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AVYAKT MURLI

03 / 10 / 75

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03-10-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

विशाल बुद्धि

बेगमपुर के बादशाह बनाने वाले, सर्व खुशियों के खज़ानों की चाबी प्रदान करने वाले शिव बाबा बच्चों के प्रति बोले:-

सभी अपने को विधाता बाप द्वारा विधि और विधान को जानने वाले समझते हो? विधि और विधान को जानने वाले हर संकल्प और हर कर्म में सिद्धि स्वरूप होते हैं। ऐसे अपने को अनुभव करते हो? सिद्धि स्वरूप अर्थात् बेगमपुर का बादशाह। भविष्य राज्य-भाग्य प्राप्त करने के पहले वर्तमान समय भी बेगमपुर के बादशाह हो। अर्थात् संकल्प में भी गम अर्थात् दु:ख की लहर न हो, क्योंकि दु:खधाम से निकल अब संगमयुग पर खड़े हो। ऐसे संगमयुगी बेगमपुर के बादशाह अपने को समझते हो ना? बेगमपुर का बादशाह अर्थात् सर्व खुशियों के खज़ाने का मालिक। खुशियों का खज़ाना ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार के कारण ही आज श्रेष्ठ आत्माओं के नाम और रूप का सत्कार होता रहता है। ऐसे बेगमपुर के बादशाह, जिन्हों का नाम लेने से ही अनेक आत्माओं के अल्पकाल के लिए दु:ख दूर हो जाते हैं, जिनके चित्रों को देखते चरित्रों का गायन करते हैं और दु:खी आत्मा खुशी का अनुभव करने लगती हैं, ऐसे चैतन्य आप स्वयं बेगमपुर के बादशाह हो?

अपने खज़ानों को जानते हो? सर्व खज़ानों को स्मृति में रखते हुए सदा हर्षित अर्थात् सदा प्रकृति और पाँच विकारों के आक्रमण से परे। इसी खुशी के खज़ानों से सम्पन्न-स्वरूप एक बाप दूसरा न कोई - ऐसा अनुभव करते हो? खज़ानों की चाबी तो मजबूत रखते हो ना? चाबी को खो तो नहीं देते हो? समय और समय के प्रमाण आत्माओं की सूक्ष्म पुकार सुनने में आती है वा अपने में ही सदा बिजी रहते हो? कल्प पहले वाले आप के भक्त आत्मायें अपने-अपने इष्ट का आह्वान कर रही हैं। आ जा, आ जा की धुन लगा रही हैं। दिन-प्रतिदिन अपनी पुकार साजों से सजाते हुए अर्थात् खूब गाजे बाजे बजाते हुए जोर शोर से प्कारना शुरू करते हैं। आप सभी को राजी करने के अनेक साधन अपनाते रहते हैं। तो चैतन्य में गुप्त रूप में सुनते हुए, देखते हुए रहम नहीं आता वा अब तक अपने ऊपर रहम करने में बिज़ी हो? विश्व कल्याणकारी, महादानी, वरदानी स्वरूप में स्थित होने से ही रहम आयेगा। स्वयं को जगत्-माता व जगत पिता के स्वरूप में अनुभव करने से ही रहम उत्पन्न होगा। किसी भी आत्मा का दु:ख व भटकना सहन नहीं होगा। लेकिन इस स्वरूप में बहुत कम समय ठहरते हो। समय प्रमाण सेवा का स्वरूप बेहद और विशाल होना चाहिए। बेहद का स्वरूप कौन-सा  है? अभी जो कर रहे हो, इसको बेहद कहेंगे? मेला बेहद का हुआ। पहले की भेंट में अब बेहद समझते हो लेकिन अंतिम बेहद का स्वरूप क्या है?

