18-01-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


सम्पूर्ण विल करने से विल-पॉवर की प्राप्ति

आज किसलिए बुलाया हैं? आज बापदादा क्या देख रहे हैं? एक एक सितारे को किस रूप में देख रहे हैं? सितारों में भी क्या विशेषता देखते हैं? हरेक सितारे की सम्पूर्णता की समीपता देख रहे हैं। आप सभी अपने को जानते हो कि कितना सम्पूर्णता के समीप पहुँचे हो? सम्पूर्णता के समीप पहुँचने की परख क्या होती हैं? सम्पूर्णता की परख यही है किववाह सभी बातों को सभी रीति से, सभी रूपों से परख सकते हैं। आज सारे दिन में क्या-क्या स्मृति आई? चित्र स्मृति में आया व्वा चरित्र स्मृति में आया? चित्र के साथ और कुछ याद आया? (शिक्षा याद आई, ड्रामा याद आया)। चित्र के साथ विचित्र भी याद आया? कितना समय चित्र की यद् में थे कितना समय विचित्र की यद् में थे या दोनों की याद मिली हुई थी? विचित्र के साथ चित्र को याद करने से खुद भी चरित्रवान बन जायेंगे। अगर सिर्फ चित्र और चरित्र को यद् करेंगे तो चरित्र की ही याद रहेगी। इसलिए विचित्र के साथ चित्र और चार्टर याद आये। आज के दिन और भी कोई विशेष कार्य किया? सिर्फ याद में ही मग्न थे कि याद के साथ और भी कुछ किया? (विकर्म विनाश) यह तो याद का परिणाम हैं। और विशेष क्या कर्त्तव्य किया? पूरा एक वर्ष अपना चार्ट देखो? इस अव्यक्ति पढ़ाई, इस अव्यक्त स्नेह और सहयोग की रिजल्ट चेक की? इस अव्यक्त स्नेह और सहयोग का १२ मास का पेपर क्या हैं, चेकिंग की? चेकिंग करने के बाद ही अपने ऊपर अधिक अटेंशन रख सकते हैं। तो आज के दिन स्वयं ही अपना पेपर चेक करना है। व्यक्त भाव से अव्यक्त भावव में कहाँ तक आगे बढ़े – यह चेकिंग करनी है। अगर अव्यक्ति स्थिति बढ़ी है तो अपने चलन में भी अलौकिक होंगे। अव्यक्त स्थिति की प्रैक्टिकल परख क्या है? अलौकिक चलन। इस लोक में रहते अलौकिक कहाँ तक बने हो? यह चेक करना है। इस वर्ष में पहली परीक्षा कोनसी हुई? इस निश्चय की परीक्षा में हरेक ने कितने-कितने मार्क्स ली। वह अपने आप को जानते हैं। निश्चय की परीक्षा तो हो गयी। अब कौन सी परीक्षा होनी हैं? परीक्षा का मालुम होते भी फ़ैल हो जाते है। कोई-कोई के लिए यह बड़ा पेपर है लेकिन कोई-कोई का अब बड़ा पेपर होना है। जैसे इस पेपर में निश्चय की परीक्षा हुई वैसे ही अब कौन सा पेपर होना है? व्यक्त में भी अब भी सहारा है। जैसे पहले भी निमित्त बना हुआ साकार तन सहारा था वैसे ही अब भी ड्रामा में निमित्त बने हुए साकार में सहारा हैं। पहले भी निमित्त ही थे। अब भी निमित्त हैं। यह पुरे परिवार का साकार सहारा बहुत श्रेष्ठ है। अव्यक्त में तो साथ है ही। जितना स्नेह होता है उतना सहयोग भी मिलता है। स्नेह की कमी के कारन सहयोग भी कम मिलता है। साकार से स्नेह अर्थात् सारे सिजरे से स्नेह। साकार अकेला नहीं हैं। प्रजापिता ब्रह्मा तो उनके साथ परिवार है। माला के मनके हो न। माला में अकेला मनका नहीं होता है। माला में एक ही याद के सूत्र में, स्नेह में परिवार समाया हुआ है। तो यह जैसे माला में स्नेह के सूत्र में पिरोये हुए हैं। दैवी कुल तो भविष्य में है, इस ब्राह्मण कुल का बहुत महत्व है। जितना-जितना ब्राह्मण कुल से स्नेह और समीपता होगी उतना ही दैवी राज्य में समीपता होगी। साकार में क्या सबूत देखा? बापदादा किसको आगे रखते हैं? बच्चों को। क्योंकि बच्चों के बिना माँ बाप का नाम बाला नहीं हो सकता। तो जैसे साकार में कर्म करके दिखाया वही फॉलो करना है। यहाँ पेपर पहले ही सुनाया जाता है। निश्चय का पेपर तो हुआ। लेकिन अब पेपर होना है हरेक के स्नेह, सहयोग और शक्ति का। अब वह समय नजदीक आ रहा है जिसमे आप का भी कल्पप पहलेवाला चित्र प्रत्यक्ष होना है। अनेक प्रकार की समस्याओं को परिवर्तन के लिए ऊँगली देनी है। कलियुगी पहाड़ तो पार होना ही है। लेकिन इस वर्ष में मन की समस्याएं, तन की समस्याएं, वायुमण्डल की समस्याएं सर्व समस्याओं के पहाड़ को स्नेह और सहयोग की अंगुली देनी है। तन की समस्या भी आणि है। लौकिक सम्बन्ध में तो पास हो गए। लेकिन यह जो अलौकिक सम्बन्ध है, उस सम्बन्ध द्वारा भी छोटी-मोती समस्याएं आएँगी। लेकिन यह समस्याएं सभी पेपर समझना, यह प्रैक्टिकल बातें नहीं समझना। यह प्पपेर समझना। अगर पेपर समझकर उनको पास करेंगे तो पास हो जायेंगे। अभी देखना है पेपर आउट होते भी कितने पास होते हैं। फिर इस पेपर की रिजल्ट सुनायेंगे। इस समय अपने में विल पावर धारण करना है। अभी विल पावर नहीं आई है। यथा योग्य यथा शक्ति पावर है।

विल पावर कैसे आ सकेगी? विल पावर आने का साधन कौन सा है? विल पावर की कमी क्यों हैं? उसके कारण का पता है? याद की कमी भी क्यों है? बाप ने साकार में कर्म करके दिखाया है, विल पावर कैसे आई। पहला पहला कदम कौन सा उठाया? सभी कुछ विल कर दिया? विल करने में देरी तो नहीं की? जो भी बुरे है अन्दर वा बाहर। वह सम्पूर्ण विल नहीं की है तब तक विल पावर आ नहीं सकती। साकार ने कुछ सोचा क्या? कि कैसे होगा, क्या होगा, यह कब सोचा? अगर कोई सोच-सोच कर विल करता है तो उसका इतना फल नहीं मिलता। जैसे झाटकू और बिगर झाटकू का फर्क होता है। पहले स्वीकार कौन होता है? जो पहले स्वीकार होता है उनको नंबर वन की शक्ति मिलती है। जो पहले स्वीकार नहीं होते उनको शक्ति भी इतनी प्रप्प्त नहीं होती है। इस बात पर सोचना। बापदादा वर्तमान के साथ भविष्य भी जनता है। तो भविष्य कर्मबन्धन की रस्सियों को काटना अप्पना कर्त्तव्य है। अगर कोई भी रस्सी टूटी हुई नहीं होती है तो मन की खिंचावट होती रहती है। इसलिए रस्सियाँ कटवाने के लिए ठहरे हैं। रस्सियाँ अगर टूटी हुई है तो फिर कोई रुक सकता है? छुटा हुआ कब कोई भी बंधन में रुक नहीं सकता।

आज के दिवस पर क्या करना है और अगले ववर्ष के लिए क्या तैयारी करनी है – वह सभी याद रखना है। विदेही को युगल बनायेंगे तो विदेही बनने में सहयोग मिलेगा। विदेही बनने में सहयोग कम मिलता है, सफ़लता कम देखने में आती तो समझना चाहिए कि व्विदेही को युगल नहीं बनाया है। कमाल इसको कहा जाता ही जो मुश्किल बात को सहज करें। सहज बातों को पार करना कोई कमाल नहीं है। मुश्किलातों को पार करना वह है कमाल। अगर मुश्किलातों में ज़रा भी मुरझाया तो क्या होगा? एक सेकंड में सौदा करनेवाले कहाँ फँसते नहीं हैं। फ़ास्ट जाने वाला कहाँ फँसेगा नहीं। फँसनेवाला फ़ास्ट नहीं जा सकेगा। लास्ट स्थिति को देख फ़ास्ट जाना है। अब भी फ़ास्ट जाने का चांस है। सिर्फ एक हाई जम्प लगाना है। लास्ट में फ़ास्ट नहीं जा सकेंगे। अच्छा-


22-01-70              ओम शान्ति                        अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


“अंतिम कोर्स – मन के भावों को जानना” – २२-०१-१९७०

सभी कहाँ बैठे हो और क्या देख रहे हो ?  अव्यक्त स्थिति में स्थित हो अव्यक्त रूप को देख रहे हो व व्व्यक्त में अव्यक्त को देखने का प्रयत्न करते हो ?  इस दुनिया में आवाज़ हैं |  अव्यक्त दुनिया में आवाज़ नहीं है |  इसलिए बाप सभी बच्चों को आवाज़ से परे ले जाने की ड्रिल सिखला रहे हैं |  एक सेकंड में आवाज़ में आना एक सेकंड में आवाज़ से परे हो जाना ऐसा अभ्यास इस वर्तमान समय में बहुत आवश्यक है |  वह समय भी आएगा |  जैसे – जैसे अव्यक्त स्थिति में स्थित होते जायेंगे वैसे-वैसे नयनों के इशारों से किसके मन के भाव जान जायेंगे |  कोई से बोलने व सुनने की आवश्यकता नहीं होगी |  ऐसा समय अब आनेवाला है |  जैसे बप्प्दादा के सामने जब आते हो तो बिना सुनाये हुए भी आप सभी के मन के संकल्प मन के भावों को जान लेते हैं |  वैसे ही आप बच्चों को भी यही अंतिम कोर्स पढना है |  जैसे मुख की भाषा कही जाती है व्वैसे ही फिर रूहों की रूहान होती है |  जिसे रूह-रहन कहते हैं |  तो रूह भी रूह से बातें करते हैं |  लेकिन कैसे ?  क्या रूहों की बातें मुख से होती है ?  जैसे जैसे रूहानी स्थिति में स्थित होते जायेंगे वैसे-वैसे रूह रूह की बात को ऐसे ही सहज और स्पष्ट जान लेंगे |  जैसे इस दुनिया में मुख द्वारा वर्णन करने से एक दो के भाव जानते हो  |  तो इसके लिए किस बात की धरना की आवश्यकता है ?  विशेष इस बात की आवश्यकता है जो सदैव बुद्धि की लाइन क्लियर हो |  कोई भी अपने बुद्धि में व मन डिस्टर्बेंस होगा वा लाइन क्लियर न होगी तो एक दो के संकल्प और भाव को जान नहीं सकेंगे |  लाइन क्लियर न होने के कारण अपने संकल्पों की मिक्सचैरिटी हो सकती है |  इसलिए हरेक को देखना चाहिए कि हमारी बुद्धि की लाइन क्लियर हैं ?  बुद्धि में कोई भी किसी भी प्रकार का विघ्न तो नहीं सताता है ?  अटूट, अटल, अथक यह तीनों ही बातें जीवन में हैं |  अगर इन तीनों में से एक बात में भी कमी है तो समझना चाहिए कि बुद्धि की लाइन क्लियर नहीं है |  जब बुद्धि की लाइन क्लियर हो जाएगी तो उसकी स्थिति, स्मृति क्या होगी ?  जितनी-जितनी बुद्धि की लाइन अर्थात् पुरुषार्थ की लाइन क्लियर होगी उतना-उतना क्या स्मृति में रहेगा ?  कोई भी बात में उनके सामने भविष्य ऐसा ही स्पष्ट होगा जैसे वर्तमान स्पष्ट होता है |  उनके लिए वर्तमान और भविष्य एक समान हो जायेंगे |  जैसे आजकल साइंसदानों ने कहाँ-कहाँ की बातों को इतना स्पष्ट दिखाया है जो दूर की चीज़ भी नज़दीक नज़र आती है |  इसी रीति से जिनका पुरुषार्थ क्लियर होगा उनको भविष्य की हर बात दूर होते भी नजदीक दिखाई पड़ेगी |  जैसे आजकल टेलीविज़न में देखते हैं तो सभी स्पष्ट दिखाई पड़ता हैं ना |  तो उनकी बुद्धि और उनकी दृष्टि टेलीविज़न की भांति सभी बातें स्पष्ट देखेंगी और जानेंगी |  और कोई भी बात में पुरुषार्थ की मुश्किलात नहीं रहेगी |  तो वह अनुभव, वह अंतिम स्थिति की परख अपने आप में देखो कि कहाँ तक अंतिम स्थिति के नज़दीक हैं |  जैसे सूर्य अपने जब पुरे प्रकाश में आता है तो हर चीज़ स्पष्ट देखने में आती है |  जो अन्धकार है, धुंध है वह सभी ख़त्म हो जाता है |  इसी रीति जब सर्वशक्तिवान ज्ञान सूर्य के साथ अटूट सम्बन्ध है तो अपने आप में भी ऐसे ही हर बात स्पष्ट देखने में आएगी |  और जो चलते-चलते पुरुषार्थ में माया का अन्धकार व धुंध आ जाता है, जो सत्य बात को छिपानेवाले हैं, वह हट जायेंगे |  इसके लिए सदैव दो बातें याद रखना |  आज के इस अलौकिक मेले में जो सभी बच्चे आये हैं |  वह जैसे लौकिक बाप अपने बच्चों को मेले में ले जाते हैं तो जो स्नेही बच्चे होते हैं उनको कोई-न-कोई चीज़ लेकर देते हैं |  तो बापदादा भी आज के इस अनोखे मेले में आप सभी बच्चों को कौन सी अनोखी चीज़ देंगे ?

आज के इस मधुर मिलन के मेले को यादगार बापदादा क्या दे रहे हैं कि सदैव शुभ चिन्तक और शुभ चिंतन में रहना |  शुभ चिंतन और शुभ चिन्तक |  यह दो बातें सदैव याद रखना |  शुभ चिंतन से अपनी स्थिति बना सकेंगे और शुभचिन्तक बनने से अनेक आत्माओं की सेव्व करेंगे |  तो आज यह वतन से, आये हुए सभी बच्चों के प्रति अविनाशी सौगात है |  बापदादा का स्नेह अधिक है व बच्चों का अधिक है ?  कोई कोई बच्चे सोचते होंगे कि हम सभी का स्नेह बापदादा से ज्यादा है |  कोई-कोई हैं भी लेकिन मेजोरिटी नहीं |  स्नेह है लेकिन अटूट और एक रस स्नेह नहीं है |  बच्चों का स्नेह रूप बदलता बहुत है |  बापदादा का स्नेह अटूट और एकरस रहता है |  तो अब बताओ कि किसका स्नेह ज्यादा है ?  बापदादा बच्चों को देखते हैं तो त्रिनेत्री होने से तीन रूपों से देखते हैं |  वह कौन से ३ रूप ?  जैसे आप बच्चे बाप को तीन रूपों से देखते हो न |  तो वह सभी जानते हैं |  लेकिन बाप  बच्चों को तीन रूप से देखते हैं- एक तो पुरुषार्थी रूप, दूसरा अब संगम का भविष्य जो फ़रिश्ता रूप है और तीसरा भविष्य देवता रूप |  तीनों का साक्षात्कार होता रहता है |  तीनों ही रूप एक-एक ऐसे ही स्पष्ट देखने में आते हैं जैसे वर्तमान यह देह का रूप इन आँखों से स्पष्ट देखने में आता है |  इस रीति दिव्व्य नेत्र द्वारा यह तीनों रूप स्पष्ट देखने में आते हैं |  जैसे इन आँखों से देखि हुई चीज़ का वर्णन करना सहज होता है न |  सुनी हुई बातों का वर्णन करना कुछ मुश्किल होता है लेकिन देखी हुई बात का वर्णन करना सहज होता है और स्पष्ट होता है |  तो इन दिव्य नेत्रों वा अव्यक्त नेत्रों द्वारा हरेक के तीनों रूप भी इतना ही सहज वर्णन करना होता है |  वैसे ही आप सभी को भी एक दो के यह तीनों रूप देखने में आएंगे |  अभी यथायोग्य, यथाशक्ति है |  लेकिन कुछ समय बाद यह यथा शक्ति शब्द भी ख़त्म हो जायेगा |  और हरेक अपने अपने नंबर प्रमाण सम्पूर्णता को प्राप्त हो जायेंगे |  तो बापदादा आप सभी के सम्पूर्ण मुखड़े देखते हैं |  सम्पूर्णता नंबरवार होगी |  माला के १०८ मणके जो हैं, तो नंबर वार मणका और एक सौ आठवाँ मणका दोनों को सम्पूर्ण कहेंगे कि नहीं ?  विजयी रत्न कहेंगे ?  विजयी रत्न अर्थात् अपने नंबर प्रमाण सम्पूर्णता को प्राप्त हो |  उनके लिए सारे ड्रामा के अन्दर वाही सम्पूर्णता की फर्स्ट स्टेज है |  जैसे सतयुग में विश्व महाराजन तो ८वाँ भी कहलायेगा लेकिन फर्स्ट विश्व-महाराजन की सृष्टि के सम्पूर्ण सुख और ८वें के सम्पूर्णता के सुख में अंतर होगा ना |  वैसे ही यहाँ भी हरेक अपने-अपने नंबर प्रमाण सम्पूर्णता को प्राप्त हो रहे हैं |  इसलिए बापदादा सम्पूर्ण स्टेज को देखते रहते और वर्तमान समय के पुरुषार्थ को देखते रहते हैं |  क्या हैं और क्या बनने वाले हैं |

आप ने पूछा ना कि वतन में क्या बैठ करते हो ?  यही देखते रहते हैं और अव्यक्ति सहयोग देने की सर्विस करते हैं |  सभी समझते हैं कि बापदादा वतन में पता नहीं क्या बैठ करते होंगे |  लेकिन सर्विस की स्पीड साकार वतन से वहां तेज़ है |  क्योंकि यहाँ तो साकार तन का भी हिसाब साथ था |  अब तो इस बंधन से भी मुक्त हैं, अपने प्रति नहीं है सर्व आत्माओं के प्रति हैं |  जैसे इस शरीर को छोड़ना और शरीर को लेना यह अनुभवव सभी को है, वैसे ही जब चाहो तब शरीर का भान बिलकुल छोड़कर अशरीरी बन जाना और जब चाहो तब शरीर आधार लेकर कर्म करना यह अनुभव है ?  इस अनुभव को अब बढ़ाना है |  बिलकुल ऐसे ही अनुभव होगा जैसे कि स्थूल चोला अलग है और छोले को धारण करनेवाली आत्मा अलग है, यह अनुभव अब जयादा होना चाहिए |  सदैव यही याद रखो कि अब गए कि गए |  सिर्फ सर्विस के निमित्त शारीर का आधार लिया हुआ है लेकिन जैसे ही सर्विस समाप्त हो वैसे ही अपने को एकदम हल्का कर सकते हैं |  जैसे आप लोग कहाँ भी ड्यूटी पर जाते हो और फिर वापस घर आते हो तो अपने को हल्का समझते हो ना |  ड्यूटी की ड्रेस बदलकर घर की ड्रेस पहन लेते हो वैसे ही सर्विस प्रति यह शरीर रूपी वस्त्र का आधार लिया फिर सर्विस समाप्त हुई और इन वस्त्रों के बोझ से हल्के और न्यारे हो जाने का प्रयत्न करो |  एक सेकंड में छोले से अलग कौन हो सकेंगे ?  अगर टाइटनेस होगी तो अलग हो नहीं सकेंगे |  कोई भी चीज़ अगर चिपकी हुई होती है तो उनको खोलना मुश्किल होता है |  हल्के होने से सहज ही अलग हो जाता है |  वैसे ही अगर अपने संस्कारों में कोई भी इजीपण नहीं होगा तो फिर अशरीरीपन का अनुभव कर नहीं सकेंगे |  सुनाया था ना कि क्या बनना है |  इजी और अलर्ट, ऐसे रहनेवाले ही इस अभ्यास में रह सकेंगे |  बापदादा बच्चों को कोई नया नहीं देख रहे हैं |  क्योंकि जब कि तीनों ही कालों को जानते हैं तो नया कैसे कहेंगे |  इसलिए सभी अति पुराने हैं |  कितना पुराने हैं वह हिसाब नहीं निकाल सकते |  तो अपने को नया नहीं समझना |  अति प्पुराने हैं और वही पुराने अब फिर से अपना हक़ लेने के लिए आये हैं |  यह नशा सदैव कायम रहे |  यह भी कभी नहीं बोलना कि पुरुषार्थ करेंगे, देखेंगे |  नहीं |  जो लास्ट आये हैं उनको यही सोचना है कि हम फ़ास्ट जायेंगे |  अगर फ़ास्ट का लक्ष्य रखेंगे तो पुरुषार्थ भी ऐसे ही होगा |  इसलिए कभी भी यह नहीं सोचना कि हम लोग तो पीछे आये हैं तो प्रजा बन जायेंगे |  नहीं |  पीछे आनेवालों को भी अधिकार है राज्य पद पाने का |  अच्छा |

अव्यक्त मुलाकात भी मिलन ही है |  इसलिए सभी को यही निश्चय रखना है कि हम राज्य पद लेकर ही छोड़ेंगे |  हम नहीं बनेंगे तो कौन बनेंगे |  कोटों में कोई कौन-सी आत्मा गिनी जाती हैं ?  ऐसे कोटों में से कोई हम आत्माएं ड्रामा के अन्दर हैं |  यह अपना निश्चय नहीं भूलना |  बापदादा सभी बच्चों का भविष्य देख हर्षित होते हैं |  एक एक से मिलना, मन की बात तो यह है |  लेकिन आप सबके समान इस व्यक्त दुनिया में |  |  |  बापदादा को अभी यह व्यक्त दुनिया नहीं है |  तो आप के दुनिया के प्रमाण समय हो भी देखना पड़ता है |  वतन में समय नहीं होता |  घडी नहीं होती |  लेकिन इस व्यक्त दुनिया में यह सभी बातें देखनी पड़ती है |  वहां तो जब सूर्य, चाँद ही नहीं तो रात दिन किस हिसाब से हो |  इसलिए समय का बंधन नहीं है |

23-01-70              ओम शान्ति                       अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


सेवा में सफलता पाने की युक्तियाँ २३-०१-१९७०

ऐसे अनुभव करते हैं जैसे कि सर्विस के कारण मज़बूरी से बोलना पड़ता है ?  लेकिन सर्विस समाप्त हुई तो आवाज़ की स्थिति भी समाप्त हो जाएगी (बम्बई की एक पार्टी बापदादा से बम्बई में होनेवाले सम्मेलन के लिए डायरेक्शन ले रही थी) यह जो आजकल की सर्विस कर रहे हो उसमे विशेषता क्या चाहिए ?  भाषण तो वर्षों कर ही रहे हो लेकिन अब भाषणों में भी क्या अव्यक्त स्थिति भरनी है ?  जो बात करते हुए भी सभी ऐसे अनुभव करें कि यह तो जैसे कि अशरीरी, आवाज़ से परे न्यारे स्थिति में स्थित होकर बोल रहे हैं |  अब इस सम्मलेन में यह नवीनता होनी चाहिए |  यह स्पीकर्स और ब्राह्मण स्पीकर्स दूर से ही अलग देखने में आयें |  तब है सम्मेलन की सफ़लता |  कोई अनजान भी सभा में प्रवेश करे तो दूर से ही महसूस करे कि अनोखे बोलनेवाले हैं |  सिर्फ वाणी का जो बल है व तो कनरस तक रह जाता है |  लेकिन अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर जो बोलना होता है वह सिर्फ़ कनरस नहीं लेकिन मनरस भी होगा |  कनरस सुनानेवाले तो बहुत हैं लेकिन मनरस देने वाला अब तक दुनिया में कोई नहीं है |  बाप तो तुम बच्चों के सामने प्रत्यक्ष हुआ लेकिन तुम बच्चों को फिर बहार प्रत्यक्ष होना है |  तो यह सम्मेलन कोई साधारण रीति से नहीं होना है |  मीटिंग में भी बोलना – कि चित्रों में भी चैतन्यता हो |  जैसे चैतन्य व्यक्त भाव को स्पष्ट करते हैं वैसे ही चित्र चैतन्य बनकर साक्षात्कार करायें |  जब चित्र में चैतन्यता का भाव प्रत्यक्ष होता है, वाही चित्र अच्छा लगता है |  बहार की आर्ट की बात नहीं है लेकिन बहार के साथ अन्दर भी ऐसा ही हो |  बापदादा यही नवीनता देखना चाहते हैं |  कम बोलना भी कर्त्तव्य बड़ा कर दिखाए |  यही ब्राह्मणों की रीति रस्म है |  यह सम्मेलन अनोखा कैसे हो यह ख्याल रखना है |  चित्रों में भी अव्यक्ति चैतन्यता हो |  जो दोर्र से ही ऐसी महसूसता आये |  नहीं तो इतनी प्रजा कैसे बनेगी |  सिर्फ़ मुख से नहीं लेकिन आन्तरिक स्थिति से जो प्रजा बनेगी उसे ही आन्तरिक सुख का अनुभव कहा जाता है |  आप लोगों ने अब तक रिजल्ट देखि कि जो अव्यक्त स्थिति के अनुभव से आये वह शुरू से ही सहज चल रहे हैं, निर्विघ्न है |  और जो अव्यक्त स्थिति के साथ फिर और भी कोई आधार पर चले हैं उन्ही के बिच में विघ्न, मुश्किलातें आदि कठिन पुरुषार्थ देखने में आता हैं |  इसलिए अभी ऐसी प्रजा बनानी है जो अव्यक्त शक्ति की फाउंडेशन से बहुत थोड़े समय में और सहज ही अपने लक्ष्य को प्राप्त हो |  जितना खुद सहज पुरुषार्थी होंगे, अव्यक्त शक्ति में होंगे उतना ही औरों को भी आप समान बना सकेंगे |  तो इस सम्मेलन की रिजल्ट देखनी है |  टॉपिक तो कोई भी हो लेकिन स्थिति टॉप की चाहिए |  अगर टॉप की स्थिति है तो टॉपिक्स को कहाँ भी मोड़ सकते हो |  अब भाषण पर नहीं लेकिन स्थिति पर सफलता का आधार कहा जाता है |  क्योंकि भाषण अर्थात् भाषा की प्रवीणता तो दुनिया में बहुत है |  लेकिन आत्मा में शक्ति का अनुभव करानेवाले तो तुम ही हो |  तो यही अभी नवीनता लानी है |  जब भी कोई कार्य करते हो तो पहले वायुमण्डल को अव्यक्त बनाना आवश्यक है |  जैसे और सजावट का ध्यान रखते हो वैसे मुख्य सजावट यह है |  लेकिन क्या होता है ?  चलते-चलते उस समय बहर्मुखता अधिक हो जाती है तो जो लास्ट वायुमण्डल होने के कारन रिजल्ट वह नहीं निकलती |  आप लोग सोचते बहुत हो, ऐसे करेंगे, यह करेंगे |  लेकिन लास्ट समय कर्त्तव्य ज्यादा देख बाहरमुखता में आ जाते हो |  वैसे ही सुनने वाले भी उस समय तो बहुत अच्छा कहते हैं परन्तु फिर झट बाहरमुखता में आ जाते हैं |  इसलिए ऐसा ही प्रोग्राम रखना है जो कोई भी आये तो पहले अव्यक्त प्रभाव का अनुभव हो |  यह है सम्मेलन की सफलता का साधन |  कुछ दिन पहले से ही यह वायुमण्डल बनाना पड़े |  ऐसे नहीं कि उसी दिन सिर्फ करना है |  वायुमंडल को शुद्ध करेंगे तब कुछ नवीनता देखने में आएगी |  साकार शरीर में भी अलौकिकता दूर से ही देखने में आती थी ना |  तो बच्चों के भी इस व्यक्त शरीर से अलौकिकता देखने में आये |

प्रेस कांफ्रेंस की रिजल्ट अगर अछि है तो करने में कोई हर्जा नहीं है |  लेकिन पहले उन्हों से मिलकर उन्हीं को मददगार बनाना – यह तो बहुत ज़रूरी है |  समय पर जाकर उन्हों से काम निकालना और समय के पहले उन्हों को मददगार बनाना इसमें भी फर्क पड़ता है |  बहुत करके समय पर अटेंशन जाता है |  अभी अपनी बुद्धि की लाइन को क्लियर करेंगे तो सभी स्पष्ट होता जायेगा |  जैसे आप लोगों का प्रदर्शनी में है ना – स्विच ऑन करने से जवाब मिलता है |  वैसे ही पुरुषार्थ की लाइन क्लियर होने से संकल्प का स्विच दबाया और किया |  ऐसा अनुभव करते जायेंगे |  सिर्फ व्यर्थ संकल्पों की कंट्रोलिंग पॉवर चाहिए |  व्यर्थ संकल्प चलने के कारण जो ओरिजिनल बापदादा द्वारा प्रेरणा कहें वा शुद्ध रेस्पोंस मिलता है वह मिक्स हो जाता है क्योंकि व्यर्थ संकल्प अधिक होते हैं |  अगर व्यर्थ संकल्पों को कण्ट्रोल करने की पॉवर है तो उसमें एक वही रेस्पोंस स्पष्ट देखने में आता हैं |  वैसे ही अगर बुद्धि ट्रांसलाइट है तो उसमे हर बात का रेस्पोंस स्पष्ट होता जाता है और यथार्थ होता है |  मिक्स नहीं |  जिनके व्यर्थ संकल्प नहीं चलते वह अपने अव्यक्त स्थिति को ज्यादा बढ़ा सकते हैं |  शुद्ध संकल्प भी चलने चाहिए |  लेकिन उनको भी कण्ट्रोल करने की शक्ति होनी चाहिए |  व्यर्थ संकल्पों का तूफ़ान मेजोरिटी में ज्यादा है |

कोई कभी कार्य शुरू किया जाता है तो सैंपल बहुत अच्छा बनाया जाता है |  यह भी सम्मेलन का सैंपल सभी के आगे रखना है |

अव्यक्त स्थिति क्या चीज़ होती है, इसका अनुभव कराना है |  आप की एक्टिविटी में सभी समय की घड़ी को देखें |  समय की घड़ी बनकर जा रहे हो |  जैसे साकार भी समय की घड़ी बने ना |  वैसे शरीर के होते अव्यक्त स्थिति के घंटे बजाने की घड़ी बनना है |  यह सर्विस सभी से अछि है |  व्यक्त में अव्यक्त स्थिति का अनुभव क्या होता है, वह सभी को प्रैक्टिकल में पाठ पढ़ना है |  अच्छा |

बापदादा और दैवी परिवार सभी के स्नेह के सूत्र में मणका बनकर पिरोना है |  स्नेह के सूत्र में पिरोया हुआ मैं मणका हूँ – यह नशा रहना चाहिए |  मणकों को कहाँ रखा जाता है ?  माला में मणकों को बहुत शुद्धि से रखा जाता है |  उठाते भी बहुत शुद्धि पूर्वक हैं |  हम भी ऐसा अमूल्य मणका हैं, यह समझना है |  (कोई ने सर्विस के लिए राय पूछी) उन्हों की सर्विस वाणी से नहीं होगी |  लेकिन जब चरित्र प्रभावशाली होंगे, चेंज देखेंगे तब वह स्वयं खींचकर आएंगे |  कोई-कोई को अपना अहंकार भी होता है ना |  तो वाणी से वाणी अहंकार के टक्कर में आ जाती है |  लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ के टक्कर में नहीं आ सकेंगे |  इसलिए ऐसे-ऐसे लोगों को समझाने के लिए यही साधन है |  वायुमंडल को अव्यक्त बनाओ |  जो भी सेवाकेंद्र हैं, उन्हों के वायुमंडल को आकर्षणमय बनाना चाहिए जो उन्हों को अव्यक्त वतन देखने में आये |  कोई भी दूर से महसूस करे कि यह इस घर के बिच में कोई चिराग है |  चिराग दूर से ही रौशनी देता है |  अपने तरफ आकर्षित करता है |  तो चिराग माफिक चमकता हुआ नज़र आये तब है सफलता |

अव्यक्त भट्ठी में आकर के अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है ?  यह अनुभव जो यहाँ होता है फिर उनको क्या करेंगे ?  साथ लेकर जायेंगे व यहाँ ही छोड़ जायेंगे |  उनको ऐसा साथी बनाना जो कोई कितना भी इस अव्यक्त आकर्षण के साथ को छुड़ाने चाहे तो भी नहीं छूटे |  लौकिक परिवार को अलौकिक परिवार बनाया है |  जरा भी लौकिकपण न हो |  जैसे एक शारीर छोड़ दूसरा लेते हैं तो उस जन्म की कोई भी बात स्मृति में नहीं रहती है ना |  यह भी मरजीवा बने हो न |  तो पिछले जीवन की स्मृति और दृष्टि ऐसे ही ख़त्म हो जानी चाहिए |  लौकिक में अलौकिकता भरने से ही अलौकिक सर्विस होती है |  अलौकिक सर्विस क्या करे हो ?  आत्मा का कनेक्शन पॉवर हाउस के साथ करने की सर्विस करते हो |  कोई तार का तार के साथ कनेक्शन करना होता है तो रब्बर उतारना होता है ना |  वैसे ही आप का भी पहला कर्त्तव्य है कि अपने को आत्मा समझ शरीर के भान से अलग बनाना |  यहाँ की मुख्य सब्जेक्ट कितनी हैं और कौन-सी हैं ?  सब्जेक्ट मुख्य हैं चार |  ज्ञान, योग, धारणा और सेवा |  इनमे भी मुख्य कौन से हैं ?  यहाँ से ही शांति का स्टॉक इकठ्ठा किया है ?  आशीर्वाद मालूम है कैसे मिलती है ?  जितना-जितना आत्माभिमानी बनते हैं उतनी आशीर्वाद न चाहते हुए भी मिलती है |  यहाँ स्थूल में कोई आशीर्वाद नहीं मिलती है |  यहाँ स्वतः ही मिलती है |  अगर बापदादा का आशीर्वाद नहीं होता तो यहाँ तक कैसे आते |  हर सेकंड बापदादा बच्चों को आशीर्वाद दे रहे हैं |  लेकिन लेने वाले जितनी लेते हैं, उतनी अपने पास कायम रखते हैं |

आप का और भी युगल है ?  सदा साथ रहनेवाला युगल कौन है ?  यहाँ सदैव युगल रूप में रहेंगे तो वहां भी युगल रूप में राज्य करेंगे |  इसलिए युगल को कभी अलग नहीं करना है |  जैसे चतुर्भुज कंबाइंड होता है वैसे यह भी कंबाइंड है |  शिवबाबा को अपने से कभी अलग नहीं करना |  ऐसे युगल कभी देख, ८४ जन्मों में ८४ युगलों में ऐसा युगल कब मिला ?  तो जो कल्प में एक बार मिलता है उनको तो पूरा ही साथ रखना चाहिए ना |  अभी याद रखना कि हम युगल हैं |  अकेले नहीं हैं |  जैसे स्थूल कार्य में हार्डवर्कर हो |  वैसे ही मन की स्थिति में भी ऐसे ही हार्ड हो जो कोई भी परिस्थिति में पिघल न जाएँ |  हार्ड चीज़ पिघलती नहीं है |  तो ऐसे ही स्थिति और कर्म दोनों हार्ड हो |  जिसके साथ अति स्नेह होता है सको साथ रखा जाता है ना |  तो सदा ऐसे समझो कि मैं युगल मूर्त हूँ | अगर युगल साथ होगा तो माया आ नहीं सकेगी |  युगल मूर्त समझना यही बड़े ते बड़ी युक्ति है |  कदम-कदम पर साथ रहने के कारण साहस रहता है |  शक्ति रहती है फिर माया आएगी नहीं |

तुम गोडली स्टूडेंट हो ?  डबल स्टूडेंट बनकर के फिर आगे का लक्ष्य क्या रखा है ?  उंच पद किसको समझते हो ?  लक्ष्मी-नारायण बनेंगे ?  जैसा लक्ष्य रखा जाता है तो लक्ष्य के साथ फिर और क्या धारणा करनी पड़ती है ?  लक्षण अर्थात् दैवी गुण |  लक्ष्य जो इतना उंच रखा है तो इतने उंच लक्षण का भी ध्यान रखना है |  छोटी कुमारी बहुत बड़ा कार्य कर सकती है |  अपनी प्रैक्टिकल स्थिति में स्थित हो किसको बैठ सुनाये तो उनका असर बड़ों से भी अधिक हो सकता है |  सदैव लक्ष्य यही रखना है कि मुझ छोटी को कर्त्तव्य बहुत बड़ा करके दिखाना है |  देह भल छोटी है लेकिन आत्मा की शक्ति बड़ी है |  जो जास्ती पुरुषार्थ करने की इच्छा रखते हैं उनको मदद भी मिलती है |  सिर्फ अपनी इच्छा को दृढ़ रखना, तो मदद भी दृढ़ मिलेगी |  कितनी भी कोई हिलाए लेकिन यह संकल्प पक्का रखना |  सकल्प पक्का होगा तो फिर सृष्टि भी ऐसी बनेगी |  भाल जिस्मानी सर्विस भी करते रहो |  जिस्मानी सर्विस भी एक साधन है इसी साधन से सर्विस कर सकते हो |  ऐसे ही समझो कि इस सर्विस के सम्बन्ध में जो भी आत्माएं आती हैं उनको सन्देश देने का यह साधन है |  सर्विस में तो कई आत्माएं कनेक्शन में आती हैं |  जैसे यहाँ जो आये उन्हीं को भी सर्विस के लिए सम्बन्धियों के पास भेजा ना |  ऐसे ही समझो कि सर्विस के लिए यह स्थूल सर्विस कर रहे हैं |  तो फिर मन भी उसमें लगेगा और कमाई भी होगी |  लौकिक को भी अलौकिक समझ करो |  फिर कोई और वातावरण में नहीं आयेंगे |  जैसे जैसे अव्यक्त स्थिति होती जाएगी वैसे बोलना भी कम होता जायेगा |  कम बोलने से ज्यादा लाभ होगा | फिर इस योग की शक्ति से सर्विस करेंगे |  योगबल और ज्ञान-बल दोनों इकठ्ठा होता है |  अभी ज्ञान बल से सर्विस हो रही है |  योगबल गुप्त है |  लेकिन जितना योगबल और ज्ञानबल दोनों समानता में लायेंगे उतनी-उतनी सफ़लता होगी |  सरे दिन में चेक करो कि योगबल कितना रहा, ज्ञानबल कितना रहा ?  फिर मालूम पद जायेगा कि अंतर कितना है |  सर्विस में बिजी हो जायेंगे तो फिर विघ्न आदि भी टल जायेंगे |  दृढ़ निश्चय के आगे कोई रुकावट नहीं आ सकती |  ठीक चल रहे हैं |  अथक और एकरस दोनों ही गुण हैं |  सदैव फॉलो फ़ादर करना है |  जैसे साकार रूप में भी अथक और एकरस, एग्जाम्पल बनकर दिखाया |  वैसे ही औरों के प्रति एग्जाम्पल बनना है |  यही सर्विस है |  समय भाल न भी मिले सर्विस का, लेकिन चरित्र भी सर्विस दिखला सकता है |  चरित्र से भी सर्विस होती है |  सिर्फ वाणी से नहीं होती |  आप के चरित्र उस विचित्र बाप की याद दिलाएं |  यह तो सहज सर्विस है न |  जैसे कई लोग अपने गुरु का वा स्त्री अपने पति का फोटो लॉकेट में लगा देती है न |  यह एक स्नेह की निशानी है |  तो तुम्हारा या मस्तक जो है यह भी उस विचित्र का चरित्र दिखलायें |  यह नयन उस विचित्र का चित्र दिखाएं |  ऐसा अविनाशी लॉकेट पहन लेना है |  अपनी स्मृति भी रहेगी और सर्विस भी होगी |

मधुबन में आकर मुख्य कर्त्तव्य क्या किया ?  जैसे कोई खान पर जाते हैं तो खान के पास जाकर क्या किया जाता है |  खान से जितना ले सकते हैं उतना लिया जाता है |  सिर्फ़ थोड़ा-सा नहीं |  वैसे ही मधुबन है सर्व प्राप्तियों की खान |  तो आप खान पर आये हो ना |  बाकि सेवाकेंद्र हैं इस खान की ब्रान्चेस |  खान पर जाने से ख्याल रखा जाता है जितना ले सकें |  तो यहाँ भी जितना ले सको ले सकते हो |  यहाँ की एक-एक वस्तु एक-एक ब्राह्मण आत्मा बहुत कुछ शिक्षा और शक्ति देनेवाली है |  बापदादा यही चाहते हैं कि जो भी आते हैं वह थोड़ा बहुत नहीं लेकिन सभी कुछ ले लेवें |  बापदादा का बच्चों में शेन है तो एक-एक को संपन्न बनाने चाहते हैं |  जितना यहाँ लेने में संपन्न बनेंगे उतना ही भविष्य में राज्य पाने के संपन्न होंगे |  इसलिए एक सेकंड भी इन अमूल्य दिनों को ऐसे नहीं गँवाना |  एक-एक सेकंड में पद्मों की कमाई कर सकते हो |  पदम सौभाग्यशाली तो हो |  जो इस भूमि  पर पहुँच गए हो |  लेकिन इस पदम भाग्य को सदा कायम रखने के लिए पुरुषार्थ सदैव सम्पूर्णता का रखना |  जैसा बीज होता है वैसा फल निकलता है |  तो आप लोग जैसे बीज हो, नींव जितनी खुद मज़बूत होगी उतना ही ईमारत भी पक्की होगी |  इसलिए सदैव समझना चाहिए कि हम नींव हैं |  हमारे ऊपर साड़ी बिल्डिंग का आधार है |

याद का रेस्पोंड मिलता है ?  बापदादा तो अब सभी के साथ हैं ही, क्योंकि साकार में तो एक स्थान पर साथ रह सकते थे |  अभी तो सर्व के साथ रह सकते हैं |  सदैव यह ध्यान रखो कि एक मत से एक रिजल्ट होगी |  इस गुण को परिवर्तन में लाना |  कैसी भी परिस्थिति आये, लेकिन अपने को मज़बूत रखना है |  औरों को अपने गुणों का दान देना है |  जैसे दान करने से रिटर्न में भविष्य में मिलता है ना |  इस गुण का दान करने से भी बड़ी प्रालब्ध मिलती है जो एक मत होते हैं वाही एक को प्यारे लगे हैं |  बापदादा दो होते एक हैं न |  वैसे भाल कितने भी हो लेकिन एक मत होकर चलना |  बाप के घर में आकर विशेष खज़ाना लिया ?  बाप के घर में विशेषताएं भरी हुई हैं ना |  अपने घर में असली स्वरुप में स्थित होने आये हो अपना असली स्वरुप और असली स्थिति क्या है, वह याद आती है ?  आत्मा की असली स्थिति क्या है ?  जैसे पहले आत्मा परमधाम की निवासी, सर्व गुणों का स्वरुप है |  वैसे ही यहाँ भी अपनी स्थिति का अनुभव् करने के लिए आये हो |  मधुबन में आये हो उस स्थिति का टेस्ट करने |  टेस्ट करने बाद उनको सदा के लिए अपनाना है |  इसका नाम ही है मधुबन |  मधु अर्थात् मधुरता यानि स्नेह और शक्ति दोनों ही वरदान पूर्ण रूप से प्राप्त करना |  यहाँ मधुबन में दोनों चीज़ वरदान रूप में मिलती है |  फिर बहार में जायेंगे तो इन दोनों चीज़ के लिए अपना पुरुषार्थ करना पड़ेगा |  इसलिए यहाँ वरदान रूप में प्राप्त जो हो रहा है उनको ऐसा प्राप्त करना जो अविनाशी रहे |  जब वरदान रूप में प्राप्त हो सकते हैं तो पुरुषार्थ करके क्यों लेवें |  गुरु वरदान देता है तो क्या करना होता है ?  अपने को उसके अर्पण करना पड़ता है, तब वरदान प्राप्त होता है |  तो यहाँ भी जितना अपने को अर्पण करेंगे, उतना वरदान प्राप्त होगा |  वरदान तो सभी को मिलता है, लेकिन जो ज्यादा अपने को अर्पण करता है, उतना ही वरदान का पात्र बनता है |  वरदान से ऐसी झोली भर लो, जो भरी हुई झोली कभी खाली न हो |  जितना जो भरना चाहे वह भर सकते हैं |  ऐसा ही ध्यान रखकर इन थोड़े दिनों में अथक लाभ उठाना है |  एक-एक सेकंड सफल करने के यह दिन है |  अभी का एक सेकंड बहुत फायदे और बहुत नुकसान का भी है |  एक सेकंड में जैसे कई वर्षों की कमाई गँवा भी देते हैं ना |  तो यहाँ का एक सेकंड इतना बड़ा है |

त्याग से ही भाग्य बनता है |  लेकिन त्याग करने के बाद मनसा में भी संकल्प उत्पन्न नहीं होना चाहिए |  जब कोई बलि चढ़ता है तो उमे अगर ज़रा भी चिल्लाया वा आँखों से बूँद निकली तो उनको देवी के आगे स्वीकार नहीं कराएँगे |  झाटकू सुना है ना |  एक धक् से कोई चीज़ को ख़त्म करने और बार बार काटने में फ़र्क रहता है ना |  झाटकू अर्थात् एक धक् से ख़त्म |  बापदादा के पास भी कौन से बच्चे स्वीकार होंगे ?  जिनको मनसा में भी संकल्प न आये इसको कहा जाता है महाबली | ऐसे महान बलि को ही महान बल की प्राप्ति होती है |  सर्वशक्तिवान के बच्चे हो और फिर शक्ति नहीं, बाप की प्पुरु जायदाद का हक़दार बनना है ना |  सर्वशक्तिवान बाप की सर्व शक्तियों की जायदाद, जन्म-सिद्ध अधिकार सदैव अपने सामने रखो |  सर्वशक्तिवान के आगे कमज़ोरी ठहर सकती है ?  आज से कमज़ोरी ख़त्म |  सिर्फ एक शक्ति नहीं |  पाण्डव भी शक्ति रूप हैं |  एक दीप से अनेक जगते हैं |

डबल सर्जरी करते हो ?  और ही अच्छा चांस मिलता है दो मार्ग बताने का |  शरीर का भी और मन का भी |  जैसे स्थूल सर्विस करने से तनख्वाह मिलती है ?  (स्वर्ग की बादशाही मिलती है) वह तो वहां मिलेगी लेकिन यहाँ क्या मिलता है ?  प्रत्यक्ष फल का अनुभव होता है ?  भविष्य तो बनता ही है लेकिन भविष्य से भी ज्यादा अभी की प्राप्ति है |  अभी जो ईश्वरीय अतीन्द्रिय सुख मिलता है वह भविष्य में नहीं मिल सकता |  यह अतीन्द्रिय सुख सारे कल्प में कभी नहीं मिल सकता |  ऐसा खजाना अभी बाप द्वारा मिलता है |  अनेक जन्म इन्द्रियों का सुख और एक सेकंड में अतीन्द्रिय सुख अनुभव होता है ?  शिवबाबा को युगल बनाया है ?  वह देहधारी युगल तो सुख के साथी होते हैं लेकिन यह तो दुःख के समय साथी बनता है |  ऐसे  युगल को तो एक सेकंड भी अलग नहीं करना चाहिए |  साथ रखना अर्थात् शक्ति रूप बनना |  यह ब्राह्मण परिवार देखा |  इतना बड़ा परिवार कब मिलता है ?  सिर्फ इस संगम पर ही इतना बड़ा परिवार मिलता है |  हम इतने बड़े परिवार के हैं – यह नशा रहता है ?  जितना कोई बड़े परिवार का होता है उतनी उसको ख़ुशी रहती है |  सारी दुनिया में हम थोड़ों को इतना बड़ा परिवार मिलता है |  तो यह निश्चय और नशा होना चाहिए |  हरेक को यह नशा होना चाहिए कि कोटों में से कोई हम गायन में आनेवाली आत्माएं हैं |  कभी सोचा था क्या कि ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो सकता है ?  अचानक लॉटरी मिली है |  लॉटरी की ख़ुशी होती है ना और फिर यह अविनाशी लॉटरी है |  जो कभी ख़त्म हो न सके |  ऐसी लॉटरी हम आत्माओं को मिली है |  यह नशा रहता है ?  कोने-कोने से बापदादा ने देखो कीन्हों को चुना है |  चुने हुए रत्नों में आप विशेष हैं |  यह याद रहता है |  बापदादा को कौन-से रत्न अच्छे लगते हैं ?  साधारण |  ऐसी ख़ुशी सदैव अविनाशी रहे |  वह कैसे रहेगी ?  जैसे दीपक होता है वह सदैव जगा रहे इसके लिए ध्यान रखते हैं |  घृत और बत्ती इन दो चीज़ का ख्याल रखना पड़ता है |  तो यहाँ भी ख़ुशी का दीपक सदैव जगा रहे इसके लिए दो बातें ध्यान में रखनी है |  ज्ञान घृत और योग है बत्ती |  अगर यह दोनों ही ठीक हैं तो ख़ुशी का दीपक अविनाशी रहेगा |  कभी बुझेगा नहीं |

१५ दिन भी इस संगमयुग के बहुत हैं |  ऐसे मत समझना कि हम तो १५ दिन के बच्चे हैं लेकिन संगम का समय ही अभी बहुत कम है |  इस काम के हिसाब से यह १५ दिन भी बहुत हैं, इसलिए अब ऐसे ही सोचना कि लास्ट वालों को फ़ास्ट होना है |  बिछड़े हुए जो होते हैं वह आने से ही तीव्र पुरुषार्थ में लग जाते हैं हिम्मत बच्चे रखते हैं, मदद बाप देते हैं |  एक कुमारी १०० ब्राह्मणों से उत्तम गाई जाती है |  एक में १०० की शक्ति भरेंगे तो क्या नहीं कर सकते |  सिर्फ अपने पांव को पक्का मजबूत बनाओ |  कितना भी कोई हिलाएं तो हिलना नहीं है |  अचलघर भी तुम्हारा यादगार है ना |  अचल अर्थात् जिसको कोई हिला न सके |  तीन मास में तीन वर्सा लिए हैं ?  बापदादा तीन वर्सा कौन सा देते हैं ?  सुख, शांति और शक्ति |  जितना अधिकार लेंगे उतना वहाँ राज्य के अधिकारी बनेंगे |  सम्पूर्ण अधिकार पाने का लक्ष्य रखना है |  क्योंकि बाप भी सम्पूर्ण है ना |  

युगल रहते हुए अकेले रहे हो गा युगल रूप में रहते हो ?  अकेला रूप कौन सा है ?  आत्मा अकेली है ना |  आते भी अकेले हैं |  जाते भी अकेले हैं |  तो युगल रूप में पार्ट बजाते भी आत्मिक स्थिति में रहना अर्थात् अकेले बनना है और फिर रूहानी युगल बनना है |  तो बाप और बच्चे |  वह तो हुआ देह का युगल |  आत्मा और परमात्मा यह भी युगल हैं |  आत्मा सजनी, सीता कहते हैं ना |  परमात्मा है साजन, राम |  तो रूहानी युगल मूर्त बनना है |  बस |  देह के  युगल रूप नहीं |  देहधारी का युगल रूप ख़त्म हुआ |  अनेक जन्म देहधारियों का युगल रूप देखा |  अब आत्मा और परमात्मा का युगल रूप बनना है |  ऐसी स्थिति में रहते हो ?  इस अनोखे युगल रूप के सामने वह युगल तो कुछ नहीं |  तो देह की भावना ख़त्म हो जाएगी |  सभी से प्रिय चीज़ क्या है ?  प्रिय चीज़ अच्छी लगती है ना |  तो उस प्रिय वास्तु को छोड़ दुसरे को प्रिय कैसे बना सकते हैं |  अकेला भी बन जाना है, फिर युगल भी बनना है |

कोई को आने से ही लॉटरी मिल जाती है |  कोई को प्रयत्न करने से लॉटरी मिलती |  ऐसे उच्च भाग्यशाली अपने को समझते हो ?  कुमारों के लिए भी सरल मार्ग है |  क्योंकि उलटी सीढ़ी जो चढ़े हुए हैं, उनको उतरनी पड़ती हैं |  इसलिए कुमार-कुमारियों के लिए और ही सहज है |  जो बंधन मुक्त होते हैं वह जल्दी दौड़ सकते हैं |  तो सभी बातों में निर्बन्धन रहना है |  कैसी भी परिस्थिति में अपनी स्थिति ऊँची रखनी है |  जो उच्च जीवन का लक्ष्य है उनसे दूर  नहीं होना है |  अच्छा-

24-01-70              ओम शान्ति                        अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


ब्राह्मणों का मुख्य धंधा – समर्पण करना और कराना २४-०१-१९७०

अपने जीवन की नैय्या किसके हवाले की है ?  (शिवबाबा के) श्रीमत पर पूर्ण रीति से चल रहे हो ?  श्रीमत पर चलना अर्थात् हर कर्म में अलौकिकता लाना |  शिवबाबा के वरसे का पूरा अधिकारी अपने को समझते हो ?  जो वर्से के अधिकारी बनते हैं, उन्हों का सर्व के ऊपर अधिकार होता है, वह कोई भी बात के अधीन नहीं होते |  अगर अधीन होते हैं देह के, देह के सम्बन्धियों वा देह के कोई भी वस्तुओं से तो ऐसे अधीन होनेवाले अधिकारी नहीं हो सकते |  अधिकारी अधीन नहीं होते हैं |  सदैव अपने को अधिकारी समझने से कोई भी माया के रूप के अधीन बन्ने से बाख जायेंगे |  हमेशा यह चेक करना कि अलौकिक कर्म कितने किये हैं और लौकिक कर्म कितने किये हैं ?  अलौकिक कर्म औरों को अलौकिक बनाने की प्रेरणा देंगे |  सभी ने यह लक्ष्य रखा है कि हम सभी ऊँचे ते ऊँचे बाप के बच्चे ऊँचे ते ऊँचा राज्य पद प्राप्त करेंगे वा जो मिलेगा वाही ठीक है ?  जब ऊँचे से ऊँचे बाप के बच्चे हैं तो लक्ष्य भी ऊँचा रखना है |  जब अविनाशी आत्मिक स्थिति में रहेंगे तब ही अविनाशी सुख की प्राप्ति होगी |  आत्मा अविनाशी है ना |

मधुबन में आकर मधुबन के वरदान को प्राप्त किया ?  वरदान, विबर म्हणत के सहज ही मिलता है |  अव्यक्ति स्थिति में अव्यक्ति आनंद, अव्यक्ति स्नेह, अव्यक्ति शक्ति इन सभी की प्राप्ति सहज रीति होती है |  तो ऐसा वरदान सदैव कायम रहे, इसकी कोशिश की जाती है |  सदैव वरदानों की याद में रहने से यह वरदान अविनाशी रहेगा |  अगर वरदाता को भूले तो वरदान भी ख़त्म |  इसलिए वरदाता को कभी अलग नहीं करना |  वरदाता साथ है तो वरदान भी साथ है |  सारी सृष्टि में सभी से प्रिय वास्तु (शिवबाबा) वाही है तो उनकी याद भी स्वतः ही रहनी चाहिए |  जबकि है ही प्रिय में प्रिय एक तो फिर उनकी याद भूलते क्यों ?  ज़रूर और कुछ याद आता होगा |  कोई भी बात बिना कारन के नहीं होती |  विस्मृति का भी कारण है |  विस्मृति के कारन प्रिय वास्तु दूर हो जाती है |  विस्मृति का कारन है अपनी कमज़ोरी |  जो श्रीमत मिलती है उन पर पूरी रीति से न चलने कारन कमज़ोरी आती है |  और कमज़ोरी के कारन विस्मृति होती है |  विस्मृति में प्रिय वास्तु भूल जाती है |  इसलिए सदैव कर्म करने के पहले श्रीमत की स्मृति रख फिर हर कर्म करो |  तो फिर वह कर्म श्रेष्ठ होगा |  श्रेष्ठ कर्म से श्रेष्ठ जीवन स्वतः ही बनती है |  इसलिए हर कार्य के पहले अपनी चेकिंग करनी है |  कर्म करने के बाद चेकिंग करने से जो उल्टा कर्म हो गया उसका तो विकर्म बन गया |  इसलिए पहले चेकिंग करो फिर कर्म करो |

ईश्वरीय पढ़ाई बहुत सहज और सरल रीति किसको देने का तरीका आता है ?  एक सेकंड में किसको बाप का परिचय दे सकते हो ?  जितना औरों को प्परिचय देंगे उतना ही अपना भविष्य प्रालब्ध बनायेंगे |  यहाँ देना और वहाँ लेना |  तो गोया लेना ही है  | जितना देते रहो उतना समझो हम लेते हैं |  इस ज्ञान का भी प्रत्यक्ष फल और भविष्य के प्रालब्ध प्राप्ति का अनुभव करना है |  वर्तमान के प्राप्ति के आधार पर ही भविष्य को समझ सकते हो |  वर्तमान अनुभव भविष्य को स्पष्ट करता है |  अपने को किस रूप में समझकर चलते हो ?  मैं शक्ति हूँ, जगत की माता हूँ – यह भावना रहती है ?  जो जगत माता का रूप है उसमे जगत के कल्याण का रहता है |  शिवशक्ति रुप्प में कोई भी कमज़ोरी नहीं रहेगी |  तो मैं जगतमाता हूँ और शिवशक्ति हूँ, यह दोनों रूप स्मृति में रखना तब मायाजीत बनेंगे |  और विश्व के कल्याण की भावना से कई आत्माओं के कल्याण के निमित्त बनेंगे |  नष्टोमोहा सम्बन्ध से वा अपने शरीर से बने हो ?  नष्टोमोहा की लास्ट स्टेज कहाँ तक है ?  जितना नष्टोमोहा बनेंगे उतना स्मृति रूप बनेंगे |  तो स्मृति को सदा कायम रखने के लिए साधन है नष्टोमोहा बनना |  नष्टोमोहा बनना सहज है वा मुश्किल है ?  जब अपने आप को समर्पण कर देंगे तो फिर सभी सहज होगा |  अगर समर्पण न कर के अपने ऊपर रखते हो तो मुश्किल भासता है |  सहज बनाने का मुख्य साधन है – समर्पण करना |  बाप को जो चाहिए वो करावे |  जैसे मशीन होती हैं, उन द्वारा सारा कारखाना चलता है |  मशीन का काम है कारखाने को चलाना |  वैसे हम निमित्त हैं |  चलाने वाला जैसे चलावें |  हमको चलना है |  ऐसा समझने से मुश्किलात फील नहीं होगी |  या स्थिति दिन प्रति दिन परिपक्व करनी है |  इस मुख्य बात पर अटेंशन रखना है |  जितना स्वयं को समर्पण करते हैं बाप के आगे, उतना ही बाप भी उन बच्चों के आगे समर्पण होते हैं |  अर्थात् जो बाप का खज़ाना है वह स्वतः ही उनका बन जाता है |  जो गुण अपने में होता है वह किसको देना मुश्किल क्यों ?  समर्पण करना और कराना – यही ब्राह्मणों का धंधा है |  जो है ही ब्राह्मणों का धंधा तो ब्राह्मणों के सिवाए और कौन जानेंगे |  जैसे बाप थोड़े में राज़ी नहीं होता बच्चों को भी थोड़े में राज़ी नहीं होना है |

निश्चय की निशानी क्या है ?  विजय |  जितना निश्चयबुद्धि होंगे उतना ही सभी बैटन में विजयी होंगे |  निश्चयबुद्धि की कभी हार नहीं होती |  हार होती है तो समझना चाहिए कि निश्चय की कमी है |  निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों में से हम एक रत्न हैं ऐसे अपने को समझना है |  विघ्न तो आएंगे, उन्हों को ख़त्म करने की युक्ति है – सदैव समझो कि यह पेपर है |  अपनी स्थिति की परख यह पेपर कराता है |  कोई भी विघ्न आये तो उनको पेपर समझ पास करना है |  बात को नहीं देखना है लेकिन पेपर समझना है |  पेपर में भी भिन्न-भिन्न क्वेश्चन होते हैं – कभी मनसा का, कभी लोक-लाज का, कभी देशवासियों का क्वेश्चन आएगा |  परन्तु इसमें घबराना नहीं है |  गहराई में जाना है |  वातावरण ऐसा बनाना चाहिए जो न चाहते भी कोई खींच आये |  जितना खुद अव्यक्त वायुमंडल बनाने में बिजी रहेंगे |  उतना स्वतः सभी होता रहेगा |  जैसे रस्ते जाते कोई खुशबू भी न चाहते हुए खिचेंगी |

