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AVYAKT MURLI

30 / 05 / 71

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30-05-71  ओम शान्ति  अव्यक्त बापदादा  मधुबन

 

बाप की आज्ञा और प्रतिज्ञा

 

बापदादा आज्ञा भी करते हैं और प्रतिज्ञा भी करते हैं। ऐसे कौनसे महावाक्य हैं जिसमें आज्ञा भी आ जाए और प्रतिज्ञा भी आ जाए? ऐसे महावाक्य याद आते हैं जिनमें आज्ञा और प्रतिज्ञा - दोनों आ जाएं? ऐसे बहुत महावाक्य हैं। लम्बी लिस्ट है इनकी। लेकिन टैम्पटेशन के महावाक्य हैं कि एक कदम आप उठाओ तो हजार कदम बापदादा आगे आयेंगे, न कि 10 कदम। इन महावाक्यों में आज्ञा भी है कि एक कदम आगे बढ़ाओ और फिर प्रतिज्ञा भी है कि हजार कदम बापदादा भी आगे बढ़ेंगे। ऐसे उमंग- उत्साह दिलाने वाले महावाक्य सदैव स्मृति में रहने चाहिए। आज्ञा को पालन करने से बाप की जो प्रतिज्ञा है उससे सहज रीति अपने को आगे बढ़ा सकेंगे। क्योंकि फिर प्रतिज्ञा मदद का रूप बन जाती है। एक अपनी हिम्मत, दूसरी मदद - जब दोनों मिल जाते हैं तो सहज हो जाता है। इसलिए ऐसे-ऐसे महावाक्य सदैव स्मृति में रहने चाहिए। स्मृति ही समर्थी लाती है। जैसे राजपूत होते हैं, वह जब युद्ध के मैदान में जाते हैं तो भले कैसा भी कमज़ोर हो उनको अपने कुल की स्मृति दिलाते हैं। राजपूत ऐसे-ऐसे होते हैं, ऐसे होकर गये हैं, ऐसे ऐसे करके गये हैं, ऐसे कुल के तुम हो - यह स्मृति दिलाने से उन्हों में समर्थी आती है। सिर्फ कुल की महिमा सुनते-सुनते स्वयं भी ऐसे महान् बन जाते हैं। इस रीति आप सूर्यवंशी हो, वो सूर्यवंशी राज्य करने वाले क्या थे? कैसे राज्य किया और किस शक्ति के आधार पर से ऐसा राज्य किया? वह स्मृति और साथ-साथ अब संगमयुग के ईश्वरीय कुल की स्मृति। अगर यह दोनों ही स्मृति बुद्धि में आ जाती हैं तो फिर समर्थी आ जाती है। जिस समर्थी से फिर माया का सामना करना सरल हो जाता है। सिर्फ स्मृति के आधार से। तो हर कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए क्या साधन हुआ? स्मृति से अपने में पहले समर्थी को लाओ। फिर कार्य करो। तो भले कैसा भी कमज़ोर होगा लेकिन स्मृति के आधार से उस समय के लिए समर्थी आ जायेगी। भले पहले वह अपने को उस कार्य के योग्य न समझते होंगे लेकिन स्मृति से वह अपने को योग्य देखकर आगे के लिए उमंग-उत्साह में आयेंगे। तो सर्व कार्य करने के पहले यह स्मृति रखो। ईश्वरीय कुल और भविष्य की, दोनों ही स्मृति आने से कभी भी निर्बलता नहीं आ सकेगी। निर्बलता नहीं तो असफलता भी नहीं। असफलता का कारण ही है निर्बलता। जब स्मृति से समर्थी को लायेंगे तो निर्बलता अर्थात् कमज़ोरी समाप्त। असफलता हो नहीं सकती। तो सदा सफलतामूर्त बनने के लिए अपनी स्मृति को शक्तिशाली बनाओ, फिर स्वयं ही वह स्वरूप बन जायेंगे। जैसी-जैसी स्मृति रहेगी वैसा स्वरूप अपने को महसूस करेंगे। स्मृति होगी कि मैं शक्ति हूँ तो शक्तिस्वरूप बनकर के सामना कर सकेंगे। अगर स्मृति में ही यह रखते हो - मैं तो पुरुषार्थी हूँ, कोशिश कर देखती हूँ, तो स्वरूप भी कमज़ोर बन जाता है। तो स्मृति को शक्तिशाली बनाने से स्वरूप भी शक्ति का बन जायेगा। तो यह सफलता का तरीका है। फिर यह बोल नहीं सकेंगे कि चाहते हुए भी क्यों नहीं होता।

