07-11-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘बापदादा की विशेष पसन्दगी और ज्ञान का फाउण्डेशन - पवित्रता’’

आज प्यार के सागर बापदादा अपने प्यार के स्वरूप बच्चों से मिलने आये हैं। सभी बच्चों के अन्दर बाप का प्यार समाया हुआ है। प्यार सभी बच्चों को दूर से समीप ले आता है। भक्त आत्मा थे तो बाप से कितना दूर थे। इसलिए चारों ओर ढूंढते रहते थे और अभी इतना समीप हो जो हर एक बच्चा निश्चय और फ़लक से कहते हैं कि मेरा बाबा मेरे साथ है। साथ है या ढूँढना पड़ता है - इस तरफ है, उस तरफ है? तो कितना समीप हो गया! कोई भी पूछे परमात्मा कहाँ है? तो क्या कहेंगे? मेरे साथ है। फ़लक से कहेंगे कि अब तो बाप भी मेरे बिना रह नहीं सकता। तो इतने समीप, साथी बन गये हो। आप भी एक सेकण्ड भी बाप के बिना नहीं रह सकते हो। लेकिन जब माया आती है तब कौन साथ होता है? उस समय बाप अगर साथ है तो माया आ सकती है? लेकिन न चाहते भी बीच-बीच में बच्चे बाप से आंख मिचौली का खेल कर देते हैं। बापदादा बच्चों का यह खेल भी देखते रहते हैं कि बच्चे एक तरफ कह रहे हैं मेरा बाबा, मेरा बाबा और दूसरे तरफ किनारा भी कर लेते हैं। अगर अभी यहाँ ऐसे किनारा करेंगे तो आपको देख नहीं सकेंगे ना। तो आप भी माया की तरफ़ ऐसे कर लेते हो। बाप को देखने की दृष्टि बन्द हो जाती है और माया को देखने की दृष्टि खुल जाती है। तो आंख मिचौली खेल कभी-कभी खेलते हो? बाप फिर भी बच्चों के ऊपर रहमदिल बन माया से किसी भी ढंग से किनारा करा लेता है। वो बेहोश करती और बाप होश में लाता है कि तुम मेरे हो। बन्द आंख याद के जादू से खोल देते हैं।

बापदादा पूछते हैं कि सभी का प्यार कितने परसेन्ट में है? तो सभी कहते हैं - 100 परसेन्ट से भी ज्यादा है। पद्मगुणा प्यार है। ऐसा कहते हो ना? अच्छा जिसका पद्मगुणा से कम है, करोड़ है, लाख है, हज़ार है, सौ है, वो हाथ उठाओ। (कोई ने नहीं उठाया) अच्छा, सभी पक्के हैं! बापदादा फिर दूसरा क्वेश्चन करेंगे, फिर नहीं बदलना। अच्छा, ये तो बहुत खुशखबरी सुनाई कि पद्मगुणा प्यार है।

अभी बाप पूछते हैं कि प्यार का सबूत क्या होता है? (समान बनना) तो समान बने हो? (नहीं) फिर पद्मगुणा से तो कम हो गया। आप सभी कहेंगे कि अभी सम्पूर्ण बनने में थोड़ा-सा टाइम पड़ा है इसलिए हो जायेंगे - ऐसे? लेकिन अगर प्यार वाला कहता है कि तुम प्यार के पीछे जान कुर्बान कर लो तो वो जान देने के लिए भी तैयार होते हैं। बापदादा जान तो लेते नहीं हैं क्योंकि जान से तो सेवा करनी है। लेकिन एक बात पर बापदादा को थोड़े समय के लिए आश्चर्य करना पड़ता है। आश्चर्य करना नहीं चाहिए, वो तो आपको भी कहते हैं, लेकिन बापदादा को आश्चर्य करना पड़ता है, पार्ट बजाते हैं। जान कुर्बान छोड़ो लेकिन प्यार की निशानी है न्योछावर होना, जो कहे वो करना। तो बाप सिर्फ एक बात में न्योछावर होना देखना चाहते हैं। बातें अनेक हैं, लेकिन बाप अनेक को नहीं लेते सिर्फ एक बात में न्योछावर होना है। उसके लिए हाथ उठा लेते हैं, प्रतिज्ञा भी कर लेते हैं लेकिन प्रतिज्ञा करने के बाद भी करते रहते हैं वो क्या? हर एक स्वयं समझते हैं कि मेरा बार-बार बाप से किनारा होने का मूल संस्कार या मूल कमज़ोरी क्या है। हर एक अपनी मूल कमज़ोरी को जानते हो ना? तो वो कमज़ोरी जानते हुए भी न्योछावर क्यों नहीं करते हो? 63 जन्म की साथी है इसीलिए उससे प्यार है?

प्यार का अर्थ ही है जो प्यार वाला पसन्द करे वो करना। अगर मानो प्यार करने वाला एक बात कहता है और वो दूसरा कुछ करते हैं तो क्या हो जाता है? प्यार होता है या झगड़ा होता है? उस समय प्यार कहेंगे कि अच्छी तरह से लाठी उठाकर एक-दो को लगायेंगे? तो बाप को क्या पसन्द है? बापदादा कहते हैं कि समान बनने में तो कई बातें हैं। ब्रह्मा बाप की विशेषताएं देखो और ब्रह्मा बाप समान ही बनना है तो कितनी बड़ी लिस्ट है! उसके लिए भी बापदादा कहते हैं चलो कोई बात नहीं। एक-दो बात कम है तो भी हर्जा नहीं। लेकिन जो मूल फाउण्डेशन है, जो ब्रह्मा बाप वा ज्ञान का आधार है वो क्या है? ब्रह्मा बाबा शिव बाप की विशेष पसन्दगी क्या है? (पवित्रता, अन्तर्मुखता, निश्चयबुद्धि, सच्चाई-सफाई)। वास्तव में फाउण्डेशन है - पवित्रता। लेकिन पवित्रता की परिभाषा बहुत गुह्य है। पवित्रता जहाँ होगी वहाँ निश्चय, सच्चाई-सफ़ाई, ये सब आ जाता है। लेकिन बापदादा देखते हैं कि पवित्रता की गुह्य भाषा, पवित्रता का गुह्य रहस्य अभी बुद्धि में पूरा स्पष्ट नहीं है। व्यर्थ संकल्प चलना या चलाना, अपने अन्दर भी चलता है और दूसरों को भी चलाने के निमित्त बनते हैं। तो व्यर्थ संकल्प - क्या ये पवित्रता है? तो फिर संकल्प की पवित्रता का रहस्य सभी को प्रैक्टिकल में लाना चाहिए ना। वैसे देखा जाये तो पांचों ही विकार, चाहे काम हो, चाहे मोह हो, सबसे नम्बरवन है काम और लास्ट में है मोह। लेकिन कोई भी विकार जब आता है तो पहले संकल्प में आता है। व्यर्थ संकल्प क्रोध भी पैदा करता है तो काम अर्थात् व्यर्थ दृष्टि, किसी आत्मा के प्रति अगर व्यर्थ दृष्टि भी जाती है तो उस समय पवित्रता नहीं मानी जायेगी। तो यह व्यर्थ संकल्प बाप के प्यार के पीछे न्योछावर क्यों नहीं करते? कर सकते हो? (हाँ जी) हाँ जी कहना बहुत सहज है। लेकिन बापदादा के पास तो सबका चार्ट रहता है ना। अभी तक पांच ही विकारों के व्यर्थ संकल्प मैजारिटी के चलते हैं। फिर चाहे कोई भी विकार हो। ये क्यों, ये क्या, ऐसा होना नहीं चाहिए, ऐसा होना चाहिए....... या कॉमन बात बापदादा सुनाते हैं कि ज्ञानी आत्माओं में या तो अपने गुण का, अपनी विशेषता का अभिमान आता है या तो जितना आगे बढ़ते हैं उतना अपनी किसी भी बात में कमी को देख करके, कमी अपने पुरूषार्थ की नहीं लेकिन नाम में, मान में, शान में, पूछने में, आगे आने में, सेन्टर इन्चार्ज बनाने में, सेवा में, विशेष पार्ट देने में - ये कमी, ये व्यर्थ संकल्प भी विशेष ज्ञानी आत्माओं के लिए बहुत नुकसान करता है। और आजकल ये दो ही विशेष व्यर्थ संकल्प का आधार है। तो आप जब सेवा पर जाओ तो एक दिन की दिनचर्या नोट करना और चेक करना कि एक दिन में इन दोनों में से चाहे अभिमान या दूसरे शब्दों में कहो अपमान - मेरे को कम क्यों, मेरा भी ये पद होना चाहिए, मेरे को भी आगे करना चाहिए, तो ये अपमान समझते हो ना। तो ये दो बातें अभिमान और अपमान - यही दो आजकल व्यर्थ संकल्पो का कारण है। इन दोनों को अगर न्योछावर कर दिया तो बाप समान बनना कोई मुश्किल नहीं है। तो क्या न्योछावर करने की शक्ति है? अच्छा, कितने समय में? अभी आज नवम्बर है ना, नया साल आयेगा तो दो मास हो जायेगा ना! नये साल में वैसे भी नया खाता रखा जाता है, तो हर एक चाहे टीचर, चाहे विद्यार्था हैं, चाहे महारथी हैं, चाहे प्यादा हैं। ऐसे नहीं कि ये तो महारथियों के लिए है, हम तो हैं ही छोटे! राज्य-भाग्य लेने के टाइम तो कोई नहीं कहेगा कि मैं छोटा हूँ, उस समय तो कहेंगे कि सेकण्ड नारायण मुझे ही बना दो। तो हर एक को सिर्फ दो शब्द अपना समाचार देना है और उस पोस्ट के ऊपर विशेष ये लिखना- ‘‘अवस्था का पोतामेल’’। तो वो पोस्ट अलग हो जायेगी। और अन्दर लिखना कि व्यर्थ संकल्प किस परसेन्टेज में न्योछावर हुए? 50 परसेन्ट या 100 परसेन्ट न्योछावर हुए? बस एक लाइन लिखना, लम्बा-चौड़ा नहीं लिखना। जो लम्बा-चौड़ा लिखेंगे उसको पहले ही फाड़ देंगे। तो तैयार हो? ज़ोर से बोलो - हाँ जी या ना जी? जो समझते हैं कि इसमें हिम्मत चाहिए, टाइम भी चाहिए, तो अभी से हाथ उठा लो तो आपको पहले से ही छुट्टी है। कोई है या पीछे लिखेंगे - पुरूषार्थ तो बहुत किया लेकिन हुआ नहीं। ऐसे तो नहीं लिखेंगे? पक्के हैं? अच्छा।

बापदादा ने देखा कि प्यार मधुबन तक तो ले आता है। लेकिन इसी प्यार से पहुँचना कहाँ है? बाप समान बनना है ना! तो जैसे मधुबन में भागते-भागते आते हो ना, मेरा नाम ज़रुर लिखो, मेरा नाम ज़रुर लिखो। और नहीं लिखते तो टीचर को थोड़ी आंख भी दिखा देते हो। तो जैसे मधुबन के लिए प्यार में भागते हो, आते हो ऐसे ही पुरूषार्थ करो कि मेरा नाम बाप समान बनने में पहले हो। तो ये पवित्रता का फाउण्डेशन पक्का करो। ब्रह्मा बाप ने पवित्रता के कारण, एक नवीनता के कारण गालियाँ भी खाईं। तो पवित्रता फाउण्डेशन है और फाउण्डेशन का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ये तो एक कॉमन बात है लेकिन अभी आगे बढ़े हो तो बचपन की स्टेज नहीं है, अभी तो वानप्रस्थ स्थिति में जाना है। मैं ब्रह्मचारी तो रहता हूँ, पवित्रता तो है ही, सिर्फ इसमें खुश नहीं हो जाओ। वैसे तो अभी दृष्टि-वृत्ति में पवित्रता को और भी अण्डरलाइन करो लेकिन मूल फाउण्डेशन है अपने संकल्प को शुद्ध बनाओ, ज्ञान स्वरूप बनाओ, शक्ति स्वरूप बनाओ। संकल्प में कमज़ोरी बहुत है। क्या करें, कर नहीं सकते हैं, पता नहीं क्या हो गया..... क्या ये पवित्रता की शक्ति है? पवित्र आत्मा कहेगी - क्या करें, हो गया, हो जाता है, चाहते तो नहीं हैं लेकिन.....? ये कौन-सी आत्मा है? पवित्र आत्मा बोलती है कि कमज़ोर आत्मा बोलती है? त्रिकालदर्शी आत्मायें हो। जब क्यों, क्या कहते हो, तो बापदादा कहते हैं इन्हों को जिज्ञासु के आगे ले जाओ, उनको चित्र समझाते हैं कि 84 जन्मों को हम जानते हैं। समझाते हो 84 जन्म और करते हो अभी क्या और क्यों? जब जानते हो तो जानने वाला क्या, क्यों करेगा? वो जानता है कि ये इसलिए होता है। क्या का जवाब स्वयं ही बुद्धि में आयेगा कि माया के प्रभाव के परवश है। चाहे महारथी हो, चाहे प्यादा हो। अगर महारथी से भी ग़लती होती है तो उस समय वो महारथी नहीं है, परवश है। तो परवश वाला कहाँ भी लहर में लहरा जाता है लेकिन आप उस रूप में देखते हो कि ये महारथी होकर कर रहा है! उस समय महारथी नहीं, परवश है। समझा, नये साल में क्या करना है? व्यर्थ के समाप्ति का नया खाता। ठीक है? पक्का? कि कोई न कोई कारण बतायेंगे। अगर कारण होगा तो कोई नया प्लैन बतायेंगे। अभी नहीं बतायेंगे। अभी बतायेंगे तो आप कोई रीज़न निकाल लेंगे। कारण नहीं निवारण। समस्या स्वरूप नहीं, समाधान स्वरूप।

अभी प्रकृति भी थक गई है। प्रकृति की भी ताकत सारी खत्म हो गई है। तो प्रकृति भी आप प्रकृतिपति आत्माओं को अर्जा कर रही है कि अभी जल्दी करो। अभी देरी नहीं करो। अच्छा!

बापदादा को भी तन को चलाना पड़ता है। चले, नहीं चले, लेकिन चलाना तो पड़ता है। क्योंकि बाप का बच्चों से प्यार है। तो इतने प्यार वाली आत्मायें आवें और बाप रूहरिहान नहीं करे तो कैसे होगा! तो जबरदस्ती भी चलाना ही पड़ता है। अच्छा, सभी खुश हैं? बाप मिला - सन्तुष्ट हैं ना?

इस्टर्न

कितना अन्दाज़ आये हैं? (550) तो साढ़े पांच सौ आये हो ना तो साढ़े को निकाल देना बाकी रहा पांच, तो पांचों पर विजय पहला नम्बर इस्टर्न ज़ोन होना चाहिए। (सभी ने तालियां बजाई) लिखने के टाइम भी ताली बजाना। नम्बरवन। वैसे तो इस्टर्न ब्रह्मा बाबा का प्रवेशता का भी पहला नम्बर है। तो बाप समान बनने में, बाप के प्यार के पीछे न्योछावर करने में भी इस्टर्न को पहला नम्बर लेना है। सभी टीचर्स हाँ कर रही हैं तो स्टूडेण्ट को भी करना पड़ेगा। इस्टर्न की टीचर्स उठो। सभी टीचर्स वायदा करते हो कि समझते हो कि पता नहीं क्या होगा! देखना टी.वी. में आ रहा है। इस्टर्न तो नम्बरवन होना ही है।

बम्बई, महाराष्ट्र

बाम्बे क्या करेगा? महाराष्ट्र क्या करेगा? सोलापुर भी है, जलगांव भी है। कोई भी पुर हो लेकिन बापदादा कहते हैं कि सोलापुर नहीं, सोला सम्पूर्ण। कोल्हापुर है, सोलापुर है, कई पुर हैं तो उन्हों को तो याद आना चाहिए कि हम पूर तो हैं सिर्फ सम्पूर्ण आगे एड करना। ठीक है सोलापुर। सोलापुर वाली टीचर्स हाथ उठाओ। अभी क्या होगा? सोलापुर या सोला सम्पूर्ण? हिम्मत है कि कहेंगे कि हम तो छोटी टीचर्स हैं। छोटी सुभान अल्लाह। समझा? अच्छा जलगांव और उदगीर। तो जलगांव क्या करेगा? अपने व्यर्थ विकल्पों को जल में खत्म कर देगा। एकदम खत्म। जल में हो गया खत्म। तो क्या करेंगे? विकल्पों को जलमय करना। कोई विकल्प रहे नहीं। जैसे कहाँ-कहाँ जलमय होता है ना तो एक भी निशानी नहीं रहती। ऐसे आप समाप्त कर लेना। ठीक है? अच्छा, बाम्बे वाले क्या करेंगे? आजकल बहुत बड़े-बड़े बॉम्ब निकाले हैं। दीपावली में देखा होगा ना, इतने बॉम्ब इकट्ठे जलाते हैं जो लाइन की लाइन खत्म। तो बाम्बे वाले अनेक विकल्पों की लाइन को एक तीली लगाना और सारे के सारे खत्म हो जायें। बॉम्बे वाली टीचर्स उठो। अच्छा! तीली तो है ना? अच्छी पॉवरफुल तीली है? कि तीली लगी फिर बुझ जायेगा। दृढ़ संकल्प की तीली से फटाफट। एक के पीछे एक, एक के पीछे एक खत्म। सभी खुश हो जायेंगे। अच्छा।

तामिलनाडु

तामिलनाडु क्या करेगा? तामिलनाडु में डांस बहुत अच्छी करते हैं। कोई भी दादियाँ जाती हैं तो अच्छी-अच्छी डांस दिखाते हैं। जैसे शास्त्रों में शंकर के लिए दिखाते हैं, नृत्य करते-करते सारा विनाश कर दिया। तो डांस करते-करते क्या करेंगे? भिन्न-भिन्न प्रकार से सभी विघ्नों का विनाश। जैसे डांस वे भिन्न-भिन्न पोज़ रखते हो ना ऐसे एक-एक विकल्प को अच्छी तरह से, ऐसे खत्म करना जो नाम-निशान भी नहीं रहे। ठीक है? तामिलनाडु, तामिलनाडु की टीचर्स उठो। अच्छा। तामिलनाडु की टीचर्स बहुत आई हैं। टीचर्स को भी मिलने का चांस मिलता है। बापदादा को टीचर्स वैसे बहुत प्यारी लगती हैं। इसमें तो ताली बजा दी लेकिन वैसे के पीछे ऐसे भी है। वैसे तो टीचर्स को बापदादा एकदम समान दृष्टि से देखते हैं कि ये बाप समान हैं, निमित्त हैं लेकिन जब ऐसी-वैसी उल्टी डांस कर देती हैं, जो मन को नहीं भाती है, कभीकभी ऐसी डांस करते हैं तो सब कहते हैं बन्द करो, बन्द करो। तो जब टीचर्स ऐसा कुछ करती हैं तो बापदादा की, खास ब्रह्मा बाबा की आंखे नीचे हो जाती हैं। इतना टीचर्स को अटेन्शन रखना चाहिए। टाइटल तो टीचर्स को बहुत अच्छा है, बैज भी बहुत जल्दी पहन लेते हो। लेकिन टीचर का अर्थ ही है बाप समान। विशेष ब्रह्मा बाबा टीचर्स को दिल से प्यार करते हैं लेकिन कभी-कभी दृष्टि नीचे भी करनी पड़ती है। तो ऐसे नहीं करना। बाकी अच्छा है, तामिलनाडु ने विस्तार अच्छा किया है और एक विशेषता ये भी है कि हैण्ड्स भी अपने निकालते जाते और सेवा भी बढ़ाते जाते। तो ये भी अच्छी बात है। हैण्ड्स तैयार भी करना और सेवा भी बढ़ाना - दोनों ही करना।

आन्ध्र प्रदेश

आन्ध्र प्रदेश में एक विशेषता ब्राह्मण परिवार की है जो वहाँ से एक लाडला बच्चा निकला राजु, तो उस एक ने एक एग्ज़ाम्पल बन अनेक वी.आई.पी., आई.पी. की सर्विस कर सैम्पल बनाया। सेवा बहुत होती है लेकिन इसने हिम्मत रख करके एक एग्ज़ाम्पल स्थापन किया और वैसे भी आन्ध्र में वी.आई.पी., आई.पी. ज्यादा ही हैं। चाहे वो किसी भी देश में चले जाते हैं लेकिन आन्ध्र के आई.पी., वी.आई.पी. चारों ओर बहुत होते हैं। तो आन्ध्र ने जैसे एक एग्ज़ाम्पल तैयार किया, ऐसे ये विकल्प विनाश का एग्ज़ाम्पल भी आन्ध्र को दिखाना है। तैयार हैं? आन्ध्रा वाली टीचर्स उठो। अच्छा, टीचर्स तो बहुत हैं। अभी ये भी एग्ज़ाम्पल दिखायेंगे। देखो कितना अच्छा रत्न निकला और एडवांस पार्टी में भी अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। तो करेंगे ना! खिटखिट नहीं होनी चाहिए। खिटखिट खत्म। विजय का झण्डा हर सेवाकेन्द्र पर लहराये। ये नहीं बापदादा सुने कि फलाने सेन्टर पर खिटखिट है इसलिए फलानी दादी को भेजो। ये नहीं होना चाहिए। ऐसे थोड़ा-थोड़ा बीचबी च में खेल करते है। अभी खत्म। पहले टीचर्स खत्म करेंगी तभी वायब्रेशन्स फैलेगा। ये सूक्ष्म वायब्रेशन्स है। आप समझेंगे एक ने किया ना, सभी को क्या पता? लेकिन वायब्रेशन ऐसी चीज़ है जो न पता होते भी...। मैंने सिर्फ किया, नहीं। मैंने सभी बाबा के सेवाकेन्द्रों का वायब्रेशन खराब किया। इतनी ज़िम्मेवारी हर एक टीचर के ऊपर है। बैज पहनना तो बहुत अच्छा है। अच्छा भी लगता है। सभी एक जैसा बैज पहन कर बैठती हैं तो अच्छा लगता है लेकिन बैज की लाज रखना। अच्छा!

कर्नाटक

बैंगलोर आया है। बैंगलोर की विशेषता है कि जगदम्बा सरस्वती माँ ने बैंगलोर में बहुत-बहुत सेवा कर बीज डाला है। बाम्बे और बैंगलोर में किया है। तो बाम्बे को और बैंगलोर को जगदम्बा माँ के बीज का सदा फल देना है। और देखा जाये तो बैंगलोर के जो विशेष सेवाधारी हैं वो हैं भी जगदम्बा के पालना के फल। तो बैंगलोर वालों को, जैसे जगदम्बा सम्पूर्ण बन भिन्न नाम-रूप में सेवा के निमित्त है, ऐसे जगदम्बा का नाम बाला करना है। वैसे बैंगलोर का वायुमण्डल दुनिया के हिसाब से भी औरों से कुछ अच्छा है। सेवा भी है बहुत। अभी सेवा को निरव्यर्थ संकल्प बनाना-ये बैंगलोर का काम है। समझा? बैंगलोर की टीचर्स उठो। अच्छा है, निर्विघ्न बनाना है ना? कि थोड़ी-थोड़ी खिटखिट अच्छी लगती है? तो नम्बरवन जगदम्बा की पालना का फल बैंगलोर को अवश्य देना है। समझा?

राजस्थान

राजस्थान क्या करेगा? राजस्थान की एक सेवा बहुत काल से बापदादा ने कही है लेकिन हुई नहीं। राजस्थान की मिनिस्ट्री को बहुत समीप लाना चाहिए। चाहे मिनिस्टर हो, चाहे सेक्रेटरी, लेकिन एक बार राजस्थान को कमाल करके दिखानी चाहिए। चाहे किसकी भी मदद लो। सभी मदद देंगे। लेकिन  राजस्थान की गवर्नमेंट के विशेष ऑफिसर्स का एक कम से कम 20-25 का ग्रुप लाना चाहिए। क्योंकि राजस्थान का प्रभाव सारे इण्डिया पर पड़ता है। जैसे दिल्ली की सेवा वर्ल्ड में नाम बाला करती है। चाहे जिज्ञासु बने, नहीं बने, लेकिन राजस्थान के इतने लोग यहाँ इकट्ठे होकर आये, तो यहाँ के जो छोटे-मोटे ऑफिसर्स हैं उनका भी कुछ दिमाग खुले। अभी मॉरीशियस का आ गया, और राजस्थान? तो राजस्थान को यह सेवा किसी भी रीति से करनी चाहिए। चाहे किसी से भी मदद लो, ग्रुप बनाओ। जहाँ से कहेंगे वहाँ से मदद मिलेगी। लेकिन एक बारी आबू वालों की आँख खुलनी चाहिए और वो ही ऑफिसर्स यहाँ भाषण करें, अनुभव सुनायें तो आबू वाले देखो पीछे-पीछे.....। नहीं तो एक तरफ सेवा होती और दूसरे तरफ आबू वाले मज़ाक करते रहते हैं। तो राजस्थान को बापदादा की ये एक आशा पूर्ण करनी है। मुश्किल है क्या? फिर यहाँ लड्डु बांटेंगे। जो भी होंगे ना उनके मुख में लड्डु पड़ेगा। चाहे उदयपुर हो, चाहे जोधपुर, .. जहाँ कार्य बढ़ता है वहाँ के लोग बहुत सहयोगी होने चाहिए। अभी देखो दिल्ली के ऑफिसर राजस्थान के ऑफिसर को हिम्मत देकर ठीक कर रहे हैं और वहाँ के बिल्कुल हिलते नहीं हैं। तो करो कमाल। आबू वाले भी प्लैन बनाओ। बापदादा समझते हैं कि जब तक आबू वाले  अच्छा नहीं कहते, चाहे अखबार में, चाहे मुख से नहीं बोलते तब तक सेवा की रिज़ल्ट पर्दे के अन्दर है। प्रत्यक्ष नहीं होती। तो राजस्थान के बड़े लोग छोटों को भी ठीक कर देंगे। परमात्म कार्य और इतने छोटे ऑफिसर परमात्म कार्य के बीच में विघ्न रूप बनें तो ये हैं तो चींटी ना। तो अभी कुछ हिलें। कमाल करके दिखाओ। प्लैन बनाओ। एक बार इन तीन-चार मुख्य स्थानों की सेवा लगकर करनी चाहिए। ऐसे नहीं, जब काम पड़ा तो काम के टाइम भागते हैं और काम पूरा हुआ तो खत्म। वैसे तो राजस्थान के ब्राह्मणों को बहुत नशा है ना कि राजस्थान में ही मुख्य केन्द्र है। ये राजस्थान का लक है लेकिन अभी इसी नशे से यह करके दिखाना। चारों ओर फैल जाये कि राजस्थान का सम्मेलन है। राजस्थान का योग शिविर है। फिर देखो आपके ये व्यापारी वगैरह सब आपेही कहेंगे हम भी बैठें। अच्छा, तो राजस्थान यह कमाल करेगा। क्यों, हेड क्वार्टर की ज़िम्मेवारी राजस्थान पर है। बहुत बड़ा ताज पड़ा है। अच्छा! पाण्डव भी  कुछ हिम्मत करेंगे ना, हिम्मत करके दिखाओ। अच्छा। राजस्थान की टीचर्स सामने बैठी हैं, ये तो बहुत टीचर्स हैं। ये एक-एक टीचर एक-एक आई.पीज़. को ला सकती हैं। एक-एक को तो लाओ तो भी 20-25 का ग्रुप बन जायेगा। बहुत अच्छी-अच्छी टीचर्स हैं। अच्छा।

आगरा

आगरा वाले क्या कर रहे हैं? आगरा वालों ने भी कोई नई कमाल करके दिखाई नहीं है। होनी तो है ना! सारे विश्व में बाप का नाम बाला तो होना ही है। लेकिन जो निमित्त बनता है उसको एक्स्ट्रा मार्क मिल जाती हैं। उसका पद, जितनी सेवा की उस अनुसार एड होकर मार्कस जमा होती जाती हैं। समझो साधारण है लेकिन सेवा निर्विघ्न है, तो सेवा की मार्क्स एडीशन होने से साधारण राजा से आगे नम्बर में आ जाते हैं। और आगे-आगे जाते आखिर विश्व महाराजा के रॉयल फैमिली में आ जाते हैं। तो ये करना है ना! आगरा भी कमाल करेगा। बापदादा को तो सदा ही सभी बच्चों में आशायें रहती हैं और वो भी आशाओं के दीपक जगे हुए। हर एक बच्चा जगे हुए आशाओं के दीपक हैं। तो कमाल करके दिखाना। देखेंगे, ये कितने समय में कमाल करते हैं। ठीक है ना? अच्छा।

डबल विदेशी

डबल विदेशी क्या करेंगे? डबल कमाल करेंगे। डबल विदेशियों की ये विशेषता अच्छी है कि सेवा के बिना उन्हों को चैन नहीं आता, मज़ा नहीं आता। उनको सेवा बहुत चाहिए। और उमंग-उत्साह से चाहे टाइम कम मिलता है, थक भी जाते हैं, स्थूल काम करते हैं, लेकिन फिर भी सेवा के लिए एवररेडी रहते हैं, सेवा के लिए बुलावा हो तो बैठेंगे या भागेंगे? भागेंगे। तो सेवा का उमंग-उत्साह यही आप डबल विदेशी आत्माओं की सेफ्टी का साधन है। सेवा में लगे हुए हो तो माया से भी बचे हुए हो। माया भी देखती है कि इन्हों को फुरसत नहीं है इसलिए वो भी वापस चली जाती है। और दूसरी बात अपने पुरूषार्थ में सच्चाई से अपनी चेकिंग अच्छी करते हैं, वो सच्चाई बापदादा के पास पहुँचती है। और सच्चाई बापदादा को प्रिय है। इसलिए सच्चाई के फलस्वरूप बापदादा द्वारा विशेष मदद भी मिलती है। चाहे कोई कमज़ोरी आ भी जाती है लेकिन बाप और सेवा से प्यार होने के कारण वो भी एक्स्ट्रा हिम्मत की मदद दिलाते हैं। समझा? अच्छा! सभी तरफ के हैं। मौरिशियस ने तो कमाल की। क्योंकि कोई भी विदेशी वी.आई.पी. या आई.पी. इण्डिया में आकर अपने देश से यहाँ का प्रोग्राम सेट करे और कराये-ये एक एक्जैम्पुल मॉरिशियस ने दिखाया। दरवाजा खोल दिया, वी.आई.पी., आई.पी. का। तो मॉरिशियस वालों को मुबारक। कहते हैं, बड़े तो बड़े छोटे शुभान अल्लाह। तो मॉरिशियस ने शुभान अल्लाह करके दिखाया। बहुत अच्छा, मुबारक। अच्छा!

मधुबन, ज्ञान सरोवर, हॉस्पिटल, तलहटी

हर एक अपना नाम समझे। बापदादा अभी मधुबन में तो आते ही रहेंगे। तो हर एक चाहे मधुबन हो, चाहे डबल मधुबन, चाहे उपसेवाकेन्द्र हैं, चाहे गीता पाठशालायें हैं, सभी को बापदादा की याद-प्यार मिल रही है और मिलती रहेगी।

नेपाल

(नेपाल का नाम भूल गये) तो नेपाल भूलने का अर्थ है कि आप गुप्त  महारथी हो। छिपे हुए रूस्तम हो। नेपाल तो बापदादा को सदा प्यारा है। क्योंकि  नेपाल में गवर्नमेंट की सेवा सहज और अच्छी है भी और होती भी रहेगी। आखिर नेपाल का राजा भी आना ही है। अच्छा, सेवा अच्छी है। हिम्मत वाली टीचर्स हैं। इसने (राज बहन ने) नया जन्म लेकर सेवा का सबूत दिया। शीला को भी खास याद देना। अच्छा।

चारों ओर के पद्मगुणा प्रेम स्वरूप आत्माओं को, सदा स्वयं को निर्विकल्प बनाने वाले विशेष आत्माओं को, सदा बाप और निर्विघ्न सेवा वे लगन में मग्न रहने वाली आत्माओं को, सदा बाप के स्नेह में न्योछावर होने वाले सभी आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

अच्छा! सब खुश! कोई नाराज़ तो नहीं हुआ - मैं नहीं मिला? राज़ को जानने वाले कभी नाराज़ नहीं होते।

दादियों से

देखो आप आदि रत्नों में सभी का प्यार के साथ-साथ शुद्ध मोह बढ़ता जाता है। सभी देखते हैं कि आदि रत्न ठीक हैं तो सब ठीक हैं। तो आप लोगों में सबका शुद्ध मोह बढ़ गया है। बापदादा इन दोनों (चन्द्रमणी दादी, रतनमोहनी दादी) के ऊपर भी खुश हैं। ज्ञान सरोवर की जिम्मेवारी सभांली है। जिम्मेवारी तो क्या, खेल है। भारीपन है क्या? खेल हल्का होता है ना? तो जिम्मेवारी क्या है? खेल है। तो बापदादा खुश है कि समय पर सहयोगी बने हैं और आदि से सहयोगी रहे हैं। आदि से हाँ जी करने वाले हैं - यही साकार बाप का आप सबको विशेष वरदान है। ब्रह्मा बाबा को नाशब्द कभी अच्छा नहीं लगता। ये तो मालूम है, अनुभवी हैं।

(ईशू बहन से) इसने आदि से अब तक बहुत अच्छा पार्ट बजाया है। और आपकी (दादी की) तो विशेष सहयोगी है। कोई भी बात में सुनने-सुनाने वाली बहुत अच्छी है क्योंकि गम्भीर रहती है। ये गम्भीरता का गुण बहुत आगे बढ़ाता है। कोई भी बात बोल दी ना, समझो अच्छा किया और बोल दिया तो आधा खत्म हो जाता है, आधा फल खत्म हो गया, आधा जमा हो गया। और जो गम्भीर होता है उसका फुल जमा होता है। कहते हैं ना-देखो जगदम्बा गम्भीर रही, चाहे सेवा स्थूल में आप लोगों से कम की, आप लोग ज्यादा कर रहे हो लेकिन ये गम्भीरता के गुण ने फुल खाता जमा किया है। कट नहीं हुआ है। कई करते बहुत हैं लेकिन आधा, पौना कट हो जाता है। करते हैं, कोई बात हुई तो पूरा कट हो जाता है या थोड़ी बात भी हुई तो पौना कट हो जाता है। ऐसे ही अपना वर्णन किया तो आधा कट हो जाता है। बाकी बचा क्या? तो जब जगदम्बा की विशेषता - जमा का खाता ज्यादा है। गम्भीरता की देवी है। ऐसे और सभी को गम्भीर होना चाहिए, चाहे मधुबन में रहते हैं, चाहे सेवाकेन्द्र में रहते हैं लेकिन बापदादा सभी को कहते हैं कि गम्भीरता से अपनी मार्क्स इकट्ठी करो, वर्णन करने से खत्म हो जाती हैं। चाहे अच्छा वर्णन करते हो, चाहे बुरा। अच्छा अपना अभिमान और बुरा किसका अपमान कराता है। तो हर एक गम्भीरता की देवी और गम्भीरता का देवता दिखाई दे। अभी गम्भीरता की बहुत-बहुत आवश्यकता है। अभी बोलने की आदत बहुत हो गई है क्योंकि भाषण करते हैं ना तो जो भी आयेगा वो बोल देंगे। लेकिन प्रभाव जितना गम्भीरता का पड़ता है इतना वाणी का नहीं पड़ता। अच्छा।

(बापदादा को गुलदस्ते भेंट किये) –

ये गुलदस्ते तो क्या हैं, आप एक-एक रूहानी गुलाब सबसे प्यारे हो।

(प्रसिद्ध गायक ओमव्यास जी ने नये गीतों की कैसेट का विमोचन बाबा से कराया) - अच्छा है, ड्रामा ने निमित्त बनाया है और निमित्त बनना ही भाग्य की निशानी है। तो भाग्य बना रहे हो और बनाते ही रहेंगे। अच्छा-ओम् शान्ति।



16-11-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘बापदादा की चाहना - डायमण्ड जुबली वर्ष को लगाव मुक्त वर्ष के रूप में मनाओ’’

आज बापदादा सदा दिल से बाप की याद में रहने वाले अपने स्नेही, सहयोगी बच्चों से मिलने आये हैं। जितना बच्चों का स्नेह है उतना बाप का भी स्नेह बच्चों से है। बाप सभी बच्चों को एक जैसा अति स्नेह देते हैं। लेकिन बच्चे अपने-अपने शक्ति अनुसार स्नेह को धारण करते हैं। इसीलिए बाप को भी कहना पड़ता है नम्बरवार याद-प्यार। लेकिन बाप सभी बच्चों को नम्बरवन दिल का प्यार अमृतवेले से लेकर देते हैं। इसलिए अमृतवेला विशेष बच्चों के लिए ही रखा हुआ है। क्योंकि अमृतवेला सारे दिन का आदि समय है। तो जो बच्चे आदि समय पर बाप का स्नेह दिल में धारण कर लेते हैं तो दिल में परमात्म स्नेह समाया हुआ होने के कारण और कोई स्नेह आकर्षित नहीं करता है। अगर अपने स्थिति अनुसार पूरा दिल भर करके दिल में स्नेह नहीं धारण करते, थोड़ा भी खाली है, अधूरा लिया है तो दिल में जगह होने के कारण माया भिन्न-भिन्न रूप से अनेक स्नेह, चाहे व्यक्ति, चाहे वैभव-दोनों रूप में उन स्नेहों में आकर्षित कर लेती है।

कई बच्चे बापदादा से कहते हैं कि हमारे पास अभी तक भी माया क्यों आती है? जब मास्टर सर्वशक्तिमान बन गये तो माया के आने का क्वेश्चन ही नहीं है। लेकिन कारण है कि आदि काल अमृतवेले अपने दिल में परमात्म स्नेह सम्पूर्ण रूप से धारण नहीं करते। अगर कोई भी चीज़ अधूरी भरी हुई है, कहाँ भी खाली है तो हलचल तो होगी ना! बैठते भी हो, उठते भी हो, लक्ष्य भी है और कहते भी हो कि एक बाप, दूसरा न कोई....... यह दिल से कहते हो या मुख से? तो फिर दिल में और आकर्षण का कारण क्या है? ज़रुर कहाँ और व्यक्ति या वैभव की तरफ स्नेह जाता है तब वो आकर्षित करती है। दिल में सम्पूर्ण परमात्म प्यार पूरा भरा हुआ नहीं होता है। आप सोचो-अगर एक हाथ में आपको कोई हीरा देवे और दूसरे हाथ में मिट्टी का गोला देवे तो आपकी आकर्षण कहाँ जायेगी? हीरे में जायेगी, मिट्टी में नहीं! मिट्टी से भी खेलना तो अच्छा होता है ना! तो व्यर्थ संकल्प ये भी क्या है? हीरा है या मिट्टी है? तो मिट्टी से खेलते तो हो ना! आदत पड़ी हुई है इसीलिए! व्यक्ति भी क्या है? मिट्टी है ना! मिट्टी-मिट्टी में मिल जाती है। देखने में आपको बहुत सुन्दर आता है, चाहे सूरत से, चाहे कोई विशेषता से, चाहे कोई गुण से, तो कहते हैं कि और मुझे कोई लगाव नहीं है, स्नेह नहीं है लेकिन इनका ये गुण बहुत अच्छा है। तो गुण का प्रभाव थोड़ा पड़ जाता है या कहते हैं कि इसमें सेवा की विशेषता बहुत है तो सेवा की विशेषता के कारण थोड़ा सा स्नेह है, शब्द नहीं कहेंगे लेकिन अगर विशेष किसी भी व्यक्ति के तरफ या वैभव के तरफ बार-बार संकल्प भी जाता है-ये होता तो बहुत अच्छा.... ये भी आकर्षण है। व्यक्ति के सेवा की विशेषता का दाता कौन? वो व्यक्ति या बाप देता है? कौन देता है? तो व्यक्ति बहुत अच्छा है, अच्छा है वो ठीक है लेकिन जब कोई भी विशेषता को देखते हैं, गुणों को देखते हैं, सेवा को देखते हैं तो दाता को नहीं भूलो। वह व्यक्ति भी लेवता है, दाता नहीं है। बिना बाप का बने उस व्यक्ति में ये सेवा का गुण या विशेषता आ सकती है? या वह विशेषता अज्ञान से ही ले आता है? ईश्वरीय सेवा की विशेषता अज्ञान में नहीं हो सकती। अगर अज्ञान में भी कोई विशेषता या गुण है भी लेकिन ज्ञान में आने के बाद उस गुण वा विशेषता में ज्ञान नहीं भरा तो वो विशेषता वा गुण ज्ञान मार्ग के बाद इतनी सेवा नहीं कर सकता। नेचरल गुण में भी ज्ञान भरना ही पड़ेगा। तो ज्ञान भरने वाला कौन? बाप। तो किसकी देन हुई, दाता कौन? तो आपको लेवता अच्छा लगता है या दाता अच्छा लगता है? तो लेवता के पीछे क्यों भागते हो?

बाप के आगे या दादियों के आगे बहुत मीठा-मीठा बोलते हैं, कहेंगे दादी मेरा कुछ लगाव नहीं, बिल्कुल नहीं, सिर्फ सेवा के कारण थोड़ा सा है। थोड़ा सा कहकर अपने को छुड़ा लेते हैं। लेकिन ये लगाव चाहे गुण का हो, चाहे सेवा का हो लेकिन लगाव आज नहीं तो कल कहाँ ले जायेगा? कोई को तो लगाव पुरानी दुनिया तक भी ले जाता है लेकिन मैजारिटी पुरानी दुनिया तक नहीं जाते हैं, थोड़े जाते हैं। मैजारिटी को लगाव पुरूषार्थ में अलबेलेपन की तरफ ले जाता है। फिर सोचते हैं कि ये तो थोड़ा-बहुत होता ही है फिर बाप को भी समझाने लगते हैं-कहते हैं बाबा आप तो साकार में हो नहीं, ब्रह्मा बाबा भी अव्यक्त हो गया और आप तो हो ही बिन्दी, ज्योति। अभी हम तो साकार में हैं, इतना मोटा-ताजा शरीर है और शरीर से सब करना है, चलना है, तो हम हैं साकार और आप आकार और निराकार हो, अभी साकार में कोई तो चाहिए ना! अच्छा बहुत नहीं, एक तो चाहिए ना! एक भी नहीं चाहिए? देखना बापदादा तो कहते हैं एक चाहिए। नहीं चाहिए? (एक बाबा चाहिए) बाप तो है ही लेकिन कई बार मन में कई बातें आ जाती है और मन भारी हो जाता है, जब तक मन को हल्का नहीं करते हैं तो योग भी नहीं लगता। फिर क्या करें? बाप का भी क्वेश्चन है कि ऐसे टाइम पर क्या करें? मन भारी है और योग लगता नहीं है तो क्या करें? उल्टी नहीं करे, अन्दर ही मचलता रहे? डॉक्टर्स लोग क्या कहते हैं? अगर पेट भारी हो जाये तो उल्टी करके निकालनी चाहिए या अन्दर ही रखनी चाहिए? डॉक्टर्स क्या कहते हैं? उल्टी करनी चाहिए ना? तो डॉक्टर भी कहते हैं उल्टी करनी चाहिए। अच्छा।

ये तो हुआ तन का डॉक्टर और आप सभी मन के डॉक्टर हो। तो तन वाले ने अपना जवाब दिया, अभी मन के डॉक्टर बताओ-अगर मन में कोई उलझन हो तो कहाँ उल्टी करें? बाबा के सामने उल्टी करेंगे! (बाबा के कमरे में जाकर करें) कमरे में उल्टियाँ करके आवें! सोचो! बाप के आगे उल्टी करेंगे? नहीं तो कहाँ करे? कोई स्थान तो बताओ ना? बापदादा तो बच्चों का तरफ लेता है कि उस समय तो कोई चाहिए ज़रुर। (बाबा को सुनायें) अगर बाप सुनता ही नहीं, तो क्या करें? कई बच्चों की कंप्लेंट है ना कि हमने तो बाबा को सुनाया, बाबा ने सुना ही नहीं, जवाब ही नहीं दिया। फिर क्या करें? वास्तव में अगर दिल में परमात्म प्यार, परमात्म शक्तियाँ, परमात्म ज्ञान फुल है, ज़रा भी खाली नहीं है तो कभी भी किसी भी तरफ लगाव या स्नेह जा नहीं सकता।

कई कहते हैं लगाव नहीं है लेकिन सिर्फ अच्छा लगता है तो इसको कौन-सी लाइन कहेंगे? लगाव नहीं है, अच्छा लगता है तो ये क्या है? इतनी छुट्टी दें कि अच्छा भले लगे, लगाव नहीं है, उनसे बैठना, उनसे बात करना, उनसे सेवा कराना वो अच्छा लगता है, तो ये छुट्टी दें? जो समझते हैं थोड़ी-थोड़ी देनी चाहिए, अभी सम्पूर्ण तो बने नहीं हैं, पुरूषार्थ कर रहे हैं, थोड़ी छुट्टी होनी चाहिए! वह हाथ उठायें। अभी हाथ तो उठायेंगे नहीं, क्योंकि शर्म आयेगी ना! लेकिन अगर आप समझते हो कि थोड़ी सी छुट्टी होनी चाहिए तो दादी को प्रायवेट चिटकी लिखकर दे देना। ऐसे नहीं कहना कि दादी पांच मिनट बात करना है, इसमें तो फिर टाइम चाहिए। चिटकी में लिख दो तो बापदादा उनका अच्छा संगठन करेंगे। और ही अच्छा हो जायेगा ना! अच्छा, अभी सब ना कर रहे हैं और सभी का वीडियो निकल रहा है। यदि ना करके फिर करेंगे तो वो कैसेट भेजेंगे कि आपने ना किया था फिर क्यों किया? भेजनी पड़ेगी या सेफ रहेंगे? पक्का या थोड़ा-थोड़ा कच्चा, थोड़ा-थोड़ा पक्का!

उस दिन भी सुनाया कि ये सीज़न डायमण्ड जुबली का आरम्भ करने वाली है तो इस सीज़न में आप लोगों ने तो कांफ्रेंस का, भाषणों का, मेलों का बहुत प्रोग्राम बनाया है लेकिन बापदादा विशेष इस डायमण्ड जुबली में एक प्रोग्राम बनाना चाहते हैं, तैयार हो?

बापदादा चाहते हैं कि डायमण्ड जुबली में जिस बच्चे को देखें-चाहे दो वर्ष का है, चाहे साठ वर्ष का है, चाहे दो मास का है, चाहे टीचर है, चाहे स्टूडेण्ट है, चाहे समर्पण है, चाहे प्रवृत्ति में है लेकिन डायमण्ड जुबली के वर्ष में, ये जो बाप के साथ आप सबने भी पान का बीड़ा उठाया है कि पवित्रता द्वारा हम प्रकृति को भी पावन करेंगे। तो ये संकल्प है या बाप को करना है? बाप के साथी हैं? थोड़ा सा हाथ ऐसे रख देते हैं, चतुराई करते हैं। ऐसे नहीं करना। तो बापदादा चाहते हैं कि सारे विश्व में हर एक बच्चा लगाव मुक्त बने - चाहे साधनों से, चाहे व्यक्ति से। साधनों से भी लगाव नहीं। यूज़ करना और चीज़ है और लगाव अलग चीज़ है। तो बापदादा लगाव-मुक्त वर्ष मनाने चाहते हैं। ये फंक्शन करना चाहते हैं। तो इस फंक्शन में आप लोग साथी बनेंगे? फिर ये तो नहीं कहेंगे कि यह कारण हो गया! कोई भी कारण हो, चाहे हिमालय का पहाड़ भी गिर जाये, लेकिन आप उस हिमालय के पहाड़ से भी किनारे निकल आओ। इतनी हिम्मत है? पहले टीचर्स बोलो। स्टूडेण्ट खुश होते हैं कि हमारी टीचर्स को बापदादा कहता है। और टीचर्स तो सहयोग के लिए सदा साथी हैं ही ना। क्योंकि आगे चलकर आजकल की दुनिया में ये सभी जो भी अपने को धर्म आत्मा, महान आत्मा कहलाते हैं उन्हों की भी पवित्रता के फाउण्डेशन हिलेंगे। और ऐसे टाइम पर आदि में जब ब्रह्मा बाप निमित्त बने तो गाली किस बात के कारण खाई? पवित्रता के कारण ना। नहीं तो कोई बड़े आयु वाले की भी हिम्मत नहीं थी जो ब्रह्मा बाप के पास्ट लाइफ में भी कोई अंगुली उठाए। ऐसी पर्सनालिटी थी। लेकिन पवित्रता के कारण गाली खानी पड़ी। और इस परमात्म ज्ञान की नवीनता ही पवित्रता है। फ़लक से कहते हैं ना कि आग-कापूस इकठ्ठा रहते भी आग नहीं लग सकती। चैलेन्ज है ना! जो युगल हैं वो हाथ उठाओ। तो आप सभी युगलों की ये चैलेन्ज है या थोड़ी-थोड़ी आग लगेगी फिर बुझा देंगे? वर्ल्ड को चैलेन्ज है ना! सारे विश्व को आप लोग भाषणों में कहते हो कि पवित्रता के बिना योगी तू आत्मा, ज्ञानी तू आत्मा बन ही नहीं सकते। ये आप सबकी चैलेन्ज है ना? जो युगल समझते हैं कि मेरी ये चैलेन्ज है वो हाथ उठाओ।अच्छा है - एक ही ग्रुप में साथी तो बहुत हैं। तो डायमण्ड जुबली में क्या करेंगे? लगाव मुक्त। क्रोधमुक्त का किया ना। थोड़ा-थोड़ा क्रोध तो बापदादा ने भी कइयों में देखा, लेकिन इस बारी थोड़ा का छोड़ दिया। फिर भी चाहे देश, चाहे विदेश में जिन्होंने अटेन्शन रखा और सम्पूर्ण रूप से क्रोध मुक्त जीवन का प्रैक्टिकल में अनुभव किया, करके दिखाया, उन सबको बापदादा पद्मगुणा से भी ज्यादा मुबारक देते हैं। क्योंकि इस समय चाहे विदेश वाले, चाहे देश वाले, सबके बुद्धि रूपी टेलीफोन यहाँ मधुबन में लगे हुए हैं। अभी सबका कनेक्शन मधुबन में है। तो सभी ने यह अनुभव तो किया ही होगा कि जिन्हों ने अच्छी तरह से दृढ़ संकल्प किया - उन्हों को बापदादा की तरफ से विशेष एक्स्ट्रा मदद भी मिली है। तो ऐसे नहीं समझना कि एक साल तो क्रोध को खत्म किया, अभी तो फ्री हैं। नहीं। अगर सम्पूर्ण लगाव मुक्त अनुभव करेंगे तो क्रोध मुक्त ऑटोमेटिकली हो जायेंगे। क्यों? क्रोध भी क्यों होता है? जिस बात को, जिस चीज़ को आप चाहते हो और वो पूर्ण नहीं होता है या प्राप्त नहीं होता है तो क्रोध आता है ना! क्रोध का कारण - आपके जो संकल्प हैं वो चाहे उल्टे हों, चाहे सुल्टे हों लेकिन पूर्ण नहीं होंगे - तो क्रोध आयेगा। मानो आप चाहते हो कि कांफ्रेंस होती है, फंक्शन होते हैं तो उसमें हमारा भी पार्ट होना चाहिए। आख़िर भी हम लोगों को कब चांस मिलेगा? आपकी इच्छा है और आप इशारा भी करते हैं लेकिन आपको चांस नहीं मिलता है तो उस समय चिड़चिड़ापन आता है कि नहीं आता है? चलो, महा क्रोध नहीं भी करो, लेकिन जिसने ना की उनके प्रति व्यर्थ संकल्प भी चलेंगे ना? तो वह पवित्रता तो नहीं हुई। ऑफर करना, विचार देना इसके लिए छुट्टी है लेकिन विचार के पीछे उस विचार को इच्छा के रूप में बदली नहीं करो। जब संकल्प इच्छा के रूप में बदलता है तब चिड़चिड़ापन भी आता है, मुख से भी क्रोध होता है वा हाथ पांव भी चलता है। हाथ पांव चलाना-वह हुआ महाक्रोध। लेकिन निस्वार्थ होकर विचार दो, स्वार्थ रखकर नहीं कि मैंने कहा तो होना ही चाहिए-ये नहीं सोचो। ऑफर भले करो, ये रांग नहीं है। लेकिन क्यों-क्या में नहीं जाओ। नहीं तो ईर्ष्या, घृणा - ये एक-एक साथी आता है। इसलिए अगर पवित्रता का नियम पक्का किया, लगाव मुक्त हो गये तो यह भी लगाव नहीं रखेंगे कि होना ही चाहिए। होना ही चाहिए, नहीं। ऑफर किया ठीक, आपकी निस्वार्थ ऑफर जल्दी पहुँचेगी। स्वार्थ या ईर्ष्या के वश ऑफर और क्रोध पैदा करेगी। तो टीचर्स क्या करेंगी? 100 परसेन्ट लगाव मुक्त। बोलो हाँ या ना? फॉरेनर्स बोलो, हाँ जी।

बापदादा को तो अपने टी.वी. में बहुत नई-नई बातें दिखाई देती हैं। अभी 60 वर्ष पूरे हो रहे हैं तो अब तक जो बातें नहीं हुई थी वो नये-नये खेल भी बहुत दिखाई देते हैं। इस सीज़न में एक-एक करके वर्णन करेंगे। लेकिन याद रखना अगर किसी के प्रति भी स्वप्न मात्र भी लगाव हो, स्वार्थ हो तो स्वप्न में भी समाप्त कर देना। कई कहते हैं कि हम कर्म में नहीं आते लेकिन स्वप्न आते हैं। लेकिन अगर कोई व्यर्थ वा विकारी स्वप्न, लगाव का स्वप्न आता है तो अवश्य सोने के समय आप अलबेलेपन में सोये। कई कहते हैं कि सारे दिन में मेरा कोई संकल्प तो चला ही नहीं, कुछ हुआ ही नहीं फिर भी स्वप्न आ गया। तो चेक करो-सोने समय बापदादा को सारे दिन का पोतामेल देकर, खाली बुद्धि हो करके नींद की? ऐसे नहीं कि थके हुए आये और बिस्तर पर गये और गये -ये अलबेलापन है। चाहे विकर्म नहीं किया और संकल्प भी नहीं किया लेकिन ये अलबेलेपन की सज़ा है। क्योंकि बाप का फरमान है कि सोते समय सदा अपने बुद्धि को क्लीयर करो, चाहे अच्छा, चाहे बुरा, सब बाप के हवाले करो और अपने बुद्धि को खाली करो। दे दिया बाप को और बाप के साथ सो जाओ, अकेले नहीं। अकेले सोते हो ना तभी स्वप्न आते हैं। अगर बाप के साथ सोओ तो कभी ऐसे स्वप्न भी नहीं आ सकते। लेकिन फरमान को नहीं मानते हो तो फरमान के बदले अरमान मिलता है। सुबह को उठकर के दिल में अरमान होता है ना कि मेरी पवित्रता स्वप्न में खत्म हो गई। ये कितना अरमान है! कारण है अलबेलापन। तो अलबेले नहीं बनो। जैसे आया वैसे यहाँ वहाँ की बातें करते-करते सो जाओ, क्योंकि समाचार तो बहुत होते हैं और दिलचश्प समाचार तो व्यर्थ ही होते हैं। कई कहते हैं-और तो टाइम मिलता ही नहीं, जब साथ में एक कमरे में जाते हैं तो लेन-देन करते हैं। लेकिन कभी भी व्यर्थ बातों का वर्णन करते-करते सोना नहीं, ये अलबेलापन है। ये फरमान को उल्लंघन करना है। अगर और टाइम नहीं है और जरूरी बात है तो सोने वाले कमरे में नहीं, लेकिन कमरे के बाहर दो सेकण्ड में एक-दो को सुनाओ, सोते-सोते नहीं सुनाओ। कई बच्चों की तो आदत है, बापदादा तो सभी को देखते हैं ना कि सोते कैसे हैं? एक सेकण्ड में बापदादा सारे विश्व का चक्कर लगाते हैं, और टी.वी. से देखते हैं कि सो कैसे रहे हैं, बात कैसे कर रहे हैं ... सब बापदादा देखते हैं। बापदादा को तो एक सेकण्ड लगता है, ज्यादा टाइम नहीं लगता। हर एक सेन्टर, हर एक प्रवृत्ति वाले सबका चक्कर लगाते हैं। ऐसे नहीं सिर्फ सेन्टर का, आपके घरों का भी टी.वी. में आता है। तो जब आदि अर्थात् अमृतवेला और अन्त अर्थात् सोने का समय अच्छा होगा तो मध्य स्वत: ही ठीक होगा। समझा? और बातें करते-करते कई तो बारह साढ़े बारह भी बजा देते हैं। मस्त होते हैं, उनको टाइम का पता ही नहीं। और फिर अमृतवेले उठकर बैठते हैं तो आधा समय निद्रालोक में और आधा समय योग में। क्योंकि जो अलबेले होकर सोये तो अमृतवेला भी तो अलबेला होगा ना! ऐसे नहीं समझना कि हमको तो कोई देखता ही नहीं है। बापदादा देखता है। यह निद्रा भी बहुत शान्ति वा सुख देती है, इसीलिए मिक्स हो जाता है। अगर पूछेंगे तो कहेंगे-नहीं, मैं बहुत शान्ति का अनुभव कर रहा था। देखो, नींद को भी आराम कहा जाता है। अगर कोई बीमार भी होता है तो डॉक्टर लोग कहते हैं - आराम करो। आराम क्या करो? नींद करो टाइम पर। तो निद्रा भी आराम देने वाली है। फ़्रेश तो करती है ना। तो नींद से फ़्रेश होकर उठते हैं ना तो कहते हैं आज (योग में) बहुत फ़्रेश हो गये। अच्छा!