जो लक्ष्य रखा जाता है उसको पूर्ण करने के लिए ऐसे लक्षण भी अपने में भरने हैं |  ढीले कोशिश वाले कहाँ तक पहुँचेंगे ?  कोशिश शब्द ही कहते रहेंगे तो कोशिश में ही रह जायेंगे |  एम तो रखना है कि करना ही है |  कोशिश अक्षर कहना कमजोरी है |  कमजोरी को मिटाने के लिए कोशिश शब्द को मिटाना है |  निश्चय से विजय हो जाती है |  संशय लाने से शक्ति कम हो जाती है |  निश्चयबुद्धि बनेंगे तो सभी का सहयोग भी मिलेगा |  कोई भी कार्य करना होता है तो सदैव यही सोचा जाता है कि मेरे बिना कोई कर नहीं सकता तब ही सफ़लता होती है |  आज से कोशिश अक्षर ख़त्म करो |  मैं शिवशक्ति हूँ |  शिवशक्ति सभी कार्य कर सकती है |  शक्तियों की शेर पर सवारी दिखाते हैं |  किस भी प्रकार माया शेर रूप में आये डरना नहीं है |  शिवशक्ति कभी हार नहीं खा सकती |  अभी समय ही कहाँ है |  समय के पहले अपने को बदलने से एक का लाख गुणा मिलेगा बदलना ही है, तो ऐसे बदलना चाहिए |  याद आता है कि अगले कल्प भी वारसा लिया था |  अपने को पुराना समझने से वह कल्प पहले की स्मृति आने से पुरुषार्थ सहज हो जाता है |  क्योंकि निश्चय रहता है कल्प पहले भी मैंने लिया था |  अब भी लेकर छोड़ेंगे |  कल्प पहले की स्मृति शक्ति दिलानेवाली होती है |  अपने को नए समझेंगे तो कमजोरी के संकल्प आयेंगे |  पा सकेंगे वा नहीं |  लेकिन मैं हूँ ही कल्प पहले वाला इस स्मृति से शक्ति आएगी |  सदैव अपने को हिम्मतवान बनाना चाहिए |  हिम्मत हारना नहीं चाहिए |  हिम्मत से मदद भी मिलेगी |  हम सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे हैं, बाप को याद किया, यही हिम्मत है |  बाप को याद करना सहज है व मुश्किल ?  सहज करने में सहज हो जाता है |  यह तो मेरा कर्त्तव्य ही है |  फ़र्ज़ है |  क्या करूँ यह संकल्प आने से मुश्किल हो जाता है |  कभी भी अपने अन्दर कमज़ोर संकल्प को नहीं रहने देना |  अगर मन में कमज़ोर संकल्प उत्पन्न भी हो जायें तो उनको वहां ही ख़त्म कर शक्ति शाली बनाना है |  अब तक भी अगर कोशिश करते रहेंगे तो अव्यक्त कशिश का अनुभव कब करेंगे ?  जब तक कोशिश है तब तक अव्यक्ति कशिश अपने में नहीं आ सकती है |  यह भाषा ही कमजोरी की है |  सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे यह नहीं कह सकते |  उनके संकल्प, वाणी सभी निश्चय के होंगे |  ऐसी स्थिति बनानी है |  सदैव चेक करो कि संकल्प रूपी फाउंडेशन मज़बूत है |  तीव्र पुरुषार्थी की चलन में यह विशेषता होगी जो उनके संकल्प, वाणी, कर्म तीनों ही एक समान होंगे |  संकल्प उंच हों और कर्म कमज़ोर हों तो उनको तीव्र पुरुषार्थी नहीं कहेंगे |  तीनों की समानता चाहिए |  सदैव यह समझना चाहिए |  जो कि माया कभी-कभी अपना रूप दिखाती है यह सदैव के लिए विदाई लेने आती है |  विदाई के बदले निमंत्रण दे देते हो |  सदैव शिवबाबा के साथ हूँ, उनसे अलग होंगे ही नहीं तो फिर कोई क्या करेंगे |  कोई बिजी रहता है तो फिर तीसरा डिस्टर्ब नहीं करता है |  समझते हैं तंग करने वाला कोई नहीं आये |  तो एक बोर्ड लगा देते हैं |  आप भी ऐसा बोर्ड लगाओ |  तो माया लौट जाएगी |  आने का स्थान ही नहीं मिलेगा |  कुर्सी खाली होती है तो कोई बैठ जाता है |

माताओं के लिए तो बहुत सहज है सिर्फ़ बाप को याद करना, बस |  बाप को याद करने से ज्ञान आपे ही इमर्ज हो जाता है |  बाप को जो याद करता है उनको हर कार्य में मदद बाप की मिल जाती है |  याद की इतनी शक्ति है जो अनुभव यहाँ पाते हो वह वहाँ भी स्मृति में रखेंगे तो अविनाशी बन जायेंगे |  बुद्धि में बार-बार यही स्मृति रखो हम परमधाम निवासी हैं |  कर्त्तव्य अर्थ यहाँ आये हैं |  फिर वापस जाना है |  जितना बुद्धि को इन बातों में बिजी रखेंगे तो फिर भटकेंगे नहीं |  ज्ञान भी किसको युक्ति से सुनना है |  सीधा ज्ञान सुनाने से घबरा जायेंगे |  पहले तो ईश्वरीय स्नेह में खींचना है |  शरीरधारी को चाहिए धन, बाप को चाहिए मन |  तो मन को जहा लगाना है वहाँ हो लगा रहे और कहाँ प्रयोग न हो |  योगयुक्त अव्यक्त स्थिति में रह दो बोल बोलना भी भाषण करना ही है |  एक घंटे के भाषण का सार दो शब्द में सुना सकते हो |

दिन प्रतिदिन कदम आगे समझते हो ?  ऐसे भी नहीं सोचना कि अभी समय पड़ा है, पुरुषार्थ कर लेंगे |  लेकिन समय के पहले समाप्ति करके और इस स्थिति का अनुभा प्राप्त करना है |  अगर समय आने पर इस स्थिति का अनुभव करेंगे तो समय के साथ स्थिति भी बदल जाएगी |  समय समाप्त तो फिर अव्यक्त स्थिति का अनुभव भी समाप्त हो, दूसरा पार्ट आ जायेगा |  इसलिए पहले से ही अव्यक्त स्थिति का अनुभव करना है |  कुमार्यां दौड़ने में तेज़ होती हैं |  तो इस ईश्वरीय दौड़ में भी तेज़ जाना है |  फर्स्ट आने वाले ही फर्स्ट के नजदीक आयेंगे |  जैसे साकार फर्स्ट गया ना |  लक्ष्य तो ऊँचा रखना है |  लक्ष्य सम्पूर है तो पुरुषार्थ भी सम्पूर्ण करना है, तब ही सम्पूर्ण पद मिल सकता |  सम्पूर्ण पुरुषार्थ अर्थात् सभी बातों में अपने को संपन्न बनाना |  बड़ी बात तो है नहीं |  जानने के बाद याद करना मुश्किल होता है क्या ?  जानने को ही नॉलेज कहा जाता है |  अगर नॉलेज, लाइट और मिघ्त नहीं है तो वह नॉलेज ही किस काम की, उनको जानना नहीं कहा जायेगा |  यहीं जानना और करना एक है |  औरों में जानने और करने में फर्क होता है |  नॉलेज वह चीज़ है जो वह रूप बना देती है |  ईश्वरीय नॉलेज क्या रूप बनाएगी ?  ईश्वरीय स्थिति |  तो ईश्वरीय नॉलेज लेनेवाले ईश्वरीय रूप में क्यों नहीं आएंगे |  थ्योरी और चीज़ है |  जानना अर्थात् बुद्धि में धारणा करना और चीज़ है |  धारणा से कर्म ऑटोमेटिकली हो जाता है |  धारणा का अर्थ ही है उस बात को बुद्धि में समाना |  जब बुद्धि में समां जाते हैं तो फिर बुद्धि के डायरेक्शन अनुसार कर्मेन्द्रियाँ भी वह करती हैं |  नॉलेजफुल बाप के हम बच्चे हैं और ईश्वरीय नॉलेज की लाइट मिघ्त हमारे साथ है |  ऐसे समझ कर चलना है |  नॉलेजक सिर्फ सुनना नहीं लेकिन समाना है |  भोजन खाना और चीज़ है हज़म करना और चीज़ है |  खाने से शक्ति नहीं आएगी |  हज़म करने से शक्ति कहाँ से आ जाती है, खाए हुए भोजन को हज़म करने से ही शक्ति रूप बनता है |  शक्तिवान बाप के बच्चे और कुछ कर न सकें, यह हो सकता है ?  नहीं तो बाप के नाम को भी शरमाते हैं |  सदैव यही एम रखनी चाहिए हम ऐसा कर्म करें जो मिसाल बन दिखाएं |  इंतज़ार में नहीं रहना है लेकिन एग्जाम्पल बनना है |  बाप एग्जाम्पल बना ना |

अपने घर में आये हो यह समझते हो ?  जब कोई भटका हुआ अपने घर पहुँच जाता है तो जैसे विश्राम मिल जाता है |  तो यहाँ विश्राम की भासना आती है |  स्थान मिलने से विश्राम की स्थिति हो जाती है |  सदैव विश्राम स्थिति में समझो |  भाल कार्य अर्थ जाओ तो भी यह स्थिति का अनुभव साथ ले जाना |  इसको साथ रखेंगे तो फिर कितना भी कार्य करते हुए स्थिति विश्राम की रहेगी |  विश्राम अवस्था में शांति सुख का अनुभव होता है |  अपने में जब शक्ति आ जाती है तो फिर वातावरण का भी असर अपने पर नहीं होता, लेकिन हमारा असर वातावरण पर रहे |  सर्वशक्तिवान वातावरण है या बाप ?  जबकि सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे हो तो फिर वातावरण आप से शक्तिशाली क्यों ?  अपनी शक्ति भूलने से ही वातावरण का असर होता है |  जैसे डॉक्टर कोई भी बीमारी वाले पेशेंट के आगे जायेगा तो भी उनको असर नहीं होगा |  वैसे ही अपनी स्मृति रखकर सर्विस करनी है |  यह अपने में शक्ति रखो कि हमें वातावरण को बनाना है ना कि वातावरण हमको बनावे |  युगल होते हुए भी अकेली आत्मा की स्मृति में रहते हो ?  आत्मा अकेली है ना |  अगर आत्मा को सम्बन्ध में आना भी है तो किसके ?  सर्व सम्बन्ध किससे हैं ?  एक से |  तो एक से दो भी बनना है बाप और बच्चे |  तीसरा कोई सम्बन्ध नहीं |  सर्व सम्बन्ध को एक से जोड़ना है |  एक से दूसरा शिवबाबा |  इस स्थिति को ही उंच स्थिति कहा जाता है |  तीसरी कोई भी चीज़ देखते हुए देखने में न आये |  अगर देखना है तो भी एक को, बोलना भी उनसे |  ऐसी स्थिति रहने से ही माया जीत बनेंगे |  जो माया जीत बनते हैं वह जगतजीत बन जाते हैं |  यह शुद्ध स्नेह सारे कल्प में एक ही बार मिलता है |  ऐसे स्नेह को हम पाते हैं यह सदैव याद रखना है |  जो कोई को प्राप्त नहीं हो सकता वह हमें प्राप्त हुआ है |  इसी नशे और निश्चय में रहना है |  दिल्ली में नाम बाला होना, भारत में नाम बाला होना है |

इतनी ज़िम्मेवारी दिल्ली वालों को उठानी है |  समय कम है सर्विस बहुत है |  इसी रफ़्तार से जब सर्विस करेंगे तब ही सभी को सन्देश पहुंचेगा |  कोई को धनवान बनाने के लिए मौका देना भी महादान है, महादान का फल भी इतना मिलता है |  बाप को सदैव साथ रखेंगे तो माया देखेगी इसके साथ सर्वशक्तिवान बाप है तो वह दूर से ही भाग जाएगी |  अकेला देखती है तब हिम्मत रखती है |  शिकार करने जब जाते हैं तो कोई भी जानवर वार न करें इसके लिए आ जलाते हैं |  वैसे ही याद की अग्नि जली हुई होगी तो माया आ नहीं सकेगी |  यह लगन की अग्नि बुझनी नहीं चाहिए |  साथ रखने से शक्ति आपे ही आ जाएगी |  फिर विजय ही विजय है |

बापदादा को बुज़ुर्ग माताएं सबसे प्यारी लगती हैं |  क्योंकि बहुत दुखों से थकी हुई हैं |  तो थके हुए बच्चों पर बाप का स्नेह रहता है |  इतना स्नेह बच्चों को भी रखना है |  घर बैठे भी याद की यात्रा में पास हो गए तो भी आगे बढ़ सकते हो |  जितना याद की यात्रा में सफल होंगे तो मन की भावनाएं भी शुद्ध हो जायेंगी |  सभी सर्विस में सहयोगी हो रहते हो ?  जितना दुश्रों को सन्देश देते हैं उतना अपने को भी सम्पूर्णता का सन्देश मिलता है |  क्योंकि दूसरों को समझाने से अपने को सम्पूर्ण बनाने का न चाहते हुए भी ध्यान जाता हैं |  यह सर्विस करना भी अपने को सम्पूर्ण बनाने का मीठा बंधन है |  इस बंधन में जितना अपने को बाँध लेंगे उतना ही सर्व संबंधों से मुक्त होते जायेंगे |  सर्व बंधनों से मुक्त होने का साधन क्या हुआ ?  एक बंधन में अपने को बांधना |  यह मीठा बंधन भी अब का ही है |  फिर कभी नहीं होता |  सभी इस ईश्वरीय बंधन में बंधी हुई आत्माएं हैं |  श्रेष्ठ कर्म करने से ही श्रेष्ठ पद मिल सकता है और श्रेष्ठाचारी भी बन जाते हैं |  एक ही श्रेष्ठ कर्म से वर्मान भी बन जाता है और भविष्य भी बनता |  जिससे दोनों ही श्रेष्ठ बन जायें वह कर्म करना चाहिए |  अहमदाबाद को सभी से ज्यादा सर्विस करनी है क्योंकि अहमदाबाद सभी सेंटर्स का बीज रूप है |  बीज में ज्यादा शक्ति होती है |  खूब ललकार करो |  जो गहरी नींद में सोये हुए भी जाग उठें |  कुमारियाँ तो बहुत कमाल कर सकती हैं |  एक कुमारी में जितनी शक्ति है तो इतनी सर्विस में सफलता दिखानी चाहिए |  कुमारियाँ पुरुषार्थ में, सर्विस में, सभी से तेज़ जा सकती हैं |  शक्तियां सर्विस में आगे हैं वा पाण्डव ?  अपना यादगार है – हम कल्प पहले वाले पाण्डव हैं |  कितने बार पाण्डव बने हो जो अनगिनत बार होती है वह पक्की याद रहती है ना |  यह स्मृति रहेगी तो फिर कभी भी विस्मृति नहीं होगी |  कल्प पहले भी हम ही थे अब भी हम ही हैं यह नशा और निश्चय रखना है |  हम ही हक़दार हैं, किसके ?  उंच ते उंच बाप के |  यह याद रहने से फिर सदैव एकरस अवस्था रहेगी |  एक की याद में रहने से ही एकरस अवस्था होगी |

अव्यक्त में सर्विस कैसे होती है ?  यह अनुभव होता जाता है ?  अव्यक्त में सर्विस का साथ कैसे सदैव रहता है |  यह भी अनुभव होता है ?  जो वायदा किया है कि स्नेही आत्माओं के हर सेकंड साथ ही है |  ऐसे सदैव साथ का अनुभव होता है ?  सिर्फ रूप बदला है लेकिन कर्त्तव्य वाही चल रहा है |  जो भी स्नेही बच्चे हैं उन्हों के ऊपर छत्र रूप में जज़र आता है |  छत्रछाया के निचे सभी कार्य चल रहा है |  ऐसी भासना आती है |  व्यक्त से अव्यक्त, अव्यक्त से व्यक्त में आना यह सीढ़ी उतरना और चढ़ना जैसे आदत पद गयी है |  अभी-अभी वहां, अभी अभी यहाँ |  जिसकी ऐसी स्थिति हो जाती है, अभ्यास हो जाता है उसको यह व्यक्त देश भी जैसे अव्यक्त भासता है |  स्मृति और दृष्टि बदल जाती है |  सभी एवररेडी बनकर बठे हुए हो ?  कोई भी देह के हिसाब किताब से भी हल्का |  वतन में शुरू-शुरू में पक्षियों का खेल दिखलाते थे, पक्षियों को उड़ाते थे |  वैसे यह आत्मा भी पक्षी है जब चाहे तब उड़ सकती है |  वह तब हो सकता है जब अभ्यास हो |  जब खुद उड़ता पक्षी बनें तब औरों को भी एक सेकंड में उड़ा सकते हैं |  अभी तो समय लगता है |  अपरोक्ष रीति से वतन का अनुभव बताया |  अपरोक्ष रूप से कितना समय वतन में साथ रहते हो ?  जैसे इस वक्त जिसके साथ स्नेह होता है, वह कहाँ विदेश में भी है तो उनका मन ज्यादा उस तरफ़ रहता है |  जिस देश में वह होता है उस देश का वासी अपने को समझते हैं |  वैसे ही तुमको अब सूक्ष्मवतनवासी बनना है |  सूक्ष्मवतन को स्थूलवतन में इमर्ज करते हो वा खुद को सूक्ष्मवतन में साथ समझते हो ?  क्या अनुभव है ?  सूक्ष्मवतनवासी बाप को यहाँ इमर्ज करते हो वा अपने को भी सूक्ष्मवतनवासी बनाकर साथ रहते हो ?  बापदादा तो यही समझते हैं कि स्थूल वतन में रहते भी सूक्ष्मवतनवासी बन जाते, यहाँ जो भी बुलाते हो यह भी सूक्ष्मवतन के वातावरण में ही सूक्ष्म से सर्विस ले सकते हो |  अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर मदद ले सकते हो |  व्यक्त रूप में अव्यक्त मदद मिल सकती है |  अभी ज्यादा समय अपने को फ़रिश्ते ही समझो |  फरिस्थों की दुनिया में रहने से बहुत ही हल्कापन अनुभव होगा जैसे कि सूक्ष्मवतन को ही स्थूलवतन में बसा दिया है |  स्थूल और सूक्ष्म में अंतर नहीं रहेगा |  तब सम्पूर्ण स्थिति में भी अंतर नहीं रहेगा |  यह व्यक्त देश जैसे अव्यक्त देश बन जायेगा |  सम्पूर्णता के समीप आ जायेंगे |  जैसे बापदादा व्यक्त में आते भी हैं तो भी अव्यक्त रूप के अव्यक्त देश के अव्यक्ति प्रवाह में रहते हैं |  वाही बच्चों को अनुभव कराने लिए आते हैं |  ऐसे आप सबहीं भी अपने अव्यक्त स्थिति का अनुभव औरों को कराओ |  जब अव्यक्त स्थिति की स्टेज सम्पूर्ण होगी तब ही अपने राज्य में साथ चलना होगा |  एक आँख में अव्यक्त सम्पूर्ण स्थिति दूसरी आँख में राज्य पद |  ऐसे ही स्पष्ट देखने में आएंगे जैसे साकार रूप में दिखाई पड़ता है |  बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी |  बस यह बनकर फिर यह बनेंगे |  यह स्मृति रहती है |  भविष्य की रुपरेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है |  जितना-जितना फ़रिश्ते लाइफ के नज़दीक होंगे उतना-उतना राजपद को भी सामने देखेंगे |  दोनों ही सामने |  आजकल कई ऐसे होते हैं जिनको अपने पस्त की पूरी स्मृति रहती है |  तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृति में रहे यह बनना है |  वह भविष के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे |  मर्ज नहीं | इमर्ज होंगे |  अच्छा-

25-01-70              ओम शान्ति                        अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


यादगार कायम करने की विधि  २५-०१-१९७०

अव्यक्त स्थिति ही मुख्य सब्जेक्ट है |  व्यक्त में रहते कर्म करते भी अव्यक्त स्थिति रहे |  इस सब्जेक्ट में ही पास होना है |  अपने बुद्धि की लाइन को क्लियर रखना है |  जब रास्ता क्लियर होता है तो जल्दी-जल्दी दौड़कर मज़िल पर पहुंचना होता है |  पुरुषार्थ की लाइन में कोई रुकावट हो तो उसको मिटाकर लाइन क्लियर करना – इस साधन से ही अव्यक्त स्थिति को प्राप्ति होती है |  मधुबन में आकर कोई-न-कोई विशेष गुण सभी को देना यही यादगार है |  वह तो हो गया जड़ यादगार |  लेकिन यह अपने गुण की याद देना यह है चैतन्य यादगार |  जो सदैव याद करते रहते |  कभी कहीं पर जाओ तो यही लक्ष्य रखना है कि जहाँ जाएँ वहां यादगार कायम करें |  यहाँ से विशेष स्नेह अपने में भर के जायेंगे तो स्नेह पत्थर को भी पानी कर देगा |  यह आत्मिक स्नेह की सौगात साथ ले जाना |  जिससे किसी पर भी विजय हो सकती है |  समय ज्यादा समझते हो वा कम ?  तो अब कम समय में १००% तक पहुँचने की कोशिश करनी है |  जितनी भी अपनी हिम्मत है वह पूरी लगानी है |  एक सेकंड भी व्यर्थ न जाए इतना ध्यान रखना है |  संगम का एक सेकंड कितना बड़ा है |  अपने समय और संकल्प दोनों को सफल करना है |  जो कार्य बड़े न कर सकें वह छोटे कर सकते हैं |  अभी तो वह कार्य भी रहा हुआ है |  अब तक जो दौड़ी लगाईं वह तो हुई लेकिन अब जम्प देना है तब लक्ष्य को पा सकेंगे |  सेकंड में बहुत बातों को परिवर्तन करना – यह है जम्प मारना |  इतनी हिम्मत है ?  जो कुछ सुना है उनको जीवन में लाकर दिखाना है |  जिसके साथ स्नेह रखा जाता है, उन जैसा बन्ने का होता है |  तो जो भी बापदादा के गुण है वह खुद में धारण करना, यही स्नेह का फ़र्ज़ है |  जो बाप की श्रेष्ठता है उसको अपने में धारण करना है |  यह है स्नेह |  एक भी विशेषता में कमी न रहे |  जब सर्व गुण अपने में धारण करेंगे तब भविष्य में सर्वगुणसंपन्न देवता बनेंगे |  यही लक्ष्य रखना है कि सर्व गुण संपन्न बनें |  बाप के गुण सामने रख अपने को चेक करो कि कहाँ तक हैं |  कम परसेंटेज भी न हो |  परसेंटेज भी सम्पूर्ण हो तब वहां भी सम्बन्ध में नजदीक आ सकेंगे |   

अब रूह को ही देखना है |  जिस्म को बहुत देख-देखकर थक गए हो |  इसलिए अब रूह को ही देखना है |  जिस्म को देखने से क्या मिला ?  दुखी ही बने |  अब रूह-रूह को देखता है तो रहत मिलती है |  शूरवीर हो ना ! शूरवीर की निशानी क्या होती है ?  उनकों कोई भी बात को पार करना मुश्किल नहीं लगता है और समय भी नहीं लगता है |  उनका समय सिवाए सर्विस के अपने विघ्नों आदि को हटाने में नहीं जाता है |  इसको कहा जाता है शूरवीर |  अपना समय अ[में विघ्नों में नहीं, लेकिन सर्विस में लगाना चाहिए |  अब तो समय बहुत आगे बढ़ गया है |  इस हिसाब से अब तक वह बातें बचपन की हैं |  छोटे बच्चे नाज़ुक होते हैं |  बड़े बहादूर होते हैं |  तो पुरुषार्थ में बचपना न हो |  ऐसा बहादूर होना चाहिए |  कैसी भी परिस्थिति हो, क्या भी हो, वायुमंडल कैसा भी हो |  लेकिन कमज़ोर न बनें, इसको शूरवीर कहा जाता है |  शारीरिक कमजोरी होती है तो भी असर हो जाता है – मौसम, वायु आदि का |  तंदुरुस्त को असर नहीं होता है |  तो यह भी वायुमंडल का असर नाज़ुक को होता है |  वायुमंडल कोई रचयिता नहीं है |  वह तो रचना है |  रचयिता ऊँचा वा रचना ?  (रचयिता) तो फिर रचयिता  रचना के अधीन क्यों ?  अब शूरवीर बन्ने का अपना स्मृति दिवस याद रखना |  यह स्मृति भूलना नहीं |  ऐसा नक्शा बनकर जाओ जो आपके नक़्शे में बाप को देखें |  अपने को सम्पूर्णता का नक्शा दिखाना है |  हिम्मत है तो मदद ज़रूर मिल जाएगी |  अब यह समझते हो कि यहाँ आकर ढीलेपन में तेज़ आई है ?  अभी पुरुषार्थ म इ ढीले नहीं बनना है |  सम्पूर्ण हक लेने के लिए सम्पूर्ण आहुति भी देनी है |  कोई भी यग्य रचा जाता है तो वह सम्पूर्ण सफल कैसे होता ?  जबकि आहुति डाली जाती है |  अगर आहुति कम होगी तो यग्य सफल नहीं हो सकता |  यहाँ भी हरेक को यह देखना है कि आहुति डाली है ?  ज़रा भी आहुति की कमी रह गयी तो सम्पूर्ण सफ़लता नहीं होगी |  जितना और इतना का हिसाब है |  हिसाब करने में धर्मराज भी है |  उनसे कोई भी हिसाब रह नहीं सकता |  इसलिए जो भी कुछ आहुति में देना है वह सम्पूर्ण देना है और फिर सम्पूर्ण लेना है |  देने में सम्पूर्णता नहीं तो लेने में भी नहीं होगी |  जितना देंगे उतना ही लेंगे |  जब मालूम पद गया कि सफलता किस्मे है फिर भी सफल न करेंगे तो क्या होगा ?  कमी रह जाएगी इसलिए सदैव ध्यान रखो कि कहाँ कुछ रह तो नहीं गया |  मन्सा में, वाणी में, कर्म में कहाँ भी कुछ रहना नहीं चाहिए |  कोई भी कार्य का जब समाप्ति का दिन होता है तो उस समय चारों ओर देखा जाता है कि कुछ रह तो नहीं गया |  वैसे अभी भी समाप्ति का समय है |  अगर कुछ रह गया तो वह रह ही जायेगा |  फिर स्वीकार नहीं हो सकता |  इसको सम्पूर्ण आहुति भी नहीं कहा जायेगा |  इसलिए इतना ध्यान रखना है |  अभी कमी रखने का समय बीत चूका |  अब समय बहुत तेज़ आ रहा है |  अगर समय तेज़ चला गया और खुद ढीले रह गए तो फिर क्या होगा ?  मंज़िल पर पहुँच सकेंगे ?  फिर सतयुगी मंजिल के बजाये त्रेता में जाना पड़ेगा |  जैसे समय तेज़ दौड़ रहा है वैसे खुद को भी दौड़ना है |  स्थूल में भी जब कोई गाडी पकडनी होती है तो समय को देखना पड़ता है |  नहीं तो रह जाते हैं |  समय तो चल ही रहा है |  कोई के लिए समय को रुंकना नहीं है |  अब ढीले चलने के दिन गए |  दौड़ी के भी दिन गए |  अब है जम्प लगाने के दिन |  कोई भी बात की कमी फील होती है तो उसको एक सेकंड में परिवर्तन में लाना इसको कहा जाता है जम्प |  देखने में ऊँचा आता हैं लेकिन है बहुत सहज |  सिर्फ निश्चय और हिम्मत चाहिए |  निश्चय वालों की विजय तो कल्प पहले भी हुई थी वह अभी भी हुई पड़ी है |  इतना पक्का अपने को बनाना है |  सेकंड सेकंड मन, वाणी और कर्म को देखना है |  बापदादा को यह देखना कोई मुश्किल नहीं |  देखने के लिए अब कोई आधार लेने की आवश्यकता नहीं है |  कहाँ से भी देख सकते हैं |  पुरानों से नए में और ही उमंग होता है कि हम करके दिखायेंगे |  ऐसे तीव्र स्टूडेंट्स भी हैं |  नए ही कमाल कर सकते हैं क्योंकि उन्हों को समय भी स्पष्ट देखने में आ रहा है |  समय का भी सहयोग है, परिस्थितियों का भी सहयोग है |  परिस्थितियाँ भी अब दिखला रही हैं कि पुरुषार्थ कैसे करना है |  जब परीक्षाएं शुरू हो गयी तो फिर पुरुषार्थ कर नहीं सक्तेंगे |  फिर फाइनल पेपर शुरू हो जायेगा |  पेपर के पहले पहुँच गए हो, यह भी अपना सौभाग्य समझना जो ठीक समय पर पहुँच गए हो |  पेपर देने के लिए दाखिल हो सके हो |  पेपर शुरू हो जाता है फिर गेट बंध हो जाता है |  शुरू में आये उन्हों को वैराग्य दिलाया जाता था |  आजकाल की परिस्थितियाँ ही वैराग्य दिलाती है |  आप लोग की धरनी बनने में देरी नहीं है |  सिर्फ़ ज्ञान के निश्चय का पक्का बीज डालेंगे और फल तैयार हो जायेगा |  यह ऐसा बीज है जो बहुत जल्दी फल दे सकता है |  बीज पावरफुल है |  बाकी पालना करना, देखभाल करना आप का काम है |  बाप सर्वशक्तिवान और बच्चों को संकल्पों को रोकने की भी शक्ति नहीं !  बाप सृष्टि को बदलते हैं, बच्चे अपने को भी नहीं बदल सकते! यही सोचो कि बाप क्या है और हम क्या है ?  तो अपने ऊपर खुद ही शर्म आएगा |  अपनी चलन को परिवर्तन में लाना है |  वाणी से इतना नहीं समझेंगे |  परिवर्तन देख खुद ही पूछेंगे कि आप को ऐसा बनानेवाला कौन ?  कोई बदलकर दिखता है तो न चाहते हुए भी उनसे पूछते हैं क्या हुआ, कैसे किया, तो आप की भी चलन को देख खुद खींचेंगे |

यह तो निमित्त सेवा केंद्र हैं |  मुख्या केंद्र तो सभी का एक ही है |  ऐसे बेहद की दृष्टि में रहते हो ना | मुख्य केंद्र से ही सभी का कनेक्शन है |  सभी आत्माओं का उनसे कनेक्शन है, सम्बन्ध है |  एक से सम्बन्ध रहता है तो अवस्था भी एकरस रहती है |  अगर और कहाँ सम्बन्ध की राग जाती है तो एकरस अवस्था नहीं रहेगी |  तो एकरस अवस्था बनाने के लिए सिवाए एक के और कुछ भी देखते हुए न देखो |  यह जो कुछ देखते हो वह कोई वास्तु रहने वाली नहीं है |  साथ रहने वाली अविनाशी वास्तु वह एक बाप ही है |  एक की ही याद में सर्व प्राप्ति हो सकती है और सर्व की याद से कुछ भी प्राप्ति न हो तो कौन-सा सौदा अच्छा ?  देखभाल कर सौदा किया जाता है या कहने पर किया जाता है ?  यह भी समझ मिली है कि यह माया सदैव के लिए विदाई लेने थोडा समय मुखड़ा दिखलाती है |  अब विदाई लेने आती है, हार खिलने नहीं |  छुट्टी लेने आती है |  अगर घबराहट आई तो वह कमजोरी कही जाएगी |  कमजोरी से फिर माया का वार होता है |  अब तो शक्ति मिली है ना |  सर्वशक्तिवान के साथ सम्बन्ध है तो उनकी शक्ति के आगे माया की शक्ति क्या हैं ?  सर्वशक्तिवान के बच्चे हैं, यह नशा नहीं भूलना |  भूलने से ही फिर माया वार करती है |  बेहोश नहीं होना है |  होशियार जो होते हैं, वह होश रखते हैं |  आजकल डाकू लोग भी कोई-कोई चीज़ से बेहोश कर देते हैं |  तो माया भी ऐसा करती है |  जो चतुर होते हैं वह पहले से ही जान लेते कि इनका यह तरीका है इसलिए पहले से ही सावधान रहते हैं |  अपने होश को गंवाते नहीं हैं |  इस संजीवनी बूटी को सदैव साथ रखना है |

भल एक मास से आये हैं |  यह भी बहुत है |  एक सेकंड में भी परिवर्तन आ सकता है |  ऐसे नहीं समझना कि हम तो अभी आये हैं, नए हैं, यहाँ तो सेकंड का सौदा है |  एक सेकंड में जन्म सिद्ध अधिकार ले सकते हैं |  इसलिए ऐसा तीव्र पुरुषार्थ करो, यही युक्ति मिलती है |  जो भी बात सामने आये तो यह लक्ष्य रखो कि एक सेकंड में बदल जाये |  सारे कल्प में यही समय है |  अब नहीं तो कब नहीं, यह मन्त्र याद रखना है |  जो भी पुराने संस्कार हैं और पुराणी नेचर है वह बदल कर ईश्वरीय बन जाये |  कोई भी पुराना संस्कार, पुराणी आदतें न रहे |  आपके परिवर्तन से अनेक लोग संतुष्ट होंगे |  सदैव यही कोशिश करनी है कि हमारी चलन द्वारा कोई को भी दुःख न हो |  मेरी चलन, संकल्प, वाणी, हर कर्म सुखदायी हो |  यह है ब्राह्मण कुल की रीति |  जो दूर से ही कोई समझ ले कि यह हम लोगों से  न्यारे हैं |  न्यारे और प्यारे रहना – यह है पुरुषार्थ |  औरों को भी ऐसा बनाना है |  अपने जीवन में अलौकिकता भासती है ?  अपने को देखना कि लोगों से न्यारा अपने को समझते हैं |  अगर याद भूल जाते हैं तो बुद्धि कहाँ रहती है ?  सिर्फ एक तरफ से भूलते हैं तो दुसरे तरफ लगेगी ना |  यह अपने को चेक करो कि अव्यक्त स्थिति से निचे आते हैं तो किस व्यक्त तरफ बुद्धि जाती है ?  ज़रूर कुछ रहा हुआ है तब बुद्धि वहाँ जाती है |  किस बातें ऐसी होती हैं जिनको खींचने से खिंचा जाता है |  कई बातिओं में ढीला छोड़ना भी खींचना होता है |  पतंग को ऊँचा उड़ाने के लिए ढीला छोड़ना पड़ता है |  देखा जाता है इस रीति नहीं खींचेगा तो फिर ढीला छोड़ना चाहिए |  जिससे वह स्वयं खींचेगा |

विघ्नों को मिटाने की युक्तियाँ अगर सदैव याद हैं तो पुरुषार्थ में ढीले नहीं होंगे |  युक्तियाँ भूल जाते हैं तो पुरुषार्थ में ढीला हो जाता है |  एक एक बात के लिए कितनी युक्तियाँ मिली हैं ?  प्राप्ति कितनी बड़ी है और रास्ता कितना सरल है |  जो अनेक जन्म पुरुषार्थ करने पर भी कोई नहीं पा सकते |  वह एक जन्म के भी कुछ घड़ियों में प्राप्त कर रहे हो |  इतना नशा रहता है ना! “इच्छा मात्रं अविद्या” ऐसी अवस्था प्राप्त करने का तरीका बताया |  ऐसी ऊँची नॉलेज और कितनी महीन है |  जीवन में इतना ऊँचा लक्ष्य कोई रख नहीं सकता कि मैं देवता बन सकता हूँ |  यह कब सोचा था कि हम ही देवता थे ?  सोचा क्या था और बनते क्या हो ?  बिन मांगे अमूल्य रत्न मिल जाते हैं |  ऐसे पद्मापद्म भाग्यशाली अपने को समझते हो ?  प्रेसिडेंट आदि भी आपके आगे क्या हैं ?  इतनी ऊँची दृष्टि, इतना ऊँचा स्वमान यद् रहता है कि कब भूल भी जाते हो ?  स्मृति-विस्मृति की चढ़ाई उतारते चढ़ते हो ?  गन्दगी से मछर आदि प्रगट होते हैं इसलिए उनको हटाया जाता है |  वैसे ही अपनी कमजोरी से माया के कीड़े पकड़ लेते हैं |  कमज़ोरी को आने न दो तो माया आयेगी नहीं |  सदैव यह यद् रखो कि सर्वशक्तिवान के साथ हमारा सम्बन्ध है |  फिर कमजोरी क्यों ?  सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे होते भी माया की शक्ति को खलास नहीं मर सकते |  एक बात सदैव याद रखो कि बाप मेरा सर्वशक्तिवान है |  हम सभी से श्रेष्ठ सूर्यवंशी हैं |  हमारे ऊपर माया कैसे वार कर सकती है |  अपना बाप, अपना वंश यद् रखेंगे तो माया कुछ भी नहीं कर सकेगी |  स्मृति स्वरुप बनना है |  इतने जन्म विस्मृति में रहे फिर भी विस्मृति अच्छी लगती है ?  ६३ जन्म विस्मृति में धोखा खाया, अब एक जन्म के लिए धोखे से बचना मुश्किल लगता है ?  अगर बार-बार कमज़ोर बनते, चेकिंग नहीं रखते तो फिर उनकी नेचर ही कमज़ोर बन जाती है |  अवस्था चेक कर अपने को ताक़तवर बनाना है, कमजोरी को बदल शक्ति लानी है |

अभी जो बैठे हैं वह अपे को सूर्यवंशी सितारे समझते हो ?  सूर्यवंशी सितारों का क्या कर्त्तव्य है ?  सूर्यवंशी सितारा माया के अधीन हो सकते हैं ?  सभी मायाजीत बने हो ?  बने हैं वा बनना है ?  मायाजीत का टाइटल अपने ऊपर धारण किया है ?  युगल में भी एक कहते हैं कि मायाजीत बन रहे हैं और एक कहते हैं कि बन गए हैं |  एक ही पढाई, एक ही पढ़नेवाला, फिर भी कोई विजयी बन गए हैं, कोई बन रहे हैं, यह फर्क क्यों ?  अगर अब तक भी त्रुटियाँ रहेंगी तो त्रुटियों वाले त्रेता युग के बन जायेंगे |  और जो पुरुषार्थी हैं वह सतयुग के बनेंगे |  पहले से ही पूरा अभ्यास होगा तो वह अभ्यास मदद देगा |  अगर ऐसा ही अभ्यास रहा, कभी विस्मृति कभी स्मृति तो अंत समय भी  विस्मृति हो सकती है |  जो बहुत समय के संस्कार होते हैं वाही अंत की स्थिति रहती है |  लौकिक रीति से जब कोई शरीर छोड़ते हैं, अगर कोई संस्कार दृढ़ होता है, खान-पान वा पहनने आदि का तो पिछाड़ी समय भी वह संस्कार सामने आता है |  इसलिए अभी से लेकर सदैव स्मृति के संस्कार भरो |  तो अंत में यही मददगार बनेंगे – विजयी बनने में |  स्टूडेंट बहुत समय की पढाई ठीक नहीं पढ़ते हैं तो पेपर ठीक नहीं दे सकते |  बहुत समय का अभ्यास चाहिए |  इसलिए अब ये विस्मृति के अथवा हार खाने के संस्कार मिट जाने चाहिए | अभी वह समय आ गया |  क्योंकि साकार रूप में सम्पूर्णता का सबूत देखा |  साकार सम्पूर्णता को प्राप्त कर चुके, फिर आप कब करेंगे ?  समय की घंटी बज चुकी है | फिर भी घंटी बजने के बाद अगर पुरुषार्थ करेंगे तो क्या होगा ?  बन सकेंगे ?  पहली सीटी बज चुकी है |  दूसरी भी बज गयी |  पहली सीटी थी साकार में माँ की और दूसरी बजी साकार रूप की |  अब तीसरी सीटी बजनी है |  दो सीटी होती हैं तैयार करने की और तीसरी होती है सवार हो जाने की |  दो घंटी इत्तलाव की होती हैं |  तीसरी इत्तलाव की नहीं होती है |  तीसरी होती है सवार हो जाने की |  तीसरी में जो रह गया सो रह गया |  इतना थोडा समय है फिर क्या करना चाहिए ?  अगर तीसरी सीटी पर संस्कारों को समेटना शुरू करेंगे तो फिर रह जायेंगे |  सुनाया था ना कि पेटी बिस्तर कौन-सा है |  व्यर्थ संकल्पों रूपी बिस्तरा और अनेक समस्याओं की पेटी दोनों ही बंद करनी है |  जब दोनों ही समेत कर तैयार होंगे तब जा सकेंगे |  अगर कुछ रह गया तो बुद्धियोग ज़रूर उस तरफ जायेगा |  फिर सवार हो न सकेंगे अर्थात् विजयी बन नहीं सकेंगे |  अब इसे क्या करना पड़े ?  कब कर लेंगे यह `कब’ शब्द को निकाल दो |  `अब’ शब्द को धारण करो |  कब कर लेंगे, धीरे-धीरे करेंगे |  ऐसे सोचनेवाले दूर ही रह जायेंगे |  ऐसा समय अब पहुँच गया है |  इसलिए बापदादा सुना देते हैं फिर कोई उलहना न दे |  समय का भी आधार रखना है |  अगर समय के आधार पर ठहरे तो प्राप्ति कुछ नहीं होगी |  समय के पहले बदलने से अपने किये का फल मिलेगा |  जो करेगा वह पायेगा |  समय प्रमाण किया, वह तो समय की कमाल हुई |  अपनी मेहनत करनी है |

बाप का बच्चों पर स्नेह होता है |  तो स्नेह की निशानी है सम्पूर्ण बनना |  चल तो रहे हैं लेकिन स्पीड को भी देखना है |  अभी सम्पूर्णता का लक्ष्य रखना है तब सम्पूर्ण राज्य में आएंगे |  कोई कमी रह गयी तो सम्पूर्ण राज्य नहीं पाएंगे |  जितनी ज्यादा प्रजा बनायेंगे उतना नजदीक में आयेंगे |  दूर वाले तो दूर ही देखने आएंगे |  नजदीक वाले हर कार्य में साथ रहेंगे |  नंबरवन शक्तियां हैं वा पाण्डव हैं ?  दुसरे को आगे बढ़ाना यह भी तो खुद आगे बढ़ना है |  आगे बढ़ानेवाले का नाम तो होगा ना |  बीच-बीच में चेकिंग भी चाहिए |  हर कार्य करने के पहले और बाद में चेकिंग करते रहो |  जब कार्य शुरू करते हो तो देखो उसी स्थिति में रह कार्य शुरू कर रहा हूँ ?  फिर बिच में भी चेकिंग करते रहो |  कितना समय याद रही ?  कार्य के शुरू में चेकिंग करने से वह कार्य भी सफल होगा और स्थिति भी एकरस रहेगी |  सिर्फ़ रात को चार्ट चेक करते तो सारा दिन तो ऐसे ही बीत जाता है |  लेकिन हर कर्म के हर घंटे में चेकिंग चाहिए |  अभ्यास पद जाता है तो फिर वह अभ्यास अविनाशी हो जाता है |  हिम्मत रखने से फिर सहज हो जायेगा |  मुश्किल सोचेंगे तो मुश्किल फील होगा |  अपने पुरुषार्थ को कब तेज़ करेंगे, अभी समय ही कहाँ है |

सारे कल्प की तकदीर इस घडी बनानी है |  ऐसे ध्यान देकर चलना है |  सारे कल्प की तकदीर बनने का समय अब है |  इस समय को अमूल्य समझ कर प्रयोग करो तब सम्पूर्ण बनेंगे |  एक सेकंड में पद्मों की कमाई करनी है |  एक सेकंड गँवाया गोया पद्मों की कमाई गंवायी, अटेंशन इतना रखेंगे तो विजयी बनेंगे |  एक सेकंड भी व्यर्थ नहीं गँवाना है |  संगम का एक सेकंड भी बहुत बड़ा है |  एक सेकंड में ही क्या से क्या बन सकते हो |  इतना हिसाब रखना है |  अच्छा-

26-01-70              ओम शान्ति                        अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


याद के यात्रा की सम्पूर्ण स्टेज   २६-०१-१९७०

बापदादा भी यहाँ बैठे हैं और आप भी बैठे हो |  लेकिन बापदादा और आप में क्या अन्तर है ?  पहले भी साकार रूप में यहाँ बैठते थे लेकिन अब जब बैठते हैं तो क्या फील होता है ?  जैसे साकार रूप में बाप के लिए समझते थे कि लोन ले आये हैं |  उसी समान अनुभव अभी होता है |  अभी आते हैं मेहमान बनकर |  यूं तो आप सभी भी अपने को मेहमान समझते हो |  लेकिन आपके और बाप के समझने में फर्क है |  मेहमान उसको कहा जाता है जो आता है और जाता है |  अभी आते हैं फिर जाने के लिए |  वह था बुद्धियोग का अनुभव, यह है प्रैक्टिकल अनुभव |  दुसरे शरीर में प्रवेश हो कैसे कर्त्तव्य करना होता, यह अनुभव बाप के समान करना है |  दिन प्रतिदिन तुम बच्चों की बहुत कुछ समान स्थिति होती जाएगी |  आप लोग भी ऐसे अनुभव करेंगे |  सचमुच जैसे लोन लिया हुआ है, कर्त्तव्य के लिए मेहमान हैं |  जब तक अपने को मेहमान नहीं समझते हो तब तक न्यारी अवस्था नहीं हो सकती है |  जो ज्यादा न्यारी अवस्था में रहते हैं, उनकी स्थिति में विशेषता क्या होती है ?  ऊण्ख़ी९ बोली से उनके चलन से उपराम स्थिति का औरों को अनुभव होगा |  जितना ऊपर स्थिति जाएगी, उतना उपराम होते जायेंगे |  शरीर में होते हुए भी उपराम अवस्था तक पहुंचना है |  बिलकुल देह और देही अलग महसूस हो |  उसको कहा जाता है याद के यात्रा की सम्पूर्ण स्टेज |  वा योग की प्रैक्टिकल सिद्धि |  बात करते-करते जैसे न्यारापण खींचे |  बात सुनते भी जैसे कि सुनते नहीं |  ऐसी भासना औरों को भी आये |  ऐसी स्थिति की स्टेज को कर्मातीत अवस्था कहा जाता है |  कर्मातीत अर्थात् देह के बंधन से मुक्त |  कर्म कर रहे हैं लेकिन उनके कर्मों का खता नहीं बनेगा जैसे कि न्यारे रहेंगे, कोई अटैचमेंट नहीं होगा |  कर्म करनेवाला अलग और कर्म अलग हैं – ऐसे अनुभव दिन प्रति दिन होता जायेगा |  इस अवस्था में जास्ती बुद्धि चलाने की भी आवश्यकता नहीं है |  संकल्प उठा और जो होना है  वाही होगा |  ऐसी स्थिति में सभी को आना होगा |  मूलवतन जाने के पहले वाया सूक्ष्मवतन जायेंगे |  वहां सभी को आकर मिलना है फिर अपने घर चलकर फिर अपने राज्य में आ जायेंगे जैसे साकार वतन में मेला हुआ वैसे ही सूक्ष्मवतन में होगा |  वह फरिश्तों का मेला नजदीक है |  कहानियाँ बताते हैं ना |  फ़रिश्ते आपस में मिलते थे |  रूह रूहों से बात करते थे |  वाही अनुभव करेंगे |  तो जो कहानियाँ गई हुई हैं उसका प्रैक्टिकल में अनुभव होगा |  उसी मेले के दिनों का इंतज़ार है |

अभी सर्विस के निमित्त हैं |  सभी कुछ भूले हुए बैठे हैं |  उस अव्यक्त स्थिति में मन और तन व्यक्त देश में है |  ऐसे अनुभव होता है ?  अच्छा-

अपने को कहाँ के निवासी समझते हो ?  परमधाम के निवासी समझते हो ?  यह कितना समय याद रहती है ?  यह एक ही बात याद रहे कि हम परमधाम निवासी आत्मा इस व्यक्त देश में ईश्वरीय कर्त्तव्य करने के निमित्त आये हुए हैं |  मधुबन में आकर के विशेष कौन सा गुण लिया है ?  मधुबन का विशेष गुण है मधुरता |  मधु अर्थात् मधुरता |  स्नेही |  जितना स्नेही होंगे उतना बेहद का वैराग्य होगा |  यह है मधुबन का अर्थ |  अति स्नेही और इतना ही बेहद की वैराग्य वृत्ति |  अगर मधुबन के विशेष गुण जीवन में धारण करके जाएँ तो सहज ही सम्पूर्ण बन सकते हैं |  फिर जो रूहानी टीचर्स बनना चाहिए तो नंबर वन की टीचर बन सकते हो |  क्योंकि जैसी अपनी धरना होगी वैसे औरों को अनुभव् में ला सकेंगे |  इन दोनों गुणों की अपने में धरना करनी है |  मधुबन की लकीर से बाहर निकलने के पहले अपने में पूरी रीति यह भरकर जाना |  एक स्नेह से दूसरा बेहद की वैराग्य वृत्ति से कोई भी परिस्थितियों को सहज ही सामना करेंगे |  सफलता के सितारे बन्ने के लिए यह दो गुण मुख्य मधुबन की सौगात ले जाना है |  जैसे कहाँ भी जाना होता है तो वहां जाते ही पूछा जाता है कि यहाँ की विशेष चीज़ क्या हैं ?  जो प्रसिद्द विशेष चीज़ होती है, वह ज़रूर साथ में ले जाते हैं |  तो  यहाँ मधुबन के दो विशेष गुण अपने साथ ले जाना |  जैसे स्थूल मधु ले जाते हो ना |  वैसे यह सूक्ष्म मधुरता की मधु ले जाना |  फिर सफलता ही सफलता है |  असफलता आपके जीवन से मिट जाएगी |  सफलता का सितारा अपने मस्तक में चमकते हुए देखेंगे |

तुम सफलता के सितारे हो वा पुरुषार्थ के सितारे हो ?  क्या समझते हो ?  सफलता के सितारे हो ?  जैसा लक्ष्य होता है वैसा ही लक्षण होता है |  अगर अब तक  यही सोचते रहेंगे कि हम पुरुषार्थी हैं तो ऐसा समझने से कई छोटी-छोटी गलतियां अपने को माफ़ कर देते हो |  समझते हो हम तो पुरुषार्थी है |  इसलिए अब पुरुषार्थी नहीं लेकिन सफलता का स्वरुप बनना है |  कहाँ तक पुरुषार्थ में रहेंगे |  जब स्वयं सफलता स्वरुप बनेंगे तब दूसरी आत्माओं को भी सफलता का मार्ग बता सकेंगे |  अगर खुद ही अंत तक पुरुषार्थी चलते रहेंगे तो संगम के प्रालब्ध का अनुभव कब करेंगे ?  क्या यह जीवन पुरुषार्थी ही रहेंगे ?  इस संगमयुग की प्रालब्ध प्रत्यक्ष रूप में नहीं प्राप्त करेंगे ?  संगम के पुरुषार्थ का फल क्या ?  (सफलता) तो सफलता स्वरुप भी निश्चय करने से सफलता होती रहेगी |  जब यह समझेंगे कि में हूँ ही सफलता का सितारा तो असफलता कैसे आ सकती है |  सर्वशक्तिवान की संतान कोई कार्य में असफल नहीं हो सकती |  अपने मस्तक में विजय का सितारा देखते हो या देखेंगे ?  विजय तो निश्चित है ही ना |  विजय अर्थात् सफलता |  अभी समय बदल रहा है |  जब समय बदल गया तो अपने पुरुषार्थ को भी बदलेंगे ना |  अब बाप ने सफलता का रूप दिखला दिया तो बच्चे भी रूप में व्यक्त देह में होते सफलता का रूप नहीं दिखायेंगे |  अपने को सदैव सफलता का मूर्त ही समझो |  निश्चय को विजय कहा जाता है |  जैसा विश्वास रखा जाता है वैसा ही कर्म होता है |  निश्चय में कमी होती तो कर्म में भी कमी हो जाएगी |  स्मृति शक्तिवान है तो स्थिति और कर्म भी शक्तिवान होंगे |  इसलिए कभी भी अपनी स्मृति को कमज़ोर नहीं रखना |  शक्तिदल और पाण्डव कब असफल हो सकते हैं क्या ?  अपनी कल्प पहले वाली बात याद है कि पाण्डवों ने क्या किया था ?  विजयी बने थे |  तो अब अपने स्मृति को श्रेष्ठ बनाओ |  अब संगम पर है विजय का तिलक फिर इस विजय के तिलक से राज तिलक मिलेगा |  इस विजय के तिलक को कोई मिटा नहीं सकते |  ऐसा निश्चय है ?  जो विजयी रत्न हैं उनकी हर बात में विजय ही विजय है |  उनकी हार हो नहीं सकती |  हार तो बहुत जन्म खाते रहे |  अब आकर विजयी बन्ने बाद फिर हार क्यों ?  “विजय हमारी ही है” ऐसा एक बल एक भरोसा हो |

(बच्ची यदि ज्ञान में नहीं चलती है तो क्या करें ? ) अगर कोई इस मार्ग में नहीं चल सकते हैं तो शादी करनी ही पड़े |  उन्हों की कमजोरी भी अपने ऊपर से मिटानी है |  साक्षी हो मज़बूरी भी करना होता है |  वह हुआ फ़र्ज़ |  लगन नहीं है |  फ़र्ज़ पालन करते हैं |  एक होता है लगन से करना, एक होता है निमित्त फ़र्ज़ निभाना |  सभी आत्माओं का एक ही समय यह जन्म सिद्ध अधिकार लेने का पार्ट नहीं है |  परिचय मिलना तो ज़रूर है, पहचानना भी है लेकिन कोई का पार्ट अभी है कोई का पीछे |  बीजों में से कोई झट से फल देता है, कोई देरी से फल देता है |  वैसे ही यहाँ भी हरेक का अपने समय पर पार्ट है, कोई देरी से फल देता है |  वैसे ही यहाँ भी हरेक का अपने समय पर पार्ट है |  फ़र्ज़ समझ करेंगे तो माया का मर्ज नहीं लगेगा |  नहीं तो वायुमंडल का असर लग सकता है |  इसलिए फ़र्ज़ समझ करना है |  फ़र्ज़ और मर्ज में सिर्फ एक बिंदी का फर्क है |  लेकिन बिंदी रूप में न होने कारण फ़र्ज़ भी मर्ज हो जाता है |  जो मददगार हैं उन्हों को मदद तो सदैव मिलती है |  बाप की मदद हर कार्य में कैसे मिलती है यह अनुभव होता हैं ?  एक दो के विशेष गुण को देख एक दो को आगे रखना है |  किसको आगे रखना यह भी अपने को आगे बढ़ाना है |

शिवजयंति पर आवाज़ फैलाना सहज होता है, जितनी हिम्मत हो उतना करो |  क्योंकि फिर समय ऐसा आना है जो इस सर्विस के मौके भी कम मिलेंगे |  इसलिए जितना कर सकते हो उतना करो |  भूलें क्यों होती हैं ?  उसकी गहराई में जाना है |  अंतर्मुख हो सोचना चाहिए यह भूल क्यों हुई ?  यह तो माया का रूप हा |  मैं तो रचयिता बाप का बच्चा हूँ |  अपने साथ एकांत में ऐसे-ऐसे बात करो |  उभारने की कोशिश करो |  कहाँ भी जाना होता है तो अपना यादगार छोड़ना होता है और कुछ ले जाना होता है |  तो मधुबन में विशेष कौन सा यादगार छोड़ा ?  एक-एक आत्मा के पास यह ईश्वरीय स्नेह और सहयोग का यादगार छोड़ना है |  जितना एक दो के स्नेही सहयोगी बनते हैं उतना ही माया के विघ्न हटाने में सहयोग मिलता है |  सहयोग देना अर्थात् सहयोग लेना |  परिवार में आत्मिक स्नेह देना है और माया पर विजय पाने का सहयोग लेना है |  यह लेन-देन का हिसाब ठीक रहता है |  इस संगम समय पर ही अनेक जन्मों का सम्बन्ध जोड़ना है |  स्नेह है सम्बन्ध जोड़ने का साधन |  जैसे कपडे सिलाई करने का साधन धागा होता है वैसे ही भविष्य सम्बन्ध जोड़ने का साधन है स्नेह रूपी धागा |  जैसे यहाँ जोड़ेंगे वैसे वहां जूता हुआ मिलेगा |  जोड़ने का समय और स्थान यह है |  ईश्वरीय स्नेह भी तब जुड़ सकता है जब अनेक के साथ स्नेह समाप्त हो जाता है |  तो अब अनेक स्नेह समाप्त कर एक से स्नेह जोड़ना है |  वह अनेक स्नेह भी परेशान करने वाले हैं |  और यह एक स्नेह सदैव के लिए परिपक्व बनाने वाला है |  अनेक तरफ से तोडना और एक तरफ जोड़ना है |  बिना तोड़े कभी जुट नहीं सकता |  अभी कमी को भी भर सकते हो |  फिर भरने का समय ख़त्म |  ऐसे समझ कर कदम को आगे बढ़ाना है |

सभी तीव्र पुरुषार्थी हो वा पुरुषार्थी हो ?  तीव्र पुरुषार्थी के मन के संकल्प में भी हार नहीं हो सकती है |  ऐसी स्थिति बनानी है |  जो संकल्प में भी माया से हार न हो |  इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थी |  वे शुद्ध संकल्पों में पहले से ही मन को बिजी रखेंगे तो और संकल्प नहीं आएंगे |  पूरा भरा हुआ होगा तो एक बूंद भी जास्ती पद नहीं सकेगी, नहीं तो बज जायेगा |  तो यही संकल्प मन में रहे जो व्यर्थ संकल्प आने का स्थान ही न हो |  इतना अपने को बिजी रखो |  मन को बिजी रखने के तरीके जो मिलते हैं, वह आप पुरे प्रयोग में नहीं लाते हो |  इसलिए व्यर्थ संकल्प आ जाते हैं |  एक तरफ बिजी रखने से दूसरा तरफ स्वयं छुट जाता है |

मंथन करने के लिए तो बहुत खज़ाना है |  इसमें मन को बिजी रखना है |  समय की रफ़्तार तेज़ है वा आप लोगों के पुरुषार्थ की रफ़्तार तेज़ हा ?  अगर समय तेज़ चल रहा है और पुरुषार्थ ढीला है तो उसकी रिजल्ट क्या होगी ?  समय आगे निकल जायेगा और पुरुषार्थी रह जायेंगे |  समय की गाडी छुट जाएगी |  सवार होनेवाले रह जायेंगे |  समय की कौन सी तेज़ देखते हो ?  समय में बीती को बीती करने की तेज़ है |  वाही बात को समय फिर कब रिपीट करता है ?  तो पुरुषार्थ की जो भी कमियाँ हैं उसमे बीती को बीती समझ आगे हर सेकंड में उन्नति को लाते जाओ तो समय के समान तेज़ चल सकते हो |  समय तो रचना है ना |  रचना में यह गुण है तो रचयिता में भी होना चाहिए |  ड्रामा क्रिएशन है तो क्रिएटर के बच्चे आप हो ना |  तो क्रिएटर के बच्चे क्रिएशन से ढीले क्यों ?  इसलिए सिर्फ एक बात का ध्यान रहे कि जैसे ड्रामा में हर सेकंड अथवा जो बात बीती, जिस रूप से बीत गयी वह फिर से रिपीट नहीं होगी फिर रिपीट  होगी ५००० वर्ष के बाद |  वैसे ही कमजोरियों को बार-बार रिपीट करते हो ?  अगर यह कमजोरियां रिपीट न होने पाएं तो फिर पुरुषार्थ तेज़ हो जायेगा |  जब कमजोरी समेटी जाती है तब कमजोरी की जगह पर शक्ति भर जाती है |  अगर कमजोरियां रिपीट होती रहती हैं तो शक्ति नहीं भारती है |  इसलिए जो बीता सो बीता, कमजोरी की बीती हुई बातें फिर संकल्प में भी नहीं आणि चाहिए |  अगर संकल्प चलते हैं तो वाणी और कर्म में आ जाते हैं |  संकल्प में ही ख़त्म कर देंगे तो वाणी कर्म में नहीं आयेंगे |  फिर मन वाणी कर्म तीनों शक्तिशाली हो जायेंगे |  बुरी चीज़ को सदैव फ़ौरन ही फेंका जाता है |  अछि चीज़ को प्रयोग किया जाता है तो बुरी बातों को ऐसे फेंको जैसे बुरी चीज़ को फेंका जाता है |  फिर समय पुरुषार्थ से तेज़ नहीं जाएगा |  समय का इंतज़ार आप करेंगे तो हम तैयार बैठे हैं |  समय आये तो हम जाएँ |  ऐसी स्थिति हो जाएगी |  अगर अपनी तैय्यारी नहीं होती है तो फिर सोचा जाता है कि समय थोडा हमारे लिए रुक जायेगा |

बांधेली का योग तेज़ होता है |  क्योंकि जिस बात से कोई रोकते हैं तो बुद्धि ज़रूर उस तरफ लगी रहती है |  घर बैठे भी चरित्रों का अनुभव कर सकते हो |  लेकिन ऐसी लगन चाहिए |  जब ऐसी लगन-अवस्था हो जाएगी तो फिर बंधन कट जायेंगे |  एक की याद ही अनेक बंधन को तोड़नेवाली है |  एक से जोड़ना है, अनेक से तोडना है |  एक बाप के सिवाए दूसरा न कोई |  जब ऐसी अवस्था हो जाएगी फिर यह बंधन आदि सभी ख़त्म हो जायेंगे |  जितना अटूट स्नेह होगा उतना ही अटूट सहयोग मिलेगा |  सहयोग नहीं मिलता, इसका कारण स्नेह में कमी है |  अटूट स्नेह रख करके अतोत सहयोग को प्राप्त करना है |  कल्प पहले का अपना अधिकार लेने लिए फिर से पहुच गए हो, ऐसा समझते हो ?  वह स्मृति आती है कि हम ही कल्प पहले थे | अभी भी फिर से हम ही निमित्त बनेंगे |  जिसको यह नशा रहता है उनके चेरे में ख़ुशी और ज्योति रूप देखने में आता है |  उनके चेहरे में अलौकिक अव्यक्ति चमक रहती है |  उनके नयनों से, मुख से सदैव ख़ुशी ही ख़ुशी देखेंगे |  देखनेवाला भी अपना दुःख भूल जाये |  जब कोई दुखी आत्मा होती है तो अपने को ख़ुशी में लाने लिए ख़ुशी के साधन बनाती है ना |  तो दर्पण में चेहरा देखने में आये |  तुम्हारे चेहरे से सर्विस हो |  न बोलते हुए आपका मुख सर्विस करे |  आजकल दुनिया में अपने चेहरे को ही श्रृंगारते हैं ना |  तो आप सभी आत्माओं का भी ऐसा श्रृंगारा हुआ मुंह देखने में आये |  सर्वशक्तिमान बाप के बच्चे हैं फिर शक्ति न आये यह कैसे हो सकता है |  ज़रूर बुद्धि की तार में कमी है |  तार को जोड़ने के लिए जो युक्तियाँ मिलती हैं उसको अभ्यास में लाओ |  तोड़ने बिगर जोड़ लेते हैं तो पूरा फिर जुटता नहीं |  थोड़े समय के लिए जुटता फिर टूट जाता है |  इसलिए अनेक तरफ से तोड़कर एक तरफ जोड़ना है |  इसके लिए संग भी चाहिए और अटेंशन भी चाहिए |  हर कदम पर, संकल्प पर अटेंशन |  संकल्प जो उठता है वह चेक करो कि यह हमारा संकल्प यथार्थ है वा नहीं ?  इतना अटेंशन जब संकल्प पर हो तब वाणी भी ठीक और कर्म भी ठीक रहे |  संकल्प और समय दोनों ही संगम युग के विशेष खजाने हैं |  जिससे बहुत कमाई कर सकते हो |  जैसे स्थूल धन को सोच समझकर प्रयोग करते हैं कि एक पैसा भी व्यर्थ न जायें |  वैसे ही यह संगम का समय और संकल्प व्यर्थ न जाएँ |  अगर संकल्प पावरफुल हैं तो अपने ही संकल्प के आधार पर अपने लिए सतयुगी सृष्टि लायेंगे |  अपने ही संकल्प कमज़ोर हैं तो अपने लिए त्रेतायुगी सृष्टि लाते हैं |  यह खज़ाना सारे कल्प में फिर नहीं मिलेगा |  तो जो मुश्किल से एक ही समय पर मिलने वाली चीज़ है, उसका कितना मूल्य रखना चाहिए |  अभी जो बना सो बना |  फिर बने हुए को देखना पड़ेगा |  बना नहीं सकेंगे |  अभी बना सकते हो |  उसका अब थोडा समय है |  दूसरों को तो कहते हो बहुत गई थोड़ी रही |  |  |  लेकिन अपने साथ लगाते हो ?  समय थोडा रहा है लेकिन काम बहुत करना है |  अपने आप से दृढ़ प्रतिज्ञा करो कि आज से फिर यह बातें कभी नहीं रहेंगी |  यह संस्कार अपने में फिर इमर्ज नहीं होने देंगे |  यह व्यर्थ संकल्प कभी भी उत्पन्न नहीं होने देंगे |  जब ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करेंगे तब ही प्रत्यक्ष फल मिलेगा |  अब दिन बदलते जाते हैं |  तो खुद को भी बदलना है |  अब ढीले पुरुषार्थ के दिन चले गए, अब है तीव्र पुरुषार्थ करने का समय |  तीव्र पुरुषार्थ के समय अगर कोई ढीला पुरुषार्थ करे तो क्या कहेंगे ?  इसलिए अब जोश में आओ |  बार-बार बेहोश न हो |  संजीवनी बूटी साथ में रख सदैव जोश में रहो |  बाकी हाँ करेंगे, हो जायेगा, देख लेंगे यह अक्षर अभी न निकलें |  ऐसी बातें बहुत समय सुनीं |  अब बापदादा यही सुनने चाहते हैं कि हाँ बाबा करके दिखायेंगे |

