12-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सदा समर्थ सोचो तथा वर्णन करो।

सर्व समर्थ शिवबाबा शक्तिस्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं के प्रति बोले:-

आज आवाज़ से परे रहने वाले बाप आवाज़ की दुनिया में आये हैं सभी बच्चों को आवाज़ से परे स्थिति में ले जाने के लिए। क्योंकि आवाज़ से परे स्थिति में अति सुख और शान्ति की अनुभूति होती है। आवाज़ से परे श्रेष्ठ स्थिति में स्थित होने से सदा स्वयं को बाप समान सम्पन्न स्थिति में अनुभव करते हैं। आज के मानव आवाज़ से परे सच्ची शान्ति के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न करते रहते हैं। कितने साधन अपनाते रहते हैं। लेकिन आप सभी शान्ति के सागर के बच्चे शान्त स्वरूप, मास्टर शान्ति के सागर हो। सेकण्ड में अपने शान्ति स्वरूप की स्थिति में स्थित हो जाते हो। ऐसे अनुभवी हो ना। सेकण्ड में आवाज़ में आना और सेकण्ड में आवाज़ से परे स्वधर्म में स्थित हो जाना - ऐसी प्रैक्टिस है? इन कर्मेन्द्रियों के मालिक हो ना। जब चाहो कर्म में आओ, जब चाहो कर्म से परे कर्मातीत स्थिति में स्थित हो जाओ। इसको कहा जाता है अभी- अभी न्यारे और अभी-अभी कर्म द्वारा सर्व के प्यारे। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर अनुभव होती है ना। जिन बातों को दुनिया के मानव मुश्किल कहते वह मुश्किल बातें आप श्रेष्ठ आत्माओं के लिए सहज नहीं लेकिन अति सहज है। क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिवान हो। दुनिया के मानव तो समझते यह कैसे होगा! इसी उलझन में बुद्धि द्वारा, शरीर द्वारा भटकते रहते हैं और आप क्या कहेंगे? कैसे होगा - यह संकल्प कभी आ सकता है? कैसे अर्थात् क्वेश्चन मार्क। तो कैसे के बजाए फिर से यही आवाज़ निकलता कि ऐसे होता है। ऐसे अर्थात् फुलस्टाप। क्वेश्चन मार्क का बदलकर फुलस्टाप लग गया है ना। कल क्या थे और आज क्या हो! महान अन्तर है ना। समझते हो कि महान अन्तर हो गया। कल कहते थे ओ गाड और आज ओ, के बजाए ओहो कहते हो। ओहो मीठे बाबा। गाड नहीं लेकिन बाबा। दूर से नज़दीक में बाप मिल गया।

आपने बाप को ढूँढा तो बाप ने भी आप बच्चों को कोने-कोने से ढूँढ लिया। लेकिन बाप को मेहनत नहीं करनी पड़ी। आपको बहुत मेहनत करनी पड़ी। क्योंकि बाप को परिचय था आपको परिचय नहीं था। आप सभी भी स्नेह के गीत गाते हो। बापदादा भी बच्चों के स्नेह के गीत गाते हैं। सबसे बड़े ते बड़ा स्नेह का गीत रोज बापदादा गाते हैं। जिस गीत को सुन-सुन सभी स्नेही बच्चों का मन खुशी में नाचता रहता है। रोज गीत गाते इसीलिए यादगार में भी गीत का महत्व श्रेष्ठ रहा है। बाप के गीत का यादगार - गीताबना दी। और बच्चों के गीत सुन खुशी में नाचने और खुशी में, आनन्द में, सुख में भिन्न-भिन्न अनुभवों के यादगार - भागवत् बना दिया है। तो दोनों का यादगार हो गया ना। ऐसे श्रेष्ठ भाग्यवान अपने को समझते हो वा अनुभव करते हो! समझने वाले अनेक होते हैं लेकिन अनुभव करने वाले कोटों में कोई होते हैं। अनुभवी मूर्त, बाप समान सम्पन्न अनुभवी मूर्त हैं। हर बोल का, हर सम्बन्ध का अनुभव हो। सम्बन्ध द्वारा भिन्न-भिन्न प्राप्ति का अनुभव हो। हर शक्ति का अनुभव हो। हर गुण का अनुभव हो। जब चाहे तब गुणों के गहने को धारण कर सकते हो। यह सर्वगुण वैराइटी ज्वैलरी है। जैसा समय, जैसा स्थान हो वैसे गुणों के गहनों से स्वयं को सजा सकते हो। न सिर्फ स्वयं को लेकिन औरों को भी गुणों का दान दे सकते हो। ज्ञान दान के साथ-साथ गुण दान का भी बहुत महत्व है। गुणों की महादानी आत्मा कभी भी किसी के अवगुण को देखते हुए, धारण नहीं करेगी। किसी के अवगुण के संगदोष में नहीं आयेगी। और ही गुणदान द्वारा दूसरे का अवगुण, गुण में परिवर्त्तन कर देगी। जैसे धन के भिखारी को धन दे सम्पन्न बना देते हैं ऐसे अवगुण वाले को गुण दान दे, गुणवान मूर्त्त बना दो। जैसे योग दान, शक्तियों का दान, सेवा का दान प्रसिद्ध है, तो गुण दान भी विशेष दान है। गुणदान द्वारा आत्मा में उमंग-उत्साह ही झलक अनुभव करा सकते हो। तो ऐसे सर्व महादानी मूर्त्त अर्थात् अनुभवी मूर्त्त बने हो!

आज विशेष डबल विदेशी बच्चों से मिलने आये हैं। डबल विदेशी बच्चों की विशेषता तो बापदादा ने सुनाई है। फिर भी बापदादा डबल विदेशी बच्चों को दूरांदेशी बुद्धि वाले बच्चे कहते हैं। दूर होते भी बुद्धि द्वारा बाप को पहचान अधिकारी बन गये हैं। ऐसे दूरांदेशी बुद्धि वाले बच्चों पर विशेषता प्रमाण बापदादा का विशेष स्नेह है। सभी परवाने बन अपने-अपने देशों से उड़ते-उड़ते शमा के पास पहुँच गये होना। सभी पक्के परवाने हो ना। शमा पर जलने वाले हो वा कोई सिर्फ चक्र लगाने वाले भी हो। जलना अर्थात् समान बनना। तो जलने वाले हो वा चक्र लगाने वाले हो? ज्यादा संख्या कौन-सी है? जो भी हो, जैसे भी हो लेकिन बापदादा को पसन्द हो। फिर भी देखो कितनी मेहनत कर पहुँच तो गये ना। इसलिए सदा अपने को समझो कि बाप के हैं और सदा ही बाप के रहेंगे। यह दृढ़ संकल्प सदा ही आगे बढ़ाता रहेगा। ज्यादा कमज़ोरियों को सोचो नहीं। कमज़ोरियों को सोचते-सोचते भी और कमज़ोर हो जाते हैं। मैं बीमार हूँ, बीमार हूँ, कहने से डबल बीमार हो जाते हैं। मैं इतनी शक्तिशाली नहीं हूँ, मेरा योग इतना अच्छा नहीं है, मेरी सेवा इतनी अच्छी नहीं हैं। मैं बाबा की प्यारी हूँ वा नहीं हूँ। पता नहीं आगे चल सकूँगी वा नहीं - यह सोच भी ज्यादा कमज़ोर बनाता है। पहले माया हल्के रूप में ट्रायल करती है और आप उसको बड़ा रूप कर देते हो तो माया को चाँस मिल जाता है, आपका साथी बनने का। वह सिर्फ ट्रायल करती है लेकिन उसकी ट्रायल को न जानकर समझते हो कि मैं हूँ ही ऐसी, इसलिए वह भी साथी बन जाती है। कमज़ोरों की साथी माया है। कभी भी कमज़ोर संकल्पों को बार-बार न वर्णन करो न सोचो। बार-बार सोचने से भी स्वरूप बन जाते हैं। सदा यह सोचो कि मैं बाबा का नहीं बनूँगा तो और कौन बनेगा! मैं ही था वा मैं ही थी। मैं ही हूँ। कल्प-कल्प मैं ही बनूँगी - यह संकल्प तन्दरूस्त, मायाजीत बना देंगे। कमज़ोरी पीछे आती है। आप उसको न पहचान सत्य समझ लेते हो तो माया अपना बना देती है। जैसे सीता का ड्रामा दिखाते हो ना। भिखारी था नहीं लेकिन सीता ने भिखारी समझ लिया। वह तो सिर्फ ट्रायल करने आया और उसे सच समझ लिया। इसलिए उसने उनका भोलापन देख अपना बना लिया। यह भी व्यर्थ संकल्प, कमज़ोर संकल्प माया का रूप बन आते हैं। ट्रायल करने के लिए, लेकिन भोले बन जाते हो इसलिए वह अपना बना देती है। ‘‘मैं हूँ ही ऐसी’’, ऐसे करते-करते माया अपना स्थान बना देती है। ऐसे कमज़ोर हो नहीं। समर्थ हो। मास्टर सर्वशक्तिवान हो। बापदादा के चुने हुए कोटों में कोई हो। ऐसे कमज़ोर कैसे हो सकते! यह सोचना ही माया को स्थान देना है। स्थान देकर फिर-फिर यह कहते हो - अब निकालो। स्थान देते ही क्यों हो। कोई कमज़ोर नहीं। सब मास्टर हो। सदा बहादुर सदा के महावीर हो। यही श्रेष्ठ संकल्प रखो। सदा बाप के साथी हैं। जहाँ बाप के साथी हैं वहाँ माया साथी बना नहीं सकती। मधुबन में किसलिए आये हो? (माया को छोड़ने) मधुबन महायज्ञ है ना। तो यज्ञ में स्वाहा करने आये हो लेकिन बापदादा कहते हैं सभी अपनी विजय अष्टमी मनाने आये हो। विजय के तिलक की सेरीमनी मनाने आये हो। विजयी बन करके विजय के तिलक की सेरीमनी मनाने आये हो ना। जी हाँ, कापी करने में सब होशियार हैं। यह भी गुण है। यहाँ भी बाप को कापी ही करना है। फॉलो करना अर्थात् कापी करना। यह तो सहज है ना। आप अपना देश छोड़कर आते हो तो बापदादा भी अपना देश छोड़कर आते हैं। बापदादा की प्रवृत्ति नहीं है क्या! सारे विश्व के कार्य को छोड़ यहाँ आते हैं। विश्व की प्रवृत्ति बाप की प्रवृत्ति है ना। बाप के लिए तो सभी बच्चे हैं। अंचली तो सबको देनी है। वर्सा नहीं देते है ना। अंचली तो देते हैं ना। अच्छा!

सर्व श्रेष्ठ अधिकारी बाप समान सदा महादानी, वरदानी आत्माओं को, सदा महान अन्तर द्वारा स्वयं को महान अनुभव करने वाले, सदा माया को पहचान मायाजीत, सर्व शक्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को, चारों ओर के देश-विदेश के, लगन में मगन रहने वाले, बाप से रूह-रूहान करने वाले, बाप से मिलन मनाने वाले, यादप्यार देने और पत्रों द्वारा भेजने वाले, कुछ मीठे-मीठे समाचार और स्व के स्नेह के पुरूषार्थ के समाचार देने वाले सर्व बच्चों को बापदादा सम्मुख देख याद-प्यार दे रहे हैं। साथ-साथ परवाने बन शमा के ऊपर जलने वाले अर्थात् हर कदम में बाप समान बनने वाले बच्चों को स्नेह सम्पन्न याद-प्यार और नमस्ते।



14-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


डबल सेवाधारी स्वत: ही मायाजीत

मायाजीत, जगतजीत बनाने वाले सर्व समर्थ बापदादा बोले:-

आज दिलाराम बाप अपने दिल तख्तनशीन बच्चों से वा अपने स्नेही, सहयोगी बच्चों से दिल की लेने-देन करने आये हैं। बाप की दिल में क्या रहता और बच्चों की दिल में क्या रहता है! आज सभी के दिल का हाल-चाल लेने आये हैं। खास दूरांदेशी डबल विदेशी बच्चों से दिल की लेन-देन करने आये हैं। मुरली तो सुनते रहते हो लेकिन आज रूह-रूहान करने आये हैं कि सभी बच्चे सहज सरल रूप से आगे बढ़ते जा रहे हो? कोई मुश्किल, चलने में थकावट तो नहीं लगती। थकते तो नहीं हो? किसी छोटी बड़ी बातों में कन्फ्यूज तो नहीं होते हो? जब किसी न किसी ईश्वरीय मर्यादा वा श्रीमत के डायरेक्शन को संकल्प में वा वाणी में वा कर्म में उल्लंघन करते हो तब कन्फ्यूज होते हो। नहीं तो बहुत खुशी-खुशी से, सुख चैन आराम से बाप के साथ-साथ चलने में कोई मुश्किल नहीं। कोई थकावट नहीं। कोई उलझन नहीं। किसी भी प्रकार की कमज़ोरी सहज को मुश्किल बना देती है। तो बापदादा बच्चों को देख रूह-रूहान कर रहे थे कि इतने लाडले सिकीलधे श्रेष्ठ आत्मायें, विशेष आत्मायें, पुण्य आत्मायें, सर्व श्रेष्ठ पावन आत्मायें, विश्व के आधारमूर्त आत्माएँ और फिर मुश्किल कैसे? उलझन में कैसे आ सकते हैं? किसके साथ चल रहे हैं? बापदादा स्नेह और सहयोग की बाँहों में समाते हुए साथ-साथ ले जा रहे हैं। स्नेह, सहयोग के बाँहों की माला सदा गले में पड़ी हुई है। ऐसे माला में पिराये हुए बच्चे और उलझन में आवें यह हो कैसे सकता! सदा खुशी के झूले में झूलने वाले, सदा बाप की याद में रहने वाले मुश्किल वा उलझन में आ नही सकते! कब तक उलझन और मुश्किल का अनुभव करते रहेंगे? बाप की पालना की छत्रछाया के अन्दर रहने वाले, उलझन में कैसे आ सकते हैं। बाप का बनने के बाद, शक्तिशाली आत्मायें बनने के बाद, माया के नॉलेजफुल बनने के बाद, सर्वशक्तियों, सर्व खज़ानों के अधिकारी बनने के बाद, क्या माया वा विघ्न हिला सकते हैं? (नहीं) बहुत धीरे-धीरे बोलते हैं। बोलो सदाकाल के लिए नहीं। देखना - सभी का फोटो निकल रहा है। टेप भरी है आवाज़ की। फिर वहाँ जाकर बदल तो नहीं जायेंगे ना! अभी से सिर्फ स्नेह के, सेवा के, उड़ती कला के विशेष अनुभवों के ही समाचार देंगे ना। माया आ गई, गिर गये, उलझ गये, थक गये, घबरा गये, ऐसे-ऐसे पत्र तो नहीं आयेंगे ना। जैसे आजकल की दुनिया में समाचार पत्रों में क्या खबरे निकलती है? दु:ख की, अशान्ति की, उलझनों की।

लेकिन आपके समाचार पत्र कौन से होंगे? सदा खुशखबरी के। खुशी के अनुभव - आज मैंने यह विशेष अनुभव किया। आज यह विशेष सेवा की। आज मंसा के सेवा की अनुभूति की। आज दिल शिकस्त को दिलवाला बना दिया। नीचे गिरे हुए को उड़ा दिया। ऐसे पत्र लिखेंगे ना। क्योंकि 63 जन्म उलझे भी, गिरे भी, ठोकरें भी खाई। सब कुछ किया और 63 जन्मों के बाद यह एक श्रेष्ठ जन्म, परिवर्तन का जन्म, चढ़ती कला से भी उड़ती कला का जन्म, इसमें उलझना, गिरना, थकना, बुद्धि से भटकना, यह बापदादा देख नहीं सकते। क्योंकि स्नेही बच्चे हैं ना। तो स्नेही बच्चों का यह थोड़ा-सा दु:ख की लहर का समय सुखदाता बाप देख नहीं सकते। समझा! तो अभी सदाकाल के लिए बीती की बीती कर लिया ना। जिस समय कोई भी बच्चा जरा भी उलझन में आता वा माया के विघ्नों के वश हो जाता, कमज़ोर हो जाता उस समय वतन में बापदादा के सामने उन बच्चों का चेहरा कैसा दिखाई देता है, मालूम है? मिक्की माउस के खेल की तरह। कभी माया के बोझ से मोटे बन जाते। कभी पुरूषार्थ के हिम्मतहीन छोटे बन जाते। मिक्की माउस भी कोई छोटा, कोई मोटा होता है ना। मिक्की माउस तो नहीं बनेंगे ना। बापदादा भी यह खेल देख हँसते रहते हैं। कभी देखो फरिश्ता रूप, कभी देखो महादानी रूप, कभी देखो सर्व के स्नेही सहयोगी रूप, कभी डबल लाइट रूप और कभी-कभी फिर मिक्की माउस भी हो जाते हैं। कौन-सा रूप अच्छा लगता है? यह छोटा-मोटा रूप तो अच्छा नहीं लगता है ना। बापदादा देख रहे थे कि बच्चों को अभी कितना कार्य करना है। किया है वह तो करने के आगे कुछ भी नहीं है। अभी कितनों को सन्देश दिया है? लाख डेढ़ लाख बने हैं ना। कम से कम सतयुग की पहली संख्या 9 लाख तो बनाओ। बनाना तो ज्यादा है लेकिन अभी 9 लाख के हिसाब से भी सोचो तो लाख डेढ़ लाख कितने परसेन्ट हुए? बापदादा देख रहे थे कितनी सेवा अभी करनी है। जिसके ऊपर इतनी सेवा की जिम्मदारी है, वह कितने बिजी होंगे। उन्हों को और कुछ सोचने की फुर्सत होगी? जो बिजी रहता है वह सहज ही मायाजीत होता है। बिजी किसमें हैं? दृष्टि द्वारा, मंसा द्वारा, वाणी द्वारा, कर्म द्वारा, सम्पर्क द्वारा चारों प्रकार की सेवा में बिजी। मंसा और वाणी वा कर्म दोनों साथ-साथ हों। चाहे कर्म करते हो, चाहे मुख से बोलते हो, जैसे डबल लाइट हो, डबल ताजधारी हो, डबल पूज्य हो, डबल वर्सा पाते हो तो सेवा भी डबल चाहिए। सिर्फ मंसा नहीं। सिर्फ कर्म नहीं। लेकिन मंसा के साथ-साथ वाणी। मंसा के साथ-साथ कर्म। इसको कहा जाता है डबल सेवाधारी। ऐसे डबल सेवाधारी स्वत: ही मायाजीत रहते हैं। समझा! सिंगल सेवा करते हो। सिर्फ वाणी में वा सिर्फ कर्म में आ जाते हो तो माया को साथी बनने का चांस मिल जाता है। मंसा अर्थात् याद। याद है बाप का सहारा। तो जहाँ डबल है, साथी साथ में है तो माया साथी बन नहीं सकती। सिंगल होते हो तो माया साथी बन जाती है। फिर कहते सेवा तो बहुत की। सेवा की खुशी भी होती है लेकिन फिर सेवा के बीच में माया भी आ गई। कारण? सिंगल सेवा की। डबल सेवाधारी नहीं बने। अभी इस वर्ष डबल विदेशी किस बात में प्राइज लेंगे? प्राइज लेनी तो है ना!

जो सेवाकेन्द्र 84 का वर्ष सेवा में, स्व की स्थिति में सदा निर्विघ्न रह, निर्विघ्न बनाने का वायब्रेशन विश्व में फैलायेंगे, सारे वर्ष में कोई भी विघ्न वश नहीं होंगे - ऐसी सेवा और स्थिति में जिस भी सेवाकेन्द्र का एक्जैम्पुल होगा उसको नम्बर वन प्राइज मिलेगी। ऐसी प्राइज लेंगे ना! जितने भी सेन्टर्स लें। चाहे देश के हों, चाहे विदेश के हों लेकिन सारे वर्ष में निर्विघ्न हों। यह सेन्टर के पोतामेल का चार्ट रखना। जैसे और पोता मेल रखते हो ना। कितनी प्रदर्शनियाँ हुई, कितने लोग आये, वैसे यह पोतामेल हर मास का नोट करना। यह मास सब क्लास के आने वाले ब्राह्मण परिवार निर्विघ्न रहे। माया आई इसमें कोई ऐसी बात नहीं। ऐसे नहीं कि माया आयेगी ही नहीं। माया आवे लेकिन माया के वश नहीं होना है। माया का काम है आना और आपका काम है - माया को जीतना। उनके प्रभाव में नहीं आना है। अपने प्रभाव से माया को भगाना है, न कि माया के प्रभाव में आना है। तो समझा कौन-सी प्राइज लेनी है। एक भी विघ्न में आया तो प्राइज नहीं क्योंकि साथी हो ना। सभी को एक दो को साथ देते हुए अपने घर चलना है ना। इसके लिए सदा सेवाकेन्द्र का वातावरण ऐसा शक्ति- शाली हो जो वातावरण भी सर्व आत्माओं के लिए सदा सहयोगी बन जाए। शक्तिशाली वातावरण कमज़ोर को भी शक्तिशाली बनाने में सहयोगी होता है। जैसे किला बांधा जाता है ना। किला क्यों बांधते हैं कि प्रजा भी किले के अन्दर सेफ रहे। एक राजा के लिए कोठरी नहीं बनाते, किला बनाते थे। आप सभी भी स्वयं के लिए, साथियों के लिए, अन्य आत्माओं के लिए ज्वाला का किला बांधो। याद के शक्ति की ज्वाला हो। अभी देखेंगे कौन प्राइज लेते हैं? 84 के अन्त में, न्यू ईयर मनाने आते हो ना तो जो विजयी होंगे उन्हों को विशेष निमन्त्रण देकर बुलाया जायेगा। अकेले विजयी नहीं। पूरा सेन्टर विजयी हो। उस सेन्टर की सेरीमनी करेंगे। फिर देखेंगे विदेश आगे आता है वा देश? अच्छा, और कोई मुश्किल तो नहीं, कोई भी माया का रूप तंग तो नहीं करता है ना। यादगार में कहानी क्या सुनी है! सूर्पनखा उसको तंग करने आई तो क्या किया? माया का नाक काटने नहीं आता? यहाँ सब सहज हो जाता है, उन्होंने तो इन्ट्रेस्टिंग बनाने के लिए कहानी बना दी है। माया पर एक बार वार कर लिया, बस। माया में कोई दम नहीं है, कमज़ोर है। सिर्फ बाहर का रूप शक्तिशाली बनाकर आती है। बाकी है अन्दर की कमज़ोरी। मरी पड़ी है। थोड़ा-सा रहा हुआ श्वांस चल रहा है। इसको खत्म करना और विजयी बनना है। क्योंकि अन्तिम समय पर तो पहुँच गये हैं ना! सिर्फ विजयी बन विजय के हिसाब से राज्य भाग्य पाना है। इसलिए यह अन्तिम श्वांस पर निमित्त मात्र विजयी बनना है। माया जीत जगतजीत हैं ना। विजय प्राप्त करने का फल - राज्य भाग्य है। इसलिए सिर्फ निमित्त मात्र यह माया से खेल है। युद्ध नहीं है। खेल है, समझा! आज से मिक्कीमाउस नहीं बनना। अच्छा!

सतयुग की स्थापना के बारे में कुछ जानकारी

अपने कल्प पहले वाले स्वर्ग के मर्ज हुए संस्कारों को इमर्ज करो तो स्वयं ही अपने को सतयुगी शाहजादी वा शाहजादे अनुभव करेंगे और जिस समय वह सतयुगी संस्कार इमर्ज करेंगे तो सतयुग की सभी रीति-रसम ऐसे स्पष्ट इमर्ज होंगी जैसे कल की बात है। कल ऐसा करते थे - ऐसा अनुभव कर सकते हो। सतयुग का अर्थ ही है, जो भी प्रकृति के सुख हैं, आत्मा के सुख हैं, बुद्धि के सुख हैं, मन के सुख हैं, सम्बन्ध के सुख हैं, जो भी सुख होते वह सब हाजिर हैं। तो अब सोचो प्रकृति के सुख क्या होते हैं, मन का सुख क्या होता है, सम्बन्ध का सुख क्या होता है - ऐसे इमर्ज करो। जो भी आपको इस दुनिया में अच्छे ते अच्छा दिखाई देता है - वह सब चीज़ें प्युअर रूप में, सम्पन्न रूप में, सुखदाई रूप में वहाँ होंगी। चाहे धन कहो, तन कहो, मौसम कहो, सब प्राप्ति तो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ हैं - उसको ही सतयुग कहा जाता है। एक बहुत अच्छे ते अच्छी सुखदाई सम्पन्न फैमली समझो; वहां राजा प्रजा समान मर्तबे होते हुए भी परिवार के रूप में चलता है। यह नहीं कहेंगे कि यह दास-दासी है। नम्बर होंगे, सेवा होगी लेकिन दासी है इस भावना से नहीं चलेंगे। जैसे परिवार के सब सम्बन्ध खुश मिजाज, सुखी परिवार, समर्थ परिवार, जो भी श्रेष्ठता है वह सब है। दुकानों में भी खरीदारी करेंगे तो हिसाब-किताब से नहीं। परिवार की लेन-देन के हिसाब से कुछ देंगे कुछ लेंगे। गिफ्ट ही समझो। जैसे परिवार में नियम होता है - किसके पास ज्यादा चीज़ होती है तो सभी को बाँटते हैं। हिसाब-किताब की रीति से नहीं। कारोबार चलाने के लिए कोई को कोई डियूटी मिली हुई है, कोई को कोई। जैसे यहाँ मधुबन में है ना। कोई कपड़े सम्भालता, कोई अनाज़ सम्भालता, कोई पैसे तो नहीं देते हो ना। लेकिन चार्ज वाले तो हैं ना। ऐसे वहाँ भी होंगे। सब चीज़ें अथाह है, इसलिए जी हाजिर। कमी तो है ही नहीं। जितना चाहिए जैसा चाहिए वह लो। सिर्फ बिजी रहने का यह एक साधन है। वह भी खेल-पाल है। कोई हिसाब-किताब किसको दिखाना तो है नहीं। यहां तो संगम है ना। संगम माना एकानामी। सतयुग माना - खाओ, पियो, उड़ाओ। इच्छा मात्रम अविद्या है। जहाँ इच्छा होती वहाँ हिसाब-किताब करना होता। इच्छा के कारण ही नीचे ऊपर होता है। वहाँ इच्छा भी नहीं, कमी भी नहीं। सर्व प्राप्ति हैं और सम्पन्न भी हैं तो बाकी और क्या चाहिए! ऐसे नहीं अच्छी चीज़ लगती तो ज्यादा ले ली। भरपूर होंगे। दिल भरी हुई होगी। सतयुग में तो जाना ही है ना। प्रकृति सब सेवा करेगी। (सतयुग में बाबा तो नहीं होंगे) ब्रह्मा बाप तो साथ ही होंगे। (शिवबाबा ऊपर क्या करेंगे?) बच्चों का खेल देखते रहेंगे। कोई तो साक्षी भी हो ना। न्यारा तो न्यारा ही रहेगा ना। प्यारा रहेगा लेकिन न्यारा रह करके प्यारा रहेगा। प्यारे का खेल तो अभी कर रहे हैं ना। सतयुग में न्यारापन ही अच्छा है। नहीं तो जब आप सभी गिरेंगे तो कौन निकालेगा! सतयुग में आना अर्थात् चक्र में आना। अच्छा - सतयुग में जब आप जन्म लो तो तब निमन्त्रण देना। आप अगर संकल्प इमर्ज करेंगी तो फिर आयेंगे। सतयुग में आना अर्थात् चक्र में आना। बापदादा को स्वर्ग की बातों में आप आकर्षण कर रहे हो! अच्छा- इतने तो वैभव होंगे जो सब खा भी नहीं सकेंगे। सिर्फ देखते रहेंगे। अच्छा

ऐसे सदा सर्व समर्थ आत्माओं को, सदा मायाजीत, जगतजीत आत्माओं को, सदा सहज योगी भव के वरदानी बच्चों को, डबल सेवाधारी, डबल ताजधारी, डबल लाइट बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

दादी जी मद्रास, बैंगलूर, मैसूर तथा कलकत्ता का चक्र लगाकर मधुबन पहुँची हैं, दादी जी को देख बापदादा बोले:-

 ‘‘कदमों में पदमों की सेवा समाई हुई है। चक्रवर्ती बन चक्र लगाए अपने यादगार स्थान बना लिए। कितने तीर्थ बने! महावीर बच्चों का चक्र लगाना माना यादगार बनना। हर चक्र में अपनी-अपनी विशेषता होती है। इस चक्र में भी कई आत्माओं के दिलों की आशा पूर्ण करने की विशेषता रही। यह दिल की आशा पूर्ण करना अर्थात् वरदानी बनना। वरदानी भी बनी और महादानी भी बनी। ड्रामा अनुसार जो प्रोग्राम बनता है उसमें कई राज़ भरे हुए होते हैं। राज़ उड़ाके ले जाते हैं। अच्छा-

जानकी दादी से:- आप सभी को नाम का दान देती हो! नाम का दान क्या है? आपका नाम क्या है! नाम का दान देना अर्थात् ट्रस्टी बनकर वरदान देना। आपका नाम लेते ही सबको क्या याद आयेगा? - सेकण्ड में जीवन मुक्ति। ट्रस्टी बनना। यह आपके नाम की विशेषता है। इसलिए नामदान भी दे दो तो किसका भी बेडा पार हो जायेगा। बाप ने अभी आपके ट्रस्टीपन की विशेषता का गायन किया है, वही यादगार, है। वही जनकअक्षर उनको मिल गया होगा। एक ही जनक की दो कहानियाँ हैं। जनक जो सेकण्ड में विदेही बन गया। दूसरा जनक जो सेकण्ड में ट्रस्टी बन गया। मेरा नहीं - तेरा। त्रेता वाला जनक भी दिखाते हैं। लेकिन आप तो बाप की जनक हो, सीता वाली नहीं। नाम दान का महत्व क्यों हैं, इस पर क्लास कराना। नाम की नईया द्वारा भी पार हो जाते हैं। और कुछ समझ में न भी आये लेकिन शिवबाबा शिवबाबाभी कहा तो स्वर्ग की गेट पास तो मिल जाती है। अच्छा –

सभी महारथी भाई-बहनों को देख:-

सेवा के निमित्त बने हुए बच्चों की भी तो माला है ना। सभी विशेष रत्न निमित्त बने हुए हो। निमित्त बनने की विशेषता निमित्तबनाती है। ब्रह्मा बाप को आप सबके ऊपर एक बात का नाज़ है। कौन-सी बात का विशेष नाज़ है? सभी बच्चों ने एक दो में विचार मिलाते हुए आदि से युनिटी का जो रूप दिखाया है इस पर ब्रह्मा बाप को विशेष नाज़ है। युनिटी इस ब्राह्मण परिवार का फाउन्डेशन है।इसलिए ब्रह्मा बाप को अव्यक्त वतन में रहते भी बच्चों पर नाज़ है। देखते तो हैं ना कारोबार।

लंदन ग्रुप से:- सदा रूहानी गुलाब बन औरों को भी खुशबू देने वाले अविनाशी बगीचे के पुष्प हो ना। सभी रूहानी गुलाब हो। जिस रूहानी गुलाब को देख सारी विश्व आकर्षित होती है। एक-एक रूहानी गुलाब कितना वैल्युबुल है। अमूल्य है। जो अभी तक भी आप सबके जड़ चित्रों की भी वैल्यु हैं। एक-एक जड़ चित्र कितनी वैल्यू से लेते वा देते हैं। हैं तो साधारण पत्थर या चांदी या सोना लेकिन वैल्यु कितनी हैं। सोने की मूर्ति कितनी वैल्यु में देंगे। इतने वैल्युबुल कैसे बने! क्योंकि बाप का बनने से सदा ही श्रेष्ठ बन गये। इसी भाग्य के गीत सदा गाते रहो। वाह मेरा भाग्य और वाह भाग्य विधाता! और वाह संगमयुग! वाह मीठा ड्रामा! सबमें वाह-वाह आता है ना। वाह-वाह के गीत गाते रहते हो ना! बापदादा को लण्डन निवासियों पर नाज़ है, सेवा के वृक्ष का बीज जो है वह लण्डन है। तो लण्डन निवासी भी बीजरूप हो गये। यू.के. वाले अर्थात् सदा ओ.के. रहने वाले, सदा पढ़ाई और सेवा दोनों का बैलेन्स रखने वाले। सदा हर कदम में स्वयं की उन्नति को अनुभव करने वाले। जब बाप के बने तो सदा बाप का साथ और बाप का हाथ है। हर बच्चे के ऊपर - ऐसे अनुभव करते हो ना। जिसके ऊपर बाप का हाथ है वह सदा ही सेफ हैं। सदा सेफ रहने वाले हो ना। ओ.के. ग्रुप के पास माया तो नहीं आती है ना। माया भी सदा के लिए ओ.के., ओ.के. करके विदाई करके चली जाती है। यू.के. अर्थात् ओ.के. ग्रुप को संग भी तो बहुत श्रेष्ठ हैं ना। संग अच्छा, वायुमण्डल शक्तिशाली तो माया आ कैसे सकती! सदा ही सेफ होंगे। ओ.के. ग्रुप अर्थात् मायाजीत ग्रुप।

मॉरीशियस पार्टी:- सदा अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान समझते हो? भाग्य में क्या मिला? भगवान ही भाग्य में मिल गया! स्वयं भाग्य विधाता भाग्य में मिल गया। इससे बड़ा भाग्य और क्या हो सकता है? तो सदा ये खुशी रहती है कि विश्व में सबसे बड़े ते बड़े भाग्यवान हम आत्मायें हैं। हम नहीं, हम आत्मायें। आत्मायें कहेंगे तो कभी भी उल्टा नशा नहीं आयेगा। देही-अभिमानी बनने से श्रेष्ठ नशा - ईश्वरीय नशा रहेगा। भाग्यवान आत्मायें हैं, जिन्हों के भाग्य का अब भी गायन हो रहा है। भागवत’ - आपके भाग्य का यादगार है। ऐसा अविनाशी भाग्य जो अब तक भी गायन होता है, इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते रहो। कुमारियाँ तो निर्बन्धन, तन से भी निर्बन्धन, मन से भी निर्बन्धन। ऐसे निर्बन्धन ही उड़ती कला का अनुभव कर सकते हैं। अच्छा- ओम् शान्ति।



16-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘स्वराज्य’’ - आपका बर्थ राईट है।

अटल, अखण्ड, अचल स्थिति में स्थित करने वाले स्वराज्य अधिकारी बच्चों प्रति बापदादा बोले:-

आज बापदादा राज्य अधिकारी सभा देख रहे हैं। सारे कल्प में बड़े ते बड़ी राज्य अधिकारी सभा इस संगमयुग पर ही लगती है। बापदादा सारे विश्व के ब्राह्मण बच्चों की सभा देख रहे हैं। सभी राज्य अधिकारी नम्बरवार अपने सम्पूर्ण स्थिति की सीट पर सेट हो स्वराज्य के रूहानी नशे में कैसे बेफिकर बादशाह बन बैठे हुए हैं। हर एक के मस्तक के बीच चमकती हुई मणि कितनी सुन्दर सज रही है। सभी के सिर पर नम्बरवार चमकता हुआ लाइट का ताज देख रहे हैं। ताजधारी तो सब हैं लेकिन नम्बरवार हैं। सभी के नयनों में बापदादा की याद समाई हुई होने कारण नयनों से याद का प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। ऐसी सजी-सजाई सभा देख बापदादा हर्षित हो रहे हैं। वाह मेरे राज्य अधिकारी बच्चे! यह स्वराज्य, मायाजीत का राज्य सभी काे जन्म सिद्ध अधिकार में मिला है। विश्व रचता के बच्चे स्वराज्य अधिकारी स्वत: ही हैं। स्वराज्य आप सभी का अनेक बार का बर्थ राइट है। अब का नहीं। लेकिन बहुत-बहुत पुराना अनेक बार प्राप्त किया हुआ अधिकार याद है। याद है ना! अनेक बार स्वराज्य द्वारा विश्व का राज्य प्राप्त किया है। डबल राज्य अधिकारी हो। स्वराज्य और विश्व का राज्य। स्वराज्य सदा के लिए राजयोगी सो राज्य अधिकारी बना देता है। स्वराज्य त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, तीनों लोकों के नॉलेजफुल अर्थात् त्रिलोकीनाथ बना देता है। स्वराज्य सारे विश्व में कोटों में कोई, कोई में भी कोई विशेष आत्मा बना देता है। स्वराज्य बाप के गले का हार बना देता है। भक्तों के सिमरण की माला बना देता है। स्वराज्य बाप के तख्तनशीन बना देता है। स्वराज्य सर्व प्राप्तियों के खज़ाने का मालिक बना देता है। अटल, अचल, अखण्ड सर्व अधिकार प्राप्त करा देता है। ऐसे स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्मायें हो ना!

‘‘मैं कौन’’ - यह पहेली अच्छी तरह से जान ली है ना। मैं कौन, इस टाइटल्स की माला कितनी बड़ी है! याद करते जाओ और एक-एक मणके को चलाते जाओ। कितनी खुशी होगी। अपनी माला स्मृति में लाओ तो कितना नशा रहेगा। ऐसे नशा रहता है? डबल विदेशियों को डबल नशा होगा ना। अविनाशी नशा है ना। इस नशे को कोई कम कर सकता है क्या, आलमाइटी अथार्टी के आगे और कौन-सी अथार्टी है! सिर्फ अलबेलेपन की गहरी नींद में सो जाते हो तो आपके अथार्टी की चाबी अर्थात् स्मृति’, माया चोरी कर लेती है। कई ऐसे नींद में सोते हैं जो पता हीं नहीं पड़ता है। यह अलबेलेपन की नींद कभी-कभी धोखा भी दे देती है। और फिर अनुभव ऐसे करते कि मैं सोया हुआ ही नहीं हूँ! जाग रहा हूँ। लेकिन चोरी हो जाती है वह पता नहीं पड़ता है। वैसे जागती ज्योति आलमाइटी अथार्टी के आगे कोई अथार्टी है नहीं। स्वप्न में भी कोई अथार्टी हिला नहीं सकती। ऐसे राज्य अधिकारी हो। समझा। अच्छा

आज तो मिलन महफिल में आये हैं। जैसे बच्चे इन्तजार करते हैं अपने मिलने के टर्न का। वैसे बाप भी बच्चों से मिलने का आह्वान करते हैं। बाप को सभी से प्यारे ते प्यारा काम है ही - बच्चों से मिलने का। चाहे अव्यक्त रूप से चाहे व्यक्त रूप में। बाप की दिनचर्या का विशेष कार्य सिकीलधे स्नेही बच्चों से मिलने का है। उन्हों को सजाने, पालना करने, समान बनाए विश्व के आगे निमित्त बनाना, यही कार्य है। इसी में बिजी रहते हैं। साइन्स वालों को प्रेरते हैं वह भी बच्चों के लिए। भक्तों को भावना का फल देते हैं तो भी बच्चों को ही आगे करते हैं। बिन्दु को तो कोई जानता नहीं। देवी-देवताओं को ही जानते हैं। भक्तों के आगे भी बच्चों को ही प्रत्यक्ष करते हैं। सबको मुक्ति में ले जाते तो भी आप बच्चों को सुख-शान्तिमय राज्य के लिए। अच्छा-

ऐसे सदा के स्वराज्य अधिकारी, सदा अटल अखण्ड, अचल स्थिति में स्थित रहने वाले, सदा रूहानी नशे में अविनाशी रहने वाले, डबल राज्य- अधिकारी, बापदादा के नयनों में समाये हुए नूरे रत्नों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

आस्ट्रेलिया पार्टी से:- बापदादा को आस्ट्रेलिया निवासी अति प्रिय हैं, क्यों? आस्ट्रेलिया की विशेषता क्या है? आस्ट्रेलिया की विशेषता है - जो स्वयं में हिम्मत रख चारो ओर सेवाधारी बन सेवा स्थान खोलने की विधि अच्छी है। जहाँ हिम्मत है वहाँ बाप हिम्मत वाले बच्चों को देख विशेष खुश होते हैं। लंदन की भी विशेषता है, वहाँ विशेष पालना अनेक अनुभवी रत्नों द्वारा मिलती रहती है और आस्ट्रेलिया को इतनी पालना का चांस नहीं मिलता है। लेकिन फिर भी अपने पांव पर खड़े होकर सेवा में वृद्धि और सफलता अच्छी कर रहे हैं। सभी याद और सेवा के शौक में अच्छे रहते हैं। याद में अच्छी रूचि रखते हैं इसलिए आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते रहेंगे। मैजारिटी निर्विघ्न है। कुछ अच्छे-अच्छे बच्चे चले भी गये हैं। लेकिन फिर भी बाप को अभी भी याद करते रहते है इसलिए उन्हों के प्रति भी सदा शुभ भावना रख उन्हों को भी फिर से बाप के समीप जरूर लाना है। ऐसा उमंग आता है ना। थोड़ा बहुत वृक्ष से फल तो गिरते ही हैं, नई बात नहीं है। इसलिए अभी स्वयं को और दूसरों को ऐसा पक्का बनाओ जो भी सफलता स्वरूप बनें। यह ग्रुप जो आया है वह पक्का है ना। माया तो नहीं पकड़ेंगी। अगर कोई कमज़ोरी हो भी तो यहाँ मधुबन में सम्पन्न होकर ही जाना। मधुबन से अमर भव का वरदान लेकर जाना। ऐसा वरदान सदा अपने साथ रखना और दूसरों को भी इसी वरदान से सुरजीत करना। बापदादा को डबल विदेशी बच्चों पर नाज़ हैं। आपको भी बाप पर नाज़ है ना! आपको भी यह नशा है ना कि सारे विश्व में से हमने बाप को पहचाना। सदा इसी नशे और खुशी में अविनाशी रहो। अभी बापदादा ने सभी का फोटो निकाल लिया है। फिर फोटो दिखायेंगे कि देखो आप आये थे। माया के भी नॉलेजफुल बनकर चलो। नॉलेजफुल कभी भी धोखा नहीं खाते क्योंकि माया कब आती और कैसे आती, इसकी नॉलेज होने कारण सदा सेफ रहते हैं। मालुम है ना कि माया कब आती है? जब बाप से किनारा कर अकेले बनते हो तब माया आती है। सदा कम्बाइण्ड रहने से माया कभी नहीं आयेगी। आस्ट्रेलिया की विशेषता है जो अधिकतर पाण्डव सेना जिम्मेवार है। नहीं तो मैजारिटी शक्तियाँ होती है। यहाँ पाण्डवों ने कमाल की है। पाण्डव अर्थात् पाण्डव पति के सदा साथ रहने वाले। हिम्मत अच्छी की है, बापदादा बच्चों की सेवा पर मुबारक देते हैं। अभी सिर्फ अविनाशी भव का वरदान सदा साथ रखना। अच्छा-

ब्राजील:- बापदादा जानते हैं कि स्नेही आत्मायें स्नेह के सागर में समाई हुई रहती हैं। कितना भी शरीर से दूर रहते हैं लेकिन सदा स्नेही बच्चे बापदादा के सम्मुख हैं। लगन सभी विघ्नों को पार कराते हुए बाप के समीप पहुँचाने में मददगार बनती हैं। इसीलिए बापदादा मुबारक दे रहे हैं, बच्चों को। बापदादा जानते हैं कि कितनी मेहनत को मुहब्बत में परिवर्तन कर, यहाँ तक पहुँचते हैं। इसीलिए स्नेह के हाथों से बापदादा बच्चों को सदा दबाते रहते हैं। जो अति स्नेही बच्चे होते हैं उनकी माँ-बाप सदैव मालिश करते हैं ना प्यार से। बापदादा बच्चों की तकदीर के सितारे को देखते हैं। चमकते हुए सितारे हो। देश की हालत क्या भी हो लेकिन बाप के बच्चे सदा बाप के स्नेह में रहने के कारण सेफ रहेंगे। बापदादा की छत्रछाया सदा साथ है। ऐसे लाडले सिकीलधे हो। बच्चों के अनेक पत्रों की माला बापदादा के गले में डाली, सभी बच्चों को इसके रिटर्न में बापदादा याद प्यार दे रहे हैं। सबको कहना कि जितने प्यार से पत्र लिखे हैं, समाचार दिये हैं उतने ही स्नेह से उसे स्वीकार किया और हिम्मते बच्चे मददे बाप सदा ही है और सदा ही रहेगा। माला मिली और माला के मणकों की माला अभी भी बापदादा सिमरण कर रहे हैं।

बापदादा जानते हैं कि तन से भल दूर हैं लेकिन मन से मधुबन निवासी हैं। मन से सदा मन्मनाभव होने के कारण बाप के समीप और सम्मुख है। ऐसे समीप और सम्मुख रहने वाले बच्चो को बापदादा सम्मुख देख नाम सहित हरेक को याद-प्यार दे रहे हैं। और सदा श्रेष्ठ बन श्रेष्ठ बनाने की सेवा में आगे बढ़ते रहो, यह वरदान सभी सिकीलधे बच्चों को दे रहे हैं। सभी अपने नाम सहित याद-प्यार स्वीकार करें। अच्छा-



18-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


18 जनवरी - स्मृति दिवस का महत्त्व

दिलबर बापदादा अपने दिलरूबा बच्चो प्रति बोले:-

आज मधुबन वाले बाप मधुबन में बच्चों से मिलने आये हैं।

1. आज अमृतवेले से स्नेही बच्चों के स्नेह के गीत, समान बच्चों के मिलन मनाने के गीत, सम्पर्क में रहने वाले बच्चों के उमंग में आने के उत्साह भरे आवाज़, बांधेली बच्चियों के स्नेह भरे मीठे उल्हाने, कई बच्चों के स्नेह के पुष्प बापदादा के पास पहुँचे। देश-विदेश के बच्चों के समर्थ संकल्पों की श्रेष्ठ प्रतिज्ञायें सभी बापदादा के पास समीप से पहुँची। बापदादा सभी बच्चों के स्नेह के संकल्प और समर्थ संकल्पों का रेसपान्ड कर रहे हैं। ‘‘सदा बापदादा के स्नेही भव’’‘‘सदा समर्थ समान भव, सदा उमंग-उत्साह से समीप भव, लगन की अग्नि द्वारा बन्धनमुक्त स्वतन्त्र आत्मा भव’’। बच्चों के बन्धनमुक्त होने के दिन आये कि आये। बच्चों के स्नेह के दिल के आवाज़, कुम्भकरण आत्माओं को अवश्य जगायेंगे। यही बन्धन में डालने वाले, स्वयं प्रभु स्नेह के बन्धन में बंध जायेंगे। बापदादा विशेष बन्धन वाली बच्चियों को शुभ दिन आने की दिल की राहत दे रहे हैं। क्योंकि –

2. आज के विशेष दिन पर विशेष स्नेह के मोती बापदादा के पास पहुँचते हैं। यही स्नेह के मोती श्रेष्ठ हीरा बना देते हैं।

3. आज का दिन समर्थ दिन है।

4. आज का दिन समान बच्चें को तत्-त्वम् के वरदान का दिन है।

5. आज के दिन बापदादा शक्ति सेना को सर्व शक्तियों की विल करता है, विल पावर देते हैं। विल की पावर देते हैं।

6. आज का दिन बाप का बैकबोन बन बच्चों को विश्व के मैदान में आगे रखने का दिन है। बाप अननोन है और बच्चे वेलनोन हैं।

7. आज का दिन ब्रह्मा बाप के कर्मातीत होने का दिन है।

8. तीव्रगति से विश्व-कल्याण, विश्व-परिक्रमा का कार्य आरम्भ होने का दिन है।

9. आज का दिन बच्चों के दर्पण द्वारा बापदादा के प्रख्यात होने का दिन है।

10. जगत के बच्चों को जगत पिता का परिचय देने का दिन है।

11. सर्व बच्चों को अपनी स्थिति, ज्ञान स्तम्भ, शक्ति स्तम्भ, अर्थात् स्तम्भ के समान अचल अडोल बनने की प्रेरणा देने का दिन है। हर बच्चा बाप का यादगार शान्ति स्तम्भहै। यह तो स्थूल शान्ति स्थम्भ बनाया है। परन्तु बाप की याद में रहने वाले याद का स्तम्भ, आप चैतन्य सभी बच्चे हो। बापदादा सभी चैतन्य स्तम्भ बच्चें की परिक्रमा लगाते हैं। जैसे आज शान्ति स्तम्भ पर खड़े होते हो, बापदादा आप सभी याद में रहने वाले स्तम्भों के आगे खड़े होते हैं।

12. आप आज के दिन विशेष बाप के कमरे में जाते हो। बापदादा भी हर बच्चे के दिल के कमरे में बच्चों से दिल की बातें करते हैं और

13. आप झोपड़ी में जाते हो। झोपड़ी है दिलवर और दिलरूबा की यादगार। दिलरूबा बच्चों से दिलवर बाप विशेष मिलन मनाते हैं। तो बापदादा भी सभी दिलरूबा बच्चों के भिन्न-भिन्न साज़ सुनते रहते हैं। कोई स्नेह की ताल से साज़ बजाता, कोई शक्ति की ताल से, कोई आनन्द, कोई प्रेम की ताल से। भिन्न-भिन्न ताल के साज़ सुनते रहते हैं। बापदादा भी आप सभी के साथ-साथ चक्र लगाते रहते हैं। तो आज के दिन का विशेष महत्व समझा!

14. आज का दिन सिर्फ स्मृति का दिन नहीं लेकिन स्मृति सो समर्थीदिवस है।

15. आज का दिन वियोग वा वैराग का दिन नहीं है लेकिन सेवा की जिम्मेवारी के ताजपोशी का दिन है।

16. समर्थी के स्मृति के तिलक का दिन है।

17. ‘‘आगे बच्चे पीछे बाप’’, इसी संकल्प को साकार होने का दिन है।

18. आज के दिन ब्रह्मा बाप विशेष डबल विदेशी बच्चो को बाप के संकल्प और आह्वान को साकार रूप देने वाले स्नेही बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। कैसे स्नेह द्वारा बाप के सम्मुख पहुँच गये हैं। ब्रह्मा बाप के आह्वान के प्रत्यक्ष फलस्वरूप, ऐसे सर्व शक्तियों के रस भरे श्रेष्ठ फलों को देख ब्रह्मा बाप बच्चों को विशेष बधाई और वरदान दे रहे हैं। सदा सहज विधि द्वारा वृद्धि को पाते रहो। जैसे बच्चे हर कदम में ‘‘बाप की कमाल है’’ यही गीत गाते हैं ऐसे बापदादा भी यही कहते हैं कि - ‘‘बच्चों की कमाल है।’’ दूरदेशी, दूर के धर्म वाले होते भी कितने समीप आ गये हैं। समीप आबू में रहने वाले दूर हो गये हैं। सागर के तट पर रहने वाले प्यासे रह गये हैं लेकिन डबल विदेशी बच्चे औरों की भी प्यास बुझाने वाले ज्ञान गंगायें बन गये। कमाल है ना बच्चों की। इसलिए ऐसे खुशनशीब बच्चों पर बापदादा सदा खुश हैं। आप सभी भी डबल खुश हो ना। अच्छा-

ऐसे सदा समान बनने के श्रेष्ठ संकल्पधारी, सर्व शक्तियों के विल द्वारा विल पावर में रहने वाले, सदा दिलवर की दिलरूबा बन भिन्न-भिन्न साज़ सुनाने वाले, सदा स्तम्भ के समान अचल अडोल रहने वाले, सदा सहज विधि द्वारा वृद्धि को पाए वृद्धि को प्राप्त कराने वाले, सदा मधुर मिलन मनाने वाले देशविदेश के सर्व प्रकार के वैरायटी बच्चों को पुष्प वर्षा सहित बापदादा का यादप् यार और नमस्ते।’’

आज सभी स्नेही विशेष सेवाधारी बच्चों को वतन में बुलाया था। जगत अम्बा को भी बुलाया, दीदी को भी बुलाया। विश्व किशोर आदि जो भी अनन्य गये हैं सेवा अर्थ उन सबको वतन में बुलाया था। विशेष स्मृति दिवस मनाने के लिए सभी अनन्य डबल सेवा के निमित्त बने हुए बच्चे संगम के ईश्वरीय सेवा में भी साथी है और भविष्य राज्य दिलाने की सेवा के भी साथी हैं तो डबल सेवाधारी हो गये ना। ऐसे डबल सेवाधारी बच्चों ने विशेष रूप से सभी मधुबन में आये हुए सहयोगी स्नेही आत्माओं को यादप्यार दी है। आज बापदादा उन्हों की तरफ से याद-प्यार का सन्देश दे रहे हैं। समझा। कोई किसको याद करते, कोई किसको याद करते। बाप के साथ-साथ सेवार्थ एडवांस पुरुषार्थी बच्चों को जिन्होंने भी संकल्प में याद किया उन सभी की याद का रिटर्न, सभी ने याद प्यार दिया है। पुष्पशान्ता भी स्नेह से याद करती थी। ऐसे तो नाम कितने का लेंवे। सभी की विशेष पार्टी वतन में थी। डबल विदेशियों के लिए विशेष दीदी ने याद दी है। आज दीदी को विशेष बहुतों ने याद किया ना। क्योंकि इन्होंने दीदी को ही देखा है। जगत अम्बा और भाउ (विश्व किशोर) को तो देखा नहीं। इसलिए दीदी की याद विशेष आई। वह लास्ट टाइम बिल्कुल निरसंकल्प और निर्मोही थी। उनको भी याद तो आती है लेकिन वह खींच की याद नहीं है। स्वतंत्र आत्मा है। उन्हों का भी संगठन शक्तिशाली बन रहा है। सब नामीग्रामी है ना। अच्छा-

कुछ विदेशी भाई-बहन सेवा पर जाने के लिए बापदादा से छुट्टी ले रहे हैं

सभी बच्चों को बापदादा यही कहते हैं कि जा नहीं रहे हो लेकिन फिर से आने के लिए, फिर से बाप के आगे सेवा कर गुलदस्ता लाने के लिए जा रहे हो। इसलिए घर नहीं जा रहे हो। सेवा पर जा रहे हो। घर नहीं, सेवा का स्थान है - यही सदा याद रहे। रहमदिल बाप के बच्चे हो तो दु:खी आत्माओं का भी कल्याण करें। सेवा के बिना चैन से सो नहीं सकते। स्वप्न भी सेवा के आते हैं ना। आँख खुली बाबा से मिले फिर सारा दिन - बाप और सेवा। देखो बापदादा को कितना नाज़ है कि एक बच्चा सर्विसएबुल नहीं लेकिन इतने सब सर्विसएबुल हैं। एक-एक बच्चा विश्व-कल्याणकारी हैं। अभी देखेंगे कौन बड़ा गुलदस्ता लाता है! तो जा रहे हैं या फिर से आ रहे हैं! बापदादा बच्चों के स्नेह में - ‘‘आओ-आओ’’ के गीत गाते हैं। जैसे-जैसे मास पूरे होते जाते हैं तो बापदादा गीत गाते - ‘‘मधुबन में आओ, मधुबन में आओ। यह गीत सुनाई देता है ना! तो ज्यादा स्नेह किसका हुआ? बाप का या आपका! अगर बच्चों का स्नेह ज्यादा रहे तो बच्चे सेफ हैं। महादानी, वरदानी, सम्पन्न आत्मायें जा रहे हैं, अभी अनेक आत्माओं को धनवान बनाकर, सजाकर बाप के सामने ले आना। जा नहीं रहे हो लेकिन सेवा कर एक से तीन गुना होकर आयेंगे। शरीर से भला कितना भी दूर जा रहे हो लेकिन आत्मा सदा बाप के साथ है। बापदादा सहयोगी बच्चों को सदा ही साथ देखते हैं। सहयोगी बच्चों को सदा ही सहयोग प्राप्त होता है। अच्छा- ओम् शान्ति-

प्रश्न:- किसी भी बात की उलझन, मन में उलझन पैदा न करे उसका साधन क्या है?

उत्तर:- समर्थ बाप को सदा साथी बनाकर रखो तो कैसी भी उलझन वाली बात में मन उलझन में नहीं आयेगा। बड़ी बात छोटी, पहाड़ भी राई हो जायेगा। बस सदा याद रहे कि मेरा बाबा, मेरी सेवा, जो बाप का सो मेरा, जो बाप का कर्म वह मेरा कर्म, जो बाप के गुण वह मेरे गुण। गुण, संस्कार, श्रेष्ठ कर्म जब सारी प्रापर्टी के मालिक हो गये, जो बाप की वह आपकी हो गई तो सदा खुशी रहेगी, कभी भी कोई उलझन मन को उलझायेगी नहीं। अच्छा - ओम् शान्ति।



20-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


महादानी बनो, वरदानी बनो

इच्छा मात्रम् अविद्या बनाने वाले सर्व समर्थ बापदादा बोले –

आज बापदादा सर्व बच्चों के प्यूरिटी की पर्सनैलिटी और सर्व प्राप्ति स्वरूप की रायल्टी, रूहानी स्मृति-स्वरूप की रीयल्टी देख रहे हैं। सभी बच्चे प्युरिटी की पर्सनैलिटी से चमकते हुए लाइट के क्राउनधारी देख रहे हैं। एक तरफ सर्व प्राप्ति स्वरूप बच्चों का संगठन देख रहे हैं। दूसरी तरफ विश्व की अप्राप्त आत्मायें जो सदा अल्पकाल की प्राप्ति होते हुए भी प्राप्ति स्वरूप नहीं हैं। सन्तुष्ट नहीं। सदा कुछ न कुछ पाने की इच्छा बनी रहती है। सदा यह चाहिए, यह चाहिए की धुन लगी हुई है। भाग दौड़ कर रहे हैं। प्यासे बन यहाँ वहाँ तन से, मन से, धन से, जन से कुछ प्राप्त हो जाए, इसी इच्छा से भटक रहे हैं। विशेष तीन बातों की तरफ इच्छा रख अनेक प्रकार के प्रयत्न कर रहे हैं। एक तो शक्ति चाहिए। तन की, धन की, पद की, बुद्धि की। और दूसरा भक्ति चाहिए। दो घड़ी सच्ची दिल से भक्ति कर पावें ऐसे भक्ति की इच्छा भी भक्त आत्मायें रखती हैं। तीसरा-अनेक आत्मायें द्वापर से दुख और पुकार की दुनिया देख-देख दुख और अशान्ति के कारण अल्पकाल की प्राप्ति मृगतृष्णा समझते हुए दुख की दुनिया से, इस विकारी दुखों के बन्धनों से मुक्ति चाहती हैं। भक्त, भक्ति चाहते हैं और अन्य कोई शक्ति चाहते, कोई मुक्ति चाहते। ऐसी असन्तुष्ट आत्माओं को सुख और शान्ति की, पवित्रता की, ज्ञान की अंचली देने वाले वा प्राप्ति कराने वाली सन्तुष्ट मणियाँ कौन हैं? आप हो? रहमदिल बाप के बच्चे, जैसे बाप को रहम आता है कि दाता के बच्चे और अल्पकाल की प्राप्ति के लिए चाहिए चाहिए-चाहिए के नारे लगा रहे हैं। ऐसे आप मास्टर दाता प्राप्ति स्वरूप बच्चों को विश्व की आत्माओं प्रति रहम आता है, उमंग आता है कि हमारे भाई अल्पकाल की इच्छा में कितने भटक रहे हैं? दाता के बच्चे, अपने भाईयों के ऊपर दया और रहम की दृष्टि डालो। महादानी बनो। वरदानी बनो। चमकती हुई सन्तुष्ट मणियाँ बन सर्व को सन्तोष दो। आजकल सन्तोषी माँ को बहुत पुकारते हैं। क्योंकि सन्तुष्टता वा संतोष सर्व प्राप्तियों का आधार स्वरूप है। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ अप्राप्ति का अभाव है। सन्तुष्टता के आधार पर स्थूल धन में भी बरकत अनुभव करते हैं। सन्तुष्टता वाले का धन दो रूपया भी दो लाख समान है। करोड़पति हो लेकिन सन्तुष्टता नहीं तो करोड़-करोड़ नहीं। इच्छाओं के भिखारी हैं। इच्छा अर्थात् परेशानी। इच्छा कभी अच्छा बना नहीं सकती। क्योंकि विनाशी इच्छा पूर्ण होने के साथ-साथ और अनेक इच्छाओं को जन्म देती है। इसलिए इच्छाओं के चक्र में मकड़ी की जाल मुआफिक फँस जाते हैं। छूटने चाहते भी छूट नहीं सकते। इसलिए ऐसे जाल में फँसे हुए अपने भाईयों को विनाशी इच्छा मात्रम् अविद्या बनाओ। परेशान अर्थात् शान से परे। हम सभी ईश्वरीय बच्चे हैं, दाता के बच्चे हैं, सर्व प्राप्तियाँ जन्म-सिद्ध अधिकार हैं। इस शान से परे होने के कारण परेशान हैं। ऐसी आत्माओं को अपना श्रेष्ठ शान बताओ। समझा क्या करना है? सभी डबल विदेशी बच्चे अपने-अपने स्थानों पर जा रहे हैं ना। क्या जाकर करेंगे? महादानी वरदानी बन सर्व आत्माओं की सुख-शान्ति की प्राप्तियों द्वारा झोली भर देना। यही संकल्प लेकर जा रहे हो ना। बापदादा बच्चों की हिम्मत और स्नेह को देख बच्चों को सदा स्नेह की रिटर्न में पद्मगुणा स्नेह देते हैं। दूर देश वाले पहचान और प्राप्ति से समीप बन गये। और अनेक देश वाले पहचान और प्राप्ति से दूर रह गये हैं। इसलिए सदा डबल विदेशी बच्चे प्राप्ति स्वरूप की दृढ़ता और सन्तुष्टता के उमंग में आगे बढ़ते चलो। भाग्य विधाता सर्व प्राप्तियों का दाता सदा आपके साथ है। अच्छा-

ऐसे रहमदिल बाप के रहमदिल बच्चों को, सर्व को सन्तुष्टता के खज़ाने से सम्पन्न बनाने वाले सन्तुष्ट मणी बच्चों को, सदा प्राप्ति स्वरूप बन सर्व को प्राप्ति कराने की शुभ भावना में रहने वाले शुभ चिन्तक बच्चों को, सर्व को विनाशी इच्छाओं से इच्छा मात्रम् अविद्या बनाने वाले, सर्व समर्थ बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

विदेशी बच्चों को देखते हुए

इस ग्रुप में किसी को भी कहें कि यहाँ बैठ जाओ तो एवररेडी हो? कोई का पीछे का कोई बन्धन तो नहीं है। ऐसे भी होगा, जब समय आयेगा सभी को टिकेट कैन्सिल कराके यहाँ बिठा देंगे। ऐसे समय पर कोई सैलवेशन भी नहीं लेंगे। सभी को याद है - जब ब्रह्मा बाप अव्यक्त हुए तो वह 4 दिन कैसे बिताये? मकान बड़ा था? खाना बनाया था? फिर 4 दिन कैसे बीता था! विनाश के दिन भी ऐसे ही बीत जायेंगे। उस समय लवलीन थे ना। ऐसे ही लवलीन स्थिति में समाप्ति होगी। फिर यहाँ की पहाड़ियों पर रहकर तपस्या करेंगे। तीसरी ऑख से सारा विनाश देखेंगे। ऐसे निश्चिंत हो ना। कोई चिंता नहीं। न मकान की, न परिवार की, न काम की। सदा निश्चिंत क्या होगा यह क्वेश्चन नहीं। जो होगा अच्छा होगा। इसको कहा जाता है - निश्चिंत। सेन्टर का मकान याद आ जाए, बैंक बैलन्स याद आ जाए... कुछ भी याद न आये। क्योंकि आपका सच्चा धन है ना। चाहे मकान में लगा है, चाहे बैंक में रहा हुआ है। लेकिन आपका तो पद्मगुणा होकर आपको मिलेगा। आपने तो इनश्योर कर लिया ना। मिट्टी, मिट्टी हो जायेगी और आपका हक आपको पद्मगुणा होकर मिल जायेगा और क्या चाहिए! सच्चा धन कभी भी वेस्ट नहीं जा सकता! समझा! ऐसे सदा निश्चिंत रहो। पता नहीं पीछे सेन्टर का क्या होगा? घर का क्या होगा? यह क्वेश्चन नहीं। सफल हुआ ही पड़ा है। सफल होगा या नहीं यह क्वेश्चन नहीं। पहले से ही विल कर दिया है ना। जैसे कोई विल करके जाता है पहले से ही निश्चिन्त होता है ना। तो आप सबने अपना हर श्वांस, संकल्प, सेकण्ड, सम्पत्ति शरीर सब विल कर दिया है ना। विल की हुई चीज़ कभी भी स्व के प्रति यूज नहीं कर सकते।

बिना श्रीमत के एक सेकण्ड या एक पैसा भी यूज नहीं कर सकते। परमात्मा का सब हो गया तो आत्मायें अपने प्रति या आत्माओं के प्रति यूज नहीं कर सकती हैं। डायरेक्शन प्रमाण कर सकती हैं। नहीं तो अमानत में ख्यानत हो जायेगी ना। थोड़ा भी धन बिना डायरेक्शन के कहाँ भी कार्य में लगाया तो वह धन आपको भी उस तरफ खींच लेगा। धन - मन को खींच लेगा। और मन तन को खींच लेगा और परेशान करेगा। तो विल कर लिया है ना? डायरेक्शन प्रमाण करते हो तो कोई भी पाप नहीं। कोई बोझ नहीं। उसके लिए फ्री हो। डायरेक्शन तो समझते हो ना। सब डायरेक्शन मिले हुए हैं! क्लीयर हैं ना! कभी मूँझते तो नहीं? इस कार्य में यह करें या नहीं करें, ऐसे मूँझते तो नहीं? जहाँ भी कुछ मूँझ हो तो जो निमित्त बने हुए हैं उन्हों से वेरीफाय कराओ। या फिर स्व स्थिति शक्तिशाली है तो अमृतवेले की टचिंग सदा यथार्थ होगी। अमृतवेले मन का भाव मिक्स करके नहीं बैठो लेकिन प्लेन बुद्धि होकर बैठो फिर टचिंग यथार्थ होगी।

कई बच्चे जब कोई प्राब्लम आती है तो अपने ही मन का भाव भर करके बैठते हैं। करना तो यही चहिए, होना तो यही चाहिए, मेरे विचार से यह ठीक है... तो टचिंग भी यथार्थ नहीं होती। अपने मन के संकल्प का ही रेसपाण्ड में आता है। इसलिए कहाँ न कहाँ सफलता नहीं होती। फिर मूंझते हैं कि अमृतवेले डायरेक्शन तो यही मिला था फिर पता नहीं ऐसा क्यों हुआ, सफलता क्यों नहीं मिली। लेकिन मन का भाव जो मिक्स किया उस भाव का ही फल मिल जाता है। मनमत का फल क्या मिलेगा? मूंझेगा ना! इसको कहा जाता है अपने मन के संकल्प को भी विल करना। मेरा संकल्प यह कहता है लेकिन बाबा क्या कहता? अच्छा!



22-01-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


नामीग्रामी सेवाधारी बनने की विधि

ज्ञान के सागर, शिवबाबा, अपने कुलदीपक बच्चों के प्रति बोले:-

आज बापदादा अपने एक टिक जगते हुए दीपकों की दीपमाला को देख रहे हैं। कैसे हर एक जगा हुआ दीपक अचल, निर्विघ्न, अपनी ज्योति से विश्व को रोशनी दे रहे हैं। यह दीपकों की रोशनी आत्मा को जगाने की रोशनी है। विश्व की सर्व आत्माओं के आगे जो अज्ञान का आवरण है, उसको मिटाने के लिए कैसे जगाकर और जगा रहे हैं, अंधकार के कारण अनेक प्रकार की ठोकरें खाने वाले आप जगे हुए दीपकों की तरफ बड़े प्यार से रोशनी की इच्छा से, आवश्यकता से, आप दीपकों की तरफ देख रहे हैं। ऐसे अंधकार में भटकने वाली आत्माओं को ज्ञान की रोशनी दो। जो घर-घर में दीपक जग जायें। (बिजली चली गई) अभी भी देखो अंधकार अच्छा लगा? रोशनी प्रिय लगती है ना। तो ऐसे बाप से कनेक्शन जुड़ाओ। कनेक्शन जोड़ने का ज्ञान दो।

सभी डबल विदेशी रिफ्रेश हो अर्थात् शक्तिशाली बन, लाइट हाउस, माइट हाउस बन, नॉलेजफुल बन, पावरफुल बन, सक्सेसफुल बनकर के सेवा स्थानों पर जा रहे हो फिर से आने के लिए। जाना अर्थात् सफलता स्वरूप का पार्ट बजाकर एक से अनेक हो करके आना। जाते हो अपने परिवार की अन्य आत्माओं को बाप के घर में ले आने के लिए। जैसे हद की लड़ाई करने वाले योद्धे बाहुबल, साइन्स बल वाले योद्धे सर्व शस्त्रं से सजकर युद्ध के मैदान पर जाते हैं विजय का मैडल लेने के लिए, ऐसे आप सभी रूहानी योद्धे सेवा के मैदान पर जा रहे हो विजय का झण्डा लहराने के लिए। जितना-जितना विजयी बनते हो उतना बाप द्वारा स्नेह, सहयोग, समीपता, सम्पूर्णता के विजयी मैडल्स प्राप्त करते हो। तो यह चेक करो कि अब तक कितने मैडल्स मिले हैं। जो विशेषताए है वा टाइटल्स देते हैं वह कितने मैडल्स धारण किये हैं। विशेष टाइटल्स की लिस्ट निकाली है ना। वह लिस्ट सामने रखकर स्वयं को देखना कि यह सब मैडिल्स हमें प्राप्त हैं? अभी तो यह बहुत थोड़े निकाले हैं। कम से कम 108 तो होने चाहिए। और अपने इतने मैडल्स को देख नशे में रहो। कितने मैडल्स से सजे हुए हो। जाना अर्थात् विशेषता का कार्य कर सदा नये ते नये मैडल्स लेते जाना। जैसा कार्य वैसा मैडल मिलता है। तो इस वर्ष हर एक सेवा के निमित्त बने हुए बच्चों को यह लक्ष्य रखना है कि कोई न कोई ऐसा नवीनता का विशेष कार्य करें जो अब तक ड्रामा में छिपा हुआ, नूँधा हुआ है। उस कार्य को प्रत्यक्ष करें। जैसे लौकिक कार्य में कोई विशेषता का कार्य करते हैं तो नामीग्रामी बन जाते हैं। चारों ओर विशेषता के साथ विशेष आत्मा का नाम हो जाता है। ऐसे हरेक समझे कि मुझे विशेष कार्य करना है। विजय का मैडल लेना है। ब्राहमण परिवार के बीच विशेष सेवाधारियों की लिस्ट में नामीग्रामी बनना है। रूहानी नशे में रहना है। नाम के नशे में नहीं। रूहानी सेवा के नशे में निमित्त और निर्माण के सर्टिफिकेट सहित नामीग्रामी होना है।

आज डबल विदेशी ग्रुप का विजयी बन विजय स्थल पर जाने का बधाई समारोह है। कोई भी विजय स्थल पर जाते हैं तो बड़ी धूमधाम से खुशी के बाजे गाजे से विजय का तिलक लगाकर बधाई मनाई जाती है। विदाई नहीं, बधाई। क्योंकि बापदादा और परिवार जानते हैं कि ऐसे सेवाधारियों की विजय निश्चित है। इसलिए बधाई का समारोह मनाते हैं। विजय हुई पड़ी है ना। सिर्फ निमित्त बन रिपीट करना है। क्योंकि करने से निमित्त बन - करेंगे और पायेंगे! जो निमित्त कर्म है और निश्चित प्रत्यक्ष फल है! इस निश्चय के उमंग उत्साह से जा रहे हो औरों को अधिकारी बना कर ले आने के लिए। अधिकार का अखुट खज़ाना महादानी बन दान पुण्य करने के लिए जा रहे हो। अब देखेंगे पाण्डव आगे जाते हैं वा शक्तियाँ आगे जाती हैं। विशेष नया कार्य कौन करते हैं। उसका मैडल मिलेगा। चाहे कोई ऐसी विशेष सेवा के निमित्त आत्माओं को निकालो। चाहे सेवा के स्थान और वृद्धि को प्राप्त कराओ। चाहे चारों ओर नाम फैलने का कोई विशेष कार्य करके दिखाओ। चाहे ऐसा बड़ा ग्रुप तैयार कर बापदादा के सामने लाओ। किसी भी प्रकार की विशेष सेवा करने वाले को विजय का मैडल मिलेगा। 84 में ही। क्योंकि दिसम्बर में न्यू ईयर मनाने तो सभी आते हो ना। खुद नहीं भी आयेंगे तो समाचार आ जायेगा। ऐसे विशेष कार्य करने वाले को सब सहयोग भी मिल जाता है। स्वयं ही कोई टिकिट भी आफर कर लेंगे। शुरू- शुरू में जब आप सभी सेवा पर निकले थे तो सेवा कर फर्स्ट क्लास में सफर करते थे। और अभी टिकेट भी लेते और सेकण्ड थर्ड में आते। ऐसी कोई कम्पनी की सेवा करो, सब हो जायेगा। सेवाधारी को साधन भी मिल जाता है। समझा! सभी सन्तुष्ट होकर विजयी बनकर जा रहे हैं ना। किसी भी प्रकार की कमज़ोरी अपने साथ तो नहीं ले जा रहे हो। कमज़ोरियों को स्वाहा कर शक्तिशाली आत्मायें बन जा रहे हो ना! कोई कमज़ोरी रह तो नहीं गई! अगर कुछ रह गया हो जो स्पेशल समय लेकर समाप्ति करके जाना। अच्छा –

ऐसे सदा अचल, जगे हुए दीपक, सदा ज्ञान रोशनी द्वारा अंधकार को मिटाने वाले, हर समय सेवा की विशेषता में विशेष पार्ट बजाने वाले, बाप द्वारा सर्व प्राप्त हुए मैडल्स को धारण करने वाले, सदा विजय निश्चित के निश्चय में रहने वाले, ऐसे अविनाशी विजय के तिलकधारी, सदा सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न, सन्तुष्ट आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते!’’

जगदीश भाई से - बापदादा के साकार पालना के पले हुए रत्नों की वैल्यु होती है। जैसे लौकिक रीति में भी पेड़ (वृक्ष) में पके हुए फलों का कितना मूल्य होता है। ऐसे साकार पालना में पले हुए अर्थात् पेड़ में पके हुए। आज ऐसी अनुभवी आत्माओं को सभी कितना प्यार से देखते हैं। पहले मिलन में ही वरदान पा लिया ना। पालना अर्थात् वृद्धि ही वरदानों से हुई ना। इसलिए सदा पालना के अनुभव का आवाज़ अनेक आत्माओं की पालना के लिए प्रेरित करते रहेंगे। सागर के भिन्न-भिन्न सम्बन्ध की लहरों में लहराने के अनुभवों की लहरों में लहराते रहेंगे। सेवा के निमित्त आदि में एकानामी के समय निमित्त बने। एकानामी के समय निमित्त बनने के कारण सेवा का फल सदा श्रेष्ठ है। समय प्रमाण सहयोगी बने इसलिए वरदान मिला। अच्छा –

कांफ्रेंस के प्रति - सभी मिलकर जब कोई एक उमंग उत्साह से कार्य करते हैं तो उसमें सफलता सहज होती है। सभी के उमंग से कार्य हो रहा है ना तो सफलता अवश्य होगी। सभी को मिलाना यह भी एक श्रेष्ठता की निशानी है। सभी के मिलने से अन्य आत्मायें भी मिलन मनाने के समीप आती है। दिल का संकल्प मिलाना अर्थात् अनेक आत्माओं का मिलन मनाना। इसी लक्ष्य को देखते हुए कर रहे हो और करते रहेंगे। अच्छा - फारेनर्स सब ठीक हैं? सन्तुष्ट हैं? अभी सब बड़े हो गये हैं। सम्भालने वाले है। पहले छोटे-छोटे थे तो नाज़ नखरे करते थे, अभी औरों को सम्भालने वाले बन गये। हमें कोई सम्भाले, यह नहीं। अभी मेहनत लेने वाले नहीं, मेहनत देने वाले। कम्पलेन्ट करने वाले नहीं, कम्पलीट। कोई भी कम्पलेन्ट अभी भी नहीं, फिर पीछे भी नहीं, ऐसा है ना! सदा खुशखबरी के समाचार देना। और जो नहीं भी आये हैं उन्हों को भी मायाजीत बनाना। फिर ज्यादा पत्र नहीं लिखने पड़ेंगे। बस सिर्फ ओ.के.। लिख देना, बस ज्यादा बड़े पत्र नहीं लिखना। सिर्फ ओ.के. अच्छी-अच्छी बातें भले लिखो लेकिन शार्ट में। अच्छा।

टीचर्स से - बापदादा का टीचर्स से विशेष प्यार है क्योंकि समान हैं। बाप भी टीचर और आप मास्टर टीचर। वैसे भी समान प्यारे लगते हैं। बहुत अच्छा उमंग उत्साह से सेवा में आगे बढ़ रही हो। सभी चक्रवर्ती हो। चक्र लगाते अनेक आत्माओं के सम्बन्ध में आए, अनेक आत्माओं को समीप लाने का कार्य कर रही हो। बापदादा खुश हैं। ऐसा लगता है ना कि बापदादा हमारे पर खुश हैं, या समझती हो कि अभी थोड़ा-सा कुछ करना है। खुश हैं और भी खुश करना है। मेहनत अच्छी करती हो, मेहनत मुहब्बत से करती हो इसलिए मेहनत नहीं लगती। बापदादा सर्विसएबुल बच्चों को सदा ही सिर का ताज कहते हैं। सिरताज हो। बापदादा बच्चों के उमंग उत्साह कोदेख और आगे उमंग-उत्साह बढ़ाने का सहयोग देते हैं। एक कदम बच्चों का, पद्म कदम बाप के। जहाँ हिम्मत है वहाँ उल्लास की प्राप्ति स्वत: होती है। हिम्मत है तो बाप की मदद है, इसलिए बेपरवाह बादशाह हो सेवा करते चलो। सफलता मिलती रहेगी। अच्छा –



13-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सम्मेलन के पश्चात मेडीटेशन हाल में कुछ विदेशी भाई-बहनों तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

आज प्रेम के सागर, शान्ति के सागर बाप अपने शान्ति प्रिय, प्रेम स्वरूप, बच्चों से मिलने आये हैं। बापदादा सारे विश्व के आत्माओं की एक ही आश - शान्ति और सच्चे प्यारकी देख सर्व बच्चों की यह आश पूर्ण करने के लिए सहज विधि बताने बच्चों के पास पहुँच गये हैं। बहुत समय से भिन्न-भिन्न रूपों से इसी आश को पूर्ण करने के लिए बच्चों ने जो प्रयत्न किये वह देख-देख रहमदिल बाप को, बच्चों पर रहम आता, दाता के बच्चे और मांग रहे हैं एक घड़ी के लिए, थोड़े समय के लिए शान्ति दे दो! अधिकारी बच्चे भिखारी बन शान्ति और स्नेह के लिए भटक रहे हैं। भटकते-भटकते कई बच्चे दिल शिकस्त बन गये हैं। प्रश्न उठता है कि क्या अविनाशी शान्ति विश्व में हो सकती है? सर्व आत्माओं में नि:स्वार्थ सच्चा स्नेह हो सकता है?

बच्चों के इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाप को स्वयं आना ही पड़ा। बापदादा बच्चों को यही खुशखबरी बताने के लिए आये हैं कि तुम ही मेरे बच्चे कल शान्ति और सुखमय दुनिया के मालिक थे। सर्व आत्माये सच्चे स्नेह की सूत्र में बंधी हुई थी। शान्ति और प्रेम तो आपके जीवन की विशेषता थी। प्यार का संसार, सुख का संसार, जीवन मुक्त संसार जिसकी अभी आश रखते हो, सोचते हो कि ऐसा होना चाहिए, उसी संसार के कल मालिक थे। आज वह संसार बना रहे हो और कल फिर उसी संसार में होंगे। कल की ही तो बात है। यही आपकी भूमि कल स्वर्ग भूमि होगी, क्या भूल गये हो? अपना राज्य, सुख सम्पन्न राज्य जहां दु:ख अशान्ति का नाम निशान नहीं, अप्राप्ति नहीं। अप्राप्ति ही अशान्ति का कारण है और अप्राप्ति का कारण है अपवित्रता। तो जहां अपवित्रता नहीं, अप्राप्ति नहीं वहां क्या होगा? जो इच्छा है, जो प्लैन सोचते हो वह प्रैक्टिकल में होगा। वह ड्रामा की भावी अटल अचल है। इसको कोई बदल नहीं सकता। बनी बनाई बनी हुई है। बाप द्वारा नई रचना हो ही गई है। आप सब कौन हो? नई रचना के फाउण्डेशन स्टोन आप हो। अपने को ऐसे फाउन्डेशन स्टोन समझते हो तब तो यहां आये हो ना। ब्राह्मण आत्मा अर्थात् नई दुनिया के आधारमूर्त्त। बापदादा ऐसे आधार मूर्त बच्चों को देख हर्षित होते हैं। बापदादा भी गीत गाते हैं वाह मेरे लाडले सिकीलधे मीठे-मीठे बच्चे! आप भी गीत गाते हो ना। आप कहते हो - तुम ही मेरे और बाप भी कहते - तुम ही मेरे। बचपन में यह गीत बहुत गाते थे ना। (दो तीन बहनों ने वह गीत गाया और बापदादा रिटर्न में रेसपाण्ड दे रहे थे।)

बापदादा तो दिल का आवाज़ सुनते हैं। मुख का आवाज़ भले कैसा भी हो। बाप ने गीत बनाया और बच्चों ने गाया। अच्छा। (कुछ भाई बहनें नीचे हाल में तथा ओमशान्ति भवन में मुरली सुन रहे थे।) नीचे भी बहुत बच्चे बैठे हुए हैं। स्नेह की सूरते और मीठे-मीठे उल्हाने बापदादा सुन रहे हैं। सभी बच्चों ने दिल वा जान सिक वा प्रेम से विश्व-सेवा का पार्ट बजाया। बापदादा सभी की लगन पर सभी को स्नेह के झूले में झुलाते हुए मुबारक दे रहे हैं - जीते रहो, बढ़ते रहो, उड़ते रहो। सदा सफल रहो। सभी के स्नेह के सहयोग ने विश्व के कार्य को सफल किया। अगर एक बच्चे की मुहब्बत भरी मेहनत को देखें तो बापदादा दिन-रात वर्णन करते रहें तो भी कम हो जायेगा। जैसे बाप की महिमा अपरम- अपार है ऐसे बाप के सेवाधारी बच्चों की महिमा भी अपरम-अपार है, एक लगन, एक उमंग एक दृढ़ संकल्प कि हमें विश्व की सर्व आत्माओं को शान्ति का सन्देश जरूर देना ही है। इसी लगन के प्रत्यक्ष स्वरूप में सफलता है और सदा ही रहेगी। दूर वाले भी समीप ही हैं। नीचे नहीं बैठे हैं लेकिन बापदादा के नयनों पर हैं। कोई ट्रेन में, कोई बस में जा रहे हैं लेकिन सभी बाप को याद हैं। उन्हों के मन का संकल्प भी बापदादा के पास पहुँच रहा है। अच्छा-

बाप के घर में मेहमान नहीं लेकिन महान आत्मा बनने वाले आये हैं। बापदादा तो सभी को आई.पी. या वी.आई.पी. नहीं देखते लेकिन सिकीलधे बच्चे देखते हैं। वी.आई.पी. तो आयेंगे और थोड़ा समय देख, सुनकर चले जायेंगे। लेकिन बच्चे सदा दिल पर रहते हैं। चाहें कहीं भी जायेंगे लेकिन रहेंगे दिल पर। अपने वा बाप के घर में पहुँचने की मुबारक हो। बापदादा सभी बच्चों को मधुबन का अर्थात् अपने घर का श्रृंगार समझते हैं। बच्चे घर का श्रृंगार हैं। आप सभी कौन हो? शृंगार हो ना! अच्छा –

ऐसे सदा दृढ़ संकल्पधारी, सफलता के सितारे, सदा दिलतख्तनशीन, सदा याद और सेवा की लगन में मगन रहने वाले, नई रचना के आधार मूर्त, विश्व को सदा के लिए नई रोशनी, नई जीवन देने वाले, सर्व को सच्चे स्नेह का अनुभव कराने वाले, स्नेही सहयोगी, निरन्तर साथी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

(डा.जोन्हा) असिस्टेन्ट सेक्रेट्री जनरल, यू.एन.ओ.