समय की रफ्तार प्रमाण सिर्फ सन्देश देने के कार्य में भी अब तक कितने परसेन्ट को सन्देश दिया है? सतयुग के आदि की नौ लाख प्रजा आपके सामने दिखाई देती है। आदि की प्रजा की भी कुछ विशेषताएँ होंगी ना? ऐसी विशेषता-सम्पन्न आत्मायें सभी सेवा-केन्द्रों में भी दिखाई देती हैं कि वह भी अभी घूंघट में ही हैं? सोलह हजार की माला दिखाई देती है? टीचर्स ने सोलह हजार की माला तैयार की है? घूंघट खोलने की डेट कौन-सी है? समय प्रमाण अब होना तो है ही लेकिन ऐसे समझकर भी अलबेले मत बनना। अब बेहद के प्लैन्स बनाओ। बेहद के प्लैन्स अर्थात् जिन भी आत्माओं की सेवा करते हो वह हर-एक आत्मा अनेकों के निमित्त बनने वाली हो। एक-एक आत्मा बेहद की आत्माओं की सेवा के प्रति निमित्त बने। अब तक तो आप स्वयं एक-एक आत्मा के प्रति समय दे रहे हो। आप ऐसी ही आत्माओं की सेवा करो जो वह आत्मा ही अनेकों की सेवा-अर्थ निमित्त बनें। उन के नाम से सेवा हो, जैसे कई आत्मायें अपने सम्बन्ध, सम्पर्क और सेवा के आधार पर अनेकों में प्रसिद्ध होती हैं अर्थात् उनके गुणों और कर्त्तव्य की छाप अनेकों प्रति पहले से ही होती है इसमें सिर्फ धनवान की बात नहीं वा सिर्फ पोजीशन की बात नहीं। लेकिन कई साधारण भी अपने गुण और सेवा के आधार पर अपनी-अपनी फील्ड में प्रसिद्ध होते हैं। चाहे राजनीतिक हों, चाहे धार्मिक हों लेकिन प्रभावशाली हों। ऐसी आत्माओं को चुनों। जो आप लोगों की तरफ से वे आत्माएँ सेवा-अर्थ निमित्त बनती जायें। ऐसी क्वॉलिटी की सर्विस अभी रही हुई है।

नाम के प्रसिद्ध दो प्रकार के होते हैं - एक पोजीशन की सीट के कारण, दूसरे होते हैं गुण और कर्त्तव्य के आधार पर। सीट के आधार पर नाम वालों का प्रभाव अल्पकाल के लिए पड़ेगा। गुण और कर्त्तव्य के आधार पर आत्माओं का प्रभाव सदाकाल के लिए पड़ेगा। इसलिए रूहानी सेवा के निमित्त ऐसी प्रसिद्ध आत्माओं को निकालो तब थोड़े समय में बेहद की सर्विस कर सकेंगे। इसको कहते है विहंग मार्ग। जो एक द्वारा अनेकों को तीर लग जाए। ऐसी आत्माओं के आने से अनेक आत्माओं का आना ऑटोमेटिकली होता है। तो अब ऐसी सर्विस की रूप-रेखा बनाओ। ऐसी सेवा के निमित्त बनने वाली आत्मायें आप गॉडली स्टूडेन्ट्स की तरह रेग्युलर स्टुडेण्ट्स नहीं बनेंगी, सिर्फ उनका सम्बन्ध और सम्पर्क समीप और स्नेह युक्त होगा। ऐसी आत्माओं को विशाल बुद्धि बन उनकी इच्छा प्रमाण, उन की प्राप्ति का आधार समझते हुए, उनके अनुभव द्वारा अनेकों की सेवा के निमित्त बनाना पड़े। इस बेहद की सेवा-अर्थ परखने की शक्ति की आवश्यकता है। इसलिए अब ऐसी विशाल बुद्धि बन सेवा का विशाल रूप बनाओ - अब देखेंगे ऐसी विशाल सर्विस का सबूत कौन से सपूत बच्चे देते हैं। ऐसी सर्विस के निमित्त बनने वाले राज्य-पद के अधिकारी बनते हैं। कौन-सा  ज़ोन नम्बर वन जाता है, यह रिजल्ट से पता पड़ जायेगा। अच्छा!