सभी दूर-दूर से आये हैं। जो इस ग्रुप में पहली बारी आये हैं वो हाथ उठाओ। जो छोटे बच्चे होते हैं ना वो बड़ों से और ही प्यारे होते हैं। लेकिन जो नये-नये आये हो वो मेकप करना। जो बड़ों ने 10 साल में किया वो आप 10 दिन में करना। और कर सकते हो क्योंकि बापदादा समझते हैं कि जब नये नये आते हैं ना तो उमंग-उत्साह बहुत होता है और जितने पुराने होते हैं तो..... समझ गये पुराने! इसलिए कहने की जरूरत क्या है! सभी नये, चाहे कुमारियाँ हैं, चाहे कुमार हैं, चाहे प्रवृत्ति वाले हैं, प्रवृत्ति वालों को तो इन सभी महात्माओं को चरणों में झुकाना है। सब आपके गुण गायेंगे कि ये प्रवृत्ति में रहते भी निर्विघ्न पवित्रता के बल से आगे बढ़ रहे हैं। एक दिन आयेगा जो आप सबके आगे ये महात्मायें झुकेंगे। लेकिन अपना वायदा याद रखना-लगाव मुक्त रहना। अच्छा।

टीचर्स से

टीचर्स तो हर बात के निमित्त है। हो ना निमित्त-ये बात पक्की है ना! टीचर्स का अर्थ ही है निमित्त। तो अभी भी इस वर्ष - लगाव मुक्त बनने में टीचर्स नम्बर वन निमित्त बनें। ठीक है! पक्का! ताली बजाओ। बापदादा भी आप टीचर्स के प्रति विशेष ताली बजाता है। अच्छा।

कुमारियाँ

कुमारियाँ हाथ उठाओ। कुमारियाँ क्या करेंगी? कुमारियों को अपने जीवन का स्वयं, स्वयं का मित्र बन निर्बन्धन बनाने में नम्बरवन जाना चाहिए। इन कुमारियों की लिस्ट इकट्ठी करो फिर देखेंगे कि सचमुच कितनी निर्बन्धन बनती हैं? कुमारयाँ अगर समझती हो कि हम निर्बन्धन होकर सेवा में निमित्त बनेंगी तो हाथ उठाओ। इन्हों की ट्रेनिंग रखेंगे। अभी तो ज्ञान सरोवर में भी रखते हैं। तो कुमारियाँ क्या बनेंगी? निर्बन्धन। न मन का बन्धन, न सम्बन्ध का बन्धन। डबल बन्धन से मुक्त। अच्छा।

कुमार

कुमार हाथ उठाओ। कुमार तो बहुत हैं। तो कुमार क्या विशेषता दिखायेंगे? कुमार ऐसे अपने को तैयार करो-चाहे अपने-अपने स्थान पर हो लेकिन जहाँ भी हो वहाँ अपने को ऐसा तैयार करो जो आपका 400-500 का ग्रुप बना करके गवर्नमेंट के इन बड़े लोगों से मिलायें कि देखो कि ये इतने यूथ विश्व की सेवा के लिए या भारत की सेवा के लिए डिस्ट्रक्शन का काम न कर, कन्स्ट्रक्शन का काम कर रहे हैं। तो ऐसा ग्रुप बनाओ। तो कितने टाइम में अपने को तैयार करेंगे? क्योंकि गवर्नमेंट यूथ को आगे रखना चाहती है लेकिन उनको ऐसे यूथ मिलते नहीं हैं और बाप के पास तो हैं ना! तो ऑलमाइटी गवर्नमेंट इस हलचल वाली गवर्नमेंट के आगे एक प्रैक्टिकल मिसाल दिखा सकती है। लेकिन कच्चे नहीं होने चाहिए। ऐसा नहीं, आप कहो हम तो बहुत अच्छे चलते हैं और आपके साथी जो हैं वो रिपोर्ट करें कि नहीं, ये तो ऐसे ही कहता है। ऐसे नहीं। पवित्रता के लिए बिगड़ते हैं वो बात अलग है लेकिन दिव्यगुणों की धारणा में आपका प्रभाव घर वालों के ऊपर पड़ना चाहिए। समझा? तो जो समझते हैं हम डायमण्ड जुबली तक तैयार हो जायेंगे वो हाथ उठाओ। अभी थोड़े कम हो गये। अच्छा, टीचर्स रिपोर्ट देना इस डायमण्ड जुबली के बीच में, एण्ड में नहीं। गवर्नमेंट को यूथ दिखायें। अभी तो 8 मास हैं। तो आठ मास ठीक है।

अधरकुमार-कुमारियाँ

अधरकुमार-कुमारियाँ क्या करेंगे? वैसे प्रवृत्ति वालों को एक नया सबूत देना चाहिए। जो घर में हैं, आपकी फैमली है, किसके चार बच्चे होंगे, किसके आठ होंगे, किसके दो होंगे, जो भी हैं लेकिन हर प्रवृत्ति वाले अपने बच्चों को ऐसे मूल्य सिखाकर तैयार करें जो बच्चों का ऐसा धारणा वाला ग्रुप सैम्पुल हो, जो कॉलेज-स्कूल के पढ़े हैं, उनके आगे उन बच्चों को दिखायें। प्रवृत्ति वालों को अपने बच्चों के ग्रुप को तैयार करना चाहिए। जो किसी से भी रिपोर्ट पूछें चाहे उसके टीचर्स से पूछें, चाहे उसके मोहल्ले के दोस्तों से पूछे, सब उसकी रिपोर्ट अच्छी देवें। ऐसे नहीं - आप कहो बहुत अच्छे हैं और टीचर कहे कि ये तो पढ़ते ही नहीं हैं। ऐसे नहीं। तो प्रवृत्ति वालों को ऐसे बच्चे तैयार करने चाहिए। ज्ञान में आते हैं, अच्छे भी हैं लेकिन उन्हों को थोड़ा और अटेन्शन दिलाकर ऐसा ग्रुप तैयार करो। तो एज्युकेशन का सर्टिफिकेट वो बच्चे हो जायेंगे। नहीं तो एज्युकेशन वाले कहते हैं ना आप सर्टिफिकेट नहीं देते हो। तो आप कहो सर्टिफिकेट देखो ये चैतन्य है। आप कागज का सर्टिफिकेट देते हो, हम आपको चैतन्य का सर्टिफिकेट दिखाते हैं। समझा? ऐसे ही डायमण्ड जुबली नहीं मनानी है। डायमण्ड जुबली में कुछ नवीनता दिखानी है। जो गवर्नमेंट की आँख खुले कि ये क्या है! किसी कार्य में वो ना कर नहीं सके। और ही ऑफर करें, जैसे यहाँ जब महामण्डलेश्वर आये थे तो उन्हों ने क्या ऑफर की? कि हमारे आश्रम ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ चलायें। ऐसे मांगनी की थी ना! तो सभी डिपार्टमेन्ट ऑफर करें कि हमारे डिपार्टमेन्ट में आप लोग ही कर सकते हैं। ऐसा प्रैक्टिकल स्वरूप करना - ये है डायमण्ड जुबली। लेकिन पहला वायदा याद है? क्या बनना है? (लगाव मुक्त) तभी ये सभी हो सकता है। अभी भी बच्चे को मारते रहेंगे तो बच्चा कैसे अच्छा होगा। और आपस में कमज़ोर होते रहेंगे तो महात्मा कैसे चरणों में आयेंगे। जितना-जितना पवित्रता के पिल्लर को पक्का करेंगे उतना-उतना ये पवित्रता का पिल्लर लाइट हाउस का काम करेगा। अच्छा।

डबल विदेशी

डबल विदेशियों में बापदादा को उसमें भी विशेष ब्रह्मा बाप को डबल प्यार है। क्यों डबल प्यार है बताओ? समझते हो डबल प्यार है? क्यों डबल प्यार है? ( लौकिक-अलौकिक डबल काम करते हैं) अच्छा जवाब दिया। लेकिन और भी है, ब्रह्मा बाबा को डबल विदेशियों से विशेष प्यार इसलिए है कि ब्रह्मा बाप हर कार्य में क्विक एक्ज़ाम्पल स्वयं भी रहे और बच्चों को भी बनाया तो डबल विदेशी आते ही कोर्स किया, थोड़ा-सा पक्के हुए और सेन्टर खोल देते हैं। ऐसे करते हो ना? इन्हों की तो बहुत ट्रेनिंग होती है, लेकिन डबल विदेशी सेवा में क्विक एक्ज़ाम्पल हैं। तो ब्रह्मा बाबा को ऐसे बच्चों का बहुत समय से आव्हान था कि ऐसे बच्चे निकलें। तो डबल विदेशी सेवा में ज्यादा टाइम नहीं लगाते। जल्दी लग जाते हैं। कितना भी बिज़ी होते हुए भी सेवा का शौक अच्छा रहता है। अभी भी ये म्यूजियम बनाने के लिए आये हैं। (ज्ञान सरोवर में 5 डबल विदेशी भाई-बहिनें म्यूजियम बना रहे हैं) देखो डबल विदेशियों की विशेषता है तब तो विदेश से खास आप लोगों को बुलाया है। विशेषता तो है ना! ये पूरा ग्रुप अच्छा है। देखो, विशेष आत्मायें हो गये ना, विशेष कार्य के लिए आपको बुलाया गया तो विशेष आत्मायें हो गये। वैसे बापदादा को तो अच्छे लगते ही हो। शिव बाबा को भी अच्छे लगते हो लेकिन ब्राह्मण परिवार को भी अच्छे लगते हो। आप लोगों को देखते हैं ना तो यहाँ भारत वालों को भी नशा रहता है कि देखो हमारा सिर्फ भारत में नहीं, विश्व में है। तो सभी के सिकीलधे हो। अच्छा।

म्यूजियम बनाने वाले ग्रुप को बापदादा ने सम्मुख बुलाया

ये भी ड्रामानुसार विशेष वरदाता का वरदान मिलता है। कोई भी आर्ट है तो आर्ट वरदान समझकर कार्य में लगाओ। ये बाप का वरदान ड्रामानुसार विशेष निमित्त बना है तो उससे कार्य सहज और सफल हुआ ही पड़ा है। ऐसे है ना? तो विशेष वरदानी आत्मायें हैं, उसको उसी विशेषता से कार्य में लगाते रहो। बाप का वरदान है - यह सदा स्मृति में रहे। तो आपके सिर्फ हाथ काम नहीं करेंगे लेकिन बाप की शक्ति आपके हाथों के साथ काम करेगी। बहुत अच्छा है। अच्छा।

अहमदाबाद - महादेव नगर, सेवाकेन्द्र के उद्घाटन के अवसर पर जिन 19 कुमारियों का समर्पण समारोह मनाया गया, वे सब बापदादा से मिलने मधुबन में आई हैं, उन्हें बापदादा ने सम्मुख बुलाया:- देखो, कुमारियों की वैसे भी महिमा है। भक्ति मार्ग में आप सभी ने कुमारियों के चरण भी धोये होंगे। पूजा भी की होगी और अभी यही कुमारियाँ आप सभी को परमात्म मिलन और परमात्म वर्से के अधिकारी बना रही हैं। सभी कुमारियाँ पक्की हो? फोटो तो निकला हुआ है। कोई कच्चा तो नहीं? कोई पुरानी दुनिया में तो नहीं चले जायेंगे। पक्के हैं! अच्छा।

चारों ओर के दिल में समाये हुए बापदादा के सिकीलधे श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बाप के हर एक फरमान मानने से, स्वयं का और औरों का भी अरमान समर्पित कराने वाले, सदा पवित्रता के पिल्लर को मज़बूत बनाने वाले और पवित्रता की लाइट, लाइट हाउस बन फैलाने वाले विशेष आत्माओं को, सदा स्वयं को लगावमुक्त बनाने वाले बाप के समीप आने वाले, रहने वाले सभी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

विदेश में रहने वाले चारों ओर के बच्चों को बापदादा का विशेष याद-प्यार क्योंकि वो यादप्यार के पत्र सदा ही भेजते रहते हैं। जिन्हों ने पत्र भेजा है उन्हों को भी विशेष याद और जिन्हों ने दिल से याद प्यार भेजा है उन्हों को भी विशेष यादप्यार।



25-11-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘परमत, परचिन्तन और परदर्शन से मुक्त बनो और पर-उपकार करो’’

आज बापदादा अपने चारों ओर जो बाप के बच्चे हैं, विशेष हैं, उन सर्व विशेष आत्माओं को देख रहे हैं। चाहे भारत के वा विदेश के किसी भी कोने में हैं, लेकिन बापदादा सर्व विशेष आत्माओं को समीप देख रहे हैं। बापदादा को अपने विशेष बच्चों को देख हर्ष होता है। जैसे आप बच्चों को बाप को देखकर खुशी होती है ना! खुशी होती है तब तो भाग करके आये हो ना। तो बाप को भी खुशी होती है कि मेरा एक-एक बच्चा विशेष आत्मा है। चाहे बुजुर्ग हैं, अनपढ़ हैं, छोटे बच्चे हैं, युवा हैं, प्रवृत्ति वाले हैं लेकिन सारे विश्व के आगे विशेष हैं। चाहे कितने भी बड़े-बड़े वैज्ञानिक चमत्कार दिखाने वाले भी हैं, चन्द्रमा तक पहुँचने वाले भी हैं लेकिन बाप के विशेष बच्चों के आगे वो भी अन्जान हैं। पांचों ही तत्वों को जान लिया, उन्हों पर विजय भी प्राप्त कर ली लेकिन छोटी सी बिन्दु आत्मा को नहीं जाना। यहाँ छोटे बच्चे से भी पूछेंगे-तुम कौन हो, तो क्या कहेगा? आत्मा हूँ कहेगा ना। आत्मा कहाँ रहती है, वो भी बतायेगा। और वैज्ञानिक से पूछो आत्मा क्या है? आत्मा के ज्ञान को अभी तक जान नहीं सके। तो कितने भी बड़े हिस्ट्री के हिसाब से, इस दुनिया के हिसाब से विशेष हों लेकिन जिसने अपने को नहीं जाना, उससे तो यहाँ का पांच वर्ष वाला बच्चा विशेष हो गया। आप लोगों का शुरू-शुरू का बहुत फ़लक का गीत है, याद है कौन सा गीत है? एक गीत था-कितना भी बड़ा सेठ, स्वामी हो लेकिन अलफ़ को नहीं जाना....। तो कितने भी बड़े हो, चाहे नेता हो, चाहे अभिनेता हो लेकिन अपने आपको नहीं जाना तो क्या जाना? तो ऐसी विशेष आत्मायें हो। यहाँ की अनपढ़ बुजुर्ग माता है और दूसरी तरफ अच्छा महात्मा है लेकिन बुजुर्ग माता फ़लक से कहेगी कि हमने परमात्मा को पा लिया। और महात्मा कहेगा-परमात्मा को पाना बहुत मुश्किल है, लेकिन यहाँ 100 वर्ष के आयु वाली भी निश्चयबुद्धि होगी तो वो क्या कहेगी? तुम ढूंढते रहो, हमने तो पा लिया। तो महात्मा भी आपके आगे क्या है! प्रवृत्ति वाले फ़लक से कहेंगे कि हम डबल पलंग पर सोते, इकट्ठे रहते भी पवित्र हैं, क्योंकि हमारे बीच में बाप है। और महात्मायें क्या कहेंगे? कहेंगे - आग-कापूस  इकठ्ठा रहना, यह तो असम्भव लगता है। और आपके लिये क्या है? प्रवृत्तिवाले बताओ-पवित्र रहना मुश्किल है या सहज है? सहज है या कभी-कभी मुश्किल हो जाता है? जो पक्के हैं वो तो बड़ी सभा हो या कुछ भी हो फ़लक से कह सकते हैं कि पवित्रता तो हमारा स्वधर्म है। परधर्म नहीं है, स्वधर्म है। तो स्व सहज होता है, पर मुश्किल होता है। अपवित्रता परधर्म है लेकिन पवित्रता स्वधर्म है। तो ऐसे अपनी विशेषता को जानते हो ना? क्योंकि नये-नये भी बहुत आये हैं ना? लेकिन कितने भी नये हैं पवित्रता का पाठ तो पक्का है ना? कई बच्चे ऐसा भी करते हैं - जब तक बाप से मिलने का एक साल पूरा नहीं होता, सबको पता है कि यह नियम पक्का है, तो मधुबन में आने तक तो ठीक रहते हैं लेकिन देख लिया, पहुँच गये, तो कई वापस जाकर अलबेले भी हो जाते हैं लेकिन सोचो कि पवित्रता की प्रतिज्ञा किससे की? बाप से की ना? बाप का फरमान है ना? तो बाप से प्रतिज्ञा कर और फिर अगर अलबेले होते हैं तो नुकसान किसको होगा? ब्राह्मण परिवार में तो एक जाते, 10 आते हैं। लेकिन नुकसान कमज़ोर होने का, उन आत्माओं को होता है इसलिए जो भी नये-नये पहली बार आये हैं वो बाप के घर में तो पहुँच गये-यह तो भाग्य की बात है ही लेकिन तकदीर की लकीर को कभी भी कम नहीं करना। तकदीर को बड़ा करना।

अच्छा, जितने भी आये हैं, सबका नाम रजिस्टर में तो है ही। रजिस्टर में अपना नाम पक्का कराया है या थोड़ा-थोड़ा कच्चा है? अच्छा, जो भी नये जहाँ से भी आये हैं, टीचर्स के पास तो लिस्ट है ही और प्रेजेन्ट मार्क भी डालते हैं या नहीं डालते? कौन-सा सेन्टर है जहाँ प्रेजेन्ट मार्क नहीं पड़ती हो, कोई सेन्टर है? टीचर सच बताओ। कभी नींद आ जाती होगी, कभी बीमार हो गये, कभी क्लास में पहुँच नहीं सके, तो रोज़ की प्रेजेन्ट मार्क पड़ती है? जो टीचर्स कहती हैं रोज का रजिस्टर और प्रेजेन्ट मार्क है वो हाथ उठाओ। अच्छा, रेग्युलर है या कभी-कभी? कि दो-तीन दिन मिस हो जाता है? सब टीचर्स पास हैं तो ताली बजाओ। तो अभी क्या करना - जो भी आप नये लाये हैं, चाहे भाई, चाहे बहनें, उनका तीन-चार मास के बाद, क्योंकि पहले थोड़ा नशा रहता है, पीछे धीरे-धीरे कम होता है, तो चार मास के बाद जितने नये आये, उतने कायम हैं या चक्कर लगाने गये हैं कहाँ? यह रिज़ल्ट लिखना। क्योंकि कई चक्कर लगाने भी जाते हैं। दो साल की माया की यात्रा करके फिर यहाँ पहुँचते हैं। तो रिज़ल्ट में सिर्फ यह दो शब्द लिखना कि 60 आये और 60 ही हैं। या 60 आये 40 हैं। सिर्फ ये दो अक्षर विशेष रतनमोहिनी के नाम से अलग लिखना। बाहर में (लिफाफे पर) ब्रह्माकुमारीज़ तो लिखेंगे लेकिन बड़े अक्षरों में रतनमोहिनी लिखना, अन्दर नहीं। तो समझेंगे इसका है, नहीं तो उसके पास (ईशू के पास) पोस्ट बहुत आ जाती है। देखेंगे, कितनी विशेष आत्मायें अपनी विशेषता दिखाती हैं?

देखो, कोई भी बच्चा लौकिक में भी पैदा होता है तो सभी क्या कहते हैं? सदा ज़िन्दा रहे, बड़ी आयु रहे। तो बापदादा भी विशेष आत्माओं की अविनाशी विशेषता देखना चाहते हैं। थोड़े टाइम की नहीं। एक साल चले, दो साल चले-ये नहीं। अविनाशी रहने वाले को ही अविनाशी प्रालब्ध प्राप्त होती है। तो मातायें भी पक्की हैं? क्योंकि चाहे आप एक साल के हो या दो साल के हो, चार के हो लेकिन समाप्ति तो एक ही समय होनी है ना! विनाश तो इकठ्ठा ही होगा ना! कि आप कहेंगे कि हम तो दो साल के हैं हमारी सिल्वर जुबली हो जावे, पीछे विनाश होवे! यह तो नहीं होगा ना। इसलिए पीछे आने वाले को और आगे जाना है। थोड़े समय में बहुत कमाई कर सकते हो। फिर भी आप लोगों को पुरूषार्थ का समय मिला है। आगे चल करके तो इतना समय भी नहीं मिलेगा। सुनाया था ना कि अभी लेट का बोर्ड तो लग गया है लेकिन टू लेट का नहीं लगा है। तो आप सभी लक्की हो। सिर्फ अपने भाग्य को स्मृति में रखते हुए बढ़ते चलना। कोई बातों में नहीं जाना।

आज बापदादा देख रहे थे कि बच्चों के पुरूषार्थ का समय वेस्ट क्यों जाता है? चाहता कोई नहीं है, सब चाहते हैं कि हमारा समय सफल हो लेकिन बीच-बीच में कहाँ आधा घण्टा, कहाँ 15 मिनट, कहाँ 5 मिनट वेस्ट चला जाता है। तो उसका कारण क्या? आज बापदादा ने देखा कि मैजारिटी का विशेष पुरूषार्थ जो कम या ढीला होता है उसके तीन कारण हैं। पहले भी सुनाया है, नई बात नहीं है लेकिन डायमण्ड जुबली में विशेष क्या अटेन्शन दो वो बापदादा शुरू से सुना रहे हैं तो तीन कारण –

पहला, चलते-चलते श्रीमत के साथ-साथ आत्माओं की परमत मिक्स कर देते हैं। कोई ने कोई बात सुना दी और आप समझते हो कि सुनाने वाला तो अच्छा, सच्चा महारथी है और आपका उस पर फेथ भी है, जब ऐसी कोई आत्मा आपको कोई ऐसी बातें सुनाती है जिसमें इन्टरेस्ट भी आता है, समाचार तो अच्छा है.... जैसे संसार समाचार अच्छा लगता है ना तो ब्राह्मण संसार समाचार भी अच्छा लगता है, तो आपने उस पर फेथ रख करके वो बात सुन ली माना अपने अन्दर समा ली, कट नहीं किया, तो बात सच्ची भी है, समाचार सच्चा भी होता है, सब झूठा नहीं होता, कोई सच्चा भी होता है लेकिन बाप का फरमान क्या है? कि ऐसे समाचार भले सुनो - ये है फरमान? नहीं, जिससे आपका कोई कनेक्शन नहीं है, सिर्फ दिलचस्प समाचार है, आप कर कुछ नहीं सकते, सिर्फ सुन लिया तो वह समाचार बुद्धि में तो गया, टाइम वेस्ट तो हुआ या नहीं? और बाप की श्रीमत में परमत मिक्स कर दी। क्योंकि बाप की आज्ञा है - सुनते हुए नहीं सुनो। तो आपने सुना क्यों? उसकी आदत डाली। मानो एक बारी आपको समाचार सुनाया, आपको भी बहुत अच्छा लगा, नई बात है, ऐसा भी होता है-ये पता तो पड़ गया, लेकिन अगर एक बारी आपने उनकी बात सुनी तो दूसरे बारी वो कहाँ जायेगा? आपके पास आयेगा। आप उसके लिए कूड़े का डिब्बा बन गये ना! जो भी ऐसा समाचार होगा वो आपके पास ही आकर सुनायेगा। क्योंकि आपने सुना! इसलिए या तो उसको समझाओ, ऐसी बातों से उसको भी मुक्त करो। सुन करके इन्टरेस्ट नहीं बढ़ाओ लेकिन अगर सुनते हो तो आपमें इतनी ताकत हो जो उसको भी सदा के लिए फुल स्टॉप लगा दो। अपने अन्दर भी फुल स्टॉप लगाओ। जिस व्यक्ति का समाचार सुना उसके प्रति दृष्टि में वा संकल्प में भी घृणा भाव बिल्कुल नहीं हो। इतनी पॉवर आपमें है तो यह सुनना नहीं हुआ, उसका कल्याण करना हुआ। लेकिन रिज़ल्ट में देखा जाता है मैजारिटी थोड़ा-थोड़ा किचड़ा इकठ्ठा होते-होते ये घृणा भाव या चाल-चलन में अन्तर आ जाता है। और कुछ भी नहीं होगा तो भी उस आत्मा के प्रति सेवा करने की भावना नहीं होगी, भारीपन होगा। इसको कहा जाता है-श्रीमत में परमत मिलाना। समाचार तो बापदादा भी सुनते हैं, लेकिन होता क्या है? मैजारिटी का भाव बदल जाता है। सुनाने में भी भाव बदल जाता है। एक आकर कहता है मैंने देखा कि ये दो बात कर रहे थे और एक का सुना हुआ दूसरा फिर कहते हैं नहीं-नहीं खड़े भी थे और बहुत अच्छी तरह से नहीं खड़े थे, दूसरा एडीशन हुआ। फिर तीसरा कहेगा इन्हों का तो होता ही है। कितना भाव बदल गया। उन्हों की भावना क्या और बातों में भाव कितना बदल जाता है। तो ये परमत वायुमण्डल को खराब कर देता है। तो जो टाइम वेस्ट जाता है उसका एक कारण परमत और दूसरा कारण है परचिन्तन। एक से बात सुनी तो आठ-दस को नहीं सुनावे, यह नहीं हो सकता। अगर कोई दूरदेश में भी होगा ना तो भी उसको पत्र में भी लिख देंगे-यहाँ बहुत नई बात हुई है, आप आयेंगे ना तो ज़रुर सुनायेंगे। तो ये क्या हो गया? परचिन्तन। समझो आपने चार को सुनाया, उन चार की भावना उस आत्मा के प्रति आपने खराब तो की ना और परचिन्तन शुरू हुआ तो इसकी गति बड़ी फास्ट और लम्बी होती है।

परचिन्तन एक-दो सेकण्ड में पूरा नहीं होता। जैसे बापदादा सुनाते हैं कि जब किसको भी ज्ञान सुनाओ तो इन्टरेस्ट दिलाने के लिए उसको कहानी के रीति से सुनाओ। पहले ये हुआ, फिर क्या हुआ, फिर क्या हुआ, फिर क्या हुआ.....। तो इन्टरेस्ट बढ़ता है ना। ऐसे जो परचिन्तन होता है वो भी एक इन्ट्रेस्टेड होता है। उसमें दूसरा ज़रुर सोचेगा, फिर क्या हुआ, फिर ऐसे हुआ, हाँ ऐसे हुआ होगा.... तो ये भी कहानी बड़ी लम्बी है। बापदादा तो सबकी दिल की बातें सुनते भी हैं, देखते भी हैं। कोई कितना भी छिपाने की कोशिश करे सिर्फ बापदादा कहाँ-कहाँ लोक संग्रह के अर्थ खुला इशारा नहीं देते, बाकी जानते सब हैं, देखते सब हैं। कोई कितना भी कहे कि नहीं, मैं तो कभी नहीं करता, बापदादा के पास रजिस्टर है, कितने बार किया, क्या-क्या किया, किस समय किया, कितनों से किया - यह सब रजिस्टर है। सिर्फ कहाँ-कहाँ चुप रहना पड़ता है। तो दूसरी बात सुनाई-परचिन्तन। उसका स्वचिन्तन कभी नहीं चलेगा। कोई भी बात होगी, परचिन्तन वाला अपनी ग़लती भी दूसरे पर लगायेगा। और परचिन्तन वाले बात बनाने में नम्बरवन होते हैं। पूरी अपनी ग़लती दूसरे के प्रति ऐसे सिद्ध करेंगे जो सुनने वाले बड़ों को भी चुप रहना पड़ता है। तो स्वचिन्तन इसको नहीं कहा जाता है कि सिर्फ ज्ञान की पॉइन्ट्स रिपीट कर दीं या ज्ञान की पॉइन्ट्स सुन लीं, सुना दीं-सिर्फ यही स्वचिन्तन नहीं है। लेकिन स्वचिन्तन अर्थात् अपनी सूक्ष्म कमज़ोरियों को, अपनी छोटी-छोटी गलतियों को चिंतन करके मिटाना, परिवर्तन करना, ये स्वचिन्तन है। बाकी ज्ञान सुनना और सुनाना उसमें तो सभी होशियार हो। वो ज्ञान का चिन्तन है, मनन है लेकिन स्वचिन्तन का महीन अर्थ अपने प्रति है। क्योंकि जब रिज़ल्ट निकलेगी तो रिज़ल्ट में यह नहीं देखा जायेगा कि इसने ज्ञान का मनन अच्छा किया या सेवा में ज्ञान को अच्छा यूज़ किया। इस रिज़ल्ट के पहले स्वचिन्तन और परिवर्तन, स्वचिन्तन करने का अर्थ ही है परिवर्तन करना। तो जब फाइनल रिज़ल्ट होगी, उसमें पहली मार्क्स प्रैक्टिकल धारणा स्वरूप को मिलेगी। जो धारणा स्वरूप होगा वो नैचरल योगी तो होगा ही। अगर मार्क्स ज्यादा लेनी है तो पहले जो दूसरों को सुनाते हो, आजकल वैल्यूज़ पर जो भाषण करते हो, उसकी पहले स्वयं में चेकिंग करो। क्योंकि सेवा की एक मार्क तो धारणा स्वरूप की 10 मार्कस होती हैं, अगर आप ज्ञान नहीं दे सकते हो लेकिन अपनी धारणा से प्रभाव डालते हो तो आपके सेवा की मार्कस जमा हो गई ना।

आजकल कई समझते हैं कि हमको सेवा का चांस बहुत कम मिलता है, हमको चांस मिलना चाहिए, दूसरे को मिलता है, मेरे को क्यों नहीं? सेवा करना बहुत अच्छा है क्योंकि अगर बुद्धि फ्री रहती है तो व्यर्थ बहुत चलता है। इसीलिए सेवा में बुद्धि बिज़ी रहे यह साधन अच्छा है। सेवा का उमंग तो अच्छा ही है लेकिन ड्रामानुसार या सरकमस्टांस अनुसार मानों आपको चांस नहीं मिला और आपकी अवस्था दूसरों की सेवा करने की बजाय अपनी भी गिरावट में आ जाये या वो सेवा आपको हलचल में लाये तो वो सेवा क्या हुई? उस सेवा का प्रत्यक्षफल क्या मिलेगा? सच्ची सेवा, प्यार से सेवा, सभी की दुआओं से सेवा, उसका प्रत्यक्षफल खुशी होती है और अगर सेवा में फीलिंग आ गई तो यहाँ ब्राह्मण फीलिंग को क्या कहते हैं? फ्लु। फ्लु वाला क्या करता है? सो जाता है। खाना नहीं खायेगा, सो जायेगा। यहाँ भी फीलिंग आती है तो या खाना छोड़ेगा या रूस करके बैठ जायेगा। तो यह फ्लु हुआ ना। अगर आप धारणा स्वरूप हो, सच्चे सेवाधारी हो, स्वार्था सेवा नहीं। एक होती है कल्याण के भावना की सेवा और दूसरी होती है स्वार्थ से। मेरा नाम आ जायेगा, मेरा अखबार में फोटो आ जायेगा, मेरा टी.वी. में आ जायेगा, मेरा ब्राह्मणों में नाम हो जायेगा, ब्राह्मणी बहुत आगे रखेगी, पूछेगी..... यह सब भाव स्वार्था-सेवा के हैं। क्योंकि आजकल के हिसाब से, प्रत्यक्षता के हिसाब से, अभी सेवा आपके पास आयेगी, शुरू में स्थापना की बात दूसरी थी लेकिन अभी आप सेवा के पिछाड़ी नहीं जायेंगे। आपके पास सेवा खुद चलकर आयेगी। तो जो सच्चा सेवाधारी है उस सेवाधारी को चलो और कोई सेवा नहीं मिली लेकिन बापदादा कहते हैं अपने चेहरे से, अपने चलन से सेवा करो। आपका चेहरा बाप का साक्षात्कार कराये। आपका चेहरा, आपकी चलन बाप की याद दिलावे। ये सेवा नम्बरवन है। ऐसे सेवाधारी जिनमें स्वार्थ भाव नहीं हो। ऐसे नहीं मुझे ही चांस मिले, मेरे को ही मिलना चाहिए। क्यों नहीं मिलता, मिलना चाहिए - ऐसे संकल्प को भी स्वार्थ कहा जाता है। चाहे ब्राह्मण परिवार में आपका नाम नामीग्रामी नहीं है, सेवाधारी अच्छे हो फिर भी आपका नाम नहीं है, लेकिन बाप के पास तो नाम है ना, जब बाप के दिल पर नाम है तो और क्या चाहिए! और सिर्फ बाप के दिल पर नहीं लेकिन जब फाइनल में नम्बर मिलेंगे तो आपका नम्बर आगे होगा। क्योंकि बापदादा हिसाब रखते हैं। आपको चांस नहीं मिला, आप राइट हो लेकिन चांस नहीं मिला तो वो भी नोट होता है। और मांग कर चांस लिया, वो किया तो सही लेकिन वो भी मार्कस कट होते हैं। ये धर्मराज का खाता कोई कम नहीं है। बहुत सूक्ष्म हिसाब-किताब है। इसलिए नि:स्वार्थ सेवाधारी बनो, अपना स्वार्थ नहीं हो। कल्याण का स्वार्थ हो। यदि आपको चांस है और दूसरा समझता है कि हमको भी मिले तो बहुत अच्छा और योग्य भी है तो अगर मानो आप अपना चांस उसको देते हो तो भी आपका शेयर उसमें जमा हो जाता है। चाहे आपने नहीं किया, लेकिन किसको चांस दिया तो उसमें भी आपका शेयर जमा होता है। क्योंकि सच्चा डायमण्ड बनना है ना। तो हिसाब-किताब भी समझ लो, ऐसे अलबेले नहीं चलो, ठीक है, हो गया...... बहुत सूक्ष्म में हिसाब-किताब का चौपड़ा है। बाप को कुछ करना नहीं पड़ता है, ऑटोमेटिक है। कभी-कभी बापदादा बच्चों का चौपड़ा देखते भी हैं। तो पहली बात परमत और दूसरी बात परचिन्तन।

तीसरी बात है परदर्शन। दूसरे को देखने में मैजारिटी बहुत होशियार हैं। परदर्शन - जो देखेंगे तो देखने के बाद वह बात कहाँ जायेगी? बुद्धि में ही तो जायेगी। और जो दूसरे को देखने में समय लगायेगा उसको अपने को देखने का समय कहाँ मिलेगा? बातें तो बहुत होती हैं ना, और जो बातें होती हैं वो देखने में भी आती हैं, सुनने में भी आती हैं, जितना बड़ा संगठन उतनी बड़ी बातें होती हैं। ये बातें क्यों होती हैं? कई सोचते हैं यह बातें होनी नहीं चाहिए। नहीं होनी चाहिये वो ठीक है लेकिन जिसके लिए आप समझ रहे हो नहीं होनी चाहिए, उसमें समय क्यों दिया? और ये बातें ही तो पेपर हैं। जितनी बड़ी पढ़ाई उतने बड़े पेपर भी होते हैं। यह वायुमण्डल बनना - यह सबके लिए पेपर भी है कि परमत या परदर्शन या परचिन्तन में कहाँ तक अपने को सेफ रखते हैं? दो बातें अलग हैं। एक है ज़िम्मेवारी, जिसके कारण सुनना भी पड़ता है, देखना भी पड़ता है। तो उसमें कल्याण की भावना से सुनना और देखना। ज़िम्मेवारी है, कल्याण की भावना है, वो ठीक है। लेकिन अपनी अवस्था को हलचल में लाकर देखना, सुनना या सोचना - यह रांग है। अगर आप अपने को ज़िम्मेवार समझते हो तो ज़िम्मेवारी के पहले अपनी ब्रेक को पॉवरफुल बनाओ। जैसे पहाड़ी पर चढ़ते हैं तो पहले से ही सूचना देते हैं कि अपनी ब्रेक को ठीक चेक करो। तो ज़िम्मेवारी भी एक ऊंची स्थिति है, ज़िम्मेवारी भले उठाओ लेकिन पहले यह चेक करो कि सेकण्ड में बिन्दी लगती है? कि लगाते हो बिन्दी और लग जाता है क्वेश्चनमार्क? वो रांग है। उसमें समय और इनर्जा वेस्ट जायेगी। इसलिए पहले अपना ब्रेक पॉवरफुल करो। चलो - देखा, सुना, जहाँ तक हो सका कल्याण किया और फुलस्टॉप। अगर ऐसी स्थिति है तो ज़िम्मेवारी लो, नहीं तो देखते नहीं देखो, सुनते नहीं सुनो, स्वचिन्तन में रहो। फायदा इसमें है।

तो आज का पाठ क्या हुआ? परमत, परचिन्तन और परदर्शन इन तीन बातों से मुक्त बनो और एक बात धारण करो, वो एक बात है पर-उपकारी बनो। तीन प्रकार की पर को खत्म करो और एक पर - पर-उपकारी बनो। बनना आयेगा? तो किन बातों से मुक्त बनेंगे? मातायें क्या करेंगी? बच्चों के उपकारी या पर-उपकारी? सर्व उपकारी। सहज है या कठिन है? जो नये-नये आये हैं वो समझते हैं यह सहज है कि मुश्किल है? टीचर्स बोलो-सहज है? (हाँ जी) नहीं, बापदादा समझते हैं मुश्किल है। बातें इतनी होती हैं, बड़ा मुश्किल है! अभी यहाँ बैठे हो तो सहज-सहज कह रहे हैं। फिर जब ट्रेन से उतरेंगे और कोई छोटी-मोटी बात हुई तो कहेंगे मुश्किल है। और घर गये, सेन्टर पर गये तो कोई न कोई बात पेपर लेने आयेगी ज़रुर। अच्छा-डबल विदेशियों को सहज लगता है या मुश्किल लगता है? अगर सहज लगता है तो हाथ उठाओ। टीचर्स तो नम्बरवन लेंगी ना? उस समय नहीं कहना कि हमको तो पता ही नहीं था, हमको यह ज्ञान ही नहीं था। इसीलिए बापदादा पहले से ही सुना रहे हैं - किसमें मार्क्स जमा होती है और किसमें मार्क्स कट होती हैं। अगर नम्बर लेना है तो मेकप करो। अभी कोई भी कर सकते हैं। सीट फिक्स कोई नहीं हुई है। सिवाए ब्रह्मा बाप और जगदम्बा के और सब सीट खाली हैं। कोई भी ले सकता है। एक साल वाला भी ले सकता है।

तो सदा क्या याद रखेंगे? अपनी विशेषताओं को याद रखो। विशेष समझेंगे तो यह खेल की बातें होंगी नहीं। तो विशेष हैं और सदा सारे कल्प में विशेष होंगे। और किसी भी धर्म नेता या महात्माओं की ऐसे विधिपूर्वक पूजा नहीं होती। जैसे देवताओं की पूजा होती है, वैसे किसी की भी नहीं होती। नेताओं को तो बिचारों को धूप में लटका देते हैं। अच्छा!

(फिर सभी ज़ोन के भाई बहिनों से बापदादा ने हाथ उठवाये)

अच्छा है, सभी को टर्न मिल जाता है। अभी ज्ञान सरोवर में अच्छे रहे पड़े हो। ज्ञान सरोवर में अच्छे हैं या यहाँ आना चाहते हो? पसन्द है ना? पंजाब को पसन्द है? भोपाल भी वहाँ है। भोपाल को अच्छा लगा? (बहुत अच्छा लगा) अच्छा, तो इन्हों को हमेशा वहीं भेजना। संगम पर इतना अच्छा प्रबन्ध मिला है। सतयुग में तो एक-एक महल ज्ञान सरोवर से भी बड़ा होगा लेकिन अभी संगम पर तो तीन पैर पृथ्वी भी अच्छी। और बापदादा ने तो देखा है। साकार में भी देखा है और वैसे तो देखते ही हैं। दूर भी नहीं है और प्रबन्ध भी अच्छा है। इसीलिए टर्न बाई टर्न किसको देना। दूसरे बारी पंजाब यहाँ आ जायेगा। अच्छा।

कुमारियों से

कुमारियाँ क्या कमाल करेंगी? कमाल करनी चाहिए ना! जो सब करते हैं अगर वही किया तो कमाल क्या हुई? तो ये कुमारियों का ग्रुप क्या करेगा? अगर आप नहीं बतायेंगे तो जो बापदादा बतायेगा वो करना पड़ेगा। नहीं तो आप लोग बता दो। इस डायमण्ड जुबली में कुमारियाँ क्या करेंगी? क्योंकि आप लोगों को तो अभी डायमण्ड जुबली का चांस है। फिर बाद में तो मिलेगा नहीं। तो कुमारियाँ क्या करेंगी, डायमण्ड जुबली को सामने रख करके फिर सोचो। पहले तो वे हाथ उठाओ जिनका लक्ष्य है कि हम सेवा में लगेंगी। खड़ी हो जाओ। अच्छा, इन्हों का फोटो निकालो। ये तो बहुत हैं। तो कुमारियों को क्या करना है? आप लोगों ने तो हाथ उठाया, खड़े भी हो गये और फोटो भी आपका निकल गया तो आप सभी को तो सेवा में लगना चाहिये, ये तो पक्का है ना? कि घर जाकर टीचर को कहेंगी कि नहीं, मैं तो नौकरी करूँगी। ऐसी तो नहीं हो? जिन्हों ने हाथ उठाया वो पक्की हो ना कि नौकरी करने वाली? सेवा करेंगी ना? अच्छा, जो निर्बन्धन है, सिर्फ पढ़ाई का एक साल है या थोड़ा सा है वो हाथ उठाओ, जो निर्बन्धन हो सकती हैं? अच्छा। क्योंकि बापदादा ने कहा है कि अभी समाप्ति का समय समीप आ रहा है। डेट नहीं बतायेंगे। लेकिन समीप आ रहा है उसी प्रमाण सेवा में वृद्धि तो होनी है ना। तो जो भी कुमारियाँ उठी थीं, वो अगर खुद निर्बन्धन नहीं हो सकतीं, कोई कारण है तो अपने कोई न कोई हमजिन्स कुमारी को तैयार ज़रुर करो। मानो आपको घर का बन्धन है। स्वयं अगर निर्बन्धन नहीं हो सकती तो कोई एक को तैयार ज़रुर करो। यह कर सकती हो? एक साल है, एक साल में एक को आप समान नहीं बना सकते? बनाना पड़ेगा ना। तो हर एक कुमारी जो स्वयं सेवा में लगनी है वो लगेंगी लेकिन अगर कोई स्वयं नहीं लग सकती है तो अपने हमजिन्स को तैयार करो। पसन्द है कुमारियों को? हाँ या ना बोलो? सोच रही हैं। अच्छा, पंजाब की कुमारियाँ हाथ उठाओ। पंजाब वाले सब मिलकर बोलो कि ये सेवा करेंगी? पंजाब का शेर कहाँ गया? क्यों आंतकवादियों से घबरा गये क्या? पंजाब को शेर कहते हैं तो शेर तो आगे आना चाहिये ना, घर में थोड़ेही बैठना चाहिए। तो कुमारियों को अपने हम जिन्स को तैयार करना है। क्योंकि देखो भाई सभी हंसते हैं कि कुमारियाँ तीन साल की ट्रायल वाली भी होंगी, और कुमार 40 साल के पुराने होंगे, तो सेन्टर पर रहने वाली कुमारी को दीदी-दादी कहना शुरू कर देते और कुमारों को दादा कोई नहीं कहते। कुमारों की ये रिपोर्ट है ना, उलहना है। अच्छा, कुमार हाथ उठाओ।

कुमारों से

कुमार दादा तो नहीं बनेंगे, दादा तो कोई नहीं कहेगा लेकिन राजा बन सकते हैं। डायमण्ड जुबली में कुमार कम से कम आठ मोतियों का एक-एक कंगन वा माला तैयार करो। अष्ट का गायन है ना। तो आपकी प्रजा बन जायेगी और प्रजा बनाने से आप राजा बन जायेंगे। कुमारियों को दादी-दीदियाँ बनने दो। आप और ही राजा बन जाओ। कुमार तो बहुत हैं, अगर एक-एक आठ भी लावे तो प्रजा बन जायेगी। और प्रजा तैयार हो गई तो आपको राजतिलक ज़रुर मिलेगा। क्योंकि बहुत करके अभी वारिस क्वालिटी कम निकलती है। अगर कुमारों ने एक भी वारिस क्वालिटी निकाल दिया तो महाराजा बन जायेंगे। कुमार तैयार हैं? समझते हो वारिस किसको कहते हैं? साधारण तो आते ही रहते हैं ना लेकिन वारिस जो होगा उस एक को देख करके और अनेक भी आयेंगे। उसको कहते हैं वारिस क्वालिटी, छोटे-छोटे माइक। तो कुमार राजा बनेंगे ना! (हाँ जी) अच्छा, यहाँ मधुबन में हाँ जी है या पंजाब और बाम्बे या जहाँ भी जायेंगे वहाँ भी हाँ जी होंगे?

कुमारों को देख करके बापदादा खुश होते हैं। सिर्फ कुमार, कुमारियों से बाप को एक बात का डर भी लगता है। खुशी भी होती है तो डर भी लगता है। समझदार हो ना कुमार, बोलने की आवश्यकता नहीं। बस इसमें सदा एक बाप दूसरा न कोई, थोड़ा-थोड़ा भी नहीं। क्या करूँ.. थोड़ा सा तो चाहिए...ऐसा नहीं। ये ऐसी माया है जो देखा है ना, गज और ग्राह की कहानी सुनी है ना, वो क्या करता है? पहले थोड़ा अन्दर करेगा, फिर पूरा अन्दर कर लेता है। पता नहीं पड़ेगा। तो डायमण्ड जुबली में यह डर तो निकाल लेना। ऐसा एक भी पत्र नहीं आना चाहिए। डायमण्ड जुबली अर्थात् कुछ कमी नहीं है। तो बापदादा देखेंगे कि हाथ तो सभी ने उठाया लेकिन राजा कितने बने वो भी लिस्ट आ जायेगी ना! अच्छा।

प्रवृत्ति वालों से

प्रवृत्ति वालों को बापदादा एक बात के लिए मुबारक देते हैं कि जब से प्रवृत्ति मार्ग वाले सेवा साथी बने हैं तो सेवा में नाम बाला करने में एग्ज़ाम्पल बने हैं। पहले लोग समझते थे कि ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी बनना माना घरबार छोड़ना.... यह डर था ना। और अभी समझते हैं कि इन्हों का तो घर भी बहुत अच्छा चलता, धन्धा भी बहुत अच्छा चलता, खुद भी खुश रहते, तो यह देख करके समझते हैं कि हम भी बन सकते हैं। तो एग्ज़ाम्पल बन गये ना। पहले कहते थे हमारा बनना मुश्किल है और अभी कहते हैं कि पवित्र प्रवृत्ति में रहना अच्छा है। तो सेवा में वृद्धि के लिए निमित्त बन गये ना - इसकी मुबारक हो। अभी प्रवृत्ति वाले क्या करेंगे? मुबारक में तो खुश हो गये। अभी कुछ करना भी तो हैं ना।

बापदादा का डायमण्ड जुबली के प्रति एक शुभ संकल्प है कि जो प्रवृत्ति में रहते हैं, एग्ज़ाम्पल हैं, लौकिक और अलौकिक सेवा भी करते हैं, डबल सेवाधारी हैं, तो हर एक प्रवृत्ति वाले ऐसी माला तैयार करो जो हर सेवाकेन्द्र पर हर वर्ग का कोई न कोई ज़रुर हो। जो भी हमारे 13 भिन्न-भिन्न वर्ग बने हुए हैं, उस हर वर्ग का ग्रुप हो जिसमें सब वर्ग हों, कोई भी वर्ग नहीं रह जाये, बड़ा ज़मीनदार भी हो, साइंसदान भी हो ....., सब वर्ग के हों, ऐसी वर्गों की भिन्न-भिन्न माला प्रवृत्ति वाले हर सेवाकेन्द्र पर तैयार करें। कम से कम सब वर्गों का एक-एक तो होना ही चाहिए लेकिन हर सेन्टर पर हर वर्ग का हो। तो सभी वर्गों के तैयार करो फिर सभी सेन्टर के सभी वर्गों की डायमण्ड जुबली मनायेंगे। समझा? प्रवृत्ति वालों को पसन्द है। हर सेवाकेन्द्र पर हर वर्ग का होना चाहिए, कम से कम एक। बाकी ज्यादा होंगे तो महाराजा बन जायेंगे। माताओं को पसन्द है? कि महिलायें सिर्फ महिलायें ले आयेंगी, महिलाओं में भी कोई वकील है, कोई डॉक्टर है। अच्छा!

डबल विदेशियों से

डबल विदेशी क्या करेंगे? लण्डन वाले बताओ क्या करेंगे? माइक तैयार करेंगे। तो कांफ्रेंस तक माइक आयेंगे या अभी तैयार हो रहे हैं? अच्छी बात है, अगर डबल विदेशी हर एक स्टेट से एक-एक माइक भी लायें तो कितने माइक हो जायेंगे? फिर माइक की सेरीमनी करेंगे। ठीक है? अच्छा, सभी को याद-प्यार मिल गया?

कर्नाटक वाले खुश है? पंजाब खुश है? बाम्बे खुश है? भोपाल खुश है? आन्ध्रा वाले खुश हैं? यू.पी. नेपाल खुश है? नेपाल की टोपियाँ होती हैं, अच्छे लगते हैं। ये कलियुग के ताज हैं।

अच्छा, टीचर्स सभी खुश हैं? देखो, मुरली तो नयों के हिसाब से गुह्य है लेकिन बापदादा को डायमण्ड जुबली में सभी से मुक्त कराना ही है। नहीं करेंगे तो धर्मराज बनेंगे। अभी तो प्यार से कह रहे हैं, फिर धर्मराज का साथ लेना पड़ेगा ना। लेकिन क्यों लें? क्यों नहीं बाप के रूप से ही सब मुक्त हो जायें। पुराने-पुराने सोचते हैं कि बापदादा ऐसा कुछ करें ना तो सब ठीक हो जायें। लेकिन बाप नहीं चाहते। बाप को धर्मराज का साथ लेना पसन्द नहीं है। कर क्या नहीं सकता है! एक सेकण्ड में किसी को भी अन्दर ही अन्दर सज़ा दे सकते हैं और वो सेकण्ड की सज़ा बहुत-बहुत तेज़ होती है। लेकिन बापदादा नहीं चाहते। बाप का रूप प्यारा है, धर्मराज साथी बना तो कुछ नहीं सुनेगा। इसलिए बापदादा को डायमण्ड जुबली में सभी को सब बातों से मुक्त करना ही है। समझा?

चारों तरफ के सर्व विश्व के विशेष आत्माओं को सदा स्वचिन्तन, ज्ञान चिन्तन करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बाप के श्रेष्ठ मत पर हर संकल्प, बोल और कर्म करने वाले समीप आत्माओं को, चारों ओर के डायमण्ड जुबली के लिए स्वयं को और सेवा को आगे बढ़ाने वाले-ऐसे विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से

दैवी परिवार का विशेष श्रृंगार है ना। तो श्रृंगार को देख करके क्या होता है? खुशी होती है कि ये होता है कि हम भी ऊपर चलें? लोक संग्रह करने वाले हो ना।

वैसे बापदादा का एक-एक बच्चे से एक-दो से ज्यादा प्यार है। ऐसे नहीं, दादियों से बहुत है, टीचर्स से बहुत है, स्टूडेन्ट से कम। नहीं, सभी से प्यार है और सदा ही रहेगा। अगर प्यार नहीं होता तो शिक्षा क्यों देते? ये शिक्षा भी प्यार है। क्योंकि बाप बच्चों को किसी भी बात में कम नहीं देखना चाहते। हर एक को आगे देखना चाहते हैं। ऐसे नहीं, दादियाँ तो ठीक हो गईं, आप लोग होवे या नहीं..... पहले आप। इसीलिए ही आते हैं। चाहे गला चले या नहीं चले लेकिन चलाते हैं। जब बच्चे दूर-दूर से, बुजुर्ग भी आते हैं, छोटे भी आते हैं, सब आते हैं तो बाप कैसे नहीं आयेंगे! ज़रुर आयेंगे। तो दादियों से प्यार ज्यादा है वा टीचर्स से ज्यादा है वा स्टूडेन्ट्स से ज्यादा है? किससे है? सभी से। चाहे बापदादा सभी को नज़दीक भी नहीं बिठा सकते, नाम भी नहीं ले सकते लेकिन दिल पर नाम सबका है। दिल के नज़दीक सभी हो। समझा? अच्छा! तो यह ब्राह्मण संसार का श्रृंगार अच्छा लगता है ना। देखो फाउण्डेशन से कितने थोड़े बचे हैं। जब आदि में आये और अभी देखो तो कितने थोड़े बचे। डायमण्ड जुबली वाले तो कितने चले गये।

मीटिंग के मुख्य भाइयों से

अच्छी मेहनत कर रहे हो। बापदादा के पास तो सब समाचार पहुँचता है। जब सभी मिलकर किसी भी कार्य को करते हैं तो आप भी अनुभव करते होंगे वो कार्य सहज भी और सफल भी होता है। और यह आपस में मिलना जल्दी-जल्दी होना चाहिये। क्योंकि यज्ञ के जो स्थूल कारोबार है, खाना-पीना छोड़ो, वो तो इन्हों का काम है, लेकिन जो ऑफिशिअल कारोबार है वो तो आप लोग ही समझ सकते हो। इसीलिए कार्य बढ़ता जाता है और जब 9 लाख बनाना है तो कार्य कितना बढ़ेगा! बहुत बढ़ेगा ना! तो आप लोगों को आपस में जल्दी-जल्दी मिलना चाहिये। फोन और फैक्स का मिलना और है, और सम्मुख मिलने से एक-दो के विचार क्लीयर कर सकते हैं। अगर नहीं भी हुआ तो करा भी सकते हैं। इसीलिए आपस में राय करना। जब एक मीटिंग पूरी करते हो ना तो दूसरे की डेट पहले से ही फिक्स करो। अच्छा।

आप लोगों से पूछने की आवश्यकता नहीं कि खुशराजी हो? बस निमित्त हैं, तो निमित्त समझने से नेचरली ज़िम्मेवारी भी है और हल्कापन तो रहेगा ही। अच्छा।



04-12-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘यथार्थ निश्चय के फाउण्डेशन द्वारा सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करो’’

आज बापदादा देश-विदेश चारों ओर के नये-नये बच्चों को देख रहे थे। चाहे मधुबन में साकार रूप में आये हैं, चाहे आकार रूप में अपने- अपने सेवा-स्थान में आये हुए हैं, तो नयों-नयों को देख बापदादा सभी के निश्चय को देख रहे थे। क्योंकि निश्चय इस ब्राह्मण जीवन के सम्पन्नता का फाउण्डेशन है और फाउण्डेशन मज़बूत है तो सहज और तीव्र गति से सम्पूर्णता तक पहुँचना निश्चित है। तो बापदादा देख रहे थे कि निश्चय भी भिन्नभिन्न प्रकार का है। जो यथार्थ निश्चय है कि मैं परमात्मा बाप का बन गया, स्वयं को भी आत्म-स्वरूप में जानना, मानना, चलना और बाप को भी जो है वैसे जानना - ये है यथार्थ निश्चय।

दूसरा निश्चय है -योग द्वारा थोड़े समय के लिए अशान्ति से शान्ति का अनुभव करते हैं और स्थान का शक्तिशाली शान्त वायुमण्डल आकर्षित करता है वा ब्राह्मण परिवार, ब्राह्मण आत्माओं का आत्मिक प्यार और पवित्रता की जीवन का प्रभाव पड़ता है, कम्पनी अच्छी लगती है, दुनिया के वायुमण्डल के कान्ट्रास्ट में ये संग अच्छा लगता है, ज्ञान भी अच्छा, परिवार भी अच्छा, वायुमण्डल भी अच्छा ..... तो वो अच्छा लगना, उस फाउण्डेशन के आधार पर चलते रहते हैं। ये है दूसरा नम्बर। पहला नम्बर सुनाया यथार्थ निश्चयऔर दूसरा नम्बर अच्छा लगता हैऔर तीसरा नम्बर - दुनिया के सम्बन्धियों के दु:खमय वातावरण से बचकर जितना समय भी सेवाकेन्द्र पर आते हैं उतना समय दु:ख से किनारा होकर शान्ति का अनुभव करते हैं। ज्ञान की गुह्यता में नहीं जायेंगे लेकिन शान्ति की प्राप्ति के कारण कभी आते हैं और कभी नहीं भी आते हैं। लेकिन यथार्थ निश्चय बुद्धि विजयी होते हैं। और देखा जाता है कि जब शुरू- शुरू में आते हैं तो अशान्ति से तंग होते हैं, शान्ति के इच्छुक होते हैं। तो जैसे प्यासे को एक बूंद भी अगर पानी की मिल जाये तो वो बहुत बड़ी बात अनुभव करता है। तो अप्राप्ति से प्राप्ति होती है, परिवार में, ज्ञान में, योग में, वायुमण्डल में अन्तर दिखाई देता है। तो पहला समय बहुत अच्छे उमंग- उत्साह से चलते हैं, बहुत नशा रहता है, खुशी भी होती है। लेकिन अगर पहले नम्बर के यथार्थ निश्चय का फाउण्डेशन पक्का नहीं है, दूसरे या तीसरे नम्बर का निश्चय है तो धीरे-धीरे जो शुरू की खुशी, शुरू का जोश है, उसमें फर्क आ जाता है।

इस सीज़न में नये-नये बहुत आये हैं और चांस भी मिला है, यह तो बहुत अच्छा है। बापदादा को भी नये-नये बच्चों को देख खुशी होती है कि ये फिर से अपने परिवार में पहुँच गये। लेकिन ये चेक करो कि निश्चय का फाउण्डेशन पक्का है? हमारा निश्चय नम्बरवन है वा नम्बर टू है? अगर नम्बरवन निश्चय है तो चलते-चलते मुख्य पवित्रता धारण करने में मुश्किल नहीं लगेगा। अगर पवित्रता स्वप्न मात्र भी हिलाती है, हलचल में आती है, तो समझो नम्बरवन फाउण्डेशन कच्चा है। क्योंकि आत्मा का स्वधर्म पवित्रता है। अपवित्रता परधर्म है और पवित्रता स्वधर्म है। तो जब स्वधर्म का निश्चय हो गया तो परधर्म हिला नहीं सकता। कई बच्चे कहते हैं कि पहले तो बहुत अच्छे आते थे, अभी पता नहीं क्या हो गया? तो क्या हो जाता है कि बाप जो है, जैसा है, वैसे अनुभव में नहीं लाते। अगर पूछेंगे कि बाप साथ है? तो हाथ सब उठायेंगे। हाथ उठाना तो बहुत सहज है। लेकिन बाप साथ है तो बाप की पहली-पहली जो महिमा करते हो कि वो सर्वशक्तिमान है - ये मानते हो या सिर्फ जानते हो? तो जब सर्वशक्तिमान बाप साथ है तो सर्वशक्तिमान के आगे अपवित्रता आ सकती है? नहीं आ सकती। लेकिन आती तो है, तो आती फिर कहाँ से है? कोई और जगह है? चोर लोग जो होते हैं वो अपना स्पेशल गेट बना लेते हैं। चोर गेट होता है। तो आपके पास भी छिपा हुआ चोर गेट तो नहीं है? चेक करो। नहीं तो माया आई कहाँ से? ऊपर से आ गई? अगर ऊपर से भी आ गई तो ऊपर ही खत्म हो जानी चाहिये। कोई छिपे हुए गेट से आती है जो आपको पता नहीं पड़ता है तो चेक करो कि माया ने कोई चोर गेट तो नहीं बनाकर रखा है? और गेट बनाती भी कैसे है, मालूम है? आपके जो विशेष स्वभाव या संस्कार कमज़ोर होंगे तो वहीं माया अपना गेट बना देती है। क्योंकि जब कोई भी स्वभाव या संस्कार कमज़ोर है तो आप कितना भी गेट बन्द करो, लेकिन कमज़ोर गेट है, तो माया तो जानीजाननहार है, उसको पता पड़ जाता है कि ये गेट कमज़ोर है, इससे रास्ता मिल सकता है और मिलता भी है। चलते- चलते अपवित्रता के संकल्प भी आते हैं, बोल भी होता, कर्म भी हो जाता है। तो गेट खुला हुआ है ना, तभी तो माया आई। फिर साथ कैसे हुआ? कहने में तो कहते हो कि सर्वशक्तिमान साथ है तो ये कमज़ोरी फिर कहाँ से आई? कमज़ोरी रह सकती है? नहीं ना? तो क्यों रह जाती है? चाहे पवित्रता में कोई भी विकार हो, मानो लोभ है, लोभ सिर्फ खाने-पीने का नहीं होता। कई समझते हैं हमारे में पहनने, खाने या रहने का ऐसा तो कोई आकर्षण नहीं है, जो मिलता है, जो बनता है, उसमें चलते हैं। लेकिन जैसे आगे बढ़ते हैं तो माया लोभ भी रॉयल और सूक्ष्म रूप में लाती है। वो रॉयल लोभ क्या है? चाहे स्टूडेण्ट हो, चाहे टीचर हो, माया दोनों में रॉयल लोभ लाने का फुल पुरूषार्थ करती है। मानो स्टूडेण्ट है, बहुत अच्छा निश्चयबुद्धि, सेवाधारी है, सबमें अच्छा है लेकिन जब आगे बढ़ते हैं तो ये रॉयल लोभ आता है कि मैं इतना कुछ करता हूँ, सब रूप (तरह) से मददगार हूँ, तन से, मन से, धन से और जिस समय चाहिये उस समय सेवा में हाज़र हो जाता हूँ फिर भी मेरा नाम कभी भी टीचर वर्णन नहीं करती कि ये जिज्ञासु बहुत अच्छा है। अगर मानों ये भी नहीं आवे तो फिर दूसरा रूप क्या होता है? अच्छा, नाम ले भी लिया तो नाम सुनते-सुनते-मैं ही हूँ, मैं ही करता हूँ, मैं ही कर सकता हूँ, वो आभिमान के रूप में आ जायेगा। या बहुत काम करके आये और किसी ने आपको पूछा भी नहीं, एक गिलास पानी भी नहीं पिलाया, देखा ही नहीं, अपने आराम में या अपने काम में बिज़ी रहे, तो ये भी आता है कि करो भी और पूछे भी कोई नहीं। तो करना ही क्या है, करना या ना करना एक ही बात है। पूछने वाला तो कोई है नहीं, इससे आराम से घर में बैठो, जब होगा तब सेवा करेंगे। तो ये भिन्न-भिन्न प्रकार का विकारों का रॉयल रूप आता है। और एक भी विकार आ गया ना, मानो लोभ नहीं आया लेकिन अभिमान आ गया या अपने मानने तक का, हमारी मान्यता हो - उसका भान आ गया तो जहाँ एक विकार होता है वहाँ उनके चार साथी छिपे हुए रूप में होते हैं। और एक को आपने चांस दे दिया तो वो छिपे हुए जो हैं वो भी समय प्रमाण अपना चांस लेते रहते हैं। फिर कहते हैं कि पहले जैसा नशा अभी नहीं है, पहले बहुत अच्छा था, पहले अवस्था बड़ी अच्छी थी, अभी पता नहीं क्या हो गया है। माया चोर गेट से आ गई - ये है पता, ये नहीं कहो पता नहीं।

और टीचर को भी आता है। टीचर को क्या चाहिये? सेन्टर अच्छा हो, कपड़े भले कैसे भी हो लेकिन सेन्टर थोड़ा रहने लायक तो अच्छा हो। और जो साथी हो वो अच्छे हो, स्टूडेण्ट अच्छे हो, बाबा की भण्डारी अच्छी हो। अगर अच्छा स्टूडेन्ट चेंज हो जाये तो दिल थोड़ा धड़कता है। फिर समझते हैं कि क्या करें, ये मददगार था ना, अभी वो चला गया। मददगार जिज्ञासु था वा बाप है? तो उस समय कौन दिखाई देता है? जिज्ञासु या बाप? तो ये रॉयल माया फाउण्डेशन को हिलाने की कोशिश करती है। अगर आपको निश्चय है-सर्वशक्तिमान साथ है तो बाप किसी न किसी को निमित्त बना ही देता है। कई फिर सोचते हैं हमें कम से कम एक बार आबू की कांफ्रेंस में या किसी बड़ी कांफ्रेंस में चांस मिलना चाहिए, चलो और नहीं, योग शिविर तो करा लें, ये भी तो चांस होना चाहिये ना, चलो भाषण नहीं करे, स्टेज पर तो आवें, आखिर विनाश हो जायेगा, क्या विनाश तक भी हमारा नम्बर नहीं आयेगा, नम्बर तो आना चाहिये ना! लेकिन पहले भी बापदादा ने सुनाया कि अगर योग्य हैं, चांस मिलता है तो खुशी से करो लेकिन ये संकल्प करना कि हमें चांस मिलना चाहिए...... यह भी मांगना है। चाहिये-चाहिये ये है रॉयल मांगना। ये होना चाहिये..... ये हमें पहचानते नहीं हैं, दादी-दीदियाँ भी सभी को पहचानती नहीं हैं, जो आगे आते हैं उसको आगे कर लेते हैं-तो ये संकल्प आना यह भी एक सूक्ष्म मांगना है। लेकिन बापदादा ने सुना दिया है कि मानों आप स्टेज पर आ गई या आपकी कोई भी विशेषता के कारण, योग नहीं भी है, अवस्था इतनी अच्छी नहीं है लेकिन बोल में, कैचिंग पॉवर में विशेषता है तो चांस मिल जाता है, क्योंकि किसी की वाणी में मिठास होता है, स्पष्टता होती है और कैचिंग पावर होती है तो यहाँ के वहाँ के मिसाल वगैरह कैच करके सुनाते हैं इसीलिए उन्हों का नाम भी हो जाता है। कौन चाहिये? फलानी चाहिये। कौन आवे? फलानी आवे, चाहे योग में कच्ची भी हो.... तो इस पर नम्बर फाइनल नहीं होने हैं। जो फाइनल नम्बर मिलेंगे वो ये नहीं होगा कि इसने कितने भाषण किये या इसने कितने स्टूडेण्ट वा सेन्टर बनाये हैं, लेकिन योग्य कितनों को बनाया है? सेन्टर बनाना बड़ी बात नहीं है लेकिन योग्य कितनी आत्माओं को बनाया? नाम हो गया-30 सेन्टर की इंचार्ज है और 30 में से 15 हिल रहे हैं, 15 ठीक हैं तो फायदा हुआ या सिर्फ नाम हुआ? सिर्फ नाम होता है कि फलानी के 30 सेवाकेन्द्र हैं। लेकिन नम्बर इससे नहीं मिलेगा। फाइनल नम्बर जितनों को सुख दिया, जितना स्वयं शक्तिशाली रहे, उसी प्रमाण मिलेंगे। इसीलिये ये भी चाहिये-चाहिये खत्म कर दो। नहीं तो योग नहीं लगेगा। रोज़ यही देखते रहेंगे कि फलानी जगह प्रोग्राम हुआ मेरे को फिर भी नहीं बुलाया, अभी परसों यहाँ हुआ, कल वहाँ हुआ, आज यहाँ हुआ! तो योग लगेगा या गिनती होती रहेगी?