बापदादा बच्चे के दिल के संकल्प को सदा ही सहयोग देते पूर्ण करते रहेंगे। जो आपका संकल्प है उसी संकल्प को साकार में लाने के योग्य स्थान पर पहुँच गये हो। ऐसे समझते हो - कि यह सब मेरे संकल्प को पूरे करने वाले साथी हैं। सदा शान्ति का अनुभव याद से करते रहेंगे। बहुत मीठी सुखमय शान्ति की अनुभूति होती रहेगी। शान्ति प्रिय परिवार में पहुँच गये हो। इसलिए सेवा के निमित्त बने। सेवा के निमित्त बनने का रिटर्न जब भी बाप को याद करेंगे तो सहज सफलता का अनुभव करते रहेंगे। अपने को सदा ‘‘मैं शान्त स्वरूप आत्मा हूँ, शान्ति के सागर का बच्चा हूँ। शान्ति प्रिय आत्मा हूँ’’ यह स्मृति में रखना और इसी अनुभव द्वारा जो भी सम्पर्क में आये उन्हीं को सन्देशी बन सन्देश देते रहना। यही अलौकिक आक्यूपेशन सदा श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ कर्म द्वारा श्रेष्ठ प्राप्ति कराता रहेगा। वर्तमान और भविष्य दोनों ही श्रेष्ठ रहेंगे। शान्ति का अनुभव करने वाली योग्य आत्मा हो। सदा शान्ति के सागर में लहराते रहना।

जब भी कोई कार्य में मुश्किल हो तो शान्ति के फरिश्तों से अपना सम्पर्क रखेंगे तो मुश्किल सहज हो जायेगा। समझा। फिर भी बहुत भाग्यवान हो। इस भाग्य विधाता की धरनी पर पहुँचने वाले कोटों में कोई, कोई में भी कोई होते हैं। भाग्यवान तो बन ही गये। अभी पद्मापद्म भाग्यवान जरूर बनना है। ऐसा ही लक्ष्य है ना! जरूर बनेंगे सिर्फ शान्ति के फरिश्तों का साथ रखते रहना। विशेष आत्मायें, विशेष पार्ट बजाने वाली आत्मायें यहाँ पहुँचती हैं। आपका आगे भी विशेष पार्ट है जो आगे चल मालूम पड़ता जायेगा। यह कार्य तो सफल हुआ ही पड़ा है सिर्फ जो भी श्रेष्ठ आत्मायें भाग्य बनाने वाली हैं उन्हों का भाग्य बनाने के लिए यह सेवा का साधन है। यह तो हुआ ही पड़ा है, यह अनेक बार हुआ है। आपका संकल्प बहुत अच्छा है। और जो भी आपके साथी हैं, जो यहाँ से होकर गये हैं, स्नेही हैं, सहयोगी भी हैं। उन सबको भी विशेष स्नेह के पुष्पों के साथ-साथ बापदादा का याद-प्यार देना।

मैडम अनवर सादात से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात इजिप्ट के लिए सन्देश

अपने देश में जाकर धन की एकानामी का तरीका सिखलाना। मन की खुशी से धन की अनुभूति होती है। और धन की एकानामी ही मन की खुशी का आधार है। ऐसे धन की एकानामी और मन की खुशी का साधन बताना तो वे लोग आपको धन और मन की खुशी देने वाले - खुशी के फरिश्ते अनुभव करेंगे। तो अभी यहाँ से शान्ति और खुशी का फरिश्ता बनकर जाना। इस शान्ति कुण्ड के सदा अविनाशी के वरदान को साथ रखना। जब भी कोई बात सामने आये तो ‘‘मेरा बाबा’’ कहने से वह बात सहज हो जायेगी। सदा उठते ही पहले बाप से मीठी-मीठी बातें करना और दिन में भी बीच-बीच में अपने आपको चेक करना कि बाप के साथ हैं! और रात को बाप के साथ ही सोना, अकेला नहीं सोना। तो सदा बाप का साथ अनुभव करती रहेंगी। सभी को बाप का सन्देश देती रहेंगी। आप बहुत सेवा कर सकती हो क्योंकि इच्छा है सभी को खुशी मिले, शान्ति मिले, जो दिल की इच्छा है उससे जो कार्य करते हैं उसमें सफलता मिलती ही है। अच्छा – ओम शान्ति!



18-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मण जीवन - अमूल्य जीवन

अपने संगे के रंग में रंगाने वाले सर्वश्रेष्ठ बापदादा अपने सिकीलधे बच्चों प्रति बोले:-

आज सदा स्नेह में समाये हुए स्नेही बच्चों से स्नेह के सागर मिलन मनाने आये हैं। जैसे बच्चे स्नेह से बाप को याद करते हैं वैसे बाप भी स्नेही बच्चों को पद्मगुणा रिटर्न देने के लिए, साकारी सृष्टि में मिलने के लिए आते हैं। बाप बच्चों को आपसमान अशरीरी निराकार बनाते और बच्चों स्नेह से निराकारी और आकारी बाप को आप समान साकारी बना देते हैं। यह बच्चों के स्नेह की कमाल! बच्चों के ऐसे स्नेह की कमाल देख बापदादा हर्षित होते हैं। बच्चों के गुणों के गीत गाते हैं कि कैसे सदा बाप के संग के रंग में बाप समान बनते जा रहे हैं। बापदादा ऐसे फॉलो फादर करने वाले बच्चों को आज्ञाकारी, वफादार, फरमानवरदार सच्चे-सच्चे अमूल्य रत्न कहते हैं। आप बच्चों के आगे यह स्थूल हीरे जवाहरात भी मिट्टी के समान हैं। इतने अमूल्य हो। ऐसे अपने को अनुभव करते हो कि मैं बापदादा के गले की माला के विजयी अमूल्य रत्न हूँ। ऐसा स्वमान रहता है?

डबल विदेशी बच्चों को नशा और खुशी रहती है कि हमें बापदादा ने इतना दूर होते हुए भी दूरदेश से चुनकर अपना बना लिया है। दुनिया बाप को ढूँढती और बाप ने हमें ढूँढा। ऐसे अपने को समझते हो? दुनिया पुकार रही है कि आ जाओ और आप सभी नम्बरवार क्या गीत गाते हो? तुम्हीं से बैठूँ, तुम्ही से खाऊँ, तुम्हीं से सदा साथ रहूँ। कहाँ पुकार और कहाँ सदा साथ! रात दिन का अन्तर हो गया ना! कहाँ एक सेकण्ड की सच्ची अविनाशी प्राप्ति के प्यासी आत्मायें और कहां आप सभी प्राप्ति स्वरूप आत्मायें! वह गायन करने वाली और आप सभी बाप की गोदी में बैठने वाले। वह चिल्लाने वाली और आप हर कदम उनकी मत पर चलने वाले। वह दर्शन की प्यासी और आप बाप द्वारा स्वयं दर्शनीयमूर्त्त बन गये। थोड़ा सा दु:ख दर्द का अनुभव और बढ़ने दो फिर देखना आपके सेकण्ड के दर्शन, सेकण्ड की दृष्टि के लिए कितना प्यासे बन आपके सामने आते हैं।

अभी आप निमन्त्रण देते हो, बुलाते हो। फिर आपसे सेकण्ड के मिलने के लिए बहुत मेहनत करेंगे कि हमें मिलने दो। ऐसा साक्षात साक्षात्कार स्वरूप आप सभी का होगा। ऐसे समय पर अपनी श्रेष्ठ जीवन और श्रेष्ठ प्राप्ति का महत्त्व आप बच्चों में से भी उस समय ज्यादा पहचानेंगे। अभी अलबेलपन और साधारणतापन के कारण अपनी श्रेष्ठता और विशेषता को भूल भी जाते हो। लेकिन जब अप्राप्ति वाली आत्मायें प्राप्ति के प्यास से आपके सामने आयेंगे तब ज्यादा अनुभव करेंगे कि हम कौन और यह कौन! अभी बापदादा द्वारा सहज और बहुत खज़ाना मिलने के कारण कभी-कभी स्वयं की और खज़ाने की वैल्यू को साधारण समझ लेते हो - लेकिन एक-एक महावाक्य, एक-एक सेकण्ड, एक-एक ब्राह्मण जीवन का श्वास कितना श्रेष्ठ है! वह आगे चल ज्यादा अनुभव करेंगे। ब्राह्मण जीवन का हर सेकण्ड एक जन्म नहीं लेकिन जन्म-जन्म की प्रालब्ध बनाने वाला है। सेकण्ड गया अर्थात् अनेक जन्मों की प्रालब्ध गई। ऐसी अमूल्य जीवन वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। ऐसी श्रेष्ठ तकदीरवान विशेष आत्मायें हो। समझा कौन हो? ऐसे श्रेष्ठ बच्चों से बाप मिलने आये हैं। डबल विदेशी बच्चों को यह सदा याद रहता है ना! वा कभी भूलता कभी याद रहता है? याद स्वरूप बने हो ना! जो स्वरूप बन जाते वह कभी भूल नहीं सकते। याद करने वाले नहीं लेकिन याद स्वरूप बनना है। अच्छा-

ऐसे सदा मिलन मनाने वाले, सदा बाप के संग के रंग में रहने वाले, सदा स्वयं के समय के सर्व प्राप्ति के महत्व को जानने वाले, सदा हर कदम में फॉलो फादर करने वाले, ऐसे सिकीलधे सपूत बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

पोलैण्ड तथा अन्य देशों से आये हुए नये-नये बच्चों से

सभी अपने को भाग्यवान समझते हो, कौन सा भाग्य है? इस श्रेष्ठ भूमि पर आना यही सबसे बड़ा भाग्य है। यह भूमि महान तीर्थ की भूमि है। तो यहाँ पहुँचे यह तो भाग्य है ही। लेकिन अभी आगे क्या करेंगे? याद में रहना, याद के अभ्यास को सदा आगे बढ़ाते रहना। जो जितना भी सीखे उसको आगे बढ़ाते रहना। अगर सदा सम्बन्ध में रहते रहेंगे तो सम्बन्ध द्वारा बहुत प्राप्ति करते रहेंगे। क्यों? आज के विश्व में सभी को खुशी और शान्ति दोनों चाहिए। तो यह दोनों ही इस राजयोग के अभ्यास द्वारा सदा के लिए प्राप्त हो जायेंगी। यह प्राप्ति चाहते हो तो सहज साधन यह है। इसको छोड़ना नहीं। साथ रखना। बहुत खुशी मिलेगी। जैसे खुशी की खान मिल जायेगी। जिससे औरों को भी सच्ची खुशी बाँट सकेंगे। औरों को भी सुनाना, औरों को भी यह रास्ता बताना। विश्व में इतनी आत्मायें हैं लेकिन उन आत्माओं में ऐसे आप थोड़ी आत्मायें यहाँ पहुँची हो। यह भी बहुत तकदीर की निशानी है। शान्तिकुण्ड में पहुँच गये। शान्ति तो सभी को आवश्यक है ना। स्वयं भी शान्त और सर्व को भी शान्ति देते रहें यही मानव की विशेषता है। अगर शान्ति नहीं तो मानव जीवन ही क्या है। आत्मिक अविनाशी शान्ति। स्वयं को और अनेकों को भी सच्ची शान्ति प्राप्त करने का रास्ता बता सकते हो। पुण्य आत्मा बन जायेंगे। किसी अशान्त आत्मा को शान्ति दे दो तो कितना बड़ा पुण्य है। स्वयं पहले भरपूर बनो फिर औरों के प्रति भी पुण्यात्मा बन सकते हो। इस जैसा पुण्य और कोई नहीं। दु:खी आत्माओं को सुख शान्ति की झलक दिखा सकते हो। जहां लगन है वहां दिल का संकल्प पूरा हो जाता है। अभी बाप द्वारा जो सन्देश मिला है वह सन्देश सुनाने वाले सन्देशी बनकर चलते रहो।

सेवाधारियों से:- सेवा की लाटरी भी सदाकाल के लिए सम्पन्न बना देती है। सेवा से सदाकाल के लिए खज़ाने से भरपूर हो जाते हैं। सभी ने नम्बरवन सेवा की। सब फर्स्ट प्राइज लेने वाले हो ना! फर्स्ट प्राइज है - सन्तुष्ट रहना और सर्व को सन्तुष्ट करना। तो क्या समझते हो, जितने दिन सेवा की उतने दिन स्वयं भी सन्तुष्ट रहे और दूसरों को भी किया या कोई नाराज़ हुआ? सन्तुष्ट रहे और सन्तुष्ट किया तो नम्बरवन हो गये। हर कार्य में विजयी बनना अर्थात् नम्बरवन होना। यही सफलता है। न स्वयं डिस्टर्ब हो और न दूसरों को करो यही विजय है। तो ऐसे सदा के विजयी रत्न। विजय संगमयुग का अधिकार है। क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिवान हो ना।

सच्चे सेवाधारी वह जो सदा रूहानी दृष्टि से, रूहानी वृत्ति से रूहे गुलाब बन रूहों को खुश करने वाले हों। तो जितना समय भी सेवा की उतना समय रूहानी गुलाब बन सेवा की? कोई बीच में काँटा तो नहीं आया। सदा ही रूहानी स्मृति में रहे अर्थात् रूहानी गुलाब स्थिति में रहे। जैसे यहाँ यह अभ्यास किया वैसे अपने-अपने स्थानों पर भी ऐसे ही श्रेष्ठ स्थिति में रहना। नीचे नहीं आना। कुछ भी हो, कैसा भी वायुमण्डल हो लेकिन जैसे गुलाब का पुष्प काँटों में रहते भी स्वयं सदा खुशबू देता, काँटों के साथ स्वयं काँटा नहीं बनता। ऐसे रूहानी गुलाब सदा वातावरण के प्रभाव से न्यारे और प्यारे। वहाँ जाकर यह नहीं लिखना कि क्या करें माया आ गई। सदा मायाजीत बनकर जा रहे हो ना। माया को आने की छुट्टी नहीं देना। दरवाजा सदा बन्द कर देना। डबल लाक है - याद और सेवा, जहाँ डबल लाक है वहाँ माया आ नहीं सकती है।

दादी जी तथा अन्य बड़ी बहनों से:- जैसे बाप सदा बच्चों का उमंग उत्साह बढ़ाते रहते वैसे फॉलो फादर करने वाले बच्चे हैं। विशेष सभी टीचर्स को देशविदेश से जो भी आईं, सबको बापदादा सेवा की मुबारक देते हैं। हरेक अपने को नाम सहित बाप के याद और प्यार के अधिकारी समझकर अपने आपको ही प्यार कर लेना। एक-एक के गुण गायें तो कितने के गुण गायें। सभी ने बहुत मेहनत की है। अगले वर्ष से अभी उन्नति को प्राप्त किया है और आगे भी इससे ज्यादा से ज्यादा स्वयं और सेवा से उन्नति को पाते रहेंगे। समझा - ऐसे नहीं समझना हमको बापदादा ने नहीं कहा, सभी को कह रहे हैं। भक्त बाप का नाम लेने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं, सोचते हैं बाप का नाम मुख पर रहे लेकिन बाप के मुख पर किसका नाम रहता? आप बच्चों का नाम बाप के मुख पर है समझा। अच्छा!



20-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


एक सर्वश्रेष्ठ, महान, और सुहावनी घड़ी

विश्व परिवर्तन के निमित्त बनाने वाले बापदादा अपने देशी और विदेशी बच्चों प्रति बोले:-

आज भाग्य बनाने वाले बाप श्रेष्ठ भाग्यवान सर्व बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। हर एक बच्चा कैसे कल्प पहले मुआफिक तकदीर जगाकर पहुँच गया है। तकदीर जगाकर आये हो। पहचानना अर्थात् तकदीर जगना। विशेष डबल विदेशी बच्चों का वरदान भूमि पर संगठन हो रहा है। यह संगठन तकदीरवान बच्चों का संगठन है। सबसे पहले तकदीर खुलने का श्रेष्ठ समय वा श्रेष्ठ घड़ी वो ही है जब बच्चों ने जाना, माना - मेरा बाप। वह घड़ी ही सारे कल्प के अन्दर श्रेष्ठ और सुहावनी है। सभी को उस घड़ी की स्मृति अब भी आती है ना! बनना, मिलना, अधिकार पाना यह तो सारा संगमयुग ही अनुभव करते रहेंगे। लेकिन वह घड़ी जिसमें अनाथ से सनाथ बने, क्या से क्या बने। बिछुड़े हुए फिर से मिले। अप्राप्त आत्मा प्राप्ति के दाता की बनी वह पहली परिवर्तन की घड़ी, तकदीर जगने की घड़ी कितनी श्रेष्ठ महान है। स्वर्ग के जीवन से भी वह पहली घड़ी महान है जब बाप के बन गये। मेरा सो तेरा हो गया। तेरा माना और डबल लाइट बने। मेरे के बोझ से हल्के बन गये। खुशी के पंख लग गये। फर्श से अर्श पर उड़ने लगे। पत्थर से हीरा बन गये। अनेक चक्करों से छूट स्वदर्शन चक्रधारी बन गये। वह घड़ी याद है? वह बृहस्पति के दशा की घड़ी जिसमें तन-मन-धनजन सर्व प्राप्ति की तकदीर भरी हुई है। ऐसी दशा, ऐसी रेखा वाली वेला में श्रेष्ठ तकदीरवान बने। तीसरा नेत्र खुला और बाप को देखा। सभी अनुभवी हो ना? दिल में गीत गाते हो ना वह श्रेष्ठ घड़ी। कमाल तो उस घड़ी की है ना! बापदादा ऐसी महान वेला में, तकदीरवान वेला में आये हुए बच्चों को देखे-देख खुश हो रहे हैं।

ब्रह्मा बाप भी बोले, वाह मेरे आदि देव के आदिकाल के राज्य भाग्य अधिकारी बच्चे! शिव बाप बोले - वाह मेरे अनादि काल के अनादि अविनाशी अधिकार को पाने वाले बच्चे! बाप और दादा दोनों के अधिकारी सिकीलधे स्नेही साथी बच्चे हो। बापदादा को नशा है। विश्व में सभी आत्मायें जीवन का साथी, सच्चा साथी प्रीत की रीति निभाने वाले साथी बहुत ढूँढने के बाद पाते भी हैं फिर भी सन्तुष्ट नहीं होते। एक भी ऐसा साथी नहीं मिलता। और बापदादा को कितने जीवन के साथी मिले हैं! और एक-एक एक दो से महान हैं। सच्चे साथी हो ना! ऐसे सच्चे साथी हो जो प्राण जाए लेकिन प्रीति की रीति न जाए। ऐसे सच्चे साथी जीवन के साथी हो।

बापदादा की जीवन क्या है, जानते हो? विश्व सेवा ही बापदादा की जीवन है। ऐसी जीवन के साथी आप सभी हो ना। इसलिए सच्चे जीवन के साथी साथ निभाने वाले, बापदादा के कितने बच्चे हैं। दिन-रात किसमें बिजी रहते हो? साथ निभाने में ना। सभी जीवन साथी बच्चों के अन्दर सदा क्या संकल्प रहता है? सेवा का नगाड़ा बजावें। अभी भी सभी मुहब्बत में मगन हो। सेवा के साथी बन सेवा का सबूत लेकर आये हो ना। लक्ष्य प्रमाण सफलता को पाते जा रहे हो। जितना किया वह ड्रामा अनुसार बहुत अच्छा किया। और आगे बढ़ना है ना। इस वर्ष आवाज़ बुलन्द तो किया लेकिन अभी कोई-कोई तरफ के माइक लाये हैं। चारों ओर के माइक नहीं आये हैं। इसलिए आवाज़ तो फैला लेकिन चारों ओर के निमित्त बने हुए आवाज़ बुलन्द करने वाले बड़े माइक कहो या सेवा के निमित्त आत्मायें कहो, यहाँ आये और हरेक अपने को अपने तरफ का मैसेन्जर समझकर जाते हैं। जिस तरफ से आयें उस तरफ के मैसेन्जर बनें। लेकिन चारों ओर के माइक आयें और मैसेन्जर बन जाएँ। चारों तरफ हर कोने से ये मैसेज सर्व को मिल जाए तो एक ही समय चारों ओर का आवाज़ निकले। इसको कहा जाता है बड़ा नगाड़ा बजना। चारों ओर एक नगाड़ा बजे, एक ही है। एक हैं। तब कहेंगे प्रत्यक्षता का नगाड़ा।

अभी हर एक देश के बैण्ड बजे हैं। नगाड़ा बजना है अभी। बैण्ड अच्छी बजाई है। इसलिए बापदादा भिन्न-भिन्न देश के निमित्त बनी हुई आत्माओं द्वारा वैराइटी बैण्ड सुन और देख खुश हो रहे हैं। भारत की भी बैण्ड सुनी। बैण्ड की आवाज़ और नगाड़े की आवाज़ में भी फर्क है। मन्दिरों में बैण्ड के बजाए नगाड़ा बजाते हैं। अब समझा आगे क्या करना है? संगठन रूप का आवाज़, बुलन्द आवाज़ होता है। अभी भी सिर्फ एक हाँ जी कहे और सभी मिलकर हाँ जी कहें तो फर्क होगा ना। एक है, एक ही हैं, यही एक हैं। यह बुलन्द आवाज़ चारों ओर से एक ही समय पर निकले। टी.वी. में देखो, रेडियो में देखो, अखबारों में देखो, मुख में देखो यही एक बुलन्द आवाज़ हो। इन्टरनेशनल आवाज़ हो। इसलिए तो बापदादा जीवन साथियों को देख खुश होते है। जिसके इतने जीवन साथी और एक-एक महान तो सर्व कार्य हुए ही पड़े हैं। सिर्फ बाप निमित्त बन श्रेष्ठ कर्म की प्रालब्ध बना रहे हैं। अच्छा- अभी तो मिलने की सीजन है। सबसे छोटे और सिकीलधे पोलैण्ड वाले बच्चे हैं। छोटे बच्चे सदैव प्यारे होते हैं। पोलैण्ड वालों को यह नशा है ना कि हम सबसे ज्यादा सिकीलधे हैं। सर्व समस्याओं को पार कर फिर भी पहुँच तो गये हैं ना! इसको कहा जाता है लगन। लगन विघ्न को समाप्त कर देती है। बापदादा के भी और परिवार के भी प्यारे हो। पोलैण्ड और पोरचुगीज दोनों देश लगन वाले हैं। न भाषा देखी न पैसे को देखा लेकिन लगन ने उड़ा लिया। जहां स्नेह हैं वहां सहयोग अवश्य प्राप्त होता है। असम्भव से सम्भव हो जाता है। तो बापदादा ऐसे स्वीट बच्चों का स्नेह देख हर्षित होते हैं। और लगन से सेवा करने वाले निमित्त बने हुए बच्चों को भी आफरीन देते हैं। अच्छी ही मुहब्बत से मेहनत की है।

वैसे तो इस वर्ष अच्छे ग्रुप लायें हैं सभी ने। लेकिन इन देशों की भी विशेषता है। इसलिए बापदादा विशेष देख रहे हैं। सभी ने अपने-अपने स्थान पर वृद्धि को अच्छा प्राप्त किया है। इसलिए स्थानों के नाम नहीं लेते। लेकिन हर स्थान की विशेषता अपनी-अपनी है। मधुबन तक पहुँचना यही सेवा की विशेषता है। चारों ओर के जो भी निमित्त बच्चे हैं, उन्हों को बापदादा विशेष स्नेह के पुष्प भेंट कर रहे हैं। चारों ओर की एकानामी में नीचे ऊपर होते हुए भी इतनी आत्माओं को उड़ाकर ले आये हैं। यही मुहब्बत के साथ मेहनत की निशानी है। यह सफलता की निशानी है। इसलिए हरेक नाम सहित स्नेह के पुष्प स्वीकार करना। जो नहीं भी आयें हैं उन्हों के याद-पत्र बहुत मालायें लाई हैं। तो बापदादा साकार रूप से न पहुँचने वाले बच्चों को भी स्नेह भरी यादप्यार दे रहे हैं। चारों ओर कि तरफ से आये हुए बच्चों की याद प्यार का रेसपाण्ड दे रहे हैं। सभी स्नेही हो। बापदादा के जीवन साथी हो। सदा साथ निभाने वाले समीप रत्न हो। इसलिए सभी की याद पत्रों के पहले मैसेन्जर के पहले ही बापदादा के पास पहुँच गई और पहुँचती रहती है। सभी बच्चे अब यही सेवा की धूम मचाओ। बाप द्वारा मिले हुए शान्ति और खुशी के खज़ाने सर्व आत्माओं को खूब बाँटो। सर्व आत्माओं की यही आवश्यकता है। सच्ची खुशी और सच्ची शान्ति की। खुशी के लिए कितना समय, धन और शारीरिक शक्ति भी खत्म कर देते हैं। हिप्पी बन जाते हैं। उन्हों को अब हैपी बनाओ। सर्व की आवश्यकता को पूर्ण करने वाले अन्नपूर्णा के भण्डार बनो। यही सन्देश सर्व विदेश के बच्चों को भेज देना। सभी बच्चों को मैसेज दे रहे हैं। कई ऐसे भी बच्चें हैं जो चलते-चलते थोड़ा सा अलबेलेपन के कारण तीव्र पुरुषार्थी से ढीले पुरुषार्थी हो जाते हैं। और कई माया के थोड़े समय के चक्र में भी आ जाते हैं। फिर भी जब फँस जाते हैं तो पश्चाताप में आते हैं। पहले माया की आकर्षण के कारण चक्र नहीं लगता लेकिन आराम लगता है। फिर जब चक्र में फँस जाते हैं तो होश में आ जाते हैं और जब होश में आते हैं तो कहते - बाबा-बाबा क्या करें। ऐसे चक्र के वश होने वाले बच्चों के भी बहुत पत्र आते हैं। ऐसे बच्चों को भी बापदादा यादप्यार दे रहे हैं। और फिर से यही याद दिला रहे हैं। जैसे भारत में कहावत है कि रात का भूला अगर दिन में घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता। ऐसे फिर से जागृति आ गई तो बीती सो बीती। फिर से नया उमंग नया उत्साह नई जीवन का अनुभव करके आगे बढ़ सकते हैं।

बापदादा भी तीन बार माफ करते हैं। तीन बार फिर भी चांस देते हैं। इसलिए कोई भी संकोच नहीं करें। संकोच को छोड़कर स्नेह में आ जाए तो फिर से अपनी उन्नती कर सकते हैं। ऐसे बच्चों को भी विशेष सन्देश देना। कोई-कोई सरकमस्टाँस के कारण नहीं आ सके है और वह बहुत तड़पते याद कर रहे हैं। बापदादा सभी बच्चों की सच्ची दिल को जानते हैं। जहाँ सच्ची दिल हैं वहां आज नहीं तो कल फलता है ही। अच्छा-

सामने डबल विदेशी हैं। उन्हों की सीजन है ना। सीजन वालों को पहले खिलाया जाता है। सभी देश वाले अर्थात् भाग्यवान आत्माओं को, देश वालों को यह भी एडीशन में नशा है कि हम बाप के अवतरित भूमि वाले हैं। ऐसे सेवा की भारत भूमि, बाप की अवतरण भूमि और भविष्य की राज्य भूमि वाले सभी बच्चों को बापदादा विशेष यादप्यार दे रहे हैं। क्योंकि सभी ने अपनी-अपनी लगन, उमंग उत्साह प्रमाण सेवा की। और सेवा द्वारा अनेक आत्माओं को बाप के समीप लाया। इसलिए सेवा के रिटर्न में बापदादा सभी बच्चों को स्नेह के पुष्पों का गुलदस्ता दे रहे हैं। स्वागत कर रहे हैं। आप भी सभी को गुलदस्ता दे स्वागत करते हो ना। तो सभी बच्चों को गुलदस्ता भी दे रहे हैं और सफलता का बैज भी लगा रहे हैं। हरेक बच्चे अपने-अपने नाम से बापदादा द्वारा मिला हुआ बैज और गुलदस्ता स्वीकार करना। अच्छा-

जोन वाली दादियाँ तो हैं ही चेयरमैन। चेयरमैन अर्थात् सदा सीट पर सेट होने वालीं। जो सदा सीट पर सेट हैं उनको ही चेयरमैन कहा जाता है। सदा चेयर के साथ नियर भी हैं। इसलिए सदा बाप के आदि सो अन्त तक हर कदम के साथी हैं। बाप का कदम और उन्हों का कदम सदा एक हैं। कदम ऊपर कदम रखने वालीं हैं। इसलिए ऐसे सदा के हर कदम के साथियों को पद्म, पद्म, पद्म गुणा यादप्यार बापदादा दे रहे हैं। और बहुत सुन्दर हीरे का पद्म पुष्प बाप द्वारा स्वीकार हो। महारथियों में भाई भी आ गये हैं। पाण्डव सदा शक्तियों के साथी हैं। पाण्डवों को यह खुशी है कि शक्ति सेना और पाण्डव दोनों मिलकर जो बाप के निमित्त बने हुए कार्य हैं उन्हों को सफल करने वाले सफलतामूर्त्त हैं। इसलिए पाण्डव भी कम नहीं, पाण्डव भी महान हैं। हर पाण्डव की विशेषता अपनी-अपनी हैं। विशेष सेवा कर रहे हैं। और उसी विशेषता के आधार पर बाप और परिवार के आगे विशेष आत्मायें हैं। इसलिए ऐसी सेवा के निमित्त विशेष आत्माओं को विशेष रूप से बापदादा विजय के तिलक से स्वागत कर रहे हैं। समझा। अच्छा-

आप सभी को तो सब मिल गया ना। कमल, तिलक, गुलदस्ता, बैज सब मिला ना। डबल विदेशियों की स्वागत कितने प्रकार से हो गई। यादप्यार तो सभी को मिल ही गया। फिर भी डबल विदेशी और स्व देशी सभी बच्चे सदा उन्नती को पाते रहो, विश्व को परिवर्तन कर सदा के लिए सुखी और शान्त बनाते रहो। सबको खुश खबरी सुनाते रहो, खुशी के झूले में झुलाते रहो। ऐसे विशेष सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

ट्रीनीडाड पार्टी से:- सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मायें हैं, ऐसे समझते हो! ब्राह्मणों को सदा ऊँची चोटी की निशानी दिखाते हैं। ऊँचे ते ऊँचा बाप और ऊँचे ते ऊँचा समय तो स्वयं भी ऊँचे हुए। जो सदा ऊँची स्थिति पर स्थित रहते हैं वह सदा ही डबल लाइट स्वयं को अनुभव करते हैं। किसी भी प्रकार का बोझ नहीं। न सम्बन्ध का, न अपने कोई पुराने स्वभाव संस्कार का। इसको कहते हैं सर्व बन्धनों से मुक्त। ऐसे फ्री हो? सारा ग्रुप निर्बन्धन ग्रुप है। आत्मा से और शरीर के सम्बन्ध से भी। निर्बन्धन आत्मायें क्या करेंगी? सेन्टर सम्भालेंगी ना। तो कितने सेवाकेन्द्र खोलने चाहिए। टाइम भी है और डबल लाइट भी हो तो आप समान बनायेंगी ना! जो मिला है वह औरों को देना है। समझते हो ना कि आज के विश्व की आत्माओं को इसी अनुभव की कितनी आवश्यकता है! ऐसे समय पर आप प्राप्ति स्वरूप आत्माओं का क्या कार्य है! तो अभी सेवा को और वृद्धि को प्राप्त कराओ। ट्रीनीडाड वैसे भी सम्पन्न देश है तो सबसे ज्यादा संख्या ट्रीनीडाड सेन्टर की होनी चाहिए। आसपास भी बहुत एरिया है, तरस नहीं पड़ता? सेन्टर भी खोलो और बड़े-बड़े माइक भी लाओ। इतनी हिम्मत वाली आत्मायें जो चाहे वह कर सकती हैं। जो श्रेष्ठ आत्मायें हैं उन्हों द्वारा श्रेष्ठ सेवा समाई हुई है। अच्छा-



22-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


संगम पर चार कम्बाइण्ड रूपों का अनुभव

सिद्धिस्वरूप का अनुभव कराने वाले, वरदाता बाप अपने विजयी बच्चों प्रति बोले:-

आज बापदादा सभी बच्चों के कम्बाइण्ड रूप को देख रहे हैं। सभी बच्चे भी अपने कम्बाइण्ड रूप को अच्छी रीति जानते हो? एक - श्रेष्ठ आत्मायें, इस अन्तिम पुराने लेकिन अति अमूल्य बनाने वाले शरीर के साथ कम्बाइण्ड हो। सभी श्रेष्ठ आत्मायें इस शरीर के आधार से श्रेष्ठ कार्य और बापदादा से मिलन का अनुभव कर रही हो। है पुराना शरीर लेकिन बलिहारी इस अन्तिम शरीर की है जो श्रेष्ठ आत्मा इसके आधार से अलौकिक अनुभव करती है। तो आत्मा और शरीर कम्बाइन्ड है। पुराने शरीर के भान में नहीं आना है लेकिन मालिक बन इस द्वारा कार्य कराने हैं। इसलिए आत्म-अभिमानी बन, कर्मयोगी बन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराते हैं।

दूसरा- अलौकिक विचित्र कम्बाइण्ड रूप। जो सारे कल्प में इस कम्बाइन्ड रूप का अनुभव सिर्फ अब कर सकते हो। वह है -’’आप और बाप’’। इस कम्बाइण्ड रूप का अनुभव। सदा मास्टर सर्वशक्तिवान, सदा विजयी, सदा सर्व के विघ्न विनाशक। सदा शुभ भावना, श्रेष्ठ कामना, श्रेष्ठ वाणी, श्रेष्ठ दृष्टि, श्रेष्ठ कर्म द्वारा विश्व-कल्याणकारी स्वरूप का अनुभव कराता है। सेकण्ड में सर्व समस्याओं का समाधान स्वरूप बनाता है। स्वयं के प्रति वा सर्व के प्रति दाता और मास्टर वरदाता बनाता है। सिर्फ इस कम्बाइण्ड रूप में सदा स्थित रहो तो सहज ही याद और सेवा के सिद्धिस्वरूप बन जाओ। विधि निमित्त मात्र हो जायेगी और सिद्धि सदा साथ रहेगी। अभी विधि में ज्यादा समय लगता है। सिद्धि यथा शक्ति अनुभव होती है। लेकिन जितना इस अलौकिक शक्तिशाली कम्बाइण्ड रूप में सदा रहेंगे तो विधि से ज्यादा सिद्धि अनुभव होगी। पुरूषार्थ से प्राप्ति ज्यादा अनुभव होगी। सिद्धिस्वरूप का अर्थ ही है - हर कार्य में सिद्धि हुई पड़ी है। यह प्रैक्टिकल में अनुभव हो।

तीसरा कम्बाइण्ड रूप - हम सो ब्राह्मण सो फरिश्ता। ब्राह्मण रूप और अन्तिम कर्मातीत फरिश्ता स्वरूप। इस कम्बाइण्ड रूप की अनुभूति विश्व के आगे साक्षात्कारमूर्त्त बनायेगी। ब्राह्मण सो फरिश्ता इस स्मृति द्वारा चलते-फिरते अपने को व्यक्त शरीर, व्यक्त देश में पार्ट बजाते हुए भी ब्रह्मा बाप के साथी अव्यक्त वतन के फरिश्ते, व्यक्त देश और देह में आये हैं - विश्व सेवा के लिए। ऐसे व्यक्त भाव से परे अव्यक्त रूपधारी अनुभव करेंगे। यह अव्यक्त भाव अर्थात् फरिश्ते-पन का भाव स्वत: ही अव्यक्त अर्थात् व्यक्तपन के बोल-चाल, व्यक्त भाव के स्वभाव, व्यक्त भाव के संस्कार सहज ही परिवर्तन कर लेंगे। भाव बदल गया तो सब कुछ बदल जायेगा। ऐसा अव्यक्त भाव सदा स्वरूप में लाओ। स्मृति में हैं कि ब्राह्मण सो फरिश्ता। अब स्मृति को स्वरूप में लाओ। स्वरूप निरन्तर स्वत: और सहज हो जाता है। स्वरूप में लाना अर्थात् सदा हैं ही अव्यक्त फरिश्ता। कभी भूले, कभी स्मृति में आवे इस स्मृति में रहना पहली स्टेज हैं। स्वरूप बन जाना यह श्रेष्ठ स्टेज है।

चौथा है - भविष्य चतुर्भुज स्वरूप। लक्ष्मी और नारायण का कम्बाइण्ड रूप क्योंकि आत्मा में इस समय लक्ष्मी और नारायण दोनों बनने के संस्कार भर रहे हैं। कब लक्ष्मी बनेंगे, कब नारायण बनेंगे। भविष्य प्रालब्ध का यह कम्बाइण्ड स्वरूप इतना ही स्पष्ट हो। आज फरिश्ता कल देवता। अभी-अभी फरिश्ता, अभी-अभी देवता। अपना राज्य, अपना राज्य स्वरूप आया कि आया। बना कि बना। ऐसे संकल्प स्पष्ट और शक्तिशाली हों क्योंकि आपके इस स्पष्ट समर्थ संकल्प के इमर्ज रूप से आपका राज्य समीप आयेगा। आपका इमर्ज संकल्प नई सृष्टि को रचेगा अर्थात् सृष्टि पर लायेगा। आपका संकल्प मर्ज है तो नई सृष्टि इमर्ज नहीं हो सकती। ब्रह्मा के साथ ब्राह्मणों के इस संकल्प द्वारा नई सृष्टि इस भूमि पर प्रत्यक्ष होगी। ब्रह्मा बाप भी नई सृष्टि में नया पहला पार्ट बजाने के लिए, आप ब्राह्मण बच्चों के लिए, ‘साथ चलेंगेके वायदे कारण इन्तजार कर रहे हैं। अकेला ब्रह्मा सो कृष्ण बन जाए, तो अकेला क्या करेगा? साथ में पढ़ने वाले, खेलने वाले भी चाहिए ना। इसलिए ब्रह्मा बाप ब्राह्मणों प्रति बोले कि मुझ अव्यक्त रूपधारी बाप समान अव्यक्त रूपधारी, अव्यक्त स्थितिधारी फरिश्ता रूप बनो। फरिश्ता सो देवता बनेंगे। समझा। इन सब कम्बाइण्ड रूप में स्थित रहने से ही सम्पन्न और सम्पूर्ण बन जायेंगे। बाप समान बन सहज ही कर्म में सिद्धि का अनुभव करेंगे।

डबल विदेशी बच्चों को बापदादा से रूह-रूहान करने वा मिलन मनाने की इच्छा तीव्र है। सभी समझते हैं कि हम ही आज मिल लेवें। परन्तु इस दुनिया में सब देखना पड़ता है। सूर्य चांद के अन्दर की दुनिया है ना! उनसे परे की दुनिया में आ जाओ तो सारा समय बैठ जाओ। बापदादा को भी हर बच्चा अपनी-अपनी विशेषताओं से प्रिय है। कोई समझे यह प्रिय है, हम कम प्रिय हैं - ऐसी बात नहीं है। महारथी अपनी विशेषता से प्रिय हैं और बाप के आगे अपने-अपने रूप से सब महारथी हैं। महान आत्मायें हैं। इसलिए महारथी हैं। यह तो कार्य चलाने के लिए किसको स्नेह से निमित्त बनाना होता है। नहीं तो कार्य के निमित्त अपना-अपना स्थान मिला हुआ है। अगर सभी दादी बन जाएँ तो काम चलेगा? निमित्त तो बनाना पड़े ना। वैसे अपनी रीति से सब दादियाँ हो। सभी को दीदी वा दादी कहते तो हैं ना। फिर भी आप सबने मिलकर एक को निमित्त तो बनाया है ना। सभी ने बनाया वा सिर्फ बाप ने बनाया। या सिर्फ निमित्त कारोबार अर्थ अपने-अपने कार्य अनुसार निमित्त बनाना ही पड़ता है। इसका यह मतलब नहीं कि आप महारथी नहीं हो। आप भी महारथी हो। महावीर हो। माया को चैलेन्ज करने वाले महारथी नहीं हुए तो क्या हुए?

बापदादा के लिए सप्ताह कोर्स करने वाला बच्चा भी महारथी है क्यांकि सप्ताह कोर्स भी तब करते जब समझते हैं कि यह श्रेष्ठ जीवन बनानी है। चैलेन्ज किया तो महारथी महावीर हुआ। बापदादा सदैव एक सलोगन सभी बच्चों को कार्य में लाने लिए याद दिलाते रहते। एक है अपनी स्वस्थिति में रहना। दूसरा है कारोबार में आना। स्वस्थिति में तो सभी बड़े हो, कोई छोटा नहीं। कारोबार में निमित्त बनाना ही पड़ता है। इसलिए कारोबार में सदा सफल होने का सलोगान है - रिगार्ड देना, रिगार्ड लेना। दूसरे को रिगार्ड देना ही रिगार्ड लेना है। देने में लेना भरा हुआ है। रिगार्ड कभी भी प्रयत्न करने वा माँगने से नहीं मिलता है। रिगार्ड दो और रिगार्ड मिलेगा। रिगार्ड लेने का साधन ही है - रिगार्ड देना। आप रिगार्ड दो और आपको नहीं मिले यह हो नहीं सकता। लेकिन दिल से दो। मतलब से नहीं। जो दिल से रिगार्ड देता है उसको दिल से रिगार्ड मिलता है। मतलब का रिगार्ड देंगे तो मिलेगा भी मतलब का। सदैवी दिल से दो और दिल से लो। इस सलोगन द्वारा सदा ही निर्विघ्न, निरसंकल्प, निश्चिन्त रहेंगे। मेरा क्या होगा यह चिन्ता नहीं रहेगी। मेरा हुआ ही पड़ा है। बना ही पड़ा है। निश्चिन्त रहेंगे। और ऐसी श्रेष्ठ आत्मा की श्रेष्ठ प्रालब्ध वर्तमान और भविष्य निश्चित ही है। कोई इसको बदल नहीं सकता। कोई किसकी सीट ले नहीं सकता। निश्चित है। निश्चिन्त की निश्चित है। इसको कहा जाता है - बाप समान फॉलो फादर करने वाले। समझा।

डबल विदेशी बच्चों पर तो विशेष स्नेह है। मतलब का नहीं। दिल का स्नेह है। बापदादा ने सुनाया था, एक पुराना गीत हैं ऊँची-ऊँची दीवारें... यह डबल विदेशियों का गीत है। समुद्र पार करते हुए, धर्म, देश, भाषा सब ऊँची-ऊँची दीवारें पार करके बाप के बन गये। इसलिए बाप को प्रिय हो। भारतवासी तो थे ही देवताओं के पुजारी। उन्होंने ऊँची दीवारें पार नहीं की। लेकिन आप डबल विदेशियों ने यह ऊँची-ऊँची दीवारें कितना सहज पार की। इसलिए बापदादा दिल से बच्चों की इस विशेषता का गीत गाते हैं। समझा। सिर्फ खुश करने के लिए नहीं कर रहे हैं। कई बच्चे रमत-गमत में कहते हैं कि बापदादा तो सभी को खुश कर देते हैं। लेकिन खुश करते हैं अर्थ से। आप अपने से पूछो बापदादा ऐसे ही कहते हैं या यह प्रैक्टिकल है! ऊँची-ऊँची दीवारें पार कर आ गये हो ना! कितनी मेहनत से टिकेट निकालते हो। यहां से जाते ही पैसे इकट्ठे करते हो ना। बापदादा जब बच्चों का स्नेह देखते हैं, स्नेह से कैसे पहुँचने के लिए साधन अपनाते हैं, किस तरीके से पहुँचते हैं, बापदादा स्नेही आत्माओं का स्नेह का साधन देख, लगन देख, खुश होते हैं। दूर वालों से पूछो कैसे आते हैं? मेहनत करके फिर भी पहुँच तो जाते हैं ना। अच्छा-

सदा कम्बाइण्ड रूप में स्थित रहने वाले, सदा बाप समान अव्यक्त भाव में स्थित रहने वाले, सदा सिद्धिस्वरूप अनुभव करने वाले, अपने समर्थ समान स्वरूप द्वारा साक्षात्कार कराने वाले, ऐसे सदा निश्चिन्त, सदा निश्चित विजयी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

सानफ़्रांसिसको - सभी स्वयं को सारे विश्व में विशेष आत्मायें हैं - ऐसे अनुभव करते हो? क्योंकि सारे विश्व की अनेक आत्माओं में से बाप को पहचानने का भाग्य आप विशेष आत्माओं को मिला है। ऊँचे ते ऊँचे बाप को पहचानना यह कितना बड़ा भाग्य है! पहचाना और सम्बन्ध जोड़ा और प्राप्ति हुई। अभी अपने को बाप के सर्व खज़ानों के मालिक अनुभव करते हो? जब सदा बच्चें हैं तो बच्चें माना ही अधिकारी। इसी स्मृति से बार-बार रिवाइज करो। मैं कौन हूँ! किसका बच्चा हूँ! अमृतवेले शक्तिशाली स्मृति-स्वरूप का अनुभव करने वाले ही शक्तिशाली रहते हैं। अमृतवेला शक्तिशाली नहीं तो सारे दिन में भी बहुत विघ्न आयेंगे। इसलिए अमृतवेला सदा शक्तिशाली रहे। अमृतवेले पर स्वयं बाप बच्चों को विशेष वरदान देने आते हैं। उस समय जो वरदान लेता है उसका सारा दिन सहजयोगी की स्थिति में रहता है। तो पढ़ाई और अमृतवेले का मिलन यह दोनों ही विशेष शक्तिशाली रहें। तो सदा ही सेफ रहेंगे।

जर्मनी ग्रुप से:- सदा अपने को विश्व-कल्याणकारी बाप के बच्चे विश्वकल् याणकारी आत्मायें समझते हो? अर्थात् सर्व खज़ानों से भरपूर। जब अपने पास खज़ाने सम्पन्न होंगे तब दूसरों को देंगे ना! तो सदा सर्व खज़ानों से भरपूर आत्माएँ बालक सो मालिक हैं! ऐसा अनुभव करते हो? बाप कहा माना बालक सो मालिक हो गया। यही स्मृति विश्व-कल्याणकारी स्वत: बना देती है। और यही स्मृति सदा खुशी में उड़ाती है। यही ब्राह्मण जीवन है। सम्पन्न रहना, खुशी में उड़ना और सदा बाप के खज़ानों के अधिकार के नशे में रहना। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मायें हो।



24-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मण जन्म - अवतरित जन्म

अव्यक्त वतन वासी बापदादा अपने अवतरित बच्चों प्रति बोले:-

बापदादा आवाज़ में आते सभी को आवाज़ से परे की स्थिति में ले जाने के लिए, व्यक्त देश में व्यक्त शरीर में प्रवेश होते हैं - अव्यक्त बनाने के लिए। सदा अपने को अव्यक्त स्थिति वाले सूक्ष्म फरिश्ता समझ व्यक्त देह में अवतरित होते हो? सभी अवतरित होने वाले अवतार हो। इसी स्मृति में सदा हर कर्म करते, कर्म के बन्धनों से मुक्त कर्मातीत अवतार हो। अवतार अर्थात् ऊपर से श्रेष्ठ कर्म के लिए नीचे आते हैं। आप सभी भी ऊँची ऊपर की स्थिति से नीचे अर्थात् देह का आधार ले सेवा के प्रति कर्म करने के लिए पुरानी देह में, पुरानी दुनिया में आते हो। लेकिन स्थिति ऊपर की रहती है, इसलिए अवतार हो। अवतार सदा परमात्म पैगाम ले आते हैं। आप सभी संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें भी परमात्म पैगाम देने के लिए, परमात्म मिलन कराने के लिए अवतरित हुए हो। यह देह अब आपकी देह नहीं रही। देह भी बाप को दे दी। सब तेरा कहा अर्थात् मेरा कुछ नहीं। इस देह को सेवा के अर्थ बाप ने लोन में दी है। लोन में मिली हुई वस्तु पर मेरे-पन का अधिकार हो नहीं सकता। जब मेरी देह नहीं तो देह का भान कैसे आ सकता! आत्मा भी बाप की बन गई। देह भी बाप की हो गई तो मैं और मेरा अल्प का कहाँ से आया! मैं-पन सिर्फ एक बेहद का रहा। मैं बाप का हूँ। जैसा बाप वैसा मैं मास्टर हूँ। तो यह बेहद का मैं-पन रहा। हद का मैंपन विघ्नों में लाता है। बेहद का मैं-पन निर्विघ्न, विघ्न विनाशक बनाता है। ऐसे ही हद का मेरा पन मेरे-मेरे के फेरे में लाता है और बेहद का मेरा-पन जन्मों के फेरों से छुड़ाता है।

बेहद का मेरा-पन है - ‘‘मेरा बाबा’’। तो हद छूट गई ना। अवतार बन देह का आधार ले सेवा के कर्म में आओ। बाप ने लोन अर्थात् अमानत दी है सेवा के लिए। और कोई व्यर्थ कार्य में लगा नहीं सकते। नहीं तो अमानत में खयानत का खाता बन जाता है। अवतार व्यर्थ खाता नहीं बनाता। आया, सन्देश दिया और गया। आप सभी भी सेवा-अर्थ सन्देश देने अर्थ ब्राह्मण जन्म में आये हो। ब्राह्मण जन्म अवतरित जन्म है। साधारण जन्म नहीं। तो सदा अपने को अवतरित हुई विश्व-कल्याणकारी, सदा श्रेष्ठ अवतरित आत्मा हैं - इसी निश्चय और नशे में रहो। टैम्प्रेरी समय के लिए आये हो और फिर जाना भी है। अब जाना है यह सदा रहता है? अवतार हैं, आये हैं, अब जाना है। यही स्मृति उपराम और अपरमअपार प्राप्ति की अनुभूति कराने वाली है। एक तरफ उपराम दूसरे तरफ अपरमअपार प्राप्ति। दोनों अनुभव साथ-साथ रहते हैं। ऐसे अनुभवीमूर्त्त हो ना। अच्छा –

अब सुनने को स्वरूप में लाना है। सुनना अर्थात् बनना। आज विशेष हमजिन्स से मिलने आये हैं। हमशरीक हो गये ना। सत शिक्षक निमित्त शिक्षकों से मिलने आये हैं। सेवा के साथियों से मिलने आये हैं। अच्छा-

सदा बेहद के मैं-पन के स्मृति स्वरूप, सदा बेहद का मेरा बाप इसी समर्थ स्वरूप में स्थित रहने वाले, सदा ऊँची स्थिति में स्थित रह देह का आधार ले अवतरित होने वाले अवतार बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

टीचर्स के साथ:- सदा सेवाधारी आत्माओं का यह संगठन है ना। सदा अपने को बेहद के विश्व सेवाधारी समझते हो? हद के सेवाधारी तो नहीं हो ना। सब बेहद के हो? किसी को भी किसी स्थान से किसी भी स्थान पर भेज दें तो तैयार हो? सभी उड़ते पंछी हो? अपने देह के भान की डाली से भी उड़ते पंछी हो या देह के भान की डाली कभी-कभी अपने तरफ खींचती है? सबसे ज्यादा अपने तरफ आकर्षित करने वाले डाली यह देह का भान है। जरा भी पुराने संस्कार, स्वभाव अपने तरफ आकर्षित करते माना देह का भान है। मेरा स्वभाव ऐसा है, मेरा संस्कार ऐसा है, मेरी रहन-सहन ऐसी है, मेरी आदत ऐसी है, यह सब देह भान की निशानी है। तो इस डाली से उड़ते पंछी हो? इसको ही कहा जाता है - कर्मातीत स्थिति। कोई भी बन्धन नहीं। कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो लेकिन कर्म के बन्धन से न्यारे। तो देह के कर्म, जैसे किसका नेचर होता है - आराम से रहना, आराम से समय पर खाना, चलना यह भी कर्म का बन्धन अपने तरफ खींचता है। इस कर्म के बन्धन अर्थात् आदत से भी परे। क्योंकि निमित्त हो ना।

जब आप सभी निमित्त आत्मायें कर्म के बन्धनों से देह के संस्कार - स्वभाव से न्यारे नहीं होंगे तो औरों को कैसे करेंगे! जैसे शरीर की बीमारी कर्म का भाग है, इसी रीति से अगर कोई भी कर्म का बन्धन अपने तरफ खींचता है तो यह भी कर्म का भोग विघ्न डालता है। जैसे शारीरिक व्याधि कर्म भोग अपनी तरफ बार-बार खींचता है, दर्द होता है तो खींचता है ना। तो कहते हो क्या करें, वैसे तो ठीक है लेकिन कर्मभोग कड़ा है। ऐसे कोई भी विशेष पुराना संस्कार वा स्वभाव वा आदत अपने तरफ खींचती है तो वह भी कर्म भोग हो गया। कर्मभोग कोई भी कर्मयोगी बना नहीं सकेगा। तो इससे भी पार। क्यों? सभी नम्बरवन जाने वाली आत्मायें हो ना। वन नम्बर का अर्थ ही है - हर बात में विन करने वाली। कोई भी कमी नहीं। टीचर्स का अर्थ ही है सदा अपनी मूर्त द्वारा कर्मातीत ब्रह्मा बाप और न्यारे तथा प्यारे शिव बाप की अनुभूति कराने वाले। तो यह विशेषता है ना। फ्रेंड्स हो ना आप! फ्रेंड्स कैसे बनते हैं? बिना समान के फ्रेंड्स नहीं बन सकते। तो आप सब बाप के फैन्डस हो, गाडली फ्रेंड्स हो। समान होना ही फैन्डशिप है। बाप के कदम पर कदम रखने वाले। क्योंकि फ्रेंड्स भी हो और फिर माशूक के आशिक भी हो। तो आशिक सदा माशूक के पांव के ऊपर पांव रखते हैं। यह रसम है ना। जब शादी होती है तो क्या कराते हैं! यही कराते हैं ना। तो यह सिस्टम भी कहाँ से बनी? आप लोगों से बनी है। आपका है बुद्धि रूपी पांव और उन्होंने स्थूल पांव समझ लिया है। हर सम्बन्ध से विशेषता का सम्बन्ध निभाने वाली निमित्त आत्मायें हो?

निमित्त शिक्षकों को औरों से बहुत सहज साधन हैं। दूसरों को तो फिर भी सम्बन्ध में रहना पड़ता है और आपका सम्बन्ध सदा सेवा और बाप से है। चाहे लौकिक कार्य भी करते हो तो भी सदा यही याद रहता है कि टाइम हो और सेवा पर जाएं। और लौकिक कार्य जिसके लिए किया जाता है उसकी स्मृति स्वत: आती है। जैसे लौकिक में माँ-बाप कमाते हैं बच्चे के लिए। तो उनकी स्वत: याद आती है। तो आप भी जिस समय लौकिक कार्य करते हो तो किसके प्रति करते हो? सेवा के लिए करते हो - या अपने लिए? क्योंकि जितना सेवा में लगाते तो उतनी खुशी होती है। कभी भी लौकिक सेवा समझकर नहीं करो। यह भी एक सेवा का तरीका है, रूप भिन्न है लेकिन है सेवा के प्रति। नहीं तो देखो अगर लौकिक सेवा करके सेवा का साधन नहीं होता तो संकल्प चलता है कि कहां से से आवे! कैसे आवे! चलता नहीं है। पता नहीं कब होगा? यह संकल्प व्यर्थ समय नहीं गँवाता? इसलिए कभी भी लौकिक जॉब (धन्धा) करते हैं, यह शब्द नहीं बोलो। यह अलौकिक जॉब है। सेवा निमित्त है। तो कभी भी बोझ नहीं लगेगा। नहीं तो कभी-कभी भारी हो जाते हैं, कब तक होगा, क्या होगा! यह तो आप लोगों के लिए प्रालब्ध बहुत सहज बनाने का साधन है।

तन-मन-धन तीन चीज़ें हैं ना! अगर तीनों ही चीज़ें सेवा में लगाते हैं तो तीनों का फल किसको मिलेगा। आपको मिलेगा या बाप को! तीनों ही रीति से अपनी प्रालब्ध बनाना तो यह औरों से एडीशन प्रालब्ध हो गई। इसलिए कभी भी इसमें भारी नहीं। सिर्फ भाव को बदली करो। लौकिक नहीं अलौकिक सेवा के प्रति ही है। इसी भाव को बदली करो। समझा - यह तो और ही डबल सरेन्डर हो? धन से ही सरेन्डर हो गये। सब बाप के प्रति है। सरेन्डर का अर्थ क्या है? जो कुछ है बाप के प्रति है अर्थात् सेवा के प्रति है। यही सरेन्डर है। जो समझते हैं हम सरेन्डर नहीं हैं, वह हाथ उठाओ। उनकी सेरिमनी मना लेंगे! बाल बच्चे भी पैदा हो गये और कहते हो सरेन्डर नहीं हुए! अपना मैरेज डे भले मनाओ लेकिन मैरेज हुई नहीं यह तो नहीं कहो। क्या समझते हो? सारा ही ग्रुप सरेन्डर ग्रुप है ना!

बापदादा तो डबल विदेशी वा डबल विदेश के स्थान पर निमित्त बनी हुई टीचर्स की बहुत महिमा करते हैं। ऐसे ही नहीं महिमा करते हैं लेकिन मुहब्बत से विशेष मेहनत भी करते हो। मेहनत तो बहुत करनी पड़ती है लेकिन मुहब्बत से मेहनत महसूस नहीं होती। देखो, कितने दूर-दूर से ग्रुप तैयार करके लाते हैं तो बापदादा बच्चों की मेहनत पर बलिहार जाते हैं। एक विशेषता डबल फारेन के निमित्त सेवाधारियों की बहुत अच्छी है। जानते हो कौन-सी विशेषता है? (अनेक विशेषतायें निकली) जो भी बातें निकाली वह स्वयं में चेक करके कम हो तो भर लेना। क्योंकि बातें तो बहुत अच्छी-अच्छी निकाली हैं। बापदादा सुना रहे हैं - एक विशेषता डबल विदेशी सेवाधारियों में देखी कि जो बापदादा डायरेक्शन देते हैं - यह करके लाना, वह प्रैक्टिकल में लाने के लिए हमेशा कितना भी प्रयत्न करना पड़े लेकिन प्रैक्टिल में लाना ही है, यह लक्ष्य प्रैक्टिकल अच्छा है। जैसे बापदादा ने कहा कि ग्रुप लाने हैं तो ग्रुप्स भी ला रहे हैं।

बापदादा ने कहा वी.आई.पीज की सर्विस करनी है, पहले कितना मुश्किल कहते थे, बहुत मुश्किल - लेकिन हिम्मत रखी, करना ही है तो अभी देखो 2 साल से ग्रुप्स आ रहे हैं ना। कहते थे लण्डन से वी.आई.पी. आना बहुत मुश्किल है। लेकिन अभी देखो प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया ना। इस बारी तो भारत वालों ने भी राष्ट्रपति को लाकर दिखाया। लेकिन फिर भी डबल विदेशियों का यह उमंग– डायरेक्शन मिला और करना ही है यह लगन अच्छी है। प्रैक्टिकल रिजल्ट देख बापदादा विशेषता का गायन करते हैं। सेन्टर खोलते हो वह तो पुरानी बात हो गई। वह तो खोलते ही रहेंगे। क्योंकि वहाँ साधन बहुत सहज हैं। यहां से वहां जा करके खोल सकते हो, यह भारत में साधन नहीं है। इसलिए सेन्टर खोलना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन ऐसे अच्छे-अच्छे वारिस क्वालिटी तैयार करना। एक है वारिस क्वालिटी तैयार करना और दूसरा है बुलन्द आवाज़ वाले तैयार करना। दोनों ही आवश्यक हैं। वारिस क्वालिटी जो आप जैसे ही सेवा के उमंग-उत्साह में तन-मन-धन सहित रहते हुए भी सरेन्डर बुद्धि हो, इसको कहते हैं - वारिस क्वालिटी। तो वारिस क्वालिटी भी निकालनी है। इसके ऊपर भी विशेष अटेन्शन। हरेक सेवाकेन्द्र में ऐसे वारिस क्वालिटी हों तो सेवाकेन्द्र सबसे नम्बरवन में जाता है।

एक है सेवा में सहयोगी होना, दूसरे हैं पूरा ही सरेन्डर होना। ऐसे वारिस कितने हैं? हरेक सेवाकेन्द्र पर ऐसे वारिस हैं। गाडली स्टूडेन्ट बनाना, सेवा में सहयोगी बनना वह लिस्ट तो लम्बी होती है लेकिन वारिस कोई-कोई होते हैं। जिसको जिस समय जो डायरेक्शन मिले, जो श्रीमत मिले उसी प्रमाण चलता रहे। तो दोनों ही लक्ष्य रखो, वह भी बनाना है और वह भी बनाना है। ऐसा वारिस क्वालिटी वाला एक अनेक सेन्टर खोलने के निमित्त बन सकता है। यह भी लक्ष्य से प्रैक्टिकल होता रहेगा। विशेषता तो अपनी समझी ना। अच्छा-

सन्तुष्ट तो हैं ही - या पूछना पड़े। है ही सन्तुष्ट करने वाले। तो जो सन्तुष्ट करने वाला होगा वह स्वयं तो होगा ना। कभी सर्विस थोड़ी कम देख करके हलचल में तो नहीं आते हो? कोई सेवाकेन्द्र पर विघ्न आता है तो विघ्न में घबराते हो? समझो बड़े ते बड़ा विघ्न आ गया - कोई अच्छा अनन्य एन्टी हो जाता है और डिस्टर्ब करता है आपकी सेवा में तो फिर घबरायेंगे? एक होता है उसके प्रति कल्याण के भाव से तरस रखना वह दूसरी बात है लेकिन स्वयं की स्थिति नीचे-ऊपर हो या व्यर्थ संकल्प चले इसको कहते हैं हलचल में आना। तो संकल्प की सृष्टि भी नहीं रचें। यह संकल्प भी हिला न सकें! इसको कहते हैं - अचल अडोल स्थिति। ऐसे भी नहीं कि अलबेले हो जाएँ कि नथिंगन्यू। सेवा भी करें, उसके प्रति रहमदिल भी बनें लेकिन हलचल में नहीं आयें। तो न अलबेले, न फीलिंग में आने वाले। दोनों ही हैं। सदा ही किसी भी वातावरण में, वायुमण्डल में हो लेकिन ऐसे अचल अडोल। कभी कोई निमित्त बने हुए राय देते हैं, उनमें कनफ्यूज होते हो? यह क्यों कहते या यह कैसे होगा! कभी-कभी थोड़ा-सा कनफ्यूज होने का वायब्रेशन आता है। क्योंकि जो निमित्त बने हुए हैं वह अनुभवी हो चुके हैं, और जो प्रैक्टिकल में चलने वाले हैं - कोई नय्ो हैं, कोई थोड़े पुराने भी हैं लेकिन जिस समय जो बात उसके सामने आती है, तो बात के कारण इतनी क्लीयर बुद्धि आदि मध्य अन्त को नहीं जान सकती है। सिर्फ वर्तमान को जान सकती है। इसलिए सिर्फ वर्तमान देख करके, आदि मध्य उस समय क्लीयर नहीं होता तो कनफ्यूज हो जाते हैं। कभी भी कोई डायरेक्शन अगर नहीं भी स्पष्ट हो तो कनफ्यूज कभी नहीं होना। धैर्य से कहो इसको समझने की कोशिश करेंगे। थोड़ा टाइम दो उसको। उसी समय कनफ्यूज होकर यह नहीं, वह नहीं, ऐसे नहीं करो। क्योंकि डबल विदेशी फ्री माइंड ज्यादा हैं इसलिए न भी फ्री माइंड से कह देते हैं। इसलिए थोड़ा-सा जो भी बात मिलती है - उसको गम्भीरता से पहले सोचो, उसमें कोई न कोई रहस्य अवश्य छिपा होता है। उससे पूछ सकते हो - इसका रहस्य क्या है? इससे क्या फायदा होगा? हमें और स्पष्ट समझाओ। यह कह सकते हो। लेकिन कभी भी डायरेक्शन को रिफ्यूज नहीं करो। रिफ्यूज करते हो इसलिए कनफ्यूज होते हो। यह थोड़ा विशेष अटेन्शन डबल विदेशी बच्चों को देते हैं। नहीं तो क्या होगा जैसे आप निमित्त बने हुए, बहनों के डायरेक्शन को जानने का प्रयत्न नहीं करेंगे और हलचल में आ जायेंगे तो आपको देखकर जिन्हों के निमित्त आप बने हो, उन्हों में यह संस्कार भर जायेंगे। फिर कभी कोई रूसेगा, कभी कोई रूसेगा। फिर सेन्टर पर यही खेल चलेगा। समझा!

दूसरी बात:- कभी भी अपने को अभी हम दूसरे धर्म के यहाँ आये हैं, यह टीचर्स में संकल्प नहीं होना चाहिए। यह नयों की बातें हैं। आप तो पुराने हो तभी निमित्त भी बने हो। हम दूसरे धर्म के इस धर्म में आये हैं, नहीं। इसी धर्म के थे और इसी धर्म में आये हैं। हम और यह अलग हैं, यह संकल्प स्वप्न में भी नहीं। भारत अलग है, विदेश अलग है - नहीं। यह संकल्प एकमत को दो मत कर देगा। फिर हम और तुम हो गया ना। जहाँ हम और तुम हो गया वहाँ क्या होगा? खिटपिट होगी ना। इसलिए एक हैं। डबल विदेशी, बापदादा निशानी के लिए कहते हैं, बाकी ऐसे नहीं अलग हो। ऐसे नहीं समझना कि हम डबल विदेशी हैं तो अलग हैं, देश वाले अलग हैं। नहीं। जब ब्राह्मण जन्म हुआ तो ब्राह्मण जन्म से ही कौन हुए? ब्राह्मण एक धर्म के हैं, विदेशी देशी उसमें नहीं होते। हम सब एक ब्राह्मण धर्म के हैं, ब्राह्मण जीवन के हैं और एक ही बात की सेवा के निमित्त हैं। कभी यह भाषा भी यूज नहीं करना कि हमारा विचार ऐसे हैं, आप इण्डिया वालों का ऐसे है, यह भाषा रांग है। गलती से भी ऐसे शब्द नहीं बोलना। विचार भिन्न-भिन्न तो भारत वालों का भी हो सकता है, यह दूसरी बात है। बाकी भारत और विदेश, यह फर्क कभी नहीं करना। हम विदेशियों का ऐसे ही चलता है, यह नहीं। हमारे स्वभाव ऐसे हैं, हमारी नेचर ऐसे है, यह नहीं। ऐसे कभी भी नहीं सोचना। बाप एक है और एक के ही सब हैं। यह निमित्त टीचर्स जैसी भाषा बोलेंगे वैसे और भी बोलेंगे। इसलिए बहुत युक्तियुक्त एक-एक शब्द बोलना। योगयुक्त और युक्तियुक्त दोनों ही साथ-साथ चलें। कोई योग में बहुत आगे जाने का करते लेकिन कर्म में युक्तियुक्त नहीं होते। दोनों का बैलेन्स हो। योगयुक्त की निशानी है ही - युक्तियुक्त’’

प्रश्न:- इस वर्ष की सेवा के लिए नया प्लैन क्या है?

उत्तर:- इस वर्ष की सेवा के लिए उस दिन भी सुनाया कि समय को समीप लाने के लिए एक तो वृत्ती से वायुमण्डल शक्तिशाली हो? यह स्व के प्रति अटेन्शन और दूसरा औरों की सेवा करने के लिए विशेष ऐसी आत्मायें निकालो जो समझें कि सचमुच शान्ति की विधि यहाँ से ही मिल सकती है। यह आवाज़ इस वर्ष में हो कि अगर शान्ति होगी तो इसी विधि से होगी। एक ही विधि है यह, जो विश्व की आवश्यकता है - वह इस विधि के सिवाए नहीं है। यह वातावरण चारों ओर इकट्ठा बनना चाहिए। भारत में चाले विदेश में शान्ति की झलक प्रसिद्ध रूप में होनी चाहिए। चारों ओर से यह सभी को टच होवे, आकर्षण हो तो यथार्थ स्थान है - तो यही है। जेसे गवर्मेन्टस की तरफ से यू.एन.ओ. बनी हुई है तो जब भी कुछ होता है तो सभी का अटेन्शन उसी तरफ जाता है। ऐसे जब भी कोई अशान्ति का वातावरण हो तो सबका अटेन्शन शान्ति के सन्देश देने वाली, यह आत्मायें हैं, इस तरफ जावे। अनुभव करें कि अशान्ति से बचने का यही एक स्थान है जहाँ पनाह ली जा सकती है। इस वर्ष यह वायुमण्डल बनना चाहिए। ज्ञान अच्छा है, जीवन अच्छी है, राजयोग अच्छा है, यह तो सब कहते हैं लेकिन असली प्राप्ति यहाँ से ही होनी है, विश्व का कल्याण इसी स्थान और विधि से हाना है, यह आवाज़ बुलन्द हो। समझा- इसके लिए विशेष शान्ति की एडवरटाइज करो, किसको शान्ति चाहिए तो यहाँ से विधि मिल सकती है। शान्ति सप्ताह रखो, शान्ति के समागम रखो, शान्ति अनुभूति के शिविर रखो, ऐसे शान्ति का वायब्रेशन फैलाओ। अच्छा-

सर्विस में जैसे स्टूडेन्ट बनाते हो वह तो बहुत अच्छा है, वह तो जरूर वृद्धि को प्राप्त करना ही है। लेकिन अभी हर वैरायटी के लोग जैसे काले गोरे भिन्नभिन्न धर्म की आत्मायें हैं, वैसे भिन्न-भिन्न आक्यूपेशन वाले हर स्थान पर होने चाहिए। कोई कहाँ भी जावे तो हर आक्यूपेशन वाला अपनी रीति से उन्हें अनुभव सुनाये। जैसे यहाँ वर्कशाप रखाते हैं - कभी डाक्टर की, कभी वकील की तो भिन्न-भिन्न आक्यूपेशन वाले एक ही शान्ति की बात अपने आक्यूपेशन के आधार से बोलते हैं तो अच्छा लगता है। ऐसे कोई भी सेन्टर पर आवे तो हर आक्यूपेशन वाले अपना शान्ति का अनुभव सुनायें इसका प्रभाव पड़ता है। सभी आक्यूपेशन वालों के लिए यह सहज विधि है, यह अनुभव हो। जैसे कुछ समय के अन्दर यह एडवरटाइज अच्छी हो गई कि सब धर्म वालों के लिए यही एक विधि है, यह आवाज़ हो। इसी रीति से अभी आवाज़ फैलाओ। जो सम्पर्क में आते हैं या स्टूडेन्ट हैं उन्हों तक तो यह आवाज़ होता है लेकिन अभी थोड़ा और चारों ओर फैले इसका अभी और अटेन्शन। ब्राह्मण भी अभी बहुत थोड़े बने हैं। नम्बरवार ब्राह्मण बनने की जो यह गति है, उसको फास्ट नहीं कहेंगे ना। अभी तो कम से कम नौ लाख तो चाहिए। कम से कम सतयुग की आदि में नौ लाख के ऊपर तो राज्य करेंगे ना! एक लाख पर तो नहीं करेंगे। उसमें प्रजा भी होगी लेकिन सम्पर्क में अच्छे आयेंगे तब तो प्रजा बनेंगे। तो इस हिसाब से गति कैसी होनी चाहिए। अभी तो संख्या बहुत कम है। अभी टोटल विदेश की संख्या कितनी होगी? कम से कम विदेश की संख्या दो-तीन लाख तो होनी चाहिए। मेहनत तो अच्छी कर रहे हो, ऐसी कोई बात नहीं है लेकिन थोड़ी स्पीड और तेज होनी चाहिए। स्पीट तेज होगी यह जनरल वातावरण से। अच्छा।

प्रश्न:- ऐसा पावरफुल वातावरण बनाने की युक्ति क्या है?

उत्तर- स्वयं पावरफुल बनो। उसके लिए अमृतवेले से लेकर हर कर्म में अपनी स्टेज शक्तिशाली है या नहीं, उसकी चेकिंग के ऊपर और थोड़ा विशेष अटेन्शन। दूसरों की सेवा में या सेवा के प्लैन्स में बिजी होने से अपनी स्थिति में कहां-कहां हल्कापन आ जाता है। इसलिए यह वातावरण शक्तिशाली नहीं होता। सेवा होती है लेकिन वातावरण शक्तिशाली नहीं होता है। इसके लिए अपने ऊपर विशेष अटेन्शन रखना पड़े। कर्म और योग, कर्म के साथ शक्ति- शाली स्टेज, इस बैलेन्स की थोड़ी कमी है। सिर्फ सेवा में बिजी होने के कारण स्व की स्थिति शक्तिशाली नहीं रहती। जितना समय सेवा में देते हो, जितना तन-मन-धन सेवा में लगाते हैं, उसी प्रमाण एक का लाख गुणा जो मिलना चाहिए वह नहीं मिलता है। इसका कारण है, कर्म और योग का बैलेन्स नहीं है। जैसे सेवा के प्लैन बनाते हो, पर्चे छपाते हो, टी.वी., रेडियो में करना है। जैसे वह बाहर के साधन बनाते हो वैसे पहले अपनी मंसा शक्तिशाली का साधन विशेष होना चाहिए। यह अटेन्शन कम है। फिर कह देते हो, बिजी रहे इसलिए थोड़ा-सा मिस हो गया। फिर डबल फायदा नहीं हो सकता।

प्रश्न:- कई ब्राह्मण आत्माओं पर भी ईविल सोल्स का प्रभाव पड़ जाता है, उस समय क्या करना चाहिए?

उत्तर:- इसके लिए सेवाकेन्द्र का वातावरण बहुत शक्तिशाली सदा रहना चाहिए। और साथ अपना भी वातावरण शक्तिशाली रहे। फिर यह ईविल स्प्रिट कुछ नहीं कर सकती है। यह मन को पकड़ती हैं। मन की शक्ति कमज़ोर होने के कारण ही इसका प्रभाव पड़ जाता है। मानो कोई कमज़ोर है और उसके ऊपर प्रभाप पड़ भी जाता है तो शुरू से पहले ही उसके प्रति ऐसे योगयुक्त आत्मायें विशेष योग भट्ठी रख करके उसको शक्ति दें और वह जो योगयुक्त ग्रुप है वह समझे कि हमको यह विशेष कार्य करना है, जैसे और प्रोग्राम होते हैं वैसे यह प्रोग्राम इतना अटेन्शन से करें तो फिर शुरू में उस आत्मा को ताकत मिलने से वह बच सकती हैं। भले वह आत्मा परवश होने के कारण योग में नहीं भी बैठ सके, क्योंकि उसके ऊपर दूसरे का प्रभाव होता है, तो वह भले ही न बैठे लेकिन आप अपना कार्य निश्चय बुद्धि हो करके करते रहो। तो धीरे-धीरे उसकी चंचलता शान्त होती जायेगी। वइ ईविल आत्मा पहले आप लोगों के ऊपर भी वार करने की कोशिश करेगी लेकिन आप समझो यह कार्य करना ही है, डरो नहीं तो धीरे- धीरे उसका प्रभाव हट जायेगा।

प्रश्न:- सेवाकेन्द्र पर अगर कोई प्रवेशता वाली आत्मायें ज्ञान सुनने के लिए आती हैं तो क्या करना चाहिए?

उत्तर:- अगर ज्ञान सुनने से उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर आता है या सेकण्ड के लिए भी अनुभव करती है तो उसको उल्लास में लाना चाहिए। कई बार आत्मायें थोड़ा-सा ठिकाना न मिलने के कारण भी आपके पास आती हैं, बदलने के लिए आया है या वैसे ही पागलपन में जहाँ रास्ता मिला, आ गया है यह परखना चाहिए। क्योंकि कई बार ऐसे पागल होते हैं जो जहाँ भी देखेंगे दरवाजा खुला है वहाँ जायेंगे। होश में नहीं होते हैं। तो ऐसे भी कई आयेंगे लेकिन उसको पहले परखना है। नहीं तो उसमें टाइम वेस्ट हो जायेगा। बाकी कोई अच्छे लक्ष्य से आया है, परवश है तो उसको शक्ति देना अपना काम है। लेकिन ऐसी आत्माओं को कभी भी अकेले में अटेण्ड नहीं करना। कुमारी कोई ऐसी आत्मा को अकेले में अटेण्ड न करें क्योंकि कुमारी को अकेला देख पागल का पागलपन और निकलता है। इसलिए ऐसी आत्माये अगर समझते हो योग्य हैं तो उन्हों ऐसा टाइम दो जिस टाइम दो-तीन और हों या कोई जिम्मेवार, कोई बुजुर्ग ऐसा हो तो उस समय उसको बुलाकर बिठाना चाहिए। क्योंकि जमाना बहुत गन्दा है और बहुत बुरे संकल्प वाले लोग हैं। इसलिए थोड़ा अटेन्शन रखना भी जरूरी है। इसमें बहुत क्लीयर बुद्धि चाहिए। क्लीयर बुद्धि होगी तो हरेक के वायब्रेशन से कैच कर सकेंगे कि यह किस एम से आया है।

प्रश्न:- आजकल किसी-किसी स्थान पर चोरी और भय का वातावरण बहुत हैं - उनसे कैसे बचे?

उत्तर:- इसमें योग की शक्ति बहुत चाहिए। मान लो कोई आपको डराने के ख्याल से आता है तो उस समय योग की शक्ति दो। अगर थोड़ा कुछ बोलेंगे तो नुकसान हो जायेगा। इसलिए ऐसे समय पर शान्ति की शक्ति दो। उस समय पर अगर थोड़े भी कुछ कहा तो उन्हों में जैसे अग्नि में तेल डाला। आप ऐसे रीति से रहो जैसे बेपरवाह हैं, हमको कोई परवाह नहीं है। जो करता है उसको साक्षी होकर अन्दर शान्ति की शक्ति दो तो फिर उसके हाथ नहीं चलेंगे। वह समझेंगे इनको तो कोई परवाह नहीं है। नहीं तो डराते हैं, डर गये या हलचल में आये तो वह और ही हलचल में लाते हैं। भय भी उन्हों को हिम्मत दिलाता है इसलिए भय में नहीं आना चाहिए। ऐसे टाइम पर साक्षीदृष्टा की स्थिति यूज करनी है। अभ्यास चाहिए ऐसे टाइम।

प्रश्न:- ब्लैसिंग जो बापदादा द्वारा मिलती है, उनका गलत प्रयोग क्या है?

उत्तर:- कभी-कभी जैसे बापदादा बच्चों को सर्विसएबल या अनन्य कहते हैं या कोई विशेष टाइटल देते हैं तो उस टाइटल को मिसयूज कर लेते हैं, समझते हैं मैं तो ऐसा बन ही गया। मैं तो हूँ ही ऐसा। ऐसा समझकर अपना आगे का पुरूषार्थ छोड़ देते हैं, इसको कहते हैं - मिसयूज अर्थात् गलत प्रयोग। क्योंकि जो बापदादा वरदान देते हैं, उस वरदान को स्वयं के प्रति और सेवा के प्रति लगाना यह है सही रीति से यूज करना और अलबेला बन जाना यह है मिसयूज करना।

प्रश्न:- बाइबिल में दिखाते हैं - अन्तिम समय में एण्टी क्राइस्ट का रूप होगा, इसका रहस्य क्या है?

उत्तर:- एन्टी क्राइस्ट का अर्थ है उस धर्म के प्रभाव को कम करने वाले। आजकल देखो उसी क्रिश्चियन धर्म में क्रिश्चियन धर्म की वैल्यू को कम समझते जा रहे हैं, उसी धर्म वाले अपने धर्म को इतना शक्तिशाली नहीं समझते और दूसरों में शक्ति ज्यादा अनुभव करते हैं, यही एन्टी क्राइस्ट हो गये। जैसे आजकल के कई पादरी ब्रह्मचर्य को महत्त्व नहीं देते और उन्हों को गृहस्थी बनाने की प्रेरणा देने शुरू कर दी है तो यह उसी धर्म वाले जैसे एण्टी क्राइस्ट हुए। अच्छा।



26-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


बापदादा की अद्भुत चित्रशाला

दिलाराम बापदादा अपने समीप और समान बच्चों प्रति बोले:-

बापदादा आज अपनी चित्रशाला को देख रहे हैं। बापदादा की चित्रशाला है यह जानते हो? आज वतन में हर बच्चे के चरित्र का चित्र देख रहे थे। हर एक का आदि से अब तक का चरित्र का चित्र कैसा रहा! तो सोचो चित्रशाला कितनी बड़ी होगी! उस चित्र में रहेक बच्चे की विशेष तीन बातें देखीं! एक- पवित्रता की पर्सनैलिटी। दूसरा - रीयल्टी की रायल्टी। तीसरा - सम्बन्घों की समीपता। यह तीन बातें हरेक चित्र में देखीं।

प्युरिटी की पर्सनैलिटी आकार रूप में चित्र के चारों ओर चमकती हुई लाइट दिखाई दे रही थी। रीयल्टी की रायल्टी चेहरे पर हर्षितमुखता और स्वच्छता चमक रही थी और सम्बन्धों की समीपता मस्तक बीच चमकता हुआ सितारा कोई ज्यादा चारों ओर फैली हुई किरणों से चमक रहा था, कोई थोड़ी-सी किरणों से चमक रहा था। समीपता वाली आत्मायें बाप समान बेहद की अर्थात् चारों ओर फैलती हुई किरणों वाली थीं। लाइट और माइट दोनों में बाप समान दिखाई दे रही थीं। ऐसे तीनों विशेषताओं से हरेक चरित्र का चित्र देखा। साथ-साथ आदि से अन्त अर्थात् अब तक तीनों ही बातों में सदा श्रेष्ठ रहे हैं वा कब कैसे कब कैसे रहे हैं उसकी रिजल्ट हर-एक के चित्र के अन्दर देखी। जैसे स्थूल शरीर में नब्ज से चेक करते हैं कि ठीक गति से चल रही है वा नीचे ऊपर होती है। तेज है वा स्लो है। इससे तन्दरूस्ती का मालूम पड़ जाता है। ऐसे हर चित्र के बीच ह्दय में लाइट नीचे से ऊपर तक जा रही थी। उसमें गति भी दिखाई दे रही थी कि एक ही गति से लाइट नीचे से ऊपर जा रही है या समय प्रति समय गति में अन्तर आता है। साथ-साथ बीच-बीच में लाइट का कलर बदलता है वा एक ही जैसा रहा है। तीसरा - चलते-चलते लाइट कहाँ-कहाँ रूकती है वा लगातार चलती रहती है। इसी विधि द्वारा हरेक के चरित्र का चित्र देखा। आप भी अपना चित्र देख सकते हो ना।

पर्सनैलिटी, रायल्टी और समीपता इन तीन विशेषताओं से चेक करो कि मेरा चित्र कैसा होगा? मेरे लाइट की गति कैसी होगी? नम्बरवार तो हैं ही। लेकिन तीनों विशेषतायें और तीनों प्रकार की लाइट की गति आदि से अब तक सदा ही रही हो- ऐसे चित्र मैजारिटी नहीं लेकिन मैनारटी में थे। तीन लाइटस की गति और तीन विशेषतायें छह बातें हुई ना। छह बातों में से मैजारिटी चारपां च तक और कुछ तीन तक थे। प्युरिटी की पर्सनैलिटी का लाइट का आकार किसका सिर्फ ताज के समान फेस के आसपास था और किसका आधे शरीर तक। जैसे फोटो निकालते हो ना। और किसका सारे शरीर के आस-पास दिखाई दे रहा था। जो मंसा-वाचा-कर्मणा तीनों में आदि से अब तक पवित्र रहे हैं। मंसा में स्वयं प्रति या किसी प्रति व्यर्थ रूपी अपवित्र संकल्प भी न चला हो। किसी भी कमज़ोरी वा अवगुण रूपी अपवित्रता का संकल्प भी धारण नहीं किया हो, संकल्प में जन्म से वैष्णव संकल्प बुद्धि का भोजन है। जन्म से वैष्णव अर्थात् अशुद्धि वा अवगुण, व्यर्थ संकल्प को बुद्धि द्वारा, मंसा द्वारा ग्रहण न किया हो। इसी को ही सच्चा वैष्णव वा बाल ब्रह्मचारी कहा जाता है। तो हरेक के चित्र में ऐसे प्युरिटी की पर्सनैलिटी की रेखायें लाइट के आकार द्वारा देखीं। जो मंसा- वाचा-कर्मणा तीनों में पवित्र रहे हैं! (कर्मणा में सम्बन्ध, सम्पर्क सब आ जाता है) उनका मस्तक से पैर तक लाइट के आकार में चमकता हुआ चित्र था। समझा! नॉलेज के दर्पण में अपना चित्र देख रहे हो? अच्छी तरह से देख लेना कि मेरा चित्र क्या रहा जो बापदादा ने देखा। अच्छा!