 

चाहना के साथ समर्थी भी चाहिए और समर्थी आयेगी स्मृति से। अगर स्मृति कमजोर है तो फिर जो संकल्प करते हो वह सिद्ध नहीं हो पाता है। जो कर्म करते हो वह भी सफल नहीं हो पाते हैं। तो स्मृति रखना मुश्किल है वा सहज है? जो सहज बात होती है वह निरन्तर भी रह सकती है। स्मृति भले निरन्तर रहती भी है लेकिन एक होती है साधारण स्मृति, दूसरी होती है पावरफुल स्मृति। साधारण रूप में तो स्मृति रहती है लेकिन पावरफुल स्मृति रहनी चाहिए। जैसे कोई जज होता है तो उनको सारा दिन अपने जजपने की स्मृति तो रहती है लेकिन जिस समय खास कुर्सा पर बैठता है तो उस समय वह सारे दिन की स्मृति से पावरफुल स्मृति होती है। तो ड्यूटी अर्थात् कर्त्तव्य पर रहने से पावरफुल स्मृति रहती है। और वैसे साधारण स्मृति रहती है। तो आप भी साधारण स्मृति में तो रहते हो लेकिन पावरफुल स्मृति, जिससे बिल्कुल वह स्वरूप बन जाए और स्वरूप की सिद्धि सफलता मिले, वह कितना समय रहती है। इसकी प्रैक्टिस कर रहे हो ना? निरन्तर समझो कि हम ईश्वरीय सर्विस पर हैं। भले कर्मणा सर्विस भी कर रहे हो, फिर भी समझो- मैं ईश्वरीय सर्विस पर हूँ। भले भोजन बनाते हो, वह है तो स्थूल कार्य लेकिन भोजन में ईश्वरीय संस्कार भरना, भोजन को पावरफुल बनाना, वह तो ईश्वरीय सर्विस हुई ना। जैसा अन्न वैसा मन कहा जाता है। तो भोजन बनाते समय ईश्वरीय स्वरूप होगा तब उस अन्न का असर मन पर होगा। तो भोजन बनाने का स्थूल कार्य करते भी ईश्वरीय सर्विस पर हो ना! आप लिखते भी हो - आन गॉडली सर्विस ओनली। तो उसका भावार्थ क्या हुआ? हम ईश्वरीय सन्तान सिर्फ और सदैव इसी सर्विस के लिए ही हैं। भल उसका स्वरूप स्थूल सर्विस का है लेकिन उसमें भी सदैव ईश्वरीय सर्विस में हूँ। जब तक यह ईश्वरीय जन्म है तब तक हर सेकेण्ड, हर संकल्प, हर कार्य ईश्वरीय सर्विस है। वह लोग थोड़े टाइम के लिए कुर्सा पर बैठ अपनी सर्विस करते हैं, आप लोगों के लिए यह नहीं है। सदैव अपने सर्विस के स्थान पर कहाँ भी हो तो स्मृति वह रहनी चाहिए। फिर कमज़ोरी आ नहीं सकती। जब अपनी सर्विस की सीट को छोड़ देते हो तो सीट को छोड़ने से स्थिति भी सेट नहीं हो पाती। सीट नहीं छोड़नी चाहिए। कुर्सा पर बैठने से नशा होता है ना। अगर सदैव अपने मर्तबे की कुर्सा पर बैठो तो नशा नहीं रहेगा? कुर्सा वा मर्तबे को छोड़ते क्यों हो? थक जाते हो? जैसे आप लोगों ने राजा का चित्र दिखाया है - पहले दो ताज वाले थे, फिर रावण पीछे से उसका ताज उतार रहा है। ऐसे अब भी होता है क्या? माया पीछे से ही मर्तबे से उतार देती है क्या! अब तो माया विदाई लेने के लिए, सत्कार करने के लिए आयेगी। उस रूप से अभी नहीं आनी चाहिए। अब तो विदा लेगी। जैसे आप लोग ड्रामा दिखाते हो - कलियुग विदाई लेकर जा रहा है। तो वह प्रैक्टिकल में आप सभी के पास माया विदाई लेने आती, न कि वार करने के लिए। अभी माया के वार से तो सभी निकल चुके हैं ना। अगर अभी भी माया का वार होता रहेगा तो फिर अपना अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कब करेंगे? वह तो अभी करना है ना। राज्य-भाग्य का तो भविष्य में अनुभव करेंगे, लेकिन अतीन्द्रिय सुख का अनुभव तो अभी करना है ना। माया के वार होने से यह अनुभव नहीं कर पाते। बाप के बच्चे बनकर वर्तमान अतीन्द्रिय सुख का पूरा अनुभव प्राप्त न किया तो क्या किया।

