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AVYAKT MURLI

26 / 01 / 70

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   26-01-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन 

         याद के यात्रा की सम्पूर्ण स्टेज

 

बापदादा भी यहाँ बैठे हैं और आप भी बैठे हो। लेकिन बापदादा और आप में क्या अन्तर है? पहले भी साकार रूप में यहाँ बैठते थे लेकिन अब जब बैठते हैं तो क्या फील होता है? जैसे साकार रूप में बाप के लिए समझते थे कि लोन ले आये हैं। उसी समान अनुभव अभी होता है। अभी आते हैं मेहमान बनकर। यूं तो आप सभी भी अपने को मेहमान समझते हो। लेकिन आपके और बाप के समझने में फर्क है। मेहमान उसको कहा जाता है जो आता है और जाता है। अभी आते हैं फिर जाने के लिए। वह था बुद्धियोग का अनुभव, यह है प्रैक्टिकल अनुभव। दुसरे शरीर में प्रवेश हो कैसे कर्त्तव्य करना होता, यह अनुभव बाप के समान करना है। दिन प्रतिदिन तुम बच्चों की बहुत कुछ समान स्थिति होती जाएगी। आप लोग भी ऐसे अनुभव करेंगे। सचमुच जैसे लोन लिया हुआ है, कर्त्तव्य के लिए मेहमान हैं। जब तक अपने को मेहमान नहीं समझते हो तब तक न्यारी अवस्था नहीं हो सकती है। जो ज्यादा न्यारी अवस्था में रहते हैं, उनकी स्थिति में विशेषता क्या होती है? उनकी बोली से उनके चलन से उपराम स्थिति का औरों को अनुभव होगा। जितना ऊपर स्थिति जाएगी, उतना उपराम होते जायेंगे। शरीर में होते हुए भी उपराम अवस्था तक पहुंचना है। बिलकुल देह और देही अलग महसूस हो। उसको कहा जाता है याद के यात्रा की सम्पूर्ण स्टेज। वा योग की प्रैक्टिकल सिद्धि। बात करते-करते जैसे न्यारापन खींचे। बात सुनते भी जैसे कि सुनते नहीं। ऐसी भासना औरों को भी आये। ऐसी स्थिति की स्टेज को कर्मातीत अवस्था कहा जाता है। कर्मातीत अर्थात् देह के बंधन से मुक्त। कर्म कर रहे हैं लेकिन उनके कर्मों का खाता नहीं बनेगा जैसे कि न्यारे रहेंगे, कोई अटैचमेंट नहीं होगा। कर्म करनेवाला अलग और कर्म अलग हैं ऐसे अनुभव दिन प्रति दिन होता जायेगा। इस अवस्था में जास्ती बुद्धि चलाने की भी आवश्यकता नहीं है। संकल्प उठा और जो होना है वाही होगा। ऐसी स्थिति में सभी को आना होगा। मूलवतन जाने के पहले वाया सूक्ष्मवतन जायेंगे। वहां सभी को आकर मिलना है फिर अपने घर चलकर फिर अपने राज्य में आ जायेंगे जैसे साकार वतन में मेला हुआ वैसे ही सूक्ष्मवतन में होगा। वह फरिश्तों का मेला नजदीक है। कहानियाँ बताते हैं ना। फ़रिश्ते आपस में मिलते थे। रूह रूहों से बात करते थे। वही अनुभव करेंगे। तो जो कहानियाँ गई हुई हैं उसका प्रैक्टिकल में अनुभव होगा। उसी मेले के दिनों का इंतज़ार है। अभी सर्विस के निमित्त हैं। सभी कुछ भूले हुए बैठे हैं। उस अव्यक्त स्थिति में मन और तन व्यक्त देश में है। ऐसे अनुभव होता है? अच्छा-

अपने को कहाँ के निवासी समझते हो? परमधाम के निवासी समझते हो? यह कितना समय याद रहती है? यह एक ही बात याद रहे कि हम परमधाम निवासी आत्मा इस व्यक्त देश में ईश्वरीय कर्त्तव्य करने के निमित्त आये हुए हैं। मधुबन में आकर के विशेष कौन सा गुण लिया है? मधुबन का विशेष गुण है मधुरता। मधु अर्थात् मधुरता। स्नेही। जितना स्नेही होंगे उतना बेहद का वैराग्य होगा। यह है मधुबन का अर्थ। अति स्नेही और इतना ही बेहद की वैराग्य वृत्ति। अगर मधुबन के विशेष गुण जीवन में धारण करके जाएँ तो सहज ही सम्पूर्ण बन सकते हैं। फिर जो रूहानी टीचर्स बनना चाहिए तो नंबर वन की टीचर बन सकते हो। क्योंकि जैसी अपनी धरना होगी वैसे औरों को अनुभव् में ला सकेंगे। इन दोनों गुणों की अपने में धरना करनी है। मधुबन की लकीर से बाहर निकलने के पहले अपने में पूरी रीति यह भरकर जाना। एक स्नेह से दूसरा बेहद की वैराग्य वृत्ति से कोई भी परिस्थितियों को सहज ही सामना करेंगे। सफलता के सितारे बन्ने के लिए यह दो गुण मुख्य मधुबन की सौगात ले जाना है। जैसे कहाँ भी जाना होता है तो वहां जाते ही पूछा जाता है कि यहाँ की विशेष चीज़ क्या हैं? जो प्रसिद्द विशेष चीज़ होती है, वह ज़रूर साथ में ले जाते हैं। तो यहाँ मधुबन के दो विशेष गुण अपने साथ ले जाना। जैसे स्थूल मधु ले जाते हो ना। वैसे यह सूक्ष्म मधुरता की मधु ले जाना। फिर सफलता ही सफलता है। असफलता आपके जीवन से मिट जाएगी। सफलता का सितारा अपने मस्तक में चमकते हुए देखेंगे।

