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AVYAKT MURLI

19 / 09 / 75

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19-09-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

 

शक्तियों एवं पाण्डवों की विशेषताएँ

 

सभी आत्माओं की जन्मपत्री जानने वाले, ज्ञान-सागर त्रिकालदर्शी परमात्मा शिव ने बताया -

आज अमृतवेले सर्व सेवा-स्थानों का सैर किया। वह सैर का समाचार सुनाते हैं। क्या देखा-हर एक रूहानी बच्चे रूह को राहत देने के लिए, मिलन मनाने के लिए, रूह-रूहान करने के लिए व अपने दिल की बातें दिलाराम बाप के आगे (दिलाराम अर्थात् दिल को आराम देने वाला) रखते हुए अपने को डबल लाइट का वरदान दे भी रहे थे और ले भी रहे थे। कोई-कोई बच्चे विश्व-कल्याणी स्वरूप में स्थित हो बाप द्वारा मिले हुए सर्व शक्तियों का वरदान व महादान अनेक आत्माओं के प्रति दे रहे थे। तीन प्रकार की रिजल्ट देखी। एक थे लेने वाले, दूसरे थे मिलन मनाने वाले और तीसरे थे लेकर देने वाले अर्थात् कमाई करने वाले। ऐसे तीन प्रकार के बच्चों को चारों ओर देखा।

यह सब देखते हुए इसके बाद गॉडली स्टुडेण्ट के रूप में देखा - हर एक स्टुडेन्ट के रूप में गॉडली नॉलेज पढ़ने के लिए उमंग और उत्साह से अपने-अपने रूहानी विश्व-विद्यालय की ओर आ रहे हैं। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार सब अपनी पढ़ाई में लगे हुए थे। - हर एक सेवा केन्द्र की रूहानी रौनक अपनी-अपनी थी। उसमें भी तीन प्रकार के देखे। एक थे सिर्फ सुनने वाले अर्थात् सुन-सुन कर हर्षित होने वाले, दूसरे थे सुनकर समाने वाले और तीसरे थे बाप समान नॉलेजफुल बनकर औरों को बनाने वाले।

यह सब देखते हुए फिर तीसरी स्टेज देखी - वह थी कर्मयोगी की स्टेज। तीसरी स्टेज में क्या देखा? एक थे कमल पुष्प, दूसरे थे रूहानी गुलाब और तीसरे थे वैरायटी प्रकार के फूल। उन वैरायटी फूलों में भी मैजॉरिटी सूर्यमुखी थे। जिस समय ज्ञानसूर्य के सम्मुख थे तो खिले हुए थे और कभी फिर ज्ञानसूर्य बाप से किनारा कर लेने के कारण फूलों के बजाय कलियाँ बन जाते थे अर्थात् रूप और रंग बदल जाता था। कमल-पुष्प क्या करते थे? सर्व कार्य करते हुए, सर्व सम्बन्धों के सम्पर्क में आते हुए न्यारे और साथ-साथ बाप के प्यारे थे। वायुमण्डल व आसुरी संग अनेक प्रकार की वृत्ति वाली आत्माओं के वाइब्रेशन्स के बीच कर्म करते हुए भी कर्म और योग दोनों में समान स्थिति में स्थित थे। अनेक प्रकार की हलचल में भी अचल थे। लेकिन ऐसी आत्मायें कितनी थी? 25% । उसमें भी मैजॉरिटी शक्तियाँ थी। पाण्डव सोच रहे हैं कि क्यों? पाण्डवों की विशेषता भी सुनाते हैं, थोड़ा समय सिर्फ धैर्य रखो। पाण्डव-पति के हमजिन्स पाण्डव की भी महिमा है। कमल-पुष्प के आगे रूहानी गुलाब वह कौन थे? रूहानी गुलाब जो सदा अपने रूहानियत की स्थिति में स्थित रहते हुए सर्व को भी रूहानि्ायत की दृष्टि से देखने वाले, सदा मस्तक मणि को देखने वाले हैं। साथ-साथ अपनी रूहानियत की स्थिति से सदा अर्थात् हर समय सर्व आत्माओं को अपनी स्मृति, दृष्टि और वृत्ति से रूहानी बनाने के शुभ संकल्पों में रहने वाले अर्थात् हर समय योगी तू आत्मा सेवाधारी आत्मा हो कर चलने वाले - ऐसे रूहानी गुलाब चारों ओर की फुलवारी के बीच बहुत थोड़े कहीं-कहीं देखे? यह परसेन्टेज कम थी। 10%  वैरायटी फूलों के अन्दर एक तो सूर्यमुखी सुनाया दूसरी क्वॉलिटी हर मौसम के बड़े सुन्दर रंगबिरंगे फूल होते हैं, उन पर मौसम की रंग-रूप की रौनक बड़ी अच्छी होती है। बगीचे की शो बढ़ा देते हैं। ऐसे मौसम के रंग बिरंगे फूलों के दृश्य बहुत देखे। रंग और रूप- यहाँ भी रूप ब्रह्माकुमारी और ब्रह्माकुमार का है, रंग ज्ञान का लगा हुआ है। तो रंग भी और रूप भी है, लेकिन रूहानियत कम। रूहानी दृष्टि और वृत्ति की सुगन्ध न के बराबर है। अभी-अभी मौसम के अनुसार अर्थात् थोड़े समय के लिये खिले हुए होंगे और थोड़े समय बाद मुरझाए हुए नज़र आयेंगे। सदा एकरस नहीं। ऐसे रंग-बिरंगे फूल जो मौसम में ही खिलते हैं, मैजॉरिटी में थे।