तो मुख्य बात - जो यथार्थ निश्चय है उसको पक्का करो। कहने में तो कह देते हो मैं आत्मा हूँ और बाप सर्वशक्तिमान है लेकिन प्रैक्टिकल में, कर्म में आना चाहिये। बाप सर्वशक्तिमान है लेकिन मेरे को माया हिला रही है तो कौन मानेगा आपका बाप सर्वशक्तिमान है! क्योंकि उससे ऊपर तो कोई है नहीं। तो बापदादा आज निश्चय के फाउण्डेशन को देख रहे हैं। चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं लेकिन इस निश्चय के फाउण्डेशन को प्रैक्टिकल में लाओ और समय पर यूज़ करो। समय बीत जाता है फिर बाप के आगे पश्चाताप के रूप में आते हो-क्या करें, बाबा हो गया, आप तो रहमदिल हो, रहम कर दो......तो ये क्या हुआ? ये भी रॉयल पश्चाताप है। साथ है तो किसी की हिम्मत नहीं है, निश्चयबुद्धि का अर्थ ही है विजयी। अगर कोई हिसाब-किताब आता भी है तो मन को नहीं हिलाओ। स्थिति को नीचे-ऊपर नहीं करो। चलो आया और फट से उसको दूर से ही खत्म कर दो। अभी योद्धे नहीं बनो। कई अभी निरन्तर योगी नहीं हैं। कुछ समय योगी हैं और कुछ समय युद्ध करने वाले योद्धे हैं। लेकिन अपने को कहलाते क्या हो? योद्धे कि योगी? कहलाते तो सहजयोगी हो। तो नये जो भी आये हैं उनको बापदादा फिर से भाग्य प्राप्त करने की मुबारक देते हैं। लेकिन मुबारक के साथ ये चेक भी करना कि फाउण्डेशन नम्बरवन है या नम्बर दो का है?

कई कहते हैं ज्ञान-योग बहुत अच्छा लगता है, अच्छा है वो तो ठीक है लेकिन कर्म में लाते हो? ज्ञान माना आत्मा, परमात्मा, ड्रामा....यह कहना नहीं। ज्ञान का अर्थ है समझ। समझदार जैसा समय होता है वैसे समझदारी से सदा सफल होता है। कभी भी देखो जीवन में दु:ख आते हैं तो क्या सोचते हो? पता नहीं, मुझे यह क्यों नहीं समझ में आया - यहीं कहेंगे। तो समझदार हो? ज्ञानी हो? बोलो हाँ या ना? (हाँ जी) हाँ तो बहुत अच्छी बोलते हैं। समझदार की निशानी है कभी धोखा नहीं खाना - ये है ज्ञानी की निशानी, और योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लियर बुद्धि। क्लीन भी हो और क्लियर भी हो। योगी कभी नहीं कहेगा-पता नहीं, पता नहीं। उनकी बुद्धि सदा ही क्लियर है। और धारणा स्वरूप की निशानी है सदा स्वयं भी डबल लाइट। कितनी भी ज़िम्मेवारी हो लेकिन धारणामूर्त, सदा डबल लाइट। चाहे मेला हो, चाहे झमेला हो-दोनों में डबल लाइट। और सेवाधारी की निशानी है-सदा निमित्त और निर्माण भाव। तो ये सभी अपने में चेक करो। कहने में तो सभी कहते हो ना कि चारों ही सब्जेक्ट के गॉडली स्टूडेण्ट हैं। तो निशानी दिखाई देनी चाहिये।

तो नये-नये क्या करेंगे? अपने निश्चय को और पक्का करना। नहीं तो फिर क्या होता है दो साल चलेंगे, तीन साल चलेंगे फिर वापस पुरानी दुनिया में चले जायेंगे। और फिर जो वापस जाते हैं वो उस दुनिया में भी सेट नहीं हो सकते हैं। न इस दुनिया के रहते, न उस दुनिया के। इसलिए अपना फाउण्डेशन बहुत पक्का करो। अनुभव करो-सर्वशक्तिमान बाप साथ है। बस एक बात भी अनुभव किया तो सबमें पास हो जायेंगे। रिवाज़ी प्राइम मिनिस्टर है, मिनिस्टर है उसके साथ का भी नशा रहता है। ये तो सर्वशक्तिमान है! अच्छा!

जो इस कल्प में पहले बारी आये हैं वो हाथ उठाओ। जो पहली बार आये हैं वो सदा खुश रहना और सदा आबाद रहना। अच्छा-टीचर्स भी बहुत आती हैं। एक साल में कितने चांस मिलते हैं? एक ही मिलता है। 12 मास को 13 मास तो कर नहीं सकते। बापदादा को तो दिल होती है टीचर्स ऐसे रिफ़्रेश हो जायें, शक्तिशाली बन जायें जो किसी भी सेन्टर पर कोई भी जाये तो एक आत्मा भी कमज़ोर नहीं दिखाई दे। निर्विघ्न सेवाकेन्द्र, उसको ही मार्क्स मिलती हैं। बापदादा इसमें खुश नहीं होते कि इस ज़ोन में हज़ार सेन्टर हैं, हज़ार गीता पाठशालायें हैं। बापदादा खुश होते हैं जिस ज़ोन में कोई खिटखिट नहीं हो, कोई कंप्लेंट नहीं हो। क्योंकि वास्तव में मानो टीचर मेहनत कर रही है और कमज़ोर संस्कार ही माया के आने का चोर गेट है। 52 खिटखिट भी हो रही है, वातावरण वैसे का वैसा है तो क्या वो सेवा है? कि झमेला है? तो आये किसलिए? ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारियां किसलिए बनें? झमेले के लिए? अगर झमेले ही चाहियें तो दुनिया में बहुत जगह हैं। बापदादा वहाँ का एड्रेस भी दे सकते हैं। लेकिन ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ बनना माना मिलन मेला मनाना, न कि झमेला। देखो अभी आये हो तो किस लक्ष्य से आये हो? झमेले के लिए आये हो? मिलन मनाने आये हो तो अच्छा लगता है ना! तो कभी भी, कोई भी स्टूडेन्ट हो वा टीचर हो, हैं तो सभी स्टूडेन्ट-कभी भी झमेला नहीं करो। झमेला करना अर्थात् क्या कहें! बापदादा को कहना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए चाहे टीचर, चाहे मधुबन, चाहे मधुबन के उप सेवाकेन्द्र, गीता पाठशालायें या आपके ज़ोन के उपसेवाकेन्द्र या केन्द्र, जो भी अपने को ब्राह्मण आत्मा कहलाते हैं, नहीं तो अपने को ब्राह्मण नहीं कहलाओ, क्षत्रिय कहलाओ, ब्राह्मण नाम को खराब नहीं करो। ब्राह्मण माना विजयी। अगर झमेला करते हैं तो क्षत्रिय हैं, न कि ब्राह्मण।

तो आज का पाठ क्या पक्का करेंगे? कौन सा संकल्प करेंगे? हर एक को मन, वाणी, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क में झमेला मुक्त बनना है। झमेला नहीं होना चाहिये। रोज़ चेक करो। ये व्यर्थ संकल्प का भी झमेला है। दूसरे के साथ नहीं है लेकिन अपने मन में तो झमेला है। तो सभी क्या संकल्प करेंगे? क्या बनेंगे? बोलो, झमेला मुक्त। क्योंकि डायमण्ड जुबली आ रही है तो डायमण्ड जुबली में झमेला वाला डायमण्ड चाहिये क्या? आप लोग पसन्द करेंगे? या बहुत सुन्दर डायमण्ड के बीच में दो-चार झमेले वाले डायमण्ड हों तो पसन्द करेंगे? नहीं करेंगे। लेकिन इसकी बहुत सहज विधि है, मेहनत करने की भी ज़रुरत नहीं। झमेला मुक्त होने की विधि सबसे सहज है कि पहले स्वयं को झमेले मुक्त करो। दूसरे के पीछे नहीं पड़ो। ये स्टूडेन्ट ऐसा है, ये साथी ऐसा है, ये सरकमस्टांस ऐसे हैं-उसको नहीं देखो लेकिन अपने को झमेला मुक्त करो। जहाँ झमेला हो वहाँ अपने मन को, बुद्धि को किनारे कर लो। आप सोचते हो-ये झमेला पूरा होगा तो बहुत अच्छा हो जायेगा, हमारी सेवा भी अच्छी, हमारी अवस्था भी अच्छी हो जायेगी। लेकिन झमेले पहाड़ के समान हैं। क्या पहाड़ से माथा टकराना है? पहाड़ हटेगा क्या? स्वयं किनारा कर लो या उड़ती कला से झमेले के पहाड़ के भी ऊपर चले जाओ। तो पहाड़ भी आपको एकदम सहज अनुभव होगा। मुझे बनना है। अमृतवेले से ये स्वयं से संकल्प करो कि मुझे झमेला मुक्त बनना है। बाकी तो है ही झमेलों की दुनिया, झमेले तो आयेंगे ही। आपकी दुनिया आपका सेवाकेन्द्र है तो आपकी दुनिया ही वो है, तो वहाँ ही आयेंगे ना। आप पेपर देने के लिए अमेरिका, लण्डन जायेंगी क्या? सेन्टर पर ही देंगी ना! तो झमेला नहीं आवे-यह नहीं सोचो। झमेला मुक्त बनना है-ये सोचो। हो सकता है? कि वहाँ सेन्टर पर या घर में जायेंगे तो कहेंगे कि ये झमेला तो मेरे से नहीं होगा। ऐसे तो नहीं? जब बाप ने कहा है कि पुरानी दुनिया से, पुरानी दुनिया के प्राप्तियों से अभी अपने मन और बुद्धि को ऊंचा करो। पुरानी दुनिया से लंगर उठा लिया कि अभी लगा हुआ है? बंधा हुआ तो नहीं है? वो कहानी सुनाते हैं ना तो अन्जान रहना ये भी अन्धकार है। वो अन्धकार नहीं लेकिन अन्जान रहना भी अन्धकार है। तो अन्धकार में नहीं रह जाना। अच्छी तरह से चेक करो। देखेंगे, ये झमेला मुक्त नम्बरवन कौन सा सेवाकेन्द्र या मधुबन बनता है?

मधुबन वालों को भी बनना है। ऐसे नहीं जो ग्रुप आया है उनको ही बनना है। मधुबन वाले नीचे बैठे हैं ना। (ओम् शान्ति भवन का हाल फुल होने के कारण सभी पाण्डव भवन में मुरली सुन रहे हैं) चाहे यहाँ बैठे हैं, चाहे नीचे बैठे हैं, लेकिन बापदादा के तो सामने हैं। आप टी.वी. के सामने हो, बापदादा आपके सामने है। तो मधुबन वाले या जो भी देश-विदेश सभी इसमें नम्बरवन बनो फिर डायमण्ड जुबली बहुत धूमधाम से मनायेंगे। अभी बापदादा को थोड़ा- थोड़ा होता है कि क्या सभी मुक्त हो जायेंगे! लेकिन ये बापदादा का संकल्प ठीक नहीं है, ऐसे ना? बाप को तो बच्चों पर निश्चय है ना! लेकिन थोड़ा-थोड़ा आता है - क्या करेंगे! बाकी है ही क्या? एक मास। डायमण्ड जुबली तो जनवरी से शुरू है। डायमण्ड जुबली के बीच में करेंगे, आरम्भ में करेंगे, क्या करेंगे? बताओ, राय बताओ कि डायमण्ड जुबली के आरम्भ में मुक्त हो जायेंगे या समाप्ति में मुक्त होंगे? जो समझते हैं थोड़ा समय तो चाहिये, इतने में कैसे हो जायेंगे, 63 जन्म के संस्कार हैं, एक मास में खत्म हो जायेंगे-मुश्किल लगता है....! टाइम चाहिये? 2 मास, 6 मास, क्या समझते हो? जो समझते हैं कुछ टाइम चाहिये वो हाथ उठाओ। अच्छा, जिन्होंने हाथ उठाया वो खड़े हो जाओ। सच्चे तो हैं ना। इन्हों का फोटो निकालो, इन्हों को टाइम देंगे। घबराओ नहीं। जिन्होंने भी हाथ उठाया है वो अपनी चिटकी में सेन्टर और अपना नाम ये परिचय लिख करके शान्तामणि को देना। कोई हर्जा नहीं है, आप लोगों ने सच बोला - तो जल्दी हो जायेंगे। बाकी इतने सभी अगर मुक्त हो गये तो ये थोड़े तो आपकी पूँछ पकड़कर भी मुक्त हो जायेंगे। अच्छा, पोस्ट वाली इशू कहाँ है? इसके पास पोस्ट आती है। तो एक मास के बाद कोई ऐसी झमेले की पोस्ट नहीं आनी चाहिये। अगर आवे तो आप बापदादा को बताना। ठीक है ना। पक्का काम करना चाहिये। इनको पहचानते हो ना। इससे सबका काम पड़ता है। भविष्य बनाने के निमित्त तो रखा हुआ है ना! सभी जमा यहीं आ करके करते हैं।

अच्छा, डबल विदेशियों ने क्या कहा? ज़ोन तो बहुत आये हैं। (सभी ज़ोन वालों से बापदादा ने हाथ उठवाये)

अच्छा, सभी ज़ोन, चाहे दिल्ली, चाहे गुजरात, चाहे तामिलनाडु जो भी हैं बापदादा ने देखा कि सभी के मन में डायमण्ड जुबली का उमंग-उत्साह बहुत अच्छा है। और सभी समझते हैं कि ये डायमण्ड जुबली, यज्ञ की स्थापना निर्विघ्न 60 साल चली है और आगे भी चलती रहेगी। तो 60 साल वृद्धि होती रही है, खत्म नहीं हो जाये संस्था या खिटखिट में बिगड़ नहीं जाये... यह इस विश्वविद्यालय की दुनिया के लिए बहुत बड़ी शान है। तो डायमण्ड जुबली मनाना अर्थात् हर ब्राह्मण का ये शान है कि हम ऐसे विश्वविद्यालय के या ऐसे श्रेष्ठ कार्य के साथी हैं। 60 साल कोई कम नहीं हैं, दुनिया के लिए तो असम्भव बात है। लेकिन आप जानते हो कि परमात्म कार्य सदा अचल, अविनाशी है। तो संस्था की शान अर्थात् हर ब्राह्मण आत्मा की शान है। फ़लक से कह सकते हो कि हमारे कार्य की डायमण्ड जुबली है। दुनिया वाले तो समझते हैं कि कोई भी बड़ा गुरू गया तो संस्था भी गई। इन्हों का ब्रह्मा बाबा गया तो सब कुछ गया.... लेकिन आप जानते हो कि ब्रह्मा बाप द्वारा भी चलाने वाला अविनाशी बाप है। तो ये डायमण्ड जुबली - एक कार्य के सफलता की निशानी है। इसमें चाहे युवा हो चाहे प्रवृत्ति वाले हो, सभी को डायमण्ड बन और अन्य डायमण्ड की माला बनानी है। अगर स्वयं निर्विघ्न श्रेष्ठ डायमण्ड हैं तो औरों को भी ऐसे ही बनायेंगे।

युवकों से

युवा हाथ उठाओ। मैजारिटी देश-विदेश में देखा जाता है कि जो नये-नये आते हैं वो मैजारिटी युवा आते हैं, युवा वर्ग का आना ये संस्था की शान है। क्योंकि गवर्नमेंट तो हार गई, वो तो साफ कहती है हमारी हिम्मत नहीं। तो आप युवा वर्ग ऐसी कमाल करके दिखाओ जो बाप का नाम हर युवा के चलन से, परिवर्तन से दिखाई दे। इसके लिए हर एक युवा को अपने को क्या बनाना है? दिव्य दर्पण। दर्पण में शक्ल दिखाई देती है ना। तो आपके चेहरे से औरों को फरिश्ता या दिव्य गुणधारीमू्र्त्त दिखाई दे।

(एजुकेशन विंग की ओर से गुजरात में चले अभियान का समाचार बापदादा को सुनाया) अच्छा है, कितनी आत्माओं को परिचय मिल गया ना! तो सेवा किया अर्थात् अपने पुण्य का खाता जमा किया। अभी एजुकेशन डिपार्टमेन्ट या वर्ग वालों ने चक्कर तो लगाया, बहुत अच्छा किया लेकिन एजुकेशन डिपार्टमेन्ट या वर्ग गवर्नमेंट को यह सिद्ध करके दिखावे कि सचमुच जो नाम है विश्वविद्यालय वो रीयल विश्वविद्यालय यही है। अभी मान्यता नहीं दिलाई है। तो ये काम अभी रहा हुआ है, अधूरा है अभी। तो ऐसा प्लैन बनाओ जो गवर्नमेंट स्वयं बोले कि हमारे विश्वविद्यालय इस विद्यालय के आगे कुछ नहीं हैं। अगर है तो ये है। यही है, यही है - ये बोले, तब एजुकेशन वालों को इनाम देंगे। अभी तो युद्ध चल रही है - एजुकेशन है या नहीं है? तो जो रीयल है, जो सत्य है वो सिद्ध तो होना है ना। तो थोड़ी और मेहनत करो। होना तो है लेकिन वो बिचारे इतने भटक रहे हैं, जल्दी से बच जावें। अच्छा, युवा अर्थात् दिव्य दर्पण। समझा?

प्रवृत्ति वालों से

प्रवृत्ति वाले क्या करेंगे? बापदादा प्रवृत्ति वालों की सदा किस पुष्प से तुलना करते हैं? (कमलपुष्प से)

अच्छा तो आप प्रवृत्ति वाले कमल पुष्प हो? कभी-कभी कोई बूंद तो नहीं लग जाती? कोई मिट्टी का प्रभाव तो नहीं पड़ जाता? तो प्रवृत्ति वाले इस सारी पुरानी दुनिया को, कमल पुष्प का तालाब बना दो। तालाब के बीच में कमल पुष्प बहुत अच्छे लगते हैं। तो इस पुरानी दुनिया को कमल पुष्प का बड़े से बड़ा तालाब बनाओ, जो जहाँ भी देखे ना तो कमल ही कमल दिखाई दें। इतनी हिम्मत है? डायमण्ड जुबली तक बनायेंगे? एक मास में नहीं कहते लेकिन एक वर्ष में तो बनाओ। बिचारे आत्माओं की हालतें देखो तो सचमुच रहम आता है। दुनिया की हालत देखो और अपने को देखो-कितना अन्तर है! कितनी बातों से, दु:खों से, दर्दों से छूट गये हो। समझते हो - दुनिया की ऐसी हालत है? किसी से भी पूछो क्या हालचाल है तो कहेंगे कि दुनिया का तो बेहाल है। और आपसे पूछे क्या हाल है? खुशहाल है। तो दुनिया बेहाल और आप सभी खुशहाल। पक्का है या कभी-कभी खुशी कम होती है? कम नहीं होने देना। तो सभी प्रवृत्ति वाले कमल हो ना! पक्का याद रखो कि हम कमल हैं। न्यारे और बाप के प्यारे। अच्छा!

कुमारियों से

कुमारियों की तो महिमा सदा बापदादा करते हैं। क्योंकि कुमारी साधारण कुमारी से विश्व की सेवाधारी कुमारी बन गई। कहाँ घर की चार दीवारों में रहने वाली और कहाँ विश्व के सेवाधारी बन गये या बन रहे हैं। तो कुमारियाँ अपने को ऐसे योग्य समझती हो? ऐसे योग्य हो या टोकरी उठाने वाली हो? टोकरी उठाते-उठाते तो सिरदर्द करता है। अभी कुमारियों को टोकरी वाली बनना है या ताज वाली बनना है? टोकरी छोड़ देंगी? कि टोकरी उठाना ज़रूरी है? कुमारियां क्या समझती हैं? जो समझती हैं कि नौकरी करनी ही पड़ेगी, मजबूरी है, वो हाथ उठाओ। मजबूरी वाली कोई नहीं है। तो घरों में क्यों बैठे हो? जब नौकरी की आवश्यकता नहीं तो क्यों बैठे हो? क्यों नहीं आते हो मैदान में? घर अच्छा लगता है? छोटा सा घर है, कोई खिटखिट नहीं है, माँ-बाप का प्यार मिल रहा है, ठीक है। सेवाकेन्द्र पर पता नहीं क्या-क्या होगा, कैसे चलेंगे, चल सकेंगे या नहीं सकेंगे, इसीलिए चार दीवारी ठीक है... ऐसे समझती हो? कुमारियों पर तो सब युगों में से संगमयुग पर विशेष परमात्म-कृपा है। अगर संगम पर परमात्म कृपा के अधिकारी नहीं बने तो सारे कल्प में नहीं बनेंगे। तो कुमारियों को परमात्म वरदान है या परमात्म-कृपा है, वो कभी भी छोड़नी नहीं चाहिये, लेनी चाहिये। समझा कुमारियों ने? डरो नहीं। आजकल समाचार सुना है, कई कुमारियाँ डरती हैं-पता नहीं, पता नहीं, पता नहीं! लेकिन सभी सेवाकेन्द्र एक जैसे नहीं होते हैं। अगर कोई बात है भी तो बड़ों को दे सकते हैं। उसके लिए कोई को मना नहीं है। अगर टीचर मना भी करती है तो बापदादा की छुट्टी है कि कहाँ से भी पत्र डाल सकते हो। सिर्फ क्या होता है-बापदादा पत्र के लिए तो कहते हैं लेकिन लम्बा बहुत लिख देते हैं। थोड़े में ही समझ में आ जाता है, लेकिन लम्बी कहानी होगी तो जो चार्ज वाली देखेगी ना, वो भी किनारे रख देगी। जब टाइम मिलेगा तब पढ़ेगी। और बड़ों तक भी नहीं जायेगा। उन्हों को भी टाइम मिले ना, तब तो आपका रामायण पढ़ेंगे। इसलिए लम्बा नहीं लिखो। शॉर्टकट में लिखो कि ये तकलीफ है और इसकी ये सैलवेशन चाहिये। फिर स्पष्टीकरण लेना होगा तो बड़े आपको आपेही बुलायेंगे। और ही मधुबन में आने का चांस मिलेगा। तो लम्बा नहीं लिखना। बाकी सबको छुट्टी है, अगर कोई ऐसी अयथार्थ बात है तो सुना सकते हैं। डरो नहीं। डरने के कारण अपनी परमात्म-कृपा का भाग्य नहीं गँवाओ। समझा कुमारियों ने? न अपने को तंग करो, न दूसरे को तंग करो। भाग्य अच्छा है। कुमारियाँ हिम्मत रखती हैं तभी सेन्टर खुल सकते हैं। अगर कुमारियाँ हिम्मत नहीं रखतीं तो सेन्टर भी नहीं खुलते। तो लक्की तो हो ना। सभी दीदी जी, दादी जी तो कहते हैं। यहीं टाइटल मिल जाता है। अच्छा।

बाकी मधुबन वाले या जो भी सम्पर्क में गीता पाठशालायें कहो, उपसेवाकेन्द्र कहो, जो भी हैं सभी को बापदादा अभी अपने समान सम्पन्न और मास्टर सर्वशक्तिमान देखना चाहते हैं। सबसे बड़े ते बड़ा मॉडल मधुबन है। मधुबन कौन सा मॉडल बनाता है, वह देखेंगे। जो सच्ची दिल से सेवा करते हैं उसको बापदादा भी पद्मगुणा मुबारक देते हैं। मधुबन वाले खातिरी तो करते हैं ना। चाहे ज्ञान सरोवर में, चाहे यहाँ पाण्डव भवन में, खातिरी तो करते हैं। तो खातिरी करने वालों को आप सभी भी मुबारक दे रहे हो ना। तो सारी सभा की तरफ से मुबारक।

अच्छा, चारों ओर के सदा श्रेष्ठ भाग्यवान भाग्य विधाता को अपना बनाने वाले ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बापदादा के श्रीमत को सुना और किया ऐसे सर्व सपूत बच्चों को, सदा सेवा में अचल रहने वाले झमेला मुक्त और परमात्म-मिलन मेला मनाने वाले सभी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

अच्छा-डबल विदेशियों को डबल नशा है ना? डबल विदेशी अर्थात् डबल लाइट, डबल नशा और डबल बापदादा और परिवार के प्यारे। समझा?

अच्छा! हेल्थ मेला करने वालों को भी मुबारक। वैसे रिज़ल्ट अच्छी है और रहेगी।

(दादियां बापदादा के सामने बैठी हैं) टीचर्स को अच्छा चांस मिल जाता है। मेहनत भी करती हैं, यहाँ थकावट उतर जाती है। यहाँ रिफ़्रेश होते हो या यहाँ भी पार्टी की चिन्ता रहती है? वैसे तो मधुबन की दिनचर्या ऐसी सेट है जो टाइम भी नहीं है। बिज़ी रहने चाहे, क्लासेस का लाभ उठाना चाहे तो स्टूडेण्ट को फुर्सत मिलती है? मधुबन में फ्री होते हो? पाण्डवों से पूछते हैं कि क्लासेस में बिज़ी रहते हो, क्या होता है? मधुबन में यहाँ वहाँ की बातें करने का फ्री टाइम मिलता है? क्लासेस में बिज़ी रहते हो? सभी क्लासेस अटेण्ड करते हो? क्लासेस ज़रुर अटेण्ड करना चाहिये क्योंकि हर एक रत्न में बापदादा वा ड्रामानुसार कोई न कोई विशेषता भरी हुई है। तो क्लास कोई भी करावे। ऐसे नहीं फलाने का क्लास है तो सभी भागो और कोई दूसरे का है तो आधा घूमना...। कोई भी क्लास कराता है उसमें विशेषता होती है। और आप लोगों के पास सभी तो पहुँच भी नहीं सकते। यहीं मिलते हैं। तो जिन्हों ने सभी क्लास अटेण्ड किये हैं, एक भी मिस नहीं किया है, वह हाथ उठाओ। अच्छा, टीचर्स अपने काम उतारती हैं। आप एक तो ऑफिशियल राउण्ड लगाने जाते हो वो तो अच्छी बात है, लेकिन क्लास के टाइम जो क्लास छोड़ करके और कहाँ घूमने गये हैं वो हाथ उठाओ। तो अभी ऐसे नहीं करना। क्लास की कई बातें समय पर बरोबर काम में आयेंगी। अभी सुनते हो, तो समझते हो बहुत सुन लिया। लेकिन कोई-कोई पॉइन्ट ऐसे टाइम में काम पर आती हैं जो आप अन्दर ही अन्दर शुक्रिया मानेंगे, इसलिए बिजी रहो। मधुबन माना पढ़ाई में बिज़ी। बाकी खाओ पियो मौज करो, वो भले करो लेकिन टाइम पर। अच्छा है, नयों-नयों को तो नई बातें मिलती हैं। पढ़ाई में अटेन्शन बहुत ज़रूरी है। पढ़ाई माना सिर्फ सुनना नहीं। पढ़ाई का अर्थ है सुनना और करना। अच्छा, सब खुशहाल तो हैं ही। बेहाल नहीं, खुशहाल हो। अच्छा। (एजुकेशन अभियान के भाई-बहनें बापदादा के सामने खड़े हुए) अच्छा है, सेवा का फल, मधुबन में आने की छुट्टी मिल गई। लेकिन इनाम तभी देंगे जब गवर्नमेंट से कहलवायेंगे। कहने से भी कुछ नहीं होता। ये तो ऑफिशियल लिखा-पढ़ी हो। कहने में तो प्राइम मिनिस्टर भी कहकर गया-बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है। तो चाहे डॉक्टर्स, एजुकेशन वाले वा इन्जीनियर्स आदि, जो भी सेवा अर्थ रैली निकालते हैं वो अच्छा है। तो मुबारक हो।

अच्छा! ओम् शान्ति।



13-12-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘व्यर्थ बोल, डिस्टर्ब करने वाले बोल से स्वयं को मुक्त कर बोल की इकॉनॉमी करो’’

आज बापदादा चारों ओर की आत्माओं को आप सभी के साथ देख रहे हैं। चारों ओर के बच्चे आकार रूप से बापदादा के सामने हैं। डबल सभा, साकारी और आकारी दोनों कितनी बड़ी सभा है। बापदादा दोनों सभा के बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। क्योंकि बापदादा हर बच्चे को विशेष दो रूपों से देख रहे हैं। एक - हर एक बच्चा इस सर्व मनुष्यात्माओं के पूर्वज, सारे वृक्ष का फाउण्डेशन है। क्योंकि जड़ से सारा वृक्ष निकलता है और दूसरे रूप में पूर्वज बड़े को भी कहते हैं। तो सृष्टि के आदि में आप आत्माओं का ही पार्ट है। इसलिए बड़े ते बड़े हो, इस कारण सर्व आत्माओं के पूर्वज हो। साथ-साथ ऊंचे ते ऊंचे बाप की पहली रचना आप ब्राह्मण आत्मायें हो। तो जैसे ऊंचे ते ऊंचा भगवन है वैसे बड़े ते बड़े पूर्वज आप हो। तो इतने सारे पूर्वज बच्चों को देख बाप हर्षित होते हैं। आप भी हर्षित होते हो कि हम पूर्वज हैं - उसी निश्चय और नशे में रहते हो? तो बापदादा आज पूर्वजों की सभा देख रहे हैं।

आप सभी जो भी बाप के बच्चे हो, माया से बचे हुए हो। बच्चे का अर्थ ही है बाप का बनना अर्थात् बच्चे बनना। तो माया से बचे हुए बाप के बच्चे बनते हैं। आप सभी माया से बचे हुए हो ना? कि कभी चक्कर में आ जाते हो? कहते हैं ना ऐसा भी चक्रव्युह होता है जो बहुत तरीके से निकलना होता है। तो कोई भी माया के चक्रव्युह में फंसने वाले तो नहीं हो? क्या कोई चक्कर है? बचे हुए हो? (हाँ जी) ऐसे नहीं करना कि यहाँ हाँ जी करके जाओ और वहाँ जाकर कहो ना जी। जब एक बार चक्कर से निकलने का रास्ता या विधि आ गई, तो फिर फंसने की तो बात ही नहीं है। माया को भी अच्छी तरह से जान गये हो ना कि कभी अनजान बन जाते हो? फिर कहते हैं हमको तो पता ही नहीं पड़ा कि ये माया है। क्योंकि जैसे आजकल का फैशन है भिन्न-भिन्न  फेस बहुत पहन लेते हैं। अभी-अभी क्या बनेंगे, अभी-अभी क्या बनेंगे। तो माया के पास भी ये फंसाने के फेस बहुत हैं। उसके पास अच्छा बड़ा दुकान है। जिस समय जो रूप धारण करना चाहे उस समय कर लेती है। और अगर जाने-अनजाने फंस गये तो निकलने में बहुत टाइम लगता है। और संगम का एक सेकण्ड व्यर्थ जाना अर्थात् एक वर्ष गँवाना है, सेकण्ड नहीं। आप सोचो संगमयुग कितना छोटा है। अभी तो डायमण्ड जुबली मना रहे हो और इस थोड़े से समय में जो बनना है, जो जमा करना है वो अभी बन सकते हैं। तो बापदादा देख रहे थे कि बनने का समय कितना थोड़ा है और बनते हो सारा कल्प। तो कहाँ 5 हज़ार और कहाँ अभी 60 वर्ष, चलो आगे कितना भी समय होगा लेकिन हज़ारों के गिनती में तो नहीं होगा ना!

तो इस थोड़े से समय में राज्य अधिकारी बनने वा रॉयल फैमिली में आने के लिए क्या करना होगा? वैसे संख्या के हिसाब से सतयुग में विश्व का तख्त सभी को तो मिल भी नहीं सकता। मानों पहले लक्ष्मी-नारायण तो तख्त पर बैठेंगे लेकिन जो पहले लक्ष्मी-नारायण की रॉयल फैमिली है, उन्हों को भी इतना ही सभी द्वारा स्नेह और सम्मान मिलता है। तो अगर पहली राजधानी के रॉयल फैमिली में भी आते हैं तो वो पहला नम्बर हैं। चाहे बड़े तख्त पर नहीं बैठते लेकिन प्रालब्ध नम्बरवन के हिसाब से ही है। नहीं तो आप सभी लोगों को त्रेता तक भी तख्त थोड़े ही मिलेगा। लेकिन विश्व राज्य अधिकारी का लक्ष्य सभी का है ना? कि वहाँ भी एक स्टेट के राजा बन जायेंगे? तो पहले नम्बर के रॉयल फैमिली में आना ये भी श्रेष्ठ पुरूषार्थ है। कोई को तख्त मिलता और किसको रॉयल फैमिली मिलती है। इसके भी गुह्य रहस्य हैं।

जो सदा संगम पर बाप के दिल तख्तनशीन स्वत: और सदा रहता है, कभी-कभी नहीं, जो सदा आदि से अन्त तक स्वप्न मात्र भी, संकल्प मात्र भी पवित्रता के व्रत में सदा रहा है, स्वप्न तक भी अवित्रता को टच नहीं किया है, ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें तख्तनशीन हो सकती हैं। जिसने चारों ही सब्जेक्ट में अच्छे मार्क्स लिये हैं, आदि से अन्त तक अच्छे नम्बर से पास हुए हैं, उसी को ही पास विद् ऑनर कहा जाता है। बीच-बीच में मार्क्स कम हुई हैं फिर मेकप किया है, मेकप वाला नहीं लेकिन आदि से चारों ही सब्जेक्ट में बाप के दिल पसन्द हैं वो तख्त ले सकता है। साथ-साथ जो ब्राह्मण संसार में सर्व के प्यारे, सर्व के सहयोगी रहे हैं, ब्राह्मण परिवार हर एक दिल से सम्मान करता है, ऐसा सम्मानधारी तख्त नशीन बन सकता है। अगर इन बातों में किसी न किसी में कमी है तो वो नम्बरवार रॉयल फैमिली में आ सकता है। चाहे पहली में आवे, चाहे आठवीं में आए, चाहे त्रेता में आए। तो अगर तख्तनशीन बनना है तो इन सभी बातों को चेक करो। अगर सेवा में 100 मार्क्स जमा हैं और धारणा में 25 परसेन्ट तो क्या होगा? वो अधिकारी बनेगा? कई बच्चे और सब्जेक्ट में आगे चले जाते हैं लेकिन प्रैक्टिकल धारणा में जैसा समय है वैसा अपने को मोल्ड करना वो है रीयल गोल्ड। कहाँ-कहाँ माया बच्चों से भी होशियार हो जाती है। वो फट से समय प्रमाण स्वरूप धारण कर लेती है और बच्चे क्या कहते हैं? बाप के पास तो सबकी बातें आती हैं ना! मानो एक रांग है और दूसरा राइट है। ऐसे भी होता है कि दोनों तरफ की कोई ना कोई कमी होती है लेकिन मानों आप बिल्कुल ही अपने को राइट समझते हो और दूसरा बिल्कुल ही रांग है, तो आप राइट हो और वो रांग है फिर भी जैसा समय, जैसा वायुमण्डल देखा जाता है वैसे अपने को ही, चाहे समाना पड़ता है, चाहे मिटाना पड़ता है, चाहे किनारा करना पड़ता है, लेकिन बच्चे क्या कहते हैं कि क्या हर बात में हर समय हमको ही मरना है क्या! मरने के लिये हम हैं और मौज मनाने के लिए ये हैं! सदा ही मरना है, ये मरना तो बहुत मुश्किल है, मरजीवा तो बन गये वो तो सहज है। ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी बन गये ये भी तो मरजीवा बने ना! ये मरना तो बहुत सहज हो गया। मर गये, ब्रह्माकुमारी बन गये। लेकिन ये बारबार का मरना ये बहुत मुश्किल है! मुश्किल है ना? छोटियाँ कहती हैं कि हमको ही ज्यादा मरना पड़ता है और बड़े कहते हैं कि हमको ही ज्यादा सुनना पड़ता है। तो आपको सहन करना पड़ता, उन्हों को सुनना पड़ता, तो मरना किसको है? कौन मरें? एक मरे, दोनों मरें? दोनों ही मर गये तो बात खत्म, खेल खत्म। तो मरना आता है या थोड़ा मुश्किल लगता है? थोड़ा सांस हांफता हैं, मुश्किल सांस निकलता है। तकलीफ होती है? उस समय जब कहते हो ना कि क्या हमें ही मरना है, हमें ही बदलना है, क्या मेरी ही जिम्मेवारी है बदलने की? दूसरे की भी तो है! आधा-आधा बांट लो-तुम इतना मरो, मैं इतना मरूँ। बापदादा को तो उस समय रहम भी बहुत आता है लेकिन ये मरना, मरना नहीं  है। ये मरना सदा के लिये जीना है। लोग कहते हैं ना कि बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलेगा। तो उस मरने से तो स्वर्ग मिलता नहीं लेकिन इस मरने से स्वर्ग का अधिकार ज़रुर मिलेगा। इसलिए ये मरना अर्थात् स्वर्ग का अधिकारी बनना। डर जाते हो ना-मरना पड़ेगा, मरना पड़ेगा, सहन करना पड़ेगा तो छोटी बात बड़ी हो जाती है। आप सोचो कोई भी डाकू या चोर है नहीं लेकिन आपको डर बैठ गया कि डाकू है, चोर है तो भय से क्या होता है? भय से या तो हार्ट नीचे-ऊपर होगी या ब्लड प्रेशर नीचे-ऊपर होगी। डर से होता है ना? तो डर जाते हो। मरना बड़ी बात नहीं है लेकिन आपका डर बड़ी बात बना देता है फिर कहते हैं पता नहीं हमको क्या होता है, पता नहीं! लेकिन जैसे हिम्मत से मरजीवा बनने में भय नहीं किया, खुशी-खुशी से किया, ऐसे खुशी-खुशी से परिवर्तन करना है। मरना शब्द नहीं है लेकिन आपने मरना-मरना शब्द कह दिया है इसलिए डर जाते हैं। वास्तव में ये मरना नहीं है लेकिन अपने धारणा की सब्जेक्ट में नम्बर लेना है। सहन करने में घबराओ मत। क्यों घबराते हो? क्योंकि समझते हो कि झूठी बात में हम सहन क्यों करें? लेकिन सहन करने की आज्ञा किसने दी है? झूठ बोलने वाले ने दी है? कई बच्चे सहन करते भी हैं लेकिन मज़बूरी से सहन करना और मोहब्बत में सहन करना, इसमें अन्तर है। बात के कारण सहन नहीं करते हो लेकिन बाप की आज्ञा है सहनशील बनो। तो बाप की आज्ञा मानते हो तो परमात्मा की आज्ञा मानना ये खुशी की बात है ना कि मजबूरी है ।  तो कई बार सहन करते भी हो लेकिन थोड़ा मिक्स होता है, मोहब्बत भी होती है, मजबूरी भी होती है। सहन कर ही रहे हो तो क्यों नहीं खुशी से ही करो। मजबूरी से क्यों करो! वो व्यक्ति सामने आता है ना तो मजबूरी लगती है और बाप सामने आवे, कि बाप की आज्ञा पालन कर रहे हैं तो मोहब्बत लगेगी, मजबूरी नहीं। तो ये शब्द नहीं सोचो। आजकल ये थोड़ा कॉमन हो गया है - मरना पड़ेगा, मरना पड़ेगा, कब तक मरना पड़ेगा, अन्त तक या दो साल, एक साल, 6 मास, फिर तो अच्छा मर जायें... लेकिन कब तक मरना है? लेकिन यह मरना नहीं है अधिकार पाना है। तो क्या करेंगे? मरेंगे? यह मरना शब्द खत्म कर दो। मरना सोचते हो ना तो मरने से तो डर लगता है ना। देखो अपनी मृत्यु तो छोड़ो, कोई-कोई तो दूसरे की मृत्यु देखकर भी डर जाते हैं। तो ये शब्द परिवर्तन करो, ऐसे-ऐसे बोल नहीं बोलो। शुद्ध भाषा बोलो। ब्राह्मणों की डिक्शनरी में यह शब्द है ही नहीं। पता नहीं किसने शुरू किया है। किया तो आप लोगों में से ही है ना! आप माना जो सामने बैठे हैं, वह नहीं। ब्राह्मणों ने ही किया है। बापदादा ने ये तो एक मिसाल सुनाया लेकिन सारे दिन में ऐसे व्यर्थ बोल या मज़ाक के बोल बहुत बोलते हैं, अच्छे शब्द नहीं बोलेंगे, लेकिन कहेंगे मेरा भाव नहीं था, यह तो मज़ाक में कह दिया। तो ऐसा मज़ाक क्या ब्राह्मण जीवन में आपके नियमों में है? लिखा हुआ तो नहीं है? कभी पढ़ा है कि मज़ाक कर सकते हैं? मज़ाक करो लेकिन ज्ञानयुक्त, योगयुक्त। बाकी व्यर्थ मज़ाक जिसको आप मज़ाक समझते हो लेकिन दूसरे की स्थिति डगमग हो जाती है, तो वह मज़ाक हुआ या दु:ख देना हुआ?

तो आज बापदादा ने देखा कि एक तो सभी पूर्वज हैं और दूसरा सबसे बड़े ते बड़े पूज्य आत्मायें भी आप हो। आप जैसी पूजा सारे कल्प में किसकी नहीं होती। तो पूर्वज भी हो और पूज्य भी। लेकिन पूज्य भी नम्बरवार हैं। जो भी ब्राह्मण बनते हैं उनकी पूजा होती ज़रुर है लेकिन किसकी विधिपूर्वक होती है और किसकी काम चलाऊ होती है। तो जो ब्राह्मण यहाँ भी योग में बैठते हैं लेकिन काम चलाऊ, कुछ नींद किया, कुछ योग किया, कुछ व्यर्थ सोचा और कुछ शुभ सोचा। तो यह काम चलाऊ हुआ ना! सफेद बत्ती जल गई, काम पूरा हो गया। ऐसे धारणा में भी काम चलाऊ बहुत होते हैं। कोई भी सरकमस्टांस आयेगा तो कहेंगे अभी तो ऐसे करके चलाओ, पीछे देखा जायेगा। तो ऐसों की पूजा काम चलाऊ होती है। देखो लाखों सालग्राम बनाते हैं लेकिन क्या होता है? विधिपूर्वक पूजा होती है? काम चलाऊ होती है ना! पाइप से नहला दिया और तिलक भी कटोरी भरके पण्डित लोग ऐसे-ऐसे कर देते हैं। (छिड़क देते हैं) तिलक लग गया। तो ये क्या हुआ? काम चलाऊ हुआ ना। पूज्य सभी बनते हो लेकिन कैसे पूज्य बनते हो वो नम्बरवार है। किसकी हर कर्म की पूजा होती है। दातन (दातून) का भी दर्शन होता है, दातन हो रहा है। मथुरा में जाओ तो दातन का भी दर्शन कराते हैं, इस समय दातन का समय है। तो काम चलाऊ नहीं बनना। नहीं तो पूजा भी ऐसी होगी।

टीचर्स क्या समझती हो? आगे बैठती हो तो नम्बर भी आगे लेना है ना! कम नहीं रह जाना। नशा रखो कि हम पूर्वज भी हैं और पूज्य भी हैं। तो जितने बड़े, उतनी बड़ी जिम्मेवारी है। बड़ा बनना सिर्फ खुश होने वाली बात नहीं है। नाम बड़ा तो काम भी बड़ा। सभी टीचर्स खुश हो? या कोई-कोई इच्छा अभी भी मन में है? कोई भी इच्छा होगी तो अच्छा बनने नहीं देगी। या इच्छा पूर्ण करो या अच्छा बनो। आपके हाथ में है। और देखा जाता है कि ये इच्छा ऐसी चीज़ है जैसे धूप में आप चलते हो तो आपकी परछाई आगे जाती है और आप उसको पकड़ने की कोशिश करो, तो पकड़ी जायेगी? और आप पीठ करके आ जाओ तो वो परछाई कहाँ जायेगी? आपके पीछे-पीछे आयेगी। तो इच्छा अपने तरफ आकर्षित कर रूलाने वाली है और इच्छा को छोड़ दो तो इच्छा आपके पीछे-पीछे आयेगी। मांगने वाला कभी भी सम्पन्न नहीं बन सकता। और कुछ नहीं मांगते हो लेकिन रॉयल मांग तो बहुत है। जानते हो ना-रॉयल मांग क्या है? अल्पकाल का कुछ नाम मिल जाये, कुछ शान मिल जाये, कभी हमारा भी नाम विशेष आत्माओं में आ जाये, हम भी बड़े भाइयों में गिने जायें, हम भी बड़ी बहनों में गिने जायें, आाखिर हमको भी तो चांस मिलना चाहिए। लेकिन जब तक मंगता हो तब तक कभी खुशी के खज़ाने से सम्पन्न नहीं हो सकते। ये मांग के पीछे या कोई भी हद की इच्छाओं के पीछे भागना ऐसे ही समझो जैसे मृगतृष्णा है। इससे सदा ही बचकर रहो। छोटा रहना कोई खराब बात नहीं है। छोटे सुभान अल्लाह हैं। क्योंकि बापदादा के दिल पर नम्बर आगे हैं। अल्पकाल की इच्छा का अनुभव करके देखा होगा, तो रूलाती है या हंसाती है? रूलाती है ना! तो रावण की आज्ञा है रूलाओ, आप तो बाप के हो ना तो बाप हंसाने वाला है या रूलाने वाला?