ऐसे सर्विस-एबल, बेहद के विशाल बुद्धि वाले, संकल्प द्वारा भी अनेक आत्माओं प्रति सेवा करने वाले, ऐसे बाप समान सदा अथक सेवाधारी, सबूत दिखाने वाले सपूत बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

इस मुरली के विशेष तथ्य

1. विधि और विधान को जानने वाले हर संकल्प और हर कर्म में सिद्धि स्वरूप होते हैं।

2. अपने को बेगमपुर के बादशाह समझते हो! अर्थात् संकल्प में भी गम अर्थात् दु:ख की लहर न हो। संगम युगी बेगमपुर के बादशाह अर्थात् सर्व खुशी के खज़ाने का मालिक।

3. समय प्रमाण अब बेहद के प्लैन्स बनाओ अर्थात् जिन भी आत्माओं की सेवा करते हो वह हर-एक आत्मा बेहद की आत्माओं की सेवा के प्रति निमित्त

04-10-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

अब दृढ़ संकल्प की तीली से रावण को जलाओ

अकालमूर्त, आत्माओं को मुक्ति और जीवन्मुक्ति का वरदान देने वाले बापदादा बोले :-

अपने को फरिश्तों की सभा में बैठने वाला फरिश्ता समझते हो? फरिश्ता अर्थात् जिसके सर्व सम्बन्ध वा सर्व रिश्ते एक के साथ हों। एक से सर्व रिश्ते और सदा एक रस स्थिति में स्थित हों। एक-एक सेकेण्ड, एक-एक बोल, एक की ही लगन में और एक की ही सेवा प्रति हों। चलते-फिरते, देखते-बोलते और कर्म करते हुए व्यक्त भाव से न्यारे अव्यक्त अर्थात् इस व्यक्त देह रूपी धरनी की स्मृति से बुद्धि रूपी पाँव सदा ऊपर रहे अर्थात् उपराम रहे। जैसे बाप ईश्वरीय सेवा-अर्थ वा बच्चों को साथ ले जाने की सेवा-अर्थ वा सच्चे भक्तों को बहुत समय के भक्ति का फल देने अर्थ, न्यारे और निराकार होते हुए भी अल्पकाल के लिए आधार लेते हैं वा अवतरित होते हैं। ऐसे ही फरिश्ता अर्थात् न्यारा और प्यारा, बाप समान स्वयं को अवतरित आत्मा समझते हो? अर्थात् सिर्फ ईश्वरीय सेवा-अर्थ यह साकार ब्राह्मण जीवन मिला है। धर्म स्थापक, धर्म स्थापना का पार्ट बजाने के लिए आए हैं - इसलिए नाम ही है शक्ति अवतार - इस समय अवतार हूँ, धर्म स्थापक हूँ। सिवाए धर्म स्थापन करने के कार्य के और कोई भी कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं। सदा ऐसी स्मृति में इसी कार्य में उपस्थित रहने वालों को ही फरिश्ता कहा जाता है। फरिश्ता डबल लाइट रूप है। एक लाईट अर्थात् सदा ज्योति-स्वरूप। दूसरा लाईट अर्थात् कोई भी पिछले हिसाब-किताब के बोझ से न्यारा अर्थात् हल्का। ऐसे डबल लाईट स्वरूप अपने को अनुभव करते हो?

यह ब्राह्मण जीवन सिवाए ईश्वरीय कार्य के और कोई कार्य-अर्थ, बिगर श्रीमत के आत्माओं की मत प्रमाण वा स्वयं की मनमत प्रमाण और कहीं यूज़ तो नहीं करते हो? यह ब्राह्मण जीवन भी बाप द्वारा ईश्वरीय सेवा प्रति मिली हुई अमानत है। अमानत में ख्यानत तो नहीं डालते हो? संकल्प द्वारा भी इस ब्राह्मण जीवन का एक श्वांस भी और कोई कार्य में नहीं लगा सकते। इसलिए भक्ति में श्वासों-श्वास सुमिरण का यादगार चला आता है। निरन्तर के फरिश्ते हो वा अल्पकाल के फरिश्ते हो? जैसे भक्ति में भी नियम है कि दान दी हुई वस्तु वा अर्पण की हुई वस्तु कोई अन्य कार्य में नहीं लगा सकते। तो आप सबने ब्राह्मण जीवन में बापदादा से पहला वायदा क्या किया? याद है वा भूल गये हो? बाप के आगे पहला वायदा यह किया कि तन-मन-धन सब आपके आगे समर्पण है। जब सर्व समर्पण किया तो सर्व अर्थात् संकल्प, श्वास, बोल, कर्म, सम्बन्ध, सर्व व्यक्ति, वैभव, संस्कार, स्वभाव, वृत्ति, दृष्टि और स्मृति - सबको अर्पण किया। इसको ही कहा जाता है समर्पण। समर्पण से भी ऊपर और पॉवरफुल शब्द, स्वयं को सर्वस्व त्यागी कहते हो।