मिलने वालों की लिस्ट लम्बी है। अव्यक्त वतन में तो न नम्बर मिलेगा और समय की कोई बात है। जब चाहे जितना समय चाहे और जितने मिलने चाहें मिल सकते हैं। क्योंकि वह हद की दुनिया से परे हैं। इस साकार दुनिया में यह सब बन्धन हैं। इसलिए निर्बन्धन को भी बन्धन में बंधना पड़ता है। अच्छा –

टीचर्स तो सन्तुष्ट हो गये ना। सभी को अपना पूरा हिस्सा मिला ना। निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं। बापदादा भी विशेष आत्माओं का विशेष रिगार्ड रखते हैं। फिर भी सेवा के साथी हैं ना। ऐसे तो सभी साथी हैं फिर भी निमित्त को निमित्त समझने में ही सेवा की सफलता है। ऐसे तो सर्विस में कई बच्चे बहुत तीव्र उमंग उत्साह में बढ़ते रहते हैं फिर भी निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को रिगार्ड देना अर्थात् बाप को रिगार्ड देना है और बाप द्वारा रिगार्ड के रिटर्न में दिल का स्नेह लेना है। समझा! टीचर्स को रिगार्ड नहीं देते हो लेकिन बाप से दिल के स्नेह का रिटर्न लेते हो। अच्छा –

ऐसे सदा दिलाराम बाप द्वारा दिल का स्नेह लेने के पात्र अर्थात् सुपात्र आत्माओं को सदा स्वयं को प्युरिटी की पर्सनैलिटी, रायल्टी की रीयल्टी में अनुभव करने वाले समीप और समान बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

यु.के.ग्रुप से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

सभी सर्व राजो से सम्पन्न राज़युक्त, योगयुक्त आत्मायें हो ना! शुरू से बापदादा का नाम चारों ओर प्रत्यक्ष करने के निमित्त आत्मायें हो। बापदादा ऐसे आदि रत्नों को, सेवा के साथियों को देखकर सदा खुश होते हैं। सभी बापदादा के राइट-हैण्ड ग्रुप हो। बहुत अच्छे-अच्छे रत्न हैं। कोई कौन सा, कोई कौन सा, लेकिन हैं सब रत्न। क्योंकि स्वयं अनुभवी बन औरों को भी अनुभवी बनाने के निमित्त बनी हुई आत्मायें हो। बापदादा जानते हैं कि सभी कितने उमंग उत्साह से याद और सेवा में सदा मगन रहने वाली आत्मायें हैं। याद और सेवा के सिवाए और सब तरफ समाप्त हो गये। बस एक हैं, एक के हैं, एकरस स्थिति वाले हैं यही सबका आवाज़ है। यही वास्तविक श्रेष्ठ जीवन है। ऐसी श्रेष्ठ जीवन वाले सदा ही बापदादा के समीप हैं। निश्चयबुद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाले हैं। सदा, वाह मेरा बाबा और वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य - यही याद रहता है ना। बापदादा ऐसे स्मृति स्वरूप बच्चों को देखकर सदा हर्षित होते हैं कि - वाह मेरे श्रेष्ठ बच्चे। बापदादा ऐसे बच्चों के गीत गाते हैं। लंदन विदेश के सेवा का फाउण्डेशन हैं। आप सब सेवा के फाउण्डेशन स्टोन हो। आप सबके पक्के होने के प्रभाव से सेवा में वृद्धि होती जा रही है। भले फाउण्डेशन वृक्ष के विस्तार में छिप जाता है लेकिन है तो फाउण्डेशन ना। वृक्ष के विस्तार को सुन्दर देख उस तरफ ज्यादा नजर होती है। फाउण्डेशन गुप्त रह जाता है। ऐसे आप भी थोड़ा सा निमित्त बन औरों को चांस देने वाले बन गये लेकिन फिर भी आदि, आदि है। औरों को चांस देकर आगे लाने में आपको खुशी होती है ना। ऐसे तो नहीं समझते हो कि यह डबल विदेशी आये हैं तो हम छिप गये हैं? फिर भी निमित्त आप ही हैं। उन्हों को उमंग-उत्साह देने के निमित्त् हो। जो दूसरों को आगे रखता है वह स्वयं आगे है ही। जैसे छोटे बच्चे को सदा कहते हैं आगे चलो, बड़े पीछे रहते हैं। छोटों को आगे करना ही बड़ों का आगे होना है। उसका प्रत्यक्षफल मिलता ही रहता है। अगर आप लोग सहयोगी नहीं बनते तो लंदन में इतने सेन्टर नहीं खुलते। कोई कहाँ निमित्त बन गये कोई कहाँ निमित्त बन गये। अच्छा –

मलेशिया, सिंगापुर

सभी अपने को बाप की स्नेही आत्मायें अनुभव करते हो! सदा एक बाप दूसरा न कोई इसी स्थिति में स्थित रहते हो! इसी स्थिति को ही एकरस स्थिति कहा जाता है। क्योंकि जहाँ एक हैं वहाँ एकरस हैं। अनेक हैं तो इस स्थिति भी डगमग होती है। बाप ने सहज रास्ता बताया है कि एक में सब कुछ देखो। अनेकों को याद करने से, अनेक तरफ भटकने से छूट गये। एक हैं, एक के हैं, इसी एकरस स्थिति द्वारा सदा अपने को आगे बढ़ा सकते हो।

सिंगापुर और हांगकांग

को अभी चाइना में सेनटर खोलने का संकल्प करना चाहिए। सारे चाइना में अभी कोई केन्द्र नहीं है। उनहों को कनेक्शन में लाते हुए अनुभव कराओ। हिम्मत में आकर संकल्प करो तो हो जायेगा। राजयोग से प्रभु प्रेम, शान्ति, शक्ति का अनुभव कराओ, तो आत्मायें आटोमेटिकली परिवर्तन हो जायेंगी। राजयोगी बनाओ, डीटी नहीं बनाओ, राजयोगी डीटी आपेही बन जायेंगे। अच्छा-



28-02-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘प्राण अव्यक्त बापदादा द्वारा झण्डारोहण’’

आज 48वीं त्रिमूर्ति शिव जयन्ती के उपलक्ष्य में ओम् शान्ति भवन की स्टेज पर खड़े होकर स्वयं मीठे बाबुल ने झण्डा लहराया तथा सभी बच्चों के प्रति मधुर सन्देश में कहा-

बाप कहते हैं बच्चों का झण्डा सदा महान है। बच्चे नहीं होते तो बाप भी क्या करते! आप कहते हैं बाप का झण्डा सदा महान... (गीत बज रहा था) और बाप कहते हैं बच्चों का झण्डा सदा महान। सदा सभी बच्चों के मस्तक पर विजय का झण्डा लहरा रहा है। सबके नयनों में, सबके मस्तक में विजय का झण्डा लहराया हुआ है। बापदादा देख रहे हैं - एक यह झण्डा नहीं लहराया लेकिन सबके मस्तक में साथ-साथ विजय का झण्डा अविनाशी लहराया हुआ है।

बाप और बच्चों के वन्डरफुल बर्थ डे की मुबारक

चारों ओर के अति स्नेही, सेवा के साथी, सदा कदम में कदम रखने वाले बच्चों को इस अलौकिक ब्राह्मण जीवन की, बर्थ डे की मुबारक हो। सदा सभी बच्चों को बापदादा यादप्यार और मुबारक की रिटर्न में स्नेह भरी बाँहों की माला पहनाते हुए मुबारक दे रहे हैं। सभी बच्चों को यह अलौकिक बर्थ-डे विश्व की हर आत्मा यादगार रूप में मनाती ही आती है क्योंकि बाप के साथ बच्चों ने भी ब्राह्मण जीवन में सर्व आत्माओं को बहुत,बहुत, बहुत सुख-शान्ति, खुशी और शक्ति का सहयोग दिया है। इस सहयोग के कारण सब दिल से शिव और शालिग्राम दोनों का बर्थ-डे शिव जयन्ती मनाते हैं। तो ऐसे शालिग्राम बच्चों को शिव बाप और ब्रह्मा बाप दोनों की सदा पद्मगुणा बधाईयाँ हों, बधाईयाँ हों। सदा बधाई हो, सदा वृद्धि हो और सदा विधिपूर्वक सिद्धि को प्राप्त हो। अच्छा- सभी को गुडमोर्निंग।’’

अव्यक्त महावाक्य

आज भोलनाथ बाप अपने भोले बच्चों से बच्चो का सो बाप का सो बच्चों का अवतरण दिवस अर्थात् अलौकिक रूहानी जयन्ती मनाने आये हैं। भोलनाथ बाप को सबसे प्रिय भोले बच्चे हैं। भोले अर्थात् जो सदा सरल स्वभाव, शुभ भाव और स्वच्छता सम्पन्न मन और कर्म दोनों में सच्चाई और सफाई, ऐसे भोले बच्चे भोलानाथ बाप को भी अपने ऊपर आकर्षित करते हैं। भोलानाथ बाप ऐसे सरल स्वभाव भोले बच्चों के गुणों की माला सदा ही सिमरण करते रहते हैं। आप सभी ने अनेक जन्मों में बाप के नाम की माला सिमरण की और बाप अभी संगमयुग पर बच्चों को रिटर्न दे रहे हैं। बच्चों की गुण माला सिमरण करते हैं। कितने भोले बच्चे भोलानाथ को प्यारे हैं। जितना ज्ञानस्वरूप, नॉलेजफुल, पावरफुल उतना ही भोलापन। भगवान को भोलापन प्यारा है। ऐसे अपने श्रेष्ठ भाग्य को जानते हो ना। जो भगवान को मोह लिया। अपना बना दिया।

आज भक्तों और बच्चों दोनों का विशेष मनाने का दिन है। भक्त तैयारियां कर रहे हैं, आह्वान कर रहे हैं और आप सम्मुख बैठे हो। भक्तों की लीला भी बाप देख-देख मुस्कराते हैं और बच्चों की मिलन लीला देख-देख हर्षाते हैं। एक तरफ वियोगी भक्त आत्मायें, दूसरे तरफ सहज योगी बच्चे। दोनों ही अपनी- अपनी लगन से प्रिय हैं। भक्त भी कोई कम नहीं हैं। कल के दिन आकारी इष्ट रूप में चक्र लगाकर देखना। बाप के साथ शालिग्राम बच्चों की भी विशेष रूप से पूजा होगी। अपना पूजन बाप के साथ भक्तों का देखना। अभी अन्त तक भी नौधा भक्त कोई-कोई हैं जो सच्चे स्नेह से भक्ति कर भक्ति की भावना का अल्प समय का फल अनुभव करते हैं। कल का दिन भक्तों के भक्ति की विशेष लगन का दिन है। समझा!

आप सभी बाप की जयन्ती मनायेंगे या अपनी? सारे कल्प में बाप और बच्चों का एक ही बर्थ-डे हो - यह हो सकता है? भल दिन वो ही हो, वर्ष वह नहीं हो सकता। बाप और बच्चे का अन्तर तो होगा ना। लेकिन अलौकिक जयन्ती बाप और बच्चों की साथ-साथ है। आप कहेंगे हम बाप का बर्थ डे मनाते हैं और बाप कहते - बच्चों का बर्थ डे मनाते हैं। तो वण्डरफुल बर्थ-डे हो गया ना! अपना भी मनाते बाप का भी मनाते। इससे ही सोचों कि भोलनाथ बाप का बच्चों के साथ कितना स्नेह हैं जो जन्म दिन भी एक ही है। तो इतना मोह लिया ना - भोलनाथ को। भक्त लोग अपने भक्ति की मस्ती में मस्त हो जाते हैं और आप ‘‘पा लिया’’ इसी खुशी में साथ-साथ मनाते गाते नाचते हो। यादगार जो बनाया है उसमें ही बहुत रहस्य समाया हुआ है।

पूजा में, चित्रों में दो विशेषतायें विशेष हैं। एक तो है बिन्दू की विशेषता और दूसरी है - बूँद-बूँद की विशेषता। पूजा की विधि में बूँद-बूँद का महत्व है। इस समय आप बच्चे बिन्दूके रहस्य में स्थित होते हो। विशेष सारे ज्ञान का सार एक बिन्दू शब्द में समाया हुआ है। बाप भी बिन्दू, आप आत्मायें भी बिन्दू और ड्रामा का ज्ञान धारण करने के लिए जो हुआ - फिनिश अर्थात् फुलस्टाप। बिन्दू लगा दिया। परम आत्मा, आत्मा और यह प्रकृति का खेल अर्थात् ड्रामा तीनों का ज्ञान प्रैक्टिकल लाइफ में बिन्दूही अनुभव करते हो ना। इसलिए भक्ति में भी प्रतिभा के बीच बिन्दू का महत्व है। दूसरा है - बूँद का महत्व- आप सभी याद में बैठते हो या किसी को भी याद में बिठाते हो तो किस विधि से कराते हो? संकल्पों की बूँदों द्वारा - मैं आत्मा हूँ, यह बूँद डाली। बाप का बच्चा हूँ - यह दूसरी बूँद। ऐसे शुद्ध संकल्प की बूँद द्वारा मिलन की सिद्धि को अनुभव करते हो ना। तो एक है शुद्ध संकल्पों की स्मृति की बूँद। दूसरा जब रूह-रूहान करते हो, बाप की एक-एक महिमा और प्राप्ति के शुद्ध संकल्प की बूँद डालते हो ना। आप ऐसे हो, आपने हमको यह बनाया। यही मीठी-मीठी शीतल बूँदे बाप के ऊपर डालते अर्थात् बाप से रूह-रूहान करते हो। एक-एक बात करके सोचते हो ना, इकट्ठा ही नहीं। तीसरी बात - सभी बच्चे अपने तनमन- धन से सहयोग की बूँद डालते। इसलिए आप लोग विशेष कहते हो - फुरी फुरी तालाब। इतना बड़ा विश्व-परिवर्तन का कार्य, सर्वशक्तिवान का बेहद का विशाल कार्य उसमें आप हरेक जो भी सहयोग देते हो, बूँद समान ही तो सहयोग है। लेकिन सभी की बूँद-बूँद के सहयोग से, सहयोग का विशाल सागर बन जाता है। इसलिए पूजा की विधि में भी बूँद का महत्व दिखाया है।

विशेष व्रत की विधि दिखाते हैं। व्रत लेते हो ना। आप सभी बाप के सहयोगी बनने में व्यर्थ संकल्प के भोजन का व्रत लेते हो कि कभी भी बुद्धि में अशुद्ध व्यर्थ संकल्प स्वीकार नहीं करेंगे। यह व्रत अर्थात् दृढ़ संकल्प लेते हो और भक्त लोग अशुद्ध भोजन का व्रत रखते हैं। और साथ-साथ आप सदा के लिए जागती ज्योति बन जाते हो और वह उसके याद स्वरूप में जागरण करते हैं। आप बच्चों के अविनाशी रूहानी अन्तर्मुखी विधियों को भक्तों ने स्थूल बाहरमुखी विधियाँ बना दी हैं। लेकिन कापी आप लोगों को ही की है। जो कुछ टच हुआ, रजोप्रधान बुद्धि होने कारण ऐसे ही विधि बना दी। वैसे रजोगुणी नम्बरवन भक्त और भक्ति के हिसाब से सतोगुणी भक्त, तो ब्रह्मा और आप सभी विशेष आत्मायें निमित्त बनते हो। लेकिन पहले मंसा स्नेह और मंसा शक्ति होने के कारण मानसिक भाव की भक्ति शुरू होती है। यह स्थूल विधियाँ पीछेपीछे धीरे-धीरे ज्यादा होती है। फिर भी रचयिता बाप अपने भक्त आत्मायें रचना को और उन्हों की विधियों को देख यही कहेंगे कि इन भक्तों के टचिंग की बुद्धि की भी कमाल है। फिर भी इन विधियों द्वारा बुद्धि को बिजी रखने से, विकारों में जाने से कुछ न कुछ किनारा तो किया ना। समझा- आपके यथार्थ सिद्धि की विधि भक्ति में क्या-क्या चलती आ रही है।यह है यादगार का महत्व।

डबल विदेशी बच्चे तो भक्ति देखने से किनारे में रहते हैं। लेकिन आप सबके भक्त हैं। तो भक्तों की लीला आप पूज्य आत्माओं को समझ्नी तो पड़ेंगी ना। डबल विदेशी बच्चे अनुभव करते हो कि हम पूज्य आत्माओं को अभी भी भक्त आत्मायें कैसे पूजन भी कर रही हैं और आह्वान भी कर रही हैं। ऐसे महसूस करते हो ? कभी अनुभव होता है - भक्तों की पुकार का। रहम आता है भक्तों पर। भक्तों का ज्ञान भी अच्छी तरह से है ना! भक्त पुकारें और आप समझो नहीं तो भक्तों का क्या होगा? इसलिए भक्त क्या हैं, पुजारी क्या हैं, पूज्य क्या है इस राज़ को भी अच्छी तरह से जानते हो। पूज्य और पुजारी के राज़ को जानते हो ना। अच्छा। कभी भक्तों की पुकार का अनुभव होता है? पाण्डवों को भी होता है वा सिर्फ शक्तियों को होता है। शालिग्राम तो ढेर होते हैं। लाखों की अन्दाज में। लेकिन देवतायें लाखों की अन्दाज में नहीं होते। चाहे देवियाँ वा देवतायें हजारों की अन्दाज में होंगे। लाखों की अन्दाज में नहीं होगा। अच्छा- इनका राज़ भी फिर कभी सुनायेंगे।

डबल विदेशियों में भी जो आदि में आये हैं, ज्यादा में ज्यादा कितने वर्ष हुए? नौ-दस वर्ष। तो जो शुरू में एग्जैम्पल बने हैं चाहे शक्तियां अथवा पाण्डव। उन्हों की भी विशेषता है ना। बाप तो सबसे पहले बड़ा विदेशी है। सबसे ज्यादा समय विदेश में कौन रहता है? बाप रहता है ना।

अभी दिन प्रतिदिन जितना आगे समय आयेगा उतना भक्तों के आह्वान का आवाज़, उन्हों की भावनायें सब आपके पास स्पष्ट रूप में अनुभव होंगी। कौनसी इष्ट देवी वा देवता हो वो भी मालूम पड़ेगा। थोड़े पक्के हो जाओ फिर यह सब दिव्य बुद्धि की टचिंग द्वारा ऐसा अनुभव होगा जैसे दिव्य दृष्टि से स्पष्ट दिखाई देता है। अभी तो सज रहे हो इसलिए प्रत्यक्षता का पर्दा नहीं खुल रहा है। जब सज जायेंगे तब पर्दा खुलेगा। और स्वयं को भी देखेंगे। फिर सबके मुख से निकलेगा कि यह फलानी देवी भी आ गई। फलाना देवता भी आ गया। अच्छा-

सदा भोलेनाथ बाप के सरलचित, सहज स्वभाव वाले सहज योगी, भोले बच्चे, सदा बिन्दी और बूँद के रहस्य को जीवन में धारण करने वाले, धारणा स्वरूप आत्मायें, सदा मन, वाणी कर्म में दृढ़ संकल्प का व्रत लेने वाली ज्ञानी तू आत्मायें, सदा अपने पूज्य स्वरूप में स्थित रहने वाली पूज्य आत्माओं को भोलानाथ, वरदाता, विधाता बाप का यादप्यार और नमस्ते।’’



01-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


एक का हिसाब

स्नेह में लवलीन बच्चों प्रति अति मीठे बाबा बोले –

आज सर्व सहजयोगी, सदा सहयोगी बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। सर्व तरफ से आये हुए बाप के बच्चे - एक बल एक भरोसा, एक मत, एकरस, एक ही के गुण गाने वाले, एक ही के साथ सर्व सम्बन्ध निभाने वाले, एक के साथ सदा रहने वाले, एक ही प्रभु परिवार के एक लक्ष्य, एक ही लक्षण, सर्व को एक ही शुभ और श्रेष्ठ भावना से देखने वाले, सर्व को एक ही श्रेष्ठ शुभ कामना से सदा ऊँचा ऊड़ाने वाले, एक ही संसार, एक ही संसार में सर्व प्राप्ति का अनुभव करने वाले, आंख खोलते ही एक बाबा! हर एक काम करते एक साथी बाबा, दिन समाप्त करते कर्मयोग वा सेवा का कार्य समाप्त करते एक के लव में लीन हो जाते, एक के साथ लवलीन बन जाते अर्थात् एक के स्नेह रूपी गोदी में समा जाते। दिन रात एक ही के साथ दिनचर्या बिताते। सेवा के सम्बन्ध में आते, परिवार के सम्बन्ध में आते फिर भी अनेक में एक देखते। एक बाप का परिवार है। एक बाप ने सेवा प्रति निमित्त बनाया है। इसी विधि से अनेकों के सम्बन्ध सम्पर्क में आते, अनेक में भी एक देखते। ब्राह्मण जीवन में, हीरो पार्टधारी बनने की जीवन में, पास विद् आनर बनने की जीवन में, सिर्फ सीखना है तो क्या? - ‘एक का हिसाब। बस एक को जाना तो सब कुछ जाना। सब कुछ पाया। एक लिखना, सीखना, याद करना, सबसे सरल, सहज है।

वैसे भी भारत में कहावत है - तीन-पाँच की बातें नहीं करो, एक की बात करो। तीन-पाँच की बातें मुश्किल होती हैं, एक को याद करना, एक को जानना अति सहज है। तो यहाँ क्या सीखते हो? एक ही सीखते हो ना। एक में ही पदम समाए हुए हैं। इसीलिए बापदादा सहज रास्ता एक का ही बताते हैं। एक का महत्व जानो और महान बनो। सारा विस्तार एक में समाया हुआ है। सब ज्ञान आ गया ना। डबल फारेनर्स तो एक को अच्छी तरह जान गये हैं ना! अच्छा- आज सिर्फ आये हुए बच्चों को रिगार्ड देने के लिए, स्वागत करने के लिए एक का हिसाब सुना दिया।

बापदादा आज सिर्फ मिलने के लिए आये हैं। फिर भी सिकीलधे बच्चे जो आज वा कल आये हैं उन्हों के निमित्त कुछ न कुछ सुना लिया। बापदादा जानते हैं कि स्नेह के कारण कैसे मेहनत कर आने के साधन जुटाते हैं। मेहनत के ऊपर बाप की मुहब्बत पदमगुणा बच्चों के साथ है। इसीलिए बाप भी स्नेह और गौल्डन वर्शन्स से सभी बच्चों का स्वागत कर रहे हैं। अच्छा-

सर्व चारों ओर के स्नेह में लवलीन बच्चों को, सर्व लगन में मगन रहने वाले मन के मीत बच्चों को, सदा एक बाप के गीत गाने वाले बच्चों को, सदा प्रीति की रीति निभाने वाले साथी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - जर्मन ग्रुप से

सभी अपने को सदा श्रेष्ठ भाग्यवान, श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? सदा यह खुशी रहती है कि हम ऊँचे ते ऊँचे बाप के बच्चे हैं? क्योंकि जैसा बाप वैसे बच्चे हैं ना। बाप सदा खुशी का भण्डार है तो बच्चे भी बाप समान होंगे ना। कभी भूलना, कभी याद रहना, इससे जीवन का मजा नहीं आ सकता। जब एकरस स्थिति हो तब जीवन में मजा है। कभी नीचे होंगे कभी ऊपर तो थक जायेंगे। वैसे भी किसको कहो बार-बार नीचे उतरो ऊपर चढ़ो तो थक जायेंगे ना। आप सब तो सदा बाप के साथ-साथ रहने वाले बाप समान आत्मायें हो ना! सेवा में सभी स्वयं से सन्तुष्ट हो? एक-दो से सन्तुष्ट हो? जो स्वयं से, सेवा से और सर्व से संतुष्ट हैं उनको बापदादा सदा सन्तुष्ट मणियाँ कहते हैं। ऐसी सन्तुष्ट मणियाँ सदा ताज में चमकती हैं। ताज की मणियाँ अर्थात् सदा ऊँची स्थिति में स्थित रहने वाली। ऐसे ही अविनाशी भव। अच्छा-

इस क्लास में आप में से सबसे नॉलेजफुल, ज्ञानी तू आत्मा कौन है? (सभी) जैसा लक्ष्य होता है वैसा नम्बर आ ही जाता है। नम्बरवन का लक्ष्य है तो वह लक्षण आते रहेंगे। बापदादा तो सभी बच्चों को देख खुश होते हैं - कैसे लगन से बाप की याद और सेवा में लगे हुए हैं। एक-एक रत्न बाप के आगे सदा ही महान है। बिना बाप की याद और सेवा के सारे दिन में चैन आता है कि बस वही लगन लगी रहती है। रिजल्ट अच्छी है जर्मनी की। रत्न भी अच्छे-अच्छे हैं और सेवा में जगह-जगह विस्तार भी अच्छा किया है, इसको कहा जाता है - बाप समान रहमदिल आत्मायें। अभी हिन्दी के अक्षर याद कर लो - थोड़ा-थोडा तो हिन्दी सीखेंगे ना। जब यहाँ थोड़े बहुत संस्कार डालेंगे तब तो सतयुग में भी बोल सकेंगे। वहाँ तो यह आपकी गिटपिट की भाषा होगी नहीं। हिन्दी न समझने कारण डायरेक्ट तो बाप का नहीं सुनते हो ना। अगर सीख जायेंगे तो डायरेक्ट सुनेंगे। बापदादा समझते हैं - बच्चे डायरेक्ट सुनें, डायरेक्ट सुनने से और मजा आयेगा। अच्छा - सेवा के लिए जितना भी आगे बढ़ो उतना बहुत अच्छा है। सर्विस के लिए किसी को मना नहीं है, जितने सेन्टर चाहो खोल सकते हो सिर्फ डायरेक्शन प्रमाण। उसमें सहज सफलता हो जाती है। अच्छा-

पौलैण्ड ग्रुप से - बापदादा को खुशी है कि सभी बच्चे अपने स्वीट होम में पहुँच गये। आप सबको भी यह खुशी है ना कि हम ऐसे महान तीर्थ पर पहुँच गये। श्रेष्ठ जीवन तो अभ्यास करते-करते बन ही जायेगी लेकिन ऐसा श्रेष्ठ भाग्य पा लिया जो इस स्थान पर अपने सच्चे ईश्वरीय स्नेह वाली परिवार में पहुँच गये। इतना खर्च करके आये हो इतनी मेहनत से आये हो, अभी समझते हो कि खर्चा और मेहनत सफल हुई। ऐसे तो नहीं समझते हो पता नहीं कहाँ पहुँच गये! कितना परिवार के और बाप के प्यारे हो। बापदादा सदा बच्चों की विशेषता को देखते हैं। आप लोग अपनी विशेषता को जानते हो? यह विशेषता तो हैं - जो लगन से इतना दूर से यहाँ पहुँचे। अभी सदा अपने ईश्वरीय परिवार को और इस ईश्वरीय विधि राजयोग को सदा साथ में रखते रहना। अभी वहाँ जाकर राजयोग केन्द्र अच्छी तरह से आगे बढ़ाना। क्योंकि कई ऐसी आत्मायें हैं जो सच्चे शान्ति, सच्चे प्रेम और सच्चे सुखकी प्यासी हैं। उन्हों को रास्ता तो बतायेंगे ना। वैसे भी कोई पानी का प्यासा हो, अगर समय पर कोई उसे पानी पिलाता है तो जीवन भर वह उसके गुण गाता रहता है। तो आप जन्म-जन्मान्तर के लिए आत्माओं के सुख-शान्ति की प्यास बुझाना, इससे पुण्य आत्मा बन जायेंगे। आपकी खुशी देखकर सब खुश हो जायेंगे। खुशी ही सेवा का साधन है। इस महान तीर्थ स्थान पर पहुँचने से सभी तीर्थ इसमें समाये हुए हैं।

इस महान तीर्थ पर ज्ञान स्नान करो और जो कुछ कमज़ोरी है उसका दान करो। तीर्थ पर कुछ छोड़ना भी होता है। क्या छोड़ेंगे? जिस बात में आप परेशान होते हो वही छोड़ना है। बस। तब महान तीर्थ सफल हो जाता है। यही दान करो तो इसी दान से पुण्य आत्मा बन जायेंगे क्योंकि बुराई छोड़ना अर्थात् अच्छाई धारण करना। जब अवगुण छोड़ेंगे, गुण धारण करेंगे तो पुण्य आत्मा हो जायेंगे। यही है इस महान तीर्थ की सफलता। महान तीर्थ पर आये यह तो बहुत अच्छा - आना अर्थात् भाग्यवान की लिस्ट में हो जाना, इतनी शक्ति है इस महान तीर्थ की। लेकिन आगे क्या करना है। एक है भाग्यवान बनना दूसरा है सौभाग्यवान बनना और उसके आगे है पदमापदम भाग्यवान बनना। जितना संग करते रहेंगे, गुणों की धारणा करते रहेंगे, उतना पदमापदम भाग्यवान बनते जायेंगे। अच्छा-

सेवाधारियों से:- यज्ञ सेवा का भाग्य मिलना यह भी बहुत बड़े भाग्य की निशानी है। चाहे भाषण नहीं करो, कोर्स नहीं कराओ लेकिन सेवा की मार्क्स तो मिलेंगी ना। इसमें भी पास हो जायेंगे। हर सब्जेक्ट की अपनी-अपनी मार्क्स है। ऐसे नहीं समझो कि हम भाषण नहीं कर सकते तो पीछे हैं। सेवाधारी सदा ही वर्तमान और भविष्य फल के अधिकारी हैं। खुशी होती है ना! माताओ को मन का नाचना आता है। और कुछ भी नहीं करो, सिर्फ खुशी में मन से नाचती रहो तो भी बहुत सेवा हो जायेगी। अच्छा- ओम् शान्ति।



03-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


डबल विदेशी बच्चों से बापदादा की रूह-रूहान

मायाजीत, प्रकृतिजीत बनाने वाले बापदादा, स्वराज्य अधिकारी बच्चों प्रति बोले:-

आज बापदादा विशेष डबल विदेशी बच्चों से मिलने आये हैं। डबल विदेशी अर्थात् सदा स्वदेश, स्वीट होम का अनुभव करने वाले। सदा मैं स्वदेशी स्वीट होम का रहने वाला, परदेश में - पर-राज्य में स्वराज्य अर्थात् आत्मिक राज्य और सुख का राज्य स्थापना करने गुप्त रूप में प्रकृति का आधार ले पार्ट बजाने के लिए आये हैं। हैं स्वदेशी, पार्ट परदेश में बजा रहे हैं। यह प्रकृति का देश है। स्वदेश आत्मा का देश है। अभी प्रकृति माया के वश में है। माया का राज्य है। इसलिए परदेश हो गया। यही प्रकृति आपके मायाजीत होने से आपकी सुखमय सेवाधारी बन जायेगी। मायाजीत, प्रकृतिजीत होने से अपना सुख का राज्य, सतोप्रधान राज्य, सुनहरी दुनिया बन जायेगी। यह स्पष्ट स्मृति आती है ना? सिर्फ सेकण्ड में चोला बदली करना है। पुराना छोड़ नया चोला धारण करना है। कितनी देर लगेगी? फरिश्ता सो देवता बनने में सिर्फ चोला बदली करने की देरी लगेगी। वाया स्वीट होम भी करेंगे लेकिन स्मृति अन्त में फरिश्ता सो देवता बने कि बने, यही रहेगी। देवताई शरीर की, देवताई जीवन की, देवताओं के दुनिया की, सतोप्रधान प्रकृति के समय की स्मृति रहती है? भरे हुए संस्कार अनेक बार के राज्य के, देवताई जीवन के इमर्ज होते हैं? क्योंकि जब तक आप होवनहार देवताओं के संस्कार इमर्ज नहीं होंगे तो साकार रूप में सुनहरी दुनिया इमर्ज कैसे होगी? आपके इमर्ज संकल्प से देवताई सृष्टि इस भूमि पर प्रत्यक्ष होगी। संकल्प स्वत: ही इमर्ज होता है या अभी समझते हो बहुत देरी है? देवताई शरीर आप देव आत्माओं का आह्वान कर रहे हैं। दिखाई दे रहे हैं अपने देवताई शरीर? कब धारण करेंगे? पुराने शरीर से दिल तो नहीं लग गई है? पुराना टाइट तो नहीं पहना हुआ है? पुराना शरीर, पुराना चोला पड़ा हुआ है जो समय पर सेकण्ड में छोड़ नहीं सकते। निर्बन्धन अर्थात् लूज ड्रेस पहनना। तो डबल विदेशियों को क्या पसन्द होता है - लूज वा टाइट? टाइट तो पसन्द नहीं है ना! बन्धन तो नहीं है?

अपने आप से एवररेडी हो! समय को छोड़ो, समय नहीं गिनती करो। अभी यह होना है, यह होना है - वह समय जाने बाप जाने। सेवा जाने बाप जाने। स्व की सेवा से सन्तुष हो? विश्व सेवा को किनारे रखो, स्व को देखो। स्व की स्थिति में, स्व के स्वतन्त्र राज्य में, स्वयं से सन्तुष्ट हो? स्व की राजधानी ठीक चला सकते हो? यह सभी कर्मचारी, मंत्री, महामंत्री सभी आपके अधिकार में हैं? कहाँ अधीनता तो नहीं है? कभी आपके ही मंत्री, महामंत्री धोखा तो नहीं देते? कहाँ अन्दर ही अन्दर गुप्त अपने ही कर्मचारी माया के साथी तो नहीं बन जाते हैं? स्व के राज्य में आप राजाओं की रूलिंग पावर कन्ट्रोलिंग पावर यथार्थ रूप से कार्य कर रही है? ऐसे तो नहीं कि आर्डर करो शुभ संकल्प में चलना है और चलें व्यर्थ संकल्प। आर्डर करो सहनशीलता के गुण को और आवे हलचल का अवगुण। सभी शक्तियाँ, सभी गुण, हे स्व राजे, आपके आर्डर में हैं? यही तो आपके राज्य के साथी हैं। तो सभी आर्डर में हैं? जैसे राजे लोग आर्डर करते और सभी सेकण्ड में जी हजूर कर सलाम करते हैं, ऐसे कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर हैं? इसमें एवररेडी हो? स्व की कमज़ोरी, स्व का बन्धन धोखा तो नहीं देगा?

आज बापदादा स्वराज्य अधिकारियों से स्व के राज्य का हाल-चाल पूछ रहे हैं! राजे बैठे हो ना? प्रजा तो नहीं हो ना? किसी के अधीन अर्थात् प्रजा, अधिकारी अर्थात् राजा। तो सभी कौन हो? राजे। राजयोगी या प्रजा योगी? सभी राजाओं की दरबार लगी हुई है ना? सतयुग के राज्य सभा में तो भूल जायेंगे, एक दो को पहचानेंगे नहीं कि हम वहीं संगमयुगी हैं। अभी त्रिकालदर्शी बन एक दो को जानते हो, देखते हो। अभी का यह राज्य दरबार सतयुग से भी श्रेष्ठ है। ऐसी राज्य दरबार सिर्फ संगमयुग पर ही लगती है। तो सबके राज्य का हालचाल ठीक है ना? बड़े आवाज़ से नहीं बोला कि ठीक है!

बापदादा को भी यह राज्य सभा प्रिय लगती है। फिर भी रोज चेक करना, अपनी राज्य दरबार रोज लगाकर देखना अगर कोई भी कर्मचारी थोड़ा भी अलबेला बने तो क्या करेंगे? छोड़ देंगे उसको? आप सबने शुरू के चरित्र सुने हैं ना! अगर कोई छोटे बच्चे चंचलता करते थे, तो उनको क्या सजा देते थे? उसका खाना बन्द कर देना या रस्सी से बांध देना यह तो कामन बात है लेकिन उसको एकान्त में बैठने की ज्यादा घण्टा बैठने की सजा देते थे। बच्चे हैं ना, बच्चे तो बैठ नहीं सकते। तो एक ही स्थान पर बिना हलचल के 4-5 घण्टा बैठना उसकी कितनी सजा है। तो ऐसी रायल सजा देते थे। तो यहाँ भी कोई कर्मेन्द्रिय ऐसे वैसे करे तो अन्तर्मुखता की भट्टी में उसको बिठा दो। बाहरमुखता में आना ही नहीं है, यही उसको सजा दो। आये फिर अन्दर कर दो। बच्चे भी करते हैं ना। बच्चों को बिठाओ फिर ऐसे करते हैं, फिर बिठा देते हैं। तो ऐसे बाहरमुखता से अन्तर्मुखता की आदत पड़ जायेगी। जैसे छोटे बच्चों को आदत डालते हैं ना - बैठो, याद करो। वह आसन नहीं लगायेंगे फिर-फिर आप लगाकर बिठायेंगे। कितनी भी वह टाँगे हिलावे तो भी उसको कहेंगे नहीं, ऐसे बैठो। ऐसे ही अन्तर्मुखता के अभ्यास की भट्टी में अच्छी तरह से दृढ़ता के संकल्प से बाँधकर बिठा दो। और रस्सी नहीं बाँधनी हैं लेकिन दृढ़ संकल्प की रस्सी, अन्तर्मुखता के अभ्यास की भट्टी में बिठा दो। अपने आपको ही सजा दो। दूसरा देगा तो फिर क्या होगा? दूसरे अगर आपको कहें यह आपके कर्मचारी ठीक नहीं हैं, इसको सजा दो। तो क्या करेंगे? थोड़ा-सा आयेगा ना - यह क्यों कहता! लेकिन अपने आपको देंगे तो सदाकाल रहेंगे। दूसरे के कहने से सदाकाल नहीं होगा। दूसरे के इशारे को भी जब तक अपना नहीं बनाया है तब तक सदाकाल नहीं होता। समझा!

राजे लोग कैसे हों? राज्य दरबार अच्छी लग रही है ना! सब बड़े राजे हो ना! छोटे राजे तो नहीं, बड़े राजे। अच्छा –

आज ब्रह्मा बाप खास डबल विदेशियों को देख रूह-रूहान कर रहे थे। वह फिर सुनायेंगे। अच्छा - सदा मायाजीत, प्रकृतिजीत, राज्य अधिकारी आत्मायें, गुणों और सर्व शक्तियों के खज़ानों को अपने अधिकार से कार्य में लगाने वाले, सदा स्वराज्य द्वारा सर्व कर्मचारियों को सदा के स्नेही साथी बनाने वाले, सदा निर्बन्धन, एवररेडी रहने वाले, सन्तुष्ट आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

आस्ट्रेलिया ग्रुप से - सदा याद और सेवा का बैलेन्स रखने वाले, बापदादा और सर्व आत्माओं द्वारा ब्लैसिंग लेने वाली आत्मायें हो ना! यही ब्राह्मण जीवन की विशेषता है जो सदा पुरूषार्थ के साथ-साथ ब्लैसिंग लेते हुए बढ़ते रहें। ब्राह्मण जीवन में यह ब्लैसिंग एक लिफ्ट का काम करती है। इस द्वारा उड़ती कला का अनुभव करते रहेंगे।

आस्ट्रेलिया निवासियों से बापदादा का विशेष स्नेह हैं, क्यो? क्योंकि सदा एक अनेकों को लाने की हिम्मत और उमंग में रहते हैं। यह विशेषता बाप को भी प्रिय है। क्योंकि बाप का भी कार्य है - ज्यादा से ज्यादा आत्माओं को वर्से का अधिकारी बनाना। तो फॉलो फादर करने वाले बच्चे विशेष प्रिय होते हैं ना। आने से ही उमंग अच्छा रहता है। यह एक आस्ट्रेलिया की धरनी को जैसे वरदान मिला हुआ है। एक अनेकों के निमित्त बन जाता है। बापदादा तो हर बच्चे के गुणों की माला सिमरण करते रहते हैं। आस्ट्रेलिया की विशेषता भी बहुत है लेकिन आस्ट्रेलिया वाले माया को भी थोड़ा ज्यादा प्रिय हैं। जो बाप को प्रिय होते हैं, वह माया को भी प्रिय हो जाते हैं। कितने अच्छे-अच्छे थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन माया के बन तो गये हैं ना। आप सब तो ऐसे कच्चे नहीं हो ना! कोई चक्र में आने वाले तो नहीं हो? बापदादा को अभी भी वह बच्चे याद हैं। सिर्फ क्या होता है किसी भी बात को पूरा न समझने के कारण क्यों और क्या में आ जाते हैं तो माया के आने का दरवाजा खुल जाता है। आप तो माया के दरवाजे को जान गये हो ना! तो न क्यों-क्या में जाओ और न माया के आने का चांस मिले। सदा डबल लाक लगा रहे। याद और सेवा ही डबल लाक है। सिर्फ सेवा सिंगल लाक है। सिर्फ याद, सेवा नहीं तो भी सिंगल लाक है। दोनों का बैलेन्स यह है - डबल लाक। बापदादा की टी.वी. में आपका फोटो निकल रहा है, फिर बापदादा दिखायेंगे - देखो इस फोटो में आप हो। अच्छा - फिर भी संख्या में हिम्मत से, निश्चय से अच्छा नम्बर है। बाप को ज्यादा प्रिय लगते हो इसलिए माया से बचने की युक्ति सुनाई अच्छा-



05-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


शान्ति की शक्ति का महत्व

शान्ति के सागर शिवबाबा शान्तिस्वरूप बच्चों के प्रति बोले:-

‘‘शान्ति के सागर बाप अपने शान्ति के अवतार बच्चों से मिलने आये हैं। आज के संसार में सबसे आवश्यक चीज़ शान्ति है। उसी शान्ति के दाता तुम बच्चे हो। कितना भी कोई विनाशी धन, विनाशी साधन द्वारा शान्ति लेने चाहे तो सच्ची अविनाशी शान्ति मिल नहीं सकती। आज का संसार धनवान होते, सुख के साधन होते फिर भी अविनाशी सदाकाल की शान्ति के भिखारी हैं। ऐसे शान्ति की भिखारी आत्माओं को आप मास्टर शान्ति दाता, शान्ति के भण्डार, शान्तिस्वरूप आत्मायें अंचली दे सर्व की शान्ति की प्यास, शान्ति की इच्छा पूर्ण करो। बापदादा को अशान्त बच्चों को देख रहम आता है। इतना प्रयत्न कर साइन्स की शक्ति से कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं, क्या क्या बना रहे हैं, दिन को रात भी बना सकते, रात को दिन भी बना सकते लेकिन अपनी आत्मा का स्वधर्म शान्ति, उसको प्राप्त नहीं कर सकते। जितना ही शान्ति के पीछे भाग-दौड करते हैं उतना ही अल्पकाल की शान्ति के बाद परिणाम अशान्ति ही मिलती है। अविनाशी शान्ति सर्व आत्माओं का ईश्वरीय जन्म-सिद्ध अधिकार है। लेकिन जन्म-सिद्ध अधिकार के पीछे कितनी मेहनत करते हैं! सेकण्ड की प्राप्ति है लेकिन सेकण्ड की प्राप्ति के पीछे पूरा परिचय न होने कारण कितने धक्के खाते हैं, पुकारते हैं, चिल्लाते हैं, परेशान होते हैं। ऐसे शान्ति के पीछे भटकने वाले अपने आत्मिक रूप के भाईयों को, भाई-भाई की दृष्टि दो। इसी दृष्टि से ही उन्हों की सृष्टि बदल जायेगी।

आप सभी शान्ति के अवतार आत्मायें सदा शान्तिस्वरूप स्थिति में रहते हो ना? अशान्ति को सदा के लिए विदाई दे दी है ना! अशान्ति की विदाई सेरीमनी कर ली है या अभी करनी है? जिसने अभी अशान्ति की विदाई सेरीमनी नहीं की है, अभी करनी है वह यहाँ है? उनकी डेट फिक्स कर दें? जिसको अभी सेरीमनी करनी है वह हाथ उठाओ। कभी स्वप्न में भी अशान्ति न आवे। स्वप्न भी शान्तिमय हो गये हैं ना! शान्ति दाता बाप है, शान्तिस्वरूप आप हो। धर्म भी शान्त, कर्म भी शान्त तो अशान्ति कहाँ से आयेगी। आप सबका कर्म क्या है? शान्ति देना। अभी भी आप सबके भक्त लोग आरती करते हैं तो क्या कहते हैं? शान्ति देवा। तो यह किसकी आरती करते हैं? आपकी या सिर्फ बाप की? शान्ति देवा बच्चे सदा शान्ति के महादानी वरदानी आत्मायें हैं। शान्ति की किरणें विश्व में मास्टर ज्ञान सूर्य बन फैलाने वाले हैं, यही नशा है ना कि बाप के साथसाथ हम भी मास्टर ज्ञान सूर्य हैं वा शान्ति की किरणें फैलाने वाले मास्टर सूर्य हैं।

सेकण्ड में स्वधर्म का परिचय दे स्व स्वरूप में स्थित करा सकते हो ना? अपनी वृत्ति द्वारा, कौन-सी वृत्ति? इस आत्मा को भी अर्थात् हमारे इस भाई को भी बाप का वर्सा मिल जाए। इस शुभ वृत्ति वा इस शुभ भावना से अनेक आत्माओं को अनुभव करा सकते हो, क्यों? भावना का फल अवश्य मिलता है। आप सबकी श्रेष्ठ भावना है, स्वार्थ रहित भावना है। रहम की भावना है। कल्याण की भावना है। ऐसी भावना का फल नहीं मिले यह हो नहीं सकता। जब बीज शक्तिशाली है तो फल जरूर मिलता है। सिर्फ इस श्रेष्ठ भावना के बीज को सदा स्मृति का पानी देते रहो तो समर्थ फल, प्रत्यक्षफल के रूप में अवश्य प्राप्त होना ही है। क्वेश्चन नहीं, हो गया या नहीं होगा। सदा समर्थ स्मृति का पानी है अर्थात् सर्व आत्माओं के प्रति शुभभावना है तो विश्व शान्ति का प्रत्यक्षफल मिलना ही है। सर्व आत्माओं की जन्म-जन्म की आश बाप के साथ-साथ सभी बच्चे भी पूर्ण कर रहे हो और सर्व की हो जानी है।

जैसे अभी अशान्ति के आवाज़ चारों ओर गूँज रहे हैं। तन-मन-धन-जन सब तरफ से अशान्ति अनुभव कर रहे हैं। भय सर्व प्राप्ति के साधनों को भी शान्ति के बजाए अशान्ति का अनुभव करा रहा है। आज की आत्मायें किसी न किसी भय के वशीभूत हैं। खा रहे हैं, चल रहे हैं, कमा रहे हैं, अल्पकाल की मौज भी मना रहे हैं लेकिन भय के साथ। ना मालूम कल क्या होगा? तो जहाँ भय का सिंहासन है, जब नेता ही भय की कुर्सा पर बैठे हैं तो प्रजा क्या होगी? जितने बड़े नेता उतने अंगरक्षक होंगे। क्यों? भय है ना। तो भय के सिंहासन पर अल्पकाल की मौज क्या होगी? शान्तिमय वा अशान्तिमय? बापदादा ने ऐसे भयभीत बच्चों को सदाकाल की सुखमय, शान्तिमय जीवन देने के लिए आप सभी बच्चों को शान्ति के अवतार के रूप में निमित्त बनाया है। शान्ति की शक्ति से बिना खर्चे कहाँ से कहाँ तक पहुँच सकते हो? इस लोक से भी परे। अपने स्वीट होम में कितना सहज पहुँचते हो! मेहनत लगती है? शान्ति की शक्ति से प्रकृतिजीत मायाजीत कितना सहज बनते हो? किस द्वारा? आत्मिक शक्ति द्वारा। अब एटामिक और आत्मिक दोनों शक्तियों का जब मेल हो जायेगा। आत्मिक शक्ति से एटामिक शक्ति भी सतोप्रधान बुद्धि द्वारा सुख के कार्य में लगेगी तब दोनों शक्तियों के मिलन द्वारा शान्तिमय दुनिया इस भूमि पर प्रत्यक्ष होगी। क्योंकि शान्ति, सुखमय स्वर्ग के राज्य में दोनों शक्तियाँ है। तो सतोप्रधान बुद्धि अर्थात् सदा श्रेष्ठ, सत्य कर्म करने वाली बुद्धि। सत अर्था अविनाशी भी है। हर कर्म, अविनाशी बाप, अविनाशी आत्मा इस स्मृति से अविनाशी प्राप्ति वाला होगा। इसलिए कहते हैं - सत कर्म। तो ऐसे सदा के लिए शान्ति देने वाले, शान्ति के अवतार हो। समझा। अच्छा-

ऐसे सदा सतोप्रधान स्थिति द्वारा, सत कर्म करने वाली आत्मायें, सदा अपने शक्तिशाली भावना द्वारा अनेक आत्माओं को शान्ति का फल देने वाली, सदा मास्टर दाता बन, शान्ति देवा बन शान्ति की किरणें विश्व में फैलाने वाली, ऐसे बाप के विशेष कार्य के सहयोगी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

लन्दन के नोबिल विजेता वैज्ञानिक जोसिफसन बापदादा से मिल रहे हैं

शान्ति की शक्ति के अनुभव को भी अनुभव करते हो? क्योंकि शान्ति की शक्ति सारे विश्व को शान्तिमय बनाने वाली है। आप भी शान्तिप्रिय आत्मा हो ना! शान्ति की शक्ति द्वारा साइन्स की शक्ति को भी यथार्थ रूप से कार्य में लगाने से विश्व का कल्याण करने के निमित्त बन सकते हो। साइन्स की शक्ति भी आवश्यक है लेकिन सिर्फ सतोप्रधान बुद्धि बनने से इसका यथार्थ रूप से प्रयोग कर सकते हैं। आप सिर्फ इसी नॉलेज की कमी है कि यथार्थ रीति से इसको कार्य में कैसे लगायें! यही साइन्स इस नॉलेज के आधार पर नई सृष्टि की स्थापना के निमित्त बनेगी। लेकिन आप वह नॉलेज न होने कारण विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। तो अभी इसी साइन्स की शक्ति को साइलेन्स की शक्ति के आधार से बहुत ही अच्छे कार्य में लगाने के निमित्त बनो। इसमें भी नोबिल प्राइज लेंगे ना! क्योंकि आवश्यकता इसी कार्य की है। तो जब जिस कार्य की आवश्यकता है उसमें निमित्त बनने वाले को सभी श्रेष्ठ आत्मा की नजर से देखेंगे। तो समझा क्या करना है! अभी साइन्स और साइलेन्स का कनेक्शन कैसा है और दोनों के कनेक्शन से कितनी सफलता हो सकती है इसकी रिसर्च करो। रिसर्च की रूचि है ना! अभी यह करना। इतना बड़ा कार्य करना है। ऐसी दुनिया बनायेंगे ना। अच्छा-

यू.के.ग्रुप - सिकीलधे बच्चे सदा ही बाप से मिले हुए हैं। सदा बाप साथ है, यह अनुभव सदा रहता है ना? अगर बाप के साथ से थोड़ा भी किनारा किया तो माया की आँख बड़ी तेज है। वह देख लेती है यह थोड़ा-सा किनारे हुआ है तो अपना बना लेती है। इसलिए किनारे कभी भी नहीं होना। सदा साथ। जब बापदादा स्वयं सदा साथ रहने की आफर कर रहे हैं तो साथ लेना चाहिए ना! ऐसे साथ सारे कल्प में कभी नहीं मिलेगा, जो बाप आकर कहे मेरे साथ रहो। ऐसे भाग्य सतयुग में भी नहीं होगा। सतयुग में भी आत्माओं के संग रहेंगे। सारे कल्प में बाप का साथ कितना समय मिलता है? बहुत थोड़ा समय है ना। तो थोड़े समय में इतना बड़ा भाग्य मिले तो सदा रहना चाहिए ना। बापदादा सदा परिपक्व स्थिति में स्थित रहने वाले बच्चों को देख रहे हैं। कितने प्यारे-प्यारे बच्चे बापदादा के सामने हैं। एक-एक बच्चे बहुत लवली है। बापदादा ने इतने प्यार से सभी को कहाँ-कहाँ से चुनकर इकट्ठा किया है। ऐसे चुने हुए बच्चे सदा ही पक्के होंगे, कच्चे नहीं हो सकते। अच्छा-



07-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


कर्मातीत, वानाप्रस्थी आत्मायें ही तीव्रगति की सेवा के निमित्त

वानप्रस्थी, कर्मातीत स्थिति में स्थित करने वाले, सदा कर्मातीत शिवबाबा बोले:-

‘‘मधुबन वरदान भूमि, समर्थ भूमि, श्रेष्ठ संग की भूमि, सहज परिवर्तन भूमि, सर्व प्राप्तियों के अनुभव कराने वाली भूमि है। ऐसी भूमि पर आकर सभी स्वयं को सम्पन्न अर्थात् सब बातों से भरपूर अनुभव करते हो? कोई अप्राप्ति तो नहीं है? जो सर्व खज़ाने मिले हैं उन्हों को सदाकाल के लिए धारण किया है? ऐसे समझते हो कि यहाँ से सेवा स्थान पर जाकर महादानी बन यही शक्तियाँ, सर्व प्राप्तियाँ सर्व को देने के निमित्त बनेंगे? सदा के लिए स्वयं को विघ्न विनाशक, समाधान स्वरूप अनुभव किया है? स्व की समस्या तो अगल रही लेकिन अन्य आत्माओं के समस्याओं का भी समाधान स्वरूप।

समय के प्रमाण अब ब्राह्मण आत्मायें समस्याओं के वश हो जाएं इससे अभी पार हो गये। समस्याओं के वश होना यह बाल अवस्था है। अब ब्राह्मण आत्माओं की बाल अवस्था का समय समाप्त हो चुका। युवा अवस्था में मायाजीत बनने की विधि से महावीर बने, सेवा में चक्रवर्ती बने। अनेक आत्माओं के वरदानी महादानी बने, अनेक प्रकार के अनुभव कर महारथी बने। अब कर्मातीत, वानप्रस्थ स्थिति में जाने का समय पहुँच गया है। कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति द्वारा ही विश्व की सर्व आत्माओं को आधाकल्प के लिए कर्म बन्धनों से मुक्त कराए मुक्ति में भेजेंगे। मुक्त आत्मायें ही सेकण्ड में मुक्ति का वर्सा बाप से दिला सकती हैं। मैजारिटी आत्मायें मुक्ति की भीख मांगने के लिए आप कर्मातीत वानप्रस्थ महादानी वरदानी बच्चों के पास आयेंगी। जैसे अभी आपके जड़ चित्रों के आगे, कोई मन्दिरों में जाकर प्रार्थना कर सुख शान्ति मांगते हैं। कोई तीर्थ स्थानों पर जाकर मांगते हैं। कोई घर बैठे मांगते हैं। जिसकी जहां तक शक्ति होती वहां तक पहुँचते हैं, लेकिन यथाशक्ति यथाफल की प्राप्ति करते हैं। कोई दूर बैठे भी दिल से करते हैं और कोई मूर्ति के सामने तीर्थ स्थान वा मन्दिरों में जाकर भी दिखावे मात्र करते हैं। स्वार्थ वश करते हैं। उन सब हिसाब अनुसार जैसा कर्म, जैसी भावना वैसे फल मिलता है। ऐसे अब समय प्रमाण आप चैतन्य महादानी वरदानी मूर्तियों के आगे प्रार्थना करेंगे। कोई सेवा स्थान रूपी मन्दिरों में पहुँचेंगे। कोई महान तीर्थ मधुबन तक पहुँचेंगे। और कोई घर बैठे साक्षात्कार करते दिव्य बुद्धि द्वारा प्रत्यक्षता का अनुभव करेंगे। सम्मुख न आते भी स्नेह और दृढ़ संकल्प से प्रार्थना करेंगे। मंसा में आप चैतन्य फरिश्तों का आह्वान कर मुक्ति से वर्से की अंचली मांगेंगे। थोड़े समय में सर्व आत्माओं को वर्सा दिलाने का कार्य तीव्रगति से करना होगा। जैसे विनाश के साधन रिफाइन होने के कारण तीव्रगति से समाप्ति के निमित्त बनेंगे ऐसे आप वरदानी महादानी आत्मायें अपने कर्मातीत फरिश्ते स्वरूप के सम्पूर्ण शक्तिशाली स्वरूप द्वारा सर्व की प्रार्थना का रेसपाण्ड मुक्ति का वर्सा दिलायेंगी। तीव्रगति के इस कार्य के लिए मास्टर सर्व शक्ति- वान, शक्तियों के भण्डार, ज्ञान के भण्डार, याद स्वरूप तैयार हो? विनाश की मशीनरी और वरदान की मशीनरी दोनों तीव्रगति के साथ-साथ चलेंगी।

बहुतकाल से अर्थात् अब से भी एवररेडी। तीव्रगति वाले कर्मातीत, समाधान स्वरूप सदा रहने का अभ्यास नहीं करेंगे तो तीव्रगति के समय देने वाले बनने के बजाए देखने वाले बनना पड़े। तीव्र पुरुषार्थी बहुत काल वाले तीव्रगति की सेवा के निमित्त बन सकेंगे। यह है वानप्रस्थ अर्थात् सर्व बन्धनमुक्त, न्यारे और बाप के साथ-साथ तीव्रगति के सेवा की प्यारी अवस्था। तो अब देने वाले बनने का समय है ना कि अब भी स्वयं प्रति, समस्याओं प्रति लेने वाले बनने का समय है! स्व की समस्याओं में उमंग होना अब वह समय गया। समस्या भी एक अपनी कमज़ोरी की रचना है। कोई द्वारा वा कोई सरकमस्टांस द्वारा आई हुई समस्या वास्तव में अपनी कमज़ोरी का ही कारण है। जहाँ कमज़ोरी है वहां व्यक्ति द्वारा वा सरकमस्टांस द्वारा समस्या वार करती है। अगर कमज़ोरी नहीं तो समस्या का वार नहीं। आई हुई समस्या, समस्या के बजाए समाधान रूप में अनुभवी बनायेगी। यह अपनी कमज़ोरी के उत्पन्न हुए मिक्की माउस हैं। अभी तो सब हंस रहे हैं और जिस समय आती है उस समय क्या करते हैं? खुद भी मिक्की माउस बन जाते हैं। इससे खेलो, न कि घबराओ। लेकिन यह भी बचपन का खेल हैं। न रचना करो न समय गँवाओ। इससे परे स्थिति में वानप्रस्थी बन जाओ। समझा!

समय क्या कहता? बाप क्या कहता? अब भी खिलौनों से खेलना अच्छा लगता है क्या? जैसे कलियुग की मानव रचना भी क्या बन गई है? मुरली में सुनते हो ना। बिच्छु-टिण्डन हो गये हैं। तो यह कमज़ोर समस्याओं की रचना भी बिच्छू-टिण्डन के समान स्वयं को काटते हैं। शक्तिहीन बना देते हैं। इसलिए सभी मधुबन से सम्पन्न बन यह दृढ़ संकल्प करके जाना कि अब से स्वयं की समस्या को समाप्त किया ही लेकिन और किस के लिए भी समस्या स्वरूप नहीं बनेंगे। स्व प्रति, सर्व के प्रति सदा समाधान स्वरूप रहेंगे। समझा!

इतना खर्चा करके मेहनत करके आते हो तो मेहनत का फल इस दृढ़ संकल्प द्वारा सहज सदा मिलता रहेगा। जैसे मुख्य बात पवित्रता के लिए दृढ़ संकल्प किया है ना कि मर जायेंगे, सहन करेंगे लेकिन इस व्रत को कायम रखेंगे। स्वप्न में वा संकल्प में भी अगर जरा भी हलचल होती है तो पाप समझते हो ना। ऐसे समस्या बनना या समस्या के वश हो जाना यह भी पाप का खाता है। पाप की परिभाषा है, पहचान है, जहाँ पाप होगा वहाँ बाप याद नहीं होगा, साथ नहीं होगा। पाप और बाप, दिन और रात जैसे हैं। तो जब समस्या आती है उस समय बाप याद आता है? किनारा हो जाता है ना? फिर जब परेशान होते हो तब बाप याद आता है। और वह भी भक्त के रूप में याद करते। अधिकारी के रूप में नहीं। शक्ति दे दो, सहारा दे दो। पार लगा दो। अधिकारी के रूप में, साथी के रूप में, समान बान के रूप में याद नहीं करते हो। तो समझा अब क्या करना है? समाप्ति समारोह मनाना है ना। समस्याओं का समाप्ति समारोह मनायेंगे ना! या सिर्फ डान्स करेंगे? अच्छे-अच्छे ड्रामा करते हो ना! अभी यह फंक्शन करना क्योंकि अभी सेवा में समय बहुत चाहिए। वहां पुकार रहे हैं और यहां हिल रहे हैं, यह तो अच्छा नहीं है ना! वह वरदानी महादानी कह याद कर रहे हैं और आप मूड आफ में रो रहे हैं तो फल कैसे देंगे! उनके पास भी आपके गर्म आंसू पहुँच जायेंगे। वह भी घबराते रहेंगे। अभी याद रखो कि हम ब्रह्मा बाप के साथ-इष्ट देव पूज्य आत्मायें हैं। अच्छा –

सदा बहुत काल के तीव्र पुरुषार्थी, तीव्रगति की सेवा के एवररेडी बच्चों को, सदा विश्व-परिवर्तन सो समस्या परिवर्तक, समाधान स्वरूप बच्चों को, सदा रहमदिल बन भक्त आत्माओं और ब्राह्मण आत्माओं के स्नेही और सहयोगी रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें, सदा समस्याओं से परे रहने वाले, कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति में रहने वाले सम्पन्न स्वरूप बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

न्यूयार्क पार्टी से - सभी अपने को बाप की विशेष आत्मायें अनुभव करते हो? सदा यही खुशी रहती है कि जैसे बाप सदा श्रेष्ठ है वैसे हम बच्चे भी बाप समान श्रेष्ठ हैं? इसी स्मृति से सदा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ हो जायेगा। जैसा संकल्प होगा वैसे कर्म होंगे। तो सदा स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहने वाली विशेष आत्मायें हो। सदा अपने इस श्रेष्ठ जन्म की खुशियाँ मनाते रहो। ऐसा श्रेष्ठ जन्म जो भगवान के बच्चे बन जायें - ऐसा सारे कल्प में नहीं होता। पांच हजार वर्ष के अन्दर सिर्फ इस समय यह अलौकिक जन्म होता है। सतयुग में भी आत्माओं के परिवार में आयेंगे लेकिन अब परमात्म सन्तान हो। तो इसी विशेषता को सदा याद रखो। सदा - मैं ब्राह्मण ऊँचे ते ऊँचे धर्म, कर्म और परिवार का हूँ। इसी स्मृति द्वारा हर कदम में आगे बढ़ते चलो। पुरूषार्थ की गति सदा तेज हो। उड़ती कला सदा ही मायाजीत और निर्बन्धन बना देगी। जब बाप को अपना बना दिया तो और रहा ही क्या। एक रह गया था। एक में ही सब समाया हुआ है। एक की याद में, एकरस स्थिति में स्थित होने से शान्ति, शक्ति और सुख की अनुभूति होती रहेगी। जहाँ एक है वहाँ एक नम्बर है। तो सभी नम्बरवन हो ना। एक को याद करना सहज है या बहुतों को? बाप सिर्फ यही अभ्यास कराते हैं और कुछ नहीं। दस चीज़ें उठाना सहज है या एक चीज़ उठाना सहज है? तो बुद्धि द्वारा एक की याद धारण करना बहुत सहज है। लक्ष्य सबका बहुत अच्छा है। लक्ष्य अच्छा है तो लक्षण अच्छे होते ही जायेंगे। अच्छा! ओम् शान्ति।



09-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


परिवर्तन को अविनाशी बनाओ

शक्तिशाली स्थिति में स्थित करने वाले सर्वशक्तिवान शिवबाबा बोले:-

‘‘बापदादा सभी चात्रक बच्चों को देख रहे हैं। सभी को सुनना, मिलना और बनना यही लगन है। सुनना, इसमें नम्बरवन चात्रक हैं। मिलना इसमें नम्बर हैं और बनना - इसमें यथा शक्ति तथा समान बनना। लेकिन सभी श्रेष्ठ आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें तीनों के चात्रक जरूर हैं। नम्बरवन चात्रक मास्टर मुरलीधर, मास्टर सर्वशक्तिवान बाप समान सदा और सहज बन जाते हैं। सुनना अर्थात्, मुरलीधर बनना। मिलना अर्थात् संग के रंग में उसी समान शक्तियों और गुणों में रंग जाना। बनना अर्थात् संकल्प के कदम पर, बोल के कदम पर, कर्म के कदम पर कदम रखते हुए साक्षात बाप समान बनना। बच्चे के संकल्प में बाप का संकल्प समान अनुभव हो। बोल में, कर्म में जैसा बाप वैसा बच्चा, सर्व को अनुभव हो। इसको कहा जाता है समान बनना वा नम्बरवन चात्रक। तीनों में से चेक करो मैं कौन हूँ? सभी बच्चों के उमंग उत्साह भरे संकल्प बापदादा के पास पहुँचते हैं। संकल्प बहुत अच्छे हिम्मत और दृढ़ता से करते हैं। संकल्प रूपी बीज शक्तिशाली है लेकिन धारणा की धरनी, ज्ञान का गंगाजल और याद की धूप कहो वा गर्मी कहो, बार-बार स्व अटेन्शन की रेख देख, इसमें कहाँ-कहाँ अलबेले बन जाते हैं। एक भी बात में कमी होने से संकल्प रूपी बीज सदा फल नहीं देता है। थोड़े समय के लिए एक सीजन, दो सीजन फल देगा। सदा का फल नहीं देगा। फिर सोचते हैं - बीज तो शक्तिशाली था, प्रतिज्ञा तो पक्की की थी। स्पष्ट भी हो गया था। फिर पता नहीं क्या हो गया। 6 मास तो बहुत उमंग रहा फिर चलते-चलते पता नहीं क्या हुआ! इसके लिए जो पहले बातें सुनाई उस पर सदा अटेन्शन रहे।

दूसरी बात - छोटी-सी बात में घबराते जल्दी हो। घबराने के कारण छोटीसी बात को भी बड़ा बना देते हो। होती चींटी है उसको बना देते हो हाथी। इसलिए बैलेन्स नहीं रहता। बैलेन्स न होने के कारण जीवन से भारी हो जाते हो। या तो नशे में बिल्कुल ऊँचे चढ़ जाते वा छोटी-सी कंकड़ी भी नीचे बिठा देती। नॉलेजफुल बन सेकण्ड में उसको हटाने के बजाए कंकड़ी आ गई, रूक गये, नीचे आ गये, यह हो गया, इसको सोचने लग जाते हो। बीमार हो गया, बुखार वा दर्द आ गया। अगर यही सोचते और कहते रहें तो क्या हाल होगा! ऐसे जो छोटी-छोटी बातें आती हैं उनको मिटाओ, हटाओ और उड़ो। हो गया, आ गया इसी संकल्प में कमज़ोर नहीं बनो। दवाई लो और तन्दरूस्त बनो। कभी-कभी बापदादा बच्चों के चेहरे को देख सोचते हैं - अभी-अभी क्या थे, अभी-अभी क्या हो गये! यह वही ही हैं या दूसरे बन गये! जल्दी में नीचे ऊपर होने से क्या होता? माथा भारी हो जाता। वैसे भी स्थूल में अभी ऊपर, अभी नीचे आओ तो चक्र महसूस करेंगे ना। तो यह संस्कार परिवर्तन करो। ऐसे नहीं सोचो की हम लोगों की आदत ही ऐसी है। देश के कारण वा वायुमण्डल के कारण वा जन्म के संस्कार, नेचर के कारण ऐसा होता ही है, ऐसी-एसी मान्यतायें कमज़ोर बना देती हैं। जन्म बदला तो संस्कार भी बदलो। जब विश्व-परिवर्तक हो तो स्वपरिवर्त क तो पहले ही हो ना। अपने आदि अनादि स्वभाव-संस्कार को जानो। असली संस्कार वह हैं। यह तो नकली हैं। मेरे संस्कार, मेरी नेचर यह माया के वशीभूत होने की नेचर है। आप श्रेष्ठ आत्माओं की आदि अनादि नेचर नहीं है। इसलिए इन बातों पर फिर से अटेन्शन दिला रहे हैं। रिवाइज करा रहे हैं। इस परिवर्तन को अविनाशी बनाओ।

विशेषतायें भी बहुत हैं। स्नेह में नम्बरवन हो, सेवा के उमंग में नम्बरवन हो। स्थूल में दूर होते भी समीप हो। कैचिंग पावर भी बहुत अच्छी है। महसूसता की शक्ति भी बहुत तीव्र है। खुशियों के झूलें में भी झूलते हो। वाह बाबा, वाह परिवार, वाह ड्रामा के गीत भी अच्छे गाते हो। दृढ़ता की विशेषता भी अच्छी है। पहचानने की बुद्धि भी तीव्र है। बाप और परिवार के सिकीलधे लाडले भी बहुत हो। मधुबन के शृंगार हो और रौनक भी अच्छी हो। वैरायटी डालियां मिलकर एक चन्दन का वृक्ष बनने का एग्जैम्पल भी बहुत अच्छे हो। कितनी विशेषतायें हैं! विशेषतायें ज्यादा हैं और कमज़ोरी एक है। तो एक को मिटाना तो बहुत सहज है ना। समस्यायें समाप्त हो गई हैं ना! समझा-

जैसे सफाई से सुनाते हो वैसे दिल से सफाई से निकालने में भी नम्बरवन हो। विशेषताओं की माला बनायेंगे तो लम्बी चौड़ी हो जायेगी। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं। यह परिवर्तन 99 प्रतिशत तो कर लिया बाकी 1 प्रतिशत है। वह भी परिवर्तन हुआ ही पड़ा है। समझा। कितने अच्छे हैं जो अभी-अभी भी बदल करके ना से हाँ कर देते हैं। यह भी विशेषता हैं ना! उत्तर बहुत अच्छा देते हैं। इन्हों से पूछते हैं शक्तिशाली, विजयी हो? तो कहते हैं अभी से हैं! यह भी परिवर्तन की शक्ति तीव्र हुई ना। सिर्फ चींटी चूहे से घबराने का संस्कार है। महावीर बन चींटी को पांव के नीचे कर दो और चूहे की सवारी बना दो, गणेश बन जाओ। अभी से विघ्न विनाशक अर्थात् गणेश बनकर चूहे पर सवारी करने लग जाना। चूहे से डरना नहीं। चूहा शक्तियों को काट लेता है। सहनशक्ति खत्म कर लेता है। सरलता खत्म कर देता है। स्नेह खत्म कर देता। काटता है ना। और चींटी सीधे माथे में चली जाती है। टेन्शन में बेहोश कर देती है। उस समय परेशान कर लेती है ना। अच्छा!

सदा महावीर बन शक्तिशाली स्थिति में स्थित होने वाले, हर संकल्प, बोल और कर्म, हर कदम पर कदम रख बाप के साथ-साथ चलने वाले, सच्चे जीवन के साथी, सदा अपनी विशेषताओं को सामने रख कमज़ोरी को सदा के लिए विदाई देने वाले, संकल्प रूपी बीज को सदा फलदायक बनाने वाले, हर समय बेहद का प्रत्यक्षफल खाने वाले, सर्व प्राप्तियों के झूलों में झूलने वाले ऐसे सदा के समर्थ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

फ्रांस ग्रुप से

1. सभी बहुत बार मिले हो और अब फिर से मिल रहे हो - क्योंकि जब कल्प पहले मिले थे तब अब मिल रहे हो। कल्प पहले वाली आत्मायें फिर से अपना हक लेने के लिए पहुँच गई हैं? नया नहीं लगता है ना! पहचान याद आ रही है कि हम बहुत बारी मिले हैं! पहचाना हुआ घर लग रहा है। जब अपना कोई मिल जाता है तो अपने को देखकर खुशी होती है। अभी समझते हो कि वह जो सम्बन्ध था वह स्वार्थ का सम्बन्ध था, असली नहीं था। अपने परिवार में, अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा भी भले पधारे कहकर स्वागत कर रहे हैं।

दृढ़ता सफलता को लाती है, जहाँ यह संकल्प होता है कि यह होगा या नहीं होगा वहां सफलता नहीं होती। जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता हुई पड़ी है। कभी भी सेवा में दिलशिकस्त नहीं होना क्योंकि अविनाशी बाप का अविनाशी कार्य है। सफलता भी अविनाशी होनी ही है। सेवा का फल न निकले यह हो नहीं सकता। कोई उसी समय निकलता है कोई थोड़ा समय के बाद इसलिए कभी भी यह संकल्प भी नहीं करना। सदा ऐसे समझो कि सेवा होनी ही है।

जापान ग्रुप से:- बाप द्वारा सर्व खज़ाने प्राप्त हो रहे हैं? भरपूर आत्मायें हैं, ऐसा अनुभव करते हो? एक जन्म नहीं लेकिन 21 जन्म यह खज़ाने चलते रहेंगे। कितना भी आज की दुनिया में कोई धनवान हो लेकिन जो खज़ाना आपके पास है वह किसी के पास भी नहीं है। तो वास्तविक सच्चे वी.आई.पी कौन हैं? आप हो ना! वह पोजीशन तो आज है कल नहीं लेकिन आपका यह ईश्वरीय पोजीशन कोई छीन नहीं सकता। बाप के घर के शृंगार बच्चे हो। जैसे फूलों से घर को सजाया जाता है ऐसे बाप के घर के शृंगार हो। तो सदा स्वयं को - मैं बाप का शृंगार हूँ ऐसा समझ श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहो। कभी भी कमज़ोरी की बातें याद नहीं करना। बीती बातों को याद करने से और ही कमज़ोरी आ जायेगी। पास्ट सोचेंगे तो रोना आयेगा इसलिए पास्ट अर्थात् फिनिश। बाप की याद शक्तिशाली आत्मा बना देती है। शक्तिशाली आत्मा के लिए मेहनत भी मुहब्बत में बदल जाती है। जितना ज्ञान का खज़ाना दूसरों को देते हैं उतना वृद्धि होती है। हिम्मत और उल्लास द्वारा सदा उन्नति को पाते आगे बढ़ते चलो। अच्छा-

 


 


12-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सन्तुष्टता

सर्व खज़ानों और शक्तियों से मालामाल करने वाले बापदादा अपने प्रसन्नचित्त, सन्तुष्ट बच्चों के प्रति बोलेः-

आज बापदादा चारो ओर के दूर होते समीप रहने वाले सभी बच्चों के सन्तुष्टता वा रूहानियत और प्रसन्नता की मुस्कराहट देख रहे थे। सन्तुष्टता रूहानियत की सहज विधि है। प्रसन्नता सहज सिद्धि है। जिसके पास सन्तुष्टता है वह सदा प्रसन्न स्वरूप अवश्य दिखाई देगा। सन्तुष्टता सर्व प्राप्ति स्वरूप है। सन्तुष्टता सदा हर विशेषता को धारण करने में सहज साधन है। सन्तुष्टता का खज़ाना सर्व खज़ानों को स्वत: ही अपनी तरफ आकार्षित् करता है। सन्तुष्टता ज्ञान की सब्जेक्ट का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सन्तुष्टता बेफिकर बादशाह बनाती है। सन्तुष्टता सदा स्वमान की सीट पर सेट रहने का साधन है। सन्तुष्टता महादानी, विश्व कल्याणी वरदानी सदा और सहज बनाती है। सन्तुष्टता हद के मेरे तेरे के चक्र से मुक्त कराए स्वदर्शन चक्रधारी बनाती है। सन्तुष्टता सदा निर्विकल्प, एकरस के विजयी आसन की अधिकारी बनाती है। सदा बापदादा के दिलतख्तनशीन, सहज स्मृति के तिलकधारी, विश्व परिवर्तन के सेवा के ताजधारी इसी अधिकार के सम्पन्न स्वरूप में स्थित करती है। सन्तुष्टता ब्राह्मण जीवन का जीयदान है। ब्राह्मण जीवन के उन्नति का सहज साधन है। स्व से सन्तुष्ट, परिवार से सन्तुष्ट और परिवार उनसे सन्तुष्ट। किसी भी परिस्थिति में रहते हुए, वायुमण्डल वायब्रेशन की हलचल में भी सन्तुष्ट। ऐसे सन्तुष्टता स्वरूप, श्रेष्ठ आत्मा विजयी रत्न के सर्टिफिकेट के अधिकारी है। तीन सर्टिफिकेट लेने पड़ें –

(1) स्व की स्व से सन्तुष्टता (2) बाप द्वारा सदा सन्तुष्टता (3) ब्राह्मण परिवार द्वारा सन्तुष्टता।

इससे अपने वर्तमान और भविष्य को श्रेष्ठ बना सकते हो। अभी भी सर्टिफकेट लेने का समय है। ले सकते हैं लेकिन ज्यादा समय नहीं है। अभी लेट हैं लेकिन टूलेट नहीं हैं। अभी भी सन्तुष्टता की विशेषता से आगे बढ़ सकते हो। अभी लास्ट सो फास्ट सो फर्स्ट की मार्जिन है। फिर लास्ट सो लास्ट हो जायेंगे। तो आज बापदादा इसी सर्टिफकेट को चेक कर रहे थे। स्वयं भी स्वयं को चेक कर सकते हो। प्रसन्नचित हैं या प्रश्नचित हैं? डबल विदेशी प्रसन्नचित वा सन्तुष्ट हैं? प्रश्न खत्म हुए तो प्रसन्न हो ही गये। सन्तुष्टता का समय ही संगमयुग है। सन्तुष्टता का ज्ञान अभी है। वहां इस सन्तुष्ट-असन्तुष्ट के ज्ञान से परे होंगे। अभी संगमयुग का ही यह खज़ाना है। सभी सन्तुष्ट आत्मायें सर्व को सन्तुष्टता का खज़ाना देने वाली हो। दाता के बच्चे मास्टर दाता हो। इतना जमा किया है ना! स्टाक फुल कर दिया है या थोड़ा कम रह गया है? अगर स्टाक कम है तो विश्वकल् याणकारी नहीं बन सकते। सिर्फ कल्याणी बन जायेंगे। बनना तो बाप समान है ना। अच्छा-

सभी देश विदेश के सर्व खज़ानों से सम्पन्न मास्टर सर्वशक्तिवान होकर जा रहे हो ना। आना है तो जाना भी है। बाप भी आते हैं तो जाते भी हैं ना। बच्चे भी आते हैं और सम्पन्न बनकर जाते हैं। बाप समान बनाने के लिए जाते हैं। अपने ब्राह्मण परिवार की वृद्धि करने के लिए जाते हैं। प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने जाते हैं। इसीलिए जा रहे हो ना! अपनी दिल से वा बन्धन से नहीं जा रहे हो। लेकिन बाप के डायरेक्शन से सेवा प्रति थोड़े समय के लिए जा रहे हो! ऐसे समझ जा रहे हो ना? ऐसे नहीं कि हम तो हैं ही अमेरिका के, आस्ट्रेलिया के.... नहीं। थोड़े समय के लिए बापदादा ने सेवा के प्रति निमित्त बनाकर भेजा है। बापदादा भेज रहे हैं, अपने मन से नहीं जाते। मेरा घर है, मेरा देश है। नहीं! बाप सेवा स्थान पर भेज रहे हैं। सभी सदा न्यारे और बाप के प्यारे! कोई बन्धन नहीं। सेवा का भी बन्धन नहीं। बाप ने भेजा है बाप जाने। निमित्त बने हैं, जब तक और जहां निमित्त बनावें तब तक के लिए निमित्त हैं। ऐसे डबल लाइट हो ना! पाण्डव भी न्यारे और प्यारे हैं ना। बन्धन वाले तो कोई नहीं हैं। न्यारा बनना ही प्यारा बनना है। अच्छा-

सदा सन्तुष्टता की रूहानियत में रहने वाले, प्रसन्नचित रहने वाले, सदा हर संकल्प, बोल, कर्म द्वारा सर्व को सन्तुष्टता का बल देने वाले, दिलशिकस्त आत्माओं को खज़ानों से शक्तिशाली बनाने वाले, सदा विश्व-कल्याणकारी बेहद के बेफिकर बादशाहों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

दादी जी तथा दादी जानकी जी से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

होलीहंसों की रूप-बसन्त की जोड़ी अच्छी है। यह (जानकी दादी) शान्ति से रूप बन सेवा ज्यादा पसन्द करती है और इनको तो बोलना ही पड़ता है। यह जब भी चाहे एकान्त में चली जाती है। इसे रूप की सेवा पसन्द है, वैसे तो आलराउण्ड हैं लेकिन फिर भी रूप-बसन्त की जोड़ी है। दोनों संस्कारों की आवश्कता है। जहां वाणी काम नहीं करेगी तो रूप काम करेगा और जहाँ रूप काम नहीं कर सकता वहां बसन्त काम करेगा। तो जोड़ी अच्छी है। जो जोड़ी बनती है। वह सब अच्छी है। वह भी जोड़ी अच्छी थी - यह भी अच्छी है। (दीदी के लिए) ड्रामा में वह गुप्त नदी हो गई। उनसे डबल विदेशियों का भी बहुत प्यार है। कोई बात नहीं। दीदी का दूसरा रूप देख लिया। सब देखकर कितने खुश होते हैं। सभी महारथी साथ हैं। बृजइन्द्रा, निर्मलशान्ता सब दूर होते भी साथी हैं! शक्तियों का अच्छा सहयोग है। सभी एक दो को आगे रखने के कारण आगे बढ़ रहे हैं। और निमित्त शक्तियों को आगे रखने के कारण सब आगे हैं। सेवा के बढ़ने के कारण ही यह है - एक दो को आगे बढ़ाना। आपस में प्यार है। युनिटी है। सदा दूसरे की विशेषता वर्णन करना यही सेवा में वृद्धि करना है। इसी विधि से सदा वृद्धि हुई है और होती रहेगी। सदैव विशेषता और विशेषता देखने का औरों को सिखाना यही संगठन की माला की डोर है। मोती भी तो धागे में पिरोते हैं ना। संगठन का धागा है ही यह। विशेषता के सिवाए और कोई वर्णन नहीं। क्योंकि मधुबन महान भूमि है। महा भाग्य भी है तो महा पाप भी है। मधुबन में जा करवे अगर ऐसा कोई व्यर्थ बोलता है तो उसका बहुत पाप बन जाता है। इसलिए सदैव विशेषता देखने का चश्मा पड़ा हुआ हो। व्यर्थ देख नहीं सकते। जैसे लाल चश्मे के सिवाए लाल के और कुछ देखते हैं क्या! तो सदैव यही चश्मा पड़ा हुआ हो - विशेषता देखने का। कभी कोई बात देखें भी तो उसका वर्णन कभी नहीं करो। वर्णन किया भाग्य गया। कुछ भी कमी आदि है तो उसका जिम्मेवार बाप है, निमित्त किसने बनाया! बाप ने। तो निमित्त बने हुए की कमी वर्णन करना माना बाप की कमी वर्णन करना। इसलिए इन्हों के लिए कभी भी बिना शुभ भावना के और कोई वर्णन नहीं कर सकते।

बापदादा तो आप रत्नों को अपने से भी श्रेष्ठ देखते हैं। बाप का शृंगार यह है ना। तो बाप को शृंगारने वाले बच्चे तो श्रेष्ठ हुए ना। बापदादा तो बच्चों की महिमा कर खुश होते रहते हैं। वाह मेरा फलाना रत्न। वाह मेरा फलाना रत्न। यही महिमा करते रहते हैं। बाप कभी किसकी कमज़ोरी को नहीं देखते। ईशारा भी देते तो भी विशेषतापूर्वक रिगार्ड के साथ इशारा देते हैं। नहीं तो बाप को अथार्टी है ना, लेकिन सदैवी रिगार्ड देकर फिर ईशारा देते हैं। यही बाप की विशेषता सदा बच्चों में भी इमर्ज रहे। फॉलो फादर करना है ना।

बापदादा के आगे सभी मुख्य बहनें बैठी हैं

जीवनमुक्त जनक आपका गायन है ना। जीवनमुक्त और विदेशी दो टाइटल्स हैं।(दादी के लिए) यह तो है ही मणि। सन्तुष्टमणि, मस्तकमणि, सफलता की मणि, कितनी मणियाँ हैं! सब मणियाँ ही मणियाँ हैं। मणियों को कितना भी छिपाके रखो लेकिन मणी की चमक कभी छिप नहीं सकती। धूल में भी चमकेगी। लाइट का काम करेगी। इसलिए नाम भी वही है, काम भी वही है। इनका भी गुण वही है, देह मुक्त जीवन मुक्त। सदा जीवन की खुशी के अनुभव की गहाराई में रहती हैं। इसको ही कहते हैं - जीवन मुक्त



15-03-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


होली उत्सव पवित्र बनने, बनाने का यादगार

होली हंस आत्माओं प्रति अव्यक्त बापदादा बोले:-

होलीएस्ट बाप होलीहंसों से होली डे मनाने आये हैं। होली डे इस संगमयुग को कहा जाता है। संगमयुग है ही होली डे। तो होलीएस्ट बाप होली बच्चों से होली डे मनाने आये हैं। दुनिया की होली एक-दो दिन की है और आप होली हंस संगमयुग ही होली मनाते हो। वो रंग लगाते हैं और आप बाप के संग के रंग में बाप समान सदा के लिए होली बन जाते हो! हद से बेहद के हो जाने से सदाकाल के लिए होली अर्थात् पवित्र बन जाते हो। यह होली का उत्सव होली अर्थात् पवित्र बनाने का, बनने का उत्साह दिलाने वाला है। जो भी यादगार विधि मनाते हैं उन सब विधियों में पवित्र बनने का सार समाया हुआ है। पहले होली बनने वा होली मनाने के लिए अपवित्रता, बुराई को भस्म करना है, जलाना है। जब तक अपवित्रता को सम्पूर्ण समाप्त नहीं किया है तब तक पवित्रता का रंग चढ़ नहीं सकता। पवित्रता की दृष्टि से एक-दो में रंग रंगने का उत्सव मना नहीं सकते। भिन्न-भिन्न भाव भूलकर एक ही परिवार के हैं, एक ही समान हैं अर्थात् भाई-भाई के एक समान वृत्ति से मनाने का यादगार है। वे तो लौकिक रूप में मनाने लिए छोटा बड़ा, नर-नारी समान भाव में मनावें इस भाव से मनाते हैं। वास्तव में भाई-भाई के समान स्वरूप की स्मृति अविनाशी रंग का अनुभव कराती है। जब इस समान स्वरूप में स्थित हो जाते हैं तब ही अविनाशी खुशी की झलक अनुभव होती है और सदा के लिए उत्साह रहता है कि सर्व आत्माओं को ऐसा अविनाशी रंग लगावें। रंग पिचकारी द्वारा लगाते हैं। आपकी पिचकारी कौन-सी है? आपके दिव्य बुद्धि रूपी पिचकारी में अविनाशी रंग भरा हुआ है ना। संग के रंग से अनुभव करते हो, उन भिन्न-भिन्न अनुभवों के रंग से पिचकारी भरी हुई है ना। भरी हुई बुद्धि की पिचकारी से किसी भी आत्मा को दृष्टि द्वारा, वृत्ति द्वारा मुख द्वारा इस रंग में रंग सकते हो जो वह सदा के लिए होली बन जाए। वो होली मनाते हैं, आप होली बनाते हो। सब दिन होली डे के बना देते हो। वो अल्पकाल के लिए अपनी खुशी की मूड बनाते हैं मनाने के लिए लेकिन आप सभी सदा मनाने के लिए होली और हैपी मूड में रहते हो। मूड बनानी नहीं पड़ती है। सदा रहते हो होली मूड में और किसी प्रकार की मूड नहीं। होली मूड सदा हल्की, सदा निश्चिन्त, सदा सर्व खज़ानों से सम्पन्न, बेहद के स्वराज्य अधिकारी। यह जो भिन्न-भिन्न मूड बदलते हैं, कब खुशी की, कब ज्यादा सोचने की, कभी हल्की, कभी भारी - यह सब मूड बदल कर सदा हैपी और होली मूड वाले बन जाते हो। ऐसा अविनाशी उत्सव बाप के साथ मनाते हो। मिटाना, मनाना और फिर मिलन मनाना। जिसका यादगार जलाते हैं, रंग लगाते हैं और फिर मिलन मनाते हैं। आप सभी भी जब बाप के रंग में रंग जाते हो, ज्ञान के रंग में, खुशी के रंग में, कितने रंगों की होली खेलते हो। जब इन सब रंग से रंग जाते हो तो बाप समान बन जाते हो। और जब समान आपस में मिलते हैं तो कैसे मिलेंगे? स्थूल में तो गले मिलते, लेकिन आप कैसे मिलते? जब समान बन जाते तो स्नेह में समा जाते हैं। समाना ही मिलना है। तो यह सारी विधि कहाँ से शुरू हुई? आप आविनाशी मनाते, वो विनाशी यादगार रूप मनाकर खुश हो जाते हैं। इससे सोचो कि आप सभी कितने अविनाशी उत्सव अर्थात् उत्साह में रहने के अनुभवी बने हो जो अब सिर्फ आपके यादगार दिन को भी मनाने से खुश हो जाते हैं। अन्त तक भी आपके उत्साह और खुशी का यादगार अनेक आत्माओं को खुशी का अनुभव कराता रहता है। तो ऐसे उत्साह भरे जीवन, खुशियों से भरी जीवन बना ली है ना!