आज बापदादा विशेष इस पर अटेन्शन दिला रहे हैं कि व्यर्थ बोल जो किसको भी अच्छे नहीं लगते, आपको अच्छा लगता है लेकिन दूसरे को अच्छा नहीं लगता, तो सदा के लिए उस शब्द को समाप्त कर दो। ऐसे सारे दिन में अगर बापदादा अपने पास बच्चों के शब्द नोट करे तो काफी फाइल बन सकती है। यह अपशब्द, व्यर्थ शब्द, ज़ोर से बोलना..... ये ज़ोर से बोलना भी वास्तव में अनेकों को डिस्टर्ब करना है। ये नहीं बोलो-मेरा तो आवाज़ ही बड़ा है। मायाजीत बन सकते हो और आवाज़ जीत नहीं बन सकते! तो ऐसे किसी को भी डिस्टर्ब करने वाले बोल और व्यर्थ बोल नहीं बोलो। बात होती है दो शब्दों की लेकिन आधा घण्टा उस बात को बोलते रहेंगे, बोलते रहेंगे। तो ये जो लम्बा बोल बोलते हो, जो चार शब्दों में काम हो सकता है वो 12-15 शब्द में नहीं बोलो। आप लोगों का स्लोगन है ‘‘कम बोलो, धीरे बोलो’’। तो जो कहते हैं ना हमारा आवाज़ बहुत बड़ा है, हम चाहते नहीं हैं लेकिन आवाज़ ही बड़ा है, तो वो गले में एक स्लोगन लगाकर डाल लेवें। होता क्या है? आप लोग तो अपनी धुन में ज़ोर से बोल रहे हो लेकिन आने-जाने वाले सुन करके ये नहीं समझते हैं कि इसका आवाज़ बड़ा है। वो समझते हैं पता नहीं झगड़ा हो रहा है। तो ये भी डिससर्विस हुई। इसलिए आज का पाठ दे रहे हैं - व्यर्थ बोल या किसी को भी डिस्टर्ब करने वाले बोल से अपने को मुक्त करो। व्यर्थ बोल मुक्त। फिर देखो अव्यक्त फरिश्ता बनने में आपको बहुत मदद मिलेगी। बोल, बोल, बोल, बोलते ही रहते हो। अगर बापदादा टेप भरकर आपको सुनाये ना तो आपको भी हंसी आयेगी। तो क्या पाठ पक्का किया है? बोल की इकॉनॉमी करो, अपने बोल की वैल्यु रखो। जैसे महात्माओं को कहते हैं ना-सत्य वचन महाराज तो आपके बोल सदा सत वचन अर्थात् कोई न कोई प्राप्ति कराने वाले वचन हों। किसको चलते-फिरते हंसी में कह देते हो - ये तो पागल है, ये तो बेसमझ है, ऐसे कई शब्द बापदादा अभी भूल गये हैं लेकिन सुनते हैं। तो ब्राह्मणों के मुख से ऐसे शब्द निकलना ये मानों आप सतवचन महाराज वाले, किसी को श्राप देते हो। किसको श्रापित नहीं करो, सुख दो। युक्तियुक्त बोल बोलो और काम का बोलो, व्यर्थ नहीं बोलो। तो जब बोलना शुरू करते हो तो एक घण्टे में चेक करो कि कितने बोल व्यर्थ हुए और कितने सत वचन हुए? आपको अपने बोल की वैल्यु का पता नहीं, तो बोल की वैल्यु समझो। अपशब्द नहीं बोलो, शुभ शब्द बोलो। क्योंकि अभी लास्ट मास है और आदि का मास डायमण्ड जुबली है, तो सारा साल डायमण्ड बनेंगे या 6 मास बनेंगे? सारा साल बनेंगे ना! इसलिए बापदादा डायमण्ड जुबली के पहले बच्चों को विशेष अटेन्शन दिला रहे हैं। बापदादा चारों ओर के दृश्य तो देखते ही रहते हैं। सारा दिन नहीं देखते रहते हैं, सेकण्ड में सब देख सकते हैं। तो पाठ पक्का किया - मुक्त बनना है? या थोड़ा-थोड़ा युक्त और थोड़ा- थोड़ा मुक्त? हर एक अपने को देखो। ये नहीं शुरू करना कि बाबा ने वाणी चलाई फिर भी बोल रहा है, दूसरे को नहीं देखना। अपने को देखो-मैंने बाप की श्रीमत को कितना अपनाया है? अभी तो एक-दो को देखते हैं-ये कर रहा है... लेकिन जब अधिकार मिलने में वो नीचे पद में जायेगा तो उस समय आप साथ देंगे? उस समय देखेंगे? उस समय नहीं देखेंगे। फिर अभी क्यों देखते हो।

अच्छा-सभी मुक्त बनेंगे ना? जो समझते हैं कि मुक्त होना मुश्किल है वो हाथ उठाओ। अगले बार जब चिटकी लिखने के लिए कहा था तो बापदादा के पास रिज़ल्ट आई, अभी तो वो चले गये लेकिन बापदादा उन बच्चों को मुबारक के साथ-साथ हिम्मत और देते हैं कि जैसे सोचा है, कोई ने लिखा है 6 मास चाहिये, किसी ने लिखा है 2 मास चाहिये, जितना भी लिखा है तो बाप की मत से अवश्य पूरा होगा। बाकी अच्छा है, सच तो बोला ना।

अच्छा, अभी एक मास में भी तो आधा मास चला गया। बाकी हैं थोड़े से दिन। तो मुक्त बनना ज़रुर। कम से कम पहले-दूसरे नम्बर के रॉयल फैमिली में तो आ जाओ। अच्छा।

इस कल्प में जो अभी पहली बार आये हैं वो हाथ उठाओ। जो भी आये हैं वो हिम्मत रखते हो कि हम तीव्र पुरूषार्था बन डायमण्ड जुबली अपने जीवन और सेवा से मनायें, ऐसी हिम्मत अपने में समझते हो? जो समझते हैं कि हम बाप को करके ही दिखायेंगे, वो हाथ उठाओ। जो पहली बार नये आये हैं लेकिन समझते हैं कि डायमण्ड जुबली के अन्त तक कर लेंगे वो हाथ उठाओ। शर्म नहीं करो। हाथ उठाने में थोड़ा संकोच हो रहा है। लेकिन बापदादा उन्हों को भी कहते हैं कि हिम्मत से क्या नहीं हो सकता! हिम्मत रखो। हिम्मत लेने के पात्र बनो तो थोड़े समय में भी आगे जा सकते हैं। इसलिए दिलशिकस्त नहीं बनो कि पता नहीं हो सकेगा या नहीं हो सकेगा।

अच्छा, अभी कौन से ज़ोन आये हैं? (बापदादा सभी ज़ोन से हाथ उठवा कर मिल रहे हैं)

बापदादा को खुशी है भले आये। डबल विदेशी जो इस बार आये हैं वो हाथ उठाओ। अच्छा।

युवाओं से

सब तरफ वाले युवा हाथ उठाओ। डायमण्ड जुबली में युवा क्या करेंगे? युवा में डबल शक्ति है। शारीरिक शक्ति भी है तो आत्मिक शक्ति भी है। तो डबल शक्ति से डायमण्ड जुबली में क्या विशेषता दिखायेंगे? रैली निकालना, फंक्शन करना ये तो करते ही रहते हो। कितने बारी किया है, बहुत बार किया है। अभी क्या करेंगे? हर एक युवा जो आजकल के अज्ञानी युवा एसोसिएशन्स हैं या ग्रुप हैं, जो और भी देश में नुकसान करते हैं, गवर्नमेंट को भी तंग करते हैं, ऐसे कोई एसोसिएशन तैयार करना, उनमें से जो ऐसे नुकसान करने वाले हैं उन्हों को परिवर्तन करके दिखाओ। प्रैक्टिकल में हर एक युवा अपने-अपने सेवास्थान पर ऐसा परिवर्तन किया हुआ ग्रुप तैयार करो। जो भी ज़ोन आये हैं हरेक ज़ोन में कहाँ 100 हैं, कहाँ 50 सेवाकेन्द्र हैं, गीता पाठशालायें तो बहुत हैं लेकिन हर एक ज़ोन अपने एरिया में जहाँ-जहाँ सेवाकेन्द्र हैं, वहाँ से ऐसे परिवर्तन किया हुआ सेम्पुल तैयार करो। आप लोगों को मालूम है, जब डाकुओं का हुआ था तो एक डाकू परिवार्तित हुआ, एक एग्ज़ाम्पल निकला और देखा गया कि एक डाकू कहाँ भी अपना अनुभव सुनाता था तो सभी को बहुत रूचि होती थी। तो आप लोग फिर ऐसे एसोसिएशन्स जहाँ संगठन होता है, वहाँ से जितने तैयार कर सको उतने निकालो। एग्ज़ाम्पल तैयार करो। फिर सभी ज़ोन के जो निकलेंगे उनका विशेष सभी का मिल करके फंक्शन रखेंगे और उसमें गवर्नमेंट के डिपार्टमेन्ट को दिखायेंगे कि ये युवा क्या करते हैं और वो युवा क्या करते हैं। तो युवा तैयार हैं? नम्बर लेना है? हाँ या ना? कितना टाइम चाहिये? डायमण्ड जुबली के 6 मास चाहिए, 4 मास चाहिए, कितना टाइम चाहिए? महाराष्ट्र के युवा क्या करेंगे? जवाब दो। मुश्किल लगता है क्या? तो जो हाँ कहते हैं, करेंगे, वो हाथ उठाओ। अच्छा। यू.पी. वाले करेंगे? हाँ बोलो या ना बोलो। कितने टाइम में करेंगे? डायमण्ड जुबली के 6 मास चाहिए? 6 मास के बाद ऐसे नहीं कहना, तो कोई मानता नहीं, दुबारा मार्क्स दे दो। चाहे कोई ज्यादा एग्ज़ाम्पल तैयार करे, चाहे कम करे, लेकिन ना शब्द नहीं आना चाहिए। तो इसमें पहला नम्बर कौन लेगा? टीचर्स समझती हैं हो जायेगा? होना ही है। गवर्नमेंट को प्रैक्टिकल मिसाल चाहिए। आप लोग कहते हो ना कि हम सोशल वर्क बहुत करते हैं। तो वो मिसाल चाहती है। तो ऐसा ग्रुप तैयार करना और टीचर्स का काम है कराना। अच्छा।

कुमारियों से

सबसे ज्यादा कुमारियाँ कहाँ से आई हैं? कुमारियाँ तो हल्की हैं ना, उठकर खड़ी हो जाओ। अच्छा, जहाँ से भी आयी हो लेकिन कुमारियों के लिए गाया हुआ है कि कुमारी वो जो अपने दो परिवार का कल्याण करे। तो आपको तो एक ही परिवार है। दूसरा तो है नहीं। तो कुमारियाँ अपने ग्रुप में से, जैसे युवा को कहा वैसे फीमेल्स की भी ऐसी एसोसिएशन्स हैं, और जहाँ-तहाँ हैं, तो जहाँ भी रहते हो वहाँ बिगड़ी हुई आत्माओं को परिवर्तन करके दिखाओ। आप भी ग्रुप बनाओ। तो डायमण्ड जुबली में गवर्नमेंट को दिखायें कि देखो मातायें भी बदल सकती और युवा भी बदल सकते हैं।

माताओं से

प्रवृत्ति वाली मातायें क्या करेंगी? बहुत ऐसी दु:खी आत्मायें हैं जो खराब संग के कारण फंस गई हैं। ऐसी एसोसिएशन्स में नियम प्रमाण जाना, ऐसे नहीं चले जाना जो इन्सल्ट करे और लौटकर आओ, कायदे प्रमाण जाना और टीचर्स देखें तो इसका बोल, चाल, चलन प्रभावशाली है, ऐसा ग्रुप माताओं का, चाहे कुमारियों का, चाहे यूथ का हो। अभी ये माला तैयार करो, तो आप माला में आ जायेंगे। बिगड़े हुए को सुधारो। मातायें कर सकती हैं? बिना छुट्टी के कोई नहीं करना। टीचर्स की छुट्टी से नियम प्रमाण 2-3 का ग्रुप बनाकर जाना। ऐसे नहीं कि सभी चल पड़ो। ऐसे नहीं करना। नियम प्रमाण चलना। समझा। तो मातायें और प्रवृत्ति वाले पाण्डव क्या करेंगे?

प्रवृत्ति वालों से

प्रवृत्ति वाले पाण्डव क्या करेंगे? पाण्डव, जो भी जिस डिपार्टमेन्ट में काम करते हो, हरेक का अपना-अपना क्षेत्र है, तो जहाँ भी लौकिक काम करते हो तो लौकिक कार्य करते हुए भी अलौकिक चाल-चलन से अपना प्रभाव डाल सकते हैं। तो पाण्डवों को कोई न कोई अपने जैसे दो-तीन को तैयार करना है क्योंकि डायमण्ड जुबली में नम्बर बढ़ाना है। इसलिए पाण्डवों को इस कार्य में सहयोग देना है। समझा।

अच्छा, सभी को पाठ याद है? कौन सा पाठ? व्यर्थ बोल मुक्त... याद है? भूल तो नहीं गया? अच्छा।

चारों ओर के पूर्वज आत्माओं को, सदा इस निश्चय और नशे में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बाप के श्रीमत प्रमाण हर कर्म करने वाले कर्मयोगी आत्माओं को, सदा दृढ़ संकल्प से बाप के हर कदम पर कदम रखने वाले फॉलो फादर बच्चों को बहुत-बहुत याद-प्यार और नमस्ते। डबल विदेशियों को डबल नमस्ते।



22-12-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘सर्व प्राप्ति सम्पन्न जीवन की विशेषता है - अप्रसन्नता मुक्त और प्रसन्नता युक्त’’

आज प्यार के सागर बापदादा अपने प्रेम स्वरूप आत्माओं को देख रहे हैं। हर एक के दिल में परमात्म प्यार समाया हुआ है। ये परमात्म प्यार प्राप्त भी एक ही जन्म में होता है। 83 जन्म देव आत्मायें वा साधारण आत्माओं द्वारा मिला। सोचो, याद करो, सारे कल्प का चक्कर लगाओ-स्वदर्शन चक्रधारी हो ना! तो एक सेकण्ड में सारे कल्प का चक्कर लगाया? 83 जन्मों में परमात्म-प्यार मिला था? नहीं मिला। सिर्फ इस संगम पर एक जन्म में परमात्म प्यार प्राप्त हुआ। तो अन्तर को जान लिया ना! आत्माओं का प्यार और परमात्म प्यार-कितना अन्तर है! साधारण आत्माओं का प्यार कहाँ ले गया? क्या प्राप्त कराया - अनुभव है ना? और परमात्म-प्यार कहाँ ले जाता? अपने स्वीट होम और स्वीट राजधानी में। आत्म-प्यार राज्य-भाग्य गँवाता है और परमात्म-प्यार राज्य-भाग्य दिलाता है, और इसी जन्म में। ऐसे नहीं कि सिर्फ भविष्य के आधार पर चल रहे हो। नहीं। डायरेक्ट परमात्म प्राप्ति तो अब है। वर्तमान के आगे भविष्य भी कुछ नहीं है। आप लोग गीत गाते हो ना कि स्वर्ग में क्या होगा और क्या नहीं होगा। और अभी का गीत क्या है? जो पाना था वो पा लिया.... वा पाना है? पा लिया। पाण्डवों ने पा लिया? गोपियों का तो गायन है ही। इस समय का गायन है कि अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खज़ाने में। देवताओं के खज़ाने में नहीं, ब्राह्मणों के खज़ाने में। तो अभी ब्राह्मण हो ना? तो अनुभव करते हो कि अप्राप्त नहीं कोई वस्तु? और ये प्राप्तियाँ अविनाशी हैं, अल्पकाल की नहीं हैं। तो जिसको सर्व प्राप्तियाँ हैं उसके जीवन में क्या विशेषता होगी? सब प्राप्तियाँ हैं, एक भी कम नहीं है तो उसकी चलन और चेहरे में क्या विशेषता दिखाई देगी? सदा प्रसन्नता। कुछ भी हो जाये लेकिन सर्व प्राप्तिवान अपनी प्रसन्नता छोड़ नहीं सकता। अप्रसन्नता कभी भी होती है तो चेक करो कि अप्राप्ति का अनुभव होता है या सर्व प्राप्तियों का?

आज बापदादा ने बहुत ही, सेवाकेन्द्र और उप-सेवाकेन्द्र देखे, विदेश में नहीं, देश में सेवाकेन्द्र देखे। सेवाकेन्द्र में विशेष तो सेवाधारी हैं, तो आज चक्कर लगाते हुए सेवाधारी और सेवास्थान, दोनों देखे। हर एक स्थान में, चाहे छोटे, चाहे बड़े, सभी में चेक किया कि सेवाधारी तन से, मन से, धन से और सेवा के सम्बन्ध-सम्पर्क से कितने प्रसन्न हैं? क्योंकि विशेष तो यही बातें हैं ना! तो क्या देखा?

तन तो सबके पुराने हैं ही, चाहे जवान हैं, चाहे बड़े हैं, छोटे और ही बड़ों से भी कहाँ-कहाँ कमज़ोर हैं, चाहे बीमारी बड़ी है लेकिन बीमारी की महसूसता कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं बीमार हूँ - ये बीमारी को बढ़ा देती है। क्योंकि तन का प्रभाव मन पर आ गया तो डबल बीमार हो गये। तन और मन दोनों से डबल बीमार होने के कारण बार-बार सोल कान्सेस के बजाय बीमारी कान्सेस हो जाते हैं। तो क्या देखा? कि तन से तो मैजारिटी, बीमार कहो या हिसाब-किताब चुक्तु करना कहो, कर रहे हैं, लेकिन 50 परसेन्ट डबल बीमार और 50 परसेन्ट सिंगल बीमार हैं। बाकी होना क्या चाहिए? कभी भी मन में बीमारी का संकल्प नहीं लाना चाहिये-मैं बीमार हूँ, मैं बीमार हूँ..... लेकिन होता क्या है? ये पाठ पक्का हो जाता है कि मैं बीमार हूँ.... कभी-कभी किसी समय बीमार होते नहीं हैं लेकिन मन में खुशी नहीं है तो बहाना करेंगे कि मेरे कमर में दर्द है। क्योंकि मैजारिटी को या तो टांग दर्द, या कमर का दर्द होता है, कई बार दर्द होता नहीं है फिर भी कहेंगे मेरे को कमर में दर्द है। अभी उसकी चेकिंग कैसे हो? डॉक्टर्स के पास इसका कोई थर्मामीटर है, जो कमर दर्द है या नहीं वो चेक कर सके? एक्सरे कराओ, ये कराओ, वो तो और ही खर्चा लगाओ। तो क्या देखा, तन के बारे में सुनाया। कई सेवाधारी ऐसे दिखाई दिये। सेवाधारी आप सभी हो। ऐसे नहीं समझना सिर्फ टीचर्स की बात है। सेवाधारी आप प्रवृत्ति वाले भी हो ना? कि जो सेन्टर्स पर रहते हैं वो सेवाधारी हैं? आप लोग प्रवृत्ति में रहने वाले भी सेवाधारी हो। कभी आपके घरों का भी चक्कर लगायेंगे। देखेंगे कि कैसे सोते हो, कैसे उठते हो? डबल बेड है, सिंगल बेड है? अच्छा ये तो आज के चक्कर की बात है।

आजकल के हिसाब से दवाइयाँ खाना ये बड़ी बात नहीं समझो। क्योंकि कलियुग का वर्तमान समय सबसे शक्तिशाली फ्रूट ये दवाइयाँ हैं। देखो कोई रंग-बिरंगी तो हैं ना। कलियुग के लास्ट का यही एक फ्रूट है तो खा लो प्यार से। दवाई खाना ये बीमारी याद नहीं दिलाता। अगर दवाई को मज़बूरी से खाते हो तो मज़बूरी की दवाई बीमारी याद दिलाती है और शरीर को चलाने के लिये एक शक्ति भर रहे हैं, उस स्मृति में खायेंगे तो दवाई बीमारी याद नहीं दिलायेगी, खुशी दिलायेगी तो बस दो-तीन दिन में दवाई से ठीक हो जायेंगे। आजकल के तो बहुत नये फैशन हैं, कलियुग में सबसे ज्यादा इन्वेन्शन आजकल दवाइयाँ या अलग-अलग थेरापी निकाली है, आज फलानी थेरापी है, आज फलानी, तो ये कलियुग के सीजन का शक्तिशाली फल है। इसलिए घबराओ नहीं। लेकिन दवाई कांसेस, बीमारी कांसेस होकर नहीं खाओ। तो तन की बीमारी होनी ही है, नई बात नहीं है। इसलिए बीमारी से कभी घबराना नहीं। बीमारी आई और उसको फ्रूट थोड़ा खिला दो और विदाई दे दो। अच्छा ये हुआ तन की रिज़ल्ट। फिर और क्या देखा?

मन, मन में क्या देखा? एक बात खुशखबरी की ये देखी कि मैजारिटी हर एक सेवाधारी के मन में बाप का प्यार और सेवा का उमंग दोनों हैं। बाकी 25 परसेन्ट कोई मज़बूरी से चल रहा है, वो छोड़ो। लेकिन मैजारिटी के मन में ये दोनों बातें देखी। और ये भी देखा कि बाप से प्यार होने के कारण याद में भी शक्तिशाली हो बैठने का, चलने का, सेवा करने का अटेन्शन बहुत देते हैं लेकिन खेल क्या होता है कि चाहते हैं कि याद की सीट पर अच्छी तरह से सेट होकर बैठ जायें लेकिन थोड़ा टाइम तो सेट होते हैं फिर हिलना-डुलना शुरू होता है। जैसे बच्चा होता है, उसको ज्यादा टाइम सीट पर बिठाओ तो हिलेगा ज़रुर। तो मन भी अगर कन्ट्रोल में, ऑर्डर में नहीं है तो थोड़ा टाइम तो बहुत अच्छे बैठते हैं, चलते हैं, सेवा भी करते हैं लेकिन कभी सेट होते हैं, कभी अपसेट भी हो जाते हैं। कारण क्या है? होना सेट चाहते हैं लेकिन अपसेट क्यों होते हैं? कारण क्या है? एकाग्रता की शक्ति, दृढ़ता की शक्ति, उसकी कमी है। प्लैन बहुत अच्छा सोचते हैं, ऐसे बैठेंगे, ये अनुभव करेंगे फिर ये सेवा करेंगे, फिर ऐसे चलेंगे, लेकिन कर्म करने में या बैठे-बैठे भी दृढ़ता की शक्ति कम हो जाती है। और बातों में मन-बुद्धि बट जाते हैं। चाहे काम में बिज़ी नहीं है लेकिन व्यर्थ संकल्प ये सबसे बड़ा काम है जो अपने तरफ खींच लेता है। तो स्थूल काम नहीं भी हो लेकिन दृढ़ता की शक्ति बंटने के कारण मन और बुद्धि सीट पर सेट होने के बजाए हलचल में आ जाते हैं।

बापदादा ने आप सबको जो काम दिया था वो देखा। बापदादा के पास सब चिटकियाँ पहुँची। लेकिन कई बच्चे बड़े चालाक हैं। चालाकी क्या करते हैं? चिटकी लिखते हैं लेकिन नाम नहीं लिखते। ऐसे समझकर करते हैं बाबा तो जानता है। जानता है, फिर भी अगर काम दिया है तो काम तो पूरा करो ना। टीचर अगर कहे ये लिखकर आओ और टीचर को कहो कि आप तो जानते हो ना - मुझे ये लिखना आता है, तो टीचर मानेगा? तो कई तो नाम ही नहीं लिखते। लेकिन जो भी जिस ग्रुप में काम दिया है, मैजारिटी सबकी ये खुशी की बात देखी, कि सबने लिखा है कि हम डायमण्ड जुबली तक करके दिखायेंगे। ये मैजारिटी का है। आप सबका भी है? जीवनमुक्त हो जायेंगे? अगर सभी बातों से मुक्त हो गये तो क्या हो जायेंगे? जीवनमुक्त हो जायेंगे ना। तो सभी ने अपनी हिम्मत, उमंग अच्छा दिखाया है, चाहे फॉरेन वालों ने, चाहे भारत वालों ने, उमंग-उत्साह सभी का अच्छा है। कोई-कोई ने, बहुत थोड़ों ने लिखा है, कि हमको टाइम लगेगा। लगने दो उन्हों को। आप लोग तो जीवनमुक्त हो जाओ। तो रिज़ल्ट में देखा कि सभी को उमंग है कि डायमण्ड जुबली में कुछ करके दिखायें। लेकिन बापदादा ने देखा कि जितना अपने आपको डायमण्ड बनाने का उमंग-उत्साह है, उतना ही डायमण्ड जुबली वर्ष में सेवाओं के प्लैन भी बहुत फास्ट बनाये हैं। फास्ट बनाये हैं इसमें बापदादा खुश है लेकिन ऐसा नहीं कहना कि बहुत सेवा का बोझ था ना इसीलिए थोड़ा नीचे-ऊपर हो गया। ये बापदादा नहीं चाहते। सेवा जो स्वयं को वा दूसरे को डिस्टर्ब करे वो सेवा नहीं है, स्वार्थ है। और निमित्त कोई न कोई स्वार्थ ही होता है इसलिए नीचे-ऊपर होते हैं। चाहे अपना, चाहे दूसरे का स्वार्थ जब पूरा नहीं होता है तब सेवा में डिस्टर्बेन्स होती है। इसलिए स्वार्थ से न्यारे और सर्व के सम्बन्ध में प्यारे बनकर सेवा करो, तब जो संकल्प किया है वा लक्ष्य रखा है कि डायमण्ड जुबली में डायमण्ड बन डायमण्ड जुबली मनायेंगे, वह पूरा हो सकेगा। आधा नहीं याद करना। कई ऐसे जवाब देते हैं, कहते हैं डायमण्ड जुबली तो मनाने की थी तो मनाया, उसमें बिज़ी हो गये। लेकिन बापदादा के दोनों शब्द याद रखना। आधा नहीं। डायमण्ड बन, डायमण्ड जुबली मनानी है। सिर्फ मनानी है नहीं, बनकर मनानी है। तो मतलब का अर्थ नहीं लेना - मना लिया ना। लेकिन बनकर मनाया? बनकरके मनाना - ये है डायमण्ड जुबली का लक्ष्य। तो आधा लक्ष्य नहीं पूरा करना। डबल है - बनना और मनाना। सिर्फ बनना नहीं, सिर्फ मनाना नहीं। दोनों साथ-साथ हो। और आप सबको मालूम है कि जब आप डायमण्ड जुबली के वा डायमण्ड बनने के प्लैन बना रहे हो तो आप सबसे पहले माया भी अपना प्लैन बना रही है। इसलिए ये नहीं कहना - क्या करें बाबा, हिम्मत कम हो गई, माया बहुत तेज है, माया को अपने पास रखो। राज्य आप करेंगे और माया को बाबा सम्भालेंगे! राज्य तो आपको करना है ना। मायाजीत जगतजीत बनता है, तो माया को जीतने के बिना जगतजीत कैसे बनेंगे? इसीलिये चारों ओर अटेन्शन प्लीज़। समझा? अच्छा।

चक्कर का आधा सुनाया, आधा फिर सुनायेंगे। सेन्टर कोई-कोई तो बहुत अच्छे सजे-सजाये और कोई सिम्पल तो कोई बहुत रॉयल, कोई बीच के भी थे। ज्यादा हैं जो समझते हैं कि रॉयल लगे, कोई वी.आई.पी. आवे तो उसको लगे कि सेन्टर अच्छा है, लेकिन अपना (ब्राह्मणों का) आदि से अब तक का नियम है कि न बिल्कुल सादा हो, न बहुत रॉयल हो। बीच का होना चाहिये। ब्रह्मा ने तो बहुत साधारण देखा और रहा। लेकिन अभी साधन हैं, साधन देने वाले भी हैं फिर भी कोई भी कार्य करो तो बीच का करो। ऐसा भी कोई न कहे कि यह क्या लगा दिया है - पता नहीं, और न कोई कहे कि ये तो अभी राजाई ठाठ हो गया है। तो आज का पाठ क्या है? मुक्त तो सबसे हो गये ना! सबसे मुक्त होने की प्रतिज्ञा हो गई है ना! पक्की है या घर जायेंगे तो कहेंगे कि मुश्किल है! पक्का रहना। माया को डायमण्ड जुबली में मज़ा चखाकर दिखाओ। मास्टर सर्वशक्तिमान हो, कम तो नहीं हो!

अच्छा, डबल फोरेनर्सभी बहुत आये हैं। स्थापना के कार्य की डबल शोभा-डबल विदेशी हैं। बापदादा जानते हैं कि कितने मेहनत से, युक्ति से यहाँ पहुँचते हैं। अगर लगन कम हो तो पहुँचना भी मुश्किल लगे। एक तरफ बापदादा सुनते हैं कि मनी डाउन हो गई है और दूसरे साल देखते हैं तो और भी विदेशी ज्यादा आ गये हैं। तो ये हिम्मत है। रशिया का ग्रुप भी आया है ना! रशिया वालों ने टिकेट कहाँ से लाई? इन्हों की कहानियाँ बहुत अच्छी सुनने वाली हैं। टिकेट कैसे इकट्ठी करते हैं, उसकी कहानी बहुत अच्छी है। ये तो सब होना ही है। जब है ही कागज़, पेपर ही तो है, चाहे डालर कहो, चाहे पौण्ड कहो, है तो पेपर ही, तो पेपर कहाँ तक चलेगा! सोने का मूल्य है, हीरे का मूल्य है, पेपर का क्या है? मनी डाउन तो होनी ही है। और आपकी मनी सबसे ज्यादा मूल्यवान है। जैसे शुरू में अखबार में डलवाया था ना कि ओम् मण्डली-रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। कमाई का साधन कुछ नहीं था। ब्रह्मा बाप के साथ एक-दो समर्पण हुए और अखबार में डाला रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। तो अभी भी जब चारों ओर ये स्थूल हलचल होगी फिर आपको अखबार में नहीं डालना पड़ेगा। आपके पास अखबार वाले आयेंगे और खुद ही डालेंगे, टी.वी. में दिखायेंगे कि ब्रह्माकुमारीज़ रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। क्योंकि आपके चेहरे चमकते रहेंगे, कुछ भी हो जाये। दिन में खाने की रोटी भी नहीं मिले तो भी आपके चेहरे चमकते रहेंगे। तो चारों ओर होगा दु:ख और आप खुशी में नाचते रहेंगे। इसी को ही कहते हैं मिरूआ मौत मलू का शिकार। इसलिए बापदादा ने आज कहा कि ब्राह्मण जो सच्चे हैं, ब्राह्मण जीवन में श्रेष्ठ जीवन के लक्ष्य वाले हैं उसकी विशेषता है प्रसन्नता। चाहे कोई गाली भाr दे रहे हो तो भी आपके चेहरे पर दु:ख की लहर नहीं आनी चाहिये। प्रसन्नचित्त। गाली देने वाला भी थक जायेगा.., हो सकता है? यह नहीं कि उसने एक घण्टा बोला, मैंने सिर्फ एक सेकण्ड बोला। सेकण्ड भी बोला या सोचा, शक्ल पर अप्रसन्नता आई तो फेल हो गये। इतना सहन किया ना, एक घण्टा सहन किया, फिर गुब्बारे से गैस निकल गई। तो गैस वाले गुब्बारे नहीं बनना। और चाहिये ही क्या? बाप मिला, सब कुछ मिला - गीत तो यही गाते हो ना। तो ऐसे टाइम पर ऐसी-ऐसी बातें याद करो तो चेहरा नहीं बदलेगा। ऐसे नहीं उसके आगे जोर-जोर से हंसने लग जाओ, तो वो और ही गर्म हो जाये। प्रसन्नता अर्थात् आत्मिक मुस्कराहट। बाहर की नहीं, आत्मिक। तो आज का पाठ क्या रहा? सदा अप्रसन्नता मुक्त और प्रसन्नता युक्त, डबल - समझा? अच्छा।

पंजाब

पंजाब ने कोई शेर मधुबन तक लाया है? चीता लाये हैं या शेर लाये हैं? कि अभी शेर को अच्छी तरह से सजाते हो! छोटे-छोटे तो आये हैं। फिर भी पंजाब की सेवा में फर्क तो है। तो वो भी हो जायेगा।

इन्दौर

इन्दौर क्या तैयार कर रहे हैं? क्या नया प्लैन बनाया है जो मधुबन तक बड़े ते बड़े पहुँचे? डायमण्ड जुबली में लास्ट में एक ऐसा प्रोग्राम करो जो सब तरफ के विशेष वी.आई.पी. पहुँचे। आई.पी. नहीं, वी.आई.पी.। चाहे विदेश, चाहे देश - दोनों तरफ से वी.आई.पी. ग्रुप पहुँचे। चाहे थोड़ी संख्या हो लेकिन हो सारा ग्रुप वी.आई.पी. का। ऐसे नहीं बापदादा कहते हैं कि हज़ारों ले आओ, वो तो हो नहीं सकता। थोड़े लाओ लेकिन क्वालिटी लाओ जो एक-एक स्वयं सेवा करे। तैयार कर रहे हो ना? सेवा तो वृद्धि को प्राप्त हो रही है और होती रहेगी। होनी ही है। सिर्फ आप डायमण्ड बन जाओ तो चारों ओर आपकी चमक खींच करके लायेगी।

आसाम, गोहाटी

गोहाटी वाले क्या विशेषता कर रहे हैं? नया प्लैन क्या बनाया है? गोहाटी का कोई मिनिस्टर आया है? (नहीं) तो लाओ ना। गोहाटी का मिनिस्टर रह जावे तो उलहना मिलेगा।

बम्बई

बाम्बे वाले क्या कर रहे हैं? क्या नया प्लैन बनाया है? देखो भाषण किया, मिनिस्टर आया, प्रेज़ीडेन्ट आया, वो तो आये और गये लेकिन ऐसा समीप लाओ जैसे मॉरीशियस वालों ने समीप लाकर खुद अपनी हिम्मत से प्रोग्राम बनाया और इण्डिया गवर्नमेंट ने पूरी मदद दी। ये पहला हिम्मत वाला है। नहीं तो विदेश वाले कहते हैं आना तो चाहते हैं, आप लोग करो। वो नहीं होना है लेकिन जैसे उसने हिम्मत रखा, अपना प्रोग्राम दिया, ऐसे विदेश से अपना प्रोग्राम बनाकर यहाँ के मिनिस्ट्री की आँख खोले कि दूर-दूर से आते हैं और हम यहीं रहे हुए हैं। तो मॉरीशियस को, चाहे छोटा है मॉरीशियस लेकिन हिम्मत में छोटे ने ही तो कमाल की। मॉरीशियस को इस सेवा की मुबारक हो। अच्छा है, देखो ये किसी को भी दृष्टान्त तो दे सकते हो ना! एक्जाम्पल दे सकते हो कि जैसे ये आया वैसे बड़े को तो और ही ज्यादा मदद मिलेगी। तो मॉरीशियस ने आई.पी. के आने का दरवाजा खोला - ये अच्छा किया।

अच्छा, बाम्बे वाले क्या करेंगे? (पीस पार्क बनायेंगे) पीस पार्क बनायेंगे, वो भी अच्छा है। कोई कमाल करके दिखाओ। पीस पार्क बनाना ये भी अच्छी हिम्मत रखी। लेकिन डायमण्ड जुबली में कोई नवीनता करो। सेवा करके कोई शेर को ले आओ..... बॉम्बे के शेर हैं बड़े-बड़े नामीग्रामी इण्डस्ट्रियलिस्ट। ऐसे कोई लाओ जो एक अनेकों को जगाये और सेवा में निमित्त बने। तो बाम्बे वाले ऐसे नामीग्रामी को लाना। ऐसा लाओ जो आगे भी सम्पर्क में आये और लाये। जैसे हैदराबाद में राजू का छोटा मिसाल देखा ना, था तो बहुत छोटा लेकिन आया भी और लाया भी। ऐसा कोई लाओ। नाम तो बाला करके गया ना।

अच्छा, इसी की ट्रेनिंग हो रही है। (ज्ञान सरोवर में सेल्फ मैनेजमेंट लीडरशिप ट्रेनिंग का कार्यक्रम चल रहा है) देखेंगे, ट्रेनिंग तो की, ट्रेनिंग का फल बापदादा के आगे कौन सा लाते हो? ट्रेनिंग कराने वाले डायमण्ड जुबली में बापदादा के आगे फल लाओ। समझा? सेवा बहुत अच्छी है लेकिन अब सम्बन्ध-सम्पर्क में लाओ, ज्ञान-योग में लाओ। सिर्फ अच्छा है, अच्छा है - यहाँ तक ये फल नहीं हो। ये तो छोटा सा एक अंगूर है। बड़ा फल लाओ। कहाँ भी जायेंगे, किसको फल देंगे तो क्या एक अंगूर ले जायेंगे? अगर गिफ्ट देंगे तो कुछ बड़ा फल लायेंगे ना। अच्छा है, कर रहे हो लेकिन इसी लक्ष्य से करो कि डायमण्ड बन और डायमण्ड जुबली में नवीनता करके दिखायेंगे। इसको कहा जाता है ट्रेनिंग की सफलता। चांस तो अच्छा मिला है। अभी देखेंगे कितने फ्रूट थाली भरकर आते हैं या एक फ्रूट आता है या एक अंगूर आता है? अच्छा।

केरला, कर्नाटक

केरला क्या करेगा? केरला की विशेषता क्या होती है? (पढ़े-लिखे बहुत होते हैं) तो इस पढ़ाई में नहीं? सेन्टर तो होने ही हैं। कृष्णा अय्यर जैसा, वो केरला ने नहीं निकाला वो दिल्ली ने निकाला। ऐसा कोई तैयार करो। ऐसे ही चार-पांच का ग्रुप तैयार करो। अच्छा, केरला में नारियल के पेड़ बहुत होते हैं ना! तो आई.पीज.का बिगड़े हुए को सुधारना यह सबसे बड़ी सेवा है। 79 पेड़ पूरा ले आओ। कृष्णा अय्यर छोटा माइक तो है ही, आदि से अन्त तक सेवा में सहयोगी है और रहेगा। अच्छा है। जैसे कृष्णा अय्यर है, मद्रास का गवर्नर है ऐसे निकालो। और ऐसों का संगठन करो फिर देखो आप आराम से बैठे रहेंगे और वो आवाज़ फैलाते रहेंगे। जैसे आजकल की जो नई-नई टीचर्स आती हैं ना वो देखती हैं कि पुरानी दादियाँ तो बड़े आराम से रहती हैं और हम लोगों को भाग-दौड़ कराती हैं। तो आप लोगों को तैयार किया ना तो वो आराम से बैठी हैं। तो आप भी ऐसे तैयार करो जो आप आराम से बैठो। अच्छा।

आन्ध्र प्रदेश

आन्ध्र प्रदेश से एक राजू तो निकला लेकिन वो जल्दी चला गया। अभी आन्ध्र प्रदेश को और ग्रुप तैयार करना चाहिये। क्योंकि आन्ध्र प्रदेश में आई.पी. बहुत हैं। चाहे कहाँ भी मिनिस्टर बन जाते हैं लेकिन फिर भी अपने देश को वैल्यु देते हैं। आन्ध्र प्रदेश का कोई मिलेगा ना तो उसको रिगार्ड से मिलते हैं। देश का नशा होता है ना। तो आन्ध्रा को भी ग्रुप तैयार करना चाहिये। सेन्टर बढ़ रहे हैं, गीता पाठशालायें बढ़ रहीं हैं, ये तो होना ही है, ये अभी बड़ी बात नहीं है। कोई नवीनता करो। बढ़ाओ, और भी गीता पाठशालायें, सेन्टर बढ़ाओ, लेकिन साथ-साथ माइक भी तैयार करो जो प्रत्यक्षता करें। अच्छा।

बेलगाम

बेलगाम क्या कर रहा है? कितने आई.पी. तैयार किये हैं? कम से कम एक कंगन तो तैयार करो। माला छोड़ो। अच्छा।

डबल विदेशी

(यू.के., जर्मनी, सभी से हाथ उठवा कर बापदादा मिल रहे हैं।) फ्रेंकफर्ट ने अपना वायदा तो पूरा कर लिया। बापदादा फ्रेंकफर्ट वालों की हिम्मत पर खुश है और सुदेश बच्ची भी सेवा मन से कर रही है इसीलिए उसको भी मुबारक। सेवा साधारण करना ये कोई बड़ी बात नहीं है, बिगड़ी को बनाना, अनेकता में एकता लाना ये है बड़ी बात। तो जर्मनी वालों प्रति आप सभी भी मुबारक की ताली बजाओ। (स्पेन, .. फ्रांस, हालैण्ड) हॉलैंड भी अच्छा चल रहा है। (साउथ अफ्रीका, मलेशिया, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, न्युजीलैण्ड) अच्छा, ऑस्ट्रेलिया वाले खुश हैं, सन्तुष्ट हैं? यस या नो बोलो। (यस)

देखो कहाँ से भी आये हो लेकिन डबल विदेशी सदा अपने मस्तक पर विजय का तिलक (विक्ट्री का) लगा हुआ देखो। क्योंकि आप लोग बाप के और सर्व ब्राह्मणों के प्यारे हो। तो हम विजयी हैं, विजयी थे और विजयी रहेंगे। ये विजय का तिलक सदा अपने मस्तक में देखो। बहुत-बहुत-बहुत लक्की हो जो कोने-कोने से बापदादा ने आप सबको निकाला है। प्यार से ढूँढ कर आपको अपना बनाया है। देखो कितने कोने-कोने में हो लेकिन बाप ने तो पहचान लिया ना! इसलिए सदा विजयी हैं - ये नशा प्रैक्टिकल में अनुभव करो। सिर्फ मुख से नहीं कहना, मुख से कहो विजय और हार खा रहे हो, ऐसे नहीं। हार हो ही नहीं सकती, हैं ही विजयी। तो विजयी का नशा डबल विदेशियों को सहज और सदा रहे। समझा?

भारत वालों से

आप सभी ने देखा, आपका परिवार कितना बड़ा है! पंजाब वालों ने देखा... बाम्बे वालों ने देखा.... सभी भारत वालों को ये खुशी होती है कि हमारा बाबा का स्थान कोने-कोने में है। जहाँ जाओ वहाँ फ़लक से कह सकते हो कि हमारा घर यहाँ भी है, यहाँ भी है। जहाँ जाओ अपना घर है। तो भारत वालों को डबल विदेशियों को देखकर खुशी होती है? अच्छा!

चारों ओर के बापदादा के प्रेम स्वरूप आत्माओं को, सदा स्वयं को अप्रसन्नता से मुक्त करने वाले तीव्र पुरूषार्था आत्माओं को, सदा याद और सेवा के बैलेन्स द्वारा सेवा की सफलता पाने वाले भाग्यवान आत्माओं को, सदा बाप को प्रत्यक्ष करने के उमंग-उत्साह में रहने वाले देश-विदेश दोनों के सर्व बच्चों को, बाप को अपनी खुशखबरी लिखने वाले, अपनी सेवा का उमंग रखने वाले ऐसे बाप के सदा स्नेही और समीप बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

(विदेश के 4 भाई फिल्म निकाल रहे हैं)

अच्छा, ये ग्रुप भी सेवा के लिए आये हैं। सभी सेवा से खुश हैं? हिम्मत है ना! क्या होगा, कैसे होगा, ये नहीं सोचो। अच्छा है, अच्छा होना ही है। जो श्रेष्ठ स्मृति से कार्य करते हो वो सदा ही अच्छा है। तो ये कभी नहीं सोचो पता नहीं क्या होगा, पता है अच्छा होगा। समझा? अच्छा है हिम्मत बहुत अच्छी रखी। जहाँ हिम्मत है पावरफुल वह है जो फौरन परखकर फैसला कर दे। 81 वहाँ मदद है। अच्छा।

दादियों से

जब आप और ये (दादी और दादी जानकी) मिलते हो तो आपको क्या लगता है? (दादियों ने कहा-बाबा आपको क्या लगता है?) बाप को तो अच्छा लगता है। आपको क्या लगता है? (बाबा ने अच्छी जोड़ी तैयार की है, देश-विदेश अलग होते भी साथ हैं) ये भी ड्रामा में पार्ट है। फिर भी ब्राह्मण परिवार के फाउण्डेशन हो ना। तो आप लोगों को भी अच्छा लगता है ना। बापदादा अपने निमित्त फाउण्डेशन वाली आत्माओं को अपने से भी आगे रखता है। क्योंकि अभी देखो बाप तो है ही निराकार, ब्रह्मा बाप भी आकारी हो गया, अभी साकार में सुनना पड़े, सुनाना पड़े, देखना पड़े, देना पड़े - इसके लिए निमित्त तो ये लोग हैं ना। और सहज चल रहे हैं ये देख आप सभी भी खुश होते हो ना? देखो आप द्वारा (दादी जानकी) ये विदेश सेवा नूँधी हुई थी तो ड्रामा को कोई बदल नहीं सकता। आपको जाना पड़ा और निमित्त बनना पड़ा। विदेश के लिए जरूरी है ना? (बाबा की सकाश है) बापदादा तो अलग हो ही नहीं सकता, ऐसा चिपका हुआ है। क्योंकि आप लोगों को सारा दिन यही कहना पड़ता कि बाबा यह करते, बाबा यह कहते.... बाबा-बाबा ही निकलता रहता है ना। याद कराने के लिए भी कहना पड़ता कि शिवबाबा याद है? कोई रो करके आये और आप बाबा-बाबा कहकर उसको हँसा देते हो। ठीक है? देखो बहुत छोटा सा ग्रुप है लेकिन बहुत काम का है। कितने थोड़े गिनती के हैं। अभी डायमण्ड जुबली तो है ही। लेकिन इस बारी बापदादा नम्बर देंगे कि रीयल में डायमण्ड कितने बनें? देखेंगे विदेश जीतता है या देश? और इसमें भी युवा ज्यादा नम्बर लेते हैं, प्रवृत्ति वाले लेते हैं वा युवा कुमारियाँ लेती हैं? बापदादा को तो खुशी है जो भी नम्बर लेवे। लेकिन इसमें साथियों का भी सर्टिफिकेट चाहिए। ऐसे नहीं अपने आप सिर्फ कहो मैं तो ठीक हूँ। नहीं, सर्टिफिकेट चाहिये। देखेंगे कितने निकलते हैं? वृद्धि तो होनी ही है।

अच्छा। ओम् शान्ति।



31-12-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘डायमण्ड वर्ष में फरिश्ता बनकर बापदादा की छत्रछाया और प्यार की अनुभूति करो’’

आज विश्व को सच्चे डायमण्ड समान चमकाने वाले, प्रकृति को भी डायमण्ड समान चमकाने वाले, विश्व की आत्माओं में से अपने डायरेक्ट बच्चों को डायमण्ड बनाने वाले, साथ-साथ नये वर्ष के साथ नव-युग, नये-विश्व स्थापन करने वाले बाप डायमण्ड बनने वाले बच्चों को देख रहे हैं। साकार स्वरूप में भी बापदादा के सामने कितने डायमण्ड चमक रहे हैं और विश्व के कोने-कोने में चारों ओर चमकते हुए डायमण्ड देख रहे हैं। आत्मा सभी के मस्तक में चमकती हुई डायमण्ड कितनी अच्छी लगती है! सामने से चमकती हुई आत्मा डायमण्ड और इतने संगठित रूप में चारों ओर डायमण्ड ही डायमण्ड देखने में दृश्य कितना प्यारा लगता है! तो ये संगठन किसका है? डायमण्ड्स का है ना? चाहे नम्बरवार हैं फिर भी चमक रहे हैं। चमकते हुए डायमण्ड की सभा बाप के सामने है। आप भी क्या देख रहे हो? डायमण्ड देख रहे हो ना कि शरीर देख रहे हो? 63 जन्म शरीर को ही देखा लेकिन अभी शरीर में चमकता हुआ डायमण्ड दिखाई देता है? कि छिपा हुआ है इसलिए कभी दिखाई देता है, कभी छिप जाता है?

डायमण्ड जुबली है, तो जुबली में क्या होता है? क्या सजाते हैं? आजकल वेरायटी लाइट्स की सजावट ज्यादा होती है। आप लोग भी वृक्ष में यहाँ-वहाँ लाइट लगाते हो ना? वो तो एक दिन के लिए जुबली मनायेंगे या क्रिसमस मनायेंगे या कोई भी उत्सव मनायेंगे लेकिन आप क्या मना रहे हो? डायमण्ड दिवस कहते हो या डायमण्ड वर्ष कहते हो? (डायमण्ड वर्ष) डायमण्ड वर्ष मना रहे हो - पक्का? अगर यही सभी का दृढ़ संकल्प है कि डायमण्ड वर्ष मना रहे हैं, तो आपके मुख में गुलाब-जामुन हो। तो मनाना अर्थात् बनना। तो सारा वर्ष डायमण्ड बनेंगे कि थोड़ा-थोड़ा दाग लगेगा? बापदादा तो बच्चों का उमंग-उत्साह देख पद्मगुणा डबल मुबारक देते हैं। आज डबल है ना, एक नया वर्ष और दूसरा डायमण्ड जुबली - दोनों का संगठन है। तो डायमण्ड वर्ष में बापदादा यही विशेषता देखना चाहते हैं कि हर बच्चे को जब देखो, जिसे देखो तो चमकता हुआ डायमण्ड ही दिखाई दे। मिट्टी के अन्दर वाला डायमण्ड नहीं, चमकता हुआ डायमण्ड। तो सारे वर्ष के लिए ऐसे डायमण्ड बन गये? क्योंकि संकल्प तो आज करना है ना कि डायमण्ड बनेंगे भी और देखेंगे भी। चाहे वो दूसरी आत्मा काला कोयला भी हो, एकदम तमोगुणी आत्मा हो लेकिन आप क्या देखेंगे? कोयला देखेंगे या डायमण्ड? डायमण्ड देखेंगे, अच्छा। तो आपकी दृष्टि पड़ने से उसका भी कालापन कम होता जायेगा। डायमण्ड जुबली में यही सेवा करनी है ना? अमृतवेले से लेकर रात तक जितनों के भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ तो डायमण्ड बन डायमण्ड देखना है। ये पक्का किया है या डायमण्ड जुबली मनाना है तो हर स्थान पर सिर्फ दो तीन फंक्शन किया और डायमण्ड जुबली हो गई? फंक्शन करो, निमन्त्रण दो, जगाओ, ये तो करना ही है और कर भी रहे हैं लेकिन सिर्फ फंक्शन नहीं करने हैं, इस डायमण्ड जुबली में डायमण्ड बन डायमण्ड देखना, डायमण्ड बनाना, ये रोज का फंक्शन है। तो रोज फंक्शन करेंगे या दो-चार दिन, सप्ताह करेंगे?

इस वर्ष में बापदादा की विशेष यही सभी बच्चों के प्रति शुभ आशा कहो वा श्रेष्ठ श्रीमत कहो कि डायमण्ड के बिना और कुछ नहीं बनना है। कुछ भी हो जाये डायमण्ड में दाग नहीं लगाना। अगर किसी भी विघ्न वश हो गये या स्वभाव के वश हो गये तो दाग लग गया। विघ्न तो आने चाहिए ना? विघ्न विनाशक टाइटल है तो विघ्न आयेंगे तब तो विनाश होंगे? अगर कोई विजयी कहे कि दुश्मन नहीं आवे लेकिन मैं विजयी हूँ तो कोई मानेगा? नहीं। तो विघ्न तो आयेंगे, चाहे प्रकृति के, चाहे आत्माओं के, चाहे अनेक प्रकार की परिस्थितियों के विघ्न आये लेकिन आप डायमण्ड ऐसे पावरफुल हो जो दाग का प्रभाव नहीं पड़े। ये हो सकता है?

यह डायमण्ड जुबली वर्ष महान् वर्ष है। जैसे कोई विशेष मास मनाते हैं ना तो ये डायमण्ड जुबली वर्ष महान् वर्ष है। बापदादा इस वषर् में सभी को चलता-फिरता फरिश्ता देखना चाहते हैं। कई कहते हैं कि आत्मा को देखने की सिर्फ सेवाकेन्द्र कल्याणी नहीं, विश्व कल्याणी बनो। 84 कोशिश तो करते हैं लेकिन आत्मा बहुत छोटी बिन्दी है ना तो शरीर दिखाई दे देता है। तो बापदादा कहते हैं चलो बिन्दी खिसक जाती है लेकिन फरिश्ता रूप तो लम्बा-चौड़ा शरीर है, वो तो बिन्दी नहीं है ना, फरिश्ता माना लाइट का आकार। तो फरिश्ते स्वरूप में स्थित होकर हर कर्म करो। ऐसा नहीं है कि फरिश्ता रूप में कर्म नहीं कर सकते हो। कर सकते हो कि साकार चाहिये? क्योंकि साकार शरीर से बहुत जन्मों का प्यार है। तो भूलना चाहते हैं लेकिन भूल नहीं पाते। तो बाप कहते हैं अच्छा अगर आपको शरीर को ही देखने की आदत पड़ गई है तो कोई हर्जा नहीं, अभी लाइट का शरीर देखो। शरीर ही चाहिए तो फरिश्ता भी शरीरधारी है। और आप सभी कहते भी हो कि शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा से बहुत प्यार है। तो प्यार का अर्थ है समान बनना। तो जैसे ब्रह्मा बाबा फरिश्ता रूप है ऐसे ब्रह्मा बाप समान फरिश्ता स्वरूप में स्थित होकर हर कर्म करो। क्योंकि जब डायमण्ड जुबली मना रहे हो, स्थापना के 60 वर्ष सम्पन्न हुए, तो विशेष स्थापना के निमित्त शिव बाप तो है लेकिन निमित्त ब्रह्मा बाबा बना। आप भी अपने को शिव कुमार और शिव कुमारी नहीं कहते हो। ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी कहते हो। तो ब्रह्मा बाप के स्थापना के कार्य की जुबली मना रहे हो। तो जिसकी जुबली मनाई जाती है उसको क्या दिया जाता है? (गिफ्ट) तो आप सभी गिफ्ट देंगे? कि ये गुलाब का पुष्प ले आकर देंगे और कहेंगे कि गिफ्ट हो गई। कोई हाथी ले आयेगा, कोई घोड़ा ले आयेगा, ये गिफ्ट तो है मनोरंजन। ये मनोरंजन भी अच्छा है। सभी देखकरके खुश होते हैं। आज घोड़ा नाच रहा है, आज कोई मनुष्य नाच रहा है, खिलौने देखकर खुश होते हैं। वो भले लाना लेकिन ब्रह्मा बाप को दिल पसन्द गिफ्ट कौन-सी देंगे? देखो, किसी को भी गिफ्ट दी जाती है तो देखा जाता है इसको क्या पसन्द है? देखते हैं कि यह ये पसन्द करेगा या नहीं करेगा? तो ब्रह्मा बाप को क्या प्रिय है? कौन-सी गिफ्ट उसको अच्छी लगती है? बाप के दिल पसन्द गिफ्ट है चलता-फिरता फरिश्ता स्वरूप। तो फरिश्ता समान बन जाओ। फरिश्ते रूप में कोई भी विघ्न आपको प्रभाव नहीं डालेगा। आपके संकल्प, वृत्ति, दृष्टि - सब डबल लाइट हो जायेंगे। तो गिफ्ट देने के लिए तैयार हो? (हाँ जी) देखना आपका टेप भी हो रहा है। अच्छी बात है गोल्डन दुनिया को लाने के लिए फरिश्ते बनेंगे तो जैसे हीरा चमकता है ऐसे आपका फरिश्ता रूप चमकेगा। ये अभ्यास अच्छी तरह से करते रहो।

अमृतवेले उठते स्मृति में लाओ - मैं कौन? फरिश्ता हूँ। संकल्प तो करते हो और चाहते भी हो, फिर भी जब अपनी रिजल्ट देखते हो वा लिख करके भी देते हो, तो मैजारिटी कहते हो कि जितना चाहते हैं उतना नहीं हुआ। 50 परसेन्ट हुआ, 60 परसेन्ट हुआ। तो डायमण्ड जुबली में भी ऐसे परसेन्टेज़ में होंगे या फुल में होंगे? क्या होगा? डबल फोरेनर्स बोलो परसेन्टेज़ होगी? हाँ या ना? थोड़ा-थोड़ा छुट्टी दें! शक्तियों में परसेन्टेज होगी? हाँ उमंग से नहीं करते, सोच के करते हैं। डबल विदेशी या भारत वाले अगर परसेन्टेज़ के बिना फुल पास हो गये तो ब्रह्मा बाबा पता है क्या करेगा? (शाबास देंगे) बस, सिर्फ शाबास दे देगा! और क्या करेगा? रोज़ आपको अमृतवेले अपनी बाहों में समा लेगा। आपको महसूसता होगी कि ब्रह्मा बाबा की बाहों में, अतीन्द्रिय सुख में झूल रहे हैं। बड़ी-बड़ी भाकी मिलेगी। ब्रह्मा बाबा का बच्चों के साथ बहुत प्यार है ना तो अमृतवेले भाकी मिलेगी और सारा दिन क्या मिलेगा? जैसे चित्रों में दिखाते हैं ना, कि जब तूफान आया, पानी बढ़ गया तो सांप छत्रछाया बन गया। उन्होंने तो श्रीकष्ण के लिए स्थूल बात दिखा दी है लेकिन वास्तव में ये है रूहानी बात। तो जो फरिश्ता बनेगा उसके सामने अगर कोई भी परिस्थिति आई या कोई भी विघ्न आया तो बाप स्वयं आपकी छत्रछाया बन जायेंगे। करके देखो। क्योंकि ऐसे ही बापदादा नहीं कहते हैं। अच्छा।

जिन बच्चों की डायमण्ड जुबली है वो हाथ उठाओ। अभी डायमण्ड जुबली वालों से बापदादा बात करते हैं, आप लोगों ने 14 वर्ष में योग तपस्या की तो विघ्न कितने आये लेकिन आपको कुछ हुआ? तो बापदादा छत्रछाया बना ना, कितनी बड़ी-बड़ी बातें हुई। सारी दुनिया, मुखी, नेतायें, गुरू लोग सब एन्टी हो गये, एक ब्रह्माकुमारियाँ अटल रही, प्रैक्टिकल में बेगरी लाइफ भी देखी, तपस्या के समय भिन्न-भिन्न विघ्न भी देखे। बन्दूक भी आई तो तलवारें भी आई, सब आया लेकिन छत्रछाया रही ना। कोई नुकसान हुआ? जब पाकिस्तान हुआ तो लोग हंगामें में डरकर सब छोड़कर भाग गये। और आपका टेनिस कोर्ट सामान से भर गया। क्योंकि जो अच्छी चीज़ लगती थी, वो छोड़ें  कैसे, उससे प्यार होता है ना, तो जो सिन्धी लोग उस समय एन्टी थे वो गाली भी देते थे और सामान भी दिया। जो बढ़िया-बढ़िया चीजें थीं वो हाथ जोड़कर देकर गये कि आप ही यूज़ करो। तो दुनिया वालों के लिए हंगामा था और ब्रह्माकुमारियों के लिए पांच रूपये में सब्जियों की सारी बैलगाड़ी थी। पांच रूपये में सब्जियाँ। आप कितने मजे से सब्जियाँ खाते थे। तो दुनिया वाले डरते थे और आप लोग नाचते थे। तो प्रैक्टिकल में देखा कि ब्रह्मा बाप, दादा - दोनों ही छत्रछाया बन कितना सेफ्टी से स्थापना का कार्य किया। तो जब इन्हों को अनुभव है तो क्या आप अनुभव नहीं कर सकते? पहले आप। जो चाहे, जितना चाहे इस डायमण्ड वर्ष में छत्रछाया का और ब्रह्मा बाप के प्यार का प्रैक्टिकल अनुभव कर सकते हो। ये इस वर्ष को वरदान अर्थात् सहज प्राप्ति है। ज्यादा पुरूषार्थ नहीं करना पड़ेगा। पुरूषार्थ से थक जाते हो ना। जब कोई पुरूषार्थ करके थक जाता है तो उस समय बापदादा उसका चेहरा देखते हैं, रहम भी बहुत आता है। तो अभी क्या करेंगे? क्या बनेंगे? फरिश्ता। फरिश्ता रूप में चलनाफिरना यही डायमण्ड बनना है। क्योंकि जो बहुत कीमती, मूल्यवान, बेदाग डायमण्ड होता है उसकी निशानी क्या होती है? उसे लाइट के आगे रखो तो चमकेगा और जब चमकता है तो उससे किरणें निकलती हैं, उसमें भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। तो जब आप रीयल डायमण्ड बनेंगे, फरिश्ता बन जायेंगे तो आपके फरिश्ते स्वरूप से ये अष्ट शक्तियाँ दिखाई देंगी। जैसे वो रंग किरणों के रूप में दिखाई देते हैं, ऐसे आप डायमण्ड अर्थात् फरिश्ता रूप बनो तो चलते-फिरते आप द्वारा अष्ट शक्तियों के किरणों की अनुभूति होगी। कोई को आपसे सहनशक्ति की फीलिंग आयेगी, कोई को आपसे निर्णय करने के शक्ति की फीलिंग आयेगी, कोई से क्या, कोई से क्या शक्तियों की फीलिंग आयेगी। आप जितना ज्यादा अभ्यास करेंगे, मानो अभी कल से नया वर्ष भी शुरू होगा और डायमण्ड जुबली भी शुरू होगी तो कल से अर्थात् पहला मास जो जनवरी है उस एक मास में आप फरिश्ता रूप में अभ्यास करेंगे और दूसरा मास आयेगा उसमें आपका अभ्यास और बढ़ेगा, तीसरे मास में और बढ़ेगा और जितना-जितना बढ़ता जायेगा ना उतना-उतना आप द्वारा औरों को महसूसता होगी। समझा? तो ये है ब्रह्मा बाप की गिफ्ट। सभी देंगे या कोई-कोई देगा?

अच्छा, मधुबन वाले भी गिफ्ट देंगे ना! मधुबन वाले तो हाँ जी में होशियार हैं। (ज्ञान सरोवर में भी मुरली सुन रहे हैं) ज्ञान सरोवर वाले फरिश्ते बन जायेंगे और ये जो ट्रांसलेट कर रहे हैं, माइक वाले, लाइट वाले, सभी को डबल लाइट, फरिश्ता बनना है। मुश्किल तो नहीं लगता है? 63 जन्म इस शरीर से प्यार है, तो मुश्किल नहीं होगा? जो दृढ़ निश्चय रखते हैं तो निश्चय की विजय कभी टल नहीं सकती। चाहे पांच ही तत्व या आत्मायें कितना भी सामना करें लेकिन वो सामना करेंगे और आप समाने की शक्ति से उस सामना को समा लेंगे। क्योंकि अटल निश्चय है। ये 60 वर्ष जो स्थापना के चले इसमें भी आदि से कमाल ब्रह्मा बाप और अनन्य बच्चों का रहा। कभी निश्चय में हलचल नहीं हुई। विजय हुई पड़ी है, यही बोल सदा ब्रह्मा बाप के रहे।

तो आज विशेष ब्रह्मा बाप ने सभी बच्चों को विशेष मुबारक और बहुतबहुत प्यार दिया। जितने भी हो, चाहे चार लाख हो, चाहे 14 लाख हो, लेकिन ब्रह्मा बाप की भुजायें इतनी बड़ी हैं जो 14 लाख भी एक साथ भुजाओं में समा सकते हैं। इसीलिये परमात्मा का भक्ति मार्ग में विराट रूप दिखाते हैं, जिसमें सब समाये हुए हैं। तो सभी ब्रह्मा बाप की भुजाओं में समाये हुए हो। कुछ भी हो, जैसे छोटा बच्चा क्या करता है, अगर कोई उसको कुछ भी कहता है या कुछ भी होता है तो वह माँ या बाप की बाहों में समा जायेगा। ऐसे होता है ना! तो आप भी ऐसे करो। बच्चे हो ना कि अभी बड़े हो गये हो? 100 साल का भी बाप के आगे तो छोटा बच्चा ही है। तो आपको भी कुछ भी हो ना, बस ब्रह्मा बाप की बाहों में समा जाओ, बस। ये तो सहज है ना?

