21-11-98   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सेवा के साथ देह में रहते विदेही अवस्था का अनुभव बढ़ाओ

आज बापदादा अपने चारों ओर के बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं क्योंकि बाप जानते हैं कि मेरा एक-एक बच्चा चाहे लास्ट पुरुषार्थी भी है फिर भी विश्व में सबसे बड़े ते बड़े भाग्यवान है क्योंकि भाग्य विधाता बाप को जान, पहचान भाग्यविधाता के डायरेक्ट बच्चे बन गये। ऐसा भाग्य सारे कल्प में किसी आत्मा का न है, न हो सकता है। साथ-साथ सारे विश्व में सबसे सम्पत्तिवान वा धनवान और कोई हो नहीं सकता। चाहे कितना भी पद्मपति हो लेकिन आप बच्चों के खज़ानों से कोई की भी तुलना नहीं है क्योंकि बच्चों के हर कदम में पद्मों की कमाई है। सारे दिन में हर रोज़ चाहे एक दो कदम भी बाप की याद में रहे वा कदम उठाया, तो हर कदम में पद्म... तो सारे दिन में कितने पद्म जमा हुए? ऐसा कोई होगा जो एक दिन में पद्मों की कमाई करे! इसलिए बापदादा कहते हैं अगर भाग्यवान देखना हो वा रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड आत्मा देखनी हो तो बाप के बच्चों को देखो।

आप बच्चों के पास सिर्फ एक स्थूल धन का खज़ाना नहीं, वो तो सिर्फ धन के साहूकार हैं और आप बच्चे कितने खज़ानों से भरपूर हैं! खज़ानों की लिस्ट जानते हो ना? यह स्थूल धन तो कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन आपके पास जो ज्ञान का खज़ाना, शक्तियों का खज़ाना, सर्व गुणों का खज़ाना, खुशी का खज़ाना और सर्व को सुख-शान्ति का रास्ता बताने से जो दुआओं का खज़ाना मिलता है, यह अविनाशी खज़ाने सिवाए परमात्म बच्चों के अविनाशी किसके पास नहीं हैं। तो बापदादा को ऐसे खज़ानों के मालिक बच्चों पर कितना रूहानी नाज़ है। बापदादा सदा बच्चों को ऐसे सम्पन्न देख यही गीत गाते वाह बच्चे वाह! आपको भी अपने पर इतना रूहानी नाज़ अर्थात् नशा है ना! हाथ की ताली बजा सकते हो। (सभी ने तालियाँ बजाईं) दोनों हाथ को क्यों तकलीफ देते हो, एक हाथ की बजाओ। एक हाथ की ताली बजाना आता है ना! ब्राह्मणों का सब कुछ निराला है। ब्राह्मण शान्त पसन्द हैं इसलिए ताली भी शान्ति की ठीक है। तो नशा तो सभी को सदा है भी और आगे भी रहेगा। निश्चित है।

बापदादा समय के परिवर्तन की तीव्र रफ़्तार को देख बच्चों के पुरूषार्थ की रफ़्तार को भी देखते रहते हैं। बापदादा हर एक बच्चे को जीवनमुक्त स्थिति में सदा देखने चाहते हैं। आप सबका यह चैलेन्ज है कि बाप से मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा आकर लो। लेकिन आपको तो मुक्ति वा जीवनमुक्ति का वर्सा मिल गया है ना? या नहीं मिला है (मिला है) सतयुग में या मुक्तिधाम में मुक्ति व जीवनमुक्ति का अनुभव नहीं कर सकेंगे। मुक्ति-जीवनमुक्ति के वर्से का अनुभव अभी संगम पर ही करना है। जीवन में रहते, समय नाज़ुक होते, परिस्थितियाँ, समस्यायें, वायुमण्डल डबल दूषित होते हुए भी इन सब प्रभावों से मुक्त, जीवन में रहते इन सर्व भिन्न-भिन्न बन्धनों से मुक्त एक भी सूक्ष्म बन्धन नहीं हो - ऐसे जीवन मुक्त बने हो वा अन्त में बनेंगे? अब बनेंगे या अन्त में बनेंगे? जो समझते हैं अन्त में बनने के बजाए अभी बनना है, वा बने हैं या बनना ही है, वह हाथ उठाओ। (सभी ने हाथ उठाया) दोनों में मिक्स हाथ उठा रहे हैं, चतुर हैं। भले चतुराई करो। लेकिन बापदादा अभी से स्पष्ट सुना रहे हैं, अटेन्शन प्लीज़। हर एक ब्राह्मण बच्चे को बाप को बन्धनमुक्त, जीवनमुक्त बनाना ही है। चाहे किसी भी विधि से, लेकिन बनाना ज़रूर है। जानते हो ना कि विधियाँ क्या हैं? इतने तो चतुर हो ना! तो बनना तो आपको पड़ेगा ही। चाहे चाहो, चाहे नहीं चाहो, बनना तो पड़ेगा ही। फिर क्या करेंगे? (अभी से बनेंगे) आपके मुख में गुलाबजामुन। सबके मुख में गुलाबजामुन आ गया ना। लेकिन यह गुलाबजामुन है - अभी बन्धनमुक्त बनने का। ऐसे नहीं गुलाबजामुन खा जाओ।

हाल की शोभा बहुत अच्छी है। एकदम माला लगती है। यहाँ से आकर देखो तो ऐसे माला लगती है। यह कुर्सिर्यो वालों की माला तैयार हो गई है। अच्छा है। कारणे-अकारणें जैसे अभी कुर्सी ली है ना ऐसे ही जब बापदादा फाइनल समय प्रमाण सीटी बजायेंगे कि जीवनमुक्ति की कुर्सी पर बैठ जाओ तो भी बैठेंगे या अभी कुर्सी पर बैठे हैं? ऐसे नहीं कि धरनी पर बैठे हुए कुर्सी नहीं लेंगे, पहले आप। धरनी पर बैठना - यह है तपस्या की निशानी। तन्दरूस्ती की निशानी है। हेल्थ भी है, तपस्या द्वारा खज़ानों की वेल्थ भी है तो जहाँ हेल्थ है, वेल्थ है वहाँ हैपी तो है ही। तो अच्छा है -हेल्दी हो, वेल्दी हो।

तो बापदादा आज देख रहे थे कि बच्चों की तीन प्रकार की स्टेजेस हैं। एक हैं - पुरुषार्थी, उसमें पुरुषार्थी भी हैं और तीव्र पुरुषार्थी भी हैं। दूसरे हैं - जो पुरूषार्थ की प्रालब्ध जीवनमुक्त अवस्था की स्टेज में अनुभव कर रहे हैं। लेकिन लास्ट की सम्पूर्ण स्टेज है - देह में होते भी विदेही अवस्था का अनुभव। तो तीन स्टेज देखीं। पुरूषार्थ की स्टेज में ज्यादा देखे। प्रालब्ध जीवनमुक्त की, प्रालब्ध यह नहीं कि सेन्टर के निमित्त बनने की वा स्पीकर अच्छे बनने की वा ड्रामा अनुसार अलग-अलग विशेष सेवा के निमित्त बनने की..... यह प्रालब्ध नहीं है, यह तो लिफ्ट है और आगे बढ़ने की, सर्व द्वारा दुआयें लेने की लेकिन प्रालब्ध है जीवनमुक्त की। कोई बन्धन नहीं हो। आप लोग एक चित्र दिखाते हो ना! साधारण अज्ञानी आत्मा को कितनी रस्सियों से बंधा हुआ दिखाते हो। वह है अज्ञानी आत्मा के लिए लोहे की ज़ंजीर। मोटे-मोटे बंधन हैं। लेकिन ज्ञानी तू आत्मा बच्चों के बहुत महीन और आकर्षण करने वाले धागे हैं। लोहे की ज़ंजीर अभी नहीं है, जो दिखाई दे देवे। बहुत महीन भी है, रॉयल भी है। पर्सनैलिटी फील करने वाले भी हैं, लेकिन वह धागे देखने में नहीं आते, अपनी अच्छाई महसूस होती है। अच्छाई है नहीं लेकिन महसूस ऐसे होती है कि हम बहुत अच्छे हैं। हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं। तो बापदादा देख रहे थे - यह जीवनबन्ध के धागे मैजारिटी में हैं। चाहे एक हो, चाहे आधा हो लेकिन जीवनमुक्त बहुत-बहुत थोड़े देखे। तो बापदादा देख रहे थे कि हिसाब के अनुसार यह सेकण्ड स्टेज है जीवनमुक्त, लास्ट स्टेज तो है - देह से न्यारे विदेहीपन की। उस स्टेज और जो स्टेज सुनाई उसके लिए और बहुत-बहुत-बहुत अटेन्शन चाहिए। सभी बच्चे पूछते हैं 99 आयेगा क्या होगा? क्या करें? क्या करें, क्या नहीं करें?

बापदादा कहते हैं 99 के चक्कर को छोड़ो। अभी से विदेही स्थिति का बहुत अनुभव चाहिए। जो भी परिस्थितियाँ आ रही हैं और आने वाली हैं उसमें विदेही स्थिति का अभ्यास बहुत चाहिए। इसलिए और सभी बातों को छोड़ यह तो नहीं होगा, यह तो नहीं होगा। क्या होगा, इस क्वेश्चन को छोड़ दो। विदेही अभ्यास वाले बच्चों को कोई भी परिस्थिति वा कोई भी हलचल प्रभाव नहीं डाल सकती। चाहे प्रकृति के पांचों ही तत्व अच्छी तरह से हिलाने की कोशिश करेंगे परन्तु विदेही अवस्था की अभ्यासी आत्मा बिल्कुल ऐसा अचल-अडोल पास विद् ऑनर होगा जो सब बातें पास हो जायेंगी लेकिन वह ब्रह्मा बाप के समान पास विद् ऑनर का सबूत रहेगा। बापदादा समय प्रति समय इशारे देते भी हैं और देते रहेंगे। आप सोचते भी हो, प्लैन बनाते भी हो, बनाओ। भले सोचो लेकिन क्या होगा!... उस आश्चर्यवत होकर नहीं। विदेही, साक्षी बन सोचो लेकिन सोचा, प्लैन बनाया और सेकण्ड में प्लेन स्थिति बनाते चलो। अभी आवश्यकता स्थिति की है। यह विदेही स्थिति परिस्थिति को बहुत सहज पार कर लेगी। जैसे बादल आये, चले गये। और विदेही, अचल-अडोल हो खेल देख रहे हैं। अभी लास्ट समय को सोचते हो लेकिन लास्ट स्थिति को सोचो।

चारों ओर की सेवाओं के समाचार बापदादा सुनते रहते हैं और दिल से सभी अथक सेवाधारियों को मुबारक भी देते हैं, सेवा बहुत अच्छे उमंग-उत्साह से कर रहे हैं और आगे भी करते रहो लेकिन सेवा और स्थिति का बैलेन्स थोड़ा-सा कभी इस तरफ झुक जाता है, कभी उस तरफ इसलिए सेवा खूब करो, बापदादा सेवा के लिए मना नहीं करते और ज़ोर-शोर से करो लेकिन सेवा और स्थिति का सदा बैलेन्स रखते चलो। स्थिति बनाने में थोड़ी मेहनत लगती है और सेवा तो सहज हो जाती है। इसलिए सेवा का बल थोड़ा स्थिति से ऊँचा हो जाता है। बैलेन्स रखो और बापदादा की, सर्व सेवा करने वाले आत्माओं की, संबंध-सम्पर्क में आने वाले ब्राह्मण परिवार की ब्लैसिंग लेते चलो। यह दुआओं का खाता बहुत जमा करो। अभी की दुआओं का खाता आप आत्माओं में इतना सम्पन्न हो जाए जो द्वापर से आपके चित्रों द्वारा सभी को दुआयें मिलती रहेंगी। अनेक जन्म में दुआयें देनी हैं लेकिन जमा एक जन्म में करनी हैं। इसलिए क्या करेंगे? स्थिति को सदा आगे रख सेवा में आगे बढ़ते चलो। क्या होगा, यह नहीं सोचो। ब्राह्मण आत्माओं के लिए अच्छा है, अच्छा ही होना है। लेकिन बैलेन्स वालों के लिए सदा अच्छा है। बैलेन्स कम तो कभी अच्छा, कभी थोड़ा अच्छा। सुना क्या करना है? क्वेश्चन मार्क सोचने के हिसाब से आश्चर्यवत् होके सोचने को फिनिश करो, यह तो नहीं होगा, यह तो नहीं होगा....। वह स्थिति को नीचे ऊपर करता है। समझा।

नये-नये भी बहुत आये हैं, जो इस कल्प में पहले बारी मधुबन में आये हैं, वह हाथ उठाओ। बहुत अच्छा। बापदादा नये-नये बच्चों को देख खुश होते हैं और बड़े खुशी से बापदादा वेलकम बच्चे, वेलकम बच्चे कर रहे हैं। अच्छा है जो फाइनल समाप्ति के पहले पहुँच गये हो। फिर भी मिलने के समय पर पहुँचे हो। इसलिए पीछे आने वालों को अभी भी चांस है, आगे बढ़ने का। तो आप लोग गोल्डन चांस ले लो। अच्छा।

गुजरात से समर्पण वाली कुमारियों का ग्रुप आया है (अहमदाबाद मेले में 38 कुमारियों का समर्पण समारोह 13 नवम्बर को मनाया गया था, वे सभी बापदादा के सम्मुख बैठी थीं) समर्पण तो हुए बहुत अच्छा हुआ। सेवा भी हुई, मनाया भी और सेवा का भाग्य भी बनाया। अभी और भी कोई समर्पण समारोह मनाना है वा मना लिया बस फिनिश हुआ? तो बापदादा यही कहेंगे कि यह पूरा ग्रुप बंधनमुक्त का समर्पण समारोह मनावे। है ताकत? अगर है तो हाथ की ताली बजाओ। एक दो को देखकर नहीं उठाना। अहमदाबाद को तो वरदान है, सेवा का फल भी है और सेवा का बल भी है। इसलिए ऐसा समर्पण समारोह मनाना। फिर बापदादा आफरीन देंगे। ठीक है ना! पहले मैं। इसमें दूसरों को नहीं देखना। पहले बड़े-बड़े करें फिर हम करेंगे। नहीं। पहले मैं। ठीक है। अच्छा - आपस में इस पर रूह-रूहान करना और एक दो को वायदा याद कराते आगे बढ़ते रहना। बहुत अच्छा।

(एज्युकेशन विंग की ट्रेनिंग में लगभग 100 टीचर्स आये हैं) बहुत अच्छी ट्रेनिंग हुई, अच्छी लगी? अभी सेवा में आगे बढ़ेंगे, यह तो बहुत अच्छा। परन्तु जो आज बापदादा ने कहा अपने आपको भी ट्रेन्ड करना। पहले स्व की ट्रेनिंग साथ में सर्व के प्रति ट्रेनिंग। तो डबल कार्य करते हुए आगे बढ़ते जाना। उड़ते जाना। उड़ने वाले हो ना? अच्छा। यह मधुबन की ट्रेनिंग को अविनाशी रखना। जैसे सेवा में चांस लेने का संकल्प रहता है, चांस लें, ऐसे ही स्व स्थिति में आगे बढ़ने का भी चांस लेते रहना। अच्छा है ना! बापदादा देखेंगे कौन नम्बर वन अर्थात् बैलेन्स में विन प्राप्त करने वाले हैं। बहुत अच्छा।

(पंजाब वालों ने पहले ग्रुप में सेवा की है) अच्छा बड़ा ग्रुप है। अच्छा चांस मिला है। पंजाब को बापदादा विशेष एक बात की मुबारक देते हैं। जानते हो कौन सी? पंजाब ने कलराठी ज़मीन को फलदायक बनाने में अच्छी उन्नति की है। प्रोग्रेस अच्छी है इसलिए मुबारक हो। और भी पंजाब शेर गाया हुआ है। आपकी दादी (चन्द्रमणी दादी) को भी पंजाब का शेर कहते थे। तो सभी शेर हो ना! तो शेर किसका शिकार करेंगे? बकरी का? नम्बरवन शेर वह है जो शेर का शिकार करे। अभी पंजाब की धरनी तो अच्छी बन गई है, अभी ऐसे विशेष वारिस बनाओ। यह है शेर का शिकार। कोई मण्डलेश्वर की विशेष सेवा करके दूसरी सीज़न में लेकर आओ। देखेंगे अगली सीज़न में पंजाब से कितने वारिस आते हैं। अच्छा - सेवा की खुशबू तो अच्छी है। सब सन्तुष्ट रहते भी हैं और सन्तुष्ट करते भी हैं। मुबारक हो।

(डबल विदेशी भी बहुत आये हैं) विदेश का ग्रुप उठो। विदेश में भी एक विशेषता बापदादा को बहुत अच्छी लगती है। कौन सी? सभी को उमंग-उत्साह बहुत है कि विदेश के कोने-कोने में बाप का स्थान बनायें और बनाया भी है। इस वर्ष कितने नये स्थान बनाये हैं? (12-15) अच्छा उमंग है कि सन्देश चारों ओर मिल जाए। यह लक्ष्य बहुत अच्छा है। जहाँ जाते हैं वहाँ कोई-न-कोई को निमित्त बनाने की सेवा का लक्ष्य अच्छा रखते हैं। यह विशेषता है। हर एक जितना हो सकता है उतना अपने आपको सेवा के निमित्त बनाने की आफर भी करते हैं और प्रैक्टिकल में भी करते हैं। यही सोचते हैं कि घर-घर में बाबा का घर हो, यह उमंग-उत्साह बहुत अच्छा है। इसलिए इस उमंग-उत्साह के लिए बापदादा और एडवांस में आगे बढ़ने की मुबारक दे रहे हैं। बापदादा विदेशी अर्थात् विश्व-कल्याण करने के निमित्त बनने वाले बच्चों को यही कहते हैं कि अब सेवा और विदेही अवस्था में नम्बरवन विदेशी बच्चों को बनना ही है। बनना है - कब? 99 में या 2 हज़ार में बनना है? कब नहीं, अब। अव्यक्त बाप की पालना का प्रत्यक्ष सबूत देना है। जैसे ब्रह्मा बाप अव्यक्त बन विदेही स्थिति द्वारा कर्मातीत बनें, तो अव्यक्त ब्रह्मा की विशेष पालना के पात्र हो इसलिए अव्यक्त पालना का बाप को रेसपाण्ड देना - विदेही बनने का। सेवा और स्थिति के बैलेन्स का। ठीक है, मंजूर है? करना ही है। बापदादा यह नहीं सोचते - देखेंगे, सोचेंगे। नहीं। करना ही है। अपनी भाषा में बोलो - करना ही है। जो भी सभी टी.वी. में भी देख रहे हैं वह सभी भी ऐसे बोल रहे हैं ना? बापदादा देख रहे हैं। चाहे भारत में देख रहे हैं, चाहे फॉरेन में देख रहे हैं लेकिन सभी को उमंग आ रहा है हम करेंगे, हम करेंगे। हमें करना ही है। एडवांस में मुबारक हो। अच्छा।

(विदेश के बहुत से भाई-बहिनें पहली बार आये हैं, रिट्रीट में आये हुए गेस्ट भी बैठे हैं)

बहुत अच्छा - सब नम्बरवन लेने वाले हैं। बहुत अच्छा, मेहमान बनकर आये और बाप के बच्चे अधिकारी बन गये। अधिकारी हो गये ना? अधिकारी हैं? बहुत अच्छा, अभी आगे बढ़ते रहना।

(हॉस्पिटल के ट्रस्टियों से) - सभी डबल ट्रस्टी हो। एक प्रवृत्ति में रहते ट्रस्टी और दूसरा हॉस्पिटल में रहते ट्रस्टी। हॉस्पिटल के भी ट्रस्टी तो जीवन में भी ट्रस्टी। अच्छा है। हॉस्पिटल आत्माओं की भी सेवा कर रही है और शरीर की भी सेवा कर रही है। तो डबल सेवा हो रही है इसलिए जो निमित्त बनी हुई आत्मायें हो उन्हों को भी डबल दुआयें मिलती रहती हैं। बहुत अच्छे प्लैन बनाये हैं ना। सेवा का चांस लेना यह है चांसलर बनना। वह चांसलर नहीं, रूहानी यूनिवार्सिटी के चांसलर। अच्छा है।

(आस्ट्रेलिया वाले ओलम्पिक गेम के समय बड़ा प्रोग्राम करने का प्लैन बना रहे हैं, बापदादा को प्लैन दिखाया) जहाँ उमंग-उत्साह है और सबकी एकमत है। तो जहाँ एकमत है और उमंग-उत्साह है तो सफलता है ही है। अच्छा है भले करो। फॉरेन में नाम बाला करो। बहुत अच्छा।

जो भी सभी भारत से आये हैं, तो भारत वालों को तो विशेष नशा है कि बापदादा अवतरित भी भारत में होते हैं और साथ-साथ अगर मिलने आते हैं तो भी भारत में ही आते हैं। तो डबल नशा है ना! भारत ने ही विदेश में सन्देश दिया, तो भारत ने विदेश में भी अपने परिवार को ढूंढ एक परिवार बना दिया। इसलिए भारतवासी बच्चों का सदा महत्त्व है और भारत का महत्त्व बढ़ना है तो भारतवासियों का महत्त्व तो है ही। इसीलिए जो भी नये-पुराने बच्चे आये हैं वह बहुत प्यार से पहुँचे हैं, बापदादा सभी बच्चों का स्नेह और चारों ओर सेवा के सहयोग को देख खुश हैं और बच्चे भी सदा खुश हैं। खुश रहते हो ना? कभी खुशी कम नहीं करना। यह स्पेशल बाप का खज़ाना है। इसलिए खुशी कभी नहीं छोड़ना। सदा खुश। अच्छा।

चारों ओर के सर्व श्रेष्ठ भाग्यवान, सर्व श्रेष्ठ खज़ानों के मालिक, सदा सेवा और स्थिति का बैलेन्स रखने वाले ज्ञानी तू आत्मा, सर्व शक्ति सम्पन्न आत्मायें, सदा बंधनमुक्त, जीवनमुक्त आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।



12-12-98   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


मेरे-मेरे का देह-अभिमान छोड़ ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखो

आज बापदादा अपने चारों ओर के श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं को देख रहे हैं। ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मा मुख वंशावली। हर ब्राह्मण आत्मा के भाग्य को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। हर ब्राह्मण आत्मा को जन्मते ही स्वयं ब्रह्मा बाप द्वारा मस्तक में स्मृति का तिलक लगता है। स्वयं भगवान तिलकधारी बनाते हैं। साथ-साथ हर ब्राह्मण आत्मा को पवित्रता के महामन्त्र द्वारा लाइट का ताज धारण कराते हैं और साथ-साथ हर ब्राह्मण आत्मा को विश्व-कल्याणकारी आत्मा बनाए जिम्मेवारी का ताज धारण कराते हैं। डबल ताज है और भगवान स्वयं अपने दिल तख़्तनशीन बनाते हैं। तो जन्मते ही तिलक, ताज और तख़्तधारी बन जाते हैं। ऐसा श्रेष्ठ भाग्य सारे कल्प में कोई आत्मा का नहीं हो सकता। तो इतने श्रेष्ठ भाग्य की स्मृति रहती है कि हम ब्राह्मण जन्मते ही ऐसे भाग्यवान बनते हैं? आप ब्राह्मणों की निशानी दुनिया वालों ने कृष्ण रूप में दिखा दी है। लेकिन वह विश्व का राजकुमार है इसलिए राज्य की निशानी तिलक, ताज, तख़्त देते हैं। फिर भी उसको छोटे-पन में तिलक ताज, तख्त नहीं मिलता लेकिन आप ब्राह्मणों को तिलक, ताज और तख़्त तीनों ही प्राप्त होता है। परमात्म-बाप द्वारा यह तीनों प्राप्तियाँ होना यह सिर्फ ब्राह्मणों के भाग्य में है। तो बापदादा देख रहे थे कि मेरे बच्चों का कितना बड़ा भाग्य का सितारा हर एक के मस्तक पर चमक रहा है। ऐसा भाग्य का सितारा आपको अपने में दिखाई देता है? सदा चमकता हुआ दिखाई देता है या कभी बहुत अच्छा चमकता है और कभी सितारे की चमक कम हो जाती है? यह भाग्य का सितारा विचित्र सितारा है। तो बापदादा आप सभी बच्चों को जब भी देखते हैं, मिलते हैं तो हर एक बच्चे के मस्तक में सितारा चमकता हुआ देख हर्षित होते हैं। सितारा चमकते-चमकते चमक कम क्यों होती है? उसके कारण को आप सब अच्छी तरह से जानते हो।

बापदादा को बच्चों का चार्ट देखकर मुस्कराहट भी आती, जब भी किसी से पूछो कि क्या बनना है? लक्ष्य क्या है? तो मैजॉरिटी का एक ही जवाब होता है कि नम्बरवन बनना है। सूर्यवंशी बनना है। चन्द्रवंशी राजा राम-सीता भी बनने नहीं चाहते। लेकिन जब लक्ष्य सूर्यवंशी नम्बरवन का है, तो जैसा लक्ष्य वैसे लक्षण सदा सूर्यवंश का दिखाई देना आवश्यक है। बच्चों का लक्ष्य सूर्यवंश का है अर्थात् सदा विजयी का है, नम्बरवन सूर्यवंशी की निशानी है सदा विजयी। सूर्य की कलायें कम और ज्यादा नहीं होतीं। उदय होता है और अस्त होता है लेकिन चन्द्रवंशी मुआिफक कलायें कम नहीं होतीं। तो सूर्यवंश की निशानी है सदा एकरस और सदा विजयी। चन्द्रवंश को क्षत्रिय कहा जाता है, क्षत्रिय जीवन में कभी हार होती, कभी जीत होती। कभी सफलतामूर्त्त और कभी मेहनत की मूर्त्त। युद्ध करना अर्थात् मेहनत करना। चन्द्रवंश की कलायें एकरस नहीं होतीं, इसलिए लक्ष्य और लक्षण को समान बनाओ। जैसे लक्ष्य रखा है बाप समान बनने का, हर एक बच्चा यही कहता है कि बाप समान बनना है। तो बाप सदा सहज विजय स्वरूप है। अगर एकरस अवस्था नहीं है तो क्या नम्बरवन बनेंगे वा नम्बरवार में आयेंगे? एक है नम्बरवन और दूसरा है नम्बरवार। तो अपने से पूछो हम नम्बरवन हैं वा नम्बरवार की लिस्ट में हैं? नम्बरवन अर्थात् फॉलो ब्रह्मा बाप।

बापदादा सहज साधन बताते हैं कि फॉलो करने में मेहनत कम लगती है। ब्रह्मा के पाँव अर्थात् कदम, हर कार्य के कदम रूपी पाँव के निशान हैं। तो पाँव पर पाँव रखकर चलना सहज होता है। नया रास्ता नहीं ढूँढना है, पाँव पर पाँव अर्थात् कदम पर कदम रखना है। जो भी कार्य करते हो चाहे मन्सा संकल्प करते हो, चाहे बोल बोलते हो, चाहे कर्म में सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो, हर कर्म करने के पहले यह सोचो कि जो मैं ब्राह्मण आत्मा कर्म कर रही हूँ, कर रहा हूँ, क्या यह ब्रह्मा बाप समान है? ब्रह्मा बाप का संकल्प क्या रहा? मेरा संकल्प भी उसी प्रमाण है? हर बोल ब्रह्मा समान है? अगर नहीं है तो नहीं करना है। न सोचना है, न बोलना है, न करना है। ऐसे नहीं ब्रह्मा बाप का कदम एक और बच्चों का कदम दूसरा, तो जो लक्ष्य है, मंज़िल है बाप समान बनने का, वह कैसे होगा? अगर ब्रह्मा के हर कदम समान कदम पर कदम फॉलो करते चलेंगे तो एक तो सदा अपने को सहज पुरुषार्थी अनुभव करेंगे और सदा सम्पूर्णता की मंज़िल समीप अनुभव करेंगे।

ब्रह्मा बाप समान अर्थात् सम्पूर्णता के मंज़िल पर पहुँचना। तो ब्रह्मा बाप वतन में आप सब बच्चों के सम्पूर्ण अव्यक्त फरिश्ते बनने का आह्वान कर रहे हैं। ब्रह्मा बाप के आह्वान का गीत वा मधुर आह्वान का आवाज़ सुनाई नहीं देता? आओ बच्चे, मीठे बच्चे, जल्दी-जल्दी आओ यह गीत वा बोल सुनाई नहीं देता? ब्रह्मा बाप का आवाज़ सुनो, कैच करो। ब्रह्मा बाप यही कहते कि बच्चे 99 वर्ष का सोचते बहुत हैं, क्या होगा, यह होगा, वह होगा... यह होगा वा नहीं होगा...! यह होगा! - इस सोच में ज्यादा रहते हैं। यह तो नहीं होगा! कभी सोचते होगा, कभी सोचते नहीं होगा। यह होगा, होगा का गीत गाते रहते हैं। लेकिन अपने फरिश्तेपन के, सम्पन्न सम्पूर्ण स्थिति में तीव्रगति से आगे बढ़ने का श्रेष्ठ संकल्प कम करते हैं। होगा, क्या होगा!... यह गा-गा के गीत ज्यादा गाते हैं। बाप कहते हैं कुछ भी होगा लेकिन आपका लक्ष्य क्या है? जो होगा वह देखने और सुनने का लक्ष्य है वा ब्रह्मा बाप समान फरिश्ता बनने का है? उसकी तैयारी कर ली है? प्रकृति अपना कुछ भी रंग-रूप दिखाये, आप फरिश्ता बन, बाप समान अव्यक्त रूपधारी बन प्रकृति के हर दृश्य को देखने के लिए तैयार हो? प्रकृति की हलचल के प्रभाव से मुक्त फरिश्ते बने हो? अपनी स्थिति की तैयारी में लगे हुए हो वा क्या होगा, क्या होगा - इसी सोचने में लगे हो? क्या कोई भी परिस्थिति सामने आये तो आप प्रकृतिपति अपने प्रकृतिपति की सीट पर सेट होंगे वा अपसेट होंगे? यह क्या हो गया? यह हो गया, यह हो गया... इसी नज़ारों के समाचारों में बिजी होंगे वा सम्पन्नता की स्थिति में स्थित हो किसी भी प्रकृति की हलचल को चलते हुए बादलों के समान अनुभव करेंगे?