अपनी चलन में अलौकिकता लाओ तो चलन की आकर्षण लौकिक सम्बन्धियों आदि को भी स्वयं खिंचेगी |  लौकिक सम्बन्ध में वाणी काम नहीं करती |  चलन की आकर्षण होगी | तो अब बहुत तेज़ से चलना है |  अभी ऐसा बदल कर दिखाओ जो सभी के आगे एग्जाम्पल बनो |  अब एक सेकंड भी नहीं गंवाना है |  चेक आप कर सकते हो |  अब समय बहुत थोडा रह गया है |  समय भी बेहद की वैराग्य वृत्ति को उत्पन्न करता है |  लेकिन समय के पहले जो अपनी म्हणत से करेंगे तो उनका फल ज्यादा मिलेगा |  जो खुद नहीं कर सकेंगे उन्हों के लिए समय हेल्प करेगा |  लेकिन वह समय की बलिहारी होगी |  अपनी नहीं |

कितनी बार बापदादा से मिले हुए हो ?  यह स्मृति में है कि अनेक बार यह जन्म-सिद्ध अधिकार मिला है |  कितना बड़ा अधिकार है |  जो कई प्रयत्नों से भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह सहज ही प्राप्त हो रहा है ऐसा अनुभव किया है ?  समय बाकी कितना है और पुरुषार्थ क्या किया है ?  दोनों की परख है ?  समय कम है और पुरुषार्थ बहुत करना है |  जब कोई स्टूडेंट लास्ट टाइम पर आकर दाखिल होते हैं तो वह थोड़े समय में कितनी म्हणत करते हैं |  जितना समय तेज़ जा रहा है इतना तेज़ पुरुषार्थ है ?  कब शब्द निकाल ही देना चाहिए |  जो तीव्र पुरुषार्थी होते हैं वह कब शब्द नहीं बोलते, अब बोलेंगे |  अब से करेंगे |  यह संगम समय का एक सेकंड भी कितना बड़ा मूल्यवान है |  एक सेकंड भी व्यर्थ गया तो कितनी कमाई व्यर्थ हो जाएगी |  पुरे कल्प की तकदीर बनाने का यह थोडा समय है |  एक सेकंड पद्मों की कमाई करने वाला भी है और एक सेकंड में पद्मों की कमाई गँवाता है |  ऐसे समय को परख करके फिर पाँव तेज़ करो |  समस्याएं तो बनती रहेंगी |  स्थिति इतनी पावरफुल हो जो परिस्थितियां स्थिति से बदल जाएँ |  परिस्थिति के आधार पर स्थिति न हो |  स्थिति परिस्थिति को बदल सकती है क्योंकि सर्वशक्तिमान के संतान हो तो क्या ईश्वरीय शक्ति परिस्थिति नहीं बदल सकती! रचयिता के बच्चे रचना को नहीं बदल सकते हैं! रचना पावरफुल होती है वा रचयिता ?  रचयिता के बच्चे रचना के अधीन कैसे होंगे |  अधिकार रखना है न कि अधीन होना है |  जितना अधिकार रखेंगे उतना परिस्थितियाँ भी बदल जाएँगी |  अगर उनके पीछे पड़ते रहेंगे तो और ही सामना करेंगी |  परिस्थितियों के पीछे पड़ना ऐसे है जैसे कोई अपनी परछाई को पकड़ने से वह हाथ आती है ?  और ही आगे बढती है तो उसको छोड़ दो |  वायुमंडल को बदलना, यह तो बहुत सहज है |  इतनी छोटी सी अगरबत्ती, खुशबु की चीज़ भी वायुमंडल को बदल सकती है |  तो ज्ञान की शक्ति से वायुमंडल को नहीं बदल सकते ?  यह ध्यान रखना है, वायुमंडल को सदैव शुद्ध रखना है |  लोग क्या भी बोलें |  जिस बात में अपनी लगन नही होती है तो वह बात सुनते हुए जैसे नहीं सुनते |  तन भाव वहां हो लेकिन मन नहीं |  ऐसे तो कई बार होता है |  मन कोई और तरफ होता है और वहां बैठे भी जैसे नहीं बैठते हैं |  तन से साथ देना पड़ता है लेकिन मन से नहीं |  उसके लिए सिर्फ अटेंशन दें अहै |  जब तक हिम्मत न रख पाँव नहीं रखा है तो ऊँची मंजिल लगेगी |  अगर पाँव रखेंगे तो फिर लिफ्ट की तरह झट पहुँच जायेंगे |  हिम्मत रखो तो चढ़ाई भी लिफ्ट बन जाएगी |  तो हिम्मत का पाँव रखो, कर सकते हो, सिर्फ लोक लाज का त्याग और हिम्मत की धारणा चाहिए |  एक दो का सहयोग भी बड़ी लिफ्ट है |  परिस्थितियाँ तो आयेंगी लेकिन अपनी स्थिति पावरफुल चाहिए |  फिर जैसा समय वैसा तरीका भी टच होगा |  अगर समय प्रमाण युक्ति नहीं आती है तो समझना चाहिए योग बल नहीं है |  योगयुक्त है तो मदद भी ज़रूर मिलती है |  जो यथार्थ पुरुषार्थी है उनके पुरुषार्थ में इतनी पॉवर रहती है |  ज्यादा सोचना भी नहीं चाहिए |  अनेक तरफ लगाव है, फिर माया की अग्नि भी लग जाती है |  परन्तु लगाव नहीं होना चाहिए |  फ़र्ज़ तो निभाना है लेकिन उसमे लगाव न हो |  ऐसा पावरफुल रहना है जो औरों के आगे एग्जाम्पल हो |  जो एग्जाम्पल बनते हैं वह एग्जामिन में पास होते हैं |  एग्जामिन देने लिए एग्जाम्पल बन दिखाओ |  जो सभी देखें कि ये कैसे नवीनता में आ गए हैं |  ऐसे सर्विसेबुल बनना है जो आप को देख औरों को प्रेरणा मिले |  पहले जो शक्तियां निकलीं उन्हों ने इतनी शक्तियों को निकाला |  आप शक्तियां फिर सृष्टि को बदलो |  इतना आगे जाना है |  गीत भी हैं ना हम शक्तियां दुनिया को बदल कर दिखायेंगे |  सृष्टि को कौन बदलेंगे ?  जो पहले खुद बदलेंगे |  शक्तियों की सवारी शेर पर दिखाते हैं |  कौन सा शेर ?  यह माया जो शेरनी रूप में सामना करने आती है उनको अपने अधीन कर सवारी बनाना अर्थात् उनकी शक्ति को ख़त्म करना |  ऐसी शक्तियां जिनकी शेर पर सवारी दिखाते हैं वही तुम हो ना |  वह सभी का ही चित्र है |  ऐसी शेरनी शक्तियां कभी माया से घबराती नहीं |  लेकिन माया उनसे घबराती है |  ऐसे माया जीत बने हो ना |  शक्ति बिगर बंधन नहीं टूटेंगे |  याद की शक्ति है – एक बाप दूसरा न कोई |  ऐसा सौभाग्य कोटों में कोई को मिलता है |  इतना पद्मा पद्मभाग्यशाली अपने को समझते हो ?  शक्ति दल बहुत कमाल कर सकता है |  जो हड्डी सेवा करनेवाले होते हैं उनको बाप भी मदद करता है |  जो स्नेही हैं, उनसे बाप भी स्नेही रहता है |  बाप के भी वाही बच्चे सामने रहते हैं |  भाल कोई कितना भी दूर हो लेकिन बापदादा के दिल के नजदीक है |

सभी से अच्छी सौगात है अपने इस चेहरे को सदैव हर्षित बनाना |  कभी भी कोई परेशानी की रेखा न हो |  जैसे सम्पूर्ण चन्द्रमा कितना सुन्दर लगता है |  वैसे अपना चेहरा सदैव हर्षित रहे |  चेहरा ऐसा चमकता हुआ हो जो और भी आपके चेहरे में अपना रूप देख सकें |  चेहरा दर्पण बन जाए |  अनेक आत्माओं को अपना मुखड़ा दिखलाना है |  अभी पद्मापद्म भाग्यशाली बनना है |  महादानी बनना है |  रहम दिल बाप के बच्चे सर्व आत्माओं पर रहम करना है |  इस रहम की भावना से कैसी भी आत्माएं बदल सकती हैं |  सारे दिन में यह चेक करो कि कितने रहम दिल बने |  कितनी आत्माओं पर रहम करना है |  इस रहम की भावना से कैसी भी आत्माएं बदल सकती है |  सारे दिन में यह चेक करो कि कितने रहम दिल बने ?  कितनी आत्माओं पर रहम किया |  दूसरों को सुख देने में भी अपने में सुख भरता है |  देना अर्थात् लेना |  दूसरों को सुख देने से खुद भी सुख स्वरुप बनेंगे |  कोई विघ्न नहीं आयेंगे |  दान करने से शक्ति मिलती है |  अंधों को आँखें देना कितना महान कार्य है |  आप सभी का यही कार्य है |  अज्ञानी अंधों को ज्ञान नेत्र देना |  और अपनी अवस्था सदैव अचल हो |  तुम बच्चों की स्थिति का ही यह अचलघर यादगार है |  जैसे बापदादा एकरस रहते हैं वैसे बच्चों को भी एकरस रहना है |  जब एक के ही रस में रहेंगे तो एकरस अवस्था में रहेंगे |  अच्छा-

02-02-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


आत्मिक पॉवर की परख

आज बापदादा हरेक का प्रोजेक्टर शो देख रहे हैं। आप लोग भी प्रोजेक्टर रखते हो? प्रोजेक्टर कौन सा है, जिस द्वारा चित्र देखते हो? हरेक के नयन प्रोजेक्टर है। इस प्रोजेक्टर द्वारा कौनसा चित्र दुनिया को दिखला सकते हो? वह है साइंस की शक्ति का प्रोजेक्टर और यह है ईश्वरीय शक्ति का प्रोजेक्टर। जितना-जितना प्रोजेक्टर पावरफुल होता है उतना ही दृश्य क्लियर देखने में आता है। वैसे ही तुम सभी बच्चों के यह दिव्य नेत्र जितना-जितना क्लियर अर्थात् रुहानियत से सम्पूर्ण होंगे उतना ही तुम बच्चों के नयनों द्वारा कई चित्र देख सकते हैं। और ऐसे ही स्पष्ट दिखलाई देंगे जैसे प्रोजेक्टर द्वारा स्पष्ट दिखाई देते हैं। तो इन नयनों द्वारा बापदादा और पूरी रचना के स्थूल, सूक्ष्म, मूल तीनों लोकों के चित्र दिखाई दे सकते हैं। कोई भी आपके सामने आये तो सर्व साक्षात्कार तुम्हारे नयनों द्वारा कर सकते हैं। जितनी-जितनी लाइट तेज़ होगी उतना चित्र क्लियर। बल्ब पावरफुल कितना है, वह फिर बापदादा कैसे देखते हैं, मालूम है? अपना बल्ब देखा है कि कितने पॉवर का है? हरेक ने अपने बल्ब की पॉवर देखी है? जो समझते हैं हम अपनी लाइट की परसेंटेज को जानते हैं कि हमारा बल्ब किस प्रकार का है। वह हाथ उठाएं। हमारी आत्मा कितनी पावरफुल है इसकी परख किस आधार पर कर सकते हो?(चार्ट से) वह भी टोटल बात हो गयी, कौन सी बात से अपनी परख कर सकते हो? लाइट में विशेषता क्या होती है? उनमें विशेष गुण यह होता है जो चीज़ जैसी है वैसे ही स्पष्ट देखने में आती है। अन्धियारें में जो जैसी वस्तु है वैसे देखने में नहीं आती है। तो लाइट का विशेष गुण है अस्पष्ट को स्पष्ट करना। इस रीति से अपनी लाइट की परसेंटेज परखने का तरीका यही है। एक तो अपने पुरुषार्थ का मार्ग स्पष्ट होगा अर्थात् लाइन क्लियर देखने में आएगी। दूसरी बात अपना भविष्य स्टेट्स भी देखने में आएगा। तीसरी बात उन्हों की सर्विस करते हो तो जितनी खुद की रौशनी पावरफुल होगी, उन्हों को भी इतना ही सहज और स्पष्ट मार्ग दिखा सकेंगे। वह भी सहज ही अपने पुरुषार्थ में चल पड़ेगा। अपनी मजिंल सहज देखने में आएगी।

जितना लाइट की परसेंटेज ज्यादा होगी। उतना ही सभी बातों में स्पष्ट देखने में आएगा। अगर लाइट की परसेंटेज कम है तो खुद भी पुरुषार्थ में स्पष्ट नहीं होगा और जिसको मार्ग बताते हैं वह भी सहज और स्पष्ट अपने मार्ग और मंजिल को जान नहीं सकेंगे। जिसकी लाइट पावरफुल होगी वह न खुद उलझते न दूसरे को उलझाते हैं। तो अपने पुरुषार्थ अपनी सर्विस से देख सकते हो कि जिन्हों की सर्विस करते हो उन्हों का मार्ग स्पष्ट होता है। अगर मार्ग स्पष्ट नहीं होता है तो अपनी लाइट की परसेंटेज की कमी है। कई खुद कभी कदम-कदम पर ठोकर खाते हैं और उनकी रचना भी ऐसी होती है। अभी आप एक-एक मास्टर रचयिता हो तो मास्टर रचयिता अपनी रचना से भी अपनी पॉवर को परख सकते हैं। जैसा बीज होता है वैसा ही फल निकलता है। अगर बीज पावरफुल नहीं होता है तो कहाँ-कहाँ फूल निकलेंगे, फल निकलेंगे लेकिन स्वीकार करने योग्य नहीं होते हैं। जो बहुत सुन्दर व खुशबुदार होंगे, जो फल अच्छा होगा उनको ही खरीद करेंगे ना। अगर बीज ही पावरफुल नहीं होता है तो रचना भी जो पैदा होती है वह स्वीकार करने योग्य नहीं होती। इसलिए अपनी लाइट की परसेंटेज को बढ़ाओ। दिन प्रति दिन सभी के मस्तक और नयन ऐसे ही सर्विस करें जैसे आप का प्रोजेक्टर शो सर्विस करता है। कोई भी सामने आयेंगे वह चित्र आपके नयनों में देखेंगे, नयन देखते ही बुद्धियोग द्वारा अनेक साक्षात्कार होंगे। ऐसे साक्षात्कार मूर्त अपने को बनाना है। लेकिन साक्षात्कार मूर्त वह बन सकेंगे जो सदैव साक्षी की स्थिति में स्थित होंगे। उनके नयन प्रोजेक्टर का काम करेंगे। उनका मस्तक सदैव चमकता हुआ दिखाई पड़ेगा। होली के बाद सांग बनाते हैं ना। देवताओं को सजाकर मस्तक में बल्ब जलाते हैं। यह सांग क्यों बनाते हैं? यह किस समय का प्रैक्टिकल रूप है? इस समय का। जो फिर आपके यादगार बनाते आते हैं। तो एक-एक के मस्तक में लाइट देखने में आये। विनाश के समय भी यह लाइट रूप आपको बहुत मदद देगी। कोई किस भी वृत्ति वाला आपके सामने आयेंगे। वह इस देह को न देख आपके चमकते हुए इस बल्ब को देखेंगे। जो बहुत तेज़ लाइट होती है और उसको जब देखने लगते हैं तो दूसरी सारी चीज़ छिप जाती है। वैसे ही जितनी-जितनी आप सभी की लाइट तेज़ होगी उतना ही उन्हों को आपकी देह देखते हुए भी नहीं देखने आएगी। जब देह को देखेंगे ही नहीं तो तमोगुणी दृष्टि और वृत्ति स्वतः ही ख़त्म हो जाएगी। यह परीक्षाएं आनी हैं। सभी प्रकार की परिस्थितियाँ पास करनी है।

यह जो ग्रुप है इन्हों का हंसी में एक नाम रखा है। आज वतन में चिट-चैट चल रही थी इसी बात पर। कोई ने हंसी में कहा था बड़ी बहनें हमारी हेड्स हैं तो फिर हम लेग(टाँगे) हैं। तो बापदादा ने फिर नाम रखा है इन्होंने के बड़े तो हैं हेड्स। लेकिन यह हैंडल हैं। मोटर में हैंडल बिगर काम चल न सके। हैंडल द्वारा ही मोटर को मोड़ सकते हैं। तो हेड्स भी इन हैंडल बिना सर्विस को हैंडल नहीं कर सकते हैं। यह जो ग्रुप है यह है हैंडल्स। इनके बिन हेड्स कुछ भी कर नहीं सकते। जो भी आते हैं उनको पहले पहले हैंडल करने वाले यह हैंडल हैं ना। तो आप लोगों के ऊपर इतनी जिम्मेवारी है। अगर आप हैंडल ठीक नहीं, तो सर्विस की हैंडलिंग भी ठीक नहीं होगी। लेकिन यह सिर्फ देखना हैंडल तो है लेकिन हेड्स को कभी हैंडल नहीं करना। हेड को हैण्ड बन कर रहना। बापदादा के भी राईट हैण्ड हैं ना, लेफ्ट हैण्ड भी हैं। राईट हैण्ड को फुल पॉवर होती है, लेकिन होता हैण्ड है। हेड नहीं होता। हैंडल तो हैं ना। लेकिन कैसे हैंडल करना है और कैसे बापदादा के राईट हैण्ड बनें, इसके लिए यहाँ आये हो। यह ग्रुप ऐसा है जो एक-एक कमाल कर सकते हैं। सर्विस को सफलता के रूप में ला सकते हैं। सर्विस में सफलता लाने के लिए दो बातें ध्यान में रखनी है। सर्व बातों में सहयोगी तो हो लेकिन सर्विस में सफलता लाने के निमित्त विशेष यह ग्रुप है। इसके लिए दो बातें विशेष ध्यान में रखना है एक है निशाना पूरा और दूसरा नशा भी पूरा होना। नशा और निशाना यह दो बातें इस ग्रुप में विशेष आनी चाहिए। जब निशाना ठीक होता है तो एक धक से किसको मरजीवा बना सकते हो। जो निशाने बाज़ होते हैं वह एक ही गोली से ठीक निशाना करते हैं। जिनको निशाना नहीं आता, उनको ३-४ बारी गोली चलानी पड़ती है। अगर अपनी स्थिति का भी निशाना और दूसरे की सर्विस करने का भी निशाना ठीक होगा और साथ-साथ नशा भी सदैव एकरस रहता होगा तो सर्विस में सफलता ज्यादा पा सकते हो। कभी नशा उतर जाता, कभी निशाना छुट जाता, यह दोनों बातें ठीक होनी चाहिए। जिसमें जितना खुद नशा होगा उतना ही निशाना ठीक कर सकेंगे। सर्विसएबल तो हो लेकिन सर्विस में अब क्या विशेषता लानी है? सर्विसएबल उनको कहा जाता है जिनका एक सेकंड और एक संकल्प भी बिना सर्विस के ना जाये, हर सेकंड सर्विस के प्रति हो। चाहे अपनी सर्विस चाहे दूसरों की सर्विस। लेकिन जब हो ही सर्विसएबल, तो समय और संकल्प सर्विस के बिगर नहीं जाना चाहिए। फरमानबरदार का अर्थ ही है फ़रमान पर चलना। मुख्य फ़रमान है निरंतर याद में रहो। अगर इस फ़रमान पर नहीं चलते तो क्या कहेंगे? जितना-जितना इस फ़रमान को प्रैक्टिकल में लायेंगे उतना ही प्रत्यक्ष फल मिलेगा। पुरुषार्थ में चलते हुए कौन सा विघ्न देखने में आता है, जो सम्पूर्ण होने में रूकावट डालता है? विशेष विघ्न व्यर्थ संकल्पों के रूप में देखा गया है। तो इससे बचने के लिए क्या करना है? एक तो कभी अन्दर की वा बहार की रेस्ट न लो। अगर रेस्ट में नहीं होंगे तो वेस्ट नहीं जायेगा। और दूसरी बात अपने को सदैव गेस्ट समझो। अगर गेस्ट समझेंगे तो रेस्ट नहीं करेंगे तो वेस्ट नहीं जायेगा। चाहे संकल्प, चाहे समय, यह है सहज तरीका। अच्छा सब फिर समाप्ति के दिन सभी के मस्तक के बल्ब कितने पॉवर के हैं वह देखेंगे। और पावरफुल होंगे तो माया उस पॉवर के आगे आने का साहस नहीं रखेगी। जितना बल्ब की पॉवर होती है उतना सामना कोई नहीं कर सकता। ऐसी पावरफुल स्थिति देखेंगे। सर्विसएबल हो, अब पावरफुल बनो। एक्टिव हो, लेकिन एक्यूरेट बनो। तो इस ग्रुप को विशेष छाप कौन सा लग्न है? एक्यूरेट। कोई भी बात में सदैव एक्यूरेट। चाहे मनसा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणातीनों में एक्यूरेट।

अच्छा !!!


05-03-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन 


जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना

आज शिव जयंती मनाने के लिए बुलाया है। कैसे मनाने चाहते हो? मिलन ही मनाना है। लोग मिलने के लिए मनाते हैं और बच्चे मिलने को ही मनाना समझते हैं। तो मिलना अर्थात् मन लिया अब बाकी क्या रहा। आप बच्चों का मनाना एक तो है मिलना और दूसरा है अपने समान बनाना। तो मिलना और बनाना, यही है मनाना। आज के दिवस पर यह दो बातें करनी है। मिलन तो मना ही रहे हो बाकी आप समान बनाना। यह दोनों बातें की गोया शिव जयंती मनायी। जब भक्त लोग जल चढाने के लिए जाते हैं तो भी बीच में ब्राह्मण होते हैं, जो उनसे कराते हैं। तो आप भी ब्राह्मण हो। जैसे भक्त लोग जल चढाते हैं वैसे तुम बच्चे बाप के ऊपर आत्माओं से जल चढ़वाते हो। यह जल अथवा दूध चढाने की रस्म क्यों चली है? जिस समय जल चढाते हैं उस समय मन में क्या सोचते हैं, मालूम हैं? जल वा दूध जो चढाते हैं उनका भावार्थ यह है। जब कोई भी प्रतिज्ञा करनी होती है तो हाथ में जल उठाते हैं, सूर्य को भी जल चढाते हैं तो अन्दर में प्रतिज्ञा करते हैं। तुम्हारे पास भी जब कोई आते हैं तो पहले-पहले उन्हों से प्रतिज्ञा का जल लो। एक प्रतिज्ञा कराते हो ना कि हम आज से एक शिवबाबा के ही बनकर रहेंगे। तो पहले उनसे प्रतिज्ञा कराते हो। वह लोग भी अन्दर में प्रतिज्ञा कर फिर स्वयं सम्मुख आकर देवताओं पर अर्पण होते हैं। जो पुरे भक्त होते हैं वह सारा ही अपने को उनके आगे झुकाते हैं अर्थात् अपने को अर्पण कर देते हैं। तो तुम भी पहले उन्हों से प्रतिज्ञा कराते हो। जब पक्के हो जाते हैं, तो सम्पूर्ण स्वाहा कराते हो। ऐसी सर्विस करनी है। बिलकुल न्यौछावर कराना। आप ने कितने को न्यौछावर कराया है? जो जितना स्वयं न्यौछावर बने हैं उतना ही औरों को बनाते हैं। अगर स्वयं ही सम्पूर्ण न्यौछावर नहीं बने हैं तो औरों को भी इतना ही आप समान बनाते हैं। अभी न्यौछावर होने में म्हणत और समय दोनों ही लगता है। लेकिन थोड़े ही समय में न्यौछावर होनेवालों की क्यू लग जाएगी। जैसे वहां यादगार है काशी कलवट खाने का। स्वयं अपनी इच्छा से कटने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यहाँ भी तैयार हो जायेंगे। आप लोगों को इच्छा पैदा करने की म्हणत भी नहीं करनी पड़ेगी। स्वयं अपनी इच्छा से जम्प देने के लिए तैयार हो जायेंगे। यह क्यू लगनी है। अभी नहीं लग रही है। इसका भी कारण है। बच्चों के पास अभी कौन सी क्यू लगी हुई है? जब वह क्यू ख़त्म हो जाएगी, तब यह क्यू लगेगी। मालूम है अभी कौन सी क्यू लगी हुई है? (संकल्पों की) संकल्पों में भी मुख्य क्या हैं, जो ही पुरुषार्थ में ढीलापन लाती है। व्यर्थ संकल्पों का मूल कारन क्या होता है? पुराने संस्कार किस रूप में आते हैं? एक शब्द बताओ जिसमे व्यर्थ संकल्पों का बीज आ जाए। व्यर्थ संकल्प वा विकल्प जो चलते हैं तो एक ही शब्द बुद्धि में आता है कि यह क्यों हुआ, क्यों से व्यर्थ संकल्पों की क्यू शुरू हो जाती है। अंग्रेजी में भी आप देखेंगे क्यू शब्द की निशानी सभी से टेढ़ी होती है। तो क्यों की क्यू बड़ी लम्बी है। इस क्यू के समाप्ति बाद ही सम्पूर्णता आएगी। फिर वह क्यू लगेगी। जब क्यों शब्द निकलेगा, फिर ड्रामा की भावी पर एकरस स्थेरियम रहेंगे। तो अभी क्यों के क्यू को ख़त्म करना है। समझा। एक क्यों शब्द से सेकंड में कितने संकल्प पैदा हो जाते हैं? क्यों से फिर कल्पना करना शुरू हो जाता हैं। तो बाप भी बच्चों से यह जल की लोटी चढ़वाने के लिए आये हैं। कोई भी प्रतिज्ञा करते हैं तो जल को साक्षी रखकर करते हैं। तो अब यह लोटी चढ़ानी है।

मधुबन में विशेष रेस्पोंसिबिलिटी पाण्डव-दल की है। तो उस दल में अब बल होना चाहिए। पाण्डव -दल में बल होगा तो फिर इस पाण्डव भवन के अन्दर आसुरी सम्प्रदाय तो क्या लेकिन आसुरी संकल्प भी नहीं आ सकते। इतना पहरा देना है। वह पहरा देना तो बहुत सहज है। जैसे इस गेट की रखवाली करते हो वैसे माया का जो गेट है, उसकी भी रखवाली करनी है। ऐसे पाण्डव सेना तैयार है जो आसुरी संस्कारों को, आसुरी संकल्पों को भी इस पाण्डव के अन्दर आने न दो? अब पहले अपने अन्दर यह पहरा मज़बूत होगा तब पाण्डव भवन में यह मजबूती ला सकते हैं। ऐसा पहरा देते हो? कौन-कौन ऐसी हिम्मत रखते हैं कि हम पाण्डव सेना अपने पाण्डव भवन की ऐसी रखवाली करेंगे। ऐसी रखवाली अगर पाण्डव करते रहें तो फिर यह पाण्डव भवन एक जादू का घर हो जायेगा। जो कैसी भी आत्मा आये, आते ही आसुरी संस्कारों और व्यर्थ संकल्पों से मुक्त हो जाएँ। ऐसे निर्विकल्प बनाने का जादू का घर हो जायेगा। ऐसी सर्विस जब करेंगे तब प्रत्यक्षता होगी। एक दो से सुनते ही लोग दौड़ेंगे। जैसे-जैसे समय आगे बढेगा वैसे दुःख अशांति भी बढ़ने के कारण हरेक आत्मा सुख चैन की प्यासी होगी। और उसी प्यास में तरसती हुई आत्मयीं इस पाण्डव भवन के अन्दर आने से ही एक सेकंड में सुख चैन का अनुभव करेंगी तब प्रभाव निकलेगा। एक-एक चैतन्य मूर्ति के सामान दर्शन मूर्त हो जायेंगे। एक एक रत्न का दर्शन करने के लिए दूर दूर से प्यासी आत्मयीं आएँगी। लेकिन जब ऐसा पहरा शुरू करने तब। जैसे संगठन का बल है, स्नेह का बल भी है, एक दो को सहयोग देने का बल भी है। अभी सिर्फ एक बल चाहिए, जिसकी कमी होने कारन ही माया की प्रवेशता हो जाती है। वह है सहनशीलता का बल। अगर सहनशीलता का बल हो तो माया कभी वार कर नहीं सकती। तो यह चारों बल चाहिए।

आज बापदादा की जयंती के साथ सभी बच्चों की भी तो जयंती है। तो इस जयंती पर चों बल अपने में धारण करेंगे तो फिर यह पाण्डव भवन साड़ी दुनिया में देखने और अनुभव करने का विशेष स्थान गिना जायेगा। इस पाण्डव भवन का महत्व सरे विश्व में होगा। महत्व बढाने वाले कौन? पाण्डव सेना और शक्ति सेना। मधुबन निवासी ही मधुबन के महत्व को बाधा सकते हैं। पाण्डवों के लिए तो प्रसिद्द है कि वह कभी भी प्रतिज्ञा से हिलते नहीं थे। एक परसेंटेज की भी कमी हुई तो इसको कमी ही कहा जायेगा। पाण्डव सेना को एग्जाम्पल बनना है। जो आप लोगों को देख औरों को भी प्रेरणा मिले। कोई भी मधुबन में आये तो यह विशेषता देखे कि यह सभी इतने अनेक होते हुए भी एक और एक की ही लगन में मग्न हैं। और एक रस स्थति में स्थित हैं। जब ऐसा दृश्य देखेंगे तब प्रत्यक्षता की निशानी देखने में आएगी। आप सब की प्रतिज्ञा ही प्रत्यक्षता को लाएगी। तो आज पहले प्रतिज्ञा का जल चढ़ाना है फिर सौगात भी मिलेगी। प्रतिज्ञा की तीन लकीर दिखाते हैं। बेल पात्र भी जो चढाते हैं वह भी तीन पत्तों का होता है। तो आज के दिन तीन प्रतिज्ञा कराई हैं। सहनशीलता का बल अपने में धारण करेंगे, क्यों की क्यू को ख़त्म करेंगे और आसुरी संस्कारों पर पहरा देना है। तो तीन प्रतिज्ञा का यह बेलपत्र चढ़ाना है। भक्त लोग तो खेल करते हैं लेकिन ज्ञान सहित खेल करना वह तो बच्चे ही जानते हैं। इसलिए आज के शिवरात्री का यादगार फिर भक्ति में रस्म माफिक चलता है। पहले आरम्भ बच्चे ही करते हैं ज्ञान सहित। और फिर भक्त कॉपी करते हैं अन्धश्रद्धा से। ज़रूर कभी किया है तब यादगार बना है।

भगवान् बच्चों को कहते हैं वन्दे मातरम् कितना फर्क हो गया। इतना नशा रहता है? जिस बाप की अनेक भक्त वन्दना करते हैं, वह स्वयं आकर कहते हैं वन्दे मातरम् इस खुमारी की निशानी क्या होगी? उनके नयन, उनके मुखड़े, उनकी चलन, बोल आदि से ख़ुशी झलकती रहेगी। जिस ख़ुशी को देख कहियों के दुःख मिट जायेंगे। ऐसी मातायीं जिनको बापदादा स्वयं वन्दना करते हैं, उनकी निशानी है ख़ुशी। चेहरा ही अनेक आत्माओं को हर्षायेगा। अज्ञानी लोग सवेरे उठ कोई ऐसी शक्ल देखते हैं तो कहते हैं सवेरे उनकी शक्ल देखी तब यह प्रभाव पड़ा तो शक्ल का प्रभाव पड़ता है। तो आप बच्चों का हर्षित चेहरा देख सभी के अन्दर हर्ष आ जायेगा। ऐसा होने वाला है। अच्छा- जितना अपने ऊपर चेकिंग करेंगे उतनी चंगे आती जाएगी। संकल्प, कर्म, समय, संस्कार इन चरों के ऊपर चेकिंग करनी है कदम-कदम पर हर रोज़ कोई – न – कोई स्लोगन सामने रख उसको प्रैक्टिकल में लाओ।


23-03-70              ओम शान्ति                       अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


सच्ची होली मनाना अर्थात् बीती को बीती करना  २३-०३-१९७०

बापदादा क्या देखते हैं और आप सब क्या देखते हो ?  देख तो आप भी रहे हो और बापदादा भी देख रहे हैं |  लेकिन आप क्या देखते हो और बापदादा क्या देखते हैं ?  फर्क है वा एक ही है |  रूहानी बच्चों को देखते आज विशेष क्या बात देख रहे हैं ?  हर चलन की विशेषता होती है ना |  तो आज मुलाक़ात में विशेष कौन सी बात देख रहे हैं ?  आज तो विशेष बात देख रहे हैं उसको देख हर्षित हो रहे हैं |  बापदादा हरे क के पुरुषार्थ की स्पीड और स्थिति की स्पिरिट देख रहे हैं |  जितनी जितनी स्पिरिट होगी उतनी स्पीड भी होगी |  तो यह देखकर हर्षा रहे हैं |  स्पीड तेज़ होने से सर्विस की सफलता तेज़ होगी |  आज होली कैसे मनायी ?  (सूक्ष्मवतन में मनायी) वतन में भी कैसे मनायी ?  सिर्फ वतन में मनायी या यहाँ भी मनाई ?  सिर्फ अव्यक्त रूप से ही मनाई ?  होली मनाना अर्थात् सदा के लिए आज के दिन बीती सो बीती का पाठ पक्का करना, यही होली मनाना है |  आप लोग भी अर्थ सुनाते हो ना |  होली अर्थात् जो बात हो गयी, बीत गयी उसको बिलकुल ख़त्म कर देना |  बीती को बीती कर आगे बढ़ना यह है होली मनाना अर्थात् होली के अर्थ को जीवन में लाना |  हर दिवस पर पुरुषार्थ को बदल देने लिए कोई न कोई बात ऐसे महसूस हो जैसे बहुत पुरानी कोई जन्म की बात है |  ऐसी बीती हुयी महसूस हो |  जब ऐसी स्थिति हो जाती है तब पुरुषार्थ की स्पीड तेज़ होती है |  पुरुषार्थ की स्पीड को ढीला करने वाली मुख्य बात यह होती है – बीती हुई बात को चिंतन में लाना |  अपनी बीती हुयी बातें या दूसरों की बीती हुयी बातों को चिंतन में लाना और चित्त में भी रखना |  एक होता है चित्त में रखना दूसरा होता है चिंतन में लाना |  जो चित्त में भी न हो |  चिंतन में भी न आये |  तीसरी होता है वर्णन करना |  तो आज के दिन बापदादा होली मनाने के लिए आये हैं |  होली मनाने लिए बुलाया है ना |  तो इस रंग को पक्का लगाना यही होली मनाना है |  होली के दिन एक तो रंग लगाते हैं और दूसरा क्या करते हैं ?  एक दिन पहले जलाते हैं दुसरे दिन मनाते हैं |  जलाने के बाद मनाना है और मनाने में मिठाई खाते हैं |  यहाँ आप कौन सी मिठाई खायेंगे ?  रंग तो बताया कौन सा लगाना है |  अब मिठाई क्यों खाते हैं ?

जब यह रंग लग जाता है तो फिर मधुरता का गुण स्वतः ही आ जाता है |  अपने वा दुसरे की बीती को न देखने से सरल चित्त हो जाते हैं और जो सरलचित्त बनता है उसका प्रत्यक्ष रूप में गुण क्या देखने में आता है ?  मधुरता |  उनके नयनों से मधुरता मुख से मधुरता, और चलन से मधुरता प्रत्यक्ष रूप में देखने में आती है |  तो इस रंग से मधुरता आती है इसलिए मिठाई का नियम है |  होली पर और क्या करते हैं ?  (मंगल-मिलन) मंगल मिलन का अर्थ क्या हुआ ?  यहाँ मंगल मिलन कैसे मनाएंगे ?  मधुरता आने के बाद मंगल मिलन क्या होता है ?  संस्कारों का मिलन होता है |  भिन्न-भिन्न संस्कारों के कारण ही एक दो से दूर होते हैं, तो जब यह रंग लग जाता है, मधुरता आ जाती है तो फिर कौन सा मिलन होता है ?  आप लोग सम्मेलन करके आये हो ना |  बापदादा ने यह जो भट्ठी बनाई है वह फिर संस्कार मिलन की बनाई है |  जब संस्कार मिलन हो, यह सम्मेलनहो तब उस सम्मेलन की प्रत्यक्षता देखने में आएगी |  आप लोगों ने सम्मेलन किया और बापदादा संस्कारों का मिलन कर रहे हैं |  तो इस मिलन का यादगार यह मंगल मिलन है |  बापदादा का बच्चों से मिलन तो है ही लेकिन आपस में सभी से बड़े ते बड़ा मिलाना है संस्कारों का मिलना |  जब यह संस्कार मिलन हो जायेगा तब जयजयकार होगी |  देवियों का गायन है ना कि वह सभी को सिद्धि प्राप्त कराती हैं |  कोई को भी रिद्धि सिद्धि प्राप्त करनी होती है तो कीन्हों से प्राप्त करते हैं ?  रिद्धि सिद्धि प्राप्त कराने वाली कौन हैं ?  देवियाँ |  जब पुरुषार्थ की विधि सम्पूर्ण हो जाती है तब यह सिद्धि भी प्राप्त होती है |  कभी भी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए बापदादा के पाद नहीं आयेंगे |  देवियों के पास जायेंगे |

देवियाँ स्वयं सिद्धि प्राप्त की हुई हैं |  तब दूसरों को रिद्धि सिद्धि दे सकती हैं |  तुम्हारे पुरुषार्थ की सिद्धि तब होगी जब संस्कारों का मिलन होगा |  सबसे जास्ती भक्तों की क्यू बड़ी कहाँ लगती हैं ?  (देवियों के पास) जैसे हनुमान के मंदिर में व् देवियों के मंदिर में ज्यादा भीड़ लगती है |  इससे क्या सिद्ध होता है ?  साकार रूप में भी क्यू कौन देखेगा ?  प्रत्यक्षता के बाद जो क्यू लगेगी वह कौन देखेंगे ?  बच्चे ही देखेंगे |  बापदादा गुप्त है प्रत्यक्ष रूप में बच्चे ही देखेंगे |  तो उसका यादगार प्रत्यक्ष रूप में बड़ी ते बड़ी क्यू भक्तों की, बच्चों के यादगार रूप पर ही लगती है |  लेकिन यह क्यू लगेगी कब ?  जब संस्कार न मिलने का एक शब्द निकल जायेगा तब वह क्यू भी लगेगी |  इस भट्ठी में और पढाई नहीं करनी है लेकिन अंतिम सिद्धि का स्वरुप बनकर दिखाना है |  यह संगठन संस्कारों को मिलाने के लिए है |  कोई भी चीज़ को जब मिलाया जाता है तो क्या करना होता है ?  संस्कारों को मिलाने के लिए दिलों का मिलन करना पड़ेगा |  दिल के मिलन से संस्कार भी मिलेंगे तो संस्कारों को मिलाने के लिए भुलाना, मिटाना और समाना यह तीनों ही बातें करनी पड़ेंगी |  कुछ मिटाना पड़ेगा, कुछ भुलाना पड़ेगा, कुछ समाना पाएगा – तब यह संस्कार मिल ही जायेंगे |  यह है अंतिम सिद्धि का स्वरुप बनना |  अब अंतिम स्थिति को समीप लाना है |  एक दो की बातों को स्वीकार करना और सत्कार देना |  अगर स्वीकार करना और सत्कार देना यह दोनों ही बातें आ जाती हैं तो फिर सम्पूर्णता और सफलता दोनों ही समीप आ जाती हैं |  सिर्फ इन दो बातों को ध्यान देना, दोनों ही बातों को समीप लाना है |  एक दो को सत्कार देना ही भविष्य का अधिकार लेना है |  यह कीन्हों की भट्ठी है, मालूम हैं ?  इस भट्ठी का नाम क्या है ?  आप लोगों को तिलक के बजाय और चीज़ देते हैं |  औरों को तिलक लगाया |  इस भट्ठी को लगानी है चिन्दी |  तिलक छोटा होता है, चिन्दी बड़ी होती है |  बडेपन की निशानी चिन्दी है |  तिलक तो छोटे भी लगाते हैं लेकिन चिन्दी बड़े लगाते हैं |  जब से जिम्मेवारी अपने ऊपर रखने की हिम्मत रखते हैं तब से चिन्दी को धारण करते हैं |  तो तिलक अच्छा वा चिन्दी अच्छी ?  आप सभी सर्व के शुभ चिन्तक हो, सर्विसेबुल अर्थात् शुभ चिन्तक |  तो इस शुभ चिन्तक  की निशानी चिन्दी है और नाम है शुभ चिन्तक ग्रुप |

आपके शुभ चिन्तक बन्ने से सभी की चिंताएं मिटती हैं |  आप सभी की चिंताओं को मिटानेवाली शुभ चिन्तक हो |  और स्लोगन कौन सा है ?  जैसे वो लोग कहते हैं आत्मा सो परमात्मा वैसे इस ग्रुप का स्लोगन कौन सा है ?  बालक सो मालिक |  यह स्लोगन विशेष इस ग्रुप का है |  अब नाम भी मिला, स्लोगन भी मिला, काम भी मिला और इस भट्ठी में क्या करना है ?  भाषण भी यह करना है कि संस्कार मिलन कैसे हो |  इस भट्ठी में कमाल यही करनी है जो एक अनेकों को संस्कारों में आप समान बना सके |  सम्पूर्ण संस्कार, अपने संस्कार नहीं |  एक अनेकों को सम्पूर्ण संस्कार वाली बना ले तो क्या होगा ?  समाप्ति |  समाप्ति करनेवाला यह ग्रुप है |  और फिर स्थापना करने वाला भी यह ग्रुप है |  समाप्ति क्या करनी है ?  पालना क्या करनी है और स्थापना क्या करनी है ?  यह तीनों ही टॉपिक्स इस भट्ठी में स्पष्ट करनी है |  इसलिए त्रिमूर्ति चिन्दी लगा रहे हैं |  स्थापना, पलना, समाप्ति अर्थात् विनाश |

क्या-क्या करना है इसको स्पष्ट और सरल रीति जो कि प्रैक्टिकल में आ सके, वर्णन तक नहीं |  प्रैक्टिकल में आ सके औरों को भी करा सकें – ऐसी बातें स्पष्ट करनी हैं |  लेकिन बिंदी रूप बनकर के ही यह तीनों कर्त्तव्य सफल कर सकेंगे |  इसलिए आपके इस कर्त्तव्य के यादगार में चिन्दी दे रहे हैं स्मृति भी, स्थिति भी और कर्त्तव्य भी तीनों ही इस यादगार में समाये हुए हैं |  विशेष ग्रुप की विशेष बातें होती हैं |  आप सभी होली मनाने आये हैं वा इस ग्रुप की सेरेमनी (celebration) देखने ?   यह भी सौभाग्य समझो की ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं के समीप बनने का ड्रामा में पार्ट है |  सेरेमनी (celebration) देखना अर्थात् अपने को ऐसा श्रेष्ठ बनाना |  यह है सेरेमनी (celebration) ऐसा अपने को बनाओ जो इस ग्रुप के जैसे साकार में समीप आये हो ना, वैसे ही सम्बन्ध में भी समीप हो |  देखने वाले भी कम नहीं |  देखने वाली आत्माएं भी श्रेष्ठ और समीप है |  बापदादा के दिल पसंद रत्न हैं |  पहले कौन आएगा ?  बापदादा तो सभी को एक ही स्पीड में देख रहे हैं |  इसलिए वन टू नहीं कह सकते |  इस समय सभी वन की याद में नंबर वन ही है |

आप लोग भी जब स्पिरिट में और स्पीड में इस ग्रुप के समीप आयेंगे तब फिर आप की भी सेरेमनी (फिर हरेक बड़ी बहनों को बापदादा चिन्दी लगाये रूहरिहान करते गए)

(दीदी) – बालक मालिक है इसलिए समान बिठाते हैं तख़्त पर (सन्दली पर) |  व्यक्त रूप में तो यह सेरेमनी कर रहे हैं लेकिन अव्यक्त रूप में यह सेरेमनी होती है ?  बालक को मालिक बनाया अब से तख़्तनशीन बनाते हैं |  साकार में थी दिल तख़्त नशीन, अब हैं सर्विस की तख़्त नशीन और भविष्य में होंगी राज्य तख़्त नशीन |  संगम पर तख़्त नशीन अभी बनते हैं |  ड्रामा में जो पार्ट नूँधा हुआ है वह कितना रहस्ययुक्त है |  इसको दिन प्रति दिन स्पष्ट समझते जायेंगे |  स्नेह से भी कर्त्तव्य कहाँ बंधन में बांधता है |  जैसे स्नेह का बंधन है वैसे कर्त्तव्य का भी बंधन है |  तो यह है कर्त्तव्य का बंधन |  कर्त्तव्य के बंधन में अव्यक्त रूप में हैं |  स्नेह के बंधन में साकार रूप में थे |

(कुमारका दादी) – स्वप्न में भी कब यह सोचा था कि अव्यक्त रूप में तख़्त नशीन बनायेंगे |  तख़्त नशीन कौन बनता है ?  जो सदैव नशे में है और निशाना बिलकुल एक्यूरेट रहता है |  नशा और निशाना, योग और ज्ञान |  ऐसे बच्चे ही तीनों तख़्त के अधिकारी बनते हैं |  त्रिमूर्ति तख़्त भी है |  अगर एक तख़्त नशीन बने तो तीनों तख़्त के बनेंगे |  बाप तख़्त नशीन बच्चों को देखते हैं तो क्या होता है ?  बापदादा को भी नशा होता है कि ऐसे लायक बच्चे हैं |

(जानकी दादी) – अब  तक वाणीमूर्त बने हो फिर बनेंगे साक्षात्कार मूर्त |  अभी वाणी से औरों को साक्षात्कार होता है लेकिन फिर होगा साइलेंस से साक्षात्कार |  जब बनेंगे तो सभी के मुख से क्या निकलेगा ?  यह जो गायन है ना कि सभी परमात्मा के रूप हैं, यह गायन संगम पर ही प्रैक्टिकल में होता है |  भक्तिमार्ग में जो भी बातें कही हैं वह संगम की बातों को मिक्स किया है |  तुम्हारी अंत में यह स्थिति आती है, जो सभी में साक्षात् बापदादा की मूर्त महसूस होगी |  सभी के मुख से यही आवाज़ निकलेगा यह तो साक्षात् बापदादा के मूर्त हैं |  साक्षात् रूप बनने से साक्षात्कार होगा तो जो यह अंत का रूप सभी में साक्षात् रूप देखते हैं इसको मिक्स करके कह देते हैं – सभी परमात्मा के रूप हैं |  बाप के समान को परमात्मा का रूप कह देते |  यह सभी बातें यहाँ से ही चली हैं तो साक्षात्कार मूर्त बन्ने के लिए साक्षात् बापदादा समान बनना है |  अब चेकिंग क्या करनी है ?  समानता की चेकिंग करनी है, वह चेकिंग नहीं |  वह तो बचपन की थी |  अब यह चेकिंग करनी है |  जितनी समानता उतना स्वमान मिलेगा |  समानता से अपने स्वमान का पता लगा सकते हैं |  समानता कहा तक आई है और कहाँ तक समानता लानी है यही चेकिंग करना और कराना है |  यह भी टॉपिक है जितनी जिसमे समानता देखो उतना समीप समझो |  समीप रत्न की परख समानता है |

(चंद्रमणि दादी) -  आप सूर्यमणि हो या चन्द्रमणि हो ?  चन्द्रमणियाँ जो होते हैं  उनका निवास स्थान कहाँ और सूर्यमणियाँ जो होते हैं उनका निवास स्थान कहाँ होता है ?  आप कौन सी मणि हो ?  (दोनों हैं) शक्ति रूप भी हैं और शीतल रूप भी हैं |  इसलिए कहती हैं सूर्यमणि भी हूँ और चन्द्रमणि भी हूँ |  अभी नॉलेज तो आ गयी है लेकिन स्थिति तो नहीं है ना |  नॉलेज से लाइट आई है |  अभी माईट नहीं आई है |  जब लाइट और माईट दोनों में एकरस होंगे तब नंबर आउट होंगे |  अभी औरों को भी नॉलेज की लाइट दे सकती हो, माईट नहीं दे सकती हो |  इसलिए सफलता भी उसी अनुसार होती है |  सभी को लाइट अर्थात् रौशनी आ रही है कि इन्हों की नॉलेज क्या है, लेकिन लाइट का प्रभाव कम है, आधा कार्य अभी रहा हुआ है |  माईट देने में नंबर वन यह बनेंगी |  कोई-कोई का लाइट देने में नंबर आगे है, कोई का माईट देने में नंबर आगे है |  कोई दोनों में है |  तीन क्वालिटी है |  (जब बापदादा चिंदी पहनाते थे तो सभी तालियाँ बजा रहे थे) सतयुग में बजेंगी शहनाइयाँ |  अभी बजती हैं तालियाँ |

(निर्मलशान्ता दादी) -  तन के रोग पर विजय प्राप्त कर रही हो |  संगम पर ताज, तिलक, तख़्त और सुहाग-भाग सभी मिलते हैं |  एक ही समय पर सर्व प्राप्तियां बापदादा कराते हैं |  जो एक जन्म की दें अनेक जन्म चलती है |  वैसे बच्चों को फिर अनेक जन्मों के हिसाब-किताब एक जन्म में चुक्तु करने हैं |  यह एक जन्म का अनेक जन्म चलता है |  वह अनेक जन्मों का एक जन्म में ख़त्म होता है तो अनेक जनों का हिसाब-किताब एक जन्म में ख़त्म करने के कारण कभी-कभी वह फ़ोर्स से रूप ले आता है |  बापदादा यह युद्ध देखते रहते हैं आप भी देखती हो अपनी वा दूसरों की ?  जब साक्षी हो देखने लग पड़ते तो यह व्याधि  बदलकर खेल रूप में हो जाती है |  बापदादा साक्षी हो देखते भी हैं और उनका साहस देखकर हर्षित भी होते हैं |  और साथ-साथ सहयोगी भी बनते हैं |  थकती तो नहीं हो ना |  (नहीं) अथक बाप के बच्चे अथक और अविनाशी हो |  मालुम है अब क्या करना है ?  अब अंत में साक्षात्कार मूर्त्त बनना है जितना साक्षी अवस्था ज्यादा रहेगी उतना समझो कि साक्षात्कार मूर्त्त बनने वाले हैं |  अब अंतिम पुरुषार्थ यह रह गया है |  साक्षात्कार मूर्त्त बन बापदादा का साक्षात्कार और अपना साक्षात्कार कराना है |

(शान्तामणि दादी) -  श्रेष्ठता लाने के लिए मुख्य गुण कौन सा है ?  जितनी स्पष्टता होती उतनी श्रेष्ठता आती है |  जो स्पष्ट होता है वाही सरल और श्रेष्ठ होता है |  स्पष्टता श्रेष्ठता के नजदीक है और जितनी स्पष्टता होती है उतनी सफलता भी होती है |  सफलता फिर इतनी समीपता में लाती है |  समीप रत्नों की निशानी किससे मालूम पड़ेगी ?  समानता से |  बापदादा के संस्कारों की समानता से समीपता का मालूम पड़ता है |  तो समानता समीपता की निशानी है |  आदि रतन हो |  आदि सो अनादि |  जो आदि रतन हैं वह अनादि गायन योग्य बनते हैं |  क्योंकि आदि देव के साथ मददगार हैं |  आदि रतन ही सृष्टि के कर्त्तव्य के आधार है |

(रत्न मोहिनी दादी) – स्नेही हो वा सहयोगी हो ?  (दोनों) स्नेही और सहयोगी दोनों समान हैं, जितना जो स्नेही उतना सहयोगी बनता है |  स्नेही सहयोग के सिवाए रह नहीं सकता |  जितना स्नेही है उतना सहयोगी है |  उतना ही शक्तिरूप भी है |  जब स्नेह, सहयोग और शक्ति तीनों की समानता होती है तब समाप्ति होती है |  इस समय डबल ताजधारी हो कि भविष्य में बनेंगे ?  संगम पर डबल ताजधारी हो ?  कौन सा डबल ताज है ?  एक है स्नेह का दूसरा है सर्विस का |  सर्विस का ताज है जिम्मेवारी का ताज |  वह स्थूल और वह सूक्ष्म है ना |  स्नेह का ताज सूक्ष्म है |  जो जहाँ डबल ताजधारी बनते हैं, वह वहां भी डबल ताजधारी बनते हैं |  बापदादा डबल ताज देते हैं |  नुम्बेर्वार ताज तो होते हैं ना |  यहाँ भी नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार ताजधारी देखने में आएंगे |

(मनोहर दादी) – जैसे साकार में जब अव्यक्त प्रोग्राम चलते थे तो श्रृंगार कर बैठते थे |  आज वाही श्रृंगार किये हुए चित्र देखते हैं |  हरेक की विशेषता अपनी-अपनी है जो विशेषता समीप लाती है |  आपकी विशेषता क्या है ?  सर्व से स्नेही और सर्व के सहयोगी बनना – यह विशेषता है |  जो सर्व के स्नेही  बनते हैं सर्व से स्नेह भी उनको प्राप्त होता है |  सर्व स्नेही भी कौन बनते हैं ?  जो सर्व त्यागी होते हैं |  जो सर्व त्यागी होते हैं, वाही सर्व के स्नेही और सहयोगी बनते हैं |  ऐसे श्रेष्ठ संकल्प वाले श्रेष्ठ पद के अधिकारी बनते हैं |  संकल्प में भी सर्व के कल्याण की भावना हो |  सिर्फ अपनी नहीं |  ऐसे ही सर्व प्राप्तियों के अधिकारी बनते हैं |  ऐसे को बापदादा तथा सभी से सत्कार मिलता है |  सत्कार का अधिकार लें यह भी बहुत बड़ी बात है |  अच्छा –

26-03-70              ओम शान्ति                      अव्यक्त बापदादा         मधुबन 


महारथी – पन के गुण और कर्त्तव्य   २६-०३-१९७०

आज बोलना है वा बोलने से परे जाना है ?  बोलने से परे अवस्था अच्छी लगती है वा बोलने की अच्छी है ?  (दोनों) ज्यादा कौन सी अच्छी लगती है ?  बोलते हुए भी बोले से परे की स्थिति हो सकती है ?  दोनों का साथ हो सकता है वा जब न बोलेन तब परे अवस्था हो सकती है ?  हो सकती है तो कब होगी ?  इस स्थिति में स्थित होने के लिए कितना समय चाहिए ?  अब हो सकती है ?  कुछ मास वा कुछ वर्ष चाहिए ?  प्रैक्टिस अभी शुरू हो सकती है कि कारोबार में नहीं हो सकती ?  अगर हो सकती है तो अब से ही हो सकती है ?  जो महारथी कहलाये जाते हैं उनकी प्रैक्टिस और प्रैक्टिकल साथ-साथ होना चाहिए |  महारथी और घोडेस्वार में अंतर ही यह होता है |  महारथियों की निशानी होगी प्रैक्टिस की और प्रैक्टिकल हुआ |  घोड़ेसवार प्रैक्टिस करने के बाद प्रैक्टिकल में आयेंगे |  और प्यादे प्लान्स ही सोचते रहेंगे |  यह अंतर होता है |  बच्चों को मुख से यह शब्द भी नहीं बोलना चाहिए कि अटेंशन है, प्रैक्टिस करेंगे |  अभी वह स्थिति भी पार हो गई |  अभी तो जो संकल्प हो वह कर्म हो |  संकल्प और कर्म में अन्तर नहीं होना चाहिए |  वह बचपन की बातें हैं |  संकल्प करना, प्लान्स बनाना फिर उसपर चलना, अब वह दिन नहीं |  अब पढाई कहाँ तक पहुंची है ?  अब तो अन्तिम स्टेज पर है |  महारथीपन के क्या गुण और कर्त्तव्य होते हैं, इसको भी ध्यान देना है |  आज वाही सुनाने और अंतिम स्थिति के स्वरुप का साक्षात्कार कराने आये हैं |  सर्विसएबुल क्या कर सकते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं, क्या कह सकते हैं, क्या नहीं कह सकते हैं ?  अब से धारणा करने से ही अंतिम मूर्त्त बनेंगे, साकार सबूत देखा ना प्रैक्टिस और प्रैक्टिकल एक समान था कि अलग-अलग था |  जो सोच वाही कर्म था |  बच्चों का कर्त्तव्य ही है फॉलो करना |  पाँव के ऊपर पाँव |  फुल स्टेप लेने का अर्थ ही है पाँव के ऊपर पाँव |  जैसे के वैसे फोलो करेंगे |  वह स्टेज कब आएगी ?  महारथियों के मुख से कब शब्द ही कमजोरी सिद्ध करता है |  एक होता करके दिखायेंगे, एक होता है हाँ करेंगे, सोचेंगे |  हिम्मत है, लेकिन फेथ नहीं |  फेथफुल के बोल ऐसे नहीं होते |  फेथफुल का अर्थ ही है निश्चयबुद्धि |  मन, वचन, कर्म हर बात में निश्चयबुद्धि |  सिर्फ ज्ञान और बाप का परिचय, इतने तक निश्चयबुद्धि नहीं |  लेकिन उनका संकल्प भी निश्चयबुद्धि, वाणी में भी निश्चय, कभी भी कोई बोल हिम्मतहिन का नहीं |  उसको कहा जाता है महारथी |  महारथी का अर्थ ही है महान |

आपस में क्या-क्या प्लान बनाया है ?  ऐसा प्लैन बनाया जो इस प्लैन से नयी दुनिया का प्लैन प्रैक्टिकल में हो जाए |  नयी दुनिया का प्लैन प्रैक्टिकल में आना अर्थात् पुराणी दुनिया की कोई भी बात फिर से प्रैक्टिकल में न आये |  सब लोग कहते हैं |  फिर कोई मन में कहते हैं, कोई मुख से कहते हैं कि प्लैन्स तो बहुत बनते हैं, अब प्रैक्टिकल में देखें |  लेकिन यह संकल्प भी सदा के लिए मिटाना यह महारथी का काम है |  सभी की नज़र अभी भी मधुबन में विशेष मुख्य रत्नों पर है |  तो उस नज़र में ऐसे दिखाना है जो उनको नज़र आप लोगों की बदली हुयी नज़रों को ही देखें |  तो अब वह पुरानी नज़र नहीं, पुरानी वृत्ति नहीं |  तब अन्तिम नगाड़ा बजेगा |  यह संगठन कॉमन नहीं है, यह संगठन कमाल का है |  इस संगठन से ऐसा स्वरुप बनकर निकलना है जो सभी को साक्षात् बापदादा के ही बोल महसूस हों |  बापदादा के संस्कार सभी के संस्कारों में देखने में आयें |  अपने संस्कार नहीं |  सभी संस्कारों को मिटाकर कौन से संस्कार भरने हैं ?  बापदादा के |  तो सभी को साक्षात्कार हो कि यह साक्षात् बापदादा बनकर ही निकले हैं |  ऐसा सभी को कराना है |  कोई भी पुराना संकल्प वा संस्कार सामने आये ही नहीं |  पहले यह भेंट करो, यह बापदादा के संस्कार हैं ?  अगर बापदादा के संस्कार नहीं तो उन संस्कारों को टच भी नहीं करो |  बुद्धि में संकल्प रूप से ही टच न हो |  जैसे क्रिमिनल चीज़ को टच नहीं करते हो वैसे ही अगर बापदादा के समान संस्कार नहीं है तो उन संस्कारों को भी टच नहीं करना है |  जैसे नियम रखते हो ना कि यह नहीं करना है तो फिर भल क्या भी परिस्थिति आती है लेकिन वह आप नहीं करते हो |  परिस्थिति का सामना करते हो, क्योंकि लक्ष्य है यह करना है |  वैसे ही जो अपने संस्कार बापदादा के समान नहीं है उनको बिलकुल टच करना नहीं है |  ऐसे समझो |  देह और देह के सम्बन्ध यह सीढ़ी तो चढ़ चुके हो |  लेकिन अब बुद्धि में भी संस्कार इमर्ज न हों |  जैसे संस्कार होंगे वैसा स्वरुप होगा |  किसके संस्कार सरल, मधुर होते हैं तो वह संस्कार स्वरुप में आते हैं |

जब संस्कार बापदादा के समान बन जायेंगे तो बापदादा के स्वरुप सभी को देखने आएंगे |  जैसे बापदादा वैसे हूबहू वाही गुण, वाही कर्त्तव्य, वे ही बोल, वे ही संकल्प होने चाहिए फिर सभी के मुख से निकलेगा यह तो वाही लगते हैं |  सूरत अलग होगी, सीरत वही होगी |  लेकिन सूरत में सीरत आणि चाहिए |  अब बापदादा बच्चों से यही  उम्मीद रखते हैं |  सभी हैं ही स्नेही सफलता के सितारे |  पुरुषार्थी सितारे |  सर्विसएबुल बच्चों का पुरुषार्थ सफलता सहित होता है |  निमित्त पुरुषार्थ करेंगे लेकिन सफलता है ही है |  अब समझा क्या करना है ?  जो सोचेंगे, जो कहेंगे वही करेंगे |  जब ऐसे शब्द सुनते हैं कि सोचेंगे, देखेंगे, विचार तो ऐसा है |  तो हँसते हैं अब तक यह क्यों ?  अब यह बातें ऐसी लगती है जैसे बुज़ुर्ग होने की बाद कोई गुड्डियों का खेल करे तो क्या लगता है ?  तो बापदादा भी मुस्कुराते हैं – बुज़ुर्ग होते भी कभी-कभी बचपन का खेल करने में लग जाते हैं |  गुड्डियों का खेल क्या होता है, मालूम है ?  साड़ी जीवन उनकी बना देते हैं, छोटे से बड़ा करते, फिर स्वयंवर करते |  |  |  | वैसे बच्चे भी कई बातों की, संकल्पों की रचना करते हैं फिर उसकी पालना करते हैं फिर उनको बड़ा करते हैं फिर उनसे खुद ही तंग होते हैं |  तो यह गुड्डियों का खेल नहीं हुआ ?  खुद ही अपने से आश्चर्य भी खाते हैं |  अब ऐसी रचना नहीं रचनी है |  बापदादा व्यर्थ रचना नहीं रचते हैं |  और बच्चे भी व्यर्थ रचना रचकर फिर उनसे हटने और मिटने का पुरुषार्थ करते हैं |  इसलिए ऐसी रचना नहीं रचनी है |  एक सेकंड में सुलटी रचना भी क्विक रचते हैं और उलटी रचना भी इतनी तेज़ी से होती है |  एक सेकंड में कितने संकल्प चलते हैं |  रचना रचकर उसमे समय देकर फिर उनको ख़त्म करने लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता है ?  अब इस रचना को ब्रेक लगाना है |  

वह बर्थ कण्ट्रोल करते हैं ना |  यह भी संकल्पों की उत्पत्ति होती है, तो यह भी बर्थ(जन्म) है |   वहाँ वह जनसँख्या अति में जाती है और यहाँ फिर संकल्पों की संख्या अति होती है |  अब इसको कण्ट्रोल करना है |  पुरुषार्थ की कमजोरी के कारण संकल्पों की रचना होती है, इसलिए अब इनको नाम निशाँ से ख़त्म कर देना है |  पुरानी बातें, पुराने संस्कार ऐसे अनुभव हों जैसे कि नामालुम कब की पुरानी बात है |  ऐसे नाम निशान ख़त्म हो जाए |  अब भाषा बदलनी है |  कई ऐसे बोल अब तक निकलते हैं जो सम्पूर्णता की स्टेज अनुसार नहीं है |  इसलिए अब से संकल्प ही वही करना है, बोल भी वही, कर्म भी वही करनी है |  इस भट्ठी के बाद सभी की सूरत में सम्पूर्णता की झलक देखने में आये |  जब आप लोग अभी से सम्पूर्णता को समीप लायेंगे तब नंबरवार और भी समीप ला सकेंगे |  अगर आप लोग ही अंत में लायेंगे तो दुसरे क्या करेंगे ?  साकार रूप ने सम्पूर्णता को साकार में लाया |  सम्पूर्णता साकर रूप में संपन्न देखने में आती थी |  सम्पूर्ण और साकार अलग देखने में आता था |  वैसे ही आपका साकार स्वरुप अलग देखने में नहीं आये |  साकार रूप में मुख्य गुण क्या स्पष्ट देखने में आये ?  जिस गुण से सम्पूर्णता समीप देखने आती थी ?  वह क्या गुण था ?  जिस गुण को देख सभी कहते थे कि साकार होते भी अव्यक्त अनुभव होता है |  वह क्या गुण था ?  (हरेक ने सुनाया) सभी बातों का रहस्य तो एक ही है |  लेकिन इस स्थिति को कहा जाता है-उपराम |  अपने देह से भी उपराम |  उपराम और दृष्टा |

जो साक्षी  बनते हैं उनका ही दृष्टांत देने में आता है |  तो साक्षी दृष्टा का साबुत और द्रष्टान्त के रूप में सामने रखना है |  एक तो अपनी बुद्धि से उपराम |  संस्कारों से भी उपराम |  मेरे संस्कार हिं इस मेरेपन से भी उपराम |  संस्कारों से भी उपराम |  मेरे संस्कार हैं इस मेरेपन से भी उपराम |  में यह समझती हूँ, इस मैं-पन से भी उपराम |  मैं तो यह समझती हूँ |  नहीं |  लेकिन समझो बापदादा की यही श्रीमत है |  जब ज्ञान की बुद्धि के बाद मैं-पन आता है तो वह मैं-पन भी नुकसान करता है |  एक तो मैं शरीर हूँ यह छोड़ना है, दूसरा मैं समझती हूँ, मैं ज्ञानी आत्मा हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, यह मैं-पन भी मिटाना है |  जहाँ मैं शब्द आता है वहां बापदादा याद आये |  जहाँ मेरी समझ आती है वहां श्रीमत याद  आये |  एक तो मैं-पन मिटाना है दूसरा मेरा-पन |  वह भी गिरता है |  यह मैं और मेरा तुम और तेरा यह चार शब्द हैं इनको मिटाना है |  इन चार शब्दों ने ही सम्पूर्णता से दूर किया है |  इन चार शब्दों को सम्पूर्ण मिटाना है |  साकार के अन्तिम बोल चेक किये, हर बात में क्या सुना ?  बाबा-बाबा |  सर्विस में सफलता न होने की करेक्शन भी कौन सी बात में थी ?  समझाते थे हर बात में बाबा-बाबा कहकर बोलो तो किसको भी तीर लग जायेगा |  जब बाबा याद आता तो मैं-मेरा,तू-तेरा ख़त्म हो जाता है |  फिर क्या अवस्था हो जाएगी ?  सभी बातें प्लेन हो जायेंगी फिर प्लेन याद में ठहर सकेंगे |

अभी बिंदी रूप में स्थित होने में मेहनत लगती है ना |  क्यों ?  सारा दिन की स्थिति प्लेन न होने कारण प्लेन याद ठहरती नहीं |  कहाँ न कहाँ मैं-पन, मेरापन, तू, तेरा आ जाता है |  शुरू में सुनाया था न कि सोने की ज़ंजीर भी कम नहीं नही |  वह ज़ंजीर अपने तरफ खींचती हैं |  हरेक अपने को चेक करे |  बिलकुल उपराम-बुद्धि, बिलकुल-प्लेन |  अगर रास्ता क्लियर होता है तो पहुँचने में कितना टाइम लगता है ?  उसी रास्ते में रुकावट है तो पहुँचने में भी टाइम लग जाता |  रूकावट है तब प्लेन याद में भी रुकावट है |  अब इसको मिटाना है |  जब आप करेंगे आपको देखकर सभी करेंगे |  नंबरवार स्टेज पर पहुंचना है |  आप लोग पहुंचेंगे तब दुसरे पहुंचेंगे |  इतनी जिम्मेवारी है |  संकल्प में, वाणी में, कर्म में वा सम्बन्ध में वा सर्विस में अगर कोई भी हद रह जाती है तो वह बाउंड्रीज़ जो हैं वह बाँडेज में बाँध देती हैं |  बेहद की स्थिति में होने से ही बेहद के रूप में स्थित हो जायेंगे |  अब जो कुछ खाद है उनको मिटाना है |  खाद को मिटाने लिए यह भट्ठी है |  जब संगठन हो तो साक्षात् बापदादा के स्वरूपों का संगठन हो |  अब यह सम्पूर्णता की छाप लगानी है |  सम्पूर्ण अवस्था वर्तमान समय से ही हो |  यह है महारथियों का कर्त्तव्य |  अब और क्या करना है ?  स्कॉलरशिप कौन सा लेते है ?  स्कॉलरशिप लेने वाले का अब प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता जायेगा |  ऐसे नहीं कि बापदादा गुप्त रहे तो हम बच्चों को भी गुप्त रहना है |  नहीं |  बच्चों को स्टेज पर प्रत्यक्ष होना है |  प्रत्यक्षता बच्चों की होनी है |  सर्विस के स्टेज पर भी प्रत्यक्ष कौन हैं ?  तो सम्पूर्णता की प्रत्यक्षता भी स्टेज पर लानी है |  ऐसे नहीं समझो अंत तक गुप्त ही रहेंगे |  बापदादा का गुप्त पार्ट है, बच्चों का नहीं |  तो अब वह प्रत्यक्ष रूप में लाओ |  अब मालूम हैं सर्विस कौन सी करनी है ?  सम्मेलन किया, बस यही सर्विस है ?  इनके साथ-साथ और श्रेष्ठ सर्विस कौन सी करनी है ?

