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AVYAKT MURLI

08 / 12 / 75

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08-12-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

बच्चों की विभिन्न स्टेजिस्

                                                                                          

सदा विजयी स्वरूप बनाने वाले, सर्व वरदानों के अधिकारी और विश्व द्वारा सदा सत्कारी बनाने वाले, विश्व-कल्याणकारी पिता बोले:-

अशरीरी भव यह वरदान प्राप्त कर लिया है? जिस समय संकल्प करो कि मैं अशरीरी हूँ, उसी सेकेण्ड स्वरूप बन जाओ। ऐसा अभ्यास सहज हो गया है? सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की निशानी है। कभी सहज, कभी मुश्किल, कभी सेकेण्ड में, कभी मिनट में या और भी ज्यादा समय में अशरीरी स्वरूप का अनुभव होना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज से अभी दूर है। सदा सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की परख है।

अभी-अभी बापदादा विदेश और अपने भारत देश के सर्व बच्चों की देखरेख करने चक्कर पर निकले। चक्कर लगाते विशेष बात क्या देखी? तीन प्रकार के बच्चों को देखा।

1. ज्ञान-रत्नों और याद की शक्ति के द्वारा सर्व शक्तियों को स्वयं में सम्पन्न करने वाले, निरन्तर चैतन्य चात्रक जो हर सेकेण्ड लेने वाले अर्थात् धारण करने वाले जिन्हें सिवाय प्राप्ति के या स्वयं को सम्पन्न बनाने के और कोई लगाव नहीं। रात है अथवा दिन है, लगन एकरस है -- ऐसे चैतन्य चात्रक विदेश में और भारत में दोनों ही स्थानों पर देखे।

2. सर्विस की लगन में मगन - दिन-रात सर्विस के प्लैन्स बनाने में व्यस्त। सर्विस के फल-स्वरूप स्वयं में खुशी का अनुभव करने वाले। लेकिन सर्वशक्तियों का, हर संकल्प में मायाजीत बनने की शक्ति का वा अशरीरी भव के वरदान की प्राप्ति का अनुभव करने में सदा एक-रस स्थिति नहीं। खुशी का अनुभव विशेष, लेकिन शक्ति का अनुभव कम करने वाले नॉलेजफुल का अनुभव ज्यादा और पॉवरफुल का अनुभव कम करने वाले, ज्ञान का सुमिरण ज्यादा, समर्थी-स्वरूप कम - ऐसे बच्चे भी देखे।

3. दिन-रात मंज़िल को सामने रखते हुए, सम्पूर्ण बनने की शुभ आशा रखते हुए, सदा पुरूषार्थ में व्यस्त, पुरूषार्थ में समय ज्यादा और प्राप्ति के समय कम अनुभव करने वाले, किसी-न-किसी समस्या का सामना करने में ही ज्यादा समय लगाने वाले, मुश्किल को सहज बनाने में लगने वाले - ऐसे बच्चे बहुत समय युद्धस्थल में ही स्वयं को अनुभव करने वाले हैं, अति-इन्द्रिय सुख के झूले में अर्थात् प्राप्ति के अनुभव में कम समय रहने वाले। ऐसे भी बहुत देखे।

पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रही जो पाना था, वह पा लिया। अब समय भी बाकी थोड़ा रहा है। दूसरे नम्बर वाले जो सर्विसएबल, नॉलेजफुल ज्यादा, पॉवरफुल कम थे उनकी स्थिति यह रहती है कि पा लिया है, मिल रहा है और निश्चय है कि पा ही लेंगे। खुशी के झूले में झूलते हैं लेकिन बीच-बीच में झूले को तेज झुलाने के लिए कोई आधार की आवश्यकता है। वह आधार क्या है? कोई अन्य द्वारा की हुई सर्विस प्रति हिम्मत, उल्लास दिलाने वाला हो अर्थात् बहुत अच्छा और बहुत अच्छा करने वाला हो। नहीं तो खुशी का झूला झूलते-झूलते रूक जाता है। तो रूके हुए को चलाना चाहिए। पहली स्टेज वालों का ऑटोमेटिक झूला है।

तीसरी स्टेज वालों की स्थिति-कभी प्राप्ति व विजय के आधार पर अति हर्षित और कभी बार-बार युद्ध की परिस्थिति में थकावट अनुभव करने वाले। किसी-न-किसी साधन के सहारे पर स्वयं को थोड़े समय के लिए खुश अनुभव करने वाले - कभी खुश, कभी शिकायत। क्या करूँ, कैसे करूँ, कर तो रहा हूँ इतनी मेहनत कर रहा हूँ, मेरी तकदीर ही ऐसी है, ड्रामा में मेरा ऐसा ही पार्ट नूँधा हुआ है और कल्प पहले इतना ही हुआ था ऐसे कभी ऊंचा, कभी नीचा इसी सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते रहते हैं। ऐसे तीन प्रकार के बच्चे देखे।