वर्तमान समय रूहानी दृष्टि और वृत्ति के अभ्यास की बहुत आवश्यकता है। 75%  इस रूहानियत के अभ्यास में कमज़ोर हैं। मैजॉरिटी किसी-न-किसी प्रकार के प्रकृति के आकर्षण के वशीभूत हो ही जाते हैं। व्यक्ति व वैभव कभी-न-कभी अपने वश कर लेता है। उसमें भी मन्सा संकल्प के चक्कर में खूब परेशान होने वाले हैं। इस परेशानी के कारण स्वयं से दिलशिकस्त भी हो जाते हैं। वास्तव में ब्राह्मण आत्मा अगर संकल्प में विकारी दृष्टि और वृत्ति रखती है अर्थात् इस चमड़ी को देखती है - चमड़ी अर्थात् जिस्म द्वारा विकारी भावना रखते हैं - तो ऐसी भावना रखने वाले भी महापापी की लिस्ट में आ जाते हैं। ब्राह्मण जीवन में बड़े से बड़ा पाप व दाग इस विकारी भावना का गिना जाता है। ब्राह्मण अर्थात् दिव्य-बुद्धि के वरदान वाले। दिव्य नेत्र के वरदान वाले, ऐसे दिव्य बुद्धि और दिव्य नेत्र वाले बुद्धि में संकल्प द्वारा दिव्य नेत्र में एक सेकेण्ड के लिए भी नजर द्वारा इस चमड़ी को व जिस्म को टच भी नहीं कर सकते। दिव्य बुद्धि का, दिव्य नेत्र का शुद्ध आहार और व्यवहार शुद्ध संकल्प हैं। अगर अपने शुद्ध संकल्प रूपी आधार अर्थात् भोजन को छोड़ अशुद्ध आहार स्वीकार करते हो अर्थात् संकल्प के वशीभूत हो जाते हैं तो ऐसे मलेच्छ भोजन वाले मलेच्छ आत्मा कहलायेंगे अर्थात् महापापी, आत्मघाती कहलायेंगे। इसलिए इस महापाप के संकल्प से भी स्वयं को सदा बचाने का प्रयत्न करो। नहीं तो इस महापाप का दण्ड बहुत कड़े रूप में भोगना पड़ेगा। इसलिए दिव्य बुद्धि और सदा शुद्ध आहारी बनो। समझा?