ड्रामा के अन्दर यही संगमयुग का वण्डरफुल पार्ट है जो अविनाशी उत्सव मनाते हुए अपना यादगार उत्सव भी देख रहे हो। एक तरफ चैतन्य श्रेष्ठ आत्मायें हो। दूसरे तरफ अपने चित्र देख रहे हो। एक तरफ याद स्वरूप बने हो, दूसरे तरफ अपने हर श्रेष्ठ कर्म का यादगार देख रहे हो। महिमा योग्य बन गये हो और कल्प पहले की महिमा सुन रहे हो। यह वण्डर है ना। और स्मृति से देखो कि यह हमारा गायन है! वैसे तो हर आत्मा भिन्न नाम रूप से अपना श्रेष्ठ कर्म का यादगार चित्र देखते भी हैं लेकिन जानते नहीं है। अभी गाँधी जी भी भिन्न नाम रूप से अपनी फिल्म देखता तो होगा ना। लेकिन पहचान नहीं। आप पहचान से अपने चित्र देखते हो। जानते हो कि यह हमारे चित्र हैं! यह हमारे उत्साह भरे दिनों का यादगार उत्सव के रूप में मना रहे हैं। यह ज्ञान सारा आ गया है ना। डबल विदेशियों के चित्र मन्दिरों में है? यह देलवाड़ा मन्दिर में अपना चित्र देखा है? या सिर्फ भारत वालों के चित्र हैं? सभी ने अपने चित्र देखे? यह पहचाना कि हमारे चित्र हैं। जैसे हे अर्जुन! एक का मिसाल है, वैसे यादगार चित्र भी थोड़े दिखाते हैं। परन्तु हैं सभी के। ऐसे नहीं समझो कि यह तो बहुत थोड़े चित्र हैं। हम कैसे होंगे। यह तो सैम्पल दिखाया है। लेकिन है आप सबका यादगार। जो याद में रहते हैं उनका यादगार जरूर बनता है। समझा। तो पिचकारी बड़ी सभी की भरी हुई है ना! छोटी-छोटी तो नहीं जो एक बार में ही समाप्त हो जाए। फिर बार-बार भरना पड़े। ऐसी मेहनत करने की भी दरकार नहीं। सभी को अविनाशी रंग से रंग लो। होली बनाने की होली मनाओ। आपकी तो होली हो गई है ना - कि मनानी है? होली हो गई अर्थात् होली मना ली। रंग लगा हुआ है ना। यह रंग साफ नहीं करना पड़ेगा। स्थूल रंग लगाते भी खुशी से हैं और फिर उनसे बचने भी चाहते हैं। और आपका यह रंग तो ऐसा है जो कहेंगे और भी लगाओ। इससे कोई डरेगा नहीं। उस रंग से तो डरते हैं - आँख में न लग जाए। यह तो कहेंगे जितना लगाओ उतना अच्छा। तो ऐसी होली मना ली है ना। होली बन गये! यह पवित्र बनने बनाने का यादगार है।

यहाँ भारत में तो अनेक कहानियाँ बना दी हैं क्योंकि कहानियाँ सुनने की रूचि रखते हैं। तो हर उत्सव की कहानियाँ बना दी हैं। आपकी जीवन कहानी से भिन्न-भिन्न छोटी-छोटी कहानियाँ बना दी हैं। कोई राखी की कहानी बना दी कोई होली की कहानी, कोई जन्म की कहानी बना दी। कोई राज्य दिवस की बना दी। लेकिन यह हैं सब आपके जीवन कहानियों की कहानियाँ। द्वापर में व्यवहार में भी इतना समय नहीं देना पड़ता था, फ्री थे। संख्या भी आज के हिसाब से कम थी। सम्पत्ति भी रजोप्रधान थी - स्थिति भी रजोप्रधान थी। इसलिए बिजी रहने के लिए यह कथा, कहानियाँ, कीर्तन यह साधन अपनाये हैं। कुछ तो साधन चाहिए ना। आप लोग तो फ्री होते हो तो सेवा करते हो या याद में बैठ जाते हो। वो उस समय क्या करें! प्रार्थना करेंगे या कथा कीर्तन करेंगे। इसलिए फ्री बुद्धि हो करके कहानियाँ बड़ी अच्छी-अच्छी बनाई हैं। फिर भी अच्छा है जो अपवित्रता में ज्यादा जाने से बच गये। आजकल के साधन तो ऐसे हैं जो 5 वर्ष के बच्चे को ही विकारी बना देते हैं। और उस समय फिर भी कुछ मर्यादायें भी थीं- लेकिन हैं सब आपका यादगार। इतना नशा और खुशी है ना कि हमारा यादगार मना रहे हैं। हमारे गीत गा रहे हैं। कितने प्यार से गीत गाते हैं। इतने प्यार स्वरूप आप बने हैं तब तो प्यार से गाते हैं। समझा- होली का यादगार क्या है! सदा खुश रहो, हल्के रहो - यही मनाना है। अच्छा - कभी मूड आफ नहीं करना। सदा होली मूड, लाइट मूड! हैपी मूड। अभी बहुत अच्छे समझदार बनते जाते हैं। पहले दिन जब मधुबन में आते हैं वह फोटो और फिर जब जाते हैं वह फोटो दोनों निकालने चाहिए। समझते ईशारे से हैं। फिर भी बापदादा के वा बापदादा के घर के शृंगार हो। आपके आने से देखो मधुबन की रौनक कितनी अच्छी हो जाती हैं। जहाँ देखो वहाँ फरिश्ते आ-जा रहे हैं। रौनक है ना! बापदादा जानते हैं आप शृंगार हो। अच्छा-

सभी ज्ञान के रंग में रंगे हुए, सदा बाप के संग के रंग में रहने वाले, बाप समान सम्पन्न बन औरों को भी अविनाशी रंग में रंगने वाले, सदा होली डे मनाने वाले, होली हंस आत्माओं को बापदादा की सदा हैपी और होली रहने की मुबारक हो। सदा स्वयं को सम्पन्न बनाने की, उमंग उत्साह में रहने की मुबारक हो। साथ-साथ चारों ओर के लगन में मगन रहने वाले, सदा मिलन मनाने वाले, विशेष बच्चों को याद प्यार और नमस्ते!



02-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


बिन्दु का महत्त्व

ज्योतिबिन्दु, ज्ञान के सिन्धु शिवबाबा अपने ज्योतिबिन्दु आत्माओं प्रति बोले:-

आज भाग्यविधाता बाप सर्व भाग्यवान बच्चों से मिलने आये हैं। भाग्य विधाता बाप सभी बच्चों को भाग्य बनाने की अति सहज विधि बता रहे हैं। सिर्फ बिन्दु के हिसाब को जानो। बिन्दु का हिसाब सबसे सहज है। बिन्दु के महत्व को जाना और महान बने। सबसे सहज और महत्वशाली बिन्दु का हिसाब सभी अच्छी तरह से जान गये हो ना! बिन्दु कहना और बिन्दु बनना। बिन्दु बन बिन्दु बाप को याद करना है। बिन्दु थे और अब बिन्दु स्थिति में स्थित हो बिन्दु बाप समान बन मिलन मनाना है। यह मिलन मनाने का युग, उड़ती कला का युग कहा जाता है। ब्राह्मण जीवन है ही मिलने और मनाने के लिए। इसी विधि द्वारा सदा कर्म करते हुए कर्मों के बन्धन से मुक्त कर्मातीत स्थिति का अनुभव करते हो। कर्म के बन्धन में नहीं आते लेकिन सदा बाप के सर्व सम्बन्ध में रहते हो। करावनहार बाप निमित्त बनाए करा रहे हैं। तो स्वयं साक्षी बन गये। इसलिए इस सम्बन्ध की स्मृति बन्धन मुक्त बना देती है। जहाँ सम्बन्ध से करते वहाँ बन्धन नहीं होता। मैंने किया, यह सोचा तो सम्बन्ध भूला और बन्धन बना! संगमयुग बन्धमुक्त सर्व सम्बन्ध युक्त, जीवनमुक्त स्थिति के अनुभव का युग है। तो चेक करो सम्बन्ध में रहते हो या बन्धन में आते? सम्बन्ध में स्नेह के कारण प्राप्ति है, बन्धन में खींचातान, टेन्शन के कारण दु:ख और अशान्ति की हलचल है। इसलिए जब बाप ने बिन्दुका सहज हिसाब सिखा दिया तो देह का बन्धन भी समाप्त हो गया। देह आपकी नहीं है। बाप को दे दिया तो बाप की हुई। जब आपका निजी बन्धन, मेरा शरीर या मेरी देह यह बन्धन समाप्त हुआ। मेरी देह कहेंगे क्या, आपका अधिकार है? दी हुई वस्तु पर आपका अधिकार कैसे हुआ? दे दी है वा रख ली है? कहना तेरा और मानना मेरा यह तो नहीं है ना! जब तेरा कहा तो मेरे-पन का बन्धन समाप्त हो गया। यह हद का मेरा, यही मोह का धागा है। धागा कहो, जंजीर कहो, रस्सी कहो, यह बन्धन में बांधता है। जब सब कुछ आपका है यह सम्बन्ध जोड़ लिया तो बन्धन समाप्त हो सम्बन्ध बन जाता है। किसी भी प्रकार का बन्धन चाहे देह का, स्वभाव का, संस्कार का, मन के झुकाव का यह बन्धन सिद्ध करता है बाप से सर्व सम्बन्ध की, सदा के सम्बन्ध की कमज़ोरी है। कई बच्चे सदा और सर्व सम्बन्ध में बन्धन मुक्त रहते। और कई बच्चे समय प्रमाण मतलब से सम्बन्ध जोड़ते हैं। इसलिए ब्राह्मण जीवन का अलौकिक रूहानी मजा पाने से वंचित रह जाते हैं। न स्वयं, स्वयं से सन्तुष्ट और न दूसरों से सन्तुष्टता का आशीर्वाद ले सकते। ब्राह्मण जीवन श्रेष्ठ सम्बन्धों का जीवन है ही - बाप और सर्व ब्राह्मण परिवार का आशीर्वाद लेने का जीवन। आशीर्वाद अर्थात् शुभ भावनायें, शुभ कामनायें। आप ब्राह्मणों का जन्म ही बापदादा की आशीर्वाद कहो, वरदान कहो इसी आधार से हुआ है। बाप ने कहा - आप भाग्यवान, श्रेष्ठ विशेष आत्मा हो। इसी स्मृति रूपी आशीर्वाद वा वरदान से शुभ भावना, शुभ कामना से आप ब्राह्मणों का नया जीवन, नया जन्म हुआ है। सदा आशीर्वाद लेते रहना। यही संगमयुग की विशेषता है! लेकिन इन सबका आधार - सर्व श्रेष्ठ सम्बन्ध है। सम्बन्ध मेरे-मेरे की जंजीरों को, बन्धन को सेकण्ड में समाप्त कर देता है। और सम्बन्ध का पहला स्वरूप वो ही सहज बात है बाप भी बिन्दु मैं भी बिन्दु और सर्व आत्मायें भी बिन्दु। तो बिन्दु का ही हिसाब हुआ ना। इसी बिन्दु में ज्ञान का सिन्धु समाया हुआ है। दुनिया के हिसाब में भी बिन्दु 10 को 100 बना देता और 100 को हजार बना देता है। बिन्दु बढ़ाते जाओ और संख्या बढ़ाते जाओ। तो महत्व किसका हुआ? बिन्दु का हुआ ना। ऐसे ब्राह्मण जीवन में सर्व प्राप्ति का आधार बिन्दु है।

अनपढ़ भी बिन्दु समझ सकते हैं ना! कोई कितना भी व्यस्त हो तन्दरूस्त न हो, बुद्धि कमज़ोर हो लेकिन बिन्दु का हिसाब सब जान सकते। मातायें भी हिसाब में तो होशियार होती हैं ना। तो बिन्दु का हिसाब सदा याद रहे! अच्छा-

सर्व स्थानों से अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा भी सभी बच्चों को अपने भाग्य बनाने की मुबारक देते हैं। अपने घर में आये हैं। यही अपना घर दाता का घर है। अपना घर आत्मा और शरीर को आराम देने का घर है। आराम मिल रहा है ना! डबल प्राप्ति है। आराम भी मिलता, राम भी मिलता। तो डबल प्राप्ति हो गई ना! बाप के घर का बच्चे शृंगार हैं। बापदादा घर के शृंगार बच्चों को देख रहे हैं। अच्छा-

सदा सर्व सम्बन्ध द्वारा बन्धन मुक्त, कर्मातीत स्थिति का अनुभव करने वाले, सदा बिन्दु के महत्व को जान महान बनने वाले, सदा सर्व आत्माओं द्वारा सन्तुष्टता की शुभ भावना, शुभ कामना की आशीर्वाद लेने वाले, सर्व को ऐसी आशीर्वाद देने वाले, सदा स्वयं को साक्षी समझ निमित्त भाव से कर्म करने वाले, ऐसे सदा अलौकिक रूहानी मौज मनाने वाले, सदा मजे की जीवन में रहने वाले, बोझ को समाप्त करने वाले, ऐसे सदा भाग्यवान आत्माओं को भाग्य विधाता बाप की याद प्यार और नमस्ते।’’

दादियों से:- समय तीव्रगति से जा रहा है। जैसे समय तीव्रगति से चलता जा रहा है - ऐसे सर्व ब्राह्मण तीव्रगति से उड़ते हैं। इतने हल्के डबल लाइट बने हैं? अभी विशेष उड़ाने की सेवा है। ऐसे उड़ाती हो? किस विधि से सबको उड़ाना है? क्लास सुनते-सुनते क्लास कराने वाले बन गये। जो भी विषय आप शुरू करेंगे उसके पहले उस विषय की पाइंटस सबसे पास होंगी। तो कौन-सी विधि से उड़ाना है इसका प्लैन बनाया है? अभी विधि चाहिए हल्के बनाने की। यह बोझ ही नीचे ऊपर लाता है। किसको कोई बोझ है किसको कोई बोझ है। चाहे स्वयं के संस्कारों का बोझ, चाहे संगठन का... लेकिन बोझ उड़ने नहीं देगा। अभी कोई उड़ते भी हैं तो दूसरे के जोर से। लेकिन दूसरे के जोर से उड़ने वाले कितना समय उड़ेंगे? जैसे खिलौना होता है उसको उड़ाते हैं, फिर क्या होता? उड़कर नीचे आ जाता। उड़ता जरूर है लेकिन सदा नहीं उड़ता। अभी जब सर्व ब्राह्मण आत्मायें उड़ें तब और आत्माओं को उड़ाएं बाप के नज़दीक पहुँचा सकें। अभी तो उड़ाने के सिवाए, उड़ने के सिवाए और कोई विधि नहीं है। उड़ने की गति ही विधि है। कार्य कितना है और समय कितना है?

47 वर्ष में एक डेढ़ लाख ब्राह्मण हुए हैं। लेकिन कम से कम 9 लाख तो पहले चाहिए। ऐसे तो संख्या ज्यादा होगी लेकिन सारे विश्व पर राज्य करेंगे तो कम से कम 9 लाख तो हों। समय प्रमाण श्रेष्ठ विधि चाहिए। श्रेष्ठ विधि है ही उड़ाने की विधि। उसका प्लैन बनओ। छोटे-छोटे संगठन तैयार करो। कितने वर्ष अव्यक्त पार्ट को भी हो गया! साकार पालना, अव्यक्त पालना कितना समय बीत गया। अभी कुछ नवीनता करनी है ना। प्लैन बनाओ। 84 में कम से कम 84 का चक्र तो पूरा हो। उड़ने और नीचे आने का चक्र तो पूरा हो। 84 जन्म हैं, 84 का चक्र गाया हुआ है। 84 में जब यह चक्र पूरा होगा तब स्वदर्शन चक्र दूर से आत्माओं को समीप लायेगा। यादगार में क्या दिखाते हैं? एक जगह पर बैठे चक्र भेजा और वह स्वदर्शन चक्र स्वयं ही आत्माओं को समीप ले आया। स्वयं नहीं जाते। चक्र चलाते हैं। तो पहले यह चक्र पूरे हों तब तो स्वदर्शन चक्र चलें। तो अभी 84 में यह विधि अपनाओ जो सब हद के चक्र समाप्त हों ऐसे ही सोचा है ना। अच्छा-

टीचर्स से

टीचर्स तो हैं ही उड़ती कला वाली! निमित्त बना - यही उड़ती कला का साधन है। तो निमित्त बने हो अर्थात् ड्रामा अनुसार उड़ती कला का साधन मिला हुआ है। इसी विधि द्वारा सदा सिद्धि को पाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। निमित्त बनना ही लिफ्ट है। तो लिफ्ट द्वारा सेकण्ड में पहुँचने वाले उड़ती कला वाले हुए। चढ़ती कला वाले नहीं। हिलने वाले नहीं लेकिन हिलाने से बचाने वाले। आग की सेक में आने वाले नहीं लेकिन आग बुझाने वाले। तो निमित्त की विधि से सिद्धि को प्राप्त करो। टीचर्स का अर्थ ही है - निमित्त भाव। यह निमित्त भाव ही सर्व फल की प्राप्ति स्वत: कराता है। अच्छा-



04-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


संगमयुग की श्रेष्ठ वेला श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर बनाने की वेला

देश विदेश से आये, सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने के पुरुषार्थी बच्चों प्रति अव्यक्त बापदादा बोले:-

‘‘आप बापदादा हरेक ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्मा के श्रेष्ठ जीवन के जन्म की वेला, तकदीर की रेखा देख रहे थे। जन्म की वेला सभी बच्चें की श्रेष्ठ हैं क्योंकि अभी युग ही पुरूषोत्तम श्रेष्ठ है। श्रेष्ठ संगमयुग पर अर्थात् श्रेष्ठ वेला में सभी का श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म हुआ। जन्म वेला सभी की श्रेष्ठ है। तकदीर की रेखा, तकदीर भी सभी ब्राह्मणों की श्रेष्ठ है। क्योंकि श्रेष्ठ बाप के शिव वंशी ब्रह्माकुमार वा कुमारी हैं। तो श्रेष्ठ बाप, श्रेष्ठ जन्म, श्रेष्ठ वर्सा, श्रेष्ठ परिवार, श्रेष्ठ खज़ाने - यह तकदीर की लकीर जन्म से सभी की श्रेष्ठ है। वेला भी श्रेष्ठ और प्राप्ति के कारण तकदीर की लकीर भी श्रेष्ठ है। यह तकदीर सभी बच्चों को एक बाप द्वारा एक जैसी प्राप्त है। इसमें अन्तर नहीं है। फिर भी एक जैसी तकदीर प्राप्त होते भी नम्बरवार क्यों? बाप एक, जन्म एक, वर्सा एक, परिवार एक, वेला भी एक संगमयुग, फिर नम्बर क्यों? सर्व प्राप्ति अर्थात् तकदीर सभी को बेहद की मिली है। अन्तर क्या हुआ? बेहद की तकदरी को जीवन के कर्म की तस्वीर में लाना इसमें यथा शक्ति होने के कारण अन्तर पड़ जाता है। ब्राह्मण जीवन अर्थात् तकदीर को तस्वीर में लाना, जीवन में लाना। हर कर्म में लाना, हर संकल्प से, बोल से, कर्म से तकदीरवान को तकदीर अनुभव हो अर्थात् दिखाई दे। ब्राह्मण अर्थात् तकदीरवान आत्मा के नयन, मस्तक, मुख की मुस्कराहट हर कदम सभी को श्रेष्ठ तकदीर की अनुभूति करावे। इसको कहा जाता है - तकदीर की तस्वीर बनाना। तकदीर को अनुभव की कलम से, कर्म के कागज के तस्वीर में लाना। तकदीर के तस्वीर की चित्र रेखा बनाना। तस्वीर तो सभी बना रहे हो लेकिन किसकी तस्वीर सम्पन्न है और किसकी तस्वीर कुछ न कुछ किसी बात में कम रह जाती है। अर्थात् प्रैक्टिकल जीवन में लाने में किसकी मस्तक रेखा अर्थात् मंसा, नयन रेखा अर्थात् रूहानी दृष्टि, मुख की मुस्कराहट की रेखा अर्थात् सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप सन्तुष्ट आत्मा। सन्तुष्टता ही मुस्कराहट की रेखा है। हाथों की रेखा अर्थात् श्रेष्ठ कर्म की रेखा। पांव की रेखा अर्थात् हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने की शक्ति। इसी प्रकार तकदीर की तस्वीर बनाने में किसका किस में, किसका किस में अन्तर पड़ जाता है। जैसे स्थूल तस्वीर भी बनाते हैं तो कोई को नैन नहीं बनाने आते, कोई को टांग नहीं बनाने आती। कोई मुस्कराहट नहीं बना सकते। तो फर्क पड़ जाता है ना। जितना सम्पन्न चित्र उतना मूल्यवान होता है। वो ही एक का चित्र लाखों का मूल्य कमाता और कोई 100 भी कमाता। तो अन्तर किस बात का हुआ? सम्पन्नता का। ऐसे ही ब्राह्मण आत्मायें भी सर्व रेखाओं में सम्पन्न न होने कारण किसी एक रेखा, दो रेखा की सम्पूर्णता न होने कारण नम्बरवार हो जाते हैं।

तो आज तकदीरवान बच्चों की तस्वीर देख रहे थे। जैसे स्थूल तकदीर में भी भिन्न-भिन्न तकदीर होती है। वैसे यहाँ तकदीर की भिन्न-भिन्न तस्वीरें देखी। हर तस्वीर में मुख्य मस्तक और नयन तस्वीर की वैल्यु बढ़ाते हैं। वैसे यहाँ भी मंसा वृत्ति की शक्ति और नयन के रूहानी दृष्टि की शक्ति, इसका ही महत्व होता। यही तस्वीर का फाउन्डेशन हैं। सभी अपनी तस्वीर को देखो कि हमारी तस्वीर कितनी सम्पन्न बनी है। ऐसी तस्वीर बनी है जो तस्वीर में तकदीर बनाने वाला दिखाई दे। हर एक रेखा को चेक करो। इसी कारण नम्बर हो जाता है। समझा।

दाता एक है, देता भी एक जैसा है। लेकिन बनाने वाले बनाने में नम्बरवार हो जाते। कोई अष्ट और ईष्ट देव बन जाते। कोई देव बन जाते। कोई देवों को देख-देख हर्षित होने वाले हो जाते। अपना चित्र देख लिया ना! अच्छा-

साकार रूप में मिलने में तो समय और संख्या को देखना पड़ता। और अव्यक्त मिलन में समय और संख्या की बात नहीं है। अव्यक्त मिलन के अनुभवी बन जायेंगे तो अव्यक्त मिलन के विचित्र अनुभव सदा करते रहेंगे। बापदादा बच्चों के सदा आज्ञाकारी हैं। इसलिए अव्यक्त होते भी व्यक्त में आना पड़ता है। लेकिन बनना क्या है? अव्यक्त बनना है ना या व्यक्त में आना है? अव्यक्त बनो। अव्यक्त बनने से बाप के साथ निराकार बन घर में चलेंगे। अभी वाया की स्टेज तक नहीं पहुँचे हो। फरिश्ता स्वरूप से निराकार बन घर जा सकेंगे। तो अभी फरिश्ता स्वरूप बने हो! तकदीर की तस्वीर सम्पन्न की है? सम्पन्न तस्वीर ही फरिश्ता है। अच्छा-

सभी आये हुए भिन्न-भिन्न जोन के बच्चों को हर एक जोन की विशेषता सहित बापदादा देख-देख हर्षित हो रहे हैं। कोई भाषा भले नहीं जानते लेकिन प्रेम और भावना की भाषा जानने में होशियार हैं। और कुछ नहीं जानते लेकिन मुरली की भाषा जानते हैं। प्रेम और भावना से न समझने वाले भी समझ जाते हैं। बंगार बिहार तो सदा बहारी मौसम में रहते। सदा बहार है।

पंजाब है ही सदा सभी को हरा भरा करने वाला। पंजाब में खेती अच्छी होती है। हरियाणा तो है ही हरा भरा। पंजाब हरियाणा सदा हरियाली से हरा भरा है। जहाँ हरियाली होती है उस स्थान को सदा कुशल, श्रेष्ठ स्थान कहा जाता है। पंजाब हरियाणा सदा खुशी में हरा भरा है। इसलिए बापदादा भी देख-देख हर्षित होते हैं। राजस्थान की क्या विशेषता है? राजस्थान चित्र रेखा में प्रसिद्ध है। राजस्थान की तस्वीरें बहुत मूल्यवान होती हैं। क्योंकि राजे बहुत हुए हैं ना। तो राजस्थान तकदीर की तस्वीरें सबसे ज्यादा मूल्यवान बनाने वाले हैं। चित्रों की रेखा में सदा श्रेष्ठ हैं। गुजरात की क्या विशेषता है? वहाँ आइनों का श्रृंगार ज्यादा होता है। तो गुजरात दर्पण है। दर्पण कहो, आइना कहो। जिसमें बाप की मूर्त देखी जाए। आइने में शक्ल देखते हैं ना। तो गुजरात के दर्पण द्वारा बाप की तस्वीर फरिश्ता स्वरूप की तस्वीर सभी को दिखाने की विशेषता है। तो गुजरात की विशेषता है बाप को प्रत्यक्ष करने वाले दर्पण। बाकी छोटा-सा तामिलनाडु रह गया। छोटा ही कमाल करता है। बड़ा कार्य करके दिखाता है। तामिलनाडु क्या करेंगे? वहाँ मन्दिर बहुत हैं। मन्दिरों में नाद बजीते हैं। तामिलनाडु की विशेषता है - नगाड़ा बजाए बाप की प्रत्यक्षता का आवाज़ बुलन्द करना। अच्छी विशेषता है। छोटे-पन में भी नाद बजाते हैं। भक्त लोग भी बड़े प्यार से नाद बजाते हैं। और बच्चे भी प्यार से बजाते हैं। अब हरेक स्थान अपनी विशेषता को प्रत्यक्ष स्वरूप में लाओ। सभी जोन वालों से मिल लिया ना! आखिर तो ऐसा ही मिलना होगा। पुराने बच्चे कहते हैं हमको क्यों नहीं बुलाते। प्रजा भी बनाते, बढ़ाते भी रहते। तो पुरानों को नये-नयें को चांस देना पड़े तब तो संख्या बढ़े। पुरानें भी पुरानी चाल से चलते रहें तो नयों का क्या होगा! पुराने हैं दाता, देने वाले और नये हैं लेने वाले। तो चांस देना हैं इसमें दाता बनना पड़े। साकार मिलन में सब हद आ जाती हैं। अव्यक्त मिलन में कोई हद नहीं। कई कहते हैं संख्या बढ़ेगी फिर क्या होगा! साकार मिलन की विधि भी तो बदलेगी। जब संख्या बढ़ती हैं तो कुछ दान-पुण्य भी करना होता है। अच्छा-

सभी देश विदेश के चारों ओर के स्नेही बच्चों के स्नेह के दिल के आवाज़, खुशी के गीत और दिल के समाचार के पत्रों के रेसपान्ड में बापदादा सभी बच्चों को पदमगुणा यादप्यार के साथ रेसपान्ड दे रहे हैं कि सदा याद से अमर भव के वरदानी बन बढ़ते चलो और बढ़ाते चलो। सभी उमंग उत्साह में रहने वाले बच्चों को बापदादा स्व उन्नति और सेवा की उन्नति के लिए मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो। सदा साथ हो। सदा सम्पन्न और सम्पूर्ण हो, ऐसे सर्व वरदानी बच्चों को बापदादा फिर से यादप्यार दे रहे हैं। यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से

सदा स्वयं को बाप समान सम्पन्न आत्मा समझते हो! जो सम्पन्न है वह सदा आगे बढ़ते रहेंगे। सम्पन्नता नहीं तो आगे नहीं बढ़ सकते। तो जैसे बाप वैसे बच्चे। बाप सागर है बच्च्ो मास्टर सागर हैं। हर गुण को चेक करो- जैसे बाप ज्ञान का सागर है तो हम मास्टर ज्ञान सागर हैं। बाप प्रेम का सागर है तो हम मास्टर प्रेम के सागर हैं। ऐसे समानता को चेक करो तब बाप समान सम्पन्न बन सदा आगे बढ़ते जायेंगे। समझा- सदा ऐसी चेकिंग करते चलो। सदा इसी खुशी में रहो कि जिसको विश्व ढूंढता है, उसने हमको अपना बनाया है।



08-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


संगमयुग पर प्राप्त अधिकारों से विश्व-राज्य अधिकारी

ज्ञान सूर्य शिवबाबा अपने सफलता के सितारों के प्रति बोले:-

बापदादा आज स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं की दिव्य दरबार देख रहे हैं। विश्व राज्य दरबार और स्वराज्य दोनों ही दरबार अधिकारी आप श्रेष्ठ आत्मायें बनती हो। स्वराज्य अधिकारी ही विश्व-राज्य अधिकारी बनते हैं। यह डबल नशा सदा रहता है? बाप का बनना अर्थात् अनेक अधिकार प्राप्त करना। कितने प्रकार के अधिकार प्राप्त किये हैं, जानते हो? अधिकार-माला को याद करो। पहला अधिकार - परमात्म बच्चे बने अर्थात् सर्वश्रेष्ठ माननीय पूज्यनीय आत्मा बनने का अधिकार पाया। बाप के बच्चे बनने के सिवाए पूज्यनीय आत्मा बनने का अधिकार प्राप्त हो नहीं सकता। तो पहला अधिकार - पूज्यनीय आत्मा बने। दूसरा अधिकार - ज्ञान के खज़ानों के मालिक बने अर्थात् अधिकारी बने। तीसरा अधिकार - सर्व शक्तियों के प्राप्ति के अधिकारी बने। चौथा अधिकार - सर्व कर्मेन्द्रियों-जीत स्वराज्य अधिकारी बने। इस सर्व अधिकारों द्वारा मायाजीत सो जगत जीत विश्व-राज्य अधिकारी बनते। तो अपने इन सर्व अधिकारों को सदा स्मृति में रखते हुए समर्थ आत्मा बन जाते। समर्थ बने हो ना!

स्वराज्य वा विश्व का राज्य प्राप्त करने के लिए विशेष 3 बातों की धारणा द्वारा ही सफलता प्राप्त की है। कोई भी श्रेष्ठ कार्य की सफलता का आधार, त्याग, तपस्या और सेवा है। इन तीनों बातों के आधार पर सफलता होगी वा नहीं होगी यह क्वेश्चन नहीं उठ सकता। जहाँ तीनों बातों की धारणा है वहाँ सेकण्ड में सफला है ही है। हुई पड़ी है। त्याग किस बात का? सिर्फ एक बात का त्याग - सर्व त्याग सहज और स्वत: कराता है। वह एक त्याग है - देह भान का त्याग, हद के मैं-पन का त्याग सहज करा देता है। यह हद का मैं-पन’ - तपस्या और सेवा से वंचित करा देता है। जहाँ हद का मै-पनहैं वहाँ त्याग, तपस्या और सेवा हो नहीं सकती। हद का मैं-पन, मेरा-पन, इस एक बात का त्याग चाहिए। मैं और मेरासमाप्त हो गया तो बाकी क्या रहा? बेहद का। मैंएक शुद्ध आत्मा हूँ और मेरा तो एक बाप दूसरा न कोई। मेरा तो एक बाप। तो जहाँ बेहद का बाप सर्वशक्तिवान हैं, वहाँ सफलता सदा साथ है। इसी त्याग द्वारा तपस्या भी सिद्ध हो गई ना। तपस्या क्या है? - मैं एक का हूँ। एक की श्रेष्ठ मत पर चलने वाला हूँ। इसी से एकरस स्थिति स्वत: हो जाती है। सदा एक परमात्म-स्मृति - ये ही तपस्या है। एकरस स्थिति ये ही श्रेष्ठ आसन है। कमल पुष्प समान स्थिति यही तपस्या का आसन है। त्याग से तपस्या भी स्वत: ही सिद्ध हो जाती है। जब त्याग और तपस्या स्वरूप बन गये तो क्या करेंगे? अपने पन का त्याग अथवा मैं-पन समाप्त हो गया। एक की लगन में मगन तपस्वी बन गये तो सेवा के सिवाए रह नहीं सकते। यह हद का मैं और मेरासच्ची सेवा करने नहीं देता। त्यागी और तपस्वी मूर्त सच्चे सेवाधारी हैं। मैंने यह किया, मैं ऐसा हूँ, यह देह का भान जरा भी आया तो सेवाधारी के बदले क्या बन जाते? सिर्फ नामधारी सेवाधारी बन जाते। सच्चे सेवाधारी नहीं बनते। सच्ची सेवा का फाउण्डेशन है - त्याग और तपस्या। ऐसे त्यागी तपस्वी सेवाधारी सदा सफलता स्वरूप हैं। विजय, सफलता उनके गले की माला बन जाती है। जन्म सिद्ध अधिकारी बन जाता। बापदादा विश्व के सर्व बच्चों को यही श्रेष्ठ शिक्षा देते हैं कि - त्यागी बनो, तपस्वी बनो, सच्चे सेवाधारी बनो

आज का संसार मृत्यु के भय का संसार है। (आँधी-तूफान आया) प्रकृति की हलचल में आप तो अचल हो ना! तमोगुणी प्रकृति का काम है हलचल करना और आप अचल आत्माओं का कार्य है - प्रकृति को भी परिवर्तन करना। नथिंग न्यू। यह सब तो होना ही है। हलचल में ही तो अचल बनेंगे। तो स्वराज्य अधिकारी दरबार निवासी श्रेष्ठ आत्माओं ने समझा! यह भी राज्य दरबार है ना। राजयोगी अर्थात् स्व के राजे। राजयोगी दरबार अर्थात् स्वराज्य दरबार। आप सभी भी राजनेता बन गये ना। वह हैं देश के राजनेता और आप हो स्वराज्य-नेता। नेता अर्थात् नीति प्रमाण चलने वाले। तो आप धर्मनीति, स्वराज्य नीति प्रमाण चलने वाले स्वराज्य नेता हो। यथार्थ श्रेष्ठ नीति अर्थात् श्रीमत। श्रीमतही यथार्थ नीति है। इस नीति पर चलने वाले सफल नेता हैं।

बापदादा देश के नेताओं को मुबारक देते हैं। क्योंकि फिर भी मेहनत तो करते हो ना। भल वैराइटी हैं। फिर भी देश के प्रति लगन है। हमारा राज्य अमर रहे - इस लगन से मेहनत तो करते हैं ना। हमारा भारत ऊँचा रहे। यह लगन स्वत: ही मेहनत कराती है। अब समय आयेगा जब राज्य-सत्ता और धर्म-सत्ता दोनों साथ होंगी। तब विश्व में भारत की जय-जयकार होगी। भारत ही लाइट हाउस होगा। भारत की तरफ सबकी दृष्टि होगी। भारत को ही विश्व प्रेरणा-पुंज अनुभव करेगा। भारत अविनाशी खण्ड है। अविनाशी बाप की अवतरण भूमि है। इसलिए भारत का महत्व सदा महान है। अच्छा-

सभी अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा सभी बच्चों को आने की बधाई दे रहे हैं। भले पधारे। बाप के घर के श्रृंगार भले पधारे। अच्छा-

सभी सफलता के सितारों को, सदा एकरस स्थिति के आसन पर स्थित रहने वाले तपस्वी बच्चों को, सदा एक परमात्म श्रेष्ठ याद में रहने वाली महान आत्माओं को, श्रेष्ठ भावना श्रेष्ठ कामना करने वाले विश्व कल्याणकारी सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री भ्राता माधव सिंह सोलंकी से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

बाप के घर में वा अपने घर में भले आये। बाप जानते हैं कि सेवा में लगन अच्छी है। कोटों में कोई ऐसे सेवाधारी है। इसलिए सेवा की मेहनत की आन्तरिक खुशी प्रत्यक्षफल के रूप में सदा मिलती रहेगी। यह मेहनत सफलता का आधार है। अगर सभी निमित्त सेवाधारी मेहनत को अपनायें तो भारत का राज्य सदा ही सफलता को पाता रहेगा। सफलता तो मिलनी ही है। यह तो निश्चित है लेकिन जो निमित्त बनता है, निमित्त बनने वाले को सेवा का प्रत्यक्षफल और भविष्य फल प्राप्त होता है। तो सेवा के निमित्त हो। निमित्त-भाव रख सदा सेवा में आगे बढ़ते चलो। जहाँ निमित्तभाव है, मैं-पन का भाव नहीं है वहाँ सदा उन्नति को पाते रहेंगे। यह निमित्त-भाव शुभ-भावना, शुभ-कामना स्वत: जागृत करता है। आज शुभ-भावना, शुभ-कामना नहीं है उसका कारण निमित्त-भाव के बजाए मैं-पन आ गया है। अगर निमित्त् समझें तो करावनहार बाप को समझें। करन करावनहार स्वामी सदा ही श्रेष्ठ करायेंगे। ट्रस्टीपन के बाजए राज्य की प्रवृत्ति के गृहस्थी बन गये हैं, गृहस्थी में बोझ होता है और ट्रस्टी पन में हल्कापन होता है। जब तक हल्के नहीं तो निर्णय शक्ति भी नहीं है। ट्रस्टी हैं, हल्के हैं तो निर्णय शक्ति श्रेष्ठ है। इसलिए सदा ट्रस्टी हैं, निमित्त हैं, यह भावना फलदायक है। भावना का फल मिलता है। तो यह निमित्त-पन की भावना सदा श्रेष्ठ फल देती रहेगी। तो सभी साथियों को यह स्मृति दिलाओं कि निमित्त-भाव, ट्रस्टी-पन का भाव रखो। तो यह राजनीति विश्व के लिए श्रेष्ठ नीति हो जायेगी। सारा विश्व इस भारत की राजनीति को कापी करेगा। लेकिन इसका आधार ट्रस्टीपन अर्थात् - निमित्त-भाव।

कुमारों से

कुमार अर्थात् सर्व शक्तियों को, सर्व खज़ानों को जमा कर औरों को भी शक्तिवान बनाने की सेवा करने वाले। सदा इसी सेवा में बिजी रहते हो ना। बिजी रहेंगे तो उन्नति होती रहेगी। अगर थोड़ा भी फ्री होंगे तो व्यर्थ चलेगा। समर्थ रहने के लिए बिजी रहो। अपना टाइम-टेबल बनाओ। जैसे शरीर का टाइम-टेबल बनाते हैं ऐसे बुद्धि का भी टाइम-टेबल बनाओ। बुद्धि से बिजी रहने का प्लैन बनाओ। तो बिजी रहने से सदा उन्नति को पाते रहेंगे। आजकल के समय प्रमाण कुमार जीवन में श्रेष्ठ बनना बहुत बड़ा भाग्य है। हम श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा हैं, यही सदा सोचो। याद और सेवा का सदा बैलेन्स रहे। बैलेन्स रखने वालों को सदा ब्लैसिंग मिलती रहेगी। अच्छा-



10-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


प्रभु प्यार - ब्राह्मण जीवन का आधार

प्यार के सागर शिवबाबा, प्रभु प्यार की पालना में रहने वाले श्रेष्ठ आत्माओं प्रति बोले

‘‘आप सभी स्नेही सहयोगी, सहजयोगी आत्माओं को देख रहे हैं। योगी आत्मायें तो सभी हैं। ऐसे ही कहेंगे कि यह योगियों की सभा है। सभी योगी तू आत्मायें अर्थात् प्रभु प्रिय आत्मायें बैठी हैं। जो प्रभु को प्रिय लगती हैं वह विश्व की प्रिय बनती ही हैं। सभी को यह रूहानी नशा, रूहानी रूहाब, रूहानी फखर सदा रहता है कि हम परमात्म-प्यारे, भगवान के प्यारे, जगत के प्यारे बन गये। सिर्फ एक आधी घड़ी की नजर वा दृष्टि पड़ जाए, भक्त लोग इसके प्यासे रहते हैं। और इसी को महानता समझते हैं। लेकिन आप ईश्वरीय प्यार के पात्र बन गये। यह कितना महान भाग्य है। आज हर आत्मा बचपन से मृत्यु तक क्या चाहती है? बेसमझ बच्चे भी जीवन में प्यार चाहता है। पैसा पीछे चाहता लेकिन पहले प्यार चाहता। प्यार नहीं तो जीवन, निराशा को जीवन अनुभव करते, बेरस अनुभव करते हैं। लेकिन आप सर्व आत्माओं को परमात्म प्यार मिला, परमात्मा के प्यारे बने। इससे बड़ी वस्तु और कुछ है? प्यार है तो जहान है, जान है। प्यार नहीं तो बेजान, बेजहान हैं। प्यार मिला अर्थात् जहान मिला। ऐसा प्यार, श्रेष्ठ भाग्य अनुभव करते हो? दुनिया इसकी प्यासी है। एक बूँद की प्यासी है और आप बच्चों का यह प्रभु प्यार प्रापर्टी है। इसी प्रभु प्यार से पलते हो। अर्थात् ब्राह्मण जीवन में आगे बढ़ते हो। ऐसा अनुभव करते हो? प्यार के सागर में लवलीन रहते हो? वा सिर्फ सुनते वा जानते हो? अर्थात् सागर के किनारे पर खड़े-खड़े सिर्फ सोचते और देखते रहते हो! सिर्फ सुनना और जानना यह है किनारे पर खड़ा होना। मानना और समा जाना यह है प्रेम के सागर में लवलीन होना। प्रभु के प्यारे बनकर भी सागर में समा जाना, लीन हो जाना यह अनुभव नहीं किया तो प्रभु प्यार के पात्र बन करके पाने वाले नहीं लेकिन प्यासे रह गये। पास आते भी प्यासे रह जाना इसको क्या कहेंगे? सोचो किसने अपना बनाया! किसके प्यारे बने! किसकी पालना में पल रहे हैं? तो क्या होगा? सदा स्नेह में समाये हुए होने कारण समस्यायें वा किसी भी प्रकार की हलचल का प्रभाव पड़ नहीं सकता। सदा विघ्न-विनाशक, समाधान स्वरूप, मायाजीत अनुभव करेंगें।

कई बच्चे कहते हैं- ज्ञान की गुह्य बातें याद नहीं रहतीं। लेकिन एक बात यह याद रहती है कि मैं परमात्मा का प्यारा हूँ, परमात्म-प्यार का अधिकारी हुँ। इसी एक स्मृति से भी सदा समर्थ बन जायेंगे। यह तो सहज है ना। यह भी भूल जाता फिर तो भूल भुलैया में फँस गये। सिर्फ यह एक बात सर्व प्राप्ति के अधिकारी बनाने वाली है। तो सदैव यही याद रखो, अनुभव करो कि मैं प्रभु का प्यारा जग का प्यारा हूँ। समझा! यह तो सहज है ना। अच्छा - सुना तो बहुत है, अब समाना है। समाना ही समान बनना है। समझा!

सभी प्रभु प्यार के पात्र बच्चों को, सभी स्नेह में समाए हुए श्रेष्ठ आत्माओं को, सभी प्यार की पालना के अधिकारी बच्चों को, रूहानी फखर में रहने वाली, रूहानी नशे में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सभी सहज योगी आत्मायें हो ना! सर्व सम्बन्ध से याद सहज योगी बना देती है। जहाँ सम्बन्ध है वहाँ सहज है। मैं सहजयोगी आत्मा हूँ, यह स्मृति सर्व समस्याओं को सहज ही समाप्त करा देती है। क्योंकि सहजयोगी अर्थात् सदा बाप का साथ है। जहाँ सर्व शक्तिवान बाप साथ है, सर्व शक्तियाँ साथ हैं तो समस्या समाधान के रूप में बदल जायेगी। कोई भी समस्या बाप जाने, समस्या जाने। ऐसे सम्बन्ध के अधिकार से समस्या समाप्त हो जायेगी। मैं क्या करूँ! नहीं। बाप जाने समस्या जाने। मैं न्यारा और बाप का प्यारा हूँ। तो सब बोझ बाप का हो जायेगा और आप हल्के जो जायेंगे। जब स्वयं हल्के बन जाते तो सब बातें भी हल्की हो जाती हैं। जरा भी सोच चलता तो भारी हो जाते और बातें भी भारी हो जातीं। इसलिए मैं हल्का हूँ, न्यारा हूँ तो सब बातें भी हल्की हैं। यही विधि हैं, इसी विधि से सिद्धि प्राप्त होगी। पिछला हिसाब-किताब चुक्तू होते हुए भी बोझ अनुभव नहीं होगा। ऐसे साक्षी होकर देखेंगे तो जैसे पिछला खत्म हो रहा है और वर्तमान की शक्ति से साक्षी हो देख रहे हैं। जमा भी हो रहा है और चुक्तू भी हो रहा है। जमा की शक्ति से चुक्तू का बोझ नहीं। तो सदा वर्तमान को याद रखो। जब एक तरफ भारी होता तो दूसरा स्वत: हल्का हो जाता। तो वर्तमान भारी है तो पिछला हल्का हो जायेगा ना। वर्तमान प्राप्ति का स्वरूप सदा स्मृति में रखो तो सब हल्का हो जायेगा। तो पिछले हिसाब को हल्का करने का साधन है - वर्तमान को शक्तिशाली बनाओ। वर्तमान है ही शक्तिशाली। वर्तमान की प्राप्ति को सामने रखेंगे तो सब सहज हो जायेगा। पिछला सूली को काँटा हो जायेगा। क्या है, क्यों है! नहीं। पिछला है। पिछले को क्या देखना। जहाँ लगन है वहाँ विघ्न भारी नहीं लगता। खेल लगता है। वर्तमान की खुशी की दुआ से और दवा से सब हिसाब-किताब चुक्तू करो।

टीचर्स से

सदा हर कदम में सफलता अनुभव करने वाली हो ना! अनुभवी आत्मायें हो ना! अनुभव ही सबसे बड़ी अथार्टी है। अनुभव की अथार्टी वाले हर कदम में हर कार्य में सफल हैं ही। सेवा के निमित्त बनने का चांस मिलना भी एक विशेषता की निशानी है। जो चांस मिलता है उसी को आगे बढ़ाते रहो। सदा निमित्त बन आगे बढ़ने और बढ़ाने वाली हैं। यह निमित्त-भावही सफलता को प्राप्त कराता है। निमित्त और निर्मान की विशेषता को सदा साथ रखो। यही विशेषता सदा विशेष बनायेगी। निमित्त बनने का पार्ट स्वयं को भी लिफ्ट देता है। औरों के निमित्त बनना अर्थात् स्वयं सम्पन्न बनना। दृढ़ता से सफलता को प्राप्त करते चलो। सफलता ही है, इसी दृढ़ता से सफलता स्व्यं आगे जायेगी।

जन्मते ही सेवाधारी बनने का गोल्डन चांस मिला है तो बड़े ते बड़ी चांसलर बन गई ना। बचपन से ही सेवाधारी की तकदीर लेकर आई हो। तकदीर जगाकर आई हो। कितनी आत्माओं की श्रेष्ठ तकदीर बनाने के कर्त्तव्य के निमित्त बन गई! तो सदा याद रहे - वाह मेरे श्रेष्ठ तकदीर की श्रेष्ठ लकीर! बाप मिला, सेवा मिली, सेवास्थान मिला और सेवा के साथ-साथ सर्व आत्माओं का श्रेष्ठ परिवार मिला। क्या नहीं मिला! राज्य भाग्य सब मिल गया। यह खुशी सदा रहे। विधि द्वारा सदा वृद्धि को पाते रहो। निमित्त भाव की विधि से सेवा में वृद्धि होती रहेगी।

कुमारों से

कुमार जीवन में बच जाना यह सबसे बड़ा भाग्य है। कितने झंझटों से बच गये! कुमार अर्थात् बन्धमुक्त आत्मायें। कुमार जीवन बन्धनमुक्त जीवन है। लेकिन कुमार जीवन में भी फ्री रहना माना बोझ उठाना। कुमारों के प्रति बापदादा का डायरेक्शन है - लौकिक में रहते अलौकिक सेवा करनी है। लौकिक सेवा सम्पर्क बनाने का साधन है। इसमें बिजी रहो तो अलौकिक सेवा कर सकेंगे। लौकिक में रहते अलौकिक सेवा करो। तो बुद्धि भारी नहीं रहेगी। सबको अपना अनुभव सुनाकर सेवा करो। लौकिक सेवा, सेवा का साधन समझकर करो तो लौकिक साधन बहुत सेवा का चांस दिलायेगा। लक्ष्य ईश्वरीय सेवा का है लेकिन यह साधन है। ऐसे समझकर करो। कुमार अर्थात् हिम्मत वाले। जो चाहो वह कर सकते हैं। इसलिए बापदादा सदा साधनों द्वारा सिद्धि को प्राप्त करने की राय देते हैं। कुमार अर्थात् निरन्तर योगी। क्योंकि कुमारों का संसार ही एक बाप है। जब बाप ही संसार है तो संसार के सिवाए बुद्धि और कहाँ जायेगी। जब एक ही हो गया तो एक की ही याद रहेगी ना! और एक को याद करना बहुत सहज है। अनेकों से तो छूट गये। एक में ही सब समाये हुए हैं! सदा हर कर्म से सेवा करनी है, दृष्टि से, मुख से - सेवा ही सेवा। जिससे प्यार होता है उसे प्रत्यक्ष करने का उमंग होता है। हर कदम में बाप और सेवा सदा साथ रहे। अच्छा-



12-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मण जीवन का फाण्डेशन - पवित्रता

दु:खों से छुड़ाने वाले, धोखों से बचाने वाले, रहमदिल बापदादा बोले:-

आज बापदादा सभी होलीहंसों को देख रहे हैं। हर एक होलीहंस कहाँ तक होली बने हैं, कहाँ तक हंस बने हैं! पवित्रता अर्थात् होली बनने की शक्ति कहाँ तक जीवन में अर्थात् संकल्प, बोल और कर्म में, सम्बन्ध में, सम्पर्क में लाई है। हर संकल्प, होली अर्थात् पवित्रता की शक्ति सम्पन्न है! पवित्रता के संकल्प द्वारा किसी भी अपवित्र संकल्प वाली आत्मा को परख और परिवर्तन कर सकते हो? पवित्रता की शक्ति से किसी भी आत्मा की दृष्टि, वृत्ति और कृति तीनों ही बदल सकते हो। इस महान शक्ति के आगे अपवित्र संकल्प भी वार नहीं कर सकते। लेकिन जब स्वयं संकल्प, बोल वा कर्म में हार खाते हो तब दूसरे व्यक्ति वा वायब्रेशन से हार होती है। किसी के भी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाना यह सिद्ध करता है कि स्वयं बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने में हार खाये हुए हैं। तब किसी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाते हैं। पवित्रता में हार खाना, इसका बीज है किसी भी व्यक्ति वा व्यक्ति के गुण, स्वभाव, व्यक्तित्व वा विशेषता से प्रभावित होना। यह व्यक्ति वा व्यक्त भाव में प्रभावित होना, प्रभावित होना नहीं लेकिन बरबाद होना है। व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषता वा गुण, स्वभाव बाप की दी हुई विशेषता है अर्थात् दाता की देन है। व्यक्ति पर प्रभावित होना यह धोखा खाना है। धोखा खाना अर्थात् दु:ख उठाना। अपवित्रता की शक्ति, मृगतृष्णा समान शक्ति है जो सम्पर्क वा सम्बन्ध से बड़ी अच्छी अनुभव होती है, आकर्षण करती है। समझते हैं कि मैं अच्छाई की तरफ प्रभावित हो रहा हूँ। इसलिए शब्द भी यही बोलते वा सोचते कि यह बहुत अच्छे लगते या अच्छी लगती है वा इसका गुण वा स्वभाव अच्छा लगता है। ज्ञान अच्छा लगता है। योग कराना अच्छा लगता है। इससे शक्ति मिलती है! सहयोग मिलता है, स्नेह मिलता है। अल्पकाल की प्राप्ति होती है लेकिन धोखा खाते हैं। देने वाले दाता अर्थात् बीज को, फाउण्डेशन को खत्म कर दिया और रंग-बिरंगी डाली को पकड़कर झूल रहे हैं तो क्या हाल होगा? सिवाए फाउण्डेशन के डाली झुलायेगी या गिरायेगी? जब तक बीज अर्थात् दाता, विधाता से सर्व सम्बन्ध, सर्व प्राप्ति के रस का अनुभव नहीं तब तक कब व्यक्ति से, कब वैभव से, कब वायब्रेशन- वायुमण्डल आदि भिन्न-भिन्न डालियों से अल्पकाल की प्राप्ति का मृगतृष्णा समान धोखा खाते रहेंगे। यह प्रभावित होना अर्थात् अविनाशी प्राप्ति से वंचित होना। पवित्रता की शक्ति जब चाहो जिस स्थिति को चाहे, जिस प्राप्ति को चाहो, जिस कार्य में सफलता चाहो, वह सब आपके आगे दासी के समान हाजर हो जायेगी। जब कलियुग के अन्त में भी रजोप्रधान पवित्रता की शक्ति धारण करने वाले नामधारी महात्माओं की अब अन्त तक भी प्रकृति दासी होने का प्रमाण देख रहे हो। अब तक भी नाम महात्मा चल रहा है, अब तक भी पूज्य हैं। अपवित्र आत्मायें झुकती हैं। तो सोचो - अन्त तक भी पवित्रता के शक्ति की कितनी महानता है। और परमात्मा द्वारा प्राप्त हुई सतोप्रधान पवित्रता कितनी शक्तिशाली होगी। इस श्रेष्ठ पवित्रता की शक्ति के आगे अपवित्रता झुकी हुई नहीं लेकिन आपके पांव के नीचे हैं। अपवित्रता रूपी आसुरी शक्ति, शक्ति स्वरूप के पांव के नीचे दिखाई हुई है। जो पांव के नीचे हारी हुई है, हार कैसे खिला सकती है।!

ब्राह्मण जीवन और हार खाना इसको कहेंगे नामधारी ब्राह्मण। इसमें अलबेले मत बनो। ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है - पवित्रता की शक्ति। अगर फाउण्डेशन कमज़ोर है तो प्राप्तियों की 21 मंज़िल वाली बिल्डिंग कैसे टिक सकेगी? यदि फाउण्डेशन हिल रहा है तो प्राप्ति का अनुभव सदा नहीं रह सकता अर्थात् अचल नहीं रह सकते। और वर्तमान युग को वा जन्म की महान प्राप्ति का अनुभव भी नहीं कर सकते। युग की, श्रेष्ठ जन्म की महिमा गाने वाले ज्ञानी-भक्त बन जायेंगे। अर्थात् समझ है लेकिन स्वयं नहीं हैं, इसको कहते हैं - ज्ञानी- भक्त। अगर ब्राह्मण बनकर सर्व प्राप्तियों का, सर्व शक्तियों का वरदान या वर्सा अनुभव नहीं किया तो उसको क्या कहेंगे? वंचित आत्मा वा ब्राह्मण आत्मा? इस पवित्रता के भिन्न-भिन्न रूपों को अच्छी तरह से जानों, स्वयं के प्रति कड़ी दृष्टि रखो। चलाओ नहीं। निमित्त बनी हुई आत्माओं को, बाप को भी चलाने की कोशिश करते हैं। यह तो होता ही है, ऐसा कौन बना है! वा कहते हैं - यह अपवित्रता नहीं है, महानता है, यह तो सेवा का साधन है। प्रभावित नहीं हैं, सहयोग लेते हैं। मददगार है इसीलिए प्रभावित हैं। बाप भूला और लगा माया का गोला। या फिर अपने को छुड़ाने के लिए कहते हैं - मैं नहीं करती, यह करते हैं। लेकिन बाप को भूले तो धर्मराज के रूप में ही बाप मिलेगा। बाप का सुख कभी पा नहीं सकेंगे। इसलिए छिपाओ नहीं, चलाओ नहीं। दूसरे को दोषी नहीं बनाओ। मृगतृष्णा के आकर्षण में धोखा नहीं खाओ। इस पवित्रता के फाउण्डेशन में बापदादा धर्मराज द्वारा 100 गुणा, पद्मगुणा दण्ड दिलाता है। इसमें रियायत कभी नहीं हो सकती। इसमें रहमदिल नहीं बन सकते। क्योंकि बाप से नाता तोड़ा तब तो किसी के ऊपर प्रभावित हुए। परमात्म प्रभाव से निकल आत्माओं के प्रभाव में आना अर्थात् बाप को जाना नहीं, पहचाना नहीं। ऐसे के आगे बाप, बाप के रूप में नहीं धर्मराज के रूप में है। जहाँ पाप है वहाँ बाप नहीं। तो अलवेले नहीं बनो। इसको छोटी सी बात नहीं समझो। वह भी किसी के प्रति प्रभावित होना, कामना अर्थात् काम विकार का अंश है। बिना कामना के प्रभावित नहीं हो सकते। वह कामना भी काम विकार है। महाशत्रु है। यह दो रूप में आता है। कामना या तो प्रभावित करेगी या परेशान करेगी। इसलिए जैसे नारे लगाते हो - काम विकार नर्क का द्वार। ऐसे अब अपने जीवन के प्रति यह धारणा बनाओ कि किसी भी प्रकार की अल्पकाल की कामना मृगतृष्णा के समान धोखेबाज है। कामना अर्थात् धोखा खाना। ऐसी कड़ी दृष्टि वाले इस काम अर्थात् कामना पर काली रूप बनो। स्नेही रूप नहीं बनो, विचारा है, अच्छा है, थोड़ा-थोड़ा है ठीक हो जायेगा। नहीं! विकर्म के ऊपर विकराल रूप धारण करो। दूसरों के प्रति नहीं अपने प्रति। तब विकर्म विनाश कर फरिश्ता बन सकेंगे। योग नहीं लगता तो चेक करो - जरूर कोई छिपा हुआ विकर्म अपने तरफ खींचता है। ब्राह्मण आत्मा और योग नहीं लगे, यह हो नहीं सकता। ब्राह्मण माना ही एक के हैं, एक ही हैं। तो कहाँ जायेंगे? कुछ है ही नहीं तो कहाँ जायेंगे? अच्छा-

सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन और भी काम विकार के बाल बच्चे हैं। बापदादा को एक बात पर बहुत आश्चर्य लगता है - ब्राह्मण कहता है, ब्राह्मण आत्मा पर व्यर्थ वा विकारी दृष्टि, वृत्ति जाती है। यह कुल कलंकित की बात है। कहना बहन जी, वा भाई जी और करना क्या है! लौकिक बहन पर भी अगर कोई बुरी दृष्टि जाए, संकल्प भी आये, तो उसे कुल कलंकित कहा जाता है। तो यहाँ क्या कहेंगे? एक जन्म के नहीं लेकिन जन्म-जन्म का कलंक लगाने वाले। राज्य भाग्य को लात मारने वाले। ऐसे पद्मगुणा विकर्म कभी नहीं करना। यह विकर्म नहीं, महा विकर्म है। इसलिए सोचो, समझो, सम्भालो। यही पाप जमदूतों की तरह चिपक जायेंगे। अभी भले समझते हैं बहुत मजे में रह रहे हैं, कौन देखता है, कौन जानता है लेकिन पाप पर पाप चढ़ता जाता है और यही पाप खाने को आयेंगे। बापदादा जानते हैं कि इसकी रिजल्ट कितनी कड़ी है। जैसे शरीर से कोई तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ता वैसे बुद्धि पापों में तड़प-तड़पकर शरीर छोड़ेगी। सदा सामने यह पाप के जमदूत रहते हैं। इतना कड़ा अन्त है। इसलिए वर्तमान में गलती से भी ऐसा पाप नहीं करना। बापदादा सिर्फ सम्मुख बैठे हुए बच्चों को नहीं कर रहे हैं लेकिन चारों ओर के बच्चों को समर्थ बना रहे हैं। खबरदार, होशियार बना रहे हैं। समझा - अभी तक इस बात में कमज़ोरी काफी है। अच्छा –

सभी स्वयं प्रति इशारे से समझने वाले, सदा अपने विकल्प और विकर्म पर काली रूप धारण करने वाले, सदा भिन्न-भिन्न धोखों से बचने वाले, दु:खों से बचने वाले, शक्तिशाली आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’



15-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


स्नेही, सहयोगी, शक्तिशाली - बच्चों की तीन अवस्थाएँ

अव्यक्त बापदादा, अपने स्नेही, सहयोगी शक्तिशाली बच्चों के प्रति बोले:-

बापदादा सभी स्नेही, सहयोगी और शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही बच्चों में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के स्नेह वाले हैं। एक हैं - दूसरों की श्रेष्ठ जीवन को देख, दूसरों का परिवर्तन देख उससे प्रभावित हो स्नेही बनना। दूसरें हैं - किसी न किसी गुण की, चाहे सुख वा शान्ति की थोड़ी-सी अनुभव की झलक देख स्नेही बनना। तीसरे हैं - संग अर्थात् संगठन का, शुद्ध आत्माओं का सहारा अनुभव करने वाली स्नेही आत्मायें। चौथे हैं - परमात्म स्नेही आत्मायें। स्नेही सब हैं लेकिन स्नेह में भी नम्बर हैं। यथार्थ स्नेही अर्थात् बाप को यथार्थ रीति से जान स्नेही बनना।

ऐसे ही सहयोगी आत्माओं में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के सहयोगी हैं। एक हैं - भक्ति के संस्कार प्रमाण सहयोगी। अच्छी बातें हैं, अच्छा स्थान है, अच्छी जीवन वाले हैं, अच्छे स्थान पर करने से अच्छा फल मिलता है, इसी आधार पर, इसी आकर्षण से सहयोगी बनना अर्थात् अपना थोड़ा-बहुत तन-मन-धन लगाना। दूसरे हैं - ज्ञान वा योग की धारणा के द्वारा कुछ प्राप्ति करने के आधार पर सहयोगी बनना। तीसरे हैं - एक बाप दूसरा न कोई। एक ही बाप है, एक ही सर्व प्राप्ति का स्थान है। बाप का कार्य सो मेरा कार्य है। ऐसे अपना बाप, अपना घर, अपना कार्य, श्रेष्ठ ईश्वरीय कार्य समझ सहयोगी सदा के लिए बनना। तो अन्तर हो गया ना!

ऐसे ही शक्तिशाली आत्मायें, इसमें भी भिन्न-भिन्न स्टेज वाले हैं - सिर्फ ज्ञान के आधार पर जानने वाले कि मैं आत्मा शक्ति स्वरूप हूँ, सर्वशक्तिवान बाप का बच्चा हूँ - यह जानकर प्रयत्न करते हैं शक्तिशाली स्थिति में स्थित होने का। लेकिन सिर्फ जानने तक होने कारण जब यह ज्ञान की पाइंट स्मृति में आती है, उस समय शक्तिशाली पाइंट के कारण वह थोड़ा-सा समय शक्ति- शाली बनते फिर पाइंट भूली, शक्ति गई। जरा भी माया का प्रभाव, ज्ञान भुलाए निर्बल बना देता है। दूसरे हैं - ज्ञान का चिन्तन भी करते, वर्णन भी करते, दूसरों को शक्तिशाली बातें सुनाते, उस समय सेवा का फल मिलने के कारण अपने को उतना समय शक्तिशाली अनुभव करते हैं लेकिन चिन्तन के समय तक वा वर्णन के समय तक, सदा नहीं। पहली चिन्तन की स्थिति, दूसरी वर्णन की स्थिति।

तीसरे हैं - सदा शक्तिशाली आत्मायें। सिर्फ चिन्तन और वर्णन नहीं करते लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान स्वरूप बन जाते। स्वरूप बनना अर्थात् समर्थ बनना। उनके हर कदम, हर कर्म स्वत: ही शक्तिशाली होते हैं। स्मृति स्वरूप हैं इसलिए सदा शक्तिशाली स्थिति है। शक्तिशाली आत्मा सदा अपने को सर्वशक्तिवान बाप के साथ, कम्बाइण्ड अनुभव करेगी। और सदा श्रीमत का हाथ छत्रछाया के रूप में अनुभव होगा। शक्तिशाली आत्मा, सदा दृढ़ता की चाबी के अधिकारी होने कारण सफलता के खज़ाने के मालिक अनुभव करते हैं। सदा सर्व प्राप्तियों के झूलों में झूलते रहते हैं। सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य के मन में गीत गाते रहते हैं। सदा रूहानी नशे में होने कारण पुरानी दुनिया के आकर्षण से सहज परे रहते हैं। मेहनत नहीं करनी पड़ती है। शक्तिशाली आत्मा का हर कर्म, बोल स्वत: और सहज सेवा कराता रहता है। स्व परिवर्तन वा विश्व-परिवर्तन शक्तिशाली होने के कारण सफलता हुई पड़ी है, यह अनुभव सदा ही रहता है। किसी भी कार्य में क्या करें, क्या होगा यह संकल्प मात्र भी नहीं होगा। सफलता की माला सदा जीवन में पड़ी हुई है। विजयी हूँ, विजय माला का हूँ। विजय जन्म सिद्ध अधिकार है, यह अटल निश्चय स्वत: और सदा रहता ही है। समझा। अब अपने आप से पूछो - मैं कौन? शक्तिशाली आत्मायें माइनॉरिटी हैं। स्नेही, सहयोगी उसमें भी भिन्न-भिन्न वैराइटी वाले मैजारिटी हैं। तो अब क्या करेंगे? शक्ति- शाली बनो। संगमयुग का श्रेष्ठ सुख अनुभव करो। समझा! सिर्फ जानने वाले नहीं, पाने वाले बनो। अच्छा-

अपने घरे में आये वा बाप के घर में आये। पहुँच गये, यह देख बापदादा खुश होते हैं। आप भी बहुत खुश हो रहे हैं ना! यह खुशी सदा कायम रहे। सिर्फ मधुबन तक नहीं - संगमयुग ही साथ रहे। बच्चों की खुशी में बाप भी खुश है। कहाँ-कहाँ से चलकर, सहन कर पहुँच तो गये ना। गर्मी-सर्दी, खान-पान सबको सहनकर पहुँचे हो। धूल मिट्टी की वर्षा भी हुई। यह सब पुरानी दुनिया में तो होता ही है। फिर भी आराम मिल गया ना। आराम किया? तीन फुट नहीं तो दो फुट जगह तो मिली। फिर भी अपना घर, दाता का घर मीठा लगता है ना। भक्ति मार्ग की यात्राओं से तो अच्छा स्थान है। छत्रछाया के अन्दर आ गये। प्यार की पालना में आ गये। यज्ञ की श्रेष्ठ धरनी पर पहुँचना, यज्ञ के प्रसाद का अधिकारी बनना, कितना महत्व है। एक कणा, अनेक मूल्यों के समान है। यह तो सब जानते हो ना! वह तो प्रसाद का एक कणा मिलने के प्यासे हैं और आपको तो ब्रह्मा भोजन पेट भरकर मिलेगा। तो कितने भाग्यवान हो! इस महत्व से ब्रह्मा भोजन खाना तो सदा के लिए मन भी महान बन जायेगा। अच्छा- सबसे ज्यादा पंजाब आया है। इस बारी ज्यादा क्यों भागे हो? इतनी संख्या कभी नहीं आई है। होश में आ गये! फिर भी बापदादा ये ही श्रेष्ठ विशेषता देखते - पंजाब में सतसंग और अमृतवेले का महत्व है। नंगे पाव भी अमृतवेले पहुँच जाते हैं। बापदादा भी पंजाब निवासी बच्चें को इसी महत्व को जानने वालों की महानता से देखते हैं। पंजाब निवासी अर्थात् सदा संग के रूहानी रंग में रंगे हुए। सदा सत के संग में रहने वाले। ऐसे हो ना? पंजाब वाले सभी अमृतवेले समर्थ हो मिलन मनाते हो? पंजाब वालों में अमृतवेले का आलस्य तो नहीं है ना? झुटके तो नहीं खाते हो? तो पंजाब की विशेषता सदा याद रखना। अच्छा-

ईस्टर्न जोन भी आया है, ईस्ट की विशेषता क्या होती है? (सनराइज) सूर्य सदा उदय होता है। सूर्य अर्थात् रोशनी का पुंज। तो सभी ईस्टर्न जोन वाले मास्टर ज्ञान सूर्य हैं। सदा अंधकार को मिटाने वाले, रोशनी देने वाले हैं ना! यह विशेषता है ना। कभी माया के अंधकार में नहीं आने वाले। अंधकार मिटाने वाले मास्टर दाता हो गये ना! सूर्य दाता है ना। तो सभी मास्टर सूर्य अर्थात् मास्टर दाता बन विश्व को रोशनी देने के कार्य में बिजी रहते हो ना। जो स्वयं बिजी रहते हैं, फुर्सत में नहीं रहते, माया को भी उन्हों के लिए फुर्सत नहीं होती। तो ईस्टर्न जोन वाले क्या समझते हो? ईस्टर्न जोन में माया आती है? आती भी है तो नमस्कार करने आती या मिक्की माउस बना देती है? क्या मिक्की माउस का खेल अच्छा लगता है? ईस्टर्न जोन की गद्दी है - बाप की गद्दी। तो राजगद्दी हो गई ना! राजगद्दी वाले राजे होंगे या मिक्की माउस होंगे? तो सभी मास्टर ज्ञान सूर्य हो? ज्ञान सूर्य उदय भी वहीं से हुआ है ना। इस्ट से ही उदय हुआ। समझा अपनी विशेषता। प्रवेशता की श्रेष्ठ गद्दी के अर्थात् वरदानी स्थान की श्रेष्ठ आत्मायें हो। यह विशेषता किसी और जोन में नहीं है। तो सदा अपने विशेषता को विश्व की सेवा में लगाओ। क्या विशेषता करेंगे? सदा मास्टर ज्ञान सूर्य। सदा रोशनी देने वाले मास्टर दाता। अच्छा - सभी मिलने आये हैं, सदा श्रेष्ठ मिलन मनाते रहना। मेला अर्थात् मिलना। एक सेकण्ड भी मिलन मेले से वंचित नहीं होना। निरन्तर योगी का अनुभव पक्का करके जाना। अच्छा-

सदा एक बाप के स्नेह में रहने वाले, स्नेही आत्माओं को हर कदम ईश्वरीय कार्य के सहयोगी आत्माओं को, सदा शक्तिशाली स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा विजय के अधिकार को अनुभव करने वाले विजयी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से

एक बल और एक भरोसे से सदा उन्नति को पाते रहो। सदा एक बाप के हैं, एक बाप की श्रीमत पर चलना है। इसी पुरूषार्थ से आगे बढते चलो। अनुभव करो श्रेष्ठ ज्ञान स्वरूप बनने का। महान योगी बनने का। गहराई में जाओ। जितना ज्ञान की गहराई में जायेंगे उतना अमूल्य अनुभव के रत्न प्राप्त करेंगे। एकाग्र बुद्धि बनो। जहाँ एकाग्रता है वहाँ सर्व प्राप्तियों का अनुभव है। अल्पकाल की प्राप्ति के पीछे नहीं जाओ। अविनाशी प्राप्ति करो। विनाशी बातों में आकर्षित नहीं हो। सदा अपने को अविनाशी खज़ाने के मालिक समझ बेहद में आओ। हद में नहीं आओ। बेहद का मजा और हद के आकर्षण का मजा - इसमें रात-दिन का फर्क है। इसलिए समझदार बन समझ से काम लो। और वर्तमान तथा भविष्य श्रेष्ठ बनाओ।  अच्छा - ओमशान्ति।



17-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


पद्मापद्म भाग्यशाली की निशानी

पद्मापद्म भाग्यशाली बनाने वाले बापदादा अपने निरन्तर सेवाधारी बच्चों प्रति बोले:-

‘‘भाग्य विधाता बाप सभी भाग्यवान बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा भाग्यवान आत्मा है। ब्राह्मण बनना अर्थात् भाग्यवान बनना। भगवान का बनना अर्थात् भाग्यवान बनना। भाग्यवान तो सभी हैं लेकिन बाप के बनने के बाद बाप द्वारा जो भिन्न-भिन्न खज़ानों का वर्सा प्राप्त होता है उस श्रेष्ठ वर्से के अधिकार को प्राप्त कर अधिकारी जीवन में चलाना वा प्राप्त हुए अधिकार को सदा सहज विधि द्वारा वृद्धि को प्राप्त करना इसमें नम्बरवार बन जाते हैं। कोई भाग्यवान रह जाते, कोई सौभाग्यवान बन जाते। कोई हजार, कोई लाख, कोई पद्मापद्म भाग्यवान बन जाते। क्योंकि खज़ाने को विधि से कार्य में लगाना अर्थात् वृद्धि को पाना। चाहे स्वयं को सम्पन्न बनाने के कार्य में लगावें, चाहे स्वयं की सम्पन्नता द्वारा अन्य आत्माओं की सेवा के कार्य में लगावें। विनाशी धन खर्चने से खुटता है, अविनाशी धन खर्चने से पद्मगुणा बढ़ता है। इसलिए कहावत है - खर्चो और खाओ। जितना खर्चेंगे-खायेंगे उतना शाहों का शाह बाप और मालामाल बनायेंगे। इसलिए जो प्राप्त हुए खज़ाने के भाग्य को सेवा अर्थ लगाते हैं वह आगे बढ़ते हैं। पद्मापद्म भाग्यवान अर्थात् हर कदम में पद्मों की कमाई जमा करने वाले और हर संकल्प से वा बोल, कर्म सम्पर्क से पदमों को पदमगुणा सेवाधारी बन सेवा में लगाने वाले। पद्मापद्म भाग्यवान सदा फराखदिल, अविनाशी, अखण्ड महादानी, सर्व प्रति सर्व खज़ाने देने वाले - दाता होंगे। समय वा प्रोग्राम प्रमाण, साधनों प्रमाण सेवाधारी नहीं। अखण्ड- महादानी। वाचा नहीं, तो मंसा वा कर्मणा। सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा किसी न किसी विधि द्वारा अखुट अखण्ड खज़ाने के निरन्तर सेवाधारी। सेवा के भिन्न-भिन्न रूप होंगे लेकिन सेवा का लंगर सदा चलता रहेगा। जैसे निरन्तर योगी हो वैसे निरन्तर सेवाधारी। निरन्तर सेवाधारी सेवा का श्रेष्ठ फल निरन्तर खाते और खिलाते रहते। अर्थात् स्वयं ही सदा का फल खाते हुए प्रत्यक्ष स्वरूप बन जाते हैं।

पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा सदा पद्म-आसन निवासी अर्थात् कमल पुष्प स्थिति के आसन निवासी, हद के आकर्षण और हद के फल को स्वीकार करने से न्यारे और बाप तथा ब्राह्मण परिवार के, विश्व के प्यारे। ऐसी श्रेष्ठ सेवाधारी आत्मा को सर्व आत्मायें सदा दिल के स्नेह के खुशी के पुष्प चढ़ाते हैं। स्वयं बापदादा भी ऐसे निरन्तर सेवाधारी पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा प्रति स्नेह के पुष्प चढ़ाते। पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा सदा अपने चमकते हुए भाग्य के सितारे द्वारा अन्य आत्माओं को भी भाग्यवान बनाने की रोशनी देते। बापदादा ऐसे भाग्यवान बच्चों को देख रहे थे। चाहे दूर हैं, चाहे सन्मुख हैं लेकिन सदा बाप को दिल में समाये हुए हैं। इसलिए समान सो समीप रहते। अब अपने आप से पूछो - मैं कौन-सा भाग्यवान हूँ? अपने आपको तो जान सकते हैं ना। दूसरे के कहने से मानो वा न मानो लेकिन स्वयं को सब जानते हैं कि मैं कौन हूँ। समझा। फिर भी बापदादा कहते हैं - भाग्यहीन से भाग्यवान तो बन गये। अनेक प्रकार के दु:ख-दर्द से तो बचेंगे। स्वर्ग के मालिक तो बनेंगे। एक है स्वर्ग में आना। दूसरा है राज्य अधिकारी बनना। आने वाले तो सब हो लेकिन कब और कहाँ आयेंगे यह स्वयं से पूछो। बापदादा के रजिस्टर में स्वर्ग में आने की लिस्ट में नाम आ गया। दुनिया से तो यह अच्छा है। लेकिन अच्छे से अच्छा नहीं है। तो क्या करेंगे? कौन-सा जोन नम्बरवन जायेगा? हर जोन की विशेषता अपनी- अपनी है।

महाराष्ट्र की विशेषता क्या है? जानते हो? महान तो है ही लेकिन विशेष विशेषता क्या गाई जाती है! महाराष्ट्र में गणपति की पूजा ज्यादा होती है। गणपति को क्या कहते हैं? विघ्न विनाशक। जो भी कार्य आरम्भ करते हैं तो पहले श्रीगणेशाय नम: कहते हैं। तो महाराष्ट्र वाले क्या करेंगे? हर महान कार्य में श्री गणेश करेंगे ना! महाराष्ट्र अर्थात् सदा विघ्न-विनाशक राष्ट्र। तो सदा विघ्नविनाशक बन स्वयं और अन्य के प्रति इसी महानता को दिखायेंगे! महाराष्ट्र में विघ्न नहीं होना चाहिए। सब विघ्न-विनाशक हो जाएँ। आया और दूर से नमस्कार किया। तो ऐसा विघ्न विनाशक ग्रुप लाया है ना! महाराष्ट्र को सदा अपनी इस महानता को विश्व के आगे दिखाना है। विघ्न से डरने वाले तो नहीं हो ना! विघ्न-विनाशक चैलेंज करने वाले हैं। वैसे भी महाराष्ट्र में बहादुरी दिखाते हैं। अच्छा!

यू.पी. वाले क्या कमाल दिखायेंगे? यू.पी. की विशेषता क्या है? तीर्थ भी बहुत हैं, नदियाँ भी बहुत हैं, जगतगुरू भी वहाँ ही हैं। चार कोने में चार जगतगुरू हैं ना। महामण्डलेश्वर यू.पी. में ज्यादा हैं। हरि का द्वार यू.पी. का विशेष है। तो हरि का द्वार अर्थात् हरि के पास जाने का द्वार बताने वाले सेवाधारी यू.पी. में ज्यादा होने चाहिए। जैसे तीर्थ स्थान के कारण यू.पी. में पण्डे बहुत हैं। वह तो खाने-पीने वाले हैं लेकिन यह है सच्चा रास्ता बताने वाले रूहानी सेवाधारी पण्डे। जो बाप से मिलन मनाने वाले हैं। बाप के समीप लाने वाले हैं। ऐसे पाण्डव सो पण्डे यू.पी. में विशेष हैं! यू.पी. को यह विशेष पाण्डव सो पण्डे का प्रत्यक्ष रूप दिखाना है। समझा!

मैसूर की विशेषता क्या है? वहाँ चन्दन भी है और विशेष गार्डन भी हैं। तो कर्नाटक वालों को विशेष सदा रूहानी गुलाब, सदा खुशबूदार चन्दन बन विश्व में चन्दन की खुशबू कहो, अथवा रूहानी गुलाब की खुशबू कहो, विश्व को गार्डन बनाना है। और विश्व में चन्दन की खुशबू फैलानी है। चन्दन का तिलक दे खुशबूदार और शीतल बनाना है। चन्दन शीतल भी होता है। तो सबसे ज्यादा रूहानी गुलाब कर्नाटक से निकलेंगे ना। यह प्रत्यक्ष प्रमाण लाना है। अभी सबको अपनी-अपनी विशेषता का प्रत्यक्ष रूप दिखाना है। सबसे खिले हुए खुशबूदार रूहानी गुलाब लाने पड़ें। लाये भी हैं, कुछ-कुछ लाये हैं लेकिन गुलदस्ता नहीं लाया है। अच्छा!

विदेश की महिमा तो बहुत सुनाई है। विदेश की विशेषता है - डिटैच भी बहुत जोर से होंगे तो अटैच भी जोर से होंगे। बापदादा विदेशी बच्चों का न्यारा और प्यारापन देख हर्षित होते हैं। वह जीवन तो बीत गई। जितना फँसे हुए थे उतने ही अब न्यारे भी हो गये। इसलिए विदेश का न्यारा और प्यारापनबापदादा को भी प्यारा लगता है। इसलिए विशेष बापदादा भी यादप्यार दे रहे हैं। अपनी विशेषता में समा गये हो! ऐसे न्यारे और प्यारे हो ना! अटैचमेन्ट तो नहीं है ना? फिर भी देखो, विदेशी मेहमान होकर घर में आये हैं तो मेहमानों को सदा आगे किया जाता है। इसलिए भारतवासियों को विदेशियों को देख विशेष खुशी होती है। कई ऐसे गेस्ट होते जो होस्ट बन वैठ जाते हैं। विदेशियों की सदा यही चाल रही है। गेस्ट बन आते और होस्ट बन बैठ जाते। फिर भी अनेक दिवारों को तोड़कर बाप के पास सो आपके पास आये हैं, तो ‘‘पहले आप’’ तो कहेंगे ना! ऐसे तो भारत की विशेषता अपनी, विदेशी की अपनी है। अच्छा-

84 घण्टों वाली देवियाँ मशहूर हैं। तो अभी 84 में घण्टा बजायेंगे वा और भी अभी इन्तजार करें! विदेश में तो डर से जी रहे हैं। तो कब घण्टे बजायेंगे। विदेशी बजावें वा देश बजावे। 84 माना चारों ओर के घण्टे बजें। जब समाप्ति में आरती करते हैं तो जोर-जोर से घण्टे बजाते हैं ना - तब समाप्ति होती है। आरती का होना माना समाप्ति होना। तो अब क्या करेंगे? अच्छा-

सभी पदम-आसनधारी पद्मापद्म भाग्यवान, सदा हर सेकण्ड, हर संकल्प में निरन्तर सेवाधारी, सदा फराखदिल बन सर्व खज़ानों को देने वाले, मास्टर दाता, सदा स्वयं की सम्पन्नता द्वारा औरों को भी सम्पन्न बनाने वाले, श्रेष्ठ भाग्य अधिकारी, सदा श्रेष्ठ सबूत देने वाले सपूत बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पंजाब निवासियों प्रति:- बाप बैठा है इसलिए सोचने की जरूरत नहीं है, जो होगा वह कल्याणकारी है। आप तो सबके हो। न हिन्दू हो न सिक्ख हो। बाप के हो तो सबके हो। पाकिस्तान में भी यही कहते थे ना - आप तो अल्लाह के बन्दे हो, आपको किसी बात से कनेक्शन नहीं। इसलिए आप ईश्वर के हो, और किसी के नहीं। क्या भी हो लेकिन डरने वाले नहीं। कितनी भी आग लगे बिल्ली के पूँगरे तो सेफ रहेंगे लेकिन जो योगयुक्त होंगे वही सेफ रहेंगे। ऐसे नहीं, कहे मैं बाप की हूँ और याद करे दूसरो को! ऐसे को मदद नहीं मिलेगी। डरो नहीं, घबराओ नहीं, आगे बढो। याद की यात्रा में, धारणाओं में, पढ़ाई में सब सबजेक्ट से आगे बढ़ो। जितना आगे बढेंगे उतना सहज ही प्राप्ति करते रहेंगे।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सभी अपने को इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर विशेष पार्टधारी समझते हो? कल्प पहले वाले अपने चित्र अभी देख रहे हो! यही ब्राह्मण जीवन का वन्डर है। सदा इसी विशेषता को याद करो कि क्या थे और क्या बन गये! कौड़ी से हीरे तुल्य बन गये। दु:खी संसार से सुखी संसार में आ गये। आप सब इस ड्रामा के हीरो हीरोइन एक्टर हो। एक-एक ब्रह्माकुमार-कुमारी बाप का सन्देश सुनाने वाले सन्देशी हो। भगवान का सन्देश सुनाने वाले सन्देशी कितने श्रेष्ठ हुए! तो सदा इसी कार्य के निमित्त अवतरित हुए हैं। ऊपर से नीचे आये हैं यह सन्देश देने - यही स्मृति खुशी दिलाने वाली हैं। बस, अपना यही आक्यूपेशन सदा याद रखो कि खुशियों की खान के मालिक हैं। यही आपका टाइटिल है।

2. सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मायें अनुभव करते हो? सच्चे ब्राह्मण अर्थात् सदा सत्य बाप का परिचय देने वाले। ब्राह्मणों का काम है कथा करना, तुम कथा नहीं करते लेकिन सत्य परिचय सुनाते हो। ऐसे सत्य बाप का सत्य परिचय देने वाले, ब्राह्मण आत्मायें हैं, यही नशा रहे। ब्राह्मण देवताओं से भी श्रेष्ठ हैं। इसलिए ब्राह्मणों का स्थान चोटी पर दिखाते हैं। चोटी वाले ब्राह्मण अर्थात् ऊँची स्थिति में रहने वाले। ऊँचा रहने से नीचे सब छोटे होंगे। कोई भी बात बड़ी नहीं लगेगी। ऊपर बैठकर नीचे की चीज़ देखो तो छोटी लगेगी। कभी कोई समस्या बड़ी लगती तो उसका कारण नीचे बैठकर देखते हो। ऊपर से देखो तो मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। तो सदा याद रखना - चोटी वाले ब्राह्मण हैं, इसमें बड़ी समस्या भी सेकण्ड में छोटी हो जायेगी। समस्या से घबराने वाले नहीं लेकिन पार करने वाले समस्या का समाधान करने वाले।

आज सवेरे (18-4-1984) अमृतवेले भुवनेश्वर के एक भाई ने हार्टफेल होने से अपना पुराना शरीर मधुबन में छोड़ा उस समय अव्यक्त बापदादा के उच्चारे हुए महावाक्य

सभी ड्रामा की हर सीन को साक्षी हो देखने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना! कोई भी सीन जो भी ड्रामा में होती है उसको कहेंगे कल्याणकारी। नथिंग न्यू। (उनकी लौकिक भाभी से) क्या सोच रही हो? साक्षीपन की सीट पर बैठ सब दृश्य देखने से अपना भी कल्याण है और उस आत्मा का भी कल्याण है। यह तो समझती हो ना! याद में शक्ति रूप हो ना। शक्ति सदा विजयी होती है। विजयी शक्ति रूप बन सारा पार्ट बजाने वाली। यह भी पार्ट है। पार्ट बजाते हुए कभी भी और कोई संकल्प नहीं करना। हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। अभी उस आत्मा को शान्ति और शक्ति का सहयोग दो। इतने सारे दैवी परिवार का सहयोग प्राप्त हो रहा है। इसलिए कोई सोचने की बात नहीं है। महान तीर्थ स्थान है ना! महान आत्मा है, महान तीर्थ है। सदा महानता ही सोचो। सभी याद में बैठे हो ना! एक लाडला बच्चा, अपने इस पुराने शरीर का हिसाब पूरा कर अपने नये शरीर की तैयारी में चला। इसलिए अभी सभी उस भाग्यवान आत्मा को शान्ति, शक्ति का सहयोग दो। यही विशेष सेवा है। क्यों, क्या में नहीं जाना लेकिन स्वयं भी शक्ति स्वरूप हो, विश्व में शान्ति की किरणें फैलाओ। श्रेष्ठ आत्मा है, कमाई करने वाली आत्मा है। इसलिए कोई सोचने की बात नहीं। समझा!



