30-11-06 ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' मधुबन


“ज्वालामुखी तपस्या द्वारा मैंपन की पूंछ को जलाकर बापदादा समान बनो तब समाप्ति समीप आयेगी”

आज अखुट अविनाशी खजानों के मालिक बापदादा अपने चारों ओर के सम्पन्न बच्चों के जमा का खाता देख रहे हैं। तीन प्रकार के खाते देख रहे हैं - एक है अपने पुरुषार्थ द्वारा श्रेष्ठ प्रालब्ध जमा का खाता। दूसरा है सदा सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना, यह सन्तुष्टता द्वारा दुवाओं का खाता। तीसरा है मन्सा-वाचा-कर्मणा, सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा बेहद के नि:स्वार्थ सेवा द्वारा पुण्य का खाता। आप सभी भी अपने इन तीन खातों को चेक करते ही हो। यह तीनों खाते जमा कितने हैं, हैं वा नहीं हैं उसकी निशानी हैं - सदा सर्व प्रति, स्वयं प्रति सन्तुष्टता स्वरूप, सर्व प्रति शुभ भावना, शुभ कामना और सदा अपने को खुशनुम:, खुशनसीब स्थिति में अनुभव करना। तो चेक करो दोनों खाते की निशानियां स्वयं में अनुभव होती हैं? इन सर्व खजानों को जमा करने की चाबी है - निमित्त भाव, निर्माण भाव, नि:स्वार्थ भाव। चेक करते जाओ और चाबी का नम्बर पता है! चाबी का नम्बर है - तीन बिन्दी। थ्री डाॅट। एक आत्मा बिन्दी, दूसरा बाप बिन्दी, तीसरा - ड्रामा का फुल स्टाप बिन्दी, चाबी तो है ना आप सभी के पास? खजाने को खोलकर देखते रहते हो ना! इन सभी खजानों के वृद्धि की विधि है - दृढ़ता। दृढ़ता होगी तो किसी भी कार्य में यह संकल्प नहीं चलेगा कि होगा या नहीं होगा। दृढ़ता की स्थिति है - हुआ ही पड़ा है, बना ही पड़ा है। बनेगा, जमा होगा, नहीं होगा, नहीं। करते तो हैं, होना तो चाहिए, तो तो भी नहीं। दृढ़ता वाला निश्चयबुद्धि, निश्चिंत और निश्चित अनुभव करेगा।
बापदादा ने पहले भी सुनाया है - अगर ज्यादा से ज्यादा सर्व खजाने का खाता जमा करना है तो मनमनाभव के मन्त्र को यन्त्र बना दो। जिससे सदा बाप के साथ और पास रहने का स्वत: अनुभव होगा। पास होना ही है, तीन रूप के पास हैं - एक है पास रहना, दूसरा है जो बीता सो पास हुआ और तीसरा है पास विद ऑनर होना। अगर तीनों पास हैं, तो आप सबको राज्य अधिकारी बनने की फुल पास है। तो फुल पास ले ली है वा लेनी है? जिन्होंने फुल पास ले ली है वह हाथ उठाओ। लेनी नहीं है, ले ली है? पहली लाइन वाले नहीं उठाते, लेनी है आपको? सोचते हैं अभी सम्पूर्ण नहीं बने हैं, इसीलिए। लेकिन निश्चयबुद्धि विजयी हैं ही, या होना है? अभी तो समय की पुकार, भक्तों की पुकार, अपने मन की आवाज क्या आ रही है? अभी-अभी सम्पन्न और समान बनना ही है। वा यह सोचते हैं बनेंगे, सोचेंगे, करेंगे...! अब समय के अनुसार हर समय एवररेडी का पाठ पक्का रहना ही है। जब मेरा बाबा कहा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा मानते ही हैं। तो जो प्यारा होता है उसके समान बनना मुश्किल नहीं होता।
बापदादा ने देखा है कि समय प्रति समय समान बनने में जो विघ्न पड़ता है वह सबके पास प्रसिद्ध शब्द है, सब जानते हैं अनुभवी हैं। वह है ''मैं'', मैंपन। इसलिए बापदादा ने पहले भी कहा है जब भी मैं शब्द बोलते हो तो सिर्फ मैं नहीं बोलो, मैं आत्मा। जुड़वा शब्द बोलो। तो मैं कभी अभिमान ले आता, बॉडी कान्सेस वाला मैं, आत्मा वाला नहीं। कभी अभिमान भी लाता, कभी अपमान भी लाता है। कभी दिलशिकस्त भी बनाता। इसलिए इस बॉडी कान्सेस के मैंपन को स्वप्न में भी नहीं आने दो। बापदादा ने देखा है स्नेह की सब्जेक्ट में मेजॉरिटी पास हैं। आप सभी को किसने यहाँ लाया? सभी चाहे प्लेन में आये हो, चाहे ट्रेन में, चाहे बस में आये हो, लेकिन वास्तव में बापदादा के स्नेह के विमान में यहाँ पहुंचे हो। तो जैसे स्नेह की सबजेक्ट में पास है, अब यह कमाल करो समान बनने की सबजेक्ट में भी पास विद आनर बनके दिखाओ। पसन्द है? समान बनना पसन्द है? पसन्द है लेकिन बनने में थोड़ा मुश्किल है! समान बन जाओ तो समाप्ति सामने आयेगी। लेकिन कभी-कभी जो दिल में प्रतिज्ञा करते हो, बनना ही है। तो प्रतिज्ञा कमजोर हो जाती और परीक्षा मजबूत हो जाती है। चाहते सभी हैं लेकिन चाहना एक होती है प्रैक्टिकल दूसरा हो जाता है क्योंकि प्रतिज्ञा करते हो लेकिन दृढ़ता की कमी पड़ जाती है। समानता दूर हो जाती है, समस्या प्रबल हो जाती है। तो अब क्या करेंगे?