तो ब्रह्मा बाप बच्चों से पूछ रहे हैं कि मेरे समान फरिश्ते सदाकाल के लिए बने हो? क्योंकि आप बच्चों को व्यक्त में रहते अव्यक्त बनना है। आप कहेंगे - बाप तो अव्यक्त हो गया, हमें भी ऐसे अव्यक्त बना देवे ना। ब्रह्मा बाप कहते हैं पहले अपने आपसे पूछो कि जो विश्व-कल्याण की जिम्मेवारी का ताज बाप ने पहनाया है, वह सम्पन्न कर लिया है? विश्व-कल्याणकारी, विश्व का कल्याण सम्पन्न हुआ है? ब्रह्मा बाप तो अव्यक्त इसलिए बनें कि बच्चों को विश्व-कल्याण का कार्य देकर, बंधन से भी मुक्त हो सेवा की रफ़्तार तीव्र कराने के निमित्त बनना था, जिसका प्रत्यक्ष स्वरूप चारों ओर देख रहे हो। चाहे देश में, चाहे विदेश में अव्यक्त ब्रह्मा द्वारा तीव्रगति हुई है और होनी भी है। सेवा में तीव्र गति का निमित्त आधार ब्रह्मा बाप को बनना था। लेकिन राज्य अधिकारी एक ब्रह्मा बाप को नहीं बनना है, साथ में बच्चों को भी राज्य अधिकार लेना है। इसलिए साकार में निमित्त आप साकार रूपधारी बच्चों को बनाया है। लेकिन अन्त में आप सब बच्चों को व्यक्त में अव्यक्त फरिश्ता बन विश्व-कल्याण के सेवा की रफ़्तार तीव्र कर समाप्ति और सम्पन्न होना है और करना है।

ब्रह्मा बाप कहते हैं कि क्या 99 में समाप्ति करें? प्रकृति को एक ताली बजायेंगे और प्रकृति तो तैयार खड़ी है। क्या फरिश्ते समान डबल लाइट बन गये हो? कम से कम 108 ऐसे सदा विजयी बने हैं, जो किसी भी प्रकार के व्यर्थ और निगेटिव संकल्प, बोल वा कर्म अर्थात् सर्व के सम्बन्ध-सम्पर्क में पास हों? व्यर्थ वा निगेटिव - यही बोझ सदाकाल के लिए डबल लाइट फरिश्ता बनने नहीं देता। तो ब्रह्मा बाप पूछते हैं - इस बोझ से हल्के फरिश्ते बने हैं? अण्डरलाइन है - सदा। कम से कम 108 तो सदा फरिश्ता जीवन का अनुभव करें तब कहेंगे ब्रह्मा बाप समान बनना। तो बाप पूछते हैं - ताली बजायें? या 2000 में ताली बजायें, 2001 में ताली बजायें, कब बजायें? क्या सोचते हो ताली बजेगी तो बन जायेंगे, ऐसे? क्या सोचते हो - ताली बजेगी उस समय बनेंगे? क्या होगा? बजायें ताली? बोलो तैयार हो? पेपर लेवें? ऐसे थोड़ेही मान जायेंगे, पेपर लेंगे? टीचर्स बताओ - पेपर लें? सब छोड़ना पड़ेगा। मधुबन वालों को मधुबन छोड़ना पड़ेगा, ज्ञान सरोवर वालों को ज्ञान सरोवर, सेन्टर वालों को सेन्टर, विदेश वालों को विदेश, सब छोड़ना पड़ेगा। तो एवररेडी हैं? अगर एवररेडी हो तो हाथ की ताली बजाओ। एवररेडी? पेपर लें? कल एनाउन्समेंट करें? वहाँ जाकर भी नहीं छोड़ना है, वहाँ जाकर थोड़ा ठीक करके आऊँ, नहीं। जहाँ हूँ, वहाँ हूँ। ऐसे एवररेडी। अपना दफ्तर भी नहीं, खटिया भी नहीं, कमरा भी नहीं, अलमारी भी नहीं। ऐसे नहीं कहना थोड़ा-सा काम है ना, दो दिन करके आयें। नहीं। आर्डर इज़ आर्डर। सोचकर हाँ कहो। नहीं तो कल आर्डर निकलेगा, कहाँ जाना है, कहाँ नहीं जाना है। निकालें आर्डर, तैयार हैं? इतना हिम्मत से हाँ नहीं कह रहे हैं। सोच रहे हैं थोड़ा-सा एक दिन मिल जाये तो अच्छा है। मेरे बिना यह नहीं हो जाए, यह नहीं हो जाए, यह वेस्ट संकल्प भी नहीं करना। ब्रह्मा बाप ट्रांसफर हुआ तो क्या सोचा कि मेरे बिना क्या होगा? चलेगा, नहीं चलेगा। चलो एक डायरेक्शन तो दे दूं, डायरेक्शन दिया? अपनी सम्पन्न स्थिति द्वारा डायरेक्शन दिया, मुख से नहीं। ऐसे तैयार हो? आर्डर मिला और छोड़ो तो छूटा। हलचल करें? ऐसा करना है - यह बता देते हैं। आर्डर होगा, पूछकर नहीं, तारीख नहीं फिक्स करेंगे। अचानक आर्डर देंगे आ जाओ, बस। इसको कहा जाता है डबल लाइट फरिश्ता। आर्डर हुआ और चला। जैसे मृत्यु का आर्डर होता है फिर क्या सोचते हैं, सेन्टर देखो, आलमारी देखो, जिज्ञासु देखो, एरिया देखो......! आजकल तो मेरे-मेरे में एरिया का झमेला ज्यादा हो गया है, मेरी एरिया! विश्वकल्याणकारी की क्या हद की एरिया होती है? यह सब छोड़ना पड़ेगा। यह भी देह का अभिमान है। देह का भान फिर भी हल्की चीज़ है, लेकिन देह का अभिमान यह बहुत सूक्ष्म है। मेरा-मेरा इसको ही देह का अभिमान कहा जाता है। जहाँ मेरा होगा ना वहाँ अभिमान ज़रूर होगा। चाहे अपनी विशेषता प्रति हो, मेरी विशेषता है, मेरा गुण है, मेरी सेवा है, यह सब मेरापन - यह प्रभू प्रसाद है, मेरा नहीं। प्रसाद को मेरा मानना, यह देह-अभिमान है। यह अभिमान छोड़ना ही सम्पन्न बनना है। इसीलिए जो वर्णन करते हो फरिश्ता अर्थात् न देह अभिमान, न देह-भान, न भिन्न-भिन्न मेरे-पन के रिश्ते हों, फरिश्ता अर्थात् यह हद का रिश्ता खत्म। तो अब क्या तैयारी करेंगे? ब्रह्मा बाप का आवाज़ अटेन्शन से सुनो, आह्वान कर रहे हैं। बाप कहते हैं समाप्ति का नगाड़ा बजाना तो बहुत सहज है, जब चाहें तब बजा सकते हैं लेकिन कम-से-कम सतयुग आदि के 9 लाख तो एवररेडी हो ना! चाहे नम्बरवार हों, नम्बरवन तो थोड़े होंगे। कम से कम 108 नम्बरवन, 16 हज़ार नम्बर टू, 9 लाख नम्बर थ्री। लेकिन इतने तो तैयार हो जाएँ। राजधानी तो तैयार होनी चाहिए।

अभी रिज़ल्ट में बापदादा ने देखा कि वर्तमान समय माया का स्वरूप निगेटिव और व्यर्थ संकल्प का मैजारिटी में है। विश्व-कल्याणकारी की स्टेज है - सदा बेहद की वृत्ति हो, दृष्टि हो और बेहद की स्थिति हो। वृत्ति में ज़रा भी किसी आत्मा के प्रति निगेटिव या व्यर्थ भावना नहीं हो। निगेटिव बात को परिवर्तन कराना, वह अलग चीज़ है। लेकिन जो स्वयं निगेटिव वृत्ति वाला होगा वह दूसरे के निगेटिव को भी पॉजेटिव में चेंज नहीं कर सकता। इसलिए हर एक को अपनी सूक्ष्म चेकिंग करनी है कि वृत्ति, दृष्टि सर्व के प्रति सदा बेहद और कल्याणकारी है? ज़रा भी कल्याण की भावना के सिवाए हद की भावना, हद के संकल्प, बोल सूक्ष्म में भी समाये हुए तो नहीं हैं? जो सूक्ष्म में समाया हुआ होता है, उसकी निशानी है कि समय आने पर वा समस्या आने पर वह सूक्ष्म स्थूल में आता है। सदा ठीक रहेगा लेकिन समय पर वह इमर्ज हो जायेगा। फिर सोचते हैं यह है ही ऐसा। यह बात ही ऐसी है। यह व्यक्ति ही ऐसा है। व्यक्ति ऐसा है लेकिन मेरी स्थिति शुभ भावना, बेहद की भावना वाली है या नहीं है? अपनी गलती को चेक करो। समझा।

बातों को नहीं देखो, अपने को देखो। बस 99 में यह अपने अन्दर धुन लगाओ जो ब्रह्मा बाप का कदम वह ब्रह्मा बाप समान मेरा हर कदम हो। ब्रह्मा बाप से सभी को प्यार है ना। तो प्यारे को ही फॉलो किया जाता है। बाप समान बनना ही है। ठीक है ना? 99 में सब तैयार हो जायेंगे? एक वर्ष है। यह हो गया, यह हो गया... यह नहीं सोचना। यह तो होना ही है। पहले से ही पता है यह होना है लेकिन बाप समान फरिश्ता बनना ही है। समझा। करना है ना? कर सकेंगे? एक वर्ष में तैयार हो जायेंगे कि आधे वर्ष में तैयार हो जायेंगे? आपके सम्पन्न बनने के लिए ब्रह्मा बाप भी आह्वान कर रहा है और प्रकृति भी इन्तज़ार कर रही है। 6 मास में एवररेडी बनो, चलो 6 मास नहीं एक वर्ष में तो बनो। हलचल में नहीं आना, अचल। लक्ष्य नहीं छोड़ना, बाप समान बनना ही है, कुछ भी हो जाए। चाहे कई ब्राह्मण हिलावें, ब्राह्मण रूकावट बनकर सामने आयें फिर भी हमें समान बनना ही है। पसन्द है यह राय?

(बापदादा ने सभी से हाथ उठवाया और सबका वीडियो, फोटो निकलवाया) यह फोटो सभी को भेजेंगे। यहाँ की मूवी में कोई मिस भी हो सकता है। वतन की मूवी में तो कोई मिस नहीं हो सकता है। अच्छा

बाप कहते हैं एक सेकण्ड में सभी अभी-अभी विदेही बन सकते हो? तो अभी एक सेकण्ड में विदेही स्थिति में स्थित हो जाओ। (ड्रिल) अच्छा अभी देह में आ जाओ। अभी फिर विदेही बन जाओ। ऐसे सारे दिन में बीच-बीच में एक सेकण्ड भी मिले, तो बार-बार यह अभ्यास करते रहो। अच्छा।

सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं को सदा ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखने वाले फॉलो फादर आज्ञाकारी बच्चों को, सदा ब्रह्मा बाप समान फरिश्ता स्थिति में स्थित रहने वाले समीप आत्माओं को, सदा प्रकृतिपति बन प्रकृति के हर दृश्य को साक्षी हो देखने वाले अचल-अडोल आत्माओं को, सदा बेहद की वृत्ति और दृष्टि में रहने वाले भाग्यवान बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

बाहर जो भी सुन रहे हैं चाहे देश में, चाहे विदेश में उन बच्चों को भी विशेष यादप्यार।

दादियों से - निमित्त बनने से दुआयें मिलती हैं। आप लोगों की तो दवाई भी दुआयें हैं। सभी जो भी निमित्त दादियाँ हैं वा जो भी निमित्त कार्य में मददगार बनते हैं उन्हों को विशेष दुआओं की लिफ्ट है। यज्ञ हिस्ट्री में जो-जो आत्मा जिस कार्य के आदि से अब तक निमित्त बनी है, उनको उस निमित्त बने हुए कार्य की विशेष दुआयें मिलती हैं। निमित्त बनने का समझो एक भाग्य मिलता है। एक तो निमित्त बनने वाले पर सभी की नज़र होने के कारण उसका स्व पर भी अटेन्शन रहता है। उनका पुरूषार्थ अपने प्रति भी सहज हो जाता है। जैसे स्टेज पर बैठते हैं तो स्टेज पर बैठने से स्वत: अटेन्शन होता है, तो निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर हैं। तो स्टेज पर होने के कारण स्व का पुरूषार्थ सहज हो जाता है। सबके सहयोग की दुआयें भी मिलती हैं। अगर निमित्त बनी हुई आत्मा यथार्थ पार्ट बजाती है तो औरों के सहयोग की भी मदद मिलती है। अच्छा है। (ड्रिल बहुत अच्छी लग रही थी) यह रोज़ हर एक को करनी चाहिए। ऐसे नहीं हम बिजी हैं। बीच में समय प्रति समय एक सेकण्ड चाहे कोई बैठा भी हो, बात भी कर रहा हो, लेकिन एक सेकण्ड उनको भी ड्रिल करा सकते हैं और स्वयं भी अभ्यास कर सकते हैं। कोई मुश्किल नहीं है। दो-चार सेकण्ड भी निकालना चाहिए इससे बहुत मदद मिलेगी। नहीं तो क्या होता है, सारा दिन बुद्धि चलती रहती है ना, तो विदेही बनने में टाइम लग जाता है और बीचबी च में अभ्यास होगा तो जब चाहें उसी समय हो जायेंगे क्योंकि अन्त में सब अचानक होना है। तो अचानक के पेपर में यह विदेहीपन का अभ्यास बहुत आवश्यक है। ऐसे नहीं बात पूरी हो जाए और विदेही बनने का पुरूषार्थ ही करते रहें। तो सूर्यवंशी तो नहीं हुए ना! इसलिए जितना जो बिजी है, उतना ही उसको बीच-बीच में यह अभ्यास करना ज़रूरी है। फिर सेवा में जो कभीकभी थकावट होती है, कभी कुछ-न-कुछ आपस में हलचल हो जाती है, वह नहीं होगा। अभ्यासी होंगे ना। एक सेकण्ड में न्यारे होने का अभ्यास होगा, तो कोई भी बात हुई एक सेकण्ड में अपने अभ्यास से इन बातों से दूर हो जायेंगे। सोचा और हुआ। युद्ध नहीं करनी पड़े। युद्ध के संस्कार, मेहनत के संस्कार सूर्यवंशी बनने नहीं देंगे। लास्ट घड़ी भी युद्ध में ही जायेगी, अगर विदेही बनने का सेकण्ड में अभ्यास नहीं है तो। और जिस बात में कमज़ोर होंगे, चाहे स्वभाव में, चाहे सम्बन्ध में आने में, चाहे संकल्प शक्ति में, वृत्ति में, वायुमण्डल के प्रभाव में, जिस बात में कमज़ोर होंगे, उसी रूप में जान-बूझकर भी माया लास्ट पेपर लेगी। इसीलिए विदेही बनने का अभ्यास बहुत ज़रूरी है। कोई भी रूप की माया आये, समझ तो है ही। एक सेकण्ड में विदेही बन जायेंगे तो माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा। जैसे कोई मरा हुआ व्यक्ति हो, उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ना। विदेही माना देह से न्यारा हो गया तो देह के साथ ही स्वभाव, संस्कार, कमज़ोरियाँ सब देह के साथ हैं, और देह से न्यारा हो गया, तो सबसे न्यारा हो गया। इसलिए यह ड्रिल बहुत सहयोग देगी, इसमें कण्ट्रोलिंग पावर चाहिए। मन को कण्ट्रोल कर सकें, बुद्धि को एकाग्र कर सकें। नहीं तो आदत होगी तो परेशान होते रहेंगे। पहले एकाग्र करें, तब ही विदेही बनें। अच्छा। आप लोगों का तो अभ्यास 14 वर्ष किया हुआ है ना! (बाबा ने संस्कार डाल दिया है) फाउण्डेशन पक्का है। आप लोगों की तो 14 वर्ष में नेचर बन गई। सेवा में कितने भी बिजी रहो लेकिन कोई बहाना नहीं चलेगा कि हमको समय नहीं था क्योंकि बापदादा को अभी जल्दी-जल्दी 108 और 16 हज़ार तो तैयार करने हैं। नहीं तो काम कैसे चलेगा। साथी तो चाहिए ना। तो 108 फिर 16 हज़ार, फिर 9 लाख। अभी अगर आपको कहें कि 108 ऐसे नाम बताओ जो वेस्ट और निगेटिव से मुक्त हों, तो आप लोग माला बना सकती हो? सिर्फ 108 कह रहे हैं। 99 तक तो 16 हज़ार चाहिए। 9 लाख तो बन जायेंगे, उसकी कोई बड़ी बात नहीं है। पहले तो 108 तैयार हो जाएँ। (सभा से) आप सोचते हो हम 108 में आयेंगे? अभी जो कुछ हो उसे निकाल लेना, और दादी को कहना कि हम एवररेडी हैं। हाँ अपना-अपना नाम देवें, आफर करो - हम 108 में हैं फिर वेरीफाय करेंगे। सबसे अच्छा तो अपना नाम आपेही देवें।

एक बारी सबको चेंज़ करना ज़रूर है। अभी इत्तला कर रहे हैं तो एवररेडी हो जाना फिर आर्डर करेंगे। मधुबन वालों को भी चेंज़ करेंगे। मधुबन वाले सेन्टरों में जायें, सेन्टर वाले मधुबन में आयें। अपनी अलमारियाँ खाली कर देना। कोई को ताला लगाने नहीं देंगे। अच्छा - यह भी मज़ा है ना। यह भी मज़े का खेल है। अच्छा - अभी क्या करना है।

(काठमाण्डू, देहली, अहमदाबाद, कलकत्ते में बहुत अच्छी सेवायें हुई हैं, काठमाण्डू वालों ने आज विशेष याद भेजी है)

जहाँ भी सेवा की है, वह एक दो से अच्छी है। आरम्भ दिल्ली ने किया, तो दिल्ली में प्रगति मैदान में पहुँचना, यह भी एक अच्छी सेवा की रिज़ल्ट है और दिल्ली राजधानी में अभी ऐसे स्थान पर फ्री ज़मीन लेना - यह सेवा की सफलता है। जो भी आये, जितने भी आये लेकिन दिल्ली में नाम बाला होना अर्थात् चारों ओर आवाज़ फैलना, इसीलिए अभी प्रगति मैदान में झण्डा लहराया, अभी और आगे बढ़ना है। अभी आध्यात्मिक झण्डा, आध्यात्मिकता का नाम बाला करने वाला झण्डा, दिल्ली में करना ही है। और आगे बढ़ना है क्योंकि दिल्ली का आवाज़ टी.वी. द्वारा या अखबारों द्वारा फैलता है। और साथ-साथ जो भी यज्ञ के कार्य होते हैं वह यज्ञ के कार्य में विशेष आत्मायें जो निमित्त बनती हैं, उनके ऊपर भी बड़े प्रोग्राम्स का, नाम का प्रभाव पड़ता है। इसलिए देहली के ऊपर तो बापदादा की नज़र है। आखिर में आध्यात्मिकता का झण्डा, स्थापना में सेवा का झण्डा देहली में लहराया। ऐसे प्रत्यक्षता का झण्डा, आध्यात्मिकता ही श्रेष्ठ है और आध्यात्मिक आत्मायें यही हैं, यह आवाज़ फैलना ही है।

काठमाण्डू में भी वहाँ के महाराजा का प्यार है जनता में। इसलिए महाराजा का आना, यह सभी देशवासियों के ऊपर सहज प्रभाव पड़ गया। और देखा गया है कि नेपाल की धरनी में वहाँ की निमित्त बनी हुई आत्मायें अच्छी पावरफुल हैं। इसलिए नेपाल में सेवा होना सहज है। बच्चों ने मेहनत की है और अच्छे-अच्छे प्रभावित हुए हैं, समीप आये हैं। एक होता है प्रभावित होना, दूसरा होता है समीप सहयोगी बनना। तो नेपाल में समीप सहयोगी आत्मायें भी हैं, यह रिज़ल्ट अच्छी है।

और गुजरात ने बहुत अच्छी मेहनत की है। सहयोगी बनाने का जो लक्ष्य रखा उसमें सफलता अच्छी मिली। इसलिए जो सहयोगी बने तो सहयोगियों को बाप वा ड्रामा द्वारा कुछ न कुछ पुण्य का फल मिलता है। इसलिए वह सहयोग आगे चलकर समीप आते जायेंगे और उन्हों द्वारा सेवा फैलती जायेगी। यह कार्य तो सबसे बड़ा भी किया, बढ़िया भी किया। लक्ष्य अच्छा रखा और हर एक ने अपना जो भी कार्य लिया वह बिना खर्चा सोचने के, बिना हद की बातें सोचने के, जो दिल से, तन से, आपसी प्यार से किया इसमें सफलता है। गुजरात को भी सफलता हुई है और आगे भी होती रहेगी।

कलकत्ता में भी हिम्मत बहुत अच्छी रखी। है सब छोटे-छोटे लेकिन हिम्मत बड़ी रखी। और हिम्मत का फल यज्ञ से विशेष मदद मिली। उमंग-उत्साह में आकर काम कर ही लिया और अच्छा नाम भी हुआ। और योग शिविर में भी अच्छे आये, मेले में भी अच्छे आये। और सब बातों को न देख समय पर उमंग-उत्साह से काम चल ही गया। अच्छा चला। इसलिए छोटे और बड़ा कार्य किया तो उन्हों को विशेष मुबारक हो। अभी जो भी प्रोग्राम्स होंगे, वह बहुत अच्छे होंगे क्योंकि समय को वरदान मिला हुआ है। अभी जहाँ भी करेंगे, रिज़ल्ट अच्छे-ते-अच्छी होगी। अच्छा।

लखनऊ, बैंगलोर, हैदराबाद - तीन जगह बड़े प्रोग्राम होने हैं। तीनों अच्छे हैं। बापदादा तो पहले से ही कहते अच्छा होगा। (मद्रास और बाम्बे में भी बड़े प्रोग्राम होने हैं) सभी को होवनहार मुबारक हो।

अच्छा। ओमशान्ति।



31-12-98   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


इस नये वर्ष में हिम्मत के आधार पर स्वयं को मेहनत मुक्त, सदा विजयी अनुभव करो

आज नव युग रचता बापदादा अपने अति स्नेही, सदा सहयोगी और अति समीप बच्चों को नव युग, नव जीवन और नव वर्ष की मुबारक देने आये हैं। चारों ओर के बच्चे अति स्नेह से बापदादा को दिल में सम्मुख रख मुबारक ले रहे हैं। बापदादा बच्चों के नव वर्ष के उमंग-उत्साह को देख हर्षित हो रहे हैं। मैजारिटी बच्चे चाहे दूर बैठे हैं, चाहे समीप बैठे हैं सभी के मन में यही उमंग- उत्साह है कि इस वर्ष में नवीनता करके ही दिखायेंगे। चाहे स्व के परिवर्तन में, चाहे सेवा की सफलता में, चाहे हर आत्मा को शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा परिवार्तित करने में उमंग भी अच्छा है, उत्साह भी बहुत अच्छा है। साथ-साथ हिम्मत भी यथा शक्ति है। बापदादा ऐसे हिम्मत वाले बच्चों को एक संकल्प के पीछे पद्मगुणा मदद अवश्य देते हैं। इसलिए हिम्मत से सदा आगे बढ़ते चलो। कभी भी स्व प्रति वा अन्य आत्माओं के प्रति हिम्मत को कम नहीं करना क्योंकि यह नवयुग है ही हिम्मत रखने से उड़ने का युग, वरदानी युग, पुरूषोत्तम युग, डायरेक्ट विधाता द्वारा सर्व शक्तियाँ वर्से में सहज प्राप्त होने का युग, इसलिए इस युग के महत्त्व को सदा स्मृति में रखो। कोई भी कार्य आरम्भ करते हो चाहे स्व-पुरूषार्थ, चाहे विश्व-सेवा, सदा हिम्मत और बापदादा की मदद द्वारा निश्चय है ही कि स्व-पुरूषार्थ में वा सेवा में सफलता हुई पड़ी है। होना ही है। असम्भव, सम्भव होना ही है क्योंकि यह युग सफलता का युग है। असम्भव, सम्भव होने का युग है। इसलिए होगा या नहीं होगा, कैसे होगा, इसका क्वेश्चन इस युग में आप ब्राह्मण आत्माओं के लिए है ही नहीं। ब्राह्मणों की जन्म पत्री में है - सफलता उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। अधिकारी आत्माओं को यह सोचने की आवश्यकता नहीं है, वर्सा मिलना ही है।

तो नये वर्ष में यह विशेष स्मृति इमर्ज करो कि सब तरफ से सफलता मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा का अधिकार है ही। इस निश्चय से, रूहानी नशे से उड़ते चलो। (अभिमानी नशा नहीं, रूहानी नशा) निश्चय बुद्धि सदा हर कार्य में विजयी है ही है। ऐसे निश्चय बुद्धि ब्राह्मण आत्मा के मस्तक पर विजय के तकदीर की लकीर सदा है ही है। विजय का तिलक सदा ही मस्तक पर चमक रहा है। इसलिए इस वर्ष को सदा विजयी वर्ष अनुभव करते चलो। ऐसा निश्चय और नशा है? डबल विदेशियों को है? डबल विदेशी होशियार हैं। (सबने हाथ हिलाया) बहुत अच्छा। तिलक नज़र आ रहा है। और भारतवासी तो हैं ही भाग्यवान, क्यों? भारत की धरनी ही भाग्यवान है। इसलिए चाहे विदेशी, चाहे भारतवासी दोनों ही भाग्य विधाता के बच्चे हैं इसलिए हर ब्राह्मण बच्चा विजयी है। सिर्फ हिम्मत को इमर्ज करो। हिम्मत समाई हुई है क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिवान हो - ऐसे हो ना? (सभी हाथ हिला रहे हैं) हाथ तो बहुत अच्छा हिलाते हैं। अभी मन से भी सदा हिम्मत का हाथ हिलाते रहना। बापदादा को खुशी है, नाज़ है कि मेरा एक-एक बच्चा अनेक बार का विजयी है। एक बार नहीं, अनेक बार की विजयी आत्मायें हो। तो कभी यह नहीं सोचना, पता नहीं क्या होगा? होगा शब्द नहीं लाना। विजय है और सदा रहेगी। सब पक्के हैं? बहुत अच्छा। अभी फिर वहाँ जाकर ऐसा कमज़ोर समाचार नहीं लिखना कि दादियां, बाबा माया आ गई, ऐसे नहीं लिखना। मायाजीत हैं। हम नहीं होंगे तो और कौन होगा, यह रूहानी नशा इमर्ज करो। और-और कार्य में मन और बुद्धि बिजी हो जाती है ना तो नशा मर्ज हो जाता है। लेकिन बीच-बीच में चेक करो कि कर्म करते हुए भी यह विजयी-पन का रूहानी नशा है? निश्चय होगा तो नशा ज़रूर होगा। निश्चय की निशानी नशा है और नशा है तो अवश्य निश्चय है। दोनों का सम्बन्ध है। इसलिए अभी 99 में अपना नशा सदा इमर्ज रखना, तो अभुल हो जायेंगे। न भूल होगी, न मेहनत होगी। बापदादा ने पहले भी कहा है कि जब बापदादा बच्चों को मेहनत करते हुए देखते हैं, युद्ध करते हुए देखते हैं तो बच्चों की मेहनत करना बाप को अच्छा नहीं लगता है। इसलिए इस नव वर्ष को कैसे मनायेंगे? मुक्ति वर्ष मनाया। निगेटिव, वेस्ट को समाप्त किया तो यह वर्ष ऑटोमेटिक मेहनत मुक्त वर्ष हो जायेगा। सब मौज में रहने वाले, मेहनत करने वाले नहीं। मौज अच्छी लगती है या मेहनत अच्छी लगती है? मौज अच्छी लगती है ना? तो यह वर्ष मन में, संकल्प में भी मेहनत मुक्त हो।

बापदादा के पास बच्चों के पत्र वा चिटकियां बहुत अच्छे-अच्छे हिम्मत की आई हैं कि हम अब से 108 की माला में अवश्य आयेंगे। बहुतों के अच्छे- अच्छे उमंग के पत्र भी आये हैं और रूह-रूहान में भी बहुतों ने बापदादा को अपने निश्चय और हिम्मत का अच्छा समाचार दिया है। बापदादा ऐसे बच्चों को कहते हैं - बाप ने आप सबके बीती को बिन्दू लगा दिया। इसलिए बीती को सोचो नहीं, अब जो हिम्मत रखी है, हिम्मत और मदद से आगे बढ़ते चलो। नव वर्ष के नये उमंग भी बहुत अच्छे-अच्छे लिखे हैं चाहे विदेश के बच्चों ने, चाहे देश के बच्चों ने, बापदादा ऐसे बच्चों को यही वरदान देते हैं - इसी हिम्मत में, निश्चय में, नशे में अमर भव। अमर रहेंगे ना! डबल विदेशी अमर रहेंगे? भारतवासी भी रहेंगे ना? भारत को तो नम्बर लेना ही चाहिए।