 

बच्चा अर्थात् वर्से का अधिकारी। तो सदैव यह सोचो कि संगमयुग का श्रेष्ठ वर्सा अतीन्द्रिय सुख सदाकाल प्राप्त रहा? अगर अल्पकाल के लिए प्राप्त किया तो बाकी फर्क क्या रहा? सदाकाल की प्राप्ति के लिए ही तो बाप के बच्चे बने। फिर भी अल्पकाल का अनुभव क्यों? अटूट, अटल अनुभव होना चाहिए। तब ही अटल, अखण्ड स्वराज्य प्राप्त करेंगे। तो अटूट रहता है वा बीच-बीच में टूटता है? टूटी हुई चीज फिर जुड़ी हुई हो और कोई बिल्कुल अटूट चीज़ है - तो दोनों से क्या अच्छा लगेगा? अटूट चीज अच्छी लगेगी ना। तो यह अतीन्द्रिय सुख भी अटूट होना चाहिए। तब समझो कि बाप के वर्से के अधिकारी बनेंगे। अगर अटूट, अटल नहीं तो क्या समझना चाहिए? वर्से के अधिकारी नहीं बने हैं लेकिन थोड़ा बहुत दान-पुण्य की रीति से प्राप्त कर लिया है, जो कभी-कभी प्राप्त हो जाता है। वर्सा सदैव अपनी प्राप्ति होती है। दान-पुण्य तो कभी-कभी की प्राप्ति होती है। वारिस हो तो वारिस की निशानी है - अतीन्द्रिय सुख के वर्से के अधिकारी। वारिस को बाप सभी-कुछ विल करता है। जो वारिस नहीं होंगे उनको थोड़ा-बहुत देकर खुश करेंगे। बाप तो पूरा विल कर रहे हैं। जिनका बाप के विल पर पूरा अधिकार होगा, उन्हों की निशानी क्या दिखाई देगी? वह विल-पावर वाले होंगे। उनका एक-एक संकल्प विल-पावर वाला होगा। अगर विल-पावर है तो असफलता कभी नहीं होगी। पूरे विल के अधिकारी नहीं बने हैं तब विल-पावर नहीं आती है। बाप की प्रॉपर्टी वा प्रास्पर्टा को अपनी प्रॉपर्टी बनाना - इसमें बहुत विशाल बुद्धि चाहिए। बाप की प्रॉपर्टी को अपनी प्रॉपर्टी कैसे बनायेंगे? जितना अपना बनाते जायेंगे उतना ही नशा और खुशी होगी। तो बाप की प्रॉपर्टी को अपनी प्रॉपर्टी बनाने का साधन कौनसा है? वा बाप की प्रॉपर्टी बाप की ही रहने दे? (कोई- कोई ने अपना विचार बताया) जिनकी दिल सच्ची थी उन पर साहेब राज़ी हुआ, तब तो प्रॉपर्टी दी। प्रॉपर्टी तो दे दी, अब उनको सिर्फ अपना बनाने की बात है। सर्विस वा दान भी तब कर सकेंगे जब प्रॉपर्टी को अपना बनाया होगा। जितना प्रॉपर्टी होगी उतना नशे से दान कर सकेंगे वा दूसरे की सर्विस कर सकेंगे। लेकिन बात है पहले अपना कैसे बनायें? अपना बन गया फिर दूसरे को देने से बढ़ता जाता है। यह हुई