तुम सफलता के सितारे हो वा पुरुषार्थ के सितारे हो? क्या समझते हो? सफलता के सितारे हो? जैसा लक्ष्य होता है वैसा ही लक्षण होता है। अगर अब तक यही सोचते रहेंगे कि हम पुरुषार्थी हैं तो ऐसा समझने से कई छोटी-छोटी गलतियां अपने को माफ़ कर देते हो। समझते हो हम तो पुरुषार्थी है। इसलिए अब पुरुषार्थी नहीं लेकिन सफलता का स्वरुप बनना है। कहाँ तक पुरुषार्थ में रहेंगे। जब स्वयं सफलता स्वरुप बनेंगे तब दूसरी आत्माओं को भी सफलता का मार्ग बता सकेंगे। अगर खुद ही अंत तक पुरुषार्थी चलते रहेंगे तो संगम के प्रालब्ध का अनुभव कब करेंगे? क्या यह जीवन पुरुषार्थी ही रहेंगे? इस संगमयुग की प्रालब्ध प्रत्यक्ष रूप में नहीं प्राप्त करेंगे? संगम के पुरुषार्थ का फल क्या? (सफलता) तो सफलता स्वरुप भी निश्चय करने से सफलता होती रहेगी। जब यह समझेंगे कि में हूँ ही सफलता का सितारा तो असफलता कैसे आ सकती है। सर्वशक्तिवान की संतान कोई कार्य में असफल नहीं हो सकती। अपने मस्तक में विजय का सितारा देखते हो या देखेंगे? विजय तो निश्चित है ही ना। विजय अर्थात् सफलता। अभी समय बदल रहा है। जब समय बदल गया तो अपने पुरुषार्थ को भी बदलेंगे ना। अब बाप ने सफलता का रूप दिखला दिया तो बच्चे भी रूप में व्यक्त देह में होते सफलता का रूप नहीं दिखायेंगे। अपने को सदैव सफलता का मूर्त ही समझो। निश्चय को विजय कहा जाता है। जैसा विश्वास रखा जाता है वैसा ही कर्म होता है। निश्चय में कमी होती तो कर्म में भी कमी हो जाएगी। स्मृति शक्तिवान है तो स्थिति और कर्म भी शक्तिवान होंगे। इसलिए कभी भी अपनी स्मृति को कमज़ोर नहीं रखना। शक्तिदल और पाण्डव कब असफल हो सकते हैं क्या? अपनी कल्प पहले वाली बात याद है कि पाण्डवों ने क्या किया था? विजयी बने थे। तो अब अपने स्मृति को श्रेष्ठ बनाओ। अब संगम पर है विजय का तिलक फिर इस विजय के तिलक से राज तिलक मिलेगा। इस विजय के तिलक को कोई मिटा नहीं सकते। ऐसा निश्चय है? जो विजयी रत्न हैं उनकी हर बात में विजय ही विजय है। उनकी हार हो नहीं सकती। हार तो बहुत जन्म खाते रहे। अब आकर विजयी बन्ने बाद फिर हार क्यों? विजय हमारी ही है ऐसा एक बल एक भरोसा हो।

(बच्ची यदि ज्ञान में नहीं चलती है तो क्या करें? ) अगर कोई इस मार्ग में नहीं चल सकते हैं तो शादी करनी ही पड़े। उन्हों की कमजोरी भी अपने ऊपर से मिटानी है। साक्षी हो मज़बूरी भी करना होता है। वह हुआ फ़र्ज़। लगन नहीं है। फ़र्ज़ पालन करते हैं। एक होता है लगन से करना, एक होता है निमित्त फ़र्ज़ निभाना। सभी आत्माओं का एक ही समय यह जन्म सिद्ध अधिकार लेने का पार्ट नहीं है। परिचय मिलना तो ज़रूर है, पहचानना भी है लेकिन कोई का पार्ट अभी है कोई का पीछे। बीजों में से कोई झट से फल देता है, कोई देरी से फल देता है। वैसे ही यहाँ भी हरेक का अपने समय पर पार्ट है, कोई देरी से फल देता है। वैसे ही यहाँ भी हरेक का अपने समय पर पार्ट है। फ़र्ज़ समझ करेंगे तो माया का मर्ज नहीं लगेगा। नहीं तो वायुमंडल का असर लग सकता है। इसलिए फ़र्ज़ समझ करना है। फ़र्ज़ और मर्ज में सिर्फ एक बिंदी का फर्क है। लेकिन बिंदी रूप में न होने कारण फ़र्ज़ भी मर्ज हो जाता है। जो मददगार हैं उन्हों को मदद तो सदैव मिलती है। बाप की मदद हर कार्य में कैसे मिलती है यह अनुभव होता हैं? एक दो के विशेष गुण को देख एक दो को आगे रखना है। किसको आगे रखना यह भी अपने को आगे बढ़ाना है।