पाण्डवों की विशेषता क्या देखी? सेवा प्रति हार्ड वर्कर (परिश्रमी) प्लैनिंग (नियोजन) बुद्धि अथक बन सेवा की स्टेज पर हर समय एवर रेडी हैं। सेवा के सब्जेक्ट में मैदान पर आने वाले मैजारिटी पाण्डव हैं, इस विशेषता में पाण्डव आगे हैं और इसी सेवा के रिटर्न में हिम्मत और हुल्लास अनुभव करते चल रहे हैं। पाण्डव वातावरण के विकारी वायब्रेशन के बीच ज्यादा रहते हैं, इसलिए ऐसे वातावरण में रहते हुए न्यारे और प्यारे रहते हैं, तो उनको इस सफलता में शक्तियों से एकस्ट्रा मार्क्स मिलती हैं। लेकिन इस लॉटरी को और ज्यादा कार्य में लाओ व ऐसा गोल्डन चान्स और ज्यादा लेना। सुना आज के सैर का समाचार। अच्छा।

ऐसे इशारे से समझने वाले समझदार, स्थूल-सूक्ष्म शुद्ध आहारी, सदा श्रेष्ठ व्यवहारी, हर संकल्प में विश्व-कल्याण की भावना रखने वाले विश्व-कल्याणी आत्माओं के प्रति बापदादा की याद-प्यार और नमस्ते।

इस मुरली के विशेष ज्ञान-तत्व

पाण्डव सदा एवररेडी और सेवा प्रति हार्ड वर्कर (परिश्रमी) प्लानिंग (नियोजन) बुद्धि, अथक सेवा की स्टेज पर हर समय तैयार रहने वाले हैं। पाण्डव वातावरण के विकारी वायुमण्डल के बीच ज्यादा रहते हुए भी न्यारे और प्यारे रहते हैं तो शक्तियों से अधिक मार्क्स पा सकते हैं।

07-10-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

सर्व अधिकार और बेहद के वैराग्य वाला ही राजऋषि

सदा विजयी बनाने वाले तथा सर्व अधिकारों की प्राप्ति कराने वाले रूहानी मिलिट्री के सर्वोच्च कमाण्डर निराकार शिव बाबा बोले: -

आज बापदादा कौन-सी सभा देख रहे हैं? यह है राज ऋषियों की सभा। अपने को सदा राज ऋषि समझते हुए चलते हो? एक तरफ राज्य, दूसरी तरफ ऋषि। दोनों के लक्षण अलग-अलग हैं। वह है भाग्य, वह है त्याग। वह है सर्वअधिकारी और वह फिर ऋषि अर्थात् बेहद के वैरागी। सर्व अधिकारी और बेहद के वैरागी। वह सर्व का प्यारा और वह सबसे न्यारा। दोनों ही लक्षण, बोल और कर्म में सदा साथ-साथ दिखाई देते हैं। वर्तमान स्वराज्य अर्थात् स्व का इन सर्व-कर्मइन्द्रियों पर राज्य - इसको कहते हैं स्वराज्य और वही है भविष्य का डबल राज्य अधिकारी। डबल राज्य का नशा सदा रहता है? जितना राज्य का नशा उतना ही बेहद का वैराग अर्थात् ऋषि रूप सदा स्मृति में रहता है? दोनों का बैलेन्स है। वा एक स्वरूप याद रहता है, दूसरा भूल जाता है? इस पुरानी देह और देह की दुनिया से बेहद के वैरागी बन गये हो? वा अभी भी यह पुरानी देह और दुनिया अपनी तरफ आकर्षित करती है? यह कब्रिस्तान अनुभव होता है? सभी मूर्च्छित हुई आत्मायें नजर आती हैं या सिर्फ कहने मात्र हैं? ये सब मरे पड़े हैं अर्थात् कब्रिस्तान है, जब तक वह अनुभव न होगा तो बेहद के वैरागी नहीं बन सकेंगे। आज की दुनिया में भी हद के वैरागी जंगल में या श्मशान में जाते हैं। इसलिए ही गायन है श्मशानी वैराग्य। तो जब तक यह दुनिया श्मशान है, ऐसा अनुभव नहीं होगा तो सदाकाल का बेहद का वैराग्य - यह अनुभव कैसे होगा?