अब मुख्य सर्विस है ही अपनी वृत्ति और दृष्टि को पलटाना |  यह जो गायन है नज़र से निहाल, तो दृष्टि और वृत्ति की सर्विस यह प्रैक्टिकल में लानी है |  वाचा तो एक साधन है लेकिन कोई को सम्पूर्ण स्नेह और सम्बन्ध में लाना उसके लिए वृत्ति और दृष्टि की सर्विस हो |  यह सर्विस एक स्थान पर बैठे हुए एक सेकंड में अनेकों की कर सकते हैं |  यह प्रत्यक्ष साबुत देखेंगे |  जैसे शुरू में बापदादा का साक्षात्कार पर बैठे हुआ ना |  वैसे अब दूर बैठे आपकी पावरफुल वृत्ति अ इसा कार्य करेगी जैसे कोई हाथ से पकड़ कर लाया जाता है |  कैसा भी नास्तिक तमोगुणी बदला हुआ देखने में आएगा |  अब वह सर्विस करनी है | लेकिन यह सर्विस सफलता को तब पायेगी जब वृत्ति और बैटन में क्लियर होगी |  जिम्मेवारी तो हरे अपनी समझते ही हैं |  हरेक को अपनी सर्विस होते हुए भी यज्ञ की जिम्मेवारी भी अपने सेंटर की जिम्मेवारी के समान ही समझना है |  खुद ऑफर करना है |  वाणी के साथ-साथ वृत्ति और दृष्टि में इतनी ताक़त है, जो किसके संस्कारों को बहुत कम समय में बदल दकते हो |  वाणी के साथ वृत्ति और दृष्टि नहीं मिलती तो सफलता होती ही नहीं |  मुख्य यह सर्विस है |  अभी से ही बेहद की सर्विस पर बेहद की आत्माओं को आकर्षित करना है |  जिस सर्विस को आप सर्विस समझते हो प्रजा बनाने की, वह तो आप की प्रजा के भी प्रजा खुद बनने हैं, वह तो प्रदर्शनियों में बन रहे हैं |  अभी तो आप लोगों को बेहद में अपना सुख देना है तब सारा विश्व आपको सुखदाता मानेगा |  विश्व महाराजन को विश्व का डाटा कहते हैं ना |  तो अब आप भी सभी को सुख देंगे तब सभी तुमको सुखदाता मानेंगे |  सुख देंगे तब तो मानेंगे | इसलिए अब आगे बढ़ना है |  एक सेकंड में अनेकों की सर्विस कर सकते हो |  कोई भी बात में फील करना फ़ैल की निशानी है |  कोई भी बात में फील होता है, कोई के संस्कारों में, सम्पर्क में, कोई की सर्विस में फील किया माना फ़ैल |  वह फिर फ़ैल जमा होता है |  जैसे आजकल रिवाज़ है, तीन-तीन मास में परीक्षा होती है, उसके लिए फ़ैल वा पास के नंबर फाइनल में मिलाते हैं |  जो बार-बार फ़ैल होता है वह फाइनल में फ़ैल हो पड़ते हैं |  इसलिए बिलकुल फ्लोलेस बनना है |  जब फ्लोलेस बनें तब समझो फुल पास |  कोई भी फ्लो होगा तो फुल पास नहीं होंगे |  

ओम शांति

02-04-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


 “सम्पूर्ण स्टेज की निशानियाँ 

सभी के अन्दर सुनने का संकल्प है। बापदादा के अन्दर क्या है? बापदादा सुनने सुनाने से परे ले जाते हैं। एक सेकंड में आवाज़ से परे होना आता है? जैसे आवाज़ में कितना सहज और जल्दी आते हो वैसे ही आवाज़ से परे भी सहज और जल्दी जा सकते हो? अपने को क्या कहलाते हो? मास्टर सर्वशक्तिमान। अब मास्टर सर्वशक्तिमान का नशा कम रहता है, इसलिए एक सेकंड में आवाज़ में आना, एक सेकंड में आवाज़ से परे हो जाना इस शक्ति की प्रैक्टिकल-झलक चेहरे पर नहीं देखते। जब ऐसी अवस्था हो जाएगी, अभी-अभी आवाज़ में, अभीअभी आवाज़ से परे। यह अभ्यास सरल और सहज हो जायेगा तब समझो सम्पूर्णता आई है। सम्पूर्ण स्टेज की निशानी यह है। सर्व पुरुषार्थ सरल होगा। पुरुषार्थ में सभी बातें आ जाती हैं। याद की यात्रा, सर्विस दोनों पुरुषार्थ में आ जाते हैं। जब दोनों में सरल अनुभव हो तब समझो सम्पूर्णता की अवस्था प्राप्त होने वाली है। सम्पूर्ण स्थिति वाले पुरुषार्थ कम करेंगे, सफलता अधिक प्राप्त करेंगे। अभी पुरुषार्थ अधिक करना पड़ता है उसकी भेंट में सफलता कम है। आज बापदादा सभी की सूरत में एक विशेष बात चेक कर रहे थे। देखें किसको टच होती है, कौनसी बात चेक कर रहे थे? जब थॉट रीडर्स कैच कर सकते हैं तो मास्टर सर्वशक्तिमान नहीं कर सकते हैं? यह जो भट्ठी हुई उन्हों का पेपर नहीं लिया है। तो आज पेपर लेते हैं। पास तो सभी हो ही। एक होते हैं पास दूसरे होते हैं पास विद ऑनर। पाण्डव सेना जो है वह शक्तियों के आगे रहते हैं। कोई आगे कोई पीछे रहते हैं (गोपों से) आप शक्तियों के आगे हो या पीछे हो? आगे जो दौड़ने चाहेंगे उनको कोई रोक नहीं सकता। अपनी रुकावट रोक सकती है। बाकी कोई के रोकने से नहीं रुक सकता। वैसे पाण्डवों को पीछे रहना ही आगे होना है। पीछे किसलिए रहते हैं? गार्ड पीछे रहता है। आप पीछे वाले गार्ड हो या आगे वाले? कौन सी जगह अच्छी लगती है? गार्ड पीछे रहता है गाइड आगे रहता है। तो गाइड तो आगे है ही। नहीं तो पाण्डवों को गार्ड बनाकर शक्तियों की रखवाली के लिए निमित्त बनाया हुआ है। पाण्डवों को पीछे रह कर शक्तियों को आगे करना है। गाइड नहीं बनना है। गार्ड बनना है। आप कौन से पुरुषार्थियों की लाइन में हो। पुरुषार्थियों की लितनी लाइनें बनी हुई हैं?

अब बापदादा ऐसा मास्टर सर्वशक्तिमान बनाने की पढ़ाई पढ़ा रहे हैं, जो किसके भी सूरत में उसकी स्थिति और संकल्प स्पष्ट समझ सको। शक भी न रहे। स्पष्ट मालूम पड़ जाये। यह है अंतिम पढ़ाई की स्टेज। साकार रूप में थोड़ी सी झलक अंत में दिखाई। जो साकार रूप में साथ थे उन्होंने कई ऐसी बातें नोट की हैं। ऐसी ही स्थिति नंबरवार सभी बच्चों की होनी है। जब ऐसी स्थिति होती जाएगी तब अन्तिम स्वरुप और भविष्य स्वरुप आप सभी की सूरत से सभी को स्पष्ट दिखने में आएगा। जब तक साक्षात् साकार रूप नहीं बने हैं तब तक साक्षात्कार नहीं हो सकता है। इसलिए इस सब्जेक्ट पर अति समीप रत्नों को ध्यान देना है। जितना समीप उतना ही स्वयं भी स्पष्ट और दूसरे भी उनके आगे स्पष्ट दिखाई देंगे। जितना-जितना जिसका पुरुषार्थ स्पष्ट होता जाता है उतना ही उनकी प्रालब्ध स्पष्ट होती जाती है, और अन्य भी उनके आगे स्पष्ट होते जाते हैं। स्पष्ट अर्थात् संतुष्ट। जितना संतुष्ट होंगे उतना ही स्पष्ट होंगे। स्पष्ट बच्चों को साकार रूप में कौन से शब्द कहते थे? साफ़ और सच्चा। जिसमें सच्चाई और सफाई है वह सदैव स्पष्ट होता है। जब सफाई होती है तो भी सभी वस्तु स्पष्ट देखने में आती है। यह लेसन भट्ठी की पढ़ाई का लास्ट लेसन है। यही एग्जाम्पल बनना है। जो किसी भी बात में एग्जाम्पल बनते हैं उनको उसका फल एग्ज़ाम में एक्स्ट्रा मार्क्स मिलते हैं। चार सब्जेक्ट्स विशेष ध्यान में रखनी हैं। एक याद का बल, स्नेह का बल, सहयोग का बल और सहन का बल। यह चार बातें विशेष इस भट्ठी की सब्जेक्ट्स थी।

इन चार बातों में बापदादा ने रिजल्ट क्या निकाली? हर्ष की ही रिजल्ट है। सभी बल एक समान होने में कुछ परसेंटेज की कमी है। बल चारों ही हैं लेकिन चारों की ही समानता हो। उसमें परसेंटेज की कमी है। तो रिजल्ट क्या हुई? ७५% पास। बाकि जो २५% कमी है, वह सिर्फ उसकी है कि सर्व बल समान हों। कोई में कोई बल विशेष है, कोई में कोई बल विशेष है। चारों बल जब समान हों तब समझो सम्पूर्ण। (इस अवस्था में शरीर छुट जाए तो भविष्य रिजल्ट क्या होगी?) जो ऐसे पुरुषार्थी होते हैं फिर भी हिम्मतवान तो हैं ना। तो बापदादा की भी प्रतिज्ञा की हुई है बच्चों से, कि हिम्मते बच्चे मददे बाप। ऐसी हिम्मत रख चलने वाले अंत तक इस ही हिम्मत में रहते रहेंगे तो ऐसे हिम्मतवान बच्चों को कुछ मदद मिल जाती है। सभी से बुद्धियोग हटाकर अंत में एक की याद में रहने का जो पुरुषार्थी है, उसे मदद मिलने के कारण सहज हो जाता है। स्कॉलरशिप मिलेगी वा नहीं वह फिर है अंत तक हिम्मत रखने पर। जितना बहुत समय से हिम्मत में चलते रहते हैं वह बहुत समय का लिंक टूटा नहीं तो गेलप कर सकता है। अगर अभी भी कारणे अकारणे बहुत समय के हिम्मत का लिंक टूट जाता है तो फिर स्कॉलरशिप लेना मुश्किल है। अगर बहुत समय का लिंक अंत तक रहा तो एक्स्ट्रा हेल्प मिल सकती है। इसलिए अब यही लास्ट लेसन पक्का करा रहे हैं।

अभी तक टोटल रिजल्ट में क्या देखा? सर्विस की सब्जेक्ट में इंचार्ज बनना आता है लेकिन याद की सब्जेक्ट में बैटरी चार्ज करना बहुत कम आता है। समझा। साकार रूप में अनुभव देखा। साकार रूप में सर्विस की जिम्मेवारी सभी से ज्यादा थी। बच्चों में उनसे कितनी कम है। बच्चों को सिर्फ सर्विस की ड्यूटी है। लेकिन साकार रूप में तो सभी ड्यूटी थी। संकल्पों का सागर था। रेस्पोंसिबिलिटी के संकल्पों में थे फिर भी सागर की लहरों में देखते थे वा सागर के तले में देखते थे? बच्चों को लहरों में लहराना आता है लेकिन तले में जाना नहीं आता। उनका सहज साधन पहले सुनाया कि प्रैक्टिस करो। अभी-अभी आवाज़ में आये, फिर मास्टर सर्वशक्तिमान बन अभी-अभी आवाज़ से परे। अभी-अभी का अभ्यास करो। कितने भी कारोबार में हो लेकिन बीच-बीच में एक सेकंड भी निकाल कर इसका जितना अभ्यास, जितनी प्रैक्टिस करेंगे उतना प्रैक्टिकल रूप बनता जायेगा। प्रैक्टिस कम है इसलिए प्रैक्टिकल रूप नहीं। कभी सागर की लहरों में कभी तले में यह अभ्यास करो। आज विशेष बात यही चेक कर रहे थे कि बच्चों में जितना ही साहस है उतनी ही सहनशक्ति है? साहस रखने की शक्ति कितनी है और सहन शक्ति कितनी है? यह देख रहे थे। जितना-जितना स्वयं पुरुषार्थ में संतुष्ट और स्पष्ट होंगे उतना और उनके आगे स्पष्ट दिखाई देंवे। अब पेपर भी हुआ, रिजल्ट भी सुनाई। बाकी पाण्डवों की बात रह गयी। बापदादा के पास पुरुषार्थियों की कितनी लाइनें हैं? औरों को न देख अपनी लाइन को तो देखते होंगे वा लाइन को भी न देख अपने को देखते हो? एक है तीव्र पुरुषार्थियों की लाइन, दूसरी है पुरुषार्थियों की लाइनें, तीसरी है गुप्त पुरुषार्थियों की लाइनें और चौथी हैं ढीले पुरुषार्थियों की लाइन। अब बताओ आप किस लाइन में हो? अब ऐसा समय जल्दी आएगा जो यह शब्द नहीं बोलेंगे कि आप जानो। नहीं। हम सभी जानते हैं। क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिमान हैं ना। सभी शक्तियां समान रूप में ही जाएँगी। फिर मास्टर सर्वशक्तिमान हो जायेंगे। बाप का इतना निश्चय है। निश्चयबुद्धि है, वह विजयी है ही। बाप और स्वयं में निश्चयबुद्धि हैं तो विजय कहाँ जाएगी। निश्चयबुद्धि के पीछे-पीछे विजय आती हैं। वह विजय के पीछे नहीं दौड़ते, विजय उनके पीछे दौड़ती है। हम विजयी बनें इस संकल्प का भी वह त्याग कर लेते। ऐसे सर्वस्व त्यागी हो? सर्वस्व त्यागी और सर्व संकल्पों के त्यागी। सिर्फ सर्व संबंधों का त्याग नहीं। सर्व संकल्पों से भी त्यागी। यही सम्पूर्ण स्थिति है। बापदादा क्या देखते हैं? विजय का सितारा। तो बापदादा की लिस्ट में विजयी सितारे हो। जैसे और कार्य में एक दो के सहयोगी हो वैसे ही भविष्य में भी एक दो के सहयोगी देखने में आ रहे हो। बनना नहीं है देखने में आ रहे हो। इतना ही समीप आना है, जितना अब आवाज़ कर रहे हैं और पहुँच रहा है। अब आप लोगों को सर्व बातों में थोड़े समय में पूरा फॉलो करना है। कर रहे हो और करते ही रहेंगे।

आप लोगों का जो पहले-पहले संगठन बनाया था वह क्या कर रहे हैं? किसलिए संगठन बनाया था? यज्ञ की संभाल के साथ संगठन में रहने वाले स्वयं की भी संभाल कर रहे हैं? जो स्वयं की संभाल करते हैं वह यज्ञ की भी संभाल करते हैं। जो स्वयं की संभाल नहीं कर सकते हैं वह यज्ञ की भी संभाल नहीं कर सकते हैं। इस संगठन को क्या-क्या करना है यह उन्हों को भी स्पष्ट नहीं है, इसलिए फिर जब सहज हो सके तब साथियों को बुलाना। जब आप बुलाएँगे तब बापदादा आएंगे। बापदादा को आने में देरी नहीं लगती है। अपनी ग्रुप की फिर कब देख रेख की? पाण्डव ग्रुप और शक्ति ग्रुप, यह है सर्विस ग्रुप। लेकिन जो पांडवों का ग्रुप और यज्ञ माताओं का ग्रुप था उसका क्या हालचाल है? मुख्य केन्द्र के समीप आने से देखरेख कर सकेंगे। इन ग्रुप को अपना कर्त्तव्य ही है। सिर्फ ८ दिन का नहीं। (सम्मेलन की रिजल्ट?) जो भट्ठी की रिजल्ट बताई वही सम्मेलन की रिजल्ट है। चारों ही बल समान हो, उसमें २५% की कमी सुनाई। समझा। पास विद ऑनर होते तो ना मालूम क्या होता। सब पास(समीप) आ जाते। अभी सिर्फ आवाज़ किया है। ललकार नहीं की है। इसकी भी युक्ति बताई कि चारों बल की समानता होनी चाहिए। कब किस बल की विशेषता कब किस बल की। लेकिन चारों बल समान रख सर्विस करने से ललकार होगी। ललकार न होने का भी कारण है।सम्मेलन की बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन टोटल आवाज़ निकलता है अब ललकार नहीं निकलती है। आवाज़ फैलाया है। सोये हुए को जगाया नहीं है, सिर्फ करवट बदलाया है। ललकार न होने का कारण क्या है? बताओ। ललकार तब होगी जब कोई भी बात को अंगीकार नहीं करेंगे। अभी क्या होता है कई बातों को अंगीकार कर लेते हैं, चाहे स्थूल चाहे सूक्ष्म। जब कोई भी संकल्प में भी अंगीकार वा स्वीकार न हो तब ललकार हो। अभी मिक्स है। इसलिए रिजल्ट भी मिक्स है। जो कल्प पहले फिक्स हुए रिजल्ट हैं वह अब नहीं है। उस फिक्स को भी जानते हो, अब मिक्स हैं। समझा। अपनेपन को भी अंगीकार न करे। मैं यह हूँ, मैं सर्विसएबुल हूँ। मैं महारथी हूँ, मैं यह करती हूँ, यह किया... इन सबका मैं-पन निकालकर बाबा बाबा शब्द आएगा तब ललकार होगी। परमात्म में ही परम बल होता है। आत्माओं में यथाशक्ति होती है। तो बाबा कहने से परम बल आएगा। मैं कहने से यथाशक्ति बल आता है। इसलिए रिजल्ट भी यथाशक्ति होती है।

अब भाषा भी चेंज हो। साकार रूप में सभी दिखाया। कब कहा कि मैं यह चला रहा हूँ? मैंने मुरली अच्छी चलाई कब कहा? मैंने सर्विस की, मैंने बच्चों को टच किया कब कहा। यह अंगीकार करना ख़त्म हो जाना है। इसको कहा जाता है जो वायदा किया है वह निभाना। आप लोग एक गीत गाते थे तुम्हीं पर मर मिटेंगे हम... याद आता है? मर मिटना किसको कहा जाता है? मैं पन मिटाना यही मर मिटना है। अंगीकार न करो तो ललकार कर सकते हो। कोई भी बात न निन्दा-स्तुति, न मैं, न तुम, न मेरा तेरा कुछ भी अंगीकार(स्वीकार) न करना तब ललकार होगी। आप मन में संकल्प पीछे करते हो। आप के मन में संकल्प पहुंचे ही वहां पहुँच जाता है। क्यों पहले पहुँचता है यह भी गुह्य पहेली है। आप लोग मन में जो संकल्प करते हो वह आपके मन में पीछे आता है उनके पहले बापदादा के पास स्पष्ट हो जाता है। क्योंकि सम्पूर्ण बनने से ड्रामा क हर नूंध स्पष्ट देखने में आती है। इसलिए ड्रामा की नूंध को पहले से ही स्पष्ट देख सकते। इसलिए भविष्य देख करके पहले से बात करते हैं। पहले से जैसे कि पहुंचा ही हुआ है। फिर जब आप लोग पार्ट बजाते हो, बापदादा भी पार्ट बजाते हैं। आप रूहरूहान करने का पार्ट बजाते हो, बापदादा सुनने का पार्ट बजाते हैं। समझा। जो जैसा है वैसा स्वयं को पूरा न भी जान सके लेकिन बापदादा जान सकते हैं। तो अब चारों बल समानता में लाने हैं। तब साकार के समान बन जायेंगे। जितना संस्कारों को समानता में लावेंगे उतना ही समीप आयेंगे। कौन से संस्कार? साकार रूप के संस्कार उपराम और साक्षी दृष्टा यह साकार के सम्पूर्ण स्थिति के श्रेष्ठ लक्षण थे। इन संस्कारों में समानता लानी है। इन गुणों से सर्व के दिलों पर विजयी होंगे। जो संगम पर सर्व के दिलों पर विजयी बनता है वही भविष्य में विश्व महाराजन बनते हैं। विश्व में सर्व आ जाते हैं। तो बीज यहाँ डालना है फल वहां लेना है।

अच्छाओम शान्ति !!!


05-04-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन 


सर्व पॉइंट का सार पॉइंट (बिन्दी) बनो

सभी सुनने चाहते हो वा सम्पूर्ण बनने चाहते हो? सम्पूर्ण बनने के बाद सुनना होता होगा? पहले है सुनना फिर है सम्पूर्ण बन जाना। इतनी सभी पॉइंट सुनी है उन सभी पॉइंट का स्वरुप क्या है जो बनना है? सर्व सुने हुए पॉइंट का स्वरुप क्या बनना है? सर्व पॉइंट का सार व स्वरुप पॉइंट(बिंदी) ही बनना है। सर्व पॉइंट का सार भी पॉइंट में आता है तो पॉइंट बनना है। पॉइंट अति सूक्ष्म होता है जिसमे सभी समाया हुआ है। इस समय मुख्य पुरुषार्थ कौन-सा चल रहा है? अभी पुरुषार्थ है विषार को समाने का। जिसको विस्तार को समाने का तरीका आ जाता है वाही बापदादा के समान बन जाते हैं। पहले भी सुनाया था ना कि समाना और समेटना है। जिसको समेटना आता है उनको समाना भी आता है। बीज में कौन सी शक्ति है? वृक्ष के विस्तार को अपने में समाने की। तो अब क्या पुरुषार्थ करना है? बीज स्वरुप स्थिति में स्थित होने का अर्थात् अपने विस्तार को समाने का। तो यह चेक करो। विस्तार करना तो सहज है लेकिन विस्तार को समाना सरल हुआ है? आजकल साइंस वाले भी विस्तार को समेटने का ही पुरुषार्थ कर रहे हैं। साइंस पॉवर वाले भी तुम साइलेंस की शक्ति वालों से कॉपी करते हैं। जैसे-जैसे साइलेंस की शक्ति सेना पुरुषार्थ करती है वैसा ही वह भी पुरुषार्थ कर रहे हैं। पहले साइलेंस की शक्ति सेना इन्वेंशन करती है फिर साइंस अपने रूप से इन्वेंशन करती है। जैसे-जैसे यहाँ रिफाइन होते जाते हैं वैसे ही साइंस भी रिफाइन होती जाती है। जो बातें पहले उन्हों को भी असंभव लगती थी वह अब संभव होती जा रही हैं। वैसे ही यहाँ भी असंभव बातें सरल और संभव होती जाती हैं। अब मुख्य पुरुषार्थ यही करना है कि आवाज़ में लाना जितना सहज है उतना ही आवाज़ से परे जाना सहज हो। इसको ही सम्पूर्ण स्थिति के समीप की स्थिति कहा जाता है।

यह ग्रुप कौन-सा है? इस ग्रुप के हरेक मूरत में अपनी-अपनी विशेषता है। विशेषता के कारन ही सृष्टि में विशेष आत्माएं बने हैं। विशेष आत्माएं तो हो ही। अब क्या बनना है? विशेष हो, अब श्रेष्ठ बनना है। श्रेष्ठ बन्ने के लिए भट्ठी में क्या करेंगे? इस ग्रुप में एक विशेषता है जो कोई में नहीं थी। वह कौन सी एक विशेषता है? अपनी विशेषता जानते हो? इस ग्रुप की यही विशेषता देख रहे हैं कि पुरुषार्थी की लेवल में एक दो के नजदीक हैं। हरेक के मन में कुछ करके दिखाने का ही उमंग है। इसलिए इस ग्रुप को बापदादा यही नाम दे रहे हैं – होवनहार और उम्मीदवार ग्रुप और यही ग्रुप है जो सृष्टि के सामने अपना असली रूप प्रत्यक्ष करके दिखा सकते हैं। मैदान में कड़ी हुई सेना यह है। आप लोग तो बैकबोन हो। तो बापदादा के कर्त्तव्य को प्रत्यक्ष करने की यह भुजाएं हैं। मालूम है कि भुजाओं में क्या-क्या अलंकार होते हैं? बापदादा की भुजाएं अलंकारधारी हैं। तो अपने आप से पूछो कि हम भुजाएं अलंकारधारी हैं? कौन-कौन से अलंकार धारण किये हुए मैदान पर उपस्थित हो? सर्व अलंकारों को जानते हो ना? तो अलंकारधारी भुजाएं हो? अलंकारधारी शक्तियां ही बापदादा का शो करती हैं। शक्तियों की भुजाएं कभी भी खली नहीं दिखाते। अलंकार कायम होंगे तो ललकार होगी। तो बापदादा आज क्या देख रहे है? एक-एक भुजा के अलंकार और रफ़्तार। इस ग्रुप को भट्ठी में क्या करायेंगे? शक्तियों का मुख्य गुण क्या है? इस ग्रुप में एक शक्तिपन का पहला गुण निर्भयता और दूसरा विस्तार को एक सेकंड में समेटने की युक्ति भी सिखाना। एकता और एकरस। अनेक संस्कारों को एक संस्कार कैसे बनायें। यह भी इस भट्ठी में सिखाना है। कम समय और कम बोल लेकिन सफलता अधिक हो। यह भी तरीका सिखाना है। सुनना और स्वरुप बन जाना है। सुनना अधिक और स्वरुप बनना कण, नहीं। सुनते जाना और बनते जाना। जब साक्षात्कार मूर्त्त बनकर जाना, वाचा मूर्ति नहीं। जो भी आप सभी को देखे तो आकरी और अलंकारि देखे। सेन्स बहुत है लेकिन अब क्या करना है? ज्ञान का जो इसेन्स है उसमे रहना है। सेन्स को इसेन्स में लगा देना है। तब ही जो बापदादा उम्मीद रखते हैं वह प्रत्यक्ष दिखायेंगे। इसेन्स को जानते हो ना। जो इस ज्ञान की आवश्यक बातें हैं वही इसेन्स है। अगर वह आवश्यकताएं पूरी हो जाएंगी। अभी कोई-न-कोई आवश्यकएं हैं। लेकिन आवश्यकताओं को सदा के लिए पूर्ण करने के लिए दो आवश्यक बातें हैं। जो बताई – आकारी और अलंकारी बनना। आकारी और अलंकारी बन्ने के लिए सिर्फ एक शब्द धारण करना है। वह कौन-सा शब्द है जिसमे आकारी और अलंकारी दोनों आ जायें? वह एक शब्द है लाइट। लाइट का अर्थ एक तो ज्योति भी है और लाइट का अर्थ हल्का भी है। तो हल्कापन और प्रकाशमय भी। अलंकारी भी और आकारी भी। ज्योति स्वरुप भी, ज्वाला स्वरुप भी और फिर हल्का, आकारी। तो एक ही लाइट शब्द में दोनों बातें आ गई ना। इसमें कर्त्तव्य भी आ जाता है। कर्त्तव्य क्या है? लाइट हाउस बनना। लाइट में स्वरुप भी आ जाता है। कर्त्तव्य भी आ जाता है।

हरेक टीचर्स को बापदादा द्वारा पर्सनल ज्ञान रत्नों की सौगात मिली

टिका क्यों लगाया जाता है? जैसे तिलक मष्तिष्क पर ही लगया जाता है, ऐसे ही बिन्दी स्वरुप यह भी तिलक है जो सदैव लगा ही रहे। दूसरा भविष्य का राज्तिकल यह भी तिलक ही है। दोनों की स्मृति रहे। उसकी निशानी यह तिलक है। निशानी को देख नशा रहे। यह निशानी सदा काल के लिए दी जाती है। जैसे सुनाया था पॉइंट, वैसे यह तिलक भी पॉइंट है। समेटना और समाना आता है? समेटना और समाना यह जादूगरी का काम है। जादूगर लोग कोई भी चीज़ को समेट कर भी दिखाते, समाकर भी दिखाते। इतनी बड़ी चीज़ छोटी में भी समाकर दिखाते। यही जादूगरी सीखनी है। प्रैक्टिस यह करो। विस्तार में जाते फिर वहां ही समाने का पुरुषार्थ करो। जिस समय देखो कि बुद्धि बहुत विस्तार में गई हुई है उस समय यह अभ्यास करो। इतना विस्तार को समा सकते हो? तब आप बाप के समान बनेंगे। बाप को जादूगर कहते हैं ना। तो बच्चे क्या हैं? शीतल स्वरुप और ज्योति स्वरुप, दोनों ही स्वरुप में स्थित होना आता है? अभी-अभी ज्योति स्वरुप, अभी-अभी शीतल स्वरुप। जब दोनों स्वरुप में स्थित होना आता है। तब एकरस स्थिति रह सकती है। दोनों की समानता चाहिए यही वर्तमान पुरुषार्थ है।

यह पुष्प क्यों दे रहे हैं? अनेक जन्मों में जो बाप की पूजा की है वह रेतुर्न एक जन्म में बापदादा देता है। जो न्यारा होता है वही अति प्यारा होता है। अगर सर्व का अति प्यारा बनना है, तो सर्व बातों से जितना न्यारा बनेंगे उतना सर्व का प्यारा। जितना न्यारापन उतना ही प्यारापन। और ऐसे जो न्यारे प्यारे होते हैं उनको बापदादा का सहारा मिलता है। न्यारे बनते जाना अर्थात् प्यारे बनते जाना। अगर मानो कोई आत्मा के प्यारे नहीं बन सकते हैं उसका कारन यही होता है कि उस आत्मा के संस्कार और स्वभाव से न्यारे नहीं बनते। जितना जिसका न्यारापन का अनुभव होगा उतना स्वतः प्यारा बनता जायेगा। प्यारे बनने का पुरुषार्थ नहीं, न्यारे बनने का पुरुषार्थ करना है। न्यारे बनने की प्रालब्ध है प्यारा बनने। यह अभी की प्रालब्ध है। जैसे बाप सभी को प्यारा है वैसे बच्चों को सारे जगत की आत्माओं का प्यारा बनने है। उसका पुरुषार्थ सुनाया कि उसकी चलन में न्यारापन। तो यह पुष्प है जग से न्यारे और जग से प्यारे बनने का। इस ग्रुप में हर्ष-पन भी है, अभी हर्ष में क्या ऐड करना है? आकर्षणमूर्त बने हैं वही आकारी मूर्त्त बनते हैं। बाप आकारी होते हुए भी आकर्षणमूर्त थे ना। जितना-जितना आकारी उतना-उतना आकर्षण। जैसे वह लोग पृथ्वी से परे स्पेस में जाते हैं तब पृथ्वी की आकर्षण से परे जाते हैं। तुम पुरानी दुनिया के आकर्षण से परे जायेंगे। फिर न चाहते हुए भी आकर्षणमूर्त बन जायेंगे। साकार में होते हुए भी सभी को आकारी देखना है। सर्विस का भी बहुत बल मिलता है। एक है अपने पुरुषार्थ का बल। एक औरों की सर्विस करने से भी बल मिलता है। तो दोनों ही बल प्राप्त होते हैं। बापदादा का स्नेह कैसे प्राप्त होता है, मालूम हैं? जितना-जितना बाप के कर्त्तव्य में सहयोगी बनते हैं उतना-उतना स्नेह। कर्त्तव्य के सहयोग से स्नेह मिलता है। ऐसा अनुभव है? जिस दिन कर्त्तव्य के अधिक सहयोगी होते हैं, उस दिन स्नेह का विशेष अधिक अनुभव होता है? सदा सहयोगी सदा स्नेही। स्वमान कैसे प्राप्त होता है? जितना निर्माण उतना स्वमान। और जितना-जितना बापदादा के समान उतना ही स्वमान। निर्माण भी बनना है, समान भी बनना है। ऐसा ही पुरुषार्थ करना है। निर्माणता में भी कमी नहीं तो समानता में भी कमी नहीं। फिर स्वमान में भी कमी नहीं। अपनी स्वमान की परख समानता से देखनी है।

बापदादा का अपने से साक्षात्कार कराने लिए क्या बनना पड़ेगा? कोई भी चीज़ का साक्षात्कार किस में होता है? दर्पण में। तो अपने को दर्पण बनाना पड़ेगा। दर्पण तब बनेंगे जब सम्पूर्ण अर्पण होंगे। सम्पूर्ण अर्पण तो श्रेष्ठ दर्पण, जिस दर्पण में स्पष्ट साक्षात्कार होता है। अगर यथायोग्य यथाशक्ति अर्पण हैं तो दर्पण भी यथायोग्य यथाशक्ति है। सम्पूर्ण अर्थात् स्वयं के भान से भी अर्पण। अपने को क्या समझना है? विशेष कुमारी का कर्त्तव्य यही है जो सभी बापदादा का साक्षात्कार कराएं। सिर्फ वाणी से नहीं लेकिन अपनी सूरत से। जो बाप में विशेषताएं थीं साकार में, वे अपने में लानी हैं। यह है विशेष ग्रुप। इस ग्रुप को जैसे साकार में कहते थे जो ओटे सो अर्जुन समान अल्ला। तो इस ग्रुप को भी समान अल्ला बनना है। ऐसे करके दिखाना जैसे मस्तिष्क में यह तिलक चमकता है ऐसे सृष्टि में स्वयं को चमकाना है। ऐसा लक्ष्य रखना है। सर्विस में सहयोगी होने के कारण बापदादा का विशेष स्नेह भी है। सहयोग और स्नेह के साथ अभी शक्ति भरनी है। अभी शक्तिरूप बनना है। शक्तियों में विशेष कौन सी शक्ति भरनी है? सहनशक्ति। जिसमे सहन शक्ति कम उसमे सम्पूर्णता भी कम। विशेष इस शक्ति को धारण करके शक्ति स्वरुप बन जाना है। तृप्त आत्मा जो होती है उनका विशेष गुण है निर्भयता और संतुष्ट रहना। जो स्वयं संतुष्ट रहता है और दूसरों को संतुष्ट रखता है उसमे सर्वगुण आ जाते हैं। जितना-जितना शक्तिस्वरुप होंगे तो कमजोरी सामने रह नहीं सकती। तो शक्तिरूप बनकर जाना। ब्रह्माकुमारी भी नहीं, कुमारी रूप में कहाँ-कहाँ कमजोरी आ जाती है। शक्ति-रूप में संहार की शक्ति है। शक्ति सदैव विजयी है। शक्तियों के गले में सदैव विजय की माला होती है। शक्ति-रूप की विस्मृति से विजय भी दूर हो जाती है इसलिए सदा अपने को शक्ति समझना।

बच्चे बाप से बड़े जादूगर है। बापसे बड़े जादूगर इसलिए, जो बाप को जो बनाने चाहते वह बना सकते हैं। बाप के लिए तो गायन है कि जो चाहे सो बना सकते लेकिन को जो चाहे सो बना सकते, वह कौन? बच्चे। अव्यक्त होते भी व्यक्त में लाते यह जादूगरी कहें? अव्यक्त होने के दिन नजदीक हैं तब तो अव्यक्त की लिफ्ट मिली है। ज्ञानमूर्त्त और यादमूर्त्त दोनों में समान बनना है। जब चाहे तब ज्ञान मूर्त्त जब चाहे तब याद मूर्त्त बनें। जितना जो खुद याद मूर्त्त हो रहता रहता है उतना ही वह औरों को बाप की याद दिला सकते हैं। याद मूर्त्त बन सभी को याद दिलाना है। समय का इंतज़ार करती हो या समय तुम्हारा इंतज़ार करता है? समय के लिए अपने को इंतज़ार नहीं करना है। अपने को सदैव ऐसे ही एवररेडी रखना है जो कभी भी समय आ जाये। इंतज़ार को ख़त्म करके इंतज़ाम रखना है। जब अपना इंतज़ाम पूरा होता है फिर इंतज़ार करने की आवश्यकता नहीं रहती। उसको ही कहा जाता है एवररेडी। सब में एवररेडी। सिर्फ सर्विस में नहीं, पुरुषार्थ में भी एवररेडी। संस्कारों को समीप करने में भी एवररेडी। विशेष स्नेह है इसलिए विशेष बनाने की बातें चल रही हैं। वृक्ष में जो पीछे-पीछे फुल और पत्ते लगते हैं वे कैसे होते हैं? पहलेवाले पुराने होते हैं और पीछे वाले बड़े सुंदर होते हैं। तो यह भी पीछे आये हैं लेकिन प्यारे बहुत हैं। पीछे वाले नर्म बहुत हैं। यहाँ नर्म में क्या है? जितना नर्म उतना गर्म। अगर सिर्फ नर्म होंगे कोई छीन भी लेगा। कोमल बनने के साथ कमाल करनी है। कोमलता और कमाल दोनों ही संग होने से कमाल कर दिखाते हैं? यह सारा ग्रुप कमाल करके दिखानेवाला है। ऐसा लक्ष्य रखना है जो कोई कमाल करके दिखाए। तब कहेंगे बड़े, बड़े हैं लेकिन छोटे समान अल्ला। जैसा-जैसा कर्म करेंगे वैसा नाम पड़ेगा। अगर श्रेष्ठ काम करेंगे तो नाम पड़ेगा। श्रेष्ठमणि। श्रेष्ठमणि को सर्व कार्य श्रेष्ठ करने पड़ते हैं। मन, वाणी, कर्म में सरलता और सहनशीलता यह दोनों आवश्यक हैं। अगर सरलता है सहनशीलता नहीं तो भी श्रेष्ठ नहीं। इसलिए सरलता और सहनशीलता दोनों साथ-साथ चाहिए। अगर सहनशीलता के बिना सरलता आ जाती है तो भोलापन कहा जाता है। सरलता के साथ सहनशीलता है तो शक्ति स्वरुप कहा जाता है। शक्तियों में सरलता और सहनशीलता दोनों ही गुण चाहिए। अभी की रिजल्ट में यही देखते हैं कि कहाँ सहनशीलता अधिक है कहाँ सरलता अधिक है। अब इन दोनों को समान बनाना है। मधुरता भी चाहिए। शक्ति रूप भी चाहिए। देवियों के चित्र बहुत देखते हैं तो उसमें क्या देखते हैं? जितना ज्वाला उतनी शीतलता। कर्त्तव्य ज्वाला का है सूरत शीतलता की है। यह है अन्तिम स्वरुप।

जैसे बुद्धि से छोटा बिन्दु खिसक जाता है। ऐसे यह छोटा बिंदु भी हाथ से खिसक जाता है। जितना-जितना अपने देह से न्यारे रहेंगे उतना समय बात से भी न्यारे। जैसे वस्त्र उतारना और पहनना सहज है कि मुश्किल? इस रीत न्यारे होंगे तो शरीर के भान में आना, शरीर के भान से निकलना यह भी ऐसे लगेगा। अभी-अभी शरीर का वस्त्र धारण किया, अभी-अभी उतारा। मुख्य पुरुषार्थ आज इस विशेष बाप पर करना है। जब यह मुख्य पुरुषार्थ करेंगे तब मुख्य रत्नों में आएंगे। यह बिन्दी लगाना कितना सहज है। ऐसे ही बिन्दी रूप हो जाना सहज है।

ब्राहमणों की लेन देन कौन सी होती है? स्नेह लेना और स्नेह देना। स्नेह देने से ही स्नेह मिलता है। स्नेह के देने लेने से बाप का स्नेह भी लेते और ऐसे ही स्नेही समीप होते हैं। स्नेह वाले दूर होते भी समीप हैं। बापदादा के समीप आने लिए स्नेह की लेन-देन करके समीप आना है। इस लेन-देन में रात दिन बिताना है। यही ब्राह्मणों का कर्त्तव्य है, तो ब्राह्मणों का लक्षण भी हैं। स्नेही बनने लिए क्या करना पड़ेगा? जितना जो विदेही होगा उतना वो स्नेही होगा। तो विदेही बनना अर्थात् स्नेही बनना क्योंकि बाप विदेही है ना। ऐसे ही देह में रहते भी विदेही रहने वाले सर्व के स्नेही रहते हैं। यही नोट करना है कितना विदेही रहते हैं। ऐसा श्रेष्ठ सौभाग्य कब स्वप्न में भी था? तो जैसे यह स्वप्न में भी संकल्प नहीं था ऐसे ही जो भी कमजोरियां हैं उन्हों का भी स्वप्न में संकल्प नहीं रहना चाहिए। ऐसा पुरुषार्थ करना है। लक्ष्य भी रखो कि यह कमजोरियां पूर्व जन्म के बहुत जन्मों की हैं। वर्तमान जन्म के लिए ऐसी कमजोरियों का प्रायःलोप करो। मास्टर सर्वशक्तिमान हो? सर्वशक्तिमान के बच्चे अर्थात् सर्वशक्तिमान। ऐसे कभी नहीं कहें कि मैं यह नहीं कर सकती। सब कुछ कर सकती हूँ। कोई भी असंभव बाप नहीं। कोई मुश्किल बात भी सहज। उनके लिए कुछ मुश्किल होता है? नहीं। मास्टर सर्वशक्तिमान बनना है। एक शक्ति की भी कमी न रहे। जहाँ अकेला बनो वहाँ साथ समझो। कहाँ अकेला भेजें तो साथ समझेंगे ना। अगर शिवबाबा साथ है तो फिर कहाँ अकेली हो तो अकेलापन लगेगा नहीं। अकेले रहते भी साथ का अनुभव हो। यह अभ्यास ज़रूर करना चाहिए। और साथ रहते भी अकेला समझे, यह भी अभ्यास चाहिए। साथ भी रह सकें और अकेला भी रह सकें। अकेला अर्थात् न्यारा। संगठन अर्थात् प्यारा। न्यारे भी हों तो प्यारे भी हों। अभ्यास दोनों चाहिए। बाप अकेला रहता है या साथ में रहता है? अकेला रहना ही साथ है। बाहर का अकेलापन और अन्दर का साथ। बाहर के साथ से अकेलापन भूल जाते हैं। लेकिन बाहर से अकेले अन्दर से अकेले नहीं।

सभी से श्रेष्ठ मणि कौन होते हैं? मस्तकमणि कौन बनता है? जो मस्तक में विराजमान हुई आत्मा में ज्यादा समय उपस्थित रहता है। वह थोड़े होते हैं। मस्तक में थोड़े, ह्रदय में बहुत होते हैं। सभी से पहले नज़र कहाँ जाती है? ऐसे मस्तकमणि बनना है। मस्तकमणि वह बनते हैं जो सदैव आस्तिक रहते हैं। वह सदैव हाँ करते हैं। जो आस्तिक है, वही मस्तकमणि हैं। कोई भी बात में ना शब्द संकल्प में भी न हो। ऐसे गुण वाले मस्तक में आ जाते हैं।

गायन योग्य कौन बनते हैं और पूजन योग्य कौन बनते हैं? एक ही बात से दोनों योग्य बनते हैं या दोनों के लिए दो विशेष बातें हैं? कई ऐसी भी देवियाँ हैं जिनका गायन बहुत है पूजन कम है। और कई देवियों का दोनों होता है। तो जो कब कैसे, कब कैसे रहते हैं उनका पूजा एकरस नहीं रहता और जो सदा पानी स्थिति में रहते तो उनका पूजन भी सदा रहता है। एकरस रहनेवाले का पूजन एकरस होता है। पुरुषार्थ में कब शब्द नहीं रहना चाहिए। तीव्र पुरुषार्थी की निशानी है जो कब न कह अब कहते हैं। जो पुरुषार्थ में कब कहेंगे तो उनकी पूजा भी कम। इसलिए कोई भी बात में कब देखेंगे, नहीं। लेकिन अब दिखाऊंगा। इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थी। सम्पूर्ण स्थिति जो होती है उसमे सर्व शक्तियां संपन्न होती हैं। सर्व शक्ति संपन्न बनने से सर्व गुण संपन्न बनेंगे। भविष्य में बनना है सर्वगुण संपन्न, अब बनना है सर्व शक्ति संपन्न। जितना सर्व शक्ति संपन्न उतना सर्व गुण संपन्न बनेंगे।

कितनी शक्तियां होती है? मालूम हैं? कौन सी शक्तियां सुनाई थीं? एक है स्नेह शक्ति, सम्बन्ध शक्ति, सहयोग शक्ति, सहन शक्ति। यह चार शक्तियाँ हैं, तो संबंद समीप है। चारों समान हों। ज्यादा साहस है व सहन शक्ति है? साहस अर्थात् हिम्मत। जो हिम्मत वाले होते हैं उनको मदद मिलती है। मदद मांगने से नहीं मिलती। हिम्मत रखनी पड़ती है। हिम्मत पुरु रखते हैं मदद बहुत मिलती है। हिम्मत है तो सर्व बातों में मदद है। सदैव हिम्मतवान बनना है फिर बापदादा, दैवी परिवार की मदद आपे ही मिलेगी। स्नेहमूर्त्त हो? शक्तिमूर्त्त हो? स्नेह और शक्ति दोनों की आवश्यकता है। शक्तिरूप से विजयी और स्नेह रूप से सम्बन्ध में आते हो। अगर शक्ति नहीं होती तो माया पर विजय नहीं पाते हो। इसलिए शक्ति रूप से विजयी और स्नेह रूप से सम्बन्ध भी चाहिए। दोनों चाहिए। बाप को सर्वशक्तिमान और प्यार का सागर भी कहते हिं। तो स्नेह और शक्ति दोनों चाहिए।

सितारे कितने होते हैं? आप अपने को क्या समझती हो? बापदादा ने कौन से नाम रखे हैं? लकी सितारे हो। अपने को लकी समझते हो? लकी तो सभी हैं जब से बाप के बने हो। लेकिन लकी में भी सदैव सफलता के सितारे। कोई समीप के सितारे, कोई उम्मीद के सितारे। वह हरेक का अपना है। अब सोचना है कि मैं कौन हूँ? अपने को सफलता का सितारा समझना है। प्रत्यक्षफल की कामना नहीं रखनेवाले सफलता पाते हैं।

ओम शांति


14-05-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


समर्पण का गुह्य अर्थ

आज वतन से एक सौगात लाये हैं। बताओ कौन सी सौगात लाये हैं, मालूम है? अव्यक्त रूप में सौगात भी अव्यक्त होगी ना। आज वतन से दर्पण ले आये हैं। दर्पण किसलिए लाया है? आप सभी जिस विशेष प्रोग्राम के लिए आये हुए हो वह कौन सा है? समर्पण कराने आये हो व सम्पूर्ण होने आये हो? वतन से दर्पण लाया है सभी को अर्पणमय का मुखड़ा देखने के लिए और दिखाने के लिए। समर्पण हो चुके हो? सभी हो चुके हो? इस सभा के अन्दर कौन समझते हैं कि हम समर्पण हो चुके हैं? समर्पण किसको कहा जाता है? देह अभिमान में समर्पण हुए हो। समर्पण वा सम्पूर्ण अर्पण हुए? हाँ वा ना बोलो। देह अभिमान से सम्पूर्ण अर्पण हुए हो? इसमें हाँ क्यों कहते हो? स्वभाव अर्पण हुए हैं? (इसमें पुरुषार्थ है) स्वभाव अर्पण का समारोह कब करेंगे? आप लोग कन्या समर्पण समारोह मनाने आये हो लेकिन बापदादा वह समारोह मनाना चाहते हैं। वह कब मनाएंगे? इसके लिए कहा कि दर्पण ले आये हैं। उसमें तीन बातें देख रहे हैं। एक स्वभाव समर्पण, दूसरा देह अभिमान का समर्पण और तीसरा संबंधों का समर्पण। देह अर्थात् कर्मेन्द्रियों के लगाव का समर्पण। तीन चीज़े दर्पण में देख रहे हैं। जब स्वभाव समर्पण समारोह होगा तब सम्पूर्ण मूर्त्त का साक्षात्कार होगा। और दहेज़ क्या मिलेगा? जब यह सम्पूर्ण सुहाग प्राप्त होगा तो श्रेष्ठ भाग्य का दहेज़ स्वतः ही मिलेगा। अपने सुहाग सदा भाग्य। जो जितना सुहागिन रहते हैं। उतना ही श्रेष्ठ भाग्यवान बनते हैं। सुहाग की निशानी होती हैं बिन्दी। चिन्दी और बिन्दी दोनों ही होती हैं। तो जो सदा सुहागिन हैं उनकी बिन्दी रूप की स्मृति सदा कायम रहती है। अगर यह बिंदी रूप की स्थिति सदा साथ है तो वही सदा सुहागिन है। तो अपने सुहाग से भाग्य को देखो। जितना सुहाग उतना भाग्य। अविनाशी सुहाग तो अविनाशी भाग्य। सदा अपने सुहाग को कायम रखने के लिए चार बातें याद रखनी हैं। कौन सी चार बातें? चार बातों में से कोई एक बात भी बताओ। जैसे स्थूल दहेज़ तैयार करके आये हो ना।
वैसे इसका कौन से पुरुषार्थ का दहेज़ चाहिए। कौन सी चार बातें हैं? एक तो सदैव जीवन का उद्देश्य सामने हो, दूसरा बापदादा का आदेश, तीसरा सन्देश और चौथा स्वदेश। जीवन का उद्देश्य सामने होने से पुरुषार्थ तीव्र चलेगा और बापदादा के आदेश की स्मृति रखकर के पुरुषार्थ करने से पुरुषार्थ में भी सफलता मिलती है। सभी को सन्देश देना है जिसको सर्विस कहा जाता है और अब क्या याद रखना है? स्वदेश कि अब घर जाना है। अब वापस जाने का समय है। समय समीप आ पहुंचा है। इन चार बातों में कोई भी बात की कमी है तो उस कमी का नाम ही कमज़ोर पुरुषार्थी है। कमी को भरने के लिए यह चार शब्द सामने रखो। बापदादा बच्चों को आज एक नया टाइटल दे रहे हैं। लॉ मेकर्स। वह लोग पीस मेकर्स टाइटल देते हैं। लेकिन आज बापदादा सभी बच्चों को टाइटल देते हैं की आप सभी लॉ मेकर्स हो। सतयुगी जो भी लॉ चलने वाले है उसे बनाने वाले आप हो। हम लॉ मेकर्स हैंयह स्मृति में रखेंगे तो कोई भी कदम सोच समझ कर उठाएंगे। आप जो कदम उठाते हो वह मानो लॉ बन रहे हैं। जैसे जस्टिस वा चीफ़ जस्टिस होते हैं वह जो भी बात फाइनल करते हैं तो वह लॉ बन जाता है। तो यहाँ भी सभी जस्टिस बैठे हुए हैं। लॉ मेकर्स हो। इसलिए ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है। जब हैं ही लॉ मेकर्स तो जो संकल्प आप करेंगे, जो कदम आप उठाएंगे, आप को देख सा विश्व फॉलो करेगा। आप लोगों की प्रजा आप सभी को फॉलो करेगी। तो ऐसे अपने को समझ फिर हर कर्म करो। इसमें भी नंबर होते हैं। लेकिन है तो सभी लॉ मेकर्स।

आज बापदादा इस सभा को देख हर्षित हो रहे थे। कितने लॉ मेकर्स इकट्ठे हुए हैं। ऐसा अपने को समझकर चलते हो? इतनी बड़ी जिम्मेवारी समझकर चलने से फिर छोटी-छोटी बातें स्वतः ही ख़त्म हो जाती हैं। स्लोगन भी है जो कर्म मैं करूँगा मुझे देख सभी करेंगे। यह स्लोगन सदैव याद रखेंगे तब ही कार्य ठीक से कर सकेंगे। अपने को अकेला नहीं समझो। आप एक-एक के पीछे आपकी राजधानी है। वे भी आप को देख रहे हैं। इसलिए यह याद रहे कि जो कर्म मैं करूंगा मुझे देख सभी करेंगे। इससे क्या होगा कि सभी के स्वभाव वा संस्कारों का समर्पण समारोह जल्दी हो जायेगा। अब इस समारोह को स्टेज पर लाने के लिए जल्दी-जल्दी तैयारी करनी है। अच्छा

दो कुमारियों का समर्पण समारोह

आज किस कार्य के लिए बुलाया है? सतयुग में माता-पिता राजसिंहासन पर बिठाते हैं। संगम पर कौन सा राजतिलक मिलता है, मालूम है? संगम का तिलक लगाया हुआ है वा लगाना है? संगम के तख़्तनशीन हुए हो? सर्विस की जिम्मेवारी का ताज है, तख़्त कौन सा है? संगम के तख़्तनशीन होने के बाद ही सतयुग के तख़्तनशीन होंगे। सर्व गहनों से श्रृंगार कर लिया है कि वह भी कर रहे हो? इस घड़ी गहनों से सजे हुए हो। संगमयुग से ही यह सभी रस्मरिवाज़ आरम्भ हो रही है। क्योंकि संगमयुग है सर्व बातों का बीज डालने का समय। जैसे बीज बोने का समय होता है ना। वैसे हर दैवी रस्म का बीज डालने का यह संगमयुग है। बीजरूप द्वारा सर्व बातों का बीज पड़ता है। उस बीजरूप के साथ-साथ आप सभी भी बीज डालने की मदद करना। आज के दिवस ऐसे ही साधारण फंक्शन नहीं हो रहा है। लेकिन सुनाया ना कि आप सभी लॉ-मेकर्स हो। यह रीति रस्म का बीज डालने का दिवस है। इतना नशा है? इसकी सारी रस्म ब्राह्मणों द्वारा होती है। कितना बड़ा कार्य करने के निमित्त हो(विश्व को पलटाने के) कितने समय में विश्व पलटेंगे? अपने को कितने समय में तैयार करेंगे? एवररेडी हो? आज सभी अपने को किस रूप में अनुभव कर रहे हो? किस रूप में बैठे हो? जैसा दिन वैसा रूप होता है ना। यह संगम की दरबार सतयुगी दरबार से भी ऊँची है। आज सभी अपने को सर्व श्रृंगार से सजे हुए देख रहे हो या सिर्फ इन्हीं(कुमारियों) को ही देख रहे हो। आप एक-एक के संगमयुग के श्रृंगार सारी सतयुगी श्रृंगार से भी श्रेष्ठ हैं। तो बापदादा सभी श्रृंगारी हुई मूर्तियों को देख रहे हैं। सतयुगी ताज इस ताज के आगे कुछ नहीं है। संगम का ताज पड़ा हुआ है? यह ताज और तख़्त सदैव कायम रहे इसलिए क्या प्रयत्न करेंगे? इसके लिए तीन बातें याद रखनी हैं। यह जो स्वयंवर का समारोह होता है, जो ताजपोशी में जो रीति-रस्म होती है वह सभी यहाँ संगम पर ही किस न किस रूप में होती है। मालूम है आज की दुनिया में क्या रीति रस्म है? कितने प्रकारों की रस्म है? एक ब्राहमणों द्वारा होती है, दूसरा कोर्ट द्वारा, तीसरा मंदिरों और गुरुओं द्वारा। इन तीनों रस्मों का किस न किस रूप में यहाँ बीज पड़ता है। यह मधुबन मंदिर भी है, चैतन्य मंदिर है। इस मंदिर के बीच आत्मा और परमात्मा की लगन होती है। साथ साथ कोर्ट का जो रिवाज़ है वह भी यहाँ से शुरू होता है। सुनाया ना कि आप लॉ-मेकर्स हो। इन्हों के आगे यह वायदा करेंगे तो यह कोर्ट हुई ना। तीनों ही रस्म इस संगम पर अलौकिक रूप से होती है। जिसका यादगार स्थूल रूप में चलता रहता है।