सभी सर्वस्व-त्यागी हो वा त्यागी? सर्वस्व त्यागी अर्थात् जो भी त्याग किया, सम्बन्ध, सम्पर्क, भाव, स्वभाव और संस्कार, इन सबको पिछले 63 जन्मों के रहे हुए हिसाब-किताब के अंश को भी वंश-सहित त्याग किया हुआ है, इसलिए सर्वस्व त्याग कहा जाता है। ऐसे सर्वस्व त्यागी, जिनका पिछला हिसाब वंशसहित समाप्त हो गया - ऐसा सर्वस्व त्यागी कभी संकल्प भी नहीं कर सकता कि मेरा पिछला स्वभाव और संस्कार ऐसा है। पिछला हिसाब अब तक कभीकभी खींचता है वा कर्म-बन्धन का बोझ, कर्म सम्बन्ध का बोझ, कोई व्यक्ति वा वैभव के आधार का बोझ मुझ आत्मा को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं? यह संकल्प व बोल सर्वस्व त्यागी के नहीं हैं-सर्वस्व त्यागी, सर्व बन्धनों से मुक्त, सर्व बोझों से मुक्त, हर संकल्प में भाग्य बनाने वाला पदमा-पदम भाग्यशाली होगा। ऐसे के हर कदम में पदमों की कमाई स्वत: ही होती है। ऐसे सर्वस्व त्यागी हो ना? शब्द के अर्थ स्वरूप में स्थित हो ना? बोलने वाले नहीं लेकिन करने वाले और अनेकों को कराने वाले हो ना? मुश्किल तो नहीं लगता है? मुश्किल लगने का तो सवाल ही नहीं उठना चाहिये, क्योंकि ब्राह्मण जीवन का धर्म और कर्म ही यह है। जो जीवन वा निजी कर्म होता है वह कभी किसी को मुश्किल नहीं लगता है। मुश्किल तब लगता है जब अपने को अवतरित हुई आत्मा अर्थात् शक्ति अवतार नहीं समझते हो। सदैव यह याद रखो कि मैं अवतार हूँ। धर्म स्थापन करने अर्थ धर्म-आत्मा हूँ। धर्म अर्थात् हर संकल्प स्वत: ही धर्म-अर्थ होते हैं-समझा? ऐसे को कहा जाता है फरिश्ता।

अभी ऐसा बोल कभी नहीं बोलना - क्या करूँ, कैसे करूँ, होता नहीं, आता नहीं और न चाहते हुए भी हो ही जाता है। यह कौन बोलता है? फरिश्ता बोलता है या सर्वस्व त्यागी बोलता है? मास्टर सर्वशक्तिवान् और यह बोल! - दोनों की तुलना करो - मास्टर सर्वशक्तिवान् यह बोल बोल सकता है? क्या अनेकों को बन्धन-मुक्त करने वाली आत्मा ऐसा बोल, बोल सकती है? यह बन्धन-मुक्त आत्मा के बोल हैं? परन्तु आप तो सभी बन्धन-मुक्त आत्मा हो। आज से ऐसे संकल्प और बोल सदा के लिए समाप्त करो। दृढ़ संकल्प की तीली से आज इन कमजोरियों के रावण को जलाओ। अर्थात् दशहरा मनाओ। पाँच विकारों के वंश को भी और पाँच तत्वों के अनेक प्रकार के आकर्षण को भी इन दस ही बातों के विजयी बनो। अर्थात् विजय का दिवस मनाओ। अच्छा।

ऐसे विजय दिवस मनाने वाले विजयी रत्न, जिनके मस्तक पर विजय का अविनाशी तिलक लगा हुआ है, ऐसे अविनाशी तिलक धारी, सदा अकाल तख्त-नशीन, अकाल-मूर्त्त, सर्वआत्माओं को बन्धन-मुक्त बनाने वाले, योग- युक्त, स्नेह-युक्त, युक्ति-युक्त, सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