नये वर्ष में क्या मनाते हैं? एक तो गिफ्ट देते और दूसरा ग्रीटिंग्स देते हैं। मिठाई खूब खाते खिलाते हैं। नाचते गाते भी बहुत हैं। तो आप सिर्फ 12 के बाद एक दिन नया वर्ष नहीं मनाना लेकिन ब्राह्मण बच्चों के लिए इस नव युग में हर घड़ी नई है, हर श्वांस नया है, हर संकल्प नया है, इसलिए सदा पूरा वर्ष, एक दिन नहीं, एक सप्ताह नहीं, एक मास नहीं, चार मास नहीं, आठ मास नहीं, 12 ही मास सदा एक दो को दिलखुश मिठाई बाँटते रहना। बाँटेंगे ना! दिलखुश मिठाई बाँटने आती है? सभी होशियार हैं। तो दिलखुश मिठाई बांटना। कोई आपकी दिल खुश मिठाई अपने स्वभाव के कारण, संस्कार के कारण, समस्या के कारण अगर नहीं भी स्वीकार करे तो आप दिलशिकस्त नहीं होना। आपने बाँटी, आपका आज्ञाकारी बनने का चार्ट बापदादा के पास जमा हो गया। यह नहीं देखना कि मैंने तो दिलखुश मिठाई खिलाई लेकिन यह तो नाराज़ हो गया, कोई हर्जा नहीं, वह राज़ को नहीं जानता है ना तो नाराज़ हो गया। आप तो राज़ को जानते हो ना! तो यह राज़ भी जान लो कि यह हिसाब-किताब वा समस्या के वश है। आप आज्ञाकारी बनो। ठीक है ना? आज्ञाकारी बनना है ना? यहाँ तो हाँ बहुत अच्छा करते हैं, अगर आप यहाँ देखो ना, हाथ भी बहुत अच्छा हिलाते हो, खुश कर देते हो। कांध भी हिलाते हैं, हाथ भी हिलाते हैं। लेकिन बापदादा तो फिर भी हर बच्चे के ऊपर सदा ही खुश रहते हैं। जब मेरा बच्चा कह दिया, तो जो भी हो, जैसे भी हो, बाप तो देख खुश होता ही है। बाप ने जो वायदा किया है - कैसे भी लायक बनाकर साथ ले ही जाना है। साथ में चलना है ना? साथ चलने के लिए तैयार हैं? सभी तैयार हैं? एवररेडी हैं? अच्छा, एवररेडी भी हैं, बहुत अच्छा। एवरहैपी भी हैं? और जब माया आ जायेगी तो? फिर थोड़ा-थोड़ा मन में चिल्लायेंगे? बाबा माया आ गई, आ गई। चिल्लाना नहीं, अपने को उड़ा देना। माया नीचे रह जाये आप ऊपर उड़ जाओ तो माया देखती रहेगी। अच्छा तो खुशी में नाचते भी रहना और दिल खुश मिठाई बाँटते भी रहना। साथ में जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये उसको कोई न कोई गिफ्ट देना, कोई हाथ खाली नहीं जाये, कौन-सी गिफ्ट देंगे? आपके पास गिफ्ट तो बहुत है। गिफ्ट का स्टॉक है? तो देने में कन्जूस नहीं बनना, देते जाना। फ़रागदिल बनना, किसी को शक्ति का सहयोग दो, शक्ति का वायब्रेशन दो, किसको कोई गुण की गिफ्ट दो। मुख से नहीं लेकिन अपने चेहरे और चलन से दो। यदि कोई गुण वा शक्ति इमर्ज नहीं भी हो, तो कम-से-कम छोटी सी सौगात भी देना, वह कौन-सी? शुभ भावना और शुभ कामना की। शुभ कामना करो कि यह मेरा सिकीलधा भाई या बहन, सिकीलधा सोचेंगे तो अशुभ भावना से शुभ भावना बन जायेगी। इस भाई-बहन का भी उड़ती कला का पार्ट हो जाए, इसके लिए सहयोग वा शुभ भावना है। कई बच्चे कहते हैं कि हम देते हैं वह लेते नहीं हैं। अच्छा शुभ भावना नहीं लेते हैं, कुछ तो देते हैं ना। चाहे अशुभ बोल आपको देते हैं, अशुभ वायब्रेशन देते हैं, अशुभ चलन चलते हैं तो आप हो कौन? आपका आक्यूपेशन क्या है? विश्व-परिवर्तक हो? आपका धंधा क्या है? विश्व-परिवर्तक हैं ना! तो विश्व को परिवर्तन कर सकते हो और उसने अगर आपको उल्टा बोल दिया, उल्टी चलन दिखाई तो उसका परिवर्तन नहीं कर सकते हो? पॉज़िटिव रूप में परिवर्तन नहीं वर सकते हो? निगेटिव को निगेटिव ही धारण करेंगे कि निगेटिव को पॉज़िटिव में परिवर्तन कर आप हर एक को शुभ भावना, शुभ कामना की गिफ्ट देंगे। शुभ भावना का स्टॉक सदा जमा रखो। आप दे दो। परिवर्तन कर लो। तो आपका टाइटिल जो विश्व-परिवर्तक है वह प्रैक्टिकल में यूज़ होता जायेगा। और यह पक्का समझ लो कि जो सदा हर एक को परिवर्तन कर अपना विश्वपरिवर्त क का कार्य साकार में लाता है वही साकार रूप में 21 जन्म की गारन्टी से राज्य-अधिकारी बनेगा। तख्त पर भले एक बारी बैठेगा लेकिन हर जन्म में राज्य परिवार में, राज्य-अधिकारी आत्माओं के समीप सम्बन्ध में होगा। तो विश्व-परिवर्तक ही विश्व-राज्य-अधिकारी बनता है। इसलिए सदा यह अपना आक्यूपेशन याद रखो - मेरा कर्त्तव्य ही है परिवर्तन करना। दाता के बच्चे हो तो दाता बन देते चलो, तब ही भविष्य में हाथ से किसको देंगे नहीं लेकिन सदा आपके राज्य में हर आत्मा भरपूर रहेगी, यह इस समय के दाता बनने की प्रालब्ध है। इसलिए हिसाब नहीं करना, इसने यह किया, इसने इतना बार किया, मास्टर दाता बन गिफ्ट देते जाओ। और ग्रीटिंग्स क्या देंगे? देखो किसी को भी, किसी से प्राप्ति होती है ना तो उसके मुख से, मन से यही शब्द निकलता है कि आपको मुबारक हो, एक दो को खुशी बाँटते हो तो कहते हैं मुबारक हो। उत्सव मनाते हो तो कहते हैं मुबारक हो। ऐसे जो भी आपके सामने आवे तो मुख से ऐसे शब्द बोलो, संकल्प में ऐसे श्रेष्ठ संकल्प हों तो जो भी आपसे मिलेगा वह हर समय दिल से मुबारक वा दुआयें अवश्य देगा। तो सदा ऐसे बोल बोलो, ऐसा सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ जो दिल से, मुख से मुबारक निकले वा दुआयें निकलें। ऐसा शब्द नहीं निकालो जो मुबारक लायक नहीं हो। एक एक बोल जैसे रत्न हो। साधारण बोल नहीं हो। बापदादा ने अब तक रिज़ल्ट में देखा है, कल तो बदल जायेगा लेकिन अब तक देखा है कि बोल में जो संयम और स्नेह होना चाहिए वह स्नेह भी कम हो जाता है और संयम भी कम हो जाता है। इसलिए ऐसा बोल बोलो जो रत्न हो। आप स्वयं जब हीरे तुल्य हो तो हर बोल भी रत्न समान हो। ऐसा मूल्यवान हो। साधारण नहीं हो। न साधारण हो, न व्यर्थ हो। और कभी-कभी बापदादा देखते हैं, रिज़ल्ट सुनायें, क्योंकि 12 बजे के बाद सब समाप्त करना है ना! तो बापदादा ने यह भी देखा है कि कोई-कोई बच्चे छोटी-सी बात का विस्तार बहुत करते हैं, इसमें क्या होता है, जो ज्यादा बोलता है ना तो जैसे वृक्ष का विस्तार होता है उसमें बीज छिप जाता है, वह ऐसे समझते हैं कि हम समझाने के लिए विस्तार कर रहे हैं, लेकिन विस्तार में जो बात आप समझाने चाहते हैं ना उसका सार छिप जाता है और बोल, वाणी की भी एनर्जी होती है। जो वेस्ट बोल होते हैं तो वाणी की एनर्जी कम हो जाती है। ज्यादा बोलने वाले के दिमाग की एनर्जी भी कम हो जाती है। शार्ट और स्वीट यह दोनों शब्द याद रखो। और कोई सुनाता है ना तो उसको तो कह देते हैं कि मेरे को इतना सुनने का टाइम नहीं है। लेकिन जब खुद सुनाते हैं तो टाइम भूल जाता है। इसलिए अपने खज़ानों का स्टॉक जमा करो। संकल्प का खज़ाना जमा करो, बोल का खज़ाना जमा करो, शक्तियों का खज़ाना जमा करो, समय का खज़ाना जमा करो, गुणों का खज़ाना जमा करो। रोज़ रात को अपने इन खज़ानों के बचत का पोतामेल चेक करो। कितने संकल्प वेस्ट के बजाए बेस्ट के खाते में जमा किया? कितना समय बेस्ट के खाते में जमा किया? गुण और शक्तियों से श्रेष्ठ कार्य किया? गुण को कार्य में लगाया? शक्ति को कार्य में लगाया? यह है जमा करना। तो सभी संकल्प, समय, गुण, शक्ति इसका पोतामेल रोज़ रात्रि को चेक करो फिर टोटल करो कितना बचत का खाता हुआ? यही बचत स्वयं को भी सहयोग देती रहेगी और औरों को भी देगी। तो समझा - क्या करना है? सब पूछते हैं ना क्या करना है? तो अब यह करना है। ग्रीटिंग्स भी लेनी है, गिफ्ट भी देनी है, जमा भी करना है और मेहनत को छोड़ना है। जब बचत के ऊपर अटेन्शन देंगे तो मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। मेहनत मुक्त वर्ष धूमधाम से मनायें। वेस्ट और निगेटिव मुक्त वर्ष मनायें। बापदादा मुक्ति वर्ष की रिज़ल्ट अभी नहीं पूछ रहे हैं, बापदादा को याद है। रिज़ल्ट लेंगे कि कितनों ने मुक्ति वर्ष मनाया या मास मनाया? 6 मास मनाया, आधा मनाया, पूरा मनाया - यह सब 18 तारीख को हिसाब लेंगे?

डबल विदेशियों ने तो अच्छा मना लिया है ना, भारत वालों ने भी मनाया तो है, रिज़ल्ट 18 तारीख को लेंगे। जिसने सारा वर्ष मनाया, उसको क्या देंगे? दादियां बतावें जिन्होंने पूरा वर्ष मुक्ति वर्ष मनाया है, उनको क्या देंगे? मुबारक और दुआयें तो हैं ही और यादगार क्या देंगे? इनाम तैयार रखना। देखेंगे कितने इनाम लेते हैं? तो नया वर्ष, नया उमंग, नया उत्साह और नई हिम्मत सब नया ही नया। जो इस घड़ी स्टेज है वह दूसरे घड़ी उससे श्रेष्ठ स्टेज होनी चाहिए। ठीक है ना? अच्छा

आज 12 बजे तक बैठना है। इसीलिए सब यहाँ-वहाँ से भागकर नया वर्ष मनाने के लिए पहुँचे हैं। अच्छा है - जो भी नये-पुराने आये हैं हर एक को दिल से दुआओं भरी मुबारक दे रहे हैं। भले पधारे, भले आये। शान्तिवन का शृंगार भले पधारे। देखो यह हाल कितना सज गया है। तो सजाने वाले कौन? आप ही हैं ना! अच्छा

आज बापदादा हर ग्रुप से जहाँ बैठे हो वहाँ ही खड़ा कर मिलन मनायेंगे। चाहे डबल विदेशी हो चाहे भारत के हर ज़ोन के हो, एक-एक ज़ोन से बापदादा मिलन मनायेंगे लेकिन स्टेज पर नहीं आना। वहाँ ही खड़े हो करके मिलन मनाना। यह भी तो नई बात है ना। नया वर्ष मनाने आये हैं, यह भी नई बात है। अच्छा।

डबल विदेशी - यूथ ग्रुप से (सभी ने गीत गाया)

उमंग-उत्साह का गीत बहुत अच्छा गाया। यूथ को बहुत कार्य करना है। ऐसा यूथ ग्रुप तैयार हो जो सब निमन्त्रण देकर आपको अपनी स्टेज पर बुलावें। बहुत अच्छा है। ट्रेनिंग देने वाले भी अच्छे हैं। तो जो बापदादा ने इस वर्ष का कार्य दिया है, उसमें यूथ ग्रुप नम्बरवन लेंगे ना? सिखाने वालों ने भी अच्छी मेहनत की है।

वैल्युज़ कोर्स में आये हुए भाई-बहिनों से -- ऐसे होशियार हो जाओ जो बापदादा और सारा विश्व आपको थैंक्स देता रहे। सभी के जीवन में वैल्युज़ इमर्ज करके दिखाओ। जहाँ ऐसे कोई बहुत कड़े स्वभाव के हों ना, वहाँ इस ग्रुप में से कोई ऐसे तैयार हो जाएँ जो वहाँ के वातावरण को चेंज़ कर दें। जैसे पंजाब में आतंकवाद बहुत था ना तो पंजाब वालों ने योग के वायब्रेशन से, स्नेह से सेवा की और फर्क आ गया, तो यह वैल्यु वाले भी ऐसी कोई प्रत्यक्ष सेवा करके दिखावें। जहाँ एकदम वैल्यु गिरी हुई हो ऐसे को वैल्यु के वायब्रेशन से परिवर्तन करके दिखाना। मुबारक हो।

आस्ट्रेलिया, फिजी, न्युजीलैण्ड -- आस्ट्रेलिया वालों ने हिम्मत करके जो रिट्रीट हाउस लिया है उसकी मुबारक हो। और उसमें ऐसे कोई निकालो जो माइक बन आपके बदले में वह अनुभव सुनावे, तो आस्ट्रेलिया पहले भी सदा आगे रहा है। अब रिट्रीट हाउस से ऐसे माइक तैयार कर बापदादा के सामने लाना है।

यूरोप, यू.के., दुबई, मौरीशियस -- यूरोप को तो वरदान मिला हुआ है कि यूरोप अनेक आत्माओं को जगाने के निमित्त बना भी है और बनेगा भी क्योंकि यूरोप के साथ यू.के. भी है तो बहुत अच्छा है। यूरोप वाले आप सबको याद होगा शुरू में बापदादा यूरोपवासी यादव कहके यूरोप को याद करते थे और यूरोप को ब्रह्मा बाप ने बहुत बारी याद किया। तो अभी भी जो भी यू.के. वा यूरोप में हैं उन्हों को ऐसे साइन्स वाला माइक निकालना है जो आपके तरफ से माइक बन साइन्स वाला साइलेन्स को सिद्ध करके दिखावे। साइलेन्स वाले साइलेन्स को सिद्ध करते हैं यह बड़ी बात नहीं है लेकिन साइन्स वाले साइलेन्स की शक्ति को सिद्ध करें - अभी ऐसी कोई कमाल दिखाओ। सुना - यूरोप और यू.के. वालों ने। ऐसा निकालना। बहुत अच्छा है। कमाल करनी है। होनी ही है। अच्छा।

अमेरिका - अमेरिका क्या करेगा? अमेरिका वालों को यू.एन. में ऐसा माइक तैयार करना है। यू. एन. का मेम्बर हो और ऐसा माइक बने जो कहे कि सचमुच जो हम नहीं कर सकते वह यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय के कर सकते हैं। कर रहे हैं और करके दिखायेंगे। ऐसा कोई निकालो। रिट्रीट हाउस ले रहे हैं तो उसमें क्या करेंगे? ऐसे यू.एन. का कोई मेम्बर तैयार करो जो स्टेज पर कहे कि यही हैं, यही हैं जो कार्य कर सकते हैं। हिम्मत है ना! करना ही है? और हुआ भी पड़ा है सिर्फ निमित्त बनना है, बस। बाकी कमाल करेंगे, इतना वर्ष यू.एन. का कनेक्शन रहा है, कुछ तो कमाल करेंगे ना! तो ऐसी कमाल करके दिखाना। अच्छा। रिट्रीट हाउस के लिए मुबारक हो।

एशिया ग्रुप -- अच्छा यह क्या करेंगे? एशिया में ऐसे बहुत रत्न हैं जो ब्राह्मण परिवार के हैं लेकिन अभी तक छिपे हुए हैं। एशिया के कई भाग नई दुनिया में मिल जायेंगे, इसलिए आपकी धरनी एशिया की भाग्यवान है, तो उसमें से ऐसे विशेष रत्न निकालो, बापदादा चाहते हैं कि अभी आप जो ब्राह्मण आत्मायें हैं वह माइट बनें तथा माइक और बनें। आप माइट बन लाइट दो और वह लोग माइक बन भाषण करें, परिचय दें, अनुभव सुनावें, तो ऐसे एशिया में हैं जिन्हों को ढूंढो और निमित्त बनाओ। तो आप लोग माइट बन जायेंगे और वह माइक बनेंगे। ठीक है? एशिया वालों को करना है ना? बहुत अच्छा, फिर इनाम देंगे कि पहला बड़े से बड़ा माइक किसने निकाला? एशिया निकालेगी, नम्बरवन जायेगा? हर एक सोचे नम्बरवन जाना है। बापदादा देखेंगे कौन बड़े से बड़ा माइक तैयार करता है। छोटे-छोटे तो कनेक्शन में हैं, लेकिन स्टेज पर आवें। माइक वह जो स्टेज पर बेधड़क बन भाषण करे, ऐसे माइक तैयार करो। ठीक है? तो कौन-सा नम्बर लेना है? पहला नम्बर लेना। छोटे बच्चे भी हिम्मत वाले हैं, बहुत अच्छा।

अफ्रीका, साउथ अफ्रीका -- अफ्रीका में बहुत अच्छे-अच्छे रत्न हैं। सेवा करने में होशियार हैं ना। तो अभी क्या करेंगे? अफ्रीका में सबसे ज्यादा गोल्ड है ना! तो बापदादा के पास ऐसे गोल्डन स्टेज वाले रत्न ले आओ। जैसे स्थूल गोल्ड मशहूर है ऐसे अफ्रीका के रत्न हीरे भी वहाँ हैं, गोल्ड भी हैं, तो ऐसे रत्न सामने लाओ। कब लायेंगे, तारीख बताओ। अच्छा मार्च में ले आयेंगे? हाँ अफ्रीका वाले कमाल करके दिखाओ। कमाल करेंगे? बहुत अच्छा। रत्न बहुत अच्छे-अच्छे हैं। अभी मार्च तक देखेंगे फिर इनाम देंगे, ठीक है, पसन्द है?

रशिया -- रशिया वाले क्या कमाल करेंगे? जैसे रशिया में अभी स्वतन्त्रता हुई है ना। कम्युनिस्ट का राज्य नहीं है, स्वतन्त्र हैं तो ऐसे स्वतन्त्रता का झण्डा लहराओ जो रशिया में यह आवाज़ हो जाए कि सच्ची स्वतन्त्रता यहाँ से ही मिल सकती है। यह आवाज़ चारों ओर फैल जाए, धर्म के हिसाब से नहीं लेकिन सच्ची स्वतन्त्रता के हिसाब से। यह आवाज़ लहरायेंगे? रशिया वाले सभी को बहुत प्यारे लगते हैं। क्यों प्यारे लगते हैं? क्योंकि बाप भी भोलानाथ है ना, तो रशिया वाले भी भोले बहुत अच्छे हैं। भोलेभाले हैं लेकिन हैं तीखे, अन्दर होशियार हैं लेकिन सूरत से बिल्कुल भोले, प्यारे मीठे लगते हैं इसलिए सबका रशिया वालों से विशेष प्यार है, बहुत अच्छा। अभी स्वतन्त्रता का आवाज़ फैलाना। अच्छा।

इज़राइल -- अभी नया-नया खुला है ना तो लाड़ले हो। जो छोटे होते हैं ना वह लाड़ले होते हैं और जो लाड़ले होते हैं वह सदा माँ-बाप के समीप रहते हैं। उन्हों के ऊपर सदा माँ-बाप की नज़र रहती है इसलिए कमाल करके ही दिखानी है। प्लैन अच्छे बनाते हैं और सफलता मिलती ही है। थोड़े हैं लेकिन अच्छे हैं, हिम्मत अच्छी है। तो दूसरे वर्ष कमाल करके ग्रुप ले आना। ठीक है। अच्छा।

चिल्ड्रेन ग्रुप को सम्भालने वाले टीचर्स से -- अच्छा तैयार किया है। अच्छा दिल से उमंग-उत्साह से कार्य किया है। इसलिए जो कार्य किया है उसकी सफलता मिलनी ही है। ग्रुप अच्छा है।

ज्युरिस्ट मीटिंग में आये हुए भाई बहिनों से -- ज्युरिस्ट क्या करेंगे? (लॉ और लव का बैलेन्स रखेंगे, भारत को स्वर्ग बनायेंगे) वैसे भी ज्युरिस्ट बोलने में होशियार होते हैं। अच्छा बोला, हिम्मत के बोल बोले और ज्युरिस्ट का काम ही है - कमज़ोर केस को हिम्मत वाला बनाना। तो अच्छा हिम्मत दिखाई और सदा जो भी मर्यादायें हैं, लाज़ हैं उस पर चलने और चलाने का वायुमण्डल 34 बनाते चलो। बाकी क्वालिटी अच्छी है। एक-एक बहुत कार्य कर सकते हैं, क्यों? आपके पास जो क्लायन्ट बनकर आते हैं वह उस समय आपको भगवान का रूप समझते हैं। आपमें फेथ होता है, ऐसे क्लायन्ट को आप लोग बाप का बना सकते हो। तो वकील भी बढ़ते जायेंगे, जज भी बढ़ेंगे। अभी कोई ऐसा जज तैयार करो जो नज़दीक वाला हो। और जज़ अपने अनुभव के आधार से बोले कि अगर भारत का कल्याण होना है, सत्य सिद्ध होना है तो यही है, यही है, यही है। ऐसा ग्रुप तैयार करो। ऐसा कोई बड़ा जज़ तैयार करो जो निर्भय होकर स्टेज पर बोले, सिद्ध करके बतावे कि यह सत्य क्यों है। ऐसी हिम्मत है ना? आपके बोलने से ही हिम्मत लग रही है। तो ऐसा करना। जिसको जो कहा है, वह इस वर्ष में लास्ट सीज़न तक, मार्च की एण्ड तक तैयार करके लावे। पसन्द है? फॉरेन वालों को भी काम दिया है, यूथ को भी काम दिया है, जजेस को भी काम दिया है। अभी देखेंगे कौन करके आता है। तो आपका पहला नम्बर होगा ना? लेकिन ऐसा तैयार करके आओ जो पब्लिक में कहें, यहाँ कांफ्रेंस में कहना और बात है, वह तो यह धरनी ऐसी है, पब्लिक स्टेज पर कहे - ऐसा तैयार करना। (मधुबन की लता बहन, वकील से) यह वकील भी होशियार है, अच्छा काम कर रही है। शक्ति आगे आवे ठीक है। मुबारक हो, मुबारक हो। बहुत अच्छा।

टीचर्स बहिनों से -- ग्रुप तो बहुत बड़ा है। (5-6 सौ टीचर्स हैं) टीचर्स क्या करेंगी? इस वर्ष में टीचर्स इनाम लेना। किस बात में? स्वयं और सेन्टर निवासी और साथ में सर्व स्टूडेन्टस पूरे वर्ष में निर्विघ्न रहे, कोई भी विघ्न न स्वयं में आवे, न साथियों में आवे, न स्टूडेन्ट में आवे, ऐसी हिम्मत है तो हाथ उठाओ। पार्टी लेकर आये हो तो नाम तो नोट हैं। सौगातें तैयार रखना। इनाम तैयार रखना। देखेंगे कितने इनाम लेने के पात्र बनते हैं। तीन सर्टिफकेट लेंगे। तीन सर्टिफकेट - एक अपना स्वयं का सर्टिफकेट, दूसरा साथियों का सर्टिफकेट और तीसरा स्टूडेन्ट का हाँ या ना। बातों में नहीं निकालेंगे सिर्फ हाँ निर्विघ्न रहे, या नहीं रहे। कचहरी नहीं करेंगे, बातें नहीं निकालेंगे। तो तीन सर्टिफकेट लेने वाले को इनाम मिलेगा। हाथ तो सभी ने उठाया, जिसने नहीं उठाया समझते हैं कोशिश करेंगे, पता नहीं होवे नहीं होवे, वह हाथ उठाओ। ऐसा कोई है? शर्म तो नहीं करते हो? अगर हिम्मत नहीं भी हो तो हिम्मत रखना, हिम्मत की मदद ज़रूर मिलेगी। समझा। समझा। समझा? सब टीचर्स ने सुना? अच्छा है - टीचर्स को देखकर बापदादा खुश होते है - टीचर्स सेवा के साथी हैं इसलिए बापदादा को टीचर्स को देखकर खुशी होती है। बापदादा रिगार्ड भी रखते हैं क्योंकि बच्चे भी हैं, साथी भी हैं इसलिए विशेष मदद भी है। ठीक है ना।

मधुबन निवासी, आबू निवासी -- अच्छा ग्रुप है। देखो मधुबन वाले अगर सेवा में आगे नहीं होते तो इतनी आत्माओं को बाप से मिलन का भाग्य कैसे मिलता। इसलिए मधुबन वालों को सबसे बड़े-ते-बड़ी देन सबके दुआओं की मिलती है। दुआयें मिलती हैं? दुआयें महसूस करते हो? सिखलाते भी हो और निमित्त भी बनते हो। तो मधुबन वालों को बापदादा ब्राह्मणों के सेवा की छत्रछाया कहते हैं। मधुबन निवासियों के सेवा की छत्रछाया में अनेक आत्माओं का फायदा हो जाता है। पुरूषार्थ में आगे बढ़ते रहते हैं। तो सभी का पुण्य मधुबन वालों को शेयर में मिलता रहता है। मधुबन वाले शेयर होल्डर हैं। बिना मेहनत के भी मिलता रहता है। सबके दिल की दुआयें बहुत अमूल्य चीज़ है। दिल से जिसको जितनी दुआयें मिलती हैं, वह दिल की दुआयें जमा होती हैं तो सहज पुरूषार्थ हो जाता है। सेवा का पुण्य अच्छा मिला है। यह सेवा का पुण्य सदा बढ़ाते रहना। कम नहीं करना, सदा बढ़ाते रहना। जैसे बाप जी हाज़र कहते हैं वैसे मधुबन निवासी बाप के समीप हैं, तो मधुबन निवासियों को सदा जी हाज़र और जी हजूर दोनों ही याद है और रहेगा।

दोनों याद है ना - हजूर भी याद है और जी हाज़र भी याद है। कोई भी बुलावे, तो हाँ हाज़र, हाँ हाज़र। ऐसे है? हाज़र हैं ना। ना ना तो नहीं करते हैं ना, हाँ-हाँ वाले हैं। हाँ जी, हाँ जी करके हजूर के आगे समीप आ गये हैं। और सबके लाड़ले बन गये हैं। किस श्रेष्ठ नज़र से मधुबन वालों को देखते हैं? बहुत लाड़ले हो गये हैं ना। जहाँ भी जायेंगे, मधुबन वाले आये हैं, मधुबन वाले आये हैं - यह सेवा का फल है। तो क्या याद है? जी हजूर और जी हाज़र। पक्का है ना? कभी भी ना ना नहीं। हाँ जी, हाँ जी...। बहुत अच्छा। बापदादा को मधुबन निवासियों से सदा प्यार है। सदा प्यारे हैं। अच्छा।

भारतवासी भाई-बहनों से अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात

राजस्थान -- (सेवा की बहुत अच्छी ड्युटी सम्भाली है) राजस्थान ने सेवा का चांस अच्छा लिया भी और किया भी, इसलिए सेवा की मुबारक हो। ग्रुप बहुत अच्छा है, अभी एक दो को सहयोग देकर आगे बढ़ते चलो। ठीक है ना। अच्छा।

महाराष्ट्र ज़ोन - महाराष्ट्र नाम ही है महा, तो महाराष्ट्र क्या महान कार्य करके दिखायेंगे? बापदादा ने आगे भी कहा है कि क्वान्टिटी तो बहुत अच्छी है, अभी महाराष्ट्र को ऐसी क्वालिटी तैयार करनी है, जो आवाज़ फैलाने में सहयोगी बन जाये। अभी महाराष्ट्र से कोई ऐसी विशेष आत्मा तैयार करो जो सारे महाराष्ट्र में उसके आवाज़ का प्रभाव हो और महाराष्ट्र में मेहनत वाले हैं, अच्छी हिम्मत वाले हैं। इसलिए सहज ऐसे सेवा करने से निकल आयेंगे। इस वर्ष सभी को, हर ज़ोन को ऐसा तैयार करके मार्च तक लाना है। मंजूर है तो हाथ हिलाओ। मार्च में माइक की सेरीमनी मनायेंगे। यह लंदन का माइक, यह अमेरिका का माइक... यह भारत का, यह हर ज़ोन का, यह महाराष्ट्र का, यह आंध्रा का, सब ज़ोन का हो, फिर देखना क्या कमाल हो जाती है।

बाम्बे -- बाम्बे को ब्रह्मा बाबा नर-देसावर कहते हैं। इसका अर्थ है सदा सम्पन्न रहने वाला। तो बाम्बे वालों को क्या तैयार करना है? कोई ऐसे सेवा के निमित्त बनाओ जो अनेक छोटे-छोटे सेन्टर को भी बड़ा बना दें। बाम्बे में तो करते ही हो लेकिन ऐसा कोई नरदेसावर निकालो जो औरों का भी सहयोगी बनें, तब कहेंगे बाम्बे नरदेसावर है। ऐसे कोई व्यक्ति तैयार करो जो आवाज़ फैलाये कि सच्चा धन अगर है तो ब्रह्माकुमारियों के पास है। सच्चा धन क्या होता है, उसके उपर चैलेंज़ करके दिखावे कि सच्चा धन, अविनाशी धन किसको कहा जाता है। सहयोगी भी बनें और चैलेन्ज़ करके दिखावे तो सबकी आँखें खुल जाये कि अविनाशी धन कौन सा है। ऐसा मार्च तक निकालेंगे? अगर हाँ है तो हाथ उठाओ। हिम्मत नहीं हो तो ना कहो। हिम्मत रखो तो क्या नहीं हो सकता है। किसको भी टचिंग होती है तो सेकेण्ड ही लगता है। यह तो तीन मास हैं तो देखेंगे नम्बरवन प्राइज़ कौन लेता है। बहुत बढ़िया प्राइज़ मिल रही है। इस बारी स्थूल प्राइज़ देंगे जो यादगार रहेगा। अच्छा।