अच्छा, तीन बातें कौन सी याद रखनी है? एक तो अपने को उपकारी समझकर चलना है, दूसरा निरहंकारी, तीसरा अधिकारी। अधिकार भी सामने रखना है और निरहंकार का गुण भी सामने रखना है और उपकार करने का कर्त्तव्य भी सामने रखना है। यह तीन बातें सदैव याद रखना है। कितना भी कोई अपकारी हो लेकिन अपनी दृष्टि और वृत्ति उपकारी हो। अधिकारी भी समझकर चलना है लेकिन निरहंकारी भी। जितना अधिकारी उतना निरहंकारी। तब यह ताज और तख़्त सदैव कायम रहेगा। समझा।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

21-05-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


भिन्नता को मिटाने की युक्ति 

आज हरेक बच्चे की दो बातें देख रहे हैं वह दो बातें कौन सी देख रहे हैं? बापदादा के देखने को भी देख रहे हो? ऐसी अवस्था अब आने वाली है। जो कोई के संकल्प को ऐसे ही स्पष्ट जान लेंगे जैसे वाणी द्वारा सुनने के बाद जाना जाता है। मास्टर जानी-जाननहार यह डिग्री भी यथायोग्य यथा शक्तिशाली को प्राप्त होती है ज़रूर। तो आज क्या देख रहे हैं? हरेक पुरुषार्थी के पुरुषार्थ में अभी तक मार्जिन क्या रही हुई है – एक तो उस मार्जिन को देख रहे हैं दूसरा हरेक की माईट को देख रहे हैं। मार्जिन कितनी है और माईट कितनी है। दोनों का एक दो से सम्बन्ध हैं। जितनी माईट है उतनी मार्जिन है। तो माईट और मार्जिन दोनों ही हरेक पुरुषार्थी की देख रहे हैं। कोई बहुत नजदीक तक पहुँच गए हैं। कोई बहुत दूर तक मंजिल को देख रहे हैं। तो भिन्न-भिन्न पुरुषार्थियों की भिन्न-भिन्न स्थिति देख क्या सोचते होंगे? भिन्नता को देख क्या सोचते होंगे?
बापदादा सभी को मास्टर नॉलेजफुल बनाने की पढ़ाई पढ़ाते हैं। प्रैक्टिकल में भगवान् के जितना साकार सम्बन्ध में नजदीक आएंगे उतना पुरुषार्थ में भी नजदीक आयेंगे। अपने पुरुषार्थ और औरों के पुरुषार्थ को देख क्या सोचते हो? बीज तो अविनाशी है। अविनाशी बीज को संग का जल देना है। तो फिर फल निकल आयेगा। तो अब फल स्वरुप दिखाना है। वृक्ष से मेहनत फल के लिए करते हैं ना। तो जो ज्ञान की परवरिश ली है उनकी रिजल्ट फलस्वरुप बनना है। तो यह जो भिन्नता वो कैसे मिटेगी? भिन्नता को मिटाने का सहज उपाय कौन सा है? जो अभी की भिन्नता है वह अंत तक रहेगी वा फर्क आएगा? सम्पूर्ण अवस्था की प्राप्ति के बाद अब के पुरुषार्थी जीवन की भिन्नता रहेगी? आजकल की जो भिन्नता है वह एकता में लानी है। एकता के लिए वर्तमान की भिन्नता को मिटाना ही पड़ेगा। बापदादा इस भिन्नता को देखते हुए भी एकता को देखते हैं। एकता होने का साधन है – दो बातें लानी पड़ें। एक तो एक्नामी बन सदैव हर बात में एक का ही नाम लो, एक्नामी और इकॉनमी वाले बनना है। इकॉनमी कौन सी? संकल्पों की भी इकॉनमी चाहिए और समय की भी और ज्ञान के खजाने की भी इकॉनमी चाहिए। सभी प्रकार की इकॉनमी जब सिख जायेंगे। फिर क्या हो जायेगा? फिर मैं समाकर एक बाप में सभी भिन्नता समा जाएगी। एक में समाने की शक्ति चाहिए। समझा। यह पुरुषार्थ अगर कम है तो इतना ही इसको ज्यादा करना है। कोई भी कार्य होता है उसमें कोई भी अपनापन न हो। एक ही नाम हो। तो फिर क्या होगा? बाबा-कहने से माया भाग जाती है। मैं-मैं कहने से माया मार देती है। इसलिए पहले भी सुनाया था कि हर बात में भाषा को बदली करो। बाबा-बाबा की ढाल सदा सदैव अपने साथ रखो। इस ढाल से फिर जो भी विघ्न हैं वह ख़त्म हो जायेंगे। साथ-साथ इकॉनमी करने से व्यर्थ संकल्प नहीं चलेंगे। और न व्यर्थ संकल्पों की टक्कर होगा। यह है स्पष्टीकरण। अच्छा। जो भी जानेवाले हैं वह क्या करके जायेंगे? जो कोई जहाँ से जाते हैं तो जहाँ से जाना होता है वहां अपना यादगार देकर जाना होता है। तो जो भी जाते हैं उन्हों को अपना कोई न कोई विशेष यादगार देकर जाना है।
सरल याद किसको रहती है? मालूम है? जितना जो स्वयं सरल होंगे उतना याद भी सरल रहती है। अपने में सरलता की कमी के कारण याद भी सरल नहीं रहती है। सरल चित्त कौन रह सकेगा? जितना हर बात में जो स्पष्ट होगा अर्थात् साफ़ होगा उतना सरल होगा। जितना सरल होगा उतना सरल याद भी होगी। और दूसरों को भी सरल पुरुषार्थी बना सकेंगे। जो जैसा स्वयं होता है वैसे ही उनकी रचना में भी वही संस्कार होते हैं तो हरेक को अपना विशेष यादगार देकर जाना है।

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

28-05-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


हाई-जम्प देने के लिए हल्का बनो 

कौन-सा समर्पण है? समर्पण समारोह तो नहीं है ना । इस समारोह का नाम कबो है? यह है इन्हों का अपने जीवन का फ़ैसला करने का समारोह । फ़ैसला किया नहीं है, करने का है । अभी एग्रीमेन्ट करनी होगी फिर होगी इंगेजमेट । उसके बाद फिर सम्पूर्ण होने का समारोह होगा । अभी यहाँ पहली स्टेज पर आई हो । अभी एग्रीमेन्ट करनी है इसलिये सभी आये हैं ना । जीवन का फ़ैसला करने आई हो वा नहीं? बापदादा भी हरेक का साहस देख रहे हैं । अब कोई बात का साहस रखा जाता है तो साहस के साथ और क्कुह भी करना पड़ता है कई बातें सामना करने लिए आती है । साहस रखा और माया का सामना करना शुरू हो जाता है । इसलिए सामना करने के लिए हिम्मत भी पहले से ही अपने में रखनी है । यह सभी सामना करने के लिए तैयार हैं? कोई भी परीक्षा किसभी रूप में आये, परीक्षा को पास करने के लिए अगर हाई जम्प देने का अभ्यास होगा तो कोई भी परीक्षा को पास कर लेंगे । तो यह हाई जम्प लगाने वाला का ग्रुप है । जो समझते हैं हम हाई जम्प देने वाले हैं वह हाथ उठायें । यह तो सभी साहस रखने में नम्बरवन हैं । इन्हों को बताना हाई जम्प किसको कहा जाता है, उसका पहला लक्षण कौन सा है? उसको अन्दर बाहर हल्कापन महसूस होगा । एक है अन्दर अपनी अवस्था का हल्कापन । दूसरा है बाहर का हल्कापन । बाहर में सभी कनेक्शन में आना पड़ता है । एक दो के सम्बन्ध-सम्पर्क में आना होता है, तो अन्दर भी हल्कापन, बाहर भी हल्कापन । हल्कापन होगा तो हाई जम्प दे सकेंगे । इस ग्रुप को ऐसा हल्का बनाना जो वहाँ भी जाये तो हिल मिल जाये । इतना साहस है? अगर इतनी सभी कुमारियाँ समर्पण हो जाये तो क्या हो जायेगा?
इस भट्ठी से ऐसा होकर निकलना है जो जैसा भी कोई हो, जहाँ भी हो, जैसी भी परिस्थिति हो उन सभी का सामना का सकें । क्योंकि समस्याओं को मिटाने वाले बनकर निकलना है । न कि खुद समस्या बन जाना है । कोई तो समस्याओं को मिटाने वाले होते हैं कोई फिर खुद ही समस्या बन जाते हैं । तो खुद समस्या न बनना लेकिन समस्याओं को मिटाने वाले बनना है । फिर बापदादा इस ग्रुप का नाम क्या रखेंगे? कर्म करने के पहले नाम रखते है इसलिए कि जैसा नाम वैसा काम कर दिखायेंगे । इतने उम्मीदवार हो ना । कहते हैं ना बड़े तो बड़े छोटे बाप समान... यह ग्रुप भी बहुत लाडला है । उम्मीदवार है । साहस के कारण ही बापदादा इस ग्रुप का नाम रखते हैं - शूर-वीर ग्रुप । जैसा नाम है वैसा ही सदैव हर कार्य शूरवीर समान करना । कब कायर नहीं बनना । कमज़ोरी नहीं दिखाना । काली का पूजन देखा है? जैसे का काली दल है ना । वैसे इस सारे ग्रुप को फिर काली दल बनना है । एक-एक काली रूप जब बनेंगी तब समस्याओं का सामना कर सकेंगी । विशेष कुमारियों को शीतला नहीं बनना है, काली बनना है । शीतला भी किस रूप में बनना है वह अर्थ भी तो समझती हो । लेकिन जब सर्विस पर हो, कर्तव्य पर हो तो काली रूप चाहिए । काली रूप होगी तो काली भी किस पर बलि नहीं चढेगी । लेकिन अनेकों को अपने ऊपर बलि चढायेंगी । कोई पर भी स्वयं बलि नहीं चढ़ना । लेकिन उसको अपने ऊपर अर्थात् जिसके ऊपर आप सभी बलि चढ़ी हो उन पर ही सभी को बलि चढ़ाना है । ऐसी काली अगर बन गई तो फिर अनेकों की समस्याओं को हल कर सकेंगी । बहुत कड़ा रूप चाहिए । माया का कोई विघ्न सामने आने का साहस न रख सके । जब कुमारियाँ काली रूप बन जाये तब सर्विस की सफ़लता हो । तो इन सभी कालीपन का लक्षण सुनाना । सदैव एकरस स्थिति रहे और विघ्नों को भी हटा सकें इसके लिए सदैव दो बातें अपने सामने रखनी है । जैसे एक आँख में मुक्ति टूसरी आँख में जीवनमुक्ति रखते हैं । वैसे एक तरफ़ विनाश के नगाड़े सामने रखो और दूसरे तरफ़ अपने राज्य के नज़ारे सामने रखो, दोनों ही साथ में बुद्धि में रखो । विनाश भी, स्थापना भी । नगाड़े भी नज़ारे भी । तब कोई भी विघ्न को सहज पार कर सकेंगी ।
जो कार्य कोई ग्रुप ने नहीं किया वह कार्य इस ग्रुप को करके दिखाना है । कमाल करके दिखाना है । सदैव एक दो के स्नेही और सहयोगी भी बनकर चलेंगे तो सफ़लता का सितारा आप सभी के मस्तिष्क पर चमकता हुआ दिखाई पड़ेगा । वहाँ भी स्नेह वा सहयोग देने में कमी नहीं करना । स्नेह और सहयोग दोनों जब आपस में मिलते हैं तो शक्ति की प्राप्ति होती है । जिस शक्ति से फिर सफ़लता प्राप्त होती है । इसलिए इन दोनों बातों का ध्यान रखना, जो आपके जड़ चित्रों का गायन है कि देवियाँ एक नज़र से असुरों का संहार कर देती । वैसे एक सेकेण्ड में कोई भी आसुरी संस्कार का संहार काने वाली संहारकारी मूर्त बनना है । अब यह बात देखना कि जहाँ संहार करना है वहाँ रचना नहीं रच लेना, और जहाँ रचना रचनी है वहाँ संहार नहीं का लेना । जहाँ मास्टर ब्रह्मा बनना है वहाँ मास्टर शंकर नहीं बनना । यह बुद्धि में ज्ञान चाहिए । कहाँ मास्टर ब्रह्मा बनना है, कहाँ मास्टर शंकर बनना है । अगर रचना करने बदली विनाश कर देते तो भी रांग और अगर विनाश के बदली रचना रच लेते तो भी रांग । कहानी सुनी हैं ना जब उल्टा कार्य किया तो तो बिच्छू टिन्डन पैदा हुए । तो यही भी अगर संहार के बजाए उल्टी रचना रच ली तो व्यर्थ संकल्प बिच्छू टिन्डन मिसल बन पड़ेंगे । तो ऐसी रचना नहीं रचना जो स्वयं को भी काटें और दूसरों को भी काटें । ऐसी रचना रचने से सावधान रहना । जिस समय जिस कर्तव्य की आवश्यकता है उस समय वह कर्तव्य करना है । समय चला गया तो फिर सम्पूर्ण बन नहीं सकेंगे । तो इस ग्रुप को बहुत जल्दी-जल्दी एग्रीमेन्ट बाद इंगेजमेन्ट करना है । सेवा केन्द्रों पर सर्विस में लग जाना यह इंगेजमेन्ट होती है फिर सर्विस में सफ़लता पूरी हुई, तो तीसरा समारोह है सम्पूर्ण सम्पन्न बनने का। तीनों समारोह जल्दी का दिखाना है । छोटे जास्ती तेज जा सकते हैं । सिकीलधे, लाडले भी छोटे होते हैं ना । इसलिए इस ग्रुप को प्रैक्टिकल में दिखाना है । हिम्मत है ना । हिम्मत के साथ उल्लास भी रखना है । कभी हार नहीं खाना । लेकिन अपने को हार बनाकर गले में पिरोना है । अगर गले में पिरोये जायेंगे तो फिर कभी हार नहीं खायेंगे । जब हार खाने का मौका आये तो यह याद रखना कि हार खाने वाले नहीं हैं लेकिन बापदादा के गले का हार हैं । छोटे-छोटे कोमल पत्ते जो होते है, उन्हों को चिड़ियाएँ बहुत खाती हैं । क्योंकि कोमल होते हैं तो खाने में मज़ा आता है । इसलिए संभाल रखनी है । जब अपने को एक के आगे अर्पण कर लिया तो और कोई के आगे संकल्प से भी अर्पण नहीं होना है । संकल्प भी बहुत धोखा देता है । जो बहुत प्यारे बच्चे होते हैं तो उनको क्या करते हैं? काला टीका लगा देते है । इसलिए इस ग्रुप को भी टीका लगाना है । जो कोई की भी नज़र न लग सके । तिलक का अर्थ तो समइाते हो, जैसे तिलक मस्तक में टिक जाता है वैसे जो भी बातें निकलीका सभी सदैव स्थिति में स्थित रहे इसका यह तिलक है । यह सभी बात स्थिति में स्थित हो जाये तब राजतिलक मिलेगा । स्थिति कौन सी चाहिए? वह तो समझते हो ना । इस ग्रुप को यह स्लोगन याद रखना है 'सफ़लता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है' असफ़लता नहीं । सफ़लता का ही श्रंगार करना है । नयनों में भी, मुख से भी, मस्तक से भी सफ़लता का स्वरूप देखने में आये । संकल्प भी सफ़लता का। और दूसरे जो भी कार्य हो उसमें सफ़लता हो । सफ़लता ही जन्मसिद्ध अधिकार हो । यह है इस ग्रुप का स्लोगन । भट्ठी में पड़ने से सभी कुछ बदल जाता है । सबसे छोटी और ही शो करती है । (पूनम बापदादा के आगे बैठी है) जिसमें कोई उम्मीद नहीं होती है वह और ही उम्मीदवार हो दिखलाते हैं । यह कमाल कर दिखायेगी । बाल भवन का एक ही यादगार है । यादगार को हमेशा शो केस में रखा जाता है । तो अपने को सदैव शो केस में रखना है । अगर एक छोटी ने कमाल की तो इस सारे ग्रुप का नाम बाला हो जायेगा ।
अब जो स्लोगन बताया का वह करके दिखाना है । छोटों को बड़ा कर्तव्य कर दिखाना है । इनसे सभी से एग्रीमेन्ट लिखवाना कोई भी विघ्न आए, कैसी भी समस्या आये लेकिन और कोई पर भी बलि नहीं चढ़ेंगे । सच्चा पक्का वायदा है ना । जैसे बीज बोने के बाद उसको जल दिया जाता है तब वृक्ष रूप में फलीभूत होता है । इस रीति यह भी जो प्रतिज्ञा करते हैं फिर इसको जल कौन सा देना है? प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए संग भी चाहिए और साथ-साथ अपनी हिम्मत भी । संग और हिम्मत दोनों के आधार से पार हो जायेंगे । ऐसा पक्का ठप्पा लगाना जो सिवाए वाया परमधाम, बैकुण्ठ और कहाँ न चली जाएँ । जैसे गवर्नमेन्ट सील लगाती है तो उसको कोई खोल नहीं सकता वैसे आलमाइटी गवर्नमेन्ट की सील हरेक को लगाना है । इस ग्रुप से कोई भी कमज़ोर हुआ तो इन सभी के पत्र आयेगें । समझा ।

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

29-05-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


समीप रत्नों की निशानियां 

समय कितना समीप पहुँचा हुआ दिखाई पड़ता है, हिसाब निकाल सकते हो? भविष्य लक्षण के साथ सम्पूर्ण स्वरूप का लक्षण भी सामने रहता है? समीप का लक्षण क्या होगा? जैसे कोई शरीर छोड़ने वाले होते हैं तो कई लोगों को मालूम पड़ता है । आप भी ऐसे अनुभव करेंगे कि यह शरीर जैसे कि अलग है । इसको हम धारण कर चला रहे हैं । समीप रत्न की समीप आने की निशानी यही होगी । सदैव अपना आकरी रूप और भविष्य रूप सामने देखते रहेंगे । प्रैक्टिकल में अनुभव होगा । लाइट का फ़रिश्ता स्वरूप सामने दिखाई देगा कि ऐसा बनना है और भविष्य रूप भी दिखाई देगा । अब यह छोड़ा और वह लिया । जब ऐसी अनुभूति हो तब समझो की सम्पूर्णता के समीप हैं । एक आँख में सम्पूर्ण स्वरुप और दूसरी आँख में भविष्य स्वरुप । ऐसा प्रत्यक्ष देखने में आएगा । जैसे अपना यह स्वरुप प्रत्यक्ष अनुभव होता है । बैठे-बैठे ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि यहाँ नहीं लेकिन उस सम्पूर्ण स्वरुप में बैठे हैं । यह पुरुषार्थी शरीर एकदम मर्ज हो जायेगा । वह दोनों इमर्ज होंगे । एक तरफ अव्यक्त दूसरी तरफ भविष्य । जब पहले ऐसा अनुभव आप लोग करेंगे तब दूसरों को भी अनुभव होगा । जैसे एक वस्त्र छोड़ कर दूसरा लिया जाता हैं । वैसे ही अनुभव करेंगे । यह मर्ज हो वह इमर्ज होगा । यह भूलता जायेगा । इस अवस्था में विल पॉवर भी होती है । जैसे विल किया जाता है ना ! तो विल करने के बाद ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरापन सभी ख़त्म हो गया । जिम्मेवारी उतर गयी । विल पॉवर भी आती है और यह भी अनुभव होता है जैसे सभी कुछ विल कर चुके । संकल्प सहित सब विल हो जाये । शरीर का भान छोड़ना और संकल्प तब बिल्कुल विल करना – यह है माईट । फिर समानता की अवस्था होगी । समानता वा सम्पूर्णता एक बात ही है । अभी यह चार्ट रखना है । वह चार्ट तो कॉमन है । यह 5 तत्त्वों का शरीर होते हुए भी लाइट स्वरुप अनुभव करेंगे । सुनाया था ना कि लाइट शब्द के अर्थ में भी अन्तर होता है । लाइट अर्थात् हल्कापन भी होता है और लाइट अर्थात् ज्योति भी कहा जाता है । बिल्कुल हल्कापन अर्थात् लाइट रूप हो चल रहे हैं, हम तो निमित्त हैं । अव्यक्त रूप में तो हर बात में मदद मिलती है । अच्छा ।
 

पार्टियों से –:

1 - सभी का पुरुषार्थ ठीक चल रहा है? किस नंबर का लक्ष्य रखा है? (फर्स्ट) फर्स्ट नंबर के लिए मालूम है क्या करना पड़ता है? फर्स्ट नंबर लेने के लिए विशेष फ़ास्ट रखना पड़ता है । फ़ास्ट के दो अर्थ होते हैं । एक फ़ास्ट व्रत को भी कहा जाता है । तो विशेष कौनसा व्रत रखना है?(पवित्रता का) यह व्रत तो कॉमन है । यह व्रत तो सभी रखते हैं । फर्स्ट आने के लिए विशेष व्रत रखना है कि एक बात दूसरा न कोई । हर बात में एक की ही स्मृति आये । जब यह फ़ास्ट रखेंगे तो फर्स्ट आ जायेंगे । दूसरा फ़ास्ट – जल्दी चलने को भी कहा जाता है अर्थात् तीव्र पुरुषार्थ ।
महारथी उसको कहा जाता है जो सदैव माया पर विजय प्राप्त करे । माया को सदा के लिए विदाई दे दो । विघ्नों को हटाने की पूरी नॉलेज है? सर्वशक्तिमान के बच्चे मास्टर सर्वशक्तिमान हो । तो नॉलेज के आधार पर विघ्न हटाकर सदैव मगन अवस्था रहे । अगर विघ्न हटते नहीं हैं तो ज़रूर शक्ति प्राप्त करने में कमी है । नॉलेज ली है लेकिन उसको समाया नहीं है । नॉलेज को समाना अर्थात् स्वरुप बनना । जब समझ से कर्म होगा तो उसका फल सफलता अवश्य निकलेगी ।
2 – तीव्र पुरुषार्थी के क्या लक्षण होते हैं? समझाया था ना कि फरमानबरदार किसको कहा जाता है? जिसका संकल्प भी बिगर फरमान के नहीं चलता । ऐसे फरमानबरदार को ही तीव्र पुरुषार्थी कहा जाता है । सर्वशक्तिमान बाप के बच्चे जो शक्तिमान हैं, उन्हों के आगे माया भी दूर से ही सलाम कर विदाई ले लेती है । वल्लभाचारी लोग अपने शिष्यों को छूने भी नहीं देते हैं । अछूत अगर छू लेता है तो स्नान किया जाता है । यहाँ भी ज्ञान स्नान कर ऐसी शक्ति धारण करो जो अछूत नजदीक न आयें । माया भी क्या है? अछूत ।

अच्छा !!!

07-06-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


दिव्य मूर्त बनने की विधि” 

नयनों द्वारा क्या देख रहे हैं? आप सभी भी नयनों द्वारा देख रहे हो। बापदादा भी नयनों का आधार ले देख रहे हैं। बापदादा क्या देखते हैं? आप सभी क्या देख रहे हैं? देख रहे हो वा देखते हुए भी नहीं देखते हो? क्या स्थिति है? बापदादा क्या देख रहे यही आप देख रहे हो? संकल्पों को कैच करने की प्रैक्टिस होगी तो संकल्प रहित भी सहज बन सकेंगे। ज्यादा संकल्प तब चलाना पड़ता है जब किसके संकल्प को परख नहीं सकते हैं। लेकिन हरेक के संकल्पों को रीड करने की प्रैक्टिस होगी तो व्यर्थ संकल्प ज्यादा नहीं चलेंगे। और सहज ही एक संकल्प में एकरस स्थिति में एक सेकंड में स्थित हो जायेंगे। तो संकल्पों को रीड करनायह भी एक सम्पूर्णता की निशानी है। जितना-जितना अव्यक्त भाव में स्थित होंगे उतना हरेक के भाव को सहज समझ जायेंगे। एक दो के भाव को न समझने का कारण अव्यक्त भाव की कमी है। अव्यक्त स्थिति एक दर्पण है। जब आप अव्यक्त स्थिति में स्थित होते हो तो कोई भी व्यक्ति के भाव अव्यक्त स्थिति रूप दर्पण में बिल्कुल स्पष्ट देखने में आएगा। फिर मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। दर्पण को मेहनत नहीं करनी पड़ती है कोई के भाव को समझने में। जितनी-जितनी अव्यक्त स्थिति होती है, वह दर्पण साफ़ और शक्तिशाली होआ है। इतना ही बहुत सहज एक दो के भाव को स्पष्ट समझते हैं। अव्यक्त स्थिति रूप दर्पण को साफ़ और स्पष्ट करने के लिए तीन बातें आवश्यक है। उन तीन बातों से कोई एक बात भी सुनाओ (हरेक ने बताया) आज हरेक की सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता यह तीन चीज़ें एक-एक की देख रहे हैं। इन तीनों बातों में से कोई एक भी ठीक रीति धारण है तो दर्पण स्पष्ट है। अगर एक भी बात की कमी है तो दर्पण पर भी कमी का दाग दिखाई पड़ेगा। इसलिए जो भी कार्य करते हो, हर कार्य में तीन बातें चेक करो। सभी प्रकार से सरलता भी हो, सहनशीलता भी हो और श्रेष्ठता भी हो। साधारणपन भी न हो। अभी कहाँ श्रेष्ठता के बजाय साधारण दिखाई पड़ती है। साधारणपन को श्रेष्ठता में बदली करो और हर कार्य में सहनशीलता को सामने रखो। और अपने चेहरे पर, वाणी पर सरलता को धारण करो। फिर देखो सर्विस वा कर्तव्य की सफलता कितनी श्रेष्ठ होती है। अभी तक कर्तव्य की रिजल्ट क्या देखने में आती है? प्लैन और प्रैक्टिकल में अंतर कितना है?

अन्तर का कारण क्या है? तीनों ही रूप में अभी पूर्ण प्लेन नहीं हुए हो। स्मृति में भी प्लेन, वाणी में भी प्लेन होना चाहिए। कोई भी पुराने संस्कार का कहाँ दाग न हो और कर्म में भी प्लेन अर्थात् श्रेष्ठता। अगर प्लेन हो जायेंगे तो फिर प्लैन और प्रैक्टिकल एक हो जायेंगे। फिर सफलता प्लेन (एरोप्लेन) माफिक उड़ेगी। इसलिए हर बात में मनसा, वाचा कर्मणा और छोटी बात में भी सावधानी चाहिए। मन, वाणी कर्म में तो होना ही है लेकिन उसके साथ-साथ यह जो अलौकिक सम्बन्ध हैं उसमें भी प्लेन होंगे तो सर्विस की सफलता आप सभी के मस्तक पर सितारे के रूप में चमक पड़ेगी। फिर हरेक आप एक-एक को सफलता का सितारा देखेंगे। सुनाया था ना कि स्लोगन कौन सा याद रखो? सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। फिर तुमको कोई भी देखेंगे तो उनको दूर से दिव्यमूर्त देखने में आएंगे। साधारणमूर्त नहीं, लेकिन दिव्यमूर्त। आजकल बहुत सर्विस में बिजी हो। जो कुछ किया बहुत अच्छा किया। आगे के लिए सफलता को समीप लाओ। जितना-जितना एक दो के समीप आयेंगे उतना सफलता समीप आयेगी। एक दो के समीप अर्थात् संस्कारों के समीप। तब कोई भी सम्मेलन की सफलता होगी। जैसे समय समीप आ रहा है वैसे सभी समीप आ रहे हैं। लेकिन अब ऐसी समीपता में क्या भरना है? जितनी समीपता उतना एक दो को सम्मान देना। जितना एक दो को सम्मान देंगे उतना ही सारी विश्व आप सभी का सम्मान करेंगी सम्मान देने से सम्मान मिलेगा। देने से मिलता है न कि लेने से। कोई चीज़ लेने से मिलती है और कोई चीज़ देने से मिलती है। तो कोई को भी सम्मान देना गोया सर्व का सम्मान लेना है। और भाषा में भी परिवर्तन चाहिए। आज सभी सर्विसएबुल बैठे हैं ना तो इसलिए भविष्य के इशारे दे रहे हैं। कभी भी कोई का विचार स्पष्ट न हो तो भी ना कभी नहीं करनी चाहिए। शब्द सदैव हाँ निकलना चाहिए। जब यहाँ हाँ जी करेंगे तब वहाँ सतयुग में भी आपकी प्रजा इतना हाँ जी, हाँ जी करेगी। अगर यहाँ ही ना जी ना जी करेंगे तो वहाँ भी प्रजा दूर से ही प्रणाम करेगी। तो ना शब्द को निकाल देना है।

कोई भी बात हो पहले हाँ जी। हाँ जी कहना ही दूसरे के संस्कार को सरल बनाने का साधन है। समझा। सुनाया था वर्तमान समय जो कर्म कर रहे हो। वह भविष्य के लॉ बन रहे हैं। आप सभी का कर्म भविष्य का लॉ है। जो लॉ-मेकर्स होते हैं वह सोच-समझकर शब्द निकालते हैं। क्योंकि उनका एक-एक शब्द भविष्य के लिए लॉ बन जाता है। सभी के हर संकल्प भविष्य के लॉ बन रहे हैं। तो कितना ध्यान देना चाहिए! अभी तक एक बात को पकड़ते हैं तो विधान को छोड़ देते हैं। कब विधान को पकड़ते हैं तो विधि को छोड़ देते हैं। लेकिन विधि और विधान दोनों के साथ ही विधाता की याद आती हैं। अगर विधाता ही याद रहे तो विधि और विधान दोनों ही साथ स्मृति में रहेगा। लेकिन विधाता भूल जाता है तो एक चीज़ छूट जाती है। विधाता की याद में रहने से विधि और विधान दोनों साथ रहते हैं। विधाता को भूलने से कभी विधान छूट जाता है तो कभी विधि छूट जाती है। जब दोनों साथ रहेंगे तब सफलता गले का हार बन जाएगी। अच्छा। आज बहुत शिक्षा दी। यह स्नेह है। क्योंकि बापदादा समान बनाना चाहते हैं। समान बनाने का साधन स्नेह हुआ ना।

कुमारियों का पेपर तो अब लेना है। साहस को प्रत्यक्ष रूप में लाने के लिए साहस में बहुत-बहुत शक्ति भरनी है। अब कितनी शक्ति भरी है, वह पेपर लेंगे। अच्छा।

पार्टियों के साथ

1 – जितना-जितना अपने को सर्विस के बन्धन में बांधते जायेंगे तो दूसरे बन्धन छूटते जायेंगे। आप ऐसे नहीं सोचो कि यह बन्धन छूटे तो सर्विस में लग जाएँ। ऐसे नहीं होगा। सर्विस करते रहो। बन्धन होते हुए भी अपने को सर्विस के बन्धन में जोड़ते जाओ। यह जोड़ना ही तोडना है। तोड़ने के बाद जोड़ना नहीं होता है। जितना जोड़ेंगे उतना ही टूटेगा। जितना अपने को सर्विस में सहयोगी बनायेंगे उतना ही प्रजा आपकी सहयोगी बनेगी। कोई भी कारण है तो उनको हल्का छोड़कर पहले सर्विस के मौके को आगे रखो। कर्तव्य को पहले रखना होता है। कारण होते रहेंगे। लेकिन कर्तव्य के बल से ढीले पड़ जायेंगे।

2 – माताओं के जो संगठन बने हुए हैं उनमें घुस जाओ। मेम्बर बनने से फिर कईयों को आप समान बनाने का चांस मिलेगा। संपर्क में आने से ही चांस मिलेगा। अभी माताओं की संस्थाओं में आप लोगों का नाम बाला नहीं हुआ है। पहले गुप्त वेश में पाँव रखो फिर वह तुम्हारे बन जायेंगे। भटकी हुई माताओं को राह बतानी है। तो फिर मातायें जो बिचारी सितम सहन करती हैं, उन्हों को भी आप बचा सकेंगे। कई मातायें सहारा चाहती हैं, उन्हों को सहारा मिल जायेगा। तो यह सर्विस कर कमाल कर दिखाओ फिर देखो कितने हैंड्स मिलते हैं। बहुत समय की यह बात प्रैक्टिकल में लानी है। जैसे एक एशलम (शरण) देते हैं ना। वह है अनाथ आश्रम। यह तो सनाथ आश्रम है। अच्छा।

3 – अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है? एक सेकंड ही अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता है तो उसका असर काफी समय तक रहता है। अव्यक्त स्थिति का अनुभव पावरफुल होता है। जितना हो सके उतना अपना समय व्यक्तभाव से हटाकर अव्यक्त स्थिति में रहना है। अव्यक्त स्थिति से सर्व संकल्प सिद्ध हो जाते हैं। इसमें मेहनत कम और प्राप्ति अधिक होती है। और व्यक्त स्थिति में स्थित होकर पुरुषार्थ करने में मेहनत अधिक और प्राप्ति कम होती है। फिर चलते-चलते उलझन और निराशा आती है। इसलिए अव्यक्त स्थिति सर्व प्राप्ति का अनुभव बढ़ाओ।

अव्यक्तमूर्त को सामने देख समान बनने का प्रयत्न करना है। जैसा बाप वैसे बच्चे। यह स्लोगन याद रखो। अंतर न हो। अंतर को अन्तर्मुख होकर मिटाना है। बाप कब निराश होते हैं? परिस्थितियों से घबराते हैं? तो बच्चे फिर क्यों घबराते हैं? ज्यादा परिस्थितियों को सामने करने का साकार सबूत भी देखा। कभी उनका घबराहट का रूप देखा? सुनाया था ना कि सदैव यह याद रखो कि स्नेह में सम्पूर्ण होना है। कोई मुश्किल नहीं हैं। स्नेही को सुध-बुध रहती है? जब अपने आप को मिटा ही दिया फिर यह मुश्किल क्यों? मिटा दिया ना। जो मिट जाते हैं वह जल जाते हैं। जितना अपने को मिटाना उतना ही अव्यक्त रूप से मिलना। मिटना कम तो मिलना भी कम। अगर मेले में भी कोई मिलन न मनाये तो मेला समाप्त हो जायेगा फिर कब मिलन होगा? स्नेह को समानता में बदली करना है। स्नेह को गुप्त और समानता को प्रत्यक्ष करो। सभी समाया हुआ है सिर्फ प्रत्यक्ष करना है। अपने कल्प पहले के समाये हुए संस्कारों को प्रत्यक्ष करना है। कप पहले की अपनी सफलता का स्वरुप याद आता है ना। अभी सिर्फ समाये हुए को प्रैक्टिकल प्रत्यक्ष रूप में लाओ। सदैव अपनी सम्पूर्णता का स्वरुप और भविष्य 21 जन्मों का रूप सामने रखना है। कई लोग अपने घर को सजाने के लिए अपने बचपन से लेकर, अपने भिन्न-भिन्न रूपों का यादगार रखते हैं। तो आप अपने मन मन्दिर में अपने सम्पूर्ण स्वरुप की मूर्ति, भविष्य के अनेक जन्मों की मूर्तियाँ स्पष्ट रूप में सामने रखो। फिर और कोई तरफ संकल्प नहीं जायेगा।

समीप रत्न के लक्षण क्या हैं? जो जितना जिसके समीप होते हैं उतना संस्कारों में भी समानता होती है। तो बापदादा के समीप अर्थात् लक्षण के नजदीक आओ। जितना चेक करेंगे उतना जल्दी चेंज होंगे। आदि स्वरुप को स्मृति में रखो। सतयुग आदि का और मरजीवा जीवन के आदि रूप को स्मृति में रखने से मध्य समा जायेगा।

स्नेही हो वा सहयोगी भी हो? जिससे स्नेह होता है उनको रिटर्न में क्या दिया जाता है? स्नेह का रिटर्न है सहयोग। वह कब देंगे? जैसे बाप सर्व समर्थ है तो बच्चों को भी मास्टर सर्व समर्थ बनना है। विनाश के पहले अगर स्नेह के साथ सहयोगी बनेंगे तो वर्से के अधिकारी बनेंगे। विनाश के समय भल सभी आत्माएं पहचान लेंगी लेकिन वर्सा नहीं पा सकेंगी क्योंकि सहयोगी नहीं बन सकेंगी।

4 - कर्म बन्धन शक्तिशाली है या यह ईश्वरीय बन्धन? ईश्वरीय बन्धनों को अगर तेज़ करो तो कर्म बन्धन आपे ही ढीले हो जायेंगे। बन्धन से ही बन्धन कटता है। जितना ईश्वरीय बन्धन में बंधेंगे उतना कर्म बन्धन से छूटेंगे। जितना वह कर्मबन्धन पक्का है तो उतना ही यह ईश्वरीय बन्धन को भी पक्का करो तो वह बन्धन जल्दी कटेगा।

5 – बिन्दु रूप में अगर ज्यादा नहीं टिक सकते तो इसके पीछे समय न गंवाओ। बिंदी रूप में तब टिक सकेंगे जब पहले शुद्ध संकल्प का अभ्यास होगा। अशुद्ध संकल्पों संकल्पों से हटाओ। जैसे कोई एक्सीडेंट होने वाला होता है। ब्रेक नहीं लगती तो मोड़ना होता है। बिंदी रूप है ब्रेक। अगर वह नहीं लगता तो व्यर्थ संकल्पों से बुद्धि को मोड़कर शुद्ध संकल्पों में लगाओ। कभी-कभी ऐसा मौका होता है जब बचाव के लिए ब्रेक नहीं लगायी जाती है, मोड़ना होता है। कोशिश करो कि सारा दिन शुद्ध संकल्पों के सिवाए कोई व्यर्थ संकल्प न चले। जब यह सब्जेक्ट पास करेंगे तो फिर बिंदी रूप की स्थिति सहज रहेगी।


11-06-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


विश्वपति बनने की सामग्री” 

आज सतगुरुवार के दिवस किस लिए विशेष बुलाया है? आज कुमारियों का कौन-सा दिवस है? (समाप्ति समारोह) समाप्ति समारोह नहीं है लेकिन आज का सतगुरूवार का दिन विश्वपति बनने की शुभ अविनाशी दशा बैठने का दिवस है। समझा। तो आज बापदादा विश्वपति बनाने की क्या सामग्री लाये होंगे? जब कोई समारोह होता है तो उसमें सामग्री भी होती है। तो आज विश्वपति बनाने के समारोह में विशेष क्या सामग्री लाये हैं? ताज, तख़्त और तिलक। फिर इन तीनों को धारण करने की हिम्मत है? ताज को धारण करने लिए तख़्त पर विराज़मान होने के लिए और तिलक को धारण करने के लिए क्या करना पड़ेगा? अगर यह धारण करने की हिम्मत है तो उसके लिए क्या करना पड़ेगा? एक तो त्याग, दूसरा तपस्या और सेवा। तिलक को धारण करने के लिए तपस्या और ताज को धारण करने के लिए त्याग और तख़्त पर विराज़मान होने के लिए जितनी सेवा करेंगे उतना अब भी तख़्त नशीन और भविष्य में भी तख़्त नशीन बनेंगे। इन तीनों बातों से ही तीनों चीज़ें धारण कर सकेंगे। अगर एक भी धारणा कम है तो फिर विश्वपति नहीं बन सकेंगे। समझा। तो इन तीनों गुणों की अपने में सम्पूर्ण धारणा की है? तीनों में से एक भी छूटे नहीं तब शूरवीर का जो नाम दिया है वह कार्य कर सकेंगी? तीनों की प्रतिज्ञा की है? त्याग किसका करेंगे? सभी से बड़े से बड़ा त्याग क्या है? अब सर्विस पर उपस्थित हो रही हो तो उसके लिए मुख्य यही धारणा रखना है कि मैं पन का त्याग। मैंने किया, मैं यह जानती हूँ, मैं यह कर सकती हूँ, यह मैं पन का जो अभिमान है उसका त्याग करना है। मैं के बजाय बापदादा की सुनाई हुई ज्ञान की बातों को वर्णन करो। मैं यह जानती हूँ। नहीं। बापदादा द्वारा यह जाना है। ज्ञान में चलने के बाद जो स्व अभिमान आ जाता हैं, उसका भी त्याग। जब इतनी त्याग की वृत्ति और दृष्टि होगी तब सदैव स्मृति में बाप और दादा रहेगा और मुख पर भी यही बोल रहेंगे। समझा। तब विश्वपति बन सकेंगी। विश्व की सर्विस कर सकेंगी।

अपनी धारणा को अविनाशी बनाने के लिए वा सदा कायम रखने के लिए दो बातें याद रखनी है। कौन सी? विशेष कन्याओं के लिए हैं। एक तो सभी बातों में सिम्पल रहना और अपने को सैम्पल समझना। जैसे आप सैम्पल बन दिखायेंगे वैसे ही अनेक आत्माएं भी यह सौदा करने के लिए पात्र बनेंगी। इसलिए यह दो बातें सदैव याद रखो। अपने को ऐसा श्रेष्ठ सैम्पल बनाया है? जो अच्छा सैम्पल निकलता है उनको फिर छाप भी लगाई जाती है। आप कौन सी छाप लगाकर जाएँगी, जो कभी मिटे नहीं? शिवशक्तियां और ब्रह्माकुमारियाँ। साकार में दो निमित्त बनी हुई बड़ी अथॉरिटी यह छाप लगा रही हैं। इसलिए यह याद रखना कि मिटेंगे लेकिन कब हटेंगे नहीं। संस्कारों में, चाहे सर्विस में, चाहे सम्बन्ध में सर्व बातों में अपने को मिटायेंगे लेकिन हटेंगे नहीं। हटना कमजोरी का काम है। शिवशक्तियाँ अपने को मिटाती हैं न कि हटती हैं। तो यह बातें याद रखनी हैं। फिर इस ग्रुप का प्रैक्टिकल पेपर कब होगा? अभी का रिजल्ट फाइनल का नहीं हैं। अभी तो पेपर देने के लिए जा रहे हो। फिर उसकी रिजल्ट देखेंगे। यह ग्रुप आगे कदम बढ़ा सकता है। बापदादा ऐसी उम्मीद रखते हैं। इसलिए अब ऐसा समझो कि जो भी कर्मबन्धन हैं उसको बहुत जल्दी काटकर फिर मधुबन में सम्पूर्ण समर्पण का समारोह मनाने आना है। इस लक्ष्य से जाना है। फिर इस ग्रुप से कितनों का सम्पूर्ण समर्पण का समारोह होता है। आज तो महाबली बनने की बातें सुनाई हैं। फिर महाबली चढ़ने के लिए आयेंगे तो बाप-दादा खूब सजायेंगे।सजाकर फिर स्वाहा करना होता है। जितना बाप-दादा के स्नेही उतना फिर सहयोगी भी बनना है। सहयोगी तब बनेंगे जब अपने में सर्वशक्तियों को धारण करेंगे। फिर स्वाहा होना सहज होगा। जो भी कोई शक्ति की कमी हो तो वह आज के दिन ही अपने में भरकर जाना। कोई भी कमी साथ ले न जाना। अभी सिर्फ हिसाब-किताब चुक्तू करने जाते हो। सर्वशक्तियां अपने में भरकर जायेंगे तब चुक्तू कर सकेंगे ना। तो अब फाइनल पेपर के नंबर्स तो जब प्रैक्टिकल कर दिखायेंगे तब निकलेंगे।

अच्छा !!!


18-06-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


वृद्धि के लिए टाइमटेबुल की विधि” 

बापदादा एक सेकंड में अव्यक्त से व्यक्त में आ गया वैसे ही बच्चे भी एक सेकंड में व्यक्त से अव्यक्त हो सकते हैं? जैसे जब चाहे तब मुख से बोले, जब चाहे तब मुख को बंद कर दें। ऐसे होता है ना। वैसे ही बुद्धि को भी जब चाहें तब चलायें, जब न चाहें तब न चले। ऐसा अभ्यास अपना समझते हो? मुख का ओर्गन्स कुछ मोटा है, बुद्धि मुख से सूक्ष्म है। लेकिन मुख के माफिक बुद्धि को जब चाहो तब चलाओ, जब चाहो तब न चलाओ। ऐसा अभ्यास है? यह ड्रिल जानते हो? अगर इस बात का अभ्यास मजबूत होगा तो अपनी स्थिति भी मजबूत बना सकेंगे। यह है अपनी स्थिति की वृद्धि की विधि। कई बच्चों का संकल्प है वृद्धि कैसे हो? वृद्धि विधि से होती है। अगर विधि नहीं जानते हो तो वृद्धि भी नहीं होगी। आज बापदादा हरेक की वृद्धि और विधि दोनों देख रहे हैं। अब बताओ क्या दृश्य देखा होगा? हरेक अपने आप से पूछे और देखें कि वृद्धि हो रही है? (बहुतों ने हाथ उठाया) मैजारिटी अपनी वृद्धि से संतुष्ट हैं। अच्छा सारे दिन में अव्यक्त स्थिति कितना समय रहती है? बिन्दी रूप के लिए नहीं पूछते हैं। अव्यक्त स्थिति कितना समय रहती है? बापदादा सम्पूर्ण स्टेज को सामने रख पूछते हैं और आप अपने पास्ट के पुरुषार्थ को सामने रख सोचते हो कितना फ़र्क हो गया। वर्तमान समय पढ़ाई की मुख्य सब्जेक्ट्स कौन सी चल रही है? मुख्य सब्जेक्ट यह पढ़ रहे हो कि ज्यादा से ज्यादा अव्यक्त स्थिति बने। तो मुख्य सब्जेक्ट में रिजल्ट तो कम है। निरंतर याद में रहने की सम्पूर्ण स्टेज के आगे एक दो घंटा क्या है। इनसे ज्यादा अपनी अव्यक्त स्थिति बनाने की विधि बुद्धि में है? अगर विधि है तो वृद्धि क्यों नहीं होती है, कारण? विधि का ज्ञान सारा स्पष्ट बुद्धि में आता है, लेकिन एक बात नहीं आती, जिस कारण विधि का मालूम होते भी वृद्धि नहीं होती है। वह कौन सी बात है। अच्छा, आज वृद्धि कैसे हो उस पर सुनाते हैं। एक बात जो नहीं आती वह यह है कि विस्तार करना और विस्तार में जाना आता है लेकिन विस्तार को जब चाहें तब समेटना और समा लेना यह प्रैक्टिस कम है। ज्ञान के विस्तार में आना भी जानते हो लेकिन ज्ञान के विस्तार को समाकर ज्ञान स्वरुप बन जाना, बीज रूप बन जाना इसकी प्रैक्टिस कम है। विस्तार में जाने से टाइम बहुत व्यर्थ जाता है और संकल्प भी व्यर्थ जाते हैं। इसलिए जो शक्ति जमा होनी चाहिए, वह नहीं होती, इसके लिए क्या प्लेन रचो, वह आज सुनते हैं।

सारे विश्व में बड़े से बड़े कौन हैं (हम ब्राह्मण) बड़े से बड़े आदमी क्या करते हैं? आज कल के जो बड़े आदमी हैं वह क्या साधन अपनाते हैं जिससे बड़े-बड़े कार्य में सफलता पाते हैं? वह पहले अपने समय को सेट करते हैं। अपना टाइम टेबुल बनाते हैं। जितना बहुत बिजी होगा उतना उसका एक एक घंटे का टाइम टेबुल बनाते हैं। अगर टाइम टेबुल नहीं होगा तो टाइम को सफल नहीं कर सकेंगे। टाइम को सफल नहीं करेंगे तो कार्य भी सफल नहीं होगा। इसलिए आजकल के बड़े आदमी हर समय का टाइम टेबुल बनाते हैं। अपनी डायरी में नोट रखते हैं। जब आप ब्राह्मण बड़े से बड़े हो तो आप अपना टाइम टेबुल रखते हो? यह एक विधि है। जैसे वह लोग सवेरे दिन आरम्भ होते ही टाइम टेबुल बनाते हैं। इस रीति आप हरेक अमृतवेले से ही टाइम टेबुल बनाओ कि आज के दिन क्या-क्या करना है? जैसे शारीरिक कार्य का टाइम टेबुल बना है वैसे आत्मा की उन्नति का भी टाइम टेबुल बनाओ। समझा। इसमें अटेंशन और चेकिंग कम है। अब ऐसा टाइम टेबुल बनाओ। जैसे वह लोग अपने प्लैन बनाते हैं। आज के दिन इतने कार्य समाप्त करने हैं इस रीति आज के दिन अव्यक्त स्थिति का इतना परसेंट और इतना समय निकालना है। टाइम प्रमाण चलने से एक ही दिन में अनेक कार्य कर सकते हैं। टाइम टेबुल नहीं होगा तो अनेक कार्य नहीं कर सकेंगे। तो अपनी डायरी बनाओ। जैसे एक घंटे का स्थूल कार्य बना हुआ है इस रीति आत्मा की उन्नति का कार्य नोट करो। प्लैन बनाओ। फिर जैसे स्थूल कार्य करने के बाद उस पर राईट डालते हो ना। यह हो चुका, यह नहीं हुआ। इस रीति जो भी प्लैन बनाते हो वह कहाँ तक प्रैक्टिकल में हुआ, वा नहीं हुआ, न होने का कारण और साथ उसका निवारण का साधन सोचकर आगे चढ़ते जाओ। आज के दिन यह करके ही छोड़ूंगा। ऐसे-ऐसे पहले से प्रतिज्ञा करो। कोई भी कार्य के लिए पहले प्रतिज्ञा होती है फिर प्लैन होता है। फिर होता है प्रैक्टिकल। और प्रैक्टिकल के बाद फिर होती है चेकिंग कि यह हुआ यह नहीं हुआ। चेकिंग के बात जो बीती सो बीती। आगे उन्नति का साधन रखते हैं। जैसे आप लोगों ने नए विद्यार्थियों के लिए साप्ताहिक पाठ्यक्रम बनाया है ना। तो आत्मा की उन्नति के लिए भी साप्ताहिक प्लैन बना सकते हो। जैसे यहाँ मधुबन में जब आते हो तो कुछ छोड़ करके जाते हो, कुछ भर कर जाते हो। इस रीति से हर दिन कुछ छोड़ो और कुछ भरो। जब इतना अटेंशन रखेंगे तब समय के पहले सम्पूर्ण बन सकेंगे। समय के अनुसार अगर सम्पूर्ण बनें तो उसकी इतनी प्राप्ति नहीं होती है। समय के पहले सम्पूर्ण बनना है। सम्पूर्णता क्या चीज़ है, उसका अनुभव करेंगे ईश्वरीय अतीन्द्रिय सुख निरन्तर क्या होता है, उसका अनुभव यहाँ ही करना है। अब देखेंगे कि कायदे मुजिब कैसे अपना टाइम टेबुल वा साप्ताहिक कार्यक्रम बनाते हो।

जितना जो सेन्सिबुल होते हैं वह ऐसे कार्य यथार्थ रीति से कर सकते हैं। सभी से सेन्सिबुल हैं ब्राह्मण। देवताओं से भी सेन्सिबुल ब्राह्मण हैं। तो कितना सेन्सिबुल बने हैं, उसकी परख होगी। सेन्स के साथ इसेन्स भी निकालना सीखना है। इसेन्स बहुत थोड़ा होता है। और जिसकी इसेन्स निकालते हैं वह बहुत विस्तार होता है। तो सेन्स भी अच्छा चाहिए और इसेन्स निकालने भी आना चाहिए। कोई कोई में सेन्स बहुत है, लेकिन इसेन्स में टिकना नहीं आता है। तो दोनों ही अभ्यास चाहिए। सुनाया था ना कि आप लोग भी नेचर क्योर करने वाले हो। नेचर अर्थात् संस्कार। जब पुरुषार्थ नहीं कर पाते हो तो दोष रखते हो नेचर पर। हमारी नेचर ऐसी है। नेचर पर दोष रख अपने को हल्का कर देते हो। लेकिन नहीं। आप लोगों का कर्तव्य ही है नेचर क्योर करना। वह नेचर क्योर वाले फ़ास्ट रखाते हैं। तो आप लोगों को अब क्या करना है? फ़ास्ट जाना है। लास्ट नहीं रहना है। फ़ास्ट जाने के लिए फ़ास्ट रखो। कौन सी फ़ास्ट? टाइम टेबुल बनाओ। आज इस बात की फ़ास्ट रखेंगे। प्रतिज्ञा करो। जैसे वह लोग कब कोई चीज़ की फ़ास्ट रखते हैं, वैसे आप लोग भी हर रोज़ कोई न कोई कमी की बात नोट करो। वह लोग भी जो चीज़ नुकसानकारक है उसके लिए फ़ास्ट रखते हैं। तो पुरुषार्थ में जो भी नुकसानकारक बातें हैं उनकी फ़ास्ट रखो फिर उसको चेक भी करो। कई व्रत रखते हैं, उपवास रखते हैं। लेकिन कर नहीं पाते तो बीच में खा भी लेते हैं। यहाँ भी ऐसे करते हैं। जैसे भक्ति मार्ग की आदत पड़ी हुई है। सुबह को प्रतिज्ञा करते हैं कि यह नहीं करेंगे फिर दिन आरम्भ हुआ तो वह प्रतिज्ञा ख़त्म। यहाँ भी ऐसे सुबह को प्रतिज्ञा करते हैं फिर कह देते समस्या ऐसी आ गई है। समस्या समाप्त होगी तो फिर करूँगा। अब वह संस्कार ख़त्म करो। समेटना और समाना सीखो। पुराने संस्कार समाना हैं। उसकी प्रतिज्ञा करो वा फ़ास्ट रखो, बड़े आदमियों के पहले से ही प्रोग्राम फिक्स होते हैं ना। आप लोग तो सभी से बड़े हो। तो अपना प्रोग्राम भी 6 मास का फिक्स करो। यह कार्य करके ही छोडूंगा। बन कर ही छोडूंगा जब इतना निश्चयबुद्धि बनेंगे तब विजयी बनेंगे। बाप में तो निश्चय है लेकिन अपने में भी निश्चयबुद्धि होकर कार्य करो तो फिर विजय ही विजय है। विजय के आगे समस्या कोई चीज़ नहीं है। फिर वह समस्या नहीं फील होगी लेकिन खेल फील होगा। खेल ख़ुशी से किया जाता है।

कोई कार्य सहज होता है तो आप लोग कहते हो ना यह तो बाएँ हाथ का खेल है अर्थात् सहज है। तो यह भी बुद्धि का खेल हो जायेगा। खेल में घबराएंगे नहीं। बड़े से बड़े हो तो बड़े से बड़ी स्थिति भी बनाओ। कई बड़े आदमी ऐसे होते हैं जो अपने बड़ेपन में ठहरना नहीं आता है। आप लोग ऐसे नहीं बनना। जितने बड़े हो उतना ही बड़ी स्थिति भी दिखलाओ। बड़ा कार्य करके दिखाओ। कम से कम आठ घंटे का लक्ष्य रखना है। अव्यक्त स्थिति के लिए कह रहे हैं। अव्यक्त स्थिति आठ घंटा बनाना बड़ी बात नहीं। अव्यक्त की स्मृति अर्थात् अव्यक्त स्थिति। बाप की दो घंटे याद क्यों? दो घंटे बाप की याद रही तो बाकी समय क्या किया? बाप के स्नेही हो वा माया के? जिससे स्नेह होता है, स्नेह अर्थात् संपर्क। जिससे संपर्क होता है तो उन जैसे संस्कार ज़रूर भरेंगे। संस्कार मिलने के आधार से ही संपर्क होता है ना। तो अगर बाप के स्नेही हो, संपर्क भी है तो संस्कार क्यों नहीं मिलते? फिर बापदादा कहेंगे कि माया के स्नेही हो। अगर दो घंटे बाप के स्नेही और 22 घंटा माया के स्नेही रहते हो तो क्या कहेंगे? सर्विस करते भी स्नेह को, संपर्क को न छोड़ो। सम्पूर्ण स्टेज तो नजदीक रहने की है। एक गीत भी है नान वो हम से जुदा होंगे। जब जुदा ही नहीं होंगे तो स्नेह दिल से कैसे निकलेगा। तो होना निरंतर चाहिए। परन्तु पुरुषार्थी के कारण फिर भी मार्जिन देते हैं। तो कम से कम 8 घंटे का लक्ष्य रखकर डायरी बनाओ, टाइम टेबुल बनाओ फिर रिजल्ट भी देखेंगे हर सप्ताह की रिजल्ट अपनी ब्राह्मणी से चेक कराओ। और हर सप्ताह की रिजल्ट इकट्ठी कर एक मास की रिजल्ट मधुबन आनी चाहिए। ब्राह्मणियों को काम करना चाहिए। हर सप्ताह की डायरी हरेक की चेक करो। क्या टाइम टेबुल बनाया। उसमें कहाँ तक सफल हुए। फिर शार्ट में एक मास की रिजल्ट मधुबन भेजनी है। अभी अलबेलेपन का समय नहीं है। बहुत समय अलबेला पुरुषार्थ किया। अब जो किया सो किया। फिर यह स्लोगन याद दिलाएंगे। जो आप लोग औरों को सुनाते होअब नहीं तो कब नहीं। अगर अब न करेंगे तो फिर कब करेंगे। फिर कब हो नहीं सकेगा। इसलिए स्लोगन भी याद रखना हर दिन का अलग-अलग अपने प्रति स्लोगन भी सामने रख सकते हो। जैसे यह स्लोगन है कि जो कर्म में करूँगा मुझे देख और करेंगे। इस रीति दूसरे दिन फिर दूसरा स्लोगन सामने रखो। जैसे बापदादा ने सुनाया कि सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। यह भी सुनाया था कि मिटेंगे लेकिन हटेंगे नहीं। इसी प्रकार हर रोज़ का कोई न कोई स्लोगन सामने रखो और उस स्लोगन को प्रैक्टिकल में लाओ। फिर देखो अव्यक्त स्थिति कितनी जल्दी हो जाती है।

फरिश्तों को फर्श की कभी आकर्षण नहीं होती है। अभी अभी आया और गया। कार्य समाप्त हुआ फिर ठहरते नहीं। आप लोगों ने भी कार्य के लिए व्यक्त का आधार लिया, कार्य समाप्त किया फिर अव्यक्त एक सेकंड में। यह प्रैक्टिस हो जाये फिर फ़रिश्ते कहलायेंगे।

अच्छा !!!