आज से दीदी-दादी के पास कोई नहीं जाना - सिर्फ रूहानी मिलन मनाने जाना - यह बातें करने न जाना - कुछ लेने के लिए जाना, लेकिन कम्पलेन्ट लेकर नहीं जाना। अच्छा। ओम् शान्ति।

इस मुरली का सार

1. सिवाय धर्म स्थापन करने के कार्य के और कोई भी कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं, सदा ऐसी स्मृति में रह कार्य करने वाले को ही फरिश्ता कहा जाता है।

2. फरिश्ता डबल लाइट रूप है। एक लाइट अर्थात् सदा ज्योति स्वरूप, दूसरा लाइट अर्थात् कोई भी पिछले हिसाब-किताब के बोझ से न्यारा अर्थात् हल्का।

 

 

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QUIZ QUESTIONS

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 प्रश्न 1 :- अपने को विधाता बाप द्वारा विधि और विधान को जानने वाले की क्या निशानी होगी?

 प्रश्न 2 :- फरिश्तों की सभा में बैठने वाले फरिश्ते की क्या निशानी है?

 प्रश्न 3 :- इस ब्राह्मण जीवन में अमानत में ख्यानत कब हो जाती है?

 प्रश्न 4 :- समर्पण से भी ऊपर और पॉवरफुल शब्द कौन-सा है? उसकी क्या विशेषता है?

 प्रश्न 5 :- बेहद के प्लैन्स से बापदादा का क्या अभिप्राय है?

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

{ कल्प, रहम, तीली, कल्याणकारी, मुश्किल, इष्ट, सहन, दशहरा, महादानी, ब्राह्मण, धुन, स्वरूप, वंश, वरदानी, धर्म }

 1   _____ लगने का तो सवाल ही नहीं उठना चाहिये, क्योंकि _____ जीवन का _____ और कर्म ही यह है।

  विश्व _____, _____, _____ स्वरूप में स्थित होने से ही रहम आयेगा।

 3   दृढ़ संकल्प की _____ से आज इन कमजोरियों के रावण को जलाओ, अर्थात् _____ मनाओ। पाँच विकारों के _____ को भी और पाँच तत्वों के अनेक प्रकार के आकर्षण को भीइन दस ही बातों के विजयी बनो।

 4  स्वयं को जगत्-माता व जगत पिता के स्वरूप में अनुभव करने से ही _____ उत्पन्न होगा। किसी भी आत्मा का दु:ख व भटकना _____ नहीं होगा; लेकिन इस _____ में बहुत कम समय ठहरते हो।

 5  _____ पहले वाले आपकी भक्त आत्मायें अपने-अपने _____ का आह्वान कर रही हैं। आ जा, आ जा की _____ लगा रही हैं।

 

सही-गलत वाक्यों को चिह्नित करें:-

 1  :- जो जीवन वा निजी कर्म होता है, वह कभी किसी को सहज नहीं लगता है।

 2  :- मुश्किल तब लगता है, जब अपने को अवतरित हुई आत्मा अर्थात् शक्ति अवतार समझते हो।

 3  :- सिवाए विश्व-विनाश करने के कार्य के और कोई भी कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं।

 4  :- सिर्फ ईश्वरीय सेवा-अर्थ यह साकार ब्राह्मण जीवन मिला है।

 5   :- सदैव यह याद रखो कि मैं बन्धन-युक्त हूँ। धर्म स्थापन करने अर्थ धर्म-आत्मा हूँ।

 

 

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QUIZ ANSWERS

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 प्रश्न 1 :- अपने को विधाता बाप द्वारा विधि और विधान को जानने वाले की क्या निशानी होगी?