शिवजयंति पर आवाज़ फैलाना सहज होता है, जितनी हिम्मत हो उतना करो। क्योंकि फिर समय ऐसा आना है जो इस सर्विस के मौके भी कम मिलेंगे। इसलिए जितना कर सकते हो उतना करो। भूलें क्यों होती हैं? उसकी गहराई में जाना है। अंतर्मुख हो सोचना चाहिए यह भूल क्यों हुई? यह तो माया का रूप हा। मैं तो रचयिता बाप का बच्चा हूँ। अपने साथ एकांत में ऐसे-ऐसे बात करो। उभारने की कोशिश करो। कहाँ भी जाना होता है तो अपना यादगार छोड़ना होता है और कुछ ले जाना होता है। तो मधुबन में विशेष कौन सा यादगार छोड़ा? एक-एक आत्मा के पास यह ईश्वरीय स्नेह और सहयोग का यादगार छोड़ना है। जितना एक दो के स्नेही सहयोगी बनते हैं उतना ही माया के विघ्न हटाने में सहयोग मिलता है। सहयोग देना अर्थात् सहयोग लेना। परिवार में आत्मिक स्नेह देना है और माया पर विजय पाने का सहयोग लेना है। यह लेन-देन का हिसाब ठीक रहता है। इस संगम समय पर ही अनेक जन्मों का सम्बन्ध जोड़ना है। स्नेह है सम्बन्ध जोड़ने का साधन। जैसे कपडे सिलाई करने का साधन धागा होता है वैसे ही भविष्य सम्बन्ध जोड़ने का साधन है स्नेह रूपी धागा। जैसे यहाँ जोड़ेंगे वैसे वहां जूता हुआ मिलेगा। जोड़ने का समय और स्थान यह है। ईश्वरीय स्नेह भी तब जुड़ सकता है जब अनेक के साथ स्नेह समाप्त हो जाता है। तो अब अनेक स्नेह समाप्त कर एक से स्नेह जोड़ना है। वह अनेक स्नेह भी परेशान करने वाले हैं। और यह एक स्नेह सदैव के लिए परिपक्व बनाने वाला है। अनेक तरफ से तोडना और एक तरफ जोड़ना है। बिना तोड़े कभी जुट नहीं सकता। अभी कमी को भी भर सकते हो। फिर भरने का समय ख़त्म। ऐसे समझ कर कदम को आगे बढ़ाना है।

सभी तीव्र पुरुषार्थी हो वा पुरुषार्थी हो? तीव्र पुरुषार्थी के मन के संकल्प में भी हार नहीं हो सकती है। ऐसी स्थिति बनानी है। जो संकल्प में भी माया से हार न हो। इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थी। वे शुद्ध संकल्पों में पहले से ही मन को बिजी रखेंगे तो और संकल्प नहीं आएंगे। पूरा भरा हुआ होगा तो एक बूंद भी जास्ती पद नहीं सकेगी, नहीं तो बज जायेगा। तो यही संकल्प मन में रहे जो व्यर्थ संकल्प आने का स्थान ही न हो। इतना अपने को बिजी रखो। मन को बिजी रखने के तरीके जो मिलते हैं, वह आप पुरे प्रयोग में नहीं लाते हो। इसलिए व्यर्थ संकल्प आ जाते हैं। एक तरफ बिजी रखने से दूसरा तरफ स्वयं छुट जाता है।

मंथन करने के लिए तो बहुत खज़ाना है। इसमें मन को बिजी रखना है। समय की रफ़्तार तेज़ है वा आप लोगों के पुरुषार्थ की रफ़्तार तेज़ हा? अगर समय तेज़ चल रहा है और पुरुषार्थ ढीला है तो उसकी रिजल्ट क्या होगी? समय आगे निकल जायेगा और पुरुषार्थी रह जायेंगे। समय की गाडी छुट जाएगी। सवार होनेवाले रह जायेंगे। समय की कौन सी तेज़ देखते हो? समय में बीती को बीती करने की तेज़ है। वही बात को समय फिर कब रिपीट करता है? तो पुरुषार्थ की जो भी कमियाँ हैं उसमे बीती को बीती समझ आगे हर सेकंड में उन्नति को लाते जाओ तो समय के समान तेज़ चल सकते हो। समय तो रचना है ना। रचना में यह गुण है तो रचयिता में भी होना चाहिए। ड्रामा क्रिएशन है तो क्रिएटर के बच्चे आप हो ना। तो क्रिएटर के बच्चे क्रिएशन से ढीले क्यों? इसलिए सिर्फ एक बात का ध्यान रहे कि जैसे ड्रामा में हर सेकंड अथवा जो बात बीती, जिस रूप से बीत गयी वह फिर से रिपीट नहीं होगी फिर रिपीट होगी 5000 वर्ष के बाद। वैसे ही कमजोरियों को बार-बार रिपीट करते हो? अगर यह कमजोरियां रिपीट न होने पाएं तो फिर पुरुषार्थ तेज़ हो जायेगा। जब कमजोरी समेटी जाती है तब कमजोरी की जगह पर शक्ति भर जाती है। अगर कमजोरियां रिपीट होती रहती हैं तो शक्ति नहीं भारती है। इसलिए जो बीता सो बीता, कमजोरी की बीती हुई बातें फिर संकल्प में भी नहीं आनी चाहिए। अगर संकल्प चलते हैं तो वाणी और कर्म में आ जाते हैं। संकल्प में ही ख़त्म कर देंगे तो वाणी कर्म में नहीं आयेंगे। फिर मन वाणी कर्म तीनों शक्तिशाली हो जायेंगे। बुरी चीज़ को सदैव फ़ौरन ही फेंका जाता है। अछि चीज़ को प्रयोग किया जाता है तो बुरी बातों को ऐसे फेंको जैसे बुरी चीज़ को फेंका जाता है। फिर समय पुरुषार्थ से तेज़ नहीं जाएगा। समय का इंतज़ार आप करेंगे तो हम तैयार बैठे हैं। समय आये तो हम जाएँ। ऐसी स्थिति हो जाएगी। अगर अपनी तैय्यारी नहीं होती है तो फिर सोचा जाता है कि समय थोडा हमारे लिए रुक जायेगा।