समय के प्रमाण वर्तमान स्थिति हर समय सर्व-प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा विजयीपन के नशे में रहना चाहिए। क्योंकि बाप ने सर्व-शक्तियों का मास्टर बना दिया है, स्वयं से भी श्रेष्ठ प्राप्ति का अधिकारी बना दिया है। ऐसे मास्टर व सर्व अधिकारी दूसरी व तीसरी स्टेज के अनुभव में नहीं लेकिन फर्स्ट स्टेज के अनुभव में रहने चाहिये। विदेशी ग्रुप जो लास्ट इज फास्ट कहलाते हैं। फास्ट इज फर्स्ट कहा जाता है। तो जो भी विदेशी ग्रुप आया है वह सब फर्स्ट स्टेज वाले हो ना? फर्स्ट स्टेज अर्थात् सदा अनुभवी मूर्त्त। हर सेकेण्ड अनुभव में मग्न रहने वाले, ऐसा है ना? कभी और अभी कहने वाला नहीं। कभी यह होता और कभी वह होता - यह नहीं। सदा एक के रस में रहने वाले और एक के द्वारा सर्व अनुभव पाने वाले - उसको कहा जाता फर्स्ट है। बापदादा को भी ऐसे लास्ट सो फास्ट वाले बच्चों पर नाज़ है। हर- एक के मस्तक की तकदीर की लकीर बापदादा तो देखते हैं ना - कि हर एक बच्चे का भविष्य क्या है? भविष्य को देख हर्षित होते है। अभी के आये हुए ग्रुप में भी अच्छे उम्मीदवार बच्चे हैं। जो विश्व के दीपक बन बाप-समान अनेकों को रास्ता बताने के निमित बनेंगे। अभी तो विशेष विदेशियों के अर्थ हैं ना? कुछ यहाँ बैठे हैं सम्मुख और कुछ विदेश में दिन-रात इसी ही याद में रहते। वह क्या अनुभव कर रहे हैं - जैसे रेडियो व टी.वी. में कोई विशेष प्रोग्राम आना होता है तो सब अपना-अपना स्विच ऑन करके रखते हैं। सबका अटेन्शन उस एक तरफ ही होता है। ऐसे ही विदेश में चारों ओर बच्चे अपनी स्मृति का स्विच ऑन करके बैठे हैं। सबका संकल्प यही एक मधुबन की स्मृति का है। दूर होते हुए भी कई बच्चे बाप को इस संगठन में सम्मुख दिखाई देते हैं। अच्छा।

ऐसे साकार रूप में सम्मुख बैठने वाले व आकारी रूप में बुद्धियोग द्वारा सम्मुख बैठे हुए ऐसे सदा विजयी स्वरूप, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले, प्राप्ति-स्वरूप, सर्व वरदानों के अधिकारी, विश्व द्वारा सदा सत्कारी और विश्व प्रति सदा कल्याणी, ऐसे विश्व के दीपकों को, बापदादा के दिलतख्तनशीन बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

इस मुरली का सार

1. पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रहती है कि जो पाना था, वह पा लिया। वे सदा झूले में झूलते रहते हैं।

2. समय के प्रमाण, वर्तमान स्थिति हर समय सर्व प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। क्योंकि बाप ने तुम्हें सर्व शक्तियों का मास्टर बना दिया है।

24-01-76   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

 

पुरूषार्थ को तीव्र करने की युक्ति- अब नहीं तो कभी नहीं

 

रूहानी सेवाधारी टीचर्स से मधुर मुलाकात करते हुए अव्यक्त बाप-दादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे:-

टीचर्स जैसे विशेष सेवार्थ निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं, वैसा पुरूषार्थ भी चलता है या जैसे स्टूडेण्ट्स का चलता है, वैसे ही चलता है? पार्ट के अनुसार विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? सम्पूर्ण बनना है, सतोप्रधान बनना है - यह तो सभी का लक्ष्य है, यह तो इन-जनरल हो गया। लेकिन टीचर्स का विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है व होना चाहिये, वह यही है कि हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो, समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है? सर्विसएबल, एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है!

जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प, हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं। जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे। महावीर के संस्कार हैं - अब नहीं तो कभी नहीं!

हमारे से ये आगे हैं, यह करेंगे तो हम करेंगे - यह अलबेलेपन के संस्कार हैं। जो संकल्प आया वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

सभी विशेष आत्मायें हो न? अपने को छोटा तो नहीं समझते हो? पुरूषार्थ में हर एक बड़ा है। कारोबार में छोटा-बड़ा होता है, पुरूषार्थ में छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरूषार्थ में छोटा आगे जा सकता है। कारोबार में मर्यादा की बात है। पुरूषार्थ में मर्यादा की बात नहीं। पुरूषार्थ में जो करेगा, सो पायेगा।

अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं? टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है। उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे। अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है, उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा। अच्छा!