 उत्तर 1 :-अपने को विधाता बाप द्वारा विधि और विधान को जानने वाले हर संकल्प और हर कर्म में सिद्धि स्वरूप होते हैं। सिद्धि स्वरूप अर्थात्:

          बेगमपुर का बादशाह। भविष्य राज्य-भाग्य प्राप्त करने के पहले वर्तमान समय भी बेगमपुर के बादशाह हो। अर्थात् संकल्प में भी गम अर्थात् दु:ख की लहर न हो, क्योंकि दु:खधाम से निकल अब संगमयुग पर खड़े हो। ऐसे बेगमपुर के बादशाह, जिन्हों का नाम लेने से ही अनेक आत्माओं के अल्पकाल के लिए दु:ख दूर हो जाते हैं, जिनके चित्रों को देखते चरित्रों का गायन करते हैं और दु:खी आत्मा खुशी का अनुभव करने लगती हैं, ऐसे चैतन्य आप स्वयं बेगमपुर के बादशाह हो।

          सर्व खुशियों के खज़ाने का मालिक। खुशियों का खज़ाना ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार के कारण ही आज श्रेष्ठ आत्माओं के नाम और रूप का सत्कार होता रहता है।  सर्व खज़ानों को स्मृति में रखते हुए सदा हर्षित अर्थात् सदा प्रकृति और पाँच विकारों के आक्रमण से परे। इसी खुशी के खज़ानों से सम्पन्न-स्वरूप एक बाप, दूसरा न कोईऐसा अनुभव करते हो।

         

 प्रश्न 2 :- फरिश्तों की सभा में बैठने वाले फरिश्ते की क्या निशानी है?

  उत्तर 2 :-बाबा ने समझाया कि जैसे बाप ईश्वरीय सेवा-अर्थ वा बच्चों को साथ ले जाने की सेवा-अर्थ वा सच्चे भक्तों को बहुत समय के भक्ति का फल देने अर्थ, न्यारे और निराकार होते हुए भी अल्पकाल के लिए आधार लेते हैं वा अवतरित होते हैं, ऐसे ही स्वयं को फरिश्ता अर्थात् न्यारा और प्यारा, बाप समान अवतरित आत्मा समझना है। फरिश्ता अर्थात्:

          जिसके सर्व सम्बन्ध वा सर्व रिश्ते एक के साथ हों।

          एक से सर्व रिश्ते और सदा एक रस स्थिति में स्थित हों।

          एक-एक सेकेण्ड, एक-एक बोल, एक की ही लगन में और एक की ही सेवा प्रति हों।

          चलते-फिरते, देखते-बोलते और कर्म करते हुए व्यक्त भाव से न्यारे हो।

          ❺ अव्यक्त अर्थात् इस व्यक्त देह रूपी धरनी की स्मृति से बुद्धि रूपी पाँव सदा ऊपर रहे अर्थात् उपराम रहे।

          डबल लाइट रूप; एक लाईट अर्थात् सदा ज्योति-स्वरूप। दूसरा लाईट अर्थात् कोई भी पिछले हिसाब-किताब के बोझ से न्यारा अर्थात् हल्का।

          सिवाए धर्म स्थापन करने के कार्य के, और कोई भी कार्य है ही नहीं।

        

 प्रश्न 3 :- इस ब्राह्मण जीवन में अमानत में ख्यानत कब हो जाती है?

  उत्तर 3 :-बाबा ने ईशारा किया कि यह ब्राह्मण जीवन भी बाप द्वारा ईश्वरीय सेवा प्रति मिली हुई अमानत है। लेकिन यदि यह ब्राह्मण जीवन सिवाए ईश्वरीय कार्य के, और कोई कार्य-अर्थ, बिगर श्रीमत के आत्माओं की मत प्रमाण वा स्वयं की मनमत प्रमाण और कहीं यूज़ करते हैं, तो  अमानत में ख्यानत तो डालते हैं।

भक्ति मार्ग में चली आ रही यादगारों के उदाहरण से बाबा ने स्पष्ट किया कि:

          भक्ति में श्वासों-श्वास सुमिरण का यादगार चला आता है। संकल्प द्वारा भी इस ब्राह्मण जीवन का एक श्वांस भी और कोई कार्य में नहीं लगा सकते।

          जैसे भक्ति में दान दी हुई वस्तु वा अर्पण की हुई वस्तु कोई अन्य कार्य में नहीं लगा सकते। तो आप सबने ब्राह्मण जीवन में बापदादा के आगे पहला वायदा यह किया कि तन-मन-धन सब आपके आगे समर्पण है। जब सर्व समर्पण किया तो सर्व अर्थात् संकल्प, श्वास, बोल, कर्म, सम्बन्ध, सर्व व्यक्ति, वैभव, संस्कार, स्वभाव, वृत्ति, दृष्टि और स्मृतिसबको अर्पण किया। इसको ही कहा जाता है समर्पण।

 

 प्रश्न 4 :- समर्पण से भी ऊपर और पॉवरफुल शब्द कौन-सा है? उसकी क्या विशेषता है?