19-06-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार” 

ब्राह्मणों को त्रिमूर्ति शिव वंशी कहते हो ना। त्रिमूर्ति बाप के बच्चे स्वयं भी त्रिमूर्ति हैं। बाप भी त्रिमूर्ति है। जैसे बाप त्रिमूर्ति है वैसे आप भी त्रिमूर्ति हो? तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार की आती है? वह मालूम है कौन सी है, जो ब्राह्मणों के तीन प्रकार की लाइट्स साक्षात्कार होते रहते हैं? आप लोगों से लाइट का साक्षात्कार होता मालूम पड़ता है? त्रिमूर्तिवंशी त्रिमूर्ति बच्चों की तीन प्रकार की लाइट्स का साक्षात्कार होता है। वह कौन सी लाइट्स हैं? एक तो लाइट का साक्षात्कार होता है नयनों से। कहते हैं ना कि नयनों की ज्योति। नयन ऐसे दिखाई पड़ेंगे जैसे नयनों में दो बड़े बल्ब जल रहे हैं। दूसरी होती है मस्तक की लाइट। तीसरी होती हैं माथे पर लाइट का क्राउन। अभी यह कोशिश करना है जो तीनों ही लाइट्स का साक्षात्कार हो। कोई भी सामने आये तो उनको यह नयन बल्ब दिखाई पड़े। ज्योति ही ज्योति दिखाई दें। जैसे अंधियारे में सच्चे हीरे चमकते हैं ना। जैसे सर्च लाइट होती है, बहुत फ़ोर्स से और अच्छी रीति फैलाते हैंइस रीति से मस्तक के लाइट्स का साक्षात्कार होगा। और माथे पर जो लाइट का क्राउन है वह तो समझते हो। ऐसे त्रिमूर्ति लाइट्स का साक्षात्कार एक-एक से होना है। तब कहेंगे यह तो जैसे फ़रिश्ता है। साकार में नयन, मस्तक और माथे के क्राउन के साक्षात्कार स्पष्ट होंगे।

नयनों तरफ देखते-देखते लाइट देखेंगे। तुम्हारी लाइट को देख दूसरे भी जैसे लाइट हो जायेंगे। कितनी भी मन से वा स्थिति में भारीपन हो लेकिन आने से ही हल्का हो जाए। ऐसी स्टेज अब पकडनी है। क्योंकि आप लोगों को देखकर और सभी भी अपनी स्थिति ऐसी करेंगे। अभी से ही अपना गायन सुनेंगे। द्वापर का गायन कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन ऐसे साक्षात्कारमूर्त और साक्षात् मूर्त बनने से अभी का गायन अपना सुनेंगे। आप के आगे आने से लाइट ही लाइट देखने में आये। ऐसे होना है। मधुबन ही लाइट का घर हो जायेगा। यह दीवे आदि देखते भी जैसे कि नहीं देखेंगे। जैसे वतन में लाइट ही लाइट देखने में आती है वैसे यह स्थूल वतन लाइट का हाउस हो जायेगा। जब आप चैतन्य लाइट हाउस हो जायेंगे तो फिर या मधुबन भी लाइट हाउस हो जायेगा। अभी यह है लास्ट पढ़ाई की लास्ट सब्जेक्टप्रैक्टिकल में। थ्योरी का कोर्स समाप्त हुआ। प्रैक्टिकल, कोर्स की लास्ट सब्जेक्ट हैं। इस लास्ट सब्जेक्ट में बहुत फ़ास्ट पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसी स्टेज के लिए ही गायन है।

बापदादा से कब विदाई नहीं होती है। माया से विदाई होती है। बापदादा से तो मिलन होता है। यह थोड़े समय का मिलन सदा का मिलन करने के निमित्त बन जाता है। बाप के साथ गुण और कर्तव्य मिलना यही मिलन है। यही प्रयत्न सदैव करते रहना है। अच्छा।

संकल्पों को ब्रेक लगाने का मुख्य साधन कौन सा है? मालूम है? जो भी कार्य करते हो तो करने के पहले सोचकर फिर कार्य शुरू करो। जो कार्य करने जा रहा हूँ वह बापदादा का कार्य है, मैं निमित्त हूँ। जब कार्य समाप्त करते हो तो जैसे यज्ञ रचा जाता है तो समाप्ति समय आहुति दी जाती है। इस रीति जो कर्तव्य किया और जो परिणाम निकला। वह बाप को समर्पण, स्वाहा कर दिया फिर कोई संकल्प नहीं। निमित्त बन कार्य किया और जब कार्य समाप्त हुआ तो स्वाहा किया। फिर संकल्प क्या चलेगा? जैसे आग में चीज़ डाली जाती है तो फिर नाम निशान नहीं रहता वैसे हर चीज़ की समाप्ति में सम्पूर्ण स्वाहा करना है। फिर आपकी जिम्मेवारी नहीं। जिसके अर्पण हुए फिर जिम्मेवार वह हो जाते हैं। फिर संकल्प काहे का। जैसे घर में कोई बड़ा होता है तो जो भी काम किया जाता है तो बड़े को सुनाकर खाली हो जायेंगे। वैसे ही जो कार्य किया, समाचार दिया, बस। अव्यक्त रूप को सामने रख यह करके देखो। जितना जो सहयोगी बनता है उनको एक्स्ट्रा सहयोग देना पड़ता है। जैसे अपनी आत्मा की उन्नति के लिए सोचते हैं इस रीति शुद्ध भावना, शुभ चिन्तक और शुभ चिंतन के रूप में एक्स्ट्रा मदद, दोनों रूप से किसी भी आत्मा को विशेष सहयोग दे सकते हो। देना चाहिए। इससे बहुत मदद मिलती है। जैसे कोई गरीब को अचानक बिगर मेहनत प्राप्ति हो जाती है, उस रीति जिस भी आत्मा के प्रति एक्स्ट्रा सहयोग दिया जाता है वह आत्मा भी महसूस करती है हमको विशेष मदद मिली है। साकार रूप में भी एक्स्ट्रा कोई आत्मा को सहयोग दने का साबुत करके दिखाया ना। उस आत्मा को स्वयं भी अनुभव हुआ। यस सर्विस करके दिखानी है। जितना-जितना आप सूक्ष्म होते जायेंगे उतना यह सूक्ष्म सर्विस भी बढती जाएगी। स्थूल के साथ सूक्ष्म का प्रभाव जल्दी पड़ता है और सदा काल के लिए। बापदादा भी विशेष सहयोग देते हैं। एक्स्ट्रा मदद का अनुभव होगा। मेहनत कम प्राप्ति अधिक। अच्छा।

बापदादा बच्चों से जितना अविनाशी स्नेह करते हैं उतना बच्चे अविनाशी स्नेह रखते हैं? यह अविनाशी स्नेह यही एक धागा है जो 21 जन्मों के बंधन को जोड़ता है। सो भी अटूट स्नेह। जितना पक्का धागा होता है उतना ही ज्यादा समय चलता है। यह संगम का समय 21 जन्मों को जोड़ता है। इस संगम के युग का एकएक संकल्प एक-एक कर्म 21 जन्म के बैंक में जमा होता है। इतना अटेंशन रखकर फिर संकल्प भी करना। जो करूँगा वह जमा होगा। तो कितना जमा होगा। एक संकल्प भी व्यर्थ न हो। एक संकल्प भी व्यर्थ हुआ तो जमा कट हो जाता है। तो जमा जब करना होता है तो एक भी व्यर्थ न हो। कितना पुरुषार्थ करना है! संकल्प भी व्यर्थ न जाए। समय तो छोड़ो। अब पुरुषार्थ इस सीमा पर पहुँच रहा है। जैसे पढ़ाई दिन प्रतिदिन ऊँची होती जाती है तो यह भी ऐसे है। बड़े क्लास में पढ़ रहे हो ना।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

25-06-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


व्यक्त और अव्यक्त वतन की भाषा में अंतर 

व्यक्त लोक में रहते अव्यक्त वतन की भाषा को जान सकते हो? अव्यक्त वतन की भाषा कौन सी होती है? कब अव्यक्त वतन की भाषा सुनी है? अभी तो अव्यक्त को व्यक्त लोक के निवासियों के लिए अव्यक्त आधार ले व्यक्त देख की रीति माफिक बोलना पड़ता है । वहाँ अव्यक्त वतन में तो एक सेकंड में बहुत कुछ रहस्य स्पष्ट हो जाते हैं । यहाँ आप की दुनिया में बहुत बोलने के बाद स्पष्ट होता है । यह है फ़र्क व्यक्त भाषा और अव्यक्त बापदादा के इशारों से यह समझ सकते हो कि आज बापदादा क्या देख रहे हैं? जैसे साइंस द्वारा कहाँ-कहाँ बातें, कहाँ कहाँ के दृश्य कैच कर सकते हैं । वैसे आप लोग अव्यक्त स्थिति के आधार से सम्मुख की बातों को कैच नहीं कर सकते हो? तीन बातें देख रहे हैं । वह कौन सी? बापदादा आज यही देख रहे हैं कि हरेक कहाँ तक चेकर बना है और चेकर के साथ मेकर कहाँ तक बने हैं । जितना जो चेकर होगा उतना मेकर बन सकता है । इस समय आप लॉ मेकर भी हो और न्यू वर्ल्ड के मेकर भी हो और पीस मेकर भी हो । लेकिन मेकर के साथ चेकर ज़रूर बनना है । विशेष क्या चेक करना है? यही सर्विस अब रही हुई है जिससे नाम बाला होना है । वह चेकर्स क्या चेक करे हैं? एडल्टरेशन करने वाले जो हैं उन्हों के पास ऑलमाइटी गवर्नमेंट का चेकर बनकर जाओ । जैसे उस गवर्नमेंट के चेकर्स व इंस्पेक्टर्स कोई के पास जाते हैं तो वह अपना भेद बता नहीं देते हैं । इस रीति से पाण्डव गवर्नमेंट के अथॉरिटी से चेकर्स बनकर जाओ । जो वह देखने से ही अपनी करप्शन, एडल्टरेशन से घबराएंगे और फिर सिर झुकायेंगे । अब यह सर्विस रही हुई है । इससे ही नाम बाला होना है । एक ने भी सिर झुकाया तो अनेकों के सिर झुक जायेंगे । पाण्डव गवर्नमेंट की अथॉरिटी बनकर जाना और ललकार करना । अब समझा । अपना भी चेकर बनना है और सर्विस में भी । जो जितना चेकर और मेकर बनता है वही फिर रूलर भी बनता है । तो कहाँ तक चेकर बने हैं और मेकर्स बने हैं और कहाँ तक रूलर्स बने हैं । यह बातें एक-एक की देख रहे हैं ।
जब अपने को इन तीन रूपों में स्थित करेंगे तो फिर छोटी-छोटी बातों में समय नहीं जायेगा । जब है ही औरों के भी करप्शन, एडल्टरेशन चेक करनेवाले तो अपने पास फिर करप्शन, एडल्टरेशन रह सकती है? तो यह नशा रहना चाहिए कि हम इन तीनों ही स्थितियों में कहाँ तक स्थित रह सकते हैं । रूलर्स जो होते हैं वह किसके अधीन नहीं होते हैं । अधिकारी होते हैं । वह कब किसके अधीन नहीं हो सकते । तो फिर माया के अधीन कैसे होंगे? अधिकार को भूलने से अधिकारी नहीं समझते । अधिकारी न समझने से अधीन हो जाते हैं । जितना अपने को अधिकारी समझेंगे उतना उदारचित्त ज़रूर बनेंगे । जितना उदार चित्त बनता उतना वह उदाहरण स्वरुप बनता है – अनेकों के लिए । उदारचित्त बनने के लिए अधिकारी बनना पड़े । अधिकारी का अर्थ ही है की अधिकार सदैव याद रहे । तो फिर उदाहरण स्वरुप बनेंगे । जैसे बापदादा उदाहरण रूप बने । वैसे आप सभी भी अनेकों के लिए उदाहरण रूप बनेंगे । उदारचित्त रहने वाला भी उदाहरण भी बनता और अनेकों का सहज ही उद्धार भी कर सकता है । समझा । जब कोई में माया प्रवेश करती है तो पहले किस रूप में माया आती है? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) पहले माया भिन्न-भिन्न रूप से आलस्य ही लाती है । देह अभिमान में भी पहला रूप आलस्य का धारण करती है । उस समय श्रीमत लेकर वेरीफाई कराने का आलस्य करते हैं फिर देह अभिमान बढ़ता जाता है और सभीं बातों में भिन्न-भिन्न रूप से पहले आलस्य रूप आता है । आलस्य, सुस्ती और उदासी ईश्वरीय सम्बन्ध से दूर कर देती है । साकार सम्बन्ध से वा बुद्धि के सम्बन्ध से वा सहयोग लेने के सम्बन्ध से दूर कर देती है । इस सुस्ती आने के बाद फिर विकराल रूप क्या होता है? देह अहंकार में प्रत्यक्ष रूप में आ जाते हैं । पहले छठे विकार से शुरू होते हैं । ज्ञानी तू आत्मा वत्सों में लास्ट नंबर अर्थात् सुस्ती के रूप से शुरू होती है । सुस्ती में फिर कैसे संकल्प उठेंगे । वर्तमान इसी रूप से माया की प्रवेशता होती है । इस पर बहुत ध्यान देना है । इस छठे रूप में माया भिन्न-भिन्न प्रकार से आने की कोशिश करती है । सुस्ती के भी भिन्न-भिन्न रूप होते हैं । शारीरिक, मानसिक, दोनों सम्बन्ध में भी माया आ सकती है । कई सोचते हैं चलो अब नहीं तो फिर कब यह कर लेंगे । जल्दी क्या पड़ी है । ऐसे-ऐसे बहुत रॉयल रूप से माया आती है । कई यह भी सोचते हैं कि अव्यक्त स्थिति इस पुरुषार्थी जीवन में 6-8 घंटा रहे, यह हो ही कैसे सकता है । यह तो अन्त में होना है । यह भी सुस्ती का रॉयल रूप है । फिर करूँगा, सोचूंगा, देखूंगा यह सब सुस्ती है । अब इसके चेकर बनो । कोई को भी रॉयल रूप में माया पीछे हटती तो नहीं है? प्रवृत्ति की पालना तो करना ही है । लेकिन प्रवृत्ति में रहते वैराग्य वृत्ति में रहना है, यह भूल जाता है । आधी बात याद रहती है, आधी बात छोड़ देते हैं । बहुत सूक्ष्म संकल्पों के रूप में पहले सुस्ती प्रवेश करती है । इसके बाद फिर बड़ा रूप लेती है ।
अगर उसी समय ही उनको निकाल दें तो ज्यादा सामना न करना पड़े । तो अब यह चेक करना है कि तीव्र पुरुषार्थी बनने में वा हाई जम्प देने में किस रूप में माया सुस्त बनाती है । माया का जो बाहरी रूप है उनको तो चेक करते हो लेकिन इस रूप को चेक करना है । कई यह भी सोचते हैं कि फिक्स सीट्स ही कम है । तो औरों को आगे पुरुषार्थ में देख अपनी बुद्धि में सोच लेते हैं कि इतना आगे हम जा नहीं सकेंगे । इतना ही ठीक है । यह भी सुस्ती का रूप है । तो इन सभी बातों में अपने को चेंज कर लेना है । तब ही लॉ मेकर्स वा पीस मेकर्स बन सकेंगे । वा न्यू वर्ल्ड मेकर्स बन सकेंगे । पहले स्वयं हो ही न्यू नहीं बनायेंगे तो न्यू वर्ल्ड मेकर्स कैसे बनेंगे । पहले तो खुद को बनाना है ना । पुरुषार्थ में तीव्रता लाने का तरीका मालूम है । फिर उसमें ठहरते क्यों नहीं हो । जब तक अपने आप से कोई प्रतिज्ञा नहीं की है तब तक परिपक्वता आ नहीं सकेगी । जब तक यहाँ फिक्स नहीं करेंगे तब तक वहाँ सीट्स फिक्स नहीं होंगी । तो अब बताओ पुरुषार्थ में तीव्रता कब लायेंगे?(अभी से) म्यूजियम वा प्रदर्शनी में जो स्लोगन सभी को सुनाते हो ना कि ‘अब नहीं तो कब नहीं’ । वह अपने लिए भी याद रखो । कब कर लेंगे ऐसा न सोचो । अभी बनकर दिखायेंगे । जितना प्रतिज्ञा करेंगे उतनी परिपक्वता वा हिम्मत आएगी और फिर सहयोग भी मिलेगा ।
आप पुराने हो इसलिए आप को सामने रख समझा रहे हैं । सामने कौन रखा जाता है? जो स्नेही होता है । स्नेहियों को कहने में कभी संकोच नहीं आता है । एक-एक ऐसे स्नेही हैं । सभी सोचते हैं बाबा बड़ा आवाज़ क्यों नहीं करते हैं । लेकिन बहुत समय के संस्कार से अव्यक्त रूप से व्यक्त में आते हैं तो आवाज़ से बोलना जैसे अच्छा नहीं लगता है । आप लोगों को भी धीरे-धीरे आवाज़ से परे इशारों पर कारोबार चलानी है । यह प्रैक्टिस करनी है । समझा । बापदादा बुद्धि की ड्रिल कराने आते हैं जिससे परखने की और दूरांदेशी बनने की क्वालिफिकेशन इमर्ज रूप में आ जाये । क्योंकि आगे चल करके ऐसी सर्विस होगी जिसमे दूरांदेशी बुद्धि और निर्णयशक्ति बहुत चाहिए । इसलिए यह ड्रिल करा रहे हैं । फिर पावरफुल हो जाएँगी । ड्रिल से शरीर भी बलवान होता है । तो यह बुद्धि की ड्रिल से बुद्धि शक्तिशाली होगी । जितनी-जितनी अपनी सीट फिक्स करेंगे समय भी फिक्स करेंगे तो अपना प्रवृत्ति का कार्य भी फिक्स कर सकेंगे । दोनों लाभ होंगे । जितनी बुद्धि फिक्स रहती है तो प्रोग्राम भी सभी फिक्स रहते हैं । प्रग्राम फिक्स तो प्रोग्राम फिक्स । प्रोग्रेस हिलती है तो प्रोग्राम भी हिलते हैं अब फिक्स करना सीखो । अब सम्पूर्ण बनकर औरों को भी सम्पूर्ण बनाना बाकी रह गया है । जो बनता है वह फिर सबूत भी देता है । अभी बनाने का सबूत देना है । बाकी इस कार्य के लिए व्यक्त देश में रहना है ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

26-06-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


कामधेनु का अर्थ 

अपने को साक्षात्कार मूर्त समझती हो? मूर्ति के पास किसलिए जाते हैं? अपने मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए । ऐसे साक्षात्कार मूर्त बने हो जो कोई आत्मा में किसी भी प्रकार की कामनाएं हों, उनकी पूर्ति कर सको । अल्पकाल की कामनाएं नहीं, सदाकाल की कामनाएं पूरी कर सकती हो? कामधेनु माताओं को कहा जाता है ना । कामधेनु का अर्थ ही है – सर्व की मनोकामनाएं पूरी करनेवाली । जिसकी अपनी सर्व कामनाएं पूरी होंगी, वही औरों की कामनाएं पूरी कर सकेंगी । सदैव यही लक्ष्य रखो कि हमको सर्व की कामनाएं पूर्ण करनेवाली मूर्ति बनना है । सर्व की इच्छाएं पूर्ण करने वाले स्वयं इच्छा मात्रं अविद्या होंगे । ऐसा अभ्यास करना है । प्राप्ति स्वरुप बनने से औरों को प्राप्ति करा सकते हो । तो सदैव अपने को दाता अथवा महादानी समझना है । महाज्ञानी बनने के बाद महादानी का कर्तव्य चलता है । महाज्ञानी की परख महादानी बनने से होती है । सैर करना अच्छा लगता है । जिन्हों को सैर करने की आदत होती है, वह सदैव सैर करते हैं । यहाँ भी ऐसे है । जितना स्वयं सैर करेंगे उतना औरों को भी बुद्धियोग से सैर कराएँगे । आप लोगों से साक्षात्कार होना है । जैसे साकार रूप के सामने आने से हरेक को भावना अनुसार साक्षात्कार वा अनुभव होता था । ऐसे आप लोगों द्वारा भी सेकंड बाई सेकंड अनेक अनुभव वा साक्षात्कार होंगे । ऐसे दर्शनीय मूर्त वा साक्षात्कार मूर्त तब बनेंगे जब अव्यक्त आकृति रूप दिखायेंगे । कोई भी सामने आये तो उसे शरीर न दिखाई दे लेकिन सूक्ष्मवतन में प्रकाशमय रूप दिखाई दे । सिर्फ मस्तक की लाइट नहीं लेकिन सारे शरीर द्वारा लाइट के साक्षात्कार होंगे । जब लाइट ही लाइट देखेंगे तो स्वयं भी लाइट रूप हो जायेंगे ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

29-06-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


समर्पण का विशाल रूप 

आप सभी अपने चारों मूर्त को जानते हो? आज बापदादा हरेक के अभी संगम समय की (न कि भविष्य की) ही चार मूर्त एक-एक में देख रहे हैं । वह चार मूर्त कौन सी है? अपनी मूर्त को जानते हो? (कोई-कोई ने बताया) यह सब जो वर्णन किया – ऐसी मूर्त अब बनी नहीं हो व बन गयी हो? कब बनेंगे? लास्ट सो फ़ास्ट जायेंगे, ऐसा सोचा है । लेकिन लास्ट समय फ़ास्ट जा सकेंगे? जितना बहुत समय से अपने को सफलता मूर्त बनायेंगे उतना ही बहुत समय वहाँ सम्पूर्ण राज्य के अधिकारी बनेंगे । समझो अगर कोई बहुत समय से सफलतामूर्त नहीं बनते हैं तो उसी अनुसार राज्य का अधिकार भी थोड़ा समय ही मिलता है । सम्पूर्ण समय नहीं मिलता । जो बहुत समय से सम्पूर्ण बनने के पुरुषार्थ में मगन रहते हैं वही सम्पूर्ण समय राज्य के अधिकारी बनते हैं । चार मूर्त कौन सी देख रहे हैं । यह भी सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य है । एक तो देख रहे हैं ज्ञान मूर्त, 2 गुण मूर्त, 3 दान मूर्त और 4 सम्पूर्ण सफलता मूर्त । सुनाया था ना कि सर्विस करना अर्थात् महादानी बनना । तो हरेक की यह चार मूर्त देख रहे हैं । चार मुख का भी गायन है ना । एक मूर्त में चार मूर्त का साक्षात्कार कराना है – सभी को । अगर एक मूर्त भी कम है तो वहाँ भी इतनी कमी पड़ जाती है । जैसे यहाँ साथ में ले जाने वाला सामान बुक कराते हैं तो वहाँ मिल जाता है । ऐसे ही यह भी बुकिंग ऑफिस है । जितना यहाँ बुक करेंगे उतना वहाँ प्राप्ति होगी । यही सोचो कि चार ही मूर्त बने हैं? चारमुखी बने हैं? जितना यहाँ अपनी मूर्त में सर्व बातें धारण करेंगे उतना ही भविष्य राज्य तो मिलेगा ही लेकिन द्वापर में जो आपकी जड़ मूर्तियाँ बनेंगी वह भी इस संगम की मूर्ति प्रमाण ही बनेंगी । समझा । अब सम्पूर्ण मूर्त बनने के लिए क्या लक्ष्य सामने रखेंगे? जैसे भक्ति वालों को समझाते हो ना कि चित्र को देखकर वह ऐसे किस पुरुषार्थ से बने सो समझो । तो आप सम्पूर्ण मूर्त बनने के लिए क्या लक्ष्य सामने रखेंगे? उन्होंने क्या लक्ष्य रख । साकार में सम्पूर्ण लक्ष्य तो एक ही है ना । उसने कर्मातीत बनने के लिए क्या लक्ष्य रखा? किन बातों में सम्पूर्ण बने? सम्पूर्ण शब्द कितना विशालता से धारण किया – यह मालूम है? शब्द तो एक ही है सम्पूर्ण । लेकिन कितना विशाल रूप से धारण कर ऐसे बने । सर्व समर्पण के लक्ष्य से ही सम्पूर्ण बने ।
जितना समर्पण उतना सम्पूर्ण । लेकिन समर्पण का भी विशाल रूप क्या है? जितना विशाल रूप से इसको धारण करेंगे उतना ही विशाल बुद्धि भी बनते और विश्व के अधिकारी भी बनते । वह विशालता क्या थी? इसमें भी चार बातें हैं । एक तो अपना हर संकल्प समर्पण, दूसरा हर सेकंड समर्पण अर्थात् समय समर्पण, तीसरा कर्म भी समर्पण और चौथा सम्बन्ध और संपत्ति जो है वह भी समर्पण । सर्व सम्बन्ध का भी समर्पण चाहिए । उस सम्बन्ध में लौकिक सम्बन्ध तो आ ही जाता है । लेकिन यह जो आत्मा और शरीर का सम्बन्ध है उसका भी समर्पण । इतने तक सम्बन्ध को समर्पण किया है? विनाशी सम्पति तो कोई बड़ी बात नहीं है । लेकिन जो अविनाशी संपत्ति सुख, शांति, पवित्रता, प्रेम, आनंद की प्राप्ति होती है जन्मसिद्ध अधिकार के नाते, उसको भी और आत्माओं की सेवा में समर्पण कर दिया । बच्चों की शांति में स्वयं की शांति समझी । तो आत्माओं को शांति देने में ही अपनी शांति समझें । यह है लौकिक संपत्ति और साथ-साथ ईश्वरीय संपत्ति को भी समर्पण करके अपनी साक्षी स्थिति में रहना । तो समर्पण शब्द का इतना बड़ा विशाल रहस्य है । समझा । ऐसे विशाल रूप से धारण करने वाले ही सम्पूर्ण मूर्त और सफलता मूर्त बनेंगे । तो समर्पण शब्द कोई साधारण अर्थ से न समझना । लौकिक का समर्पण करना सहज है लेकिन जो ईश्वरीय प्राप्ति होती है वह भी समर्पण करना अर्थात् महादानी बनना और औरों का शुभ चिन्तक बनना, यह नंबरवार यथायोग्य यथाशक्ति होता है । इतने तक समर्पण बनने वाले को सम्पूर्ण समर्पण कहा जाता है । ऐसे सम्पूर्ण-मूर्त समर्पण-मूर्त बने हो? अपनापन बिल्कुल समा जाए । जब कोई चीज़ किसमें समा जाती है तो फिर समान हो जाती है । समाना अर्थात् समान हो जाना । तो अपना-पन जितना ही समायेंगे उतना ही समानतामूर्त बनेंगे । आप लोग जब अन्य आत्माओं की सेवा करते हो तो क्या लक्ष्य रख करते हो? (आप समान बनाने का) आप समान भी नहीं लेकिन बाप समान बनाना है । आप समान बनायेंगे तो जो आप में कमी होगी वह उनमें भी आ जाएगी । इसलिए अगर सम्पूर्ण बनना है तो आप समान भी नहीं लेकिन बाप समान बनाना है । जैसे बाप अपने से भी उंच बनाते हैं ना । बाप समान बनायेंगे तो फॉलो फ़ादर हो जायेगा ।
जैसे बाप ने अपने से ऊँचा बनाया वैसे अपने से भी ऊँचा बाप समान बनायेंगे तो गोया फॉलो फ़ादर किया । तो अब आप समान भी नहीं लेकिन बाप समान बनाना है । अगर आपने लक्ष्य ही आप समान बनाने का रखा तो उन्हों में तो बहुत कमी रह जायेगी । क्योंकि लक्ष्य ही आपने इतना रखा । इसलिए लक्ष्य सदैव सम्पूर्णता का रखना है । जो सम्पूर्ण-मूर्त प्रत्यक्ष प्रख्यात हो चुके हैं उसका लक्ष्य नहीं नहीं रखना है । जो अब गुप्त हैं, प्रत्यक्षता में नहीं आये हैं उनका भी लक्ष्य नहीं रख सकते । क्योंकि जैसी एम वैसा ऑब्जेक्ट होता है । तो एम को श्रेष्ठ रखेंगे ताकि प्राप्ति भी श्रेष्ठ होगी । अब तीसरी आँख सिव ऊपर निशाने पर एक टिक लटकी हुई होनी चाहिए । जैसे कोई मग्न अवस्था में होता है तो उनके नयन एक टिक हो जाते हैं ना । वैसे यह तीसरा नेत्र, दिव्यबुद्धि का यह नेत्र भी सदैव एक टिक, एक रस रहे । एक टिक अर्थात् एक में ही टिका हुआ, मग्न-रूप देखने में आये । तीसरे नेत्र का साक्षात्कार कैसे होगा? मस्तक से । मस्तक में खलक, नयनों में फलक देखने में आएगी । इससे भी पता पड़ेगा कि इनका तीसरा नेत्र मग्न है या युद्धस्थल में है । जब आँख थोड़ी ठीक नहीं होती है तो पलक घड़ी-घड़ी नीचे ऊपर होती रहती है । यह भी तीसरा नेत्र अगर यथार्थ रीति से ठीक होगा अर्थात् दिव्य बुद्धि यथार्थ रीति से स्वच्छ होगी तो एक टिक होगा । आँख में कोई किचड़ा आदि पड़ जाता है तो क्या होता है? पलकें हिलने लगती हैं । कीचड़े की निशानी है हिलना । यथार्थ तंदुरुस्ती की निशानी है स्थिर हो जाना । वैसे यह तीसरा नेत्र सदैव एक टिक हो । यह साक्षात्कार आप के मस्तक से होगा । नयनों से होगा तो चेक करो हमारा तीसरा नेत्र जल्दी-जल्दी बन्द होता है और खुलता है व सदैव खुला ही रहता है ।
कोई भी याद में मस्त हो जाते हैं तो भी आंखें एक टिक हो जाती है, तो यहाँ भी सम्पूर्ण स्थिति में वही टिक सकेगा जो एक ही याद में मग्न होगा । नहीं तो नयनों के माफिक बंद होते खुलते रहेंगे । एकटिक नहीं हो सकेंगे । अगर कोई किचड़ा हो तो जल्दी निकालो । नहीं तो हंसी की बात सुनाएं । समझो आपका कोई साक्षात्कार करता है और आपकी मूर्त नीचे ऊपर होती रहेगी तो क्या साक्षात्कार करेंगे? जैसे फोटो निकालने के समय हिलना बंद कराते हैं न । अगर हिला तो फ़ोटो ख़राब । वैसे ही आपकी अवस्था हिलती रहेगी तो क्या साक्षात्कार होगा? जैसे फोटो निकालते समय अपने को कितना स्थिर करते हो वैसे ही सदैव समझो कि हमारे भक्त हर समय हमारा साक्षात्कार कर रहे हैं । तो साक्षात्कार मूर्त अर्थात् स्थिरमूर्त होंगे । नहीं तो भक्तों को साक्षात्कार स्पष्ट नहीं होगा । स्पष्ट साक्षात्कार कराने के लिए स्थिरबुद्धि, एकटिक स्थिति आवश्यक है । समझा । अभी से ही भक्त लोग एक-एक का साक्षात्कार करेंगे । वह बीज अर्थात् संस्कार उन भक्तों की आत्मा में भरेगा । फिर उस संस्कार से मर्ज होंगे और फिर द्वापर में वही संस्कार इमर्ज होगा । जैसे आप समझाते हो ना कि धर्म-स्थापक यहाँ से सन्देश लेकर, भरकर जायेंगे वही फिर इमर्ज होगा । वैसे आप सभी के अपने-अपने भक्त और प्रजा संस्कार ले जाएगी । फिर उसी प्रमाण इमर्ज होते हैं । अगर भक्तों के सामने स्पष्ट मूर्त ही नहीं दिखायेंगे तो उनमें वह संस्कार कैसे भरेंगे? यह भी कर्तव्य करना है । सिर्फ प्रजा नहीं बनानी है, साथ-साथ भक्तों में भी वह संस्कार भरना है । कितनी प्रजा बनी है, कितने भक्त बने हैं यह भी मालूम पड़ेगा । भक्तों की माला और प्रजा की माला दोनों प्रत्यक्ष होंगे । हरेक को अपनी दोनों मालाओं का साक्षात्कार होगा । अपना भी साक्षात्कार होगा कि मैं कहाँ माला में पिरोया हुआ हूँ । यह भी एक गुप्त रहस्य है कि किन्हों के भक्त ज्यादा होते, किन्हों की प्रजा जास्ती बनती । जैसे कोई की राजधानी बड़ी होते भी संपत्ति कम होती, कोई की राजधानी कम होती परन्तु संपत्ति ज्यादा होती है । यह भी गुप्त रहस्य है । जो कभी खोलेंगे । अभी तो लक्ष्य रखो – प्रजा बनाने का । भक्त तो लास्ट में मिनट मोटर के समान बनेंगे । यहाँ भी भक्त वंदना करेंगे । पूजा नहीं । गायन करेंगे, पूजा वही वहाँ करेंगे । यह सब बाद में मालूम पड़ेगा ।
 

अच्छा !!!

02-07-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


साइलेंस बल का प्रयोग 

स्नेह और शक्ति रूप अपने को समझते हो? शक्तियों का कर्तव्य क्या होता है, मालूम है? शक्तियों के मुख्य दो गुण गाये जाते हैं। वह कौन से? आपकी यादगार में विशेष क्या देखते हैं? शक्तियों की मूर्त में मुख्य विशेषता क्या होती है? स्वयं शक्तियाँ हो और अपनी विशेषता मालूम नहीं है। शक्तियों की विशेषता यह होती है कि जितना ही प्रेममूर्त उतना ही संहारीमूर्त होती है। शक्तियों के नयन सदैव प्रेममूर्त होते हैं, लेकिन जितना ही प्रेममूर्त उतना ही विकराल रूप भी होते हैं। एक सेकंड में किसको भी प्रेममूर्त भी बना सकती तो एक सेकंड में किसका विनाश भी कर सकती हैं। तो ऐसे ही दोनों गुण अपने में देखती हो? दोनों गुण प्रत्यक्ष रूप में आते हैं व गुप्त रूप में? प्रेमरूप प्रत्यक्ष और शक्ति रूप गुप्त है। फिर वह विकराल रूप कब प्रत्यक्ष करेंगे? मालूम है? आजकल बापदादा विशेष स्लोगन कौन सा देते हैं? कब नहीं लेकिन अब करेंगे। कब शब्द कमज़ोर बोलते हैं। बहादुर शक्तियाँ तो बोलती हैं अब। जैसे स्वयं अविनाशी इम्पैरिशिबुल हैं वैसे ही इस माया में फँस कर विनाश को प्राप्त होना उन्हों के लिए इम्पॉसिबल है। जो इम्पैरिशिबुल हैं उनके लिए माया की कोई भी लहर में लहराना भी इम्पॉसिबल हैं। जो इम्पैरिशिबुल स्थिति में रहते हैं उन्हों के लिए माया के कोई भी स्वरुप से झुकाव में आना इम्पॉसिबल है जैसे बापदादा के लिए इम्पॉसिबल कहेंगे। जो स्वयं झुकाव में आते होंगे उन्हों के आगे और कैसे झुकेंगे। सारे विश्व को अपने आगे झुकानेवाले हो ना। शेरनी शक्तियों का एक भी संकल्प या एक भी बोल व्यर्थ नहीं जा सकता। जो कहा वह किया। संकल्प और कर्म में अंतर नहीं होता। क्योंकि संकल्प भी जीवन का अनमोल खज़ाना है। जैसे स्थूल खजाने को व्यर्थ नहीं करते हो वैसे शिव शक्तियाँ जिनकी मूर्त में दोनों गुण प्रत्यक्ष रूप में हैं उन्हों का एक भी संकल्प व्यर्थ नहीं होता। एक-एक संकल्प से स्वयं का और सर्व का कल्याण होता है। एक सेकंड में, एक सेकंड से भी कल्याण कर सकते हैं। इसलिए शक्तियों को कल्याणी कहते हैं। जैसे बापदादा कल्याणकारी है वैसे बच्चों का भी कल्याणकारी नाम प्रसिद्द है। अब तो इतना हिसाब देखना पड़े। हमारे कितने सेकंड में, कितने संकल्प सफल हुए, कितने असफल हुए। जैसे आजकल साइंस ने बहुत उन्नति की है जो एक स्थान पर बैठे हुए अपने अस्त्रों द्वारा एक सेकंड में विनाश कर सकते हैं। तो क्या शक्तियों का यह साइलेंस बल कहाँ भी बैठे एक सेकंड में काम नहीं कर सकता? कहाँ जाने की अथवा उन्हों को आने की भी आवश्यकता नहीं। अपने शुद्ध संकल्पों द्वारा आत्माओं को खींचकर सामने लायेगा। जाकर मेहनत करने की आवश्यकता नहीं। अब ऐसे प्रभाव देखेंगे। जैसे साकार में कहते रहते थे कि ऐसा तीर लगाओ जो तीर सहित आप के सामने पक्षी आ जाये। अब यह होगा अपनी विलपॉवर से।

सबसे जास्ती दूर लाइट कौन सी जाती है? लाइट हाउस की। तो अब लाइट हाउस, सर्च लाइट बनना है। रिवाजी बल्ब नहीं। सर्चलाइट वह बन सकेंगे जो स्वयं को सर्च कर सकते हैं। जितना स्वयं को सर्च कर सकेंगे उतना ही सर्चलाइट बनेंगे। अगर स्वयं को सर्च नहीं कर सकते तो सर्चलाइट भी नहीं बन सकेंगे। अब तो वह समय आ गया है। अभी पावरफुल भी नहीं लेकिन विलपावर वाला बनना है। विलपावर और वाइडपावर अर्थात् बेहद की तरफ दृष्टि वृत्ति। तो अब एडिशन क्या करेंगे? पावर तो है लेकिन अब विलपावर और वाइडपावर चाहिए। आज बापदादा किस रूप से देख रहे हैं? उम्मीदों के सितारे। अभी हैं उम्मीदों के सितारे फिर बनेंगे सफलता के सितारे। तो वर्तमान भी देखते हैं और भविष्य भी देख रहे हैं। सफलता आप के गले की माला है। अपने गले में सफलता की माला दिखाई देती है? संगम पर कौनसा श्रृंगार है? सफलता की माला यथायोग्य यथाशक्ति हर एक के गले में पड़ी हुई है। तो बापदादा बच्चों के श्रृंगार को देखते हैं। श्रृंगारे हुए बच्चे अच्छे लगते हैं। बापदादा का अभी क्या संकल्प चल रहा है? बापदादा आप से क्या बोलनेवाले हैं, कैच कर सकती हो? आजकल बाप बुद्धि की ड्रिल कराने आते हैं। अभी मैदान पर प्रत्यक्ष होना है, अब गुप्त रहने का समय नहीं है। जितना प्रत्यक्ष होंगे उतना बापदादा को प्रख्यात करेंगे। बेहद में चक्कर लगाकर चक्रवर्ती बन रहे हो? जो एक स्थान पर बैठा रहता है उसको क्या कहा जाता है? जो एक ही स्थान पर स्थित हो सर्विस भी कर रहे हैं लेकिन बेहद में चक्र नहीं लगाते हैं तो भविष्य में भी उन्हों को एक इंडिविजुअल राजाई मिल जाएगी। बाप भी सर्व के सहयोगी बने न। विश्व का राजा वह बनेंगे जो विश्व की हर आत्मा से सम्बन्ध जोड़ेंगे और सहयोगी बनेंगे। जैसे बापदादा विश्व के स्नेही सहयोगी बने वैसे बच्चों को भी फॉलो फादर करना है। तब विश्व महाराजन की जो पदवी है उसमें आने के अधिकारी बन सकते हो। हिसाब है ना। जैसा और जितना, वैसा और उतना मिलता है। अब प्रतिज्ञा करके विशेष प्रत्यक्ष होना है। औरों को नहीं प्रख्यात करना है, बाप को प्रत्यक्ष करना है। जब प्रत्यक्ष होंगे तो प्रख्यात होंगे। विश्व अधिकारी बनने का लक्ष्य रखा है ना। अभी यही तीव्र पुरुषार्थ करना है। इस पुरानी दुनिया से बहुत सहज बेहद का वैराग लाने का साधन क्या है? (कोई-कोई ने बताया) जिन्हों ने जो बात सुनाई वह सहज समझ सुनाई ना। अगर सहज ही है तो बेहद के वैरागी तो सहज बन गए। अगर अपने से ही न लगाया तो दूसरों से कैसे लगायेंगे। बेहद का वैराग्य कहते हैं। जो वैरागी होते हैं वह कहाँ निवास करते हैं? बहुत सरल युक्ति बताते हैं कि बेहद का वैरागी बनना है तो सदैव अपने को मधुबन निवासी समझो। लेकिन मधुबन को खाली नहीं देखना। मधुबन है ही मधुसूदन के साथ। तो मधुबन याद आने से बापदादा, दैवी परिवार, त्याग-तपस्या और सेवा भी याद आ जाते हैं। मधुबन तपस्या भूमि भी है। मधुबन एक सेकंड में सभी से त्याग कराता है। यहाँ बेहद के वैरागी बन गए हो ना। तो मधुबन है ही त्यागी वैरागी बनाने वाला। जब बेहद के वैरागी बनेंगे तब बेहद की सर्विस कर सकेंगे। कहाँ भी लगाव न हो। अपने आप से भी लगाव नहीं लगाना है तो औरों की तो बात ही छोड़ो।
आज आपस में रुह-रुहान हो रही थी बापदादा की। आज सवेरे-सवेरे एक नज़ारा वतन से देख रहे थे कि हरेक बच्चा कहाँ तक बंधा हुआ है और हरेक का बंधन कहाँ तक टूटा है। कहाँ तक नहीं टूटा है? किसकी तो मोटी रस्सियाँ भी हैं, किसके कम भी हैं, कोई के कच्चे धागे भी हैं। यह नज़ारा देख रहे थे कि किसके कच्चे धागे रह गए हैं, किसकी मोटी रस्सियाँ हैं, किसकी पतली भी हैं। लेकिन फिर भी कहेंगे तो बंधन ना। कोई न कोई कच्चा वा पक्का धागा है। कच्चा धागा भी बंधन तो कहेंगे ना। सिर्फ उन्हों को देरी नहीं लगेगी। मोटी रस्सी वाले को देरी भी लगेगी और मेहनत भी लगेगी। तो आज वतन से यह नज़ारा देख रहे थे। हरेक अपने आप को तो जान सकते हैं। मोटा रस्सा है वा पतला। कच्चा धागा है वा पक्का। बांधेली हो या स्वतंत्र? स्वतंत्र का अर्थ है स्पष्ट। फिर भी बापदादा हर्षित होते हैं। कमाल तो करते हो, लेकिन बापदादा उससे भी आगे देखने चाहते हैं। जितना आपके मुख पर बापदादा का नाम होगा उतना ही सभी के मुख पर आपका नाम होगा। मधुबन है ही परिवर्तन भूमि। तो परिवर्तन क्या करके जाना है, वह तो समझते हो ना।

अच्छा !!!


11-07-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


संगमयुग की डिग्री और भविष्य की प्रालब्ध” 

आज बापदादा सभी स्टूडेंट्स की पढ़ाई बाद क्या-क्या डिग्री प्राप्त की है वह देख रहे हैं। इस पढ़ाई की डिग्री कौन सी मिलती है? डिग्री मिलनी है वा मिली है? पढ़ाई के बाद डिग्री मिलती है ना। तो इस संगम पर आपको क्या मिलेगा? सम्पूर्ण फ़रिश्ता वा अव्यक्त फ़रिश्ता। यह है संगमयुग की डिग्री। और दैवीपद है भविष्य की प्रालब्ध। तो अब की डिग्री है सम्पूर्ण अव्यक्त फ़रिश्ता। इस डिग्री की मुख्य क्वालिफिकेशन कौन-कौन सी हैं और कहाँ तक हरेक स्टूडेंट इसमें क्वालिफाइड बना है। यह देख रहे हैं। जितना क्वालिफाइड होगा उतना ही औरों को भी क्वालिफाइड बनाएगा। क्वालिफाइड जो होगा वही बनाएगा क्वालिटी। और जो नहीं होगा वह बनाएगा क्वांटिटी। तो आज सभी की क्वालिटीज़ देख रहे हैं। देखा जाता है ना कि किन-किन क्वालिटीज़ में क्वालिफाइड हैं। तो यहाँ मुख्य क्वालिटीज़ में एक तो देख रहे हैं कि कहाँ तक नॉलेजफुल बने हैं। नॉलेजफुल के साथ फैथफुल, सक्सेसफुल, पावरफुल, और सर्विसएबुल कहाँ तक बने हैं। इतनी क्वालिटीज़ अगर सभी में आ जाएँ तो फिर डिग्री मिल जाएगी। तो हरेक को यह देखना है कि इन क्वालिटीज़ में कौन-कौन सी क्वालिटीज़ धारण हुई हैं। नॉलेज फुल अर्थात् बुद्धि में फुल नॉलेज की धारणा। जितना नॉलेजफुल होगा उतना ही वह सक्सेसफुल होगा। अगर सक्सेसफुल कम हैं तो समझेंगे नॉलेज की कमी है। सक्सेसफुल न होने के कारण क्या है? फैथफुल कम। फैथफुल अर्थात् निश्चयबुद्धि। एक तो अपने में फैथ दूसरा बाप-दादा में और तीसरा सर्व परिवार की आत्माओं में फैथफुल होना पड़ता है। जितना फैथफुल बनकर निश्चयबुद्धि होकर कोई कर्तव्य करेंगे तो निश्चयबुद्धि की विजय अर्थात् फैथफुल होने से सक्सेसफुल हो ही जाता है। उसका हर कर्तव्य, हर संकल्प, हर बोल पावरफुल होगा। ऐसे क्वालिफाइड को ही यह डिग्री प्राप्त हो सकती है। अगर डिग्री को प्राप्त नहीं करते तो क्या होता है मालूम है? कोर्ट द्वारा क्या निकलता है? डिक्री (नोटिस)। या तो डिग्री मिलेगी या तो डिक्री निकलेगी। धर्मराजपुरी में बंद होने की डिक्री निकलेगी।

इसलिए पुरुषार्थ कर डिग्री लेनी है। डिक्री नहीं निकालनी है। जिन्हों पर डिक्री निकलती है वह शर्मसार हो जाते हैं। इसलिए सदैव चेक करो कि कहाँ तक क्वालिफाइड बने हैं? यह तो मुख्य क्वालिफिकेशन बताई। लेकिन लिस्ट तो बड़ी लम्बी है। हर क्वालिटीज़ के पीछे फुल शब्द भी है। फैथफुल, पावरफुल।.... तो इस रीति से सभी गुणों में फुल हैं तब डिग्री मिलेगी। सभी सक्सेस तो होते हैं लेकिन सक्सेसफुल हैं, पावरफुल हैं या कम हैं यह देखना है। जो इन सर्व गुणों में फुल होगा उनको ही सम्पूर्ण अव्यक्त फ़रिश्ता की डिग्री मिलती है। सभी ने यही लक्ष्य रखा है ना। अभी वर्तमान समय कौन सा है? अभी है बहुत नाज़ुक समय। अभी नाज़ से चलने का समय नहीं है। वह नाज़ बचपन के थे। अगर नाज़ुक समय में भी कोई नाजों से चलेंगे तो रिजल्ट में नुकसान ही होगा। इसलिए अभी संहारीमूर्त बनना है। विकरालरूप धारी बनना है। तो अब दिन प्रतिदिन नाज़ुक समय होने के कारण संहारीमूर्त बनना है। संहार भी किसका? अपने संस्कारों का। अपने विकर्मों पर और विकर्मी आत्माएं जो इस समय हैं उन्हों के ऊपर अब विकराल रूप धारण कर एक सेकंड में भस्म करने का है। शंकर के लिए कहते हैं ना कि एक सेकंड में आँख खोली और विनाश। यह संहारीमूर्त के कर्तव्य की निशानी है। कोई के भी ऊपर विकराल रूप बनकर दृष्टि डाली और उनके विकर्मी संस्कारों को भस्म कर दें। तो विकर्मों और व्यर्थ कर्मों, विकर्मियों के ऊपर अब विकराल रूप धारण करना है। अब स्नेहीमूर्त भी नहीं। अब तो काली रूप चाहिए। विकाराल संहारी रूप चाहिए। अब लास्ट समय है। अब तक अगर विकराल रूपधारी नहीं बनेंगे तो अपने विकर्मों और विकर्मियों का सामना नहीं कर सकेंगे। अभी समाने की बात नहीं। विकर्मों, व्यर्थ संकल्पों को वा विकर्मियों के विकर्मी चलन को अब समाना नहीं है लेकिन संहार करना है। अब स्नेह को समाना है। शक्तिरूप को प्रत्यक्ष करना है। शक्तियों को एक ही समय तीन बातें धारण करनी हैं। एक तो मस्तक में मातृ-स्नेहीपने का गुण, रूप में रूहानियत और वाणी में वज्र। एक-एक बोल विकर्मों और विकर्मियों को ख़त्म करनेवाला हो। जब यह तीनों बातें इकट्ठी धारण होंगी तब क्या होगा? विकर्मों और विकर्मी भस्म हो जायेंगे। शक्तियों की नज़र से विकर्मी आत्माएं कम्पायमान होंगी। किससे? अपने विकर्मों से। तो अब संहारकारी बनो और जल्दी-जल्दी संहार करो। कहाँ-कहाँ श्रृंगार करते संहार को भूल जाते हैं। श्रृंगार तो बहुत किया लेकिन अब संहार करो। मास्टर ब्रह्मा भी बने, पालना की, श्रृंगार किया लेकिन अब पार्ट है संहार का। शक्तियों के अलंकार और शक्तियों की ललकार और शक्तियों के किस कार्य का गायन है? घुँघरू की झंकार। घुँघरू डालकर असुरों पर नाचना है। नाचने से क्या होता है? जो भी चीज़ होगी वह दब कर ख़त्म हो जएगी। निर्भयता और विनाश की निशानी यह घुँघरू की झंकार है। ऐसे नहीं कि पाण्डवों ने नहीं किया है। पाण्डव भी शक्ति रूप हैं। शक्ति रूप में दोनों आ जाते हैं। तो यह तीनों कर्तव्य प्रैक्टिकल और प्रत्यक्ष रूप में चल रहे हैं। अब कमजोरों का काम नहीं हैं। मैदान पर कमज़ोर नहीं आते हैं। शूरवीर आते हैं। तो अब मैदान पर प्रत्यक्ष होने का समय है। शूरवीर शक्तिरूप बनकर प्रत्यक्ष रूप में सामने आओ। जब इस रूप में प्रत्यक्ष होंगे तब क्या होगा? प्रत्यक्षता। बाप और बच्चों की प्रत्यक्षता होगी। जितना प्रत्यक्ष होंगे उतनी प्रत्यक्षता होगी। तो बाप को प्रख्यात करने के लिए प्रत्यक्ष होना पड़े। अब तक अपनी ही कमजोरियों को विदाई न देंगे तो सृष्टि के कल्याणकारी कैसे बनेंगे। इसलिए अपनी कमजोरियों को अब विदाई दो तब सृष्टि के कल्याणकारी बन सकेंगे। अच्छा

पार्टियों के साथ :-

1: वर्तमान समय सभी क्या विशेष पुरुषार्थ कर रहे हैं? सन्देश देना यह तो साधारण बात है। विशेष आत्मा बनने के लिए विशेष कार्य भी करना पड़ेगा। आजकल दुनिया के जो विशेष आत्माएं हैं उन पर विशेष ध्यान देना है। एक विशेष आत्मा के ऊपर ध्यान देने से अनेकों का ध्यान स्वतः ही खिंच जायेगा। विशेष आत्मा पर ध्यान देने से वह विशेष नहीं, तुम विशेष बनेंगे। विशेष ध्यान से कोई भी व्यर्थ संकल्प, कर्म वा समय नहीं जायेगा। शक्ति अगर जमा हो जाती है तो विशेष सर्विस भी सहज हो जाती है। तो अब पुराने हिसाब-किताब के चौपड़े को ख़त्म कर नया चौपड़ा बनाना है। जो जितना क्वालिफाइड होता है उतना ही उसकी वैल्यू होती है। वैल्यूएबुल चीज़ को कभी भी साधारण स्थान पर नहीं रखा जाता है। उसको विशेष स्थान दिया जाता है। तो क्वालिफिकेशन्स को सामने रख फिर नोट करते जाओ कि कितने परसेंट बने हैं। जब सेंट-परसेंट हो जायेंगे तो यह जो सेंट (साधु-संत) हैं, वह भी झुकेंगे। और उन्हों के झुकने से वह झंकार दूर-दूर तक सभी के कानों में पहुँचेगी। यथार्थ पुरुषार्थ का अर्थ ही है वहाँ ही पुरुषार्थ और वहाँ ही प्राप्ति। इस संगमयुग को विशेष वरदान है प्रत्यक्ष फल प्राप्त कराने का। फल भी ऐसा है, जो पुरुषार्थ कम प्रालब्ध जास्ती। तो समय की विशेषता को जान अपने में विशेषता भरनी है। अगर कमी रह जाएगी तो फिर कमी की निशानी क्या होगी? कमान। अगर कमाल नहीं करेंगे तो कमान मिलेगी। एक सेकंड का भी फल अगर प्राप्त नहीं किया तो फुल नहीं बनेंगे। फ़ैल की लिस्ट में आ जायेंगे।

2: दिल्ली को कहते हैं बापदादा की दिल। जैसे दिल की धड़कन से तंदुरुस्ती का मालूम पड़ता है वैसे दिल्ली के आवाज़ से समाप्ति का आवाज़ सुनेंगे। दिल्ली है दर्पण, तो दिल्ली वालों की कितनी जिम्मेवारी है। जितना बड़ा जिम्मेवारी का ताज उतना ही सतयुग में भी बड़ा ताज मिलेगा। इसको कहते हैं बेहद की जिम्मेवारी। बाप भी मधुबन में रहते बेहद की सर्विस करते थे ना। तो एक-एक को बेहद की जिम्मेवारी है। बेहद की बुद्धि कैसे होती है? बेहद की बात सोचना, बेहद परिवार से सम्बन्ध और स्नेह, सर्व स्थान अपने। .... ऐसे को कहते हैं बेहद का सर्विसएबुल। हद की सर्विस वाले को सर्विसएबुल नहीं कहेंगे।

3: मधुबन को कहते हैं सेफ (तिजोरी)। मधुबन निवासी से में पड़े हैं। सेफ में रहने वाले कौनसी मणियाँ हो? सभी से बढ़िया मणि होती है मस्तकमणि। मस्तकमणि कम होती है, ह्रदयमणियाँ ज्यादा होती हैं। जो ज्यादा सेफ में रहते हैं, वह मस्तकमणि हैं। योगयुक्त और निश्चयबुद्धि बनकर के कर्तव्य करने से सफलता प्राप्त हूँ ही जाती है। पहले से ही अगर यह संकल्प बुद्धि में होता है कि करते हैं परन्तु मिलता मुश्किल है। तो यह संकल्प भी निश्चय की परसेंट को कम कर देता हैं। निश्चयबुद्धि हो करें तो फेल नहीं होंगे। समस्याओं का सामना करने से सफलता मिलती है। विघ्न तो आएंगे लेकिन लगन की अग्नि से विघ्न भस्म हो जायेंगे।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

24-07-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


बिन्दु रूप की स्थिति सहज कैसे बनें ? 

सभी जिस स्थिति में अभी बैठे हैं, उसको कौन सी स्थिति कहेंगे? व्यक्त में अव्यक्त स्थिति है? बापदादा से मुलाक़ात करते समय बिंदु रूप की स्थिति में स्थित रह सकते हो? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) बिंदु रूप की स्थिति विशेष किस समय बनती है? जब एकांत में बैठे हो तब या चलते फिरते भी हो सकती है? अंतिम पुरुषार्थ याद का ही ही । इसलिए याद की स्टेज वा अनुभव को भी बुद्धि में स्पष्ट समझना आवश्यक है । बिंदु रूप की स्थिति क्या है और अव्यक्त स्थिति क्या है, दोनों का अनुभव क्या-क्या है? क्योंकि नाम दो कहते हैं तो ज़रूर दोनों के अनुभव में भी अंतर होगा । चलते-फिरते बिंदु रूप की स्थिति इस समय कम भी नहीं लेकिन ना के बराबर ही कहें । इसका भी अभ्यास करना चाहिए । बीच-बीच में एक दो मिनट भी निकाल कर इस बिंदी रूप की प्रैक्टिस करनी चाहिए । जैसे जब कोई ऐसा दिन होता है तो सारे चलते-फिरते हुए ट्राफिक को भी रोक कर तीन मिनट साइलेंस की प्रैक्टिस कराते हैं । सारे चलते हुए कार्य को स्टॉप कर लेते हैं । आप भी कोई कार्य करते हो वा बात करते हो तो बीच-बीच में यह संकल्पों की ट्राफिक को स्टॉप करना चाहिए । एक मिनिट के लिए भी मन के संकल्पों को चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टिस करना चाहिए । अगर यह प्रैक्टिस नहीं करेंगे तो बिंदु रूप की पावरफुल स्टेज कैसे और कब ला सकेंगे? इसलिए यह अभ्यास करना आवश्यक है । बीच-बीच में यह प्रैक्टिस में करते रहेंगे तो जो आज यह बिंदु रूप की स्थिति मुश्किल लगती है वह सरल हो जाएगी जैसे अभी मैजारिटी को अव्यक्त स्थिति सहज लगती है । पहले जब अभ्यास शुरू किया तो व्यक्त में अव्यक्त स्थिति में रहना भी मुश्किल लगता था । अभी अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना जैसे सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दुरूप की स्थिति भी सहज हो जाएगी । अभी महारथियों को यह प्रैक्टिस करनी चाहिए । समझा ।
फ़रिश्ता रूप की स्थिति अर्थात् अव्यक्त स्थिति जिसकी सदाकाल रहती वह बिन्दुरूप में भी सहज स्थित हो सकेगा । अगर अव्यक्त स्थिति नहीं है तो बिन्दुरूप में स्थित होना भी मुश्किल लगता है । इसलिए अभी इसका भी अभ्यास करो । शुरू शुरू में अव्यक्त स्थिति का अभ्यास करने के लिए कितना एकांत में बैठ अपना व्यक्तिगत पुरुषार्थ करते थे । वैसे ही इस फाइनल स्टेज का भी पुरुषार्थ बीच-बीच में समय निकाल करना चाहिए । यह है फाइनल सिद्धि की स्थिति । इस स्थिति को पहुँचने के लिए एक बात का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा । आजकल वह गवर्नमेंट कौन सी स्कीम बनाती है? उन्हों के प्लेन्स भी सफल तब होते हैं जब पहले-पहले यह लक्ष्य रखते हैं कि सभी बातों में जितना हो सके इतनी बचत हो । बचत की योजना भी करते हैं ना । समय बचे, पैसे बचें, एनर्जी की बचत करना चाहते हैं । एनर्जी कम लगे और कार्य ज्यादा हो । सभी प्रकार की बचत की योजना करते हैं । तो अब पाण्डव गवर्नमेंट को कौन सी स्कीम करनी पड़े? यह जो सुनाया की बिन्दुरूप की सम्पूर्ण सिद्धि की अवस्था को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़े । अभी जिस रीति चल रहे हैं उस हिसाब से तो सभी यही कहते हैं कि बहुत बिजी रहते हैं, एकांत का समय कम मिलता है, अपने मनन का समय भी कम मिलता है । लेकिन समय कहाँ से आएगा । दिन प्रतिदिन सर्विस भी बढती जानी है और समस्याएं भी बढती जानी हैं । और यह जो संकल्पों की स्पीड है वह भी दिन प्रतिदिन बढ़ेगी । अभी एक सेकंड में जो दस संकल्प करते हो उसकी डबल ट्रिपल स्पीड हो जाएगी । जैसे आजकल जनसंख्या का हिसाब निकालते हैं ना कि एक दिन में कितनी वृद्धि होती है । यहाँ फिर यह संकल्पों की स्पीड तेज़ होगी । एक तरफ संकल्पों की, दूसरी तरफ ईविल स्पिरिट्स (आत्माओं) की भी वृद्धि होगी । लेकिन इसके लिए एक विशेष अटेंशन रखना पड़े, जिससे सर्व बातों का सामना कर सकेंगे । वह यह है कि जो भी बात होती है उसको स्पष्ट समझने के लिए दो शब्द याद रखना है । एक अंतर और दूसरा मन्त्र । जो भी बात होती है उसका अंतर करो कि यह यथार्थ है या यथार्थ है । बापदादा के समान है वा नहीं है । बाप समान है वा नहीं? एक तो हर समय अन्तर (भेंट) करके उसका एक सेकंड में नॉट या तो डॉट । करना नहीं है तो फिर डॉट देंगे, अगर करना है तो करने लग जायेंगे । तो नॉट और डॉट यह भी स्मृति में रखना है । अंतर और मन्त्र यह दोनों प्रैक्टिकल में होंगे । दोनों को भूलेंगे नहीं तो कोई भी समस्या वा कोई भी ईविल स्पिरिट सामना नहीं कर सकेगी । एक सेकंड में समस्या भस्म हो जाएगी । ईविल स्पिरिट्स आप के सामने ठहर नहीं सकती हैं । तो यह पुरुषार्थ करना पड़े । समझा ।
(ईविल स्पिरिट्स का रूप कौन सा है?) उनका स्पष्ट रूप है किन्हीं आत्माओं में प्रवेश होना । लेकिन ईविल स्पिरिट्स का कुछ गुप्त रूप भी होता है । चलते-चलते कोई में विशेष कोई न कोई बुरा संस्कार बिल्कुल प्रभावशाली रूप में देखने में आएगा । जिसका इफ़ेक्ट क्या होगा कि उनका दिमाग अभी-अभी एक बात, अभी अभी दूसरी बात । वह भी फ़ोर्स से कहेंगे । उनकी स्थिति भी एक ठिकाने टिकी हुई नहीं होगी । वह अपने को भी परेशान करते हैं, दूसरों को भी परेशान करेंगे । स्पष्ट रूप में जो ईविल स्पिरिट्स आती हैं उसको परख कर और उससे किनारा करना सहज है । लेकिन आप लोगों के सामने स्पष्ट रूप में कम आएगी । गुप्त रूप में बहुत आएगी । जिसको आप लोग साधारण शब्दों में कहते हो कि पता नहीं उनका दिमाग कुछ पागल सा लगता है । लेकिन उस समय उसमें यह ईविल अर्थात् बुरे संस्कारों का फ़ोर्स इतना हो जाता है जो वह ईविल स्पिरिट्स के समान ही होती है । जैसे वह बहुत तंग करते हैं वैसे यह भी बहुत तंग करते हैं । यह बहुत होने वाला है । इसलिए सुना कि अभी समय की बचत, संकल्पों की बचत, अपनी शक्ति की बचत यह योजना बनाकर बीच-बीच में उस बिंदी रूप की स्थिति को बढ़ाओ । जितना बिन्दि रूप की स्थिति होगी उतना कोई भी ईविल स्पिरिट्स वा ईविल संस्कार का फ़ोर्स आप लोगों पर वार नहीं करेगा । और आप लोगों का शक्तिरूप ही उन्हों को मुक्त करेगा । यह भी सर्विस करनी है । ईविल स्पिरिट्स को भी मुक्त करना है क्योंकि अभी अंत के समय का भी अन्त है तो ईविल स्पिरिट्स वा ईविल संस्कारों को भी अति में जाकर फिर उन्हों का अंत होगा । किचड़ा सारा बाहर निकल कर भस्म हो जायेगा । इसलिए उन्हों का सामना करने के लिए अगर अपनी समस्याओं से ही मुक्त नहीं हुए होंगे तो इन समस्याओं से कैसे सामना कर सकेंगे । इसलिए कहते हैं बचत स्कीम बनाओ और प्रैक्टिकल में लाओ तब अपना और सर्व आत्माओं का बचाव कर सकेंगे । सिर्फ भाषण करने वा समझाने की सर्विस नहीं, अब तो सर्विस का रूप भी बड़ा सूक्ष्म होता जाएगा । इसलिए अपने सूक्ष्म स्वरुप की स्थिति भी बढ़ाओ । यह सभी प्रत्यक्ष होकर फिर प्रायः लोप होना है । प्रायः लोप होने पहले प्रत्यक्ष हो फिर प्रायः लोप होंगे । सर्विस इतनी बढ़नी है जो एक-एक को दस का कार्य करना पड़ेगा ।
शक्तियों की भुजाएं कितनी दिखाते हैं? भुजाओं का अर्थ है इतनी सर्विस में मददगार बनना । पाण्डव समझते हैं कि यह तो शक्तियों की ही भुजाएं हैं । पाण्डवों को फिर क्या दिखाया है, मालूम है? लम्बा दिखाया है । तो यह भी पाण्डवों की इतना ज्यादा मददगार बनने की निशानी है । लम्बा शरीर नहीं लेकिन बुद्धि लम्बी है । इन्हों का आगे दौड़ना गोया शक्तियों का आगे दौड़ना है । शक्तियों को आगे रखना यही इन्हों की दौड़ की निशानी है ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