पीछे की बात। लेकिन पहले अपना कैसे बनायेंगे? जितना-जितना जो खज़ाना मिलता है उसके ऊपर मनन करने से अन्दर समाता है। जो मनन करने वाले होंगे उन्हों के बोलने में भी विल-पावर होगी। किसके बोलने में शक्ति का अनुभव होता है, क्यों? सुनते तो सभी इक्ट्ठे हैं। प्रॉपर्टी तो सभी को एक जैसी एक ही समय इकट्ठी मिलती है। जो मनन करके उस दी हुई प्रॉपर्टी को अपना बनाते हैं, उसको क्या होता है? कहावत है ना - अपनी घोट तो नशा चढ़े। अभी सिर्फ रिपीट करने का अभ्यास है। मनन करने का अभ्यास कम है। जितना-जितना मनन करेंगे अर्थात् प्रॉपर्टी को अपना बनायेंगे तो नशा होगा। उस नशे से किसको भी सुनायेंगे, तो उनको भी नशा रहेगा। नहीं तो नशा नहीं चढ़ता है। सिर्फ भक्त बन महिमा कर लेते हैं, नशा नहीं चढ़ता है। तो मनन करने का अभ्यास अपने में डालते जाओ। फिर सदैव ऐसे नज़र आयेंगे जैसे अपनी मस्ती में मस्त रहने वाले हैं। फिर इस दुनिया की कोई भी चीज, उलझन आपको आकर्षण नहीं करेगी, क्योंकि आप अपने मनन की मस्ती में मस्त हो। जिस दिन मनन में मस्त होंगे उस दिन माया भी सामना नहीं करेगी, क्योंकि आप बिज़ी हो ना। अगर कोई बिज़ी होता है तो दूसरा अगर आयेगा भी तो लौट जायेगा। जैसे वह लोग अन्डरग्राउण्ड चले जाते हैं ना। आप भी मनन करने से अन्दर अर्थात् अन्डरग्राउण्ड चले जाते हो। अन्डरग्राउण्ड रहने से बाहर के बाम्बस् आदि का असर नहीं होता है। इसी रीति से मनन में रहने से, अन्तर्मुखी रहने से बाहरमुखता की बातें डिस्टर्ब नहीं करेगी। देह-अभिमान से गैर हाज़िर रहेंगे। जैसे कोई अपनी सीट से गैर हाज़िर होगा तो लोग लौट जायेंगे ना। आप भी मनन में अथवा अर्न्तमुखी रहने से देह-अभिमान की सीट को छोड़ देते हो, फिर माया लौट जायेगी, क्योंकि आप अर्न्तमुखी अर्थात् अन्डरग्राउण्ड हो। आजकल अन्डरग्राउण्ड बहुत बनाते जाते हैं - सेफ्टी के लिए। तो आपके लिए भी सेफ्टी का साधन यही अन्तर्मुखता है अर्थात् देह-अभिमान से अन्डरग्राउण्ड। अन्डरग्राउण्ड में रहना अच्छा लगता है! जिसका अभ्यास नहीं होता है वह थोड़ा टाइम रह फिर बाहरमुखता में आ जाते हैं, क्योंकि बहुत जन्मों के संस्कार बाहरमुखता के हैं। तो अन्तर्मुखता में कम रह पाते हैं। लेकिन रहना निरन्तर अन्तर्मुखी है। अच्छा।