बांधेली का योग तेज़ होता है। क्योंकि जिस बात से कोई रोकते हैं तो बुद्धि ज़रूर उस तरफ लगी रहती है। घर बैठे भी चरित्रों का अनुभव कर सकते हो। लेकिन ऐसी लगन चाहिए। जब ऐसी लगन-अवस्था हो जाएगी तो फिर बंधन कट जायेंगे। एक की याद ही अनेक बंधन को तोड़नेवाली है। एक से जोड़ना है, अनेक से तोडना है। एक बाप के सिवाए दूसरा न कोई। जब ऐसी अवस्था हो जाएगी फिर यह बंधन आदि सभी ख़त्म हो जायेंगे। जितना अटूट स्नेह होगा उतना ही अटूट सहयोग मिलेगा। सहयोग नहीं मिलता, इसका कारण स्नेह में कमी है। अटूट स्नेह रख करके अटूट सहयोग को प्राप्त करना है। कल्प पहले का अपना अधिकार लेने लिए फिर से पहुच गए हो, ऐसा समझते हो? वह स्मृति आती है कि हम ही कल्प पहले थे। अभी भी फिर से हम ही निमित्त बनेंगे। जिसको यह नशा रहता है उनके चेरे में ख़ुशी और ज्योति रूप देखने में आता है। उनके चेहरे में अलौकिक अव्यक्ति चमक रहती है। उनके नयनों से, मुख से सदैव ख़ुशी ही ख़ुशी देखेंगे। देखनेवाला भी अपना दुःख भूल जाये। जब कोई दुखी आत्मा होती है तो अपने को ख़ुशी में लाने लिए ख़ुशी के साधन बनाती है ना। तो दर्पण में चेहरा देखने में आये। तुम्हारे चेहरे से सर्विस हो। न बोलते हुए आपका मुख सर्विस करे। आजकल दुनिया में अपने चेहरे को ही श्रृंगारते हैं ना। तो आप सभी आत्माओं का भी ऐसा श्रृंगारा हुआ मुंह देखने में आये। सर्वशक्तिमान बाप के बच्चे हैं फिर शक्ति न आये यह कैसे हो सकता है। ज़रूर बुद्धि की तार में कमी है। तार को जोड़ने के लिए जो युक्तियाँ मिलती हैं उसको अभ्यास में लाओ। तोड़ने बिगर जोड़ लेते हैं तो पूरा फिर जुटता नहीं। थोड़े समय के लिए जुटता फिर टूट जाता है। इसलिए अनेक तरफ से तोड़कर एक तरफ जोड़ना है। इसके लिए संग भी चाहिए और अटेंशन भी चाहिए। हर कदम पर, संकल्प पर अटेंशन। संकल्प जो उठता है वह चेक करो कि यह हमारा संकल्प यथार्थ है वा नहीं? इतना अटेंशन जब संकल्प पर हो तब वाणी भी ठीक और कर्म भी ठीक रहे। संकल्प और समय दोनों ही संगम युग के विशेष खजाने हैं। जिससे बहुत कमाई कर सकते हो। जैसे स्थूल धन को सोच समझकर प्रयोग करते हैं कि एक पैसा भी व्यर्थ न जायें। वैसे ही यह संगम का समय और संकल्प व्यर्थ न जाएँ। अगर संकल्प पावरफुल हैं तो अपने ही संकल्प के आधार पर अपने लिए सतयुगी सृष्टि लायेंगे। अपने ही संकल्प कमज़ोर हैं तो अपने लिए त्रेतायुगी सृष्टि लाते हैं। यह खज़ाना सारे कल्प में फिर नहीं मिलेगा। तो जो मुश्किल से एक ही समय पर मिलने वाली चीज़ है, उसका कितना मूल्य रखना चाहिए। अभी जो बना सो बना। फिर बने हुए को देखना पड़ेगा। बना नहीं सकेंगे। अभी बना सकते हो। उसका अब थोडा समय है। दूसरों को तो कहते हो बहुत गई थोड़ी रही।।। लेकिन अपने साथ लगाते हो? समय थोडा रहा है लेकिन काम बहुत करना है। अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा करो कि आज से फिर यह बातें कभी नहीं रहेंगी। यह संस्कार अपने में फिर इमर्ज नहीं होने देंगे। यह व्यर्थ संकल्प कभी भी उत्पन्न नहीं होने देंगे। जब ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करेंगे तब ही प्रत्यक्ष फल मिलेगा। अब दिन बदलते जाते हैं। तो खुद को भी बदलना है। अब ढीले पुरुषार्थ के दिन चले गए, अब है तीव्र पुरुषार्थ करने का समय। तीव्र पुरुषार्थ के समय अगर कोई ढीला पुरुषार्थ करे तो क्या कहेंगे? इसलिए अब जोश में आओ। बार-बार बेहोश न हो। संजीवनी बूटी साथ में रख सदैव जोश में रहो। बाकी हाँ करेंगे, हो जायेगा, देख लेंगे यह अक्षर अभी न निकलें। ऐसी बातें बहुत समय सुनीं। अब बापदादा यही सुनने चाहते हैं कि हाँ बाबा करके दिखायेंगे।