अच्छा, ये तो है डायमण्ड जुबली की बातें। अभी साथ में आज नया वर्ष भी मनायेंगे ना? तो 12 बजे ये साल पूरा होगा। अभी है थोड़ा टाइम। अभी पुराने साल में बैठे हैं लेकिन नया साल मना रहे हैं। इसके लिये आये हैं ना? डबल विदेशी ज्यादा क्यों आये हो? वैसे तो इण्डिया का टर्न है, डबल विदेशी क्यों आये हो? न्यू इयर मनाने के लिये, क्रिसमस मनाने के लिए। बापदादा को अच्छा लगता है डबल विदेशियों से चिटचैट करने में। तो नया वर्ष भी मनाना है तो पुराने वर्ष को क्या करेंगे? विदाई देंगे। बस सिर्फ मुख से कह दिया विदाई देंगे। या चित्र बनायेंगे वो जा रहा है, वो आ रहा है? पुराने वर्ष को विदाई कैसे देंगे? सिर्फ गीत गायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे! काम क्या करेंगे? देखो साल समाप्त हो रहा है वो विदाई ले रहा है फिर ये वर्ष कब आयेगा? (5 हज़ार वर्ष के बाद) तो ये पांच हज़ार वर्ष के लिये आपसे विदाई लेगा! जो विदाई लेता है उसको भी कुछ दिया जाता है। देखो आप लोग भी जाने वाले होते हो तो आपको विदाई की गिफ्ट मिलती है, तो आप इस पुराने वर्ष को क्या देंगे? कुछ देंगे या खाली भेज देंगे-जाओ, जाओ। क्या देंगे? पुराने को क्या अच्छा लगेगा? पुरानी चीज़। (कमज़ोरी देंगे) बापदादा ने देख् कि कमज़ोरी देते तो हो लेकिन फिर वापस ले लेते हो। देखो, वो (वर्ष) अक्ल वाला है जो पांच हज़ार वर्ष के पहले वापस नहीं आयेगा और आप पुरानी चीजें वापस क्यों लेते हो? चिटकी लिखकर देंगे-हाँ.. बाबा, बस, क्रोध मुक्त हो जायेंगे.... बहुत अच्छा लिखते हैं और रूहरिहान भी करते हैं तो बहुत अच्छा कांध हिलाते हैं, हाँ, हाँ करते हैं। फिर पता नहीं क्यों वापस ले लेते हैं। पुरानी चीजों से प्रीत रखते हैं। फिर कहते हैं हमने तो छोड़ दिया वो हमको नहीं छोड़ती हैं। बाप कहते हैं आप चल रहे हो और चलते हुए कोई कांटा या ऐसी चीज़ आपके पीछे चिपक जाती है तो आप क्या करेंगे? ये सोचेंगे कि ये मुझे छोड़े या मैं छोडूँ? कौन छोड़ेगा? अच्छा, अगर फिर भी वो हवा में उड़ती हुई आपके पास आ जाये तो फिर क्या करेंगे? फिर रख देंगे या फेंक देंगे? फेकेंगे ना? तो ये चीज़ क्यों नहीं फेंकते? अगर गलती से आ भी गई तो जब आपको पसन्द नहीं है और वो चीज़ आपके पास फिर से आती है तो क्या आप वो चीज सम्भाल कर रखेंगे? कोई भी किसको ग़लती से भी अगर कोई खराब चीज़ दे देवे तो क्या उसे आलमारी में सजाकर रखेंगे? फेंक देंगे ना? उसकी फिर से शक्ल भी नहीं दिखाई दे, ऐसे फेंकेंगे। तो ये फिर क्यों वापस लेते हो? बापदादा की ये श्रीमत है क्या कि वापस लो? फिर क्यों लेते हो? वो तो वापस आयेगी क्योंकि उसका आपसे प्यार है लेकिन आपका प्यार नहीं है। उसको आप अच्छे लगते हो और आपको वो अच्छा नहीं लगता है तो क्या करना पड़े? तो बापदादा सभी बच्चों को कहते हैं पुराने वर्ष को विदाई देना अर्थात् जो बातें दिल में सोची है ना, कितनी बातों का इशारा दिया? कितनी बातें हैं, ज्यादा है क्या? (8 बातें हैं) तो विदाई के साथ इन आठ को ही अच्छी तरह से सजाधजा कर विदाई दे दो। समझा? दे सकते हो? हिम्मत है देने की? (हाँ जी) बापदादा को सबसे अच्छा लगता है कि हाँ जी बहुत जल्दी करते हैं।

तो अभी जब वर्ष, पांच हज़ार वर्ष के लिये विदाई लेता है तो आप कम से कम ये छोटा सा ब्राह्मण जन्म एक ही जन्म है, ज्यादा नहीं है, एक ही है और उसमें भी कल का भरोसा नहीं तो वो पांच हज़ार की विदाई लेता है तो आप कम से कम एक जन्म के लिए तो विदाई दो। दे सकते हो? हाँ जी तो करते हो। लेकिन जिस समय वो वापस आती है तो सोचते हो - बड़ा मुश्किल लगता है, छूटता ही नहीं है, क्या करें! छोड़ो तो छूटे। वो नहीं छूटेगा, आप छोड़ो तो छूटेगा। क्योंकि आपने उनसे प्यार बहुत कर लिया है तो वो नहीं छोड़ेगा, आपको छोड़ना पड़ेगा। तो पुराने वर्ष को इस विधि से दृढ़ संकल्प और सम्पूर्ण निश्चय, इस ट्रे में ये आठ ही बातें सजा कर उसको दे दो तो फिर वापस नहीं आयेंगी, निश्चय को हिलाओ नहीं। निश्चय हिल जाता है - क्या हुआ, हो जायेगा, अभी दो हज़ार वर्ष पूरे हुए नहीं, दो हज़ार तक ठीक हो जायेगा.... ये है निश्चय में अलबेलापन। बापदादा को भी बहुत अच्छी-अच्छी बातें कहते हैं-बाबा आप फिक्र नहीं करो, दो हज़ार में पूरा हो जायेगा। अभी थोड़ा-थोड़ा....। लेकिन दो हज़ार की डेट तो बाप ने दी नहीं है, तो ऐसे न हो कि आप दो हज़ार का इन्तज़ार करते रहो और नई दुनिया का इन्तज़ाम पहले से हो जाये। इसीलिये अलबेले मत बनना। रिवाइज़ करो, बार-बार रिवाइज़ करो। क्यों भूल जाते हो? जब कोई काम शुरू करते हो ना तो बहुत अच्छा सोचते हो - मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ, ये भी आत्मा है, आत्मा शरीर से ये काम करा रही है, शुरू ऐसे करते हो। लेकिन काम करते-करते आत्मा मर्ज हो जाती है। आप जो काम करते हो, उसमें हाथ तो चलता ही है लेकिन मन-बुद्धि सहित अपने को बिज़ी कर देते हो। भल बॉडी कान्सेस कम होते हो लेकिन एक्शन कॉन्सेस ज्यादा हो जाते हो। फिर कहते हो बाबा मेरे से कुछ गलती नहीं हुई, मैंने किसको कुछ नहीं कहा, लेकिन बापदादा कहते हैं कि मानो आप बॉडी कान्सेस नहीं हो, एक्शन कान्सेस हो और उसी समय कुछ हो जाये तो रिज़ल्ट क्या होगी? सोल कान्सेस जितना तो नहीं मिलेगा। तो इसकी विधि है बार-बार रिवाइज़ करो, बार-बार चेक करो। जब काम पूरा होता है फिर आप सोचते हो, लेकिन नहीं, जब तक नेचरल सोल कान्सेस हो जाओ तब तक ये सहज विधि है बार-बार रिवाइज़ करना। रिवाइज़ करेंगे तो जो पीछे सोचना पड़ता है वो नहीं होगा। तो रिवाइज़ करने का टाइम है कि बहुत बिज़ी रहते हो? कभी भी अपना चार्ट चेक करते हो तो दो बातें चेक करो। एक बात नहीं। मैंने बुरा नहीं किया अर्थात् कुछ गँवाया नहीं, वो तो ठीक हुआ लेकिन जमा कितना किया? गँवाया नहीं इसकी तो मुबारक हो। लेकिन गँवाया भी नहीं और कमाया भी नहीं तो वो किस लिस्ट में जायेगा? तो चेक करो कि मैंने जमा कितना किया? जमा का खाता चेक करो। क्योंकि सारा कल्प चाहे राज्य करेंगे, चाहे पूजे जायेंगे लेकिन जमा अभी करना है या द्वापर में या सतयुग में करेंगे? तो ये चेक करो कि मैंने जमा कितना किया? कम से कम इतना तो जमा करो जो 21 जन्म रॉयल फैमिली में प्रालब्ध भोगते रहो। अगर कम जमा होगा तो त्रेता में आयेंगे, सतयुग मिस करेंगे। त्रेता में आना पसन्द है? सारा पहला-पहला सुख तो सूर्यवंशी ले लेंगे, चन्द्रवंशियों को बाद में बचा हुआ मिलेगा। तो जमा का खाता चेक करो। सारे दिन में ज्यादा से ज्यादा जमा हो तो सहज ही आप निर्विघ्न हो ही जायेंगे और फरिश्ते रूप में स्थित हो जायेंगे। तो विधि क्या हुई? हर घण्टे रिवाइज़ करो। कौन-सी कान्सेस रहे? कर सकते हो? हो सकता है?

बापदादा ने सबका चार्ट चेक किया तो टोटल 50 परसेन्ट बच्चे दूसरों को देख स्वयं अलबेले रहते हैं। कहाँ-कहाँ अच्छे-अच्छे बच्चे भी अलबेलेपन में बहुत आते हैं। ये तो होता ही है..... ये तो चलता ही है.... चलने दो... सभी चलते हैं.... बापदादा को हंसी आती है कि क्या अगर एक ने ठोकर खाई तो उसको देखकर आप अलबेलेपन में आकर ठोकर खाते हो, ये समझदारी है? तो इस अलबेलेपन का पश्चाताप बहुत-बहुत-बहुत बड़ा है। अभी बड़ी बात नहीं लगती है, हाँ चलो... लेकिन बापदादा सब देखते हैं कि कितने अलबेले होते हैं, कितने औरों को नीचे जाने में फॉलो करते हैं? तो बापदादा को बहुत रहम आता है कि पश्चाताप की घड़ियाँ कितनी कठिन होगी। इसलिए अलबेलेपन की लहर को, दूसरों को देखने की लहर को इस पुराने वर्ष में मन से विदाई दो। जब थोड़ा उमंग-उत्साह आता है ना तो थोड़े समय के लिए वैराग्य आता है लेकिन वो अल्पकाल का वैराग्य होता है। इसलिए जो बापदादा ने मुक्त होने की बातें सुनाई हैं, उसके ऊपर बहुत अटेन्शन देना। जितने पुराने होते हैं ना तो देखा गया है कि पुरानों में अलबेलापन ज्यादा आता है। जो पहले-पहले का जोश, उमंग होता है, वो नहीं होता है। पढ़ाई का भी अलबेलापन आ जाता है, सब सुन लिया, समझ लिया। सोचो, अगर समझ लिया, सोच लिया तो बापदादा पढ़ाई पूरी कर देते। जब स्टूडेन्ट पढ़ चुके तो फिर क्यों पढ़ाई पढ़ाये? फिर तो समाप्त कर दें ना! लेकिन इस अलबेलेपन को अच्छी तरह से विदाई दो। औरों को नहीं देखो। बाप को देखो। ब्रह्मा बाप को देखो। अगर कोई ठोकर खाता है तो महारथी का काम है ठोकर से बचाना, न कि खुद फॉलो करना। तो पुराने वर्ष को अच्छी तरह से विदाई देंगे ना? अभी कितना बजा है? पौने दस। अच्छा! तो अभी दो घण्टे हैं, दो घण्टे में विदाई का सामान तैयार कर दो। बापदादा देखेंगे कि बाप को गिफ्ट देने में ज्यादा नम्बर डबल विदेशी लेते हैं या भारत वाले लेते हैं? दोनों लेंगे ना? हाँ या ना बोलो। अच्छा, डबल विदेशी कितने देशों से आये हैं? (36) और भारत के कितने ज़ोन आये? (पांच) भारत के पांच ज़ोन से आये हैं और वो 36 देशों से आये हैं। डबल विदेशी सदा बापदादा को अपना साथी समझकर साथ रहते हैं ना। जितना नाम है विदेश, उतना ही साथ भी बाप का नज़दीक अनुभव करते हो? क्योंकि जब तक बाप साथ है तो माया भी बाप का साथ देखकर दूर से ही भाग जाती है। अकेले होते हो तो माया को चांस मिलता है। अकेले नहीं हो तो माया को चांस मिल नहीं सकता। और जब बाप स्वयं ऑफर करता है कि मैं बच्चों का साथी हूँ तो भगवान की ऑफर सारे कल्प में फिर मिलेगी? तो स्वयं बाप की ऑफर है - साथ रहो। कोई भी मुश्किल बात साथ से सहज हो जाती है। तो साथ का अनुभव होता है? डबल विदेशी ब्राह्मण परिवार का विशेष श्रृंगार हैं। जैसे आज विशेष श्रृंगार किया है ना। (पूरी स्टेज सुगन्धित फूल मालाओं से सजाई गई है) अच्छा लगता है ना! तो आप लोग भी एक- एक रत्न ब्राह्मण परिवार का श्रृंगार हो। तो श्रृंगार कभी गिर नहीं जाये, श्रृंगार गिर गया तो कैसे लगेगा? अभी श्रृंगार किया है और गिर जाये तो क्या अच्छा लगेगा? सदैव समझो कि हम ब्राह्मण परिवार के ताज के हीरे हैं। तो ताज से एक भी हीरा गिर जाये तो अच्छा लगेगा? तो इतना अपना महत्व समझो। साधारण नहीं समझो, महान् हो।

अच्छा है, चारों ओर से सेवा के समाचार भी बहुत अच्छे आते रहते हैं। भारत के अपने प्रोग्राम हैं, विदेश के अपने हैं। तो सेवा में अपने को बिज़ी रखते हैं और सदा रखना भी है। सेवा सेफ्टी का साधन है। जितना अपने को बिज़ी रखेंगे उतना सेफ रहेंगे। समझा?

(विदेश से सिन्धी भाई-बहिनों का ग्रुप आया है, बापदादा ने सभी को आगे बुलाकर बिठाया) इतना बड़ा ब्राह्मण परिवार देख खुशी होती है? देखो कितने हैं आपके परिवार में! और सारा परिवार चुने हुए श्रेष्ठ आत्माओं का है। तो भारत वाले आप लोगों को देखकर खुश होते हैं क्योंकि खास जो बरखिलाफ थे वो फेवर में हो गये। सिन्ध में काके, चाचे, मामे, गायन भी है मामा, काका, चाचा ... तो उन्हीं परिवार से निकल आये। तो कितने लक्की हो। सिन्धी लोग बहुत बरखिलाफ थे ना और अभी नज़दीक आये हैं इसीलिये इस ग्रुप को नज़दीक बिठाया है। आपका ग्रुप सब खुश है? अच्छा।

सभी डबल विदेशी सदा बाप के साथी हैं इसीलिये साथी का स्थान कौन सा है? साथी कहाँ रहते हैं? दिलतख्त पर। तो रहते हो या कभी-कभी उतर आते हो? सदा बाप के साथी हैं, इसीलिये तख्त नशीन हैं, अधिकार है तख्त पर। जो साथी होता है, मानो राजा है, अभी राजा तख्त पर बैठेगा तो रानी अधिकारी है ना। क्योंकि साथी है। तो आप सभी डबल विदेशी साथी हो ना? तो आपका दिलतख्त संगमयुग का अधिकार है। इसका मतलब ये नहीं है कि भारतवासी नहीं हैं। अभी डबल विदेशियों से बात कर रहे हैं इसलिये डबल विदेशी कह रहे हैं, बाकी जो भी साथी हैं वो सब अधिकारी हैं। फिर भी दौड़- धूप करके पहुँच तो जाते हो ना! तो क्या याद रखेंगे? कौन हो? साथी हैं और तख्तनशीन हैं। समझा?

भारत वासियों प्रति

भारतवासी ठीक हैं? भारतवासियों को तो नशा है कि अगर भारत में बाप नहीं आते तो विदेशी कहाँ से आते? क्योंकि बापदादा को ड्रामा में गरीब  निवाज़ कहा जाता है तो विदेश गरीब नहीं है, भारत गरीब है और बाप को गरीब पसन्द हैं। इसीलिये गरीब से गरीब भारत में आया, लण्डन में नहीं आया। अमेरिका में भी नहीं आया। भारत अविनाशी है। अविनाशी खण्ड फिर भी भारत ही होगा। ये अमेरिका तो अभी निकली है, अभी खत्म हो जायेगी। बाप अविनाशी है तो अविनाशी खण्ड में ही आता है। भारत को नशा भी बहुत है। भारत को सबसे बड़ा नशा है कि हमने भगवान को भी अपने प्यार के रस्सी में बांध लिया है। देखो अभी भी भारत में आते हैं ना। आप सबको भी भारत में मिलने आना है। तो भारत भी कम नहीं और विदेश भी कम नहीं। दोनों लाडले हैं। अच्छा।

(सिन्धी भाई-बहिनों से) कितने आये हैं? 70 आये हैं। अभी फिर माला पूरी करके आयेंगे। दो प्रकार के आये हैं। लेकिन आते-आते आखिर जायेंगे कहाँ? कितना भी कोशिश करें किनारे करने की, लेकिन नहीं हो सकता। बाप को छोड़ सकते हो? बाप कहे आप नहीं आओ फिर क्या करेंगे? (आयेंगे) क्यों आयेंगे? बाप कहे नहीं आओ फिर भी आयेंगे क्यों? कहो अधिकार है मेरा। मेरा घर है, मेरा बाप है। तो अधिकार है। सोचते हैं बाबा मिलेगा, नहीं मिलेगा, देखेगा, नहीं देखेगा...। देख लिया ना! अभी इन्हों को सभी सिन्धियों को जगाना है। सब ओर जग रहे हैं। जितना बड़ा करना चाहो करो। ऐसी सीज़न में करो जो सब होटल पहले से बुक कर लें। जिस होटल में भी जायें तो ब्रह्माकुमारियों का हो। जगाना तो सबको है और भारत में तो जगाने के बहुत अच्छे-अच्छे प्रोग्राम रखे हैं। बापदादा के पास सब समाचार आये हैं कि भारत जम्प लगा रहा है कि भारत में कोने-कोने में सन्देश मिल जाये। कोई रह नहीं जाये। तो ये बहुत अच्छी बात है। उलहना पूरा हो जायेगा।

यूथ से

यूथ की रिट्रीट चल रही है। देश-विदेश का मिलकर प्रोग्राम हो रहा है। इनका टीचर कौन है? तो अच्छा लगता है यूथ को? स्टूडेन्ट भी राजी और टीचर भी राजी, दोनों राजी। अच्छा। बहुत अच्छा प्रॉमिस किया है, पक्का रखना। सभी ने मिलकर जो प्रॉमिस किया है वो मुख से बोलो। (सभी ने बोलकर प्रॉमिस की) बहुत अच्छा, ताली बजाओ। अच्छा। देखो ऐसे देश-विदेश के यूथ इकट्ठे होकर कमाल करके दिखायें तो गवर्नमेंट क्या करेगी? जब देखेगी कि देश-विदेश के सब मिलकर दृढ़ संकल्प किया है तो आप यूथ के संकल्प के आगे आपेही सरेण्डर हो जायेंगे। कभी प्रोग्राम बनायेंगे तो देशविदेश के यूथ इण्डिया की गवर्नमेंट को जगायेंगे। वो भी खुश होंगे। अच्छा!

चारों ओर के चमकते हुए सच्चे डायमण्डस को, सदा निश्चय और दृढ़ संकल्प द्वारा स्वयं को सच्चा डायमण्ड बनाए औरों को बनाने वाले, सदा बापदादा के समान डबल लाइट फरिश्ता स्वरूप में स्थित होने वाले श्रेष्ठ आत्मायें, सदा बाप और सेवा दोनों में बिज़ी रहने वाले मायाजीत सो विश्व के राज्य-भाग्य जीत, ऐसे संगमयुगी डायमण्ड्स को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

देखो, यह यहाँ का रिवाज़ है 12 बजे बेल बजेगा, तो बापदादा को बच्चों की बात रखनी पड़ती है। वैसे तो 11 बजे बेल लगाओ या 12 बजे। ब्राह्मण नहीं मनायेंगे तो कौन मनायेंगे!

(डायमण्ड जुबली के उपलक्ष्य में बच्चों ने गीत गाये, नये वर्ष की बधाइयाँ दी, कार्ड आदि बापदादा को दिये, तत्पश्चात् नये वर्ष का शुभारम्भ होते ही बापदादा ने सभी को बधाइयाँ दी)

आज के दिन डबल मुबारक है। एक नये वर्ष की और दूसरी डायमण्ड जुबली वर्ष की। तो सदा इस वर्ष को अपने दोनों स्वरूप एक डबल लाइट फरिश्ता और दूसरा सच्चा डायमण्ड, बेदाग डायमण्ड, अमूल्य डायमण्ड। तो डायमण्ड बनकर अनेक आत्माओं को डायमण्ड बनाना - यही इस वर्ष का लक्ष्य है। और बापदादा जानते हैं कि ब्राह्मण बच्चे लक्ष्य और लक्षण को साथ-साथ करके दिखाते हैं। तो ये डायमण्ड जुबली वर्ष अनेक आत्माओं के, बाप के समीप आने का वर्ष है। और साथ-साथ यह वर्ष सहज बाप के साथ रहने से सहज ही प्राप्ति का वर्ष है। इसलिए चारों ओर के बच्चे इस सहज वरदान का पूरा-पूरा लाभ लेंगे और औरों को दिलायेंगे। डायमण्ड गुडनाइट और गुडमोर्निंग दोनों।

चारों ओर के बच्चों के बहुत खुशी और उमंग-उत्साह के कार्ड मिले, पत्र भी मिले और सभी को रिटर्न में डबल प्यार और मुबारक हो।

(4 जनवरी को तलहटी में बहुत बड़े हाल का फाउण्डेशन स्टोन लगा रहे हैं, यह समाचार बापदादा को सुनाया गया)

जब डायमण्ड जुबली में सेवा करेंगे तो उन्हों को बैठने के लिए जगह बनाई है कि आप बाहर बैठेंगे उन्हों को अन्दर बिठायेंगे, क्या करेंगे? आप अन्दर ही बैठेंगे, बाहर नहीं। अगर बाहर माइक में सुनने आये तो अन्दर बैठेंगे? तो क्या करना पड़े? इसी शुभ संकल्प से अभी नीचे ज्यादा में ज्यादा मिल सके, बैठ सके, उसके लिए पहले स्टेज का फाउण्डेशन डाल रहे हैं और सभी डालेंगे ना। चारों ओर के देश-विदेश के बच्चों के अंगुली से जब ज्ञान सरोवर बन गया तो ये तो उसके आगे कुछ भी नहीं है। वो तो सभी के संकल्प और सहयोग से सहज से सहज बनना ही है। आपको पसन्द है? डबल विदेशियों को ज्यादा अच्छा लगता है कि भारतवासियों को अच्छा लगता है? दोनों को अच्छा लगता। तो फिर फाउण्डेशन डालना अर्थात् अंगुली देना। पहाड़ तो उठा ही पड़ा है। ठीक है ना? देश और विदेश का संगठन का मेला है तो देश और विदेश दोनों मिलकर जो फाउण्डेशन डालेंगे वो कितना अच्छा होगा! तो जो भी होंगे उन सबके तरफ से उस धरनी पर स्नेह से फाउण्डेशन डालेंगे। अच्छा!



09-01-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘बालक सो मालिकपन के नशे में रहने के लिए मन का राजा बनो’’

आज विश्व के मालिक बाप अपने चारों ओर के मालिक सो बालक बच्चों को देख रहे हैं। बालक भी हो तो मालिक भी हो। विश्व के मालिक भविष्य में बनेंगे लेकिन बाप के सर्व खजानों के मालिक अभी हो। विश्व राज्य अधिकारी भविष्य में बनेंगे लेकिन स्वराज्य अधिकारी अभी हो। इसलिए बालक भी हो और मालिक भी हो। दोनों हो ना! बालकपन का नशा सदा रहता ही है। बापदादा ने देखा कि बालकपन का नशा चाहे इमर्ज रूप में, चाहे मर्ज रूप में मैजारिटी को रहता है। क्योंकि अगर याद में बैठते हो तो भी क्या याद रहता है? बाबा। तो बाबाये सोचना वा कहना, बच्चा है तब बाबा कहते हैं। और जो सच्चे सेवाधारी हैं उनके मुख से बार-बार क्या निकलता है? बाबा ने ये कहा, बाबा ये कहते हैं। सारे दिन में चेक करो तो कितने बारी बाबा-बाबाशब्द सेवा में कहते रहते हो? लेकिन दो प्रकार से बाबाशब्द कहने वाले हैं। एक है दिल से बाबाकहने वाले और दूसरे हैं नॉलेज के दिमाग से कहने वाले। जो दिल से बाबाकहते हैं उनको सदा सहज दिल में बाबा द्वारा प्रत्यक्ष प्राप्ति खुशी और शक्ति मिलती है और जो सिर्फ दिमाग अच्छा होने के कारण नॉलेज के प्रमाण बाबा-बाबाशब्द कहते हैं उन्हों को उस समय बोलने में अपने को भी खुशी होती और सुनने वालों को भी उस समय तक खुशी होती, अच्छा लगता लेकिन सदाकाल के लिए दिल में खुशी और शक्ति दोनों हो, वो सदा नहीं रहती, कभी रहती, कभी नहीं, क्यों? दिल से बाबानहीं कहा। तो बापदादा ने देखा कि बालकपन का निश्चय सभी को है, नशा कभी है, कभी नहीं है। बाबा के हैं - ये निश्चय, इसमें मैजारिटी ठीक हैं। बालक तो हो ही लेकिन सिर्फ बालक नहीं हो बालक सो मालिक हो। डबल है।

तो मालिकपन - एक स्वराज्य अधिकारी मालिक और दूसरा बाप के सर्व खज़ानों के मालिक, क्योंकि सर्व खजानों को अपना बनाते हो, मेरा वर्सा है, दाता बाप है लेकिन बाप ने दिया कि आप वर्से के मालिक हो। तो यह वर्सा सबको मिला है? किसको कम, किसको ज्यादा तो नहीं मिला है? सबको एक जैसा मिला है ना? या किसको एक करोड़ मिला है और किसको 10 करोड़, ऐसे तो नहीं है ना? क्योंकि बाप के खज़ाने बेहद के हैं। कितने भी बच्चे हो लेकिन बाप के खज़ाने कम होने वाले नहीं हैं। खुला और सम्पन्न भण्डार है। इसलिए बाप किसको कम क्यों देवें! जब है ही बच्चों के लिए तो किसको ज्यादा, किसको कम क्यों दें! तो एक बाप के वर्से के अधिकारी मालिक और दूसरा स्वराज्य के मालिक। तो स्वराज्य मिला है? दोनों के मालिक हो? पक्का है ना? तो मालिक होकर कितना समय चलते हो? कहते भी हो कि स्वराज्य हमारा बर्थ राइट है। कहते हो ना या महारथियों का बर्थ राइट है, हमारा थोड़ा है? स्वराज्य का अधिकार सभी को मिला है कि थोड़ा-थोड़ा मिला है? इस पर पूरा पक्का रहना। तो चेक करो कि स्व की सर्व कर्मेन्द्रियाँ आर्डर प्रमाण हैं? कर्मेन्द्रियाँ, आप स्वराज्य अधिकारी बच्चों के कर्मचारी हैं ना? मालिक तो नहीं हैं? आप मालिक हो, ये ठीक है? कि कर्मचारी मालिक हैं और आप कर्मचारी बन जाते हो?

तो बापदादा ने देखा कि बच्चों की स्थिति में सबसे ज्यादा जो मालिकपन भुलाने वाला है वा समय प्रति समय राजा से अपने वश में करने वाला है - वो है मन। इसलिए बाप का मन्त्र भी है मन्मनाभव। तन-मनाभव, धन-मनाभव या बुद्धि-मनाभव नहीं है। मन्मनाभव है। तो मन अपना प्रभाव डाल देता है। मन के वश में आ जाते हैं। देखो कोई भी छोटी सी व्यर्थ बात वा व्यर्थ वातावरण वा व्यर्थ दृश्य सबका प्रभाव पहले किस पर पड़ता है? मन पर प्रभाव पड़ता है ना, फिर बुद्धि उसको सहयोग देती है। मन और बुद्धि अगर उसी प्रकार चलती रहती तो संस्कार बन जाता है। अभी भी अपने को चेक करो तो मेरा जो व्यर्थ संस्कार है वो बना कैसे? मानो किसी का संस्कार छोटी सी बात में सेकण्ड में, मन में फीलिंग आने का बन गया है तो ये संस्कार बना कैसे? फिर कहते हैं चाहते नहीं हैं, सोचते भी हैं लेकिन हो जाता है। इसको कहा जाता है संस्कारवश। कोई का थोड़े टाइम में मन मायूस हो जाता, थोड़ा सा देखा, सुना और मन मायूस हो गया। फिर अगर कोई पूछेगा तो क्या कहेंगे? कहेंगे, नहीं कोई बात नहीं, ये मेरे संस्कार हैं। ठीक हो जायेगा, संस्कार हैं। लेकिन बना कैसे? मन और बुद्धि के आधार से संस्कार बन गया। फिर भिन्न-भिन्न संस्कार हैं जो ब्राह्मण संस्कार नहीं हैं। बापदादा तो सोचते हैं कि कहलाने में तो किसी से भी पूछेंगे कि आप कौन हो? तो क्या कहेंगे? ब्रह्माकुमारी या ब्रह्माकुमार हैं। तो ब्रह्मा के बच्चे क्या हुए? ब्राह्मण। लेकिन जब व्यर्थ संस्कार के वश हो जाते हो तो क्या उस समय ब्रह्माकुमार, ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो? उस समय कौन हो? यदि अपने से युद्ध करते हो - ये नहीं, ये नहीं... तो ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो? कई बच्चे कहते हैं दो दिन से मेरे मन में खुशी गुम हो गई, पता नहीं क्यों? वैसै तो अन्दर समझते हैं लेकिन बाहर से कहते हैं पता नहीं क्यों! लेकिन वो दिन ब्राह्मण हैं या क्षत्रिय हैं? जिसकी खुशी गुम हो जाये तो ब्राह्मण हैं? तो क्या कभी क्षत्रिय बनते हो, कभी ब्राह्मण बनते हो? सभी ने कहा ना मालिक हैं, लेकिन उस समय क्या हैं? मालिक हैं या परवश हैं?

तो बापदादा ने देखा कि मालिकपन को हिलाने वाला विशेष मन है। और आप स्वराज्य अधिकारी राजा हो, मन आपका मन्त्री है। वा मन मालिक है, आप मन्त्री हो? आप राजा हो ना, मन तो राजा नहीं है? मन्त्री है, सहयोगी है। तो मन का मालिकपन - ये सदा हो तब कहेंगे कि स्वराज्य अधिकारी। नहीं तो कभी अधिकारी, कभी अधीन। इसका कारण क्या है? क्यों नहीं परिवर्तन होता? जब समझते भी हो फिर भी संस्कार के वश हो जाते हो। इसलिए पहले मन को कन्ट्रोल करो। कहते हो राजा हैं लेकिन राजा का अर्थ है जिसमें रूलिंग पॉवर हो। अगर नाम राजा हो और रूलिंग पॉवर नहीं तो उसका क्या हाल होगा? उसका राज्य चलेगा? नहीं चलेगा। तो रूलिंग पॉवर कितने परसेन्टेज में आई है - ये चेक करो।

एक ग़लती बहुत करते हो उसके कारण भी संस्कार के ऊपर विजय नहीं प्राप्त कर सकते, बहुत टाइम लगता है समझते हैं कल से नहीं करेंगे लेकिन जब कल होता है तो आज से कल की बात बड़ी हो जाती है। तो कहते हैं कल छोटी बात थी ना आज तो बहुत बड़ी बात थी। तो बड़ी बात होने के कारण थोड़ा हो गया, फिर ठीक कर लेंगे-ये बड़ों को वा अपने दिल को दिलासा देते हो और ये दिलासा देते हुए चलते हो लेकिन ये दिलासा नहीं है, ये धोखा है। उस समय थोड़े समय के लिए अपने को या दूसरों को दिलासा देना-बस अभी ठीक हो जायेंगे, लेकिन ये स्वयं को धोखा देने की आदत पक्की करते जाते चलते-फिरते फरिश्ता स्वरूप में रहना-यही ब्रह्मा बाप की दिल-पसन्द गिफ्ट है। 99 हो। जो उस समय पता नहीं पड़ता लेकिन जब प्रैक्टिकल में धोखा मिलता है तभी समझते हैं कि हाँ ये धोखा ही है। तो भूल क्या करते हो? जब बड़े या छोटे एक-दो को शिक्षा देते हैं तो क्या कहते हो? ये मेरा स्वभाव है, मेरा संस्कार है, कोई का फीलिंग का, कोई का किनारा करने का, कोई का बार-बार परचिन्तन करने का, कोई का परचिन्तन सुनने का, भिन्न-भिन्न हैं, उसको तो आप बाप से भी ज्यादा जानते हो। लेकिन बापदादा कहते हैं कि जिसको आपने मेरा संस्कार कहा वो मेरा है? किसका है? (रावण का) तो मेरा क्यों कहा? ये तो कभी नहीं कहते हो कि ये रावण के संस्कार हैं। कहते हो मेरे संस्कार हैं। तो ये मेराशब्द - यही पुरूषार्थ में ढीला करता है। ये रावण की चीज़ अन्दर छिपाकर क्यों रखी है? लोग तो रावण को मारने के बाद जलाते हैं, जलाने के बाद जो भी कुछ बचता है वो भी पानी में डाल देते हैं, और आपने मेरा बनाकर रख दिया है! तो जहाँ रावण की चीज़ होगी वहाँ अशुद्ध के साथ शुद्ध संस्कार इकट्ठे रहेंगे क्या? और राज्य किसका है? अशुद्ध का। शुद्ध का तो नहीं है ना! तो राज्य है अशुद्ध का और अशुद्ध चीज़ अपने पास सम्भाल कर रख दी है। जैसे सोना या हीरा सम्भाल के रखा हो। इसलिए अशुद्ध और शुद्ध दोनों की युद्ध चलती रहती है तो बार-बार ब्राह्मण से क्षत्रिय बन जाते हैं। मेरा संस्कार क्या है? जो बाप का संस्कार है, विशेष है ही विश्व कल्याणकारी, शुभ चिन्तनधारी। सबके शुभ भावना, शुभ कामनाधारी। ये हैं ओरिजनल मेरे संस्कार। बाकी मेरे नहीं हैं। और यही अशुद्धि जो अन्दर छिपी हुई है ना, वो सम्पूर्ण शुद्ध बनने में विघ्न डालती है। तो जो बनना चाहते हो, लक्ष्य रखते हो लेकिन प्रैक्टिकल में फर्क पड़ जाता है।

मैजॉरिटी ने सोचा है, कइयों ने तो अपना संकल्प किया भी, लिखा भी कि इस डायमण्ड जुबली में बाप समान डायमण्ड बनना ही है। ये संकल्प है या सोचना है? सोचना हो तो सोच लो! लेकिन नम्बर पीछे मिलेगा। कहावत भी है कि जो करेगा वो पायेगा। ये तो नहीं है ना कि जो सोचेगा वो पायेगा! तो संकल्प बहुत अच्छा करते हो। बापदादा भी पढ़ करके, सुन करके खुश होते हैं लेकिन ये रावण की चीज़ जो छिपाकर रखी है ना वो मन का मालिक बनने नहीं देती। मेरी आदत है, मेरा स्वभाव है, मेरा संस्कार है, मेरी नेचर है-ये सब रावण की जायदाद साथ में, दिल में रख दी है, तो दिलाराम कहाँ बैठेगा! रावण के वर्से के ऊपर बैठे क्या! तो अभी इसको मिटाओ। जब मेरा शब्द बोलते हो तो याद करो-मेरा स्वभाव या मेरी नेचर क्या है? और मन को दुनिया वाले भी कहते हैं ये घोड़ा है, बहुत भागता है और तेज भागता है लेकिन आपका मन भागना चाहिये? आपको श्रीमत का लगाम मज़बूत है। अगर लगाम ठीक है तो कुछ भी हलचल नहीं हो सकती। लेकिन करते क्या हो? बापदादा तो देखते रहते हैं ना तो हंसी भी आती है, जैसे सवारी को चला रहे हो, लगाम हाथ में है लेकिन अगर चलते-चलते लगाम पकड़ने वाले की बुद्धि या मन कोई साइटसीन के तरफ लग गई तो क्या होगा? लगाम ढीला होगा! और लगाम ढीला होने से मन चंचलता जरूर करेगा। तो श्रीमत का लगाम सदा अपने अन्दर स्मृति में रखो। जब भी कोई बात हो, मन चंचल हो तो श्रीमत का लगाम टाइट करो। फिर कुछ नहीं होगा। फिर मंज़िल पर पहुँच जायेंगे। तो श्रीमत हर कदम के लिए है, श्रीमत सिर्फ ब्रह्मचारी बनो ये नहीं है। हर कर्म के लिये श्रीमत है। चलना, खाना, पीना, सुनना, सुनाना - सबकी श्रीमत है। है, कि नहीं है? मानो आप परचिन्तन कर रहे हो तो क्या ये श्रीमत है? श्रीमत को ढीला किया तो मन को चांस मिलता है चंचल बनने का। फिर उसको आदत पड़ जाती है। तो आदत डालने वाला कौन? आप ही हो ना! तो पहले मन का राजा बनो। चेक करो - अन्दर ही अन्दर ये मन्त्री अपना राज्य तो नहीं स्थापन कर रहे हैं? जैसे आजकल के राज्य में अलग ग्रुप बना करके और पॉवर में आ जाते हैं। और पहले वालों को हिलाने की कोशिश करते हैं तो ये मन भी ऐसे करता है, बुद्धि को भी अपना बना लेता है। मुख को, कान को, सबको अपना बना लेता है। तो रोज़ चेक करो, समाचार पूछो-हे मन मन्त्री तुमने क्या किया? कहाँ धोखा तो नहीं दिया? कहाँ अन्दर ही अन्दर ग्रुप बना देवे और आपको राजा की बजाय गुलाम बना दे! तो ऐसा न हो। देखो ब्रह्मा बाप आदि में रोज़ ये दरबार लगाते थे जिसमें सभी सहयोगी साथियों से समाचार पूछते, ये रोज़ की ब्रह्मा बाप की आदि की दिनचर्या है। सुना है ना? तो ब्रह्मा बाप ने भी मेहनत की है ना! अटेन्शन रखा तब स्वराज्य अधिकारी सो विश्व के राज्य अधिकारी बने। शिव बाप तो है ही निराकार लेकिन ब्रह्मा बापने तो आपके समान सारी जीवन पुरूषार्थ से प्रालब्ध प्राप्त की। तो ब्रह्मा बाप को फॉलो करो। ये मन बहुत चंचल है और बहुत क्वीक है, एक सेकण्ड में आपको सारा फॉरेन घुमाकर आ सकता है। तो क्या सुना? बालक सो मालिक। ऐसे नहीं खुश रहना-बालक तो बन गये, वर्सा तो मिल गया लेकिन अगर वर्से के मालिक नहीं बने तो बालकपन क्या हुआ? बालक का अर्थ ही है मालिक। लेकिन स्वराज्य के भी मालिक बनो। सिर्फ वर्से को देख करके खुश नहीं हो, स्वराज्य अधिकारी बनो। इतनी छोटी सी आंख बिन्दी है, वो भी धोखा दे देती है। तो मालिक नहीं हुए तभी धोखा देती है। तो बापदादा सभी बच्चों को स्वराज्य अधिकारी राजा देखना चाहते हैं। अधिकारी, अधीन नहीं रहेगा। समझा? क्या बनेंगे? बालक सो मालिक। रावण की चीज़ को तो यहाँ हाल में ही छोड़कर जाना। ये तपस्या का स्थान है ना। तो तपस्या को अग्नि कहा जाता है। तो अग्नि में खत्म हो जायेगा।

बापदादा ने देखा कि बच्चों का रावण से अभी भी प्यार है। दिल से चाहते नहीं हैं लेकिन रह गया है। अभी इसको खत्म करो। टीचर्स क्या करेंगी? यहीं छोड़कर जायेंगी या ट्रेन में फेकेंगी? क्योंकि 63 जन्मों की पुरानी चीज है तो थोड़ी तो प्रीत है। पाण्डव क्या करेंगे? यहीं छोड़ कर जायेंगे या नीचे आबूरोड पर छोड़ेंगे? यहीं छोड़कर जाना। छोड़ने के लिये तैयार हो? ढीलाढाला हाँ कर रहे हो। बापदादा रोज़ कोई न कोई बच्चों की बातें चेक करता है। आप भी चेक करेंगे तब तो चेंज होंगे ना!

अच्छा, ये चांस तो एक्स्ट्रा चांस मिला है। ये भी नयों को या पुरानों को अचानक की लॉटरी मिली है। तो अचानक की लॉटरी का महत्व होता है। तो इस लॉटरी को सदा प्रैक्टिकल कर्म में लाते हुए बढ़ाते रहना। जितना स्वयं प्रति या औरों प्रति कार्य में लगायेंगे उतना बढ़ता रहेगा। तो बढ़ाते रहना ये लॉटरी का दिन भूलना नहीं। याद रखना।

कुमारियों से

कुमारियाँ क्या करेंगी? कुमारी का अर्थ ही है कमाल करने वाली। तो कमाल करनी है। क्या कमाल करेंगी? बापदादा सदा जब भी कुमारियों को देखते हैं तो उसी नज़र से देखते हैं कि ये कमाल करने वाली कुमारी है। चाहे कुमारी अपना क्या भी करे लेकिन बापदादा हर कुमारी में कमाल करने वाली शुभ भावना, शुभ कामना रखते हैं। तो कुमारियाँ क्या करेंगी? क्योंकि कुमारियाँ बहुत बन्धनों से फ्री हैं। अगर कुमारी पुरूषार्थ में अच्छी है तो उसको सेन्टर मिल जाता है। एक तो सेन्टर की सेवाधारी का भाग्य मिलता है और सेन्टर पर अकेले नहीं लेकिन साथी भी मिल जाते हैं। कुमारों को तो अकेला-अकेला खाना बनाना पड़ता है और कुमारियों को चाहे टर्न-बाई-टर्न बनाओ लेकिन एक-दो में मददगार तो होते हैं ना! और दूसरा कमाने की कोई चिन्ता नहीं। अगर कोई कुमार आपके पास (दादी के पास) जाता है तो आप नौकरी छुड़ायेंगी? कहेंगे नौकरी करो। तो कुमारियों का तो लक है, कहते हैं नौकरी छोड़कर आ जाओ। खुद कुमारी का लगाव होता है पढ़ने में या नौकरी में। तो ये तो उसका भाग्य हुआ। लेकिन कुमारियों को चांस तो अच्छा है। और फिर सेवा का चांस कितना मिलता है? जितना करना चाहो उतना कर सकते हो।

ब्रह्मा बाप पुराने बच्चों के प्रति ये बोल रहे हैं कि अगर कोई कहता है कि सेवा है ही नहीं, बहुत करते हैं लेकिन सेवा दिखाई नहीं देती है, कोई सेवा के लिए मिलता नहीं है तो ब्रह्मा बाप क्या कहता था कि जंगल पड़ा हुआ है और शिकारी कहे कि शिकार नहीं मिलता, ये हो सकता है! शिकारी को परखने की शक्ति नहीं है, देखने की वो जो तेज़ आंख चाहिये, वो नहीं है। बाकी जंगल में शिकार न हो ये हो ही नहीं सकता। कितनी संख्या बढ़ रही है। चाहे छोटा गांव है, चाहे बड़ा शहर है सब जगह संख्या बढ़ रही है। तो संख्या बढ़ रही है और सेवा नहीं हो ये कैसे हो सकता है! करने की विधि नहीं आती। तो कुमारियों को अपने आपको निर्बन्धन बनाने की विशेष सेवा करनी है। पहले अपने को निर्बन्धन बनाओ। क्या है कुमारियाँ डरती हैं सेन्टर पर रहने से और कुमार चाहते हैं सेन्टर पर रहना। कारण क्या है? कमज़ोर आत्मायें हैं, नम्बरवार तो होना ही है ना। तो कमजोर आत्माओं की कमजोरी को देख घबरा जाते हैं। अच्छों को नहीं देखते, जो कमजोर है, उसको फॉलो करते हैं। इसीलिए बापदादा ने कहा भी है-सी फादर-मदर। फॉलो फादर-मदर। न कि कमज़ोर को फॉलो करो। तो कुमारियों को तो दिल में उछल आनी चाहिये। कि बस, सेवा करें और सेवा के सफलता का सितारा बनें, कमज़ोर नहीं।

कुमारों से

कुमारों को भी चांस मिलेगा। जब सेवा बहुत बढ़ेगी, इतनी सब आत्माओं को सन्देश देना है तो क्या थोड़ी सी आत्मायें कर सकेंगी! तो आप लोगों को चांस मिलेगा लेकिन आप लोग ऐसे पहले से तैयार हो जाओ। जो टीचर्स को सप्ताह कोर्स कराना पड़ता है और आप एक सेकण्ड में अपनी दृष्टि-वृत्ति द्वारा परिचय दे सको। ऐसी सेवा कुमारों को करनी है। अभी देखो बापदादा स्पष्ट सुनाता है कि कुमारों को सेन्टर पर क्यों नहीं रखते हैं? कारण क्या है? डर लगता है दादियों को। और कभी-कभी प्रैक्टिकल में नुकसान होते भी हैं। ऐसे ही डर नहीं लगता, होता भी है। अगर कुमार पक्के योगी बन जायें, ज़रा भी सिवाए आत्मा के और कोई बात में जायें नहीं तो कुमारों को बहुत सेवाकेन्द्र मिल सकते हैं। अभी नुकसान का डर है। क्योंकि रावण की चीज़ अन्दर रखी है ना, इसलिए डर लगता है। लेकिन जो कुमारियों ने इतने वर्ष में सेवा की, कुमार फास्ट सेवा करेंगे। चांस बहुत अच्छा मिलना है लेकिन पहले तैयार हो जाओ। पहले दादियों को बेफिक्र बनाओ। जहाँ कुमार-कुमारियाँ इकट्ठे रहते हैं ना तो डर लगता है, फॉरेन की बात अलग है, वहाँ तो फीमेल भी मेल है, मेल भी फीमेल हैं। वहाँ की बात अलग है। लेकिन भारत में अगर दो-तीन भाई सेन्टर चलायें तो पहले तो लोग डिस्कस करने के सिवाए और कुछ नहीं करेंगे। और जोश होता है ना तो डण्डा भी लग सकता है। इसलिए आप तैयार हो जाओ, आपको सेवा बहुत मिलनी है और जितना कुमारियों को सेवा का चांस है, ऐसे अगर आप पक्के योगी बन गये तो थोड़े समय में आपका खाता भी उतना ही जमा हो सकता है। लेकिन बापदादा को दिल से गैरेन्टी दिलाओ, कागज वाला बापदादा नहीं मानते। आज कागज पर पानी और स्याही से नहीं, खून से भी लिखकर देते हैं और एक मास के बाद कुमार से युगल बनकर आते हैं। तो ऐसी गैरेन्टी नहीं चाहिये। लेकिन डायमण्ड जुबली में बापदादा ने देखा कि कुमार बहुत अच्छा सबसे नम्बरवन पुरूषार्थ कर रहे हैं तो कुमार समय को भी समीप ला सकते हैं। समय समीप आ जायेगा और आपकी सेवा होती जायेगी। लेकिन बापदादा रोज़ वतन में चेक करते हैं ऐसे ही नहीं कोई यहाँ कहेगा तो मान लेंगे। प्रैक्टिकल बाप चेक करेगा। फिर देखो कुमार फर्स्ट नम्बर ले सकते हैं। समझा? सन्देश देने में तो कुमार वैसे ही होशियार हो और देखो जिस सेन्टर पर कुमार नहीं आते हैं तो वहाँ सेवा की वृद्धि नहीं होती है। ऐसे है ना टीचर्स? टीचर्स कहती हैं सेवा के लिए किसको भेंजे! तो कुमार अभी भी सेवा कर रहे हैं लेकिन सिर्फ ये पक्का निश्चय कर लो कि हम हैं ही योगी आत्मायें। सदा योगी हैं। शरीर के तरफ स्वप्न मात्र भी संकल्प नहीं जाये। तो कुमार कमाल करना, बापदादा आपका चेक करके ग्रुप बनायेगा। अच्छा!

प्रवृत्ति वालों से

प्रवृत्ति वालों से बापदादा को एक शुभ आशा है जो अभी तक प्रवृत्ति वालों ने पूरी नहीं की है। वो क्या है? सेवा में मातायें बहुत चाहिये और जहाँ माता है वहाँ दादियाँ भी निरसंकल्प हो जाती हैं। लेकिन प्रवृत्ति वाली मातायें निकलती बहुत कम हैं। जैसे कुमारियों की ट्रेनिंग रखते हैं ऐसे माताओं को 15 दिन की ट्रेनिंग देकर के एक मास, दो मास, तीन मास सेवा की ट्रायल करो, चाहे भारत के किसी भी देश में मातायें जो हैं वो अपने को फ्री करें, दो मास, चार मास, छह मास किसी भी ढंग से मातायें सेवा में आगे आयें तो सेवा बहुत कर सकती हैं। अभी निमन्त्रण होते हुए भी सेन्टर नहीं खुलते हैं। कारण? अकेली छोटी-छोटी कुमारी समय प्रमाण नहीं रख सकते। और माता हो तो एक मास में आप देखो कितने सेन्टर खुल जाते हैं। तो माताओं में ये हिम्मत नहीं है। किसको पोत्रा, किसको धोत्रा, किसको पति, कोई न कोई बन्धन है। माताओं में जोश आना चाहिये। प्रवृत्ति को सम्भालें लेकिन एक-दो में साथी बन करके, एक-दो के मददगार बनके पहले दो मास, तीन मास निकलो फिर सेवा का रस बैठ जायेगा तो आपको आप ही निर्बन्धन करेगा। तो प्रवृत्ति वाले पाण्डव माताओं के किसी भी ढंग से मददगार बन माताओं को सेवा के लिए स्वतन्त्र करो। लेकिन अभी तक यह आश बाप की प्रवृत्ति वालों ने पूरी नहीं की। डायमण्ड जुबली में करना। समझा प्रवृत्ति वालों ने। अच्छा!

डबल विदेशियों से

देखो डबल विदेशियों को फुल सीज़न में आने का चांस है, कोई भी ग्रुप ऐसा नहीं है जिसमें डबल विदेशी न हो। तो ये एक्स्ट्रा डबल विदेशियों को चांस मिला हुआ है। इस सीज़न में आना अच्छा लगता है? इण्डियन सीज़न में आने में मज़ा आता है? क्योंकि देखो विदेश को वैसे भी भारत देश में समा ही जाना है। सतयुग में अमेरिका और लण्डन नहीं होगा। भारत में ही समा जायेंगे। विश्व एक हो जायेगी। डबल विदेश और भारत ये अलग नहीं होगा। इस्ट और वेस्ट दोनों मिलकर एक विश्व हो जायेगा। तो पीछे तो आना ही है इसलिए अभी से अपना हक रख देते हैं। अच्छा। भारत वालों को भी खुशी होती है और आप लोगों को भी खुशी होती है। दोनों को खुशी होती है। बाकी विदेश में भी जो चारों ओर सेवा चल रही है तो समाचार तो आते रहते हैं तो रिज़ल्ट में चारों ओर उमंग-उत्साह अच्छा है और रिज़ल्ट भी अच्छी है। अभी कुछ तरफ की रिज़ल्ट में क्लास में स्टूडेन्ट बढ़े हैं तो ये सेवा की सफलता है। समझा? जिन्हों ने भी सेवा के पत्र या अपने अवस्था के पत्र, डायमण्ड जुबली के उमंग-उत्साह के पत्र भेजे हैं उन सभी को बापदादा रिटर्न में पद्मगुणा से भी ज्यादा याद-प्यार दे रहे हैं। विदेश में भी अभी स्टूडेन्ट बढ़ रहे हैं ना! विदेश के चारों ओर से आये हैं। और इस वर्ष देश-विदेश दोनों मिलकर प्रोग्राम कर रहे हैं ये बहुत अच्छा है। और ऐसे ही सदा मिलकर एक राय से आगे बढ़ते रहेंगे।

(फिर बापदादा ने सभी ज़ोन के भाई-बहिनों से अलग-अलग हाथ उठवाकर मिलन मनाया। दिल्ली में डायमण्ड जुबली के उपलक्ष्य में निकाली गई झांकियों का समाचार बापदादा ने सुना)

अच्छा है दिल्ली का समाचार भी सुना तो डायमण्ड जुबली की जो शुरूवात है वो बहुत अच्छी हुई। तो अच्छा ही किया, दिल्ली वालों ने चतुराई की कि पहले करेंगे तो दादियाँ मिलेंगी और साथ में करेंगे तो दादियाँ नहीं मिलेंगी। चतुराई अच्छी की। और दिल्ली तो आप सबकी है ना! राज्य दिल्ली पर करेंगे या लण्डन में? दिल्ली सबकी है। कितने बार दिल्ली में राज्य किया है? अनगिनत बार। तो आपकी हो गई ना! इसीलिए स्थापना की सेवा भी दिल्ली में जमुनाघाट पर हुई। राज्य भी जमुनाघाट पर करना है तो आरम्भ भी जमुनाघाट से हुआ। मेहनत की लेकिन राज्य का छाप तो लगा दिया ना। तो अच्छा है, और भी सब तरफ के भी प्रोग्राम अच्छे बनाये हैं, अभी प्रैक्टिकल होंगे तो बहुत अच्छा। जो अभी प्लैन बना रहे हैं तो अच्छे ते अच्छा बना रहे हैं और सफलता तो होनी ही है।

अच्छा, पीछे वाले अच्छे बैठे हैं? बापदादा तो ज्यादा पीछे ही देखते हैं। क्योंकि पीछे अगर देखते हैं ना तो आगे आपेही आ जाते हैं। अच्छा।

चारों ओर के बालक सो मालिक डबल अधिकार लेने वाले श्रेष्ठ आत्मायें, सदा स्वराज्य अधिकारी बन अपना राज्य चलाने वाले भाग्यवान आत्मायें, सदा बाप के संस्कार सो मेरे संस्कार इस विधि से सेवा में आगे बढ़ने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।

दादियों से

जितनी ज़िम्मेवारियाँ बढ़ती हैं उतना ही एक्स्ट्रा दुआएं और बाप का प्यार बढ़ता जाता है ना! लेकिन ज़िम्मेवारियाँ हैं, बाप के हिसाब से बहुत हैं। आपकी मददगार तो बाप की भुजायें हैं ही। फिर भी ज़िम्मेवारियाँ हैं और रहनी है। बहुत ज़िम्मेवारियाँ है ना! आप लोग क्या समझते हो? एक के ऊपर बहुत जिम्मेवारियाँ है ना! बहुत जिम्मेवारी है ना! (ज़िम्मेवारी तो बाबा आपकी है इशारा मिलता हम सब करते हैं) ये तो अच्छी बात है आप डबल लाइट हैं और डबल लाइट होने के कारण आपको लगती नहीं हैं। ये एक्स्ट्रा बाप और माँ दोनों की अन्दर की मदद है। क्योंकि मात-पिता जगदम्बा और ब्रह्मा बाप दोनों की जिम्मेवारियाँ स्थूल में आपके ऊपर हैं। सूक्ष्म में तो साथ है लेकिन बाहर से तो निमित्त आप हैं। इसीलिए आपसे सभी का शुद्ध प्यार ज्यादा है। दादियों का भी है, विश्व का भी है।

अच्छा। ओम् शान्ति।



18-01-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘सदा समर्थ रहने की सहज विधि- शुभाचिंतन करो और शुभ चिन्तक बनो’’

आज स्नेह सम्पन्न स्मृति दिवस है। चारों ओर के बच्चों के स्नेह का, दिल का आवाज़ बापदादा के पास पहुँच गया है। यह स्नेह सुख स्वरूप स्नेह है। बापदादा इस दिवस को स्मृति दिवस के साथ-साथ समर्थी दिवस कहते हैं। क्योंकि ब्रह्मा बाप ने अपने साकार स्वरूप में सर्व कार्य करने की समार्थियाँ अर्थात् शक्तियाँ साकार रूप में बच्चों को अर्पण किया। इस दिवस को सन शोज़ फादर के वरदान का दिन कहा जाता है। साकार रूप में बच्चों को आगे किया और फरिश्ता रूप में अपने बच्चों की और विश्व की सेवा आरम्भ किया। ये 18 जनवरी का दिवस ब्रह्मा बाप के सम्पूर्ण नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप का रहा। जैसे गीता के 18 अध्याय का सार है - भगवान ने अर्जुन को नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप बनाया। तो ये 18 का यादगार है कि ब्रह्मा बाप कितना ही बच्चों के प्रति अति स्नेही रहे, जो बच्चे अनुभवी हैं कि सदा सेवा के निमित्त बच्चों को कितना याद करते - अनुभव है ना! मोह नहीं रहा लेकिन दिल का प्यार रहा। क्योंकि मोह उसको कहा जाता है जिसमें अपना स्वार्थ हो। तो ब्रह्मा बाप का अपना स्वार्थ नहीं रहा, लेकिन बच्चों में सेवा अर्थ अति स्नेह रहा। फिर भी साथ रहते, बच्चों को सामने देखते भी कोई देह के रूप में याद सताई नहीं। एकदम न्यारा और प्यारा रहा। इसलिए कहा जाता है स्मृति स्वरूप नष्टोमोहा। कोई मेरापन नहीं रहा, देहभान से भी नष्टोमोहा। तो ये दिवस ऐसे फॉलो फादर का पाठ पढ़ाने का दिवस रहा।

ये अव्यक्त दिवस दुनिया की अन्ज़ान आत्माओं को परमात्म कार्य की तरफ जगाने का रहा। क्योंकि मैजारिटी लोग ब्रह्मा बाप को देखकर यही सोचते या समझते थे कि इन्हों का परम आत्मा ब्रह्मा है। ये ब्रह्माकुमारियाँ, ब्रह्मा को ही भगवान मानती हैं। और ब्रह्मा ने साकार में पार्ट परिवर्तन किया तो क्या सोचने लगे कि अभी तो ब्रह्माकुमारियों का भगवान चला गया और ये ब्रह्माकुमारियों का कार्य आज नहीं तो कल समाप्त हो जायेगा। लेकिन आप जानते हैं कि इन्हों का करावनहार ब्रह्मा द्वारा भी परमात्मा था, है और अन्त तक रहेगा। तो ये परमात्म कार्य है, व्यक्ति का कार्य नहीं है। ये पहचान ब्रह्मा बाप के साकार पार्ट परिवर्तन होने के बाद समझते हैं कि इन्हों को कोई शक्ति चला रही है, अभी भी बिचारे परमात्मा को नहीं जानते। लेकिन कोई शक्ति कार्य करा रही है, वो कौन-सी शक्ति है, उसको भी देख रहे हैं, सोच रहे हैं और आखिर तो समझना ही है। तो किसका कार्य है? ब्रह्मा बाप का या परम आत्मा का ब्रह्मा द्वारा? किसका कार्य है?