इस वाणी की मुख्य पॉइन्ट

आजकल का विशेष पुरूषार्थ यह होना चाहिए कि हर संकल्प पॉवरफुल हो साधारण न हो, समर्थ हो, व्यर्थ न हो। जो संकल्प आया, वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

बच्चों की विभिन्न स्टेजिस्

 

 

सदा विजयी स्वरूप बनाने वाले, सर्व वरदानों के अधिकारी और विश्व द्वारा सदा सत्कारी बनाने वाले, विश्व-कल्याणकारी पिता बोले:-

अशरीरी भव यह वरदान प्राप्त कर लिया है? जिस समय संकल्प करो कि मैं अशरीरी हूँ, उसी सेकेण्ड स्वरूप बन जाओ। ऐसा अभ्यास सहज हो गया है? सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की निशानी है। कभी सहज, कभी मुश्किल, कभी सेकेण्ड में, कभी मिनट में या और भी ज्यादा समय में अशरीरी स्वरूप का अनुभव होना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज से अभी दूर है। सदा सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की परख है।

अभी-अभी बापदादा विदेश और अपने भारत देश के सर्व बच्चों की देखरेख करने चक्कर पर निकले। चक्कर लगाते विशेष बात क्या देखी? तीन प्रकार के बच्चों को देखा।

1. ज्ञान-रत्नों और याद की शक्ति के द्वारा सर्व शक्तियों को स्वयं में सम्पन्न करने वाले, निरन्तर चैतन्य चात्रक जो हर सेकेण्ड लेने वाले अर्थात् धारण करने वाले जिन्हें सिवाय प्राप्ति के या स्वयं को सम्पन्न बनाने के और कोई लगाव नहीं। रात है अथवा दिन है, लगन एकरस है -- ऐसे चैतन्य चात्रक विदेश में और भारत में दोनों ही स्थानों पर देखे।

2. सर्विस की लगन में मगन - दिन-रात सर्विस के प्लैन्स बनाने में व्यस्त। सर्विस के फल-स्वरूप स्वयं में खुशी का अनुभव करने वाले। लेकिन सर्वशक्तियों का, हर संकल्प में मायाजीत बनने की शक्ति का वा अशरीरी भव के वरदान की प्राप्ति का अनुभव करने में सदा एक-रस स्थिति नहीं। खुशी का अनुभव विशेष, लेकिन शक्ति का अनुभव कम करने वाले नॉलेजफुल का अनुभव ज्यादा और पॉवरफुल का अनुभव कम करने वाले, ज्ञान का सुमिरण ज्यादा, समर्थी-स्वरूप कम - ऐसे बच्चे भी देखे।

3. दिन-रात मंज़िल को सामने रखते हुए, सम्पूर्ण बनने की शुभ आशा रखते हुए, सदा पुरूषार्थ में व्यस्त, पुरूषार्थ में समय ज्यादा और प्राप्ति के समय कम अनुभव करने वाले, किसी-न-किसी समस्या का सामना करने में ही ज्यादा समय लगाने वाले, मुश्किल को सहज बनाने में लगने वाले - ऐसे बच्चे बहुत समय युद्धस्थल में ही स्वयं को अनुभव करने वाले हैं, अति-इन्द्रिय सुख के झूले में अर्थात् प्राप्ति के अनुभव में कम समय रहने वाले। ऐसे भी बहुत देखे।

पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रही जो पाना था, वह पा लिया। अब समय भी बाकी थोड़ा रहा है। दूसरे नम्बर वाले जो सर्विसएबल, नॉलेजफुल ज्यादा, पॉवरफुल कम थे उनकी स्थिति यह रहती है कि पा लिया है, मिल रहा है और निश्चय है कि पा ही लेंगे। खुशी के झूले में झूलते हैं लेकिन बीच-बीच में झूले को तेज झुलाने के लिए कोई आधार की आवश्यकता है। वह आधार क्या है? कोई अन्य द्वारा की हुई सर्विस प्रति हिम्मत, उल्लास दिलाने वाला हो अर्थात् बहुत अच्छा और बहुत अच्छा करने वाला हो। नहीं तो खुशी का झूला झूलते-झूलते रूक जाता है। तो रूके हुए को चलाना चाहिए। पहली स्टेज वालों का ऑटोमेटिक झूला है।

तीसरी स्टेज वालों की स्थिति-कभी प्राप्ति व विजय के आधार पर अति हर्षित और कभी बार-बार युद्ध की परिस्थिति में थकावट अनुभव करने वाले। किसी-न-किसी साधन के सहारे पर स्वयं को थोड़े समय के लिए खुश अनुभव करने वाले - कभी खुश, कभी शिकायत। क्या करूँ, कैसे करूँ, कर तो रहा हूँ इतनी मेहनत कर रहा हूँ, मेरी तकदीर ही ऐसी है, ड्रामा में मेरा ऐसा ही पार्ट नूँधा हुआ है और कल्प पहले इतना ही हुआ था ऐसे कभी ऊंचा, कभी नीचा इसी सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते रहते हैं। ऐसे तीन प्रकार के बच्चे देखे।