अपनी चलन में अलौकिकता लाओ तो चलन की आकर्षण लौकिक सम्बन्धियों आदि को भी स्वयं खिंचेगी। लौकिक सम्बन्ध में वाणी काम नहीं करती। चलन की आकर्षण होगी। तो अब बहुत तेज़ से चलना है। अभी ऐसा बदल कर दिखाओ जो सभी के आगे एग्जाम्पल बनो। अब एक सेकंड भी नहीं गंवाना है। चेक आप कर सकते हो। अब समय बहुत थोडा रह गया है। समय भी बेहद की वैराग्य वृत्ति को उत्पन्न करता है। लेकिन समय के पहले जो अपनी मेहनत से करेंगे तो उनका फल ज्यादा मिलेगा। जो खुद नहीं कर सकेंगे उन्हों के लिए समय हेल्प करेगा। लेकिन वह समय की बलिहारी होगी। अपनी नहीं।

 

कितनी बार बापदादा से मिले हुए हो? यह स्मृति में है कि अनेक बार यह जन्म-सिद्ध अधिकार मिला है। कितना बड़ा अधिकार है। जो कई प्रयत्नों से भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह सहज ही प्राप्त हो रहा है ऐसा अनुभव किया है? समय बाकी कितना है और पुरुषार्थ क्या किया है? दोनों की परख है? समय कम है और पुरुषार्थ बहुत करना है। जब कोई स्टूडेंट लास्ट टाइम पर आकर दाखिल होते हैं तो वह थोड़े समय में कितनी मेहनत करते हैं। जितना समय तेज़ जा रहा है इतना तेज़ पुरुषार्थ है? कब शब्द निकाल ही देना चाहिए। जो तीव्र पुरुषार्थी होते हैं वह कब शब्द नहीं बोलते, अब बोलेंगे। अब से करेंगे। यह संगम समय का एक सेकंड भी कितना बड़ा मूल्यवान है। एक सेकंड भी व्यर्थ गया तो कितनी कमाई व्यर्थ हो जाएगी। पुरे कल्प की तकदीर बनाने का यह थोडा समय है। एक सेकंड पद्मों की कमाई करने वाला भी है और एक सेकंड में पद्मों की कमाई गँवाता है। ऐसे समय को परख करके फिर पाँव तेज़ करो। समस्याएं तो बनती रहेंगी। स्थिति इतनी पावरफुल हो जो परिस्थितियां स्थिति से बदल जाएँ। परिस्थिति के आधार पर स्थिति न हो। स्थिति परिस्थिति को बदल सकती है क्योंकि सर्वशक्तिमान के संतान हो तो क्या ईश्वरीय शक्ति परिस्थिति नहीं बदल सकती! रचयिता के बच्चे रचना को नहीं बदल सकते हैं! रचना पावरफुल होती है वा रचयिता? रचयिता के बच्चे रचना के अधीन कैसे होंगे। अधिकार रखना है न कि अधीन होना है। जितना अधिकार रखेंगे उतना परिस्थितियाँ भी बदल जाएँगी। अगर उनके पीछे पड़ते रहेंगे तो और ही सामना करेंगी। परिस्थितियों के पीछे पड़ना ऐसे है जैसे कोई अपनी परछाई को पकड़ने से वह हाथ आती है? और ही आगे बढती है तो उसको छोड़ दो। वायुमंडल को बदलना, यह तो बहुत सहज है। इतनी छोटी सी अगरबत्ती, खुशबु की चीज़ भी वायुमंडल को बदल सकती है। तो ज्ञान की शक्ति से वायुमंडल को नहीं बदल सकते? यह ध्यान रखना है, वायुमंडल को सदैव शुद्ध रखना है। लोग क्या भी बोलें। जिस बात में अपनी लगन नही होती है तो वह बात सुनते हुए जैसे नहीं सुनते। तन भाव वहां हो लेकिन मन नहीं। ऐसे तो कई बार होता है। मन कोई और तरफ होता है और वहां बैठे भी जैसे नहीं बैठते हैं। तन से साथ देना पड़ता है लेकिन मन से नहीं। उसके लिए सिर्फ अटेंशन दें अहै। जब तक हिम्मत न रख पाँव नहीं रखा है तो ऊँची मंजिल लगेगी। अगर पाँव रखेंगे तो फिर लिफ्ट की तरह झट पहुँच जायेंगे। हिम्मत रखो तो चढ़ाई भी लिफ्ट बन जाएगी। तो हिम्मत का पाँव रखो, कर सकते हो, सिर्फ लोक लाज का त्याग और हिम्मत की धारणा चाहिए। एक दो का सहयोग भी बड़ी लिफ्ट है। परिस्थितियाँ तो आयेंगी लेकिन अपनी स्थिति पावरफुल चाहिए। फिर जैसा समय वैसा तरीका भी टच होगा। अगर समय प्रमाण युक्ति नहीं आती है तो समझना चाहिए योग बल नहीं है। योगयुक्त है तो मदद भी ज़रूर मिलती है। जो यथार्थ पुरुषार्थी है उनके पुरुषार्थ में इतनी पॉवर रहती है। ज्यादा सोचना भी नहीं चाहिए। अनेक तरफ लगाव है, फिर माया की अग्नि भी लग जाती है। परन्तु लगाव नहीं होना चाहिए। फ़र्ज़ तो निभाना है लेकिन उसमे लगाव न हो। ऐसा पावरफुल रहना है जो औरों के आगे एग्जाम्पल हो। जो एग्जाम्पल बनते हैं वह एग्जामिन में पास होते हैं। एग्जामिन देने लिए एग्जाम्पल बन दिखाओ। जो सभी देखें कि ये कैसे नवीनता में आ गए हैं। ऐसे सर्विसेबुल बनना है जो आप को देख औरों को प्रेरणा मिले। पहले जो शक्तियां निकलीं उन्हों ने इतनी शक्तियों को निकाला। आप शक्तियां फिर सृष्टि को बदलो। इतना आगे जाना है। गीत भी हैं ना हम शक्तियां दुनिया को बदल कर दिखायेंगे। सृष्टि को कौन बदलेंगे? जो पहले खुद बदलेंगे। शक्तियों की सवारी शेर पर दिखाते हैं। कौन सा शेर? यह माया जो शेरनी रूप में सामना करने आती है उनको अपने अधीन कर सवारी बनाना अर्थात् उनकी शक्ति को ख़त्म करना। ऐसी शक्तियां जिनकी शेर पर सवारी दिखाते हैं वही तुम हो ना। वह सभी का ही चित्र है। ऐसी शेरनी शक्तियां कभी माया से घबराती नहीं। लेकिन माया उनसे घबराती है। ऐसे माया जीत बने हो ना। शक्ति बिगर बंधन नहीं टूटेंगे। याद की शक्ति है एक बाप दूसरा न कोई। ऐसा सौभाग्य कोटों में कोई को मिलता है। इतना पद्मा पद्मभाग्यशाली अपने को समझते हो? शक्ति दल बहुत कमाल कर सकता है। जो हड्डी सेवा करनेवाले होते हैं उनको बाप भी मदद करता है। जो स्नेही हैं, उनसे बाप भी स्नेही रहता है। बाप के भी वही बच्चे सामने रहते हैं। भल कोई कितना भी दूर हो लेकिन बापदादा के दिल के नजदीक है।