जो बच्चे साकार के बाद में आये हैं वो सोचते हैं कि ब्रह्मा बाबा ने अपना साकार पार्ट इतना जल्दी क्यों पूरा किया? हम तो देखते ना! हम तो मिलते ना! सोचते हो ना? लेकिन कल्प पहले का भी गायन है कि कौरव सेना के निमित्त बने हुए महावीर का कल्याण किस द्वारा हुआ? शक्ति द्वारा हुआ ना! तो शक्तियों का पार्ट ड्रामा में साकार रूप में नूँधा हुआ है। और सब मानते भी हैं कि मातृ शक्ति के बिना इस विश्व का कल्याण होना असम्भव है। तो ब्रह्मा बाप फरिश्ता क्यों बना? साकार पार्ट परिवर्तन क्यों हुआ? अगर ब्रह्मा बाप फरिश्ता रूप नहीं धारण करता तो आप इतनी आत्मायें यहाँ पहुँच नहीं पाती। क्योंकि वायुमण्डल की भ्रान्तियाँ इस विश्व क्रान्ति के कार्य को हल्का कर रही थी। तो ब्रह्मा बाप का फरिश्ता बनना आप ज्यादा से ज्यादा बच्चों के भाग्य खुलने का कारण रहा। अभी फरिश्ते रूप में जो सेवा की फास्ट गति है वो देख रहे हो ना! फास्ट गति हुई या कम हुई है? फास्ट हुई है ना! तो फास्ट गति हुई तभी आप यहाँ पहुँचे हो। नहीं तो सोये हुए थे अच्छी तरह से। तो आज का दिवस ऐसा नहीं है जैसे लोग मनाते हैं - चला गया, चला गया। लेकिन उमंग-उत्साह आता है कि फॉलो फादर, हम भी ऐसे स्मृति स्वरूप नष्टोमोहा बनें। ये प्रैक्टिकल पाठ पढ़ने का दिवस है।

आज आप किसी के भी दिल से दु:ख के आंसू निकले? निकले या अन्दर- अन्दर थोड़ा आया! जिसको दु:ख की थोड़ी भी लहर आई वो हाथ उठाओ। दु:ख हुआ? नहीं हुआ? आज के दिन तो ब्रह्मा बाप को सेवा का साथी बनने का दिन है। आप सब साथी हो कि साक्षी हो? सेवा में साथी और माया की परिस्थितियों से साक्षी। माया को तो वेलकम किया है ना कि घबराते हो-हाय, क्या हो गया! थोड़ा-थोड़ा घबराते हो? माया के हल्के-हल्के रूपों को तो आप भी जान गये हो और माया भी सोचती है कि ये जान गये हैं लेकिन जब कोई भी विकराल रूप की माया आवे तो सदा साक्षी होकर खेल करो। जैसे वो कुश्ती का खेल होता है ना, देखा है कि दिखायें? यहाँ बच्चे करके दिखाते हैं ना! तो समझो कि ये कुश्ती का खेल, खेल रहे हैं, अच्छी तरह से मारो। घबराओ नहीं, खेल है। तो साक्षी होकर खेल करने में मज़ा आता है और माया आ गई, माया आ गई तो घबरा जाते हैं। कुछ भी ताकत अभी माया में नहीं है। सिर्फ बाहर का शेर का रूप है लेकिन बिल्ली भी नहीं है। सिर्फ आप लोगों को घबराने के लिए बड़ा रूप ले आती है फिर सोचते हो पता नहीं अब क्या होगा! तो यह कभी नहीं कहो - क्या करूँ, कैसे होगा, क्या होगा.., लेकिन बापदादा ने पहले भी यह पाठ पढ़ाया है कि जो हो रहा है वो अच्छा और जो होने वाला है वो और अच्छा। ब्राह्मण बनना अर्थात् अच्छा ही अच्छा है। चाहे बातें ऐसी होती हैं जो कभी आपके स्वप्न में भी नहीं होती और कई बातें ऐसे होती हैं जो अज्ञान काल में नहीं होगी लेकिन ज्ञान के बाद हुई हैं, अज्ञानकाल में कभी बिज़नेस नीचे-ऊपर नहीं हुआ होगा और ज्ञान में आने के बाद हो गया, घबरा जाते हैं - हाय, ज्ञान छोड़ दें! लेकिन कोई भी परिस्थिति आती है उस परिस्थिति को अपना थोड़े समय के लिये शिक्षक समझो। शिक्षक क्या करता है? शिक्षा देता है ना! तो परिस्थिति आपको विशेष दो शक्तियों के अनुभवी बनाती है - एक-सहनशक्ति, न्यारापन, नष्टोमोहा और दूसरा-सामना करने की शक्ति का पाठ पढ़ाती है जिससे आगे के लिए आप सीख लो कि ये परिस्थिति, ये दो पाठ पढ़ाने आई है। और जो कहते रहते हो हम तो ट्रस्टी हैं, मेरा कुछ नहीं है, ठगी से तो नहीं कहते! दिल से कहते हो? ट्रस्टी हो कि थोड़ा गृहस्थी हो? कभी गृहस्थी बन जाते कभी ट्रस्टी बन जाते?

न्यु इयर में बापदादा को दो-चार खिलौने दिये थे, उसमें क्या था कि एक तरफ करो तो भाई है, दूसरे तरफ करो तो फीमेल है, एक ही खिलौना बदल जाता था। एक सेकण्ड में वो हो जाता, एक सेकेण्ड में वो हो जाता। तो आप ऐसे खिलौने तो नहीं हो, अभी-अभी गृहस्थी, अभी-अभी ट्रस्टी। थोड़ा-थोड़ा, कभी-कभी तो हो जाता है? घबराते हो ना तो माया समझ जाती है कि ये घबरा गया है, मारो अच्छी तरह से। इसलिए घबराओ नहीं। ट्रस्टी हैं अर्थात् पहले से ही सब कुछ छूट गया। ट्रस्टी माना सब बाप के हवाले कर दिया। मेरा क्या होगा! - बस गा गा आता है ना तो गड़बड़ होती है। सब अच्छा है और अच्छा होना ही है, निश्चिन्त है - इसको कहा जाता है समर्थ स्वरूप। तो आज का दिन कौन सा है? समर्थ बनने का, नष्टोमोहा होने का। सिर्फ बाबा बहुत याद आये, गीत गाने का नहीं है। तो ब्रह्मा बाप का फरिश्ता रूप होना ड्रामा में परमात्म कार्य को प्रत्यक्ष करने का निमित्त कारण बना। ब्रह्मा बाबा है या है नहीं? (है) दिखाई तो देता नहीं!

देखो आप जो पीछे आये हो वो बहुत लक्की हो। क्यों? अभी सेवा के बने बनाये साधनों के समय पर आये। मक्खन निकाला 60 वर्ष वालों ने और मक्खन खाने वाले आप आ गये। आज हिस्ट्री सुनी होगी ना, इतनी मेहनत आप करते तो भाग जाते। और वर्तमान समय सेवा का वायुमण्डल बना हुआ है। अभी चाहे प्रेज़ीडेन्ट है, चाहे प्राइम मिनिस्टर है, चाहे कोई भी नेता है, मैजारिटी ये तो मानते हैं ना कि कार्य अच्छा है, हम कर सकते हैं या नहीं, वो बात अलग है। हरेक का पार्ट अपना है। लेकिन अच्छा कार्य है और ये कार्य और आगे बढ़ना चाहिये ये तो कहते हैं ना! पहले क्या कहते थे कि ब्रह्माकुमारियों की शक्ल भी नहीं देखना। अगर शुरू में निमन्त्रण देने जाते भी थे ना तो दरवाजा बन्द कर देते थे। तो आप तो अच्छे टाइम पर आये हो ना! सेवा का चांस बहुत है। जितनी सेवा करने चाहो उतनी कर सकते हो। अभी सभी समझते हैं कि साकार ब्रह्मा के बाद भी ब्रह्माकुमारियों ने सिल्वर जुबली भी मना ली, गोल्डन भी मना ली, अभी डायमण्ड तक पहुँच गये हैं। क्योंकि कोई भी बड़ा गुरू चला जाता है तो गड़बड़ हो जाती है। यहाँ गड़बड़ है क्या? यहाँ तो और ही वृद्धि है, बढ़ता जाता है। तो इससे सिद्ध है कि ये कार्य कराने वाला बाप परम आत्मा है, निमित्त माध्यम ब्रह्मा बाप है। अभी भी माध्यम ब्रह्मा बाप है। ये पार्ट अलग चीज़ है लेकिन माध्यम ड्रामा में पहले साकार ब्रह्मा रहा और अभी फरिश्ता रूप में ब्रह्मा है। ब्रह्मा को पिता कहेंगे, रचता तो ब्रह्मा है ना। ये तो पार्ट बीच-बीच में बच्चों की पालना करने के लिए निमित्त है। बाकी रचता ब्रह्मा है और रचना के कार्य में अभी भी अन्त तक ब्रह्मा का ही पार्ट है।

तो आज सारे दिन में किसके पास माया आई? कोई पोत्रा-धोत्रा याद नहीं आया? तो सदा ऐसे समर्थ रहो और इसकी सबसे सहज विधि है दो शब्द याद रखो। दो शब्द याद रह सकते हैं ना? सारी मुरली भूल जाये लेकिन दो शब्द याद रखो और प्रैक्टिकल में करते चलो। वो दो शब्द, जानते भी हो, कोई नई बात नहीं है, एक है शुभ चिन्तन, निगेटिव को भी पॉजेटिव करो, इसको कहते हैं शुभ चिन्तन। निगेटिव पॉजेटिव हो सकता है और बदल सकते हो सिर्फ चेक करो कि कर्म करते भी शुभ चिन्तन चला? और दूसरा सभी के प्रति शुभ चिन्तक, तो शुभ चिन्तन और शुभ चिन्तक दोनों का सम्बन्ध है। अगर शुभ चिन्तन नहीं है तो शुभ चिन्तक भी नहीं बन सकते। इसलिए इन दो बातों का अटेन्शन रखना। समझा? क्या करेंगे? यहीं नहीं भूल जाना। क्योंकि अभी देखा गया है कि बहुत ऐसी समस्यायें हैं, लोग हैं जो आपके वाणी से नहीं समझते लेकिन शुभ चिन्तक बन शुभ वायब्रेशन दो तो बदल जाते हैं। और एक बात से मुक्त भी होना है। इस ब्राह्मण जीवन में मुक्त होने वाले हो ना, मुक्त होने की 9 बातें बता दी, अगर इन नौ बातों से मुक्त हो गये तो नौ रत्न बन सकते हैं। तो आज बापदादा एक बात की स्मृति दिला रहे हैं - कभी भी कोई भी शारीरिक बीमारी हो, मन का तूफान हो, तन में हलचल हो, प्रवृत्ति में हलचल हो, सेवा में भी हलचल होती है तो किसी भी प्रकार के हलचल में दिलशिकस्त कभी नहीं होना। बड़ी दिल वाले बनो। बाप की दिल कितनी है, छोटी है क्या! बाप बड़ी दिल वाले हैं और बच्चे छोटी दिल कर देते हैं, बीमार हो गये तो रोना शुरू कर देंगे। दर्द हो गया, दर्द हो गया। तो दिलशिकस्त होना दवाई है? बीमारी चली जायेगी कि बढ़ेगी? जब हिसाब-किताब आ गया, दर्द आ गया तो हिसाब-किताब आ गया ना, लेकिन दिलशिकस्त से बीमारी को बढ़ा देते हो। इसलिए हिम्मत वाले बनो तो बाप भी मददगार बनेंगे। ऐसे नहीं, रो रहे हैं-हाय क्या करूँ, क्या करूँ और फिर सोचो कि बाबा की तो मदद है ही नहीं। मदद उसको मिलती है जो हिम्मत रखते हैं। पहले बच्चे की हिम्मत फिर बाप की मदद है। तो हिम्मत तो हार ली और सोचने लगते हो कि बाप की मदद तो मिली नहीं, बाबा भी टाइम पर तो करता ही नहीं है! तो आधे अक्षर याद नहीं करो, बाबा मददगार है लेकिन किसका? तो आधा भूल जाते हो और आधा याद करते हो कि बाबा भी पता नहीं महारथियों को ही करता है, हमको तो करता ही नहीं है, हमको तो देता ही नहीं है। पहले आप, महारथी पीछे। लेकिन दिलशिकस्त नहीं बनो और मन में अगर कोई उलझन आ भी जाती है तो ऐसे समय पर निर्णय शक्ति चाहिये और निर्णय शक्ति तब आ सकती है जब आपका मन बाप के तरफ होगा। अगर अपने उलझन में होंगे तो हाँ-ना, हाँ-ना, इसी उलझन में रह जायेंगे। इसलिए मन से भी दिलशिकस्त नहीं बनो। और धन भी नीचे-ऊपर होता है, जब करोड़पतियों का ही नीचे-ऊपर होता है तो आप लोग उसके आगे क्या हो। वो तो होना ही है। लेकिन आप लोगों को निश्चय पक्का है कि जो बाप के साथी हैं, सच्चे हैं तो कैसी भी हालत में बापदादा दाल-रोटी जरूर खिलायेगा। दो-दो सब्जी नहीं खिलायेगा, दाल-रोटी खिलायेगा। लेकिन ऐसे नहीं करना कि काम से थक करके बैठ जाओ और कहो बाबा दाल-रोटी खिलायेगा। ऐसे अलबेले या आलस्य वाले को नहीं मिलेगा। बाकी सच्ची दिल पर साहेब राजी है। और परिवार में भी खिटखिट तो होनी है। जब आप लोग कहते हो कि अति के बाद अन्त होना है, कहते हो! अति में जा रहा है और जाना है तो परिवार में खिटखिट न हो, ये नहीं होना है, होना है! लेकिन आप ट्रस्टी बन, साक्षी बन परिस्थिति को बाप से शक्ति ले हल करो। गृहस्थी बनकर सोचेंगे तो और गड़बड़ होगी। पहले बिल्कुल न्यारे ट्रस्टी बन जाओ। मेरा नहीं। ये मेरापन-मेरा नाम खराब होगा, मेरी ग्लानि होगी, मेरा बच्चा और मुझे...., मेरी सास मेरे को ऐसे करती है.... ये मेरापन आता है ना तो सब बातें आती हैं। मेरा जहाँ भी आया वहाँ बुद्धि का फेरा हो जाता है, बदल जाते हैं। अगर बुद्धि कहाँ भी उलझन में बदलती है तो समझ लो ये मेरापन है, उसको चेक करो और जितना सुलझाने की कोशिश करेंगे उतना उलझेगा। इसलिए सभी बातों में क्या नहीं बनना है? दिलशिकस्त नहीं बनना है। क्या नहीं बनेंगे? (दिलशिकस्त) सिर्फ कहना नहीं, करना है। भगवान के बच्चे हैं ये तो पक्का वायदा है ना, इसको तो माया भी नहीं हिला सकती। जब ये पक्का वायदा है, निश्चय है तो भगवान के बच्चे भी दिलशिकस्त हो जायें, तो बड़ी दिल रखने वाले कौन होंगे? और कोई होंगे? आप ही हो ना! तो क्या करेंगे? अभी समर्थ बनो और सन शोज़ फादर का पाठ पक्का करो। कच्चा नहीं करो, पक्का करो। सभी हिम्मत वाले हो ना? हिम्मत है? अच्छा।

डायमण्ड जुबली की खुशी है ना? बापदादा समाचार सुनते ही रहते हैं। अच्छा किया पहले दिल्ली में आरम्भ किया, राजधानी में अपना पांव जमा लिया। अभी सभी कर रहे हैं। लेकिन याद रखना कि बापदादा ने इस डायमण्ड जुबली वर्ष में कोई न कोई हर ज़ोन को काम दिया है। यूथ को काम दिया है, कुमारियों को काम दिया है, प्रवृत्ति वालों को काम दिया है तो काम करना नहीं भूल जाना। बापदादा के पास कोई न कोई, चाहे छोटा सा नेकलेस बना के लाओ, चाहे कंगन बना के लाओ, चाहे बड़ा हार बना के लाओ, लेकिन लाना जरूर है। हाथ खाली नहीं आना है। हिम्मत है ना? बनायेंगे ना? बापदादा तो कहेंगे चलो कंगन ही लाओ। क्योंकि बहुत आत्मायें अन्दर टेन्शन से बहुत दु:खी हैं। सिर्फ बिचारों में आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं है। तो आप मास्टर सर्वशक्तिमान उन्हों को हिम्मत दो, तो आ जायेंगे। जैसे किसको टांग नहीं होती है ना तो लकड़ी की टांग बनाकर देते हैं तो चलता तो है ना! तो आप हिम्मत की टांग दे दो। लकड़ी की नहीं देना, हिम्मत की दो। बहुत दु:खी हैं, रहम दिल बनो। बापदादा तो अज्ञानी बच्चों को भी देखता रहता है ना कि अन्दर क्या हालत है! बाहर का शो तो बहुत अच्छा टिपटॉप है लेकिन अन्दर बहुत-बहुत दु:खी हैं। आप बहुत अच्छे समय पर बच्चा बने अर्थात् बच गये। अच्छा।

चारों ओर के सर्व समर्थ आत्माओं को, सर्व माया जीत, प्रकृति जीत आत्माओं को, सदा सन शोज़ फादर करने वाले बच्चों को, सदा दिल खुश रहने वाले बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

आज विदेश वाले बच्चे भी बहुत याद आ रहे हैं। चारों ओर मधुबन से मन की लगन लगी हुई है। बापदादा भी सभी बच्चों को सामने देख विशेष याद और सेवा का याद-प्यार दे रहे हैं।

दादी जी से

नैनों की भाषा से सर्व वरदान मिल गये ना! बाप के स्नेह और हिम्मत के हाथ सदा मस्तक पर है ही है।

दादियों से

ये सभी समर्थ साथी हैं ना! सभी माया को अच्छी तरह से जानने वाले हो। आप निमित्त बने हुए आत्माओं के कारण डायमण्ड जुबली मना रहे हैं। (बापदादा ने दादियों को सामने बिठाया) आप लोगों को भी देखने में मज़ा आता है ना! तो बापदादा आज अमृतवेले डायमण्ड जुबली के एक-एक रत्न को देख रहे थे। तो मिक्स तो हैं लेकिन चाहे छोटा संगठन पुराना है और नया संगठन भी आपके साथी बने हैं, नयों में भी अच्छे-अच्छे हैं, नाम नहीं लेते हैं लेकिन गुलदस्ता हिम्मत वाला निमित्त है तब ये कार्य डायमण्ड जुबली तक पहुँच गया है। डायमण्ड जुबली के लास्ट में कौन-सा झण्डा लहरायेंगे? यही, जो फूल बांध करके करते हो! बाप आ गया’ - ये झण्डा लहराओ। कि कपड़े वाला, फूलों वाला लहरायेंगे? डायमण्ड जुबली में नवीनता होनी चाहिये ना। बच्चे बाप से वंचित रह जायें तो रहम पड़ता है ना! अनाथ बन गये हैं। उन्हों को बाप का परिचय तो देंगे ना! नहीं तो आप सबके कान पकड़ेंगे। वो लोग ही आपके कान पकड़ेंगे कि क्यों नहीं बताया, क्यों नही बताया। तो बापदादा देख रहे हैं कि ऐसा प्लैन बनायें जिसमें सभी समझें। ढूँढते तो हैं कि कहाँ है, कहाँ है लेकिन कहाँ है? यहाँ है-ये एड्रेस तो देंगे ना! तो ऐसे प्लैन बनाना। मीटिंग करते हो ना, ऐसा प्लैन बनाओ जो सबको एड्रेस मिल जाये।

तामिलनाडु के राज्यपाल महामहिम डॉ.एम.चन्नारेडी प्रति अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य

अपने को बालक सो मालिक समझते हैं? जो बालक हैं वो मालिक ज़रुर हैं। तो सदा अपने को बालक सो मालिक - ये समझते रहो। सारा परिवार आपको बालक सो मालिक समझते हैं। तो बाप के जो अविनाशी खज़ाने हैं, शक्तियाँ, गुण, ज्ञान, सब खजानों के मालिक बन गये। इसी खुशी में, इसी नशे में सदा रहो। जो आपकी नेचरल विशेषता है दृढ़ता की, वो दृढ़ता की शक्ति अभी इस ज्ञान मार्ग में भी बहुत कार्य में आयेगी।

बापदादा ने देखा है कि कैसी भी परिस्थितियाँ सामने आती हैं लेकिन दिल शिकस्त नहीं होते हो। हिम्मत रखते हो। हिम्मत की विशेषता है इसको सिर्फ अभी अलौकिक कार्य में लगाओ। जो चाहो वो कर सकते हो। विरोधियों को भी शान्त कर सकते हो। बापदादा ने देखा जब से प्रजा का राज्य शुरू हुआ है तब से गवर्नर या मिनिस्टर तो बहुत बने हैं, आप भी बने हो लेकिन वर्तमान समय आपकी एक भाग्य की लॉटरी है वो कौन-सी? जो इस ईश्वरीय कार्य के प्रत्यक्षता करने में आप निमित्त बने। चाहे थोड़े समय के लिये पद मिला लेकिन जो भी इस ज्ञान सरोवर में बाप को पहचानेंगे तो उसका निमित्त बनने वाले को शेयर मिल जाता है। तो आप बहुत बड़े शेयर होल्डर बन गये। और साथ-साथ देखो दुआएं तो कार्य के कारण औरों को भी मिलती हैं लेकिन आपको इतने ब्राह्मणों की दुआएं मिली। तो एक-एक ब्राह्मण कितना बड़ा है तो ब्राह्मणों की दुआये हैं, क्योंकि ब्राह्मणों को भी चांस मिलता है बापदादा से मिलने का। तो ब्राह्मणों की दुआएं आपको ऑटोमेटिक मिल रही हैं तो आपके भविष्य बैंक में जमा हो रहा है। कारण क्या है? कि बाप और परिवार से प्यार है। दिल का प्यार है, स्वार्थ का प्यार नहीं। तो जो दिल का प्यार होता है उसका प्रत्यक्ष फल मिलता है, जो स्वार्थ का प्यार होता है उसमें सफलता नहीं मिलती। और दिल का प्यार सफलता दिलाता है।

आपके पास एक गोल्डन चाबी है। पता है कौन सी गोल्डन चाबी आपको मिली है? (आपके वरदान) वो तो है ही लेकिन चाबी है, सबसे बढ़िया चाबी है दृढ़ता। दृढ़ता ही सफलता की चाबी है। तो ये चाबी आपके पास है। सेवा की है और करते रहेंगे-ये बाप जानते हैं। तो जहाँ प्यार है ना वहाँ भूल नहीं सकते हैं। और ये मनुष्यात्मा का प्यार नहीं है, ईश्वरीय प्यार है। प्यार सदा नज़दीक लाता है। ठीक है ना! अच्छा, परिवार ठीक है? परिवार को भी याद देना। जहाँ भी जायेंगे, सेवा करेंगे।

नारायण दादा से

कदम आगे बढ़ा रहे हो ना? कदम आगे बढ़ाना अर्थात् फॉलो फादर। तो बढ़ा है कदम? बीज अविनाशी डायरेक्ट बाप द्वारा पड़ा हुआ है-ये भाग्य कम नहीं है! तो इसी भाग्य को आगे बढ़ाते चलो। देखो सभी दादियों का आपसे कितना प्यार है! तो प्यार का रेसपान्ड है आगे बढ़ाना। बाकी ठीक है सब, परिवार ठीक है? अच्छा!

जगदीश भाई जी से

अच्छा किया दिल्ली ने। दिल्ली ने नम्बर ले लिया। अभी और भी ऐसे माइक तैयार करो जो आपके तरफ से बोलें कि ये परमात्म मार्ग है। और करने के निमित्त तो आप बने हुए हो ही। आदि से वरदान है इसलिए करते चलो। बाकी अच्छा किया दिल्ली ने, अपनी हिम्मत, युनिटी और सफलता-तीनों दिखाई। सभी को मुबारक तो है ही लेकिन ये एक कार्य की मुबारक है। अभी आगे भी करना है।

बापदादा ने नौ रत्नों में आने के लिए जिन 9 बातों से मुक्त बनने का इशारा दिया है वह निम्न लिखित हैं:-

1. क्रोध मुक्त

2. व्यर्थ संकल्प मुक्त।

3. लगाव मुक्त।

4. परमत, परचिन्तन और परदर्शन मुक्त।

5. अभिमान व अपमान मुक्त।

6. झमेला मुक्त।

7. व्यर्थ बोल, डिस्टर्ब करने वाले बोल से मुक्त।

8. अप्रसन्नता मुक्त।

9. दिलशिकस्त मुक्त।



16-02-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘डायमण्ड जुबली वर्ष में विशेष अटेन्शन देकर समय और संकल्प के खज़ाने को जमा करो’’

आज त्रिमूर्ति रचता शिव बाप बच्चों को तीन बधाइयाँ दे रहे हैं। बच्चे बाप को बधाई देने आये हैं, तो बाप रिटर्न में तीन बधाइयाँ दे रहे हैं। एक शिव जयन्ती की, दूसरी डायमण्ड जुबली की और तीसरी वर्तमान समय उमंग- उत्साह से सेवा करने की बधाई। तो तीन बधाइयाँ चारों ओर के बच्चों को बापदादा दे रहे हैं। बाप के पास सबके दिलों के उमंग-उत्साह के सेवा के समाचार पहुँचते रहते हैं। ये अलौकिक जयन्ती सारे कल्प में नहीं होती है। क्योंकि सारे कल्प में चाहे देव आत्मा हो, चाहे महात्मा हो, चाहे साधारण आत्मायें हो लेकिन आत्मायें, आत्मा की जयन्ती मनाते हैं। और इस संगम पर आप श्रेष्ठ आत्मायें किसकी जयन्ती मनाने आये हो? परम आत्मा की और परम आत्मा बाप बच्चों की जयन्ती मनाते हैं। सतयुग-त्रेता में भी परम आत्मा आपकी जयन्ती नहीं मनायेंगे वा आप परमात्मा की जयन्ती नहीं मनायेंगे। तो कितने पद्म-पद्म-पद्म गुणा भाग्यवान आत्मा हो। ऐसे कभी अपने श्रेष्ठ भाग्य को स्वप्न में भी सोचा होगा? नहीं सोचा? लेकिन आज साकार रूप में मना रहे हैं। तो खुशी है ना! देखो चाहे देश वाले, चाहे विदेश वाले, चाहे मधुबन वाले, जो भी इस ग्रुप में बैठे हैं, कितना लक्की हैं! अन्दर क्या गीत गाते हो? वाह मेरा भाग्य। और बाप भी गीत गाते हैं वाह बच्चों का भाग्य। विशेष सेवा का ग्रुप बैठा है ना, सब तरफ के विशेष हैं ना, तो विशेष सेवा का विशेष प्रत्यक्षफल प्राप्त करने वाली आत्मायें हो। तो बाप भी ऐसे श्रेष्ठ बच्चों को देख हर्षित होते हैं। बच्चे ज्यादा हर्षित होते हैं या बाप होते हैं? दोनों। या बाप ज्यादा होता है? आप ज्यादा होते हो। अच्छा।

आज बापदादा चारों ओर के सेवाधारी डायमण्ड की माला को देख रहे हैं। आप सभी माला में हो ना? बाप के गले में डायमण्ड बन चमकने वाले माला के दाने हो या और कोई है? आप ही हो और नहीं? लोग कहते हैं कि 108 की माला लेकिन बापदादा के गले में आप सभी डायमण्ड्स की कितनी लम्बी माला है? 108 तो आप नीचे बैठे हुए हो जायेंगे। पीछे वाले भी हो ना? पहले पीछे वाले। देखो ये भी त्याग का प्रत्यक्ष फल है कि बापदादा पीछे वालों को ज्यादा मुबारक देते हैं। और उससे ज्यादा नीचे वालों को।

बापदादा हर एक बच्चे की विशेषता को देखते हैं। चाहे सम्पूर्ण नहीं बने हैं, पुरूषार्था हैं लेकिन ऐसा एक भी बाप का बच्चा नहीं है जिसमें कोई विशेषता नहीं हो। सबमें विशेषता है। सबसे पहली विशेषता तो कोटो में कोई के लिस्ट में तो हैं ना। और विशेषता ये है कि बड़े-बड़े तपस्वी महान् आत्मायें, 16108 जगत्गुरू, चाहे शास्त्रवादी हैं, चाहे महामण्डलेश्वर हैं, लेकिन बाप को नहीं जाना और बाप के सभी बच्चों ने बाप को तो जान लिया ना। तो बाप को जानना यह कितनी बड़ी विशेषता है। दिल से मेरा बाबातो कहते हैं ना। मेरा कह कर अधिकारी तो बन गये ना। तो इसको क्या कहेंगे? जिसने बाप को परख लिया, पहचान लिया, तो पहचानना ये भी बुद्धि की विशेषता है, परखने की शक्ति है। तो आप सभी के परखने की शक्ति श्रेष्ठ है। अच्छा-आज विशेष मनाने आये हो ना? आज मनाने का दिन है या आज भी सुनने का दिन है? सुनना भी है? अच्छा।

तो शिवरात्रि कहते हैं लेकिन आपके लिए अभी क्या है? आपके लिए रात्रि नहीं है तो क्या है? अमृतवेला है? आप तो रात्रि से निकल गये या थोड़ी-थोड़ी रात्रि अभी है? छुट्टी ले गई? किसी भी प्रकार का अंधकार आता है कि खत्म हो गया? अमृतवेला सदा वरदान का समय है तो आपको रोज़ वरदान मिलता है ना? तो आप कहेंगे बाप आता रात्रि में है लेकिन हमारे लिये अमृतवेला गोल्डन मोर्निंग, डायमण्ड मोर्निंग हो गई। तो ऐसे वरदानी स्वरूप अपना देखते हो? माया वरदान भुला तो नहीं देती? आती है माया? कभी-कभी तो आती है? माया तो लास्ट घड़ी तक आयेगी। ऐसे नहीं जायेगी। लेकिन माया का काम है आना और आपका काम है दूर से भगाना। आ जावे फिर भगाओ, ये नहीं। ये टाइम अभी समाप्त हुआ। माया आवे और आपको हिलावे फिर आप भगाओ, टाइम तो गया ना! लेकिन साइलेन्स के साधनों से आप दूर से ही पहचान सकते हो कि ये माया है। इसमें भी टाइम वेस्ट नहीं करो और माया भी देखती है ना कि चलो आने तो देते हैं ना, तो आदत पड़ जाती है आने की। जैसे कोई पशु को, जानवर को अपने घर में आने की आदत डाल दो फिर तंग होकर भगाओ भी लेकिन आदत तो पड़ जाती है ना! और बाप ने सुनाया था कि व्ई बच्चे तो माया को चाय-पानी भी पिलाते हैं। चाय-पानी कौन सी पिलाते हो? पता है ना? क्या करूँ, कैसे करूँ, अभी तो पुरूषार्था हूँ, अभी तो सम्पूर्ण नहीं बने हैं, आखिर हो जायेंगे - ये संकल्प चाय-पानी हैं। तो वो देखती है चाय-पानी तो मिलती है। किसी को भी अगर चाय-पानी पिलाओ तो वो जायेगा कि बैठ जायेगा? तो जब भी कोई परिस्थिति आती है तो क्यों, क्या, कैसे, कभी-कभी तो होता ही है, अभी कौन पास हुआ है, सबके पास है - ये है माया की खातिरी करना। कुछ नमकीन, कुछ मीठा भी खिला देते हो। और फिर क्या करते हो? फिर तंग होकर कहते हो अभी बाबा आप ही भगाओ। आने आप देते हो और भगाये बाबा, क्यों? आने क्यों देते हो? माया बार-बार क्यों आती है? हर समय, हर कर्म करते, त्रिकालदर्शी की सीट पर सेट नहीं होते हो। त्रिकालदर्शी अर्थात् पास्ट, प्रेजेन्ट और फ्युचर को जानने वाले। तो क्यों, क्या नहीं करना पड़ेगा। त्रिकालदर्शी होने के कारण पहले से ही जान लेंगे कि ये बातें तो आनी हैं, होनी हैं, चाहे स्वयं द्वारा, चाहे औरों द्वारा, चाहे माया द्वारा, चाहे प्रकृति द्वारा, सब प्रकार से परिस्थितियाँ तो आयेंगी, आनी ही हैं। लेकिन स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो पर-स्थिति उसके आगे कुछ भी नहीं है। पर-स्थिति बड़ी या स्व-स्थिति बड़ी? या कभी स्व-स्थिति बड़ी हो जाती, कभी पर-स्थिति? तो इसका साधन है - एक तो आदि-मध्य-अन्त तीनों काल चेक करके, समझ कर फिर कुछ भी करो। सिर्फ वर्तमान नहीं देखो। सिर्फ वर्तमान देखते हो तो कभी परिस्थिति ऊंची हो जाती और कभी स्व-स्थिति ऊंची हो जाती। दुनिया में भी कहते हैं पहले सोचो फिर करो। नहीं तो जो सोच कर नहीं करते तो पीछे सोचना पश्चाताप का रूप हो जाता है। ऐसे नहीं करते, ऐसे करते, तो पीछे सोचना अर्थात् पश्चाताप का रूप और पहले सोचना ये ज्ञानी तू आत्मा का गुण है। द्वापर-कलियुग में तो अनेक प्रकार के पश्चाताप ही करते रहे हो ना? लेकिन अब संगम पर पश्चाताप करना अर्थात् ज्ञानी तू आत्मा नहीं है। ऐसा अपने को बनाओ जो अपने आपमें भी, मन में एक सेकण्ड भी पश्चाताप नहीं हो। तो इस डायमण्ड जुबली में विशेष सारे दिन में एक समय और दूसरा संकल्प-इन दो खजानों पर अटेन्शन रखना। वैसे खजाने तो बहुत हैं लेकिन विशेष इन दो खजानों के ऊपर अटेन्शन देना है। हर दिन संकल्प श्रेष्ठ, शुभ कितना जमा किया? क्योंकि पूरे कल्प के लिये जमा करने की बैंक अभी खुलती है। सतयुग में ये बैंक जमा की बन्द हो जायेगी। ये बैंक भी नहीं होगी, दूसरी बैंक भी नहीं होगी। इतना धन आपके पास होगा जो किसी से भी कुछ लेने की आवश्यकता नहीं होगी। बैंक में क्यों रखते हैं? एक तो सेफ्टी और दूसरा ब्याज मिलता है। कई बहुत होशियार होते हैं जो ब्याज से ही चलते रहते हैं। और इस समय तो अगर ऐसे होशियार हैं तो अच्छे हैं, जमा करते हैं ना। लेकिन ब्याज किस तरफ लगाते हैं वो देखना है। तो सतयुग में न ये बैंक होगी, न रूहानी खजाने जमा करने की बैंक होगी। दोनों बैंक नहीं होगी। इस समय एक का पद्मगुणा करके देने की बैंक है लेकिन एक जमा करेंगे तब पद्म मिलेगा, ऐसे नहीं। हिसाब है। तो डायमण्ड जुबली में सच्चे डायमण्ड बनना ही है, ये तो पक्का है ना? कि कभी संकल्प आता है कि पता नहीं बन सकेंगे या नहीं? पता नहीं, तो नहीं आता? क्या भी हो, त्याग करना पड़े, तपस्या करनी पड़े, निर्मान बनना पड़े, कुछ भी हो जाये, बनना जरूर है। है? बोलो, हाँ जी या ना जी? (हाँ जी) देखना, हाँ जी कहना तो बहुत सहज है। हाँ जी बनना इसमें अटेन्शन देना पड़ेगा। पहला-पहला त्याग ये मैंशब्द है। ये मैंशब्द है बहुत पुराना लेकिन आजकल ये बहुत रॉयल रूप का हो गया है। ये मैंशब्द समाप्त हो भाषा में भी बाबा-बाबाशब्द आ जाये। कहने में देखो साधारण बात है, मैं योग्य हूँ ना, तो योग्य हूँ तो सैलवेशन या सेवा उसी प्रमाण मिलनी चाहिये। मैं योग्य हूँ, मैं करती हूँ, तो ये राइट है? करते तो हो ना फिर क्यों नहीं कहें करती तो हूँ! मैं रांग हूँ, राइट हूँ, कहने में तो आयेगा ना मैं करती हूँ! ... आप नहीं करती हो? करता बाबा है! वो बाप है करावनहार लेकिन करनहार तो आप हो ना। तो मैंकहना रांग क्यों हुआ? वैसे जब मैंशब्द भी प्रयोग करते हो तो वास्तव में मैंशब्द किससे लगता है? आत्मा से या शरीर से? मैं कौन? आत्मा है ना, शरीर तो नहीं है? तो अगर देही अभिमानी बन, मैं आत्मा हूँ-इस स्मृति से मैंशब्द यूज़ करते हैं तो राइट है। लेकिन मैंशब्द बॉडी कान्सेस के रूप में अगर यूज़ करते हैं तो रांग है। सारे दिन में ये मैंशब्द बहुत आता है और आना ही है। तो अभ्यास करो-जब भी मैंशब्द कहते हो तो मैं कौन? वास्तव में मैंहै ही आत्मा। शरीर को मेराकहते हैं। तो मैंशब्द अगर आत्म अभिमानी बनकर कहेंगे तो आत्मा को बाप स्वत: याद है। कहने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। हूँ ही मैं आत्मा - ये अभ्यास डाल दो। जैसे ये उल्टा अभ्यास पड़ गया है और नेचरल हो गया है कि जब मैंशब्द बोलते हो तो अपना नाम-रूप स्मृति में आ जाता है। मैं कौन हूँ? मैं फलानी हूँ। यह नेचरल हो गया है ना? सोचना नहीं पड़ता है। तो ये जो उल्टे भाव से मैंशब्द यूज़ करते हो तभी रिज़ल्ट में मेहनत ज्यादा और प्राप्ति कम होती। कई बच्चे कहते हैं हम तो बहुत सेवा करते हैं, बहुत मेहनत करते हैं लेकिन प्राप्ति इतनी नहीं होती है। उसका कारण क्या? वरदान सबको एक है, 60 साल वालों को भी एक तो एक मास वाले को भी एक है। खजाने सभी को एक जैसे हैं। पालना सबको एक जैसी है, दिनचर्या, मर्यादा सबके लिए एक जैसी है। दूसरी-दूसरी तो नहीं है ना! ऐसे तो नहीं, विदेश की मर्यादायें और हैं, इण्डिया की और हैं, ऐसे तो नहीं? थोड़ा-थोड़ा फर्क है? नहीं है? तो जब सब एक है फिर किसको सफलता मिलती है, किसको कम मिलती है - क्यों? कारण? बाप मदद कम देता है क्या? किसको ज्यादा देता हो, किसको कम, ऐसे है? नहीं है। फिर क्यों होता है? मतलब क्या हुआ? अपनी गलती है। या तो बॉडी-कॉन्सेस वाला मैं-पन आ जाता है, या कभी-कभी जो साथी हैं उन्हों की सफलता को देख ईर्ष्या भी आ जाती है। उस ईर्ष्या के कारण जो दिल से सेवा करनी चाहिये, वो दिमाग से करते हैं लेकिन दिल से नहीं। और फल मिलता है दिल से सेवा करने का। कई बार बच्चे दिमाग यूज़ करते हैं लेकिन दिल और दिमाग दोनों मिलाके नहीं करते। दिमाग मिला है उसको कार्य में लगाना अच्छा है लेकिन सिर्फ दिमाग नहीं। जो दिल से करते हैं तो दिल से करने वाले के दिल में बाप की याद भी सदा रहती है। सिर्फ दिमाग से करते हैं तो थोड़ा टाइम दिमाग में याद रहेगा-हाँ, बाबा ही कराने वाला है, हाँ बाबा ही कराने वाला है लेकिन कुछ समय के बाद फिर वो ही मैं-पन आ जायेगा। इसलिए दिमाग और दिल दोनों का बैलेन्स रखो।

तो सुनाया डायमण्ड जुबली में क्या करना है? विशेष बचत का खाता जमा करो। ऐसे नहीं, कि सारा दिन मेरे से कोई ऐसी बात नहीं हुई, किसको दु:ख नहीं दिया, किसी से कुछ खिटखिट नहीं हुई अर्थात् गँवाया नहीं। ये तो अच्छी बात है गँवाया नहीं लेकिन जमा किया? सेवा भी की तो अपने रूहानियत से सेवा में सफलता प्राप्त की? वा सफलता जमा की? तो सेवा में समय लगाया - ये तो अच्छी बात की ना लेकिन सेवा किस विधि से की? कई कहते हैं हम तो सारा दिन इतने सेवा में बिज़ी रहते हैं जो अपना ही नहीं पता पड़ता। बिज़ी रहते हैं यह बहुत अच्छा। लेकिन सेवा का प्रत्यक्षफल जमा हुआ? कि सिर्फ मेहनत की? सेवा में समय 8 घण्टा लगाया लेकिन 8 ही घण्टे सेवा के जमा हुए? समय जमा हुआ? कि आधा जमा हुआ, आधा भागदौड़ में, सोचने में गया? श्रेष्ठ संकल्प, शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प जमा होते हैं। तो सारे दिन में जमा का खाता नोट करो। जब जमा का खाता बढ़ता जायेगा तो स्वत: ही डायमण्ड बन ही जाना है। अभी भी समय और संकल्प - ना अच्छे में, ना बुरे में होते हैं। तो बुरे में नहीं हुआ ये तो बच गये लेकिन अच्छे में जमा हुआ? समझा? समय को, संकल्प को बचाओ, जितना अभी बचत करेंगे, जमा करेंगे तो सारा कल्प उसी प्रमाण राज्य भी करेंगे और पूज्य भी बनेंगे। चाहे द्वापर से आप साकार रूप में तो गिरती कला में आते हो लेकिन आपका जमा किया हुआ खाता आपके जड़ चित्रों की पूजा कराता है। तो सब ये नोट करना तो मालूम पड़ जायेगा कि व्यर्थ वा साधारण समय कितना होता है? साधारण संकल्प कितने होते हैं? लेकिन एक अटेन्शन रखना - अगर मानो आपका आज के दिन जमा का खाता बहुत कम हुआ तो कम देख करके दिलशिकस्त नहीं होना। और ही समझो कि अभी भी हमको चांस है जमा करने का। अपने को उमंग-उत्साह में लाओ। अपने आपसे रेस करो, दूसरे से नहीं। अपने आपसे रेस करो कि आज अगर 8 घण्टे जमा हुए तो कल 10 घण्टे हो। दिलशिकस्त नहीं होना। क्योंकि अभी फिर भी जमा करने का समय है। अभी टू लेट का बोर्ड नहीं लगा है। फाइनल रिजल्ट का टाइम अभी एनाउन्स नहीं हुआ है। जैसे लौकिक में पेपर की डेट फाइनल हो जाती है तो अच्छे पुरूषार्था क्या करते हैं? दिलशिकस्त होते हैं या पुरूषार्थ में आगे बढ़ते हैं? तो आप भी दिलशिकस्त नहीं बनना। और ही उमंग-उत्साह में आकरके दृढ़ संकल्प करो कि मुझे अपने जमा का खाता बढ़ाना ही है। समझा? दिलशिकस्त तो नहीं होंगे? फिर बाप को मेहनत करनी पड़े! फिर बड़े-बड़े पत्र लिखना शुरू कर देंगे - बाबा क्या हो गया... ऐसा हो गया... ! बाबा बचाओ, बचाओ - ऐसे नहीं कहना। देखो आपके जड़ चित्रों से जाकर मांगनी करते हैं कि हमको बचाओ। तो आप बचाने वाले हो, बचाओ-बचाओ कहने वाले नहीं।

डबल विदेशी समझते हैं कि हमारी भी पूजा होती है? कि भारत वालों की होती है? किसकी होती है? आपकी होती है? तो सदा अपना राज्य अधिकारी स्वरूप और पूज्य स्वरूप - मैं पूज्य आत्मा हूँ, औरों को देने वाली दाता हूँ। लेवता नहीं, देवता हूँ। बाप ने तो आपेही दिया ना या आपने मांगा तब दिया? आपको तो मांगना भी नहीं आता था। भक्ति में क्या मांगते थे? एक बच्चा दे दो, एक मकान दे दो या इम्तहान में पास करा दो। वर्से के अधिकारी नहीं समझते थे और बाप ने तो वर्से में सब कुछ दे दिया। क्या अपने पास कुछ रखा है? बिना मांगे दिया है। हम विश्व के राजा बन सकते हैं-ये कभी सोच सकते थे? संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा बन सकते हैं, ये भी कहाँ सोचते थे। तो जमा करो क्योंकि बापदादा ने देखा कि मेहनत बहुत करते हैं। लेकिन जमा का खाता अभी जितना होना चाहिये उतना नहीं है। तो जब डेट एनाउन्स हो जायेगी फिर आप कहो कि हमको तो पता ही नहीं था। पता होता तो कर लेते थे। इसलिए इस डायमण्ड जुबली में याद से, सेवा से, शुभ भावना, शुभ कामना से खाता जमा करो। समझा क्या करना है? जमा करना है। बापदादा के पास तो सबका पहुँच ही जाता है। एक मास की रिज़ल्ट अपने आप देखो। ऐसे नहीं कि यहाँ पत्र लिखकर भेजो। नहीं, ये अपने आप चेक करो और चेक करके चेंज करो। दिलशिकस्त नहीं बनो, चेंज करो। जब बाप साथ है तो बाप को यूज़ करो ना! यूज़ कम करते हो, सिर्फ कहते हो बाबा साथ है, बाबा साथ है। यूज़ करो। जब सर्वशक्तिमान साथ है तो सफलता तो आपके चरणों में दौड़नी है।

अच्छा, शिव जयन्ती वा शिवरात्रि के सम्बन्ध से आपका कम्बाइन्ड रूप कौन-सा गाया जाता है? (शिवशक्ति)। ये पक्का है? या शक्ति अलग है, शिव अलग है? तो शिवशक्ति का अर्थ ही है कि कम्बाइन्ड हैं। अलग नहीं। फिर अलग कैसे करते हो? अलग हो सकता है? तो फिर कैसे होता है? जुड़ा हुआ तो है फिर अलग कैसे होता है? जुड़ा हुआ अलग नहीं होता है लेकिन सिर्फ माया फेस ऐसा कर देती है, घुमा देती है तो किनारा हो जाता है। तो मैं शिवशक्ति हूँ - ये स्मृति आज के शिव जयन्ती की यादगार है। और पाण्डव क्या हैं? आप भी शिवशक्ति हो या शिव पाण्डव हो? क्या हो? शक्ति तो हो ना? अच्छा।

बच्चों ने पूछा था कि भविष्य में क्या सेवा होनी है? तो बाप ने पहले भी कहा है कि अभी जहाँ तक ज्यादा में ज्यादा हो सके तो बनी-बनाई स्टेज़ पर आप चीफ गेस्ट हो, इस सेवा को और बढ़ाओ। इसके लिये जो भी बड़े-बड़े एसोसिएशन्स हैं या कम्पनियाँ हैं, सोसाइटीज़ हैं उनमें विशेष निमित्त आत्माओं को परिचय दे समीप लाओ तो एक-एक की अलग-अलग सेवा करने की बजाय एक ही समय अनेक आत्माओं की सेवा हो जायेगी। इस पर और आगे अटेन्शन दे बढ़ाओ। दूसरी बात, कि अभी आप ऐसे स्पीकर तैयार करो, बड़े माइक जो हैं वो अलग चीज़ हैं, वो तो करने ही हैं, लेकिन ऐसे सम्पर्क वालों को नॉलेज से समीप लाओ जो आपके ज्ञान की बातें, आप नहीं कहो लेकिन वो सिद्ध करके बतायें तो ये बात इस कारण से यथार्थ है। अभी शान्ति और प्रेम, यहाँ तक पहुँचे हैं और यही स्पीच करते हैं कि यहाँ प्रेम मिला, शान्ति अनुभव हुई वा ब्रह्मा बाप की कमाल है, यहाँ तक आये हैं लेकिन ब्रह्मा बाप में परम आत्मा की कमाल है, अभी वहाँ तक पहुँचाना है। विदेश को बापदादा मुबारक देते हैं कि हिम्मत रख आई.पीज़. को नज़दीक लाया है और दिन प्रतिदिन हर वर्ष कुछ न कुछ आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अभी ऐसे कोई चाहे 10-15 हो, ज्यादा नहीं हो, लेकिन पोज़ीशन वाले हो, जिसका प्रभाव सुनने वालों पर पड़ सके ऐसे चाहे भारत में, चाहे विदेश में, ऐसे ज्ञान के समीप लाओ जो वो परमात्म ज्ञान को स्वयं समझ कर स्पष्ट करे। मेहनत है इसमें। लेकिन बाप की, परमात्म ज्ञान की प्रत्यक्षता अगर डायमण्ड जुबली के बाद भी नहीं करेंगे तो कब करेंगे! अभी सेवाकेन्द्र 62 देशों में हैं ना, लेकिन हर एक स्टेट में बड़े माइक के पहले ऐसे छोटे-बड़े स्पीकर तैयार करो। भारत में भी हर स्टेट में ऐसा स्पीकर ग्रुप या एक-दो तैयार करो। बाप की प्रत्यक्षता तब होगी जब दूसरे सिद्ध करें। जैसे अभी तक जो सेवा की है तो औरों के अनुभव से आपका परिचय सुनकर वृद्धि होती गई है। जब से औरों ने कहना शुरू किया है कि वहाँ तो स्वर्ग है, शान्ति है, प्यार है, तो एक-दो का अनुभव सुनकर वृद्धि जल्दी हुई है। तो यहाँ तक तो सेवा की है, उसकी मुबारक हो लेकिन आगे क्या करना है? ऐसा समीप लाओ। अलग में ज्ञान की मेहनत करो, संगठन में नहीं होगा। लेकिन उसके लिये मेहनत कर सम्पर्क वालों को सेवा में लगाओ। अभी धरनी तैयार की है। अभी धरनी में परमात्म ज्ञान या परमात्म पहचान का बीज डालने का लक्ष्य रखो। चाहे टाइम लगेगा, लेकिन ये भी लक्ष्य रखा तो हो गया ना? सफलता मिली ना? नहीं तो पहले सोचते थे कि विदेश से यहाँ कैसे आयेंगे? बहुत मुश्किल है। लेकिन अभी 200-250 तो आ जाते हैं ना? तो ये धरनी अभी तैयार की है, हल चलाया है, अच्छी मेहनत की है। अभी ऐसा ग्रुप तैयार करो। कम से कम चलो सर्वव्यापी की बात है या बहुत कड़ी-कड़ी प्वाइन्ट्स हैं, उसको नहीं भी वर्णन करें लेकिन इतना तो समझें कि ये परमात्म शक्ति है। ब्रह्मा की अलग नहीं, ब्रह्मा में भी परमात्म शक्ति ने कार्य किया है। तो बाप की पहचान तो मिले ना। ये परमात्म कार्य है, कोई शक्ति है - यहाँ तक आये हैं लेकिन आखिर समाप्ति तब होगी जब परमात्म पहचान मिले। तो जो अब तक किया है वो बहुत अच्छा किया है लेकिन अभी और अच्छे से अच्छा करना है। बाप जानते हैं कि मेहनत बहुत करनी पड़ती है लेकिन करनी तो होगी ना! तो ऐसा कोई प्रोग्राम बनाओ, जो ऐसे योग्य समझो उनका छोटा-छोटा ग्रुप बनाकर उन्हें समीप लाओ। चाहे एक-एक होकर करो, चाहे छोटे ग्रुप में करो। जैसा व्यक्ति वैसी सेवा करो। समझा क्या करना है?