आन्ध्र प्रदेश -- सब फंक्शन में बिजी हैं। थोड़े आये हैं, थोड़े भी बहुत कमाल कर सकते हैं। तो आन्ध्र प्रदेश भी कमाल कर सकता है क्योंकि आन्ध्र प्रदेश में भी गवर्मेन्ट एज्यूकेशन डिपार्टमेन्ट बहुत सहज कनेक्शन में आ सकते हैं। आन्ध्र प्रदेश अगर एज्यूकेशन डिपार्टमेन्ट में विशेष सेवा करे तो सफलता बहुत सहज मिल सकती है। आन्ध्र प्रदेश के जो मुख्य लोग हैं वह सहज सम्बन्ध-सम्पर्क में आ सकते हैं, यह आन्ध्र प्रदेश को वरदान है, इसलिए हिम्मत रखो तो सफलता सहज होगी। अच्छा।

दिल्ली और आगरा -- दिल्ली वालों का कार्य आदि से आरम्भ हुआ है। सेवा की आदि दिल्ली से हुई है, इसलिए बापदादा दिल्ली का नाम सदा वर्णन करते रहते हैं। दिल्ली वालों ने इन्वेन्शन तो समय प्रति समय की है लेकिन अभी और भी नई नई इन्वेन्शन कर कोई नई सार्विस की रूपरेखा बनाने के निमित्त बनना है। दिल्ली का आवाज़ विश्व तक पहुँचता है। इसलिए दिल्ली का विशेष सेवा का नाम चारों ओर बाला हो जाता है। अभी कोई नया प्लान दिल्ली को प्रैक्टिकल में करके दिखाना है। माइक तो दिल्ली में बहुत हैं, सहयोगी हैं, समय पर सहयोग देते हैं लेकिन आवाज बुलन्द करना उसमें अभी उन सहयोगी आत्माओं को समीप लाना है। समय पर कार्य के निमित्त बनते हैं लेकिन आवाज़ बुलन्द करने के लिए सदा तैयार रहें, वो अभी कोई नई इन्वेन्शन कर उन्हों को सहयोगी से सदा सहयोगी बनाना है। दिल्ली में ऐसी हिम्मत है ना।

जगदीश भाई से -- आदि से सेवा बहुत की है। आदि से सेवा के निमित्त बने हो और इन्वेन्शन भी अच्छी-अच्छी की है। अभी देखो वर्गीकरण की रिज़ल्ट कितनी अच्छी है। इसलिए अभी फिर कोई नई इन्वेन्शन करनी है। सबका आपसे प्यार है। मुरली में नाम आता है ना तो सभी का अटेन्शन जाता है। अभी शरीर को जबरदस्ती नहीं चलाओ, अभी आराम से चलाओ। अभी यह नहीं सोचो यह करना ही है। नहीं। औरों को आप समान बनाओ। मेले की शुरूआत भी दिल्ली से ही शुरू हुई है, कांफ्रेंस भी हुई अभी नई इन्वेन्शन भी दिल्ली से शुरू हो। अच्छा।

यू.पी. -- लखनऊ में बहुत अच्छा मेला चल रहा है। जैसे अभी सारे यू.पी. के सम्बन्ध से कार्य किया है, वैसे अभी यू.पी. में गवर्मेन्ट की सेवा अच्छी हो सकती है। अगर सभी मिलकर यू.पी. में गवर्मेन्ट की सेवा करें तो वहाँ का आवाज़ चारों ओर फैल सकता है। ऐसी क्वालिटी यू.पी. में है जो सेवा में सहयोगी बन सकते हैं। अभी सभी बिजी हैं, अच्छा किया है। बापदादा खुश है और मुबारक दे रहे हैं। अनेक आत्माओं तक आवाज़ फैला है, ऐसे समय प्रति समय संगठन द्वारा आगे बढ़ते जायें, धरनी अच्छी है, सहज है, इसलिए आगे बढ़ाते चलो। अच्छा।

ईस्टर्न -- अच्छा ग्रुप आया है। सेवा की मुबारक तो बापदादा ने दे ही दी है। अभी आवाज़ निकालने में सर्व के सहयोग से बापदादा खुश है। ब्रह्मा बाप की प्रत्यक्षता का स्थान है। इसलिए जैसे ब्रह्मा बाप का आदि स्थान है ऐसे अभी सभी को नाम बाला करने का पुरूषार्थ करना चाहिए। अभी सर्व के सहयोग से नाम हुआ है, मेहनत अच्छी की है, सहयोग भी अच्छा दिया है, अभी ऐसे ही सहयोगी बन और आदि स्थान को मशहूर करते जाएँ। कलकत्ता में बहुत अच्छे- अच्छे इन्डस्ट्रियल निकल सकते हैं। ऐसी सेवा करके कोई ऐसे निमित्त बनाओ जो अनेकों की सेवा में निमित्त बनें। अच्छा है, अभी हिम्मत अच्छी है, उमंग भी अच्छा है, रिज़ल्ट भी अच्छी है। आगे बढ़ते चलो, बढ़ते-बढ़ते मंज़िल पर पहुँच ही जायेंगे। अच्छा।

पंजाब -- अच्छा है, पंजाब वालों ने भी जगह-जगह पर अच्छा नाम बाला किया है। पंजाब अभी सेवा में अच्छा आगे बढ़ रहा है। इसलिए पंजाब वालों को वा हरियाणा, हिमाचल वालों को सभी को सेवा में आगे बढ़ने की मुबारक हो। जो भी प्रोग्राम किये हैं, अच्छे सहयोग से और सफलता पूर्वक किये हैं, तो जैसे अभी सेवा में फास्ट जा रहे हैं ऐसे आगे भी फास्ट रहेंगे और सफलता को प्राप्त करना ही है। अच्छी रिज़ल्ट है, पंजाब वालों को मुबारक।

इन्दौर-भोपाल -- चाहे इन्दौर है, चाहे भोपाल है लेकिन हर एक अपने अनुसार सेवा में आगे तो बढ़ ही रहे हैं। बापदादा ने देखा है सेवा का उमंग- उत्साह अच्छा है और वृद्धि भी होती रहती है। अभी जैसे वृद्धि करते रहते हैं, वैसे ही चाहे भोपाल में, चाहे इन्दौर में, दोनों जगह ऐसा पावरफुल ग्रुप बनाओ जो सदा सेवा में और स्वउन्नति में एक्ज़ाम्पल बनें। दोनों तरफ ऐसा ग्रुप बनाओ जो एक्ज़ाम्पल बन और तरफ भी अपना अनुभव सुना सके। तो मध्यप्रदेश अनुभव सुनाने का ग्रुप तैयार करे। सेवा में तो हैं ही अच्छे और आगे भी करेंगे परन्तु ऐसा कोई ग्रुप का एक्ज़ाम्पल बनाओ जो ब्राह्मणों की सेवा हो, जहाँ कुछ भी हो तो ऐसे ग्रुप का एक्ज़ाम्पल सामने आवे। दोनों ही मध्य प्रदेश है ना। तो दोनों को ऐसी कोई तैयारी करनी चाहिए। सेवा के प्लैन तो अच्छे बनाते ही हैं। अभी ऐसा ग्रुप बन सकता है? तो मार्च में दोनों तरफ का ऐसा ग्रुप बाप के सामने लाना है। ठीक है? वैसे तो सभी तरफ ग्रुप बनाना है, लेकिन पहले आप लोग बनाओ। सभी ज़ोन में बनाना है, निमित्त पहला नम्बर आप बनो। सेवा में तो होशियार हैं ही। प्लैन भी अच्छे-अच्छे बनाते हैं। अच्छा।

गुजरात -- गुजरात ने सेवा का विहंग मार्ग तो दिखाया, बहुत अच्छा किया। अभी गुजरात को नवीनता क्या करनी है? सेवा तो कर ली, अच्छा किया। गुजरात में जगह-जगह पर वारिस क्वालिटी हैं, अभी गुजरात को वारिस क्वालिटी का ग्रुप तैयार करके लाना है। बापदादा को उम्मीद है कि गुजरात से वारिस क्वालिटी निकल सकती है। और है भी लेकिन उन्हों को संगठित रूप में बड़ों के सामने लाओ। ऐसे है ना? वारिस हैं? तो अभी ऐसा ग्रुप लाना। गुजरात एक वारिस क्वालिटी में एक्ज़ाम्पल बनें। वारिस की भाषा तो समझते हैं ना - जो तन से, मन से, सहयोग से सबसे नम्बरवन हो और हर कार्य में हर समय एवररेडी हो? इसको कहा जाता है वारिस। जिस समय बुलावा आवे उस समय हाज़र हो जाये, इसको कहा जाता है - वारिस क्वालिटी। हर समय जी हजूर हाज़र। हाज़र हो जाए, हर कार्य में नम्बर आगे आवे - इसको कहा जाता है वारिस। तो गुजरात से ऐसे वारिस निकालने हैं। अच्छा।

कर्नाटक -- अच्छा ग्रुप है। कर्नाटक वाले जितना ही भावना स्वरूप हैं उतना ही हर कार्य में सहयोगी भी बहुत अच्छे हैं। चाहे कोई भी कार्य हो लेकिन संख्या सहयोगी बन जाती है। इसलिए कनार्टक की धरनी सेवाधारी बहुत अच्छी है। कर्नाटक के वी.आई.पीज़ भी बहुत अच्छे भाव-वान होने के कारण सहयोग अच्छा देते हैं इसलिए कर्नाटक वालों को भी चारों ओर के वी.आई.पीज़ का ग्रुप तैयार करना चाहिए और ऐसे वी.आई.पीज़ हैं जो माइक भी बन सकते हैं परन्तु संगठित रूप में उन्हों को पालना चाहिए इसलिए कनार्टक वाले जो निमित्त हैं उन्हों को संगठित रूप में ऐसे वी.आई.पीज़ का ग्रुप तैयार करना चाहिए जो कहाँ भी सेवा के निमित्त बन सकते हैं। वी.आई.पी. की सेवा कर रहे हैं लेकिन मैदान पर लाना चाहिए वह संगठित रूप में कर सकते हो। तो अभी संगठित रूप में करना। अच्छा।

तामिलनाडु-केरला -- तामिलनाडु की विशेषता है जो निमित्त है (रोजी बहन) उसकी हिम्मत बहुत अच्छी है। और निमित्त वाले की हिम्मत होने के कारण चारों ओर स्टूडेण्ट में भी हिम्मत अच्छी है इसलिए हिम्मते बच्चे मददे बाप है ही। बापदादा तामिलनाडु के सेवाधारियों को बहुत-बहुत मुबारक देते हैं। आगे भी सेवा की नई-नई इन्वेन्शन करते रहना और आगे बढ़ते बढ़ाते रहना।

(1-1-99 के शुभ प्रभात पर बापदादा ने सभी बच्चों को 12 बजे के बाद मुबारक दी)

चारों ओर के अति स्नेही समीप ब्राह्मण आत्माओं को नव युग के रचता का मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। यह घड़ी है विदाई और बधाई की। संगम है। पुराने वर्ष को विदाई, पुराने वर्ष के साथ-साथ पुरानी बातें, पुरानी समस्यायें, पुराने संस्कार सबको विदाई और नये उमंग-उत्साह सम्पन्न वर्ष को मुबारक के साथ बधाई भी है, इस वर्ष को सदा मेहनत मुक्त वर्ष मनाना है। इस वर्ष को सदा स्व और सर्व को निर्विघ्न भव के वरदान से मनाना है। इस वर्ष को सदा विजय हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है, - इस निश्चय और नशे को सदा हर कर्म करते भी इमर्ज रखने का वर्ष मनाना। इस वर्ष में हर एक को बापदादा और दादियों द्वारा नम्बरवन जाने का इनाम वा गिफ्ट लेनी है, इसके लिए सभी विदेशी वा भारतवासियों को नम्बरवन का निश्चय रख आगे बढ़ना और बढ़ाना है। तो बहुत-बहुत यादप्यार सहित सब प्रकार की मन्सा से, वाचा से, सब रूप से बापदादा पद्मापद्म गुणा मुबारक दे रहे हैं। अभी एक सेकण्ड सभी पावरफुल संकल्प से, दृढ़ता से पुराने वस्तुओं को, पुराने वर्ष को, पुरानी बातों को सदा के लिए विदाई दो। एक सेकण्ड सभी - दृढ़ता सफलता है - इस दृढ़ संकल्प में स्थित हो जाओ।



18-01-99   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


वर्तमान समय के प्रमाण वैराग्य वृत्ति को इमर्ज कर साधना का वायुमण्डल बनाओ

आज स्नेह के सागर बापदादा अपने अति स्नेही बच्चों से मिल रहे हैं। आज का दिन विशेष स्नेह का दिन है। अमृतवेले से लेकर चारों ओर के बच्चे स्नेह की लहरों में लहरा रहे हैं। हर एक बच्चे के दिल का स्नेह दिलाराम बाप के पास पहुँच गया। बापदादा भी सभी बच्चों को स्नेह के रेसपान्स में स्नेह और समर्थ-पन का वरदान दे रहे हैं। आज के दिन को बापदादा यज्ञ की स्थापना में विशेष परिवर्तन का दिन कहते हैं। आज के दिन ब्रह्मा बाप गुप्त रूप में बैकबोन बन अपने बच्चों को साकार रूप में विश्व के मंच पर प्रत्यक्ष किया। इसलिए इस दिवस को बच्चों के प्रत्यक्षता का दिन कहा जाता है, समर्थ दिवस कहा जाता है, विल पावर देने का दिवस कहा जाता है। ब्रह्मा बाप गुप्त रूप में कार्य करा रहा है। अलग नहीं है, साथ ही है सिर्फ गुप्त रूप में करा रहा है। यह अव्यक्ति दिवस बच्चों के कार्य को तीव्र गति में लाने का दिवस है। अभी भी हर एक बच्चे की छत्रछाया बन पालना का कर्त्तव्य कर रहे हैं। जैसे माँ बच्चों के लिए छत्रछाया होती है ऐसे ही अमृतवेले से लेकर ब्रह्मा माँ चारों तरफ के बच्चों की रेख-देख करते रहते हैं। साकार में निमित्त बच्चे हैं लेकिन भाग्य विधाता ब्रह्मा माँ हर बच्चे के भाग्य को देख बच्चों को विशेष शक्ति, हिम्मत, उमंग-उत्साह की पालना करते रहते हैं। शिव बाप तो साथ में है ही लेकिन विशेष ब्रह्मा का पालना का पार्ट है।

आज के दिन भाग्य विधाता ब्रह्मा हर बच्चे को विशेष स्नेह के रिटर्न में वरदान का भण्डार भण्डारी बन बाँटते हैं। जो बच्चा जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित हो मिलन मनाते हैं उस हर एक बच्चे को जो वरदान चाहिए वह सहज प्राप्त होता है। वरदानों का खुला भण्डार है, जो चाहिए, जितना चाहिए उतना प्राप्त होने का श्रेष्ठ दिवस है। स्नेह का रिटर्न होता है - सहज वरदान की गिफ्ट। तो गिफ्ट में मेहनत नहीं करनी पड़ती है, सहज प्राप्ति होती है। गिफ्ट मांगी नहीं जाती है, स्वत: ही प्राप्त होती है। पुरूषार्थ से वरदान के अनुभूति की प्राप्ति अलग चीज़ है लेकिन आज के दिन ब्रह्मा माँ स्नेह के रिटर्न में वरदान देते हैं। तो आज के दिन सभी ने सहज वरदान प्राप्त होने की अनुभूति की? अभी भी सच्चे दिल के स्नेह का रिटर्न वरदान प्राप्त कर सकते हो। वरदान प्राप्त करने का साधन है - दिल का स्नेह। जहाँ दिल का स्नेह है, वो स्नेह ऐसा खज़ाना है जिस खज़ाने द्वारा, बापदादा द्वारा जो चाहे अविनाशी वरदान प्राप्त कर सकते हो। वह स्नेह का खज़ाना हर बच्चे के पास है? स्नेह का खज़ाना है तब तो पहुँचे हो ना! स्नेह खींचकर लाया है और स्नेह में रहना बहुत सहज है। पुरूषार्थ की मेहनत नहीं करनी पड़ती क्योंकि स्नेह का अनुभव हर आत्मा को होता ही है। सिर्फ अब जो बिखरा हुआ स्नेह था, कुछ कहाँ, कुछ कहाँ था, वह बिखरा हुआ स्नेह एक के ही साथ जोड़ लिया है क्योंकि पहले अलग-अलग सम्बन्ध था, अब एक में सर्व सम्बन्ध हैं। तो सहज सर्व स्नेह एक से हो गया। इसलिए हर एक कहता है मेरा बाबा। तो स्नेह किससे होता है? मेरे से। सभी कहते हैं ना मेरा बाबा, या दादियों का बाबा है? महारथियों का बाबा है? सबका बाबा है ना! आज के दिन कितने बार हर एक बच्चे ने दिल से कहा - मेरा बाबा, मेरा बाबा। सभी ने मेरा-बाबा, मेरा-बाबा कह रूह-रूहान की ना! सारा दिन क्या किया? स्नेह के पुष्प बापदादा को अर्पित किये। बापदादा के पास स्नेह के पुष्प बहुत बढ़िया से बढ़िया पहुँच रहे थे। स्नेह तो बहुत अच्छा रहा, अब बाप कहते हैं स्नेह का स्वरूप साकार में इमर्ज करो। वह है समान बनना। अभी यह समान बनने का लक्ष्य तो सभी के पास है, अभी साकार में लक्षण दिखाई दें। जिस भी बच्चे को देखें, जो भी मिले, सम्बन्ध-सम्पर्क में आये, उन्हों को यह लक्षण दिखाई दें कि यह जैसे परमात्मा बाप, ब्रह्मा बाप के गुण हैं, वह बच्चों के सूरत और मूरत से दिखाई दें। अनुभव करें कि इनके नयन, इनके बोल, इन्हों की वृत्ति वा वायब्रेशन न्यारे हैं। मधुबन में आते हैं तो बाप ब्रह्मा के कर्म साकार में होने के कारण भूमि में तपस्या, कर्म और त्याग के वायब्रेशन समाये हुए होने के कारण यहाँ सहज अनुभव करते हैं कि यह संसार न्यारा है क्योंकि ब्रह्मा बाप और विशेष बच्चों के वायब्रेशन से वायुमण्डल अलौकिक बना हुआ है। ऐसे ही जो बच्चा जहाँ भी रहता है, जो भी कर्मक्षेत्र है, हर एक बच्चे से बाप समान गुण, कर्म और श्रेष्ठ वृत्ति का वायुमण्डल अनुभव में आये, इसको बापदादा कहते हैं - बाप समान बनना। जो अभी तक संकल्प है बाप समान बनना ही है, वह संकल्प अभी चेहरे और चलन से दिखाई दे। जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये उनके दिल से यह आवाज निकले कि यह आत्मायें बाप समान हैं। (बीचबी च में खांसी आ रही है) आज माइक खराब है, मिलना तो है ना। यह भी तो माइक है ना, यह माइक नहीं चलता तो यह माइक भी काम का नहीं। कोई हर्जा नहीं यह भी मौसम का फल है।

तो बापदादा अभी सभी बच्चों से यह प्रत्यक्षता चाहते हैं। जैसे वाणी द्वारा प्रत्यक्षता करते हो तो वाणी का प्रभाव पड़ता है, उससे भी ज्यादा प्रभाव गुण और कर्म का पड़ता है। हर एक बच्चे के नयनों से यह अनुभव हो कि इन्हों के नयनों में कोई विशेषता है। साधारण नहीं अनुभव करें। अलौकिक हैं। उन्हों के मन में क्वेश्चन उठे कि यह कैसे बनें, कहाँ से बनें। स्वयं ही सोचें और पूछें कि बनाने वाला कौन? जैसे आजकल के समय में भी कोई बढ़िया चीज़ देखते हो तो दिल में उठता है कि यह बनाने वाला कौन है! ऐसे अपने बाप समान बनने की स्थिति द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करो। आजकल मैजारिटी आत्मायें सोचती हैं कि क्या इस साकार सृष्टि में, इस वातावरण में रहते हुए ऐसे भी कोई आत्मायें बन सकती हैं! तो आप उन्हों को यह प्रत्यक्ष में दिखाओ कि बन सकता है और हम बने हैं। आजकल प्रत्यक्ष प्रमाण को ज्यादा मानते हैं। सुनने से भी ज्यादा देखने चाहते हैं तो चारों ओर कितने बच्चे हैं, हर एक बच्चा बाप समान प्रत्यक्ष प्रमाण बन जाए तो मानने और जानने में मेहनत नहीं लगेगी। फिर आपकी प्रजा बहुत जल्दी-जल्दी तैयार हो जायेगी। मेहनत, समय कम और प्रत्यक्ष प्रमाण अनुभव करने से जैसे प्रजा का स्टैम्प लगता जायेगा। राजे-रानी तो आप बनने वाले हैं ना! बापदादा एक बात का फिर से अटेन्शन दिला रहे हैं कि वर्तमान वायुमण्डल के अनुसार मन में, दिल से अभी वैराग्य वृत्ति को इमर्ज करो। बापदादा ने हर बच्चे को चाहे प्रवृत्ति में है, चाहे सेवाकेन्द्र पर है, चाहे कहाँ भी रहते हैं, स्थूल साधन हर एक को दिये हैं, ऐसा कोई बच्चा नहीं है जिसके पास खाना, पीना, रहना इसके साधन नहीं हो। जो बेहद के वैराग्य की वृत्ति में रहते हुए आवश्यक साधन चाहिए, वह सबके पास हैं। अगर कोई को कमी है तो वह उसके अपने अलबेले-पन या आलस्य के कारण है। बाकी ड्रामानुसार बापदादा जानते हैं कि आवश्यक साधन सबके पास हैं। जो आवश्यक साधन हैं वह तो चलने ही हैं। लेकिन कहाँ-कहाँ आवश्यकता से भी ज्यादा साधन हैं। साधना कम है और साधन का प्रयोग करना या कराना ज्यादा है। इसलिए बापदादा आज बाप समान बनने के दिवस पर विशेष अण्डरलाइन करा रहे हैं - कि साधनों के प्रयोग का अनुभव बहुत किया, जो किया वह भी बहुत अच्छा किया, अब साधना को बढ़ाना अर्थात् बेहद की वैराग्य वृत्ति को लाना। ब्रह्मा बाप को देखा लास्ट घड़ी तक बच्चों को साधन बहुत दिये लेकिन स्वयं साधनों के प्रयोग से दूर रहे। होते हुए दूर रहना - उसे कहेंगे वैराग्य। लेकिन कुछ है ही नहीं और कहे कि हमको तो वैराग्य है, हम तो हैं ही वैरागी, तो वह कैसे होगा। वह तो बात ही अलग है। सब कुछ होते हुए नॉलेज और विश्व-कल्याण की भावना से, बाप को, स्वयं को प्रत्यक्ष करने की भावना से अभी साधनों के बजाए बेहद की वैराग्य वृत्ति हो। जैसे स्थापना के आदि में साधन कम नहीं थे, लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की भट्ठी में पड़े हुए थे। यह 14 वर्ष जो तपस्या की, यह बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल था। बापदादा ने अभी साधन बहुत दिये हैं, साधनों की अभी कोई कमी नहीं है लेकिन होते हुए बेहद का वैराग्य हो। विश्व की आत्माओं के कल्याण के प्रति भी इस समय इस विधि की आवश्यकता है क्योंकि चारों ओर इच्छायें बढ़ रही हैं, इच्छाओं के वश आत्मायें परेशान हैं, चाहे पद्मपति भी हैं लेकिन इच्छाओं से वह भी परेशान हैं। वायुमण्डल में आत्माओं की परेशानी का विशेष कारण यह हद की इच्छायें हैं। अब आप अपने बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा उन आत्माओं में भी वैराग्य वृत्ति फैलाओ। आपके वैराग्य वृत्ति के वायुमण्डल के बिना आत्मायें सुखी, शान्त बन नहीं सकती, परेशानी से छूट नहीं सकती। आप वृक्ष की जड़ हैं, ब्राह्मणों का स्थान वृक्ष में कहाँ दिखाया है? जड़ में दिखाया है ना! तो आप फाउण्डेशन हैं, आपकी लहर विश्व में फैलेगी इसलिए बापदादा विशेष साकार में ब्रह्मा बाप समान बनने की विधि, वैराग्य वृत्ति की तरफ विशेष अटेन्शन दिला रहा है। हर एक से अनुभव हो कि यह साधनों वश नहीं, साधना में रहने वाले हैं। होते हुए वैराग्य वृत्ति हो। आवश्यक साधन यूज़ करो लेकिन जितना हो सकता है उतना दिल के वैराग्य वृत्ति से, साधनों के वशीभूत होकर नहीं। अभी साधना का वायुमण्डल चारों ओर बनाओ। समय समीप के प्रमाण अभी सच्ची तपस्या वा साधना है ही बेहद का वैराग्य। सेवा का विस्तार इस वर्ष में बहुत किया। इस वर्ष चारों ओर बड़े-बड़े प्रोग्राम किये और सेवा से सहयोगी आत्मायें भी बहुत बने हैं, समीप आये हैं, सम्पर्क में आये हैं, लेकिन क्या सिर्फ सहयोगी बनाना है? यहाँ तक रखना है क्या? सहयोगी आत्मायें अच्छी-अच्छी हैं, अब उन सहयोगी क्वालिटी वाली आत्माओं को और सम्बन्ध में लाओ। अनुभव कराओ, जिससे सहयोगी से सहज योगी बन जाएँ। इसके लिए एक तो साधना का वायुमण्डल और दूसरा बेहद की वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल हो तो इससे सहज सहयोगी सहज योगी बन जायेंगे। उन्हों की सेवा भले करते रहो लेकिन साथ में साधना, तपस्या का वायुमण्डल आवश्यक है।

अभी चारों ओर पावरफुल तपस्या करनी है, जो तपस्या मन्सा सेवा के निमित्त बनें, ऐसी पावरफुल सेवा अभी तपस्या से करनी है। अभी मन्सा सेवा अर्थात् संकल्प द्वारा सेवा की टचिंग हो, उसकी आवश्यकता है। समय समीप आ रहा है, निरन्तर स्थितियाँ और निरन्तर पावरफुल वायुमण्डल की आवश्यकता है। बाप समान बनना है तो पहले बेहद की वैराग्य वृत्ति धारण करो। यही ब्रह्मा बाप की अन्त तक विशेषता देखी। न वैभव में लगाव रहा, न बच्चों में.. सबसे वैराग्य वृत्ति। तो आज के दिन का बाप समान बनने का पाठ पक्का करना। बस ब्रह्मा बाप समान बनना ही है। ऐसा दृढ़ निश्चय अवश्य आगे बढ़ायेगा।

बाकी सभी बच्चे सोचते होंगे कि आज प्राइज़ मिलना है। अभी देखो चारों ओर के बच्चे तो हैं नहीं, तो सिर्फ आप आये हुए को प्राइज़ दें! प्राइज तो है ही परन्तु बापदादा कहते हैं - हर एक सारे वर्ष में सर्व बन्धनों से मुक्त रहे! लिस्ट निकाली थी ना। कितने बंधन निकाले थे? (18) अच्छा तो 18 ही बंधन से स्वप्न तक भी मुक्त, स्वप्न में भी कोई बंधन की रूप-रेखा न आई हो, इसको कहा जाता है - मुक्त। तो हाथ तो बहुत सहज उठाते हैं, बाबा को पता है हाथ उठवायेंगे तो बहुत प्रकार के हाथ उठेंगे लेकिन फिर भी बापदादा कहते हैं कि जिस चेकिंग से आप हाथ उठाने के लिए तैयार हैं, बापदादा को पता है कितने तैयार हैं, कौन तैयार हैं। अभी भी और अन्तर्मुखी बन सूक्ष्म चेकिंग करो। अच्छा कोई को दु:ख नहीं दिया, लेकिन जितना सुख का खाता जमा होना चाहिए उतना हुआ? नाराज़ नहीं किया, राज़ी किया? व्यर्थ नहीं सोचा लेकिन व्यर्थ के जगह पर श्रेष्ठ संकल्प इतने ही जमा हुए? सबके प्रति शुभ भावना रखी लेकिन शुभ भावना का रेसपान्स मिला? वह चाहे बदले नहीं बदले, लेकिन आप उससे सन्तुष्ट रहे? ऐसी सूक्ष्म चेकिंग फिर भी अपने आपकी करो और अगर ऐसी सूक्ष्म चेकिंग में पास हो तो बहुत अच्छे हो। ऐसी पास आत्मायें अपने-अपने सेवाकेन्द्र पर चारों ओर सेन्टर पर अपना नाम, रिज़ल्ट सब बातों में कितना परसेन्ट रहा? सुख कितने को दिया? राज़ी कितने रहे? नाराज़ को राजी किया? कि जो राज़ी है उसको ही राज़ी किया? तो यह सब चेकिंग करके पास विद् ऑनर हैं, तो अपना नाम, अपने टीचर को लिख करके दो और टीचर जो छोटे-छोटे सेन्टर हैं, उन्हों के ऊपर जो बड़ी बहिनें मुकरर हैं, वह उन्हों से पास करावें फिर ज़ोन के पास सब नाम आवें। ज़ोन के पास सब नाम इकट्ठे करो फिर वह ज़ोन वाली ऐसी पास वाली आत्माओं के नाम मधुबन में भेजें, फिर इनाम मिलेगा। फिर ताली बजायेंगे। जो ऐसे पास विद् ऑनर होंगे उसको तो प्राइज़ मिलना ही चाहिए, वह मिलेगी लेकिन सच्ची दिल से, सच्चे बाप को अपना सच्चा पोतामेल बताना और प्राइज़ लेना क्योंकि बापदादा के पास सबके संकल्प तो पहुँचते हैं ना। तो जो हाथ उठाने वाले हैं ना, उसमें बापदादा ने देखा कि मिक्स बहुत हैं और बिना समझ के हाथ उठा देते हैं। तो कोई मिक्स वाले हाथ उठा दें और बापदादा प्राइज़ नहीं देवे तो अच्छा नहीं है। इसलिए कायदे-प्रमाण अगर पास विद् ऑनर हैं तो उसकी तो बहुत-बहुत महिमा है और ऐसे का नाम तो सभी ब्राह्मणों में प्रसिद्ध होना चाहिए ना। अच्छा है, मैजारिटी ने मेहनत अच्छी की है, अटेन्शन रहा है परन्तु सम्पूर्ण की बात है। जिन्होंने मेहनत की है, उन्हों को आज प्राइज़ के बजाए मुबारक दे रहे हैं। फिर प्राइज़ देंगे। ठीक है ना! अच्छा