19-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


भावुक-आत्मा तथा ज्ञानी-आत्मा के लक्षण

श्रेष्ठ अधिकार को देने वाले, विजयी रत्न बनाने वाले बापदादा बोले:-

आज बापदादा सभी बच्चों को देख रहे हैं कि कौन से बच्चे भावना से बाप के पास पहुँचे हैं, कौन से बच्चे पहचान कर पाने अर्थात् बनने के लिए पहुँचे हैं। दोनों प्रकार के बच्चे बाप के घर में पहुँचे। भावना वाले भावना का फल यथा शक्ति - खुशी, शान्ति, ज्ञान वा प्रेम का फल प्राप्त कर इसी में खुश हो जाते हैं। फिर भी भक्ति की भावना और अब बाप के परिचय से बाप वा परिवार के प्रति भावना इसमें अन्तर है। भक्ति की भावना अन्धश्रद्धा की भावना है। इन्डायरेक्ट मिलने की भावना, अल्पकाल के स्वार्थ की भावना है। वर्तमान समय ज्ञान के आधार पर जो बच्चों की भावना है वह भक्ति मार्ग से अति श्रेष्ठ है। क्योंकि इन्डायरेक्ट देव आत्माओं द्वारा नहीं है - डायरेक्ट बाप के प्रति भावना है, पहचान है लेकिन भावनापूर्वक पहचान और ज्ञान द्वारा पहचान इसमें अन्तर है। ज्ञान द्वारा पहचान अर्थात् बाप जो है जैसा है, मैं भी जो हूँ जैसा हूँ उसे विधिपूर्वक जानना अर्थात् बाप समान बनना। जाना तो सभी ने है लेकिन भावनापूर्वक वा ज्ञान की विधिपूर्वक, इस अन्तर को जानना पड़े। तो आज बापदादा कई बच्चों की भावना देख रहे हैं। भावना द्वारा भी बाप को पहचानने से वर्सा तो प्राप्त कर ही लेते हैं। लेकिन सम्पूर्ण वर्से के अधिकारी और वर्से के अधिकारी यह अन्तर हो जाता है। स्वर्ग का भाग्य वा जीवनमुक्ति का अधिकार भावना वालों को और ज्ञान वालों को - मिलता दोनों को है। सिर्फ पद की प्राप्ति में अन्तर हो जाता है। बाबा’ - शब्द दोनों ही कहते हैं और खुशी से कहते हैं इसलिए बाबा कहने और समझने का फल - वर्से की प्राप्ति तो होनी ही है। जीवनमुक्ति के अधिकार के हकदार तो बन जाते हैं लेकिन अष्ट रत्न, 108 विजयी रत्न, 16 हजार और फिर 9 लाख। कितना अन्तर हो गया! माला 16 हजार की भी है और 108 की भी है। 108 में 8 विशेष भी हैं। माला के मणके तो सभी बनते हैं। कहेंगे तो दोनों को मणके ना! 16 हजार की माला का मणका भी खुशी और फखुर से कहेगा कि मेरा बाबा और मेरा राज्य। राज्य पद में राज्य तख्त के अधिकारी और राज्य घराने के अधिकारी और राज्य घराने के सम्पर्क में आने के अधिकारी, यह अन्तर हो जाता है।

भावुक आत्मायें और ज्ञानी तू आत्मायें - नशा दोनों को रहता है। बहुत अच्छी प्रभु प्रेम की बातें सुनाते हैं। प्रेम स्वरूप में दुनिया की सुधबुध भी भूल जाते हैं। मेरा तो एक बाप इस लगन के गीत भी अच्छे गाते हैं लेकिन शक्ति रूप नहीं होते हैं। खुशी में भी बहुत देखेंगे लेकिन अगर छोटा-सा माया का विघ्न आया तो भावुक आत्मायें घबरायेंगे भी बहुत जल्दी। क्योंकि उनमें ज्ञान की शक्ति कम होती है। अभी-अभी देखेंगे बहुत मौज में बाप के गीत गा रहे हैं और अभी-अभी माया का छोटा-सा वार भी खुशी के गीत के बजाए क्या करूँ, कैसे करूँ, क्या होगा, कैसे होगा! ऐसे क्या-क्या के गीत गाने में भी कम नहीं होते। ज्ञानी तू आत्मायें सदा स्वयं को बाप के साथ रहने वाले मास्टर सर्वशक्तिवान समझने से माया को पार कर लेते हैं। क्या, क्यों के गीत नहीं गाते। भावुक आत्मायें सिर्फ प्रेम की शक्ति से आगे बढ़ते रहते हैं। माया से सामना करने की शक्ति नहीं होती। ज्ञानी तू आत्मा समान बनने के लक्ष्य से सर्व शक्तियों का अनुभव कर सामना कर सकते हैं। अब अपने आप से पूछो कि मैं कौन! भावुक आत्मा हैं या ज्ञानी तू आत्मा हूँ? बाप तो भावना वालों को भी देख खुश होते हैं। मेरा बाबा कहने से अधिकारी तो हो ही गये ना! और अधिकार लेने के भी हकदार हो ही गये। पूरा लेना वा थोड़ा लेना। वह पुरूषार्थ प्रमाण जितना झोली भरने चाहे उतनी भर सकते हैं। क्योंकि मेरा बाबा कहा तो वह चाबी तो लगा ही दी ना। और कोई चाबी नहीं है क्योंकि बापदादा सागर है ना। अखुट है, बेहद है। लेने वाले थक जाते। देने वाला नहीं थकता क्योंकि उसको मेहनत ही क्या करनी पड़ती। दृष्टि दी और अधिकार दिया। मेहनत लेने वालों को भी नहीं है सिर्फ अलबेलेपन के कारण गँवा देते हैं। और फिर अपनी कमज़ोरी के कारण गँवा कर फिर पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। गँवाना - पाना, पाना - गँवाना, इस मेहनत के कारण थक जाते हैं। खबरदार होशियार हैं तो सदा प्राप्ति स्वरूप हैं। जैसे सतयुग में दासियाँ सदा आगे-पीछे सेवा के लिए साथ रहती हैं ऐसे ज्ञानी तू आत्मा बाप समान श्रेष्ठ आत्मा के अब भी सर्व शक्ति, सर्व गुण सेवाधारी के रूप में सदा साथ निभाते हैं। जिस शक्ति का आह्वान करो, जिस भी गुण का आह्वान करो जी हाजर। ऐसे स्वराज्य अधिकारी ही विश्व के राज्य अधिकारी बनते हैं। तो मेहनत तो नहीं लगेगी ना। हर शक्ति, हर गुण सदा विजयी हैं ही, ऐसा अनुभव कराते हैं। जैसे ड्रामा करके दिखाते हो ना। रावण अपने साथियों को ललकार करता और ब्राह्मण आत्मा, स्वराज्य अधिकारी आत्मा अपने शक्तियों और गुणों को ललकार करती। तो ऐसे स्वराज्य अधिकारी बने हो? वा समय पर यह शक्तियाँ कार्य में नहीं ला सकते हो! कमज़ोर राजा का कोई नहीं मानता। राजा को मानना पड़ता प्रजा का। बहादुर राजे सभी को अपने आर्डर से चलाते और राज्य प्राप्त करते हैं। तो सहज को मुश्किल बनाना और फिर थक जाना यह अलबेलेपन की निशानी है। नाम राजा और आर्डर में कोई नहीं! इसको क्या कहा जायेगा? कई कहते हैं ना - मैंने समझा भी कि सहनशक्ति होनी चाहिए लेकिन पीछे याद आया। उस समय सोचते भी सहनशक्ति से कार्य नहीं ले सकते। इसका मतलब बुलाया अभी और आया कल। तो आर्डर में हुआ! हो गया माना अपनी शक्ति आर्डर में नहीं है। सेवाधारी समय पर सेवा न करें तो ऐसे सेवाधारी को क्या कहेंगे? तो सदा स्वराज्य अधिकारी बन सर्व शक्तियों को, गुणों को, स्व-प्रति और सर्व के प्रति सेवा में लगाओ। समझा। सिर्फ भावुक नहीं बनो। शक्तिशाली बनो। अच्छा- वैरायटी प्रकार की आत्माओं का मेला देख खुश हो रहे हो ना! मधुबन वाले कितने मेले देखते हैं। कितने वैरायटी ग्रुप्स आते हैं! बापदादा भी वैरायटी फुलवाड़ी को देख हर्षित होते हैं। भले आये। शिव की बारात का गायन जो है वह देख रहे हो ना! बाबा-बाबा कहते सब चल पड़े तो हैं ना। मधुबन तो पहुँच गये। अब सम्पूर्ण मंजल पर पहुँचना है। अच्छा-

सदा श्रेष्ठ अधिकार को पाने वाले विजयी आत्माओं को, सदा अपने अधिकार से सर्व शक्तियों द्वारा सेवा करने वाले शक्तिशाली आत्माओं को, सदा राज्य तख्त अधिकारी बनने वाले अधिकारी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

अलग-अलग पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकत

पंजाब जोन से:- सभी पंजाब निवासी महावीर हो ना! डरने वाले तो नहीं? किसी भी बात का भय तो नहीं है! सबसे बड़ा भय होता है मृत्यु से। आप सब तो हो ही मरे हुए। मरे हुए को मरने का क्या डर! मृत्यु से डर तब लगता है जब सोचते हैं, अभी यह करना है, यह करें और वह पूर्ति नहीं होती है तो मृत्यु से भय होता है। आप तो सब कार्य पूरा कर एवररेडी हो। यह पुराना चोला छोड़ने के लिए एवररेडी हो ना! इसलिए डर नहीं। और भी जो भयभीत आत्मायें हैं उन्हों को भी शक्तिशली बनाने वाले, दुःख के समय पर सुख देने वाली आत्मायें हो। सुखदाता के बच्चे हो। जैसे अन्धियारे में चिराग होता है तो रोशनी हो जाती है। ऐसे दुःख के वातावरण में सुख देने वाली आप श्रेष्ठ आत्मायें हों। तो सदा यह सुख देन्ो की श्रेष्ठ भावना रहती है। सदा सुख देना है, शान्ति देनी है। शान्तिदाता के बच्चे शान्ति देवा हो। तो शान्ति देवा कौन है? अकेला बाप नहीं, आप सब भी हो। तो शान्ति देने वाले शान्ति देवा - शान्ति देने का कार्य कर रहे हो ना! लोग पूछते हैं - आप लोग क्या सेवा करते हो? तो आप सभी को यही कहो कि इस समय जिस विशेष बात की आवश्यकता है वह कार्य हम कर रहे हैं। अच्छा, कपड़ा भी देंगे, अनाज़ भी दे देंगे, लेकिन सबसे आवश्यक चीज़ हैं - शान्ति। तो जो सबके लिए आवश्यक चीज़ है वह हम दे रहे हैं। इससे बड़ी सेवा और क्या है! मन शान्त है तो धन भी काम में आता है। मन शान्त नहीं तो धन की शक्ति भी परेशान करती है। अभी ऐसे शान्ति की शक्तिशाली लहर फैलाओ जो सभी अनुभव करें कि सारे देश के अन्दर यह शान्ति का स्थान है। एक-दो से सुने और अनुभव करने के लिए आवें कि दो घड़ी भी जाने से यहाँ बहुत शान्ति मिलती है। ऐसा आवाज़ फैले। जैसे उन्हों का आवाज़ फैल गया है कि अशान्ति का स्थान यह गुरूद्वारा ही बन चुका है। ऐसे शान्ति का कोना कौन-सा है, यही सेवा स्थान है, यह आवाज़ फैलना चाहिए। कितनी भी अशान्त आत्मा हो! जैसे रोगी हास्पिटल में पहुँच जाता है ऐसे यह समझें कि अशान्ति के समय इस शान्ति के स्थान पर ही जाना चाहिए। ऐसी लहर फैलाओ। यह कैसे फैलेगी? इसके लिए एक-दो आत्माओं को भी बुलाकर अनुभव कराओ। एक से एक, एक से एक ऐसे फैलता जायेगा। जो अशान्त हैं उन्हों को खास बुलाकर भी शान्ति का अनुभव कराओ। जो भी सम्पर्क में आयें उन्हों को यह सन्देश दो कि शान्ति का अनुभव करो। पंजाब वालों को विशेष यह सेवा करनी चाहिए। अभी आवाज़ बुलन्द करने का चांस है। अभी भटक रहे हैं। कोई स्थान चाहिए। कौन-सा है वह परिचय नहीं है, ढूँढ रहे हैं। एक ठिकाने से तो भटक गये, समझ गये हैं कि यह ठिकाना नहीं है। ऐसी भटकती हुई आत्माओं को अभी सहज ठिकाना नहीं दे सकते हो? ऐसी सेवा करो। करफ्यू हो कुछ भी हो, सम्पर्क में तो आते हो ना। सम्पर्क वालों को अनुभव कराओ तो ऐसी आत्मायें आवाज़ फैलायेंगी। उन्हें एक दो घण्टा भी योग शिविर कराओ। अगर थोड़ा भी शान्ति का अनुभव किया तो बहुत खुश होंगे, शुक्रिया मानेंगे। जब लक्ष्य होता है कि हमको करना है तो रास्ता भी मिल जाता है। तो ऐसा नाम बाला करके दिखाओ। जितना पंजाब की धरनी सख्त है उतनी नर्म कर सकते हो। अच्छा-

2. सदा अपने को फरिश्ता अर्थात् डबल लाइट अनुभव करते हो? इस संगमयुग का अन्तिम स्वरूप फरिश्ताहै ना। ब्राह्मण जीवन की प्राप्ति है ही फरिश्ता जीवन! फरिश्ता अर्थात् जिसका कोई देह और देह के सम्बन्ध में रिश्ता नहीं। देह और देह के सम्बन्ध, सबसे रिश्ता समाप्त हुआ या थोड़ा-सा अटका हुआ है? अगर थोड़ी-सी सूक्ष्म लगाव की रस्सी होंगी तो उड़ नहीं सकेंगे। नीचे आ जायेंगे। इसलिए फरिश्ता अर्थात् कोई भी पुराना रिश्ता नहीं। जब जीवन ही नया है तो सब कुछ नया होगा। संकल्प नया, सम्बन्ध नया। आक्यूपेशन नया। सब नया होगा। अभी पुरानी जीवन स्वप्न में भी स्मृति में नहीं आ सकती। अगर थोड़ा भी देह भान में आते तो भी रिश्ता है तब आते हो। अगर रिश्ता नहीं है तो बुद्धि जा नहीं सकती। विश्व की इतनी आत्मायें हैं उन्हों से रिश्ता नहीं तो याद नहीं आती हैं ना। याद वह आते हैं जिससे रिश्ता है। तो देह का भान आना अर्थात् देह का रिश्ता है। अगर देह के साथ जरा-सा लगाव रहा तो उड़ेंगे कैसे! बोझ वाली चीज़ को ऊपर कितना भी फेंको नीचे आ जायेगी। तो फरिश्ता माना हल्का, कोई बोझ नहीं। मरजीवा बनना अर्थात् बोझ से मुक्त होना। अगर थोड़ा भी कुछ रह गया तो जल्दी-जल्दी खत्म करो, नहीं तो जब समय की सीटी बजेगी तो सब उड़ने लगेंगे और बोझ वाले नीचे रह जायेंगे। बोझ वाले - उड़ने वालों को देखने वाले हो जायेंगे।

तो यह चेक करना कि कोई सूक्ष्म रस्सी भी रह तो नहीं गई है। समझा? तो आज का विशेष वरदान याद रखना कि निर्बन्धन फरिश्ता आत्मायें हैं।बन्धनमुक्त आत्मायें हैं। फरिश्ता’ - शब्द कभी नहीं भूलना। फरिश्ता समझने से उड़ जायेंगे। वरदाता का वरदान याद रखेंगे तो सदा मालामाल रहेंगे। अच्छा-

3. सदा अपने को शान्ति का सन्देश देने वाले, शान्ति का पैगाम देने वाले सन्देशी समझते हो? ब्राह्मण जीवन का कार्य है - सन्देश देना। कभी इस कार्य को भूलते तो नहीं हो? रोज चेक करो कि मुझ श्रेष्ठ आत्मा का श्रेष्ठ कार्य है वह कहाँ तक किया! कितनों को सन्देश दिया। कितनों को शान्ति का दान दिया। सन्देश देने वाले महादानी-वरदानी आत्मायें हो। कितने टाइटल्स हैं आपके? आज की दुनिया में कितने भी बड़े ते बड़े टाइटल हों आपके आगे सब छोटे हैं। वह टाइटल देने वाली आत्मायें हैं लेकिन अब बाप बच्चों को टाइटल देते हैं। तो अपने भिन्न-भिन्न टाइटल्स को स्मृति में रख उसी खुशी, उसी सेवा में सदा रहो। टाइटल की स्मृति से सेवा स्वत: स्मृति में आयेगी। अच्छा-



22-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


विचित्र बाप द्वारा विचित्र पढ़ाई तथा विचित्र प्राप्ति

श्रेष्ठ प्राप्ति के अधिकारी बनाने वाले सत बाप, सत शिक्षक - ज्ञान स्वरूप बच्चों प्रति बोले:-

आज रूहानी बाप अपने रूहानी बच्चों से मिलने आये हैं। रूहानी बाप हर- एक रूह को देख रहे हैं कि हर-एक में कितनी रूहानी शक्ति भरी हुई है। हर एक आत्मा कितनी खुशी स्वरूप बनी है। रूहानी बाप अविनाशी खुशी का खज़ाना बच्चों को जन्म-सिद्ध अधिकार में दिया हुआ देख रहे हैं कि हरेक ने अपना वर्सा, अधिकार कहाँ तक जीवन में प्राप्त किया है। खज़ाने के बालक सो मालिक बने हैं! बाप दाता है, सभी बच्चों को पूरा ही अधिकार देते हैं। लेकिन हर एक बच्चा अपनी-अपनी धारणा की शक्ति प्रमाण अधिकारी बनता है। बाप का तो सभी बच्चों के प्रति एक ही शुभ संकल्प है कि हर एक आत्मा रूपी बच्चा सदा सर्व खज़ानों से सम्पन्न अनेक जन्मों के लिए सम्पूर्ण वर्से के अधिकारी बन जाएँ। ऐसे प्राप्ति करने के उमंग उत्साह में रहने वाले बच्चों को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। हर एक छोटा-बड़ा, बच्चा युवा वा वृद्ध मीठी-मीठी मातायें, अनपढ़ या पढ़े हुए, शरीर से निर्बल फिर भी आत्मायें कितनी बलवान हैं! एक परमात्मा की लगन कितनी है! अनुभव है कि हमने परमात्मा बाप को जाना, सब कुछ जाना। बापदादा भी ऐसे अनुभवी आत्माओं को सदा यही वरदान देते हैं - हे लगन में मगन रहने वाले बच्चे, सदा याद में जीते रहो। सदा सुख शान्ति की प्राप्ति में पलते रहो। अविनाशी खुशी के झूले में झूलते रहो। और विश्व की सभी आत्माओं रूपी अपने रूहानी भाईयों को सुख-शान्ति का सहज साधन सुनाते हुए, उन्हों को भी रूहानी बाप के रूहानी वर्से के अधिकारी बनाओ। यही एक पाठ सभी को पढ़ाओ। हम सब आत्मायें एक बाप के हैं। एक ही परिवार के हैं, एक ही घर के हैं। एक ही सृष्टि मंच पर पार्ट बजाने वाले हैं। हम सर्व आत्माओं का एक ही स्वधर्म शान्ति और पवित्रता है। बस इसी पाठ से स्व-परिवर्तन और विश्व परिवर्तन कर रहे हो और निश्चित होना ही है। सहज बात है ना! मुश्किल तो नहीं। अनपढ़ भी इस पाठ से नॉलेजफुल बन गये हो। क्योंकि रचयिता बीज को जान रचयिता द्वारा रचना को स्वत: ही जान जाते। सभी नॉलेजफुल हो ना! सारी पढ़ाई - रचता और रचना की, सिर्फ तीन शब्दों में पढ़ ली है। आत्मा परमात्मा और सृष्टि चक्र।इन तीनों शब्दों से क्या बन गये हो! कौन-सा सार्टिफिकेट मिला है? बी.ए., एम.ए. का सार्टिफिकेट तो नहीं मिला। लेकिन त्रिकालदर्शी, ज्ञान स्वरूपयह टाइटल तो मिले हैं ना। और सोर्स आफ इन्कम क्या हुआ? क्या मिला? सत शिक्षक द्वारा अविनाशी जन्म-जन्म सर्व प्राप्ति की गैरन्टी मिली है। वैसे टीचर गैरन्टी नहीं देता कि सदा कमाते रहेंगे वा धनवान रहेंगे। वह सिर्फ पढ़ा के योग्य बना देते हैं। तुम बच्चों को वा गाडली स्टूडेन्ट को बाप-शिक्षक द्वारा, वर्तमान के आधार से 21 जन्म सतयुग त्रेता के सदा ही सुख शान्ति, सम्पत्ति, आनन्द, प्रेम, सुखदाई परिवार मिलना ही है। मिलेगा नहीं, मिलना ही है। यह गैरन्टी है। क्योंकि अविनाशी बाप है, अविनाशी शिक्षक है। तो अविनाशी द्वारा प्राप्ति भी अविनाशी है। यही खुशी के गीत गाते हो ना कि हमें सत बाप, सत शिक्षक द्वारा सर्व प्राप्ति का अधिकार मिल गया। इसी को ही कहा जाता है - विचित्र बाप, विचित्र स्टूडेन्टस और विचित्र पढ़ाई वा विचित्र प्राप्ति। जो कोई भी कितना भी पढ़ा हुआ हो लेकिन इस विचित्र बाप और शिक्षक की पढ़ाई वा वर्से को जान नहीं सकते। चित्र निकाल नहीं सकते। जाने भी कैसे। इतना बड़ा ऊँचे ते ऊँचा बाप शिक्षक और पढ़ाता कहाँ और किसको हैं! कितने साधारण हैं! मानव से देवता बनाने की, सदा के लिए चरित्रवान बनाने की पढ़ाई है और पढ़ने वाले कौन हैं? जिसको कोई नहीं पढ़ा सकते उनको बाप पढ़ाते हैं। जिसको दुनिया पढ़ा सकती, बाप भी उन्हों को ही पढ़ावे तो क्या बड़ी बात हुई! ना उम्मीद आत्माओं को ही उम्मीदवार बनाते हैं। असम्भव को सम्भव कराते हैं। इसलिए ही गायन है - तुम्हारी गत मत तुम ही जानो।बापदादा ऐसे नाउम्मीद से उम्मीदवार बनने वाले बच्चों को देख खुश होते हैं। भले आये। बाप के घर के श्रृंगार भले पधारे। अच्छा-

सदा स्वयं को श्रेष्ठ प्राप्ति के अधिकारी अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, एक जन्म में अनेक जन्मों की प्राप्ति कराने वाले ज्ञान स्वरूप बच्चों को, सदा एक पाठ पढ़ाने और पढ़ने वाले श्रेष्ठ बच्चों को, सदा वरदाता बाप के वरदानों में पलने वाले भाग्यवान बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

बापदादा के सम्मुख सिरोही के इनकम टैक्स ऑफीसर बैठे हैं, उनके प्रति उच्चारे हुए मधुर महावाक्य

यह तो समझते हो ना कि अपने घर में आये हैं? यह घर किसका है? परमात्मा का घर, सबका घर हुआ ना? तो आपका भी घर हुआ ना? घर में आये यह तो बहुत अच्छा किया - अब और अच्छे ते अच्छा क्या करेंगे? अच्छे ते अच्छा करना और ऊँचे ते ऊँचा बनना यह तो जीवन का लक्ष्य होता ही है। अब अच्छे ते अच्छा क्या करना है? जो पाठ अभी सुनाया - वह एक ही पाठ पक्का कर लिया तो इस एक पाठ में सब पढ़ाई समाई हुई है। यह वन्डरफुल विश्व विद्यालय है, देखने में घर भी है लेकिन बाप ही सत शिक्षक है, घर भी है और विद्यालय भी है। इसलिए कई लोग समझ नहीं सकते हैं - कि यह घर है या विद्यालय है। लेकिन घर भी है और विद्यालय भी है क्योंकि जो सबसे श्रेष्ठ पाठ है, पह पढ़ाया जाता है। कालेज में वा स्कूल में पढ़ाने का लक्ष्य क्या है? चरित्रवान बने, कमाई योग्य बने, परिवार को अच्छी तरह से पालना करने वाला बने, यही लक्ष्य है ना। तो यहाँ यह सब लक्ष्य पूरा हो ही जाता है। एक-एक चरित्रवान बन जाता है।

भारत देश के नेतायें क्या चाहते हैं? भारत का बापू जी क्या चाहता था? यही चाहता था ना - कि भारत लाइट हाउस बने। भारत - दुनिया के आध्यात्मिक शक्ति का केन्द्र बने। वही कार्य यहाँ गुप्त रूप से हो रहा है। अगर एक भी राम-सीता समान बन जाए तो एक राम-सीता के कारण रामराज्य हुआ और इतने सब राम-सीता के समान बन जाएं तो क्या होगा? तो यह पाठ मुश्किल नहीं है, बहुत सहज है। इस पाठ को पक्का करेंगे तो आप भी सत् टीचर द्वारा रूहानी सार्टिफिकेट भी लेंगे और फिर गैरन्टी भी ले लेंगे - सोर्स आफ इनकम की। बाकी वण्डरफुल जरूर है। दादा भी, परदादा भी यहाँ ही पढ़ता है तो पोत्रा-धोत्रा भी यहाँ ही पढ़ता है। एक ही क्लास में दोनों ही पढ़ते हैं क्यांकि आत्माओं को यहाँ पढ़ाया जाता है, शरीर को नहीं देखा जाता है। आत्मा को पढ़ाया जाता है - चाहे पांच साल का बच्चा है, वह भी यह पाठ तो पढ़ सकता है ना। और बच्चा ज्यादा काम कर सकता है। और जो बुजुर्ग हो गये उन्हों के जिए भी यह पाठ जरूरी है, नहीं तो जीवन से निराश हो जाते हैं। अनपढ़ मातायें उन्हों को भी श्रेष्ठ जीवन तो चाहिए ना। इसलिए सत शिक्षक सभी को पढ़ाता है। चाहे कितना भी वी.वी.वी.आई.पी. हो लेकिन सत् शिक्षक के लिए तो सब स्टूडेण्ट हैं। यह एक ही पाठ सबको पढ़ाता है। तो क्या करेंगे? पाठ पढ़ेंगे ना, फायदा आपको ही होगा। जो करेगा वो पायेगा। जितना करेंगे उतना फायदा होगा - क्योंकि यहॉ एक का पद्मगुणा होकर मिलता है। वहाँ विनाशी में ऐसा नहीं है। अविनाशी पढ़ाई में एक का पद्म हो जायेगा क्योंकि दाता है ना! अच्छा-

राजस्थान जोन से बापदादा की मुलाकात:-

राजस्थान जोन की विशेषता क्या है? राजस्थान में ही मुख्य केन्द्र है। तो जैसे जोन की विशेषता है वैसे राजस्थान निवासियों की भी विशेषता होगी ना! अभी राजस्थान में कोई विशेष हीरे निकलने हैं या आप ही विशेष हीरे हो? आप तो सबसे विशेष हो ही लेकिन सेवा के क्षेत्र में दुनिया की नजरों में जो विशेष हैं, उन्हों को भी सेवा के निमित्त बनाना है। ऐसी सेवा की है? राजस्थान को सबसे नम्बरवन होना चाहिए। संख्या में, क्वालिटी में, सेवा की विशेषता में, सब में नम्बरवन! मुख्य केन्द्र नम्बरवन तो है ही लेकिन उसका प्रभाव सारे राजस्थान में होना चाहिए। अभी नम्बरवन संख्या में महाराष्ट्र, गुजरात को गिनती करते हैं। अभी यह गिनती करें कि सबसे नम्बरवन - राजस्थान है। अभी इस वर्ष तैयारी करो। अगले वर्ष महाराष्ट्र और गुजरात से भी नम्बरवन जाना। निश्चय बुद्धि विजयी। कितने अच्छे-अच्छे अनुभवी रत्न हैं। सेवा को आगे बढ़ायेंगे - जरूर बढ़ेगी। अच्छा-



24-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


वर्तमान ब्राह्मण जन्म - हीरे तुल्य

श्रेष्ठ स्वमान में स्थित करने वाले, राज्य भाग्य अधिकारी बच्चों प्रति बापदादा बोले:-

आज बापदादा अपने सर्व श्रेष्ठ बच्चों को देख रहे हैं। विश्व की तमोगुणी अपवित्र आत्माओं के अन्तर में कितनी श्रेष्ठ आत्मायें हैं! दुनिया में सर्व आत्मायें पुकारने वाली हैं, भटकने वाली, अप्राप्त आत्मायें हैं। कितनी भी विनाशी सर्व प्राप्तियाँ हो फिर भी कोई न कोई अप्राप्ति जरूर होगी। आप ब्राह्मण बच्चों को सर्व प्राप्तियों के दाता के बच्चों को अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। सदा प्राप्ति स्वरूप हो। अल्पकाल के सुख के साधन अल्पकाल के वैभव, अल्पकाल का राज्य अधिकार न होते हुए भी बिन कौड़ी बादशाह हो। बेफिकर बादशाह हो। मायाजीत, प्रकृतिजीत स्वराज्य अधिकारी हो। सदा ईश्वरीय पालना में पलने वाले खुशी के झूले में, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले हो। विनाशी सम्पत्ति के बजाए अविनाशी सम्पत्तिवान हो। रत्न जड़ित ताज नहीं लेकिन परमात्म बाप के सिर के ताज हो। रतन जड़ित शृंगार नहीं लेकिन ज्ञान रत्नों, गुणों रूपी रत्नों के शृंगार से सदा शृंगारे हुए हो। कितना भी बड़ा विनाशी सर्व श्रेष्ठ हीरा हो, मूल्यवान हो लेकिन एक ज्ञान के रत्न, गुण के रत्न के आगे उनकी क्या वैल्यु हैं? इन रत्नों के आगे वह पत्थर के समान हैं। क्योंकि विनाशी हैं। नौ लखे हार के आगे भी आप स्वयं बाप के गले का हार बन गये हो। प्रभु के गले के हार के आगे नौ लाख कहो वा नौ पद्म कहो वा अनगिनत पद्म के मूल्य का हार कुछ भी नहीं है। 36 प्रकार का भोजन भी इस ब्रह्मा भोजन के आगे कुछ नहीं है। क्योंकि डायरेक्ट बापदादा को भोग लगाकर इस भोजन को परमात्म प्रसाद बना देते हो। प्रसाद की वैल्यु आज अन्तिम जन्म में भी भक्त आत्माओं के पास कितनी हैं? आप साधारण भोजन नहीं खाते। प्रभु प्रसाद खा रहे हो। जो एक-एक दाना पद्मों से भी श्रेष्ठ है। ऐसी सर्व श्रेष्ठ आत्मायें हो। ऐसा रूहानी श्रेष्ठ नशा रहता है? चलते-चलते अपनी श्रेष्ठता को भूल तो नहीं जाते हो? अपने को साधारण तो नहीं समझते हो? सिर्फ सुनने वाले या सुनाने वाले तो नहीं! स्वमान वाले बने हो? सुनने-सुनाने वाले तो अनेकानेक हैं। स्वमान वाले कोटों में कोई हैं। आप कौन हो? अनेकों में हो वा कोटों में कोई वालों में हो? प्राप्ति के समय पर अलबेला बनना - उन्हों को बापदादा कौन-सी समझ वाले बच्चे कहें? पाये हुए भाग्य को, मिले हुए भाग्य को अनुभव नहीं किया अर्थात् अभी महान भाग्यवान नहीं बने तो कब बनेंगे? इस श्रेष्ठ प्राप्ति के संगमयुग पर हर कदम यह स्लोगन सदा याद रखो कि ‘‘अभी नहीं तो कभी नहीं’’ समझा। अच्छा!

अभी गुजरात जोन आया है। गुजरात की क्या विशेषता है? गुजरात की यह विशेषता है - छोटा बड़ा खुशी में जरूर नाचते हैं। अपना छोटा-पन, मोटा-पन सभी भूल जाते हैं। रास के लगन में मगन हो जाते। सारी-सारी रात भी मगन रहते हैं। तो जैसे रास की लगन में मगन रहते, ऐसे सदा ज्ञान की खुशी की रास में भी मगन रहते हो ना! इस अविनाशी लगन में मगन रहने के भी नम्बरवन अभ्यासी हो ना! विस्तार भी अच्छा है। इस बारी मुख्य स्थान (मधुबन) के समीप के साथी दोनों जोन आये हैं। एक तरफ है गुजरात, दूसरे तरफ है राजस्थान। दोनों समीप हैं ना! सारे कार्य का सम्बन्ध राजस्थान और गुजरात से है। तो ड्रामा अनुसार दोनों स्थानों को सहयोगी बनने का गोल्डन चांस मिला हुआ है। दोनों हर कार्य में समीप और सहयोगी बने हुए हैं। संगमयुग के स्वराज्य की राजगद्दी तो राजस्थान में हैं ना! कितने राजे तैयार किये हैं? राजस्थान के राजे गाये हुए हैं। तो राजे तैयार हो गये हैं या हो रहे हैं? राजस्थान में राजाओं की सवारियाँ निकलती हैं। तो राजस्थान वालों को ऐसा पूरी सवारी तैयार कर लानी चाहिए। तब तो सब पुष्पों की वर्षा करेंगे ना! बहुत ठाठ से सवारी निकलती है। तो कितने राजाओं की सवारी आयेगी? कम से कम जहाँ सेवाकेन्द्र है वहाँ का एक-एक राजा आवे तो कितने राजे हो जायेंगे। 25 स्थानों के 25 राजे आवें तो सवारी सुन्दर हो जायेगी ना! ड्रामा अनुसार राजस्थान में ही सेवा की गद्दी बनी है। तो राजस्थान का भी विशेष पार्ट है। राजस्थान से ही विशेष सेवा के घोड़े भी निकले हैं ना। ड्रामा में पार्ट है सिर्फ इनको रिपीट करना है।

कर्नाटक का भी विस्तार बहुत हो गया है। अब कर्नाटक वालों को विस्तार से सार निकालना पड़े। जब मक्खन निकालते हैं तो पहले तो विस्तार होता है फिर उससे मक्खन सारनिकलता है। तो कर्नाटक को भी विस्तार से अब मक्खन निकालना है। सार स्वरूप बनना और बनाना है। अच्छा-

अच्छा, अपने श्रेष्ठ स्वमान में स्थित रहने वाले, सर्व प्राप्तियों के भण्डार, सदा संगमयुगी श्रेष्ठ स्वराज्य और महान भाग्य के अधिकारी आत्माओं को, सदा रूहानी नशे और खुशी स्वरूप आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से

सभी अपने स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? स्वराज्य का अधिकार मिल गया? ऐसी अधिकारी आत्मायें शक्तिशाली होंगी ना! राज्य को - ‘सत्ताकहा जाता है। सत्ता अर्थात् शक्ति। आजकल की गवर्मेन्ट को भी कहते हैं - राज्य सत्ता वाली पार्टी है। तो राज्य की सत्ता अर्थात् शक्ति है। तो स्वराज्य कितनी बड़ी शक्ति है? ऐसी शक्ति प्राप्त हुई है? सभी कमेन्द्रियाँ आपकी शक्ति प्रमाण कार्य कर रही हैं? राजा सदा अपनी राज्य सभा को, राज्य दरबार को बुलाकर पूछते हैं कि - कैसे राज्य चल रहा है? तो आप स्वराज्य अधिकारी राजाओं की कारोबार ठीक चल रही है? या कहाँ नीचे-ऊपर होता है? कभी कोई राज्य कारोबारी धोखा तो नहीं देते हैं! कभी आँख धोखा दे, कभी कान धोखा दे, कभी हाथ, कभी पांव धोखा दे! ऐसे धोखा तो नहीं खाते हो! अगर राज्य सत्ता ठीक है तो हर संकल्प, हर सेकण्ड में पद्मों की कमाई है। अगर राज्य सत्ता ठीक नहीं है तो हर सेकण्ड में पद्मों की गँवाई होती है। प्राप्ति भी एक की पद्मगुणा है तो और फिर अगर गँवाते हैं तो एक का पद्मगुणा गँवाते हो। जितना मिलता है - उतना जाता भी है। हिसाब है। तो सारे दिन की राज्य कारोबार को देखो। आँख रूपी मंत्री ने ठीक काम किया? कान रूपी मंत्री ने ठीक काम किया? सबकी डिपार्टमेन्ट ठीक रही या नहीं? यह चेक करते हो या थक कर सो जाते हो? वैसे कर्म करने से पहले ही चेक कर फिर कर्म करना है। पहले सोचना फिर करना। पहले करना पीछे सोचना, यह नहीं। टोटल रिजल्ट निकालना अलग बात है लेकिन ज्ञानी आत्मा पहले सोचेगी फिर करेगी। तो सोचसमझ कर हर कर्म करते हो? पहले सोचने वाले हो या पीछे सोचने वाले हो? अगर ज्ञानी पीछे सोचे उसको ज्ञानी नहीं कहेंगे। इसलिए सदा स्वराज्य अधिकारी आत्मायें हैं और इसी स्वराज्य के अधिकार से विश्व के राज्य अधिकारी बनना ही है। बनेंगे या नहीं - यह क्वेश्चन नहीं। स्वराज्य है तो विश्व राज्य है ही। तो स्वराज्य में गड़बड़ तो नहीं है ना? द्वापर से तो गड़बड़ शालाओं में चक्कर लगाते रहे। अब गड़बड़ शाला से निकल आये, अभी फिर कभी भी किसी भी प्रकार की गड़बड़ शाला में पांव नहीं रखना। यह ऐसी गड़बड़ शाला है एक बार पांव रखा तो भूल भुलैया का खेल है! फिर निकलना मुश्किल हो जाता। इसलिए सदा एक रास्ता। एक में गड़बड़ नहीं होती। एक रास्ते पर चलने वाले सदा खुश - सदा सन्तुष्ट।

बैंगलोर हाईकोर्ट के जस्टिस से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

किस स्थान पर और क्या अनुभव कर रहे हो? अनुभव सबसे बड़ी अथार्टी है। सबसे पहला अनुभव है - आत्म-अभिमानी बनने का। अब आत्म-अभिमानी का अनुभव हो जाता है तो परमात्म-प्यार, परमात्म-प्राप्ति का भी अनुभव स्वत: हो जाता है। जितना अनुभव उतना शक्तिशाली। जन्म-जन्मान्तर के दु:खों से छुड़ाने की जजमेन्ट देने वाले हो ना! या एक ही जन्म के दु:खों से छुड़ाने वाले जज हो? वह तो हुए हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट का जज। यह है स्प्रिचुअल जज। इस जज बनने में पढ़ाई की वा समय की आवश्यकता नहीं है। दो अक्षर ही पढ़ने हैं - आत्मा और परमात्मा। बस। इसके अनुभवी बन गये तो स्प्रिचुअल जज बन गये। जैसे बाप जन्म-जन्म के दु:खों से छुड़ाने वाले हैं - इसलिए बाप को सुख का दाता कहते हैं, तो जैसा बाप वैसे बच्चे। डबल जज बनने से अनेक आत्माओं के कल्याण निमित्त बन जायेंगे। आयेंगे एक केस के लिए और जन्मजन्म के केस जीत कर जायेंगे। बहुत खुश होंगे। तो बाप की आज्ञा है- स्प्रिचुअल जज बनो अच्छा - ओमशान्ति।



26-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


रूहानी विचित्र मेले में सर्व खज़ानों की प्राप्ति

सदा श्रेष्ठ मतदाता शिवबाबा अपने सुपात्र, आज्ञाकारी बच्चों प्रति बोले:-

आज बापदादा बच्चों के मिलन की लगन को दख रहे हैं। सभी दूर-दूर से किस लिए आये हैं? मिलन मनाने के लिए अर्थात् मेले में आये हैं। रूहानी मेला विचित्र मेलाहै। इस मेले का मिलना भी विचित्र है और विचित्र आत्मायें विचित्र बाप से मिलती हैं। यह सागर और नदियों का मेला है। ईश्वरीय परिवार के मिलने का मेला है। यह मेला एक बार के मेले से अनेक बार की सर्व प्राप्ति करने का मेला है। इस मेले में खुले भण्डार, खुले खज़ाने हैं। जिसको जो खज़ाना चाहिए, जितना चाहिए उतना बिगर खर्चे के, अधिकार से ले सकते हैं। लाटरी भी है। जितनी भाग्य की श्रेष्ठ लाटरी लेने चाहे उतनी ले सकते हैं। अभी लाटरी लो और पीछे नम्बर निकलेगा, ऐसा नहीं है। अभी जो लेना हो, जितनी भी लकीर भाग्य की दृढ़ संकल्प द्वारा खीचने चाहो उतनी खींच सकते हो। सेकण्ड में लाटरी ले सकते हो। इस मेले में जन्म-जन्म के लिए राज्य पद का अधिकार ले सकते हो अर्थात् इस मेले में राजयोगी सो जन्म-जन्म के विश्व के राजे बन सकते हो। जितनी बड़ी प्राप्ति की सीट चाहिए वह सीट बुक कर सकते हो। इस मेले में विशेष सभी को एक गोल्डन चांस भी मिलता है। वह गोल्डन चांस है - दिल से मेरा बाबा कहो और बाप के दिलतख्तनशीन बनो।इस मेले में एक विशेष गिफ्ट भी मिलती है - वह गिफ्ट है - छोटा-सा सुखी और सम्पन्न संसार।जिस संसार में जो चाहो सब सदा ही प्राप्त है। वह छोटा-सा संसार बाप में ही संसार है। इस संसार में रहने वाला सदा ही प्राप्तियों के, खुशियों के अलौकिक झूलों में झूलता है। इस संसार में रहने वाले सदा इस देह की मिट्टी के मैले-पन के ऊपर फरिश्ता बन उड़ती कला में उड़ते रहते हैं। सदा रत्नों से खेलते पत्थर बुद्धि और पत्थरों से पार रहते हैं। सदा परमात्म साथ का अनुभव करते हैं। तुम्हीं से खाऊं, तुम्ही से सुनूँ, तुम्हीं से बोलूँ, तुम्हीं से सर्व सम्बन्ध की प्रीत की रीति निभाऊं, तुम्हारी ही श्रीमत पर, आज्ञा पर हर कदम उठाऊं। यही उमंग-उत्साह के, खुशी के गीत गाते रहते हैं। ऐसा संसार इस मिलन मेने में मिलता है। बाप मिला, संसार मिला। ऐसा यह श्रेष्ठ मेला है। तो ऐसे मेले में आये हो ना! ऐसा न हो कि मेला देखते-देखते एक ही प्राप्ति में इतने मस्त हो जाओ जो सर्व प्राप्तियाँ रह जायें। इस रूहानी मेले में सर्व प्राप्ति करके जाना है। बहुत मिला, इसमें ही खुश होकर चले जाओ, ऐसे नहीं करना। पूरा पा करके जाना। अभी भी चेक करो - कि मेले की सर्व प्राप्तियाँ प्राप्त कीं? जब खुला खज़ाना है तो सम्पन्न होकर ही जाना। फिर वहाँ जाकर ऐसे नहीं कहना कि यह भी करना था। जितना चाहिए था उतना नहीं किया। ऐसे तो नहीं कहेंगे ना? तो समझा, इस मेले का महत्व। मेला मनाना अर्थात् महान बनना। सिर्फ आना और जाना नहीं है। लेकिन सम्पन्न प्राप्ति स्वरूप बनना है। ऐसा मेला मनाया है? निमित्त सेवाधारी क्या समझते हैं? वृद्धि, विधि को भी चेन्ज करती हैं। वृद्धि होना भी जरूरी है और हर विधि में सम्पन्न और सन्तुष्ट रहना भी जरूरी है। अभी तो फिर भी बाप और बच्चे के सम्बन्ध से मिलते हो। समीप आते हो। फिर तो दर्शन मात्र रह जायेंगे। अच्छा-

सभी रूहानी मिलन मेला मनाने वाले, सर्व प्राप्तियों का सम्पूर्ण अधिकार पाने वाले, सदा सुखमय सम्पन्न संसार अपनाने वाले, सदा प्राप्तियों के, खुशियों के गीत गाने वाले, ऐसे सदा श्रेष्ठ मत पर चलने वाले, आज्ञाकारी सुपात्र बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

टीचर्स से:- सदा याद और सेवा का बैलेन्स रखने वाली और सदा बाप की ब्लैसिंग लेने वाली। जहाँ बैलेन्स हैं वहाँ बाप द्वारा स्वत: ही आशीर्वाद तो क्या वरदान प्राप्त होते हैं। जहाँ बैलेन्स नहीं वहाँ वरदान भी नहीं। और जहाँ वरदान नहीं होगा वहाँ मेहनत करनी पड़ेगी। वरदान प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् सर्व प्राप्तियाँ सहज हो रही हैं। ऐसे वरदानों को प्राप्त करने वाले सेवाधारी हो ना! सदा एक बाप, एकरस स्थिति और एक मत होकर के चलने वाले। ऐसा ग्रुप है ना। जहाँ एकमत हैं वहाँ सदा ही सफलता है। तो सदा हर कदम में बाप वरदाता द्वारा वरदान प्राप्त करने वाले। ऐसे सच्चे सेवाधारी। सदा अपने को डबल लाइट समझकर सेवा करते रहो। जितना हल्के उतना सेवा में हल्कापन और जितना सेवा में हल्कापन आयेगा उतना सभी सहज उड़ेंगे-उड़ायेंगे। डबल लाइट बन सेवा करना, याद में रहकर सेवा करना - यही सफलता का आधार है। उस सेवा का प्रत्यक्ष फल मिलता ही है।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

संगमयुग सदा सर्व प्राप्ति करने का युग है। संगमयुग श्रेष्ठ बनने और बनाने का युग है। ऐसे युग में पार्ट बजाने वाली आत्मायें कितनी श्रेष्ठ हो गई! तो सदा यह स्मृति रहती है- कि हम संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें हैं? सर्व प्राप्तियों का अनुभव होता है? जो बाप से प्राप्ति होती है उस प्राप्ति के आधार पर सदा स्वयं को सम्पन्न भरपूर आत्मा समझते हो? इतना भरपूर हो जो स्वयं भी खाते रहो और दूसरों को भी बांटो। जैसे बाप के लिए कहा जाता है - भण्डारे भरपूर हैं, ऐसे आप बच्चों का भी सदा भण्डारा भरपूर है! कभी खाली नहीं हो सकता। जितना किसी को देंगे उतना और ही बढ़ता जयेगा। जो संगमयुग की विशेषता है व आपकी विशेषता है। हम संगमयुगी सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मायें हैं, इसी स्मृति में रहो। संगमयुग पुरूषोत्तम युग है, इस युग में पार्ट बजाने वाले भी पुरूषोत्तम हुए ना। दुनिया की सर्व आत्मायें आपके आगे साधारण हैं, आप अलौकिक और न्यारी आत्मायें हो! वह अज्ञानी हैं, आप ज्ञानी हो। वह शूद्र हैं, आप ब्राह्मण हो। वह दु:खधाम वाले हैं और आप संगमयुग वाले हो। संगमयुग भी सुखधाम है। कितने दु:खो से बच गये हो! अभी साक्षी होकर देखते हो कि दुनिया कितनी दु:खी है और उनकी भेंट में आप कितने सुखी हो! फर्क मालूम होता है ना! तो सदा हम पुरूषोत्तम युग की पुरूषोत्तम आत्मायें, सुख स्वरूप श्रेष्ठ आत्मायें हैं, इसी स्मृति में रहो। अगर सुख नहीं, श्रेष्ठता नहीं तो जीवन नहीं।

2. सदा याद की खुशी में रहते हो ना? खुशी ही सबसे बड़े ते बड़ी दुआ और दवा है। सदा यह खुशी की दवा और दुआ लेते रहो तो सदा खुश होने के कारण शरीर का हिसाब-किताब भी अपनी तरफ खींचेगा नहीं। न्यारे और प्यारे होकर शरीर का हिसाब-किताब चुक्तू करेंगे। कितना भी कड़ा कर्मभोग हो, वह भी सूली से काँटा हो जाता है। कोई बड़ी बात नहीं लगती। समझ मिल गई यह हिसाब-किताब है तो खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करने वाले के लिए सब सहज हो जाता है। अज्ञानी हाय-हाय करेंगे और ज्ञानी सदा वाह मीठा बाबा! वाह ड्रामा की स्मृति में रहेंगे। सदा खुशी के गीत गाओ। बस यही याद करो कि जीवन में पाना था वह पा लिया। जो प्राप्ति चाहिए वह सब हो गई। सर्व प्राप्ति के भरपूर भण्डार हैं। जहाँ सदा भण्डार भरपूर हैं वहाँ दु:ख-दर्द सब समाप्त हो जाते हैं। सदा अपने भाग्य को देख हर्षित होते रहो - वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! यही सदा मन में गीत गाते रहो। कितना बड़ा आपका भाग्य है। दुनिया वालों को तो भाग्य में सन्तान मिलेगी, धन मिलेगा, सम्पत्ति मिलेगी लेकिन यहाँ क्या मिलता? स्वयं भाग्य विधाता ही भाग्य में मिल जाता है! भाग्य विधाता जब अपना हो गया तो बाकी क्या रह गया! यह अनुभव है ना! सिर्फ सुनी-सुनाई पर तो नहीं चल पड़े। बड़ों ने कहा भाग्य मिलता है और आप चल पड़े इसको कहते हैं - सुनी-सुनाई पर चलना। तो सुनने से समझते हो वा अनुभव से समझते हो! सभी अनुभवी हो? संगमयुग है ही अनुभव करने का युग। इस युग में सर्व प्राप्ति का अनुभव कर सकते हो। अभी जो अनुभव कर रहे हो। यह सतयुग में नहीं होगा। यहाँ जो स्मृति है वह सतयुग में मर्ज हो जायेगी। यहाँ अनुभव करते हो कि बाप मिला है, वहाँ बाप की तो बात ही नहीं। संगमयुग ही अनुभव करने का युग है। तो इस युग में सभी अनुभवी हो गये! अनुभवी आत्मायें कभी भी माया से धोखा नहीं खा सकती। धोखा खाने से ही दु:ख होता है। अनुभव की अथार्टी वाले कभी धोखा नहीं खा सकते। सदा ही सफलता को प्राप्त करते रहेंगे। सदा खुश रहेंगे। तो वर्तमान सीजन का वरदान याद रखना - सर्व प्राप्ति स्वरूप सन्तुष्ट आत्मायें हैं। सन्तुष्ट बनाने वाले हैं।अच्छा-



29-04-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ज्ञान सूर्य के रूहानी सितारों की भिन्न-भिन्न विशेषताएँ

ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा, बापदादा यथाशक्ति और शक्तिशाली सितारों के प्रति बोले:-

आज ज्ञान सूर्य ज्ञान चन्द्रमा, अपने वैरायटी सितारों को देख रहे हैं। कोई स्नेही सितारे हैं, कोई विशेष सहयोगी सितारें हैं, कोई सहजयोगी सितारे हैं, कोई श्रेष्ठ ज्ञानी सितारे हैं, कोई विशेष सेवा के उमंग वाले सितारे हैं। कोई मेहनत का फल खाने वाले सितारे हैं, कोई सहज सफलता के सितारे हैं। ऐसे भिन्न-भिन्न विशेषताओं वाले सभी सितारे हैं। ज्ञान सूर्य द्वारा सर्व सितारों को रूहानी रोशनी मिलने कारण चमकने वाले सितारे तो बन गये। लेकिन हरेक प्रकार के सितारों की विशेषता की झलक भिन्न-भिन्न है। जैसे स्थूल सितारे भिन्न-भिन्न ग्रह के रूप में भिन्न-भिन्न फल अल्पकाल का प्राप्त कराते हैं। ऐसे ज्ञान सूर्य के रूहानी सितारों का भी सर्व आत्माओं को अविनाशी प्राप्ति का सम्बन्ध है। जैसा स्वयं जिस विशेषतासे सम्पन्न सितारा है वैसा औरों को भी उसी प्रमाण फल की प्राप्ति कराने के निमित्त बनता है। जितना स्वयं ज्ञान चन्द्रमा वा सूर्य के समीप हैं उतना औरों को भी समीप सम्बन्ध में लाते हैं अर्थात् ज्ञान सूर्य द्वारा मिली हुई विशेषताओं के आधार पर औरों को डायरेक्ट विशेषताओं की शक्ति के आधार पर इतना समीप लाया है जो उन्हों का डायरेक्ट ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा से सम्बन्ध हो जाता है। इतने शक्तिशाली सितारे हो ना! अगर स्वयं शक्तिशाली नहीं, समीप नहीं तो डायरेक्ट कनेक्शन नहीं जुटा सकते। दूर होने के कारण उन्हीं सितारों की विशेषता अनुसार उन्हों के द्वारा जितनी शक्ति, सम्बन्ध सम्पर्क प्राप्त कर सकते हैं उतनी यथा शक्ति प्राप्ति करते रहते हैं। डायरेक्ट शक्ति लेने की शक्ति नहीं होती है। इसलिए जैसे ज्ञान सूर्य ऊँचे ते ऊँचे हैं, विशेष सितारे ऊँचे हैं। वैसे ऊँची स्थिति का अनुभव नहीं कर सकते। यथा शक्ति, यथा प्राप्ति करते हैं। जैसी शक्तिशाली स्थिति होनी चाहिए वैसे अनुभव नहीं करते।

ऐसी आत्माओं के सदा यही बोल मन से वा मुख से निकलते कि होना यह चाहिए लेकिन है नहीं। बनना यह चाहिए लेकिन बने नहीं हैं। करना यह चाहिए लेकिन कर नहीं सकते। इसको कहा जाता है - यथाशक्ति आत्मायें। सर्व शक्तिवान आत्मायें नहीं हैं। ऐसी आत्मायें वा स्व के वा दूसरों के विघ्न विनाशक नहीं बन सकते। थोड़ा-सा आगे बढ़े और विघ्न आया। एक विघ्न मिटाया, हिम्मत में आये, खुशी में आये फिर दूसरा विघ्न आयेगा। जीवन की अर्थात् पुरुषार्थी की लाइन सदा क्लीयर नहीं होगी। रूकना, बढ़ना इस विधि से आगे बढ़ते रहेंगे। और औरों को भी बढ़ाते रहेंगे। इसलिए रूकने और बढ़ने के कारण तीव्रगति का अनुभव नहीं होता। कब चलती कला, कब चढ़ती कला, कब उड़ती कला। एकरस शक्तिशाली अनुभूति नहीं होती। कभी समस्या, कभी समाधान स्वरूप। क्योंकि यथाशक्ति है। ज्ञान सूर्य से सर्व शक्तियों को ग्रहण करने की शक्ति नहीं। बीच का कोई सहारा जरूर चाहिए। इसको कहा जाता है - यथा-शक्ति आत्मा।

जैसे यहाँ ऊँची पहाड़ी पर चढ़ते हो। जिस भी वाहन पर आते हो, चाहे बस में, चाहे कार में, तो इन्जन पावरफुल होती है तो तीव्रगति से और बिना कोई हवा पानी के सहारे सीधा ही पहुँच जाते हो। और इन्जन कमज़ोर है तो रूक कर पानी वा हवा का सहारा लेना पड़ता है। नानस्टाप नहीं। स्टाप करना पड़ता है। ऐसी यथा शाक्ति आत्मायें, कोई न कोई आत्माओं का सैलवेशन का, साधनों का आधार लेने के बिना एक तीव्रगति उड़ती कला की मंज़िल पर पहुँच नहीं पाते हैं। कभी कहेंगे - आज खुशी कम हो गई, आज योग इतना शक्तिशाली नहीं है। आज इस धारणा करने में समझते हुए भी कमज़ोर हूँ। आज सेवा का उमंग नहीं आ रहा है। कभी पानी चाहिए, कभी हवा चाहिए, कभी धक्का चाहिए। इसको शक्तिशाली कहेंगे? हूँ तो अधिकारी, लेने में नम्बरवन अधिकारी हूँ। किसी से कम नहीं। और करने में क्या कहते? हम तो छोटे हैं। अभी नये हैं। पुराने नहीं है। सम्पूर्ण थोड़े ही बने हैं। अभी समय पड़ा है। बड़ों का दोष है। हमारा नहीं है। सीख रहे हैं, सीख जायेंगे। बापदादा तो सदा ही कहते हैं। सभी को चांस देना चाहिए। हमको भी यह चांस मिलना चाहिए। हमारा सुनना चाहिए। लेने में हम और करने में जैसे बड़े करेंगे। अधिकार लेने में अब और करने में कब कर लेंगे। लेने में बड़े बन जाते और करने में छोटे बन जाते। इसको कहा जाता है - यथा-शक्ति आत्मा।

बापदादा यह रमणीक खेल देख-देख मुस्कराते रहते हैं। बाप तो चतुर सुजान है। लेकिन मास्टर चतुर सुजान भी कम नहीं। इसलिए यथा-शक्ति आत्मा से अब मास्टर सर्वशक्तिवान बनो। करने वाले बनो। स्वत: ही शक्तिशाली कर्म का फल शुभ भावना, श्रेष्ठ कामना का फल स्वत: ही प्राप्त होगा। सर्व प्राप्ति स्वयं ही आपके पीछे परछाई के समान अवश्य आयेगी। सिर्फ ज्ञान सूर्य की प्राप्त हुई शक्तियों की रोशनी में चलो तो सर्व प्राप्ति-रूपी परछाई आपे ही पीछे-पीछे आयेगी। समझा-

आज यथा-शक्ति और शक्तिशाली सितारों की रिमझिम देख रहे थे। अच्छा –

सभी तीव्रगति से भाग-भाग कर पहुँच गये हैं। बाप के घर में पहुँचे - तो बच्चों को कहेंगे भले पधारे। जैसा जितना भी स्थान है, आपका ही घर है। घर तो एक दिन में बढ़ेगा नहीं लेकिन संख्या तो बढ़ गई है ना। तो समाना पड़ेगा। स्थान और समय को संख्या प्रमाण ही चलाना पड़ेगा। सभी समा गये हो ना! क्यूतो सभी बाद में लगेगी ही। फिर भी अभी भी बहुत-बहुत लकी हो। क्योंकि पाण्डव भवन वा जो स्थान है उसके अन्दर ही समा गये। बाहर तक तो क्यू नहीं गई है ना! वृद्धि होनी है, क्यू भी लगनी है। सदा हर बात में खुशी मौज में रहो। फिर भी बाप के घर में जैसा दिल का आराम कहाँ मिल सकेगा! इसलिए सदा हर हाल में सन्तुष्ट रहना, संगमयुग की वरदानी भूमि की तीन पैर पृथ्वी सतयुग के महलों से भी श्रेष्ठ है। इतनी बैठने की जगह मिली है यह भी बहुत श्रेष्ठ है। यह दिन भी फिर भी याद आयेगा। अभी फिर भी दृष्टि और टोली तो मिलती है। फिर दृष्टि और टोली दिलाने वाले बनना पड़ेगा। वृद्धि हो रही है यह भी खुशी की बात है ना। जो मिलता, जैसे मिलता सब में राजी और वृद्धि अर्थात् कल्याण है। अच्छा-

कर्नाटक विशेष सिकीलधा हो गया है। महाराष्ट्र भी सदा संख्या में महान रहा है। देहली ने भी रेस की है। भल वृद्धि को पाते रहो। यू.पी. भी किसी से कम नहीं है। हर स्थान की अपनी-अपनी विशेषता है। वह फिर सुनायेंगे।

बापदादा को भी साकार शरीर का आधार लेने के कारण समय की सीमा रखनी पड़ती है। फिर भी लोन लिया हुआ शरीर है। अपना तो नहीं है। शरीर का जिम्मेवार भी बापदादा हो जाता है। इसलिए बेहद का मालिक भी हद में बंध जाता है। अव्यक्त वतन में बेहद है। यहाँ तो संयम, समय और शरीर की शक्ति सब देखना पड़ता है। बेहद में आओ, मिलन मनाओ। वहाँ कोई नहीं कहेगा कि अभी आओ अभी जाओ वा नम्बरवार आओ। खुला निमन्त्रण है अथवा खुला अधिकार है। चाहे दो बजे आओ, चाहे चार बजे आओ। अच्छा -

सदा सर्व शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा ज्ञान सूर्य के समीप और समान ऊँची स्थिति में स्थित रहने वाली विशेष आत्माओं को, सदा हर कर्म करने में ‘‘पहले मैं’’ का उमंग-उत्साह रखने वाले हिम्मतवान आत्माओं को, सदा सर्व को शक्तिशाली आत्मा बानाने वाले सर्व समीप बच्चों को ज्ञान-सूर्य, ज्ञान-चन्द्रमा का यादप्यार और नमस्ते।’’

दादियों से:- बापदादा को आप बच्चों पर नाज़ है, किस बात का नाज़ हैं? सदैव बाप अपने समान बच्चों को देख नाज़ करते हैं। जब बच्चे बाप से भी विशेष कार्य करके दिखाते तो बाप को कितना नाज़ होगा! दिन-रात बाप की याद और सेवा यह दोनों ही लगन लगी हुई है। लेकिनि महावीर बच्चों की विशेषता यह है कि पहले याद को रखते फिर सेवा को रखते। घोड़ेसवार और प्यादे पहले सेवा पीछे याद। इसलिए फर्क पड़ जाता है। पहले याद फिर सेवा करें तो सफलता है। पहले सेवा को रखने से सेवा में जो भी अच्छा-बुरा होता है उसके रूप में आ जाते हैं और पहले याद रखने से सहज ही न्यारे हो सकते हैं। तो बाप को भी नाज़ है ऐसे समान बच्चों पर! सारे विश्व में ऐसे समान बच्चे किसके होंगे? एक-एक बच्चे की विशेषता वर्णन करें तो भागवत बन जाए। शुरू से एक महारथी की विशेषता वर्णन करें तो भागवत बन जायेगा। मधुबन में जब ज्ञान-सूर्य और सितारे संगठित रूप में चमकते हैं तो मधुबन के आकाश की शोभा कितनी श्रेष्ठ हो जाती है। ज्ञान-सूर्य के साथ सितारे भी जरूर चाहिए।



01-05-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


विस्तार में सार की सुन्दरता

सर्व को सार स्वरूप में स्थित करने वाले बापदादा शक्तिशाली आत्माओं प्रति बोले:-

‘‘बापदादा विस्तार को भी देख रहे हैं और विस्तार में सार स्वरूप बच्चों को भी देख रहे हैं। विस्तार इस ईश्वरीय वृक्ष का श्रृंगार है। और सार स्वरूप बच्चे इस वृक्ष के फल स्वरूप हैं। विस्तार सदा वैराइटी रूप होता है? और वैराइटी स्वरूप की रौनक सदा अच्छी लगती है। वैराइटी की रौनक वृक्ष का शृंगार जरूर है, लेकिन सार स्वरूप फल शक्तिशाली होता है। विस्तार को देख सदा खुश होते हैं और फल को देख शक्तिशाली बनने की शुभ आशा रखते हैं। बापदादा भी विस्तार के बीच सार को देख रहे थे। विस्तार में सार कितना सुन्दर लगता है! यह तो सभी अनुभवी हो। सार की परसेन्टेज और विस्तार की परसेन्टेज दोनों में कितना अन्तर हो जाता है? यह भी जानते हो ना। विस्तार की विशेषता अपनी है और विस्तार भी आवश्यक है, लेकिन मूल्य सार स्वरूप फल का होता है। इसलिए बापदादा दोनों को देश हर्षित होते हैं। विस्तार रूपी पत्तों से भी प्यार है। फूलों से भी प्यार तो फलों से भी प्यार। इसलिए बापदादा को बच्चों के समान सेवाधारी बन मिलने आना ही पड़ता है। जब तक समान नहीं बनें तो साकार मिलन मना नहीं सकते। चाहे विस्तार वाली आत्मायें हैं, चाहे सार स्वरूप आत्मायें हैं। दोनों ही बाप के बने अर्थात् बच्चे बने, इसलिए बाप को सर्व नम्बरवार बच्चों के मिलन भावना का फल देना ही पड़ता है। जब भक्तों को भी भक्ति का फल अल्पकाल का प्राप्त होता ही है तो बच्चों का अधिकार बच्चों को अवश्य प्राप्त होता है।

आज मुरली चलाने नहीं आये हैं। जो दूर-दूर से सभी आये हैं तो मिलन मनाने का वायदा निभाने आये हैं। कोई सिर्फ प्रेम से मिलते, कोई ज्ञान से मिलते, कोई समान स्वरूप से मिलते। लेकिन बाप को तो सबसे मिलना ही है। आज सब तरफ से आये हुए बच्चों की विशेषता देख रहे थे। एक देहली की विशेषता देख रहे थे। सेवा की आदि का स्थान है और आदि में भी सेवाधारियों को, सेवा की आदि के लिए जमुना का किनारा ही प्राप्त हुआ। जमुना किनारे जाकर सेवा की ना! सेवा का बीज भी देहली में जमुना किनारे पर शुरू हुआ और राज्य का महल भी जमुना किनारे पर ही होगा। इसलिए गोपीवल्लभ, गोप गोपियों के साथ-साथ जमुना किनारा भी गाया हुआ है। बापदादा वह स्थापना की शक्तिशाली बच्चों की टी.वी देख रहे थे। तो देहली वालों की विशेषता वर्तमान समय में भी है और भविष्य में भी है। सेवा का फाउण्डेशन स्थान भी है और राज्य का भी फाउण्डेशन है। फाउण्डेशन स्थान के निवासी इतने शक्तिशाली हो ना! देहली वालों के ऊपर सदा शक्तिशाली रहने की जिम्मेवारी है। देहली निवासी निमित्त आत्माओं को सदा इस जिम्मेवारी का ताज पड़ा हुआ है ना। कभी ताज उतार तो नहीं देते हैं! देहली निवासी अर्थात् सदा जिम्मेवारी के ताजधारी। समझा देहली वालों की विशेषता। सदा इस विशेषता को कर्म में लाना है। अच्छा-

दूसरे हैं सिकीलधे कर्नाटक वाले। वह भावना और स्नेह के नाटक बहुत अच्छे दिखाते हैं। एक तरफ अति भावना और अति अति स्नेही आत्मायें हैं दूसरी तरफ दुनिया के हिसाब से एज्युकेटेड नामीग्रामी भी कर्नाटक में हैं तो भावना और पद के अधिकारी, दोनों ही है। इसलिए कर्नाटक से आवाज़ बुलन्द हो सकता है। धरनी आवाज़ बुलन्द की है। क्योंकि वी.आई.पीज होते हुए भी भावना और श्रद्धा की धरनी होने के कारण निर्मान है। वह सहज साधन बन सकते हैं। कर्नाटक की धरनी इस विशेष कार्य के लिए निमित्त है। सिर्फ अपनी इस विशेषता को भावना और निर्मान दोनों को सेवा में सदा साथ रखें। इस विशेषता को किसी भी वातावरण में छोड़ नहीं दें। कर्नाटक की नाव के दो चप्पू हैं। इन दोनों को साथ-साथ रखना। आगे पीछे नहीं। तो सेवा की नांव धरनी की विशेषता की सफलता दिखायेंगी। दोनों का बैलेन्स नाम बाला करेगा। अच्छा-

सदा स्वयं को सार स्वरूप अर्थात् फल स्वरूप बनाने वाले, सदा सार स्वरूप में स्थित हो औरों को भी सार की स्थिति में स्थित करने वाले, सदा शक्तिशाली आत्मा, शक्तिशाली याद स्वरूप, शक्तिशाली सेवाधारी, ऐसे समान स्वरूप मिलन मनाने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

अव्यक्त बापदादा की पार्टियों से मुलाकात

1. सदा अपने को बाप के वर्से के अधिकारी अनुभव करते हो? अधिकारी अर्थात् शक्तिशाली आत्मा हैं - ऐसे समझते हुए कर्म करो। कोई भी प्रकार की कमज़ोरी रह तो नहीं गई है? सदा स्वयं को जैसे बाप वैसे हम, बाप सर्व शक्तिवान है तो बच्चे मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, इस स्मृति से सदा ही सहज आगे बढ़ते रहेंगे। यह खुशी सदा रहे क्योंकि अब की खुशी सारे कल्प में नहीं हो सकती। अब बाप द्वारा प्राप्ति है, फिर आत्माओं द्वारा आत्माओं को प्राप्ति है। जो बाप द्वारा प्राप्ति होती है वह आत्माओं से नहीं हो सकती। आत्मा स्वयं सर्वज्ञ नहीं है। इसलिए उससे जो प्राप्ति होती है वह अल्पकाल की होती है और बाप द्वारा सदाकाल की अविनाशी प्राप्ति होती है। अभी बाप द्वारा अविनाशी खुशी मिलती है। सदा खुशी में नाचते रहते हो ना! सदा खुशी के झूले में झूलते रहो। नीचे आया और मैला हुआ। क्योंकि नीचे मिट्टी है। सदा झूले में तो सदा स्वच्छ। बिना स्वच्छ बने बाप से मिलन मना नहीं सकते। जैसे बाप स्वच्छ हैं उससे मिलने की विधि स्वच्छ बनना पड़े। तो सदा झूले में रहने वाले सदा स्व्च्छ। जब झूला मिलता है तो नीचे आते क्यों! झूले में ही खाओ, पियो, चलो... इतना बड़ा झूला है। नीचे आने के दिन समाप्त हुए। अभी झूलने के दिन हैं। तो सदा बाप के साथ सुख के झूले में, खुशी, प्रेम, ज्ञान, आनन्द के झूले में झूलने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हैं, यह सदा याद रखो। जब भी कोई बात आये तो यह वरदान याद करना तो फिर से वरदान के आधार पर साथ का, झूलने का अनुभव करेंगे। यह वरदान सदा सेफ्टी का साधन है। वरदान याद रहना अर्थात् वरदाता याद रहना। वरदान में कोई मेहनत नहीं होती। सर्व प्राप्तियाँ सहज हो जाती हैं।

2. सभी अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा अनुभव करते हो? सबसे बड़ा भाग्य - भाग्यविधाता अपना बन गया। सदा इस श्रेष्ठ भाग्य की खुशी और नशा रहे। यह रूहानी नशा है जो सदा रह सकता है। विनाशी नशा सदा रहे तो नुकसान हो जाए। जो इस रूहानी नशे में होगा उसको स्वत: ही इस पुरानी दुनिया की आकर्षण भूली हुई होगी। ना पुरानी देह, न पुराने देह के सम्बन्ध, सभी सहज ही भूल जाते हैं। भूलने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। देह भान भी भूला हुआ होगा। आत्म अभिमानी होंगे। सदा देही-अभिमानी स्थिति ही सम्पूर्ण स्थिति है। तो सदा इसी स्मृति में रहो कि हम भाग्यवान आत्मायें हैं, कोई साधारण भाग्यवान, कोई श्रेष्ठ भाग्यवान हैं। श्रेष्ठ’ - शब्द सदा याद रखना, ‘‘श्रेष्ठ आत्मा हूँ, श्रेष्ठ बाप का हूँ और श्रेष्ठ भाग्यवान हूँ’’ - यही वरदान सदा साथ रहे। जब श्रेष्ठ आत्मा, श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ कृत्ति हो जायेगी तो आप सबको देखकर अनेक आत्माओं को श्रेष्ठ बनने की शुभ आशा उत्पन्न होगी। इससे सेवा भी हो जायेगी।

विदाई के समय:- गुड-मोर्निंग तो सब करते हैं लेकिन आपकी गाड के साथ मोर्निंग है तो गाडली-मोर्निंग हो गई ना। गाड के साथ रात बिताई और गाड के साथ मोर्निंग मना रहे हो। तो सदा गाड और गुडदोनों ही याद रहें। गाड की याद ही गुड बनाती है। अगर गाड की याद नहीं तो गुड नहीं बन सकते। आप सबकी सदा ही गाडली लाइफ है, इसलिए हर सेकण्ड, हर संकल्प गुड ही गुड है। तो सिर्फ गुड-मोर्निंग, गुड-इवनिंग, गुड-नाइट नहीं लेकिन हर सेकण्ड, हर संकल्प गाड की याद के कारण गुड है। ऐसे अनुभव करते हो? अभी जीवन ही गुड है क्योंकि जीवन ही गाड के साथ है। हर कर्म बाप के साथ करते हो ना। अकेले तो नहीं करते? खाते हो तो बाप के साथ, या अकेले खा लेते हो? सदा गाड और गुड दोनों का सम्बन्ध याद रखो और जीवन में लाओ। समझा - अच्छा सभी को बापदादा का विशेष अमृतवेले का अमर यादप्यार और नमस्ते।’’

प्रश्न:- फरिश्ता बनने के लिए किस बन्धन से मुक्त होना पड़ेगा?

उत्तर:- मन के बन्धनों से मुक्त बनो। मन के व्यर्थ संकल्प भी फरिश्ता नहीं बनने देंगे। इसलिए फरिश्ता अर्थात् जिसका मन के व्यर्थ संकल्पों से भी रिश्ता नहीं। सदा यह याद रहे कि हम फरिश्ते किसी रिश्ते में बंधने वाले नहीं। अच्छा-



03-05-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


परमात्मा की सबसे पहली श्रेष्ठ रचना - ब्राह्मण

दिलाराम बापदादा अपने ब्राह्मण बच्चों प्रति बोले:-

आज रचता बाप अपनी रचना को, उसमें भी पहली रचना ब्राह्मणआत्माओं को देख रहे हैं। सबसे पहली श्रेष्ठ रचना आप ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्मायें हो, इसलिए सर्व रचना से प्रिय हो। ब्रह्मा द्वारा ऊँचे ते ऊँची रचना - मुख वंशावली महान आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें हो। देवताओं से भी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मायें गाई हुई हैं। ब्राह्मण ही फरिश्ता सो देवता बनते हैं। लेकिन ब्राह्मण जीवन आदि पिता द्वारा संगमयुगी आदि जीवन है। आदि संगमवासी ज्ञानस्वरूप त्रिकालदर्शी, त्रिनेत्री ब्राह्मण आत्मायें हैं। साकार स्वरूप में साकारी सृष्टि पर आत्मा और परमात्मा के मिलन और सर्व सम्बन्ध के प्रीति की रीति का अनुभव परमात्म-अविनाशी खज़ानों का अधिकार, साकार स्वरूप से ब्राह्मणों का ही यह गीत है - हमने देखा हमने पाया शिव बाप को ब्रह्मा बाप द्वारा। यह देवताई जीवन का गीत नहीं है। साकार सृष्टि पर इस साकारी नेत्रों द्वारा दोनों बाप को देखना उनके साथ खाना-पीना, चलना, बोलना, सुनना, हर चरित्र का अनुभव करना, विचित्र को चित्र से देखना यह श्रेष्ठ भाग्य ब्राह्मण जीवन का है।

ब्राह्मण ही कहते हैं - हमने भगवान को बाप के रूप में देखा। माता, सखा, बन्धु, साज़न के स्वरूप में देखा। जो ऋषि मुनि, तपस्वी, विद्वान आचार्य, शास्त्र सिर्फ महिमा गाते ही रह गये। दर्शन के अभिलाषी रह गये। कब आयेगा, कब मिल ही जायेगा। इसी इन्तजार में जन्म-जन्म के चक्र में चलते रहे लेकिन ब्राह्मण आत्मायें फलक से, निश्चय से कहती, नशे से कहती, खुशी-खुशी से कहती, दिल से कहती - हमारा बाप अब मिल गया। वह तरसने वाले और आप मिलन मनाने वाले। ब्राह्मण जीवन अर्थात् सर्व अविनाशी अखुट, अटल, अचल सर्व प्राप्ति स्वरूप जीवन, ब्राह्मण जीवन इस कल्प-वृक्ष का फाउण्डेशन, जड़ है। ब्राह्मण जीवन के आधार पर वह वृक्ष वृद्धि को प्राप्त करता है। ब्राह्मण जीवन की जड़ों से सर्व वैराइटी आत्माओं को बीज द्वारा मुक्ति-जीवनमुक्ति की प्राप्ति का पानी मिलता है। ब्राह्मण जीवन के आधार से यह टाल-टालियाँ विस्तार को पाती है। तो ब्राह्मण आत्मायें सारे वैराइटी वंशावली की पूर्वज हैं। ब्राह्मण आत्मायें विश्व  के सर्व श्रेष्ठ कार्य का, निर्माण का मुहूर्त करने वाली हैं। ब्राह्मण आत्मायें ही अवश्मेध राजस्व यज्ञ, ज्ञान यज्ञ रचने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हैं। ब्राह्मण आत्मायें हर आत्मा के 84 जन्म की जन्मपत्री जानने वाली हैं। हर आत्मा के श्रेष्ठ भाग्य की रेखा विधाता द्वारा श्रेष्ठ बनाने वाली हैं। ब्राह्मण आत्मायें महान यात्रा - मुक्ति-जीवनमुक्ति की यात्रा कराने के निमित्त हैं। ब्राह्मण आत्मायें सर्व आत्माओं को सामूहिक सगाई बाप से कराने वाली हैं। परमात्म हाथ में हाथ का हथियाला बंधवाने वाली हैं। ब्राह्मण आत्मायें जन्म-जन्म के लिए सदा पवित्रता का बन्धन बाँधने वाली हैं। अमरकथा कर अमर बनाने वाली हैं। समझा - कितने महान हो और कितने जिम्मेवार आत्मायें हो! पूर्वज हो। जैसे पूर्वज वैसी वंशावली बनती है। साधारण नहीं हो। परिवार के जिम्मेवार वा कोई सेवा स्थान के जिम्मेवार - इस हद के की जिम्मेवार नहीं हो। विश्व की आत्माओं के आधार मूर्त हो। उद्धार मूर्त हो। बेहद की जिम्मेवारी हर ब्राह्मण आत्मा के ऊपर है। अगर बेहद की जिम्मेवारी नहीं निभाते, अपनी लौकिक प्रवृत्ति वा अलौकिक प्रवृत्ति में ही कभी उड़ती कला, कब चढ़ती कला, कब चलती कला, कब रूकती कला, इसी कलाबाजी में ही समय लगाते, वह ब्राह्मण नहीं लेकिन क्षत्रिय आत्मायें हैं। पुरूषार्थ की कमाल पर यह करेंगे, ऐसे करेंगे-करेंगे के तीर निशान-अन्दाजी करते रहते हैं। निशान-अन्दाजी और निशान लग जाए इसमें अन्तर है। वह निशान का अन्दाज करते रह जाते। अब करेंगे, ऐसे करेंगे। यह निशान का अन्दाज करते। उसको कहते हैं - क्षत्रिय आत्मायें। ब्राह्मण आत्मायें निशान का अन्दाजा नहीं लगातीं। सदा निशान पर ही स्थित होती हैं। सम्पूर्ण निशाना सदा बुद्धि में है ही है। सेकण्ड के संकल्प से विजयी बन जाते। बापदादा - ब्राह्मण बच्चे और क्षत्रिय बच्चे दोनों का खेल देखते रहते हैं। ब्राह्मणों का विजय का खेल और क्षत्रियों को सदा तीर कमान के बोझ उठाने का खेल। हर समय पुरूषार्थ की मेहनत का कमान है ही है। एक समस्या को समाधान करते ही हैं तो दूसरी समस्या खड़ी हो जाती। ब्राह्मण समाधान स्वरूप हैं। क्षत्रिय बार-बार समस्या को समाधान करने में लगे हुए रहते। जैसे साकार रूप में हँसी की कहानी सुनाते थे ना। क्षत्रिय क्या करत भये! इसकी कहानी है ना - चूहा निकालते तो बिल्ली आ जाती। आज धन की समस्या कल मन की, परसों तन की वा सम्बन्घ सम्पर्क वालों की। मेहनत में ही लगे रहते हैं। सदा कोई न कोई कम्पलेन्ट जरूर होगी। चाहे अपनी हो, चाहे दूसरों की हो। बापदादा ऐसे समय प्रति समय कोई न कोई मेहनत में लगे रहने वाले बच्चों को देख दयालु कृपालु के रूप से देख रहम भी करते हैं।

संगमयुग, ब्राह्मण जीवन दिलाराम की दिल पर आराम करने का समय है। दिल पर आराम से रहो। ब्रह्मा भोजन खाओ। ज्ञान-अमृत पियो। शक्तिशाली सेवा करो और आराम मौज से दिलतख्त पर रहो। हैरान क्यों होते हो। हे राम नहीं कहते। हे बाबा या हे दादी-दीदी तो कहते हो ना! हे बाबा, हे दादी-दीदी कुछ सुना। कुछ करो। यह हैरान होना है। आराम से रहने का युग है। रूहानी मौज करो। रूहानी मौजों में यह सुहावने दिन बिताओ। विनाशी मौज नहीं करना। गाओ, नाचो, मुरझाओं नहीं। परमात्म मौजों का समय अब नहीं मनाया तो कब मनायेंगे! रूहानी शान में बैठो। परेशान क्यों होते हो? बाप को आश्चर्य लगता है - छोटी-सी चींटी से परेशान हो जाते हो। क्योंकि शान से परे हो जाते तो चींटी बुद्धि तक चली जाती है। बुद्धियोग विचलित कर देती है। जैसे स्थूल शरीर में भी चींटी काटेगी तो शरीर हिलेगा, विचलित होगा ना। वैसे बुद्धि को विचलित कर देती है। चींटी अगर हाथी के कान पर जाती है तो मूर्छित कर देती है ना! ऐसे ब्राह्मण आत्मा मूर्छित हो क्षत्रिय बन जाती है। समझा क्या खेल करते हो! क्षत्रिय नहीं बनना। फिर राजधानी भी त्रेतायुगी मिलेगी। सतयुगी देवताओं ने खा-पीकर जो बचाया होगा वह क्षत्रियों को त्रेता में मिलेगा। कर्म के खेत का पहला पूर ब्राह्मण सो देवताओं को मिलता है। और दूसरा पूर, क्षत्रियों को मिलता है। खेत के पहले पूर की टेस्ट और दूसरे पूर में टेस्ट क्या हो जाती है, यह तो जानते हो ना! अच्छा-

महाराष्ट्र और यू.पी. जोन है। महाराष्ट्र की विशेषता है। जैसे महाराष्ट्र नाम है वैसे महान आत्माओं का सुन्दर गुलदस्ता बापदादा को भेंट करेंगे। महाराष्ट्र की राजधानी सुन्दर और सम्पन्न है। तो महाराष्ट्र को ऐसे सम्पन्न नामीग्रामी आत्माओं को सम्पर्क में लाना है। इसलिए कहा कि महान आत्मा बनाए सुन्दर गुलदस्ता बाप के सामने लाना है। अब अन्त के समय में इन सम्पत्ति वालों का भी पार्ट है। सम्बन्ध में नहीं, लेकिन सम्पर्क का पार्ट है। समझा!

यू.पी. में देश-विदेश में प्रसिद्ध वन्डर आफ दि वर्ल्ड ताजमहलहै ना! जैसे यू.पी. में वर्ल्ड की वन्डरफुल चीज़ है ऐसे यू.पी. वालों को सेवा में वन्डरफुल प्रत्यक्ष फल दिखाना है। जो देश विदेश में, ब्राह्मण संसार में नामीग्रामी  हो कि यह तो बहुत वन्डरफुल काम किया, वन्डरफुल आफ वर्ल्ड हो। ऐसा वन्डरफुल कार्य करना है। गीता पाठशालायें हैं, सेन्टर हैं, यह वन्डरफुल नहीं। जो अब तक किसी ने नहीं किया वह करके दिखायें तब कहेंगे - वन्डरफुल। समझा। विदेशी भी अब हाजर-नाज़र हो गये हैं, हर सीजन में। विदेश वाले विदेश के साधनों द्वारा विश्व में दोनों बाप को हाजर-नाज़र करेंगे। नाज़र अर्थात् इस नजर से देख सकें। तो ऐसे बाप को विश्व के आगे हाजर-नाज़र करेंगे। समझा विदेशियों को क्या करना है! अच्छा- कल तो सारी बारात जाने वाली है। आखिर वह भी दिन आयेगा - जो हेलीकाप्टर भी उतरेंगे। सब साधन तो आपके लिए ही बन रहे हैं। जैसे सतयुग में विमानों की लाइन लगी हुई होती है। अभी यहाँ जीप और बसों की लाइन लगी रहती। आखिर विमानों की भी लाइन लगेगी। सभी डर कर भागेंगे और सब कुछ आपको देकर जायेंगे। वह डरेंगे और आप उड़ेगे। आपको मरने का डर तो है नहीं। पहले ही मर गये। पाकिस्तान में सैम्पल देखा था ना - सब चाबियाँ देकर चले गये। तो सब चाबियाँ आपको मिलनी हैं। सिर्फ सम्भालना। अच्छा-

सदा ब्राह्मण जीवन की सर्व विशेषताओं को जीवन में लाने वाले, सदा दिलाराम बाप के दिलतख्त पर रूहानी मौज, रूहानी आराम करने वाले, स्थूल आराम नहीं कर लेना, सदा संगमयुग के श्रेष्ठ शान में रहने वाले, मेहनत से मुहब्बत की जीवन में लवलीन रहने वाले, श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’



07-05-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


बैलेन्स रखने से ही ब्लैसिंग की प्राप्ति

प्यार के सागर, आनन्द के सागर शिवबाबा, पद्मापद्म भाग्यवान बच्चों प्रति बोले:-

आज प्रेम स्वरूप, याद स्वरूप बच्चों को प्रेम और याद का रिटर्न देने के लिए प्रेम के सागर बाप इस प्यार की महफिल बीच आये हैं। यह रूहानी प्यार की महफिल रूहानी सम्बन्ध की मिलन महफिल है। जो सारे कल्प में अब ही अनुभव करते हो। सिवाए इस एक जन्म के और कब भी रूहानी बाप का रूहानी प्यार मिल न सके। यह रूहानी प्यार रूहों को सच्ची राहत देता है। सच्ची राह बताता है। सच्ची सर्व प्राप्ति कराता है। ऐसा कभी संकल्प में भी आया था कि इस साकार सृष्टि में इस जन्म में और ऐसी सहज विधि से ऐसे आत्मा और परमात्मा का रूहानी मिलन सन्मुख होगा? जैसे बाप के लिए सुना था कि ऊँचे ते ऊँचा बहुत तेजोमय, बड़े ते बड़ा है, वैसे ही मिलने की विधि भी मुश्किल और बड़े अभ्यास से होगी यह सोचते-सोचते नाउम्मीद हो गये थे। लेकिन बाप ने नाउम्मीद बच्चों को उम्मीदवार बना दिया। दिलशिकस्त बच्चों को शक्तिशाली बना दिया। कब मिलेगा, वह अब मिलन का अनुभव करा दिया। सारे प्रापर्टी का अधिकारी बना दिया। अभी अधिकारी आत्मायें अपने अधिकार को जानते हो ना! अच्छी तरह से जान लिया है वा जानना है?