अपने आप से पूछो कि ऋषि बना हूँ? ऐसे निश्चय बुद्धि वैराग्य के साथ-साथ अधिकार की खुशी में भी रहेगे तो राज-ऋषि बनने के लिए जितना ही राज्य का नशा उतना ही बेहद के वैराग्य के नजारे, दोनों ही साथ-साथ अनुभव होंगे। जितना कब्रिस्तान अनुभव होगा, उतना ही परिस्तान सामने दिखाई देगा। त्याग के साथ-साथ भाग्य भी स्पष्ट सामने दिखाई देगा। सम्पूर्ण राजऋषि की स्थिति अर्थात् नशा और निशाने दोनों ही स्पष्ट होंगे। निशाना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज। ऐसे नशे में रहने वाले के सामने निशाना इतना समीप होगा जैसे स्थूल नेत्रों के सामने स्थूल वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। जब सामने दिखाई देती है, तो फिर कोई संकल्प नहीं उठेगा कि यह वस्तु है कि नहीं है, क्या है, वा कैसी है? ऐसे ही सम्पूर्ण स्टेज का निशाना सामने दिखाई देने के कारण, मैं बनूँगा या नहीं बनूँगा वा सम्पूर्ण स्टेज किसको कहा जाता है यह क्वेश्चन समाप्त हो जायेगा। अपने सम्पूर्ण स्टैज की निशानियाँ स्वयं में स्पष्ट नजर आयेंगी। वह निशानियाँ क्या होंगी, वह जानते हो व अनुभव करते हो?

पहली निशानी-पुरानी दुनिया की किसी भी व्यक्ति वा वैभव से संकल्प-मात्र वा स्वप्न-मात्र भी लगाव नहीं होगा। सदा स्वयं को कलियुगी दुनिया से किनारा करने वाले संगमयुगी समझेंगे। सारी सृष्टि की आसुरी आत्माओं को कल्याण और रहम की दृष्टि से देखेंगे। सदा स्वयं को बाप समान विश्व-सेवाधारी अनुभव करेंगे। हर परिस्थिति वा परीक्षा में सदा स्वयं को विजयी अनुभव करेंगे। विजय मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है। ऐसा अधिकारी स्वरूप समझ कर हर कर्म करेंगे। सदा त्रिमूर्ति तख्त-नशीन अनुभव करेंगे। त्रिकालदर्शीपन के स्मृति स्वरूप होने के कारण हर कर्म के तीनों कालों को जानने वाले हर कर्म को श्रेष्ठ कर्म वा सुकर्मा बनायेंगे। विकर्म का खाता समाप्त हुआ अनुभव होगा। हर कार्य, हर संकल्प सिद्ध हुआ ही पड़ा है ऐसा सदा अनुभव करेंगे, पुराने संस्कार और स्वभाव से उपराम अनुभव करेंगे, सदा साक्षीपन की सीट पर स्वयं को सैट हुआ अनुभव करेंगे। यह है - निशानियाँ भी और निशाना भी। ऐसे को कहा जाता है राजऋषि। ऐसे राज-ऋषि बने हो? टाईटल तो राज-ऋषि का मिला है ना? जो टाईटल हैं वही प्रैक्टिकल भी है ना?

ब्राह्मण अर्थात् कहना और करना, सोचना और बोलना, सुनना और स्वरूप में लाना एक समान हो। सब ब्राह्मण हो ना? एक सेकेण्ड में जहाँ अपने को चाहो उस स्थिति में स्थित कर सकते हो? ऐसे एवर रेडी  बने हो? अशरीरी बनने का अभ्यास इतना ही सरल अनुभव होता है जैसे शरीर में आना अति सहज और स्वत: लगता है। रूहानी मिलिट्री हो ना? मिलिट्री अर्थात् हर समय सेकेण्ड में ऑर्डर को प्रैक्टिकल में लाने वाले। अभी-अभी ऑर्डर हो अशरीरी भव, तो एवररेडी हो या रेडी होना पड़ेगा? अगर मिलिट्री रेडी होने में समय लगाये तो विजय होगी? ऐसा सदा एवररेडी रहने का अभ्यास करो। अच्छा। ऐसे सदा सर्व अधिकारों के नशे में रहने वाले संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मणों, स्वराज्य और विश्व के राज्य के नशे में रहने वाले, श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते। ओम् शान्ति।

मुरली के विशेष तथ्य

1. एक तरफ सर्व अधिकार, दूसरी तरफ बेहद का वैराग्य-दोनों का बैलेन्स रखने वाला ही राज-ऋषि कहला सकता है।

2. अपने को डबल राज्य अर्थात् स्वराज्य अर्थात् सर्व कर्मइन्द्रियों पर राज्य और भविष्य विश्व के राज्य का अधिकारी समझ कर चलते हो?