 

 

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QUIZ QUESTIONS

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प्रश्न 1 :- बापदादा ने हर कार्य मे सफलता प्राप्त करने के लिए क्या साधन बताये ?

 प्रश्न 2 :- बाबा ने भोजन बनाते हुए क्या स्मृति रखने को कहा ?

 प्रश्न 3 :- बापदादा अनुसार अब माया क्या करने आयेगी ?

 प्रश्न 4 :- बापदादा ने सेफ्टी का साधन क्या बताया ?

 प्रश्न 5 :- वारिस की निशानी क्या है और वारिस को क्या मिलता है ?

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

 ( पालन, प्रतिज्ञा, सदैव, सर्विस, सहज ईश्वरीय, खुशी, बिजी, नशा, मनन, माया )

 

  1  हम _____ सन्तान सिर्फ और _____ इसी _____ के लिए ही हैं।

  2  आज्ञा को _____ करने से बाप की जो _____ है उससे _____ रीति अपने को आगे बढ़ा सकेंगे। 

  3  जितना अपना बनाते जायेंगे उतना ही _____ और _____ होगी।

  4  जिस दिन _____ में मस्त होंगे उस दिन _____ भी सामना नहीं करेगी, क्योंकि आप _____ हो ना।

  5  जिनकी _____ _____थी उन पर साहेब राज़ी हुआ, तब तो _____ दी।

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 

 1  :-  तो यह अतीन्द्रिय सुख भी अटूट होना चाहिए।

 2  :- बाप के बच्चे बनकर वर्तमान संसार के सुख का पूरा अनुभव प्राप्त किया तो क्या किया।

 3  :- एक अपनी हिम्मत, दूसरी मदद - जब दोनों मिल जाते हैं तो मुश्किल हो जाता है।

 4  :- अगर कोई बिज़ी होता है तो दूसरा अगर आयेगा भी तो लौट जायेगा।

 5   :- बापदादा आज्ञा भी करते हैं और प्रतिज्ञा भी करते हैं।

 

 

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QUIZ ANSWERS

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प्रश्न 1 :- बाबा ने फीलिंग से परे और सभी बातों में फुल की डेफिनेशन क्या दी है?

उत्तर 1 :- .. बाबा ने बताया कि:- मास्टर सर्वशक्तिमान अर्थात् फीलिंग से परे। सभी बातों में फुल। नॉलेजफुल। सभी शब्दों के पिछाड़ी में फुल आता है। तो जितना फुल बनते जायेंगे उतना फीलिंग का फ्लो वा फ्लू यह ख़त्म हो जायेगा। फ्लोलेस को फुल कहा जाता है।

 

 प्रश्न 2 :- आज बाबा ने मास्टर सर्वशक्तिमान की कौन सी शक्ति बताई है, और मायाजीत बनने की सरल रीति क्या समझाई है?

 उत्तर 2 :- ..बाबा बताते हैं कि सर्वशक्तिमान बाप को सर्व सम्बन्ध से अपना बनाया है। यही मास्टर सर्वशक्तिमान की शक्ति है। और मायाजीत बनने प्रति बाबा ने बच्चों से ही पूछते हुए समझाया है कि :-                   

          ..❶ सर्वशक्तिमान को सर्व सम्बन्ध से अपना बनाया है?

          ..❷ जब इतना बड़े से बड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण है फिर क्यों नहीं अपने को जानते और मानते हो।

          ..❸ यह प्रत्यक्ष प्रमाण सदैव सामने रहे तो मायाजीत बहुत सरल रीति बन सकते हो। समझा।

 

प्रश्न 3 :- बुद्धि यहां वहां जाने की बच्चों की कंप्लेन प्रति बाबा ने क्या समझाया है?

उत्तर 3 :- ..बाबा ने बच्चों को समझाया कि:-

          ..❶ जब सर्व सम्बन्ध एक के साथ जुट गए तो और बात रही ही क्या। जब कुछ रहता ही नहीं तो बुद्धि जाएगी कहाँ। अगर बुद्धि इधर-उधर जाती है तो सिद्ध होता है कि सर्व सम्बन्ध एक के साथ नहीं जोड़े हैं।

          ..❷ जोड़ने की निशानी है अनेकों से टूट जाना।

          ..❸ कोई ठिकाना ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जाएगी। और सभी ठिकाने टूट जाते हैं। एक से जुट जाता है।

          ..❹ फिर यह जो कम्पलेन है कि बुद्धि यहाँ-वहाँ दौडती है वह बन्द हो जाएगी।

 

 प्रश्न 4 :- बापदादा वतन से वर्कर्स का एक्शन देखते हैं,लेकिन वर्कर्स के बदले कभी-कभी क्या करते हो, मालूम है? यहां बाबा कौन से एक्शन की बात कर रहे हैं?