दूसरी बात थी कि सभी ज़ोन वालों को मार्च तक माइक लाना है, सभी को याद तो है। तो पहले मार्च में बापदादा ज़ोन वालों से रिजल्ट लेंगे, किसने और किस क्वालिटी का माइक तैयार किया। आप कहेंगे यह माइक है लेकिन होगा छोटा माइक। समझो जिस नगर का माइक निकला, उसी नगर का माइक है, ज़ोन का भी नहीं है, तो उसको छोटा माइक कहेंगे ना। तो ऐसा कौन सा माइक तैयार किया है, वह बापदादा पूछेंगे। अगर कोई ज़ोन वाले लास्ट में नहीं भी आ सके तो अपनी चिटकी लास्ट टर्न में लिखकर भेजें, आवें तो ज़ोन के हेडस् को निमन्त्रण है। अगर नहीं आ सकते हैं, न आने का कोई ऐसा कारण है तो अपनी चिटकी भेज देंगे तो भी चलेगा। फिर बापदादा उन सभी माइक के संगठन का प्रोग्राम रखेंगे, जिसमें सभी तरफ के माइक स्टेज पर आयेंगे। उन्हों का विशेष प्रोग्राम रखेंगे, ऐसे नहीं कि मार्च में माइक भी लेकर आवें। माइक को वहाँ ही रहने दो, आप आना। जो माइक है उन्हों को तो धूमधाम से मंगायेंगे ना। उन्हों की स्वागत भी तो अच्छी करनी है ना। तो उन्हों का स्पेशल प्रोग्राम रखेंगे और फिर प्राइज़ देंगे नम्बरवन, टू, थ्री। ठीक है। ज़ोन वालों को स्पष्ट हुआ? मार्च में रिज़ल्ट लानी है। अच्छा।

अभी क्या याद रखा? कौन सी बात को अण्डरलाइन किया? बेहद का वैराग्य। अभी आत्माओं को इच्छाओं से बचाओ। बिचारे बहुत दु:खी हैं। बहुत परेशान हैं। तो अभी रहमदिल बनो। रहम की लहर बेहद के वैराग्य वृत्ति द्वारा फैलाओ। अभी सभी ऊँचे ते ऊँचे परमधाम में बाप के साथ बैठ सर्व आत्माओं को रहम की दृष्टि दो। वायब्रेशन फैलाओ। फैला सकते हैं ना? तो बस अभी परमधाम में बाप के साथ बैठ जाओ। वहाँ से यह बेहद के रहम का वायुमण्डल फैलाओ। (बापदादा ने ड्रिल कराई) अच्छा।

चारों ओर के सर्व अति स्नेही बच्चों को, सर्व चारों ओर के साधना करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, बापदादा को सारे दिन में बहुत प्यारे-प्यारे, मीठे-मीठे दिल के गीत सुनाने वाले, रूह-रूहान करने वाले शक्तियों के, गुणों के वरदान से झोली भरने वाले, बापदादा को सबके गीत, खुशी के गीत स्नेह के गीत, रूहानी नशे के गीत, मीठी-मीठी बातें बहुत-बहुत दिल को लुभाने वाली सुनाई दी और बापदादा भी सुनने और मिलने में लवलीन थे। तो ऐसे दिल के सच्चे, दिल के आवाज़ सुनाने वाले बच्चे महान हैं और सदा महान रहेंगे, ऐसे मीठेमीठे बच्चे सदा बेहद के वैराग्य वृत्ति को अपनाने वाले, दृढ़ निश्चय बुद्धि बच्चों को बापदादा एक के बदले पद्मगुणा रिटर्न स्नेह दे रहे हैं। दिलाराम के दिल पर रहने वाले सभी बच्चों को बहुत-बहुत यादप्यार और नमस्ते।

जो बाहर भी सुन रहे हैं उन्हों को भी बाबा देख रहे हैं और बापदादा दूर नहीं देखते हैं लेकिन सभी तरफ के बच्चों को सम्मुख देख यादप्यार और मुबारक और याद सौगात वा याद पत्रों का रिटर्न कर रहे हैं कि सदा उड़ती कला में उड़ने वाले बच्चे सदा आबाद हैं, सदा ही आबाद रहेंगे। अच्छा।

दादी जी से

आज के दिन को स्मृति दिवस कहते हैं, तो स्मृति में क्या रहा? समर्थ का वरदान याद रहा? आपको तो डायरेक्ट विल कर ली ना? अच्छा पार्ट बजा रही हो। बापदादा देख रहे हैं, वृद्धि भी बहुत हो रही है और यह वृद्धि भी सेवा का सबूत ही है। तो बच्चों की सेवा को देख बापदादा तो खुश होते हैं। बाप गुप्त हो गये, अभी सभी के मुख पर क्या है? अभी तो सभी के मुख पर सामने बच्चे ही हैं। ब्रह्माकुमारियां बहुत अच्छा काम कर रही हैं तो अभी बच्चे प्रत्यक्ष हुए। अभी बाप प्रत्यक्ष होना है। बाप ने पहले बच्चों को प्रत्यक्ष किया। अभी बाप प्रत्यक्ष होंगे तो फिर तो समाप्ति हो जायेगी ना। इसलिए पहले बच्चे प्रत्यक्ष हो रहे हैं फिर बाप होंगे। फिर भी बहुत अच्छा, सेवा का उमंग-उत्साह अच्छा है, अभी निर्विघ्न बनाने की ज्यादा लहर फैलाओ। यह भी लहर फैल जायेगी तो सहज हो जायेगा।

आज सभी तरफ अच्छा वायुमण्डल था (सभी स्नेह में डूबे हुए थे) दिन का महत्त्व होता है। इस दिन का भी महत्त्व है। (दादी जानकी ने खास याद दिया है)



13-02-99   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


शिव अवतरण और एकानामी के अवतार

आज त्रिमूर्ति शिव बाप अपने अति प्यारे-प्यारे, मीठे-मीठे शालिग्राम बच्चों से मिलने आये हैं। आज के दिन शिव और शालिग्रामों का विशेष दिवस है। तो बाप को बच्चों से मिलकर खुशी हो रही है कि बच्चों का बर्थ डे बाप मनाने आये हैं और बच्चे कहते हैं कि हम बाप का बर्थ डे मनाने आये हैं। बाप को भी खुशी है, बच्चों को भी खुशी है। क्यों? क्योंकि यह बर्थ डे सारे कल्प में न्यारा और प्यारा है। सारे कल्प में ऐसा बर्थ डे किसका भी मनाया नहीं जाता है। बाप और बच्चों का साथ में एक ही समय पर बर्थ डे हो - यह और किसी भी समय वा किसी का भी होता ही नहीं है। तो पहले बापदादा बच्चों को पद्मपद्म- पद्मगुणा मुबारक दे रहे हैं। बच्चों की मुबारक तो अमृतवेले से बहुतबहुत दिल से, दिल की मुबारक बापदादा के पास पहुँच ही गई है। बापदादा इतने सब बच्चों को, सालिग्रामों को देख यही खुशी के गीत दिल में गाते हैं कि वाह सिकीलधे बच्चे वाह! वाह लाड़ले बच्चे वाह! वाह अलौकिक जन्म, अलौकिक बर्थ डे मनाने वाले वाह! तो बापदादा हर बच्चे के लिए वाह-वाह का गीत गा रहे हैं क्योंकि इतनी सारी विश्व की आत्माओं में से कितने थोड़े से आप बच्चे ऐसे पद्मापद्म भाग्यवान बने हो और आगे भी भाग्यवान रहेंगे। अमर भाग्यवान आधा कल्प रहेंगे। एक जन्म का वरदान नहीं है, अनेक जन्म अमर वरदानी बन गये। ऐसे बच्चों को अपना स्व-मान कितना स्मृति में रहता है? इस अलौकिक बर्थ डे वा अलौकिक जन्म का अखुट वर्सा बाप जन्मते ही बच्चों को देते हैं। जन्मते ही स्मृति का श्रेष्ठ तिलक हर बच्चे को बाप ने दे दिया है। तिलक लगा हुआ है ना? ब्राह्मण जीवन है तो तिलक भी अविनाशी है। ब्राह्मणों के मस्तक में तिलक, यह श्रेष्ठ भाग्य की निशानी है।

तो आप सभी और चारों ओर के बच्चे दूर बैठे भी बहुत उमंग-उत्साह से यह न्यारा और प्यारा बर्थ डे मना रहे हैं। मना रहे हैं ना? सभी खुश हो रहे हैं कि बाप हमारा बर्थ डे मना रहे हैं और हम बाप का मना रहे हैं। कितनी खुशी है! खुशी को माप सकते हैं? माप है? इस दुनिया में, इस अलौकिक खुशी का कोई माप करने का साधन निकला ही नहीं है। अगर आपको कहें कि सागर जितनी खुशी है? तो क्या कहेंगे? कि सागर तो कुछ भी नहीं है। अच्छा आकाश जितनी है? तो आकाश से भी ऊँचे आपका घर है, आपका सूक्ष्मवतन है। इसलिए कोई माप-तौल निकला नहीं है, न निकल सकता है। इतनी खुशी है तो एक हाथ की ताली बजाओ। (सभी ने ताली बजाई) खुशी है - इसमें तो सभी ने हाथ उठाया, मुबारक हो। अभी दूसरा प्रश्न है, (समझ गये हैं तो हँस रहे हैं) बापदादा हर बच्चे को सदा खिला हुआ रूहानी गुलाब देखने चाहते हैं। आधा खिला हुआ नहीं, सदा और फुल। खिला हुआ फूल कितना प्यारा लगता है। देखने में ही मजा आता है। और थोड़ा भी मुरझा जाता है तो क्या करते हो? किनारे कर लेते हो। बापदादा किनारे नहीं करते लेकिन वह स्वयं ही किनारे हो जाता है।

आज तो मनाने का दिन है ना! मुरली तो सदा सुनते ही हो। आज तो खूब खुशी में मन से नाचो और गाओ। मन से नाचो, पाँव से नहीं। पाँव से नाचना शुरू करेंगे तो घमसान हो जायेगा। लेकिन बापदादा देख रहे हैं कि बच्चे नाच भी रहे हैं और मीठे-मीठे बाप की महिमा और अपने अलौकिक महिमा के गीत भी बहुत गा रहे हैं। बाबा को आपके मन का आवाज़ पहुँच रहा है। सब देशों से आवाज़ आ रहा है। बाप का आवाज़ सुन भी रहे हैं और बाप भी उन्हों का आवाज़ सुन रहा है। बाप भी कहते हैं - हे विश्व के बहुत-बहुत स्नेही बच्चे खूब नाचो, खूब गाओ और काम ही क्या है! ब्राह्मणों का काम क्या है? योग लगाना भी क्या है? मेहनत है क्या? योग का अर्थ ही है आत्मा और परमात्मा का मिलन। तो मिलन में क्या होता है? खुशी में नाचते हैं। बाप की महिमा के मीठे-मीठे गीत दिल ऑटोमेटिक गाती है। ब्राह्मणों का काम ही यह है, गाते रहो और नाचते रहो। यह मुश्किल है? नाचना-गाना मुश्किल है? नहीं है ना। जिसको मुश्किल लगता है वह हाथ उठाओ। आजकल तो नाचने-गाने की सीज़न है, तो आपको भी क्या करना है? नाचो, गाओ। सहज है ना? सहज है तो काँध तो हिलाओ। मुश्किल तो नहीं है ना? जान-बूझ कर सहज से हटकर मुश्किल में चले जाते हो। मुश्किल है नहीं, बहुत सहज है क्योंकि बाप जानते हैं कि आधाकल्प मुश्किल की जीवन व्यतीत की है इसलिए इस समय सहज है। मुश्किल वाला कोई है? कभी-कभी मुश्किल लगता है? जैसे कोई चलते-चलते रास्ता भूलकर और रास्ते में चला जाए तो मुश्किल लगेगा ना। ज्ञान का मार्ग मुश्किल नहीं है। ब्राह्मण जीवन मुश्किल नहीं है! ब्राह्मण के बजाए क्षत्रिय बन जाते हो तो क्षत्रिय का काम ही होता है लड़ना, झगड़ना... वह तो मुश्किल ही होगा ना! युद्ध करना तो मुश्किल होता है, मौज मनाना सहज होता है।

डबल फॉरेनर्स मौज मनाने वाले हो ना! एक हाथ की ताली बजाओ। मौज में हो? वहाँ जाकर मूंझ तो नहीं जायेंगे? देखो, आज के शिव जयन्ति का महत्त्व दो बातों का है। एक इस दिवस पर व्रत रखते हैं। डबल फॉरेनर्स को तो मनाना ही नहीं पड़ा। भारत में ही मनाते हैं तो इस दिवस का महत्त्व है - व्रत रखना और दूसरा है जागरण करना। तो आप सबने व्रत भी ले लिया है ना? पक्का व्रत लिया है? या कभी कच्चा, कभी पक्का? कच्ची चीज़ अच्छी लगती है? पका हुआ सब अच्छा लगता है ना! तो व्रत क्या लिया है? बापदादा ने सबसे पहला व्रत कौन-सा दिया? जब स्मृति का तिलक लगा तो पहला-पहला व्रत कौन सा लिया? याद है ना? सम्पूर्ण पवित्र भव। बाप ने कहा और बच्चों ने धारण किया। तो पवित्रता का व्रत सिर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं लेकिन ब्रह्मा समान हर संकल्प, बोल और कर्म में पवित्रता - इसको कहा जाता है ब्रह्मचारी और ब्रह्माचारी। हर बोल में पवित्रता का वायब्रेशन समाया हुआ हो। हर संकल्प में पवित्रता का महत्त्व हो। हर कर्म में, कर्म और योग अर्थात् कर्मयोगी का अनुभव हो - इस्को कहा जाता है ब्रह्माचारी। ब्रह्मा बाप को देखा हर बोल महावाक्य, साधारण वाक्य नहीं क्योंकि आपका जन्म ही साधारण नहीं, अलौकिक है। अलौकिकता का अर्थ ही है पवित्रता। तो रोज़ रात को अपना टीचर बनकर चेक करो और अपने को परसेन्टेज़ के प्रमाण अपने आपको ही मार्क्स दो। बनना 100 परसेन्ट है। लेकिन हर रोज़ अपने आपको देखो, दूसरे को नहीं देखना। बापदादा ने देखा है कि अपने बजाए दूसरों को देखने लग जाते हैं, वह सहज होता है। तो अपने को देखो कि आज के दिन संकल्प, बोल और कर्म में कितनी परसेन्ट रही?

आप लोगों ने इस वर्ष चारों ओर क्या सन्देश दिया है? परिवर्तन सभी फंक्शन में सुनाया है। जहाँ तहाँ भाषण किया है तो परिवर्तन के टॉपिक पर बहुत अच्छे-अच्छे भाषण किये हैं। तो इस वर्ष चारों ओर सेवा में औरों को भी परिवर्तन का लक्ष्य बहुत अच्छे धूमधाम से दिया है, बापदादा खुश हैं। तो आप अपने लिए भी यह चेक करो कि हर रोज़, हर दिन क्या परसेन्टेज़ में परिवर्तन हुआ? परिवर्तन चढ़ती कला का हो, गिरती कला का नहीं। बापदादा भी हर एक बच्चे का चार्ट देखता है। आप सोचेंगे सभी बच्चों का देखते हैं या कोई विशेष का देखते हैं! बापदादा सभी बच्चों का चार्ट कभी-कभी देखते हैं, रोज़ नहीं देखते लेकिन कभी-कभी देखते हैं - चाहे वह लास्ट है, चाहे फास्ट है। सभी हँस रहे हैं तो बापदादा ही सुना देवे कि क्या चार्ट है? आज का दिन मनाने का है ना, इसलिए नहीं सुनाते हैं। लेकिन आगे के लिए इशारा दे रहे हैं कि आज के दिन का जो महत्त्व है व्रत लेना अर्थात् दृढ़ संकल्प लेना। व्रत को कभी सच्चे भक्त तोड़ते नहीं हैं। तो बापदादा बच्चों को फिर से आगे के लिए इशारा दे रहे हैं कि अभी भी पहला फाउण्डेशन संकल्प शक्ति कभी-कभी वेस्ट ज्यादा और निगेटिव वेस्ट से थोड़ा कम है। इस संकल्प शक्ति का उपयोग जितना स्व प्रति वा विश्व के प्रति करना है उतना और बढ़ाओ क्योंकि संकल्प के आधार पर बोल और कर्म होता है तो संकल्प शक्ति का परिवर्तन करो। जो वेस्ट और निगेटिव जाता है, उसे परिवर्तन कर विश्व-कल्याण के प्रति कार्य में लगाओ। बापदादा संकल्प के खज़ाने को सर्व श्रेष्ठ मानते हैं इसलिए इस संकल्प के खज़ाने प्रति एकानामी के अवतार बनो। आज के दिन को अवतरण का दिन कहा जाता है तो बापदादा की सभी बच्चों प्रति यही शुभ आशा है कि आज के दिन शिव अवतरण के साथ आप सभी एकानामी के अवतार बनो। संकल्प में एकानामी की अर्थात् वेस्ट से बचाया, तो और सभी खज़ाने ऑटोमेटिक बच जायेंगे। तो 99 में क्या होगा? 99 चालू हो गया। पहले सोच रहे थे, 99 में क्या होगा? कुछ हुआ क्या? फरवरी तो आ गई। अगर होगा भी तो आपको क्या है? आपको कोई नुकसान है? भय है? क्या होगा, उसका भय होता है? आपके लिए अच्छा ही होगा। दुनिया के लिए कुछ भी हो जाए आपको निर्भय और हर्षितमुख हो खेल देखना है। खेल में खून भी दिखाते हैं तो प्यार भी दिखाते हैं। लड़ाई भी दिखाते हैं तो अच्छी बातें भी दिखाते हैं। फिर खेल में भय होता है क्या? क्या होगा, क्या हुआ, क्या हुआ? यह सोचते हैं क्या? मजे से बैठकर देखते हैं। तो यह भी बेहद का खेल है। अगर जरा भी भय वा घबराहट होगी - क्या हो गया, क्या हो गया... ऐसा तो होना नहीं चाहिए, क्यों हो गया तो ऐसी स्थिति वाले को इफेक्ट आयेगा। अच्छे में अच्छी स्थिति और गड़बड़ की स्थिति में खुद भी गड़बड़ में आ जायेंगे, हलचल में आ जायेंगे। इसलिए 99 हो या 2 हज़ार हो, आपको क्या है? होने दो खेल। मजे से देखो। घबराना नहीं। हाय यह क्या हो गया! संकल्प में भी नहीं आये। सब पूछते हैं 99 में क्या होगा? कुछ होगा, नहीं होगा। बापदादा कहते हैं आप लोगों ने ही प्रकृति को सेवा दी है कि खूब सफाई करो, उसको लम्बा-लम्बा झाडू दिया है, सफा करो। तो घबराते क्यों हो? आपके आर्डर से वह सफाई करायेगी तो आप क्यों हलचल में आते हो? आपने ही तो आर्डर दिया है। तो अचल-अडोल बन मन और बुद्धि को बिल्कुल शक्तिशाली बनाए अचल-अडोल स्थिति में स्थित हो जाओ। प्रकृति का खेल देखते चलो। घबराना नहीं। आप अलौकिक हो, साधारण नहीं हो। साधारण लोग हलचल में आयेंगे, घबरायेंगे। अलौकिक, मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मायें खेल देखते अपने विश्व-कल्याण के कार्य में बिजी रहेंगे। अगर मन और बुद्धि को फ्री रखा तो घबरायेंगे। मन और बुद्धि से लाइट हाउस हो, लाइट फैलायेंगे, इस कार्य में बिजी रहेंगे तो बिजी आत्मा को भय नहीं होगा, साक्षीपन होगा; और कोई भी हलचल हो अपने बुद्धि को सदा ही क्लीयर रखना, क्यों-क्या में बुद्धि को बिजी वा भरा हुआ नहीं रखना, खाली रखना। एक बाप और मैं.. तब समय अनुसार चाहे पत्र, टेलीफोन, टी.वी. वा आपके जो भी साधन निकले हैं, वह नहीं भी पहुँचे तो बापदादा का डायरेक्शन क्लीयर कैच होगा। यह साइंस के साधन कभी भी आधार नहीं बनाना। यूज़ करो लेकिन साधनों के आधार पर अपनी जीवन को नहीं बनाओ। कभी-कभी साइंस के साधन होते हुए भी यूज़ नहीं कर सकेंगे। इसलिए साइलेन्स का साधन - जहाँ भी होंगे, जैसी भी पिरस्थिति होगी बहुत स्पष्ट और बहुत जल्दी काम में आयेगा। लेकिन अपने बुद्धि की लाइन क्लीयर रखना। समझा। आप ही तो आह्वान कर रहे हैं कि जल्दी-जल्दी गोल्डन एज़ आ जावे। तो गोल्डन एज़ में यह सफाई चाहिए ना। तो प्रकृति अच्छी सफाई करेगी।

तो आज के दिन संकल्प नहीं लेकिन दृढ़ संकल्प क्या लिया? एकानामी का अवतार बनना ही है। चाहे संकल्प में, चाहे बोल में, चाहे साधारण कर्म की एकानामी। और दूसरी बात - सदा बुद्धि को क्लीयर रखना। जिसको दूसरे शब्दों में बापदादा कहते हैं - सच्ची दिल पर साहेब राज़ी। सच्ची दिल, साफ दिल। वर्तमान समय में सच्चाई और सफाई की आवश्यकता है। दिल में भी सच्चाई, परिवार में भी सच्चाई और बाप से भी सच्चाई। समझा। आज के दिन कहना नहीं था लेकिन कह दिया। बापदादा का प्यार है ना तो ज़रा भी कमज़ोरी बापदादा देख नहीं सकते। बापदादा सदा हर बच्चे को अपने जैसा सम्पूर्ण देखने चाहते हैं।

चारों ओर हलचल है, प्रकृति के सभी तत्त्व खूब हलचल मचा रहे हैं, एक तरफ भी हलचल से मुक्त नहीं हैं, व्यक्तियों की भी हलचल है, प्रकृति की भी हलचल है, ऐसे समय पर जब इस सृष्टि पर चारों ओर हलचल है तो आप क्या करेंगे? सेफ्टी का साधन कौन-सा है? सेकण्ड में अपने को विदेही, अशरीरी वा आत्म-अभिमानी बना लो तो हलचल में अचल रह सकते हो। इसमें टाइम तो नहीं लगेगा? क्या होगा? अभी ट्रायल करो - एक सेकण्ड में मन-बुद्धि को जहाँ चाहो वहाँ स्थित कर सकते हो? (ड्रिल) इसको कहा जाता है - साधना। अच्छा।

देश-विदेश के चारों ओर के बाप के लव में लवलीन आत्माओं को, सदा स्वयं को ब्रह्माचारी स्थिति में स्थित करने वाले स्नेही, सहयोगी बच्चों को, सदा एकनामी और एकानामी को कार्य में लगाने वाले हिम्मतवान बच्चों को, सदा हलचल में भी अचल रहने वाले निर्भय आत्माओं को, सदा मौज मनाने वाले, बाप के समीप रहने वाले बच्चों को यादप्यार और नमस्ते।

बच्चों के सब कार्ड मिले। बापदादा देख रहे हैं, सभी ने जन्म दिन के कार्ड और फॉरेन वालों ने प्यार के दिवस के कार्ड भेजे हैं, तो प्यार का सागर बाप सभी बच्चों को शिवरात्रि के साथ-साथ प्यार के लवलीन दिवस की भी मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।

दादियों से

फॉरेन भी अच्छा आगे बढ़ रहा है। अभी बचपन पूरा हुआ। अभी अच्छे अनुभवी हो गये हैं। पहले जो बचपन होता था ना वह अभी मैजारिटी का खत्म हो गया है। भारत में भी वृद्धि अच्छी है। 9 लाख चाहिए, वह तो बन रहे हैं ना। माला भी बन रही है तो 9 लाख भी बन रहे हैं। दोनों ही बन रहे हैं। लास्ट सो फास्ट भी कोई-कोई आ रहे हैं। अच्छा है। बापदादा तो लास्ट नम्बर वाले पर भी खुश हैं। बाप को तो पहचान लिया है।

(झण्डा लहराने के पश्चात बापदादा के उच्चारे हुए मधुर महावाक्य)

आज बाप और बच्चों के दोनों के बर्थ डे की मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। जैसे अभी सभी खूब खुशी में नाच रहे हैं, ऐसे अमर भव! जैसे यह झण्डा लहराया और पुष्पों की वर्षा हुई, ऐसे ही सदा अपने दिल में बाप की याद का यह झण्डा लहराता रहे। नीचे ऊपर नहीं हो। कभी भी याद का झण्डा नीचे नहीं हो, ऊँचा हो। तो दुनिया वाले अहो भाग्य, अहो बाप यह पुष्पों की वर्षा दुआओं के साथ आप सबके ऊपर करेंगे। तो एक तरफ याद का झण्डा लहराओ, दूसरे तरफ जो आज बाप का सन्देश मिला - एकानामी का अवतार बनो, तो ऐसे दृढ़ संकल्प का झण्डा अपने दिल में लहराना। और साथ में सेवा के प्रति सदा चारों ओर सर्व आत्माओं के आगे बाप को प्रत्यक्ष करने का झण्डा लहराना। यह है झण्डे का महत्त्व। एक दिन आयेगा, आया-कि-आया जब सब लोग बाप की महिमा करते, प्रत्यक्षता के झण्डे के नीचे आयेंगे। सहारा लेंगे और आप सहारे दाता बाप के बच्चे, मास्टर सहारे दाता होंगे। आया-कि-आया। अच्छा।

चारों ओर के देश, शहर, गाँव, चारों ओर के बच्चों को, सबसे पहले छोटे-छोटे गाँव वाले बच्चों को याद-प्यार और मुबारक। साथ में आप सबको भी मुबारक। कितनी मुबारक दें। जितना आप धारण कर सकते हो उससे भी ज्यादा मुबारक।



01-03-99   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


होली मनाना अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र बनकर संस्कार मिलन मनाना

आज बापदादा चारों ओर के अपने होलीएस्ट और हाइएस्ट बच्चों को देख रहे हैं। विश्व में सबसे हाइएस्ट ऊँचे-ते-ऊँचे श्रेष्ठ आत्मायें आप बच्चों के सिवाए और कोई है? क्योंकि आप सभी ऊँचे-ते-ऊँचे बाप के बच्चे हैं। सारे कल्प में चक्र लगाकर देखो तो सबसे ऊँचे मर्तबे वाले और कोई नज़र आते हैं? राज्य-अधिकारी स्वरूप में भी आपसे ऊँचे राज्य अधिकारी बने हैं? फिर पूजन और गायन में देखो जितनी पूजा विधिपूर्वक आप आत्माओं की होती है उससे ज्यादा और किसी की है? वण्डरफुल राज़ ड्रामा का कितना श्रेष्ठ है जो आप स्वयं चैतन्य स्वरूप में, इस समय अपने पूज्य स्वरूप को नॉलेज के द्वारा जानते भी हो और देखते भी हो। एक तरफ आप चैतन्य आत्मायें हैं और दूसरे तरप् आपके जड़ चित्र पूज्य रूप में हैं। अपने पूज्य स्वरूप को देख रहे हो ना? जड़ रूप में भी हो और चैतन्य रूप में भी हो। तो वण्डरफुल खेल है ना! और राज्य के हिसाब से भी सारे कल्प में निर्विघ्न, अखण्ड-अटल राज्य एक आप आत्माओं का ही चलता है। राजे तो बहुत बनते हैं लेकिन आप विश्वराज़न वा विश्वराजन की रॉयल फैमिली सबसे श्रेष्ठ है। तो राज्य में भी हाइएस्ट, पूज्य रूप में भी हाइएस्ट और अब संगम पर परमात्म-वर्से के अधिकारी, परमात्म मिलन के अधिकारी, परमात्म-प्यार के अधिकारी, परमात्म-परिवार की आत्मायें और कोई बनती हैं? आप ही बने हो ना? बन गये हो या बन रहे हो? बन भी गये और अब तो वर्सा लेकर सम्पन्न बन बाप के साथ-साथ अपने घर में भी चलने वाले हैं। संगम का सुख, संगमयुग की प्राप्तियाँ, संगमयुग का समय सुहाना लगता है ना! बहुत प्यारा लगता है। राज्य के समय से भी संगम का समय प्यारा लगता है ना? प्यारा है या जल्दी जाने चाहते हो? फिर पूछते क्यों हो कि बाबा विनाश कब होगा? सोचते हो ना - पता नहीं विनाश कब होगा? क्या होगा? हम कहाँ होंगे? बापदादा कहते हैं जहाँ भी होंगे - याद में होंगे, बाप के साथ होंगे। साकार में या आकार में साथ होंगे तो कुछ नहीं होगा। साकार में कहानी सुनाई है ना। बिल्ली के पूंगरे भट्ठी में होते हुए भी सेफ रहे ना! या जल गये? सब सेफ रहे। तो आप परमात्म बच्चे जो साथ होंगे वह सेफ रहेंगे। अगर और कहाँ बुद्धि होगी तो कुछ-न-कुछ सेक लगेगा, कुछ-न-कुछ प्रभाव होगा। साथ में कम्बाइण्ड होंगे, एक सेकण्ड भी अकेले नहीं होंगे तो सेफ रहेंगे। कभी-कभी कामकाज़ या सेवा में अकेले अनुभव करते हो? क्या करें अकेले हैं, बहुत काम है! फिर थक भी जाते हैं। तो बाप को क्यों नहीं साथी बनाते! दो भुजा वालों को साथी बना देते, हज़ार भुजा वाले को क्यों नहीं साथी बनाते। कौन ज्यादा सहयोग देगा? हज़ार भुजा वाला या दो भुजा वाला?