3. असार संसार अनुभव होता है या अब तक भी कोई सार दिखाई देता है? यह सब मरे पड़े हैं अर्थात् कब्र दाखिल है, जब तक यह अनुभव नहीं होगा तब तक बेहद के वैरागी नहीं बन सकेंगे।

4. ब्राह्मण अर्थात् कहना और करना, सोचना और बोलना, सुनना और स्वरूप में लाना, एक समान हो।

5. सम्पूर्ण स्टेज की गुह्य निशानी यह है कि पुरानी दुनिया का कोई भी व्यक्ति व वैभव से संकल्प-मात्र व स्वप्नमात्र भी लगाव का अनुभव नहीं होगा और हर परिस्थिति व परीक्षा में सदा स्वयं को विजयी अनुभव करेंगे।

 

 

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QUIZ QUESTIONS

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 प्रश्न 1 :- बापदादा कौन सी तीन प्रकार की रिज़ल्ट देखी और इसे देखते हुए तीन स्टेज कौन सी देखी?

 प्रश्न 2 :- वैरायटी प्रकार के फूल, कमल फूल और रूहानी गुलाब के सन्दर्भ में बापदादा के महावाक्य क्या है

 प्रश्न 3 :- वर्तमान समय रूहानी दृष्टि और वृत्ति के अभ्यास की बहुत आवश्यकता है। इस सन्दर्भ के लिए बापदादा ने क्या समझानी दी है

 प्रश्न 4 :- बापदादा ने पाण्डवों की विशेषता क्या देखी?

 प्रश्न 5 :- सम्पूर्ण राजऋषि की निशानी और निशाना क्या हैं?

 

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

{ निशानी, लगाव, विजयी, करना, बोलना, समान, नशे, निशाना, वस्तु, राज्य, भविष्य, अधिकारी, सार, कब्र, वैरागी }

 1   ब्राह्मण अर्थात् कहना और ____, सोचना और ____, सुनना और स्वरूप में लाना, एक ____ हो।

 2   अपने को डबल ____ अर्थात् स्वराज्य अर्थात् सर्व कर्मइन्द्रियों पर राज्य और ____ विश्व के राज्य का ____ समझ कर चलते हो?

 3   असार संसार अनुभव होता है या अब तक भी कोई ____ दिखाई देता है? यह सब मरे पड़े हैं अर्थात् ____ दाखिल है, जब तक यह अनुभव नहीं होगा तब तक बेहद के ____ नहीं बन सकेंगे।

 4  निशाना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज। ऐसे ____ में रहने वाले के सामने ____ इतना समीप होगा जैसे स्थूल नेत्रों के सामने स्थूल ____ स्पष्ट दिखाई देती है।

 5   सम्पूर्ण स्टेज की गुह्य ____ यह है कि पुरानी दुनिया का कोई भी व्यक्ति व वैभव से संकल्प-मात्र व स्वप्नमात्र भी ____ का अनुभव नहीं होगा और हर परिस्थिति व परीक्षा में सदा स्वयं को ____ अनुभव करेंगे।

 

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 1  :-   मिलिट्री अर्थात् हर समय सेकेण्ड में ऑर्डर को प्रैक्टिकल में नहीं लाने वाले।

 2  :-  अशरीरी बनने का अभ्यास इतना ही सरल अनुभव होता है जैसे शरीर में आना अति सहज और स्वत: लगता है।

 3  :-   आज की दुनिया में भी बेहद के वैरागी जंगल में या श्मशान में जाते हैं। इसलिए ही गायन है श्मशानी वैराग्य।

 4  :-  एक तरफ राज्य, दूसरी तरफ ऋषि। दोनों के लक्षण अलग-अलग हैं। वह है भाग्य, वह है त्याग।

 5   :-   वर्तमान स्वराज्य अर्थात् स्व का इन सर्व-कर्मइन्द्रियों पर राज्य - इसको कहते हैं स्वराज्य और वही है वर्तमान का डबल राज्य अधिकारी।

 

 

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QUIZ ANSWERS

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 प्रश्न 1 :- बापदादा ने कौन सी तीन प्रकार की रिज़ल्ट देखी और इसे देखते हुए तीन स्टेज कौन सी देखी?