अच्छा।

चारों ओर के जयन्ती की मुबारक देने वाले बच्चों को, सदा बाप के साथ-साथ रहने वाले कम्बाइण्ड रूपधारी बच्चों को, सदा उमंग-उत्साह के द्वारा स्वयं को और औरों को आगे बढ़ाने वाले बच्चों को, चारों ओर के सेवा में आगे बढ़ने वाले सच्चे सेवाधारी बच्चों को बापदादा की पद्म-पद्म-पद्म गुणा मुबारक हो। याद-प्यार के साथ बाप भी बच्चों की मुबारक, याद-प्यार स्वीकार कर रहे हैं। देख रहे हैं कि सभी तरफ मुबारक-मुबारक के दिल के गीत बज रहे हैं। तो ऐसे मुबारक लेने और मुबारक देने के दोनों के संगम की विशेष याद-प्यार और नमस्ते।

अच्छा एक बात आज बच्ची ने खुशखबरी सुनाई कि इस ग्रुप में ऐसे बच्चे हैं जो पूरा एक वर्ष क्रोध मुक्त रहे हैं। तो जब सेरीमनी होगी तभी ऐसे क्रोधमुक्त बच्चों का सभी मुखड़ा भी देखना और बाप भी देखेंगे। वो स्टेज पर आयेंगे। जिन्होंने हाथ नहीं उठाया हो और बने हो वो भी आ सकते हैं। लेकिन एक वर्ष क्रोध मुक्त बने हुए हो। क्या सोच रहे हो? हम भी होते तो अच्छा होता।

दादियों से

आपके त्याग और तपस्या का फल प्रत्यक्ष फल दिखा रहा है। ये 14 वर्ष की तपस्या प्रैक्टिकल में रिजल्ट के रूप में देख रहे हो। सभी चाहे देश में, चाहे विदेश में, इस वर्ष के आदि से उमंग-उत्साह में बहुत आये। क्यों? विशेषता क्या है? क्यों उमंग-उत्साह में इतने आये? (डायमण्ड जुबली है) डायमण्ड जुबली की खुशी भी है लेकिन साथ-साथ सेवा की सफलता अभी प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे रही है। इस कारण फल को देख करके, एक होता है स्वार्थ का फल जो अल्पकाल का होता है और दूसरा है निस्वार्थ सेवा का फल, तो अभी जो मिल रहा है वो निस्वार्थ सेवा जो इतना समय की है उसका फल सहज प्राप्त हो रहा है और इस डायमण्ड जुबली के नशे में, खुशी में और भी सेवा आगे बढ़ सकती है। आप उमंग-उत्साह से बढ़ाते जायेंगे तो सेवा बढ़ जायेगी। आप निमित्त बनी हुई आत्मायें लक्ष्य रखो तो आपके लक्ष्य की किरणें सभी को मिलेगी। होना ही है, करना ही है, आप लोगों को तो है लेकिन औरों को भी हिम्मत और उमंग दिलाने में लक्ष्य और दृढ़ रखो। ब्रह्मा बाप और शिव बाप की पहचान बच्चों को मिलनी तो है ना? समझा? (सामने बैठी हुई टीचर्स से) आप लोग सुन रहे हो ना? तो आप भुजाओं के बिना कुछ नहीं होता है। ये हैं प्लैन करने वाले, संकल्प देने वाले लेकिन संकल्प को साकार करने वाले कौन? बोलो ना हम हैं। क्यों, भुजा समझ कर करेंगे तो मैं-पन बॉडी कान्सेस का आयेगा ही नहीं। विदेश के भी आदि रत्न बैठे हैं। लहर अभी अच्छी है। लहर औरों को अभी देने की आवश्यकता नहीं है। लहर आ गई है। अभी सिर्फ उन्हों को और उमंग-उत्साह दिलाते चलो। निमित्त आत्मायें अच्छी हो और बापदादा के समीप हो। समीप हो या फॉरेन में हो? समीप हैं ना? बापदादा भी खुश होते हैं वाह मेरे राइट हैण्ड। राइट हैण्ड हैं ना? राइट हैण्ड से ही काम होता है। तो हर स्थान पर बाप के राइट हैण्ड हैं। लेकिन जो आदि रत्न निमित्त हो उन्हों को और आगे बढ़ते बढ़ाना है। एक ही काम है बस। कहाँ भी देखो सेवा में थोड़ी सी थकावट फील करते हैं या मेहनत फील करते हैं तो उन्हों को कोई न कोई सहयोग देकर उमंग-उत्साह बढ़ाओ। ये आप लोगों का काम है। समझा? जो टीचर्स हैं उसमें भी आप लोग विशेष निमित्त हो। समझते हो अपने को निमित्त? बोलो, जयन्ती बोलो। थक तो नहीं गई ना? अच्छा है सभी टीचर्स में भी अभी मैजारिटी में हिम्मत आ गई है। अभी निर्विघ्न बनने की विधि भी समझ गये हैं। पहले घबराते बहुत थे ना, अभी घबराते कम हैं, हिम्मत आई है। क्योंकि एक तरफ बाप का प्यार और दूसरे तरफ सेवा का बल तो दोनों ने अभी हिम्मत बढ़ाई है।

अच्छा-टीचर्स हाथ उठाओ। बस बापदादा सभी को यह कहते हैं कि सदा खुश रहो, सेवा में आबाद रहो।

बच्चों से मिलन मनाने के पश्चात् बापदादा ने अपने हस्तों से झण्डा फहराया।

जब यह झण्डा लहराया तो बच्चों को कितनी खुशी हो रही है। और जब विश्व में सभी के आगे झण्डा लहरेगा तो कितनी खुशियाँ होंगी! कितनी तालियाँ बजेंगी। झण्डा सदा ऊंचा रखते हैं क्यों? ऊंचे का अर्थ है कि सबकी नज़र उस तरफ जाये तो जब प्रत्यक्षता का झण्डा लहरेगा तो सबकी नज़र उसी एक बाप के तरफ होगी। आपके दिलों में तो बाप का झण्डा याद का है ही लेकिन अभी दूसरों के दिलों में ये प्रत्यक्षता का झण्डा लहराना है। ये तो कपड़े का झण्डा लहराया लेकिन प्रत्यक्षता का झण्डा सभी को मिलकर लहराना है और लहरना ही है।

जाम्बिया के भूतपूर्व राष्ट्रपति कैनेथ कौण्डा तथा उनके साथियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

बहुत अच्छे टाइम पर यहाँ पहुँच गये। सेवा का चांस बहुत अच्छा ले सकते हो। अभी अपने को सिर्फ जाम्बिया के सेवाधारी समझते हो वा अपने को गॉडली मैसेन्जर समझते हो? जाम्बिया में गॉडली मैसेन्जर भी बनकर गॉडली मैसेज देंगे ना? देखो सेवा के संस्कार तो पहले से हैं ही, अभी सिर्फ सेवा में स्प्रीचुअलिटी एड करनी है। और आप जानते भी हो कि आज विश्व में स्प्रीचुअलिटी के बिना परिवर्तन होना मुश्किल है। तो आप जैसे और राजनीति सेवा के ग्रुप बनाते हैं, बने हुए हैं, ऐसे अभी आध्यात्मिक मूल्य का ग्रुप बनाओ। जैसे अभी राजनीतिक कार्य में भी आपके साथी हैं, ग्रुप है, तो ऐसा ग्रुप बनाओ जो मॉरल वैल्यु को आगे बढ़ाये। ऐसे एक-एक देश में, चाहे छोटे, चाहे बड़े कोई न कोई निमित्त बन जायेंगे तो ये वायब्रेशन फैलता जायेगा। क्योंकि आपमें पहले से ही दो विशेषतायें हैं और उन विशेषताओं से आप और जल्दी आगे बढ़ सकते हो। एक तो शुरू से दृढ़ निश्चय वाले हो, करना ही है और दूसरा सेवा के लिये अगर कुछ सहन भी करना पड़ता तो सहनशक्ति भी है। तो जहाँ दृढ़ता और सहनशक्ति है वहाँ जो चाहे वो कर सकते हैं। अच्छा है।

मॉरिशियस के भूतपूर्व शिक्षा एवं विज्ञान मंत्री भ्राता परशुराम जी से:-

ये भी लक्की है क्योंकि मनन करते रहते हो। प्लैन सोचते रहते हो-ऐसे नहीं ऐसे है, ऐसे नहीं ऐसे। तो जो मनन शक्ति वाले होते हैं उसको बाप की भी मदद मिलती है। जो मुश्किल काम होता है ना वो सहज हो जाता है। तो अभी तक जो किया है वो बहुत अच्छा किया है और आगे भी करना ही है। सोचेंगे, करेंगे.. नहीं। करना ही है। जो ये सोचते हैं ना - देखेंगे, करेंगे तो जो विघ्न आते हैं उसमें पीछे हट जाते हैं। और जो दृढ़ संकल्प रखते हैं कि करना ही है वो पास हो जाते हैं। चाहे कितनी भी ऊंची दीवार आ जाए लेकिन पार हो जाते हैं। दीवार छोटी हो जाती है और स्वयं शक्तिशाली बड़े हो जाते हो। इसलिए हिम्मत और बाप का साथ ये नहीं छोड़ना।

(रिट्रीट में आये हुए अन्य गेस्ट को देखकर) इतने सभी मिलकर जो चाहे सो कर सकते हैं। अपने शक्तियों को आगे कार्य में लगाते जाओ तो बढ़ती जायेंगी। क्योंकि अभी स्प्रीचुअल पॉवर का भी पता पड़ गया। अभी स्प्रीचुअल पॉवर का अनुभव हो गया ना? अच्छा है, ग्रुप अच्छा है। ये और ग्रुप को भी लायेंगे। जिसकी भावना स्प्रीचुअलिटी के तरफ होती है उसको भावना का फल अवश्य मिलता है। अभी गॉडली मैसेज देने में भी सहयोगी बनना ही है। विदाई के समय बापदादा ने विदेश सेवाओं के सिल्वर जुबली की मुबारक दी तथा पूरे वर्ष जो क्रोध मुक्त रहे हैं उन्हें स्टेज पर बुलाया:-

सभी ने अच्छी तरह से मनाया? अपने को बनाया? मनाना अर्थात् बनना। तो मनाया भी और अपने को बनाया भी। आज विशेष विदेश के सेवा स्थापन होने की सिल्वर जुबली है। तो सभी सिल्वर जुबली वालों को खास लण्डन और हांगकांग और नैरोबी, लुसाका...जहाँ भी सेवा की और जिन्होंने भी सेवा की उन सबको बहुत-बहुत मुबारक! मुबारक!! मुबारक!!! तो सिल्वर जुबली भी मना लेना। खास डबल विदेशियों की सिल्वर जुबली है। आप लोगों की है सिल्वर जुबली? (21 वर्ष हुए) तो भी मुबारक हो जो 21 वर्ष चले हैं। हाथ उठाओ जो 21 वर्ष के हैं।

क्रोध मुक्त रहने वालों से

अच्छा हिम्मत का काम किया है लेकिन इसको छोड़ना नहीं। सदा रहेंगे ना? कि थोड़ा ढीला हो जायेगा? ढीला नहीं होना है और मज़बूत होना है।



27-02-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘सत्यता का फाउण्डेशन है पवित्रता और निशानी है-चलन वा चेहरे में दिव्यता’’

आज सत्-बाप, सत्-शिक्षक, सतगुरु अपने चारों ओर के सत्यता के शक्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है। और सत्यता का प्रैक्टिकल प्रमाण चेहरे पर और चलन में दिव्यता होगी। दुनिया में भी अनेक आत्मायें अपने को सत्यवादी कहते हैं वा समझते हैं लेकिन सम्पूर्ण सत्यता पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता रह नहीं सकती है। तो आप सबका फाउण्डेशन क्या है? पवित्रता। तो पवित्रता के आधार पर सत्यता का स्वरूप स्वत: और सहज सदा होता है। सत्यता सिर्फ सच बोलना, सच करना इसको नहीं कहा जाता लेकिन सबसे पहला सत्य जिससे आपको पवित्रता की वा सत्यता की शक्ति आई, तो पहली बात है अपने सत्य स्वरूप को जाना, मैं आत्मा हूँ-ये सत्य स्वरूप पहले नहीं जानते थे। लेकिन पहला सत्य अपने स्वरूप को जाना। मैं फलानी हूँ या फलाना हूँ, बॉडी के हिसाब से वह सत्य स्वरूप था? सत्य स्वरूप है पहले स्व स्वरूप और फिर बाप के सत्य परिचय को जाना। अच्छी तरह से अपना सत्य स्वरूप और बाप का सत्य परिचय जान लिया है? तीसरी बात-इस सृष्टि चक्र को भी सत्य स्वरूप से जाना। यह चक्र क्या है और इसमें मेरा पार्ट क्या है! तो अपना पार्ट अच्छी तरह से स्पष्ट रूप से जान लिया? आपका पार्ट अच्छा है ना? सबसे अच्छा पार्ट संगमयुग का कहेंगे। लेकिन आपका देव आत्मा का पार्ट भी विश्व में सारे चक्र की आत्माओं से श्रेष्ठ है। चाहे धर्म आत्मायें, महान आत्मायें भी पार्ट बजाती हैं लेकिन वो आत्मा और शरीर दोनों से पवित्र नहीं हैं और आप देव आत्मायें शरीर और आत्मा दोनों से पवित्र हैं, जो सारे कल्प में और कोई आत्मा ऐसी नहीं। तो पवित्रता का फाउण्डेशन सिवाए आपके और कोई भी आत्मा का श्रेष्ठ नहीं है। आपको देव आत्मा का पार्ट याद है? पाण्डवों को याद है? देव आत्मा की पवित्रता नेचुरल रूप में रही है। महान आत्मायें, आत्माओं को पवित्र बनाती हैं लेकिन बहुत पुरूषार्थ से, नेचुरल नहीं। न नेचुरल है न नेचर रूप में है। और आपकी आधा कल्प पवित्रता की जीवन नेचुरल भी है और नेचर भी है। कोई पुरूषार्थ वहाँ नहीं है। यहाँ का पुरूषार्थ वहाँ नेचुरल हो जाता है। क्योंकि वहाँ अपवित्रता का नाम-निशान नहीं, मालूम ही नहीं कि अपवित्रता भी होती है। इसलिए आपके पवित्रता का प्रैक्टिकल स्वरूप देवता अर्थात् दिव्यता का है। इस समय दुनिया वाले कितना भी अपने को सत्यवान समझें लेकिन स्व स्वरूप की सत्यता ही नहीं जानते। बाप के सत्य परिचय को ही नहीं जानते। तो सम्पूर्ण सत्य स्वरूप नहीं कहेंगे। आपमें भी सत्यता की शक्ति सदा तब रहेगी जब अपने और बाप के सत्य स्वरूप की स्मृति रहेगी, तो स्वत: ही हर संकल्प भी आपका सत्य होगा। अभी कभी भूल भी जाते हो, बॉडी कानसेस में आ जाते हो तो संकल्प सदा सत्यता के शक्तिशाली हो, पवित्रता के शक्तिशाली हो, वह सदा नहीं रहता। सदा रहता है कि व्यर्थ भी होता है? तो व्यर्थ को सत्य कहेंगे? झूठ तो बोला ही नहीं तो क्यों नहीं सत्य है? अगर कोई यह समझकर बैठे कि मैं कभी भी झूठ नहीं बोलती, सदा सच बोलती लेकिन सत्यता की परख है कि संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क सबमें दिव्यता अनुभव हो। बोल सच रहे हैं लेकिन दिव्यता नहीं है, देखते हो ना-कई बार-बार कहेंगे मैं सच बोलती, मैं सच बोलती। मैं सदा सच्ची हूँ लेकिन बोल में, कर्म में अगर दिव्यता नहीं है तो दूसरे को आपका सच, सच नहीं लगेगा। यही समझेंगे कि यह अपने को सिद्ध कर रही है लेकिन समझ में नहीं आता कि यह सत्य है। सत्य को सिद्ध करने के लिए सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। अगर अपने सत्य को जिद्द से सिद्ध करते हैं तो वह दिव्यता दिखाई नहीं देती है। ये साधारणता है, जो दुनिया में भी करते हैं। और बापदादा सत्य की निशानी एक स्लोगन में कहते हैं, साकार द्वारा भी सुना जो सच्चा होगा वह कैसे दिखाई देगा! सच तो नच। सदा खुशी में नाचता रहेगा। जब जिद्द करके सिद्ध करते तो आप अपना या दूसरे का चेहरा नोट करेंगे तो वह खुशी का नहीं होगा। थोड़ा सोचने का और थोड़ा उदासी का होगा। नाचने का नहीं होगा। सच तो बिठो नच, सच्चा खुशी में नाचता है। तो खुशी में जीवन के दिन या रात बहुत अच्छी लगती है। और थोड़ा भी सत्य में असत्य मिक्स है तो उस समय की जीवन इतनी अच्छी नहीं लगेगी। तो सत्यता का अर्थ ही है सत्य स्वरूप में स्थित होकर चाहे संकल्प, चाहे बोल, चाहे कर्म करना।

आजकल दुनिया वाले तो स्पष्ट कहते हैं कि आजकल सच्चे लोगों का चलना ही मुश्किल है, झूठ बोलना ही पड़ेगा। लेकिन कई समय पर, कई परिस्थितियों में ब्राह्मण आत्मायें भी मुख से नहीं बोलती लेकिन अन्दर समझती हैं कि कहाँ-कहाँ चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। उसको झूठ नहीं कहते लेकिन चतुराई कहते हैं। तो चतुराई क्या है? यह तो करना ही पड़ता है! तो वह स्पष्ट बोलते हैं और ब्राह्मण रॉयल भाषा में बोलते हैं। फिर कहते हैं मेरा भाव नहीं था, न भावना थी न भाव था लेकिन करना ही पड़ता है, चलना ही पड़ता है। लेकिन ब्रह्मा बाप को देखा, साकार है ना, निराकार के लिए तो आप भी सोचते हो कि शिव बाप तो निराकार है, ऊपर मजे में बैठा है, नीचे आवे तो पता पड़े क्या है! लेकिन ब्रह्मा बाप तो साकार स्वरूप में आप सबके साथ ही रहे, स्टूडेन्ट भी रहे और सत्यता व पवित्रता के लिए कितनी आपोज़ीशन हुई तो चालाकी से चला? लोगों ने कितना राय दी कि आप सीधा ऐसे नहीं कहो कि पवित्र रहना ही है, यह कहो कि थोड़ा-थोड़ा रहो। लेकिन ब्रह्मा बाप घबराया? सत्यता की शक्ति धारण करने में सहनशक्ति की भी आवश्यकता है। सहन करना पड़ता है, झुकना पड़ता है, हार माननी पड़ती है लेकिन वह हार नहीं है, उस समय के लिए हार लगती है लेकिन है सदा की विजय।

सत्यता की शक्ति से आज डायमण्ड जुबली मना रहे हैं। अगर पवित्रता और सत्यता नहीं होती तो आज आपके चेहरों से, चलन से आने वालों को जो दिव्यता अनुभव होती है वह नहीं होती। चाहे प्यादा भी है, नम्बरवार तो है ही ना। महारथी भी हैं, नाम के महारथी नहीं, लेकिन जो सच्चे महारथी हैं अर्थात् सत्यता की शक्ति से चलने वाले महारथी हैं। जो परिस्थिति को देखकर सत्यता से ज़रा भी किनारा कर लेते, कहते हैं और कुछ नहीं किया एक दो शब्द ऐसे बोल दिये, दिल से नहीं बोले ऐसे बाहर से थोड़ा बोल दिये तो यह सम्पूर्ण सत्यता नहीं है। सत्यता के पीछे अगर सहन भी करना पड़ता तो वह सहन नहीं है भल बाहर से लगता है कि हम सहन कर रहे हैं लेकिन आपके खाते में वह सहन शक्ति के रूप में जमा होता है। नहीं तो क्या होता कि अगर कोई थोड़ा सा भी सहन करने में कमजोर हो जाता है तो उसे असत्य का सहारा जरूर लेना पड़ता है। तो उस समय ऐसे लगता है जैसे सहारा मिल गया, ठीक हो गया लेकिन उसके खाते में सहनशक्ति जमा नहीं होती है। तो बाहर से ऐसे समझेंगे कि हम बहुत अच्छे चलते हैं, हमको चलने की चतुराई आ गई है, लेकिन अगर अपना खाता देखेंगे तो जमा का खाता बहुत कम होगा। इसलिए चतुराई से नहीं चलो, एक दो को देखकर भी कापी करते हैं, यह ऐसे चलती है ना तो इसका नाम बहुत अच्छा हो गया है, यह बहुत आगे हो गई है और हम सच्चे चलते हैं ना तो हम पीछे के पीछे ही रह गये। लेकिन वह पीछे रहना नहीं है, वह आगे बढ़ना है। बाप के आगे, आगे बढ़ते हो और दूसरों के आगे चाहे पीछे दिखाई भी दो लेकिन काम किससे है! बाप से या आत्माओं से? (बाप से) तो बाप के दिल में आगे बढ़ना अर्थात् सारे कल्प के प्रालब्ध में आगे बढ़ना। और अगर यहाँ आगे बढ़ने में आत्माओं को कॉपी करते हो, तो उस समय के लिए आपका नाम होता है, शान मिलता है, भाषण करने वाली लिस्ट में आते हो, सेन्टर सम्भालने की लिस्ट में आते हो लेकिन सारे कल्प की प्रालब्ध नहीं बनती। जिसको बापदादा कहते हैं मेहनत की, बीज डाला, वृक्ष बड़ा किया, फल भी निकला लेकिन कच्चा फल खा गये, हमेशा के लिए प्रालब्ध का फल खत्म हो जाता है। तो अल्पकाल के शान, मान, नाम के लिए कॉपी नहीं करो। यहाँ नाम नहीं है लेकिन बाप के दिल में नम्बर आगे नाम है। इसलिए डायमण्ड बनना है तो यह सब चेकिंग करो। ज़रा भी रॉयल रूप का दाग डायमण्ड में छिपा हुआ तो नहीं है? तो सत्यता की शक्ति से दिव्यता को धारण करो। कुछ भी सहन करना पड़े, घबराओ नहीं। सत्य समय प्रमाण स्वयं सिद्ध होगा। कहते भी हो ना कि सत्य की नाव डोलती है लेकिन डूबती नहीं, तो किनारा तो ले लेंगे ना। निर्भय बनो। अगर कहाँ भी सामना करना पड़ता है तो ब्रह्मा बाप के जीवन को आगे रखो। ब्रह्मा बाप के आगे दुनिया की परिस्थितियां तो थी लेकिन वेराइटी बच्चों की भी परिस्थितियां रहीं लेकिन संगठन में होते, जिम्मेवारी होते सत्यता की शक्ति से विजयी हो गये। बच्चों की खिटखिट ब्रह्मा बाप ने नहीं देखी क्या? ब्रह्मा बाप के आगे भी वेराइटी संस्कार वाली आत्मायें रही, लेकिन इतनी सब परिस्थितियां होते हुए सत्यता की स्व-स्थिति ने सम्पूर्ण बना दिया।

तो आप सबको क्या बनना है? चतुराई तो नहीं है ना! बहुत अच्छा बोलते हैं - मैंने कुछ नहीं किया थोड़ा चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। लेकिन कब तक? तो सहनशक्ति धारण कर असत्य का सामना करो। प्रभाव में नहीं आ जाओ। कई समझते हैं कि हमने महारथियों में भी ऐसे देखा ना तो फॉलो तो महारथियों को करना है ना, अभी ब्रह्मा बाबा तो सामने हैं नहीं, महारथी हैं उसको फॉलो किया। लेकिन अगर महारथी भी मिक्स करता है, चतुराई से चलता है तो उस समय महारथी, महारथी नहीं है। उस समय ग्रहचारी में है न कि महारथी है। इसीलिए बाप ने क्या स्लोगन दिया-फॉलो फादर या सिस्टर ब्रदर? तो साकार कर्म में ब्रह्मा बाप को आगे रखो, फॉलो करो और अशरीरी बनने में निराकार बाप को फॉलो करो। चाहे अच्छे-अच्छे बच्चे भी हैं लेकिन वह भी फॉलो फादर करते हैं। तो आपको क्या करना है? फॉलो फादर। पक्का या थोड़ा-थोड़ा एडवान्टेज मिलता है तो ले लो भविष्य में देखा जायेगा? कई ऐसे भी सोचते हैं कि सतयुग में चाहे कम पद पायेंगे लेकिन सुखी तो होंगे ही। दु:ख तो होगा ही नहीं। सब प्राप्तियां तो होंगी। चाहे प्रजा की भी प्रजा होगी तो भी अप्राप्ति तो होगी नहीं, तो अभी तो मज़ा ले लें, पीछे देखा जायेगा। लेकिन यह अल्पकाल का मज़ा, सज़ा के भागी बना देगा। तो वह मंजूर है, सजा खायेंगे थोड़ी! वह भी मज़ा ले लो? नहीं!

तो तीनों बातें याद रखो-पवित्रता, सत्यता और दिव्यता। ऐसे साधारण बोल नहीं, साधारण संकल्प नहीं, साधारण कर्म नहीं, दिव्यता। दिव्यता का अर्थ ही है दिव्य गुण द्वारा कर्म करना, संकल्प करना, वही दिव्यता है। जैसे लोग पूछते हैं ना कि पाप कर्म क्या होता है? तो आप कहते हो कि कोई भी विकार के वश कर्म करना यह पाप है। ऐसे समझाते हो ना! तो दिव्यता अर्थात् दिव्य गुण के आधार पर मन-वचन और कर्म करना। तो सत्यता का महत्व जाना!

(ड्रिल)

एक सेकण्ड में अपने को अशरीरी बना सकते हो? क्यों? संकल्प किया मैं अशरीरी आत्मा हूँ, तो कितना टाइम लगा? सेकण्ड लगा ना! तो सेकण्ड में अशरीरी, न्यारे और बाप के प्यारे - ये ड्रिल सारे दिन में बीच-बीच में करते रहो। करने तो आती है ना? तो अभी सब एक सेकण्ड में सब भूलकर एकदम अशरीरी बन जाओ। (बापदादा ने 5 मिनट ड्रिल कराई) अच्छा।

चारों ओर के सर्व पवित्रता के फाउण्डेशन को सदा मजबूत रखने वाले, सदा सत्यता की शक्ति से विश्व में भी सतयुग अर्थात् सत्यता की शक्ति के वायब्रेशन फैलाने वाले सदा हर समय मन-वाणी-कर्म तीनों में दिव्यता धारण करने वाले, सदा फॉलो फादर करने के नेचुरल अभ्यास वाली आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

इस ड्रिल को दिन में जितना बार ज्यादा कर सको उतना करते रहना। चाहे एक मिनट करो। तीन मिनट, दो मिनट का टाइम न भी हो एक मिनट, आधा मिनट यह अभ्यास करने से लास्ट समय अशरीरी बनने में बहुत मदद मिलेगी। बन सकते हैं? अभी सभी अशरीरी हुए या युद्ध में, मेहनत करते-करते टाइम पूरा हो गया? सेकण्ड में बन सकते हो! बहुत काम है फिर भी बन सकते हो? मुश्किल नहीं है? यू.एन. में बहुत भाग दौड़ कर रही हो और अशरीरी बनने की कोशिश करो, होगा? अगर यह अभ्यास समय प्रति समय करेंगे तो ऐसे ही नेचुरल हो जायेगा जैसे शरीर भान में आना, मेहनत करते हो क्या? मैं फलानी हूँ, यह मेहनत करते हो? नेचुरल है। तो यह भी नेचुरल हो जायेगा। जब चाहो अशरीरी बनो, जब चाहो शरीर में आओ। अच्छा काम है आओ इस शरीर का आधार लो लेकिन आधार लेने वाली मैं आत्मा हूँ, वह नहीं भूले। करने वाली नहीं हूँ, कराने वाली हूँ। जैसे दूसरों से काम कराते हो ना। उस समय अपने को अलग समझते हो ना! वैसे शरीर से काम कराते हुए भी कराने वाली मैं अलग हूँ, यह प्रैक्टिस करो तो कभी भी बॉडी कानसेस की बातों में नीचे ऊपर नहीं होंगे। समझा।

डबल विदेशी आगे जाने चाहते हो ना! हैं भी अच्छे, अटेन्शन अच्छा है। सेवा में भी उमंग-उत्साह अच्छा है। और बढ़ता रहेगा।

डबल विदेशियों से पूछ रहे हैं कि सभी ने इस वर्ष जो सेवा की, जो प्रोजेक्ट मिला, उसमें सन्तुष्ट रहे? सभी ने प्रोग्राम किया ना? तो सन्तुष्ट हैं? हाँ या ना? कुछ भी सेवा करो चाहे जिज्ञासू कोर्स वाले आवे या नहीं आवे लेकिन स्वयं, स्वयं से सन्तुष्ट रहो। निश्चय रखो कि अगर मैं सन्तुष्ट हूँ तो आज नहीं तो कल यह मैसेज काम करेगा, करना ही है। इसमें थोड़ा सा उदास नहीं बनो। खर्चा तो किया.... प्रोग्राम भी किया.... लेकिन आया कोई नहीं। स्टूडेन्ट नहीं बढ़े, कोई हर्जा नहीं आपने तो किया ना। आपके हिसाब-किताब में जमा हो गया और उन्हों को भी सन्देश मिल गया। तो टाइम पर सभी को आना ही है, इसलिए करते जाओ। खर्चा बहुत हुआ, उसको नहीं सोचो। अगर स्वयं सन्तुष्ट हो तो खर्चा सफल हुआ। घबराओ नहीं, पता नहीं क्या हुआ! कई बच्चे ऐसे कहते हैं मेरा योग ठीक नहीं था, तभी यह हुआ। किससे योग था? और कोई है क्या जिससे योग था? योग है और सदा रहेगा। बाकी कोई सीजन का फल है, कोई हर समय का फल है। तो अगर आया नहीं तो सीजन का फल है, सीजन आयेगी। दिलशिकस्त नहीं बनो। क्योंकि श्रीमत को तो माना ना। श्रीमत प्रमाण कार्य किया। इसीलिए श्रीमत को मानना यह भी एक सफलता है। बढ़ते जाओ, करते जाओ। और ही पश्चाताप करके आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कहा हमने नहीं माना। यहाँ ही आप देवियां बनेंगी। आपके पांव पर पड़ेंगे, तभी तो भक्ति में भी पांव पड़ेंगे ना। तो वह टाइम भी आना है जो सब आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कितना अच्छा हमारा कल्याण किया।

अभी तो आई.पी. भी अच्छे-अच्छे लाते ही हो। बापदादा के पास तो रिजल्ट आती ही है तो अच्छे-अच्छे वी.आई.पी., आई.पी. भी लाये, वह भी सफलता हुई। आगे बच्चों का प्रोग्राम भी किया ना। बच्चों में कितने बच्चे फॉरेन के थे? (100) एक सौ फॉरेन के थे और अभी फिर महिलाओं का कर रहे हो। वह भी तैयारी कर रहे हो। तो आगे बढ़ रहे हो ना? पहले जब कहते थे आई.पी. लाओ तो कहते थे फॉरेन से बहुत मुश्किल है, बहुत मुश्किल है, यह जयन्ति बोलती थी। अभी क्या बोलती है? सहज। और यह डायमण्ड जुबली है ना तो देखो भारत में भी जो प्रोग्राम हुए हैं वह भी मैजारिटी सभी जगह बहुत सफल हुआ है। क्योंकि यह जो विधि रखी है ना कि सभी डायमण्ड जुबली के कारण दीपक जगाने आवें, तो वह समझते हैं हमको कोई पोजीशन मिला। वैसे कहेंगे आओ सुनने तो नहीं आते। तो डायमण्ड जुबली की विधि के कारण अभी आई.पी. कनेक्शन में अच्छे आये हैं और आते रहेंगे। क्योंकि अज्ञानी हैं ना तो सिर्फ सुनने जाना है, तो देह अभिमान आता है। और कुछ करना है तो समझते हैं कुछ पोजीशन है। तो जिसको जो चाहिए वह दे दिया, आपका काम हो गया, अभी दीपक जगाने में वैसे सोचो तो क्या है? लेकिन वह खुश हो जाते हैं। समझते हैं हमारा रिगार्ड रखा। तो देश विदेश में डायमण्ड जुबली की जो सेवा कर रहे हो वह सफल है और रहेगी। अच्छा।

महिलायें कितनी आ रही हैं? (180) उनके निमित्त कौन-कौन हैं? सेवा अच्छी लगती है ना? थकते तो नहीं?

टीचर्स हाथ उठाओ। टीचर्स थकती हो? जो थोड़ा-थोड़ा कभी थकता हो? वह तो हाथ उठायेंगे नहीं। जो कभी थकता नहीं टीचर्स में वह हाथ उठाओ। पाण्डव हाथ उठा रहे हैं, बहनों ने नहीं उठाया तो पाण्डव पास हो गये। मुबारक। थको नहीं। जिस समय थकावट फील हो ना तो कहाँ भी जाकर डांस शुरू कर दो। चाहे बाथरूम में। क्या है इससे मूड चेंज हो जायेगी। चाहे मन की खुशी में नाचो, अगर वह नहीं कर सकते हो तो स्थूल में गीत बजाओ और नाचो। फॉरेन में डांस तो सबको आता है। डांस करने में तो होशियार हैं। फरिश्ता डांस तो आता है। अच्छा।

(शील दादी और रामी बहन बापदादा के सम्मुख आई तथा गले मिली)

अपने घर मधुबन में पहुंच गई ना। खुश है ना? खुश रहती हो और सदा खुश रहो। बहुत अच्छा हिम्मत से हिसाब-किताब को चुक्तू किया। हिम्मत अच्छी है। डायमण्ड जुबली मनाने आई हो ना। (रामी से) ठीक है?

(मधुबन के प्रफुल्ल भाई ने एक्सीडेंट में शरीर छोड़ा है) बच्चा अच्छा था और सेवा के उमंग-उत्साह में भी रहा लेकिन हिसाब-किताब का टाइम बनता है तो कोई न कोई कारण से बन ही जाता है। बाकी बच्चा स्वयं ठीक था। (बाबा जब बच्चों को मदद करता है तो उस टाइम क्यों नहीं की?) उनका हिसाब उसी ड्राइवर से उसी स्थान से होता है। भावी को नहीं टाल सकते। (डाक्टरों ने बचाने के बहुत प्रयास किये) सभी का प्यार भी था। मृत्यु की डेट  टल नहीं सकती। भगवान भी बदल नहीं सकता।

ज्ञान सरोवर में स्पार्क मीटिंग (रिसर्च) के लिए आये हुए भाई बहिनों से

सभी रिसर्च करने के लिए इकट्ठे हुए हैं। अच्छा है जितना अन्तर्मुखता के कमरे में बैठ रिसर्च करेंगे उतना अच्छे से अच्छी टचिंग होंगी। और इसी टचिंग से अनेक आत्माओं को लाभ मिलेगा। तो अच्छा है। करते रहो लेकिन प्रयोग और योग दोनों का बैलेन्स रखते आगे बढ़ते चलो। बाकी अच्छा है। जितना मनन करो उतना ही मक्खन निकलता है। तो कोई न कोई अच्छा माखन निकालेंगे जो सबमें शक्ति भरे। अच्छा।



10-03-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


करनहारऔर करावनहारकी स्मृति से कर्मातीत स्थिति का अनुभव

आज कल्याणकारी बाप अपने साथी कल्याणकारी बच्चों को देख रहे हैं। सभी बच्चे बहुत ही लगन से, प्यार से विश्व कल्याण का कार्य करने में लगे हुए हैं। ऐसे साथियों को देख बापदादा सदा वाह साथी बच्चे वाह! यह गीत गाते रहते हैं। आप सभी भी वाह-वाह के गीत गाते रहते हो ना? आज बापदादा ने चारों ओर के सेवा की गति देखी। साथ में स्व-पुरूषार्थ की भी गति को देखा। तो सेवा और स्व-पुरूषार्थ दोनों के गति में क्या देखा होगा? आप जानते हो? सेवा की गति तीव्र है वा स्व-पुरूषार्थ की गति तीव्र है? क्या है? दोनों का बैलेन्स है? नहीं है? तो विश्व परिवर्तन की आत्माओं को वा प्रकृति को ब्लैसिंग कब मिलेगी? क्योंकि बैलेन्स से जो आप सभी को ब्लैसिंग मिली हैं वह औरों को मिलेंगी। तो अन्तर क्यों? कहलाते क्या हो - कर्मयोगी वा सिर्फ योगी? कर्मयोगी हो ना! पक्का है ना? तो सेवा भी कर्म है ना! कर्म में आते हो, बोलते हो वा दृष्टि देते हो, कोर्स कराते हो, म्यूजियम समझाते हो-यह सब श्रेष्ठ कर्म अर्थात् सेवा है। तो कर्मयोगी अर्थात् कर्म के समय भी योग का बैलेन्स। लेकिन आप खुद ही कह रहे हो कि बैलेन्स कम हो जाता है। इसका कारण क्या? अच्छी तरह से जानते भी हो, नई बात नहीं है। बहुत पुरानी बात है। बापदादा ने देखा कि सेवा वा कर्म और स्व-पुरूषार्थ अर्थात् योगयुक्त। तो दोनों का बैलेन्स रखने के लिए विशेष एक ही शब्द याद रखो-वह कौनसा? बाप करावनहारहै और मैं आत्मा, ( मैं फलानी नहीं) आत्मा करनहारहूँ। तो करन-करावनहार’, यह एक शब्द आपका बैलेन्स बहुत सहज बनायेगा। स्व-पुरूषार्थ का बैलेन्स या गति कभी भी कम होती है, उसका कारण क्या? ‘करनहारके बजाए मैं ही करने वाली या वाला हूँ, ‘करनहारके बजाए अपने को करावनहारसमझ लेते हो। मैं कर रहा हूँ, जो भी जिस प्रकार की भी माया आती है, उसका गेट कौन सा है? माया का सबसे अच्छा सहज गेट जानते तो हो ही - मैं। तो यह गेट अभी पूरा बन्द नहीं किया है। ऐसा बन्द करते हो जो माया सहज ही खोल लेती है और आ जाती है। अगर करनहारहूँ तो कराने वाला अवश्य याद आयेगा। कर रही हूँ, कर रहा हूँ, लेकिन कराने वाला बाप है। बिना करावनहारके करनहारबन नहीं सकते हैं। डबल रूप से करावनहारकी स्मृति चाहिए। एक तो बाप करावनहारहै और दूसरा मैं आत्मा भी इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ। इससे क्या होगा कि कर्म करते भी कर्म के अच्छे या बुरे प्रभाव में नहीं आयेंगे। इसको कहते हैं-कर्मातीत अवस्था।

आप सबका लक्ष्य क्या है? कर्मातीत बनना है ना! या थोड़ा-थोड़ा कर्मबन्धन रहा तो कोई हर्जा नहीं? रहना चाहिए या नहीं रहना चाहिए? कर्मातीत बनना है? बाप से प्यार की निशानी है-कर्मातीत बनना। तो करावनहारहोकर कर्म करो, कराओ, कर्मेन्द्रियां आपसे नहीं करावें लेकिन आप कर्मेन्द्रियों से कराओ। बिल्कुल अपने को न्यारा समझ कर्म कराना-यह कानसेसनेस इमर्ज रूप में हो। मर्ज रूप में नहीं। मर्ज रूप में कभी करावनहारके बजाए कर्मेन्द्रियों के अर्थात् मन के, बुद्धि के, संस्कार के वश हो जाते हैं। कारण? ‘करावनहारआत्मा हूँ, मालिक हूँ, विशेष आत्मा, मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ, यह स्मृति मालिकपन की स्मृति दिलाती है। नहीं तो कभी मन आपको चलाता और कभी आप मन को चलाते। इसीलिए सदा नेचरल मनमनाभव की स्थिति नहीं रहती। मैं अलग हूँ बिल्कुल, और सिर्फ अलग नहीं लेकिन मालिक हूँ, बाप को याद करने से मैं बालक हूँ और मैं आत्मा कराने वाली हूँ तो मालिक हूँ। अभी यह अभ्यास अटेन्शन में कम है। सेवा में बहुत अच्छा लगे हुए हो लेकिन लक्ष्य क्या है? सेवाधारी बनने का वा कर्मातीत बनने का? कि दोनों साथ-साथ बनेंगे? ये अभ्यास पक्का है? अभी-अभी थोड़े समय के लिए यह अभ्यास कर सकते हो? अलग हो सकते हो? या ऐसे अटैच हो गये हो जो डिटैच होने में टाइम चाहिए? कितने टाइम में अलग हो सकते हो? 5मिनट चाहिए, एक मिनट चाहिए वा एक सेकण्ड चाहिए? एक सेकण्ड में हो सकते हो?

पाण्डव एक सेकण्ड में एकदम अलग हो सकते हो? आत्मा अलग मालिक और कर्मेन्द्रियां कर्मचारी अलग, यह अभ्यास जब चाहो तब होना चाहिए। अच्छा, अभी-अभी एक सेकण्ड में न्यारे और बाप के प्यारे बन जाओ। पावरफुल अभ्यास करो बस मैं हूँ ही न्यारी। यह कर्मेन्द्रियां हमारी साथी हैं, कर्म की साथी हैं लेकिन मैं न्यारा और प्यारा हूँ। अभी एक सेकण्ड में अभ्यास दोहराओ। (ड्रिल) सहज लगता है कि मुश्किल है? सहज है तो सारे दिन में कर्म के समय यह स्मृति इमर्ज करो, तो कर्मातीत स्थिति का अनुभव सहज करेंगे। क्योंकि सेवा वा कर्म को छोड़ सकते हो? छोड़ेंगे क्या? करना ही है। तपस्या में बैठना यह भी तो कर्म है। तो बिना कर्म के वा बिना सेवा के तो रह नहीं सकते हो और रहना भी नहीं है। क्योंकि समय कम है और सेवा अभी भी बहुत है। सेवा की रूपरेखा बदली है। लेकिन अभी भी कई आत्माओं का उल्हना रहा हुआ है। इसलिए सेवा और स्व-पुरूषार्थ दोनों का बैलेन्स रखो। ऐसे नहीं कि सेवा में बहुत बिजी थे ना इसलिए स्व-पुरूषार्थ कम हो गया। नहीं। और ही सेवा में स्व-पुरूषार्थ का अटेन्शन ज्यादा चाहिए। क्योंकि माया को आने की मार्जिन सेवा में बहुत प्रकार से होती है। नाम सेवा लेकिन होता है स्वार्थ। अपने को आगे बढ़ाना है लेकिन बढ़ाते हुए बैलेन्स को नहीं भूलना है क्योंकि सेवा में ही स्वभाव, संबंध का विस्तार होता है और माया चांस भी लेती है। थोड़ा सा बैलेन्स कम हुआ और माया नया-नया रूप धारण कर लेती है, पुराने रूप में नहीं आयेगी। नये-नये रूप में, नई-नई परिस्थिति के रूप में, सम्पर्क के रूप में आती है। तो अलग में सेवा को छोड़कर अगर बापदादा बिठा दे, एक मास बिठाये, 15 दिन बिठाये तो कर्मातीत हो जायेंगे? एक मास दें बस कुछ नहीं करो, बैठे रहो, तपस्या करो, खाना भी एक बार बनाओ बस। फिर कर्मातीत बन जायेंगे? नहीं बनेंगे?

अगर बैलेन्स का अभ्यास नहीं है तो कितना भी एक मास क्या, दो मास भी बैठ जाओ लेकिन मन नहीं बैठेगा, तन बैठ जायेगा। और बिठाना है मन को न कि सिर्फ तन को। तन के साथ मन को भी बिठाना है, बैठ जाए बस बाप और मैं, दूसरा न कोई। तो एक मास ऐसी तपस्या कर सकते हो या सेवा याद आयेगी? बापदादा वा ड्रामा दिखाता रहता है कि दिन-प्रतिदिन सेवा बढ़नी ही है, तो बैठ कैसे जायेंगे? जो एक साल पहले आपकी सेवा थी और इस साल जो सेवा की वह बढ़ी है या कम हुई है? बढ़ गई है ना! न चाहते भी सेवा के बन्धन में बंधे हुए हो लेकिन बैलेन्स से सेवा का बन्धन, बन्धन नहीं संबंध होगा। जैसे लौकिक संबंध में समझते हो कि एक है कर्म बन्धन और एक है सेवा का संबंध। तो बन्धन का अनुभव नहीं होगा, सेवा का स्वीट संबंध है। तो क्या अटेन्शन देंगे? सेवा और स्व-पुरूषार्थ का बैलेन्स। सेवा के अति में नहीं जाओ। बस मेरे को ही करनी है, मैं ही कर सकती हूँ, नहीं। कराने वाला करा रहा है, मैं निमित्त करनहारहूँ। तो जिम्मेवारी होते भी थकावट कम होगी। कई बच्चे कहते हैं - बहुत सेवा की है ना तो थक गये हैं, माथा भारी हो गया है। तो माथा भारी नहीं होगा। और ही करावनहारबाप बहुत अच्छा मसाज़ करेगा। और माथा और ही फ़्रेश हो जायेगा। थकावट नहीं होगी, एनर्जी एकस्ट्रा आयेगी। जब साइन्स की दवाइयों से शरीर में एनर्जी आ सकती है, तो क्या बाप की याद से आत्मा में एनर्जी नहीं आ सकती? और आत्मा में एनर्जी आई तो शरीर में प्रभाव आटोमेटिकली पड़ता है। अनुभवी भी हो, कभी-कभी तो अनुभव होता है। फिर चलते-चलते लाइन बदली हो जाती है और पता नहीं पड़ता है। जब कोई उदासी, थकावट या माथा भारी होता है ना फिर होश आता है, क्या हुआ? क्यों हुआ? लेकिन सिर्फ एक शब्द करनहारऔर करावनहारयाद करो, मुश्किल है या सहज है? बोलो हाँ जी। अच्छा।

अभी 9 लाख प्रजा बनाई है? विदेश में कितने बने हैं? 9 लाख बने हैं? और भारत में बने हैं? नहीं बने हैं। तो आप ही समाप्ति के कांटे को आगे नहीं बढ़ने देते। बैलेन्स रखो, डायमण्ड जुबली है ना तो खूब सेवा करो लेकिन बैलेन्स रखकर सेवा करो तो प्रजा जल्दी बनेंगी। टाइम नहीं लगेगा। प्रकृति भी बहुत थक गई है, आत्मायें भी निराश हो गई हैं। और जब निराश होते हैं तो किसको याद करते हैं? भगवान, बाप को याद करते हैं, लेकिन उसका पूरा परिचय न होने के कारण आप देवी-देवताओं को ज्यादा याद करते हैं। तो निराश आत्माओं की पुकार आपको सुनने में नहीं आती? आती है कि अपने में ही मस्त हो? मर्सीफुल हो ना! बाप को भी क्या कहते हैं? मर्सीफुल। और सब धर्म वाले मर्सा जरूर मांगते हैं, सुख नहीं मांगेगे लेकिन मर्सी सबको चाहिए। तो कौन देने वाला है? आप देने वाले हो ना? या लेने वाले हो? लेकर देने वाले। दाता के बच्चे हो ना! तो अपने भाई बहिनों के ऊपर रहमदिल बनो, और रहमदिल बन सेवा करेंगे तो उसमें निमित्त भाव स्वत: ही होगा। किसी पर भी चाहे कितना भी बुरा हो लेकिन अगर आपको उस आत्मा के प्रति रहम है, तो आपको उसके प्रति कभी भी घृणा या ईर्ष्या या क्रोध की भावना नहीं आयेगी। रहम की भावना सहज निमित्त भाव इमर्ज कर देती है। मतलब का रहम नहीं, सच्चा रहम। मतलब का रहम भी होता है, किसी आत्मा के प्रति अन्दर लगाव होता है और समझते हैं रहम पड़ रहा है। तो वह हुआ मतलब का रहम। सच्चा रहम नहीं, सच्चे रहम में कोई लगाव नहीं, कोई देह भान नहीं, आत्मा- आत्मा पर रहम कर रही है। देह अभिमान वा देह के किसी भी आकर्षण का नाम-निशान नहीं। कोई का लगाव बॉडी से होता है और कोई का लगाव गुणों से, विशेषता से भी होता है। लेकिन विशेषता वा गुण देने वाला कौन? आत्मा तो फिर भी कितनी भी बड़ी हो लेकिन बाप से लेवता (लेने वाली) है। अपना नहीं है, बाप ने दिया है। तो क्यों नहीं डायरेक्ट दाता से लो। इसीलिए कहा कि स्वार्थ का रहम नहीं। कई बच्चे ऐसे नाज़-नखरे दिखाते हैं, होगा स्वार्थ और कहेंगे मुझे रहम पड़ता है। और कुछ भी नहीं है सिर्फ रहम है। लेकिन चेक करो-नि:स्वार्थ रहम है? लगावमुक्त रहम है? कोई अल्पकाल की प्राप्ति के कारण तो रहम नहीं है? फिर कहेंगे बहुत अच्छी है ना, बहुत अच्छा है ना, इसीलिए थोड़ा.... थोड़े की छुट्टी नहीं है। अगर कर्मातीत बनना है तो यह सभी रूकावटें हैं जो बॉडी कानेसस में ले आती हैं। अच्छा है, लेकिन बनाने वाला कौन? अच्छाई भले धारण करो लेकिन अच्छाई में प्रभावित नहीं हो। न्यारे और बाप के प्यारे। जो बाप के प्यारे हैं वह सदा सेफ हैं। समझा!

अगर सेवा को बढ़ाते हो और बढ़ाना ही है तो स्थापना को भी नज़दीक लाना है या नहीं? कौन लायेगा? बाप लायेगा? सभी लायेंगे। साथी हैं ना! अकेला बाप भी कुछ नहीं कर सकता, सिवाए आप साथी बच्चों के। देखो, बाप को अगर समझाना भी है तो भी शरीर का साथ लेना पड़ता है। बिना शरीर के साथ के बोल सकता है? चाहे पुरानी गाड़ी हो चाहे अच्छी हो, लेकिन आधार तो लेना पड़ता है। बिना आधार के कर नहीं सकता। ब्रह्मा बाप का साथ लिया ना, तभी तो आप ब्राह्मण बनें। ब्रह्माकुमार कहते हो, शिवकुमार नहीं कहते हो। क्योंकि निराकार बाप को भी साकार का आधार लेना ही है। जैसे साकार ब्रह्मा का आधार लिया, अभी भी ब्रह्मा के अव्यक्त फरिश्ते के रूप में आधार लेने के बिना आपकी पालना नहीं कर सकते हैं। चाहे साकार में लिया, चाहे आकार रूप में लिया लेकिन आत्मा का आधार, साथ लेना ही पड़ता है। वैसे तो आलमाइटी अथॉरिटी है, जब जादूगर विनाशी खेल सेकण्ड में दिखा सकते हैं तो क्या आलमाइटी अथॉरिटी जो चाहे वह नहीं कर सकता है? कर सकता है? अभी-अभी विनाश को ला सकता है? अकेला ला सकता है? अकेला नहीं कर सकता। चाहे आलमाइटी अथॉरिटी भी है लेकिन आप साथियों के संबंध में बंधा हुआ है। तो बाप का आपसे कितना प्यार है। चाहे कर सकता है, लेकिन नहीं कर सकता। जादू की लकड़ी नहीं घुमा सकता है क्या? लेकिन बाप कहते हैं कि राज्य अधिकारी कौन बनेगा? बाप बनेगा क्या? आप बनेंगे। स्थापना तो कर ले, विनाश भी कर ले लेकिन राज्य कौन करेगा? बिना आपके काम चलेगा? इसलिए बाप को आप सभी को कर्मातीत बनाना ही है। बनना ही है ना कि बाप जबरदस्ती बनाये? बाप को बनाना है और आप सबको बनना ही है। यह है स्वीट ड्रामा। ड्रामा अच्छा लगता है ना? कि कभी कभी तंग हो जाते हो, ये क्या बना? यह बदलना चाहिए-सोचते हो? बाप भी कहते हैं - बना बनाया ड्रामा है, यह बदल नहीं सकता। रिपीट होना है लेकिन बदल नहीं सकता। ड्रामा में इस आपके अन्तिम जन्म को पावर्स हैं। है ड्रामा, लेकिन ड्रामा में इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म में बहुत ही पावर्स मिली हुई हैं। बाप ने विल किया है इसीलिए विल पावर है। तो कौन सा शब्द याद रखेंगे? ‘करन-करावनहार। पक्का या प्लेन में जाते-जाते भूल जायेंगे? भूलना नहीं।

अभी फिर से अपने को शरीर के बन्धन से न्यारा कर्मातीत स्टेज, कर्म करा रहे हैं लेकिन न्यारा, देख रहे हैं, बात कर रहे हैं लेकिन न्यारा, मालिक और बाप द्वारा निमित्त आत्मा हूँ, इस स्मृति में फिर से मन और बुद्धि को स्थित करो। (ड्रिल) अच्छा।

चारों ओर के सदा सेवा के उंमग उत्साह में रहने वाले सेवाधारी आत्मायें, सदा स्व-पुरूषार्थ और सेवा दोनों का बैलेन्स रखने वाली ब्लिसफुल आत्मायें, सदा नि:स्वार्थ रहमदिल बन सर्व आत्माओं प्रति सच्चा रहम करने वाली विशेष आत्मायें, सदा सेकण्ड में अपने को कर्म बन्धन वा अनेक रॉयल बन्धनों से मुक्त करने वाले तीव्र पुरूषार्था आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

आज विशेष मुख्य मधुबन निवासी और मधुबन की भुजायें, कितनी भुजायें हैं? 5 चाहे ज्ञान सरोवर है, चाहे हॉस्पिटल वाले हैं, चाहे म्यूजियम वाले हैं, तलहटी वाले हैं, संगम वासी हैं, पीस-पार्क वाले हैं और प्रवृत्ति में रह निवृत्ति का पार्ट बजाने वाले हैं, जो भी सभी हैं, तो लगातार सभी ने बहुत समय से बहुत अच्छी सेवा की है, सबको खुशी दी है और दुआयें ली हैं, तो बापदादा ऐसे सर्व सेवाधारियों को मुबारक भी देते हैं। आप डबल विदेशियों की सेवा वा आने वाले मेहमानों की सेवा अच्छी की है ना?

मधुबन वाले यहाँ कितने बैठे हैं, वह उठो, हॉस्पिटल वाले उठो, बहुत अच्छा। म्यूजियम वाले? तलहटी, शान्तिवन वाले? संगम वाले? ज्ञान सरोवर के सेवाधारी? पीस-पार्क के सेवाधारी?

देखो, आप लोगों के वहाँ तो कभी-कभी बड़े प्रोग्राम होते हैं लेकिन मधुबन में सदा ही बड़े प्रोग्राम हैं। छोटे प्रोग्राम नहीं चलते, बड़े ही चलते हैं तो मधुबन अर्थात् 5 ही इकट्ठे हैं, बिना हॉस्पिटल के भी काम नहीं चलता। और बिना ज्ञान सरोवर के सेवाधारियों से भी काम नहीं चलता और पीस-पार्क तो जैसा नाम है वैसे अनेक आत्माओं को शान्ति का अनुभव कराने वाला है, तो पीस-पार्क के सेवाधारी, पाण्डव भवन के सेवाधारी सब बहुत आवश्यक हैं। और अभी तो सभी के मन में क्या है? अभी क्या बनाना है? शान्तिवन में मेला होना है, नाम शान्तिवन है लेकिन होना मेला है, झमेला नहीं, मेला। दुनिया के मेले झमेले होते हैं, यहाँ मेला मिलन का होता है। तो सभी को शान्तिवन तैयार करने के लिए बहुत उमंग है? कि मुश्किल है? अभी डायमण्ड जुबली मनानी है? फिर शुरू करें? (हाँ जी) डबल काम करना पड़ेगा। एक डायमण्ड जुबली और दूसरा शान्तिवन की तैयारी। तो बूंद-बूंद से तालाब बन जायेगा। देखो खेल क्या है? एक बिन्दू और दूसरा बूंद। बाप के यादगार जो मन्दिर हैं उसमें भी क्या दिखाते हैं? बूंद भी दिखाते हैं और बिन्दू भी दिखाते हैं। तो आप सबकी शुभ भावना और सहयोग की बूंद यह मेला भवन तैयार कर देगी। तो सभी सहयोगी हैं ना? कि डायमण्ड जुबली के बाद करें? 6 मास रूक जायें? शुरू कर दें? (हाँ जी) भारत वाले भी सुन रहे हैं, ऐसे नहीं सिर्फ आप डबल विदेशी लेकिन सभी के बूंद से महल तैयार हो जायेंगे और आप मेला मनायेंगे।

डबल फारेनर्स ने भी इस वर्ष सेवा में अच्छा हाइजम्प दिया है। कितने प्रोग्राम किये हैं? एक के पीछे एक प्रोग्राम करते रहे हैं। और सभी सफल हैं और सदा रहेंगे। तो जिन्होंने पहला प्रोग्राम रिट्रीट का किया वह उठो, जो सहयोगी हैं, रेसपान्सिबुल वह उठो। सिर्फ 3 शक्तियां रही हुई हैं बाकी चली गई हैं, तो जो चले गये हैं उन्हों को पद्मगुणा मुबारक देना। अच्छा-दूसरा प्रोग्राम महिलाओं का, उसमें सहयोगी बनने वाले उठो। इसमें पाण्डव बैकबोन रहे हैं और शक्तियां आगे रही हैं। बाकी एक प्रोग्राम होना है। (फैमिली रिट्रीट का कार्यक्रम होने वाला है) अच्छा। बच्चों के प्रोग्राम का जिम्मेवार कौन रहा? (चले गये) उन्हों को डबल पदम मुबारक। अभी जो होने वाला है उसके निमित्त कौन है? इसमें पाण्डव हैं, तो इनएडवांस मुबारक। यह हुए सेवा के निमित्त। लेकिन अगर देखने वाले, बैठने वाले नहीं होते तो हाल खाली होता, इसलिए आप देखने वाले, बैठने वाले उन्हों को भी मुबारक। तो डबल विदेशियों ने इस बारी डबल संख्या भी बना ली है। बहुत बढ़ गये हैं ना। (ज्ञान सरोवर छोटा हो गया है) कितना भी बड़ा बनायेंगे, छोटा तो होना ही है।

सबसे बड़ा ग्रुप विदेश से किसका है? रशिया। छोटा सुभानअल्ला। बहुत अच्छा, सरकमस्टांश को पार करने के विधि को जान गये हैं। चाहे कितनी भी परिस्थितियां हैं लेकिन पार करना सहज हो गया है। इसीलिए रशिया वालों को होशियार बनने की मुबारक हो। अच्छा। पहले उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले, वह आप सभी हो। आप नहीं होते तो कोई प्रोग्राम सफल नहीं होते। किसके आगे भाषण करते, दीवारों में करते। तो सबसे पहले आपको मुबारक। अभी तरीका आ गया है। अच्छा – साउथ अफ्रीका और मॉरीशियस ने दोनों ने मेहनत अच्छी की है। साउथ अफ्रीका ने भी थोड़े समय में मेहनत अच्छी की है। हिम्मत वाले हैं। और मॉरीशियस है छोटा लेकिन काम मोटा किया है। अच्छा किया है। ऐसे ही और आगे बढ़ते जाना और बड़े ते बड़े माइक लाते रहना।

जो पहली बार आये हैं वह हाथ उठाओ। (टोली के टाइम लाइन में आना) और पुराने कहेंगे हमको तो मिला ही नहीं। लेकिन बड़ों का काम क्या होता है? छोटों को आगे रखना, इसमें ही बड़ा-पन है इसलिए छोटों को देख खूब खुश हो, अपना नहीं सोचो, छोटों को आगे बढ़ाना, छोटों को एक्स्ट्रा मिलना, यह आपको मिल गया। अच्छा।

दादी, दादी जानकी जी से

सभी का सहयोग यह सहज ही आपको और सेवा को बढ़ा रहा है। और आप देख-देख हर्षा रही हो। आपका काम है देख-देख हर्षित होना। अभी यही काम रह गया है। उमंग-उत्साह बढ़ाना और हर्षित होना, मनोरंजन लगता है ना! मेहनत लगती है या मनोरंजन लगता है? सेवा भी एक खेल है। तो खेल में चाहे कोई गिरता है, कोई जीतता है लेकिन खेल में सदा खुशी होती है। तो यह सेवा भी क्या है? संगमयुग का खेल है। ऐसे है? और खेल देख-देख कर खुश होते रहते हैं। और औरों की भी खुशी बढ़ाते रहते हो। बस अभी आप लोगों का काम यही है। खुशी बढ़ाना, उमंग-उत्साह बढ़ाना और स्व-पुरूषार्थ बढ़ाना। आपको अभी यही खेल करना है। और औरों को खेल में अच्छे खिलाड़ी बनाना है। अच्छा

दादी निर्मलशान्ता से

यह भी आ गई, ठीक है। मज़ा आता है ना? सेवा में भी मज़ा, घर में भी मज़ा, मज़ा ही मज़ा। अगर विश्व में देखो तो सबसे मजे की जीवन किसकी है? चाहे कितना भी दुनिया वाले सोचें कि हम मजे में हैं लेकिन सदा का मज़ा, सच्चा मज़ा सिवाए आपके और किसके पास भी नहीं है इसलिए सदा बढ़ रहे हो और बढ़ाते रहते हो। रोज़ खुराक खुशी की खाते रहना।

ज्ञान सरोवर के म्यूजियम प्रति सन्देश

यह ज्ञान सरोवर का म्यूजियम  बहुत सेवा के निमित्त बनेगा। देश विदेश की आत्मायें इससे बाप का परिचय प्राप्त करेंगी और अनेक आत्मायें अपना खोया हुआ जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त कर खुशी में नाचेंगी। अनेक आत्माओं को स्व का और बाप का परिचय मिलने से वह अनुभव करेंगी कि हम क्या थे और क्या बन गये। विचित्र परिवर्तन का अनुभव करेंगे। और शक्तिशाली बन औरों को भी यह ईश्वरीय सन्देश देने के निमित्त बनेंगे।

साउथ अफ्रीका के मिनिस्टर भ्राता नायडू से

आप अपने को विश्व सेवा के निमित्त आत्मा हूँ, ऐसे समझते हो? तो बहुत बड़ा काम करना है। यह जो सीट मिली हुई है वह विशेष बड़ी सेवा के निमित्त बनाने के लिए मिली है। मिनिस्ट्री की हलचल नहीं देखो, सेवा देखो। अभी आपको जो सेवा करनी है वह रही हुई है। इसलिए कुछ समय के लिए मिनिस्टर या लौकिक पोजीशन जो भी है उसको लौकिक रीति से नहीं देखो, अभी अलौकिक सेवा प्रति आपकी सीट है। तो सीट पर मिनिस्टर रूप में नहीं लेकिन विश्व सेवाधारी के रूप में रहो। अभी स्मृति में अन्तर हो गया। फर्क हो गया। अभी मिनिस्टर हूँ नहीं, विश्व सेवाधारी हूँ। यह सीट विश्व सेवा के लिए है। समझा। चाहे सीट मिनिस्टर हो या आपोजीशन की हो लेकिन सीट विश्व सेवाधारी की है, उस लक्ष्य से सीट पर बैठो। और जो लौकिक कार्य है उसमें भी इस वृत्ति से, इस स्मृति से बहुत मदद मिलेगी। क्योंकि बुद्धि, मन अभी एक बाप में एकाग्र हो गया। तो अभी आपकी बुद्धि जो निर्णय करेगी वह बहुत यथार्थ करेगी। जिस समय जिसको जो करना चाहिए वह टच होगा। मन, बुद्धि को एक बाप में एकाग्र करने का मेडीटेशन तो सीख गये हो ना। और भी मेडीटेशन का थोड़ा अभ्यास करेंगे तो बहुत मदद मिलेगी। जिस काम से, वायुमण्डल से, देख करके कभी थकते थे, अभी थकेंगे नहीं। अभी यह बुद्धि में आयेगा कि इन सबका कल्याण कैसे हो! क्योंकि मैं विश्व सेवाधारी, विश्व कल्याण की सीट पर हूँ। मिनिस्टर की सीट पर नहीं विश्व कल्याण की सीट पर। इस वृत्ति से, इस दृष्टि से कुछ समय सेवा करके देखो। बहुत अच्छे अनुभव करेंगे और आपका शक्तिशाली वातावरण औरों को भी साथी बनायेगा। समझा। यह बहुत आपका भाग्य है जो इस समय भाग्य प्राप्त करने के स्थान पर पहुंच गये हो। यह भाग्य बनने का स्थान है। समझा। तो लक्की हैं और इस लक्क को बढ़ाते रहेंगे तो सफलता पाते रहेंगे।