संगमयुग पर ब्रह्माकुमार वा ब्रह्माकुमारी अकेले नहीं हो सकते। सिर्फ जब सेवा में, कर्मयोग में बहुत बिजी हो जाते हो ना तो साथ भी भूल जाते हो और फिर थक जाते हो। फिर कहते हो थक गये, अभी क्या करें! थको नहीं, जब बापदादा आपको सदा साथ देने के लिए आये हैं, परमधाम छोड़कर क्यों आये हैं? सोते, जागते, कर्म करते, सेवा करते, साथ देने के लिए ही तो आये हैं। ब्रह्मा बाप भी आप सबको सहयोग देने के लिए अव्यक्त बनें। व्यक्त रूप से अव्यक्त रूप में सहयोग देने की रफ्तार बहुत तीव्र है, इसलिए ब्रह्मा बाप ने भी अपना वतन चेंज कर दिया। तो शिव बाप और ब्रह्मा बाप दोनों हर समय आप सबको सहयोग देने के लिए सदा हाज़र हैं। आपने सोचा बाबा और सहयोग अनुभव करेंगे। अगर सेवा, सेवा, सेवा सिर्फ वही याद है, बाप को किनारे बैठ देखने के लिए अलग कर देते हो, तो बाप भी साक्षी होकर देखते हैं, देखें कहाँ तक अकेले करते हैं। फिर भी आने तो यहाँ ही हैं। तो साथ नहीं छोड़ो। अपने अधिकार और प्रेम की सूक्ष्म रस्सी से बाँधकर रखो। ढीला छोड़ देते हो। स्नेह को ढीला कर देते हो, अधिकार को थोड़ा सा स्मृति से किनारा कर देते हो। तो ऐसे नहीं करना। जब सर्वशक्तिवान साथ का आफर कर रहा है तो ऐसी आफर सारे कल्प में मिलेगी? नहीं मिलेगी ना? तो बापदादा भी साक्षी होकर देखते हैं, अच्छा देखें कहाँ तक अकेले करते हैं!

तो संगमयुग के सुख और सुहेजों को इमर्ज रखो। बुद्धि बिजी रहती है ना तो बिजी होने के कारण स्मृति मर्ज हो जाती है। आप सोचो सारे दिन में किसी से भी पूछें कि बाप याद रहता है या बाप की याद भूलती है? तो क्या कहेंगे? नहीं। यह तो राइट है कि याद रहता है लेकिन इमर्ज रूप में रहता है या मर्ज रहता है? स्थिति क्या होती है? इमर्ज रूप की स्थिति या मर्ज रूप की स्थिति, इसमें क्या अन्तर है? इमर्ज रूप में याद क्यों नहीं रखते? इमर्ज रूप का नशा शक्ति, सहयोग, सफलता बहुत बड़ी है। याद तो भूल नहीं सकते क्योंकि एक जन्म का नाता नहीं है, चाहे शिव बाप सतयुग में साथ नहीं होगा लेकिन नाता तो यही रहेगा ना! भूल नहीं सकता है, यह राइट है। हाँ कोई विघ्न के वश हो जाते हो तो भूल भी जाता है लेकिन वैसे जब नेचरल रूप में रहते हो तो भूलता नहीं है लेकिन मर्ज रहता है। इसलिए बापदादा कहते हैं - बार-बार चेक करो कि साथ का अनुभव मर्ज रूप में है या इमर्ज रूप में? प्यार तो है ही। प्यार टूट सकता है? नहीं टूट सकता है ना? तो प्यार जब टूट नहीं सकता तो प्यार का फायदा तो उठाओ। फायदा उठाने का तरीका सीखो।

बापदादा देखते हैं प्यार ने ही बाप का बनाया है। प्यार ही मधुबन निवासी बनाता है। चाहे अपने स्थान पर कैसे भी रहें, कितना भी मेहनत करें लेकिन फिर भी मधुबन में पहुँच जाते हैं। बापदादा जानते हैं, देखते हैं, कई बच्चों को कलियुगी सरकमस्टांश होने के कारण टिकिट लेना भी मुश्किल है परन्तु प्यार पहुँचा ही देता है। ऐसे है ना? प्यार में पहुँच जाते हैं लेकिन सरकमस्टांश तो दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जाते हैं। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी तो होता ही है। लेकिन स्थूल सहयोग भी कहाँ-न-कहाँ कैसे भी मिल जाता है। चाहे डबल फॉरेनर्स हों, चाहे भारतवासी, सबको यह बाप का प्यार सरकमस्टांश की दीवार पार करा लेता है। ऐसे है ना? अपने-अपने सेन्टर्स पर देखो तो ऐसे बच्चे भी हैं जो यहाँ से जाते हैं, सोचते हैं पता नहीं दूसरे वर्ष आ सकेंगे या नहीं आ सकेंगे लेकिन फिर भी पहुंच जाते हैं। यह है प्यार का सबूत। अच्छा।

आज होली मनाई? मना ली होली? बापदादा तो होली मनाने वाले होली हंसों को देख रहे हैं। सभी बच्चों का एक ही टाइटल है होलीएस्ट। द्वापर से लेकर किसी भी धर्मात्मा या महात्मा ने सर्व को होलीएस्ट नहीं बनाया है। स्वयं बनते हैं लेकिन अपने फॉलोअर्स को, साथियों को होलीएस्ट, पवित्र नहीं बनाते और यहाँ पवित्रता ब्राह्मण जीवन का मुख्य आधार है। पढ़ाई भी क्या है? आपका स्लोगन भी है पवित्र बनो-योगी बनो। स्लोगन है ना? पवित्रता ही महानता है। पवित्रता ही योगी जीवन का आधार है। कभी-कभी बच्चे अनुभव करते हैं कि अगर चलते-चलते मन्सा में भी अपवित्रता अर्थात् वेस्ट वा निगेटिव, परचिन्तन के संकल्प चलते हैं तो कितना भी योग पावरफुल चाहते हैं, लेकिन होता नहीं है क्योंकि ज़रा भी अंशमात्र संकल्प में भी किसी प्रकार की अपवित्रता है तो जहाँ अपवित्रता का अंश है वहाँ पवित्र बाप की याद जो है, जैसा है वैसे नहीं आ सकती। जैसे दिन और रात इकठ्ठा नहीं होता। इसीलिए बापदादा वर्तमान समय पवित्रता के ऊपर बार-बार अटेन्शन दिलाते हैं। कुछ समय पहले बापदादा सिर्फ कर्म में अपवित्रता के लिए इशारा देते थे लेकिन अभी समय सम्पूर्णता के समीप आ रहा है इसलिए मन्सा में भी अपवित्रता का अंश धोखा दे देगा। तो मन्सा, वाचा, कर्मणा, सम्बन्ध-सम्पर्क सबमें पवित्रता अति आवश्यक है। मन्सा को हल्का नहीं करना क्योंकि मन्सा बाहर से दिखाई नहीं देती है लेकिन मन्सा धोखा बहुत देती है। ब्राह्मण जीवन का जो आन्तरिक वर्सा सदा सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप, मन की सन्तुष्टता है, उसका अनुभव करने के लिए मन्सा की पवित्रता चाहिए। बाहर के साधनों द्वारा या सेवा द्वारा अपने आपको खुश करना - यह भी अपने को धोखा देना है।

बापदादा देखते हैं कभी-कभी बच्चे अपने को इसी आधार पर अच्छा समझ, खुश समझ धोखा दे देते हैं, दे भी रहे हैं। दे देते हैं और दे भी रहे हैं, यह भी एक गु राज़ है। क्या होता है, बाप दाता है, दाता के बच्चे हैं, तो सेवा युक्तियुक्त नहीं भी है, मिक्स है, कुछ याद और कुछ बाहर के साधनों वा खुशी के आधार पर है, दिल के आधार पर नहीं लेकिन दिमाग के आधार पर सेवा करते हैं तो सेवा का प्रत्यक्ष फल उन्हों को भी मिलता है; क्योंकि बाप दाता है और वह उसी में ही खुश रहते हैं कि वाह हमको तो फल मिल गया, हमारी अच्छी सेवा है। लेकिन वह मन की सन्तुष्टता सदाकाल नहीं रहती और आत्मा योगयुक्त पावरफुल याद का अनुभव नहीं कर सकती, उससे वंचित रह जाते। बाकी कुछ भी नहीं मिलता हो, ऐसा नहीं है। कुछ-न-कुछ मिलता है लेकिन जमा नहीं होता। कमाया, खाया और खत्म। इसलिए यह भी अटेन्शन रखना। सेवा बहुत अच्छी कर रहे हैं, फल भी अच्छा मिल गया, तो खाया और खत्म। जमा क्या हुआ? अच्छी सेवा की, अच्छी रिज़ल्ट निकली, लेकिन वह सेवा का फल मिला, जमा नहीं होता। इसलिए जमा करने की विधि है - मन्सा, वाचा, कर्मणा - पवित्रता। फाउण्डेशन पवित्रता है। सेवा में भी फाउण्डेशन पवित्रता है। स्वच्छ हो, साफ हो। और कोई भी भाव मिक्स नहीं हो। भाव में भी पवित्रता, भावना में भी पवित्रता। होली का अर्थ ही है - पवित्रता। अपवित्रता को जलाना। इसीलिए पहले जलाते हैं फिर मनाते हैं और फिर पवित्र बन संस्कार मिलन मनाते हैं। तो होली का अर्थ ही है - जलाना, मनाना। बाहर वाले तो गले मिलते हैं लेकिन यहाँ संस्कार मिलन, यही मंगल मिलन है। तो ऐसी होली मनाई या सिर्फ डांस कर ली? गुलाबजल डाल दिया? वह भी अच्छा है खूब मनाओ। बापदादा खुश होते हैं गुलाबजल भले डालो, डांस भले करो लेकिन सदा डांस करो। सिर्फ 5-10 मिनट की डांस नहीं। एक-दो में गुणों का वायब्रेशन फैलाना - यह गुलाबजल डालना है। और जलाने को तो आप जानते ही हो, क्या जलाना है! अभी तक भी जलाते रहते हो। हर वर्ष हाथ उठाकर जाते हैं, बस दृढ़ संकल्प हो गया। बापदादा खुश होते हैं, हिम्मत तो रखते हैं। तो हिम्मत पर बापदादा मुबारक भी देते हैं। हिम्मत रखना भी पहला कदम है। लेकिन बापदादा की शुभ आशा क्या है? समय की डेट नहीं देखो। 2 हज़ार में होगा, 2001 में होगा, 2005 में होगा, यह नहीं सोचो। चलो एवररेडी नहीं भी बनो इसको भी बापदादा छोड़ देते हैं, लेकिन सोचो बहुतकाल के संस्कार तो चाहिए ना! आप लोग ही सुनाते हो कि बहुतकाल का पुरूषार्थ, बहुतकाल के राज्य-अधिकारी बनाता है। अगर समय आने पर दृढ़ संकल्प किया, तो वह बहुतकाल हुआ या अल्पकाल हुआ? किसमें गिनती होगा? अल्पकाल में होगा ना! तो अविनाशी बाप से वर्सा क्या लिया? अल्पकाल का। यह अच्छा लगता है? नहीं लगता है ना! तो बहुतकाल का अभ्यास चाहिए, कितना काल है वह नहीं सोचो, जितना बहुतकाल का अभ्यास होगा, उतना अन्त में भी धोखा नहीं खायेंगे। बहुतकाल का अभ्यास नहीं तो अभी के बहुतकाल के सुख, बहुतकाल की श्रेष्ठ स्थिति के अनुभव से भी वंचित हो जाते हैं। इसलिए क्या करना है? बहुतकाल करना है? अगर किसी के भी बुद्धि में डेट का इन्तजार हो तो इन्तज़ार नहीं करना, इन्तज़ाम करो। बहुतकाल का इन्तज़ाम करो। डेट को भी आपको लाना है। समय तो अभी भी एवररेडी है, कल भी हो सकता है लेकिन समय आपके लिए रूका हुआ है। आप सम्पन्न बनो तो समय का पर्दा अवश्य हटना ही है। आपके रोकने से रूका हुआ है। राज्य-अधिकारी तो तैयार हो ना? तख़्त तो खाली नहीं रहना चाहिए ना! क्या अकेला विश्वराजन तख़्त पर बैठेगा! इससे शोभा होगी क्या? रॉयल फैमिली चाहिए, प्रजा चाहिए, सब चाहिए। सिर्फ विश्वराजन तख़्त पर बैठ जाए, देखता रहे कहाँ गई मेरी रॉयल फैमिली। इसलिए बापदादा की एक ही शुभ आशा है कि सब बच्चे चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं, जो भी अपने को ब्रह्माकुमारी या ब्रह्माकुमार कहलाते हैं, चाहे मधुबन निवासी, चाहे विदेश निवासी, चाहे भारत निवासी - हर एक बच्चा बहुतकाल का अभ्यास कर बहुतकाल के अधिकारी बनें। कभी-कभी के नहीं। पसन्द है? एक हाथ की ताली बजाओ। पीछे वाले होशियार हैं, अटेन्शन से सुन रहे हैं। बापदादा पीछे वालों को अपने आगे देख रहा है। आगे वाले तो हैं ही आगे। (मेडीटेशन हाल में बैठकर मुरली सुन रहे हैं) नीचे वाले बापदादा के सिर के ताज होकर बैठे हैं। वह भी ताली बजा रहे हैं। नीचे वालों को त्याग का भाग्य तो मिलना ही है। आपको सम्मुख बैठने का भाग्य है और उन्हों के त्याग का भाग्य जमा हो रहा है। अच्छा बापदादा की एक आश सुनी! पसन्द है ना! अभी अगले वर्ष क्या देखेंगे? ऐसे ही फिर भी हाथ उठायेंगे! हाथ भले उठाओ, दो-दो उठाओ परन्तु मन का हाथ भी उठाओ। दृढ़ संकल्प का हाथ सदा के लिए उठाओ।

बापदादा एक-एक बच्चे के मस्तक में सम्पूर्ण पवित्रता की चमकती हुई मणी देखने चाहते हैं। नयनों में पवित्रता की झलक, पवित्रता के दो नयनों के तारे, रूहानियत से चमकते हुए देखने चाहते हैं। बोल में मधुरता, विशेषता, अमूल्य बोल सुनने चाहते हैं। कर्म में सन्तुष्टता, निर्माणता सदा देखने चाहते हैं। भावना में - सदा शुभ भावना और भाव में सदा आत्मिक भाव, भाई-भाई का भाव। सदा आपके मस्तक से लाइट का, फरिश्ते पन का ताज दिखाई दे। दिखाई देने का मतलब है अनुभव हो। ऐसे सजे सजाये मूर्त्त देखने चाहते हैं। और ऐसी मूर्त्त ही श्रेष्ठ पूज्य बनेगी। वह तो आपके जड़ चित्र बनायेंगे लेकिन बाप चैतन्य चित्र देखने चाहते हैं। अच्छा

चारों ओर के सदा बापदादा के साथ रहने वाले, समीप के सदा के साथी, सदा बहुतकाल के पुरूषार्थ द्वारा बहुतकाल का संगमयुगी अधिकार और भविष्य राज्य-अधिकार प्राप्त करने वाले अति सेन्सीबुल आत्मायें, सदा अपने को शक्तियों, गुणों से सजे-सजाये रखने वाले, बाप की आशाओं के दीपक आत्मायें, सदा स्वयं को होलीएस्ट और हाइएस्ट स्थिति में स्थित रखने वाले बाप समान अति स्नेही आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

सर्व विदेश वा देश में दूर बैठे हुए भी सम्मुख अनुभव करने वालों को बापदादा का बहुत-बहुत-बहुत यादप्यार।

दादी जी

से बापदादा आपको सदा मुबारकें बहुत देते हैं। तन की दुआयें भी देते हैं, मन का साथ भी देते हैं और सेवा के साथी भी बनते हैं। ऐसे अनुभव होता है? तन की दुआयें भी बहुत मिलती हैं। यह दवाई बहुत अच्छी मिल रही है। बाकी हिसाब-किताब तो ब्रह्मा बाप ने भी चुक्तू किया तो सबको करना है। सब सूली से कांटा हो जाता है, बाकी दुआयें बहुत मिलती हैं। परिवार द्वारा भी तो बापदादा द्वारा भी। अमृतवेले से लेकर रात तक बापदादा दुआओं से मालिश करते रहते हैं। ऐसे अनुभव होता है ना? आप नहीं चल रही हैं, चलाने वाला चला रहा है, इसीलिए अथक हैं। अच्छा।

स्पेशल दुआयें हैं। (दादी जानकी से) स्पेशल दुआयें हैं ना? सब निमित्त बनने वालों को स्पेशल दुआयें मिलती हैं। आप फॉरेनर्स से क्या चाहती हो? (सभी बापदादा के गले में पिरो जायें) यह तो बहुत कुछ चाहती हैं, आप भी बहुत कुछ करते हो ना! यह प्यार की पालना दे रही हैं, इतना अटेन्शन रखना - यही दिल का प्यार है। जिससे प्यार होता है ना उसकी कमी देख नहीं सकते। (बापदादा ने दादी, दादी जानकी को साथ में बिठाया)

यह दादियाँ जो हैं ना - यह बाप के बड़े भाई हैं। तो भाई तो साथ बैठते हैं ना? अच्छी मेहनत नहीं लेकिन मुहब्बत अच्छी करते हैं। बापदादा भी निमित्त बनने वालों को और जो करने वाले हैं उन्हों को देखकर खुश होते हैं। आप भी कम नहीं हो। और यह भी कम नहीं हैं। अच्छा।

(शान्तिवन से यहाँ अच्छा लगता है) लेकिन अनेक वंचित रह जायेंगे। सभी भाई-बहनों का ख्याल तो रखना है ना। यह तो होली का चांस आपको मिल गया है।

विदेशी भाई-बहनों से

पहला चांस डबल फॉरेनर्स को मिला है। देखो सबका डबल फॉरेनर्स से कितना प्यार है। पहला चांस आपको ही मिला है। अच्छा है, बापदादा सेवा में वृद्धि का उमंग-उत्साह देख खुश होता है। बापदादा वतन में भी आपकी मीटिंग्स, प्लैन, प्रोग्राम, रूह-रूहान सब कुछ देखते हैं। अच्छा चांस भी मिलता है। हर साल फॉरेन में इतना संगठन तो नहीं हो सकता है। यहाँ एक तो कितना बेहद का बड़ा परिवार है, यह देखने को मिलता है, सबका परिचय हो जाता है। और दूसरा पावरफुल पालना भी मिलती है, प्यार भी मिलता है। और बीच बीच में थोड़ी सी स्ट्रिक्ट की आँख दिखाना भी ज़रूरी है। अटेन्शन है लेकिन अटेन्शन को अन्डरलाइन हो जाता है। ऐसे अनुभव करते हो जो मधुबन में पालना मिलती है तो अण्डरलाइन तो होती है ना! और समीप भी आते हैं।

बापदादा को डबल फॉरेनर्स की, मैजारिटी की एक विशेषता वर्तमान समय की बहुत अच्छी लगती है, एक तो जो बार-बार समथिंग-समथिंग कहते थे ना, वह अभी मैजारिटी का कम है। पहले तो छोटी-छोटी बात में कहते थे समथिंग, समटाइम। लेकिन अभी अच्छे हिम्मत वाले बन आगे बढ़ रहे हैं। बचपन पूरा हुआ है, कहाँ-कहाँ पुरूषार्थ में यूथ हैं और कहाँ-कहाँ वानप्रस्थ के नज़दीक हैं। तो यूथ वालों को अभी भी थोड़ी लहर आती है। आयु में यूथ नहीं, पुरूषार्थ में। फिर भी पहले और अभी में अन्तर है। अभी नॉलेज़फुल हो गये हैं। समझ गये हैं - क्या करना है, कैसे चलना है, इसके नॉलेज़फुल बन गये हैं। बाकी क्या रहा है? अभी पावरफुल बनना है, उसमें अण्डरलाइन करो। सेन्टर भी बढ़ते जाते हैं। हिम्मत रखकर सेन्टर खोलते अच्छे हैं। जो सभी सेन्टर्स सम्भालते हैं, सेन्टर पर रहते हैं वह हाथ उठाओ। अच्छा - तो सेन्टर पर रहने वाले वा निमित्त बनने वाले कभी थकावट होती है? थोड़ी-थोड़ी होती है? थोड़ा टाइम होती है फिर ठीक हो जाते हैं। अच्छा है, देखो आप लोगों को एक विशेष लिफ्ट है सेवा की। भारत में तो पहले ट्रेनिंग करते हैं फिर ट्रायल पर रहती फिर टीचर बनती और आप लोग सीधा ही सेन्टर इन्चार्ज बन जाते। तो यह चांस तो अच्छा है ना। डबल काम करते हैं। हिम्मत के कारण आगे बढ़ रहे हो और बढ़ते रहेंगे। जॉब भी करते, सेन्टर भी सम्भालते, थक कर आते फिर थोड़े टाइम में अपने को रिफ्रेश कर फिर सेन्टर सम्भालते, यह देख करके बापदादा को कभी-कभी दिल में विशेष प्यार आता है। डबल बिजी हो गये ना। लेकिन डबल कार्य करने का डबल फायदा भी होता है। सेवा करना अर्थात् अपने पुण्य का खाता जमा करना और जितना नि:स्वार्थ, युक्तियुक्त सेवा भाव से सेवा करते हैं, उतनी पुण्य की पूंजी जमा करते हो। और वही पुण्य की पूंजी, खज़ाना साथ में ले जायेंगे। उस पुण्य की कमाई आधाकल्प की कमाई हो जायेगी। तो पुण्य आत्मायें अच्छी हो। मैं निमित्त सेवाधारी पुण्य आत्मा हूँ, यह स्मृति छोटे-छोटे पापों से मुक्त कर देती है। तो सदा चेक करो कि आज के दिन मन्सा द्वारा या सेवा द्वारा कितने पुण्य जमा किये? और पुण्य के आधार से छोटी-छोटी बातें कितनी समाप्त हो गई? खर्च कितना हुआ और बचत कितनी हुई? अगर बार-बार विघ्न आते हैं और उसको मिटाने के लिए गुण और शक्तियों का खर्च करते हैं तो वह कितना हुआ? और योगयुक्त अवस्था से बाप को साथी बनाकर सेवा करने में पुण्य का खाता कितना जमा हुआ? सबसे बड़े से बड़े मल्टीमिलियनेर आप हो। एक दिन में देखो कितनी कमाई करते हो? इतनी कमाई न फॉरेन में कोई कर सकता है, न भारत में कर सकता है। तो मल्टी मल्टी लगाते जाओ जैसे हिसाब में बिन्दी लगाओ तो बढ़ जाता है ना। एक के आगे एक बिन्दी लगाओ तो 10 हो जाता है और दो बिन्दी लगाओ तो 100 हो जाता है और लगाओ तो हजार हो जाता है, बिन्दी की कमाल है। तो आप ऐसे बिन्दी लगाते जाओ, मल्टी मल्टी मल्टी-मिल्युनर हो जाओ।

अच्छा - सब ठीक हो? पाण्डव ठीक हैं? बहुत अच्छा। बापदादा को भी नाज़ है कि विश्व में जहाँ भी जाओ बाप के बच्चे हैं। आप लोगों को भी नशा होता है ना जिस देश में भी जाओ तो क्या कहेंगे? हमारा घर है। ऐसे लगता है ना कितने घर हो गये हैं आपके? इतने घर किसके होंगे? सभी कहते हो बाबा का घर है, बाबा के घर में जा रहे हैं। कितने लाडले हो गये हो। इसीलिए सदा खुश। स्वप्न में भी दु:ख की लहर नहीं आवे। स्वप्न भी आवें तो खुशी के। उदासी के नहीं, थकावट के नहीं, मूंझने वाले नहीं। खुशी के। तो ऐसे है? ऐसे खुश रहो जो आपका खुशी का चेहरा देख रोने वाले भी खुश हो जाएं। ऐसी खुशी है ना? रोने वाले को हँसा सकते हो ना! चेहरा बदली नहीं हो। कभी ऐसा, कभी ऐसा नहीं। सदा मुस्कराता रहे। अच्छा - कितने परसेन्ट रिफ्रेश हुए? 100 परसेन्ट या 90 परसेन्ट? 101 परसेन्ट अच्छा।

अच्छा - दूसरे वर्ष जब आयेंगे तो 101 होगा या नीचे जायेगा या ऊपर जायेगा? सभी का ऊपर जायेगा! जो समझते हैं देखेंगे, जाने के बाद पता पड़ेगा। चाहते तो ऐसे हैं लेकिन देखेंगे, वह हाथ उठाओ। ऐसे कोई है। फर्स्ट टाइम वाले हाथ उठाओ। अच्छा...।

दूसरा ग्रुप - आबू निवासी,सेवाधारी,हॉस्पिटल निवासी तथा पार्टियों से

सभी अपने श्रेष्ठ भाग्य को देख हर्षित होते हैं? सदा हर्षित। कभी-कभी तो नहीं? सभी कहते हैं बाप मिला सब कुछ मिला। जब सब मिला, तो जहाँ सर्व प्राप्ति हैं, वहाँ सदा खुशी है ही। ऐसे है ना? खुशी कम तब होती है जब कोई अप्राप्ति है। तो कोई अप्राप्ति है क्या? तो सदा खुश। खुशी अपनी खुराक है। तो खुराक को कोई छोड़ता है क्या? तो सदा खुश रहने वाले, औरों को भी खुशी बांटते हैं। जब भी आपको कोई देखे तो खुशी की झलक दिखाई दे। ऐसे अनुभव करते हो? बापदादा सदा हर बच्चे को खुशनसीब की नज़र से देखते हैं। खुशनसीब हैं और खुशमिजाज हैं। कभी चेहरा बदली तो नहीं होता? थोड़ा सा सोच में, थोड़ा सा कनफ्युज़ चेहरा तो नहीं होता है ना! या थोड़ा-थोड़ा हो जाते हो? कनफ्युज़ होते हो? हाँ हाँ कह रहे हो? कभी-कभी होते हैं। कभी-कभी भी नहीं। बाप के बच्चे सदा एकरस रहते हैं। कभी किस रस में, कभी किस रस में, नहीं। एकरस, सदा खुश। ठीक है ना? अभी नहीं बदलना। आज के दिन इसको जला दो। खत्म। कुछ भी हो, बाप साथ है, मूंझने की क्या बात है। कनफ्युज़ होने की क्या बात है। बाप के साथ का सहयोग लो, अकेले समझते हो तो मौज के बजाए मूंझ जाते हो। तो मूंझना नहीं। ठीक है ना? अभी भी मूंझेंगे। (नहीं) अभी नहीं मूंझ रहे हो, मौज में हो इसलिए कहते हो कि नहीं मूंझेंगे! कुछ भी हो जाए लेकिन मौज नहीं जाए। ठीक है ना या मौज चली जायेगी? मौज नहीं जानी चाहिए। सेवा का बल है तो उस बल को कार्य में लगाओ। सिर्फ सेवा नहीं करो लेकिन सेवा का बल जो बाप से मिलता है, उसको काम में लगाओ। सिर्फ सेवा कर रहे हैं, सेवा कर रहे हैं तो थक जाते हो, मूंझ भी जाते हो लेकिन बाप के साथ का अनुभव, जहाँ बाप है वहाँ मौज ही मौज है। तो साथ को इमर्ज करो, सुनाया ना - याद करते हो लेकिन साथ को यूज़ नहीं करते, इसीलिए मूंझ जाते हो। संगमयुग मौजों का युग है या मूंझने का युग है? मौज का है तो फिर मूंझते क्यों हो? अभी अपने जीवन की डिक्शनरी से मूंझना शब्द निकाल दो। निकाल लिया? पक्का। या थोड़ा-थोड़ा दिखाई देगा? एकदम मिटा दो। परमात्मा के बच्चे और मौज में नहीं रहे तो और कौन रहेगा और कोई है क्या? तो सदा मौज ही मौज है। सभी अपनी ड्यूटी पर खुश हो? या थोड़ा-थोड़ा ड्यूटी में खिटखिट है? कुछ भी हो जाए, यह पेपर पास करना है। बात नहीं है, पेपर है। तो पेपर पास करने में खुशी होती है ना। क्लास आगे बढ़ते हैं ना! तो बात हो गई, समस्या आ गई यह नहीं सोचो। पेपर आया पास हुआ, मौज मनाओ। जब बच्चे पेपर पास करके आते हैं तो कितने मौज में होते हैं, मूंझते हैं क्या! यह पेपर तो आयेंगे। पेपर ही अनुभव में आगे बढ़ाते हैं, इसलिए सदा मौज में रहने वाले। सेवाधारी नहीं लेकिन मौज में रहने वाले। सदा यह अपना टाइटल याद करो। हॉस्पिटल के सेवाधारी हैं, नहीं, मौज में रहने वाले सेवाधारी हैं। अच्छा।

डाक्टर्स तो मौज में रहते हो ना? पेशेन्ट को मौज दिलाने वाले। बहुत अच्छा। (बापदादा सभी से हाथ उठवाकर मिल रहे हैं।)