 उत्तर 1 :- बापदादा तीन प्रकार की रिजल्ट देखी -

           एक थे लेने वाले, दूसरे थे मिलन मनाने वाले और तीसरे थे लेकर देने वाले अर्थात् कमाई करने वाले।

           यह सब देखते हुए इसके बाद गॉडली स्टुडेण्ट के रूप में देखा - हर एक स्टुडेन्ट के रूप में गॉडली नॉलेज पढ़ने के लिए उमंग और उत्साह से अपने-अपने रूहानी विश्व-विद्यालय की ओर आ रहे हैं। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार सब अपनी पढ़ाई में लगे हुए थे। - हर एक सेवा केन्द्र की रूहानी रौनक अपनी-अपनी थी।

           उसमें भी तीन प्रकार के देखे। एक थे सिर्फ सुनने वाले अर्थात् सुन-सुन कर हर्षित होने वाले, दूसरे थे सुनकर समाने वाले और तीसरे थे बाप समान नॉलेजफुल बनकर औरों को बनाने वाले।

           यह सब देखते हुए फिर तीसरी स्टेज देखी - वह थी कर्मयोगी की स्टेज। एक थे कमल पुष्प, दूसरे थे रूहानी गुलाब और तीसरे थे वैरायटी प्रकार के फूल।

 

 प्रश्न 2 :- वैरायटी प्रकार के फूल, कमल फूल और रूहानी गुलाब के सन्दर्भ में बापदादा के महावाक्य क्या है

 उत्तर 2 :- बापदादा कहते हैं :-

           उन वैरायटी फूलों में भी मैजॉरिटी सूर्यमुखी थे। जिस समय ज्ञानसूर्य के सम्मुख थे तो खिले हुए थे। और कभी फिर ज्ञानसूर्य बाप से किनारा कर लेने के कारण फूलों के बजाय कलियाँ बन जाते थे अर्थात् रूप और रंग बदल जाता था।

           कमल-पुष्प क्या करते थे? सर्व कार्य करते हुए, सर्व सम्बन्धों के सम्पर्क में आते हुए न्यारे और साथ-साथ बाप के प्यारे थे।

           अनेक प्रकार की हलचल में भी अचल थे। लेकिन ऐसी आत्मायें कितनी थी? 25% । उसमें भी मैजॉरिटी शक्तियाँ थी।

           रूहानी गुलाब जो सदा अपने रूहानियत की स्थिति में स्थित रहते हुए सर्व को भी रूहानियत की दृष्टि से देखने वाले, सदा मस्तक मणि को देखने वाले हैं।

           साथ-साथ अपनी रूहानियत की स्थिति से सदा अर्थात् हर समय सर्व आत्माओं को अपनी स्मृति, दृष्टि और वृत्ति से रूहानी बनाने के शुभ संकल्पों में रहने वाले अर्थात् हर समय योगी तू आत्मा सेवाधारी आत्मा हो कर चलने वाले - ऐसे रूहानी गुलाब चारों ओर की फुलवारी के बीच बहुत थोड़े कहीं-कहीं देखे? यह परसेन्टेज कम थी। 10%

           वैरायटी फूलों के अन्दर एक तो सूर्यमुखी सुनाया दूसरी क्वॉलिटी हर मौसम के बड़े सुन्दर रंगबिरंगे फूल होते हैं, उन पर मौसम की रंग-रूप की रौनक बड़ी अच्छी होती है। बगीचे की शो बढ़ा देते हैं।   

           रंग और रूप- यहाँ भी रूप ब्रह्माकुमारी और ब्रह्माकुमार का है, रंग ज्ञान का लगा हुआ है।

           तो रंग भी और रूप भी है, लेकिन रूहानियत कम। रूहानी दृष्टि और वृत्ति की सुगन्ध न के बराबर है। ऐसे रंग-बिरंगे फूल जो मौसम में ही खिलते हैं, मैजॉरिटी में थे।

 