आज बापदादा बच्चों को देख रूह-रूहान कर रहे थे कि सभी बच्चों को निश्चय भी सदा है, प्यार भी है, याद की लगन भी है, सेवा का उमंग भी है। लक्ष्य भी श्रेष्ठ है। किसी से भी पूछेंगे क्या बनना है? तो सभी कहेंगे लक्ष्मी-नारायणबनने वाले हैं। राम-सीता कोई नहीं कहते। 16 हजार की माला भी दिल से पसन्द नहीं करते। 108 की माला के मणके बनेंगे। यही उमंग सभी को रहता है। सेवा में, पढ़ाई में हरेक अपने को किसी से भी कम योग्य नहीं समझते हैं। फिर भी सदा एकरस स्थिति, सदा उड़ती कला की अनुभूति, सदा एक में समाये हुए, देह और देह की अल्पकाल की प्राप्तियों से सदा न्यारे, विनाशी सुध-बुध भूले हुए हो, ऐसी सदा की स्थिति अनुभव करने में नम्बरवार हो जाते हैं। यह क्यों? बापदादा इसका विशेष कारण देख रहे थे। क्या कारण देखा? एक ही शब्द का कारण है।

सब कुछ जानते हैं और सब कुछ सबको प्राप्त भी है, विधि का भी ज्ञान है, सिद्धि का भी ज्ञान है। कर्म और फलदोनों का ज्ञान है। लेकिन सदा बैलेन्स में रहना नहीं आता। यह बैलेन्स की ईश्वरीय नीतिसमय पर निभाने नहीं आती। इसलिए हर संकल्प में, हर कर्म में बापदादा तथा सर्व श्रेष्ठ आत्माओं की श्रेष्ठ आशीर्वाद, ब्लैसिंग प्राप्त नहीं होती। मेहनत करनी पड़ती है। सहज सफलता अनुभव नहीं होती। किस बात का बैलेन्स भूल जाता है? एक तो याद और सेवा। याद में रह सेवा करना - यह है याद और सेवा का बैलेन्स। लेकिन सेवा में रह समय प्रमाण याद करना, समय मिला याद किया, नहीं तो सेवा को ही याद समझना इसको कहा जाता है - अनबैलेन्स। सिर्फ सेवा ही याद है और याद में ही सेवा है। यह थोड़ा-सा विधि का अन्तर सिद्धि को बदल लेता है। फिर जब रिजल्ट पूछते कि याद की परसेन्टज कैसी रही? तो क्या कहते? सेवा में इतने बिजी थे, कोई भी बात याद नहीं थी। समय ही नहीं था या कहते सेवा भी बाप की ही थी, बाप तो याद ही था। लेकिन जितना सेवा में समय और लगन रहीं उतना ही याद की शक्तिशाली अनुभूति रहीं? जितना सेवा में स्वमान रहा उतना ही निर्मान भाव रहा? ये बैलेन्स रहा? बहुत बड़ी, बहुत अच्छी सेवा की यह स्वमान तो अच्छा है लेकिन जितना स्वमान उतना निर्मान भाव रहे। करावनहार बाप ने निमित्त बन सेवा कराई। यह है निमित्त, निर्मान भाव। निमित्त बने, सेवा अच्छी हुई, वृद्धि हुई, सफलता स्वरूप बनें, यह स्वमान तो अच्छा है लेकिन सिर्फ स्वमान नहीं, निर्मान भाव का भी बैलेन्स हो। यह बैलेन्स सदा ही सहज सफलता स्वरूप बना देता है। स्वमान भी जरूरी है। देह भान नहीं, स्वमान। लेकिन स्वमान और निर्माण दोनों का बैलेन्स न होने कारण स्वमान, देह अभिमान में बदल जाता है। सेवा हुई, सफलता हुई, यह खुशी तो होनी चाहिए। वाह बाबा! आपने निमित्त बनाया मैंने नहीं किया, यह मैं-पन स्वमान को देह अभिमान में ले आता है। याद और सेवा का बैलेन्स रखने वाले स्वमान और निर्मान का भी बैलेन्स रखते। तो समझा बैलेन्स किस बात में नीचे ऊपर होता है!

ऐसे ही जिम्मेवारी के ताजधारी होने के कारण हर कार्य में जिम्मेवारी भी पूरी निभानी है। चाहे लौकिक सो अलौकिक प्रवृत्ति है, चाहे ईश्वरीय सेवा की प्रवृत्ति है। दोनों प्रवृत्ति की अपनी-अपनी जिम्मेवारी निभाने में जितना न्यारा उतना प्यारा! यह बैलेन्स हो। हर जिम्मावारी को निभाना यह भी आवश्यक है लेकिन जितनी बड़ी जिम्मेवारी उतना ही डबल लाइट। जिम्मेवारी निभाते हुए जिम्मेवारी के बोझ से न्यारे हो। इसको कहते हैं - बाप का प्यारा। घबरावे नहीं क्या करूँ, बहुत जिम्मेवारी है। यह करूँ, वा नहीं। क्या करूँ, यह भी करूँ वह भी करूँ, बड़ा मुश्किल है। यह महसूसता अर्थात् बोझ है! तो डबल लाइट तो नहीं हुए ना। डबल लाइट अर्थात् न्यारा। कोई भी जिम्मेवारी के कर्म के हलचल का बोझ नहीं। इसको कहा जाता है - न्यारे और प्यारे का बैलेन्स रखने वाले।

दूसरी बात:- पुरूषार्थ में चलते-चलते पुरूषार्थ से जो प्राप्ति होती उसका अनुभव करते करते बहुत प्राप्ति के नशे और खुशी में आ जाते। बस हमने पा लिया, अनुभव कर लिया। महावीर, महारथी बन गये, ज्ञानी बन गये, योगी भी बन गये। सेवाधारी भी बन गये। यह प्राप्ति बहुत अच्छी है लेकिन इस प्राप्ति के नशें में अलबेलापन भी आ जाता है। इसका कारण? ज्ञानी बने, योगी बने, सेवाधारी बने लेकिन हर कदम में उड़ती कला का अनुभव करते हो? जब तक जीना है तब तक हर कदम में उड़ती कला में उड़ना है। इस लक्ष्य से जो आज करते उसमें और नवीनता आई वा जहाँ तक पहुँचे वही सीमा सम्पूर्णता की सीमा समझ लिया? पुरूषार्थ में प्राप्ति का नशा और खुशी भी आवश्यक है लेकिन हर कदम में उन्नति वा उड़ती कला का अनुभव भी आवश्क है। अगर यह बैलेन्स नहीं रहता तो अबलेलापन, ब्लैसिंग प्राप्त करा नहीं सकता। इसलिए पुरुषार्थी जीवन में जितना पाया उसका नशा भी हो और हर कदम में उन्नति का अनुभव भी हो। इसको कहा जाता है - ‘‘बैलेन्स’’। यह बैलेन्स सदा रहे। ऐसे नहीं समझना हम तो सब जान गये। अनुभवी बन गये। बहुत अच्छी रीति चल रहे हैं। अच्छे बने हो यह तो बहुत अच्छा है लेकिन और आगे उन्नति को पाना है। ऐसे विशेष कर्म कर सर्व आत्माओं के आगे निमित्त एक्जैम्पुल बनना है। यह नहीं भूलना। समझा, किन-किन बातों में बैलेन्स रखना है? इस बैलेन्स द्वारा स्वत: ही ब्लैसिंग मिलती रहती है। तो समझा नम्बर क्यों बनते हैं? कोई किस बात के बैलेन्स में कोई किस बात के बैलेन्स में अलबेले बन जाते हैं।

बाम्बे निवासी तो अलबेले नहीं हो ना? हर बात में बैलेन्स रखने वाले हो ना? बैलेन्स की कला में होशियार हो ना। बैलेन्स भी एक कला है। इस कला में सम्पन्न हो ना! बाम्बे को कहा ही जाता है - सम्पत्ति सम्पन्न देश। तो बैलेन्स की सम्पत्ति, ब्लैसिंग की सम्पत्ति में भी सम्पन्न हो ना! नरदेसावर की ब्लैसिंग है! बाम्बे वाले क्या विशेषता दिखायेंगे? बाम्बे में मल्टीमिल्यनियर्स बहुत है ना। तो बाम्बे वालों को ऐसी आत्माओं को यह अनुभव कराना आवश्यक है कि रूहानी अविनाशी पद्मापद्मपति सर्व खज़ानों की खानों के मालिक क्या होता है, यह उन्हों को अनुभव कराओ। यह तो सिर्फ विनाशी धन के मालिक हैं, ऐसे लोगों को इस अविनाशी खज़ाने का महत्व सुनाकर अविनाशी सम्पत्ति सम्पन्न बनाओ। वो महसूस करें कि यह खज़ाना अविनाशी श्रेष्ठ खज़ाना है। ऐसी सेवा कर रहे हो ना! सम्पत्ति वालों की नजर में यह अविनाशी सम्पत्तिवान आत्मायें श्रेष्ठ हैं, ऐसा अनुभव करें। समझा। ऐसे नहीं सोचना कि इन्हों का पार्ट तो है ही नहीं। अन्त में इन्हों के भी जागने का पार्ट है। सम्बन्ध में नहीं आयेंगे, लेकिन सम्पर्क में आयेंगे। इसलिए अब ऐसी आत्माओं को भी जगाने का समय पहुँच गया है। तो जगाओ, खूब अच्छी तरह से जगाओ। क्योंकि सम्पत्ति के नशे की नींद में सोये हुए हैं। नशे वालों को बार-बार जगाना पड़ता है। एक बार से नहीं जागते। तो अब ऐसे नशे में सोने वाली आत्माओं को अविनाशी सम्पत्ति के अनुभवों से परिचित कराओ। समझा। बाम्बे वाले तो मायाजीत हो ना! माया को समुद्र में डाल दिया ना। तले में डाला है या ऊपर-ऊपर से? अगर ऊपर कोई चीज़ होती है तो फिर लहरों से किनारे आ जाती, तले में डाल दिया तो स्वाहा। तो माया फिर किनारे तो नहीं आ जाती है ना? बाम्बे निवासियों को हर बात में एक्जैम्पुल बनना है। हर विशेषता में एक्जैम्पुल। जैसे बाम्बे की सुन्दरता देखने के लिए सभी दूर-दूर से भी आते हैं ना! ऐसे दूर-दूर से देखने आयेंगे। हर गुण के प्रैक्टिकल स्वरूप एक्जैम्पल बनो। सरलताजीवन में देखनी हो तो इस सेन्टर में जाकर इस परिवार को देखो। सहनशीलतादेखनी हो तो इस सेन्टर में इस परिवार में जाकर देखो। बैलेन्सदेखना हो तो इन विशेष आत्माओं में देखो। ऐसी कमाल करने वाले हो ना! बाम्बे वालों को डबल रिटर्न करना है। एक जगत अम्बा माँ की पालना का और दूसरा ब्रह्मा बाप की विशेष पालना का। जगत अम्बा माँ की पालना भी बाम्बे वालों को विशेष मिली है। तो बाम्बे को इतना रिटर्न करना पड़ेगा ना। हर एक स्थान, हरेक विशेष आत्मा द्वारा बाप की माँ की विशेष आत्माओं की विशेषता दिखाई दे - इस को कहा जाता है - रिटर्न करना। अच्छा - भले पधारे। बाप के घर में वा अपने घर में भले पधारे।

बाप तो सदा बच्चों को देख हर्षित होते हैं। एक-एक बच्चा विश्व का दीपक है। सिर्फ कुल का दीपक नहीं, विश्व का दीपक है। हरेक विश्व के कल्याण अर्थ निमित्त बने हुए हैं तो विश्व के दीपक हो गये ना! वैसे तो सारा विश्व भी बेहद का कुल है। उसी नाते से बेहद के कुल के दीपक भी कह सकते हैं। लेकिन हद के कुल के नहीं। बेहद के कुल के दीपक कहो वा विश्व के दीपक कहो। ऐसे हो ना! सदा जगे हुए दीपक हो ना? टिमटिमाने वाले तो नहीं! जब लाइट टिमटिमाती है तो देखने से आँखें खराब हो जाती हैं। अच्छा नहीं लगता है ना। तो सदा जगे हुए दीपक हो ना! ऐसे दीपकों को देख बापदादा सदा हर्षित होते हैं। समझा। अच्छा-

सदा हर कर्म में बैलेन्सरखने वाले, सदा बाप द्वारा ब्लैसिंग लेने वाले, हर कदम में उड़ती कला के अनुभव करने वाले, सदा प्यार के सागर में समाये हुए, समान स्थिति में स्थित रहने वाले, पद्मापद्म भाग्यवान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार औन नमस्ते।’’

दादियों से:- सभी ताजधारी रत्न हो ना! सदा जितना बड़ा ताज उतना ही हल्के से हल्के। ऐसा ताज धारण किया है, इस ताज को धारण करके हर कर्म करते हुए भी ताजधारी रह सकते हैं। जो रत्न जड़ित ताज होगा वह फिर भी समय प्रमाण धारण करते और उतारते हैं लेकिन यह ताज ऐसा है जो उतारने की आवश्कता ही नहीं। सोते हुए भी ताजधारी और उठते हैं तो भी ताजधारी। अनुभव है ना! ताज हल्का है ना? कोई भारी तो नहीं हैं! नाम बड़ा - वजन हल्का है। सुखदाई ताज है। खुशी देने वाला ताज है। ऐसा ताजाधारी बाप बनाते हैं जो जन्म-जन्म ताज मिलता रहे। ऐसे ताजधारी बच्चों को देख बापदादा तो हर्षित होते है। बापदादा ने ताजपोशी का दिन अभी से ही मना करके सदा की रसम का नियम बना दिया है। सतयुग में भी ताजपोशी दिवस मनाया जायेगा। जो संगम पर ताजपोशी दिवस मनाया उसी का ही यादगार अविनाशी चलता रहेगा। स्वयं बाप साकार वतन से वानप्रस्थ हुए ना! अव्यक्त वतन में सेवाधारी हैं लेकिन साकार वतन से नो वानप्रस्थ हुए ना! साकार वतन से वानप्रस्थ हो बच्चों को ताज तख्त दे और स्वयं अव्यक्त वतन में चले। तो ताजपोशी का दिन हो गया ना! विचित्र ड्रामा है ना। अगर जाने के पहले बताते तो वण्डरफुल ड्रामा नहीं होता। ऐसा विचित्र ड्रामा है जिसका चित्र नहीं खींचा जा सकता। विचित्र बाप का विचित्र पार्ट है। जिसका चित्र बुद्धि में संकल्प द्वारा भी नहीं खींच सकते, इसको कहते हैं - विचित्र। इसलिए विचित्र ताजपोशी हुई। बापदादा सदा महावीर बच्चों को ताजपोशी करने वाले ताजधारी स्वरूप में देखते हैं। बापदादा साथ देने में नहीं छिपे लेकिन साकार दुनिया से छिपकर अव्यक्त दुनिया में उदय हो गये। साथ रहेंगे, साथ चलेंगे यह तो वायदा है ही। यह वायदा कभी छूट नहीं सकता। इसलिए तो ब्रह्मा बाप इन्तजार कर रहे हैं। नहीं तो कर्मातीत बन गये तो जा सकते हैं। बन्धन तो नहीं है ना। लेकिन स्नेह का बन्धन है। स्नेह के बन्धन के कारण साथ चलने का वायदा निभाने के कारण बाप को इन्तजार करना ही है। साथ निभाना है और साथ चलना है। ऐसे ही अनुभव है ना। अच्छा हरेक विशेष है। विशेषता एक-एक की वर्णन करें तो कितनी होगी? माला बन जायेंगी। इसलिए दिल में ही रखते हैं, वर्णन नहीं करते। अच्छा-

पार्टियों से:- अमृतवेला सदा शक्तिशाली है? अमृतवेला शक्तिशाली है तो सारा दिन शक्तिशाली रहेगा। अमृतवेला कमज़ोर है तो सारा दिन कमज़ोर। अमृतवेले नियम प्रमाण तो नहीं बैठते हो? यह वरदानों का समय है। वरदानों के समय अगर कोई सोया रहे, सुस्ती में रहे वा विस्मृति रहे, कमज़ोर होकर बैठे तो वरदानों से वंचित रह जायेगा। तो अमृतवेले का महत्व सदा याद रहता है ना? उस समय नींद तो नहीं करते हो? झुटके तो नहीं खाते हो ना? कभी-कभी कोई नींद की अवस्था को भी शान्ति की अवस्था समझते हैं। उन्हों से पूछते हैं कैसे बैठे थे तो कहते हैं - बहुत शान्ति में! तो ऐसी चेकिंग करो - कभी भी शक्तिशाली स्टेज के बीच में यह माया तो नहीं आती है। जो शक्तिशाली हैं उसके आगे माया कमज़ोर हो जाती है।

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात – युगलों से:- सदा प्रवृत्ति में रहते इस वृत्ति में रहते हो कि हम न्यारे और सदा बाप के प्यारे हैं! यही वृत्ति सदा प्रवृत्ति में रहती है? वैसे प्रवृत्ति को पर वृत्ति भी कह सकते हैं। पर माना न्यारे। प्रवृत्ति में रहते प्रवृत्ति के बन्धन से परे अर्थात् पर-वृत्ति वा न्यारे और प्यारे। ऐसे बन्धनमुक्त बन प्रवृत्ति के कार्य को निभाने वाले हो ना! बन्धन में बन्धने वाले नहीं लेकिन बन्धन्मुक्त हो कर्म करने वाले। मन का भी बन्धन नहीं। एक है तन का बन्धन, दूसरा है मन का बन्धन, तीसरा है सम्बन्ध का बन्धन, व्यवहार का बन्धन। तो सब बन्धनों से मुक्त। निर्बन्धन आत्मा बंध नहीं सकती। सारे बन्धन लगन की अग्नि से भस्म करने वाले। लगन अग्नि है। अग्नि में जो चीज़ डाले सब भस्म! ऐसी बन्धनमुक्त आत्मा उड़ने के सिवाए रह नहीं सकती। बन्धन फँसाता है, निर्बन्धन उड़ाता है। बन्धन का पिंजड़ा खुला तो पंछी उड़ेगा ना! कोई कितना भी गोल्डन पिंजड़ा लेकर आये उस पिंजड़े में भी फँसने वाले नहीं। यह माया सोने का रूप धारण करके आती है। सोनामाना आकर्षण करने वाला। यादगार में भी दिखाते हैं - सोना-हिरण बनकर आई। तो सोने का हिरण अच्छा तो नहीं लगता। जब उड़ता पंछी हो गये तो सोना हो या हीरा हो लेकिन पिंजड़े के पंछी नहीं बन सकते।

अधर-कुमारों से - सदा अपने को विजय के तिलकधारी आत्मायें अनुभव करते हो? विजय का तिलक सदा लगा हुआ है? कभी मिट तो नहीं जाता? माया कभी मिटा तो नहीं देती? रोज अमृतवेले इस विजय के तिलक को स्मृति द्वारा ताजा करो तो सारा दिल विजय का तिलक लगा रहेगा। विजय का तिलक है तो राज्य का, भाग्य का भी तिलक है। इसीलिए भक्त भी बहुत बड़े-बड़े तिलक लगाते हैं। तिलक भक्ति की निशानी समझते हैं। प्रभु-प्यार है - इसकी निशानी तिलक लगा देते हैं। आपको कितने तिलक हैं? राज्य का तिलक, भाग्य का तिलक, विजय का तिलक.... यह सब तिलक मिले हैं ना? तिलकधारी ही तख्तधारी हैं। बाप का दिलतख्त जो अभी मिला है ऐसा तख्त भविष्य में भी नहीं मिलेगा। यह बहुत श्रेष्ठ तख्त है। तख्त मिला, तिलक मिला और क्या चाहिए?



09-05-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सदा एक रस उड़ने और उड़ाने के गीत गाओ

ज्ञान के सागर शिवबाबा अपने ज्ञान स्वरूप, सहजयोगी बच्चों प्रति बोले:-

आज दिलाराम बाप दिलरूबा बच्चों के दिल का गीत सुन रहे थे। अमृतवेले से लेकर हर एक दिलरूबा के दिल के गीत बापदादा सुनते हैं। गीत सब गाते हैं और गीत का बोल भी सभी का एक ही है। वह है ‘‘बाबा’’! सभी बाबा-बाबा के गीत गाते हैं। सभी को यह गीत आता है! दिन-रात गाते रहते हो। लेकिन बोल एक होते हुए भी हरेक के बोलने का तर्ज़ और साज़ भिन्न-भिन्न है। किसी के खुशी की साज़ है। किसका उड़ने और उड़ाने का साज़ है। और किस किस बच्चे का अभ्यास का साज़ है। कभी बहुत अच्छा और कभी सम्पूर्ण अभ्यास न होने कारण नीचे ऊपर भी गाते हैं। एक साज़ में दूसरे साज़ मिक्स हो जाते हैं। जैसे यहाँ गीत के साथ जब साज़ सुनते हो तो कोई गीत वा साज़ नाचने वाला होता, कोई स्नेह में समाने वाला होता, कोई पुकार का होता, कोई प्राप्ति का होता। बापदादा के पास भी भिन्न-भिन्न प्रकार के राज और साज़ भरे गीत सुनाई देते हैं। कोई आज के विज्ञान की इन्वेन्शन प्रमाण आटोमेटिक निरन्तर गीत गाते। स्मृति का स्विच सदा खुला हुआ है इसलिए स्वत: ही और सदा बजता रहता है। कोई जब स्विच आन करते हैं - तब साज़ बजता है। गाते सभी दिल से हैं लेकिन कोई का सदा स्वत: और एकरस है। कोई का बजाने से बजता है। लेकिन भिन्न-भिन्न साज़ कब कैसा, कब कैसा। बापदादा बच्चों के गीत सुन हर्षित भी होते हैं कि सभी के दिल में एक ही बाप समाया हुआ है। लगन भी एक के साथ है। सब कुछ करते भी एक बाप के प्रति है। सर्व सम्बन्ध भी एक बाप से जुट गये हैं। स्मृति में, दृष्टि में, मुख पर एक ही बाप है। बाप को अपना संसार बना दिया। हर कदम में बाप की याद से पद्मों की कमाई जमा भी कर रहे हैं।

हरेक बच्चे के मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य का सितारा भी चमक रहा है। ऐसी श्रेष्ठ विशेष आत्मायें विश्व के आगे एक्जैम्पल भी बन गई हैं। ताज, तिलक, तख्तनशीन भी हो गये हैं। ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें जिनके गुणों के गीत स्वयं बाप गाते हैं। बाप हरेक बच्चे के नाम की माला सिमरण करते हैं। ऐसा श्रेष्ठ भाग्य सभी को प्राप्त है ना! फिर गीत गाते-गाते साज़ क्यों बदलते हैं? कब प्राप्ति के, कब मेहनत के, कब पुकार के, कब दिलशिकस्त के। यह साज़ क्यों बदलते हैं? सदा एकरस उड़ने और उड़ाने के गीत क्यों नहीं गाते? ऐसे गीत गाओ जो सुनने वालों को पंख लग जाएँ और उड़ने लग जाए। लंगड़े को टाँगे मिल जाएँ और नाचने लग जाए। दु:ख की शैय्या से उठ सुख के गीत गाने लगे। चिन्ता की चिता पर बैठे हुए प्राणी चिता से उठ खुशी में नाचने लगें। दिलशिकस्त आत्मायें उमंग उत्साह के गीत गाने लग जाएँ। भिखारी आत्मायें सर्व खज़ानों से सम्पन्न बन ‘‘मिल गया, पाल लिया’’ यह गीत गाने लग जायें। ये ही सिद्धि प्राप्त सेवा की विश्व की आवश्यकता है। अल्पकाल की सिद्धि वालों के पीछे कितने भटक रहे हैं। कितना अपना समय और धन लगा रहे हैं।

वर्तमान समय सर्व आत्मायें मेहनत से थक गई हैं, सिद्धि चाहती हैं। अल्पकाल की सिद्धि द्वारा सन्तुष्ट हो जाती है। लेकिन एक बात में सन्तुष्ट होती तो और अनेक बातें उत्पन्न होती। लंगड़ा चल पड़ता लेकिन और इच्छा उत्पन्न होती। यह भी हो जाए, यह भी हो जाए। तो वर्तमान समय के प्रमाण आप आत्माओं के सेवा की विधि ये सिद्धि स्वरूप की होनी है। अविनाशी, अलौकिक रूहानी सिद्धि वा रूहानी चमत्कार दिखाओ। यह चमत्कार कम है क्या? सारी दुनिया की 99 प्रतिशत आत्मायें चिन्ता की चिता पर मरी पड़ी हैं। ऐसे मरे हुए को जिन्दा करो। नया जीवन दो। एक प्राप्ति की टाँग है और अनेक प्राप्तियों से लंगड़े हैं। ऐसी आत्माओं को अविनाशी सर्व प्राप्तियों की टांग दो। अन्धों को त्रिनेत्री बनाओ। तीसरा नेत्र दो। अपने जीवन के श्रेष्ठ वर्तमान और भविष्य देखने की आँख दो। क्या यह सिद्धि नहीं कर सकते हो! यह रूहानी चमत्कार नहीं दिखा सकते हो। भिखारी को बादशाह नहीं बना सकते हो! ऐसी सिद्धि स्वरूप सेवा की शक्तियाँ बाप द्वारा प्राप्त नहीं हैं क्या! अब विधि स्वरूप से सिद्धि स्वरूप बनो। सिद्धि स्वरूप सेवा के निमित्त बनो। विधि अर्थात् पुरूषार्थ के समय पर पुरूषार्थ किया। अब पुरूषार्थ का फल सिद्धि स्वरूप बन सिद्धि स्वरूप सेवा में विश्व के आगे प्रत्यक्ष बनो। अब यह आवाज़ बुलन्द हो कि विश्व में अविनाशी सिद्धि देने वाले, सिर्फ दिखाने वाले नहीं, देने वाले सिद्धि स्वरूप बनाने वाले एक ही, यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय ही है। एक ही स्थान है। स्वयं तो सिद्धि स्वरूप बने हो ना!

बाम्बे में पहले यह नाम बाला करो। बार-बार मेहनत से छूटो। आज इस बात पर पुरूषार्थ की मेहनत की, आज इस बात पर मेहनत की। यह है पुरूषार्थ की मेहनत। इस मेहनत से छूट प्राप्ति स्वरूप शक्तिशाली बनना, यह है सिद्धि स्वरूप। अब सिद्धि स्वरूप ज्ञानी तू आत्मयें, योगी तू आत्मायें बनो और बनाओ। क्या अन्त तक मेहनत ही करते रहेंगे। भविष्य में प्रालब्ध पायेंगे! पुरूषार्थ का प्रत्यक्ष फल अब खाना ही है। अभी प्रत्यक्ष फल खाओ। फिर भविष्यफल खाना। भविष्य की इन्तजार में प्रत्यक्ष फल गँवा न देना। अन्त में फल मिलेगा इस दिलासे पर भी नहीं रहना। एक करो, पदम पाओ। यह अब की बात है। कब की बात नहीं। समझा - बाम्बे वाले क्या बनेंगे? दिलासा वाले तो नहीं बनेंगे ना। सिद्ध-बाबा मशहूर होते हैं। कहते हैं ना यह सिद्ध-बाबा हैं, सिद्ध-योगी हैं। बाम्बे वाले भी सिद्ध सहज योगी अर्थात् सिद्धि को प्राप्त किये हुए हो ना! अच्छा-

सदा स्वत: एकरस उड़ाने के गीत गाने वाले, सदा सिद्धि स्वरूप बन अविनाशी रूहानी सिद्धि प्राप्त कराने वाले, रूहानी चमत्कार दिखाने वाले, चमत्कारी आत्मायें, सदा सर्व प्राप्तियों की सिद्धि का अनुभव कराने वाले सिद्धि स्वरूप सहजयोगी, ज्ञान स्वरूप बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

कुमारियों के अलग-अलग ग्रुप से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सदा रूहानी याद में रहने वाली रूहानी कुमारियाँ हो ना! देह-अभिमान वाली कुमारियाँ तो बहुत हैं लेकिन आप रूहानी कुमारियाँ हो। सदा रूह अर्थात् आत्मा की स्मृति में रहने वाली। आत्मा बन आत्मा को देखने वाली इसको कहते हैं - रूहानी कुमारियाँ। तो कौन-सी कुमारियॉ हो? कभी देह-अभिमान में आने वाली नहीं। देह-अभिमान में आना अर्थात् माया की तरफ गिरना। और रूहानी स्मृति में रहना अर्थात् बाप के समीप आना। गिरने वाले नहीं, बाप के साथ रहने वाले। बाप के साथ कौन रहेंगे? रूहानी कुमारियाँ ही बाप के साथ रह सकती। जैसे बाप सुप्रीम है, कब देह-अभिमान में नहीं आता, ऐसे देह-अभिमान में आने वाले नहीं। जिनका बाप से प्यार है, वह रोज प्यार से याद करते हैं, प्यार से ज्ञान की पढ़ाई पढ़ते हैं। जो प्यार से कार्य किया जाता है उसमें सफलता होती है। कहने से करते तो थोड़ा समय सफलता होती। प्यार से, अपने मन से चलने वाले सदा चलते। जब एक बार अनुभव कर लिया कि बाप क्या और माया क्या! तो एक बार के अनुभवी कभी भी धोखे में नही आ सकते। माया भिन्न-भिन्न रूप में आती है। कपड़ों के रूप में आयेगी, माँ-बाप के मोह के रूप में आयेगी, सिनेमा के रूप में आयेगी। घूमने-फिरने के रूप में आयेगी। माया कहेगी यह कुमारियाँ हमारी बनें, बाप कहेंगे हमारी बनें, तो क्या करेगी?

माया को भगाने में होशियार हो? घबराने वाली कमज़ोर तो नहीं हो? ऐसे तो नहीं सहेलियों के संग में सिनेमा में चली जाओगी! संग के रंग में कभी नहीं आना। सदा बहादुर, सदा अमर, सदा अविनाशी रहना। सदा अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना। गटर में नहीं गिरना। गटर शब्द ही कैसा है? बाप सागर है, सागर में सदा लहराते रहना। कुमारी जीवन में ज्ञान मिल गया, रास्ता मिल गया, मंजल मिल गई, यह देख खुशी हाती है! बहुत भाग्यवान हो। आज के संसार की हालत देखो। दु:ख-दर्द के बिना और कोई बात नहीं। गटर में गिरते हुए चोट के ऊपर चोट खाते रहते। आज का यह संसार है। सुनते हो ना - आज शादी की, कल जल मरी। आज शादी की कल घर आ गई। एक तो गटर में गिरी फिर और चोट पर चोट खाई। तो ऐसी चोट खानी है क्या? इसलिए सदा अपने को भाग्यवान आत्मा समझो। जो बाप ने बचा लिया। बच गये, बाप के बन गये, ऐसे खुशी होती है ना! बापदादा को भी खुशी होती है क्योंकि गिरने से, ठोकर खाने से बच गईं। तो सदा ऐसे अविनाशी रहना।

2. सभी श्रेष्ठ कुमारियाँ हो ना? साधारण कुमारी से श्रेष्ठ कुमारी हो गई। श्रेष्ठ कुमारी सदा श्रेष्ठ कर्त्तव्य करने के निमित्त। ऐसे सदा अपने को अनुभव करती हो कि हम श्रेष्ठ कार्य के निमित्त हैं! श्रेष्ठ कार्य क्या है? विश्व-कल्याण। तो विश्व-कल्याण करने, वाली विश्व-कल्याणकारी कुमारियाँ हो। घर में रहने वाली कुमारियाँ नहीं। टोकरी उठाने वाली कुमारियाँ नहीं लेकिन विश्व-कल्याणकारी कुमारियाँ। कुमारियाँ वह जो कहते हैं - कुल का कल्याण करें। सारा विश्व आपका कुल है। बेहद का कुल हो गया। साधारण कुमारियाँ अपने हद के कुल का कल्याण करती हैं। और श्रेष्ठ कुमारियाँ विश्व के कुल का कल्याण करेंगी। ऐसी हो ना! कमज़ोर तो नहीं! डरने वाली तो नहीं! सदा बाप साथ है। जब बाप साथ है तो कोई डर की बात नहीं। अच्छा है, कुमारी जीवन में बच गई यह बहुत बड़ा भाग्य है। रास्ते उल्टे पर जाकर फिर लौटना, यह भी समय वेस्ट हुआ ना! तो समय, शक्तियाँ सब बच गई। भटकने की मेहनत से छूट गई। कितना फायदा हुआ। बस वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! यह देखकर सदा हर्षित रहो। किसी भी कमज़ोरी से अपनी श्रेष्ठ सेवा से वंचित नहीं होना।

3. कुमारी अर्थात् महान। पवित्र आत्मा को सदा महान आत्मा कहा जाता है। आजकल में महात्मायें भी महात्मा कैसे बनते हैं? पवित्र बनते हैं। पवित्रता के कारण ही महान आत्मा कहे जाते हैं। लेकिन आप महान आत्माओं के आगे वह कुछ भी नहीं हैं। आपकी महानता ज्ञान सहित अविनाशी महानता है। वह एक जन्म में महान बनेंगे फिर दूसरे जन्म में फिर से बनना पड़ेगा। आप जन्म-जन्म की महान आत्मायें हो। अभी की महानता से जन्म-जन्म के लिए महान हो जायेंगी। 21 जन्म महान रहेंगी। कुछ भी हो जाए लेकिन बाप के बने तो सदा बाप के ही रहेंगे। ऐसी पक्की हो ना? कच्ची बनेंगी तो माया खा जायेगी। कच्चे को माया खाती, पक्के को नहीं। देखना - यहाँ सभी का फोटो निकल रहा है। पक्की रहना। घबराने वाली नहीं। जितना पक्का उतना खुशी का अनुभव, सर्व प्राप्तियों का अनुभव करेंगे। पक्के नहीं तो सदा की खुशी नहीं। सदा अपने को महान आत्मा समझो। महान आत्मा से कोई ऐसा साधारण कार्य हो नहीं सकता। महान आत्मा कभी किसी के आगे झुक नहीं सकती। तो माया की तरफ कभी झुकने वाली नहीं। कुमारी माना हैण्डस। कुमारियों का शक्ति बनना अर्थात् सेवा में वृद्धि होना। बाप को खुशी है कि यह होवनहार विश्व-सेवाधारी विश्व का कल्याण करने वाली विशेष आत्मायें हैं।

4. कुमारियाँ चाहे छोटी हैं, चाहे बड़ी हैं लेकिन सभी सौ ब्राह्मणों से उत्तम कुमारियाँ हैं - ऐसे समझती हो? सौ ब्राह्मणों से उत्तम कन्या क्यों गाया जाता है? हर एक कन्या कम से कम सौ ब्राह्मण तो जरूर तैयार करेगी। इसलिए सौ ब्राह्मणों से उत्तम कन्या कहा जाता है। सौ तो कुछ भी नहीं है, आप तो विश्व की सेवा करेंगी। सभी सौ ब्राह्मणों से उत्तम कन्यायें हो। सर्व आत्माओं को श्रेष्ठ बनाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। ऐसा नशा रहता है? कालेज की, स्कूल की कुमारियाँ नहीं। ईश्वरीय विश्व विद्यालय की कुमारियाँ हो। कोई पूछे कौन-सी कुमारियाँ हो? तो बोलो हम ईश्वरीय विश्व विद्यालय की कुमारियाँ हैं! यह एक-एक कुमारियाँ सेवाधारी कुमारियाँ बनेंगी। कितने सेन्टर खुलेंगे। कुमारियों को देख बाप को यही खुशी रहती है कि यह सब इतने हैण्ड तैयार हो रहे हैं। राइट हैण्ड हो ना! लेफ्ट हैण्ड नहीं। लेफ्ट हैण्ड से जो काम करते हैं वह थोड़ा नीचे ऊपर हो सकता है। राइट हैण्ड से काम जल्दी और अच्छा होता है। तो इतनी सब कुमारियाँ तैयार हो जाएँ तो कितने सेन्टर खुल जायेंगे, जहाँ भेजें वहाँ जायेंगी ना! जहाँ बिठायेंगे वहाँ बैठेंगी ना! कुमारियाँ सब महान हो। सदा महान रहना। संग में नहीं आना। अगर कोई आपके ऊपर अपना रंग लगाने चाहे तो आप उस पर अपना रंग लगा देना। माँ-बाप भी बन्धन डालने चाहें तो भी बन्धन में बंधने वाली नहीं। सदा निर्बन्धन। सदा भाग्यवान। कुमारी जीवन पूज्य जीवन है। पूज्य कभी पुजारी बन नहीं सकती। सदा इसी नशे में रहने वाली।

5. सभी देवियाँ हो ना! कुमारी अर्थात् देवी। जो उल्टे रास्ते में जाती वह दासी बन जाती और जो महान आत्मा बनती वह देवियाँ हैं! दासी झुकती है। तो आप सब देवियाँ हो, दासी बनने वाली नहीं। देवियों का कितना पूजन होता है। तो यह पूजन आपका है ना! छोटी हो या बड़ी - सब देवियाँ हो। बस यही सदा याद रखो कि हम महान आत्मायें, पवित्र आत्मायें हैं, बाप का बनना यह कम बात नहीं है, कहने में सहज बात हो गई है। लेकिन किसके बने हो? कितने ऊँचे बने हो? कितनी विशेष आत्मायें बने हो? यह चलते-फिरते याद रहता है कि हम कितनी महान कितनी ऊँची आत्मायें हैं! भाग्यवान आत्माओं को सदा अपना भाग्य याद रहे। कौन हो? देवी! देवी सदा मुस्कराती रहती है। देवी कभी रोती नहीं। देवियों के चित्रों के आगे जाओ तो क्या दिखाई देता? सदा मुस्कराती रहती है! दृष्टि से, हाथों से सदा देने वाली देवी। देवता या देवी का अर्थ ही है - देने वाला। क्या देने वाली हो? सभी को सुख शान्ति आनन्द, प्रेम सर्व खज़ाने देने वाली देवियाँ हो। सभी राइट हैण्ड हो। राइट हैण्ड अर्थात् श्रेष्ठ कर्म करने वाली।

माताओं से:- सभी मातायें, जगत मातायें हो गई ना! जगत का उद्धार करने वाली जगत मातायें। हद के गृहस्थी की मातायें नहीं। सदा विश्व कल्याणकारी। जैसे बाप विश्व-कल्याणकारी है वैसे बच्चे भी विश्व-कल्याणकारी। तो घर में रहती हो या विश्व की सेवा के स्थान पर रहती? विश्व ही आपकी सेवा का स्थान है। बेहद में रहने वाली, हद में रहने वाली नहीं। ज्यादा समय किसमें जाता है, हद की प्रवृत्ति में या बेहद में? जितना बेहद का लक्ष्य रखेंगी तो हद के बन्धनों से सहज मुक्त होती जायेंगी। जो अभी संकल्प आता है कि समय नहीं मिलता, इच्छा है लेकिन शरीर नहीं चलता, शक्ति नहीं है... यह सब बन्धन है। जब दृढ़ संकल्प कर लेते कि बेहद की सेवा में आना ही है, लगना ही है तो यह बन्धन सेकण्ड में समाप्त हो जाते हैं। समय स्वत: मिल जायेगा। शरीर आपे ही चलने लग जायेगा। यह अनुभव है भी और भी कर सकती हो। श्रेष्ठ कार्य के लिए समय न मिले, शरीर काम न करे, यह हो नहीं सकता। पहिये लग जायेंगे। जब उमंग उत्साह के पहिये लग जाते हैं तो न चलने वाले भी चलने लग पड़ते हैं। बीमारी भी खत्म हो जाती है। जैसे लौकिक में कोई आवश्यक काम करना होता है तो क्या करते हो? उतना समय बीमारी भाग जाती है ना! बाद में भले ही सो जाओ लेकिन उस समय मजबूरी से भी करती हो ना! तो जैसे हद के कार्य में न चाहते भी चल पड़ते, ऐसे यहाँ भी खुशी-खुशी से चल पड़ेंगे। जब मजबूरी के पहिये भी चला सकते हैं तो यह खुशी के पहिये क्या नहीं कर सकते! तो उमंग उत्साह और खुशी के पहिये लगाकर यह हद के बन्धन काटो। पति का बन्धन, बच्चों का बन्धन तो खत्म हुआ, अभी इन सूक्ष्म बन्धनों से भी मुक्त बनो। उड़ो और उड़ाओ। यह ऐसा है, वह ऐसा है.. यह भी रस्सी है। इसको भी तोड़ो, यह भी नीचे ले आती है। तो बन्धनमुक्त उड़ते पंछी बनो।

2. माताओं को विशेष कौन सा खज़ाना मिला है? खुशी का खज़ाना मिला है ना! यह खज़ाना बाप ने विशेष माताओं के लिए लाया है। उसी खुशी के खज़ाने से खेलते रहो। बांटते रहो। यही काम है। घर का काम करते भी खुशी का धन बांटते रहो। तो घर का काम भी ऐसे होगा जैसे खेल रहे हैं। खेल में थकना नहीं होता। तो सदा ऐसे आगे बढ़ते रहो। साधारण मातायें नहीं हो, शिव शक्तियाँ हो। शक्तियाँ अर्थात् संघारनी, विजयी। विजय का झण्डा लहराने वाली। विश्व में बाप को प्रत्यक्ष करने वाली। प्रवृत्ति को सम्भालते हुए सदा बेहद का नशा रहे कि - हम असुर संघारनी शिव शक्तियाँ हैं।

माताओं के लिए तो स्वयं बाप सृष्टि पर आये हैं। ऐसी खुशी है ना - कि हमने बुलाया और बाप को आना पड़ा। क्यों? माताओं ने दु:ख के कारण दिल से पुकारा और ऐसी पुकारने वाली माताओं को बाप ने पूज्य बना दिया। पुकार करने से छुड़ा दिया। अभी पुकारने की जरूरत नहीं। सब आशायें पूर्ण हो गई। बाप मिला सब कुछ मिला - सदा इसी खुशी में रहते खुशी का दान देती रहो। अपने हमजिन्स पर रहम करो। आपके हमजिन्स कितने दु:खी हैं। हमजिन्स को जगाना यही माताओं का काम है। जगे हैं जगाने के लिए। अभी से रहमदिल बन जगाओ नहीं तो आपकी हमजिन्स आपको उल्हना देंगी कि हमें क्यों नहीं जगाया? अच्छा-



11-05-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मणों के हर कदम, संकल्प, कर्म से विधान का निर्माण

विधाता, वरदाता बापदादा मास्टर विधाता, वरदाता बच्चों प्रति बोले:-

‘‘विश्व रचता अपने नये विश्व के निर्माण करने वाले नए विश्व की तकदीर बच्चों को देख रहे हैं। आप श्रेष्ठ भाग्यवान बच्चों की तकदीर विश्व की तकदीर है। नये विश्व के आधार स्वरूप श्रेष्ठ बच्चे हो। नये विश्व के राज्य-भाग्य के अधिकारी विशेष आत्मायें हो। आपकी नई जीवन विश्व का नव-निर्माण करती हैं। विश्व को श्रेष्ठाचारी सुखी-शान्त-सम्पन्न बनाना ही है, आप सबके इस श्रेष्ठ दृढ़ संकल्प की अंगुली से कलयुगी दु:खी संसार बदल सुखी संसार बन जाता है क्योंकि सर्व शक्तिवान बाप की श्रीमत प्रमाण सहयोगी बने हो। इसलिए बाप के साथ आप सबका सहयोग, श्रेष्ठ योग विश्व-परिवर्तन कर लेता है। आप श्रेष्ठ आत्माओं का इस समय का सहजयोगी-राजयोगी जीवन का हर कदम, हर कर्म नये विश्व का विधान बन जाता है। ब्राह्मणों की विधि सदा के लिए विधान बन जाती है। इसलिए दाता के बच्चे दाता, विधाता और विधि-विधाता बन जाते हैं। आज लास्ट जन्म तक भी आप दाता के बच्चों के चित्रों द्वारा भक्त लोग मांगते ही रहते हैं। ऐसे विधि-विधाता बन जाते जो अब तक भी चीफ जस्टिस भी सभी को कसम उठाने के समय ईश्वर का या ईष्ट देव का स्मृति स्वरूप बनाए कसम उठवाते हैं। लास्ट जन्म में भी विधान में शक्ति आप विधि-विधाता बच्चों की चल रही है। अपना कसम नही उठाते। बाप का या आपका महत्व रखते हैं। सदा वरदानी स्वरूप भी आप हो। भिन्न-भिन्न वरदान, भिन्न-भिन्न देवताओं और देवियों द्वारा आपके चित्रों द्वारा ही मांगते हैं। कोई शक्ति का देवता है तो कोई विद्या की देवी है। वरदानी स्वरूप आप बने हो तब अभी तक भी परम्परा भक्ति की आदि से चलती रही है। सदा बापदादा द्वारा सर्व प्राप्ति स्वरूप प्रसन्नचित्त, प्रसन्नता स्वरूप बने हो तो अब तक भी अपने को प्रसन्न करने के लिए देवीदेवताओं को प्रसन्न करते हैं कि ये ही हमें सदा के लिए प्रसन्न करेंगे। सबसे बड़े ते बड़ा खज़ाना सन्तुष्टताका बाप द्वारा आप सबने प्राप्त किया है। इसलिए सन्तुष्टता लेने के लिए सन्तोषी देवी की पूजा करते रहते हैं। सभी सन्तुष्ट आत्मायें - सन्तोषी माँ हो ना। सब सन्तोषी हो ना! आप सभी सन्तुष्ट आत्मायें सन्तोषी मूर्त हो। बापदादा द्वारा सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार रूप में प्राप्त की है इसलिए सफलता का दान, वरदान आपके चित्रों से मांगते हैं। सिर्फ अल्प-बुद्धि होने के कारण, निर्बल आत्मायें होने के कारण, भिखारी आत्मायें होने के कारण अल्पकाल की सफलता ही मांगते हैं। जैसे भिखारी कभी भी यह नहीं कहेंगे कि हजार रूपया दो। इतना ही कहेंगे कुछ पैसे दे दो। रूपया, दो दे दो। ऐसे यह आत्मायें भी सुख-शान्ति पवित्रता की भिखारी अल्पकाल के लिए सफलता मांगेंगी। बस यह मेरा कार्य हो जाए, इसमें सफलता हो जाए। लेकिन मांगते आप सफलता स्वरूप आत्माओं से ही हैं। आप दिलाराम बाप के बच्चे दिलवाला बाप को सभी दिल का हाल सुनाते हो, दिल की बातें करते हो। जो किसी आत्मा से नहीं कर सकते वह बाप से करते हो। सच्चे बाप के सच्चे बच्चे बनते हो। अब भी आपके चित्रों के आगे सब दिल का हाल बोलते रहते हैं। जो भी अपनी कोई छिपाने वाली बात होगी, सबके स्नेही सम्बन्धी से छिपायेंगे लेकिन देवी-देवताओं से नहीं छिपायेंगे। दुनिया के आगे कहेंगे मैं यह हूँ, सच्चा हूँ, महान हूँ। लेकिन देवताओं के आगे क्या कहेंगे? जो हूँ वह यही हूँ। कामी भी हूँ तो कपटी भी हूँ। तो ऐसे नये विश्व की तकदीर हो। हर एक की तकदीर में पावन विश्व का राज्य भाग्य है।

ऐसे विधाता-वरदाता, विधि-विधाता सर्व श्रेष्ठ आत्मायें हो। हरेक के श्रेष्ठ मत रूपी हाथों में स्वर्ग के स्वराज्य का गोला है। ये ही माखन है। राज्य-भाग्य का माखन है। हरेक के सिर पर पवित्रता की महानता का, लाइट का क्राउन है। दिलतख्तनशीन हो। स्वराज्य के तिलकधारी हो। तो समझा मैंकौन? ‘मैं कौनकी पहेली हल करने आये हो ना? पहले दिन का पाठ यह पढ़ा ना। मैं कौन? मैं यह नहीं हूँ और मैं यह हूँ। इसी में ही सारा ज्ञान सागर का ज्ञान समाया हुआ है। सब जान गये हो ना! यही रूहानी नशा सदा साथ रहे। इतनी श्रेष्ठ आत्मायें हो। इतनी महान हो। हर कदम, हर संकल्प, हर कर्म यादगार बन रहा है। विधान बन रहा है। इसी श्रेष्ठ स्मृति से उठाओ। समझा। सारे विश्व की नजर आप आत्माओं की तरफ है। जो मैं करूँगा वो विश्व के लिए विधान और यादगार बनेगा। मैं हलचल में आऊंगी तो दुनिया हलचल में आयेगी। मैं सन्तुष्टता प्रसन्नता में रहूँगी, तो दुनिया सन्तुष्ट और प्रसन्न बनेगी। इतनी जिम्मेवारी हर विश्व नव-निर्माण के निमित्त आत्माओं की है। लेकिन जितनी बड़ी है उतनी हल्की है। क्योंकि सर्वशक्तिवान बाप साथ है। अच्छा-

ऐसे सदा प्रसन्नचित्त आत्माओं को, सदा मास्टर विधाता, वरदाता बच्चों को, सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप सन्तुष्ट आत्माओ को, सदा याद द्वारा हर कर्म का यादगार बनाने वाली पूज्य महान आत्माओं को विधाता वरदाता बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

कुमारों के अलग-अलग ग्रुप से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सभी श्रेष्ठ कुमार हो ना? साधारण कुमार नहीं, श्रेष्ठ कुमार! तन की शक्ति, मन की शक्ति सब श्रेष्ठ कार्य में लगाने वाले। कोई भी शक्ति विनाशी कार्य में लगाने वाले नहीं। विकारी कार्य है विनाशकारी कार्य, और श्रेष्ठ कार्य है - ईश्वरीय कार्य। तो सर्व शक्तियों को ईश्वरीय कार्य में लगाने वाले श्रेष्ठ कुमार। कहाँ व्यर्थ के खाते में तो कोई शक्ति नहीं लगाते हो? अभी अपनी शक्तियों को कहाँ लगाना है यह समझ मिल गई। इसी समझ द्वारा सदा श्रेष्ठ कार्य करो। ऐसे श्रेष्ठ कार्य में सदा रहने वाले, श्रेष्ठ प्राप्ति के अधिकारी बन जाते हैं। ऐसे अधिकारी हो? अनुभव करते हो कि श्रेष्ठ प्राप्ति हो रही है? या होनी है? हर कदम में पदमों की कमाई जमा हो रही है यह अनुभव है ना? जिसकी एक कदम में पदमों की कमाई जमा हो वह कितने श्रेष्ठ हुए! जिसकी इतनी जमा सम्पत्ति हो उसको कितनी खुशी होगी! आजकल के लखपति, करोड़पति को भी विनाशी खुशी रहती है आपकी अविनाशी प्रापर्टी है। श्रेष्ठ कुमार की परिभाषा समझते हो? ‘सदा हर शक्ति श्रेष्ठ कार्य में लगाने वाले। व्यर्थ खाता सदा के लिए समाप्त हुआ? श्रेष्ठ खाता जमा हुआ? या दोनों चलता है? एक खत्म हुआ। अभी दोनों चलाने का समय नहीं है। अभी वह सदा के लिए खत्म। दोनों होगे तो जितना जमा होना चाहिए उतना नहीं होगा। गँवाया नही, जमा हुआ तो कितना जमा होगा! तो व्यर्थ खाता समाप्त हुआ, समर्थ खाता जमा हुआ।

2. कुमार जीवन शक्तिशाली जीवन है। कुमार जीवन में जो चाहे वह कर सकते हो। चाहे अपने को श्रेष्ठ बनायें, चाहे अपने को नीचे गिरायें। यह कुमार जीवन ही ऊँचा या नीचा होने वाली है। ऐसी जीवन में आप बाप के बन गये। विनाशी जीवन के साथी के कर्मबन्धन में बंधने के बजाए सच्चा जीवन का साथी ले लिया। कितने भाग्यवान हो! अभी आये तो अकेले आये या कम्बाइण्ड होकर आये? (कम्बाइण्ड) टिकेट तो नहीं खर्च की ना? तो यह भी बचत हो गई। वैसे अगर शरीर के साथी को लाते तो टिकेट खर्च करते, उनका सामान भी उठाना पड़ता और कमाकर रोज खिलाना भी पड़ता। यह साथी तो खाता भी नहीं सिर्फ वासना लेते हैं। रोटी कम नहीं हो जाती और ही शक्ति भर जाती है। तो बिना खर्चा, बिना मेहनत के और साथी भी अविनाशी, सहयोग भी पूरा मिलता है। मेहनत नहीं लेते और सहयोग देते हैं। कोई मुश्किल कार्य आये, याद किया और सहयोग मिला। ऐसे अनुभवी हो ना! जब भक्तों को भी भक्ति का फल देने वाले हैं तो जो जीवन का साथी बनने वाले हैं उनको साथ नहीं देंगे? कुमार कम्बाइण्ड तो बने लेकिन इस कम्बाइण्ड में बेफिकर बादशाह बन गये। कोई झंझट नहीं, बेफिकर हैं। आज बच्चा बीमार हुआ, आज बच्चा स्कूल नहीं गया... या कोई बोझ नहीं। सदा निर्बन्धन। एक के बन्धन में बंधने से अनेक बन्धनों से छूट गये। खाओ पियो मौज करो और क्या काम! अपने हाथ से बनाया और खाया। जो चाहो वह खाओ। स्वतन्त्र हो। कितने श्रेष्ठ बन गये। दुनिया के हिसाब से भी अच्छे हो। समझते हो ना कि दुनिया के झंझटों से बच गये। आत्मा की बात छोड़ो, शरीर के कर्म बन्धन के हिसाब से भी बच गये। ऐसे सेफ हो। कभी दिल तो नहीं होती कि कोई ज्ञानी साथी बना दें? कोई कुमारी का कल्याण कर दें? ऐसी दिल होती है? यह कल्याण नहीं है - अकल्याण है। क्यों? एक बन्धन बंधा और अनेक बन्धन शुरू हुए। यह एक बन्धन अनेक बन्धन पैदा करता। इसलिए मदद नहीं मिलेगी। बोझ होगा। देखने में मदद है लेकिन है अनेक बातों का बोझ। जितना बोझ कहो उतना बोझ है। तो अनेक बोझ से बच गये। कभी स्वप्न में भी नहीं सोचना। नहीं तो ऐसा बोझ अनुभव करेंगे जो उठना ही मुश्किल। स्वतन्त्र रहकर बन्धन में बंधे तो पद्मगुणा बोझ होगा। वह अनजान से बिचारे बंध गये, आप जानबूझकर बंधेंगे तो और पश्चाताप् का बोझ होगा। कोई कच्चा तो नहीं है? कच्चे की गति नहीं होती। न यहाँ का रहता, न वहाँ का रहता। आपकी तो सद्गति हो गई है ना। सद्गति माना श्रेष्ठ गति। थोड़ा संकल्प आता हैं? फोटो निकल रहा है। अगर कुछ नीचे ऊपर किया तो फोटो आयेगा। जितने पक्के बनेंगे उतना वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ है।

3. सभी समर्थ कुमार हो ना! समर्थ हो? सदा समर्थ आत्मायें जो भी संकल्प करेंगी, जो भी बोल बोलेंगी, कर्म करेंगी वह समर्थ होगा। समर्थ का अर्थ ही है - व्यर्थ को समाप्त करने वाले। व्यर्थ का खाता समाप्त और समर्थ का खाता सदा जमा करने वाले। कभी व्यर्थ तो नहीं चलता? व्यर्थ संकल्प या व्यर्थ बोल या व्यर्थ समय। अगर सेकण्ड भी गया तो कितना गया! संगम पर सेकण्ड कितना बड़ा है। सेकण्ड नहीं लेकिन एक सेकण्ड एक जन्म के बराबर है। एक सेकण्ड नहीं गया, एक जन्म गया। ऐसे महत्व को जानने वाले समर्थ आत्मायें हो ना। सदा यह स्मृति रहे कि हम समर्थ बाप के बच्चे हैं, समर्थ आत्मायें हैं। समर्थ कार्य के निमित्त हैं। तो सदा ही उड़ती कला का अनुभव करते रहेंगे। कमज़ोर उड़ नहीं सकते। समर्थ सदा उड़ते रहेंगे। तो कौन सी कला वाले हो? उड़ती कला या चढ़ती कला? चढ़ने में सांस फूल जाता है। थकते भी हैं, साँस भी फूलता है। और उड़ती कला वाले सेकण्ड में मंज़िल पर सफलता स्वरूप बने। चढ़ती कला है तो जरूर थकेंगे, साँस भी फूलेगा - क्या करें, कैसे करें, यह साँस फूलता है। उड़ती कला में सबसे पार हो जाते। टचिंग आती है कि यह करें, यह हुआ ही पड़ा है। तो सेकण्ड में सफलता की मंज़िल को पाने वाले - इसको कहा जाता है समर्थ आत्मा। बाप को खुशी होती है कि सभी उड़ती कला वाले बच्चे हैं, मेहनत क्यों करें। बाप तो कहेंगे - बच्चे मेहनत से बचे रहें। जब बाप रास्ता दिखा रहा है - डबल लाइट बना रहा है तो फिर नीचे क्यों आ जाते हो? क्या होगा, कैसे होगा, यह बोझ है। सदा कल्याण होगा, सदा श्रेष्ठ होगा, सदा सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है, इस स्मृति से चलो।

4. कुमारों को पेपर देने के लिए युद्ध करनी पड़ती है। पवित्र बनना है, यह संकल्प किया तो माया युद्ध करना शुरू कर देती है। कुमार जीवन श्रेष्ठ जीवन है। महान आत्मायें हैं। अभी कुमारों को कमाल करके दिखानी है। सबसे बड़े ते बड़ी कमाल है - बाप के समान बन बाप के साथी बनाना। जैसे आप स्वयं बाप के साथी बने हो ऐसे औरों को भी साथी बनाना है। माया के साथियों को बाप के साथी बनाना है - ऐसे सेवाधारी। अपने वरदानी स्वरूप से शुभ भावना और शुभ कामना से बाप का बनाना है। इसी विधि द्वारा सदा सिद्धि को प्राप्त करना है। जहाँ श्रेष्ठ विधि है वहाँ सिद्धि जरूर है। कुमार अर्थात् सदा अचल। हलचल में आने वाले नहीं। अचल आत्मायें औरों को भी अचल बनाती हैं।

5. सभी विजयी कुमार हो ना? जहाँ बाप साथ है वहाँ सदा विजय है। सदा बाप के साथ के आधार से कोई भी कार्य करेंगे तो मेहनत कम और प्राप्ति ज्यादा अनुभव होगी। बाप से थोड़ा सा भी किनारा किया तो मेहनत ज्यादा प्राप्ति कम। तो मेहनत से छूटने का साधन है - बाप का हर सेकण्ड हर संकल्प में साथ हो। इस साथ से सफलता हुई पड़ी है। ऐसे बाप के साथी हो ना? जो बाप की आज्ञा है उस आज्ञा के प्रमाण कदम हों। बाप के कदम के पीछे कदम हो। यहाँ कदम रखें या न रखें, राइट है या रांग है, यह सोचने की भी जरूरत नहीं। नया कोई रास्ता हो तो सोचना भी पड़े। लेकिन जब कदम पर कदम रखना है तो सोचने की बात नहीं। सदा बाप के कदम पर कदम रख चलते चलो। तो मंजल समीप ही है। बाप कितना सहज करके देते हैं - श्रीमतही कदम है। श्रीमत के कदम पर कदम रखो। तो मेहनत से सदा छूटें रहेंगे। सर्व सफलता अधिकार के रूप में होगी। छोटे कुमार भी बहुत सेवा कर सकते हैं। कभी भी मस्ती नहीं करना, आप की चलन, बोल चाल ऐसा हो जो सब पूछें कि यह किस स्कूल में पढ़ने वाले हैं। तो सेवा हो जायेगी ना। अच्छा-

युगलों के ग्रुप से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

1. एक मत के पट्टे पर चलने वाले तो फास्ट रफ्तार वाले होंगे ना! दोनों की मत एक, यह एक मत ही पहिया है। एक मत के पहियों के आधार पर चलने वाले सदा तीव्रगति से चलते हैं। दोनों ही पहिये श्रेष्ठ पहिये हैं। एक ढीला एक तेज तो नहीं हो ना? दोनों पहिये एकरस। तीव्र पुरूषार्थ में पाण्डव नम्बरवन हैं या शक्तियाँ? एक दो को आगे बढ़ाना अर्थात् स्वयं आगे बढ़ना। ऐसे नहीं आगे बढ़ाकर खुद पीछे हो जाएं। आगे बढ़ाना स्वयं आगे बढ़ना। सभी लकी आत्मायें हो ना? दिल्ली और बाम्बे निवासी विशेष लकी हैं - क्योंकि रास्ते चलते भी बहुत खज़ाना मिलता है। विशेष आत्माओं का संग, सहयोग, शिक्षा सब प्राप्त होता है। यह भी वरदान है जो बिना निमन्त्रण के मिलता रहता है। दूसरे लोग कितनी मेहनत करते हैं। सारे ब्राह्मण जीवन में या सेवा की जीवन में ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें दो-तीन बारी भी कहाँ पर मुश्किल पहुँचते हैं लेकिन आप बुलाओ, न बुलाओ, आपके पास सहज ही पहुँच जाते हैं। तो संग का रंग जो प्रसिद्ध है, विशेष आत्माओं का संग भी उमंग दिलाता है। कितना सहज भाग्य प्राप्त करने वाली भाग्यवान आत्मायें हो। सदा गीत गाते रहो - वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य। जो प्राप्ति हो रही है उसका रिटर्न है - सदा उड़ती कला। रूकने और चलने वाले नहीं। सदा उड़ने वाले।

2. सदा अपने को बाप की छत्रछाया के अन्दर रहने वाले अनुभव करते हो? बाप की याद ही छत्रछायाहै। जो छत्रछाया के अन्दर रहते वह सदा सेफ रहते हैं। कभी बरसात या तूफान आता तो छत्रछाया के अन्दर चले जाते हैं। ऐसे बाप की याद छत्रछायाहै। छत्रछाया में रहने वाले सहज ही मायाजीत हैं। याद को भूला अर्थात् छत्रछाया से बाहर निकला। बाप की याद सदा साथ रहे। जो ऐसे छत्रछाया में रहने वाले हैं उन्हें बाप का सहयोग सदा मिलता रहता है। हर शक्ति की प्राप्ति का सहयोग सदा मिलता रहता है। कभी कमज़ोर होकर माया से हार नहीं खा सकते। कभी माया याद भुला तो नहीं देती है? 63 जन्म भूलते रहे, संगमयुग है याद में रहने का युग। इस समय भूलना नहीं। भूलने से ठोकर खाई, दु:ख मिला। अभी फिर कैसे भूलेंगे! अभी सदा याद में रहने वाले।

3. सदा अपने विशेष पार्ट को देख हर्षित रहते हो? ऊँचे ते ऊँचे बाप के साथ पार्ट बजाने वाले विशेष पार्टधारी हो। विशेष पार्टधारी का हर कर्म स्वत: ही विशेष होगा क्योंकि स्मृति में है कि - मैं विशेष पार्टधारी हूँ। जैसे स्मृति वैसी स्थिति स्वत: बन जाती है।

हर कर्म, हर बोल विशेष। साधारणता समाप्त हुई। विशेष पार्टधारी सभी को स्वत: आकर्षित करते हैं। सदा इस स्मृति में रहो कि हमारे इस विशेष पार्ट द्वारा अनेक आत्मायें अपनी विशेषता को जानेंगी। किसी भी विशेष आत्मा को देख स्वयं भी विशेष बनने का उमंग आता है। कहाँ भी रहो, कितने भी मायावी वायुमण्डल में रहो लेकिन विशेष आत्मा हर स्थान पर विशेष दिखाई दे। जैसे हीरा मिट्टी के अन्दर भी चमकता दिखाई देता। हीरा - हीरा ही रहता है। ऐसे कैसा भी वातावरण हो लेकिन विशेष आत्मा सदा ही अपनी विशेषता से आकर्षित करेगी। सदा याद रखना कि - हम विशेष युग की विशेष आत्मायें हैं।

विदाई के समय:-

संगमयुग है ही मिलने का युग। जितना मिलेंगे उतना और मिलने की आशा बढ़ेगी। और मिलने की शुभ आशा होनी भी चाहिए। क्योंकि यह मिलने की शुभ आशा ही माया जीत बना देती है। यह मिलने का शुभ संकल्प सदा बाप की याद स्वत: दिलाता है। यह तो होनी ही चाहिए। यह पूरी हो जायेगी तो संगम पूरा हो जायेगा। और सब इच्छायें पूरी हुई लेकिन याद में सदा समाये रहें, यह शुभ इच्छा आगे बढ़ायेगी। ऐसे है ना! तो सदा मिलन मेला होता ही रहेगा। चाहे व्यक्त द्वारा चाहे अव्यक्त द्वारा। सदा साथ ही रहते हैं फिर मिलने की आवश्यकता ही क्या! हर मिलन का अपना-अपना स्वरूप और प्राप्ति है। अव्यक्त मिलन अपना और साकार मिलन अपना। मिलना तो अच्छा ही है। अच्छा- सदा शुभ और श्रेष्ठ प्रभात रहेगी। वह तो सिर्फ गुडमोर्निंग करते लेकिन यहाँ शुभ भी है और श्रेष्ठ भी है। हर सेकण्ड शुभ और श्रेष्ठ इसलिए सेकण्ड-सेकण्ड की मुबारक हो। अच्छा। ओमशान्ति।



26-08-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


दादीजी, मोहिनी बहन और जगदीश भाई को विदेश सेवा पर जाने की छुट्टी देते हुए अव्यक्त बापदादा

ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा बापदादा ज्ञान सितारों बच्चों प्रति बोले-

आज त्रिमूर्ति मिलन देख रहे हैं। ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा और ज्ञान सितारों का मिलन हो रहा है। यह त्रिमूर्ति मिलन इस ब्राह्मण संसार के विशेष मधुबन मण्डल में होता है। आकाश मण्डल में चन्द्रमा और सितारों का मिलन होता है। इस बेहद के मधुबन मण्डल में सूर्य और चन्द्रमा दोनों का मिलन होता है। इन दोनों के मिलन से सितारों को ज्ञान सूर्य द्वारा शक्ति का विशेष वरदान मिलता है और चन्द्रमा द्वारा स्नेह का विशेष वरदान मिलता है। जिससे लवली और लाइट हाउस बन जाते हैं। यह दोनों शक्तियाँ सदा साथ-साथ रहें। माँ का वरदान और बाप का वरदान दोनों सदा सफलता स्वरूप बनाते हैं। सभी ऐसे सफलता के श्रेष्ठ सितारे हो। सफलता के सितारे सर्व को सफलता स्वरूप बनने का सन्देश देने के लिए जा रहे हो। किसी भी वर्ग वाली आत्मायें जो भी कोई कार्य कर रहीं हैं, सभी का मुख्य लक्ष्य यही है कि हम अपने कार्य में सफल हो जाएं। और सफलता क्यों चाहते हैं, क्योंकि समझते हैं हमारे द्वारा सभी को सुख शान्ति की प्राप्ति हो। चाहे अपने नाम के स्वार्थ से करते हैं, अल्पकाल के साधनों से करते हैं लेकिन लक्ष्य स्व-प्रति वा सर्व-प्रति सुख शान्ति का है। लक्ष्य सभी का ठीक है लेकिन लक्ष्य प्रमाण स्व स्वार्थ के कारण धारण नहीं कर सकते हैं। इसलिए लक्ष्य और लक्षण में अन्तर होने के कारण सफलता को पा नहीं सकते। ऐसी आत्माओं को अपने मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने का सहज साधन यही सुनाओ -एक शब्द का अन्तर करने से सफलता का मन्त्र प्राप्त हो जायेगा। वह है - स्वार्थ के बजाए सर्व के सेवा-अर्थ। स्वार्थ लक्ष्य से दूर कर देता है। सेवा अर्थ यह संकल्प लक्ष्य प्राप्त करने में सहज सफलता प्राप्त कराता है। किसी भी लौकिक चाहे अलौकिक कार्य अर्थ निमित्त हैं, उसी अपने-अपने कार्य में सन्तुष्टता वा सफलता सहज पा लेंगे। इस एक शब्द के अन्तर का मन्त्र हर वर्ग वाले को सुनाना।

सारे कलह-कलेश, हलचल, अनेक प्रकार के विश्व के चारों ओर के हंगामे इस एक शब्द - ‘‘स्वार्थ’’ के कारण हैं। इसलिए सेवा भाव समाप्त हो गया है। जो भी जिस भी आक्यूपेशन वाले हों जब अपना कार्य आरम्भ करते हैं तो क्या संकल्प लेते हैं? निस्वार्थ सेवा का संकल्प करते हैं लेकिन लक्ष्य और लक्षण चलते-चलते बदल जाता है। तो मूल कारण चाहे कोई भी विकार आता है उसका बीज है - ‘‘स्वार्थ’’। तो सभी को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की सफलता की चाबी दे आना। वैसे भी लोग मुख्य चाबी ही भेंट करते हैं। तो आप सभी को सफलता की चाबी भेंट करने के लिए जा रही हो और सब कुछ दे देते हैं लेकिन खज़ाने की चाबी कोई नहीं देता है। जो और कोई नहीं देता वही आप देना। जब सर्व खज़ानों की चाबी उनके पास हो गई तो सफलता है ही। अच्छा - आज तो सिर्फ मिलने के लिए आये हैं।

राजतिलक तो 21 जन्म मिलता ही रहेगा और स्मृति का तिलक भी संगम के नाम-संस्कार के दिन बापदादा द्वारा मिल ही गया है। ब्राह्मण हैं ही - स्मृति के तिलकधारी और देवता हैं राज्य तिलकधारी। बाकी बीच का फरिश्ता स्वरूप, उसका तिलक है - सम्पन्न स्वरूप का तिलक, समान स्वरूप का तिलक। बापदादा कौन सा तिलक लगायेंगे? सम्पन्न और समान स्वरूप का तिलक। और सर्व विशषताओं की मणियों से सजा हुआ ताज। ऐसे तिलकधारी, ताजधारी फरिश्ते स्वरूप सदा डबल लाइट के तख्तनशीन श्रेष्ठ आत्मायें हो। बापदादा इसी अलौकिक श्रृंगार से सेरीमनी मना रहे हैं। ताजधारी बन गये ना! ताज, तिलक और तख्त। यही विशेष सेरीमनी है। सभी सेरीमनी मनाने आये हो ना। अच्छा!

सभी देश और विदेश के सफलता के सितारों को बापदादा सफलता की माला गले में डाल रहे हैं। कल्प-कल्प के सफलता के अधिकारी विशेष आत्मायें हो। इसलिए सफलता जन्म सिद्ध अधिकार, हर कल्प का है। इसी निश्चय, नशे में सदा उड़ते चलो। सभी बच्चे याद और प्यार की मालायें हर रोज बड़े स्नेह की विधि पूर्वक बाप को पहुँचाते हैं। इसी की कापी भक्त लोक भी रोज माला जरूर पहनाते हैं। जो सच्ची लगन में मगन रहने वाले बच्चे हैं वह अमृतवेले बहुत बढ़िया स्नेह के श्रेष्ठ संकल्पों के रत्नों की मालायें, रूहानी गुलाब की मालायें रोज बापदादा को अवश्य पहनाते हैं, तो सभी बच्चों की मालाओं से बापदादा श्रृंगारे होते हैं। जैसे भक्त लोग भी पहला कार्य अपने ईष्ट को माला से सजाने का करते हैं। पुष्प अर्पण करते हैं। ऐसे ज्ञानी तू आत्मायें स्नेही बच्चे भी बापदादा को अपने उमंग उत्साह के पुष्प अर्पण करते हैं। ऐसे स्नेही बच्चों को स्नेह के रिटर्न में बापदादा पद्मगुणा स्नेह की, वरदानों की, शक्तियों की मालायें डाल रहे हैं। सभी का खुशी का डान्स भी बापदादा देख रहे हैं। डबल लाइट बन उड़ रहे हैं और उड़ाने के प्लैन बना रहे हैं। सभी बच्चे विशेष पहला नम्बर अपना नाम समझ पहले नम्बन में मेरी याद बाप द्वारा आई है ऐसे स्वीकार करना। नाम तो अनेक हैं। लेकिन सभी नम्बरवार याद के पात्र हैं। अच्छा –

मधुबन वाले सभी शक्तिशाली आत्माएँ हो ना। अथक सेवा का पार्ट भी बजाया और स्व-अध्ययन का पार्ट भी बजाया। सेवा में शक्तिशाली बन अनेक जन्मों का भविष्य और वर्तमान बनाया। सिर्फ भविष्य नहीं लेकिन वर्तमान भी मधुबन वालों का नाम बाला है। तो वर्तमान भी बनाया, भविष्य भी जमा किया। सभी ने शारीरिक रेस्ट ले ली। अब फिर सीजन के लिए तैयार हो गए, सीजन में बीमार नहीं होना है, इसलिए वह भी हिसाब-किताब पूरा किया। अच्छा –

जो भी आये हैं सभी को लाटरी तो मिल ही गई। आना अर्थात् पद्मगुणा जमा होना। मधुबन में आत्मा और शरीर दोनों की रिफ्रेशमेन्ट हैं। अच्छा -’’

जगदीश भाई से - सेवा में शक्तियों के साथ पार्ट बजाने के निमित्त बनना यह भी विशेष पार्ट है। सेवा से जन्म हुआ, सेवा से पालना हुई और सदा सेवा में आगे बढ़ते चलो। सेवा के आदि में पहला पाण्डव ड्रामा अनुसार निमित्त बने। इसलिए यह भी विशेष सहयोग का रिटर्न है। सहयोग सदा प्राप्त है और रहेगा। हर विशेष आत्मा की विशेषता है। उसी विशेषता को सदा कार्य में लगाते विशेषता द्वारा विशेष आत्मा रहे हो। सेवा के भण्डार में जा रहे हो। विदेश में जाना अर्थात् सेवा के भण्डार में जाना। शक्तियों के साथ पाण्डवों का भी विशेष पार्ट है। सदा चान्स मिलते रहे हैं और मिलते रहेंगे। ऐसे ही सभी में विशेषता भरना। अच्छा –

मोहिनी बहन के साथ:- सदा विशेष साथ रहने का पार्ट है। दिल से भी सदा साथ और साकार रूप में श्रेष्ठ साथ की वरदानी हो। सभी को इसी वरदान द्वारा साथ का अनुभव कराना। अपने वरदान से औरों को भी वरदानी बनाना। मेहनत से मुहब्बत क्या होती है। मेहनत से छूटना और मुहब्बत में रहना - यह सबको विशेष अनुभव हो, इसलिए जा रही हो। विदेशी आत्मायें मेहनत नहीं करना चाहती हैं, थक गई हैं। ऐसी आत्माओं को सदा के लिए साथ अर्थात् मुहब्बत में मगन रहने का सहज अनुभव कराना। सेवा का चान्स यह भी गोल्डन लाटरी है। सदा लाटरी लेने वाली सहज पुरुषार्थी। मेहनत से मुहब्बत का अनुभव क्या है - ऐसी विशेषता सभी को सुनाकर स्वरूप बना देना। जो दृढ़ संकल्प किया वह बहुत अच्छा किया। सदा अमृतवेले ये दृढ़ संकल्प रिवाइज करते रहना। अच्छा –

बाम्बे वालों के लिए याद प्यार - बाम्बे में सबसे पहले सन्देश देना चाहिए। बाम्बे वाले बिजी भी बहुत रहते हैं। बिजी रहने वालों को बहुत समय पहले से सन्देश देना चाहिए, नहीं तो उल्हाना देंगे कि हम तो बिजी थे, आपने बताया भी नहीं। इसलिए उन्हों को अभी से अच्छी तरह जगाना है। तो बाम्बे वालों को कहना कि अपने जन्म की विशेषता को सेवा में विशेष लगाते चलो। इसी से सफलता सहज अनुभव करेंगे। हरेक के जन्म की विशेषता है, उसी विशेषता को सिर्फ हर समय कार्य में लगाओ। अपनी विशेषता को स्टेज पर लाओ। सिर्फ अन्दर नहीं रखो, स्टेज पर लाओ। अच्छा –



19-11-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


बेहद की वैराग वृत्ति से सिद्धियों की प्राप्ति

सदा अचल और अडोल भव’’ का वरदान देने वाले शिव बाबा बोले-

आज विश्व रचयिता अपनी श्रेष्ठ रचना को वा रचना के पूर्वज आत्माओं को देख रहे हैं। चारों ओर की पूर्वज पूज्य आत्मायें बापदादा के सामने हैं। पूर्वज आत्माओं के आधार से विश्व की सर्व आत्माओं को शक्ति और शान्ति प्राप्त हो रही है और होनी है। अनेक आत्मायें पूर्वज पूज्य आत्माओं को शान्ति देवा, शक्ति देवा कह याद कर रही हैं। ऐसे समय पर शान्ति देवा आत्मायें मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य अपनी शान्ति की किरणें, शान्ति की लहरें दाता के बच्चे देवा बन सर्व को दे रहे हो! यह विशेष सेवा करने के अभ्यासी बने हो वा अन्य भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवाओं में इतने बिजी हो जो इस विशेष सेवा के लिए फुर्सत और अभ्यास कम होता है? जैसा समय वैसे सेवा के स्वरूप को कल्पना सकते हो? अगर किसी को पानी की प्यास हो और आप बढ़िया भोजन दे दो तो वह सन्तुष्ट होगा? ऐसे वर्तमान समय शान्ति और शक्ति की आवश्यकता है। मंसा की शान्ति द्वारा आत्माओं को मन की शान्ति अनुभव करा सकते हो! वाणी द्वारा कानों तक आवाज़ पहुँचा सकते हो लेकिन वाणी के साथ मंसा शक्ति द्वारा मन तक पहुँचा सकते हो! मन का आवाज़ मन तक पहुँचता है। सिर्फ मुख का आवाज़ कानों और मुख तक रह जाता। सिर्फ वाणी से वर्णन शक्ति और मन से मनन शक्ति, मगन स्वरूप की शक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। वह सुनने वाले और वह बनने वाले बन जाते, दोनों में अन्तर हो जाता है तो सदा वाचा और मंसा दोनों साथ-साथ सेवा में रहें। वर्तमान समय विशेष भारतवासियों का क्या हालचाल देखा? अभी शमशानी वैराग की वृत्ति में हैं। ऐसे शमशानी वैराग वृत्ति वालों को बेहद की वैराग वृत्ति दिलाने के लिए - स्वयं बेहद के वैराग वृत्ति वाले बनो।

अपने आपको चेक करो। कभी राग कभी वैराग, दोनों में चलते हैं वा सदा बेहद के वैरागी बने हो? बेहद के वैरागी अर्थात् देह रूपी घर से भी बेघर। देह भी बाप की है न कि मेरी। इतना देह के भान से परे। बेहद के वैरागी कभी भी संस्कार, स्वभाव, साधन किसी के भी वशीभूत नहीं होंगे। न्यारा बन, मालिक बन साधनों द्वारा सिद्धि स्वरूप बनेंगे। साधन को विधि बनायेंगे। विधि द्वारा स्व-उन्नति की वृद्धि की सिद्धि पायेंगे। सेवा से वृद्धि की सिद्धि प्राप्त करेंगे। निमित्त आधार होगा लेकिन अधीन नहीं होंगे। आधार के अधीन होना अर्थात् वशीभूत होना। वशीभूत शब्द का अर्थ ही है, जैसे भूत आत्मा परवश और परेशान करती है, ऐसे किसी भी साधन वा संस्कार वा स्वभाव वा सम्पर्क के वशीभूत हो जाते तो भूत समान परेशान और परवश हो जाते हैं। बेहद के वैरागी, सदा करावनहार करा रहे हैं, इसी मस्ती में रमता योगी से भी ऊपर - उड़ता योगी होगा। जैसे हद के हठयोग की विधियों से धरनी, आग, पानी सबसे ऊँचा आसनधारी दिखाते हैं। उसको योग के सिद्धि स्वरूप मानते हैं। वह है अल्पकाल के हठयोग की विधि की सिद्धि। ऐसे बेहद के वैराग वृति वाले इस विधि द्वारा देह भान की धरनी से ऊपर, माया के भिन्न-भिन्न विकारों की अग्नि से ऊपर, भिन्न-भिन्न प्रकार के साधनों द्वारा संग के बहाव में आने से न्यारे बन जाते हैं। जैसे पानी का बहाव अपना बना देता है, अपनी तरफ खींच लेता है। ऐसे किसी भी प्रकार के अल्पकाल के बहाव अपने तरफ आकर्षित न करें। ऐसे पानी के बहाव से भी ऊपर इसको कहा जाता - उड़ता योगी। यह सब सिद्धियाँ बेहद के वैराग की विधि से प्राप्त होती हैं।

बेहद के वैरागी अर्थात् हर संकल्प, बोल और सेवा में बेहद की वृत्ति, स्मृति, भावना और कामना हो। हर संकल्प बेहद की सेवा में समर्पित हो। हर बोल में नि:स्वार्थ भावना हो। हर कर्म में करावनहार करा रहे हैं - यह वायब्रेशन सर्व को अनुभव हो। इसको कहा जाता है - बेहद के वैरागी। बेहद के वैरागी अर्थात् अपनापन मिट जाए। बाबा-पन आ जाए। जैसे अनहद जाप जपते हैं, ऐसे अनहद स्मृति स्वरूप हों। हर संकल्प में, हर श्वास में बेहद और बाबा समाया हुआ हो। तो हद के वैरागी, शमशानी वैरागी आत्माओं को वर्तमान समय शान्ति और शक्ति देवा बन बेहद के वैरागी बनाओ।

तो वर्तमान समय के प्रमाण बच्चों की रिजल्ट क्या रही - यह टी.वी. बापदादा ने देखी और बच्चों ने इन्दिरा गांधी की टी.वी. देखी। समय पर देखी, नॉलेज के लिए देखी, समाचार के लिए देखी इसमें कोई हर्जा नहीं। लेकिन क्या हुआ, क्या होगा इस रूप से नहीं देखना। नॉलेजफुल बन हर दृश्य को कल्प पहले की स्मृति से देखो। तो बापदादा ने बच्चों का क्या देखा! बच्चों का दृश्य भी रमणीक था। तीन प्रकार की रिजल्ट देखी।

एक थे - चलते-चलते अलबेलेपन की नींद में सोई हुई आत्मायें। जैसे कोई जोर से आवाज़ होता है वा कोई हिलाता है तो सोया हुआ जाग जाता है लेकिन क्या हुआ! इस संकल्प से कुछ समय जागे और फिर धीरे-धीरे वही अलबेलेपन की नींद। यह तो होता ही है, इस चादर को ओढ़ के सो गए। अभी तो रिहर्सल है। फाइनल तो आगे होना है। इससे और मुंह तक चादर ओढ़ ली।

दूसरे थे - आलस्य की नींद में सोये हुए। यह तो सब होना ही था वह हुआ, पुरूषार्थ तो कर ही रहे हैं। और आगे भी कर ही लेंगे! संगमयुग में तो पुरूषार्थ करना ही है। कुछ किया है, कुछ आगे कर लेंगे। दूसरों को जागकर देखते रहते। जैसे चादर से मुंह निकाल एक दो को (सोये हुए को) देखते हैं ना। जो नामीग्रामी हैं वह भी इतना ही रफ्तार से चल रहे हैं। हम भी चल रहे हैं। ऐसे दूसरों की कमज़ोरियों को देख फॉलो फादर के बजाए सिस्टर्स और ब्रदर्स को फॉलो कर लेते हैं और उन्हों की भी कमज़ोरियों को फॉलो करते हैं। ऐसे संकल्प करने वाले आलस्य की नींद में सोये हुए वह भी जागे जरूर। उमंग और उत्साह के आधार से आलस्य की नींद को कईयों ने त्याग भी किया। स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति में आगे कदम भी बढ़ाया। हलचल ने हिलाया और आगे बढ़े। लेकिन आलस्य के संस्कार बीच-बीच में फिर भी अपनी तरफ खींचते रहते हैं। फिर भी हलचल ने हिलाया, आगे बढ़ाया।

तीसरे थे - हलचल को देख अचल रहने वाले। सेवा के श्रेष्ठ संकल्प में सेवा के भिन्न-भिन्न प्लैन सोचना और करना। सारी विश्व को शान्ति और शक्ति की सहायता देने वाले, साहस रखने वाले। औरों को भी हिम्मत दिलाने वाले। ऐसे भी बच्चे देखे। लेकिन शमशानी उमंग-उत्साह वा शमशानी तीव्र पुरूषार्थ वा कमज़ोरियों से वैराग वृत्ति, इसी लहर में नहीं चलना। सदा परिस्थिति को स्वस्थिति की शक्ति से परिवर्तन करने वाले, विश्व-परिवर्तक की स्मृति में रहो। परिस्थिति स्थिति को आगे बढ़ावे वा वायुमण्डल मास्टर सर्वशक्तिवान को चलावे। मनुष्य आत्माओं का शमशानी वैराग, अल्पकाल के लिए बेहद का वैरागी बनावे यह पूर्वज आत्माओं का कर्म नहीं। समय रचना, मास्टर रचता को आगे बढ़ावे यह मास्टर रचता की कमज़ोरी है। आपके श्रेष्ठ संकल्प - समय को परिवर्तन करने वाले हैं। समय आप विश्व-परिवर्तक आत्माओं का सहयोगी है। समझा! समय को देखकर, समय के हिलाने से आगे बढ़ने वाले नहीं। लेकिन स्वयं आगे बढ़ समय को समीप लाओ। क्वेश्चन भी बहुतों का उठा कि अब क्या होगा? लेकिन क्वेश्चन को फुलस्टाप के रूप में परिवर्तन करो। अर्थात् अपने को सभी सब्जेक्ट में फुल करो। यह है फुलस्टाप। ऐसे समय पर क्या होगा? यह क्वेश्चन नहीं उठता लेकिन क्या करना है, मेरा कर्त्तव्य ऐसे समय पर क्या है, उस सेवा में लग जाओ। जैसे आग बुझाने वाले आग को बुझाने में लग गए। क्वेश्चन नहीं किया कि यह क्या हुआ। अपनी सेवा में लग गये ना। ऐसे रूहानी सेवाधारी का कर्त्तव्य है अपनी रूहानी सेवा में लग जाना। दुनिया वालों को भी न्यारापन अनुभव हो। समझा! फिर भी समय प्रमाण पहुँच तो गए हो ना। परिस्थिति क्या भी हो लेकिन ड्रामा ने फिर भी मिलन मेला मना लिया। और ही लकी हो गये ना जो पहुँच तो गये हो ना। खुश हो रहे हो ना कि हमारा भाग्य है जो पहुँच गए। भले आये। मधुबन की रौनक आप सब बच्चे हैं। मधुबन का शृंगार मधुबन में पहुँचा। सिर्फ मधुबन वाले बाबा नहीं, मधुबन वाले बच्चे भी हैं। अच्छा –