27-07-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


अव्यक्त बनने के लिए मुख्य शक्तियों की धारणा 

आज बापदादा किस रूप से देख रहे हैं? एक-एक के मुखड़े के अन्दर क्या देख रहे हैं? जान सकते हो? हरेक कहाँ तक अव्यक्त-मूर्त, आकर्षण-मूर्त, अलौकिक-मूर्त और हर्षित-मूर्त बने हैं? यह देख रहे हैं । चारों ही लक्षण इस मुखड़े से दिखाई पड़ते हैं । कौन-कौन कहाँ तक बने हैं, वह हरेक का मुखड़ा साक्षात्कार कराता है । जैसे दर्पण में स्थूल चेहरा देखते हैं वैसे दर्पण में यह लक्षण भी देखते हो? देखने से अपना साक्षात्कार क्या होता है? चारों लक्षण से विशेष कौन सा लक्षण अपने में देखते हो? अपने आप को देखने का अभ्यास हरेक को होना चाहिए । अन्तिम स्टेज ऐसी होनी है जिसमें हरेक के मुखड़े में यह सर्व लक्षण प्रसिद्ध रूप में दिखाई पड़ेंगे । अभी कोई गुप्त है, कोई प्रत्यक्ष है । कोई गुण विशेष है कोई उनसे कम है । लेकिन सम्पूर्ण स्टेज में यह सभी लक्षण समान रूप में और प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देंगे । जिससे सभी की नम्बरवार प्रत्यक्षता होनी है । जितना-जितना जिसमें प्रत्यक्ष रूप में गुण आते जाते हैं उतनी-उतनी प्रत्यक्षता भी होती जा रही है ।
आज विशेष किस कार्य के लिए आये हैं? पाण्डव सेना प्रति । पाण्डवों की भट्ठी का आरम्भ है । अपने में क्या नवीनता लानी है, यह मालूम है? विशेष भट्ठी में आये हो तो विशेष क्या धारणा करेंगे? (हरेक ने अपना-अपना लक्ष्य सुनाया) टीचर्स आप बताओ इस पाण्डव सेना से क्या-क्या कराना है । तो यह पहले से सुनते ही अपने में सभी पॉइंट्स भरने का प्रयत्न कर लेंगे । जो फिर आपको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी । आप इन्हों से क्या चाहते हो? यह एक सेकण्ड में अपने को बदल सकते हैं । मुश्किल तो कुछ भी हो नहीं सकता । और जो निमित्त बने हुए हैं उन्हों को मदद भी बहुत अच्छी मिलती है । पाण्डव सेना तो कल्प पहले की प्रसिद्ध है ही । पाण्डवों के कर्तव्य का यादगार तो प्रसिद्ध है । जो कल्प पहले हुआ है वह सिर्फ अभी रिपीट करना है । अव्यक्त बनने के लिए वा जो भी सभी ने लक्ष्य सुनाया उसको पूर्ण करने के लिए क्या-क्या अपने में धारण करना है । वह आज सुनाते हैं । सर्व पाण्डव अपने को क्या कहलाते हो? ऑलमाइटी गॉड फ़ादर के बच्चे कहलाते हो ना । तो अव्यक्त बनने के लिए मुख्य कौन सी शक्तियों को अपने में धारण करना है? तब ही जो लक्ष्य रखा है वह पूर्ण हो सकेगा । भट्ठी से मुख्य कौन सी शक्तियों को धारण कर के जाना है, वह बताते हैं । हैं तो बहुत लेकिन मुख्य एक तो सहन शक्ति चाहिए, परखने की शक्ति चाहिए और विस्तार को छोटा करने की और फिर छोटे को बड़ा करने की भी शक्ति चाहिए । कहाँ विस्तार को कम करना पड़ता है और कहाँ विस्तार भी करना पड़ता है । समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति, सामना करने की शक्ति और निर्णय करने की भी शक्ति चाहिए । इन सबके साथ-साथ सर्व को स्नेह और सहयोगी बनाने की अर्थात् सर्व को मिलाने की भी शक्ति चाहिए । तो यह सभी शक्तियां धारण करनी पड़े । तब ही सभी लक्षण पूरे हो सकते हैं । हो सकते भी नहीं लेकिन होना ही है । करके ही जाना है । यह निश्चयबुद्धि के बोल हैं । इसके लिए एक बात विशेष है । रूहानियत भी धारण करनी है और साथ-साथ ईश्वरीय रूहाब भी हो । यह दो बातें धारण करना है और एक बात छोड़ना है । वह कौन सी? (कोई ने कहा रौब छोड़ना है, कोई ने कहा नीचपना छोड़ना है) यह ठीक है । कहाँ-कहाँ अपने में फैथ न होने के कारण कई कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं । इसलिए कहते हैं नीचपना छोड़ना है । रौब को भी छोड़ना है । दूसरा जो भिन्न-भिन्न रूप बदलते हैं, कब कैसा, कब कैसा, तो वह भिन्न-भिन्न रूप बदलना छोड़कर एक अव्यक्त और अलौकिक रूप भट्ठी से धारण करके जाना है । अच्छा । तिलक तो लगा हुआ है ना । अभी सिर्फ भट्ठी की सौगात देनी है । वह क्या सौगात देंगे? तिलक लगा हुआ है, ताजधारी भी हैं वा ताज देना है । अभी अगर छोटा ताज धारण किया है तो भविष्य में भी कमी पड़ जाएगी । भट्ठी में विश्व महाराजन बनने के लिए आये हो । सभी से बड़े से बड़ा ताज तो विश्व महाराजन का ही होता है । उनकी फिर क्या-क्या जिम्मेवारियां होती है, वह भी पाठ पढ़ाना होगा ।
यह भी एक अच्छा समागम है । आपकी टीचर (चन्द्रमणि) बड़ी हर्षित हो रही है । क्योंकि देखती है कि हमारे सभी स्टूडेंट्स विश्व महाराजन बनेंगे । इस ग्रुप का नाम क्या है, मालूम? एक-एक में विशेष गुण हैं । इसलिए यह विशेष आत्माओं का ग्रुप है । अपने को विशेष आत्मा समझते हो । देखा यह कीचेन (त्रिमूर्ति की कीचेन) सौगात देते हैं । इस लक्ष्य को देख ऐसे लक्षण धारण करने हैं । एक दो के संस्कारों को मिलाना है । और साथ-साथ यह जो चाबी की निशानी दी है अर्थात् सर्व शक्तियां जो सुनाई हैं, उनकी चाबी लेकर ही जाना है । लेकिन यह दोनों बातें कायम तब रहेंगी जब रचयिता और रचना का यथार्थ ज्ञान स्मृति में होगा । इसके लिए यह याद सौगात है । अपने को सफलतामूर्त समझते हो? सफलता अर्थात् सम्पूर्ण गुण धारण करना । अगर सर्व बातों में सफलता है तो उसका नाम ही है सम्पूर्णमूर्त । सफलता के सितारे हैं उसी स्मृति में रह कार्य करने से ही सफलता का अधिकार प्राप्त होता है । सफलता के सितारे बनने से सामना करने की शक्ति आती है । सफलता को सामने रखने से समस्या भी पलट जाती है और सफलता प्रैक्टिकल में हो भी जाती है । समीप सितारों के लक्षण क्या होते हैं? जिसके समीप है उन समान बनना है । समीप सितारों में बापदादा के गुण और कर्तव्य प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेंगे । जितनी समीपता उतनी समानता देखेंगे । उनका मुखड़ा बापदादा के साक्षात्कार कराने का दर्पण होता है । उसको बापदादा का परिचय देने का प्रयत्न कम करना पड़ता है । क्योंकि वह स्वयं ही परिचय देने की मूर्त होते हैं । उनको देखते ही बापदादा का परिचय प्राप्त हो जाता है । सर्विस में ऐसे प्रत्यक्ष सबूत देखेंगे । भल देखेंगे आप लोगों को लेकिन आकर्षण बापदादा की तरफ होगी । इसको कहा जाता है सन शोज़ फादर । स्नेह समीप लाता है । अपने स्नेह के मूर्त को जानते हो? स्नेह कभी गुप्त नहीं रह सकता । स्नेही के हर कदम से, जिससे स्नेह है उसकी छाप देखने में आती है । जितना हर्षितमूर्त उतना आकर्षणमूर्त बनना है । आकर्षणमूर्त सदैव बने रहें इसके लिए आकारी रूपधारी बन साकार कर्तव्य में आना है । अन्तर्मुखी और एकांतवासी यह लक्षण धारण करने जो लक्ष्य रखा है उसकी सहज प्राप्ति हो सकती है । साधन से सिद्धि होती है ना ।
सर्विस में सदैव सम्पूर्ण सफलता के लिए विशेष किस गुण को सामने रखना पड़ता है । साकार रूप में विशेष किस गुण के होने कारण सफलता प्राप्त हुई? (उदारचित्त) जितना उदारचित्त उतना सर्व के उद्धार करने का निमित्त बन सकते हैं । उदारचित्त होने से सहयोग लेने के पात्र बन जाते हैं । ऐसा समझना चाहिए कि हम सर्व आत्माओं के उद्धार करने के निमित्त हैं । इसलिए हर बात में उदारचित्त । मनसा में, वाचा में, कर्मणा में भी उदारचित्त बनना है । संपर्क में भी बनना है । बनते जा रहे हैं और बनते ही जाना है । जितना जो उदारचित्त होता है उतना वह आकर्षणमूर्त भी होता है । तो इसी प्रयत्न को आगे बढ़ा के प्रत्यक्षता में लाना है । मधुबन में रहते मधुरता और बेहद की वैराग्यवृत्ति को धारण करना है । यह है मधुबन का मुख्य लक्षण । इसको ही मधुबन कहा जाता है । बाहर रहते भी अगर यह लक्ष्य है तो गोया मधुबन निवासी हैं । जितना यहाँ रेस्पान्सिबिल्टी लेते हैं उतना वहाँ प्रजा द्वारा रेस्पेक्ट मिलेगा । सहयोग लेने के लिए स्नेही बनना है । सर्व के स्नेही, सर्व के सहयोगी । जितना जितना चक्रवर्ती बनेंगे उतना सर्व के सम्बन्ध में आ सकते हैं । इस ग्रुप को विशेष चक्रवर्ती बनना चाहिए । क्योंकि सर्व के सम्बन्ध में आने से सर्व को सहयोग दे भी सकेंगे और सर्व का सहयोग ले भी सकते हैं । हरेक आत्मा की विशेषता देखते सुनते, संपर्क में आते वह विशेषताएं स्वयं में आ जाती हैं । तो प्रैक्टिकल में सर्व का सहयोगी बनना है । इसके लिए पाण्डव सेना को चक्रवर्ती बनना पड़ेगा । योग की अग्नि सदैव जली रहे इसलिए मन-वाणी-कर्म और सम्बन्ध, यह चारों बातों की रखवाली करना पड़े । फिर यह अग्नि अविनाशी रहेगी । बार-बार बुझायेगे और जलायेगे तो टाइम वेस्ट हो जायेगा और पद भी कम होगा । जितना स्नेह है उतनी शक्ति भी रखो । एक सेकण्ड में आकारी और एक सेकण्ड में साकारी बन सकते हो? यह भी आवश्यक सर्विस है । जैसे सर्विस के और अनेक साधन हैं वैसे यह प्रैक्टिस भी अनेक आत्माओं के कल्याण के लिए एक साधन है । इस सर्विस से कोई भी आत्मा को आकर्षित कर सकते हो । इसमें कुछ खर्चा भी नहीं है । कम खर्च बाला नशीन । ऐसी योजना बनाओ । अभी हरेक में कोई न कोई विशेष शक्ति है लेकिन सर्व शक्तियां आ जायेंगी तो फिर क्या बन जायेंगे? मास्टर सर्वशक्तिमान । सभी गुणों में श्रेष्ठ बनना है । इष्ट देवताओं में सर्वशक्तियां समान रूप में होती हैं । तो यह पुरुषार्थ करना है ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

30-07-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


महारथी अर्थात् महानता 

आज पाण्डव सेना की भट्ठी का समाप्ति समारोह है या आज शुरुआत करते हो? (समीपता आरम्भ हुई है) विशेष कौन सी इम्प्रूवमेंट की है और उसके लिए क्या विशेष संकल्प किया है? परिवर्तन शुरू हुआ है कि होगा? संकल्प रूप में लिया है वा संस्कार भर लिया है (हरेक ने अपना-अपना सुनाया) यह है पाण्डव सेना की भट्ठी का पेपर । इस एक प्रश्न से पूरा पेपर हो गया । वर्तमान समय संकल्प और कर्म साथ-साथ होना ही आवश्यक है । अभी-अभी संकल्प किया अभी-अभी कर्म में लाया । संकल्प और कर्म में महान अन्तर नहीं होना चाहिए । महारथियों का अर्थ ही है महानता । तो महानता सिर्फ संकल्प में नहीं सर्व में महानता । यह है महारथियों की निशानी । संकल्प को प्रैक्टिकल में लाने के लिए सोच करने में समय नहीं लगता क्योंकि महारथियों के संकल्प भी ऐसे होते हैं जो संकल्प प्रैक्टिकल में संभव हो सकते हैं । यह करें न करें, कैसे करें क्या होगा यह सोचने की उनको आवश्यकता नहीं है । संकल्प ही ऐसे उत्पन्न होंगे जो संकल्प उठा और सिद्ध हुआ । इससे अपनी स्टेज की परख कर सकते हो । फाइनल स्टेज है ही योग की सिद्धि प्राप्त करना । कर्म की सिद्धि प्राप्त करना । इसके लिए कौन सी मुख्य पावर धारण करना है, जो यह सिद्ध हो जाएँ । संकल्प, वाणी, कर्म सभी सिद्ध हो जाएँ, इसके लिए कौन सी पॉवर चाहिए? सभी जो शक्तियां सुनाई थीं वह तो चाहिए ही लेकिन उनमें भी पहले कंट्रोलिंग पावर विशेष चाहिए । अगर कंट्रोलिंग पावर नहीं तो व्यर्थ मिक्स होने के कारण सिद्धि प्राप्त नहीं होती । अगर यथार्थ उत्पत्ति हो संकल्पों की वा यथार्थ वाणी निकले, यथार्थ कर्म हो तो हो नहीं सकता कि सिद्ध न हो । लेकिन व्यर्थ मिक्स होने कारण सिद्धि प्राप्त नहीं होती । यथार्थ की सिद्धि होती है । व्यर्थ की नहीं होती है । व्यर्थ को कण्ट्रोल किया जाता है, उसके लिए कंट्रोलिंग पावर ज़रूर चाहिए, किसी प्रकार की कमज़ोरी का कारण कंट्रोलिंग पावर की कमी है । कमज़ोरी क्यों होती है? अपने संस्कारों को मिटा नहीं सकते । समझते हुए भी यह संकल्प यथार्थ है वा व्यर्थ है, समझते हुए भी कंट्रोलिंग पावर नहीं है । जब कण्ट्रोल करें तब उसके बदले में और संस्कार अपने में जमा कर सकेंगे । कंट्रोलिंग पावर की कमी होने के कारण अपने को ही कण्ट्रोल नहीं कर पाते हैं । अपनी रचना का रचयिता बनना आता है? कौन सी रचना रचनी है? वह यथार्थ रचना रचने में कमी है । ऐसी रचना रच लेते हैं जो स्वयं ही अपनी रचना से परेशान हो जाते हैं । अब पाण्डव सेना को प्रैक्टिकल क्या सबूत देना है? जो कमज़ोरी के बोल, कमज़ोरी के कर्म करते हो उनकी समाप्ति का समाप्ति समारोह करना है । भट्ठी के समाप्ति का समारोह नहीं । कमज़ोरी की समाप्ति और हर संकल्प ऐसा पावरफुल उत्पन्न हो जो एक-एक संकल्प कमाल कर दिखानेवाला हो । तो कमज़ोरी की जगह कमाल को भरना होगा । कमज़ोरी शब्द ही अब शोभता नहीं । विश्व का आधार आप आत्माओं के ऊपर है । तो जो विश्व के आधारमूर्त और उद्धारमूर्त हैं ऐसी मूर्तियों के मुख से कमज़ोरी के शब्द शोभते नहीं हैं । अब तो हरेक की मूर्ति में सभी को क्या साक्षात्कार होगा? बापदादा का । ऐसी अलौकिक झलक सभी की मूर्त में दिखाई देनी है जो कोई भी उस झलक को देखकर फ़िदा हो जाए । सभी को फ़िदा कर सकेंगे । कोई को मुक्तिधाम, कोई को जीवनमुक्तिधाम । कोई भी ऐसा न रहे जो आप लोगों से अपना यथा पार्ट हक़ न ले ले । सभी आत्माओं को आप लोगों द्वारा अपना-अपना यथा पार्ट तथा बाप का वर्सा ज़रूर लेना है ।आपकी मूर्त में ऐसी झलक होनी है कि जो कोई भी अपना वर्सा लेने से वंचित नहीं रहेंगे । ऐसे अपने को दाता के बच्चे दाता समझना है । देने वालों में फलक और झलक रहती है । अभी वह मर्ज है । उन संस्कारों को अब इमर्ज करो । किस बात में बिज़ी हैं जो वह झलक अब तक इमर्ज नहीं होती है? कमजोरियों को मिटाने में बिज़ी हैं । चुक्तू तो करना ही पड़ेगा । लेकिन एक होता है जल्दी मुक्त करना । वही हिसाब कोई 5 मिनट में कोई आधा घंटा भी लगाते हैं । कोई तो सारा दिन सोचते भी हिसाब नहीं निकाल सकते । यह सभी विशेष आत्मायें हैं तो हर संकल्प हर कर्म विशेष होना चाहिए । जिससे हर आत्मा को प्रेरणा मिले – आगे बढ़ने की । क्योंकि आप सभी आधारमूर्त हो । अगर आधार ही ऐसा होगा तो दूसरे क्या करेंगे? विशेष आत्माओं को विशेष ध्यान देना ही है । अब बीती को संकल्प में भी इमर्ज नहीं करना है । अगर भूल से पुराने संस्कारों की विष इमर्ज हो भी जाए तो उसको ऐसा समझो कि यह बहुत पिछले जन्म के संस्कार हैं । अब के नहीं । पुरानी बीती हुई बातों को बार-बार कोई वर्णन करे तो इसको कहा जाता है व्यर्थ । इस पाण्डव सेना को पहले अपने परिवार के बीच एक उदहारण बनकर दिखाना है । जैसे साकार रूप में उदाहरण बने ना । ऐसे फॉलो फ़ादर । इसलिए आज का दिन कहेंगे पुराने संस्कार और संकल्प के समाप्ति समारोह का दिवस । समझा ।
इस ग्रुप का नाम क्या हुआ? जब नाम दिया जाता है तो किस आधार पर दिया जाता है? आज कौन सा दिन है? बृहस्पतिवार । बृहस्पति की दशा अर्थात् सफलता । तो यह ग्रुप है सर्व के सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन । कभी भी किसी भी प्रकार का किसको सहयोग चाहिए तो दाता के बच्चे सदैव देने वाले होते हैं । उनका हाथ कभी देने से रुकता नहीं है । सर्व के सहयोगी तब बनेंगे जब सर्व के स्नेही बनेंगे । स्नेही नहीं तो सर्व के सहयोगी भी नहीं बन सकते । इसलिए इस ग्रुप को मनसा, वाचा, कर्मणा और सम्बन्ध में भी सहयोगी बनना है और सफलतामूर्त बनना है । इसलिए कहा कि सर्व सहयोगी, सफलतामूर्त संगठन । समझा ।
सर्व का सहयोगी बनने के लिए अपने आप को मिटाना भी पड़ता है । इस कार्य से हटेंगे नहीं । तो अपने को मिटाना अर्थात् अपने पुराने संस्कारों को मिटाना । पुराने संस्कार ही सर्व के सहयोगी बनने में विघ्न डालते हैं । तो अपने पुराने संस्कारों को मिटाना है । दूसरे का संस्कार मिटाने के लिए नहीं कर रहे हैं । अपने संस्कार मिटायेंगे तो दूसरे आपको स्वयं ही फॉलो करेंगे । एक हम दूसरा बाप । तीसरा देखते हुए भी न देखो । तीसरी बातें देखने में आयेंगी भी लेकिन देखते हुए भी न देखो, अपने को और बाप को देखो । स्लोगन यही याद रखना – “ मिटायेंगे लेकिन सर्व के सहयोगी बनेंगे ।” आपका यादगार चित्र जो कल्प पहले वाला है वह याद है? गोवर्धन पर्वत का यादगार रूप क्या बनाते हैं? कब देखा है? आजकल के भक्तिमार्ग के गोवर्धन पर्वत की पूजा जब करते हैं तो क्या बनाते हैं? (गोबर का बनाते हैं .....) पहाड़ को ऊँगली देना अर्थात् पुराने संस्कारों को मिटाने में ऊँगली देना । पहले यह पहाड़ उठाना हा । तब यह कलियुगी दुनिया बदल फिर नहीं दुनिया बनेगी । कोई भी स्लोगन स्मृति में रखो । यह भी अच्छा है । लेकिन स्लोगन का स्वरुप बनना ही है । यह तो एक साधन है लेकिन साधन से स्वरुप बनना अच्छा है । माला के मणके कौन सी विशेषता से बनते हैं? मणकों की विशेषता यही है जो एकमत होकर एक ही धागे में पिरोये जाते हैं । एक की ही लगन एकरस स्थिति और एकमत तो सब एक ही एक । एक जैसे मणके हैं तो एक धागे में पिरोये जाते हैं ना । यो एक ही मत पर चलने वाले और आपस में भी एकमत हो । संकल्प भी एक से । दो मत होती हैं तो वह दूसरी अर्थात् 16000 की माला के दाने बन जाते हैं । एक मत के लिए ऐसा वातावरण बनाना है । वातावरण तब बनेगा जब समाने की शक्ति होगी । मानो कोई बात में भिन्नता हो जाती है क्योंकि यथा-योग्य यथा शक्ति तो है ना । तो उस भिन्नता को समाओ । समाने की शक्ति चाहिए । तो ऐसी आपस में एकता से ही समीप आयेंगे । सर्व के आगे दृष्टान्त रूप बन जायेंगे । सबमें अपनी-अपनी विशेषता होती है । कोई भी हो उसकी विशेषताओं को देखो विशेष आत्मा बन जायेंगे । कमी को तो बिल्कुल देखना ही नहीं है । जैसे चंद्रमा अथवा सूर्य को ग्रहण लगता है ना कि नहीं देखना चाहिए । नहीं तो ग्रह्चारी बैठ जाएगी । तो किसकी भी कमी ग्रहण है । भूल से भी कोई ने देख लिया तो समझो ग्रहचारी बैठ जाएगी । तो सच्चा सोना बनना है । ज़रा भी खाद होगी तो वही देखने में आएगी । विशेषताओं को दबा देगी । अपने को ऐसा चेंज करो जो दूसरों पर प्रभाव पड़े । धक से चेंज करना है । एकदम न्यारे बनो तो औरों का लगाव भी खुद ही टूटता जायेगा ।
 

अच्छा !!!

06-08-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


बन्धन मुक्त आत्मा की निशानी” 

अभी अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर व्यक्त देह का आधार लेकर देख रहे हैं, यह अनुभव कर रहे हो? जैसे कोई स्थूल स्थान में प्रवेश करते हो वैसे ही इस स्थूल देह में प्रवेश कर यह कार्य कर रहे हैं। ऐसा अनुभव होता है? जब चाहें तब प्रवेश करें और जब चाहें तब फिर न्यारे हो जाएँ, ऐसा अनुभव करते हो? एक सेकण्ड में धारण करें और एक सेकण्ड में छोडें यह अभ्यास है? वैसे और स्थूल वस्तुओं को जब चाहे तब लो और जब चाहो तब छोड़ सकते हैं ना। वैसे इस देह के भान को जब चाहें तब छोड़ देही अभिमानी बन जायेंयह प्रैक्टिस इतनी सरल है, जितनी कोई स्थूल वस्तु की सहज होती है? रचयिता जब चाहे रचना का आधार ले जब चाहे तब रचना के आधार को छोड़ दे ऐसे रचयिता बने हो? जब चाहें तब न्यारे, जब चाहें तब प्यारे बन जाएँ। इतना बन्धनमुक्त बने हो? यह देह का भी बन्धन है। देह अपने बन्धन में बांधती है। अगर देह बन्धन से मुक्त हो तो यह देह बन्धन नहीं डालेगी। लेकिन कर्तव्य का आधार समझ आधार को जब चाहें तब ले सकते हैं ऐसी प्रैक्टिस चलती रहती है? देह के भान को छोड़ने अथवा उससे न्यारा होने में कितना समय लगता है? एक सेकण्ड लगता है? सदैव एक सेकण्ड लगता है व कभी कितना, कभी कितना। (कभी कैसी, कभी कैसी) इससे सिद्ध है कि अभी सर्व बन्धनों से मुक्त नहीं हुए हो। जितना बन्धनमुक्त उतना ही योगयुक्त होंगे और जितना योगयुक्त होंगे उतना ही जीवनमुक्त में उंच पद की प्राप्ति होती है। अगर बन्धनमुक्त नहीं तो योगयुक्त भी नहीं। उसको मास्टर सर्वशक्तिमान कहेंगे? देह के सम्बन्ध और देह के पदार्थों से लगाव मिटाना सरल है लेकिन देह के भान से मुक्त हो जाना। जब चाहें तब व्यक्त में आयें। ऐसी प्रैक्टिस अभी जोर शोर से करनी है। ऐसे ही समझें जैसे अब बाप आधार ले बोल रहे हैं वैसे ही हम भी देह का आधार लेकर कर्म कर रहे हैं। इस न्यारेपन की अवस्था प्रमाण ही प्यारा बनना है। जितना इस न्यारेपन की प्रैक्टिस में आगे होंगे उतना ही विश्व को प्यारे लगने में आगे होंगे। सर्व स्नेही बनने के लिए पहले न्यारा बनना है। सर्विस करते हुए, संकल्प करते हुए भी अपने को और दूसरों को भी महसूसता ऐसी आनी चाहिए कि यह न्यारा और अति प्यारा है। जितना जो स्वयं न्यारा होगा उतना औरों को बाप का प्यारा बना सकेंगे।

सर्विस की सफलता का स्वरुप क्या है? (भिन्न-भिन्न विचार सभी के निकले) सर्विस की सफलता का स्वरुप यही है कि सर्व आत्माओं को बाप के स्नेही और बाप के कर्तव्य में सहयोगी और पुरुषार्थ में उन आत्माओं को शक्तिरूप बनाना। यह है सर्विस की सफलता का स्वरुप। जिन आत्माओं की सर्विस करो उन आत्माओं में यह तीनों ही क्वालिफिकेशन प्रत्यक्ष रूप में देखने में आनी चाहिए। अगर तीनों में से कोई भी गुण की कमी है तो सर्विस की सफलता की भी कमी है। समझा।

मुख्य एक बात ध्यान में रखने और कर्म में धारण करने वाली कौन सी है, जिससे इस सफलता स्वरुप को प्रैक्टिकल में ला सकते हो? वह कौन सी बात है? बहुत सहज है। मुश्किल बात को ध्यान देकर धारण करते हैं और सहज बात को छोड़ देने से सहज की धारणा देरी से होती है। यह मालूम है? समझा जाता है यह तो कोई बड़ी बात नहीं है। हो जाएगी। फिर होता क्या है? हो जाएगी, हो जाएगी करते-करते ध्यान से निकल जाती है। इसलिए धारणा रूप भी नहीं होते। तो वह कौन-सी एक बात है। अगर उस बात को धारण कर लें तो सफलता स्वरूप बन सकते हैं। (साक्षीपन) हाँ यह बात ठीक है। आज बापदादा भी साक्षी अवस्था की राखी बाँधने के लिए आये हैं। अगर यह साक्षीपन की राखी सदैव बंधी हुई हो तो सर्विस की सफलता बहुत जल्दी निकलेगी। अभी जिस कर्तव्य में मास लगता है उस कर्तव्य में एक घंटा भी नहीं लगेगा। यह साक्षीपन की राखी बांधनी है। औरों को तो प्यूरिटी की राखी बाँधते हो लेकिन बापदादा आज यह साक्षीपन की राखी बाँध रहे हैं। जितना साक्षी रहेंगे उतना साक्षात्कारमूर्त और साक्षात् मूर्त बनेंगे। साक्षीपन कम होने के कारण साक्षात् और साक्षात्कारमूर्त भी कम बने हैं। इसलिए यह अभ्यास करो। कौन-सा अभ्यास? अभी-अभी आधार लिया, अभी-अभी न्यारे हो गए। यह अभ्यास बढ़ाना अर्थात् सम्पूर्णता और समय को समीप लाना है। तो अब क्या प्रयत्न करना है? समय और सम्पूर्णता को समीप लाओ। और एक बात विशेष ध्यान में यह रखनी है कि अपने रिकॉर्ड को ठीक रखने के लिए सर्व को रिगार्ड दो। जितना जो सर्व को रिगार्ड देता है उतना ही अपना रिकॉर्ड ठीक रख सकता है। दूसरे का रिगार्ड रखना अपना रिकॉर्ड बनाना है। अगर रिगार्ड कम देते हैं तो अपने रिकॉर्ड में कमी करते हैं। इसलिए इस मुख्य बात की आवश्यकता है। समझा। जैसे यज्ञ के मददगार बनना ही मदद लेना है वैसे रिगार्ड देना ही रिगार्ड लेना है। देते हैं लेने के लिए। एक बार देना अनेक बार लेने के हक़दार बन जाते हैं। जैसे कहते हैं छोटों को प्यार और बड़ों को रिगार्ड। लेकिन सभी को बड़ा समझ रिगार्ड देना यही सर्व के स्नेह को प्राप्त करने का साधन है। यह बात भी विशेष ध्यान देने योग्य है। हर बात में पहले आप। यह वृत्ति, दृष्टि और वाणी तथा कर्म में लानी चाहिए। जितना पहले आप कहेंगे उतना ही विश्व के बाप समान बन सकेंगे।

विश्व के बाप समान का अर्थ क्या है? एक तो विश्व के बाप समान बनना। दूसरा जब विश्व राजन बनेंगे तो भी विश्व के बाप ही कहलायेंगे ना। विश्व के राजन विश्व के बाप हैं ना। तो विश्व के बाप भी बनेंगे और विश्व के बाप समान भी बनेंगे। किससे? पहले आप करने से। समझा।

निर्माण बनने से प्रत्यक्ष प्रमाण बन सकेंगे। निर्माण बनने से विश्व का निर्माण कर सकेंगे। समझा। ऐसी स्थिति को धारण करने के लिए साक्षीपन की राखी बांधनी है। जब पहले से ही साक्षीपन की राखी बाँध के जायेंगे तो राखी की सर्विस सफलतापूर्वक होगी। समझा।

पार्टियों से

सम्मेलन कर रहे हो। सम्मेलन का अर्थ क्या है? सर्व आत्माओं का मिलन। सर्व आत्माओं का मिलन किससे करायेंगे? बाप से। आजकल समय कौन-सा है? सम्पूर्णता का समय समीप आने का है तो वर्तमान समय के प्रमाण निश्चित हुई पड़ी है। जैसे कल्प पहले भी पुरुषार्थ निमित्तमात्र कराया था। ऐसे ही नहीं कि पुरुषार्थ आज और प्राप्ति कब जो जाएगी। नहीं। अभी-अभी पुरुषार्थ अभी-अभी प्राप्ति। ऐसा पुरुषार्थ है? जब स्वयं प्राप्ति स्वरुप बनेंगे तब अन्य अनेक आत्माओ को प्राप्ति करा सकेंगे। अगर स्वयं प्राप्ति स्वरुप नहीं होंगे तो अन्य को कैसे प्राप्ति करा सकेंगे? अब नहीं करायेंगे तो कब करायेंगे। सुनाया था ना किकबशब्द भी ख़त्म। हर बात मेंअबहो। इतना परिवर्तन वाणी, कर्म और संकल्प में लाना है। संकल्प में भी अब यह न आये कि कब कर लेंगे या कब हो जायेगा। नहीं। अब हो ही जायेगा। ऐसा परिवर्तन करना है तब सर्विस की सफलता है। अगर स्वयं में ही कब होगा तो आप की प्रजा भी कहेगी कि अच्छा तो बहुत लगा कब कर लेंगे या कब हो जायेगा। कब पर छोड़ने वाले पिछली प्रजा के होते हैं। तो अब नजदीक की प्रजा बनानी है। नजदीक की प्रजा बनाने के लिए नाज़ुकपना छोड़ना पड़ेगा। नाजों से चलना छोड़ राजों से चलना है। अलबेलापन नाज़ुकपन होता है। जितना-जितना राज़युक्त होंगे उतना उतना नाज़ुकपन छूटता जायेगा। रूहानियत का एक ही रूप सदैव रहता है? रूप बदलने के बजाय यह शरीर का भान छोड़ना है इस प्रैक्टिस में रहना है। शरीर छोड़ने का अभ्यास होगा तो रूप बदलना छूट जायेगा। पढ़ाई में भी रेग्यूलर होना मुख्य बात होती है। वह भी सिर्फ आने में नहीं लेकिन हर बात में रेग्यूलर, जितना रेग्यूलर उतना ही रूलर बनेंगे। तो क्या करना पड़े? सभी बातों में रेग्यूलर। अमृतबेले उठने से लेकर हर कर्म, हर संकल्प और हर वाणी में भी रेग्यूलर। एक भी बोल ऐसा न निकले जो व्यर्थ हो। इस दुनिया के जो बड़े आदमी हैं वह लोग जब स्पीच करते हैं तो उन्हों के बोलने के शब्द भी फिक्स किये जाते हैं। आप भी बड़े से बड़े आदमी हो ना। तो आपके बोल भी फिक्स होने चाहिए। माया की मिक्स न हो। ऐसे रेग्यूलर बनने वालों की सर्विस सफल हुई पड़ी है। सम्मेलन का हर कार्य करते भी यह कभी नहीं भूलना कि हम विश्व के आगे साक्षात्कारमूर्त हैं। साक्षात्कार मूर्त बनने से आप के द्वारा बापदादा का साक्षात्कार स्वतः ही होगा। वह तब कर सकेंगे जब स्वयं को ज्ञान, योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे। जितना स्वयं को प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे उतना बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

06-08-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


दृष्टि से सृष्टि की रचना 

सभी अव्यक्त स्थिति में रहते व्यक्त में कार्य कर रहे हो? जैसे बाप अव्यक्त होते व्यक्त में प्रवेश हो कार्य करते हैं वैसे बाप समान बने हो? बाप समान बनेंगे तब ही औरों को भी बाप समान बना सकेंगे । अपने आप से पूछो कि दृष्टि बाप समान बनी है? वाणी और संकल्प बाप समान बने हैं? बाप को क्या स्मृति में रहता है? जानते हो? बाप की स्मृति में सदैव क्या रहता है और आपकी स्मृति में सदैव क्या रहता है? क्या अन्तर है? समान स्मृति होती है? कोई स्मृति रहती है कि कोई भी नहीं रहती है? स्मृति रहती है या स्मृति से भी परे हो? कोई बात में बाप के समान आपकी स्मृति रहती है? (नहीं) अन्त तक स्मृति में समानता आ जाएगी? (नम्बरवार) फर्स्ट बच्चे और बाप में फर्क रहेगा? बापदादा में फर्क रहेगा? समानता आ जाएगी । जैसे बेहद का बाप है वैसे दादा भी बेहद का बाप है । बापदादा के समीप, समानता होनी चाहिए । जितनी-जितनी समीपता उतनी समानता । अन्त में अब बच्चे भी अपनी रचना के रचयिता बनकर प्रैक्टिकल में अनुभव करेंगे । जैसे बाप को रचना को देख रचयिता के स्वरुप की स्मृति स्वतः रहती है ऐसी स्टेज नम्बरवार बच्चों की भी आनी है । दृष्टि से सृष्टि रचने आती है? आपकी रचना कैसी है? कुख की व नैनों की? दृष्टि से रचना रचेंगे? यह जो कहावत है की दृष्टि से सृष्टि बनेंगी । ऐसा दृष्टि जिससे सृष्टि बदल जाए । ऐसी दृष्टि में दिव्यता अनुभव करते हो? दृष्टि धोखा भी देती और दृष्टि पतितों को पावन भी करती । दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल ही जाती है । तो दृष्टि कहाँ तक बदली है? दृष्टि क्या बदलनी होती है, यह मालूम है? आत्मिक दृष्टि बनानी है । आत्मिक दृष्टि, दिव्य दृष्टि और अलौकिक दृष्टि बनी है? जहाँ देखते, जिसको देखते वह आत्मिक स्वरूप ही दिखाई दे । ऐसी दृष्टि बदली है? जिस दृष्टि में अर्थात् नैनों में खराबी होती है तो एक समय में दो चीज़ें दिखाई पड़ती हैं । ऐसे ही दृष्टि पूर्ण नहीं बदली है तो यहाँ भी दो चीज़ें दिखाई पड़ती हैं । देही और देह । कभी वह कभी वह । ऐसे होता है ना । कभी देह को देखते हैं कभी देही को । जब नैन ठीक होते हैं तो जो चीज़ जैसी होती है वैसी ही यथार्थ रूप में दिखाई पड़ता है । ऐसे ही यह दृष्टि भी जब बदल जाती है तो जो यथार्थ रूप है वह दिखाई पड़ता है । यथार्थ रूप है देही न की देह । जो यथार्थ रूप है वह दिखाई दे । इससे समझो कि दृष्टि ठीक है । दृष्टि के ऊपर बहुत ध्यान रखना है । दृष्टि बदल गयी तो कब धोखा नहीं देगी । साक्षात्कार दृष्टि से ही करेंगे और एक एक की दृष्टि में अपने यथार्थ रूप और यथार्थ घर तथा यथार्थ राज़धानी देखेंगे । इतनी दृष्टि में पावर है, अगर यथार्थ दृष्टि है तो । तो सदैव अपने को चेक करो कि अभी कोई भी सामने आये तो मेरी दृष्टि द्वारा क्या साक्षात्कार करेंगे । जो आपकी वृत्ति में होगा वैसा अन्य आप की दृष्टि से देखेंगे । अगर वृत्ति देह अभिमान की है, चंचल है तो आपकी दृष्टि से साक्षात्कार भी ऐसे ही होगा । औरों की भी दृष्टि वृत्ति चंचल होगी । यथार्थ साक्षात्कार कर नहीं सकेंगे । यह समझते हो? इन्हों की ट्रेनिंग है ना । इस ग्रुप के लिए मुख्य विषय है अपनी वृत्ति के सुधार से अपनी दृष्टि को दिव्य बनाना । कहाँ तक बनी हैं? नहीं बनी तो क्यों नहीं बनी है? इस पर इन्हों को स्पष्ट समझाना । सृष्टि न बदलने का कारण है दृष्टि का न बदलना । दृष्टि न बदलने का कारण है वृत्ति का न बदलना । दृष्टि बदल जाए तो सृष्टि भी बदल जाए । आजकल सभी बच्चों के प्रति विशेष इशारा बापदादा का यही है कि अपनी दृष्टि को बदलो । साक्षात्कारमूर्त बनो । देखने वाले ऐसे अनुभव करें कि यह नैन नहीं लेकिन यह एक जादू की डिब्बियां है । जैसे जादू की डिब्बी में भिन्न-भिन्न नजारें देखते हैं वैसे आपके नैनों में दिव्य रंगत देखें । नैन साक्षात्कार के साधन बन जाएँ ।
यह ग्रुप मालूम है कौन सा ग्रुप है? इनमें विशेषता क्या है? सारे विश्व के अन्दर विशेष आत्मायें हो । ऐसे तो नहीं समझते कि हम साधारण हैं । ऐसे कभी नहीं समझना । सारे विश्व के अन्दर विशेष आत्मायें कौन है? अगर आप विशेष आत्मायें न होती तो बाप ने अपना क्यों बनाया । अपने को विशेष आत्मा समझने से विशेषता आएगी । अगर साधारण समझेंगी तो कर्तव्य भी साधारण करेंगी । एक-एक आत्मा अपने को विशेष समझ औरों में भी विशेषता लानी है । तुम विशेष आत्मायें हो, यह नशा ईश्वरीय नशा है । देह अभिमान का नशा नहीं । ईश्वरीय नशा सदैव नैनों से दिखाई दे । तो इस ग्रुप विशेषता क्या है? आप अपने ग्रुप की विशेषता समझती हो? (कोरा कागज़ है, कईयों ने विभिन्न बातें सुनायी) इस ग्रुप का टाइटल तो बहुत बड़ा है । ट्रेनिंग के बाद यही गुण कायम रहे, यह भी ट्रेनिंग चाहिए । अभी तो विशेषताएं बहुत अच्छी सुन रही हो । कोरे कागज़ पर जो कुछ लिखा जाता है वह स्पष्ट होता है । जितना स्पष्ट उतना श्रेष्ठ । अगर स्पष्टता में कमी है तो श्रेष्ठता में भी कमी । और कुछ मिक्स नहीं करना है । कोई-कोई मिक्स बहुत करते हैं । इससे क्या होता है? यथार्थ रूप भी अयथार्थ हो जाता है । वही ज्ञान की बातें माया का रूप बन जाती हैं । इसलिए इस ग्रुप की यह विशेषता चित्र में दिखाई दे कि यह ग्रुप सदा स्पष्ट और श्रेष्ठ रहा । सदैव अपने यथार्थ रूप में रहे । जो बाप जैसी है उस रूप से जानकार धारण करनी है । और चलते चलना है । यह है स्पष्टता । इस ग्रुप को बापदादा क्या टाइटल देते हैं? जैसे कहावत है छोटे सुभानअल्ला । लेकिन बापदादा कहते हैं छोटे तो समान अल्लाह । सभी बातों में कदम-कदम में समानता रखो । लेकिन समानता कैसे आएगी? समानता के लिए दो बातें ध्यान में रखना है । साकार रूप में क्या विशेषताएं थी? एक तो सदैव अपने को आधारमूर्त समझो । सारे विश्व के आधारमूर्त । इससे क्या होगा कि जो भी कर्म करेंगे जिम्मेवारी से करेंगे । अलबेलापन नहीं रहेगा । जैसे बापदादा सर्व के आधारमूर्त हैं वैसे हरेक बच्चा विश्व के आधारमूर्त हैं । जो कर्म आप करेंगे, वह सभी करेंगे । संगम पर जो रस्म चलती है, भक्तिमार्ग में बदलकर चलती है । सारे विश्व के आप आधारमूर्त हो । हरेक को अपने को आधारमूर्त समझना है और दूसरा उद्धारमूर्त बनना है । जितना आप उद्धार करेंगे उतना औरों को भी उद्धार कर सकेंगे । जितना औरों का उद्धार करेंगे उतना अपना भी उद्धार करेंगे । अपना उद्धार नहीं करेंगे तो औरों का कैसे करेंगे । औरों का उद्धार तब करेंगे जब उद्धारमूर्त बनेंगे । छोटे होते भी कर्तव्य बाप के समान करना है । यह याद रखने से समानता आएगी । फिर जो इस ग्रुप का टाइटल दिया “छोटा बाप समान” वह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगा । यह भूलना नहीं । अच्छा अब क्या करना है? (टीका लगाना है) यह टीका भी साधारण टीका नहीं है । टीका किसलिए लगाते हैं, मालूम है? टीका सौभाग्य की निशानी है । जो बातें सुनी उन बातों में टिकने की निशानी टीका है । टीका भी मस्तक में टिक जाता है । तो बुद्धि में यह बातें टिक जाएँ इसलिए यह टीका दिया जाता है । और किसलिए है? (कईयों ने अपना विचार सुनाया) बापदादा जो सुनायेंगे वह और है । यह टीका (इंजेक्शन) सदा माया के रोगों से निवृत्त रहने का टीका है । सदा तंदुरुस्त रहने का भी टीका है । एक टीका जो आप सभी ने सुनाया और यह भी है । दोनों टीका लगाने हैं । एक है शक्तिशाली बनने का और दूसरा है सदा सुहाग और भाग्य में स्थित रहने का । दोनों टीका बापदादा लगाते हैं । निशानी एक, राज़ दो हैं । निशानी तो स्थूल होती है लेकिन राज़ दो हैं । इसलिए ऐसे तिलक नहीं लगाना । तिलक लगाना अर्थात् सदाकाल के लिए प्रतिज्ञा करना । यह टीका एक प्रतिज्ञा की निशानी है । सदैव हर बात में पास विद ऑनर बनेंगे । इस प्रतिज्ञा का यह तिलक है । इतनी हिम्मत है । पास नहीं बल्कि पास विद ऑनर । पास विद ऑनर और पास में क्या फर्क है? पास विद ऑनर अर्थात् मन में भी संकल्पों से सजा न खाएं । धर्मराज की सजाओं की तो बात पीछे हैं । परन्तु अपने संकल्पों की भी उलझन अथवा सजाओं से परे । इसको कहते हैं पास विद ऑनर । अपनी गलती से स्वयं को सजा देते हैं । उलझते हैं, पुकारते हैं, मूँझते हैं इससे भी परे । पास विद ऑनर इसको कहते हैं । ऐसी प्रतिज्ञा करने को तैयार हो? संकल्पों में भी न उलझें । वाणी, कर्म, सम्बन्ध, संपर्क की बात छोड़ दो । वह तो मोटी बात है । ऐसी प्रतिज्ञा वाला ग्रुप है? हिम्मतवान है ।
हिम्मत कायम रहेगी तो सर्व मददगार पत्ते रहेंगे । सहयोगी बनेंगे तो स्नेह मिलता रहेगा । जैसे वृक्ष में जो कोमल और छोटे पत्ते निकलते हैं, वह बहुत प्रिय लगते हैं । लेकिन चिड़िया भी कोमल पत्तों को ही खाती है । सिर्फ प्यारे रहना किसके? बापदादा के न कि माया रूपी चिड़ियों के । तो यह भी कोमल पत्ते हैं । कोमल पत्तों को कमाल करनी है । क्या कमाल करनी है? अपने ईश्वरीय चरित्र के ऊपर सर्व को आकर्षित करना है । अपने ऊपर नहीं, चरित्र के ऊपर । इस ग्रुप के ऊपर पूरा ध्यान है । इस ग्रुप को अपने ऊपर भी इतना ही ध्यान रखना है ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

22-10-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


फुल की निशानी – फ्लोलेस 

मास्टर जानी जाननहार बने हो? मास्टर नॉलेजफुल बने हो? मास्टर नॉलेजफुल बनने से सर्व नॉलेज को जान गए हो? मास्टर नॉलेजफुल, मास्टर जानी जाननहार बन गए हो वा बन रहे हो? अभी तक बन रहे हो । नॉलेजफुल बन गये व नॉलेजफुल बन रहे हो? नॉलेजफुल बन रहे हो वा ब्लिसफुल बन रहे हो? बन रहे हो वा बन गए हो?(बन रहे हैं) जहाँ तक अन्तिम स्टेज साकार रूप में देखी, वहाँ तक नॉलेजफुल, जानी जाननहार बने हो? साकार बाप के समान बनने में अन्तर रहा हुआ है इसलिए फुल नहीं कहते हो । कहाँ तक फुल बनना है उसका एग्ज़ाम्पुल स्पष्ट है ना? ज्यादा मास्टर रचयिता के नशे में रहते हो वा रचना के? किस नशे में ज्यादा समय रहते हो । आज ये प्रश्न क्यों पूछा? आज सर्व रत्नों को देख और परख रहे थे कि कहाँ तक फ्लोलेस हैं अर्थात् फुल हैं । अगर फुल नहीं तो फेल । तो आज फुल और फेल की रेखा देख रहे थे । तब प्रश्न पूछा कि फुल बने हो? जैसे बाप की महिमा है सभी बातों में फुल है ना । तो बच्चों को भी मास्टर नॉलेजफुल तो बनना ही है । सिर्फ नॉलेज में नहीं लेकिन मास्टर नॉलेजफुल । इसलिए प्रश्न भी पूछा कि मास्टर नॉलेजफुल बने हो? मास्टर तो हो ना । मास्टर नॉलेजफुल में भी ना हो सकती है क्या? अगर आप के दो हिसाब हैं तो बापदादा के भी दो राज़ हैं । आज एक-एक में तीन बातें विशेष रूप से देख रहे थे । आज अमृतवेले की दिनचर्या सुना रहे हैं कि क्या देख रहे थे । आज बापदादा ने एक-एक रत्न की तीन बातें देखी । वह कौन-सी? यह भी एक ड्रिल कराते हैं ।
आज तीन बातें यह देख रहे थे – एक तो हरेक की लाइट, दूसरा माईट और तीसरा राईट । राईट शब्द के दो अर्थ हैं । एक तो राईट यथार्थ को कहा जाता है, दूसरा राईट अधिकार को कहा जाता है । राईट, अधिकारी भी कितने बने हैं और साथ साथ यथार्थ रूप में कहाँ तक हैं । तो लाइट, माईट और राईट । यह तीन बातें देख रहे थे । रिजल्ट क्या निकली वह भी बताते हैं । अभी सर्विस बहुत की है ना । तो वह रिजल्ट देख रहे थे । अभी तक सिर्फ आवाज़ फैलने तक रिजल्ट है । आवाज़ फैलाने में पास हो लेकिन आत्माओं को बाप के समीप लाने का आह्वान अभी करना है । आवाज़ फैला है लेकिन आत्माओं का आह्वान करना है । आह्वान करना और बाप के समीप लाना यह पुरुषार्थ अभी रहा हुआ है । क्योंकि स्वयं भी आवाज़ से परे रहने के इच्छुक हैं, अभ्यासी नहीं हैं । इसलिए आवाज़ से आवाज़ फैल रहा है । लेकिन जितना स्वयं आवाज़ से परे होकर सम्पूर्णता का आह्वान अपने में करेंगे उतना आत्माओं का आह्वान कर सकेंगे । अभी भल आह्वान करते भी हो लेकिन रिज़ल्ट आवागमन में है । आवागमन में आते भी हैं । जाते भी हैं । लेकिन आह्वान के बाद आहुति बन जाएँ, वह काम अभी करना है । नॉलेज के तरफ आकर्षित होते हैं लेकिन नॉलेजफुल के ऊपर आकर्षित करना है । अभी तक मास्टर रचयिता कहाँ-कहाँ रचना के आकर्षण में आकर्षित हो जाते हैं । इसलिए जो जितना और जैसा स्वयं है उतना और वैसा ही सबूत दे रहे हैं । अभी तक शक्ति रूप, शूरवीरता का स्वरुप नैनों और चैनों में नहीं है ।
शक्ति वा शूरवीरता की सूरत ऐसी दिखाई दे जो कोई भी आसुरी लक्षण वाले हिम्मत न रख सकें । लेकिन अभी तक आसुरी लक्षण के साथ-साथ आसुरी लक्षण वाले कहाँ-कहाँ आकर्षित कर लेते हैं । जिसको रॉयल माया के रूप में आप कहते हो वायुमण्डल ऐसा था । वाइब्रेशन ऐसे थे वा समस्या ऐसी थी इसलिए हार हो गयी । कारण देना गोया अपने को कारागार में दाखिल करना है । अब समय बीत चुका । अब कारण नहीं सुनेंगे । बहुत समय कारण सुने । लेकिन अब प्रत्यक्ष कार्य देखना है न कि कारण । अभी थोड़े समय के अन्दर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे । क्योंकि अब अन्तिम समय है । अनुभव करेंगे कि इतना समय बाप के रूप में कारण भी सुने, स्नेह भी दिया, रहम भी किया, रियायत भी बहुत की लेकिन अभी यह दिन बहुत थोड़े रह गए हैं । फिर अनुभव करेंगे कि एक संकल्प के भूल एक का सौगुणा दण्ड कैसे मिलता है । अभी-अभी किया और अभी-अभी इसका फल व दण्ड प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करेंगे अभी वह समय बहुत जल्दी आने वाला है । इसलिए बापदादा सूचना देते हैं क्योंकि फिर भी बापदादा बच्चों के स्नेही है ।
अब मास्टर रचयितापन का नशा धारण कर रचना के सर्व आकर्षण से अपने को दूर करते जाओ । बाप के आगे रचना हो लेकिन अब समय ऐसा आने वाला है जो मास्टर रचयिता, मास्टर नॉलेजफुल बनकर उस आकर्षक पावरफुल स्थिति में स्थित न रहे तो रचना और भी भिन्न-भिन्न रंग-ढंग, रूप और रचेगी । इसलिए फुल बनने के लिए स्टेज पर पूरी रीति स्थित हो जाओ तो फिर कहाँ भी फेल नहीं होंगे । अभी बचपन की भूलें, अलबेलेपन की भूलें, आलस्य की भूलें, बेपरवाही की भूलें रही हुई हैं । इन चार प्रकार की भूलों को ऐसे भूल जाओ जैसे सतयुगी दुनिया में भूल जायेंगे । तो ऐसा पावरफुल शक्तिस्वरूप, शस्त्रधारी स्वरूप, सदा जागती ज्योति स्वरूप अपना प्रत्यक्ष रूप दिखाओ । अभी आपके अपने अपने भक्त आप गुप्त वेशधारी देवताओं को फिर से पाने के लिए तड़फ रहे हैं । आप के सम्पूर्ण मूर्त प्रत्यक्ष होंगे तब तो आप के भक्त प्रत्यक्ष रूप में अपने इष्ट को पा सकेंगे । अभी तो कई प्रकार के हैं । भल आवाज़ सुनेंगे लेकिन यह भी याद रखना एक तरफ आसुरी आत्माओं की आवाज़ और भी आकर्षक तथा फुल फ़ोर्स में होंगी । दूसरी तरफ आप के भक्तों की आवाज़ भी कई प्रकार से और फुल फ़ोर्स में होंगी । अभी प्रत्यक्ष रूप में क्या लाना है और क्या नहीं लाना है वह भी परखना बुद्धि का काम है । इसलिए अभी रियायत का समय गया । अभी रूहानियत का समय है । अगर रूहानियत नहीं होगी तो भिन्न-भिन्न प्रकार की माया की रंगत में आ जायेंगे । इसलिए आज बापदादा फिर भी सूचना दे रहे हैं ।
जैसे मिलिट्री मार्शल पहले एक सीटी बजाते हैं फिर लास्ट सीटी होती है फाइनल । तो आज नाज़ुक समय की सूचना की फर्स्ट सीटी है । सीटी बजाते हैं कि तैयार हो जायें । इसलिए अभी परीक्षाओं के पेपर देने के लिए तैयार हो जाओ । ऐसे नहीं समझो बापदादा तो अव्यक्त हैं । हम व्यक्त में क्या भी करें । लेकिन नहीं । हरेक के एक-एक सेकण्ड के संकल्प का चित्र अव्यक्त वतन में स्पष्ट होता रहता है । इसलिए बेपरवाह नहीं बनना है । ईश्वरीय मर्यादाओं में बेपरवाह नहीं बनना है । आसुरी मर्यादाओं वा माया से बेपरवाह बनना है न कि ईश्वरीय मर्यादाओं से बेपरवाह बनना है । बेपरवाही का कुछ-कुछ प्रवाह वतन तक पहुँचता है । इसलिए आज बापदादा फिर से याद दिला रहे हैं । सम्पूर्णता को समीप लाना है । समस्याओं को दूर भगाना है और सम्पूर्णता को समीप लाना है । कहाँ सम्पूर्णता के बजाय समस्याओं को बहुत सामने रखते हैं । समस्याओं का सामना करें तो समस्या समाप्त हो जाये । सामना करना नहीं आता है तो एक समस्या से अनेक समस्यायें आ जाती हैं । पैदा हो और वहाँ ही ख़त्म कर दें तो वृद्धि न हो । समस्या को फौरन समाप्त कर देंगे तो फिर वंश पैदा नहीं होगा । अंश रहता है तो वंश होता है । अंश को ही ख़त्म कर देंगे तो वंश कहाँ से आएगा । तो समझा समस्या के बर्थ कण्ट्रोल करना है । अभी इशारे में कह रहे हैं फिर सभी प्रत्यक्ष रूप में आपकी स्थिति बोलेगी । छिप नहीं सकेंगे । जैसे नारद की सूरत सभा के बीच छिप सकी? अभी तो बाप गुप्त रखते हैं लेकिन थोड़े समय के बाद फिर गुप्त नहीं रह सकेगा । उनकी सूरत सीरत को प्रत्यक्ष करेगी । जैसे साइंस में आजकल इन्वेंशन करते जाते हैं । कोई भी गुप्त चीज़ स्वतः ही प्रत्यक्ष हो जाए । ऐसे ही साइलेंस की शक्ति का भी स्वतः ही प्रत्यक्ष रूप हो जायेगा । कहने वा करने से नहीं होगा । समझा
तो भविष्य समय की सूचना दे रहे हैं । इसलिए अब नाज़ुक समय का सामना करने के लिए नाज़ुकपन छोड़ना है । तब ही नाज़ुक समय का सामना कर सकेंगे । अच्छा । हर्षितमुख रहने का जो गुण है वह पुरुषार्थ में बहुत मददगार बन सकता है । जैसे सूरत हर्षित रहती है वैसे आत्मा भी सदैव हर्षित रहे । इस नैचुरल गुण को आत्मा में लाना है । सदा हर्षित रहेंगे तो फिर माया की कोई आकर्षण नहीं होगी । यह बाप की गारंटी है । लेकिन वह तब होगा जब सदैव आत्मा को हर्षित रखेंगे । फिर बाप का काम है माया के आकर्षण से दूर रखना । यह गारंटी बाप आप से विशेष कर रहे हैं । क्योंकि जो आदि रत्न होते हैं उन्हों से आदिदेव का विशेष स्नेह होता है । तो आदि को अनादी बनाओ । जब अनादी बन जायेंगे तो फिर माया की आकर्षण नहीं होगी । समस्याएं सामने नहीं आयेंगी । जब बाप का स्नेह स्मृति में रहेगा तो सर्वशक्तिमान के स्नेह के आगे समस्य क्या है । कहाँ वह स्नेह और कहाँ समस्या । वह राई वह पहाड़, इतना फर्क है । तो अनादि रत्न बनने के लिए सर्वशक्तिमान की शक्ति और स्नेह को सदैव साथ रखना है । अपने को अकेला कभी भी नहीं समझो । साथी के बिना जीवन का एक सेकण्ड भी न हो । जो स्नेही साथी होते हैं वह अलग नहीं होते हैं । साथी को साथ न रखने से, अकेला होने से माया जीत लेती है ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

23-10-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


महारथी बनने का पुरुषार्थ 

रूहानी ड्रिल आती है, ड्रिल में क्या करना होता है? ड्रिल अर्थात् शरीर को जहाँ चाहे वहाँ मोड़ सकें और रूहानी ड्रिल अर्थात् रूह को जहाँ जैसे और जब चाहे वहाँ स्थित कर सकें अर्थात् अपनी स्थिति जैसे चाहे वैसी बना सकें, इसको कहते हैं रूहानी ड्रिल । जैसे सेना को मार्शल वा ड्रिल मास्टर जैसे इशारे देते हैं वैसे ही करते हैं । ऐसे स्वयं ही मास्टर वा मार्शल बन जहाँ अपने को स्थित करना चाहें वहाँ कर सकें । ऐसे अपने आपके ड्रिल मास्टर बने हो? ऐसे तो नहीं की मास्टर कहे हैंड्स डाउन और स्टूडेंट्स हैंड्स अप करें । मार्शल कहे राईट तो सेना करे लेफ्ट । ऐसे सैनिकों वा स्टूडेंट्स को क्या किया जाता है? डिसमिस । तो यहाँ भी स्वयं ही डिसमिस हो ही जाते हैं – अपने आधिकार से । प्रैक्टिस ऐसी होनी चाहिए जो एक सेकण्ड में अपनी स्थिति को जहाँ चाहो वहाँ टिका सको । क्योंकि अब युद्ध स्थल पर हो । युद्ध स्थल पर सेना अगर एक सेकण्ड में डायरेक्शन को अमल में न लाये तो उनको क्या कहा जावेगा? इस रूहानी युद्ध पर भी स्थिति को स्थित करने में समय लगाते हैं तो ऐसे सैनिकों को क्या कहें । आज बापदादा पुरुषार्थी, महारथी बच्चों को देख रहे हैं । अपने को जो महारथी समझते वो हाथ उठाओ (थोड़ों ने हाथ उठाया) जो महारथी नहीं है वह अपने को क्या समझते हैं? अपने को घोड़ेसवार समझते हैं वह हाथ उठावें । जिन्होंने महारथियों में हाथ नहीं उठाया उन्हों से बापदादा एक प्रश्न पूछ रहे हैं । अपने को बापदादा का वारिस समझते हो? जो अपने को घोड़ेसवार समझते हैं वह अपने को वारिस समझते हैं? वारिस का पूर्ण अधिकार लेना है वा नहीं? जब लक्ष्य पूरा वर्सा लेने का है तो घोड़ेसवार क्यों? अगर घोड़ेसवार हैं तो मालूम है नम्बर कहाँ जायेगा? सेकण्ड ग्रेड वाले कहाँ आयेंगे इतनी परवरिश लेने के बाद भी सेकण्ड ग्रेड । अगर बहुत समय से सेकण्ड ग्रेड पुरुषार्थ ही रहा तो वर्सा भी बहुत समय सेकण्ड ग्रेड मिलेगा । बाकी थोड़ा समय फर्स्ट ग्रेड में अनुभव करेंगे । सर्वशक्तिमान बाप के बच्चे कहलाने वाले और व्यक्त-अव्यक्त द्वारा पालना लेने वाले फिर सेकण्ड ग्रेड । ऐसे मुख से कहना भी शोभता नहीं है । या तो आज से अपने को सर्वशक्तिमान के बच्चे न कहलाओ ।
बापदादा ऐसे पुरुषार्थियों को बच्चे न कहकर क्या कहते हैं? मालूम हैं? बच्चे नहीं कच्चे हैं । अभी तक भी ऐसा पुरुषार्थ करना बच्चों के स्वमान लायक नहीं दिखाई पड़ता है । इसलिए फिर भी बापदादा कहते हैं कि बीती सो बीती करो । अब से अपने को बदलो । महारथी बनने लिए सिर्फ दो बातें याद रखो । कौन-सी? एक तो अपने को सदैव साथी के साथ रखो । साथी और सारथी, वह है महारथी । पुरुषार्थ में कमज़ोरी के दो कारण हैं । बाप के स्नेही बने हो लेकिन बाप को साथी नहीं बनाया है । अगर बापदादा को सदैव साथी बनाओ तो जहाँ बापदादा साथ है वहाँ माया दूर से मूर्छित हो जाती है । बापदादा को अल्प समय के लिए साथी बनाते हैं इसलिए शक्ति की इतनी प्राप्ति नहीं होती है । सदैव बापदादा साथ हो तो सदैव बापदादा से मिलन मनाने में मगन हों । और जो मगन होता है उसकी लगन और कोई तरफ लग न सकें । शुरू-शुरू में बाप से बच्चों का क्या वायदा हुआ है? तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से रूह को रिझाऊं । यह अपना वायदा भूल जाते हो? अगर सारे दिनचर्या में हर कार्य बाप के साथ करो तो क्या माया डिस्टर्ब कर सकती है? बाप के साथ होंगे तो माया डिस्टर्ब नहीं करेगी । माया का डिस्ट्रकशन हो जायेगा । तो भल बाप के स्नेही बने हो लेकिन साथी नहीं बनाया है । हाथ पकड़ा है साथ नहीं लिया ही इसलिए माया द्वारा घात होता है । गलतियों का कारण है गफलत । गफ़लत गलतियां कराती है ।
अगर रूह को न देख रूप तरफ आकर्षित होते हैं तो समझो मुर्दे से प्रीत कर रहे हैं । मुर्दे से प्रीत रखने वाले को समझना चाहिए कि हमारा भविष मुर्दाघाट में कार्य करने का है । जिस समय ऐसा संकल्प भी आये तो मुर्दा घाट का पार्ट समझो । सभी को कहते हो ना एम और ऑब्जेक्ट को सामने रखो । तो जो भी कार्य करते हो, जो भी संकल्प करते हो उसके लिए भी लक्ष्य और प्राप्ति अर्थात् एम ऑब्जेक्ट सामने रखो । सर्वशक्तिमान बाप वरदाता से अपना कल्प-कल्प इसी पार्ट का वर्सा लेने लिए आये हो । मुर्दे को सुरजीत करने वाले मुर्दा घाट में पार्ट नूँधने लिए आये हैं? अपने से पूछो । जो भी बच्चा अपनी गलतियों को एक बार बाप के सामने रखता है उनको यह समझना चाहिए कि बाप के आगे अपनी कमियों को रखने के बाद अगर दुबारा कर लिया तो क्षमा के सागर के साथ 100 गुणा सजा से बचाने लिए सदैव बापदादा को अपने सामने रखो । हर कदम बापदादा को फालो करते चलना है । हर संकल्प को हर कार्य को अव्यक्त बल से अव्यक्त रूप द्वारा वेरीफाई कराओ । जैसे साकार में साथ होता है तो वेरीफाई कराने बाद प्रैक्टिकल में आते हैं । वैसे ही बापदादा को अव्यक्त रूप से सदैव सम्मुख वा साथ रखने से हर संकल्प और हर कार्य वेरीफाई कराकर फिर करने से कोई भी व्यर्थ विकर्म नहीं होगा । कोई द्वारा भी कोई बात सुनते हो तो बात का साज़ में न जाकर राज़ को जानों । राज़ को छोड़ साज़ को सुनने से नाज़ुकपन आता है । कभी भी नहीं सोचो कि फलाना ऐसे कहता है तब ऐसा होता है लेकिन जो करता है सो पाता है । यह सामने रखो । दूसरे के कमाई का आधार नहीं लेना है । न दूसरे की कमाई में आँख जानी चाहिए । जिस कारण ही ईर्ष्या होती है । इसके लिए सदैव बाप का यह स्लोगन याद रखो की अपनी घोंट तो नशा चाहे । दूसरे के नशे को निशाना नहीं बनाओ । लेकिन बापदादा के गुण और कर्तव्य को निशाना बनाओ । सदैव बापदादा के कर्तव्य की स्मृति रखो कि बापदादा के साथ मैं भी अधर्म के विनाश अर्थ निमित्त हैं वह स्वयं फिर अधर्म का कार्य वा दैवी मर्यादा को तोड़ने का कर्तव्य कैसे कर सकते हैं । मैं मास्टर मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ । तो मर्यादाओं को तोड़ नहीं सकते हैं । ऐसी स्मृति रखने से समान और सम्पूर्ण स्थिति हो जाएगी । समझा । सोचो कम, कर्तव्य अधिक करना है । सिर्फ सोचने में समय नही गंवाना है । सृष्टि के क़यामत के पहले कमज़ोरी और कमियों की क़यामत करो ।
भट्ठी वालों ने भट्ठी में अपना रूप और रंग और रौनक बदली की है । अनेक रूप बदलना मिटाया है? सदा के लिए रूहानी रूप दिखाई दे ऐसा अपने को बनाया है? उलझनों का नाम निशान न रहे ऐसा अपने को उज्जवल बनाया है? अल्पकाल के लिए प्रतिज्ञा की है वा अन्तकाल तक प्रतिज्ञा की है? अपनी पुरानी बातों, पुराने संस्कारों को ऐसा परिवर्तन में लाना है । जैसे जन्म परिवर्तन होने के बाद पुराने जन्म की बातें भूल जाती हैं । ऐसा पुराने संस्कारों को भस्म किया है वा अस्थियाँ रख दी है? अस्थियों में फिर से भूत प्रवेश हो जाता है । इसलिए अस्थियों को सम्पूर्ण स्थिति के सागर में समा के जाना है । कहाँ छिपाकर ले न जाना । नहीं तो अपनी अस्थियाँ स्थिति को परेशान करती रहेंगी । संकल्पों की समाप्ति करनी है । अच्छा –
तुम हरेक बच्चे को पुरुषार्थ करना है तख़्तनशीन बनने का न कि तख़्तनशीन के आगे रहने का । तख़्तनशीन तब बनेंगे जब अब समीप बनेंगे । जितना जो समीप होगा उतना समानता में रहेगा । तुम बच्चों के नैनों को कोई देखे तो उनको मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता दिखाई दे । ऐसा नयनों में जादू हो । तो आप के नैन कितनी सेवा करेंग नैन भी सर्विस करेगा तो मस्तिष्क भी सर्विस करेगा । मस्तिष्क क्या दिखाता है, आत्माओं को? बाप । आपके मस्तिष्क से बाप का परिचय हो ऐसी सर्विस करनी है तब समीप सितारे बनेंगे । जैसे साकार में बाप को देखा मस्तक और नैन सर्विस करते थे । मस्तिष्क में ज्योति बिंदु रहता था, नैनों में तेज त्रिमूर्ति के याद का । ऐसे समान बनना है । समान बनने से ही समीप बनेंगे । जब आप स्वयं ऐसी स्थिति में रहेंगे तो माया क्या करेगी, माया स्वयं ख़त्म हो जाएगी । तुम बच्चों को रेग्यूलर बनना है । बापदादा रेग्यूलर किसको कहते हैं । रेग्यूलर उनको कहा जाता है जो सुबह से लेकर रात तक जो कर्तव्य करता है वह श्रीमत के प्रमाण करता है । सब में रेग्यूलर । संकल्प में, वाणी में, कर्म में, चलने में, सोने में, सबमें रेग्यूलर । रेग्यूलर चीज़ अच्छी होती है । जितना जो रेग्यूलर होता है उतना दूसरों की सर्विस ठीक कर सकता है । सर्विसएबुल अर्थात् एक संकल्प भी सर्विस के सिवाए न जाए । ऐसे सर्विसएबुल और कोई सबूत बना सकते हैं । सर्विस केवल मुख की ही नहीं लेकिन सर्व कर्मेन्द्रियाँ सर्विस करने में तत्पर हो । जैसे मुख बिज़ी होता है वैसे मस्तिष्क, नैन सर्विस में बिज़ी हो । सर्व प्रकार की सर्विस कर सर्विस का सबूत निकालना है । एक प्रकार की सर्विस से सबूत नही निकलता सिर्फ सराहना करते हैं । चाहिए सबूत, तो सबूत देने लिए सर्व प्रकार की सर्विस में सदा तत्पर रहना है । सर्विसएबुल जितना होगा वैसा आप समान बनाएगा । फिर बाप समान बनाएगा ।
 

अच्छा !!!