 प्रश्न 3 :- वर्तमान समय रूहानी दृष्टि और वृत्ति के अभ्यास की बहुत आवश्यकता है। इस सन्दर्भ के लिए बापदादा ने क्या समझानी दी है

 उत्तर 3 :-  बापदादा समझाते हैं कि  -

           ❶ 75% बच्चे इस रूहानियत अर्थात रूहानी दृष्टि और वृत्ति के अभ्यास में कमज़ोर हैं। मैजॉरिटी किसी-न-किसी प्रकार के प्रकृति के आकर्षण के वशीभूत हो ही जाते हैं।

           व्यक्ति व वैभव कभी-न-कभी अपने वश कर लेता है। उसमें भी मन्सा संकल्प के चक्कर में खूब परेशान होने वाले हैं। इस परेशानी के कारण स्वयं से दिलशिकस्त भी हो जाते हैं।    

             वास्तव में ब्राह्मण आत्मा अगर संकल्प में विकारी दृष्टि और वृत्ति रखती है अर्थात् इस चमड़ी को देखती है - चमड़ी अर्थात् जिस्म द्वारा विकारी भावना रखते हैं - तो ऐसी भावना रखने वाले भी महापापी की लिस्ट में आ जाते हैं।

           ब्राह्मण अर्थात् दिव्य-बुद्धि के वरदान वाले। दिव्य नेत्र के वरदान वाले, ऐसे दिव्य बुद्धि और दिव्य नेत्र वाले बुद्धि में संकल्प द्वारा दिव्य नेत्र में एक सेकेण्ड के लिए भी नजर द्वारा इस चमड़ी को व जिस्म को टच भी नहीं कर सकते।

           दिव्य बुद्धि का, दिव्य नेत्र का शुद्ध आहार और व्यवहार शुद्ध संकल्प हैं। अगर अपने शुद्ध संकल्प रूपी आधार अर्थात् भोजन को छोड़ अशुद्ध आहार स्वीकार करते हो अर्थात् संकल्प के वशीभूत हो जाते हैं तो ऐसे मलेच्छ भोजन वाले मलेच्छ आत्मा कहलायेंगे अर्थात् महापापी, आत्मघाती कहलायेंगे।

           इसलिए इस महापाप के संकल्प से भी स्वयं को सदा बचाने का प्रयत्न करो। नहीं तो इस महापाप का दण्ड बहुत कड़े रूप में भोगना पड़ेगा। इसलिए दिव्य बुद्धि और सदा शुद्ध आहारी बनो।

 

 प्रश्न 4 :- बापदादा ने पाण्डवों की विशेषता क्या देखी?

 उत्तर 4 :- बापदादा ने देखा कि:-

           पाण्डवों सेवा प्रति हार्ड वर्कर (परिश्रमी) प्लैनिंग (नियोजन) बुद्धि अथक बन सेवा की स्टेज पर हर समय एवर रेडी हैं।

           सेवा के सब्जेक्ट में मैदान पर आने वाले मैजारिटी पाण्डव हैं, इस विशेषता में पाण्डव आगे हैं और इसी सेवा के रिटर्न में हिम्मत और हुल्लास अनुभव करते चल रहे हैं।

           पाण्डव वातावरण के विकारी वायब्रेशन के बीच ज्यादा रहते हैं, इसलिए ऐसे वातावरण में रहते हुए न्यारे और प्यारे रहते हैं, तो उनको इस सफलता में शक्तियों से एकस्ट्रा मार्क्स मिलती हैं।

 

 प्रश्न 5 :- सम्पूर्ण राजऋषि की निशानी और निशाना क्या हैं?

 उत्तर 5 :- बापदादा कहते हैं

सम्पूर्ण राजऋषि की निशानी और निशाना निम्नलिखित हैं :-

           पहली निशानी-पुरानी दुनिया की किसी भी व्यक्ति वा वैभव से संकल्प-मात्र वा स्वप्न-मात्र भी लगाव नहीं होगा।

           सदा स्वयं को कलियुगी दुनिया से किनारा करने वाले संगमयुगी समझेंगे।

           सारी सृष्टि की आसुरी आत्माओं को कल्याण और रहम की दृष्टि से देखेंगे।

           सदा स्वयं को बाप समान विश्व-सेवाधारी अनुभव करेंगे।

           हर परिस्थिति वा परीक्षा में सदा स्वयं को विजयी अनुभव करेंगे। विजय मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है। ऐसा अधिकारी स्वरूप समझ कर हर कर्म करेंगे।