उत्तर 4 :- .. बाबा बच्चों की की भिन्न भिन्न प्रकार के व्यवहार को देखकर कहते हैं कि:-

          ..❶ बापदादा वतन से वर्कर्स का एक्शन देखते हैं, जो यह करते हैं। कभी-कभी बहुत विचित्र सर्कस करते हैं।

          ..❷ जैसे सर्कस में भिन्न-भिन्न एक्ट दिखाते हैं ना। वैसे यह भी अपनी-अपनी सर्कस दिखाते हैं।

          ..❸ उस सर्कस में क्या-क्या पार्ट बजाते हैं वह देखने योग्य होता है कि कभी-कभी वर्कर्स अपना विकराल रूप दिखा देते हैं।

          ..❹ अपनी कमियों पर विकराल रूप धारण करने के बजाय अन्य पर विकराल रूप की सर्कस दिखाते हैं। चाहे व्यवहार में, चाहे परिवार में, चाहे परमार्थ में तीनों में यह विकराल रूप की सर्कस दिखाते हैं।

          ..❺ कभी-कभी फिर दूसरी सर्कस व्यर्थ संकल्प के झूले में झूलने की दिखाते हैं। वास्तव में झूला झूलना है अतीन्द्रिय सुख का लेकिन झूलते हैं व्यर्थ संकल्पों का।

          ..❻ तीसरी सर्कस कौन-सी दिखाते हैं। स्थिति बदली करने की सर्कस दिखाते हैं।

          ..❼ रूप और स्थिति बदलने का पार्ट मैजारिटी दिखाते हैं। तो वतन में बैठ कर बापदादा वर्कर्स ग्रुप की यह सर्कस देखते हैं।

 

 प्रश्न 5 :- बापदादा टीचर्स को किन टाॅपिक्स पर क्लास कराने की बात कर रहे है?

उत्तर 5 :- ..आज बापदादा ने  टीचर्स को क्लास करने के लिए जो टॉपिक्स दिये वो हैं:-

          ..❶ सम्पूर्ण प्यूरिटी किसको कहा जाता है?

          ..❷ प्यूरिटी कौन-सी और किस युक्तियों से धारण कर सकते हो?

          ..❸ प्यूरिटी की कितना विस्तार है, प्यूरिटी के विस्तार को समझना है।

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

(  पुरुषार्थ, स्वच्छता, इच्छा सफलतामूर्त, समीपता, संगमयुग, प्रालब्ध, अच्छा, सहनशक्तिवान, सम्पूर्णता, प्रासपर्टी  )

 

 1   प्यूरिटी ही ________ की ________ है।

 ..   संगमयुग /  प्रासपर्टी

 

 2  ________ बनना है। फिर उम्मीदवार से ________ बन जायेंगे।

..   सहनशक्तिवान /  सफलता मूर्त

 

3  ________ के ________ की निशानी सफलता है।

..  सम्पूर्णता /  समीपता

 

 4  ________ के बजाय  ________ शब्द याद रखना। इच्छा  ________ को ख़त्म कर देती है।

..   इच्छा /  अच्छा /  स्वच्छता

 

 5  ________ की इच्छा को ख़त्म कर सिर्फ अच्छा ________ करो। 

 ..   प्रालब्ध /  पुरुषार्थ

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 

1 :- पुरुषार्थ की प्रालब्ध को यहाँ भोगने की इच्छा से जमा होने में कमी कर देते हैं।

 

 2  :- जितना बड़ा आदमी, जितना अधिक धनवान होता है, उतना छोटा-सा बुरा कर्म वा गलती का छोटा-सा एक पैसे का दण्ड भी उसके लिए बहुत छोटा होता है।  

.. जितना बड़ा आदमी, जितना अधिक धनवान होता है, उतना छोटा-सा बुरा कर्म वा गलती का छोटा-सा एक पैसे का दण्ड भी उसके लिए बहुत बड़ा होता है।

 

3  :- जब मास्टर सर्वशक्तिमान हैं तो पास ही पास हैं। कभी फेल नहीं हो।

 

4  :- उम्मीदवार भी हो, हिम्मतवान भी हो सिर्फ एक बात एड करनी है। सहनशक्तिवान बनना है।

 

 5   :- सम्पूर्णता क्या होती है उसकी मुख्य चार बातों का पेपर लेंगे। कौन-सी चार बातें यह बतायेंगे।

 .. सम्पूर्णता क्या होती है उसकी मुख्य चार बातों का पेपर लेंगे। कौन-सी चार बातें यह नहीं बतायेंगे।