टीचर्स से

आप लोग डबल साथी हो बड़े जो निमित्त हैं उन्हों के भी साथी और बाप के भी। तो डबल साथी बन रहने का पार्ट बजाया तो साथी होकर रहना ये बड़े मजे की जीवन है। खाओ-पियो, सेवा करो और नाचो। जिम्मेवारी होते भी जिम्मेवारी से फ्री। वैसे मेहनत तो सेकेण्ड ग्रुप ही करता है। तो बापदादा खुश होते हैं - हिम्मत से आगे बढ़ रहे हो और बढ़ा रहे हो। तो एक-एक की विशेषता बहुत अच्छी है, नाम बड़ों का काम आपका। अगर आपको आगे नहीं रखें तो काम ही नहीं चले। अच्छा।



22-03-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘ब्राह्मण जीवन की पर्सनालिटी - सब प्रश्नों से पार सदा प्रसन्नचित्त रहना’’

आज सर्व प्राप्ति दाता, बापदादा अपने सर्व प्राप्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। बापदादा द्वारा प्राप्तियाँ तो बहुत हुई हैं, जिसका अगर वर्णन करो तो बहुत हैं लेकिन लम्बी लिस्ट बताने के बजाए यही वर्णन करते हो कि अप्राप्त नहीं कोई वस्तु इस ब्राह्मण जीवन में।तो बापदादा देख रहे हैं कि प्राप्तियाँ तो बहुत हैं, लम्बी लिस्ट है ना! तो जिसको सर्व प्राप्तियाँ हैं उसकी निशानी प्रत्यक्ष जीवन में क्या दिखाई देगी-वह जानते हो ना? सर्व प्राप्तियों की निशानी है - सदा उसके चेहरे और चलन में प्रसन्नता की पर्सनालिटी दिखाई देगी। पर्सनालिटी ही किसी को भी आकर्षित करती है। तो सर्व प्राप्तियों की निशानी - प्रसन्नता की पर्सनालिटी है, जिसको सन्तुष्टता भी कहते हैं। लेकिन आजकल चेहरे पर जो सदा प्रसन्नता की झलक देखने में अवे, वह नहीं दिखाई देती। कभी प्रसन्नचित्त और कभी प्रश्नचित्त। दो प्रकार के हैं, एक हैं - जरासी परिस्थिति आई तो प्रश्नचित्त - क्यों, क्या, कैसे, कब ... यह प्रश्नचित्त। और प्राप्ति स्वरूप सदा प्रसन्नचित्त होंगे। उसको कभी भी किसी भी बात में क्वेश्चन (प्रश्न) नहीं होगा। क्योंकि सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न है। तो यह क्यों, क्या जो है वह हलचल है, जो सम्पन्न होता है उसमें हलचल नहीं होती है। जो खाली होता है, उसमें हलचल होती है। तो अपने आपसे पूछो कि मैं सदा प्रसन्नचित्त रहती वा रहता हूँ? कभी-कभी नहीं सदा? 10 वर्ष वाले तो सदा होंगे या नहीं? हाँ नहीं करते, सोच रहे हैं? प्रसन्नता अगर कम होती है तो उसका कारण प्राप्ति कम और प्राप्ति कम का कारण, कोई न कोई इच्छा है। इच्छा का फाउण्डेशन ईर्ष्या और अप्राप्ति है। बहुत सूक्ष्म इच्छायें अप्राप्ति के तरफ खींच लेती हैं, फिर रॉयल रूप में यही कहते हैं-कि मेरी इच्छा नहीं है, लेकिन हो जाए तो अच्छा है। लेकिन जहाँ अल्पकाल की इच्छा है, वहाँ अच्छा हो नहीं सकता। तो चेक करो-चाहे ज्ञान के जीवन में, ज्ञान के रॉयल रूप की इच्छायें, चाहे मोटे रूप की इच्छायें, अभी देखा जाता है कि मोटे रूप की इच्छायें समाप्त हुई हैं लेकिन रॉयल इच्छायें ज्ञान के बाद सूक्ष्म रूप में रही हुई हैं, वह चेक करो। क्योंकि बापदादा अभी सभी बच्चों को बाप समान सम्पन्न, सम्पूर्ण बनाने चाहते हैं। जिससे प्यार होता है, उसके समान बनना कोई मुश्किल बात नहीं होती है।

तो बापदादा से सबका बहुत प्यार है या प्यार है? (बहुत प्यार है) पक्का? तो प्यार के पीछे त्याग करना या परिवर्तन करना क्या बड़ी बात है? (नहीं)। तो पूरा त्याग किया है? जो बाप कहता है, जो बाप चाहता है वह किया है? सदा किया है? कभी-कभी से काम नहीं चलेगा। सदा का राज्य भाग्य प्राप्त करना है या कभी-कभी का? सदा का चाहिए ना? तो सदा प्रसन्नता, और कोई भी भाव चेहरे पर वा चलन में दिखाई नहीं दे। कभी-कभी कहते हैं ना आज बहन जी या भाई जी का मूड और है। आप भी कहते हो आज मेरा मूड और है। तो इसको क्या कहेंगे? सदा प्रसन्नता हुई? कई बच्चे प्रशंसा के आधार पर प्रसन्नता अनुभव करते हैं लेकिन वह प्रसन्नता अल्पकाल की है। आज है कुछ समय के बाद समाप्त हो जायेगी। तो यह भी चेक करो कि मेरी प्रसन्नता प्रशंसा के आधार पर तो नहीं है? जैसे आजकल मकान बनाते हैं ना तो सीमेंट के साथ रेत की मात्रा ज्यादा डाल देते हैं, मिक्स करते हैं। तो यह भी ऐसा ही है जो फाउण्डेशन मिक्स है। यथार्थ नहीं है। तो जरासा परिस्थिति का तूफान आता है वा किसी भी प्रकार की हलचल होती है तो प्रसन्नता को समाप्त कर देती है। तो ऐसा फाउण्डेशन तो नहीं है? बापदादा ने पहले भी सुनाया है, अब फिर से अण्डरलाइन कर रहे हैं कि रॉयल रूप की इच्छा का स्वरूप नाम, मान और शान है। आधार सर्विस का लेते हैं, सर्विस में नाम हो। लेकिन जो नाम के पीछे सेवा करते हैं, उनका नाम अल्पकाल के लिए तो हो जाता है कि बहुत अच्छा सर्विसएबुल है, बहुत अच्छा आकर्षण करने वाले हैं लेकिन नाम के आधार पर सेवा करने वाले का ऊंच पद में नाम पीछे हो जाता है। क्योंकि कच्चा फल खा लिया, पका ही नहीं। तो पक्का फल कहाँ खायेंगे, कच्चा खा लिया। अभी-अभी सेवा की, अभी-अभी नाम पाया तो यह कच्चा फल है, या इच्छा रखी कि सेवा तो मैंने बहुत की, सबसे ज्यादा सेवा के निमित्त मैं हूँ, ये नाम के आधार पर सेवा हुई -इसे कहेंगे कच्चा फल खाने वाले। तो कच्चे फल में ताकत होती है क्या? वा सेवा की, तो सेवा के रिजल्ट में मेरे को मान मिलना चाहिए। यह मान नहीं है लेकिन अभिमान है। जहाँ अभिमान है वहाँ प्रसन्नता रह नहीं सकती। सबसे बड़ा शान बापदादा के दिल में शान प्राप्त करो। आत्माओं के दिल में अगर शान मिल भी गया तो आत्मा स्वयं ही लेने वाली है, मास्टर दाता है, दाता नहीं। तो शान चाहिए तो सदा बापदादा के दिल में अपना शान प्राप्त करो। ये सब रॉयल इच्छायें प्राप्ति स्वरूप बनने नहीं देती हैं, इसलिए प्रसन्नता की पर्सनालिटी सदा चेहरे और चलन में दिखाई नहीं देती है। किसी भी परिस्थिति में प्रसन्नता की मूड परिवर्तन होती है तो सदाकाल की प्रसन्नता नहीं कहेंगे। ब्राह्मण जीवन की मूड सदा चियरफुल और केयरफुल। मूड बदलना नहीं चाहिए। फिर रॉयल रूप में कहते हैं आज मुझे बड़ी एकान्त चाहिए। क्यों चाहिए? क्योंकि सेवा वा परिवार से किनारा करना चाहते हैं, और कहते हैं शान्ति चाहिए, एकान्त चाहिए। आज मूड मेरा ऐसा है। तो मूड नहीं बदली करो। कारण कुछ भी हो, लेकिन आप कारण को निवारण करने वाले हो, कि कारण में आने वाले हो? निवारण करने वाले। ठेका क्या लिया है? कॉन्ट्रैक्टर हो ना? तो क्या कॉन्ट्रैक्ट लिया है? कि प्रकृति की मूड भी चेंज करेंगे। प्रकृति को भी चेंज करना है ना? तो प्रकृति को परिवर्तन करने वाले अपने मूड को नहीं परिवर्तन कर सकते? मूड चेंज होती है कि नहीं? कभी-कभी होती है? फिर कहेंगे सागर के किनारे पर जाकर बैठते हैं, ज्ञान सागर नहीं, स्थूल सागर। फॉरेनर्स ऐसे करते हैं ना? या कहेंगे आज पता नहीं अकेला, अकेला लगता है। तो बाप का कम्बाइण्ड रूप कहाँ गया? अलग कर दिया? कम्बाइण्ड से अकेले हो गये, क्या इसी को प्यार कहा जाता है? तो किसी भी प्रकार का मूड, एक होता है - मूड ऑफ, वह है बड़ी बात, लेकिन मूड परिवर्तन होना यह भी ठीक नहीं। मूड ऑफ वाले तो बहुत भिन्न-भिन्न प्रकार के खेल दिखाते हैं, बापदादा देखते हैं, बड़ों को बहुत खेल दिखाते हैं या अपने साथियों को बहुत खेल दिखाते हैं। ऐसा खेल नहीं करो। क्योंकि बापदादा का सभी बच्चों से प्यार है। बापदादा यह नहीं चाहता कि जो विशेष निमित्त हैं, वह बाप समान बन जाएं और बाकी बने या नहीं बनें, नहीं। सबको समान बनाना ही है, यही बापदादा का प्यार है। तो प्यार का रेसपान्ड देने आता है कि नाज़-नखरे से रिटर्न करते हो? कभी नाज़-नखरे दिखाते और कभी समान बनके दिखाते हैं। अभी वह समय समाप्त हुआ।

अभी डायमण्ड जुबली मना रहे हो ना? तो 60 साल के बाद वैसे भी वानप्रस्थ शुरू होता है। तो अभी छोटे बच्चे नहीं हो, अभी वानप्रस्थ अर्थात् सब कुछ जानने वाले, अनुभवी आत्मायें हो, नॉलेजफुल हो, पावरफुल हो, सक्सेसफुल हो। जैसे सदा नॉलेजफुल हो ऐसे पावरफुल और सक्सेसफुल भी हो ना? कभीकभी सक्सेसफुल क्यों नहीं होते, उसका कारण क्या है? वैसे सफलता आप सबका जन्म सिद्ध अधिकार है। कहते हो ना? सिर्फ कहते हो या मानते भी हो? तो क्यों नहीं सफलता होती है, कारण क्या है? जब अपना जन्म सिद्ध अधिकार है, तो अधिकार प्राप्त होने में, अनुभव होने में कमी क्यों? कारण क्या? बापदादा ने देखा है - मैजॉरिटी अपने कमजोर संकल्प पहले ही इमर्ज करते हैं, पता नहीं होगा या नहीं! तो यह अपना ही कमजोर संकल्प प्रसन्नचित्त नहीं लेकिन प्रश्नचित्त बनाता है। होगा, नहीं होगा? क्या होगा? पता नहीं.... यह संकल्प दीवार बन जाती है और सफलता उस दीवार के अन्दर छिप जाती है। निश्चयबुद्धि विजयी - यह आपका स्लोगन है ना! जब यह स्लोगन अभी का है, भविष्य का नहीं है, वर्तमान का है तो सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिए या प्रश्नचित्त? तो माया अपने ही कमजोर संकल्प की जाल बिछा लेती है और अपने ही जाल में फँस जाते हो। विजयी हैं ही - इससे इस कमजोर जाल को समाप्त करो। फँसो नहीं, लेकिन समाप्त करो। समाप्त करने की शक्ति है? धीरे-धीरे नहीं करो, फट से सेकण्ड में इस जाल को बढ़ने नहीं दो। अगर एक बार भी इस जाल में फँस गये ना तो निकलना बहुत मुश्किल है। विजय मेरा बर्थराइट है, सफलता मेरा बर्थराइट है। यह बर्थराइट, परमात्म बर्थराइट है, इसको कोई छीन नहीं सकता-ऐसा निश्चयबुद्धि, सदा प्रसन्नचित्त सहज और स्वत: रहेगा। मेहनत करने की भी ज़रुरत नहीं।

असफलता का दूसरा कारण क्या है? आप लोग दूसरों को भी कहते हो कि समय, संकल्प, सम्पत्ति सब सफल करो। तो सफल करना अर्थात् सफलता पाना। सफल करना ही सफलता का आधार है। अगर सफलता नहीं मिलती तो जरूर कोई न कोई खजाने को सफल नहीं किया है, तब सफलता नहीं मिली। खजानों की लिस्ट तो जानते हो ना तो चेक करो-कौन सा खजाना सफल नहीं किया, व्यर्थ गँवाया? तो स्वत: ही सफलता प्राप्त हो जायेगी। यह वर्सा भी है तो वरदान भी है - सफल करो और सफलता पाओ। तो सफल करना आता है कि नहीं? तो सफलता मिलती है? सफल करना है बीज और सफलता है फल। अगर बीज अच्छा है तो फल नहीं मिले यह हो नहीं सकता। सफल करने के बीज में कुछ कमी है तब सफलता का फल नहीं मिलता। तो क्या करना है? सदा प्रसन्नता की पर्सनालिटी में रहो। प्रसन्नचित्त रहने से बहुत अच्छे अनुभव करेंगे। वैसे भी कोई को प्रसन्नचित्त देखते हो तो कितना अच्छा लगता है! उसके संग में रहना, उसके साथ बात करना, बैठना कितना अच्छा लगता है! और कोई प्रश्नचित्त वाला आ जाए तो तंग हो जायेंगे। तो यह लक्ष्य रखो - क्या बनना है? प्रश्नचित्त नहीं, प्रसन्नचित्त।

आज सीज़न का लास्ट दिन है, तो लास्ट में क्या किया जाता है? कोई यज्ञ भी रचते हैं तो लास्ट में क्या करते हैं? स्वाहा करते हैं। तो आप क्या करेंगे? प्रश्नचित्त को स्वाहा करो। यह क्यों होता है? यह क्या होता है? ..... नहीं। नॉलेजफुल हो ना तो क्यों, क्या नहीं। तो आज से यह व्यर्थ प्रश्न स्वाहा। आपका भी टाइम बचेगा और दूसरों का भी टाइम बचेगा। दादियों का भी टाइम इसमें जाता है, यह क्यों, यह क्या, यह कैसे! तो यह समय बचाओ, अपना भी और दूसरों का भी। बचत का खाता जमा करो। फिर 21 जन्म आराम से खाओ, पियो, मौज करो, वहाँ जमा नहीं करना पड़ेगा। तो स्वाहा किया कि सोचेंगे? सोचना है, भले सोच लो। अपने से पूछ लो यह कैसे होगा, यह कर सकेंगे या नहीं? यह एक मिनट में सोच लो, पक्का काम कर लो। अपने से जितने भी प्रश्न पूछने हों वह एक मिनट में पूछ लो। पूछ लिया? स्वाहा भी कर लिया या सिर्फ प्रश्न पूछ लिया? आगे के लिए प्रश्न खत्म। (एक मिनट साइलेन्स के बाद) खत्म किया? (हाँ जी) ऐसे ही नहीं हाँ कर लेना। जब बहुतकाल का अनुभव है कि प्रश्नचित्त अर्थात् परेशान होना और परेशान करना। अच्छी तरह से अनुभव है ना? तो अपने निश्चय और जन्म सिद्ध अधिकार की शान में रहो तो परेशान नहीं होंगे। जब इस शान से परे होते हो, तभी परेशान होते हो। समझा! अच्छी तरह से समझा कि अभी कहेंगे - हाँ समझा और फॉरेन में जायेंगे तो कहेंगे मुश्किल है? ऐसे तो नहीं? अच्छा।

(आज बापदादा के सामने 10 वर्ष से ज्ञान में चलने वाले बैठे हैं) यह सभी 10 वर्ष वाले बैठे हैं, सेरीमनी मनाई? बापदादा 10 वर्ष वाले महावीर और महावीरनियाँ बच्चों को देख हर्षित होते हैं। और मुबारक देते हैं, वरदान देते हैं ‘‘सदा निर्विघ्न भव।’’ जैसे 10 वर्ष हिम्मत रख बाप के साथ और हाथ के आधार पर 10 वर्ष मजबूत रहे हो, ऐसे सदा ही हिम्मत को साथी बनाकर रखना। हिम्मत को नहीं छोड़ना। जहाँ हिम्मत है - वहाँ बाप है ही है। तो बापदादा को खुशी है कि डबल विदेशी भिन्न-भिन्न प्रकार के आकर्षण के स्थान पर रहते हुए भिन्न धर्म और भिन्न प्रकार की कल्चर होते हुए भी ब्राह्मण कल्चर में चलते रहे हैं, यह बहुत हिम्मत का सैम्पल दिखाया है। आपके सैम्पल को देख अनेक आत्मायें लाभ उठायेंगी। इसलिए हिम्मत की भी मुबारक और हिम्मत द्वारा सेवा की भी मुबारक। बापदादा को भी खुशी है आप सबको देख करके। अच्छा।

कहाँ-कहाँ के 10 साल वाले हैं, हाथ उठाओ। (बापदादा सभी से अलग-अलग हाथ उठवाकर मिल रहे हैं) अच्छा, आस्ट्रेलिया वालों की खुशखबरी सुनी। हिम्मत रखी है, सेवा के प्लैन भी अच्छे बनाये हैं और साथ-साथ रिट्रीट हाउस भी ले रहे हैं। आस्ट्रेलिया की भुजायें कितनी हैं? (13) जो आस्ट्रेलिया के सम्बन्ध में एशिया है वह हाथ उठाओ। 13 भुजायें हैं, तो भुजायें क्या करती हैं? सहयोग देती हैं। तो यह 13 भुजायें क्या करेंगी? सिर्फ देखकर, सुनकर खुश होंगी? नहीं। आस्ट्रेलिया निवासियों की सेवा का रिटर्न सभी भुजाओं को यथा शक्ति देना है। पालना लेते हो ना! तो पालना का रिटर्न देना - यह एक फर्ज है। समझा। भुजाओं ने समझा? अच्छे हैं। एशिया का ग्रुप तो बहुत अच्छा है। एशिया नजदीक भी है ना! इण्डिया भी एशिया में आता है। एशिया में हेडक्वार्टर है। तो एशिया वालों को एक्स्ट्रा नशा होना चाहिए कि एशिया में बापदादा आता है। लण्डन, अमेरिका में नहीं आता। बापदादा को एशिया प्यारा है। देखो यूरोप की महिमा अपनी है और एशिया की महिमा अपनी है। यूरोप सभी डबल विदेशियों का फाउण्डेशन स्थान है। सेवा का आरम्भ यूरोप में हुआ है। चाहे यू.के. कहो, चाहे यूरोप कहो, लेकिन बापदादा का आना एशिया में हुआ। अच्छा।

अच्छा 10 वर्ष वाले हाथ उठाओ। वैसे तो बहुत होंगे लेकिन इस ग्रुप को चांस मिला है। यह भी लक है। अच्छा है, पाण्डव भी काफी हैं। तो 10 वर्ष वालों को बापदादा और सर्व परिवार की तरफ से पद्मगुणा मुबारक हो। अच्छा।

अभी अगली सीज़न क्या होगी-यह प्रश्न है? यह काम का प्रश्न है इसलिए भले पूछो, फालतू प्रश्न नहीं। तो बापदादा का ड्रामा-प्लैन अनुसार यह प्लैन है कि यह वर्ष डायमण्ड जुबली का है और डायमण्ड जुबली की सेवा का उमंग- उत्साह चारों ओर देश-विदेश में अच्छा है और अच्छा रहेगा। अच्छा होना ही है। इसलिए यह वर्ष जितना जी भर करके सेवा करने चाहो उतनी करो, इस वर्ष में चाहे भारत, चाहे विदेश में कई बच्चों का उमंग-उत्साह है कि यथाशक्ति बड़े-बड़े प्रोग्राम करें। और जब बड़े प्रोग्राम करते हैं तो बड़ों को बुलाते हैं। तो बापदादा का प्लैन है कि इस वर्ष जो ऐसे योग्य प्रोग्राम होंगे, ऐसे नहीं मकान की ओपानिंग है तो दादी आवे, ऐसे नहीं लेकिन डायमण्ड जुबली के कनेक्शन में जो भी, जहाँ भी, प्रोग्राम योग्य होगा, वहाँ दादियाँ जा सकती हैं। लेकिन....लेकिन है। दादियों की तबियत से सबको प्यार है ना कि सिर्फ सेवा से है? सेवा से प्यार है या इनकी तबियत से भी प्यार है? दोनों से है ना। इसलिए स्वयं भी सोच समझकर निमन्त्रण दो, ऐसे नहीं कि आना ही है, नहीं तो हम नाराज हो जायेंगे। रोना शुरू कर देते हैं, ऐसा नहीं करो। देखो एक तरफ यज्ञ के, घर के सभी मालिक हो। ऐसे नहीं हम तो छोटे हैं, हमको क्या मालुम, हम तो अपने घर में थे। नहीं। विश्व के जिम्मेवार हो। कल ताज पहना था ना? ( कल 10 साल वालों को सेरीमनी में ताज पहनाया गया था) तो जिम्मेवारी का ताज था या गत्ते का था? सभी ने जिम्मेवारी का ताज पहना ना! तो जब भी कोई प्रोग्राम बनाते हो तो यज्ञ को भी देखो, क्योंकि आज मधुबन आपको आकर्षण क्यों करता है? आपके सेन्टर्स भी तो ज्ञान योग वाले हैं, लेकिन मधुबन क्यों आकर्षित करता है? क्योंकि ब्रह्मा बाप की तपस्या, उसकी स्थिति का स्थान है। तो जो निमित्त बड़ी दादियां हैं, उन्हों को यज्ञ का वातावरण, यज्ञ की कारोबार - उसको भी देखना है और आप भी सब जिम्मेवार हैं। नहीं तो मधुबन में जो भी आते हैं और वातावरण से खुश होकर जाते हैं, उसका कारण क्या है? बड़ों की स्थिति का स्थान पर प्रभाव पड़ता है। तो यह भी देखो, क्योंकि यज्ञ (मधुबन) का वातावरण चारों ओर फैलता है। आप सबको शक्ति मधुबन के स्थान से ही मिलती है। तो मधुबन की कारोबार, सेवायें, वातावरण, साथ-साथ दादियों की तबियत उसको भी देखो, फिर प्रोग्राम बनाओ। जब आप कहते हो आओ, और फिर किसी का भी प्रोग्राम कैन्सिल होता है तो थोड़ा बहुत स्थितियों में भी फर्क पड़ता है इसलिए पहले से ही सोच-समझकर नॉलेजफुल होकर, जिम्मेवार होकर फिर प्रोग्राम बनाओ। समझा। इसके लिए बापदादा यह पूरी सीज़न सेवा के लिए छुट्टी दे रहे हैं और बापदादा की सीज़न और बाहर की सेवा का बुलावा-यह दोनों में खींचातान हो जाती है इसलिए इस सीज़न में बापदादा, अगर दिसम्बर में नीचे का तैयार हो जाता है और उसका उद्घाटन होना ही है, तो दिसम्बर में फॉरेन और इण्डिया दोनों के संगठन का प्रोग्राम शान्तिवन का आरम्भ करेंगे। फॉरेन वाले ऊपर रहें, इण्डिया वाले नीचे रहें, डबल चांस मिलेगा। आप डबल विदेशी नीचे रहेंगे? पट में सोना पड़ेगा? अपने अटैचियों को तकिया बनाना, जगह चाहिए ना। तो बापदादा इस सीज़न में अर्थात् दूसरी सीज़न जो शुरू होगी उसमें दिसम्बर में आयेंगे और दिसम्बर के बाद फिर 18 जनवरी इण्डिया वालों के लिए और तीसरा फॉरेन वालों के लिए शिवरात्रि पर आयेंगे। और चौथा अगर प्रबन्ध ठीक रहा तो शिव रात्रि के बाद अप्रैल के आदि में एक फिर से मेला रखेंगे। जिसमें फॉरेन वाले भी हों और इण्डियन भी हों। तो दूसरी सीज़न का प्लैन यह है। जिसको जितनी सेवा करनी है वह दिल से करो। और योग्य अटेन्शन रखके दादियाँ भी भले चक्कर लगायें लेकिन पहले तबियत फिर सेवा। खींचातान नहीं करो। अभी टाइम काफी है इसलिए उस अनुसार एक तो चक्कर लगाओ और दूसरा ब्राह्मणों के रिफ़्रेशमेंट की, जो बापदादा ने कहा कि कर्मातीत बनने का, अशरीरी बनने का अभ्यास करो-तो इसके लिए ग्रुप वाइज़ ब्राह्मणों का संगठन यहाँ रख सकते हो। हर मास का अलग-अलग प्रोग्राम बनाओ, जो सेवा भी हो और ब्राह्मणों की रिफ़्रेशमेंट भी हो। बाकी एक ही वर्ष में खींचातान से फॉरेन में जाना ही है, ऐसी खींचातान नहीं करो। आराम से बनाओ, अभी आगे का समय भी बहुत है इसलिए इस वर्ष में वा इस सीज़न में एक चक्कर फॉरेन का फिर दूसरे समय में दूसरा चक्कर बनाओ तो आराम से, स्नेह से, सेवा और दादियों के तबियत का बैलेन्स रखो। समझा! तो दूसरी सीज़न का यही प्लैन है, फिर आगे देखेंगे। क्योंकि वर्तमान समय चाहे देश में, चाहे विदेश में हलचल भी होनी ही है। तो जितना सेवा का चांस ले सकते हो उतना ले लो। समझा! (ड्रिल)

एक सेकण्ड में अशरीरी बनना-यह पाठ पक्का है? अभी-अभी विस्तार, अभी-अभी सार में समा जाओ। (बापदादा ने फिर से ड्रिल कराई) अच्छा-इस अभ्यास को सदा साथ रखना।

चारों ओर के सर्व प्रश्नचित्त से परिवर्तन होने वाले, सदा प्रसन्नचित्त के पर्सनालिटी वाले श्रेष्ठ आत्मायें, सदा अपने विजय और जन्म सिद्ध अधिकार के स्मृति में रहने वाले, स्मृति स्वरूप विशेष आत्मायें, सदा सफल करने से सहज सफलता का अनुभव करने वाले, बाप के समीप आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते। जो डबल विदेश के चारों ओर के 10 वर्ष वाले बच्चे हैं उन्हों को विशेष मुबारक और याद-प्यार।

दादियों से

बापदादा को आप परिवार के सिरताज निमित्त आत्माओं के लिए’’ सदा जीते रहो, उड़ते रहो और उड़ाते रहो’’-यह संकल्प सदा रहता है। अपने योग की तपस्या के शक्ति से शरीरों को चला तो रहे हो लेकिन आपसे ज्यादा बापदादा को ओना रहता है। इसलिए समय प्रमाण फास्ट चक्कर नहीं लगाओ। आराम से जाओ और आओ क्योंकि दुनिया की परिस्थितियाँ भी फास्ट बदल रही हैं। इसलिए सेवा की बापदादा मना नहीं करते हैं, लेकिन बैलेन्स। सभी के प्राण आपके शरीरों में हैं, तन ठीक है तो सेवा भी अच्छी होती जायेगी। इसलिए सेवा खूब करो लेकिन ज्यादा धक्का नहीं लगाओ, थोड़ा धक्का लगाओ। ज्यादा धक्का लगाने से क्या होता है? बैटरी स्लो हो जाती है। इसलिए बैलेन्स अभी से रखना आवश्यक है। ऐसे नहीं सोचो यह वर्ष तो कर लें, दूसरा वर्ष पता नहीं क्या है? नहीं। जीना है और उड़ाना है। अभी तो आपका पार्ट है ना? तो अपने पार्ट को समझकर धक्का लगाओ लेकिन बैलेन्स में धक्का लगाओ। ठीक है। फास्ट नहीं बनाओ, दो दिन यहाँ है तो तीसरे दिन वहाँ हैं, नहीं। अभी वह टाइम नहीं है, जब ऐसा टाइम आयेगा तो एक दिन में चार-चार स्थान पर भी जाना पड़ेगा लेकिन अभी नहीं।

(सभा से) आप सबका क्या विचार है? ठीक है ना? (निर्मला बहन से) अच्छा है चारों ओर एशिया को अच्छा सम्भाला है। पार्ट भी सेवा का अच्छा बजाया है। चाहे यूरोप ने, चाहे आस्ट्रेलिया ने, चाहे अफ्रीका ने..सभी ने बहुत अच्छा ज़िम्मेवारी से पार्ट बजाया है और जितना अटेन्शन दिया उसका प्रत्यक्षफल सफलता भी मिली। ऐसे नहीं कि आस्ट्रेलिया की ड्यूटी थी, उन्हों ने किया। नहीं, सभी तरफ के डबल विदेशियों ने अच्छी-अच्छी आत्मायें मधुबन तक लाई और सफलता पाई। बैकबोन में सभी साथी रहे और सदा रहना ही है। (इस बार जर्मनी बहुत आया है) अच्छा है जैसे आस्ट्रेलिया वालों ने प्रत्यक्ष परिवर्तन का स्वरूप दिखाया, ऐसे जर्मनी वालों को ऐसा प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाना है जो हर एक सेन्टर सबसे अच्छा और संख्या में भी सबसे नम्बरवन हो। अभी जर्मन की कमाल देखेंगे। सारे ब्राह्मण परिवार की नज़र जर्मनी पर है। क्योंकि भविष्य में जर्मन बहुत सहयोगी बनने वाली है। अभी भी मददगार है, मुबारक हो। अभी ऐसी कमाल करके दिखाना जो किसी ने नहीं किया हो, लण्डन ने भी नहीं किया हो। (लण्डन वालों ने त्याग किया है, सुदेश बहन को वहाँ सेवा पर भेजा है) यह त्याग नहीं है, भाग्य है। लण्डन वालों ने अपना भाग्य बनाया है कि त्याग किया है? जो पढ़ाया है उसका फल भी तो देना है। तो फल है - दूसरों को सहयोग देना। यह लण्डन के ही तो कमरे हैं। लण्डन है हाल और बाकी सब हैं कमरे। कोई बड़े कोई छोटे। खुश हैं ना? अच्छा।

टीचर्स हाथ उठाओ, बहुत हैं। (आज पीछे बैठी हैं) दूर होते भी समीप हो। शरीर से दूर हो लेकिन दिल से बहुत समीप हो। टीचर्स अच्छी मेहनत कर रही हैं। चारों ओर की टीचर्स मेहनत और हिम्मत का प्रत्यक्ष रूप दिखा रही हैं। अच्छा।

जयन्ती बहन (लण्डन), मोहिनी बहन (अमेरिका)

(बाबा को थैंक्स) बच्चों की हिम्मत और बाप की मदद। पहला कदम - बच्चों की हिम्मत और पद्मगुणा बाप की मदद। अच्छी रेसपान्सिबिलिटी उठाई है और आगे भी बढ़ता रहेगा। अच्छा चल रहा है, प्लैन अच्छा बनाया है। अच्छा।



03-04-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


सेवाओं के साथ-साथ बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा पुराने वा व्यर्थ संस्कारों से मुक्त बनो’’

आज बेहद का बाप अपने बेहद के सदा सहयोगी साथियों को देख रहे हैं। चारों ओर के सदा सहयोगी बच्चे, सदा बाप के दिल पर दिलतख्तनशीन, निराकार बाप को अपना अकाल तख्त भी नहीं है लेकिन तुम बच्चों को कितने तख्त हैं? तो बापदादा तख्तनशीन बच्चों को देख सदा हर्षित रहते हैं-वाह मेरे तख्तनशीन बच्चे! बच्चे बाप को देख खुश होते हैं, आप सभी बापदादा को देख खुश होते हो लेकिन बापदादा कितने बच्चों को देख खुश होते हैं क्योंकि हर एक बच्चा विशेष आत्मा है। चाहे लास्ट नम्बर भी है लेकिन फिर भी लास्ट होते भी विशेष कोटो में कोई, कोई में कोई की लिस्ट में है। इसलिए एक-एक बच्चे को देख बाप को ज्यादा खुशी है वा आपको है? (दोनों को) बाप को कितने बच्चे हैं! जितने बच्चे उतनी खुशी और आपको सिर्फ डबल खुशी है, बस। आपको परिवार की भी खुशी है लेकिन बाप की खुशी सदाकाल की है और आपकी खुशी सदाकाल है या कभी नीचे ऊपर होती है?

बापदादा समझते हैं कि ब्राह्मण जीवन का श्वास खुशी है। खुशी नहीं तो ब्राह्मण जीवन नहीं और अविनाशी खुशी, कभी-कभी वाली नहीं, परसेन्टेज़ वाली नहीं। खुशी तो खुशी है। आज 50 परसेन्ट खुशी है, कल 100 परसेन्ट है, तो जीवन का श्वास नीचे ऊपर है ना! बापदादा ने पहले भी कहा है कि शरीर चला जाए लेकिन खुशी नहीं जाए। तो यह पाठ सदा पक्का है या थोड़ा- थोड़ा कच्चा है? सदा अण्डरलाइन है? कभी-कभी वाले क्या होंगे? सदा खुशी में रहने वाले पास विद् ऑनर और कभी-कभी खुशी में रहने वालों को धर्मराजपुरी पास करनी पड़ेगी। पास विद् ऑनर वाले एक सेकण्ड में बाप के साथ जायेंगे, रूकेंगे नहीं। तो आप सब कौन हो? साथ चलने वाले या रूकने वाले? (साथ चलने वाले) ऐसा चार्ट है? क्योंकि विशेष डायमण्ड जुबली के वर्ष में बापदादा की हर एक बच्चे के प्रति क्या शुभ आशा है, वह तो जानते हो ना?

बापदादा ने सभी बच्चों का चार्ट देखा। उसमें क्या देखा कि वर्तमान समय के प्रमाण एक बात का विशेष और अटेन्शन चाहिए। जैसे सेवा में बहुत उमंग- उत्साह से आगे बढ़ रहे हो और डायमण्ड जुबली में विशेष सेवा का उमंग- उत्साह है, इसमें पास हो। हर एक यथा शक्ति सेवा कर रहे हैं और करते रहेंगे। लेकिन अब विशेष क्या चाहिए? समय समीप है तो समय की समीपता के अनुसार अब कौन सी लहर होनी चाहिए? (वैराग्य की) कौन सा वैराग्य - हद का या बेहद का? जितना सेवा का उमंग-उत्साह है, उतना समय की आवश्यकता प्रमाण स्व-स्थिति में बेहद का वैराग्य कहाँ तक है? क्योंकि आपके सेवा की सफलता है जल्दी से जल्दी प्रजा तैयार हो जाए। इसलिए सेवा करते हो ना? तो जब तक आप निमित्त आत्माओं में बेहद की वैराग्य वृत्ति नहीं है, तो अन्य आत्माओं में भी वैराग्य वृत्ति नहीं आ सकती और जब तक वैराग्य वृत्ति नहीं होगी तो जो चाहते हो कि बाप का परिचय सबको मिले, वह नहीं मिल सकता। बेहद का वैराग्य सदाकाल का वैराग्य है। अगर समय प्रमाण वा सरकमस्टांश प्रमाण वैराग्य आता है तो समय नम्बरवन हो गया और आप नम्बर दो हो गये। परिस्थिति या समय ने वैराग्य दिलाया। परिस्थिति खत्म, समय पास हो गया तो वैराग्य पास हो गया। तो उसको क्या कहेंगे - बेहद का वैराग्य या हद का? तो अभी बेहद का वैराग्य चाहिए। अगर वैराग्य खण्डित हो जाता है तो उसका मुख्य कारण है - देह-भान। जब तक देह-भान का वैराग्य नहीं है तब तक कोई भी बात का वैराग्य सदाकाल नहीं होता है, अल्पकाल का होता है। सम्बन्ध से वैराग्य - यह बड़ी बात नहीं है, वह तो दुनिया में भी कईयों को दिल से वैराग्य आ जाता है लेकिन यहाँ देह-भान के जो भिन्न-भिन्न रूप हैं, उन भिन्नभिन्न रूपों को तो जानते हो ना? कितने देह-भान के रूप हैं, उसका विस्तार तो जानते हो लेकिन इस अनेक देह-भान के रूपों को जानकर, बेहद के वैराग्य में रहना। देह-भान, देही-अभिमान में बदल जाए। जैसे देह-भान एक नेचुरल हो गया, ऐसे देही-अभिमान नेचुरल हो जाए क्योंकि हर बात में पहला शब्द देह ही आता है। चाहे सम्बन्ध है तो भी देह का ही सम्बन्ध है, पदार्थ हैं तो देह के पदार्थ हैं। तो मूल आधार देह-भान है। जब तक किसी भी रूप में देह-भान है तो वैराग्य वृत्ति नहीं हो सकती। और बापदादा ने देखा कि वर्तमान समय जो देह-भान का विघ्न है उसका कारण है कि देह के जो पुराने संस्कार हैं, उससे वैराग्य नहीं है। पहले देह के पुराने संस्कारों से वैराग्य चाहिए। संस्कार स्थिति से नीचे ले आते हैं। संस्कार के कारण सेवा में वा सम्बन्ध-सम्पर्क में विघ्न पड़ते हैं। तो रिजल्ट में देखा कि देह के पुराने संस्कार से जब तक वैराग्य नहीं आया है, तब तक बेहद का वैराग्य सदा नहीं रहता। संस्कार भिन्न-भिन्न रूप से अपने तरफ आकर्षित कर लेते हैं। तो जहाँ किसी भी तरफ आकर्षण है, वहाँ वैराग्य नहीं हो सकता। तो चेक करो कि मैं अपने पुराने वा व्यर्थ संस्कार से मुक्त हूँ? कितनी भी कोशिश करेंगे, करते भी हैं कि वैराग्य वृत्ति में रहें लेकिन संस्कार कोई-कोई के पास या मैजारिटी के पास किस न किस रूप में ऐसे प्रबल हैं जो अपनी तरफ खींचते हैं। तो पहले पुराने संस्कार से वैराग्य। संस्कार न चाहते भी इमर्ज हो जाते हैं क्यों? चाहते नहीं हो लेकिन सूक्ष्म में संस्कारों को भस्म नहीं किया है। कहाँ न कहाँ अंश मात्र रहे हुए हैं, छिपे हुए हैं वह समय पर न चाहते हुए भी इमर्ज हो जाते हैं। फिर कहते हैं - चाहते तो नहीं थे लेकिन क्या करें, हो गया, हो जाता है ...... यह कौन बोलता है - देह-भान या देही-अभिमान? तो बापदादा ने देखा कि संस्कारों से वैराग्य वृत्ति में कमजोरी है। खत्म किया है लेकिन अंश भी नहीं हो, ऐसा खत्म नहीं किया है और जहाँ अंश है तो वंश तो होगा ही। आज अंश है, समय प्रमाण वंश का रूप ले लेता है। परवश कर देता है। कहने में तो सभी क्या कहते हैं कि जैसे बाप नॉलेजफुल है वैसे हम भी नॉलेजफुल हैं, लेकिन जब संस्कार का वार होता है तो नॉलेजफुल हैं या नॉलेज पुल हैं? क्या हैं? नॉलेजफुल के बजाए नॉलेज पुल बन जाते हो। उस समय किसी से भी पूछो तो कहेंगे - हाँ, समझती तो मैं भी हूँ, समझता तो मैं भी हूँ, होना नहीं चाहिए, करना नहीं चाहिए लेकिन हो जाता है। तो नॉलेजफुल हुए या नॉलेज पुल हुए? (नॉलेजपुल अर्थात् नॉलेज को खींचने वाले) जो नॉलेजफुल है उसे कोई भी संस्कार, सम्बन्ध, पदार्थ वार नहीं कर सकता।

तो डायमण्ड जुबली मना रहे हो, डायमण्ड जुबली का अर्थ है - डायमण्ड बनना अर्थात् बेहद के वैरागी बनना। जितना सेवा का उमंग है उतना वैराग्यवृत्ति का अटेन्शन नहीं है। इसमें अलबेलापन है। चलता है.... होता है.....हो जायेगा.....समय आयेगा तो ठीक हो जायेगा..... तो समय आपका शिक्षक है या बाबा शिक्षक है? कौन है? अगर समय पर परिवर्तन करेंगे तो आपका शिक्षक तो समय हो गया! आपकी रचना आपका शिक्षक हो - ये ठीक है? तो जब ऐसी परिस्थिति आती है तो क्या कहते हो? समय पर ठीक कर लूँगी, हो जायेगा। बाप को भी दिलासा देते हैं - फिकर नहीं करो, हो जायेगा। समय पर बिल्कुल आगे बढ़ जायेंगे। तो समय को शिक्षक बनाना - यह आप मास्टर रचयिता के लिए शोभता है? अच्छा लगता है? नहीं। समय रचना है, आप मास्टर रचयिता हो। तो रचना मास्टर रचयिता का शिक्षक बनें यह मास्टर रचयिता की शोभा नहीं। तो अभी जो बापदादा ने समय दिया है, उसमें वैराग्य वृत्ति को इमर्ज करो क्योंकि सेवा की खींचातान में वैराग्यवृत्ति खत्म हो जाती है। वैसे सेवा में खुशी भी मिलती है, शक्ति भी मिलती है और प्रत्यक्षफल भी मिलता है लेकिन बेहद का वैराग्य खत्म भी सेवा में ही होता है। इसलिए अब अपने अन्दर इस वैराग्य वृत्ति को जगाओ। कल्प पहले भी बने तो आप ही थे कि और थे? आप ही हैं ना। सिर्फ मर्ज है, उसको इमर्ज करो। जैसे सेवा के प्लैन को प्रैक्टिकल में इमर्ज करते हो, तब सफलता मिलती है ना। ऐसे अभी बेहद के वैराग्य वृत्ति को इमर्ज करो। चाहे कितने भी साधन प्राप्त हैं और साधन तो आपको दिन प्रतिदिन ज्यादा ही मिलने हैं लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की साधना मर्ज नहीं हो, इमर्ज हो। साधन और साधना का बैलेन्स, क्योंकि आगे चलकर के प्रकृति आपकी दासी होगी। सत्कार मिलेगा, स्वमान मिलेगा। लेकिन सब कुछ होते वैराग्य वृत्ति कम नहीं हो। तो बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल स्वयं में अनुभव करते हो कि सेवा में बिजी हो गये हो? जैसे दुनिया वालों को सेवा का प्रभाव दिखाई देता है ना! ऐसे बेहद के वैराग्य वृत्ति का प्रभाव दिखाई दे। आदि में आप सभी की स्थिति क्या थी? पाकिस्तान में जब थे, सेवा नहीं थी, साधन थे लेकिन बेहद के वैराग्यवृत्ति के वायुमण्डल ने सेवा को बढ़ाया।

तो जो भी डायमण्ड जुबली वाले हैं उन्हों में आदि संस्कार हैं, अब मर्ज हो गये हैं। अब फिर से इस वृत्ति को इमर्ज करो। आदि रत्नों के बेहद के वैराग्य वृत्ति ने स्थापना की, अभी नई दुनिया की स्थापना के लिए फिर से वही वृत्ति, वही वायुमण्डल इमर्ज करो। तो सुना क्या ज़रुरत है? साधन ही नहीं है और कहो, हमको तो वैराग्य है, तो कौन मानेगा? साधन हो और वैराग्य हो। पहले के साधन और अभी के साधनों में कितना अन्तर है? साधना छिप गई है और साधन प्रत्यक्ष हो गये हैं। अच्छा है साधन बड़े दिल से यूज़ करो क्योंकि साधन आपके लिए ही हैं, लेकिन साधना को मर्ज नहीं करो। बैलेन्स पूरा होना चाहिए। जैसे दुनिया वालों को कहते हो कि कमल पुष्प समान बनो तो साधन होते हुए कमल पुष्प समान बनो। साधन बुरे नहीं हैं, साधन तो आपके कर्म का, योग का फल हैं। लेकिन वृत्ति की बात है। ऐसे तो नहीं कि साधन के प्रवृत्ति में, साधनों के वश फंस तो नहीं जाते? कमल पुष्प समान न्यारे और बाप के प्यारे। यूज़ करते हुए उन्हों के प्रभाव में नहीं आये, न्यारे। साधन, बेहद की वैराग्य वृत्ति को मर्ज नहीं करे। अभी विश्व अति में जा रही है तो अभी आवश्यकता है - सच्चे वैराग्य-वृत्ति की और वह वायुमण्डल बनाने वाले आप हो, पहले स्वयं में, फिर विश्व में। तो डायमण्ड जुबली वाले क्या करेंगे? लहर फैलायेंगे ना? आप लोग तो अनुभवी हैं। शुरू का अनुभव है ना! सब कुछ था, देशी घी खाओ जितना खा सकते, फिर भी बेहद की वैराग्य वृत्ति। दुनिया वाले तो देशी घी खाते हैं लेकिन आप तो पीते थे। घी की नदियाँ देखी। तो डायमण्ड जुबली वालों को विशेष काम करना है - आपस में इकट्ठे हुए हो तो रूहरिहान करना। जैसे सेवा की मीटिंग करते हो वैसे इसकी मीटिंग करो। जो बापदादा कहते हैं, चाहते हैं सेकण्ड में अशरीरी हो जायें - उसका फाउण्डेशन यह बेहद की वैराग्य वृत्ति है, नहीं तो कितनी भी कोशिश करेंगे लेकिन सेकण्ड में नहीं हो सकेंगे। युद्ध में ही चले जायेंगे और जहाँ वैराग्य है तो ये वैराग्य है योग्य धरनी, उसमें जो भी डालो उसका फल फौरन निकलता। तो क्या करना है? सभी को फील हो कि बस हमको भी अभी वैराग्य वृत्ति में जाना है। अच्छा। समझा क्या करना है? सहज है या मुश्किल है? थोड़ा-थोड़ा आकर्षण तो होगी या नहीं? साधन अपने तरफ नहीं खींचेंगे? अभी अभ्यास चाहिए-जब चाहे, जहाँ चाहे, जैसा चाहिए - वहाँ स्थिति को सेकण्ड में सेट कर सके। सेवा में आना है तो सेवा में आये। सेवा से न्यारे हो जाना है तो न्यारे हो जाएं। ऐसे नहीं, सेवा हमको खींचे। सेवा के बिना रह नहीं सकें। जब चाहें, जैसे चाहें, विल पावर चाहिए। विल पावर है? स्टॉप तो स्टॉप हो जाए। ऐसे नहीं लगाओ स्टॉप और हो जाए क्वेश्चनमार्क। फुलस्टॉप। स्टॉप भी नहीं फुलस्टॉप। जो चाहें वह प्रैक्टिकल में कर सकें। चाहते हैं लेकिन होना मुश्किल है तो इसको क्या कहेंगे? विल पावर है कि पावर है? संकल्प किया - व्यर्थ समाप्त, तो सेकण्ड में समाप्त हो जाए।

बापदादा ने सुनाया ना कि कई बच्चे कहते हैं - हम योग में बैठते हैं लेकिन योग के बजाए युद्ध में होते हैं। योगी नहीं होते, योद्धे होते हैं और युद्ध करने के अगर संस्कार बहुतकाल रहे तो क्या बनेंगे? सूर्यवंशी वा चन्द्रवंशी? सोचा और हुआ। सोचना और होना, सेकण्ड का काम है। इसको कहते हैं - विल पॉवर। विल पॉवर है कि प्लैन बहुत अच्छे बनाते लेकिन प्लैन बनते हैं 10 और प्रैक्टिकल में होते हैं 5, ऐसे तो नहीं होता? सोचते बहुत अच्छा हैं - यह करेंगे, यह होगा, यह होगा लेकिन प्रैक्टिकल में अन्तर पड़ जाता है। तो अभी ऐसी विल पॉवर हो, संकल्प किया और कर्म में प्रैक्टिकल में हुआ पड़ा है, ऐसे अनुभव हो। नहीं तो देखा जाता है अमृतवेले जब बाप से रूहरिहान करते, बहुत अच्छी-अच्छी बातें बोलते हैं, यह करेंगे, यह करेंगे.....और जब रात होती तो क्या रिजल्ट होती? बाप को खुश बहुत करते हैं, बातें इतनी मीठी-मीठी करते हैं, इतनी अच्छी-अच्छी करते हैं, बाप भी खुश हो जाता, वाह मेरे बच्चे! कहते हैं - बाबा, बस आपने जो कहा ना, होना ही है। हुआ पड़ा है। बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। कई तो बाप को इतना दिलासा दिलाते हैं कि बाबा हम नहीं होंगे तो कौन होगा। बाबा कल्प-कल्प हम ही तो थे, खुश हो जाते।

(हाल में पीछे बैठने वालों से) पीछे बैठने वाले अच्छी तरह से सुन रहे हो ना?

आगे वालों से पहले पीछे वाले करेंगे? बैठे पीछे हो लेकिन सबसे समीप दिल पर हो। क्यों? दूसरे को चांस देना यह सेवा की ना! तो सेवाधारी सदा बाप के दिल पर हैं। कभी भी ऐसे नहीं सोचना कि हम भी अगर दादियाँ होती ना तो जरा सा.......लेकिन सामने तो क्या दिल पर हो। और दिल भी साधारण दिल नहीं, तख्त है। तो दिलख्तनशीन हैं ना। कहाँ भी बैठे हो, चाहे इस कोने में बैठे हो, चाहे नीचे बैठे हो, चाहे कैबिन में बैठे हो... लेकिन बाप के दिल पर हो।

सभी डायमण्ड जुबली मनाने के लिए भागे हैं? तो सिर्फ दादियाँ डायमण्ड हैं या आप भी डायमण्ड हो? आप भी डायमण्ड हो ना! निमित्त शुरू वालों की मनाते हैं लेकिन पहले आप। अच्छा-डायमण्ड जुबली वाले हाथ उठाओ। डायमण्ड जुबली इन्हों की मनाते हो लेकिन आप नहीं होते तो मनाते कौन? शोभा तो मनाने वालों से है। तो सभी को मनाने की खुशी है क्योंकि समझते हैं कि इन्हों की डायमण्ड जुबली होना अर्थात् हमारा नम्बर आ ही गया। यह नि:स्वार्थ सेवाधारी हैं। इसलिए देखकरके खुशी होती है, ईर्ष्या नहीं होती है कि क्यों इन्हों का मनाते हैं, हमारा क्यों नहीं? क्या ऐसा सोचते हो कि इन्हों का ही क्यों मनाया जाता? सोचते हो? नहीं। बहुत खुशी है। यह आदि काल के रत्नों के त्याग का भाग्य है, जो किसको ईर्ष्या नहीं होती, खुशी होती है। और हमशरीक होंगे ना तो किसको ईर्ष्या भी होगी, क्यों हम भी तो हैं, हम भी तो हैं। लेकिन ये इन्हों के त्याग का भाग्य है इसलिए किसको ईर्ष्या नहीं होती। देखो, इन्हों के त्याग ने आप सबको लाया है। अगर ये निमित्त नहीं बनते, फॉरेन में भी आदि रत्न निमित्त बने तब तो आप पैदा हुए। तो अच्छी तरह से खूब धूमधाम से मनाओ। बापदादा भी खुश है। अच्छा।

10 वर्ष वालों का भी मनाते रहते हैं। डबल फॉरेनर्स का मनाया था ना। अभी इस ग्रुप में भी बहुत 10 वर्ष वाले होंगे। तो सभी चाहे 10 वर्ष वाले, चाहे 10 वर्ष से भी पहले वाले उन सभी को बापदादा दिल से मुबारक देकर मना रहे हैं। (सभी ने खूब तालियाँ बजाई) मनाना अर्थात् सबकी दुआयें लेना। यह तालियाँ बजाना अर्थात् आप सबको सभी की दुआयें मिली। और फर्स्ट टाइम वाले भी बहुत हैं, आप सब फर्स्ट टाइम वालों को फास्ट जाने की दुआयें। चाहे फर्स्ट टाइम वाले हैं, चाहे 10 वर्ष, 20 वर्ष वाले हैं लेकिन हर एक आत्मा इस ब्राह्मण परिवार की विशेष शोभा हो। एक रत्न भी कम होता है तो शोभा नहीं होती है। तो बापदादा सभी बच्चों को उसी नज़र से देखते हैं कि यह हर एक रत्न इस ब्राह्मण परिवार का श्रृंगार है। श्रृंगार हो ना? बहुत वैल्युएबल श्रृंगार हो। इसलिए अभी तक आपके जड़ चित्रों को कितना श्रृंगार करते रहते हैं। अभी लास्ट जन्म तक भी श्रृंगार होता रहता है। ऐसी खुशी है? भगवान का श्रृंगार बनना कम बात है क्या!

अच्छा-जो आदि रत्न हैं, जिनकी डायमण्ड जुबली मनाई जा रही है उनसे प्रश्न पूछते हैं कि आदि रत्नों को कौन सी बात बहुत सहज है? दूसरों को थोड़ा टाइम लगता है लेकिन आदि रत्नों को बहुत सहज और नेचुरल है, वह कौन सी बात? उत्तर दो। (बाबा को अपना बनाना)

सभा से

आप लोगों को अपना बनाना सहज है या मुश्किल है? अच्छा अपना बना लिया है या बना रहे हैं? बना लिया-पक्का? या कभी-कभी ऐसे (कांध पीछे) कर लेते हो? नाज़-नखरे तो नहीं करते हो? कभी-कभी बहुत खेल दिखाते हैं। तो बाप को तो अपना बनाया। बाप को अपना बनाना अर्थात् सदा साथ और हाथ का अनुभव करना। तो आदि रत्नों को बाप के साथ का अनुभव करना बहुत सहज है। क्योंकि साकार में साथ का अनुभव किया है। आपको फिर भी इमर्ज करना पड़ता है लेकिन इन्होंने प्रैक्टिकल तुम्हीं साथ रहना, खाना, चलना, फिरना...यह प्रैक्टिकल साकार में अनुभव किया है। तो साकार में अनुभव की हुई चीज़ सहज याद रहती है। ये इन्हों का लक है कि बाप के साथ का अनुभव ये जब चाहें तब कर सकते हैं। ऐसे है? लेकिन ड्रामा में आप लोगों के लिए खास एक लिफ्ट है, जो अव्यक्त रूप में आये हैं, साकार रूप में ड्रामानुसार पीछे आये हैं, उन्हों को एक्स्ट्रा लिफ्ट है, कौन सी लिफ्ट है? जब चाहो तब बापदादा की एक्स्ट्रा मदद मिलती है। संकल्प का एक कदम आपका और सहयोग के बहुत कदम बाप के। इसीलिए आपको एक्स्ट्रा लिफ्ट है। समझा? आप भी कम नहीं हो। अच्छा-

आदि रत्नों को पद्मगुणा बापदादा की सर्व सम्बन्धों से मुबारक हो, मुबारक हो।

चारों ओर के तख्तनशीन श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मायें, सदा बेहद के वैराग्य वृत्ति से वायुमण्डल बनाने वाले विशेष आत्मायें, सदा अपने श्रेष्ठ विशेषताओं को कार्य में लगाने वाले विशेष आत्मायें, सदा एक बाप के साथ और श्रीमत के हाथ को अनुभव करने वाले समीप आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से

सबसे ज्यादा दुआयें आप लोंगों को मिलती हैं। सबको इन निमित्त रत्नों से प्यार क्यों है, कारण क्या? क्योंकि इन्हों का बाप से हर श्वास में प्यार है, हर श्वास में बाबा-बाबा है ना? नेचुरल है, मेहनत नहीं है। मेहनत करनी नहीं पड़ती। तो जितना इन्हों का बाप से प्यार है, उतना आप का इन्हों से है क्योंकि साकार में निमित्त हैं, बाप समान हैं। चाहे कभी किसी को शिक्षा भी देती हैं, शिक्षा के समय किसको दिल में लगता भी है लेकिन फिर अनुभव करते हैं कि हमारे कल्याण की भावना से शिक्षा दी। तो भावना शुभ है - इसलिए शिक्षा दिल से लगती है। और निमित्त बनने वालों का विशेष बैकबोन बाप है। चाहे बोल इन्हों के हैं लेकिन बैकबोन बाप है। कभी भी इन्हों के मुख से मैंशब्द नहीं निकलेगा। बाबा-बाबा निकलेगा। तो ये याद का प्रूफ है। मैं पनबाबा में समा गया। अच्छा

(आज बहुत खुशी हो रही है कि 60 वर्ष आपकी पालना में बीते हैं)

खुशी तो आप का श्वास है, आप की खुशी कोई छीन नहीं सकता। कभी खुशी गुम होती है? चाहे कोई आदि रत्न स्थापना के हैं और कोई आदि रत्न सेवा की स्थापना के, दोनों का अपना-अपना महत्व है। ये स्थापना के आदि रत्न वो सेवा के आदि रत्न। आपने स्थापना की लेकिन सेवा की वृद्धि तो इन्होंने की।

अच्छा। ओम् शान्ति।