           सदा त्रिमूर्ति तख्त-नशीन अनुभव करेंगे।

           त्रिकालदर्शीपन के स्मृति स्वरूप होने के कारण हर कर्म के तीनों कालों को जानने वाले हर कर्म को श्रेष्ठ कर्म वा सुकर्म बनायेंगे। विकर्म का खाता समाप्त हुआ अनुभव होगा।

           हर कार्य, हर संकल्प सिद्ध हुआ ही पड़ा है ऐसा सदा अनुभव करेंगे, पुराने संस्कार और स्वभाव से उपराम अनुभव करेंगे, सदा साक्षीपन की सीट पर स्वयं को सैट हुआ अनुभव करेंगे।

           एक तरफ सर्व अधिकार, दूसरी तरफ बेहद का वैराग्य-दोनों का बैलेन्स रखने वाला ही राज-ऋषि कहला सकता है।

 

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

{ निशानी, लगाव, विजयी, करना, बोलना, समान, नशे, निशाना, वस्तु, राज्य, भविष्य, अधिकारी, सार, कब्र, वैरागी }

 1   ब्राह्मण अर्थात् कहना और ____, सोचना और ____, सुनना और स्वरूप में लाना, एक ____ हो।

    करना / बोलना / समान

 

 2  अपने को डबल ____ अर्थात् स्वराज्य अर्थात् सर्व कर्मइन्द्रियों पर राज्य और ____ विश्व के राज्य का ____ समझ कर चलते हो?

    राज्य / भविष्य / अधिकारी

 

 3  असार संसार अनुभव होता है या अब तक भी कोई ____ दिखाई देता है? यह सब मरे पड़े हैं अर्थात् ____ दाखिल है, जब तक यह अनुभव नहीं होगा तब तक बेहद के ____ नहीं बन सकेंगे।

    सार / कब्र / वैरागी

 

 4  निशाना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज। ऐसे ____ में रहने वाले के सामने ____ इतना समीप होगा जैसे स्थूल नेत्रों के सामने स्थूल ____ स्पष्ट दिखाई देती है।

    नशे / निशाना / वस्तु

 

 5  सम्पूर्ण स्टेज की गुह्य ____ यह है कि पुरानी दुनिया का कोई भी व्यक्ति व वैभव से संकल्प-मात्र व स्वप्नमात्र भी ____ का अनुभव नहीं होगा और हर परिस्थिति व परीक्षा में सदा स्वयं को ____ अनुभव करेंगे।

    निशानी /  लगाव / विजयी

 

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:- 】【

 1  :-  मिलिट्री अर्थात् हर समय सेकेण्ड में ऑर्डर को प्रैक्टिकल में नहीं लाने वाले।

  मिलिट्री अर्थात् हर समय सेकेण्ड में ऑर्डर को प्रैक्टिकल में लाने वाले।

 

 2  :-  अशरीरी बनने का अभ्यास इतना ही सरल अनुभव होता है जैसे शरीर में आना अति सहज और स्वत: लगता है।

 

 3  :-  आज की दुनिया में भी बेहद के वैरागी जंगल में या श्मशान में जाते हैं। इसलिए ही गायन है श्मशानी वैराग्य।

  आज की दुनिया में भी हद के वैरागी जंगल में या श्मशान में जाते हैं। इसलिए ही गायन है श्मशानी वैराग्य।

 

 4  :-  एक तरफ राज्य, दूसरी तरफ ऋषि। दोनों के लक्षण अलग-अलग हैं। वह है भाग्य, वह है त्याग।

 

 5   :-  वर्तमान स्वराज्य अर्थात् स्व का इन सर्व-कर्मइन्द्रियों पर राज्य - इसको कहते हैं स्वराज्य और वही है वर्तमान का डबल राज्य अधिकारी।

  वर्तमान स्वराज्य अर्थात् स्व का इन सर्व-कर्मइन्द्रियों पर राज्य - इसको कहते हैं स्वराज्य और वही है भविष्य का डबल राज्य अधिकारी।