सभी बहुत-बहुत पुण्य का खाता जमा कर रहे हो। वैरायटी गुलदस्ता सबसे प्यारा लगता है। वैरायटी की सदा शोभा होती है, सुन्दरता होती है, इसलिए प्यारा लगता है। तो स्थान अनेक हैं लेकिन हैं सब एक। एक ही लक्ष्य है, एक ही मत है और एक ही बाप है, एक ही परिवार है और अवस्था भी एकरस। एकरस है ना? और रस में नहीं जाना, माया खा जायेगी। इसलिए एकरस रहना। माया को भी आपसे प्यार है ना। 63 जन्मों का प्यार है। लेकिन आप जानते हो कि माया से प्यार रखना है या बाप से? तो जहाँ बाप होगा वहाँ माया नहीं आयेगी। माया भाग जायेगी, हिम्मत ही नहीं होगी बाप के नजदीक आने की। कोई भी परिस्थिति आवे तो दिल से बाबा कहा, परिस्थिति भागी। अनुभव है ना! भगाना आता है या बिठाना आता है? उसको बिठाना नहीं। भगाओ, दूर से भगाओ। आ जावे फिर निकालने की मेहनत करो, वह भी नहीं करना। दूर से ही भगाओ। बाप का हाथ पकड़ लो तो देखेगी यह तो बाप का हाथ पकड़ा हुआ है तो भाग जायेगी। तो सदा मायाजीत। ठीक है ना! देखो आज नजदीक में तो बैठे हो ना। चांस तो मिला ना। अभी तो नहीं कहेंगे हमको तो कभी चांस नहीं मिला। मिल गया ना? बड़ा परिवार है तो बांटकर मिलता है। अच्छा तो सब खुशराजी। बापदादा का शब्द याद है ना - सदा। कभी कभी वाले नहीं, सदा। हॉस्पिटल वाले भी अच्छी मेहनत कर रहे हैं। हॉस्पिटल का कार्य भी बढ़ रहा है। अच्छा।

तीसरा ग्रुपमधुबन निवासी भाई-बहनों से

मधुबन निवासी अर्थात् कर्म में मधुरता और वृत्ति में बेहद का वैराग्य। वन में क्या होता है? बेहद का वैराग्य होता है ना! तो मधुबन निवासी अर्थात् एकस्ट्रा गिफ्ट के अधिकारी। गिफ्ट है ना! कितने निश्चिंत हो। अपनी ड्युटी बजाई और मौज में रहे। मदोगरी करनी है, जिज्ञासुओं को सम्भालना है, इससे तो फ्री हैं ना! ज्यादा में ज्यादा 8 घण्टा ड्यूटी। कम ही है। इतफाक कभी एक्स्ट्रा देनी पड़ती होगी। लेकिन और जिम्मेवारी तो नहीं है ना। चलो बिजली वाले को बिजली की जिम्मेवारी या जो भी ड्यूटी है, एक ही ड्युटी है ना। अनेक तो नहीं है। तो 8 घण्टा तो ड्यूटी के लिए बापदादा ने दिया है, कभी 12 घण्टा भी हो जाता होगा, तो भी 8 घण्टा आराम, अच्छा 12 घण्टा ड्यूटी तो भी 4 घण्टा तो बचता है। 12 घण्टा से ज्यादा तो ड्यूटी होगी नहीं। 12 घण्टे में तो सारा दिन आ गया। फिर कभी रात को करनी पड़ती होगी तो दिन में हल्का होगा। तो कम से कम 4 घण्टा पावरफुल योग रहता है? निरन्तर याद तो है ही लेकिन पावरफुल याद वह कम से कम 4 घण्टे है? तो मधुबन निवासियों को स्पेशल अटेन्शन रखना है कि हमें चारों ओर पावरफुल याद के वायब्रेशन फैलाने हैं क्योंकि आप ऊँचे-ते-ऊँचे स्थान पर बैठे हो। स्थान तो ऊँचा है ना! इससे ऊँचा तो कोई है नहीं। तो ऊँची टावर जो होती है, वह क्या करती है? सकाश देती है ना! लाइट माइट फैलाते हैं ना। तो कम से कम 4 घण्टे ऐसे समझो हम ऊंचे ते ऊंचे स्थान पर बैठ विश्व को लाइट और माइट दे रहा हूँ। यह तो आपको अच्छी तरह से अनुभव है कि मधुबन का वायब्रेशन चाहे कमजोरी का, चाहे पावर का - दोनों ही बहुत जल्दी फैलता है। अनुभव है ना! मधुबन में सुई भी गिरती है तो वह आवाज भी पहुंचता है क्योंकि मधुबन निवासियों की तरफ सबका अटेन्शन होता है। मधुबन वाले समझो विजय प्राप्त करने और कराने के निमित्त हैं। मधुबन की महिमा कितनी सुनते हो! मधुबन के गीत भी गाते हो ना। तो मधुबन के दीवारों की महिमा है या मधुबन निवासियों की महिमा है! किसकी महिमा है? आप सबकी। तो ऐसे अपनी जिम्मेवारी समझो। सिर्फ अपना काम किया, ड्यूटी पूरी की यह जिम्मेवारी नहीं। मधुबन का वायुमण्डल चारों ओर वायुमण्डल बनाता है। बापदादा को खुशी है कि आपस में संगठन बनाकर उन्नति के प्लैन वा रूहरिहान करते हैं। यह बहुत अच्छा है, इसको छोड़ना नहीं। संगठन में लाभ होता है और सारा दिन समझो कर्मणा किया, थोड़ा समय भी आपस में उन्नति की रूहरिहान करने से चेंज हो जाते हैं। उमंग-उत्साह भी बढ़ता है। तो बापदादा को यह अच्छा लगता है, जो ग्रुप बनाकर बैठते हो उसको हल्का नहीं करो और पावरफुल बनाओ। मिस भी नहीं करना चाहिए। आप समझो हमारे में तो ताकत है, हमने तो सब कुछ कर लिया है, नहीं। सहयोग देना भी सेवा है। बैठने की जरूरत नहीं हो, लेकिन बैठना - यह बहुत सेवा है। बापदादा ने समाचार सुना है, अच्छा है। इसको और बढ़ाओ। मुरली तो सुनते हो लेकिन मुरली सुनने के बाद कर्मणा में चले जाते हो तो बीच-बीच में कर्म कान्सेस भी हो जाते हो। कुछ योग लगाते हो, कुछ कर्म कान्सेस हो जाते हो। लेकिन आपस में ऐसी रूहरिहान करना - यह एक दो को रिफ्रेश करना है। वायुमण्डल को पावरफुल बनाना है। तो इस खुशखबरी पर बाबा बहुत खुश है।

अभी सबको कम से कम 4 घण्टे का चार्ट दादी को देना चाहिए। पसन्द है? 4 से 6 हो जाए तो कम नहीं करना। 6 हो जाए, 8 हो जाए बहुत अच्छा। लेकिन कम से कम 4 घण्टा, इकठ्ठा नहीं मिले कोई हर्जा नहीं। 5 मिनट 10 मिनट पावरफुल स्टेज बनाओ - टोटल में 4 घण्टा होना चाहिए। चाहे आधा घण्टा मिलता है, चाहे 5 मिनट मिलता है लेकिन जमा 4 घण्टा होना चाहिए। हो सकता है? जो समझते हैं हो सकता है वह हाथ उठाओ। अच्छा यह तो सभी एवररेडी हैं। बापदादा खुश है, हिम्मत बहुत अच्छी है। बापदादा एकस्ट्रा मदद देगा, हिम्मत नहीं हारना। हिम्मत रखेंगे तो परिवार की भी मदद, बड़ों का भी मन से सहयोग मिलेगा। और बापदादा तो एक का पदमगुणा देता ही है। तो सबको पसन्द है? अच्छा - 4 घण्टे से कम नहीं करना। एक दिन अगर 4 घण्टे नहीं हो तो दूसरे दिन 6 घण्टे करके 4 घण्टे पूरे करना। कर सकते हो? देखो, सोच समझकर हाँ करो। अभी प्रभाव में आकर हाँ नहीं करो। कर सकते हैं? (दादी से) देख रही हो ना। सभी ने हाथ उठाया है। इन्हों को तो मुबारक का इनाम है। एडवांस में मुबारक है। इनाम को छोड़ना नहीं। बहुत अच्छा।

बापदादा तो मधुबन निवासियों को सदा नयनों के सामने देखते हैं। नूरे रत्न देखते हैं। मधुबन निवासी बनना कोई छोटी सी बात नहीं है। मधुबन निवासी बनना अर्थात् अनेक गिफ्ट के अधिकारी बनना। देखो, स्थूल गिफ्ट भी मधुबन में बहुत मिलती है ना! और कितना स्वमान मिलता है। अगर मधुबन वाला कहाँ भी जाता है तो किस नजर से सभी देखते हैं? मधुबन वाला आया है। तो इतना अपना स्वमान सदा इमर्ज रखो। मर्ज नहीं, इमर्ज। ठीक है ना?

अभी बापदादा चार्ट पूछते रहेंगे? 15-15 दिन के बाद चार्ट की रिजल्ट देखेंगे। ठीक है ना! चार्ट में देना - हाँ या ना। ऊपर तारीख लिखना और नीचे हाँ ना, हाँ ना। बस दो या 3 या 4 घण्टा पावरफुल याद रही। बस, ज्यादा नहीं लिखना। पढ़ने का टाइम नहीं मिलता है ना। मधुबन निवासियों से सभी का प्यार है और आप लोगों को कितनी दुआयें मिलती हैं। जो आई.पी. भी आते हैं, योग शिविर में आते हैं, कांफ्रेंस में आते हैं तो मधुबन की सेवा देख करके दुआयें तो देते हैं ना। हर एक के दिल से निकलता है - वाह सेवाधारी वाह! तो दुआयें भी तो जमा हो रही हैं। तो कमाल करके दिखाना। मधुबन वालों का रिकार्ड 4 घण्टे का जरूर हो, ज्यादा भी हो तो और अच्छा। यही प्रवृत्ति वालों को, सेन्टर वालों को, सभी को पावरफुल बनायेगा। निमित्त आप बनो। अच्छा। खुशराजी हैं, यह पूछने की आवश्यकता है? या खुश रहते ही हो, पूछने की आवश्यकता है? खुश तो सभी हैं ही। सभी के चेहरे देखो, सभी के दांत निकले हुए हैं। बहुत अच्छे हो। अपनी विशेषता देखो और उसको कार्य में लगाओ।

विशेष मधुबन की बहिनों से बात कर रहे हैं। बापदादा सब देखते हैं। बापदादा से कुछ छिपता नहीं है। अन्दर का भी देखता है, तो बाहर का भी देखता है। मधुबन की बहिनें विशेष अपनी-अपनी विशेषता को कार्य में लगाओ। हर एक में विशेषतायें हैं, ऐसे नहीं कोई विशेषता नहीं है। सभी में हैं। सिर्फ उसको कार्य में लगाने से वृद्धि को प्राप्त होती जायेंगी। औरों की भी विशेषता देखो और अपनी विशेषता कार्य में लगाओ। कम नहीं हैं। सभी क्या बुलाते हैं! मधुबन की बहिनें। मधुबन नाम आने से ही कितनी खुशी हो जाती है। तो मधुबन की बहिनें कम नहीं हैं। सभी के दुआओं की पात्र हो। पुण्य का खाता जितना बनाने चाहो उतना बना सकते हो। चांस है। समय को जितना सफल करने चाहो उतना कर सकते हो। चांस तो है ना! या चांस नहीं मिलता है? चांस आपेही लो, चांस ऐसे नहीं मिलेगा। कोई कहे हाँ यह करो, नहीं। चांस लो। चांस लेने से क्या बन जायेंगे? चांसलर। मधुबन वाले भाग्यवान तो हैं ही लेकिन अपने भाग्य को कार्य में लगाओ। समझा। बहिनें हैं सिकीलधी और भाई हैं बहुत। सिकीलधी हैं ना! बहुत अच्छा है। अभी 4 घण्टे में पहला नम्बर बहिनें आनी चाहिए। ऐसे नहीं कहना - यह हो गया ना। यह होना नहीं चाहिए ना! यह नहीं। करना ही है। पक्का! इन्हों की फोटो निकालो।

अच्छा। ओम् शान्ति।



15-03-99   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


कर्मातीत अवस्था तक पहुंचने के लिए कन्ट्रोलिंग पावर को बढ़ाओ, स्वराज्य अधिकारी बनो

आज बापदादा चारों ओर के अपने राज दुलारे परमात्म प्यारे बच्चों को देख रहे हैं। यह परमात्म दुलार वा परमात्म प्यार बहुत थोड़े बच्चों को प्राप्त होता है। बहुत थोड़े ऐसे भाग्य के अधिकारी बनते हैं। ऐसे भाग्यवान बच्चों को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। राज दुलारे अर्थात् राजा बच्चे। तो अपने को राजा समझते हो? नाम ही है राजयोगी। तो राजयोगी अर्थात् राजे बच्चे। वर्तमान समय भी राजे हो और भविष्य में भी राजे हो। अपना डबल राज्य पद अनुभव करते हो ना? अपने आपको देखो कि मैं राजा हूँ? स्वराज्य अधिकारी हूँ? हर एक राज्य-कारोबारी आपके आर्डर में कार्य कर रहे हैं? राजा की विशेषता क्या होती है, वह तो जानते हो ना? रूलिंग पावर और कन्ट्रोलिंग पावर दोनों पावर आपके पास हैं? अपने आपसे पूछो कि राज्य कारोबारी सदा कन्ट्रोल में चल रहे हैं?

बापदादा आज बच्चों की कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर चेक कर रहे थे, तो बताओ क्या देखा होगा? हर एक जानते तो हैं। बापदादा ने देखा कि अभी भी अखण्ड राज्य अधिकार सभी का नहीं है। अखण्ड, बीच-बीच में खण्डित होता है। क्यों? सदा स्वराज्य के बदले पर राज्य भी खण्डित कर देता है। पर राज्य की निशानी है - यह कर्मेन्द्रियां पर-अधीन हो जाती हैं। माया के राज्य का प्रभाव अर्थात् पर-अधीन बनाना। वर्तमान समय मैजारिटी तो ठीक हैं लेकिन मैजारिटी माया के वर्तमान समय के विशेष प्रभाव में आ जाते हैं। जो आदि अनादि संस्कार हैं उसके बीच-बीच में मध्य के अर्थात् द्वापर से अभी अन्त तक के संस्कार के प्रभाव में आ जाते हैं। स्व के संस्कार ही स्वराज्य को खण्डित कर देते हैं। उसमें भी विशेष संस्कार व्यर्थ सोचना, व्यर्थ समय गँवाना और व्यर्थ बोल-चाल में आना, चाहे सुनना, चाहे सुनाना। एक तरफ व्यर्थ के संस्कार, दूसरे तरफ अलबेलेपन के संस्कार भिन्न-भिन्न रॉयल रूप में स्वराज्य को खण्डित कर देते हैं। कई बच्चे कहते हैं कि समय समीप आ रहा है लेकिन जो संस्कार शुरू में इमर्ज नहीं थे, वह अभी कहाँ-कहाँ इमर्ज हो रहे हैं। वायुमण्डल में संस्कार और इमर्ज हो रहे हैं, इसका कारण क्या? यह माया के वार का एक साधन है। माया इसी से अपना बनाकर परमात्म मार्ग से दिलशिकस्त बना देती है। सोचते हैं कि अभी तक ऐसे ही है तो पता नहीं समानता की सफलता मिलेगी या नहीं मिलेगी! कोई-न-कोई बात में जहाँ कमजोरी होगी, उसी कमजोरी के रूप में माया दिलशिकस्त बनाने की कोशिश करती है। बहुत अच्छा चलते-चलते कोई न कोई बात में माया संस्कार पर अटैक कर, पुराने संस्कार इमर्ज करने का रूप रखकर दिलशिकस्त करने की कोशिश करती है। लास्ट में सब संस्कार समाप्त होने हैं इसलिए कभी-कभी रहे हुए संस्कार इमर्ज हो जाते हैं। लेकिन बापदादा आप सभी भाग्यवान बच्चों को इशारा दे रहे हैं - घबराओ नहीं, माया की चाल को समझ जाओ। आलस्य और व्यर्थ - इसमें निगेटिव भी आ जाता है - इन दोनों बातों पर विशेष अटेन्शन रखो। समझ जाओ कि यह माया का वर्तमान समय वार करने का साधन है।

बाप के साथ का अनुभव, कम्बाइन्ड-पन का अनुभव इमर्ज करो। ऐसे नहीं कि बाप तो है ही मेरा, साथ है ही है। साथ का प्रैक्टिकल अनुभव इमर्ज हो। तो यह माया का वार, वार नहीं होगा, माया हार खा लेगी। यह माया की हार है, वार नहीं है। सिर्फ घबराओ नहीं, क्या हो गया, क्यों हो गया! हिम्मत रखो, बाप के साथ को स्मृति में रखो। चेक करो कि बाप का साथ है? साथ का अनुभव मर्ज रूप में तो नहीं है? नॉलेज है कि बाप साथ है, नॉलेज के साथसाथ बाप की पावर क्या है? ऑलमाइटी अथॉरिटी है तो सर्व शक्तियों की पावर इमर्ज रूप में अनुभव करो। इसको कहा जाता है बाप के साथ का अनुभव होना। अलबेले नहीं बन जाओ - बाप के सिवाए और है ही कौन, बाप ही तो है। जब बाप ही है तो वह पावर है? जैसे दुनिया वालों को कहते हो अगर परमात्मा व्यापक है तो परमात्म गुण अनुभव होने चाहिए, दिखाई देने चाहिए। तो बापदादा भी आपको पूछते हैं कि अगर बाप साथ है, कम्बाइन्ड है तो वह पावर हर कर्म में अनुभव होती है? दूसरों को भी अनुभव होती है? क्या समझते हो? डबल फॉरेनर्स क्या समझते हो? पावर है? सदा है? पहले क्वेश्चन में तो सब हाँ कर देते हैं। फिर जब दूसरा क्वेश्चन आता है, सदा है? तो सोच में पड़ जाते हैं। तो अखण्ड तो नहीं हुआ ना! आप चैलेन्ज क्या करते हो? अखण्ड राज्य स्थापन कर रहे हो या खण्डित राज्य स्थापन कर रहे हो? क्या कर रहे हो? अखण्ड है ना! टीचर्स बोलो अखण्ड है? तो अभी चेक करो अखण्ड स्वराज्य है? राज्य अर्थात् प्रालब्ध सदा का लेना है या बीच-बीच में कट हो जाए तो कोई हर्जा नहीं? ऐसे चाहते हो? लेने में तो सदा चाहिए और पुरूषार्थ में कभी-कभी चलता है, ऐसे? फॉरेनर्स को कहा था ना कि अपने जीवन की डिक्शनरी से समटाइम और समथिंग शब्द निकाल दो। अभी समटाइम खत्म हुआ? जयन्ती बोलो। रिजल्ट देंगी ना। तो समटाइम खत्म है? जो समझते हैं, समटाइम शब्द सदा के लिए समाप्त हो गया, वह हाथ उठाओ। खत्म हो गया या खत्म होगा? लम्बा हाथ उठाओ। वतन की टी.वी. में तो आपके हाथ आ गये, यहाँ की टी.वी. में सभी के नहीं आते। यह कलियुगी टी.वी. है ना, वहाँ जादू की टी.वी. है इसलिए आ जाता है। बहुत अच्छा फिर भी बहुतों ने उठाया है, उन्हों को सदाकाल की मुबारक हो। अच्छा। अभी भारतवासी जिसका प्रैक्टिकल सदाकाल स्वराज्य है, सर्व कर्मेन्द्रियां लॉ और आर्डर में हैं, वह हाथ उठाओ। पक्का हाथ उठाना, कच्चा नहीं। सदा याद रखना कि सभा में हाथ उठाया है। फिर बापदादा को बातें बहुत मीठी-मीठी बताते हैं। कहते हैं बाबा आप तो जानते हो ना, कभी-कभी माया आ जाती है ना! तो अपने हाथ की लाज़ रखना। अच्छा है। फिर भी हिम्मत रखी है तो हिम्मत नहीं हारना। हिम्मत पर बापदादा की मदद है ही है।

आज बापदादा ने देखा कि वर्तमान समय के अनुसार अपने ऊपर, हर कर्मेन्द्रियों के ऊपर अर्थात् स्वयं की स्वयं प्रति जो कन्ट्रोलिंग पावर होनी चाहिए वह कम है, वह और ज्यादा चाहिए। बापदादा बच्चों की रूहरिहान सुन मुस्करा रहे थे, बच्चे कहते हैं कि पावरफुल याद के चार घण्टे होते नहीं हैं। बापदादा ने आठ घण्टे से 4 घण्टा किया और बच्चे कहते हैं दो घण्टा ठीक है। तो बताओ कन्ट्रोलिंग पावर हुई? और अभी से अगर यह अभ्यास नहीं होगा तो समय पर पास विद आनर, राज्य अधिकारी कैसे बन सकेंगे! बनना तो है ना? बच्चे हँसते हैं। आज बापदादा ने बच्चों की बातें बहुत सुनी हैं। बापदादा को हँसाते भी हैं, कहते हैं ट्रैफिक कन्ट्रोल 3 मिनट नहीं होता, शरीर का कन्ट्रोल हो जाता है, खड़े हो जाते हैं, नाम है मन के कन्ट्रोल का लेकिन मन का कन्ट्रोल कभी होता, कभी नहीं भी होता। कारण क्या है? कन्ट्रोलिंग पावर की कमी। इसे अभी और बढ़ाना है। आर्डर करो, जैसे हाथ को ऊपर उठाना चाहो तो उठा लेते हो। क्रेक नहीं है तो उठा लेते हो ना! ऐसे मन, यह सूक्ष्म शक्ति कन्ट्रोल में आनी है। लाना ही है। ऑर्डर करो - स्टॉप तो स्टॉप हो जाए। सेवा का सोचो, सेवा में लग जाए। परमधाम में चलो, तो परमधाम में चला जाये। सूक्ष्मवतन में चलो, सेकण्ड में चला जाए। जो सोचो वह आर्डर में हो। अभी इस शक्ति को बढ़ाओ। छोटे-छोटे संस्कारों में, युद्ध में समय नहीं गंवाओ, आज इस संस्कार को भगाया, कल उसको भगाया। कन्ट्रोलिंग पावर धारण करो तो अलग-अलग संस्कार पर टाइम नहीं लगाना पड़ेगा। नहीं सोचना है, नहीं करना है, नहीं बोलना है। स्टॉप। तो स्टॉप हो जाए। यह है कर्मातीत अवस्था तक पहुंचने की विधि। तो कर्मातीत बनना है ना? बापदादा भी कहते हैं आप को ही बनना है। और कोई नहीं आयेंगे, आप ही हो। आपको ही साथ में ले जायेंगे लेकिन कर्मातीत को ले जायेंगे ना। साथ चलेंगे या पीछे-पीछे आयेंगे? (साथ चलेंगे) यह तो बहुत अच्छा बोला। साथ चलेंगे, हिसाब चुक्तू करेंगे? इसमें हाँ जी नहीं बोला। कर्मातीत बनके साथ चलेंगे ना। साथ चलना अर्थात् साथी बनकर चलना। जोड़ी तो अच्छी चाहिए या लम्बी और छोटी? समान चाहिए ना! तो कर्मातीत बनना ही है। तो क्या करेंगे? अभी अपना राज्य अच्छी तरह से सम्भालो। रोज अपनी दरबार लगाओ। राज्य अधिकारी हो ना! तो अपनी दरबार लगाओ, कर्मचारियों से हालचाल पूछो। चेक करो ऑडर में हैं? ब्रह्मा बाप ने भी रोज़ दरबार लगाई है। कापी है ना। इन्हों को बताना, दिखाना। ब्रह्मा बाप ने भी मेहनत की, रोज़ दरबार लगाई तब कर्मातीत बनें। तो अभी कितना टाइम चाहिए? या एवररेडी हो? इस अवस्था से सेवा भी फास्ट होगी। क्यों? एक ही समय पर मन्सा शक्तिशाली, वाचा शक्तिशाली, संबंध-सम्पर्क में चाल और चेहरा शक्तिशाली। एक ही समय पर तीनों सेवा बहुत फास्ट रिजल्ट निकालेगी। ऐसे नहीं समझो कि इस साधना में सेवा कम होगी, नहीं। सफलता सहज अनुभव होगी। और सभी जो भी सेवा के निमित्त हैं अगर संगठित रूप में ऐसी स्टेज बनाते हैं तो मेहनत कम और सफलता ज्यादा होगी। तो विशेष अटेन्शन कन्ट्रोलिंग पावर को बढ़ाओ। संकल्प, समय, संस्कार सब पर कन्ट्रोल हो। बहुत बार बापदादा ने कहा है - आप सब राजे हो। जब चाहो जैसे चाहो, जहाँ चाहो, जितना समय चाहो ऐसा मन बुद्धि लॉ और आर्डर में हो। आप कहो नहीं करना है, और फिर भी हो रहा है, कर रहे हैं तो यह लॉ और आर्डर नहीं है। तो स्वराज्य अधिकारी अपने राज्य को सदा प्रत्यक्ष स्वरूप में लाओ। लाना है ना? ला भी रहे हैं लेकिन बापदादा ने कहा ना - सदा शब्द एड करो। बापदादा अभी लास्ट में आयेंगे, अभी एक टर्न है। एक टर्न में रिजल्ट पूछेंगे। 15 दिन होते हैं ना। तो 15 दिन में कुछ तो दिखायेंगे या नहीं? टीचर्स बोलो, 15 दिन में रिजल्ट होगी?

अच्छा - मधुबन वाले 15 दिन में रिजल्ट दिखायेंगे। अभी कहो हाँ या ना! अभी हाथ उठाओ। (सभी ने हाथ उठाया) अपने हाथ की लाज़ रखना। जो समझते हैं कोशिश करेंगे, ऐसे कोशिश वाले हाथ उठाओ। ज्ञान सरोवर, शान्तिवन वाले उठो। (बापदादा ने मधुबन, ज्ञानसरोवर, शान्तिवन के मुख्य निमित्त भाई बहिनों को सामने बुलाया)

बापदादा ने तो आप सबका साक्षात्कार कराने के लिए बुलाया है। आप लोगों को देखकर सभी खुश होते हैं। अभी बापदादा चाहते क्या हैं, वह बता रहे हैं। चाहे पाण्डव भवन, चाहे शान्तिवन, चाहे ज्ञान सरोवर, चाहे हॉस्पिटल चार धाम तो हैं। पांचवा छोटा है। चारों में ही बापदादा की एक आश है - बापदादा तीन मास के लिए चारों धाम में अखण्ड, निर्विघ्न, अटल स्वराज्यधारी, राजाओं का रिजल्ट देखने चाहते हैं। तीन मास यहाँ वहाँ से कोई भी और बातें नहीं सुनने में आवें। सब स्वराज्य अधिकारी नम्बरवन, क्या तीन मास की ऐसी रिजल्ट हो सकती है? (निर्वैर भाई से) - पाण्डवों की तरफ से आप हो। हो सकता है? दादी तो है लेकिन साथ में यह जो सामने बैठे हैं, सब हैं। तो हो सकता है? (दादी कहती है हो सकता है।) जो पाण्डव भवन वाले बैठे हैं वह हाथ उठाओ, हो सकता है। अच्छा मानो कोई कमजोर है, उसका कुछ हो जाता है फिर आप क्या करेंगे? आप समझते हो कि साथ वालों को भी साथ देते हुए रिजल्ट निकालेंगे, इतनी हिम्मत रखते हो? हो सकता है या सिर्फ अपनी हिम्मत है? दूसरों की बात को भी समा सकते हो? उसकी गलती समा सकते हो? वायुमण्डल में फैलाओ नहीं, समा दो, इतना कर सकते हो? जोर से बोलो हाँ जी। मुबारक हो। 3 मास के बाद रिपोर्ट देखेंगे। किसी भी स्थान से कोई भी रिपोर्ट नहीं निकलनी चाहिए। एक दो को वायब्रेशन दे समा देना और प्यार से वायब्रेशन देना। झगड़ा नहीं हो।

ऐसे ही डबल विदेशी भी रिजल्ट देंगे ना। सभी को बनना है ना। डबल विदेशी जो समझते हैं अपने सेन्टर पर, साथियों के साथ 3 मास की रिजल्ट निकालेंगे, वह हाथ उठाओ। जो समझते हैं कोशिश करेंगे, कह नहीं सकते, वह कोई हैं तो हाथ उठा लो। साफ दिल हैं, साफ दिल वालों को मदद मिलती है। अच्छा।(फिर बापदादा ने सभी ज़ोन के भाई बहिनों से भी हाथ उठवाये तथा अपने स्थान पर खड़ा किया। पहले महाराष्ट्र, दिल्ली, कनार्टक के भाई बहिनों को खड़ा किया और वायदा कराया। फिर यू.पी. वालों को सेवा की मुबारक दी। )

यू.पी.:- (1600 हैं) पहले यू.पी. वालों को सेवा की मुबारक है। सभी ने अच्छी हिम्मत कर सेवा में अपना तन, मन, समय और धन भी सफल किया और पुण्य का खाता जमा किया इसलिए सभी की दुआयें सेवा का फल स्वत: ही मिलता है। तो अच्छा किया, हिम्मत की और सफलता प्राप्त की, इसलिए मुबारक हो। और सबकी दुआयें भी हैं। अच्छा - जो समझते हैं कि रिजल्ट निकालनी ही है, तो हाँ जी करो। जो समझते हैं कोशिश करके देखेगे वह खड़े रहो बाकी बैठ जाओ।

(इसके बाद गुजरात, इन्दौर, पंजाब, इस्टर्न- (नेपाल, आसाम, उड़ीसा, बंगालबिहार) राजस्थान, भोपाल, आगरा, तामिलनाडू आदि सभी ज़ोन वालों को बापदादा ने सभा में खड़ा करके वायदे कराये।)