  उत्तर 4 :-समर्पण से भी ऊपर और पॉवरफुल शब्द और स्थिति है सर्वस्व त्यागी। बाबा ने सर्वस्व त्यागी की विशेषता का वर्णन करते हुए कहा कि सर्वस्व त्यागी अर्थात्:

          जो भी त्याग किया सम्बन्ध, सम्पर्क, भाव, स्वभाव और संस्कारइन सबको पिछले 63 जन्मों के रहे हुए हिसाब-किताब के अंश को भी वंश-सहित त्याग करना।

          सर्व बन्धनों से मुक्त, सर्व बोझों से मुक्त, हर संकल्प में भाग्य बनाने वाला पदमा-पदम भाग्यशाली। ऐसे के हर कदम में पदमों की कमाई स्वत: ही होती है।

      ऐसा सर्वस्व त्यागी, जिसका पिछला हिसाब वंशसहित समाप्त हो गया, वह कभी संकल्प भी नहीं कर सकता कि:

          मेरा पिछला स्वभाव और संस्कार ऐसा है!

          कर्म-बन्धन का बोझ, कर्म सम्बन्ध का बोझ, कोई व्यक्ति वा वैभव के आधार का बोझ मुझ आत्मा को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं!

          ❸  पिछला हिसाब अब तक कभी-कभी खींचता है!

          क्या करूँ, कैसे करूँ, होता नहीं, आता नहीं और न चाहते हुए भी हो ही जाता है!

                                                                                

 प्रश्न 5 :- बेहद के प्लैन्स से बापदादा का क्या अभिप्राय है?

 उत्तर 5 :-बाबा ने समझाया कि समय-प्रमाण सेवा का स्वरूप बेहद और विशाल होना चाहिए। समय-प्रमाण अब होना तो है ही, लेकिन ऐसे समझकर भी अलबेले मत बनना। इसलिए अब बेहद के प्लैन्स बनाओ। बेहद के प्लैन्स अर्थात् जिन भी आत्माओं की सेवा करते हो, वह हर-एक आत्मा अनेकों के निमित्त बनने वाली हो; एक-एक आत्मा बेहद की आत्माओं की सेवा के प्रति निमित्त बने। अब तक तो आप स्वयं एक-एक आत्मा के प्रति समय दे रहे हो। आप ऐसी ही आत्माओं की सेवा करो, जो वह आत्मा ही अनेकों की सेवा-अर्थ निमित्त बनें।

          उन के नाम से सेवा हो, जैसे कई आत्मायें अपने सम्बन्ध, सम्पर्क और सेवा के आधार पर अनेकों में प्रसिद्ध होती हैं अर्थात् उनके गुणों और कर्त्तव्य की छाप अनेकों प्रति पहले से ही होती है; इसमें सिर्फ धनवान की बात नहीं वा सिर्फ पोजीशन की बात नहीं। लेकिन कई साधारण भी अपने गुण और सेवा के आधार पर अपनी-अपनी फील्ड में प्रसिद्ध होते हैं।

          चाहे राजनीतिक हों, चाहे धार्मिक हों,लेकिन प्रभावशाली हों। ऐसी आत्माओं को चुनों। जो आप लोगों की तरफ से वे आत्माएँ सेवा-अर्थ निमित्त बनती जायें। ऐसी क्वॉलिटी की सर्विस अभी रही हुई है।