समय के प्रमाण वर्तमान स्थिति हर समय सर्व-प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा विजयीपन के नशे में रहना चाहिए। क्योंकि बाप ने सर्व-शक्तियों का मास्टर बना दिया है, स्वयं से भी श्रेष्ठ प्राप्ति का अधिकारी बना दिया है। ऐसे मास्टर व सर्व अधिकारी दूसरी व तीसरी स्टेज के अनुभव में नहीं लेकिन फर्स्ट स्टेज के अनुभव में रहने चाहिये। विदेशी ग्रुप जो लास्ट इज फास्ट कहलाते हैं। फास्ट इज फर्स्ट कहा जाता है। तो जो भी विदेशी ग्रुप आया है वह सब फर्स्ट स्टेज वाले हो ना? फर्स्ट स्टेज अर्थात् सदा अनुभवी मूर्त्त। हर सेकेण्ड अनुभव में मग्न रहने वाले, ऐसा है ना? कभी और अभी कहने वाला नहीं। कभी यह होता और कभी वह होता - यह नहीं। सदा एक के रस में रहने वाले और एक के द्वारा सर्व अनुभव पाने वाले - उसको कहा जाता फर्स्ट है। बापदादा को भी ऐसे लास्ट सो फास्ट वाले बच्चों पर नाज़ है। हर- एक के मस्तक की तकदीर की लकीर बापदादा तो देखते हैं ना - कि हर एक बच्चे का भविष्य क्या है? भविष्य को देख हर्षित होते है। अभी के आये हुए ग्रुप में भी अच्छे उम्मीदवार बच्चे हैं। जो विश्व के दीपक बन बाप-समान अनेकों को रास्ता बताने के निमित बनेंगे। अभी तो विशेष विदेशियों के अर्थ हैं ना? कुछ यहाँ बैठे हैं सम्मुख और कुछ विदेश में दिन-रात इसी ही याद में रहते। वह क्या अनुभव कर रहे हैं - जैसे रेडियो व टी.वी. में कोई विशेष प्रोग्राम आना होता है तो सब अपना-अपना स्विच ऑन करके रखते हैं। सबका अटेन्शन उस एक तरफ ही होता है। ऐसे ही विदेश में चारों ओर बच्चे अपनी स्मृति का स्विच ऑन करके बैठे हैं। सबका संकल्प यही एक मधुबन की स्मृति का है। दूर होते हुए भी कई बच्चे बाप को इस संगठन में सम्मुख दिखाई देते हैं। अच्छा।

ऐसे साकार रूप में सम्मुख बैठने वाले व आकारी रूप में बुद्धियोग द्वारा सम्मुख बैठे हुए ऐसे सदा विजयी स्वरूप, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले, प्राप्ति-स्वरूप, सर्व वरदानों के अधिकारी, विश्व द्वारा सदा सत्कारी और विश्व प्रति सदा कल्याणी, ऐसे विश्व के दीपकों को, बापदादा के दिलतख्तनशीन बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

इस मुरली का सार

1. पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रहती है कि जो पाना था, वह पा लिया। वे सदा झूले में झूलते रहते हैं।

2. समय के प्रमाण, वर्तमान स्थिति हर समय सर्व प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। क्योंकि बाप ने तुम्हें सर्व शक्तियों का मास्टर बना दिया है।

24-01-76   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

 

पुरूषार्थ को तीव्र करने की युक्ति- अब नहीं तो कभी नहीं

 

रूहानी सेवाधारी टीचर्स से मधुर मुलाकात करते हुए अव्यक्त बाप-दादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे:-

टीचर्स जैसे विशेष सेवार्थ निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं, वैसा पुरूषार्थ भी चलता है या जैसे स्टूडेण्ट्स का चलता है, वैसे ही चलता है? पार्ट के अनुसार विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? सम्पूर्ण बनना है, सतोप्रधान बनना है - यह तो सभी का लक्ष्य है, यह तो इन-जनरल हो गया। लेकिन टीचर्स का विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है व होना चाहिये, वह यही है कि हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो, समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है? सर्विसएबल, एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है!

जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प, हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं। जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे। महावीर के संस्कार हैं - अब नहीं तो कभी नहीं!

हमारे से ये आगे हैं, यह करेंगे तो हम करेंगे - यह अलबेलेपन के संस्कार हैं। जो संकल्प आया वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

सभी विशेष आत्मायें हो न? अपने को छोटा तो नहीं समझते हो? पुरूषार्थ में हर एक बड़ा है। कारोबार में छोटा-बड़ा होता है, पुरूषार्थ में छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरूषार्थ में छोटा आगे जा सकता है। कारोबार में मर्यादा की बात है। पुरूषार्थ में मर्यादा की बात नहीं। पुरूषार्थ में जो करेगा, सो पायेगा।

अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं? टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है। उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे। अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है, उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा। अच्छा!