चारों ओर के संकल्प द्वारा, स्नेह द्वारा, आकारी रूप द्वारा पहुँचे हुए सर्व बच्चों को बापदादा सदा अचल भव, सदा बेहद के वैरागी, सदा उड़ते योगी भव का वर्सा और वरदान दे रहे हैं। सदा अनहद स्मृति स्वरूप, अलबेले और आलस्य के निद्राजीत, सदा बेहद के स्मृति स्वरूप ऐसे पूर्वज और पूज्य आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।’’

दादी जी तथा जगदीश भाई ने विदेश यात्रा का समाचार सुनाया तथा याद प्यार दी

सभी को सन्देश दे अनुभव कराया। स्नेह और सम्बन्ध बढ़ाया। अभी अधिकार लेने के लिए आगे आयेंगे। हर कदम में अनेक आत्माओं के कल्याण का पार्ट नूंधा हुआ है। इसी नूंध से सभी के दिल में उमंग-उत्साह दिलाया। बहुत अच्छा - सेवा और स्नेह का पार्ट बजाया। बापदादा करावनहार भी हैं और साक्षी हो देखने वाले भी हैं। कराया भी और देखा भी। बच्चों के उमंग-उत्साह और हिम्मत पर बापदादा को नाज़ है। आगे भी और आवाज़ बुलन्द होगा। ऐसा आवाज़ बुलन्द होगा जो सभी कुम्भकरण आँख खोलकर देखेंगे कि यह क्या हुआ! कईयों के भाग्य परिवर्तन होंगे। धरनी बनाकर आये। बीज डालकर आये। अभी जल्दी बीज का फल भी निकलेगा। प्रत्यक्षता का फल निकलने वाला ही है। समय समीप आ रहा है। अभी तो आप लोग गये लेकिन जो सेवा करके आये - उस सेवा के फल स्वरूप वह स्वयं भागते हुए आयेंगे। ऐसे अनुभव करेंगे जैसे चुम्बक दूर से खींचता है ना। ऐसे कोई खींच रहा है। जैसे आदि में अनेक आत्माओं को यह रूहानी खींच हुई कि कोई खींच रहा है, कहाँ जायें। ऐसे यह भी खींचे हुए आयेंगे। ऐसा अनुभव किया ना कि रूहानी खींच बढ़ रही है। बढ़ते-बढ़ते खींचे हुए उड़कर पहुँच जायेंगे वह भी अभी दृश्य होने वाला ही है। अभी यही रहा हुआ है। सन्देश वाहक जाते हैं लेकिन वह स्वयं सत्य तीर्थ पर पहुँचे यह है लास्ट सीन। इसके लिए अभी धरनी तैयार हो गई है, बीज भी पड़ गया है अब फिर निकला कि निकला। अच्छा - दोनों तरफ गये। बापदादा के पास सभी के हिम्मत उल्लास उमंग का पहुँचता है। मैजारटी सेवा के उमंग उत्साह होने के कारण मायाजीत बनने में भी सहज ही आगे बढ़ रहे हैं। फुर्सत होती है तो माया का वार भी होता है लेकिन बिजी रहते हैं - दिल से, ड्यूटी से नहीं। जो दिल से सेवा में बिजी रहते हैं, वह सहज ही मायाजीत हो जाते हैं। तो बापदादा बच्चों के उमंग-उत्साह को देख खुश हैं। वहाँ साधन भी सहज है और इन्हों को प्राप्त भी हो जाते हैं। लक्ष्य है, मेहनत है और साधन भी सहज प्राप्त हैं, तीनों बातों के कारण अच्छी रेस में आगे नम्बर ले रहे हैं। अच्छा है। लेकिन देश में भी कोई कम नहीं। सभी अपने-अपने उमंग-उत्साह के आधार पर बढ़ रहे हैं। नाम तो देश से ही निकलना है। विदेशों की सफलता भी देश से ही निकलनी है। यह अच्छी स्मृति उन्हों को रहती है और अपनी ड्यूटी समझते हैं कि हमको नाम बाला करना है। विदेश के आवाज़ से भारत को जगाना है। यह लक्ष्य पक्का है और निभा भी रहे हैं। तैयार कर रहे हैं लेकिन अभी विदेश तक आवाज़ है। विदेश का देश तक पहुँचे, वह उड़ते-उड़ते आ रहा है। अभी उड़ रहा है। अभी सफर कर रहा है आवाज़। उड़ते-उड़ते यहाँ पहुँच जायेगा। अभी विदेश में अच्छा फैल रहा है लेकिन विदेश का देश में पहुँचे यह भी होना ही है। अच्छा - जो भी पार्ट बजाया अच्छा बजाया। सदा आगे बढ़ने का सहयोग और वरदान है। हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। जितना अनुभवी बनते जाते हैं उतना और भी अनुभवों के आधार से आगे बढ़ते रहेंगे। करावनहार ने जो जिससे कराया वह ड्रामा अनुसार अच्छे से अच्छा कराया। निमित्त भाव सेवा करा ही लेता है। तो सेवा कराई, निमित्त बने, जमा हुआ और आगे भी जमा होता रहेगा। अच्छा–

पार्टियों से

सदा मिलन मेले में रहने वाले हो ना? यह मिलन का मेला अविनाशी मिलन मेले का अनुभव करा देता है। कहां भी रहते लेकिन मेले में रहते हो। मेले से दूर नहीं होते। मेला अर्थात् मिलन। तो सदा मिलन मेला है ही। तो ऐसा भाग्यवान कौन होगा जो सदा मेले में रहे! वैसे तो मेला लगता और खत्म हो जाता है लेकिन सदा मेले में कोई नहीं रहता। आप भाग्यवान आत्मायें सदा मेले में रहती हो। सदा मिलन मेला। मेले में क्या होता? - मिलना और झूलना। झूलना भी होता है ना! तो सदा प्राप्तियों के झूले में झूलने वाले। एक झूला नहीं है अनेक प्राप्तियों के अनेक झूले हैं। कभी किस झूले में झूलते, कभी किस झूले में। लेकिन हैं मेले में। ऐसा झूला है जो सदा ही सुख और सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराने वाला है। ऐसी कोटों में कोई भाग्यवान आत्मायें हो। पहले महिमा सुनते थे अभी महान बन गए। अच्छा-



21-11-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


स्वदर्शन धारी ही दिव्य दर्शनीय मूर्त

अव्यक्त बापदादा अपने स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों प्रति बोले-

आज बापदादा अपने विश्व प्रसिद्ध स्वदर्शन धारी, दिव्य दर्शनीय सिद्धि स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। स्वदर्शनधारी ही विश्व-दिव्य दर्शनीय बनते हैं। स्वदर्शनधारी नहीं तो दिव्य दर्शनीय मूर्त भी नहीं। हर कदम में, हर संकल्प में स्वदर्शन से ही दिव्य दर्शन करा सकते हो। स्वदर्शन नहीं तो दिव्य दर्शन भी नहीं। स्वदर्शन-स्थिति में स्थित रहने वाले चलते-फिरते नैचुरल रूप में अपने दिव्य संकल्प, दिव्य दृष्टि, दिव्य बोल, दिव्य कर्म द्वारा अन्य आत्माओं को भी दिव्य मूर्त अनुभव होंगे। साधारणता नहीं दिखाई देगी, दिव्यता दिखाई देगी। तो वर्तमान समय ब्राह्मण आत्माओं को दिव्यता का अनुभव करना है। देवता भविष्य में बनेंगे। अभी दिव्यता स्वरूप होना है। दिव्यता स्वरूप सो देवता स्वरूप। फरिश्ता अर्थात् दिव्यता स्वरूप। दिव्यता की शक्ति साधारणता को समाप्त कर देती है। जितनी-जितनी दिव्यता की शक्ति हर कर्म में लायेंगे उतना ही सबके मन से, मुख से स्वत: ही यह बोल निकलेंगे कि यह दिव्य दर्शनीय मूर्त हैं।अनेक भक्तों को जो दर्शन के अभिलाषी हैं, ऐसे दर्शन-अभिलाषी आत्माओं के सामने आप स्वयं दिव्य दर्शन मूर्त प्रत्यक्ष होंगे तब ही सर्व आत्मायें दर्शन कर प्रसन्न होंगी। और प्रसन्न्ता के कारण आप दिव्य दर्शनीय आत्माओं पर प्रसन्नता के पुष्प वर्षा करेंगी। हरेक आत्मा के द्वारा यही प्रसन्नता के बोल निकलेंगे, जन्मजन्म की जो प्यास थी वा आश थी कि मुक्ति को प्राप्त हो जाएं वा एक झलक मात्र दर्शन हो जाएं, आज मुक्ति वा मोक्ष का अनेक जन्मों का संकल्प पूरा हो गया। वा दर्शन के बजाए दर्शनीय मूर्त मिल गए। हमारे ईष्ट हमें मिल गए। इसी थोड़े समय की प्राप्ति के नशे और खुशी में जन्म-जन्म के दुख दर्द भूल जायेंगे। थोड़े से समय की यह समर्थ स्थिति आत्माओं को यथाशक्ति भावना के फलस्वरूप कुछ पापों से भी मुक्त कर देगी। इसलिए आत्मायें स्वयं को यथा शक्ति हल्का अनुभव करेंगी। इसलिए ही पाप हरो देवा वा पाप नष्ट करने वाली देवी, शक्ति, जगत मां यह बोल जरूर बोलते हैं। किसी भी देवी वा देवता के पास जाते हुए यह भावना वा निश्चय रखते हैं कि यह हमारे पाप नाश कर ही लेंगे। और अब अन्त में देवताओं के साथ गुरू लोग भी यही टैम्पटेशन देते हैं कि मैं तुम्हारे पाप नाश कर दूँगा। भक्त भी इसी भरोसे से गुरू करते हैं। लेकिन यह रसम आप दिव्य दर्शनीय आत्माओं से प्रत्यक्ष रूप में होने का यादगार चला आ रहा है। ऐसे जल्दी ही यह दिव्य दृश्य विश्व के सामने आया कि आया! अभी अपने आपको देखो कि हम दिव्य दर्शनीय मूर्त दर्शन योग्य, सर्व शृंगार सम्पन्न बने हैं? बाप समान पाप कटेश्वर स्वरूप में स्थित हैं? पाप कटेश्वर वा पाप हरनी तब बन सकते, जब याद के ज्वाला स्वरूप बनेंगे - ऐसे बने हैं? दर्शन के लिए पर्दा खोलते हैं, पर्दा हटता और दर्शन होता है। ऐसे सम्पन्न दर्शनीय स्वरूप बने हो जो समय का पर्दा हट जाए और आप दिव्य दर्शनीय मूर्त प्रैक्टिकल प्रत्यक्ष हो जाओ। वा दर्शनीय मूर्त अभी तक सम्पन्न सज रहे हो? दर्शन सदा सम्पन्न स्वरूप का होता है। तो ऐसे तैयार हो वा होना है! वा यही सोचते हो कि समय आयेगा तब तैयार होंगे! जो समय पर तैयार होंगे तो वह अपनी ही तैयारी में होंगे वा दर्शनीय मूर्त बनेंगे? वह स्व प्रति रहेंगे, न कि विश्व प्रति। वह स्वकल् याणकारी होंगे और वह विश्व-कल्याणकारी। अन्त का टाइटल विश्व-कल्याणकारी है न कि सिर्फ स्व-कल्याणकारी। स्व-कल्याणकारी सो विश्व-कल्याणकारी, डबल कार्य करनेवाले ही डबल ताजधारी बनेंगे। सिर्फ स्व-कल्याणकारी डबल ताजधारी नहीं बन सकते। राज्य में आ सकते हैं लेकिन राज्य अधिकारी नहीं बन सकते हैं। तो समय प्रमाण अभी पुरूषार्थ की गति तीव्र है! अभी याद की शक्ति और तीव्रगति से बढ़ाओ। अभी साधारण स्वरूप में है। इसलिए कभी भी परिस्थितियों के वश धोखा मिल जायेगा। शक्तिशाली याद की भट्ठी में रहेंगे तो सेफ रहेंगे। सेवा के झंझट से भी परे हो जाओ। जब सेवा में क्या-क्यों, तू-मैं, तेरा-मेरा आ जाता है तो सेवा भी झंझट हो जाती है। तो इस झंझट से भी परे हो जाओ। सेवा के पीछे स्वमान न भूलो। जिस सेवा में शक्तिशाली याद नहीं तो उस सेवा में सफलता कम और स्वयं को, और और को भी परेशानी ज्यादा। नाम की सेवा नहीं - लेकिन काम की सेवा करो। इसको कहा जाता है - शक्ति सम्पन्न सेवा। तो ऐसे नाजुक समय आने हैं, जिसमें याद की शक्ति ही सेफ्टी का साधन है ना। ऐसे याद की शक्ति आपके चारों ओर सर्व शस्त्रधारी सेफ्टी के साधन है। इसलिए सदा स्वयं को, सेवा स्थान को वा प्रवृत्ति के स्थान को और आने वाले सर्व सेन्टर्स के विद्यार्थियों को याद की शक्ति-स्वरूप वृत्ति और वायुमण्डल में लाओ। अभी साधारण याद की स्थिति सेफ्टी का साधन नहीं बन सकती।

हार और वार। माया से किसी भी प्रकार की हार और व्यक्ति तथा वायुमण्डल का वार साधारण याद वालों को धोखे में ला देगा। इसलिए बापदादा पहले से ही सभी बच्चों को ईशारा दे रहे हैं कि शक्तिशाली याद का वायुमण्डल बनाओ। जिससे स्वयं भी सेफ, ब्राह्मण आत्माओं को भी सहयोग और अन्य अज्ञानी आत्माओं को भी आपकी शान्ति और शक्ति का सहयोग मिलेगा। समझा-अच्छा!

ऐसे सर्व स्वदर्शनधारी, विश्व दिव्य दर्शनधारी, दिव्यता मूर्त, सर्व की भावना को सम्पन्न करने वाले, सर्व के मास्टर पाप कटेश्वर बन पाप हरण करने वाले, शान्ति-शक्ति देवा, श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का शक्ति सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।’’

टीचर्स बहिनों के साथ-अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

सभी टीचर्स हैं ही ज्वाला-स्वरूप। इस ज्वाला-स्वरूप के द्वारा अनेक आत्माओं की निर्बलता को दूर करने वाली। टीचर्स अर्थात् शिव-शक्ति-कम्बाइण्ड रहने वाली। शिव के बिना शक्ति नहीं, शक्ति के बिना शिव नहीं। हर सेकण्ड, हर श्वास बाप और आपकम्बाइण्ड। तो ऐसे शिव-शक्ति स्वरूप निमित्त आत्मायें हो ना! कोई भी समय साधारण याद न हो। क्योंकि स्टेज पर हैं ना! तो स्टेज पर हर समय कैसे बैठते हैं? कैसे कार्य करते हैं? अलर्ट होकर करेंगे ना! साधारण एक्टिविटी नहीं करेंगे। सदा अलर्ट होकर हर काम करेंगे। सेवाकेन्द्र स्टेज है, घर नहीं है, स्टेज है। स्टेज पर सदा अटेन्शन रहता है और घर में अलबेले हो जाते हैं। तो यह सेवाकेन्द्र सेवा की स्टेज है। इसलिए सदा ज्वालास्व रूप, शक्ति-स्वरूप। स्नेही भी हैं लेकिन स्नेह अकेला नहीं। स्नेह के साथ शक्ति रूप भी हो। अगर अकेला स्नेही रूप है, शक्ति रूप नहीं है तो कभी भी धोखा मिल सकता है। इसलिए स्नेही और शक्ति रूप दोनों कम्बाइन्ड। दोनों का बैलेन्स। इसको कहा जाता है - नम्बरवन योग्य टीचर। तो सदा इस स्मृति में रहने वाले विजयी हैं ही। विजय होगी या नहीं, यह नहीं। हैं ही। विजय ऐसी आत्माओं को जन्म-सिद्ध अधिकार के रूप में प्राप्त है। विजय के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती लेकिन विजय स्वयं माला बन गले में पिरोये, इसको कहा जाता है - विजयी रत्न।तो सभी ऐसे विजयी रतन बन आगे बढ़ो और औरों को आगे बढ़ाओ। सभी सन्तुष्ट और खुश हैं ना! सेवा में सन्तुष्ट, स्व से सन्तुष्ट और आने वाले परिवार से सन्तुष्ट। तीनों ही सन्तुष्टता, इसको कहते हैं - सन्तुष्ट आत्मा। टीचर का अर्थ ही है - मास्टर दाता बन सहयोग देने वाली। ड्रामा में टीचर बनना यह भी एक गोल्डन चान्स है। इसी गोल्डन चांस को कामय रखते उड़ते रहो और उड़ाते रहो।

पार्टियों से मुलाकात

सभी बेफिकर बादशाह हो ना? अभी भी बादशाह और अनेक जन्म भी बादशाह! जो अभी बेफिकर बादशाह नहीं बनते तो भविष्य के भी बादशाह नहीं बनते। अभी की बादशाही जन्म-जन्म की बादशाही के अधिकारी बना देती है। कोई फिकर रहता है? चलते-चलते कोई भी सरकमस्टांस होते,पेपर आते तो फिकर तो नहीं होता? क्योंकि जब सब कुछ बाप के हवाले कर दिया तो फिकर किस बात का। जब मेरा-पन होता है तब फिकर होता। जब बाप के हवाले कर दिया तो बाप जाने और बाप का काम जाने! स्वयं बेफिकर बादशाह। याद की मौज में रहो और सेवा करते रहो। याद में रह सेवा करो इसी में ही मौज है। मौजों के युग की मौजें मनाते रहो। यह मौज सतयुग में भी नहीं होगी। यह ईश्वरीय मौजें हैं। वह देवताई मौजें होंगी। ईश्वरीय मौजों का समय अभी है। इसलिए मौज मनाओ, मूँझो नहीं जहाँ मूँझ है वहाँ मौज नहीं। किसी भी बात में मूँझना नहीं, क्या होगा, कैसे होगा! यह तो नहीं होगा.....यह है मूँझना। जो होता है वह अच्छा और कल्याणकारी होता है इसलिए मौज में रहो। सदा यही टाइटल याद रखो कि हम बेफिकर बादशाह हैं। तो पुरूषार्थ की रफ्तार तीव्र हो जायेगी। मौज करो, मौज में रहो, कोई भी बात को सोचो नहीं, बाप सोचने वाले बैठा है, आप असोच बन जाओ।

आस्ट्रेलिया तथा लंदन निवासी बच्चों के प्रति बापदादा ने टेप में यादप्यार भरी

सर्व पद्मापद्म भाग्यवान आत्माओं को बापदादा पद्मगुणा यादप्यार दे रहे हैं। सभी ने जो भी विशेष सेवा के प्लैन बनाये और प्रैक्टिकल में लाये वह हर बच्चे के विशेष प्लैन में विशेषता रही और जहाँ विशेषता है वहाँ सफलता समाई हुई है। विशेष आत्मायें बन विशेष कार्य के उमंग उत्साह में रहने वाले बच्चे बहुत-बहुत यादप्यार के पात्र आत्मायें हैं। अभी भी बापदादा के सामने साकार स्वरूप में ऐसे विशेष बच्चे हैं और एक-एक बच्चे की विशेषताओं के स्वरूप को देखते हुए बापदादा मुबारक भी दे रहे हैं और साथ-साथ सदा एकरस उमंग उत्साह में रहने का विशेष वरदान भी दे रहे हैं। संकल्पों द्वारा, पत्रों द्वारा रूह-रूहान द्वारा जो भी सोचते हो, बातें करते हो वह बाप के पास पहूँचती हैं। और बापदादा भी ऐसे बच्चों को सदा रिटर्न करते हैं और अभी भी रिटर्न में मुबारक के साथ-साथ अमर भवका विशेष वरदान दे रहे हैं। सेवा अच्छी वृद्धि को पा रही है इससे सिद्ध है कि सेवाधारी भी स्व की वृद्धि की स्थिति में आगे बढ़ रहे हैं। प्रत्यक्ष करने का दृढ़ संकल्प अच्छा सबके दिल में है और अवश्य प्रत्यक्षता का झण्डा जल्दी लहरायेगा। सभी अपनी-अपनी विशेषता सहित, नाम सहित यादप्यार स्वीकार करना। जनक बच्ची भी (आस्ट्रेलिया) पहुँच रही है। रमता योगी तो है ही लेकिन आज बापदादा ने उड़ता योगी की विशषतायें सुनाई हैं। ऐसी विशेषता स्वरूप बच्चे सदा बाप के साथ हैं। सदा बाप की पालना में रह औरों को भी बाप की पालना का अनुभव कराते रहते हैं। निर्मल आश्रम (निर्मला बहन) यह भी बहुत हिम्मत और उत्साह से आगे बढ़ रही है और सदा शीतलता की विशेषता से विजयी रही है और अमर विजयी रत्न है। अच्छा - जैसे सभी उमंग उत्साह से सेवा में आगे बढ़ रहे हैं, उस उमंग उत्साह की खुशबू बापदादा के पास पहुँच रही है और बापदादा ऐसी सेवाधारी आत्माओं का सदा सफलता की मालाओं से स्वागत करते हैं। और आगे भी विशेष आवाज़ फैलाने के लिए जैसे उमंग से प्लैन बना रहे हैं वह बनाते हुए सफलता को पाते रहेंगे। अच्छा - एक-एक को अपने नाम से यादप्यार.....।



26-11-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सच्चे सहयोगी ही सच्चे योगी

सर्व समर्थ सर्वशक्तिवान शिव बाबा बोले-

आज बच्चों के मिलन स्नेह को देख रहे हैं। एक बल एक भरो - इसी छत्रछाया के नीचे मिलन के उमंग उत्साह से जरा भी हलचल, लगन को हिला न सकी। रूकावट, थकावट बदलकर स्नेह का सहज रास्ता अनुभव कर पहुँच गये हैं। इसको कहा जाता है - हिम्मते बच्चे मददे बाप।जहाँ हिम्मत है वहाँ हुल्लास भी है। हिम्मत नहीं तो हुल्लास भी नहीं। ऐसे सदा हिम्मत हुल्लास में रहने वाले बच्चे एकरस स्थिति द्वारा नम्बरवन ले लेते हैं। कैसे भी कड़े ते कड़ी परिस्थिति हो लेकिन हिम्मत और हुल्लास के पंखों द्वारा सेकण्ड में उड़ती कला की ऊँची स्थिति से हर बड़ी और कड़ी परिस्थिति - छोटी और सहज अनुभव होगी। क्योंकि उड़ती कला के आगे सब छोटे-छोटे खेल के खिलौने अनुभव होंगे। कितनी भी भयानक बातें, भयानक के बजाए स्वाभाविक अनुभव होंगी। दर्दनाक बातें दृढ़ता दिलाने वाली अनुभव होंगी। कितने भी दुखमय नजारे बजते रहेंगे। इसलिए खुशी के नगाड़े, दुख के नजारों का प्रभाव नहीं डालेंगे और ही शान्ति और शक्ति से औरों के दुख दर्द की अग्नि को शीतल जल के सदृश्य सर्व के प्रति सहयोगी बनेंगे। ऐसे समय पर तड़पती हुई आत्माओं को सहयोग की आवश्यकता होती है। इसी सहयोग द्वारा ही श्रेष्ठ योग का अनुभव करेंगे। सभी आपके इस सच्चे सहयोग को ही सच्चे योगी मानेंगे। और ऐसे ही हाहाकार के समय ‘‘सच्चे सहयोगी सो सच्चे योगी’’। इस प्रत्यक्षता से प्रत्यक्षफल की प्राप्ति से ही जय-जयकार होगी। ऐसे समय का ही गायन है - एक बूँद के प्यासे...यह शान्ति की शक्ति की एक सेकण्ड की अनुभूति रूपी बूँद तड़पती हुई आत्माओं को तृप्ती का अनुभव करायेगी। ऐसे समय पर एक सेकण्ड की प्राप्ति उन्हें ऐसे अनुभव करायेगी - जैसे कि सेकण्ड में अनेक जन्मों की तृप्ती वा प्राप्ति हो गई। लेकिन वह एक सेकण्ड की शक्तिशाली स्थिति की बहुत काल से अभ्यासी आत्मा, प्यासे की प्यास बुझा सकती है। अब चेक करो - ऐसे दुख दर्द, दर्दनाक भयानक वायुमण्डल के बीच सेकण्ड में मास्टर विधाता, मास्टर वरदाता, मास्टर सागर बन ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करा सकते हो? ऐसे समय पर यह क्या हो रहा है, यह देखने वा सुनने में लग गये तो भी सहयोगी नहीं बन सकेंगे। यह देखने और सुनने की जरा भी नाम मात्र इच्छा भी सर्व की इच्छायें पूर्ण करने की शक्तिशाली स्थिति बनाने नहीं देगी। इसलिए सदा अपने अल्पकाल की इच्छा मात्रम् अविद्याकी शक्तिशाली स्थिति में अब से अभ्यासी बनो। हर संकल्प, हर श्वास के अखण्ड सेवाधारी, अखण्ड सहयोगी सो योगी बनो। जैसे खण्डित मूर्ति का कोई मूल्य नहीं, पूज्यनीय बनने की अधिकारी नहीं। ऐसे खण्डित सेवाधारी खण्डित योगी ऐसे समय पर अधिकार प्राप्त कराने के अधिकारी नहीं बन सकेंगे। इसलिए ऐसे शक्तिशाली सेवा का समय समीप आ रहा है। समय घण्टी बजा रहा है। जैसे भक्त लोग अपने ईष्ट देव वा देवियों को घण्टी बजाकर उठाते हैं, सुलाते हैं, भोग लगाते हैं। तो अभी समय घण्टी बजाए ईष्ट देव, देवियों को अलर्ट कर रहे हैं। जगे हुए तो हैं ही लेकिन पवित्र प्रवृत्ति में ज्यादा बिजी हो गये हैं। प्यासी आत्माओं की प्यास मिटाने की, सेकण्ड में अनेक जन्मों की प्राप्ति वाली शक्तिशाली स्थिति के अभ्यास के लिए तैयारी करने की समय घण्टी बजा रहा है। प्रत्यक्षता के पर्दे खुलने का समय आप सम्पन्न ईष्ट आत्माओं का आह्वान कर रहा है। समझा। समय की घण्टी तो आप सबने सुनी ना। अच्छा –

ऐसे हर परिस्थिति को उड़ती कला द्वारा सहज पार करने वाले, बहुत काल की सेकण्ड में प्राप्ति द्वारा तृप्ती कराने वाले अखण्ड सेवाधारी, अखण्ड योगी, सदा मास्टर दाता,वरदाता स्वरूप, सदा इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति से सर्व की इच्छायें पूर्ण करने वाले - ऐसे मास्टर सर्वशक्तिवान समर्थ बच्चों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।’’

(कानपुर का समाचार गंगे बहन ने बापदादा को सुनाया) - सदा अचल अडोल आत्मा। हर परिस्थिति में बाप की छत्रछाया के अनुभवी हैं ना? बापदादा बच्चों को सदा सेफ रखते हैं। सेफ्टी का साधन सदा ही बाप द्वारा मिला हुआ है। इसलिए सदा ही बाप का स्नेह का हाथ और साथ है। ‘‘नथिंग न्यु’’ - इसके अभ्यासी हो गये हैं ना! जो बीता नथिंग-न्यु। जो हो रहा है - नथिंग न्यु। स्वत: ही टचिंग होती रहती है। यह रिहर्सल हो रही है। ऐसे समय पर सेफ्टी का, सेवा का क्या साधन हो? क्या स्वरूप हो? इसकी रिहर्सल होती है। फाइनल में हाहाकार के बीच जय-जयकार होनी है। अति के बाद अन्त और नये युग का आरम्भ हो जायेगा। ऐसे समय पर न चाहते भी सबके मन से यह प्रत्यक्षता के नगाड़े बजेंगे। नजारा नाजुक होगा लेकिन बजेंगे प्रत्यक्षता के नगाड़े। तो रिहर्सल से पार हो गई। बेफिकर बादशाह बन, पार्ट बजाया। बहुत अच्छा किया। पहुँच गई यही स्नेह का स्वरूप है। अच्छा - सोच से तो असोच है ही। जो हुआ वाह- वाह! इससे भी कईयों का कुछ कल्याण ही होगा। इसलिए जलने में भी कल्याण, तो बचने में भी कल्याण। हाय नहीं कहेंगे, हाय जल गया, नहीं। इसमें भी कल्याण! बचने के टाइम जैसे वाह-वाह करते हैं, वाह बच गया, ऐसे ही जलने के समय भी वाह-वाह। इसी को ही एकरस स्थिति कहा जाता है। बचाना अपना फर्ज़ है लेकिन जलने वाली चीज़ जलनी ही है। इसमें भी कई हिसाब-किताब होंगे। आप तो हैं ही बेफिकर बादशाह। एक गया लाख पाया’ - यह है ब्राह्मणों का स्लोगन। गया नहीं लेकिन पाया। इसलिए बेफिकर। और अच्छा कोई मिलना होता है। इसलिए जलना भी खेल, बचना भी खेल। दोनों ही खेल हैं। यही तो देखेंगे कि यह कितने बेफिकर बादशाह हैं, जल रहा है लेकिन यह बादशाह हैं। क्योंकि छत्रछाया के अन्दर हैं। वह फिकर में पड़ जाते हैं - क्या होगा, कैसे होगा? कहाँ से खायेंगे, कहाँ से चलेंगे? और बच्चों को यह फिकर है ही नहीं। अच्छा –

अभी तैयारी तो करनी पड़े ना! जायेंगे, यह नहीं सोचो लेकिन सबको ले जायेंगे, यह सोचो। सबको साक्षात्कार कराके, तृप्त करके प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजाके फिर जायेंगे। पहले क्यों जायें! अब तो बाप के साथ-साथ जायेंगे। प्रत्यक्षता की भी वण्डरफुल सीन अनुभव करके जायेंगे ना! यह भी क्यों रह जाए! यह मानसिक भक्ति, मानसिक पूजा, प्रेम के पुष्प यह अन्तिम दृश्य बहुत वण्डरफुल है। एडवान्स पार्टी में किसका पार्ट है वह दूसरी बात है। बाकी यह सीन देखना तो बहुत आवश्यक है। जिसने अन्त किया उसने सब कुछ किया। इसलिए बाप अन्त में आता तो सब कुछ कर लिया ना! तो क्यों नहीं बाप के साथ-साथ यह वण्डरफुल सीन देखते हुए साथ चलो। यह भी कोई-कोई का पार्ट है। तो जाने का संक्ल्प नहीं करो। चले गये तो भी अच्छा। रह गये तो बहुत अच्छा। अकेले जायेंगे तो भी एडवांस पार्टी में सेवा करनी पड़ेगी। इसलिए जाना है यह नहीं सोचो - सबको साथ ले जाना है, यह सोचो। अच्छा - यह भी एक अनुभव बढ़ा। जो होता है उससे अनुभव की डिग्री बढ़ जाती है। जैसे औरों की पढ़ाई में डिग्री बढ़ती है, यह भी अनुभव किया माना डिग्री बढ़ी।

पार्टियों से मुलाकात

सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो? स्वराज्य अब संगमयुग पर,विश्व का राज्य भविष्य की बात है। स्वराज्य अधिकारी ही विश्व-राज्य अधिकारी बनते हैं। सदा अपने को राजस्व अधिकारी समझ, इन कर्मेंन्द्रियों को कर्मचारी समझ अपने अधिकार से चलाते हो या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती है? आप स्वयं राजा हैं या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती? कभी कोई कर्मेन्द्रिय धोखा तो नहीं देती है? अगर किसी से भी धोखा खाया तो दुख लिया। धोखा दुख प्राप्त कराता। धोखा नहीं तो दुख नहीं। तो स्वराज्य की खुशी में, नशे में, शक्ति में रहने वाले। स्वराज्य का नशा उड़ती कला में ले जाने वाला नशा है। हद के नशे नुकसान प्राप्त कराते, यह बेहद का नशा अलौकिक रूहानी नशा सुख की प्राप्ति कराने वाला है। तो यथार्थ राज्य है - राजा का। प्रजा का राज्य हंगामें का राज्य है। आदि से राजाओं का राज्य रहा है। अभी लास्ट जन्म में प्रजा का राज्य चला है। तो आप अभी राज्य अधिकारी बन गये। अनेक-अनेक जन्म भिखारी रहे और अब भिखारी से अधिकारी बन गये। बापदादा सदा कहते - बच्चे खुश रहो, आबाद रहो। जितना अपने को श्रेष्ठ आत्मा समझ, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ बोल, श्र्ोष्ठ संकल्प करेंगे तो इस श्रेष्ठ संकल्प से श्रेष्ठ दुनिया के अधिकारी बन जायेंगे। यह स्वराज्य आपका जन्म-सिद्ध अधिकार है’, यही आपको जन्मजन्म के लिए अधिकारी बनाने वाला है।



28-11-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन

बीज रूप बाप बच्चों प्रति बोले-

आज विश्व रचता, विश्व-कल्याणकारी बाप विश्व की परिक्रमा करने के लिए, विशेष सर्व बच्चों की रेख-देख करने के लिए चारों ओर गये। ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को भी देखा। स्नेही सहयोगी बच्चों को भी देखा। भक्त बच्चों को भी देखा, अज्ञानी बच्चों को भी देखा। भिन्न-भिन्न आत्मायें अपनी-अपनी लगन में मगन देखीं। कोई कुछ कार्य करने की लगन में और कोई तोड़ने के कार्य में मगन, कोई जोड़ने के कार्य में मगन। लेकिन सभी मगन जरूर हैं। सभी के मन में संकल्प यही रहा कि कुछ मिल जाए, कुछ ले लें, कुछ पा लें, इसी लक्ष्य से हरेक अपने-अपने कार्य में लगा हुआ है। चाहे हद की प्राप्ति है, फिर भी कुछ मिल जाए वा कुछ बन जावें यही तात और लात सभी तरफ देखी। इसी के बीच ब्राह्मण बच्चों को विशेष देखा। देश में चाहे विदेश में सभी बच्चों में यही एक संकल्प देखा कि अब कुछ कर लें। बेहद के कार्य में कुछ विशेषता करके दिखावें। अपने में भी कोई विशेषता धारण कर विशेष आत्मा बन जावें। ऐसा उमंग मैजारटी बच्चों में देखा। उमंग-उत्साह का बीज स्वयं के पुरूषार्थ से, साथसाथ समय के वातावरण से सबके अन्दर प्रत्यक्ष रूप में देखा। इसी उमंग के बीज को बार-बार निरन्तर बनाने के अटेन्शन देने का पानी और चेकिंग अर्थात् सदा वृद्धि को पाने की विधि रूपी धूप देते रहें - इसमें नम्बरवार हो जाते हैं। बीज बोना सभी को आता है लेकिन पालना कर फल स्वरूप बनाना इसमें अन्तर हो जाता है।

बापदादा अमृतवेले से सारे दिन तक बच्चों का यह खेल कहो वा लगन का पुरूषार्थ कहो, रोज देखते हैं। हर एक बहुत अच्छे ते अच्छे स्व प्रति वा सेवा के प्रति उमंगों के संकल्प करते कि अभी से यह करेंगे, ऐसे करेंगे, अवश्य करेंगे। करके ही दिखायेंगे-ऐसे श्रेष्ठ संकल्प के बीज बोते रहते हैं। बापदादा से रूह- रूहान में भी बहुत मीठी-मीठी बातें करते हैं। लेकिन जब उस संकल्प को अर्थात् बीज को प्रैक्टिकल में लाने की पालना करते तो क्या होता? कोई न कोई बातों में वृद्धि की विधि में वा फल स्वरूप बनाने की विशेषता में नम्बरवार यथा शक्ति बन जाते हैं। किसी भी संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाने का सहज साधन एक ही है, वह है -’’सदा बीज रूप बाप से हर समय सर्व शक्तियों का बल उस बीज में भरते रहना’’। बीज रूप द्वारा आपके संकल्प रूपी बीज सहज और स्वत: वृद्धि को पाते फलीभूत हो जायेंगे। लेकिन बीज रूप से निरन्तर कनेक्शन न होने के कारण और आत्माओं को वा साधनों को वृद्धि की विधि बना देते हैं। इस कारण ऐसे करें वैसे करें, इस जैसा करें इस विस्तार में समय और मेहनत ज्यादा लगाते हैं। क्योंकि किसी भी आत्मा और साधन को अपना आधार बना लेते हैं। सागर और सूर्य से पानी और धूप मिलने के बजाए कितने भी साधनों के पानी से आत्माओं को आधार समझ सकाश देने से बीज फलीभूत हो नहीं सकता। इसलिए मेहनत करने के बाद, समय लगाने के बाद जब प्रत्यक्ष फल की प्राप्ति नहीं होती तो चलते-चलते उत्साह कम हो जाता और स्वयं से वा साथियों से वा सेवा से निराश हो जाते हैं। कभी खुशी, कभी उदासी दोनों लहरें ब्राह्मण जीवन के नाव को कभी हिलाती कभी चलाती। आजकल कई बच्चों के जीवन की गति-विधि यह दिखाई देती है। चल भी रहे हैं, कार्य कर भी रहे हैं लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा अनुभव नहीं करते हैं इसलिए खुशी है लेकिन खुशी में नाचते रहें, वह नहीं है। चल रहे हैं लेकिन तीव्रगति की चाल नहीं है। सन्तुष्ट भी हैं कि श्रेष्ठ जीवन वाले बन गये, बाप के बन गये, सेवाधारी बन गये, दुख दर्द की दुनिया से किनारे हो गये। लेकिन सन्तुष्टता के बीच कभी कभी असन्तुष्टता की लहर न चाहते, न समझते भी आ जाती है। क्योंकि ज्ञान सहज है, याद भी सहज है लेकिन सम्बन्ध और सम्पर्क में न्यारे और प्यारे बन कर प्रीत निभाना इसमें कहाँ सहज कहाँ मुश्किल बन जाता।

ब्राह्मण परिवार और सेवा की प्रवृत्ति, इसको कहा जाता है - सम्बन्ध सम्पर्क। इसमें किसी न किसी बात से जैसा अनुभव होना चाहिए वैसा नहीं करते। इस कारण दोनों लहरें चलती हैं। अभी समय की समीपता के कारण पुरूषार्थ की यह रफ्तार समय प्रमाण सम्पूर्ण मंजल पर पहुँचा नहीं सकेगी। अभी समय है विघ्न-विनाशक बन विश्व के विघ्नों के बीच दुखी आत्माओं को सुख चैन की अनुभूति कराना। बहुत काल से निर्विघ्न स्थिति वाला ही विघ्न-विनाशक का कार्य कर सकता है। अभी तक अपने जीवन में आये हुए विघ्नों को मिटाने में बिजी रहेंगे, उसमें ही शक्ति लगायेंगे तो दूसरों को शक्ति देने के निमित्त कैसे बन सकेंगे? निर्विघ्न बन शक्तियों का स्टाक जमा करो - तब शक्ति रूप बन विघ्न-विनाशक का कार्य कर सकेंगे। समझा!

विशेष दो बातें देखी। अज्ञानी बच्चे भारत में सीटलेने में वा सीट दिलाने में लगे हुए हैं। दिन रात स्वप्न में भी सीट ही नजर आती और ब्राह्मण बच्चे सेटहोने में लगे हुए हैं। सीट मिली हुई है लेकिन सेट हो रहे हैं। विदेश में अपने ही बनाये हुए विनाशकारी शक्ति से बचने के साधन ढूँढने में लगे हुए हैं। मैजारटी की जीवन, जीवन नहीं लेकिन क्वेश्चन मार्क बन गई है। अज्ञानी बचाव में लगे हुए हैं और ज्ञानी प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने में लगे हुए हैं। यह है विश्व का हाल चाल। अब परेशानियों से बचाओ। भिन्न-भिन्न परेशानियों में भटकती हुई आत्माओं को शान्ति का ठिकाना दो। अच्छा –

सदा सम्पन्न स्थिति की सीट पर सेट रहने वाले, स्व के और विश्व के विघ्नविनाशक, बीजरूप बाप के सम्बन्ध से हर श्रेष्ठ संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाए प्रत्यक्ष फल खाने वाले, सदा सन्तुष्ट रहने वाले, सन्तुष्टमणि बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

अहमदाबाद नारायणपुरा होस्टल की कुमारियों से बापदादा की मुलाकात

अपने भाग्य को देख हर्षित रहती हो ना ? उल्टे रास्ते पर जाने से बच गई। गँवाने के बजाए कमाने वाली जीवन बना दी। लौकिक जीवन में बिना ज्ञान के गँवाना ही गँवाना है और ज्ञानी जीवन में हर सेकण्ड कमाई ही कमाई है। वैसे तकदीरवान सभी ब्राह्मण हैं लेकिन फिर भी कुमारियाँ हैं - डबल तकदीरवान। और कुमारी जीवन में ब्रह्माकुमारी बनना, ब्राह्मण बनना यह बहुत महान है। कम बात नहीं है। बहुत बड़ी बात है। ऐसे नशा रहता है - क्या बन गई! साधारण कुमारी से शक्ति रूप हो गई। माया का संघार करने वाली शक्तियाँ हो ना! माया से घबराने वाली नहीं, संघार करने वाली। कमज़ोर नहीं, बहादुर! कभी छोटीमोटी बात पर घबराती तो नहीं हो ? सदा श्रेष्ठ प्राप्ति को याद रखेंगी तो छोटी छोटी बातें कुछ नहीं लगेंगी। अभी पूरा जीवन का सौदा किया या जब तक होस्टल में है तब तक का सौदा है? कभी भी कोई श्रेष्ठ जीवन से साधारण जीवन में - समझते हुए जा नहीं सकते। अगर कोई लखपति हो उसको कहो गरीब बनो, तो बनेगा? सरकमस्टाँस के कारण कोई बन भी जाता तो भी अच्छा नहीं लगता। तो यह जीवन है - स्वराज्य अधिकारी जीवन। उससे साधारण जीवन में जा नहीं सकते। तो अभी समझदार बनकर अनुभव कर रही हो या एक दो के संग में चल रही हो? अपनी बुद्धि का फैसला किया है? अपने विवेक से, जजमेन्ट से यह जीवन बनाई है ना! या माँ बाप ने कहा तो चली आई? अच्छा!

(2) कुमारियों ने अपने आपको आफर किया? जहाँ भी सेवा में भेजें वहाँ जायेंगी? पक्का सौदा किया है या कच्चा? पक्का सौदा है तो जहाँ बिठाओ, जो कराओ....ऐसे तैयार हो? अगर कोई भी बन्धन है तो पक्का सौदा नहीं। अगर खुद तैयार हो तो कोई रोक नहीं सकता। बकरी को बाँध कर बिठाते हैं, शेर को कोई बाँध नहीं सकता। तो शेरनी किसके बंधन में कैसे आ सकती! वह जंगल में रहते भी स्वतन्त्र है। तो कौन हो? शेरनी! शेरनी माना मैदान में आने वाली। जब एक बल एक भरोसा है तो हिम्मत बच्चों की, मदद बाप की। कैसा भी कड़ा बन्धन है लेकिन हिम्मत के आधार पर वह कड़ा बन्धन भी सहज छूट जाता है। जैसे दिखाते हैं - जेल के ताले भी खुल गये तो आपके बन्धन भी खुल जायेंगे। तो ऐसे बनो। अगर थोड़ा सा भी बन्धन है तो उसको योग अग्नि से भस्म कर दो। भस्म हो जायेगा तो नाम-निशान गुम। तोड़ने से फिर भी गाँठ लगा सकते। इसलिए तोड़ो नहीं लेकिन भस्म करो तो सदा के लिए मुक्त हो जायेंगी। अच्छा –



03-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सर्व समर्थ शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो

अव्यक्त बाप दादा बोले-

आज सर्वशक्तिवान बाप अपने चारों ओर की शक्ति सेना को देख रहे हैं। कौन-कौन सदा सर्व शक्तियों के शस्त्रधारी महावीर विजयी विशेष आत्मायें हैं! कौन-कौन सदा नहीं लेकिन समय पर समय प्रमाण शस्त्रधारी बनते हैं। कौन-कौन समय पर शस्त्रधारी बनने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए कब वार कर सकते, कब हार खा लेते। कब वार कब हार के चक्र में चलते रहते हैं। ऐसे तीनों प्रकार की सेना के अधिकारी बच्चे देखे। लेकिन विजयी श्रेष्ठ आत्मायें सदा पहले से ही एवररेडी रहती हैं। समय प्रमाण शस्त्रधारी बनने में समयशिक्षक बन जाता है। समय रूपी शिक्षक के आधार पर चलने वाले सर्वशक्तिवान शिक्षक की शिक्षा से एवररेडी न बनने के कारण कभी समय पर धोखा भी खा लेते हैं। धोखा खाने से स्मृति के होश में आते हैं। इसलिए सर्वशक्तिवान शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो। समय रूपी शिक्षक के शिक्षाधारी नहीं।

कई बच्चे बापदादा से रूह-रूहान करते वा आपस में भी रूह-रूहान करते, साधारण रूप से यह बोलते रहते कि समय आने पर सब ठीक हो जायेगा। समय पर दिखा देंगे वा समय पर कर लेंगे। लेकिन आप विश्व-परिवर्तक बच्चों को सम्पन्न श्रेष्ठ समय का आह्वान करने का कार्य मिला हुआ है। आप निमित्त हो सुनहरे सवेरे का समय लाने लिए। आप समय रूपी रचना के मास्टर रचता, समय अर्थात् युग-परिवर्तक हो। डबल काल पर विजयी हो। एक काल अर्थात् समय। दूसरा काल मृत्युके वशीभूत नहीं हो। विजयी हो। अमर भव के वरदानी स्वरूप हो। इसलिए समय प्रमाण करने वाले नहीं लेकिन बाप के फरमान प्रमाण चलने वाले। समय तो अज्ञानी आत्माओं का भी शिक्षक बनता है। आपका शिक्षक समर्थ बाप है। कोई भी तैयारी समय के पहले की जाती है न कि उस समय। एवररेडी सर्व शस्त्र शक्तिधारी सैना के हो। तो सदा अपने को चेक करो कि सर्व शक्तियों के शस्त्र धारण किये हुए हैं? कोई भी शक्ति अर्थात् शस्त्र की कमी होगी तो माया उसी कमज़ोरी के विधि द्वारा ही वार करेगी। इसलिए इसमें भी अलबेले नहीं बनना और सब तो ठीक है, थोड़ी सी सिर्फ एक बात में कमज़ोरी है, लेकिन एक कमज़ोरी माया के वार का रास्ता बन जायेगी। जैसे बाप का बच्चों से वायदा है कि जहाँ बाप की याद है वहाँ सदा मैं साथ हूँ ऐसे माया की भी चैलेन्ज है जहाँ कमज़ोरी है वहाँ मैं व्यापक हूँ। इसलिए कमज़ोरी अंश मात्र भी माया के वंश का आह्वान कर देगी। सर्वशक्तिवान के बच्चे तो सब में सम्पन्न होना है। बाप बच्चों को जो वर्से का अधिकार देते हैं, वा शिक्षक रूप में ईश्वरीय पढ़ाई की प्रालब्ध वा डिग्री देते हैं, वह क्या वर्णन करते हो? सर्वगुण सम्पन्न कहते हो वा गुण सम्पन्न कहते हो? सम्पूर्ण निर्विकारी, 16 कला सम्पन्न कहते हो, 14 कला नहीं कहते हो। 100 प्रतिशत सम्पूर्ण सुख-शान्ति का वर्सा कहते हो। तो बनना भी ऐसा पड़ेगा या एक आधी कमज़ोरी चल जायेगी, ऐसे समझते हो? हिसाब-किताब भी गहन है। भोलानाथ भी है लेकिन कर्मों की गति का ज्ञाता भी है। देता भी कणे का घणा करके है और हिसाब भी कणे-कणे का करता है। अगर एक आधी कमज़ोरी रह जाती है तो प्राप्ति में भी आधा जन्म, एक जन्म पीछे आना पड़ता है। श्रीकृष्ण के साथ-साथ वा विश्व-महाराजन पहले लक्ष्मी-नारायण की रायल फैमली वा समीप के सम्बन्ध में आ नहीं सकेंगे। जैसे संवत् एक-एक-एक से शुरू होगा। ऐसे नया सम्बन्ध, नई प्रकृति, नम्बरवन नई आत्मायें, नई अर्थात् ऊपर से उतरी हुई नई आत्मायें, नया राज्य, यह नवीनता के समय का सुख, सतोप्रधान नम्बरवन प्रकृति का सुख नम्बरवन आत्मायें ही पा सकेंगी। नम्बरवन अर्थात् माया पर विन करने वाले। तो हिसाब पूरा होगा। बाप से वरदान वा वर्सा प्राप्त करने का वायदा यही किया है कि - साथ रहेंगे, साथ जीयेंगे और फिर वापिस ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आयेंगे। यह वायदा नहीं किया है कि पीछे-पीछे आयेंगे। समान बनना ही है, साथ रहना है। सम्पन्नता, समानता सदा-साथ के प्रालब्ध के अधिकारी बनाती है। इसलिए सम्पन्न और समान बनने का समय अलबेलेपन में गँवाकर अन्त समय होश में आये तो क्या पायेंगे!

तो आज सभी के सर्व शक्तियों के शस्त्रं की चेकिंग कर रहे थे। रिजल्ट सुनाई - तीन प्रकार के बच्चे देखे। आप सोचते हैं कि आगे चल यह अलबेलेपन के नाज़, इतना थोड़ा-सा तो चल ही जायेगा, इतनी मदद तो बाप कर ही देगा, लेकिन यह नाज़ नाजुक समय पर धोखा न देवे। और बच्चे नाज़ से उल्हना न दें कि इतना तो सोचा नहीं था। इसलिए नाजुक समय सामने आता जा रहा है। भिन्न-भिन्न प्रकार की हलचल बढ़ती ही जायेगी। यह निशानियाँ हैं समय आने की। यह ड्रामा में इशारे हैं तीव्रगति से सम्पन्न बनने के। समझा!

आजकल मधुबन में तीन तरफ की नदियों का मेला है। त्रिवेणी नदी का मेला है ना! तीनों तरफ के आये हुए, लगन से पहुँचने वाले बच्चों को विशेष देख, बच्चों के स्नेह पर बापदादा हर्षित होते हैं। मुख की भाषा नहीं जानते लेकिन स्नेह की भाषा जानते हैं। कर्नाटक वाले स्नेह की भाषा को जानने वाले हैं। और पंजाब वाले क्या जानते हैं? पंजाब में क्या करते हैं? वो लोग खालिस्तान के नारे लगा रहे हैं और आप क्या करते? - ‘दैवी राजस्थान का नारा लगाते। पंजाब वाले ललकार करने में होशियार हैं। तो दैवी राजस्थान की ललकार हाहाकार की जगह जय-जयकार करने वाली है। गुजरात वाले क्या करते हैं? गुजरात वाले सदा झूले में झूलते हैं। अपने संगमयुगी समीप स्थान के भाग्य के भी झूले में झूलते। खुशी में झूलते हैं कि हम तो सबसे नज़दीक हैं। तो गुजरात भिन्न-भिन्न झूलों में झूलने वाले हैं। वैराइटी ग्रुप भी है। वैराइटी सभी को पसन्द आती है। गुलदस्ते में भी वैराइटी रंग, रूप, खुशबू वाले फूल प्रिय लगते हैं। अच्छा–

सब तरफ से आये हुए सभी शक्तिशाली, सदा अलर्ट रहने वाले, सदा सर्व शक्तियों के शस्त्रधारी, सर्व आत्माओं को सम्पूर्ण सम्पन्न बन शक्तियों का सहयोग देने वाले, श्रेष्ठ काल, श्रेष्ठ युग लाने वाले, युग-परिवर्तक नम्बरवन बन नम्बरवन सम्पन्न राज्य भाग्य के अधिकारी - ऐसे सर्व श्रेष्ठ बच्चों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।’’

पंजाब पार्टी से - सदा हर कदम में याद की शक्ति द्वारा पद्मों की कमाई जमा करते हुए आगे बढ़ रहे हो ना? हर कदम में पद्म भरे हुए हैं - यह चेक करते रहते हो? याद का कदम भरपूर है। बिना याद के कदम भरपूर नहीं, कमाई नहीं। तो हर कदम में कमाई जमा करने वाले कमाऊ बच्चे हो ना! कमाने वाले कमाऊ बच्चे होते। एक हैं सिर्फ खाया पिया और उड़ाया और एक हैं कमाई जमा करने वाले। आप कौन से बच्चे हैं? वहाँ बच्चा कमाता है अपने लिए भी और बाप के लिए भी। यहाँ बाप को तो चाहिए नहीं। अपने लिए ही कमाते। सदा हर कदम में जमा करने वाले, कमाई करने वाले बच्चे हैं, यह चेक करो। क्योंकि समय नाजुक होता जा रहा है। तो जितनी कमाई जमा होगी उतना आराम से श्रेष्ठ प्रालब्ध का अनुभव करते रहेंगे। भविष्य में तो प्राप्ति है ही। तो इस कमाई की प्राप्ति अभी संगम पर भी होगी और भविष्य में भी होगी। तो सभी कमाने वाले हो या कमाया और खाया!

जैसे बाप वैसे बच्चे। जैसे बाप सम्पन्न है, सम्पूर्ण है वैसे बच्चे भी सदा सम्पन्न रहने वाले। सभी बहादुर हो ना? डरने वाले तो नहीं हो? डरे तो नहीं? थोड़ा-सा डर की मात्रा संकल्प मात्र भी आई या नहीं? यह नथिंग न्यु है ना। कितने बार यह हुआ है, अनेक बार रिपीट हो चुका है। अभी हो रहा है इसलिए घबराने की बात नहीं। शक्तियाँ भी निर्भय हैं ना! शक्तियाँ सदा विजयी सदा निर्भय। जब बाप की छत्रछाया के नीचे रहने वाले हैं तो निर्भय ही होंगे। जब अपने को अकेला समझते हो तो भय होता। छत्रछाया के अन्दर भय नहीं होता। सदा निर्भय। शक्तियों की विजय सदा गाई हुई है। सभी विजयी शेर हो ना! शिव-शक्तियों की, पाण्डवों की विजय नहीं होगी तो किसकी होगी! पाण्डव और शक्तियाँ कल्प-कल्प के विजयी हैं। बच्चों से बाप का स्नेह है ना। बाप के स्नेही बच्चों को, याद में रहने वाले बच्चों को कुछ भी हो नहीं सकता। याद की कमज़ोरी होगी तो थोड़ा-सा सेक आ भी सकता है। याद की छत्रछाया है तो कुछ भी हो नहीं सकता। बापदादा किसी न किसी साधन से बचा देते हैं। जब भक्त आत्माओं का भी सहारा है तो बच्चों का सहारा सदा ही है।

(2) सदा हिम्मत और हुल्लास के पंखों से उड़ने वाले हो ना! उमंग-उत्साह के पंख सदा स्वयं को भी उड़ाते और दूसरों को भी उड़ाने का मार्ग बताते हैं। यह दोनों ही पंख सदा ही साथ रहें। एक पंख भी ढीला होगा तो ऊँचा उड़ नहीं सकेंगे। इसलिए यह दोनों ही आवश्यक हैं। हिम्मत भी, उमंग हुल्लास भी। हिम्मत ऐसी चीज़ है जो असम्भव को सम्भव कर सकती है। हिम्मत मुश्किल को सहज बनाने वाली है। नीचे से ऊँचा उड़ाने वाली है। तो सदा ऐसे उड़ने वाले अनुभवी आत्मायें हो ना! नीचे में आने से तो देख लिया क्या प्राप्ति हुई! नीचे ही गिरते रहे लेकिन अब उड़ती कला का समय है। हाई जम्प का भी समय नहीं। सेकण्ड में संकल्प किया और उड़ा। ऐसी शक्ति बाप द्वारा सदा मिलती रहेगी।

(3) स्वयं को सदा मास्टर ज्ञान सूर्य समझते हो? ज्ञान सूर्य का कार्य है सर्व से अज्ञान अंधेरे का नाश करना। सूर्य अपने प्रकाश से रात को दिन बना देता है, तो ऐसे मास्टर ज्ञान सूर्य विश्व से अंधकार मिटाने वाले, भटकती आत्माओं को रास्ता दिखाने वाले, रात को दिन बनाने वाले हो ना! अपना यह कार्य सदा याद रहता है? जैसे लौकिक आक्यूपेशन भूलाने से भी नहीं भूलता। वह तो है एक जन्म का विनाशी कार्य, विनाशी आक्यूपेशन, यह है सदा का आक्यूपेशन कि हम मास्टर ज्ञान सूर्य हैं। तो सदा अपना यह अविनाशी आक्यूपेशन या ड्यूटी समझ अंधकार मिटाकर रोशनी लानी है। इससे स्वयं से भी अंधकार समाप्त हो प्रकाश होगा। क्योंकि रोशनी देने वाला स्वयं तो प्रकाशमय हो ही जाता है। तो यह कार्य सदा याद रखो और अपने आपको रोज चेक करो कि मैं मास्टर ज्ञान सूर्य प्रकाशमय हूँ! जैसे आग बुझाने वाले स्वयं आग के सेक में नहीं आते ऐसे सदा अंधकार दूर करने वाले अंधकार में स्वयं नहीं आ सकते। तो मैं मास्टर ज्ञान सूर्य हूँ यह नशा व खुशी सदा रहे

कुमारों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

कुमार जीवन श्रेष्ठ जीवन है, कुमार जीवन में बाप के बन गये ऐसी अपनी श्रेष्ठ तकदीर देख सदा हर्षित रहो और औरों को भी हर्षित रहने की विधि सुनाते रहो। सबसे निर्बन्धन कुमार और कुमारियाँ हैं। कुमार जो चाहें वह अपना भाग्य बना सकते हैं। हिम्मत वाले कुमार हो ना! कमज़ोर कुमार तो नहीं। कितना भी कोई अपने तरफ आकर्षित करे लेकिन महावीर आत्मायें एक बाप के सिवाए कहाँ भी आकर्षित नहीं हो सकती। ऐसे बहादुर हो! कई रूप से माया अपना बनाने का प्रयत्न तो करेगी लेकिन निश्चय बुद्धि विजयी। घबराने वाले नहीं। अच्छा है। वाह मेरी श्रेष्ठ तकदीर’ - बस यही सदा स्मृति रखना। हमारे जैसा कोई हो नहीं सकता - यह नशा रखो। जहाँ ईश्वरीय नशा होगा वहाँ माया से परे रहेंगे। सेवा में तो सदा बिजी रहते हो ना! यह भी जरूरी है। जितना सेवा में बिजी रहेंगे उतना सहजयोगी रहेंगे लेकिन याद सहित सेवा हो तो सेफ्टी है। याद नहीं तो सेफ्टी नहीं।

(2) कुमार सदा निर्विघ्न हो ना? माया आकर्षित तो नहीं करती? कुमारों को माया अपना बनाने की कोशिश बहुत करती है। माया को कुमार बहुत पसन्द आते हैं। वह समझती है मेरे बन जाएँ। लेकिन आप सब तो बहादुर हो ना! माया के मुरीद नहीं, माया को चेलेन्ज करने वाले। आधा कल्प माया के मुरीद रहे, मिला क्या? सब कुछ गँवा दिया। इसलिए अभी प्रभु के बन गये। प्रभु का बनना अर्थात् स्वर्ग के अधिकार को पाना। तो सभी कुमार विजयी कुमार हैं! देखना, कच्चे नहीं होना। माया को कुमारों से एकस्ट्रा प्यार है इसलिए चारों ओर से कोशिश करती है मेरे बन जाएँ। लेकिन आप सबने संकल्प कर लिया। जब बाप के हो गये तो निस्फुरने हो गये। सदा निर्विघ्न भव, उड़ती कला भव

(3) कुमार - सदा समर्थ। जहाँ समर्थी है वहाँ प्राप्ति है। सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप। नॉलेजपुल होने के कारण माया के भिन्न-भिन्न रूपों को जानने वाले। इसलिए अपने भाग्य को आगे बढ़ाते रहो। सदा एक ही बात पक्की करो कि कुमार जीवन अर्थात् मुक्त जीवन। जो जीवनमुक्त है वह संगमयुग की प्राप्ति युक्त होगा। सदा आगे बढ़ते रहो और बढ़ाते रहो। कुमारों को तो सदा खुशी में नाचना चाहिए - वाह कुमार जीवन, वाह भाग्य, वाह ड्रामा! वाह बाबा....यही गीत गाते रहो। खुशी में रहो तो कमज़ोरी आ नहीं सकती। सेवा और याद दोनों से शक्ति भरते रहो। कुमार जीवन हल्की जीवन है। इस जीवन में अपनी तकदीर बनाना यह सबसे बड़ा भाग्य है। कितने बन्धनों में बंधने से बच गये। सदा अपने को ऐसे डबल लाइट समझते हुए उड़ती कला में चलते रहो तो आगे नम्बर ले लेंगे। अच्छा - ओम शान्ति।



05-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सम्पूर्ण काम जीत अर्थात् हद की कामनाओं से परे

सर्व की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले शिव बाबा बोले-

आज बापदादा अपनी सर्वश्रेष्ठ भुजाओं को देख रहें हैं। सभी भुजायें स्नेह और शक्ति द्वारा विश्व को परिवर्तन के कार्य में लगी हुई हैं। एक की सब भुजायें हैं। इसलिए सबके अन्दर एक ही लगन है, कि अपने ईश्वरीय परिवार के अपने ही भाई-बहनें जो बाप को और अपने असली परिवार को न जानने के कारण बच्चे होते हुए भी भाग्य विधाता बाप से भाग्य प्राप्त करने से वंचित हैं - ऐसे भाग्य से वंचित आत्माओं को सुरजीत करें। कुछ न कुछ अधिकार की अंचली द्वारा उन्हों को भी बाप के परिचय से परिचित करें। क्योंकि आप सभी सारी वंशावली के बड़े हो। तो बड़े बच्चे बाप समान गाये जाते हैं। इसलिए बड़ों को छोटे अनजान भाई बहनों प्रति रहम और प्यार स्वत: ही आता है। जैसे हद के परिवार के बड़ों को परिवार के प्रति सदा ध्यान रहता है, ऐसे तुम बेहद के परिवार के बड़ों को ध्यान रहता है ना! कितना बड़ा परिवार है। सारा बेहद का परिवार सामने रहता है? सभी प्रति रहम की किरणें, रूहानी आशीर्वाद की किरणें, वरदान की किरणें फैलाने वाले मास्टर सूर्य हो ना! जैसे सूर्य जितना स्वयं ऊँचा होगा तो चारों ओर किरणें फैलायेगा। नीचे होने से चारों ओर किरणें नहीं फैला सकते हैं। ऐसे आप ऊँचे ते ऊँचे बाप समान ऊँची स्थिति में स्थित होते तब ही बेहद की किरणें फैला सकते हो अर्थात् बेहद के सेवाधारी बन सकते हो। सभी ऐसे बेहद के सेवाधारी हो ना। सर्व आत्माओं की मनोकामनायें पूर्ण करने वाले कामधेनु हो ना! सर्व की मनोकामनायें पूर्ण करने वाले अब तक अपने मन की कामनायें पूर्ण करने में बिजी तो नहीं हो? अपने मन की कामनायें पूर्ण नहीं होंगी तो औरों की मनोकामानायें कैसे पूर्ण करेंगे? सबसे बड़े ते बड़ी मनोकामना बाप को पाने की थी। जब वह श्रेष्ठ कामना पूर्ण हो गई तो उस श्रेष्ठ कामना में सर्व छोटी-छोटी हद की कामनायें समाई हुई हैं। श्रेष्ठ बेहद की कामना के आगे और कोई हद की कामनायें रह जाती हैं क्या? यह हद की कामनायें भी माया से सामना नहीं करा सकती। यह हद की कामना बेहद की स्थिति द्वारा बेहद की सेवा करा नहीं सकती। हद की कामनायें भी सूक्ष्म रूप से चेक करो -मुख्य काम विकार के अंश वा वंश हैं। इसलिए कामना वश सामना नहीं कर सकते। बेहद की मनोकामना पूर्ण करने वाले नहीं बन सकते। काम जीत अर्थात् हद की कामनाओं जीत। ऐसी मनोकामनायें पूर्ण करने वाली विशेष आत्मायें हो। मन्मनाभवकी स्थिति द्वारा मन की हद की कामनायें पूर्ण कर अर्थात् समाप्त कर औरों की मनोकामनायें पूर्ण कर अर्थात् समाप्त कर औरों की मनोकामनायें पूर्ण करने का अभी समय है। तृप्त आत्मायें ही औरों की कामनायें पूर्ण कर सकेंगी। अभी वाणी से परे स्थिति में स्थित रहने की वानप्रस्थ अवस्था में कामना जीत अर्थात् सम्पूर्ण काम जीत के सैम्पुल विश्व के आगे बनो। आपके छोटे-छोटे भाई-बहिनें यही कामना लेकर आप बड़ों की तरफ देख रहे हैं। पुकार रहे हैं कि हमारी मनोकामनायें पूर्ण करो। हमारी सुख-शान्ति की इच्छायें पूर्ण करो। तो आप क्या करेंगे? अपनी इच्छायें पूर्ण करेंगे वा उन्हों की पूर्ण करेंगे? सभी को दिल से, कहने से नहीं या वायुमण्डल के संगठन की मर्यादा प्रमाण नहीं, दिल से यह श्रेष्ठ नारा निकले कि - ‘‘इच्छा मात्रम् अविद्या’’

कई बच्चे बड़े चतुर हैं। चतुर सुजान से भी चतुराई करते हैं। होती हद की इच्छा है और फिर कहेंगे ऐसे ऐसे। यह शुभ इच्छा है, सेवा प्रति इच्छा है। होती अपनी इच्छा है लेकिन बाहर का रूप सेवा का बना देते हैं। इसलिए बापदादा मुस्कराते हुए, जानते हुए, देखते हुए, चतुराई समझते हुए भी कई बच्चों को बाहर से ईशारा नहीं देते। लेकिन ड्रामा अनुसार ईशारा मिलता जरूर है। वह कैसे? हद की इच्छायें पूर्ण होते हुए रूप प्राप्ति का होता लेकिन अन्दर एक इच्छा और इच्छाओं को पैदा करती रहती है। इसलिए मन की उलझन के रूप में ईशारा मिलता रहता है। बाहर से कितना भी कोई हद की प्राप्ति में खाता पीता गाता रहे लेकिन यह मन की उलझन को छिपाने का साधन करते। अन्दर मन तृप्त नहीं होगा। अल्पकाल के लिए होगा लेकिन सदाकाल की तृप्त अवस्था वा यह दिल का गीत कि बाप मिला संसार मिला’, यह नहीं गा सकता। वह बाप को भी कहते हैं - आप तो मिले लेकिन यह भी जरूर चाहिए। यह चाहिए-चाहिए की चाहना की तृप्ती नहीं होगी। समय प्रमाण अभी सबका एक ‘‘इच्छा मात्रम् अविद्या’’ का आवाज़ हो तब औरों की इच्छायें पूर्ण कर सकेंगे। अभी थोड़े समय में आप एक-एक श्रेष्ठ आत्मा को विश्व चैतन्य भण्डार अनुभव करेगा। भिखारी बन आयेंगे। यह आवाज़ निकलेगा कि आप ही भरपूर भण्डार हो। अभी तक ढूँढ रहे हैं कि कोई हैं, लेकिन वह कहाँ हैं, कौन हैं यह स्पष्ट समझ नहीं सकते। लेकिन अभी समय का ऐरो’ (तीर) लगेगा। जैसे रास्ते दिखाने के चिन्ह होते हैं ना। ऐरो दिखाता है कि यहाँ जाओ। ऐसे सभी को यह अनुभूति होगी कि यहाँ जाओ। ऐसे भरपूर भण्डार बने हो ? समय भी आपका सहयोगी बनेगा। शिक्षक नहीं, सहयोगी बनेगा। बापदादा समय के पहले सब बच्चों को सम्पन्न स्वरूप में भरपूर भण्डार के रूप में, इच्छा मात्रम् अविद्या, तृप्त स्वरूप में देखना चाहता है। क्योंकि अभी से संस्कार नहीं भरेंगे तो अन्त में संस्कार भरने वाले बहुत काल की प्राप्ति के अधिकारी नहीं बन सकते। इसलिए विश्व के लिए विश्व आधार मूर्त हो। विश्व के आगे जहान के नूर हो। जहान के कुल दीपक हो। जो भी श्रेष्ठ महिमा है - सर्व श्रेष्ठ महिमा के अधिकारी आत्मायें अब विश्व के आगे अपने सम्पन्न रूप में प्रत्यक्ष हो दिखाओ। समझा।

सभी आये हुए विशेष सेवाधारी बच्चों को विशेष स्नेह स्वरूप से बापदादा स्नेह की स्वागत कर रहे हैं। राइटहैण्ड बच्चों को समानता की हैण्डशेक कर रहे हैं। भले पधारे। अच्छा –

सभी विश्व की मनोकामनायें पूर्ण करने वाले, सदा सम्पन्न तृप्त आत्माओं को, विश्व के आधार मूर्त, हर समय विश्व कल्याण की श्रेष्ठ कामना में स्थित रहने वाले, विश्व के आगे मास्टर विश्व रक्षक बन सर्व की रक्षा करने वाले, सर्व श्रेष्ठ महान आत्माओं को बापदादा का याद प्यार औन नमस्ते।’’

मीटिंग में आये हुए भाई बहिनों से - सेवाधारी बच्चों ने सेवा के प्लैन्स मन में तो बना लिये होंगे, बाकी मीटिंग के संगठन में साकार में लाने के लिए वर्णन करेंगे। जो भी सेवायें चल रही हैं, हर सेवा अच्छे ते अच्छी कहेंगे। जैसे समय समीप आ रहा है, समय सभी की बुद्धियों को हलचल में ला रहा है। ऐसे समय प्रमाण ऐसा शक्तिशाली प्लैन बनाओ जो धरनियों पर हल चले, हमेशा बीज डालने के पहले हल चलाते हैं ना! हल चलाने में क्या होता? हलचल होती है और उसके बाद जो बीज डालते हैं वह सहज सफलता को पाता है। ऐसे अभी यह हलचल का हल चलाओ। कौन-सी हलचल का? जैसे आज सुनाया -’’कोई हैं’’ यह तो सब समझते हैं लेकिन यही हैं और यह एक ही हैं, यह हलचल का हल नहीं चला है। अभी और भी हैं, यह भी हैं यहाँ तक पहुँचे हैं लेकिन यह एक ही हैं, अभी ऐसा तीर लगाओ। इस टचिंग के साथ ऐसी आत्मायें आपके सामने आयें। जब ऐसी हलचल हो तब ही प्रत्यक्षता हो। इसकी विधि क्या है? जैसे सब विधि चलती रहती है, भिन्न-भिन्न प्रोग्राम करते रहते हो। कांफ्रेंस भी करते हो तो दूसरों की स्टेज पर भी जाते हो, अपनी स्टेज भी बनाते हो। योग शिविर भी कराते हो। यह सभी साधन समीप तो लायें हैं और जो शंकाये थीं उन शंकाओं की निवृति भी हुई है। समीप भी आ गये। लेकिन अभी वर्से के अधिकार के समीप आवें। वाह-वाह करने वाले तो बने, अभी वारिस बनें। अभी ऐसा कोई आवाज़ बुलन्द हो कि यही सच्चा रास्ता दिखाने वाले हैं, बाप से मिलाने वाले हैं। बचाने वाले हैं, भगाने वाले नहीं। तो अभी उसकी विधि, वातावरण ऐसा हो। स्टेज की रूपरेखा भी ऐसी हो और सभी का संकल्प भी एक ही हो। वातावरण का प्रभाव शक्तिशाली होना चाहिए। प्यार का तो होता है लेकिन शान्ति और शक्ति उसमें और थोड़ा एडीशन करो। दुनिया के हिसाब से तो शान्ति भी अनुभव करते हैं, लेकिन ऐसा शान्ति का तीर लगे जो शान्ति सागर के सिवाए रह नहीं सकें। यह आपके संग का रंग तो उतने समय तक अच्छा लगता है लेकिन रंग में रंग जाएं और यही रंग उन्हों को खींचता रहे, समीप लाता रहे, सम्बन्ध में लाता रहे वह पक्का रंग लगाओ। सुनाया ना - अभी तक जो किया है वह अच्छे ते अच्छा किया है लेकिन अभी सोना तैयार किया है, अभी नग डालने हैं। आज की दुनिया में प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए। तो प्रत्यक्ष प्रमाण शान्ति और शक्ति का अनुभव हो। चाहे एक घड़ी के लिए हो लेकिन अनुभव ऐसी चीज़ है जो अनुभव की शक्ति समीप सम्बन्ध में जरूर लायेगी। तो प्लैन तो बनायेंगे ही। बाकी बापदादा बच्चों के हिम्मत, उमंग-उत्साह पर खुश हैं। सेवा के शौक में रहने वाले बच्चे हैं। सेवा की लगन अच्छी है। संकल्प भी सभी का चलता जरूर है कि अभी कुछ नवीनता होनी चाहिए। नवीनता लाने के लिए, पहले तो सभी का एक संकल्प होना चाहिए। एक ने सुनाया और सभी ने स्वीकार किया। एक संकल्प में सदा दृढ़ हों। अगर एक ईट भी हिलती है तो पूरी दीवार को हिला देती है। एक का भी संकल्प इसमें थोड़ा-सा कारणे अकारणे सरकमस्टांस प्रमाण हल्का होता है तो सारा प्रोग्राम हल्का हो जाता है। तो ऐसे अपने को दृढ़ संकल्प में लाके, करना ही है, सबका सहयोग मिलना ही है, फिर ट्रायल करो। वैसे बापदादा सेवा से खुश हैं। ऐसी कोई बात नहीं है लेकिन अभी सोने में नग भरेंगे तो दूर से आकर्षण करेंगे।

विदेश में भी बच्चे हिम्मत अच्छी रख रहे हैं। वह खुद भी आपस में हंसते रहते हैं कि माइक हमारा पहुँचा, आवाज़ भी हुआ लेकिन थोड़ी आवाज़ वाला आया। बड़ी आवाज़ वाला नहीं। फिर भी इतने तक तो पहुंच गये हैं। हिम्मत तो अच्छी करते हैं। अच्छा –

अभी आपका पूज्य स्वरूप प्रत्यक्ष होना चाहिए। पूज्य है, पूजा करने वाले नहीं। यही हमारे ईष्ट हैं, पूर्वज हैं, पूज्य हैं, यहाँ से ही सर्व मनाकामनायें पूर्ण होनी हैं, अभी यह अनुभूति हो। सुनाया ना - अभी अपने हद के संकल्प वा कामनायें समाप्त होनी चाहिए, तब ही यह लहर फैलेगी। अभी भी थोड़ा-थोड़ा मेरा-मेरा है। मेरे संस्कार, मेरा स्वभाव यह भी समाप्त हो जाए। बाप का संस्कार सो मेरा संस्कार। ओरिजनल संस्कार तो वह है ना। ब्राह्मणों का परिवर्तन ही विश्वपरिवर्त न का आधार है। तो क्या करेंगे अभी? भाषण जरूर करना है लेकिन आप भाषा में आओ और वह भाषा से परे चले जाएँ। ऐसा भाषण हो। बोलना तो पड़ेगा ना। आप आवाज़ में आओ, वे आवाज़ से परे चले जाएँ। बोल नहीं हो लेकिन अनुभव भरा हुआ बोल हो। सभी में लहर फैल जाए। जैसे कभी कोई ऐसी बात सुनाते हैं तो कभी हंसने की, कभी रोने की, कभी वैराग की लहर फैल जाती है वह टैम्प्रेरी होता है लेकिन फिर भी फैलती है ना। ऐसे अनुभूति होने का लहर फैल जाए। होना तो यही है। जैसे शुरू में स्थापना की आदि में एक ओम की ध्वनि शुरू होती थी और कितने साक्षात्कार में चले जाते थे। लहर फैल जाती थी। ऐसे सभा में अनुभूतियों की लहर फैल जाए। किसको शान्ति की, किसको शक्तियों को अनुभूति हो। यह लहर फैले। सिर्फ सुनने वाले न हो लेकिन अनुभव की लहर हो। जैसे झरना बह रहा हो तो जो भी झरने के नीचे आयेगा उसको शीतलता का, फ्रेश होने का अनुभव होगा ना! ऐसे वह भी शान्ति, शक्ति, प्रेम, आनंद, अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करते जाएं। आज भी साइंस के साधन गर्मीसर्दी की अनुभूति कराते हैं ना। सारे कमरे में ही वह लहर फैल जाती है। तो क्या यह इतनी शिव-शक्तियाँ, पाण्डव, मास्टर शान्ति, शक्ति सबके सागर...यह लहर नहीं फैला सकते! अच्छा –

कितनी विशाल बुद्धि वाले इकट्ठे हुए हैं। शक्ति सेना भी बहुत है। मधुबन में एक ही समय पर इतनी श्रेष्ठ आत्मायें आ जाएँ, यह कोई कम बात नहीं है। अभी तो आपस में भी साधारण हो, तो साधारण बात लगती है। एक-एक कितनी महान आत्मायें हो। इतनी महान आत्माओं का संगठन तो सारे कल्प में ऐसा नहीं हो सकता। कोई एक-एक का महत्व कम नहीं है। अभी तो आपस में भी एक दो को साधारण समझते हो, आगे चल एक दो को विशेषता प्रमाण विशेष आत्मा समझेंगे। अभी हल्की-हल्की बातें नोट ज्यादा होती हैं, विशेषतायें कम। बैठकर सोचो तो एक-एक कितने भक्तों के पूर्वज हो। सभी इष्ट देव और देवियाँ हो ना। एक-एक इष्ट देव के कितने भक्त होंगे? कम हस्तियाँ तो नहीं हो ना! एक मूर्ति का भी इतना महत्व होता, इतने इष्ट देव इकट्ठे हो जाएँ तो क्या हो जाए! शक्तिशाली हो। परन्तु आपस में भी छिपाया है तो विश्व से भी छिपे हो। वैसे एक-एक का मूल्य अनगिनत है। बापदादा तो जब बच्चों के महत्व को देखते हैं तो नाज़ होता है कि एक-एक बच्चा कितना महान है। अपने को भी कभी समझते हो कभी नहीं। वैसे हो बहुत महान। साधारण हस्ती नहीं हो! थोड़ी-सी प्रत्यक्षता होगी फिर आपको भी मालूम पड़ेगा कि हम कौन हैं! बाप तो उसी महानता से देखते हैं। बाप के आगे तो सब प्रत्यक्ष है ना। अच्छा - एक क्लास यह भी करना कि एक-एक की महानता क्या है। अच्छा –



10-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


पुराने खाते की समाप्ति की निशानी

कमल पुष्प सम बनाने वाले बाप दादा बोले –

आज बापदादा साकार तन का आधार ले साकार दुनिया में, साकार रूपधारी बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। वर्तमान समय की हलचल की दुनिया अर्थात् दुःख के वातावरण वाली दुनिया में बापदादा अपने अचल अडोल बच्चों को देख रहे हैं। हलचल में रहते न्यारे और बाप के प्यारे कमल पुष्पों को देख रहे हैं। भय के वातावरण में रहते निर्भय, शक्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। इस विश्व के परिवर्तक बेफिकर बादशाहों को देख रहे हैं। ऐसे बेफिकर बादशाह हो जो चारों ओर के फिकरात के वायुमण्डल का प्रभाव अंश मात्र भी नहीं पड़ सकता है। वर्तमान समय विश्व में मैजारिटी आत्माओं में भय और चिन्ता यह दोनों ही विशेष सभी में प्रवेश हैं। लेकिन जितने ही वह फिकर में हैं, चिंता में हैं उतने ही आप शुभ चिन्तक हो। चिन्ता बदल शुभ चिन्तक के भावना स्वरूप बन गये हो। भयभीत के बजाए सुख के गीत गा रहे हो। इतना परिवर्तन अनुभव करते हो ना! सदा शुभ चिन्तक बन शुभ भावना, शुभ कामना की मानसिक सेवा से भी सभी को सुख-शान्ति की अंचली देने वाले हो ना! अकाले मृत्यु वाली आत्माओं को, अकाल मूर्त बन शान्ति और शक्ति का सहयोग देने वाले हो ना! क्योंकि वर्तमान समय सीजन ही अकाले मृत्यु की है। जैसे वायु का, समुद्र का तूफान अचानक लगता है, ऐसे यह अकाल मृत्यु का भी तूफान अचानक और तेजी से एक साथ अनेकों को ले जाता है। यह अकाले मृत्यु का तूफान अभी तो शुरू हुआ है। विशेष भारत में सिविल वार और प्राकृतिक आपदायें ये ही हर कल्प परिवर्तन के निमित्त बनते हैं। विदेश की रूप रेखा अलग प्रकार की है। लेकिन भारत में यही दोनों बातें विशेष निमित्त बनती हैं। और दोनों की रिहर्सल देख रहे हो। दोनों ही साथ-साथ अपना पार्ट बजा रहे हैं।

बच्चों ने पूछा कि एक ही समय इकट्ठा मृत्यु कैसे और क्यों होता? इसका कारण है। यह तो जानते हो और अनुभव करते हो कि अब सम्पन्न होने का समय समीप आ रहा है। सभी आत्माओं का, द्वापरयुग वा कलियुग से किए हुए विकर्मों वा पापों का खाता जो भी रहा हुआ है वह अभी पूरा ही समाप्त होना है। क्योंकि सभी को अब वापस घर जाना है। द्वापर से किये हुए कर्म वा विकर्म दोनों का फल अगर एक जन्म में समाप्त नहीं होता तो दूसरे जन्मों में भी चुक्तू का वा प्राप्ति का हिसाब चलता आता है। लेकिन अभी लास्ट समय है और पापों का हिसाब ज्यादा है। इसलिए अब जल्दी-जल्दी जन्म और जल्दी-जल्दी मृत्यु - इस सजा द्वारा अनेक आत्माओं का पुराना खाता खत्म हो रहा है। तो वर्तमान समय मृत्यु भी दर्दनाक और जन्म भी मैजारिटी का बहुत दुःख से हो रहा है। न सहज मृत्यु न सहज जन्म है। तो दर्दनाक मृत्यु और दुःखमय जन्म यह जल्दी हिसाब-किताब चुक्तू करने का साधन है। जैसे इस पुरानी दुनिया में चीटियाँ, चीटें, मच्छर आदि को मारने के लिए साधन अपनाये हुए हैं। उन साधनों द्वारा एक ही साथ चीटियाँ वा मच्छर वा अनेक प्रकार के कीटाणु इकट्ठे हो विनाश हो जाते हैं ना। ऐसे आज के समय मानव भी मच्छरों, चीटियों सदृश्य अकाले मृत्यु के वश हो रहे हैं। मानव और चींटियों में अन्तर ही नहीं रहा है। यह सब हिसाबकिताब और सदा के लिए समाप्त होने के कारण इकट्ठा अकाले मृत्यु का तूफान समय प्रति समय आ रहा है।

वैसे धर्मराजपुरी में भी सजाओं का पार्ट अन्त में नूँधा हुआ है। लेकिन वह सजायें सिर्फ आत्मा अपने आप भोगती और हिसाब-किताब चुक्तू करती है। लेकिन कर्मों के हिसाब अनेक प्रकार में भी विशेष तीन प्रकार के हैं - एक हैं आत्मा को अपने आप भोगने वाले हिसाब। जैसे - बीमारियाँ। अपने आप ही आत्मा तन के रोग द्वारा हिसाब चुक्तू करती है। ऐसे और भी दिमाग कमज़ोर होना वा किसी भी प्रकार की भूत प्रवेशता। ऐसे ऐसे प्रकार की सजाओं द्वारा आत्मा स्वयं हिसाब-किताब भोगती है। दूसरा हिसाब है - सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा दुःख की प्राप्ति। यह तो समझ सकते हो ना कि कैसे है! और तीसरा है - प्राकृतिक आपदाओं द्वारा हिसाब-किताब चुक्तू होना। तीनों प्रकार के आधार से हिसाब-किताब चुक्तू हो रहे हैं। तो धर्मराजपुरी में सम्बन्ध और सम्पर्क द्वारा हिसाब वा प्राकृतिक आपदाओं द्वारा हिसाब-किताब चुक्तू नहीं होगा। वह यहाँ साकार सृष्टि में होगा। सारे पुराने खाते सभी के खत्म होने ही हैं। इसलिए यह हिसाब-किताब चुक्तू की मशीनरी अब तीव्रगति से चलनी ही है। विश्व में यह सब होना ही है। समझा! यह है कर्मों की गति का हिसाब-किताब। अब अपने आप को चेक करो - कि मुझ ब्राह्मण आत्मा का तीव्रगति के तीव्र पुरूषार्थ द्वारा सब पुराने हिसाब-किताब चुक्तू हुए हैं वा अभी भी कुछ बोझ रहा हुआ है?