सभी से अच्छी सौगात है अपने इस चेहरे को सदैव हर्षित बनाना। कभी भी कोई परेशानी की रेखा न हो। जैसे सम्पूर्ण चन्द्रमा कितना सुन्दर लगता है। वैसे अपना चेहरा सदैव हर्षित रहे। चेहरा ऐसा चमकता हुआ हो जो और भी आपके चेहरे में अपना रूप देख सकें। चेहरा दर्पण बन जाए। अनेक आत्माओं को अपना मुखड़ा दिखलाना है। अभी पद्मापद्म भाग्यशाली बनना है। महादानी बनना है। रहम दिल बाप के बच्चे सर्व आत्माओं पर रहम करना है। इस रहम की भावना से कैसी भी आत्माएं बदल सकती हैं। सारे दिन में यह चेक करो कि कितने रहम दिल बने। कितनी आत्माओं पर रहम करना है। इस रहम की भावना से कैसी भी आत्माएं बदल सकती है। सारे दिन में यह चेक करो कि कितने रहम दिल बने? कितनी आत्माओं पर रहम किया। दूसरों को सुख देने में भी अपने में सुख भरता है। देना अर्थात् लेना। दूसरों को सुख देने से खुद भी सुख स्वरुप बनेंगे। कोई विघ्न नहीं आयेंगे। दान करने से शक्ति मिलती है। अंधों को आँखें देना कितना महान कार्य है। आप सभी का यही कार्य है। अज्ञानी अंधों को ज्ञान नेत्र देना। और अपनी अवस्था सदैव अचल हो। तुम बच्चों की स्थिति का ही यह अचलघर यादगार है। जैसे बापदादा एकरस रहते हैं वैसे बच्चों को भी एकरस रहना है। जब एक के ही रस में रहेंगे तो एकरस अवस्था में रहेंगे। अच्छा

 

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QUIZ QUESTIONS

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 प्रश्न 1 :- कर्मातीत अवस्था किसको कहा जाता है?

 

 प्रश्न 2 :- मधुबन के दो कौन से विशेष गुण सौगात में अपने साथ ले जाना है? और क्यों?

 

 प्रश्न 3 :- तीव्र पुरुषार्थी किसे कहा जाता है? समय के समान तेज़ चलने के लिए पुरुषार्थ को तेज़ करने के बारे में बाबा ने क्या कहा है?

 

 प्रश्न 4 :- बांधेलियों के योग के सन्दर्भ में बाबा ने क्या कहा है?

 

 प्रश्न 5 :- चेहरे और चलन से सर्विस के विषय में बाबा ने क्या समझानी दी है?

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

 

(राज, लक्षण, बूटी, जोश, न्यारी, मर्ज, तिलक, संजीवनीअवस्था)

 

1         जैसा लक्ष्य होता है वैसा ही _________ होता है।

 

 2  जब तक अपने को मेहमान नहीं समझते हो तब तक ______   ________नहीं हो सकती है।

 

3  अब संगम पर है विजय का तिलक फिर इस विजय के तिलक से ________ _________  मिलेगा

 

4  फ़र्ज़ समझ करेंगे तो माया का _______ नहीं लगेगा।

 

 5  बार-बार बेहोश न हो। ______  ______  साथ में रख सदैव ____ में रहो।

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-】【

 

1      :- सर्वशक्तिवान की संतान कोई कार्य में सफल नहीं हो सकती।

 

2      :- एक दो के विशेष गुण को देख एक दो को पीछे रखना है। किसको आगे रखना यह भी अपने को पीछे बढ़ाना है।

 

3      :- मंथन करने के लिए तो बहुत खज़ाना है। इसमें मन को बिजी रखना है।

 

4      :- अपने ही संकल्प कमज़ोर हैं तो अपने लिए सतयुगी सृष्टि लाते हैं। 

 

 5   :- हिम्मत रखो तो चढ़ाई भी लिफ्ट बन जाएगी।

 

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QUIZ ANSWERS

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 प्रश्न 1 :-  कर्मातीत अवस्था किसको कहा जाता है?