इस वाणी की मुख्य पॉइन्ट

आजकल का विशेष पुरूषार्थ यह होना चाहिए कि हर संकल्प पॉवरफुल हो साधारण न हो, समर्थ हो, व्यर्थ न हो। जो संकल्प आया, वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

बच्चों की विभिन्न स्टेजिस्

 

 

सदा विजयी स्वरूप बनाने वाले, सर्व वरदानों के अधिकारी और विश्व द्वारा सदा सत्कारी बनाने वाले, विश्व-कल्याणकारी पिता बोले:-

अशरीरी भव यह वरदान प्राप्त कर लिया है? जिस समय संकल्प करो कि मैं अशरीरी हूँ, उसी सेकेण्ड स्वरूप बन जाओ। ऐसा अभ्यास सहज हो गया है? सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की निशानी है। कभी सहज, कभी मुश्किल, कभी सेकेण्ड में, कभी मिनट में या और भी ज्यादा समय में अशरीरी स्वरूप का अनुभव होना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज से अभी दूर है। सदा सहज अनुभव होना - यही सम्पूर्णता की परख है।

अभी-अभी बापदादा विदेश और अपने भारत देश के सर्व बच्चों की देखरेख करने चक्कर पर निकले। चक्कर लगाते विशेष बात क्या देखी? तीन प्रकार के बच्चों को देखा।

1. ज्ञान-रत्नों और याद की शक्ति के द्वारा सर्व शक्तियों को स्वयं में सम्पन्न करने वाले, निरन्तर चैतन्य चात्रक जो हर सेकेण्ड लेने वाले अर्थात् धारण करने वाले जिन्हें सिवाय प्राप्ति के या स्वयं को सम्पन्न बनाने के और कोई लगाव नहीं। रात है अथवा दिन है, लगन एकरस है -- ऐसे चैतन्य चात्रक विदेश में और भारत में दोनों ही स्थानों पर देखे।

2. सर्विस की लगन में मगन - दिन-रात सर्विस के प्लैन्स बनाने में व्यस्त। सर्विस के फल-स्वरूप स्वयं में खुशी का अनुभव करने वाले। लेकिन सर्वशक्तियों का, हर संकल्प में मायाजीत बनने की शक्ति का वा अशरीरी भव के वरदान की प्राप्ति का अनुभव करने में सदा एक-रस स्थिति नहीं। खुशी का अनुभव विशेष, लेकिन शक्ति का अनुभव कम करने वाले नॉलेजफुल का अनुभव ज्यादा और पॉवरफुल का अनुभव कम करने वाले, ज्ञान का सुमिरण ज्यादा, समर्थी-स्वरूप कम - ऐसे बच्चे भी देखे।

3. दिन-रात मंज़िल को सामने रखते हुए, सम्पूर्ण बनने की शुभ आशा रखते हुए, सदा पुरूषार्थ में व्यस्त, पुरूषार्थ में समय ज्यादा और प्राप्ति के समय कम अनुभव करने वाले, किसी-न-किसी समस्या का सामना करने में ही ज्यादा समय लगाने वाले, मुश्किल को सहज बनाने में लगने वाले - ऐसे बच्चे बहुत समय युद्धस्थल में ही स्वयं को अनुभव करने वाले हैं, अति-इन्द्रिय सुख के झूले में अर्थात् प्राप्ति के अनुभव में कम समय रहने वाले। ऐसे भी बहुत देखे।

पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रही जो पाना था, वह पा लिया। अब समय भी बाकी थोड़ा रहा है। दूसरे नम्बर वाले जो सर्विसएबल, नॉलेजफुल ज्यादा, पॉवरफुल कम थे उनकी स्थिति यह रहती है कि पा लिया है, मिल रहा है और निश्चय है कि पा ही लेंगे। खुशी के झूले में झूलते हैं लेकिन बीच-बीच में झूले को तेज झुलाने के लिए कोई आधार की आवश्यकता है। वह आधार क्या है? कोई अन्य द्वारा की हुई सर्विस प्रति हिम्मत, उल्लास दिलाने वाला हो अर्थात् बहुत अच्छा और बहुत अच्छा करने वाला हो। नहीं तो खुशी का झूला झूलते-झूलते रूक जाता है। तो रूके हुए को चलाना चाहिए। पहली स्टेज वालों का ऑटोमेटिक झूला है।