पुराना खाता अभी कुछ रहा हुआ है वा समाप्त हो गया है? इसकी विशेष निशानी जानते हो? श्रेष्ठ परिवर्तन में वा श्रेष्ठ कर्म करने में कोई भी अपना स्वभाव-संस्कार विघ्न डालता है वा जितना चाहते हैं, जितना सोचते हैं उतना नहीं कर पाते हैं, और यही बोल निकलते वा संकल्प मन में चलते कि न चाहते भी पता नहीं क्यों हो जाता है। पता नहीं क्या हो जाता है? वा स्वयं की चाहना श्रेष्ठ होते, हिम्मत हुल्लास होते भी परवश अनुभव करते हैं, कहते हैं ऐसा करना तो नहीं था, सोचा नहीं था लेकिन हो गया। इसको कहा जाता है स्वयं के पुराने स्वभाव-संस्कार के परवश। वा किसी संगदोष के परवश वा किसी वायुमण्डल वायब्रेशन के परवश। यह तीनों प्रकार के परवश स्थितियाँ होती हैं तो न चाहते हुए होना, सोचते हुए न होना वा परवश बन सफलता को प्राप्त न करना - यह निशानी है पिछले पुराने खाते के बोझ की। इन निशानियों द्वारा अपने आपको चेक करो - किसी भी प्रकार का बोझ उड़ती कला के अनुभव से नीचे तो नहीं ले आता। हिसाब चुक्तू अर्थात् हर प्राप्ति के अनुभवों में उड़ती कला। कब-कब प्राप्ति है। कब है तो अब रहा हुआ है। तो इसी विधि से अपने आपको चेक करो। दुःखमय दुनिया में तो दुःख की घटनाओं के पहाड़ फटने ही हैं। ऐसे समय पर सेफ्टी का साधन है ही - बाप की छत्रछाया। छत्रछाया तो है ही ना! अच्छा –

मिलन मेला मनाने सब आये हैं। यही मिलन मेला कितनी भी दर्दनाक सीन हो लेकिन मेला है तो यह खेल लगेगा। भयभीत नहीं होंगे। मिलन के गीत गाते रहेंगे। खुशी में नाचेंगे। औरों को भी साहस का सहयोग देंगे। स्थूल नाचना नहीं, यह खुशी का नाचना है। मेला सदा मनाते रहते हो ना! रहते ही मिलन मेले में हो। फिर भी मधुबन के मेले में आये हो, बापदादा भी ऐसे मेला मनाने वाले बच्चों को देख हर्षित होते हैं। मधुबन के शृंगार मधुबन में पहुँच गये हैं।

अच्छा- ऐसे सदा स्वयं के सर्व हिसाब-विताब चुक्तू कर औरों के भी हिसाब-किताब चुक्तू कराने की शक्ति स्वरूप आत्माओं को, सदा दुःख दर्दनाक वायुमण्डल में रहते हुए न्यारे और बाप के प्यारे रहने वाले रूहानी कमल पुष्पों को, सर्व आत्माओं प्रति शुभ-चिन्तक रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

टीचर्स बहनों से :- सेवाधारी हैं, टीचर्स नहीं। सेवा में त्याग, तपस्या समाई हुई है। सेवाधारी बनना माना खान के अधिकारी बनना। सेवा ऐसी चीज़ है जिससे हर सेकण्ड में भरपूर ही भरपूर। इतने भरपूर हो जाते जो आधा कल्प खाते ही रहेंगे। मेहनत की जरूरत नहीं - ऐसे सेवाधारी। वह भी रूहानी सेवाधारी - रूह की स्थिति में स्थित हो रूह की सेवा करने वाले इसको कहते हैं रूहानी सेवाधारी। ऐसे रूहानी सेवाधारियों को बापदादा सदा रूहानी गुलाबका टाइटल देते हैं। तो सभी रूहानी गुलाब हो जो कभी भी मुरझाने वाले नहीं! सदा अपनी रूहानियत की खुशबू से सभी को रिफ्रेश करने वाले।

2. सेवाधारी बनना भी बहुत श्रेष्ठ भाग्य है। सेवाधारी अर्थात् बाप समान। जैसे बाप सेवाधारी है वैसे आप भी निमित्त सेवाधारी हैं। बाप बेहद का शिक्षक है आप भी निमित्त शिक्षक हो। तो बाप समान बनने का भाग्य प्राप्त है। सदा इसी श्रेष्ठ भाग्य द्वारा औरों को भी अविनाशी भाग्य का वरदान दिलाते रहो। सारे विश्व में ऐसा श्रेष्ठ भाग्य बहुत थोड़ी आत्माओं का है। इस विशेष भाग्य को स्मृति में रखते समर्थ बन समर्थ बनाते रहो। उड़ाते रहो। सदा स्व को आगे बढ़ाते औरों को भी आगे बढ़ाओ। अच्छा –



12-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


विशेष आत्माओं का फर्ज़

सदा दाता, वरदाता शिवबाबा अपने बच्चों प्रति बोले-

आज दिलाराम बाप अपने दिलखुश बच्चों से मिलने आये हैं। सारे विश्व में सदा दिल खुश आप बच्चे ही हैं। बाकी और सभी कभी न कभी किसी न किसी दिल के दर्द में दुखी हैं। ऐसे दिल के दर्द को हरण करने वाले दुःख हर्ता सुख दाता बाप के सुख स्वरूप आप बच्चे हो। और सभी के दिल के दर्द की पुकार हाय-हाय का आवाज़ निकलता है। और आप दिल-खुश बच्चों की दिल से सदा वाह-वाह का आवाज़ निकलता है। जैसे स्थूल शरीर के दर्द भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं ऐसे आज की मनुष्य आत्माओं के दिल के दर्द भी अनेक प्रकार के हैं। कभी तन के कर्म भोग का दर्द, कभी सम्बन्ध सम्पर्क से दुखी होने का दर्द, कभी धन ज्यादा आया वा कम हो गया दोनों की चिंता का दर्द, और कभी प्राकृतिक आपदाओं से प्राप्त हुए दुःख का दर्द। कभी अल्पकाल की इच्छाओं की अप्राप्ति के दुःख दर्द, ऐसे एक दर्द से अनेक दर्द पैदा होते रहते हैं। विश्व ही दुःख दर्द की पुकार करने वाला बन गया है। ऐसे समय पर आप सुखदाई सुख स्वरूप बच्चों का फर्ज़ क्या है? जन्म-जन्म के दुःख दर्द के कर्ज़ से सभी को छुड़ाओ। यह पुराना कर्ज़ दुःख दर्द का मर्ज बन गया है। ऐसे समय पर आप सभी का फर्ज़ है दाता बन जिस आत्मा को जिस प्रकार के कर्ज़ का मर्ज लगा हुआ है उनको उस प्राप्ति से भरपूर करो। जैसे तन के कर्मभोग की दुःख दर्द वाली आत्मा को कर्मयोगी बन कर्मयोग से कर्म भोग समाप्त करे, ऐसे कर्मयोगी बनने की शक्ति की प्राप्ति महादान के रूप में दो। वरदान के रूप में दो, स्वयं तो कर्ज़दार हैं अर्थात् शक्तिहीन ही हैं, खाली हैं। ऐसे को अपने कर्मयोग की शक्ति का हिस्सा दो। कुछ न कुछ अपने खाते से अनेक खाते में जमा करो तब वह कर्ज़ के मर्ज से मुक्त हो सकते हैं। इतना समय जो डायरेक्ट बाप के वारिस बन सर्व शक्तियों का वर्सा जमा किया है उस जमा किये हुए खाते से फराखदिली से दान करो, तब दिल के दर्द की समाप्ति कर सकेंगे। जैसे अन्तिम समय समीप आ रहा है, वैसे सर्व आत्माओं के भक्ति की शक्ति भी समाप्त हो रही है। द्वापर से रजोगुणी आत्माओं में फिर भी दान-पुण्य, भक्ति की शक्ति अपने खातों में जमा थी। इसलिए अपने आत्म-निर्वाह के लिए कुछ न कुछ शान्ति के साधन प्राप्त थे। लेकिन अब तमोगुणी आत्मायें इस थोड़े समय के सुख के आत्म-निर्वाह के साधनों से भी खाली हो गई हैं। अर्थात् भक्ति के फल को भी खाकर खाली हो गई हैं। अब नामधारी भक्ति है। फलस्वरूप भक्ति नहीं है। भक्ति का वृक्ष विस्तार को पा चुका है। वृक्ष की रंग-बिरंगी रंगत की रौनक जरूर है। लेकिन शक्तिहीन होने के कारण फल नही मिल सकता। जैसे स्थूल वृक्ष जब पूरा विस्तार को प्राप्त कर लेता, जड़जड़ीभूत अवस्था तक पहुँच जाता है तो फलदायक नहीं बन सकता है। लेकिन छाया देने वाला बन जाता है। ऐसे भक्ति का वृक्ष भी दिल खुश करने की छाया जरूर दे रहा है। गुरू कर लिया, मुक्ति मिल जायेगी। तीर्थयात्रा दान-पुण्य किया, प्राप्ति हो जायेगी। यह दिल खुश करने के दिलासे की छाया अभी रह गई है। ‘‘अभी नहीं तो कभी मिल जायेगा!’’ इसी छाया में बिचारे भोले भक्त आराम कर रहे हैं लेकिन फल नहीं है। इसलिए सबके आत्म-निर्वाह के खाते खाली हैं। तो ऐसे समय पर आप भरपूर आत्माओं का फर्ज़ है अपने जमा किये हुए हिस्से से ऐसी आत्माओं को हिम्मत हुल्लास दिलाना। जमा है या अपने प्रति ही कमाया और खाया! कमाया और खाया उसको राजयोगी नहीं कहेंगे। स्वराज्य अधिकारी नहीं कहेंगे। राजा के भण्डारे सदा भरपूर रहते हैं। प्रजा के पालना की जिम्मेवारी राजा पर होती है। स्वराज्य अधिकारी अर्थात् सर्व खज़ाने भरपूर। अगर खज़ाने भरपूर नहीं तो अब भी प्रजा- योगी हैं। राजयोगी नहीं। प्रजा कमाती और खाती है। साहूकार प्रजा थोड़ा बहुत जमा रखती है। लेकिन राजा खज़ानों का मालिक है। तो राजयोगी अर्थात् स्वराज्य अधिकारी आत्मायें। किसी भी खज़ाने में जमा का खाता खाली नहीं हो सकता। तो अपने को देखो कि खज़ाने भरपूर हैं? दाता के बच्चे सर्व को देने की भावना है वा अपने में ही मस्त हैं? स्व की पालना में ही समय बीत जाता वा औरों की पालना का समय और खज़ाना भरपूर है। यहाँ संगम से ही रूहानी पालना के संस्कार वाले भविष्य में प्रजा के पालनहार विश्व राजन् बन सकते हैं। राजा वा प्रजा का स्टैम्प यहाँ से ही लगता है। स्टेटस वहाँ मिलता है। अगर यहाँ की स्टैम्प नहीं तो स्टेटस नहीं। संगमयुग स्टैम्प आिफस है। बाप द्वारा ब्राह्मण परिवार द्वारा स्टैम्प लगती है। तो अपने आप को अच्छी तरह से देखो। स्टाक चेक करो। ऐसे न हो समय पर एक अप्राप्ति भी सम्पन्न बनने में धोखा दे देवे! जैसे स्थूल स्टाक जमा करते, अगर सब राशन जमा कर लिया लेकिन छोटा-सी माचिस रह गयी तो अनाज़ क्या करेंगे? अनेक प्राप्तियाँ होते भी एक अप्राप्ति धोखा दे सकती है। ऐसे एक भी अप्राप्ति सम्पन्नता का स्टैम्प लगाने के अधिकारी बनने में धोखा दे देगी।

यह नहीं सोचो - याद की शक्ति तो है, किसी गुण की कमी है तो कोई हर्जा नहीं। याद की शक्ति महान है, नम्बरवन है यह ठीक है। लेकिन किसी भी एक गुण की कमी भी समय पर फुल पास होने में फेल कर देगी। यह छोटी बात नहीं समझो। एक एक गुण का महत्व और सम्बन्ध क्या है, यह भी गहरा हिसाब है, वह फिर कभी सुनायेंगे।

आप विशेष आत्माओं की फर्ज़ अदाई क्या है, आज यह विशेष स्मृति दिलाई। समझा! इस समय देहली राजधानी वाले आये हैं ना। तो राज्य अधिकारी की बातें सुनाई। ऐसे ही राजधानी में महल नहीं मिल जायेगा। पालना कर प्रजा बनानी होगी। देहली वाले तो जोर-शोर से तैयारी कर रहे होंगे ना। राजधानी में रहना है ना, दूर तो नहीं जाना है ना!

गुजरात वाले तो अभी भी साथ हैं। संगम पर मधुबन के साथ हैं तो राज्य में भी साथ होंगे ना! साथ रहने का दृढ़ संकल्प किया हैं ना। तीसरा है इन्दौर। इन-डोर अर्थात् घर में ही रहने वाले। तो इन्दौर जोन वाले राज्य के घर में रहेंगे ना। अभी भी बाप के दिल रूपी घर में रहने वाले। तो तीनों की समीपता की राशि मिलती है। सदा ऐसे ही इस भाग्य की रेखा को स्पष्ट और विस्तार को प्राप्त करते रहना। अच्छा –

ऐसे सदा सम्पन्न-पन की फर्ज़-अदाई पालन करने वाले, अपने दाता-पन के श्रेष्ठ संस्कारों से सर्व के दर्द मिटाने वाले, सदा स्वराज्य अधिकारी बन रूहानी पालना करने वाले, सर्व खज़ानों से भरपूर भण्डारे करने वाले, मास्टर दाता वरदाता, ऐसे राजयोगी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सदा अपने को साक्षीपन की सीट पर स्थित आत्मायें अनुभव करते हो? यह साक्षीपन की स्थिति सबसे बढ़िया श्रेष्ठ सीट है। इस सीट पर बैठ कर्म करने या देखने में बहुत मजा आता है। जैसे सीट अच्छी होती है तो बैठने में मजा आता है ना। सीट अच्छी नहीं तो बैठने में मजा नहीं। यह साक्षीपन की सीटसबसे श्रेष्ठ सीट है। इसी सीट पर सदा रहते हो? दुनिया में भी आजकल सीट के पीछे भाग-दौड़ कर रहे हैं। आपको कितनी बढ़िया सीट मिली हुई है। जिस सीट से कोई उतार नहीं सकता। उन्हों को कितना डर रहता है, आज सीट है कल नहीं। आपको अविनाशी है, निर्भय होकर बैठ सकते हो। तो साक्षी-पन की सीट पर सदा रहते हो? अपसेट वाला सेट नहीं हो सकता। सदा इस सीट पर सेट रहो। यह ऐसी आराम की सीट है जिस पर बैठकर जो देखने चाहो जो अनुभव करने चाहो वह कर सकते हो।

2. अपने को इस सृष्टि के अन्दर कोटों में कोई और कोई में भी कोई... ऐसी विशेष आत्मा समझते हो? जो गायन है कोटों में कोई बाप के बनते हैं, वह हम हैं। यह खुशी सदा रहती है? विश्व की अनेक आत्मायें बाप को पाने का प्रयत्न कर रहीं हैं और हमने पा लिया! बाप का बनना अर्थात् बाप को पाना। दुनिया ढूंढ रही है और हम उनके बन गये! भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग की प्राप्ति में बहुत अन्तर है। ज्ञान है पढ़ाई, भक्ति पढ़ाई नहीं है। वह थोड़े समय के लिए आध्यात्मिक मनोरंजन है। लेकिन सदा काल की प्राप्ति का साधन ज्ञानहै। तो सदा इसी स्मृति में रह औरों को भी समर्थ बनाओ। जो ख्याल ख्वाब में न था - वह प्रैक्टिकल में पा लिया। बाप ने हर कोने से बच्चों को निकाल अपना बना लिया। तो इसी खुशी में रहो।

3. सभी अपने को एक ही बाप के, एक ही मत पर चलने वाले एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले अनुभव करते हो? जब एक बाप है, दूसरा है ही नहीं तो सहज ही एकरस स्थिति हो जाती है। ऐसे अनुभव है? जब दूसरा कोई है ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जायेगी और कहाँ जाने की मार्जिन ही नहीं है। है ही एक। जहाँ दो चार बातें होती हैं तो सोचने को मार्जिन हो जाती। जब एक ही रास्ता है तो कहाँ जायेंगे! तो यहाँ मार्ग बताने के लिए ही सहज विधि है - एक बाप, एक मत, एकरस एक ही परिवार। तो एक ही बात याद रखो तो वन नम्बर हो जायेंगे। एक का हिसाब जानना है, बस। कहाँ भी रहो लेकिन एक की याद है तो सदा एक के साथ हैं, दूर नहीं। जहाँ बाप का साथ है वहाँ माया का साथ हो नहीं सकता। बाप से किनारा करके फिर माया आती है। ऐसे नहीं आती। न किनारा हो न माया आये। एक का ही महत्व है।

अधर कुमारों से बापदादा की मुलाकात

सदा प्रवृति में रहते अलौकिक वृत्ति में रहते हो? गृहस्थी जीवन से परे रहने वाले। सदा ट्रस्टी रूप में रहने वाले। ऐसे अनुभव करते हो? ट्रस्टी माना सदा सुखी और गृहस्थी माना सदा दुखी, आप कौन हो? सदा सुखी। अभी दुःख की दुनिया छोड़ दी। उससे निकल गये। अभी संगमयुगी सुखों की दुनिया में हो। अलौकिक प्रवृत्ति वाले हो, लौकिक प्रवृत्ति वाले नहीं। आपस में भी अलौकिक वृत्ति, अलौकिक दृष्टि रहे।

ट्रस्टी-पन की निशानी है - सदा न्यारा और बाप का प्यारा। अगर न्याराप् यारा नहीं तो ट्रस्टी नहीं। गृहस्थी जीवन अर्थात् बन्धन वाली जीवन। ट्रस्टी जीवन निर्बन्धन है। ट्रस्टी बनने से सब बन्धन सहज ही समाप्त हो जाते हैं। बन्धनमुक्त हैं तो सदा सुखी हैं। उनके पास दुख की लहर भी नहीं आ सकती। अगर संकल्प में भी आता है - मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा यह काम है तो यह स्मृति भी माया का आह्वान करती है। तो मेरे को तेराबना दो। जहाँ तेरा है वहाँ दु:ख खत्म। मेरा कहना और मूंझना। तेरा कहना और मौज में रहना। अभी मौज में नहीं रहेंगे तो कब रहेंगे! संगमयुग ही मौजों का युग है। इसलिए सदा मौज में रहो। स्वप्न और संकल्प में भी व्यर्थ न हो। आधा कल्प सब व्यर्थ गंवाया, अब गंवाने का समय पूरा हुआ। कमाई का समय है। जितने समर्थ होंगे उतना कमाई कर जमा कर सकेंगे।

इतना जमा करो जो 21 जन्म आराम से खाते रहो। इतना स्टाक हो जो स्वयं भी दे सको। क्योंकि दाता के बच्चे हो। जितना जमा होगा उतनी खुशी जरूर होगी।

सदा एक बाप दूसरा न कोई इसी लगन में मगन रहो। जहाँ लगन है वहाँ विघ्न नहीं रह सकता। दिन है तो रात नहीं, रात है तो दिन नहीं। ऐसे यह लगन और विघ्न हैं। लगन ऐसी शक्तिशाली है जो विघ्न को भस्म कर देती है। ऐसी लगन वाली निर्विघ्न आत्मायें हों? कितना भी बड़ा विघ्न हो, माया विघ्न रूप बन कर आये लेकिन लगन वाले उसे ऐसे पार करते हैं जैसे माखन से बाल। लगन ही सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराती है। जहाँ बाप है वहाँ प्राप्ति जरूर है। जो बाप का खज़ाना वह बच्चे का।

माताओं के साथ - शक्ति दल है ना! मातायें, जगत मातायें बन गई। अभी हद की मातायें नहीं। सदा अपने को जगत मातासमझो। हद की गृहस्थी में फँसने वाली नहीं। बेहद की सेवा में सदा खुश रहने वाली। कितना श्रेष्ठ मर्तबा बाप ने दिला दिया। दासी से सिर का ताज बना दिया। वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य’! बस यही गीत गाती रहो। बस यही एक काम बाप ने माताओं को दिया है। क्योंकि मातायें बहुत भटक-भटकर थक गई। तो बाप माताओं की थकावट देख, उन्हें थकावट से छुड़ाने आये हैं। 63 जन्म की थकावट एक जन्म में समाप्त कर दी। एक सेकण्ड में समाप्त कर दी। बाप के बने और थकावट खत्म! माताओं को झूलना और झुलाना अच्छा लगता है। तो बाप ने माताओं को खुशी का, अतीन्द्रिय सुख का झूला दिया है। उसी झूले में झूलती रहो। सदा सुखी, सदा सुहागिन बन गई। अमर बाप के अमर बच्चे बन गये। बापदादा भी बच्चों को देखकर खुश होते हैं। अच्छा।



17-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


व्यर्थ को समाप्त करने का साधन - समर्थ संकल्पों का खज़ाना - ज्ञान मुरली

सर्व समर्थ बापदादा बोले –

आज बापदादा संगमयुगी अलौकिक रूहानी महफिल में मिलन मनाने आये हैं। यह रूहानी महफिल, रूहानी मिलन सारे कल्प में अभी ही कर सकते हो। आत्माओं से परम आत्मा का मिलन! यह श्रेष्ठ मिलन सतयुगी सृष्टि में भी नहीं होगा। इसलिए इस युग को महान युग, महा मिलन का युग, सर्व प्राप्तियों का युग, असम्भव से सम्भव होने का युग, सहज और श्रेष्ठ अनुभूतियों का युग, विशेष परिवर्तन का युग, विश्व कल्याण का युग, सहज वरदानों का युग कहा जाता है। ऐसे युग में महान पार्टधारी तुम आत्मायें हो। ऐसा महान नशा सदा रहता है? सारी विश्व जिस बाप को एक सेकण्ड की झलक देखने की चात्रक है, उस बाप के सेकण्ड में अधिकारी बनने वाले हम श्रेष्ठ आत्मायें हैं। यह स्मृति में रहता है? यह स्मृति स्वत: ही समर्थ बनाती है। ऐसी समर्थ आत्मायें बने हो? समर्थ अर्थात् व्यर्थ को समाप्त करनेवाले। व्यर्थ है तो समर्थ नहीं। अगर मंसा में व्यर्थ संकल्प है तो समर्थ संकल्प ठहर नहीं सकते। व्यर्थ बार-बार नीचे ले आता है। समर्थ संकल्प समर्थ बाप के मिलन का भी अनुभव कराता। माया जीत भी बनाता। सफलता स्वरूप सेवाधारी भी बनाता। व्यर्थ संकल्प सदा उत्साह उमंग को समाप्त करता है। वह सदा क्यों, क्या की उलझन में रहता। इसलिए छोटीछोटी बातों में स्वयं से दिलशिकस्त रहता। व्यर्थ संकल्प सदा सर्व प्राप्तियों के खज़ाने को अनुभव करने से वंचित कर देता। व्यर्थ संकल्प वाले के मन की चाहना वा मन की इच्छायें बहुत ऊँची होती हैं। यह करूँगा, यह करूँ, यह प्लैन बहुत तेजी से बनाते अर्थात् तीव्रगति से बनाते हैं। क्योंकि व्यर्थ संकल्पों की गति फास्ट होती है। इसलिए बहुत ऊँची-ऊँची बातें सोचते हैं, लेकिन समर्थ न होने के कारण प्लैन और प्रैक्टिकल में महान अन्तर हो जाता है। इसलिए दिलशिकस्त हो जाते हैं। समर्थ संकल्प वाले सदा जो सोचेंगे वह करेंगे। सोचना और करना दोनों समान होगा। सदा धैर्यवत् गति से संकल्प और कर्म में सफल होंगे। व्यर्थ संकल्प तेज तूफान की तरह हलचल में लाता है। समर्थ संकल्प सदा-बहार के समान हरा-भरा बना देता है। व्यर्थ संकल्प एनर्जी अर्थात् आत्मिक शक्ति और समय गंवाने के निमित्त बनता है। समर्थ संकल्प सदा आत्मिक शक्ति अर्थात् एनर्जी जमा करता है। समय सफल करता है। व्यर्थ संकल्प रचना होते हुए भी, व्यर्थ रचना, आत्मा रचता को भी परेशान करती है। अर्थात् मास्टर सर्व शक्तिवान समर्थ आत्मा की शान से परे कर देती है। समर्थ संकल्प से सदा श्रेष्ठ शान के स्मृति स्वरूप रहते हैं। इस अन्तर को समझते भी हो फिर भी कई बच्चे व्यर्थ संकल्पों की शिकायत अभी भी करते हैं। अब तक भी व्यर्थ संकल्प क्यों चलता, इसका कारण? जो बापदादा ने समर्थ संकल्पों का खज़ाना दिया है - वह है ज्ञान की मुरली। मुरली का एक-एक महावाक्य समर्थ खज़ाना है। इस समर्थ संकल्प के खज़ाने का महत्व कम होने के कारण समर्थ संकल्प धारण नहीं होता तो व्यर्थ को चांस मिल जाता है। हर समय एक-एक महावाक्य मनन करते रहें तो समर्थ बुद्धि में व्यर्थ आ नहीं सकता है। खाली बुद्धि रह जाती है, इसलिए खाली स्थान होने के कारण व्यर्थ आ जाता है। जब मार्जिन ही नहीं होगी तो व्यर्थ आ कैसे सकता? समर्थ संकल्पों से बुद्धि को बिजी रखने का साधन नहीं आना अर्थात् व्यर्थ संकल्पों का आह्वान करना।

बिजी रखने के बिजनेसमैन बनो। दिन-रात इन ज्ञान रत्नों के बिजनेसमैन बनो। न फुर्सत होगी न व्यर्थ संकल्पों को मार्जिन होगी। तो विशेष बात ‘‘बुद्धि को समर्थ संकल्पों से सदा भरपूर रखो।’’ उसका आधार है - रोज की मुरली सुनना, समाना और स्वरूप बनना। यह तीन स्टेजेज हैं। सुनना बहुत अच्छा लगता है। सुनने के बिना रह नहीं सकते। यह भी स्टेज है। ऐसी स्टेज वाले सुनने के समय तक सुनने की इच्छा, सुनने का रस होने के कारण उस समय तक उसी रस की मौज में रहते हैं। सुनने में मस्त भी रहते हैं। बहुत अच्छा! यह खुशी से गीत भी गाते हैं। लेकिन सुनना समाप्त हुआ तो वह रस भी समाप्त हो जाता है। क्योंकि समाया नहीं। समाने की शक्ति द्वारा बुद्धि को समर्थ संकल्पों से सम्पन्न नहीं किया तो व्यर्थ आता रहता है। समाने वाले सदा भरपूर रहते हैं। इसलिए व्यर्थ संकल्पों से किनारा रहता है। लेकिन स्वरूप बनने वाले शक्तिशाली बन औरों को भी शक्तिशाली बनाते हैं। तो वह कमी रह जायेगी।

व्यर्थ से तो बचते हैं, शुद्ध संकल्पों में रहते हैं लेकिन शक्ति स्वरूप नहीं बन सकते। स्वरूप बनने वाले सदा सम्पन्न, सदा समर्थ, सदा शक्तिशाली किरणों द्वारा औरों के भी व्यर्थ को समाप्त करने वाले होते हैं। तो अपने आप से पूछो कि मैं कौन हूँ? सुनने वाले, समाने वाले वा स्वरूप बनने वाले? शक्तिशाली आत्मा सेकेण्ड में व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर देती है। तो शक्तिशाली आत्मायें हो ना? तो व्यर्थ को परिवर्तन करो। अभी तक व्यर्थ में शक्ति और समय गंवाते रहेंगे तो समर्थ कब बनेंगे? बहुतकाल का समर्थ ही बहुत काल का सम्पन्न राज्य कर सकता है। समझा।

अभी अपने समर्थ स्वरूप द्वारा औरों को समर्थ बनाने का समय है। स्व के व्यर्थ को समाप्त करो। हिम्मत है ना? महाराष्ट्र वाले आये हैं तो हिम्मत भी महान है ना। जैसे महाराष्ट्र है वैसे ही महान हो ना? महान संकल्प करने वाले हो ना? कमज़ोर संकल्प वाले नहीं। संकल्प किया और हुआ। इसको कहते हैं - महान संकल्प। ऐसे महान आत्मायें हो ना! और पंजाब वाले क्या सोचते हैं? पंजाब के बहादुर हैं ना! माया की शक्ति वाले गवर्मेन्ट को ललकार कर रहे हैं। ईश्वरीय शक्ति वाले माया को ललकार कर रहे हैं। माया को ललकार करने वाले हो ना! घबराने वाले तो नहीं हो ना। जैसे वह कहते हैं हमारा राज्य हो, आप भी माया को ललकार करते हो, गर्जना से कहते हो कि अब हमारा राज्य है। ऐसे बहादुर हो ना। पंजाब वाले भी बहादुर हैं। महाराष्ट्र वाले महान हैं और कर्नाटक वालों की विशेषता है - महान भावना। भावना के कारण भावना का फल सहज मिलता रहता है। कर्नाटक वाले भावना द्वारा महान फल खाने वाले हैं। इसलिए सदा खुशी में नाचते रहते हैं। तो खुशी का फल खाने वाले खुशनसीब आत्मायें हैं। तो वह (महाराष्ट्र) महान संकल्पधारी। और पंजाब महान ललकार करने वाले महान राज्य अधिकारी। और वह (कर्नाटक) महान फल खाने वाले। तीनों ही महान हो गये ना!

महाराष्ट्र अर्थात् सबमें महान। हर संकल्प महान, स्वरूप महान। कर्म महान। सेवा महान। सबमें महान। तो आज महानकी तीन नदियाँ मिली हैं। महान नदियाँ मिल गई ना। महान नदियों का महासागर से मिलन है। इसलिए मिलन महिफल में आयें हैं। आज महिफल भी मनानी है ना। अच्छा - ऐसे सदा समर्थ, सदा हर महावाक्य के स्वरूप बनने वाले, बहुत काल के समर्थ, आत्माओं को समर्थ बनाने वाले बापदादा का सर्व समार्थियों सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।’’

दादियों से - यह महामण्डली बैठी है। आदि में ओममण्डली रही और अन्त में महामण्डली हो गई। सभी महान आत्माओं की मण्डली है ना। वह अपने को महामण्डलेश्वर कहलाते हैं और आप अपने को महा-सेवाधारी कहलाते हो। महामण्डलेश्वर वा महामण्डलेश्वरी नहीं कहलाते लेकिन महा-सेवाधारी। तो महान सेवाधारियों की महान मण्डली। महा-सेवाधारी अर्थात् हर संकल्प से स्वत: ही सेवा के निमित्त बने हुए। हर संकल्प द्वारा स्वत: ही सेवा के निमित्त बने हुए। हर संकल्प द्वारा स्वतः सेवा होती रहती है। जो स्वत: योगी हैं वह स्वत: सेवाधारी हैं। सिर्फ चेक करो - कि स्वत: सेवा हो रही है तो अनुभव करेंगे कि सेवा के सिवाए सेकण्ड और संकल्प भी जा नहीं सकता। चलते-फिरते हर कार्य करते सेवा श्वांस-श्वांस सेकण्ड-सेकण्ड में सेवा समाई हुई है। इसको कहा जाता है - स्वत: सेवाधारी।ऐसे हो ना। अभी विशेष प्रोग्राम से सेवा करने की स्थिति समाप्त हुई। स्वत: सेवा के निमित्त बन गये। यह अभी औरों को चांस दिया है। वह प्रोग्राम भी बनायेंगे, प्रैक्टिकल भी करेंगे लेकिन आप लोगों की सेवा अभी स्वत: सेवाधारियों की है। प्रोग्राम के समय तक नहीं लेकिन सदा ही प्रोग्राम है। सदा ही सेवा की स्टेज पर हो। ऐसी मण्डली है ना। जैसे शरीर श्वांस के बिना चल नहीं सकता, ऐसे आत्मा सेवा के बिना रह नहीं सकती। यह श्वांस चलता ही रहता है ना आटोमेटिक। ऐसे सेवा स्वत: चलती है। सेवा ही जैसे कि आत्मा का श्वांस है। ऐसे है ना? कितने घण्टे सेवा की, यह हिसाब निकाल सकते हो? धर्म- कर्म है ही सेवा। चलना भी सेवा, बोलना भी सेवा, करना भी सेवा तो स्वत: सेवाधारी, सदा के सेवाधारी। जो भी संकल्प उठता उसमें सेवा समाई है। हर बोल में सेवा समाई हुई है क्योंकि व्यर्थ तो समाप्त हो गया। तो समर्थ माना सेवा। ऐसे को कहा जाता है - महामण्डली वाले महान आत्मायें हैं। अच्छा –

सभी आपके साथी भी बापदादा के सम्मुख हैं। ओम मण्डली वाले सब महामण्डली वाले, आदि के सेवाधारी सदा सेवाधारीहैं। बापदादा के सामने सभी महामण्डली की महान आत्मायें हैं। फिर पान का बीड़ा उठाने वाले तो महान मण्डली वाले ही हुए ना। पान का बीड़ा उठाया ना। बिना कुछ सोचने के, संकल्प करने के, दृढ़ संकल्प किया और निमित्त बन गये। इसको कहा जाता है - महान आत्मायें। महान कर्त्तव्य के निमित्त बने हो। एक्जैम्पुल तो बने। बिना एक्जैम्पुल देखे हुए विश्व के लिए एक्जैम्पुल बन गये। तुरंत दान महापुण्य। ऐसी महान आत्मायें हो। अच्छा।

(पार्टियों से) महाराष्ट्र तथा पंजाब ग्रुप

1. आप सब बच्चे निर्भयहो ना। क्यों? क्योंकि आप सदा निवzहो। आपका किसी से भी वैर नहीं है। सभी आत्माओं के प्रति भाई-भाई की शुभ भावना, शुभ कामना है। ऐसी शुभ भावना, कामना वाली आत्मायें सदा निर्भय रहती हैं। भयभीत होने वाले नहीं। स्वयं योगयुक्त स्थिति में स्थित हैं तो कैसी भी परिस्थिति में सेफ जरूर हैं। तो सदा सेफ रहने वाले हो ना? बाप की छत्रछाया में रहने वाले सदा सेफ है। छत्रछाया से बाहर निकले तो फिर भय है। छत्रछाया के अन्दर निर्भय हैं। कितना भी कोई कुछ भी करे लेकिन बाप की याद एक किला है। जैसे किले के अन्दर कोई नहीं आ सकता, ऐसे याद के किले के अन्दर सेफ। हलचल में भी अचल। घबराने वाले नहीं। यह तो कुछ भी नहीं देखा। यह रिहर्सल है। रीयल तो और है। रिहर्सल पक्का कराने के लिए की जाती है। तो पक्के हो गये, बहादुर हो गये? बाप से लगन है तो कैसी भी समस्याओं में पहुँच गये। समस्या जीत बन गये। लगन निर्विघ्न बनने की शक्ति देती है। बस सिर्फ मेरा बाबायह महामंत्र याद रहे। यह भूला तो गये। यही याद रहा तो सदा सेफ हैं।

2. सदा अपने को अचल अडोल आत्मायें अनुभव करते हो? किसी भी प्रकार की हलचल अचल अडोल स्थिति में विघ्न नहीं डाले। ऐसी विघ्नविनाशक अचल अडोल आत्मायें बने हो। विघ्न-विनाशक आत्मायें हर विघ्न को ऐसे पार करती जैसे विघ्न नहीं - एक खेल है। तो खेल करने में सदा मजा आता है ना। कोई परिस्थिति को पार करना और खेल करना अन्तर होगा ना। अगर विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं तो परिस्थिति खेल अनुभव होती है। पहाड़ राई के समान अनुभव होता है। ऐसे विघ्न-विनाशक हो, घबराने वाले तो नहीं। नॉलेजफुल आत्मायें पहले से ही जानती हैं कि यह सब तो आना ही है, होना ही है। जब पहले से पता होता है तो कोई बात - बड़ी बात नहीं लगती। अचानक कुछ होता है तो छोटी बात भी बड़ी लगती। पहले से पता होता तो बड़ी बात भी छोटी लगती। आप सब नॉलेजफुल हो ना। वैसे तो नॉलेजफुल हो लेकिन जब परिस्थितियों का समय होता है उस समय नॉलेजफुल की स्थिति भूले नहीं, अनेक बार किया हुआ अब सिर्फ रिपीट कर रहे हो। जब नथिंग न्यु है तो सब सहज है। आप सब किले की पक्की ईटें हो। एक-एक ईंट का बहुत महत्व है। एक भी ईंट हिलती तो सारी दिवार को हिला देती। तो आप ईंट अचल हो, कोई कितना भी हिलाने की कोशिश करे लेकिन हिलाने वाला हिल जाए - आप न हिलें। ऐसी अचल आत्माओं को, विघ्न विनाशक आत्माओं को बापदादा रोज मुबारक देते हैं। ऐसे बच्चे ही बाप वी मुबारक के अधिकारी हैं। ऐसे अचल अडोल बच्चों को बाप और सारा परिवार देखकर हर्षित होता है। अच्छा –



19-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सर्वश्रेष्ठ, सहज तथा स्पष्ट मार्ग

सर्वश्रेष्ठ साथी, सहज-सरल मार्ग प्रदर्शक शिव बाबा अपने भाग्यवान बच्चों प्रति बोले –

आज बापदादा विशेष स्नेही, सदा साथ निभाने वाले अपने साथियों को देख रहे हैं। साथी अर्थात् सदा-साथ रहने वाले। हर कर्म में, संकल्प में साथ निभाने वाले। हर कदम पर कदम रख आगे बढ़ने वाले। एक कदम भी मनमत, परमत पर उठाने वाले नहीं। ऐसे सदा साथी के साथ निभाने वाले सदा सहज मार्ग का अनुभव करते हैं क्योंकि बाप वा श्रेष्ठ साथी हर कदम रखते हुए रास्ता स्पष्ट और साफ कर देते हैं । आप सबको सिर्फ कदम के ऊपर कदम रखकर चलना है। रास्ता सही है, सहज है, स्पष्ट है - यह सोचने की भी आवश्यकता नहीं। जहाँ बाप का कदम है वह है ही श्रेष्ठ रास्ता। सिर्फ कदम रखो और हर कदम में पद्म लो। कितना सहज है! बाप साथी बन साथ निभाने के लिए साकार माध्यम द्वारा हर कदम रूपी कर्म करके दिखाने के लिए साकार सृष्टि पर अवतरित होते हैं। यह भी सहज करने के लिए साकार को माध्यम बनाया है। साकार में फॉलो करना वा कदम पर कदम रखना तो सहज है ना। श्रेष्ठ साथी ने साथियों के लिए इतना सहज मार्ग बताया - क्योंकि बाप साथी जानते है कि जिन साथियों को साथी बनाया है, यह बहुत भटके हुए होने के कारण थके हुए हैं। निराश हैं, निर्बल हैं। मुश्किल समझ दिलशिकस्त हो गये हैं इसलिए सहज से सहज सिर्फ कदम पर कदम रखो। यही सहज साधन बताते हैं। सिर्फ कदम रखना आपका काम है, चलाना, पार पहुँचाना, कदम-कदम पर बल भरना, थकावट मिटाना यह सब साथी का काम है। सिर्फ कदम नहीं हटाओ। सिर्फ कदम रखना यह तो मुश्किल नहीं है ना। कदम रखना अर्थात् संकल्प करना। जो साथी कहेंगे, जैसे चलायेंगे वैसे चलेंगे। अपना नहीं चलायेंगे। अपना चलना अर्थात् चिल्लाना! तो ऐसा कदम रखना आता है ना। क्या यह मुश्किल है? जिम्मेवारी लेने वाला जिम्मेवारी ले रहे हैं तो उसके ऊपर जिम्मेवारी सौंपने नहीं आती है? जब साकार माध्यम को मार्ग-दर्शन स्वरूप बनाए सैम्पल भी रखा फिर मार्ग पर चलना मुश्किल क्यों? सहज साधन सेकण्ड का साधन है। जो साकार रूप में ब्रह्मा बाप ने जैसे किया जो किया वही करना है। फॉलो फादर करना है।

हर संकल्प को वेरीफाय करो। बाप का संकल्प सो मेरा संकल्प है। कापी करना भी नहीं आता? दुनिया वाले कापी करने से रोकते हैं और यहाँ तो करना ही सिर्फ कापीहैं। तो सहज हुआ या मुश्किल हुआ? जब सहज, सरल, स्पष्ट रास्ता मिल गया तो फॉलो करो। और रास्तों पर जाते ही क्यों हो? और रास्ता अर्थात् व्यर्थ संकल्प रूपी रास्ता। कमज़ोरी के संकल्प रूपी रास्ता। कलियुगी आकर्षण के भिन्न-भिन्न संकल्पों का रास्ता। कलियुगी पुरानी समझ द्वारा देह अहंकारवश संकल्प का रास्ता है। इन रास्तों द्वारा उलझन के जंगल में पहुँच जाते हो। जहाँ से जितना निकलने की कोशिश करते हो उतना चारों ओर काँटे होने के कारण निकल नहीं पाते हो। काँटे क्या होते हैं? कहाँ, क्या होगा - यह क्याका काँटा लगता। कहाँ क्योंका काँटा लगता, कहाँ कैसेका काँटा लगता। कहाँ अपने ही कमज़ोर संस्कारों का काँटा लगता। चारों ओर काँटे ही काँटे नजर आते हैं। फिर चिल्लाते हैं अब साथी आकर बचाओ! तो साथी भी कहते हैं कदम पर कदम रखने के बजाए और रास्ते पर गये क्यों? जब साथी साथ देने के लिए स्वयं आफर कर रहे हैं फिर साथी को छोड़ते क्यों? किनारा करना अर्थात् सहारा छूटना। अकेले बनते क्यों हो? हद के साथ की आकर्षण चाहे किसी सम्बन्ध की, चाहे किसी साधन की अपने तरफ आकर्षित करती है। इसी आकर्षण के कारण साधन को वा विनाशी सम्बन्ध को अपना साथी बना लेते हो वा सहारा बना देते हो तब अविनाशी साथी से किनारा करते हो। और सहारा छूट ही जाता है। आधा कल्प इन हद के सहारे को सहारा समझ अनुभव कर लिया कि यह सहारा है वा दलदल है! फँसाया, गिराया वा मंज़िल पर पहुँचाया? अच्छी तरह से अनुभव किया ना। एक जन्म के अनुभवी तो नहीं हो ना। 63 जन्मों के अनुभवी हो। और भी एक-दो जन्म चाहिए? एक बार धोखा खाने वाला दुबारा धोखा नहीं खाता है। अगर बार-बार धोखा खाता है तो उसको भाग्यहीन कहा जाता है। अब तो स्वयं भाग्य विधाता ब्रह्मा बाप ने सभी ब्राह्मणों की जन्म पत्री में श्रेष्ठ भाग्य की लम्बी लकीर खींच ली है ना। भाग्य विधाता ने आपका भाग्य बनाया है। भाग्य विधाता बाप होने के कारण हर ब्राह्मण बच्चे को भाग्य के भरपूर भण्डार का वर्सा दे दिया है। तो सोचो - भाग्य के भण्डार के मालिक के बालक उसको क्या कमी रह सकती है।

मेरा भाग्य क्या है- सोचने की भी आवश्यकता नहीं क्योंकि भाग्यविधाता बाप बन गया तो बच्चे को भाग्य के जायदाद की क्या कमी होगी! भाग्य के खज़ाने के मालिक हो गये ना। ऐसे भाग्यवान कभी धोखा नहीं खा सकते हैं। इसलिए सहज रास्ता - कदम पर कदम उठाओ। स्वयं ही स्वयं को उलझन में ड़ालते हो, साथी का साथ छोड़ देते हो। सिर्फ यह एक बात याद रखो कि - हम श्रेष्ठ साथी के साथ हैं। वेरीफाय करो। तो सदा स्वयं से सैटिस्फाय रहेंगे। समझा सहज रास्ता। सहज को मुश्किल नहीं बनाओ। संकल्प में भी कभी मुश्किल अनुभव नहीं करना। ऐसे दृढ़ संकल्प करने आता है ना कि वहाँ जाकर फिर कहेंगे कि मुश्किल है। बापदादा देखते हैं कि नाम सहज योगीहै और अनुभव मुश्किल होता है। मानते अपने को अधिकारी हैं और बनते अधीन हैं। हैं भाग्यविधाता के बच्चे और सोचते हैं - पता नहीं मेरा भाग्य है वा नहीं। शायद यही मेरा भाग्य है। इसलिए अपने आपको जानो और सदा स्वयं को हर समय के साथी समझ चलते चलो। अच्छा –

ऐसे सदा हर कदम पर कदम रखने वाले, फॉलो फादर करने वाले, सदा हर संकल्प में साथी का साथ अनुभव करने वाले, सदा एक साथी दूसरा न कोई, ऐसे प्रीत निभाने वाले, सदा सहज योगी, श्रेष्ठ भाग्यवान विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - कुमारियों से

1. कुमारियाँ अर्थात् कमाल करने वाली। साधारण कुमारियाँ नहीं, अलौकिक कुमारियाँ हो। लौकिक इस लोक की कुमारियाँ क्या करतीं और आप अलौकिक कुमारियाँ क्या करती हो? रात दिन का फर्क है। वह देह अभिमान में रह औरों को भी देह अभिमान में गिरातीं और आप सदा देही अभिमानी बन स्वयं भी उड़ती और दूसरों को भी उड़ाती - ऐसी कुमारियाँ हो ना! जब बाप मिल गया तो सर्व सम्बन्ध एक बाप से सदा हैं ही। पहले कहने मात्र थे, अभी प्रैक्टिकल है। भक्ति मार्ग में भी गायन जरूर करते थे कि सर्व सम्बन्ध बाप से हैं लेकिन अब प्रैक्टिकल सर्व सम्बन्धों का रस बाप द्वारा मिलता है। ऐसे अनुभव करने वाली हो ना। जब सर्व रस एक बाप द्वारा मिलता है तो और कहाँ भी संकल्प जा नहीं सकता। ऐसे निश्चय बुद्धि विजयी रत्न सदा गाये और पूजे जाते हैं। तो विजयी आत्मायें हैं, सदा स्मृति के तिलकधारी आत्मायें हैं, यह स्मृति रहती है? इतनी कुमारियाँ कौन-सी कमाल करेंगे? सदा हर कर्म द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करेंगी। हर कर्म से बाप दिखाई दे। कोई बोल भी बोलो तो ऐसा बोल हो जो उस बोल में बाप दिखाई दे। दुनिया में भी कोई बहुत अच्छा बोलने वाले होते हैं तो सब कहते हैं - इसको सिखाने वाला कौन? उसके तरफ दृष्टि जाती है। ऐसे आपके हर कर्म द्वारा बाप की प्रत्यक्षता हो। ऐसी धारणामूर्त दिव्यमूर्त यह विशेषता है। भाषण करने वाले तो सभी बनते हैं। लेकिन अपने हर कर्म से भाषण करने वाले वह कोटो में कोई होते हैं। तो ऐसी विशेषता दिखायेगी ना। अपने चरित्र द्वारा बाप का चित्र दिखाना। अच्छा –

2. कुमारियों का झुण्ड हैं। सेना तैयार हो रही है। वह तो लेफ्ट-राइट करते, आप सदा राइट ही राइट करते। यह सैना कितनी श्रेष्ठ है, शान्ति द्वारा विजयी बन जाते। शान्ति से ही स्वराज्य पा लेते। कोई हलचल नहीं करनी पड़ती है। तो पक्की शक्ति सेना की शक्तियाँ हो, सैना छोड़कर जाने वाली नहीं। स्वप्न में भी कोई हिला न सके। कभी भी किसी के संगदोष में आने वाली नहीं। सदा बाप के संग में रहने वाले, दूसरे के संग में नहीं आ सकते। तो सारा ग्रुप बहादुर है ना! बहादुर क्या करते हैं? मैदान पर आते हैं। तो हो सभी बहादुर लेकिन मैदान पर नहीं आई हो। बहादुर जब मैदान पर आते हैं तो देखा होगा कि बहादुर की बहादुरी में बैण्ड बजाते हैं। आप भी जब मैदान पर आयेंगी तो खुशी की बैण्ड बजेगी। कुमारियाँ सदा ही श्रेष्ठ तकदीरवान हैं। कुमारियों को सेवा का बहुत अच्छा चांस है और मिलने वाला भी है। क्योंकि सेवा बहुत है और सेवाधारी कम हैं। जब सेवाधारी सेवा पर निकलेंगे तो कितनी सेवा हो जायेगी। देखेंगे कुमारियाँ क्या कमाल करती हैं। बाम्बे की कुमारियाँ तो बाम्बे बाम छोड़ने वाली कुमारियाँ होंगी ना। साधारण कार्य तो सब करते हैं लेकिन आप विशेष कार्य करके दिखाओ। कुमारियाँ घर का श्रृंगार हो। लौकिक में कुमारियों को क्या भी समझें लेकिन पारलौकिक घर में कुमारियाँ महान हैं। कुमारियाँ हैं तो सेन्टर की रौनक है। माताओं के लिए भी विशेष लिफ्ट है। पहले माता गुरू है। बाप ने माता गुरू को आगे किया है तब भविष्य में माताओं का नाम आगे है। अच्छा!

टीचर्स के साथ - टीचर्स अर्थात् बाप समान। जैसे बाप वैसे निमित्त सेवाधारी। बाप भी निमित्त है तो सेवाधारी भी निमित्त आत्मायें हैं। निमित्त समझने से स्वत: ही बाप समान बनने का संस्कार प्रैक्टिकल में आता है। अगर निमित्त नहीं समझते तो बाप समान नहीं बन सकते। तो एक निमित्त, दूसरा सदा न्यारा और प्यारा। यह बाप की विशेषता है। प्यारा भी बनता और न्यारा भी रहता। न्यारा बनकर प्यारा बनता है। तो बाप समान अर्थात् अति न्यारे और अति प्यारे। औरों से न्यारे और बाप से प्यारे। यह समानता है। बाप की यही दो विशेषताएँ हैं। तो बाप समान सेवाधारी भी ऐसे हैं। इसी विशेषता को सदा स्मृति में रखते हुए सहज आगे बढ़ती जायेंगी। मेहनत नहीं करनी पड़ेंगी। जहाँ निमित्त हैं वहाँ सफलता है ही। वहाँ मेरा-पन आ नहीं सकता। जहाँ मेरा-पन है वहाँ सफलता नहीं। निमित्त भाव सफलता की चाबी है।जब हद का लौकिक मेरा-पन छोड़ दिया तो फिर और मेरा कहाँ से आया। मेरा के बजाए बाबा-बाबाकहने से सदा सेफ हो जाते। मेरा सेन्टर नहीं बाबा का सेन्टर। मेरा जिज्ञासु नहीं - बाबा का। मेरा खत्म होकर तेरा बन जाता। तेरा कहना अर्थात् उड़ना। तो निमित्त शिक्षक अर्थात् उड़ती कला के एक्जैम्पल। जैसे आप उड़ती कला के एक्जैम्पुल बनते वैसे दूसरे भी बनते हैं। न चाहते भी जिसके निमित्त बनते हो उनमें वह वायब्रेशन स्वत: आ जाते है। तो निमित्त शिक्षक, सेवाधारी सदा न्यारे हैं, सदा प्यारे हैं। कभी भी कोई पेपर आवे तो उसमें पास होने वाले हैं। निश्चयबुद्धि विजयी हैं।

2. सभी रूहानी गुलाब हो ना। मोतिया हो या गुलाब? जैसे गुलाब का पुष्प सब पुष्पों में से श्रेष्ठ गाया जाता है ऐसे रूहानी गुलाब अर्थात् श्रेष्ठ आत्मायें। रूहानी गुलाब सदा रूहानियत में रहने वाला, सदा रूहानी नशे में रहने वाला। सदा रूहानी सेवा में रहने वाला - ऐसे रूहानी गुलाब हो। आजकल के समय प्रमाण रूहानियत की आवश्यकता है। रूहानियत न होने के कारण ही यह सब लड़ाई झगड़े हैं। तो रूहानी गुलाब बन रूहानियत की खुशबू फैलाने वाले। यही ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन है। सदा इसी आक्यूपेशन में बिजी रहो।

पार्टियों से

सदा स्वयं को डबल लाइट फरिश्ता अनुभव करते हो। फरिश्ता अर्थात् जिसकी दुनिया ही एक बापहो। ऐसे फरिश्ते सदा बाप के प्यारे हैं। फरिश्ता अर्थात् देह और देह के सम्बन्धों से आकर्षण का रिश्ता नहीं। निमित्त मात्र देह में हैं और देह के सम्बन्धियों से कार्य में आते हैं लेकिन लगाव नहीं। क्योंकि फरिश्तों के और कोई से रिश्ते नहीं होते। फरिश्ते के रिश्ते एक बाप के साथ हैं। ऐसे फरिश्ते हो ना। अभी-अभी देह में कर्म करने के लिए आते और अभी- अभी देह से न्यारे! फरिश्ते सेकण्ड में यहाँ, सेकण्ड में वहाँ। क्योंकि उड़ने वाले हैं। कर्म करने के लिए देह का आधार लिया और फिर ऊपर। ऐसे अनुभव करते हो? अगर कहाँ भी लगाव है, बन्धन है तो बन्धन वाला ऊपर नहीं उड़ सकता। वह नीचे आ जायेगा। फरिश्ते अर्थात् सदा उड़ती कला वाले। नीचे ऊपर होने वाले नहीं। सदा ऊपर की स्थिति में रहने वाले। फरिश्तों के संसार में रहने वाले। तो फरिश्ता स्मृति स्वरूप बने तो सब रिश्ते खत्म। ऐसे अभ्यासी हो ना। कर्म किया और फिर न्यारे। लिफ्ट में क्या करते हैं? अभी-अभी नीचे अभी-अभी ऊपर। नीचे आये कर्म किया और फिर स्विच दबाया और ऊपर। ऐसे अभ्यासी। अच्छा - ओम् शान्ति।



24-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ईश्वरीय स्नेह का महत्व

दाता और विधाता बापदादा अपने स्नेही बच्चों प्रति बोले –

आज स्नेह के सागर अपने स्नेही चात्रक बच्चों से मिलने आये हैं। अनेक जन्मों से इस सच्चे अविनाशी ईश्वरीय स्नेह के प्यासे रहे। जन्म-जन्म की प्यासी चात्रक आत्माओं को अब सच्चा स्नेह, अविनाशी स्नेह अनुभव हो रहा है। भक्त आत्मा होने के कारण आप सभी बच्चे स्नेह के भिखारी बन गये। अब बाप भिखारी से स्नेह के सागर के वर्से के अधिकारी बना रहे हैं। अनुभव के आधार से सबकी दिल से अब यह आवाज़ स्वत: ही निकलता है कि ईश्वरीय स्नेह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।तो भिखारी से अधिकारी बन गये। विश्व में हर एक आत्मा को जीवन में आवश्यक चीज़ स्नेह ही है। जीवन में स्नेह नहीं तो जीवन नीरस अनुभव करते हैं। स्नेहइतनी ऊँची वस्तु है जो आज के साधारण लोग स्नेह को ही भगवान मानते हैं। प्यार ही परमात्मा है वा परमात्मा ही प्यार है। तो स्नेह इतना ऊँचा है जितना भगवान को ऊँचा मानते हैं। इसलिए भगवान को स्नेह वा प्यार कहते हैं। यह क्यों कहा जाता, अनुभव नहीं है। फिर भी परमात्मा बाप जब इस सृष्टि पर आये हैं तो सभी बच्चों को प्रैक्टिकल जीवन में साकार स्वरूप से स्नेह दिया है, दे रहे हैं। तब अनुभव नहीं होते हुए भी यही समझते हैं कि स्नेह ही परमात्मा है। तो परमात्मा बाप की पहली देन स्नेहहै। स्नेह ने आप सबको ब्राह्मण जन्म दिया है। स्नेह की पालना ने आप सबको ईश्वरीय सेवा के योग्य बनाया है। स्नेह ने सहज योगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी बनाया है। स्नेह ने हद के त्याग को भाग्य अनुभव कराया है। त्याग नहीं - भाग्य है। यह अनुभव सच्चे स्नेह ने कराया ना। इसी स्नेह के आधार पर किसी भी प्रकार के तूफान ईश्वरीय तोफा अनुभव करते। स्नेह के आधार पर मुश्किल को अति सहज अनुभव करते है। इसी ईश्वरीय स्नेह के अनेक सम्बन्धों में लगी हुई दिल को, अनेक टुकड़े हुई दिल को एक से जोड़ लिया है। अब एक दिल, एक दिलाराम है। दिल के टुकड़े नहीं हैं। स्नेह ने बाप समान बना दिया। स्नेह ने ही सदा साथ के अनुभव कारण सदा समर्थ बना दिया। स्नेह ने युग परिवर्तन कर लिया। कलियुगी से संगमयुगी बना दिया। स्नेह ने ही दुःख-दर्द की दुनिया से सुख के खुशी की दुनिया में परिवर्तन कर लिया। इतना महत्व है इस ईश्वरीय स्नेहका। जो महत्व को जानते हैं वही महान बन जाते हैं। ऐसे महान बने हो ना! सभी से सहज पुरूषार्थ भी यही है। स्नेह में सदा समाये रहो। लवलीन आत्मा को कभी स्वप्न मात्र भी माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता है। क्योंकि लवलीन अवस्था माया प्रूफ अवस्था है। तो स्नेह में रहना सहज है ना। स्नेह ने सभी को मधुबन निवासी बनाया है। स्नेह के कारण पहुँचे हो ना! बापदादा भी सभी बच्चों को यही वरदान देते - सदा स्नेही भव।स्नेह ऐसा जादू है जिससे जो मांगेंगे वह प्राप्त कर सकेंगे। सच्चे स्नेह से, दिल के स्नेह से, स्वार्था स्नेह से नहीं। समय पर स्नेही बनने वाले नहीं। जब कोई आवश्यकता का समय आवे उस समय मीठा बाबा, प्यारा बाबा कहकर निभाने वाले नहीं। सदा ही इस स्नेह में समाये हुए हो। ऐसे के लिए बापदादा सदा छत्रछाया है। समय पर याद करने वाले वा मतलब से याद करने वाले, ऐसे को भी यथाशक्ति, यथा स्नेह रिटर्न में सहयोग मिलता है लेकिन यथा शक्ति। सम्पन्न सम्पूर्ण सफलता नहीं मिलती। तो सदा स्नेह द्वारा सर्व प्राप्ति स्वरूप अनुभव करने के लिए सच्ची दिल के स्नेही बनो। समझा!

बापदादा सभी मधुबन घर का शृंगार बच्चों को विशेष स्नेह की बधाई दे रहे हैं। हर एक बच्चा बाप के घर का विशेष शृंगार है। इस मधुबन बेहद घर के बच्चे ही रौनक हैं। ऐसे अपने को समझते हो ना। दुनिया वाले क्रिसिमस मनाने के लिए कहाँ-कहाँ जाते हैं। और यह विशेष विदेशी वा भारत के बच्चे स्वीट होम में पहुँचे हैं। बड़ा दिन, बड़े ते बड़े बाप से बड़ी दिल से मनाने के लिए।

यह बड़ा दिन विशेष बाप और दादादोनों के यादगार निशानी का दिन है। एक दाता रूप से शिवबाबा की निशानी और बुढ़ा स्वरूप ब्रह्मा बाप की निशानी। कभी भी युवा रूप नहीं दिखायेंगे। क्रिसिमस फादर बूढ़ा ही दिखाते हैं। और दो रंग भी जरूर दिखायेंगे। सफेद और लाल। तो बाप और दादा दोनों की यह निशानी है। बापदादा छोटे बच्चों को जो उन्हों की इच्छा है - उससे भरपूर कर देता है। छोटे-छोटे बच्चे बड़े स्नेह से इस विशेष दिन पर अपनी दिल पसन्द चीज़ें क्रिसिमस फादर से माँगते हैं वा संकल्प रखते हैं। और निश्चय रखते हैं कि वह जरूर पूर्ण करेगा। तो यह यादगार भी आप बच्चों का है। चाहे पुराने शूद्र जीवन के कितने भी बुजुर्ग हो लेकिन ब्राह्मण जीवन में छोटे बच्चे ही हैं। तो सभी छोटे बच्चे जो भी श्रेष्ठ कामना करते वह पूर्ण होती हैं ना। इसलिए यह याद निशानी लास्ट धर्म वालों में भी चली आ रही है। आप सभी को इस संगमयुग के बड़े दिन की बहुत-बहुत सौगातें बापदादा द्वारा मिल गई हैं ना। विशेष यह बड़ा दिन सौगातों का दिन है। तो बापदादा सबसे बड़ी सौगात - स्वराज्य और स्वर्ग का राज्य देता है। जिसमें अप्राप्त कोई वस्तु रह नहीं जाती। सर्व प्राप्ति स्वरूप बन जाते हो। तो बड़ा दिन मनाने वाले बड़ी दिल वाले हैं। विश्व को देने वाले तो बड़ी दिल वाले हुए ना। तो सभी को संगमयुगी बड़े दिन की बड़ी दिल से बड़े ते बड़े बापदादा बधाई दे रहे हैं। वो लोग 12 बजे के बाद मनायेंगे, आप सबसे नम्बर आगे हो ना। तो पहले आप मना रहे हो। पीछे दुनिया वाले मनायेंगे। विशेष रूप में डबल विदेशी आज बहुत उमंग उत्साह से याद सौगात बाप प्रति स्थूल सूक्ष्म रूप में दे रहे हैं। बापदादा भी सभी डबल विदेशी बच्चों को स्नेह के सौगात की रिटर्न में पद्मगुणा, सदा स्नेही साथी रहेंगे, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए लवलीन स्थिति का अनुभव करेंगे, ऐसे वरदान भरी याद और अमर प्यार की रिटर्न में सौगात दे रहे हैं। सदा गाते और खुशी में नाचते रहेंगे। सदा मुख मीठा रहेगा। ऐसे ही स्नेही भारत के बच्चों को भी विशेष सहज योगी, स्वत: योगी के वरदान की यादप्यार दे रहे हैं।

सभी बच्चों को दाता और विधाता बापदादा अविनाशी स्नेह सम्पन्न सदा समर्थ स्वरूप से सहज अनुभव करने की यादप्यार दे रहे हैं सभी को यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से

1. सदा अपने को इस पुरानी दुनिया की आकर्षण से न्यारे और बाप के प्यारे, ऐसे अनुभव करते हो? जितना न्यारे होंगे उतना स्वत: ही प्यारे होंगे। न्यारे नहीं तो प्यारे नहीं। तो न्यारे हैं और प्यारे हैं या कहाँ न कहाँ लगाव है? जब किसी से लगाव नहीं तो बुद्धि एक बाप तरफ स्वत: जायेगी। दूसरी जगह जा नहीं सकती। सहज और निरंतर योगी की स्थिति अनुभव होगी। अभी नहीं सहजयोगी बनेंगे तो कब बनेंगे? इतनी सहज प्राप्ति है, सतयुग में भी अभी की प्राप्ति का फल है। तो अभी सहजयोगी और सदा के राज्य भाग्य के अधिकारी सहजयोगी बच्चे सदा बाप के समान समीप हैं। तो अपने को बाप के समीप साथ रहने वाले अनुभव करते हो? जो साथ हैं उनको सहारा सदा है। साथ नहीं रहते तो सहारा भी नहीं मिलता। जब बाप का सहारा मिल गया तो कोई भी विघ्न आ नहीं सकता। जहाँ सर्व शक्तिवान बाप का सहारा है तो माया स्वयं ही किनारा कर लेती है। ताकत वाले के आगे निर्बल क्या करेगा? किनारा करेगा ना। ऐसे माया भी किनारा कर लेगी, सामना नहीं करेगी। तो सभी मायाजीत हो? भिन्नभिन्न प्रकार से, नये-नये रूप से माया आती है लेकिन नॉलेजफुल आत्मायें माया से घबराती नहीं। वह माया के सभी रूप को जान लेती हैं। और जानने के बाद किनारा कर लेती। जब मायाजीत बन गये तो कभी कोई हिला नहीं सकता। कितनी भी कोई कोशिश करे लेकिन आप न हिलो।

अमृतवेले से रात तक बस बाप और सेवा इसके सिवाए और कोई लगन न रहे। बाप मिला और सेवाधारी बने। क्योंकि जो मिला है उसको जितना बाँटेंगे उतना बढ़ेगा। एक दो और पद्म पाओ। यही याद रखो - कि हम सर्व भण्डारों के मालिक हैं, भरपूर भण्डारे हैं। जिसको दुनिया ढूँढ रही है उसके बच्चे बने हैं। दुःख की दुनिया से किनारा कर लिया। सुख के संसार में पहुँच गये। तो सदा सुख के सागर में लहराते, सबको सुख के खज़ाने से भरपूर करो। अच्छा –



26-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सत्यता की शक्ति

सत बाप, शिक्षक और सतगुरू अपने सत बच्चों प्रति बोले –

‘‘सर्व शक्तिवान बाप आज विशेष दो सत्ताओं को देख रहे हैं। एक राज्य सत्ता, दूसरी है ईश्वरीय सत्ता। दोनों सत्ताओं का अब संगम पर विशेष पार्ट चल रहा है। राज्य सत्ता हलचल में है। ईश्वरीय सत्ता सदा अचल अविनाशी है। ईश्वरीय सत्ता को सत्यता की शक्ति कहा जाता है क्योंकि देने वाला सत बाप, सत शिक्षक, सतगुरू है। इसलिए सत्यता की शक्ति सदा श्रेष्ठ है। सत्यता की शक्ति द्वारा सतयुग, सचखण्ड स्थापन कर रहे हो। सत अर्थात् अविनाशी। अविनाशी और सच को भी सत कहा जाता है। सच्चा भी है अविनाशी भी है।। तो सत्यता की शक्ति द्वारा अविनाशी वर्सा, अविनाशी पद प्राप्त करने वाली पढ़ाई, अविनाशी वरदान प्राप्त किये हैं? इस प्राप्ति से कोई भी मिटा नहीं सकता। सत्यता की शक्ति से सारी विश्व आप सत्यता की शक्ति वालों का भक्तिमार्ग के आदि से अन्त तक अविनाशी गायन और पूजन करती आती है। अर्थांत् गायन पूजन भी अविनाशी सत हो जाता है। सत अर्थात् सत्य। तो सबसे पहले क्या जाना? अपने आपको सत आत्माजाना। सत बाप के सत्य परिचय को जाना। इस सत्य पहचान से सत्य ज्ञान से सत्यता की शक्ति स्वत: ही सत्य हो जाती। सत्यता की शक्ति द्वारा असत्य रूपी अंधकार, अज्ञान रूपी अंधकार स्वत: ही समाप्त हो जाता है। अज्ञान सदा असत्य होता है। ज्ञान सत है, सत्य है। इसलिए भक्तों ने बाप की महिमा में भी कहा है ‘‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम’’। सत्यता की शक्ति सहज ही प्रकृति जीत, मायाजीत बना देती है। अभी अपने आप से पूछो - सत् बाप के बच्चे हैं तो सत्यता की शक्ति कहाँ तक धारणा की है?

सत्यता के शक्ति की निशानी है - वह सदा निर्भय होगा। जैसे मुरली में सुना है - ‘‘सच तो बिठो नच’’ अर्थात् सत्यता की शक्ति वाला सदा बेफिकर निश्चिन्त होने के कारण, निर्भय होने के कारण खुशी में नाचता रहेगा। जहाँ भय है, चिंता है वहाँ खुशी में नाचना नहीं। अपनी कमज़ोरियों की भी चिंता होती है। अपने संस्कार वा संकल्प कमज़ोर हैं तो सत्य मार्ग होने के कारण मन में अपनी कमज़ोरी का चिंतन चलता जरूर है। कमज़ोरी मन की स्थिति को हलचल में जरूर लाती है। चाहे कितना भी अपने को छिपावे वा आर्टिफीशिअल अल्पकाल के समय प्रमाण, परिस्थिति प्रमाण बाहर से मुस्कराहट भी दिखावे लेकिन सत्यता की शक्ति स्वयं को महसूसता अवश्य कराती है। बाप से और अपने आप से छिप नहीं सकता। दूसरों से छिप सकता है। चाहे अलबेलेपन के कारण अपने आप को भी कभी-कभी महसूस होते हुए भी चला लेवे फिर भी सत्यता की शक्ति मन में उलझन के रूप में, उदासी के रूप में, व्यर्थ संकल्प के रूप में आती जरूर है। क्योंकि सत्यता के आगे असत्य टिक नहीं सकता। जैसे भक्ति मार्ग में चित्र दिखाया है - सागर के बीच साँप के ऊपर नाच रहे हैं। है साँप लेकिन सत्यता की शक्ति से साँप भी नाचने की स्टेज बन जाते हैं। कैसी भी भयानक परिस्थिति हो, माया के विकराल रूप हों, सम्बन्ध सम्पर्क वाले परेशान करने वाले हों, वायुमण्डल कितना भी जहरीला हो लेकिन सत्यता की शक्ति वाला इन सबको खुशी में नाचने की स्टेज बना देता है। तो यह चित्र किसका है? आप सभी का है ना! सभी कृष्ण बनने वाले हैं। इसी में हाथ उठाते हैं ना। राम के चरित्रों में ऐसी बातें नहीं हैं। उसका अभी-अभी वियोग अभी-अभी खुशी है। तो कृष्ण बनने वाली आत्मायें ऐसी स्थिति रूपी स्टेज पर सदा नाचती रहती हैं। कोई प्रकृति वा माया वा व्यक्ति, वैभव उसे हिला नहीं सकता। माया को ही अपनी स्टेज वा शैया बना देगा। यह भी चित्र देखा है ना। साँप को शैया बना दिया अर्थात् विजयी बन गये। तो सत्यता की शक्ति की निशानी सच तो नच यह चित्र है। सत्यता की शक्ति वाले कभी भी डूब नहीं सकते। सत्य की नईया डगमग खेल कर सकती है लेकिन डूब नहीं सकती। डगमगाना भी खेल अनुभव करेंगे। आजकल खेल भी जान बूझ कर उफर नीचे हिलने के बनाते हैं ना। है गिरना लेकिन खेल होने के कारण विजयी अनुभव करते। कितनी भी हलचल होगी लेकिन खेल करने वाला यह समझेगा कि मैंने जीत प्राप्त कर ली। ऐसे सत्यता की शक्ति अर्थात् विजयी के वरदानी अपने को समझते हो? अपना विजयी स्वरूप सदा अनुभव करते हो? अगर अब तक भी कोई हलचल है, भय है तो सत्य के साथ असत्य अभी रहा हुआ है। इसलिए हलचल में ला रहा है। तो चेक करो - संकल्प, दृष्टि, वृत्ति बोल और सम्बन्ध सम्पर्क में सत्यता की शक्ति अचल हैं? अच्छा - आज मिलने वाले बहुत हैं इसलिए इस सत्यता की शक्ति पर, ब्राह्मण जीवन में कैसे विशेषता सम्पन्न चल सकते हैं इसका विस्तार फिर सुनायेंगे। समझा!

डबल विदेशी बच्चों ने क्रिसिमस मनाई कि आज भी क्रिसमस है? ब्राह्मण बच्चों के लिए संगमयुग ही मनाने का युग है। तो रोज नाचो, गाओ, खुशी मनाओ। कल्प के हिसाब से तो संगमयुग थोड़े दिनों के समान है ना। इसलिए संगमयुग का हर दिन बड़ा है। अच्छा –

सभी सत्यता के शक्ति स्वरूप, सत बाप द्वारा सत वरदान वा वर्सा पाने वाले, सदा सत्यता की शक्ति द्वारा विजयी आत्मायें, सदा प्रकृति जीत, मायाजीत, खुशी में नाचने वाले, ऐसे सत बच्चों को सत बाप, शिक्षक और सतगुरू का यादप्यार और नमस्ते।’’

पंजाब में ईश्वरीय सेवाओं की योजनाओं पर आयोजित मीटिंग में जाने हेतु दादी चन्द्रमणी जी बापदादा से छुट्टी ले रही हैं

सभी पंजाब निवासी सो मधुवन निवासी बच्चों को यादप्यार स्वीकार हो। सभी बच्चे सदा ही बेफिकर बादशाह बन रहे हो। क्यों? योगयुक्त बच्चे सदा छत्रछाया के अन्दर रहे हुए हैं। योगी बच्चे पंजाब में नहीं रहते लेकिन बापदादा की छत्रछाया में रहते हैं। चाहे पंजाब में हो चाहे कहाँ भी हो लेकिन छत्रछाया के बीच रहने वाले बच्चे सदा सेफ रहते हैं। अगर हलचल में आये तो कुछ न कुछ चोट लग जाती है। लेकिन अचल रहे तो चोट के स्थान पर होते हुए भी बाल बांका नहीं हो सकता। इसलिए बापदादा का हाथ है, साथ है, तो बेफिकर बादशाह होकर रहो और खूब ऐसे अशान्त वातावरण में शान्ति की किरणें फैलाओ। नाउम्मीद वालों को ईश्वरीय सहारे की उम्मीद दिलाओ। हलचल वालों को अविनाशी सहारे की स्मृति दिलाए अचल बनाओ। यही सेवा पंजाब वालों को विशेष करनी है। पहले भी कहा था कि पंजाब वालों को नाम बाला करने का चांस भी अच्छा है। चारों ओर कोई सहारा नजर नहीं आ रहा है। ऐसे समय पर अनुभव करें कि दिल को आराम देने वाले, दिल को शान्ति का सहारा देने वाले यही श्रेष्ठ आत्मायें हैं। अशान्ति के समय शान्ति का महत्व होता है तो ऐसे टाइम पर यह अनुभव कराना, यही प्रत्यक्षता का एक निमित्त आधार बन जाता है। तो पंजाब वालों को डरना नहीं है लेकिन ऐसे समय पर वह अनुभव करें कि और सभी डराने वाले हैं लेकिन यह सहारा देने वाले हैं ऐसा कोई मीटिंग करके प्लैन बनाओ जो अशान्त आत्मायें हैं उन्हों के संगठन में जाकर शान्ति का अनुभव कराओ। एक दो को भी शान्ति की अनुभूति कराई तो एक दो से लहर फैलती जायेगी और आवाज़ बुलन्द हो जायेगा। मीटिंग कर रहे हैं, बहुत अच्छा, हिम्मत वाले हो, हुल्लास वाले हो और सदा ही हर कार्य में सहयोगी स्नेही साथ रहे हो और सदा रहेंगे। पंजाब का नम्बर पीछे नहीं है, आगे है। पंजाब शेर कहा जाता है, शेर पीछे नहीं रहते, आगे रहते हैं। जो भी प्रोग्राम मिले उसमें हाँ जी, हाँ जी करना तो असम्भव ही सम्भव हो जायेगा। अच्छा –

सभी बच्चों से मिलन के बाद 5.30 बजे प्रात: बापदादा ने सतगुरूवार की यादप्यार दी

चारों ओर के सच्चे-सच्चे सत-बाप, सत-शिक्षक, सतगुरू के अति समीप, स्नेही, सदा साथी बच्चों को सतगुरूवार के दिन बहुत-बहुत यादप्यार स्वीकार हो। आज सतगुरूवार के दिन बापदादा सभी को सदा सफलता स्वरूप रहो, सदा हिम्मत हुल्लास में रहो, सदा बाप की छत्रछाया के अन्दर सेफ रहो, सदा एक बल एक भरोसे में स्थित रह साक्षी हो सब दृश्य देखते हुए हर्षित रहो, ऐसे विशेष स्नेह भरे वरदान दे रहे हैं। इन्हीं वरदानों को सदा स्मृति में रखते हुए समर्थ रहो, सदा याद रहे और सदा याद में रहो। अच्छा - सभी को गुडमार्निंग और सदा हर दिन की बधाई। अच्छा –



31-12-84   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


नए वर्ष पर अव्यक्त बापदादा के महावाक्य

नवयुग परिवर्तक, सदा कल्याणकारी शिव बाबा बोले –

आज चारों ओर के बच्चे साकार रूप में वा आकार रूप में नया युग, नया ज्ञान, नया जीवन देने वाले बापदादा से नया वर्ष मनाने के लिए इस रूहानी हाइएस्ट और होलीएस्ट नई दरबार में उपस्थित हैं। बापदादा के पास सभी बच्चों के दिल के उमंग उत्साह और परिवर्तन करने की प्रतिज्ञाओं का शुभसंकल्प, शुभ भावनायें, शुभ कामनायें पहुँच गई हैं। बापदादा भी सर्व नये विश्व के निर्माताओं को, विश्व परिवर्तक विशेष आत्माओं को सदा पुरानी दुनिया के पुराने संस्कार, पुरानी स्मृतियाँ, पुरानी वृत्तियाँ, पुरानी देह की स्मृति के भान से परे रहने वाले सर्व पुरानी बातों को विदाई देने वालों को सदा के लिए बधाई दे रहे हैं। बीती को बिन्दी लगाए, स्वराज्य की बिन्दी लगाने वालों को स्वराज्य के तिलक की बधाई दे रहे हैं। सभी बच्चों को इस विदाई की बधाई के साथ नये वर्ष की विशेष सौगात –

‘‘सदा साथ रहो’’, ‘‘सदा समान रहो’’, ‘‘सदा दिलतख्तनशीन श्रेष्ठ रूहानी नशे में रहो’’ यही वरदान की सौगात दे रहे हैं।

यह सारा वर्ष यही समर्थ स्मृति रहे - साथ हैं, बाप समान हैं तो स्वत: ही हर संकल्प में विदाई की बधाई के अनुभव करते रहेंगे। पुराने को विदाई नहीं तो नवीनता की बधाई अनुभव नहीं कर सकते हैं। इसलिए जैसे आज पुराने वर्ष को विदाई दे रहे हो वैसे वर्ष के साथ जो सब पुरानी बातें सुनाई उस पुराने-पन को सदा के लिए विदाई दो। नया युग है, नया ब्राह्मणों का सुन्दर संसार है, नया सम्बन्ध है, नया परिवार है। नई प्राप्तियाँ हैं। सब नया ही नया है। देखते हो तो भी रूहानी नजर से रूह को देखते हो। रूहानी बातों को ही सोचते हो। तो सब नया हो गया ना! रीति नई, प्रीति नई सब नया। तो सदा नवीनता की बधाई में रहो। इसको कहा जाता है - रूहानी बधाई। जो एक दिन के लिए नहीं लेकिन सदा रूहानी बधाईयों से वृद्धि को पाते रहते हो। बापदादा और सर्व ब्राह्मण परिवार की बधाईयों वा रूहानी आशीर्वादों से पल रहे हो, चल रहे हो - ऐसे न्यू ईयर विश्व में कोई मना नहीं सकते। वह अल्पकाल का मनाते हैं। आप अविनाशी सदा का मनाते हो। वह मनुष्य आत्मायें मनुष्यों से ही मनाते, आप श्रेष्ठ आत्मायें परमात्मा बाप से मनाते हो। विधाता से वरदाता से मनाते हो। इसलिए मनाना अर्थात् खज़ानों से, वरदानों से सदा के लिए झोली भरना। उन्हों का है मनाना और गँवाना। यह है झोली भरना। इसलिए ही बापदादा से मनाते हो ना। वो लोग हैपी न्यू ईयर कहते, आप एवर हैपी न्यू ईयरकहते। आज खुशी और कल दुख की घटना दुखी नहीं बनाती। कैसी भी दुःख की घटना हो लेकिन ऐसे समय पर भी सुख, शान्ति स्वरूप स्थिति द्वारा सर्व को सुख-शान्ति की किरणें देने वाले मास्टर सुख के सागर बन दाता का पार्ट बजाते हो। इसलिए घटना के प्रभाव से परे हो जाते हो। और एवर हैपी का सदा अनुभव करते हो। तो इस नये वर्ष में नवीनता क्या करेंगें? कांफ्रेंस करेंगे, मेले करेंगे। अभी सब पुरानी रीत रसमों से, पुरानी चाल चलन से थके हुए तो हैं ही। सभी समझते हैं - कुछ नया होना चाहिए। क्या नया हो, कैसे हो, वह समझ नहीं सकते हैं। ऐसी नवीनता की इच्छा रखने वालों को नये ज्ञान द्वारा नई जीवन द्वारा नवीनता की झलक का अनुभव कराओ। यह अच्छा है, इतना भी समझते हैं, लेकिन नया है, यही नया ज्ञान नया युग ला रहा है, यह अनुभव अभी गुप्त है। होना चाहिए, यह कहते हैं। उन्हों की चाहना पूर्ण करने के लिए नई जीवन का प्रत्यक्ष एक्जैम्पुल उन्हों के सामने प्रत्यक्ष रूप में लाओ। जिससे नई झलक उन्हों को अनुभव हो। तो नया ज्ञान प्रत्यक्ष करो। हर एक ब्राहमण की जीवन से नवनीता का अनुभव हो तब नई सृष्टि की झलक उन्हों को दिखाई दे। कोई भी प्रोग्राम करो उसमें लक्ष रखो - सभी को नवीनता का अनुभव हो। यह भी अच्छा कार्य हो रहा, इस रिमार्क देने के बजाए यह अनुभव करें कि यह नया ज्ञान, नया संसार लाने वाला है। समझा। नई सृष्टि की स्थापना के अनुभव कराने की लहर फैलाओ। नई सृष्टि आई कि आई। अर्थात् हम सब की शुभ भावनाओं का फल मिलने का समय आ गया है, ऐसा उमंग-उत्साह उन्हों के मन में उत्पन्न हो। सभी के मन में निराशा के बदले शुभ भावनाओं के दीपक जागाओ। कोई भी बड़ा दिन मनाते हैं तो दीपक भी जगाते हैं। आजकल तो रायल मोमबत्तियाँ हो गई हैं। तो सभी के मन में यह दीपक जगाओ। ऐसा न्यू ईयर मनाओ। श्रेष्ठ भावनाओं के फल की सौगातें सभी को दो। अच्छा –

सदा सर्व को नई जीवन, नये युग की झलक दिखाने वाले, नये उमंग-उत्साह की बधाई देने वाले, सर्व को एवर हैपी बनाने वाले, विश्व को नई रचना का अनुभव कराने वाले, ऐसे सर्व श्रेष्ठ नये युग परिवर्तक, विश्व-कल्याणकारी, सदा बाप के साथ का अनुभव करने वाले, बाप के सदा साथी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों से

1- नये वर्ष का नया उमंग, नया उत्साह सदा के लिए रहना है, ऐसा दृढ़ संकल्प सभी ने किया? नया युग है, इसमें हर संकल्प नये से नया हो। हर कर्म नये से नया हो। इसको कहा जाता है - नया उमंग नया उत्साह। ऐसा दृढ़ संकल्प किया? जैसे अविनाशी बाप है, ऐसे बाप द्वारा प्राप्ति भी अविनाशी है। तो अविनाशी प्राप्ति दृढ़ संकल्प द्वारा प्राप्त कर सकते हो। तो अपने कार्य स्थान पर जाकर इस अविनाशी दृढ़ संकल्प को भूल नहीं जाना। भूलना अर्थात् अप्राप्ति और दृढ़ संकल्प रहना अर्थात् सर्व प्राप्ति।

सदा अपने को पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा समझो। जो कदम याद से उठाते हो उस हर कदम में पद्मों की कमाई भरी हुई है। तो सदा अपने को एक दिन में अनगिनत कमाई करने वाले पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा समझ इसी खुशी में सदा रहो कि वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! तो आपको खुश देखकर औरों को भी प्रेरणा मिलती रहेगी। यही सेवा का सहज साधन है। जो याद और सेवा में सदा मस्त रहते हैं वही सेफ रहते हैं, विजयी रहते हैं। याद और सेवा ऐसी शक्ति है जिससे सदा आगे से आगे बढ़ते रहेंगे। सिर्फ याद और सेवा का बैलेन्स जरूर रखना है। बैलेन्स ही ब्लैसिंग दिलायेगा। हिम्मतवान बच्चों को हिम्मत के कारण सदा ही मदद मिलती है। हिम्मत का एक कदम बच्चे उठाते तो हजार कदम बाप की मदद मिल जाती है।

रात के 12 बजने के बाद 1.1.85 को विदेशी भाई बहिनों ने नये वर्ष की खुशी में गीत गाये तथा बापदादा ने सभी बच्चों को मुबारक दी

जैसे बच्चे बाप के स्नेह से याद में गीत गाते और लवलीन हो जाते हैं, ऐसे बाप भी बच्चों के स्नेह में समाये हुए हैं। बाप माशूक भी है तो आशिक भी है। हर एक बच्चे की विशेषता के ऊपर बाप भी आशिक होते हैं। तो अपनी विशेषता को जानते हो? बाप आपके ऊपर किस विशेषता से आशिक हुआ, यह अपनी विशेषता हरेक जानते हो?

सारे विश्व में से कितने थोड़े ऐसे बाप के स्नेही बच्चे हैं। तो बापदादा सभी स्नेही बच्चों को न्यू ईयर की बहुत-बहुत दिल व जान, सिक व प्रेम से पद्मगुणा बधाई दे रहे हैं। आप लोगों ने जैसे गीत गाये तो बापदादा भी बच्चों की खुशी के गीत गाते हैं। बाप के गीत मन के हैं और आपके मुख के हैं। आपका तो सुन लिया, बाप का भी सुना ना?

इस नये वर्ष में सदा हर कर्म में कोई न कोई विशेषता जरूर दिखाते रहना। हर संकल्प विशेष हो, साधारण नहीं हो? क्यों? विशेष आत्माओं का हर संकल्प, बोल और कर्म विशेष ही होता है। सदा उमंग-उत्साह में आगे बढ़ते रहो। उमंग-उत्साह यह विशेष पंख हैं, इन पंखों द्वारा जितना ऊँचा उड़ना चाहो उतना उड़ सकते हो। यही पंख उड़ती कला का अनुभव कराते हैं। इन पंखों से उड़ जाओ तो विघ्न वहाँ पहुँच नहीं सकते हैं। जैसे स्पेस में जाते हैं तो धरती की आकर्षण खींच नहीं सकती। ऐसे उड़ती कला वाले को विघ्न कुछ भी कर नहीं सकते। सदा उमंग-उत्साह से आगे बढ़ना और बढ़ाना यही विशेष सेवा है। सेवाधारियों को इसी विशेषता से सदा आगे बढ़ते जाना है। अच्छा - ओमशान्ति।