  उत्तर 1 :- .. बात करते-करते जैसे न्यारापन खींचे। बात सुनते भी जैसे कि सुनते नहीं। ऐसी भासना औरों को भी आये। ऐसी स्थिति की स्टेज को कर्मातीत अवस्था कहा जाता है।

          ..❶  कर्मातीत अर्थात् देह के बंधन से मुक्त। कर्म कर रहे हैं लेकिन उनके कर्मों का खाता नहीं बनेगा जैसे कि न्यारे रहेंगेकोई अटैचमेंट नहीं होगा।

          ..❷  कर्म करनेवाला अलग और कर्म अलग हैं ऐसे अनुभव दिन प्रति दिन होता जायेगा। इस अवस्था में जास्ती बुद्धि चलाने की भी आवश्यकता नहीं है। संकल्प उठा और जो होना है वही होगा।ऐसी स्थिति में सभी को आना होगा।

 

 प्रश्न 2 :-  मधुबन के दो कौन से विशेष गुण सौगात में अपने साथ ले जाना है? और क्यों?

उत्तर 2 :- .. मधुबन के दो विशेष गुण जो सौगात में अपने साथ ले जाना है वो हैं:- अति स्नेही और इतना ही बेहद की वैराग्य वृत्ति। बाबा ने कहा है कि :-

          ..❶  एक स्नेह से दूसरा बेहद की वैराग्य वृत्ति से कोई भी परिस्थितियों को सहज ही सामना करेंगे। सफलता के सितारे बनने के लिए यह दो गुण मुख्य मधुबन की सौगात ले जाना है।

          ..❷  अगर मधुबन के विशेष गुण जीवन में धारण करके जाएँ तो सहज ही सम्पूर्ण बन सकते हैं। फिर जो रूहानी टीचर्स बनना चाहिए तो नंबर वन की टीचर बन सकते हो। क्योंकि जैसी अपनी धारणा होगी वैसे औरों को अनुभव् में ला सकेंगे। इन दोनों गुणों की अपने में धारणा करनी है। मधुबन की लकीर से बाहर निकलने के पहले अपने में पूरी रीति यह भरकर जाना।    

          ..❸  जैसे कहाँ भी जाना होता है तो वहां जाते ही पूछा जाता है कि यहाँ की विशेष चीज़ क्या हैंजो प्रसिद्द विशेष चीज़ होती हैवह ज़रूर साथ में ले जाते हैं। तो यहाँ मधुबन के दो विशेष गुण अपने साथ ले जाना। जैसे स्थूल मधु ले जाते हो ना। वैसे यह सूक्ष्म मधुरता की मधु ले जाना।

          ..❹  फिर सफलता ही सफलता है। असफलता आपके जीवन से मिट जाएगी। सफलता का सितारा अपने मस्तक में चमकते हुए देखेंगे।

 

 प्रश्न 3 :-  तीव्र पुरुषार्थी किसे कहा जाता है? समय के समान तेज़ चलने के लिए पुरुषार्थ को तेज़ करने के बारे में बाबा ने क्या कहा है?

 उत्तर 3 :- .. ऐसी स्थिति बनानी है जो संकल्प में भी माया से हार न हो। इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थी। शुद्ध संकल्पों में पहले से ही मन को बिजी रखेंगे तो और संकल्प नहीं आएंगे। तो यही संकल्प मन में रहे जो व्यर्थ संकल्प आने का स्थान ही न हो। इतना अपने को बिजी रखो।

          ..  समय के समान तेज़ चलने के लिए पुरुषार्थ को तेज़ करने के बारे में बाबा ने कहा है कि:-

          ..❶  अगर समय तेज़ चल रहा है और पुरुषार्थ ढीला है तो उसकी रिजल्ट क्या होगीसमय आगे निकल जायेगा और पुरुषार्थी रह जायेंगे। समय में बीती को बीती करने की तेज़ है। वही बात को समय फिर कब रिपीट करता है? तो पुरुषार्थ की जो भी कमियाँ हैं उसमे बीती को बीती समझ आगे हर सेकंड में उन्नति को लाते जाओ तो समय के समान तेज़ चल सकते हो।

          ..❷  समय तो रचना है ना। रचना में यह गुण है तो रचयिता में भी होना चाहिए। ड्रामा क्रिएशन है तो क्रिएटर के बच्चे आप हो ना। तो क्रिएटर के बच्चे क्रिएशन से ढीले क्यों? इसलिए सिर्फ एक बात का ध्यान रहे कि जैसे ड्रामा में हर सेकंड अथवा जो बात बीतीजिस रूप से बीत गयी वह फिर से रिपीट नहीं होगी फिर रिपीट होगी 5000 वर्ष के बाद।

          ..❸  वैसे ही कमजोरियों को बार-बार रिपीट करते होअगर यह कमजोरियां रिपीट न होने पाएं तो फिर पुरुषार्थ तेज़ हो जायेगा। जब कमजोरी समेटी जाती है तब कमजोरी की जगह पर शक्ति भर जाती है। अगर कमजोरियां रिपीट होती रहती हैं तो शक्ति नहीं भारती है। इसलिए जो बीता सो बीताकमजोरी की बीती हुई बातें फिर संकल्प में भी नहीं आनी चाहिए। अगर संकल्प चलते हैं तो वाणी और कर्म में आ जाते हैं। संकल्प में ही ख़त्म कर देंगे तो वाणी कर्म में नहीं आयेंगे। फिर मन वाणी कर्म तीनों शक्तिशाली हो जायेंगे।

          ..❹  बुरी चीज़ को सदैव फ़ौरन ही फेंका जाता है। अच्छी चीज़ को प्रयोग किया जाता है तो बुरी बातों को ऐसे फेंको जैसे बुरी चीज़ को फेंका जाता है। फिर समय पुरुषार्थ से तेज़ नहीं जाएगा। समय का इंतज़ार आप करेंगे तो हम तैयार बैठे हैं। समय आये तो हम जाएँ। ऐसी स्थिति हो जाएगी।

 

 प्रश्न 4 :-  बांधेलियों के योग के सन्दर्भ में बाबा ने क्या कहा है?