तीसरी स्टेज वालों की स्थिति-कभी प्राप्ति व विजय के आधार पर अति हर्षित और कभी बार-बार युद्ध की परिस्थिति में थकावट अनुभव करने वाले। किसी-न-किसी साधन के सहारे पर स्वयं को थोड़े समय के लिए खुश अनुभव करने वाले - कभी खुश, कभी शिकायत। क्या करूँ, कैसे करूँ, कर तो रहा हूँ इतनी मेहनत कर रहा हूँ, मेरी तकदीर ही ऐसी है, ड्रामा में मेरा ऐसा ही पार्ट नूँधा हुआ है और कल्प पहले इतना ही हुआ था ऐसे कभी ऊंचा, कभी नीचा इसी सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते रहते हैं। ऐसे तीन प्रकार के बच्चे देखे।

समय के प्रमाण वर्तमान स्थिति हर समय सर्व-प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा विजयीपन के नशे में रहना चाहिए। क्योंकि बाप ने सर्व-शक्तियों का मास्टर बना दिया है, स्वयं से भी श्रेष्ठ प्राप्ति का अधिकारी बना दिया है। ऐसे मास्टर व सर्व अधिकारी दूसरी व तीसरी स्टेज के अनुभव में नहीं लेकिन फर्स्ट स्टेज के अनुभव में रहने चाहिये। विदेशी ग्रुप जो लास्ट इज फास्ट कहलाते हैं। फास्ट इज फर्स्ट कहा जाता है। तो जो भी विदेशी ग्रुप आया है वह सब फर्स्ट स्टेज वाले हो ना? फर्स्ट स्टेज अर्थात् सदा अनुभवी मूर्त्त। हर सेकेण्ड अनुभव में मग्न रहने वाले, ऐसा है ना? कभी और अभी कहने वाला नहीं। कभी यह होता और कभी वह होता - यह नहीं। सदा एक के रस में रहने वाले और एक के द्वारा सर्व अनुभव पाने वाले - उसको कहा जाता फर्स्ट है। बापदादा को भी ऐसे लास्ट सो फास्ट वाले बच्चों पर नाज़ है। हर- एक के मस्तक की तकदीर की लकीर बापदादा तो देखते हैं ना - कि हर एक बच्चे का भविष्य क्या है? भविष्य को देख हर्षित होते है। अभी के आये हुए ग्रुप में भी अच्छे उम्मीदवार बच्चे हैं। जो विश्व के दीपक बन बाप-समान अनेकों को रास्ता बताने के निमित बनेंगे। अभी तो विशेष विदेशियों के अर्थ हैं ना? कुछ यहाँ बैठे हैं सम्मुख और कुछ विदेश में दिन-रात इसी ही याद में रहते। वह क्या अनुभव कर रहे हैं - जैसे रेडियो व टी.वी. में कोई विशेष प्रोग्राम आना होता है तो सब अपना-अपना स्विच ऑन करके रखते हैं। सबका अटेन्शन उस एक तरफ ही होता है। ऐसे ही विदेश में चारों ओर बच्चे अपनी स्मृति का स्विच ऑन करके बैठे हैं। सबका संकल्प यही एक मधुबन की स्मृति का है। दूर होते हुए भी कई बच्चे बाप को इस संगठन में सम्मुख दिखाई देते हैं। अच्छा।

ऐसे साकार रूप में सम्मुख बैठने वाले व आकारी रूप में बुद्धियोग द्वारा सम्मुख बैठे हुए ऐसे सदा विजयी स्वरूप, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले, प्राप्ति-स्वरूप, सर्व वरदानों के अधिकारी, विश्व द्वारा सदा सत्कारी और विश्व प्रति सदा कल्याणी, ऐसे विश्व के दीपकों को, बापदादा के दिलतख्तनशीन बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

इस मुरली का सार

1. पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रहती है कि जो पाना था, वह पा लिया। वे सदा झूले में झूलते रहते हैं।

2. समय के प्रमाण, वर्तमान स्थिति हर समय सर्व प्राप्ति के अनुभव की होनी चाहिए। क्योंकि बाप ने तुम्हें सर्व शक्तियों का मास्टर बना दिया है।

24-01-76   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

 

पुरूषार्थ को तीव्र करने की युक्ति- अब नहीं तो कभी नहीं

 

रूहानी सेवाधारी टीचर्स से मधुर मुलाकात करते हुए अव्यक्त बाप-दादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे:-

टीचर्स जैसे विशेष सेवार्थ निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं, वैसा पुरूषार्थ भी चलता है या जैसे स्टूडेण्ट्स का चलता है, वैसे ही चलता है? पार्ट के अनुसार विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? सम्पूर्ण बनना है, सतोप्रधान बनना है - यह तो सभी का लक्ष्य है, यह तो इन-जनरल हो गया। लेकिन टीचर्स का विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है? आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है व होना चाहिये, वह यही है कि हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो, समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है? सर्विसएबल, एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है!

जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प, हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं। जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे। महावीर के संस्कार हैं - अब नहीं तो कभी नहीं!