Brahma Kumaris Brahma Kumaris

29-10-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


दीपमाला का सच्चा रहस्य 

आज बापदादा दीपमाला देख रहे हैं । यह दीपों की माला है ना । लोग दीपमाला मनाते हैं, बापदादा दीपमाला देख रहे हैं । दीपक कौन से अच्छे लगते हैं? जो दीप अखण्ड और अटल होता है, जिसका घृत कभी खुटता नहीं, वही अखण्ड जलता है । अपने को ऐसा दीपक समझते हो? ऐसे दीपकों की यादगार माला है । अपने को माला के बीच चमकता हुआ दीपक समझते हो? ऐसे समझते हो कि हमारा यादगार आज मना रहे हैं । दीपमाला के दिन दो बातें विशेष ध्यान पर रखनी होती है । दीपमाला पर किन बातों का ध्यान रखते हैं? (सफाई रखते हैं, नया चोपड़ा बनाते हैं) परन्तु लक्ष्य क्या रखते हैं? कमाई का । उस लक्ष्य को लेकर सफाई भी करते हैं । तो सफाई भी सभी प्रकार से करना है और कमाई का लक्ष्य भी बुद्धि में रखना है । यह सफाई और कमाई का दोनों कार्य आप सभी ने किया है? अपने आप से संतुष्ट हो? जब कमाई है तो सफाई तो ज़रूर होगी ना । इन दोनों बातों में संतुष्टता होना आवश्यक है । लेकिन यह संतुष्टता आएगी उनको जो सदैव दिव्यगुणों का आह्वान करते रहेंगे । जितना जो आह्वान करेंगे उतना इन दोनों में सदा सन्तुष्ट रहेंगे । जितना-जितना दिव्यगुणों का आह्वान करते जायेंगे उतना अवगुण आहुति रूप में ख़त्म होते जायेंगे । फिर क्या होगा? नए संस्कारों के नए वस्त्र धारण करेंगे । अभी आत्मा ने नए संस्कारों रूपी नए वस्त्र धारण किये हैं कि कभी-कभी पुराने वस्त्रों से प्रीत होने के कारण वह भी धारण करते हैं । जब मरजीवा बने, नया जन्म, नए संस्कारों को भी धारण किया फिर पुराने संस्कार रूपी वस्त्रों को कभी क्यों धारण कर लेते? क्या पुराने वस्त्र अति प्रिय लगते हैं? जो चीज़ बाप को प्रिय नहीं वह बच्चों को प्रिय क्यों? आज तक जो कमज़ोरी, कमियाँ, निर्बलता, कोमलता रही हुई है वह सभी पुराने खाते आज से समाप्त करना, यही दीपमाला मनाना है । अल्पकाल के लिए नहीं, लेकिन सदाकाल के लिए और सर्व रूपों से समाप्त करना, यह है दीपावली मनाना । दीपावली को ताजपोशी का दिवस कहते हैं । आज आप सभी के कौन सी ताजपोशी मनाई है? ताजपोशी के दिन क्या किया जाता है? राज सिंहासन का समारोह कब देखा है? स्मृति आती है । कितनी बार देखा होगा? अनेक बार । दिन प्रतिदिन ऐसे अनुभव करेंगे जैसे इस जन्म में प्रत्यक्ष देखी हुई बातें स्पष्ट रूप में इमर्ज रहती है । वैसे भविष्य राजाई के संस्कार जो आत्मा में समाये हुए हैं वह जैसे कल की देखी बात है । ऐसा अनुभव करते रहेंगे । ऐसे प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करेंगे । इससे समझना अब हम अपने सम्पूर्ण स्थिति और अपने राज्य के समीप पहुँच गए हैं । सतयुगी संस्कार सोचने वा स्मृति में लाने से नहीं, लेकिन स्वतः ही और स्पष्ट रीति जीवन में आते रहेंगे । इस दुनिया में रहते हुए भी नयनों में सतयुगी नज़ारे दिखाई देंगे न सिर्फ इतना लेकिन अपना भविष्य स्वरुप जो धारण करना है वह भी आँखों के आगे बार-बार स्पष्ट दिखाई देगा । बस अभी –अभी यह छोड़ा, वह सजा-सजाया चोला धारण करना है ऐसे अनुभव करते रहेंगे । इस संगमयुग पर ही सतयुगी स्वरुप का अनुभव करेंगे । पुरुषार्थ और प्रालब्ध दोनों रूपों से हरेक को प्रत्यक्ष देखेंगे । तो आज दीपावली के दिन दिव्यगुणों का आव्हान करना है । अभी फिर भी मुख से निकलता है कि हाँ कल्प पहले यह किया होगा । लेकिन पीछे यह शब्द बदल जायेंगे । इस कल्प की बात हो जाएगी । 5000 वर्ष की बात इतनी स्पष्ट स्मृति में आएगी जैसे कल की । जैसे साइंस के साधन से दूर की चीज़ भी समीप और स्पष्ट दिखाई पड़ती है । जिसको दूरबीन कहते हैं । तो आप का तीसरा नेत्र कल्प पहले की बातें समीप और स्पष्ट देखेगा वा अनुभव करेगा । तो पुराने संस्कारों की चौपडियों को फिर से भूल से भी नहीं देखना । पुराने संस्कारों का चोला फिर-फिर धारण नहीं करना, नवीनता को धारण करना । यही आज के दिन का मन्त्र है । रत्नजड़ित चोला छोड़ जड़जड़ीभूत चोले से प्रीत नहीं लगाना । सदैव बुद्धि में बापदादा की स्मृति व निशाना और आनेवाले राज्य के नज़ारें, नयनों में और मुख में सदैव बापदादा का नाम हो । इसको कहते हैं बापदादा के अति स्नेही और समीप रत्न । सभी ने श्रेष्ठ और समीप रत्न बनने का दांव लगाया है या जो भी मिले वह अच्छा? अगर इस बात में संतुष्ट रहे तो सम्पूर्ण नहीं बन सकेंगे । इसलिए सदैव यह दांव लगाओ कि हम विजयी और सम्पूर्ण बनकर ही दिखायेंगे । कमज़ोरी के शब्द समाप्त । करेंगे, हो ही जायेगा, पुरुषार्थ कर रहे हैं, यह शब्द भी न निकले । करके ही दिखायेंगे, बनकर ही दिखायेंगे । यह है निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों के बोल । और वह है कमानधारी बच्चों का बोल । बनना है स्वदर्शनचक्रधारी लेकिन बन जाते हैं कमानधारी । कई सोचते हैं कोई तो वह भी बनेंगे ना । इस बात में दयालू न बनो । कोई तो बनेंगे इसलिए हम ही बन जाएँ । ऐसे बनने वाले बहुत हैं ।
 

अच्छा !!!

01-11-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


बाप समान बनने की युक्तियाँ” 

आज हिम्मते बच्चे मददे बाप का प्रत्यक्ष सबूत देख रहे हैं। जो गायन है उसका साकार रूप देख रहे हैं। एक कदम बच्चे आगे आते हैं तो हजार गुणा बाप भी कितना दूर से सम्मुख आते हैं। आप कितना माइल से आये हो? बापदादा कितना दूर से आये हैं? ज्यादा स्नेही कौन? बच्चे वा बाप? इसमें भी बाप बच्चों को आगे बढ़ाते हैं। अभी भी इस पुरानी दुनिया में बाप से ज्यादा आकर्षण करने वाली वस्तु क्या है? जब मालूम पड़ गया कि यह पुरानी दुनिया है, सर्व सम्बन्ध, सर्व-सम्पत्ति, सर्व पदार्थ अल्पकाल और दिखावा-मात्र है। फिर भी धोखा क्यों खाते हो? लिप्त क्यों होते हो? अपने गुप्त स्वरुप और बाप के गुप्त स्वरुप को प्रत्यक्ष करो तब बाप के गुप कर्तव्य को प्रत्यक्ष कर सकेंगे। आपका शक्ति स्वरूप प्रख्यात हो जायेगा। अभी गुप्त है। सिर्फ एक शब्द याद रखो तो अपने गुप्त रूप को प्रैक्टिकल में ला सकते हो। वह कौन-सा शब्द है? सिर्फ अन्तर शब्द। अन्तर में दोनों रहस्य आ जाते हैं। अन्तर कन्ट्रास्ट को भी कहा जाता है और अन्तर अन्दर को भी कहा जाता है। जैसे कहते हैं अन्तर्मुख वा अन्तर्यामी। तो अन्तर शब्द से दो अर्थ सिद्ध हो जाते हैं। अन्तर शब्द याद आने से एक तो हरेक बात का कन्ट्रास्ट करेंगे कि यह श्रेष्ठ है वा नहीं। दूसरा अन्तर की स्थिति में रहने से वा अन्तर स्वरुप में स्थित होने से आपका गुप्त स्वरुप प्रत्यक्ष हो जायेगा। एक शब्द को याद रखने से जीवन को बदल सकते हो। अभी जैसे समय की रफ़्तार चल रही है उसी प्रमाण अभी यह पाँव पृथ्वी पर नहीं रहने चाहिए। कौन सा पाँव? जिससे याद की यात्रा करते हो। कहावत है ना कि फरिश्तों के पाँव पृथ्वी पर नहीं होते। तो अभी यह बुद्धि पृथ्वी अर्थात् प्रकृति के आकर्षण से परे हो जाएगी फिर कोई भी चीज़ नीचे नहीं ला सकती है। फिर प्रकृति को अधीन करने वाले हो जायेंगे।

न कि प्रकृति के अधीन होने वाले। जैसे साइंस वाले आज प्रयत्न कर रहे हैं, पृथ्वी से परे जाने के लिए। वैसे ही साइलेंस की शक्ति से इस प्रकृति के आकर्षण से परे, जब चाहें तब आधार लें, न कि प्रकृति जब चाहे तब अधीन कर दे। तो ऐसी स्थिति कहाँ तक बनी है? अभी तो बापदादा साथ चलने के लिए सूक्ष्मवतन में अपना कर्तव्य कर रहे हैं लेकिन यह भी कब तक? जाना तो अपने ही घर में हैं ना। इसलिए अभी जल्दी-जल्दी अपने को ऊपर की स्थिति में स्थित करने का प्रयत्न करो। साथ चलना, साथ रहना और फिर साथ में राज्य करना है ना। साथ कैसे होगा? समान बनने से। समान नहीं बनेंगे तो साथ कैसे होगा। सभी साथ उड़ना है, साथ रहना है। यह स्मृति में रखो तब अपने को जल्दी समान बना सकेंगे। नहीं तो कुछ दूर पड़ जायेंगे। वायदा भी है ना कि साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ ही राज्य करेंगे। सिर्फ राज्य करने समय बाप गुप्त हो जाते हैं। तो साथ कैसे रहेंगे? समान बनने से। समानता कैसे लायेंगे? साकार बाप के समान बनने से। अभी बापदादा कहते हो ना। उनमें समानता कैसे आई? समर्पणता से समानता सेकण्ड में आई। ऐसे समर्पण करने की शक्ति चाहिए। जब समर्पण कर दिया तो फिर अपना वा अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता। जैसे किसको कोई चीज़ दी जाती है तो फिर अपना अधिकार और अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता है। अगर अन्य कोई अधिकार रखे भी तो उसको क्या कहेंगे? यह तो मैंने समर्पण कर ली। ऐसे हर वस्तु सर्व समर्पण करने के बाद अपना वा दूसरों का अधिकार रह कैसे सकता है। जब तक अपना वा अन्य का अधिकार रहता है तो इससे सिद्ध है कि सर्व समर्पण में कमी है। इसलिए समानता नहीं आती। जो सोच-सोच कर समर्पण होते हैं उनकी रिजल्ट अब भी पुरुषार्थ में वही सोच अर्थात् संकल्प विघ्न रूप बनते हैं। समझा।

अच्छा !!!


05-11-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


डिले इज़ डेन्जर” 

हरेक अपने लाइट और माईट को देख परख सकते हैं? अपने आप को परखने की शक्ति अपने में अनुभव करते हो? अपने को अब तक पुरुषार्थी मूर्त समझते हो वा साक्षात् और साक्षात्कार मूर्त भी समझते वा अनुभव करते हो? वा समझते हो कि यह अन्तिम स्टेज है? अभी-अभी आपके भक्त आपके सम्मुख आयें तो आपकी सूरत से उनकी किस मूर्त का साक्षात्कार होगा। कौन-सा साक्षात्कार होगा? साक्षात्कार मूर्त सदैव सम्पूर्ण स्थिति का साक्षात्कार करायेंगे, लेकिन अभी अगर आपके सामने कोई आये तो उन्हें ऐसा साक्षात्कार करा सकेंगे? ऐसे तो नहीं कि आपके पुरुषार्थ की उतराई और चढ़ाई का उन्हें साक्षात्कार होता रहेगा। फोटो निकालते समय अगर कोई भी हलचल होती है तो फोटो ठीक निकलेगा? ऐसे ही हर सेकण्ड ऐसे ही समझो कि हमारा फोटो निकल रहा है। फोटो निकालते समय सभी प्रकार का ध्यान दिया जाता है वैसे अपने ऊपर सदैव ध्यान रखना है। एक-एक सेकण्ड इस सर्वोत्तम वा पुरुषोत्तम संगमयुग का ड्रामा रूपी कैमरे में आप सभी का फोटो निकलता जाता है। जो वही चित्र फिर चरित्र के रूप में गायन होता आएगा। और अभी के भिन्न-भिन्न स्टेज के चित्र, भिन्न-भिन्न रूप में पूजे जायेंगे। हर समय यह स्मृति रखो कि अपना चित्र ड्रामा रूपी कैमरे के सामने निकाल रहा हूँ। अब के एक-एक चित्र एक-एक चरित्र गायन और पूजन योग्य बनने वाले हैं। जैसे यहाँ भी जब आप लोग कोई ड्रामा स्टेज पर करते हो और साक्षात्कार करते हो तो कितना ध्यान रखते हो। ऐसे ही समझो बेहद की स्टेज के बीच पार्ट बजा रही हूँ वा बजा रहा हूँ। सारे विश्व की आत्माओं की नज़र मेरी तरफ है। ऐसे समझने से सम्पूर्णता को जल्दी धारण कर सकेंगे। समझा। एक स्लोगन सदा याद रखो जिससे सहज ही जल्दी सम्पूर्ण बन सको। वह कौन सा स्लोगन याद रखेंगे? (जाना है और आना है) यह तो ठीक है। लेकिन जाना कैसे है सम्पूर्ण होकर जाना है वा ऐसे ही? इसके लिए क्या याद रखना? डिले इज़ डेन्जर। अगर कोई भी बात में देरी की तो राज़ भाग के अधिकार में इतनी देरी पड़ जाएगी। इसलिए यह सदैव याद रखो कि वर्तमान समय के प्रमाण एक सेकण्ड भी डिले नहीं करनी है। आजकल कम्पलीट अर्थात् सम्पूर्ण कर्मातीत बनने के लिए पुरुषार्थ करते-करते मुख्य एक कम्पलेन समय प्रति समय सभी की निकलती है। चाहते हैं कम्पलीट होना लेकिन वह कम्पलीट होने नहीं देती। वह कौन सी कम्पलेन है? व्यर्थ संकल्पों की। कम्पलीट बनने में व्यर्थ संकल्पों के तूफ़ान विघ्न डालते हैं। यह मैजारिटी की कम्पलेन है। अब इसको मिटाने लिए आज युक्ति बताते हैं। मन की व्यर्थ संकल्पों की कम्पलेन कैसे पूरी होगी? याद की यात्रा तो मुख्य बात है लेकिन इसके लिए भिन्न-भिन्न युक्तियाँ हैं। वह कौन-सी? जो बड़े आदमी होते हैं उन्हों के पास अपने हर समय की अपॉइन्टमेंट की डायरी बनी हुई होती है। एक-एक घंटा उन्हों का फिक्स होता है। ऐसे आप भी बड़े ते बड़े हो ना। तो रोज़ अमृतवेले सारे दिन की अपनी अपॉइन्टमेंट की डायरी बनाओ। अगर अपने मन को हर समय अपॉइन्टमेंट में बिज़ी रखेंगे तो बीच में व्यर्थ संकल्प समय नहीं ले सकेंगे। अपॉइन्टमेंट से फ्री रहते हो तब व्यर्थ संकल्प समय ले लेते हैं। तो समय की बुकिंग करने का तरीका सीखो। अपने आप की अपॉइन्टमेंट खुद ही बनाओ कि आज सारे दिन में क्या-क्या करना है। फिर समय सफल हो जायेगा। मन को किसमें अपाइन्ट करना है। इसके लिए 4 बातें बताई हैं। 1-मिलन, 2-वर्णन, 3- मगन, 4- लगन। लगन लगाने में भी समय बहुत जाता है ना। तो मगन की अवस्था में कम रहते हैं। इसलिए लगन, मगन, मिलन और वर्णन। वर्णन है सर्विस, मिलन है रूह-रूहान करना। बापदादा से मिलते हैं ना। तो इन चार बातों में अपने समय को फिक्स करो। अगर रोज़ की अपनी दिनचर्या फिर्क्स करने के लिए अपॉइन्टमेंट सारे समय की फिक्स होगी तो बीच में व्यर्थ संकल्पों को डिस्टर्ब करने का समय ही नहीं मिलेगा। जैसे कोई बड़े आदमी होते हैं तो बिज़ी होने के कारण और व्यर्थ बातों तरफ ध्यान और समय नहीं दे सकते हैं। ऐसे अपनी दिनचर्या में समय को फिक्स करो। इतना समय इस बात में, इस समय इस बात में लगाना है। ऐसी अपॉइन्टमेंट अपनी निश्चित करो तब यह कम्पलेन ख़त्म होगी और कम्पलीट बन जाएगी।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

30-11-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


वर्कर्स की वन्डरफुल सर्कस 

मास्टर सर्वशक्तिमान बने हो? यह जो ग्रुप अधरकुमारों का है यह सभी मास्टर सर्वशक्तिमान बने हुए हैं या बनने के लिए आये हैं? जो समझते हैं बनने के लिए आये हैं वह हाथ उठायें । बाकी जो बने हुए हैं वह सामने आयें । जब मास्टर सर्वशक्तिमान हैं तो पास ही पास हैं । कभी फेल नहीं होते । कभी भी किस बात में फेल नहीं होते । अच्छा भला कब फीलिंग आती हैं? निमित्त बनी हुई टीचर्स से सर्टिफिकेट मिला है कि फीलिंग प्रूफ है? वर्तमान समय के अनुसार यह बातें कोई मामूली नहीं हैं । वर्तमान पुरुषार्थ के प्रमाण मामूली बात भी महान गिनी जाती है । समझा जैसे जितना बड़ा आदमी, जितना अधिक धनवान होता है, उतना छोटा-सा बुरा कर्म वा गलती का छोटा-सा एक पैसे का दण्ड भी उसके लिए बहुत बड़ा होता है । तो इस रीति वर्तमान समय मामूली भी महान की लिस्ट में गिना जाता है । मास्टर सर्वशक्तिमान अर्थात् फीलिंग से परे । सभी बातों में फुल । नॉलेजफुल । सभी शब्दों के पिछाड़ी में फुल आता है । तो जितना फुल बनते जायेंगे उतना फीलिंग का फ्लो वा फ्लू यह ख़त्म हो जायेगा । फ्लोलेस को फुल कहा जाता है । सभी मास्टर सर्वशक्तिमान हो? जिन्होंने हाथ नहीं उठाया है वे भी मास्टर सर्वशक्तिमान हैं । क्योंकि सर्वशक्तिमान बाप को अपना बना लिया है । सर्वशक्तिमान बाप को सर्व सम्बन्ध से अपना बनाया है । यही मास्टर सर्वशक्तिमान की शक्ति है । तो सर्वशक्तिमान को सर्व सम्बन्ध से अपना बनाया है? जब इतना बड़े से बड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण है फिर क्यों नहीं अपने को जानते और मानते हो । यह प्रत्यक्ष प्रमाण सदैव सामने रहे तो मायाजीत बहुत सरल रीति बन सकते हो । समझा । जब सर्व सम्बन्ध एक के साथ जुट गए तो और बात रही ही क्या । जब कुछ रहता ही नहीं तो बुद्धि जाएगी कहाँ । अगर बुद्धि इधर-उधर जाती है तो सिद्ध होता है कि सर्व सम्बन्ध एक के साथ नहीं जोड़े हैं । जोड़ने की निशानी है अनेकों से टूट जाना । कोई ठिकाना ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जाएगी । और सभी ठिकाने टूट जाते हैं । एक से जुट जाता है । फिर यह जो कम्पलेन है कि बुद्धि यहाँ-वहाँ दौडती है वह बन्द हो जाएगी । अच्छा ।
यह जो ग्रुप समझते हैं हम भट्ठी में आये हैं जबकि भट्ठी में हैं ही फिर विशेष रूप से क्यों आये हो? या कहो भट्ठी में तो हैं लेकिन बैटरी कहाँ तक चार्ज हुई है वह वेरीफाई या चैकिंग कराने आये हैं । चार्ज कराने आये हो व चैकिंग कराने आये हो? (दोनों) है तो सभी वैल्यूएबुल, सर्विसएबुल वर्कर्स ग्रुप । इस ग्रुप का टाइटल तो सुन लिया ना । यह टाइटल सुनकर सभी खुश हो रहे हैं । परन्तु इसमें लेकिन भी है । यह लक्ष्य भी है । यह लक्ष्य से बताते हैं कि आगे के लिए भट्ठी से समान बनकर जायेंगे । है वर्कर्स ग्रुप, लेकिन वर्कर्स के बदले कभी-कभी क्या करते हो, मालूम है? बापदादा वतन से वर्कर्स का एक्शन देखते हैं, जो यह करते हैं । कभी-कभी बहुत विचित्र सर्कस करते हैं । जैसे सर्कस में भिन्न-भिन्न एक्ट दिखाते हैं ना । वैसे यह भी अपनी-अपनी सर्कस दिखाते हैं । उस सर्कस में क्या-क्या पार्ट बजाते हैं वह देखने योग्य होता है कि कभी-कभी वर्कर्स अपना विकराल रूप दिखा देते हैं । अपनी कमियों पर विकराल रूप धारण करने के बजाय अन्य पर विकराल रूप की सर्कस दिखाते हैं । चाहे व्यवहार में, चाहे परिवार में, चाहे परमार्थ में तीनों में यह विकराल रूप की सर्कस दिखाते हैं । कभी-कभी फिर दूसरी सर्कस व्यर्थ संकल्प के झूले में झूलने की दिखाते हैं । वास्तव में झूला झूलना है अतीन्द्रिय सुख का लेकिन झूलते हैं व्यर्थ संकल्पों का । तीसरी सर्कस कौन-सी दिखाते हैं । स्थिति बदली करने की सर्कस दिखाते हैं । रूप और स्थिति बदलने का पार्ट मैजारिटी दिखाते हैं । तो वतन में बैठ कर बापदादा वर्कर्स ग्रुप की यह सर्कस देखते हैं । पुरुषार्थी बहुत अच्छे हैं लेकिन पुरुषार्थ करते-करते कहाँ-कहाँ पुरुषार्थ अच्छा करने के बाद प्रालब्ध यहाँ ही भोगने की इच्छा रखते हैं । तो इच्छा भी है, अच्छा भी है । लेकिन प्रालब्ध जमा करनी है । लेकिन कहाँ-कहाँ अपने पुरुषार्थ की प्रालब्ध को यहाँ भोगने की इच्छा से जमा होने में कमी कर देते हैं । समझा । तो इस बात को ख़त्म करके जाना है । प्रालब्ध की इच्छा को ख़त्म कर सिर्फ अच्छा पुरुषार्थ करो । इच्छा के बजाय अच्छा शब्द याद रखना । समझा । इच्छा स्वच्छता को ख़त्म कर देती है और स्वच्छता के बजाय सोचता बन जाते हैं । यह है वर्तमान रिजल्ट । वर्कर्स का अर्थ है और करता न कि सोचता । बापदादा जानते हैं यह उम्मीदवार रत्नों का ग्रुप है । उम्मीदवार भी हो, हिम्मतवान भी हो सिर्फ एक बात एड करनी है । सहनशक्तिवान बनना है । फिर उम्मीदवार से सफलता मूर्त बन जायेंगे । समझा । अभी उम्मीदवार मूर्त हो यह एक बात एड करने से सफलता मूर्त बन जायेंगे । सम्पूर्णता के समीपता की निशानी है सफलता । जितना-जितना अपने को सफलता मूर्त देखते जाओ उतना समझो सम्पूर्णता के नजदीक हैं । यह ग्रुप सफलता मूर्त बनने के लिए कौन सा स्लोगन सामने रखेंगे? स्लोगन यह है प्यूरिटी ही संगमयुग की प्रासपर्टी है । यह है स्लोगन । प्यूरिटी की कितना विस्तार है, प्यूरिटी कौन-सी और किस युक्तियों से धारण कर सकते हो इन टॉपिक्स पर टीचर्स क्लास करायेंगी । बापदादा सिर्फ टॉपिक दे रहे हैं । प्यूरिटी के विस्तार को समझना है । सम्पूर्ण प्यूरिटी किसको कहा जाता है? तो प्यूरिटी ही प्रासपर्टी है यह है इस ग्रुप का श्रेष्ठ स्लोगन । समाप्ति के समय सम्पूर्णता की परीक्षा लेंगे । पेपर के क्वेश्चन पहले से ही बता देते हैं । फिर तो पास होना सहज है ना । सम्पूर्णता क्या होती है उसकी मुख्य चार बातों का पेपर लेंगे । कौन-सी चार बातें यह नहीं बतायेंगे ।
 

अच्छा !!!

03-12-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


सामना करने के लिए कामनाओं का त्याग” 

आज हरेक अव्यक्त स्थिति का अनुभव कर रहे हैं, कहाँ तक हरेक निराकारी और अलंकारी बने हैं वह देख रहे हैं। दोनों आवश्यक हैं। अलंकारी कभी भी देह-अहंकारी नहीं बन सकेगा। इसलिए सदैव अपने आप को देखो कि निराकारी और अलंकारी हूँ। यही है मन्मनाभव, मध्याजीभव,। स्वस्थिति को मास्टर सर्वशक्तिमान कहा जाता है। तो मास्टर सर्वशक्तिमान बने हो ना। इस स्थिति में सर्व परिस्थितयों से पार हो जाते हैं। इस स्थिति में स्वभाव अर्थात् सर्व में स्व का भाव अनुभव होता है। और अनेक पुराने स्वभाव समाप्त हो जाते हैं। स्वभाव अर्थात् स्व में आत्मा का भाव देखो फिर यह भाव-स्वभाव की बातें समाप्त हो जाएगी। सामना करने की सर्व शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी। जब तक कोई सूक्ष्म वा स्थूल कामना है तब तक सामने करने की शक्ति नहीं आ सकती। कामना सामना करने नहीं देती। इसलिए ब्राह्मणों का अन्तिम स्वरूप क्यों गाया जाता है, मालूम है? इस स्थिति का वर्णन है इच्छा मात्रम् अविद्या। अब अपने पूछो इच्छा मात्रम् अविद्या ऐसी स्थिति हम ब्राह्मणों की बनी है? जब ऐसी स्थिति बनेगी तब जयजयकार और हाहाकार भी होगी। यह है आप सभी का अन्तिम स्वरुप। अपने स्वरुप का साक्षात्कार होता है सदैव अपने सम्पूर्ण और भविष्य स्वरुप ऐसे दिखाई दें जैसे शरीर छोड़नेवाले को बुद्धि में स्पष्ट रहता है कि अभी-अभी यह छोड़ नया शरीर धारण करना है। ऐसे सदैव बुद्धि में यही रहे कि अभी-अभी इस स्वरुप को धारण करना है। जैसे स्थूल चोला बहुत जल्दी धारण कर लेते हो वैसे यह सम्पूर्ण स्वरुप धारण करो। बहुत सुन्दर और श्रेष्ठ वस्त्र सामने देखते फिर पुराने वस्त्र को छोड़ वह नया धारण करना क्या मुश्किल होता है? ऐसे ही जब अपने श्रेष्ठ सम्पूर्ण स्वरुप वा स्थिति को जानते हो, सामने है तो फिर वह सम्पूर्ण श्रेष्ठ स्वरुप धारण करने में देरी क्यों? कोई भी अहंकार है तो वह अलंकारहीन बना देता है। इसलिए निरहंकारी और निराकारी फिर अलंकारी। इस स्थिति में स्थित होना सर्व आत्माओं के कल्याणकारी बनने वाले ही विश्व के राज्य अधिकारी बनते हैं। जब सर्व के कल्याणकारी बनते हो तो क्या जो सर्व का कल्याण करने वाला है वह अपना अकल्याण कर सकता है? सदैव अपने को विजयी रत्न समझ कर हर संकल्प और कर्म करो। मास्टर सर्व शक्तिमान कभी हार नहीं खा सकते। हार खाने वाले को न सिर्फ हार लेकिन धर्मराज की मार भी खानी पड़ती है। क्या हार और मार मंज़ूर है? जब हार खाते हो, हार के पहले मार सामने देखो। मार से भूत भी भागते हैं। तो मार को सामने रखने से भूत भाग जायेंगे। अब तक हार खाना किन्हों का काम है? मास्टर सर्वशक्तिमानों का नहीं है इसलिए वही पुरानी बातें, पुरानी चाल अब मास्टर सर्व शक्तिमानों की सूरत पर शोभता नहीं है। इसलिए सम्पूर्ण स्वरुप को अभी-अभी धारण करने की अपने से प्रतिज्ञा करो। प्रयत्न नहीं। प्रयत्न और प्रतिज्ञा में बहुत फर्क है। प्रतिज्ञा एक सेकण्ड में की जाती है। प्रयत्न में समय लगता है। इसलिए अब प्रयत्न का समय भी गया। अब तो प्रतिज्ञा और सम्पूर्ण रूप की प्रत्यक्षता करनी है। साक्षात् बाप समान साक्षात्कार मूर्त बनना है। ऐसे अपने आपको साक्षात्कार मूर्त समझने से कभी भी हार नहीं खायेंगे। अभी प्रतिज्ञा का समय है न कि हार खाने का। अगर बार-बार हार खाते रहते हैं तो उसका भविष्य भी क्या होगा? ऊँचे-ऊँचे पद तो नहीं पा सकते। बार-बार हार खाने वाले को देवताओं के हार बनाने वाले बनना पड़ेगा। जितना ही बार-बार हार खाते रहेंगे उतना ही बार-बार हार बनानी पड़ेगी रत्नजड़ित हार बनते हैं ना। और फिर द्वापर से भी जब भक्त बनेंगे तो अनेकों मूर्तियों को बार-बार हार पहनना पड़ेगा। इसलिए हार नहीं खाना। यहाँ कोई हार खाने वाला है क्या। अगर हार नहीं खाते तो बलिहार जाते हैं। अभी बलिहार वा बलि चढ़ने की तैयारी करने वाले हो। समाप्ति में बलि चढ़ना है वा चढ़ चुके हो? जो बलिहार हो गए हैं। उन्हों का पेपर लेंगे। इतने सभी को आज से कोई कम्पलेन नहीं आयेंगी। जब हार नहीं खायेंगे तो कम्पलेन फिर काहे की। आप लोगों का पेपर वतन में तैयार हो रहा है।

ओम शांति।


05-12-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


प्रतिज्ञा करने वालों को माया की चैलेंज” 

आवाज़ से परे जाना और ले जाना आता है? जब चाहे आवाज़ में आये जब चाहे आवाज़ से परे हो जाएँ, ऐसे सहज अभ्यासी बने हो? यह पाठ पक्का किया है? विजयी रत्न बने हो? किस पर विजयी बने हो? सर्व के दिलों पर विजय प्राप्त कर सकते हो? जैसे बापदादा के इस कर्तव्य के गुण का यादगार यहाँ है वैसे बाप के समान विजयी बने हो? सर्व के ऊपर विजयी बने हो। आपके ऊपर और कोई विजयी बन सकता है? ऐसी स्थिति भट्ठी में बनायी है। भट्ठी से जाने के बाद प्रैक्टिकल पेपर होगा। पास विद ऑनर अर्थात् संकल्प में भी फेल न हो ऐसे बने हो? कल समाचार सुना था कि जी हाँ का नारा बहुत अच्छा लगाया। ऐसी प्रतिज्ञा करने वाले पास विद ऑनर होने चाहिए। माया को चैलेंज है की प्रतिज्ञा करने वालों का खूब प्रैक्टिकल पेपर ले। सामना करने की शक्ति सदैव अपने में कायम रखना है। जो अष्ट शक्तियां सुनाई थी वह अपने में धारण की हैं। ज्ञानमूर्त, गुणमूर्त दोनों ही बने हो? माया को अच्छी तरह से सदाकाल के लिए विदाई दे चले हो? अपनी स्थूल विदाई के पहले माया को विदाई देनी है। माया भी बड़ी चतुर है। जैसे कोई-कोई जब शरीर छोड़ते हैं तो कभी-कभी साँस छिप जाता है। और समझते हैं कि फलाना मर गया, लेकिन छिपा हुआ सांस कभी-कभी फिर से चलने भी लगता है। वैसे माया अपना अति सूक्ष्म रूप भी धारण करती है। इसलिए अच्छी तरह से जैसे डॉक्टर लोग चेक करते हैं कि कहाँ श्वास छिपा हुआ तो नहीं है। ऐसे तीसरे नेत्र से अच्छी तरह से अपनी चेकिंग करनी है। फिर कभी ऐसा बोल नहीं निकले कि इस बात का तो हमको आज ही मालूम पड़ा है। इसलिए बापदादा पहले से ही खबरदार होशियार बना रहे हैं। क्योंकि प्रतिज्ञा की है, किस स्थान पर प्रतिज्ञा की है? किसके आगे की है? यह सभी बातें याद रखना है। प्राप्ति तो की लेकिन प्राप्ति के साथ क्या करना होता है? प्राप्ति की लेकिन ऐसी प्राप्ति की जो सर्व तृप्त हो जायें। जितना तृप्त बनेंगे इतना ही इच्छा मात्रम् अविद्या होंगे। कामना के बजाय सामना करने की शक्ति आयेगी। पुरानी वृत्तियों से निवृत्त हुएये सभी पेपर के क्वेश्चन्स हैं, जो पेपर प्रैक्टिकल होना है। अपने को पूर्णतया क्लियर और डोन्ट केयर करने की शक्ति अपने में धारण की है? स्वयं और समय दोनों की पहचान अच्छी तरह से स्पष्ट मालूम हुई? यह सभी कुछ किया वा कुछ रहा है? जो समझते हैं सभी बातों की प्राप्ति कर तृप्त आत्मा बन पेपर हॉल में जाने के लिए हिम्मतवान, शक्तिवान बना हूँ, वह हाथ उठायें। सभी बातों का पेपर देने और पास विद ऑनर होने के हिम्मतवान, शक्तिवान जो बने हैं वह हाथ उठाओ। अच्छा अब प्रैक्टिकल पेपर की रिजल्ट देखेंगे जो इस मास पास विद ऑनर की रिजल्ट दिखायेंगे उन्हों को बापदादा विशेष याद सौगात देंगे। लेकिन पास विद ऑनर। सिर्फ पास नहीं। अपनी-अपनी रिजल्ट लिख भेजना। फिर देखेंगे कितने बड़े ग्रुप से कितने पास विद ऑनर निकले। लेकिन यह भी द्केहना कि और जो आप के साथी हैं उन्हों से भी सर्टिफिकेट लेंगे, तब याद सौगात देंगे। सहज है ना। जब हो ही हिम्मतवान तो यह क्या मुश्किल है। सदैव यह स्मृति रखना कि मैं विजयी माला की विजयी रत्न हूँ। इस स्मृति में रहने से फिर हार नहीं होगी। अच्छा। सभी ने कहा था कि समाप्ति में पूर्ण रूप से बलि चढ़ ही जायेंगे तो सम्पूर्ण बलि चढ़े? महाबली बन के जा रहे हो कि अभी भी कुछ मरना है? महाबली के आगे कोई माया का बल चल नहीं सकता। ऐसा निश्चय अपने में धारण करके जा रहे हो ना। रिजल्ट देखेंगे फिर बापदादा ऐसे विजयी रत्नों को एक अलौकिक माला पहनायेगे।

अच्छा !!!


09-12-70 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


पुरुषार्थ का मुख्य आधार कैचिंग पावर” 

आज हरेक की दो बातें देख रहे हैं कि हरेक कितना नॉलेजफुल और कितना पावरफुल बने हैं। उसमें भी मुख्य कैचिंग पावर हरेक की कितनी पावरफुल हैंयह देख रहे हैं। पुरुषार्थ का मुख्य आधार कैचिंग पावर पर है। जैसे आजकल साइंस वाले आवाज़ को कैच करने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन साइलेंस की शक्ति से आप लोग क्या कैच करते हो? जैसे वह बहुत पहले के साउण्ड को कैच करते हैं, वैसे आप क्या कैच करते हो? अपने 5000 वर्ष पहले के दैवी संस्कार कैच कर सकते हो? कैचिंग पावर इतनी आई है। वह तो दूसरों की साउण्ड को कैच कर सकते हैं। आप अपने असली संस्कारों को सिर्फ कैच नहीं करते, लेकिन अपना प्रैक्टिकल स्वरुप बनाते हो। सदैव यह स्मृति में रखो कि मैं यही था और फिर बन रहा हूँ। जितना- जितना उन संस्कारों को कैच कर सकेंगे उतना स्वरुप बन सकेंगे। अपनी स्मृति को पावरफुल बनाओ अर्थात् श्रेष्ट और स्पष्ट बनाओ। जैसे अपने वर्तमान स्वरुप का, वर्तमान संस्कारों का स्पष्ट अनुभव होता है ऐसे अपने आदि स्वरूपों और संस्कारों का भी इतना ही स्पष्ट अनुभव हो। समझा। इतनी कैचिंग पावर चाहिए। जैसे वर्तमान समय में अपनी चलन व कर्तव्य स्पष्ट और सहज स्मृति में रहती है। ऐसे ही अपनी असली चलन सहज और स्पष्ट स्मृति में रहे। सदैव यही दृढ़ संकल्प रहे कि यह मैं ही तो था। 5000 वर्ष की बात इतनी स्पष्ट अनुभव में आये जैसे कल की बात। इसको कहते हैं कैचिंग पावर। अपनी स्मृति को इतना श्रेष्ठ और स्पष्ट बनाकर जाना। भट्ठी में आये हो ना। सदैव अपना आदि स्वरुप और आदि संस्कार सामने दिखाई दे। अपनी स्मृति को पावरफुल बनाने से वृत्ति और दृष्टि स्वतः ही पावरफुल बन जायेंगी। फिर यह कुमार ग्रुप क्या बन जायेंगे? अनुकुमार अर्थात् अनोखे। हरेक के दो नयनों से दो स्वरुप का साक्षात्कार होगा। कौन-से दो स्वरुप? सुनाया था कि निराकारी और दिव्यगुणधारी। फ़रिश्ता रूप और दैवी रूप। हरेक ऐसे अनुभव करेंगे वा हरेक से ऐसा अनुभव होगा जैसे कि चलता फिरता लाइट हाउस और माईट हाउस हो। ऐसे अपने स्वरुप का साक्षात्कार होता है? जब 5000 वर्ष को कैच सकते हो, अनुभव कर सकते हो तो इस अन्तिम स्वरुप का अनुभव नहीं होता है? अभी जो कुछ कमी रह गयी है वह भरकर ऐसे अनुभवी मूर्त बनकर जायेंगे। तो देखना कभी कुछ कमी न रह जाये। भट्ठी से ऐसा परिवर्तन कर के जाना, जैसे कभी-कभी सतयुगी आत्मायें जब प्रवेश होती हैं तो उन्हों को इस पुरुषार्थी जीवन का बिल्कुल ही नॉलेज नहीं होता। ऐसे आप लोगों को कमजोरियों और कमियों की नॉलेज ही मर्ज जाए। इसके लिए विशेष इस ग्रुप को दो बातें याद रखनी है। दो बातें दो शब्दों में ही हैं। एक गेस्ट हाउस, दूसरा गेट आउट अर्थात् बाहर निकालना है और आगे के लिए अन्दर आने नहीं देना है। दूसरा इस पुरानी दुनिया को सदैव गेस्ट हाउस समझो। फिर कभी कमज़ोरी वा कमी का अनुभव नहीं करेंगे। सहज पुरुषार्थ है ना। इस ग्रुप को कमाल कर दिखानी है इसलिए सदैव लक्ष्य रखना है कि अब फिर 21 जन्म के लिए रेस्ट करना है। लेकिन अभी एक सेकण्ड में भी मनसा, वाचा, कर्मणा सर्विस से रेस्ट नहीं। तब ही बेस्ट बनेंगे। समझा। क्योंकि यह है हार्ड वर्कर ग्रुप। हार्ड वर्कर ग्रुप में रेस्ट नहीं। कभी रेस्ट नहीं करता और वेस्ट नहीं करता। इसलिए हार्ड वर्कर ग्रुप वा रूहानी सेवाधारी संगठन को सेवा के सिवाए और कुछ सूझे ही नहीं। यह है नाम का काम। यह भी याद रखनासेवा प्रति स्वयं को ही ऑफर करना है तब बापदादा से आफरीन मिलेगी। हार्ड वर्कर वा रूहानी सेवाधारी ग्रुप को सदैव यह स्लोगन याद रखना है। समाना और सामना करना हमारा निशाना है। यह है इस ग्रुप का स्लोगन। सामना माया से करना है न कि दैवी परिवार से। समाना क्या है? अपने पुराने संस्कारों को समाना है। नॉलेजफुल के साथ-साथ पावरफुल भी बनना है तब ही सर्विसएबुल बनेंगे। अच्छा तिलक समारोह देख राजतिलक समारोह याद आता है? अभी यह तिलक सम्पूर्ण स्थिति में रहने के लिए है। फिर मिलेगा राजतिलक। यह तिलक है प्रतिज्ञा और प्रत्यक्षता का तिलक। इतनी पॉवर है? रूहानी सेवाधारी ग्रुप के लिए यह ख़ास शिक्षा दे रहे हैं। अपने को जितना अधिकारी समझते हो उतना ही सत्कारी बनो। पहले सत्कार देना फिर अधिकार लेना। सत्कार और अधिकार दोनों साथ-साथ हो। अगर सत्कार को छोड़ सिर्फ अधिकार लेंगे तो क्या हो जायेंगा? जो कुछ किया वह बेकार हो जायेगा। इसलिए दोनों बातों को साथ-साथ रखना है।

अच्छा !!!


Brahma Kumaris Brahma Kumaris

31-12-70       ओम शान्ति       अव्यक्त बापदादा        मधुबन


अमृतवेले से परिवर्तन शक्ति का प्रयोग 

आज बापदादा वर्तमान और भविष्य दोनों काल के राज्य अधिकारी अर्थात् विश्व कल्याणकारी और विश्व के राज्य अधिकारी दोनों ही रूप में बच्चों को देख रहे हैं । जितना-जितना विश्व-कल्याणकारी उतना ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं । इन दोनों अधिकारों को प्राप्त करने के लिए विशेष स्व-परिवर्तन की शक्ति चाहिए । उस दिन भी सुनाया था कि परिवर्तन शक्ति को अमृतवेले से लेकर रात तक कैसे कार्य में लगाओ ।
पहला परिवर्तन – आँख खुलते ही मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, यह है आदि समय का आदि परिवर्तन संकल्प, इसी आदि संकल्प के साथ सारे दिन की दिनचर्या का आधार है । अगर आदि संकल्प में परिवर्तन नहीं हुआ तो सारा दिन स्वराज्य वा विश्व-कल्याण में सफल नहीं हो सकेंगे । आदि समय से परिवर्तन शक्ति कार्य में लाओ । जैसे सृष्टि के आदि में ब्रह्म से देव-आत्मा सतोप्रधान आत्मा पार्ट में आयेगी, ऐसे हर रोज़ अमृतवेला आदिकाल है । इसलिए इस आदिकाल के समय उठते ही पहला संकल्प याद में ब्राह्मण आत्मा पधारे – बाप से मिलन मनाने के लिए । यही समर्थ संकल्प, श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ बोल, श्रेष्ठ कर्म का आधार बन जायेगा । पहला परिवर्तन – “मैं कौन!” तो यही फाउंडेशन परिवर्तन शक्ति का आधार है । इसके बाद –
दूसरा परिवर्तन "मैं किसका हूँ" सर्व सम्बन्ध किससे हैं । सर्व प्राप्तियां किससे हैं! पहले देह का परिवर्तन फिर देह के सम्बन्ध का परिवर्तन, फिर सम्बन्ध के आधार पर प्राप्तियों का परिवर्तन – इस परिवर्तन को ही सहज याद कहा जाता है । तो आदि में परिवर्तन शक्ति के आधार पर अधिकारी बन सकते हो ।
अमृतवेले के बाद अपने देह के कार्यक्रम करते हुए कौन-से परिवर्तन की आवश्यकता है? जिससे निरंतर सहजयोगी बन जायेंगे । सदा यह संकल्प रखो – “कि मैं चैतन्य सर्वश्रेष्ठ मूर्ति हूँ और यह मन्दिर है, चैतन्य मूर्ति का यह देह चैतन्य मन्दिर है । मन्दिर को सजा रहे हैं । इस मन्दिर का अन्दर स्वयं बापदादा की प्रिय मूर्ति विराजमान है । जिस मूर्ति के गुणों की माला स्वयं बापदादा सिमरण करते हैं । जिस मूर्ति की महिमा स्वयं बाप करते हैं । ऐसी विशेष मूर्ति का विशेष मन्दिर है ।” जितनी मूर्ति वैल्युएबल होती है मूर्ति के आधार पर मन्दिर की भी वैल्यू होती है । तो परिवर्तन क्या करना है? मेरा शरीर नहीं लेकिन बापदादा की वैल्युएबल मूर्ति का यह मन्दिर है । स्वयं ही मूर्ति स्वयं ही मन्दिर का ट्रस्टी बन मन्दिर को सजाते रहो । इस परिवर्तन संकल्प के आधार पर मेरापन अर्थात् देहभान परिवर्तन हो जायेगा । इसके बाद – अपना गोडली स्टूडेन्ट रूप सदा स्मृति में रहे । इसमें विशेष परिवर्तन संकल्प कौन-सा चाहिए? जिससे हर सेकण्ड की पढ़ाई हर अमूल्य बोल की धरणा से हर सेकण्ड वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ प्रालब्ध बन जाये । इसमें सदा यह परिवर्तन संकल्प चाहिए कि मैं साधारण स्टूडेन्ट नहीं, साधारण पढ़ाई नहीं लेकिन डायरेक्ट बाप रोज दूरदेश से हमको पढ़ाने आते हैं । भगवान के वर्शन्स हमारी पढ़ाई है । श्री-श्री की श्रीमत हमारी पढ़ाई है । जिस पढ़ाई का हर बोल पद्मों की कमाई जमा कराने वाला है । अगर एक बोल भी धारण नहीं किया तो बोल मिस नहीं किया लेकिन पद्मों की कमाई अनेक जन्मों की श्रेष्ठ प्रालब्ध वा श्रेष्ठ पद की प्राप्ति में कमी की । ऐसा परिवर्तन संकल्प ‘भगवान् बोल रहे हैं’, हम सुन रहे हैं । मेरे लिये बाप टीचर बनकर आये हैं । मैं स्पेशल लाडला स्टूडेन्ट हूँ – इसलिए मेरे लिए आये हैं । कहाँ से आये हैं, कौन आये हैं, और क्या पढ़ा रहे हैं? यही परिवर्तन श्रेष्ठ संकल्प रोज़ क्लास के समय धारण कर पढ़ाई करो । साधारण क्लास नहीं , सुनाने वाले व्यक्ति को नहीं देखो । लेकिन बोलने वाले बोल किसके हैं, उसको सामने देखो । व्यक्त में अव्यक्त बाप और निराकारी बाप को देखो । तो समझा – क्या परिवर्तन करना है । आगे चले – पढ़ाई भी पढ़ ली – अभी क्या करना है? अभी सेवा का पार्ट आया । सेवा में किसी भी प्रकार की सेवा चाहे प्रवृत्ति की, चाहे व्यवहार की, चाहे ईश्वरीय सेवा, प्रवृत्ति चाहे लौकिक सम्बन्ध हो, कर्मबन्धन के आधार से सम्बन्ध हो लेकिन प्रवृत्ति में सेवा करते परिवर्तन संकल्प यही करो – मरजीवा जन्म हुआ अर्थात् लौकिक कर्मबन्धन समाप्त हुआ । कर्मबन्धन समझ कर नहीं चलो । कर्मबन्धन, कर्मबन्धन सोचने और कहने से ही बन्ध जाते हो । लेकिन यह लौकिक कर्मबन्धन का सम्बन्ध अब मरजीवे जन्म के कारण श्रीमत के आधार पर सेवा के सम्बन्ध का आधार है । कर्मबन्धन नहीं, सेवा का सम्बन्ध है । सेवा के सम्बन्ध में वैरायटी प्रकार की आत्माओं का ज्ञान धारण कर, सेवा का सम्बन्ध समझ करके चलेंगे तो बन्धन में तंग नहीं होंगे । लेकिन अति पाप आत्मा, अति अपकारी आत्मा, बगुले के ऊपर भी नफरत नहीं, घृणा नहीं, निरादर नहीं लेकिन विश्व-कल्याणकारी स्थिति में स्थित हो रहमदिल बन तरस की भावना रखते हुए सेवा का सम्बन्ध समझकर सेवा करेंगे और जितने होपलेस केस की सेवा करेंगे तो उतने ही प्राइस का अधिकारी बनेंगे । नामिग्रामी विश्व-कल्याणकारी गाये जायेंगे । पीसमेकर की प्राइस लेंगे । तो प्रवृत्ति में कर्मबन्धन के बजाए सेवा का सम्बन्ध है – यह परिवर्तन संकल्प करो । लेकिन सेवा करते-करते अटैचमेंट में नहीं आ जाना । कभी डॉक्टर भी पेशेन्ट की अटैचमेंट में आ जाते हैं ।
सेवा का सम्बन्ध अर्थात् त्याग और तपस्वी रूप । सच्ची सेवा के लक्षण यही त्याग और तपस्या है । ऐसे ही व्यवहार में भी डायरेक्शन प्रमाण निमित्त मात्र शरीर निर्वाह लेकिन मूल आधार आत्मा का निर्वाह, शरीर निर्वाह के पीछे आत्मा का निर्वाह भूल नहीं जाना चाहिए । व्यवहार करते शरीर निर्वाह और आत्म निर्वाह दोनों का बैलेंस हो । नहीं तो व्यवहार माया जाल बन जायेगा । ऐसी जाल जो जितना बढ़ाते जायेंगे उतना फंसते जायेंगे । धन की वृद्धि करते हुए भी याद की विधि भूलनी नहीं चाहिए । याद की विधि और धन की वृद्धि दोनों साथ-साथ होना चाहिए । धन की वृद्धि के पीछे विधि को छोड़ नहीं देना है । इसको कहा जाता है लौकिक स्थूल कर्म भी कर्मयोगी की स्टेज में परिवर्तन करो । सिर्फ कर्म करनेवाले नहीं लेकिन कर्मयोगी हो । कर्म अर्थात् व्यवहार योग अर्थात् परमार्थ । परमार्थ अर्थात् परमपिता की सेवा अर्थ कर रहे हैं । तो व्यवहार और परमार्थ दोनों साथ-साथ रहे । इसको कहा जाता है श्रीमत पर चलनेवाले कर्मयोगी । व्यवहार के समय परिवर्तन क्या करना है? मैं सिर्फ व्यवहारी नहीं लेकिन व्यवहारी और परमार्थी अर्थात् जो कर रहा हूँ वह ईश्वरीय सेवा अर्थ कर रहा हूँ । व्यवहारी और परमार्थी कम्बाइन्ड हूँ । यही परिवर्तन संकल्प सदा स्मृति में रहे तो मन और तन डबल कमाई करते रहेंगे । स्थूल धन भी आता रहेगा । और मन से अविनाशी धन भी जमा होता रहेगा । एक ही तन द्वारा एक ही समय मन और धन की डबल कमाई होती रहेगी । तो सदा यह याद रहे कि डबल कमाई करने वाला हूँ । इस ईश्वरीय सेवा में सदा निमित्त मात्र का मन्त्र वा करनहार की स्मृति का संकल्प सदा याद रहे । करावनहार भूले नहीं । तो सेवा में सदा निर्माण ही निर्माण करते रहेंगे । अच्छा ....।
और आगे चलो, आगे चल अनेक प्रकार के व्यक्ति और वैभव अनेक प्रकार की वस्तुओं से संपर्क करते हो । इसमें भी सदा व्यक्ति में व्यक्त भाव के बजाए आत्मिक भाव धारण करो । वस्तुओं वा वैभवों में अनासक्त भाव धारण करो तो वैभव और वस्तु अनासक्त के आगे दासी के रूप में होगी और आसक्त भाव वाले के आगे चुम्बक की तरफ फंसानेवाली होगी । जो छुड़ाना चाहो तो भी छूट नहीं सकते । इसलिए व्यक्ति और वैभव में आत्म भाव और अनासक्त भाव का परिवर्तन करो ।
और आगे चलो – कोई भी पुरानी दुनिया के आकर्षणमय दृश्य अल्प काल के सुख के साधन यूज़ करते हो वा देखते हो तो उन साधनों वा दृश्य को देख कहाँ-कहाँ साधना को भूल साधन में आ जाते हो । साधनों के वशीभूत हो जाते हो । साधनों के आधार पर साधना – ऐसे समझो जैसे रेत के फाउंडेशन के ऊपर बिल्डिंग खड़ी कर रहे हो । उसका क्या हाल होगा? बार-बार हलचल में डगमग होंगे । गिरा कि गिरा यही हालत होगी । इसलिए यही परिवर्तन करो कि साधन विनाशी और साधना अविनाशी । विनाशी साधन के आधार पर अविनाशी साधना हो नहीं सकती । साधन निमित्त मात्र हैं, साधना निर्माण का आधार है । तो साधन को महत्व नहीं दो साधना को महत्व दो । तो सदा ये समझो कि मैं सिद्धि स्वरुप हूँ न कि साधन स्वरुप । साधना सिद्धि को प्राप्त कराएगी । साधनों की आकर्षण में सिद्धि स्वरुप को नहीं भूल जाओ । हर लौकिक चीज़ को देख, लौकिक बातों को सुन, लौकिक दृश्य को देख, लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करो अर्थात् ज्ञान स्वरुप हो हर बात से ज्ञान उठाओ । बात में नहीं जाओ, ज्ञान में जाओ तो समझा, क्या परिवर्तन करना है । अच्छा .... ।
और आगे चलो – अभी बाकी क्या रह गया ! अभी सोना रह गया । सोना अर्थात् सोने की दुनिया में सोना । सोने को भी परिवर्तन करो । बेड पर नहीं सोओ । लेकिन कहाँ सोयेंगे । बाप की याद की गोदी में सोयेंगे । फरिश्तों की दुनिया में स्वप्नों में सैर करो तो स्वप्न भी परिवर्तन करो और सोना भी परिवर्तन करो । आदि से अन्त तक परिवर्तन करो । समझा – कैसे परिवर्तन शक्ति यूज़ करो ।
इस नए वर्ष की सौगात परिवर्तन शक्ति की सौगात है । स्व परिवर्तन और विश्व परिवर्तन की इसी गिफ्ट की लिफ्ट से विश्व के परिवर्तन का समय समीप लायेंगे । नये साल की मुबारक तो सब देते हैं लेकिन बापदादा नए वर्ष में सदा तीव्र पुरुषार्थी बनने की नवीनता की इन-एडवांस मुबारक दे रहे हैं । नया वर्ष, नए संस्कार, नया स्वभाव, नया उमंग – उत्साह, विश्व को नया बनाने का श्रेष्ठ संकल्प, सर्व को मुक्ति-जीवनमुक्ति का वरदान देने का सदा श्रेष्ठ संकल्प ऐसे नवीनता की मुबारक हो, बधाई हो । पुराने संस्कारों, पुरानी चाल, पुरानी ढाल, पुराने की विदाई की बधाई हो । अच्छा .... ।
ऐसे हर कर्म में परिवर्तन शक्ति द्वारा स्व परिवर्तन और विश्व परिवर्तन करने वाले, हर सेकण्ड, हर संकल्प, हर कर्म नया अर्थात् गोल्डन एज करने वाले श्रेष्ठ अर्थात् सतोप्रधान करने वाले, नए वर्ष में सवा में और विश्व में नया चमत्कार दिखाने वाले जो अब तक असम्भव समझ रहे हैं सर्व के प्रति वा विश्व के प्रति, उस असंभव को संभव करने वाले, ऐसे सदा सफलतामूर्त श्रेष्ठ सिद्धि स्वरुप आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते ।
 

अच्छा !!!