          नाम के प्रसिद्ध दो प्रकार के होते हैंएक पोजीशन की सीट के कारण, दूसरे होते हैं गुण और कर्त्तव्य के आधार पर। सीट के आधार पर नाम वालों का प्रभाव अल्पकाल के लिए पड़ेगा। गुण और कर्त्तव्य के आधार पर आत्माओं का प्रभाव सदाकाल के लिए पड़ेगा। इसलिए रूहानी सेवा के निमित्त ऐसी प्रसिद्ध आत्माओं को निकालो, तब थोड़े समय में बेहद की सर्विस कर सकेंगे। इसको कहते है विहंग मार्ग। जो एक द्वारा अनेकों को तीर लग जाए।

          ऐसी आत्माओं के आने से अनेक आत्माओं का आना ऑटोमेटिकली होता है। तो अब ऐसी सर्विस की रूप-रेखा बनाओ।

          ऐसी सेवा के निमित्त बनने वाली आत्मायें आप गॉडली स्टूडेन्ट्स की तरह रेग्युलर स्टुडेण्ट्स नहीं बनेंगी, सिर्फ उनका सम्बन्ध और सम्पर्क समीप और स्नेह युक्त होगा।

          ऐसी आत्माओं को विशाल बुद्धि बन उनकी इच्छा प्रमाण, उन की प्राप्ति का आधार समझते हुए, उनके अनुभव द्वारा अनेकों की सेवा के निमित्त बनाना पड़े।

इस बेहद की सेवा-अर्थ परखने की शक्ति की आवश्यकता है। इसलिए अब ऐसी विशाल बुद्धि बन सेवा का विशाल रूप बनाओ।

 

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

 {कल्प, रहम, तीली, कल्याणकारी, मुश्किल, इष्ट, सहन, दशहरा, महादानी, ब्राह्मण, धुन, स्वरूप, वंश, वरदानी, धर्म }

 1   _____ लगने का तो सवाल ही नहीं उठना चाहिये, क्योंकि _____ जीवन का _____ और कर्म ही यह है।

    मुश्किल / ब्राह्मण /  धर्म

 

 2  विश्व _____, _____, _____ स्वरूप में स्थित होने से ही रहम आयेगा।

    कल्याणकारी /  महादानी /  वरदानी

 

 3   दृढ़ संकल्प की _____ से आज इन कमजोरियों के रावण को जलाओ, अर्थात् _____ मनाओ। पाँच विकारों के _____ को भी और पाँच तत्वों के अनेक प्रकार के आकर्षण को भीइन दस ही बातों के विजयी बनो।

    तीली / दशहरा /  वंश

 

  स्वयं को जगत्-माता व जगत पिता के स्वरूप में अनुभव करने से ही _____ उत्पन्न होगा। किसी भी आत्मा का दु:ख व भटकना _____ नहीं होगा; लेकिन इस _____ में बहुत कम समय ठहरते हो।

    रहम /  सहन /  स्वरूप

 

 5  _____ पहले वाले आपकी भक्त आत्मायें अपने-अपने _____ का आह्वान कर रही हैं। आ जा, आ जा की _____ लगा रही हैं।

    कल्प /  इष्ट /  धुन

 

 

सही-गलत वाक्यों को चिह्नित करें:-】【

 1  :- जो जीवन वा निजी कर्म होता है, वह कभी किसी को सहज नहीं लगता है।

  जो जीवन वा निजी कर्म होता है, वह कभी किसी को मुश्किल नहीं लगता है।

 

 2  :- मुश्किल तब लगता है, जब अपने को अवतरित हुई आत्मा अर्थात् शक्ति अवतार समझते हो।

  मुश्किल तब लगता है, जब अपने को अवतरित हुई आत्मा अर्थात् शक्ति अवतार नहीं समझते हो।

 

 3  :- सिवाए विश्व-विनाश करने के कार्य के और कोई भी कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं।

  सिवाए धर्म स्थापन करने के कार्य के और कोई भी कार्य आप ब्राह्मण अर्थात् अवतरित हुई आत्माओं का है ही नहीं।

 

 4  :- सिर्फ ईश्वरीय सेवा-अर्थ यह साकार ब्राह्मण जीवन मिला है।

 

 5   :- सदैव यह याद रखो कि मैं बन्धन-युक्त हूँ। धर्म स्थापन करने अर्थ धर्म-आत्मा हूँ।

 सदैव यह याद रखो कि मैं अवतार हूँ। धर्म स्थापन करने अर्थ धर्म-आत्मा हूँ।