हमारे से ये आगे हैं, यह करेंगे तो हम करेंगे - यह अलबेलेपन के संस्कार हैं। जो संकल्प आया वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

सभी विशेष आत्मायें हो न? अपने को छोटा तो नहीं समझते हो? पुरूषार्थ में हर एक बड़ा है। कारोबार में छोटा-बड़ा होता है, पुरूषार्थ में छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरूषार्थ में छोटा आगे जा सकता है। कारोबार में मर्यादा की बात है। पुरूषार्थ में मर्यादा की बात नहीं। पुरूषार्थ में जो करेगा, सो पायेगा।

अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं? टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है। उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे। अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है, उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा। अच्छा!

इस वाणी की मुख्य पॉइन्ट

आजकल का विशेष पुरूषार्थ यह होना चाहिए कि हर संकल्प पॉवरफुल हो साधारण न हो, समर्थ हो, व्यर्थ न हो। जो संकल्प आया, वह अब करना ही है। कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

 

 

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QUIZ QUESTIONS

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 प्रश्न 1 :- अभी-अभी बापदादा विदेश और अपने भारत देश के सर्व बच्चों की देखरेख करने चक्कर पर निकले। चक्कर लगाते विशेष बात क्या देखी?

 प्रश्न 2 :- तीन प्रकार के आत्माओं के स्टेजेज के बारे मे बाबा ने क्या क्या वर्णन किया?

 प्रश्न 3 :- आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है उसके लिए बाबा ने टीचर्स कौन से इशारे दिए?

 प्रश्न 4 :- अब नहीं तो कभी नहीं! इस स्लोगन के बारे में बाबा ने क्या समझाया ?

 प्रश्न 5 :- अपने पुरुषार्थ के चेकिंग के विषय में बाबा ने टीचर्स को क्या कहा?

 

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

{ दीपक, पुरूषार्थ, स्टेज, समय, कारोबार, नहीं, सम्पूर्णता, सहज, झूला, वर्तमान, प्राप्ति, रास्ता। }

 1   सदा _____ अनुभव होना - यही ______ की परख है।

 2  पहली ______ वालों का ऑटोमेटिक ______ है।

 3  ______ के प्रमाण, _______ स्थिति हर समय सर्व ______ के अनुभव की होनी चाहिए।

 4  विश्व के _______ बन बाप-समान अनेकों को _______ बताने के निमित बनेंगे।

 5  _______ में छोटा-बड़ा होता है, _______ में छोटा-बड़ा ______ होता।

 

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 1  :- विदेही भव - यह वरदान प्राप्त कर लिया है?

 2  :-  सब का संकल्प यही एक मधुबन की स्मृति का है।

 3  :- अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा अथकपन के नशे में रहना चाहिए।

 4  :- अभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं।

 5   :- कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।

 

 

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QUIZ ANSWERS

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 प्रश्न 1 :- अभी-अभी बापदादा विदेश और अपने भारत देश के सर्व बच्चों की देखरेख करने चक्कर पर निकले। चक्कर लगाते विशेष बात क्या देखी?

 उत्तर 1 :- बापदादा ने तीन प्रकार के बच्चों को देखा :-

          ज्ञान-रत्नों और याद की शक्ति के द्वारा सर्व शक्तियों को स्वयं में सम्पन्न करने वाले, निरन्तर चैतन्य चात्रक जो हर सेकेण्ड लेने वाले अर्थात् धारण करने वाले जिन्हें सिवाय प्राप्ति के या स्वयं को सम्पन्न बनाने के और कोई लगाव नहीं। रात है अथवा दिन है, लगन एकरस है -- ऐसे चैतन्य चात्रक विदेश में और भारत में दोनों ही स्थानों पर देखे।

          सर्विस की लगन में मगन - दिन-रात सर्विस के प्लैन्स बनाने में व्यस्त। सर्विस के फल-स्वरूप स्वयं में खुशी का अनुभव करने वाले। लेकिन सर्वशक्तियों का, हर संकल्प में मायाजीत बनने की शक्ति का वा अशरीरी भव के वरदान की प्राप्ति का अनुभव करने में सदा एक-रस स्थिति नहीं। खुशी का अनुभव विशेष, लेकिन शक्ति का अनुभव कम करने वाले नॉलेजफुल का अनुभव ज्यादा और पॉवरफुल का अनुभव कम करने वाले, ज्ञान का सुमिरण ज्यादा, समर्थी-स्वरूप कम - ऐसे बच्चे भी देखे।

          दिन-रात मंज़िल को सामने रखते हुए, सम्पूर्ण बनने की शुभ आशा रखते हुए, सदा पुरूषार्थ में व्यस्त, पुरूषार्थ में समय ज्यादा और प्राप्ति के समय कम अनुभव करने वाले, किसी-न-किसी समस्या का सामना करने में ही ज्यादा समय लगाने वाले, मुश्किल को सहज बनाने में लगने वाले - ऐसे बच्चे बहुत समय युद्धस्थल में ही स्वयं को अनुभव करने वाले हैं, अति-इन्द्रिय सुख के झूले में अर्थात् प्राप्ति के अनुभव में कम समय रहने वाले। ऐसे भी बहुत देखे।

 

 प्रश्न 2 :- तीन प्रकार के आत्माओं के स्टेजेज के बारे में बाबा ने क्या क्या वर्णन किया?