मैजारिटी तो उमंग-उत्साह में हैं बाकी जिन्होंने कोशिश में हाथ उठाया, वह भी राइट हैं। लेकिन बापदादा कहते हैं हिम्मत रखने से, दृढ़ संकल्प करने से सब अच्छा हो जाता है। मास्टर सर्वशक्तिवान बन अगर संकल्प करो तो क्या नहीं कर सकते हो। जब विश्व को परिवर्तन कर सकते हो तो क्या अपने को नहीं कर सकते हो! इसीलिए जिन्होंने हाँ की है उनको बापदादा यही कहते हैं कि सदा यह संकल्प अमृतवेले इमर्ज करना कि हमें निर्विघ्न रहना ही है और कोशिश वाले सदा अमृतवेले योग के बाद यह दृढ़ संकल्प रिवाइज करो कि हिम्मते बच्चे मददे बाप है। तो इससे कोशिश करने के बजाए सफलता अनुभव करते जायेंगे। बाकी बापदादा सभी बच्चों के रिजल्ट को देख खुश तो सदा है ही फिर भी हिम्मत के ऊपर विशेष मुबारक दे रहे हैं। तीन मास का अभ्यास सदाकाल का अनुभवी बना देगा। अगर अपने उमंग-उत्साह से किया तो। मजबूरी से किया 3 मास पास करने हैं, फिर तो सदाकाल का नहीं होगा। लेकिन उमंग-उत्साह से किया तो सदाकाल के लिए अनादि अविनाशी संस्कार इमर्ज हो जायेंगे। समझा। अच्छा

चारों ओर के सर्व स्वराज्य अधिकारी आत्माओं को, सदा अखण्ड राज्य के पात्र आत्माओं को, सदा बाप के समान कर्मातीत स्थिति में पहुंचने वाले, बाप को फॉलो करने वाले तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा एक दो को शुभ भावना, शुभ कामना का सहयोग देने वाले शुभाचिंतक बच्चों को यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से

आप निमित्त बनी हुई आत्माओं के अन्दर जो तीव्र पुरूषार्थ का संकल्प इमर्ज रहता है वह औरों को भी बल देकर च्ला रहा है। दिलशिकस्त आत्माओं में बल भर रहा है। और सभी नया उमंग लेकर जाते हैं। चाहे कुछ भी हो, थोड़ी बहुत खिटपिट तो होती है परन्तु अपने पुरूषार्थ का उमंग मैजारिटी ले जाते हैं। इसलिए धीरे-धीरे सब ठीक हो रहा है, हो जायेगा। कम नहीं होगा, बढ़ता जायेगा। अच्छा है बापदादा को नाज़ है कि ब्रह्मा बाप के साथी बच्चे अच्छा साथ निभा रहे हैं। कम नहीं हैं। साथ निभाने में अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। तो बापदादा दोनों ही अपने साथ निभाने वाले साथी बच्चों को बार-बार मुबारक क्या देंगे, दुआयें देते रहते हैं। अच्छा पार्ट बजा रहे हो। साकार में स्तम्भ बन गये हैं, जिसके आधार पर सब आगे चल रहे हैं। इसलिए आप लोगों को सहज पुरूषार्थ है, दुआओं से आपका खाता बहुत-बहुत बढ़ रहा है। अच्छा है।

(18 तारीख को दादी का छोटा आपरेशन है) पता है, क्या है, कुछ नहीं है। हुआ पड़ा है कोई ऐसी बात नहीं है। खिटखिट से निकाल देना अच्छा है। आगे भी तो सेवा करनी है ना। मुख्य पार्टधारी हैं तो उसकी ज्यादा सम्भाल की जाती है। चलाना नहीं पड़ता है। ध्यान देना ही पड़ता है। कुछ नहीं है। अच्छा - ओम् शान्ति।



30-03-99   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


तीव्र पुरूषार्थ की लगन को ज्वाला रूप बनाकर बेहद के वैराग्य की लहर फैलाओ

आज बापदादा हर एक बच्चे के मस्तक पर तीन लकीरें देख रहे हैं। जिसमें एक लकीर है - परमात्म पालना के भाग्य की लकीर। यह परमात्म पालना का भाग्य सारे कल्प में अब एक बार ही मिलता है, सिवाए इस संगमयुग के यह परमात्म पालना कभी भी नहीं प्राप्त हो सकती। यह परमात्म पालना बहुत थोड़े बच्चों को प्राप्त होती है। दूसरी लकीर है - परमात्म पढ़ाई के भाग्य की लकीर। परमात्म पढ़ाई यह कितना भाग्य है जो स्वयं परम आत्मा शिक्षक बन पढ़ा रहे हैं। तीसरी लकीर है - परमात्म प्राप्तियों की लकीर। सोचो कितनी प्राप्तियां हैं। सभी को याद है ना - प्राप्तियों की लिस्ट कितनी लम्बी है! तो हर एक के मस्तक में यह तीन लकीर चमक रही हैं। ऐसे भाग्यवान आत्मायें अपने को समझते हो? पालना, पढ़ाई और प्राप्तियां। साथ-साथ बापदादा बच्चों के निश्चय के आधार पर रूहानी नशे को भी देख रहे हैं। हर एक परमात्म बच्चा कितना रूहानी नशे वाली आत्मायें हैं! सारे विश्व में और सारे कल्प में सबसे हाइएस्ट भी हैं, महान भी हैं और होलीएस्ट भी हैं। आप जैसी पवित्र आत्मायें तन से भी, मन से भी देव रूप में सर्व गुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी और कोई बनता नहीं है। और फिर हाइएस्ट भी हो, होलीएस्ट भी हो साथ-साथ रिचेस्ट भी हो। बापदादा स्थापना में भी बच्चों को स्मृति दिलाते थे और फलक से अखबारों में भी डलवाया कि ओम मण्डली रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। यह स्थापना के समय की आप सबकी महिमा है। एक दिन में कितना भी बड़े ते बड़ा मल्टी-मल्टी मिल्युनर हो लेकिन आप जैसा रिचेस्ट हो नहीं सकता। इतना रिचेस्ट बनने का साधन क्या है? बहुत छोटा सा साधन है। लोग रिचेस्ट बनने के लिए कितनी मेहनत करते हैं और आप कितना सहज मालामाल बनते जाते हो। जानते हो ना साधन! सिर्फ छोटी सी बिन्दी लगानी है बस। बिन्दी लगाई, कमाई हुई। आत्मा भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और ड्रामा फुलस्टाप लगाना, वह भी बिन्दी है। तो बिन्दी आत्मा को याद किया, कमाई बढ़ गई। वैसे लौकिक में भी देखो, बिन्दी से ही संख्या बढ़ती है। एक के आगे बिन्दी लगाओ तो क्या हो जाता? 10, दो बिन्दी लगाओ, तीन बिन्दी लगाओ, चार बिन्दी लगाओ, बढ़ता जाता है। तो आपका साधन कितना सहज है! मैं आत्मा हूँ - यह स्मृति की बिन्दी लगाना अर्थात् खज़ाना जमा होना। फिर बाप बिन्दी लगाओ और खज़ाना जमा। कर्म में, सम्बन्ध-सम्पर्क में ड्रामा का फुलस्टाप लगाओ, बीती को फुलस्टाप लगाया और खज़ाना बढ़ जाता। तो बताओ सारे दिन में कितने बार बिन्दी लगाते हो? और बिन्दी लगाना कितना सहज है! मुश्किल है क्या? बिन्दी खिसक जाती है क्या?

बापदादा ने कमाई का साधन सिर्फ यही सिखाया है कि बिन्दी लगाते जाओ, तो सभी को बिन्दी लगाने आती है? अगर आती है तो एक हाथ की ताली बजाओ। पक्की है ना! या कभी खिसक जाती है, कभी लग जाती है? सबसे सहज बिन्दी लगाना है। कोई इस आंखों से ब्लाइन्ड भी हो, वह भी अगर कागज पर पेन्सिल रखेगा तो बिन्दी लग जाती है और आप तो त्रिनेत्री हो, इसलिए इन तीन बिन्दियों को सदा यूज़ करो। क्वेश्चन मार्क कितना टेढ़ा है, लिखकर देखो, टेढ़ा है ना? और बिन्दी कितनी सहज है। इसलिए बापदादा भिन्न-भिन्न रूप से बच्चों को समान बनाने की विधि सुनाते रहते हैं। विधि है ही बिन्दी। और कोई विधि नहीं है। अगर विदेही बनते हो तो भी विधि है - बिन्दी बनना। अशरीरी बनते हो, कर्मातीत बनते हो, सबकी विधि बिन्दी है। इसलिए बापदादा ने पहले भी कहा है - अमृतवेले बापदादा से मिलन मनाते, रूहरिहान करते जब कार्य में आते हो तो पहले तीन बिन्दियों का तिलक मस्तक पर लगाओ, वह लाल बिन्दियों का तिलक लगाने नहीं शुरू करना लेकिन स्मृति का तिलक लगाओ। और चेक करो - किसी भी कारण से यह स्मृति का तिलक मिटे नहीं। अविनाशी, अमिट तिलक है?

बापदादा बच्चों का प्यार भी देखते हैं, कितने प्यार से भाग-भाग कर मिलन मनाने पहुंचते हैं और फिर आज हाल में भी मिलन मनाने के लिए कितनी मेहनत से, कितने प्यार से नींद, प्यास को भूलकर पहले नम्बर में नजदीक बैठने का पुरूषार्थ करते हैं। बापदादा सब देखते हैं, क्या-क्या करते हैं वह सारा ड्रामा देखते हैं। बापदादा बच्चों के प्यार पर न्योछावर भी होते हैं और यह भी बच्चों को कहते हैं जैसे साकार में मिलने के लिए दौड़-दौड़ कर आते हो ऐसे ही बाप समान बनने के लिए भी तीव्र पुरूषार्थ करो, इसमें सोचते हो ना कि सबसे आगे ते आगे नम्बर मिले। सबको तो मिलता नहीं है, यहाँ साकारी दुनिया है ना! तो साकारी दुनिया के नियम रखने ही पड़ते हैं। बापदादा उस समय सोचते हैं कि सब आगे-आगे बैठ जाएं लेकिन यह हो सकता है? हो भी रहा है, कैसे? पीछे वालों को बापदादा सदा नयनों में समाया हुआ देखते हैं। तो सबसे समीप हैं नयन। तो पीछे नहीं बैठे हो लेकिन बापदादा के नयनों में बैठे हो। नूरे रत्न हो। पीछे वालों ने सुना? दूर नहीं हो, समीप हो। शरीर से पीछे बैठे हैं लेकिन आत्मा सबसे समीप है। और बापदादा तो सबसे ज्यादा पीछे वालों को ही देखते हैं। देखो नजदीक वालों को इन स्थूल नयनों से देखने का चांस है और पीछे वालों को इन नयनों से नजदीक देखने का चांस नहीं है इसलिए बापदादा नयनों में समा लेता है।

बापदादा मुस्कराते रहते हैं, दो बजता है और लाइन शुरू हो जाती है। बापदादा समझते हैं कि बच्चे खड़े-खड़े थक भी जाते हैं लेकिन बापदादा सभी बच्चों को प्यार का मसाज़ कर देते हैं। टांगों में मसाज़ हो जाता है। बापदादा का मसाज़ देखा है ना - बहुत न्यारा और प्यारा है। तो आज सभी इस सीज़न का लास्ट चांस लेने के लिए चारों ओर से भाग-भागकर पहुंच गये हैं। अच्छा है। बाप से मिलन का उमंग-उत्साह सदा आगे बढ़ाता है। लेकिन बापदादा तो बच्चों को एक सेकण्ड भी नहीं भूलता है। बाप एक है और बच्चे अनेक परन्तु अनेक बच्चों को भी एक सेकण्ड भी नहीं भूलते क्योंकि सिकीलधे हो। देखो कहाँ-कहाँ देश-विदेश के कोने-कोने से बाप ने ही आपको ढूंढा। आप बाप को ढूंढ सके? भटकते रहे लेकिन मिल नहीं सके और बाप ने भिन्न-भिन्न देश, गांव, कस्बे जहाँ-जहाँ भी बाप के बच्चे हैं, वहाँ से ढूंढ लिया। अपना बना लिया। गीत गाते हो ना - मैं बाबा का और बाबा मेरा। न जाति देखी, न देश देखा, न रंग देखा, सबके मस्तक पर एक ही रूहानी रंग देखा - ज्योति बिन्दु। डबल फॉरेनर्स क्या समझते हैं? बाप ने जाति देखी? काला है, गोरा है, श्याम है, सुन्दर है? कुछ नहीं देखा। मेरा है - यह देखा। तो बताओ बाप का प्यार है या आपका प्यार है? किसका है? (दोनों का है) बच्चे भी उत्तर देने में होशियार हैं, कहते हैं बाबा आप ही कहते हो कि प्यार से प्यार खींचता है, तो आपका प्यार है तो हमारा है तब तो खींचता है। बच्चे भी होशियार हैं और बाप को खुशी है कि इतना हिम्मत, उमंग-उत्साह रखने वाले बच्चे हैं।

बापदादा के पास 15 दिन के चार्ट का बहुत बच्चों का रिजल्ट आया है। एक बात तो बापदादा ने चारों ओर की रिजल्ट में देखी कि मैजॉरिटी बच्चों का अटेन्शन रहा है। परसेन्टेज़ जितनी स्वयं भी चाहते हैं उतनी नहीं है, परन्तु अटेन्शन है और दिल ही दिल में जो तीव्र पुरुषार्थी बच्चे हैं वह अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लक्ष्य से आगे बढ़ भी रहे हैं। और आगे बढ़ते-बढ़ते मंजिल पर पहुंच ही जायेंगे। मैनारिटी अभी भी कभी अलबेलेपन में और कभी आलस्य के वश अटेन्शन भी कम दे रहे हैं। उन्हों का एक विशेष स्लोगन है - हो ही जायेंगे, जायेंगे.... जाना है नहीं, जायेंगे। हो ही जायेगा - यह है अलबेलापन। जाना ही है, यह है तीव्र पुरूषार्थ। बापदादा वायदे बहुत सुनते हैं, बार-बार वायदे बहुत अच्छे करते हैं। बच्चे वायदे इतनी अच्छी हिम्मत से करते हैं जो उस समय बापदादा को भी बच्चे दिलखुश मिठाई खिला देते हैं। बाप भी खा लेते हैं। लेकिन वायदा अर्थात् पुरूषार्थ में ज्यादा से ज्यादा फायदा। अगर फायदा नहीं तो वायदा समर्थ नहीं है। तो वायदा भले करो फिर भी दिलखुश मिठाई तो खिलाते हो ना! साथ-साथ तीव्र पुरूषार्थ की लगन को अग्नि रूप में लाओ। ज्वालामुखी बनो। समय प्रमाण रहे हुए जो भी मन के, सम्बन्ध-सम्पर्क के हिसाब-किताब हैं उसको ज्वाला स्वरूप से भस्म करो। लगन है, इसमें बापदादा भी पास करते हैं लेकिन अभी लगन को अग्नि रूप में लाओ।

विश्व में एक तरफ भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि होगी, दूसरे तरफ आप बच्चों का पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि ज्वाला रूप में आवश्यक है। यह ज्वाला रूप इस भ्रष्टाचार, अत्याचार के अग्नि को समाप्त करेगी और सर्व आत्माओं को सहयोग देगी। आपकी लगन ज्वाला रूप की हो अर्थात् पावरफुल योग हो, तो यह याद की अग्नि, उस अग्नि को समाप्त करेगी और दूसरे तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश की, शीतल स्वरूप की अनुभूति करायेगी। बेहद की वैराग्य वृत्ति प्रज्वलित करायेगी। एक तरफ भस्म करेगी दूसरे तरफ शीतल भी करेगी। बेहद के वैराग्य की लहर फैलायेगी। बच्चे कहते हैं - मेरा योग तो है, सिवाए बाबा के और कोई नहीं, यह बहुत अच्छा है। परन्तु समय अनुसार अभी ज्वाला रूप बनो। जो यादगार में शक्तियों का शक्ति रूप, महाशक्ति रूप, सर्व शस्त्रधारी दिखाया है, अभी वह महा शक्ति रूप प्रत्यक्ष करो। चाहे पाण्डव हैं, चाहे शक्तियां हैं, सभी सागर से निकली हुई ज्ञान नदियां हो, सागर नहीं हो, नदी हो। ज्ञान गंगाये हो। तो ज्ञान गंगायें अब आत्माओं को अपने ज्ञान की शीतलता द्वारा पापों की आग से मुक्त करो। यह है वर्तमान समय का ब्राह्मणों का कार्य।

सभी बच्चे पूछते हैं कि इस साल क्या सेवा करें? तो बापदादा पहली सेवा यही बताते हैं कि अभी समय अनुसार सभी बच्चे वानप्रस्थ अवस्था में हैं, तो वानप्रस्थी अपने समय, साधन सभी बच्चों को देकर स्वयं वानप्रस्थ होते हैं। तो आप सभी भी अपने समय का खज़ाना, श्रेष्ठ संकल्प का खज़ाना अभी औरों के प्रति लगाओ। अपने प्रति समय, संकल्प कम लगाओ। औरों के प्रति लगाने से स्वयं भी उस सेवा का प्रत्यक्षफल खाने के निमित्त बन जायेंगे। मन्सा सेवा, वाचा सेवा और सबसे ज्यादा - चाहे ब्राह्मण, चाहे और जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उन्हों को कुछ न कुछ मास्टर दाता बनके देते जाओ। नि:स्वार्थ बन खुशी दो, शान्ति दो, आनंद की अनुभूति कराओ, प्रेम की अनुभूति कराओ। देना है और देना माना स्वत: ही लेना। जो भी जिस समय, जिस रूप में सम्बन्ध-सम्पर्क में आये कुछ लेकर जाये। आप मास्टर दाता के पास आकर खाली नहीं जाये। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा - चलते-फिरते भी अगर कोई भी बच्चा सामने आया तो कुछ न कुछ अनुभूति के बिना खाली नहीं जाता। यह चेक करो जो भी आया, मिला, कुछ दिया वा खाली गया? खजाने से जो भरपूर होते हैं वह देने के बिना रह नहीं सकते। अखुट, अखण्ड दाता बनो। कोई मांगे, नहीं। दाता कभी यह नहीं देखता कि यह मांगे तो दें। अखुट महादानी, महादाता स्वयं ही देता है। तो पहली सेवा इस वर्ष - महान दाता की करो। आप दाता द्वारा मिला हुआ देते हो। ब्राह्मण कोई भिखारी नहीं हैं लेकिन सहयोगी हैं। तो आपस में ब्राह्मणों को एक दो में दान नहीं देना है, सहयोग देना है। यह है पहला नम्बर सेवा। और साथ-साथ बापदादा ने विदेश के बच्चों की खुशखबरी सुनी तो बापदादा ने देखा कि जो इस सृष्टि के आवाज फैलाने के निमित्त बापदादा ने जो माइक नाम दिया है तो विदेश के बच्चों ने आपस में इस कार्य को किया है और जब प्लैन बना है तो प्रैक्टिकल होना ही है। लेकिन भारत में भी जो 13 ज़ोन हैं, हर एक ज़ोन से कम से कम एक ऐसा विशेष निमित्त सेवाधारी बनें, जिसको माइक कहो या कुछ भी कहो, आवाज फैलाने वाले कोई निमित्त बनाओ, यह बापदादा ने कम से कम कहा है लेकिन अगर बड़े-बड़े देश में ऐसे निमित्त बनने वाले हैं तो सिर्फ ज़ोन वाले नहीं लेकिन बड़े देशों से भी ऐसे तैयार कर प्रोग्राम बनाना है। बापदादा ने विदेश के बच्चों को दिल ही दिल में मुबारक दी, अभी मुख से भी दे रहे हैं कि प्रैक्टिकल में लाने का प्लैन पहले बापदादा के सामने लाया। वैसे बापदादा जानते हैं कि भारत में और ही सहज है लेकिन अभी कुछ क्वालिटी की सेवा कर सहयोगी समीप लाओ। बहुत सहयोगी हैं लेकिन संगठन में उन्हों को और समीप लाओ।

साथ-साथ बापदादा का यह संकल्प है कि हर एक बड़े शहरों की जो एरिया होती है, वह बहुत बड़ी होती है, हर एक सेन्टर को अपनी एरिया से ऐसे विशेष तैयार करना आवश्यक है क्योंकि समय समीप आ रहा है और लास्ट समय आप सभी को स्वयं अपना परिचय नहीं देना है, आपकी तरफ से वह स्पीच करे, वह स्पीकर हो और आप सर्चलाइट हो। तो हर एक को अपनी एरिया से ऐसा माइक निकालना है। हर एक एरिया में कोई न कोई विशेष बिजनेसमैन कहो वा ऐसा भिन्न-भिन्न वर्ग का कोई मुख्य होता ही है। अपने- अपने सेन्टर पर अपनी एरिया की विशेष आत्माओं को तैयार करो। वह सुनावे कि यह ज्ञान क्या है। आप अभी लास्ट समय साक्षात्कार मूर्त, फरिश्ता बन दृष्टि दो और वह स्पीकर बने। स्पीकर बनना तो सभी सीख गये हैं, छोटी-छोटी टीचर्स भी स्पीच बहुत अच्छा करती हैं। स्पीच सभी करते हो। अभी स्पीकर औरों को तैयार करो। आपकी दृष्टि वा दो वचन सभी को ऐसी भासना दें जैसे कई समय की स्पीच कर ली है। ऐसा समय आना ही है।

अभी समय भी फास्ट गति ले रहा है, सिर्फ समय बार-बार फास्ट होकर आप लोगों को ऐसे पीठ करके (मुड़कर के) देखता है कि हमारे मालिक तेज रफतार से आ रहे हैं वा समय फास्ट जा रहा है? मालिक तो आप हो ना? तो आपको बार-बार देखता है, फास्ट आ रहे हैं! इसलिए इस वर्ष क्वालिटी की सेवा में विशेष अटेन्शन दो। हर एक सेन्टर की रिजल्ट आनी चाहिए कि हमारे सेन्टर पर किस वर्ग के और कितनी क्वालिटी की सेवा हो रही है। क्वान्टिटी तो स्वत: ही बढ़ती जायेगी। अभी भी देखो यह हाल भी छोटा हो गया है ना। क्वान्टिटी तो बढ़नी ही है, अभी ऐसे प्रैक्टिकल ग्रुप तैयार करो।

साथ-साथ ब्राह्मण आत्माओं में और भी समीप लाने के लिए, हर एक तरफ वा मधुबन में चारों ओर ज्वाला स्वरूप का वायुमण्डल बनाने के लिए, चाहे जिसको भट्ठी वहते हो वह करो, चाहे आपस में संगठन में रूहरिहान करके ज्वाला स्वरूप का अनुभव कराओ और आगे बढ़ाओ। जब इस सेवा में लग जायेंगे तो जो छोटी-छोटी बातें हैं ना - जिसमें समय लगता है, मेहनत लगती है, दिलशिकस्त बनते हैं वह सब ऐसे लगेगा जैसे ज्वालामुखी हाइएस्ट स्टेज और उसके आगे यह समय देना, मेहनत करना, एक गुड़ियों का खेल अनुभव होगा। स्वत: ही सहज ही सेफ हो जायेंगे। बापदादा ने कहा ना कि सबसे ज्यादा बापदादा को रहम तब पड़ता है जब देखते हैं कि मास्टर सर्वशक्तिवान बच्चे और छोटी-छोटी बातों के लिए मेहनत करते हैं। मोहब्बत ज्वालामुखी रूप की कम है तब मेहनत लगती है। तो अभी मेहनत से मुक्त बनो, अलबेले नहीं बनना लेकिन मेहनत से मुक्त होना। ऐसे नहीं सोचना मेहनत तो करनी नहीं है तो आराम से सो जाओ। लेकिन मोहब्बत से मेहनत खत्म करो। अलबेलेपन से नहीं। समझा - क्या करना है?

अभी बापदादा को आना तो है ही। पूछते हैं आगे क्या होगा? बापदादा आयेंगे या नहीं आयेंगे? बापदादा ना तो करते नहीं हैं, हाँ जी, हाँ जी करते हैं। बच्चे कहते हैं हजूर, बाप कहते हैं जी हाजिर। तो समझा क्या करना है, क्या नहीं करना है। मेहनत मोहब्बत से कट करो। अभी मेहनत मुक्त वर्ष मनाओ - मोहब्बत से, आलस्य से नहीं। यह पक्का याद रखना - आलस्य नहीं।

ठीक है - सब संकल्प पूरे हुए? कोई रह गया? जनक से (दादी जानकी से) पूछते हैं - कुछ रहा? दादी तो मुस्करा रही है। खेल पूरा हो गया? यह आपरेशन भी क्या है? खेल में खेल है। खेल अच्छा रहा ना! अच्छा

सभी विशेष टीचर्स भी बैठी हैं। एक पंथ दो कार्य किया है, टीचर्स बड़ी होशियार हैं। (मीटिंग भी है और बापदादा से मिलन भी हुआ)

अच्छा - अनेक कल्प में तो आये हो लेकिन जो इस कल्प में पहली बार आये हैं वह हाथ उठाओ। जो भी पहली बार आये हैं चाहे आगे बैठे हैं, चाहे पीछे बैठे हैं, उन्हों को बापदादा विशेष स्नेह की दृष्टि भी दे रहे हैं और पदम गुणा मुबारक भी दे रहे हैं। बहुत अच्छे समय पर आ गये। आप देखो अभी भी इतनी संख्या है, आगे चलकर इतना भी नहीं मिल सकेगा। बैठना भी मिले, यह भी मुश्किल होगा। इसीलिए अभी आ गये, बहुत अच्छा किया। मुबारक हो। अच्छा - गर्मा लग रही है सभी को। (रंग-बिरंगी हाथ के पंखे सबके पास हैं) देखो भक्ति की यात्राओं से तो बहुत सुखी बैठे हो, मिट्टी में नहीं बैठे हो, दरी और चादर पर ही बैठे हो। (ड्रिल)

सेकण्ड में बिन्दी स्वरूप बन मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास बारबार करो। स्टॉप कहा और सेकण्ड में व्यर्थ देह-भान से मन-बुद्धि एकाग्र हो जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर सारे दिन में यूज़ करके देखो। ऐसे नहीं आर्डर करो - कन्ट्रोल और दो मिनट के बाद कन्ट्रोल हो, 5 मिनट के बाद कन्ट्रोल हो, इसलिए बीच-बीच में कन्ट्रोलिंग पावर को यूज़ करके देखते जाओ। सेकण्ड में होता है, मिनट में होता है, ज्यादा मिनट में होता है, यह सब चेक करते जाओ।

अभी सभी को तीन मास का चार्ट और पक्का करना है। सर्टिफिकेट लेना है। पहले स्वयं, स्वयं को सर्टिफिकेट देना फिर बापदादा देंगे। अच्छा।

चारों ओर के परमात्म पालना के अधिकारी आत्माओं को, परमात्म पढ़ाई के अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, परमात्म प्राप्तियों से सम्पन्न आत्माओं को, सदा बिन्दी की विधि से तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा मेहनत से मुक्त रहने वाले मोहब्बत में समाये हुए बच्चों को, ज्वाला स्वरूप विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादी जी से

जो भी कुछ ड्रामा होता है - सभी का स्नेह बढ़ता है। निमित्त आत्माओं में सभी के जैसे प्राण हैं। इसलिए आपरेशन तो निमित्त है लेकिन सबके स्नेह और दुआओं का खज़ाना बहुत जमा हो गया। देखो, ड्रामा में मुरलियां भी कितनी समय प्रमाण रिपीट हुई, बापदादा ने सभी को सकाश देने और लेने का पाठ पढ़ा लिया। समय अनुसार मुरलियां भी वही चली। बापदादा का तो प्यार है ही लेकिन हर एक बच्चों का भी दिल से प्यार है। परमात्म प्यार और ब्राह्मण आत्माओं का प्यार यह उड़ा देता है क्योंकि आपके साकार में थोड़ा समय भी मिलने का सभी को महत्व है। इतना समय मिलने के बजाए फरिश्ते मुआफिक यह मिलन - यह भी ड्रामा में पार्ट अच्छा रहा। अभी अपने को ब्रह्मा बाप के समान फरिश्ता रूप से मिलना, चलना और उड़ना - यही पार्ट चल रहा है। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा एकदम न्यारा, कर्मातीत अनुभव रहा। ऐसे आप सभी महारथियों को अभी ऐसे ब्रह्मा समान कर्मातीत अवस्था के समीप आना ही है। फॉलो फादर। एक सेकण्ड की आपकी दृष्टि कई घण्टों की प्राप्ति का अनुभव करायेगी। अभी बोलने की, बैठने की भी मेहनत कम होती जायेगी। एकदम ब्रह्मा बाप ही दिखाई देगा। यह दादियां नहीं हैं, ब्रह्मा बाप है। अव्यक्त ब्रह्मा, अव्यक्त रूप से पालना दे रहे हैं और आप द्वारा साकार ब्रह्मा बाप की अनुभूति बढ़ती जायेगी। आपको दादी नहीं देखेंगे, ब्रह्मा देखेंगे। होता है ना ऐसे? अच्छा। कीमती रत्न हो। कीमती रत्नों की सम्भाल की जाती है।

आप निमित्त बनी हुई आत्माओं के उमंग-उत्साह से चारों ओर की आत्मायें उमंग-उत्साह से चल रही हैं क्योंकि एक दो के सहयोगी हो। जैसे बाप कहते हैं ना - हाजिर हजूर। वैसे एक दो में हाज़र - हाज़र इस स्नेह और संगठन से शक्ति औरों को मिल रही है और दुआयें आपको मिल रही हैं। दोनों को प्राप्ति है। सबसे ज्यादा दुआओं का खज़ाना किसका जमा होता है? आपका। इसमें पहले मैं कहने में अभिमान नहीं है, स्वमान है। कुछ दो तो दुआयें मिलें।

अभी भी वैराग्य वृत्ति नहीं आई है, इसमें बापदादा भी देख रहे हैं, कब आरम्भ होता है। अभी तो साधन यूज़ करने के अनुभवी ज्यादा हैं। बापदादा जानते हैं कि जब तक ब्राह्मणों में बेहद की वैराग्य वृत्ति इमर्ज नहीं हुई है तो विश्व में भी वैराग्य वृत्ति नहीं आ सकती। सारे विश्व में वैराग्य वृत्ति ही कुछ पापों से मुक्त करेगी। अभी शक्ति सेना को रहम आना चाहिए। अभी रहम कम है, सेवा है। लेकिन रहमदिल, वह अभी ज्यादा इमर्ज चाहिए। पाप कर्म का बिचारे बोझ उठाते जाते हैं। बोझ से झुकते जा रहे हैं। तो रहम आना चाहिए, तरस आना चाहिए।

अच्छा। ओम् शान्ति।