 उत्तर 4 :-.. बांधेलियों के योग के सन्दर्भ में बाबा ने कहा है की:-

          ..❶  बांधेली का योग तेज़ होता है। क्योंकि जिस बात से कोई रोकते हैं तो बुद्धि ज़रूर उस तरफ लगी रहती है। घर बैठे भी चरित्रों का अनुभव कर सकते हो। लेकिन ऐसी लगन चाहिए। जब ऐसी लगन-अवस्था हो जाएगी तो फिर बंधन कट जायेंगे।

          ..❷  एक की याद ही अनेक बंधन को तोड़नेवाली है। एक से जोड़ना है, अनेक से तोडना है। एक बाप के सिवाए दूसरा न कोई। जब ऐसी अवस्था हो जाएगी फिर यह बंधन आदि सभी ख़त्म हो जायेंगे।

          ..❸  जितना अटूट स्नेह होगा उतना ही अटूट सहयोग मिलेगा। सहयोग नहीं मिलताइसका कारण स्नेह में कमी है। अटूट स्नेह रख करके अटूट सहयोग को प्राप्त करना है।

 

 प्रश्न 5 :-  चेहरे और चलन से सर्विस के विषय में बाबा ने क्या समझानी दी है?

उत्तर 5 :-.. चेहरे और चलन से सर्विस के विषय में बाबा ने कहा है कि :-

          ..❶  वह स्मृति आती है कि हम ही कल्प पहले थे। अभी भी फिर से हम ही निमित्त बनेंगे। जिसको यह नशा रहता है उनके चेहरे में ख़ुशी और ज्योति रूप देखने में आता है। उनके चेहरे में अलौकिक अव्यक्ति चमक रहती है। उनके नयनों सेमुख से सदैव ख़ुशी ही ख़ुशी देखेंगे। देखनेवाला भी अपना दुःख भूल जाये।

          ..❷  जब कोई दुखी आत्मा होती है तो अपने को ख़ुशी में लाने लिए ख़ुशी के साधन बनाती है ना। तो दर्पण में चेहरा देखने में आये। तुम्हारे चेहरे से सर्विस हो। न बोलते हुए आपका मुख सर्विस करे। आजकल दुनिया में अपने चेहरे को ही श्रृंगारते हैं ना। तो आप सभी आत्माओं का भी ऐसा श्रृंगारा हुआ मुंह देखने में आये।

          ..❸  अपने इस चेहरे को सदैव हर्षित बनाना। कभी भी कोई परेशानी की रेखा न हो। जैसे सम्पूर्ण चन्द्रमा कितना सुन्दर लगता है। वैसे अपना चेहरा सदैव हर्षित रहे। चेहरा ऐसा चमकता हुआ हो जो और भी आपके चेहरे में अपना रूप देख सकें। चेहरा दर्पण बन जाए।

          ..❹  अनेक आत्माओं को अपना मुखड़ा दिखलाना है। अभी पद्मापद्म भाग्यशाली बनना है। महादानी बनना है। रहम दिल बाप के बच्चे सर्व आत्माओं पर रहम करना है। इस रहम की भावना से कैसी भी आत्माएं बदल सकती हैं।

          ..❺  अपनी चलन में अलौकिकता लाओ तो चलन की आकर्षण लौकिक सम्बन्धियों आदि को भी स्वयं खिंचेगी। लौकिक सम्बन्ध में वाणी काम नहीं करती। चलन की आकर्षण होगी। तो अब बहुत तेज़ से चलना है। अभी ऐसा बदल कर दिखाओ जो सभी के आगे एग्जाम्पल बनो।

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

 

(राज, लक्षण, बूटी, जोश, न्यारी, मर्ज, तिलक, संजीवनीअवस्था)

 

 1   जैसा लक्ष्य होता है वैसा ही _________ होता है।

    लक्षण

 

जब तक अपने को मेहमान नहीं समझते हो तब तक  ______   _______ नहीं हो सकती है।

    न्यारी  /अवस्था

 

 3   अब संगम पर है विजय का तिलक फिर इस विजय के तिलक से ________   _________  मिलेगा।

   राज / तिलक

 

 4  फ़र्ज़ समझ करेंगे तो माया का _______ नहीं लगेगा।

   मर्ज

 

 5  बार-बार बेहोश न हो। ______  ______  साथ में रख सदैव ____ में रहो।

  संजीवनी / बूटी / जोश

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-】【

 

 1  :- सर्वशक्तिवान की संतान कोई कार्य में सफल नहीं हो सकती। 

  सर्वशक्तिवान की संतान कोई कार्य में असफल नहीं हो सकती।

 

 2  :- एक दो के विशेष गुण को देख एक दो को पीछे रखना है। किसको आगे रखना यह भी अपने को पीछे बढ़ाना है।

  एक दो के विशेष गुण को देख एक दो को आगे रखना है। किसको आगे रखना यह भी अपने को आगे बढ़ाना है।

 

 3  :- मंथन करने के लिए तो बहुत खज़ाना है। इसमें मन को बिजी रखना है।

 

 4  :- अपने ही संकल्प कमज़ोर हैं तो अपने लिए सतयुगी सृष्टि लाते हैं। 

  अपने ही संकल्प कमज़ोर हैं तो अपने लिए त्रेतायुगी सृष्टि लाते हैं।

 

 5   :- हिम्मत रखो तो चढ़ाई भी लिफ्ट बन जाएगी।