 उत्तर 2 :- बाबाने इसके वर्णन में कहा कि :-

          पहले नम्बर के चात्रकों की स्थिति सदा यही रही जो पाना था, वह पा लिया। अब समय भी बाकी थोड़ा रहा है।

          दूसरे नम्बर वाले जो सर्विसएबल, नॉलेजफुल ज्यादा, पॉवरफुल कम थे उनकी स्थिति यह रहती है कि पा लिया है, मिल रहा है और निश्चय है कि पा ही लेंगे। खुशी के झूले में झूलते हैं लेकिन बीच-बीच में झूले को तेज झुलाने के लिए कोई आधार की आवश्यकता है। वह आधार क्या है? कोई अन्य द्वारा की हुई सर्विस प्रति हिम्मत, उल्लास दिलाने वाला हो अर्थात् बहुत अच्छा और बहुत अच्छा करने वाला हो। नहीं तो खुशी का झूला झूलते-झूलते रूक जाता है। तो रूके हुए को चलाना चाहिए। पहली स्टेज वालों का ऑटोमेटिक झूला है।

          तीसरी स्टेज वालों की स्थिति-        कभी प्राप्ति व विजय के आधार पर अति हर्षित और कभी बार-बार युद्ध की परिस्थिति में थकावट अनुभव करने वाले। किसी-न-किसी साधन के सहारे पर स्वयं को थोड़े समय के लिए खुश अनुभव करने वाले - कभी खुश, कभी शिकायत। क्या करूँ, कैसे करूँ, कर तो रहा हूँ इतनी मेहनत कर रहा हूँ, मेरी तकदीर ही ऐसी है, ड्रामा में मेरा ऐसा ही पार्ट नूँधा हुआ है और कल्प पहले इतना ही हुआ था ऐसे कभी ऊंचा, कभी नीचा इसी सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते रहते हैं। ऐसे तीन प्रकार के बच्चे देखे।

 

 प्रश्न 3 :- आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है उसके लिए बाबा ने टीचर्स को कौन से इशारे दिए?

 उत्तर 3 :- बाबा ने कहा आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है वह यही है कि :- हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो, समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है? सर्विसएबल, एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है! जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प, हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं।

 

 प्रश्न 4 :- अब नहीं तो कभी नहीं! इस स्लोगन के बारे मे बाबा ने क्या समझाया?

 उत्तर 4 :- बाबाने अब नहीं तो कभी नहीं! इस स्लोगन को समझाते हुए कहा कि जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे। महावीर के संस्कार हैं - अब नहीं तो कभी नहीं!

 

 प्रश्न 5 :- अपने पुरुषार्थ के चेकिंग के विषय में बाबा ने टीचर्स को क्या कहा?

 उत्तर 5 :- बाबाने टीचर्स को यह कहा कि :-

            अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं? टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है।

           उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे।

          अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है, उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा।

 

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

{ दीपक, पुरूषार्थ, स्टेज, समय, कारोबार, नहीं, सम्पूर्णता, सहज, झूला, वर्तमान, प्राप्ति, रास्ता। }

 1   सदा ___ अनुभव होना - यही ____ की परख है।

    सहज / सम्पूर्णता

 

पहली _____ वालों का ऑटोमेटिक ______ है।

स्टेज / झूला

 

 3  ______ के प्रमाण, ______ स्थिति हर समय सर्व ______ के अनुभव की होनी चाहिए।

समय / वर्तमान / प्राप्ति

 

 4  विश्व के ______ बन बाप-समान अनेकों को ______ बताने के निमित बनेंगे।

  दीपक / रास्ता

 

 5  _______ में छोटा-बड़ा होता है, _______ में छोटा-बड़ा ______ होता।

    कारोबार / पुरूषार्थ / नहीं

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 1  :- विदेही भव यह वरदान प्राप्त कर लिया है?

  अशरीरी भव यह वरदान प्राप्त कर लिया है?

 

 2  :- सब का संकल्प यही एक मधुबन की स्मृति का है।

 

 3  :- अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा अथकपन के नशे में रहना चाहिए।

  अब यह लास्ट समय युद्ध में नहीं लेकिन सदा विजयीपन के नशे में रहना चाहिए।

 

 4  :- अभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं।

  कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं।

 

 5   :- कल नहीं आज, आज नहीं अब, अर्थात् अभी करना है।