बापदादा को एक बात पर बहुत हंसी आ रही है। कौन सी बात? हैं महावीर लेकिन जैसे शास्त्रों में हनुमान को महावीर भी कहा है लेकिन पूंछ भी दिखाया है। यह पूंछ दिखाया है मैंपन का। जब तक महावीर इस पूंछ को नहीं जलायेंगे तो लंका अर्थात् पुरानी दुनिया भी समाप्त नहीं होगी। तो अभी इस मैं, मैं की पूंछ को जलाओ तब समाप्ति समीप आयेगी।जलाने के लिएज्वालामुखी तपस्या, साधारण याद नहीं।ज्वालामुखी याद की आवश्यकता है। इसीलिए ज्वाला देवी की भी यादगार है। शक्तिशाली याद। तो सुना क्या करना है?अब यह मन में धुन लगी हुई हो - समान बनना ही है, समाप्ति को समीप लाना ही है। आप कहेंगे संगमयुग तो बहुत अच्छा है ना तो समाप्ति क्यों हो? लेकिन आप बाप समान दयालु, कृपालु, रहमदिल आत्मायें हो, तो आज की दु:खी आत्मायें और भक्त आत्माओंके ऊपर हे रहमदिल आत्मायें रहम करो। मर्सीफुल बनो। दु:ख बढ़ता जा रहा है, दु:खियों पर रहम कर उन्हों को मुक्तिधाम में तो भेजो। सिर्फ वाणी की सेवा नहीं लेकिन अभी आवश्यकता है मन्सा और वाणी की सेवा साथ-साथ हो। एक ही समय पर दोनों सेवा साथ हो। सिर्फ चांस मिले सेवा का, यह नहीं सोचो, चलते फिरते अपने चेहरे और चलन द्वारा बाप का परिचय देते हुए चलो। आपका चेहरा बाप का परिचय दे। आपकी चलन बाप को प्रत्यक्ष करती चले। तो ऐसे सदा सेवाधारी भव! अच्छा। बापदादा के सामने स्थूल में तो आप सभी बैठे हो लेकिन सूक्ष्म स्वरूप से चारों ओर के बच्चे दिल में हैं। देख भी रहे हैं, सुन भी रहे हैं। देश विदेश के अनेक बच्चों ने ईमेल द्वारा, पत्रों द्वारा, सन्देशों द्वारा यादप्यार भेजी है। सभी की नाम सहित बापदादा को याद मिली है और बापदादा दिल ही दिल में सभी बच्चों को सामने देख गीत गा रहे हैं - वाह बच्चे वाह! हर एक को इस समय इमर्ज रूप में याद रहती है। सब सन्देशी को अलग-अलग कहते हैं फलाने ने याद भेजी है, फलाने ने याद भेजी है। बाप कहते हैं, बाप के पास तो जब संकल्प करते हो, साधन द्वारा पीछे मिलती है लेकिन स्नेह का संकल्प साधन से पहले पहुंच जाता है। ठीक है ना! कईयों को याद मिली है ना! अच्छा।
अच्छा - पहले हाथ उठाओ जो पहले बारी आये हैं। यह सेवा में भी पहले बारी आये हैं। अच्छा बापदादा कहते हैं, भले पधारे, आपके आने की मौसम है। अच्छा अभी बोलो।
इन्दौर ज़ोन (आरती बहन) के सेवाधारी आये हैं:- (सबके हाथ में ''मेरा बाबा'' का दिल के सेप में सिम्बल है) हाथ तो बहुत अच्छे हिला रहे हैं, लेकिन दिल को भी हिलाना। सिर्फ सदा याद रखना, भूलना नहीं मेरा। अच्छा चांस लिया है, बापदादा सदा कहते हैं, हिम्मत रखने वालों को बापदादा पदमगुणा मदद देता है। तो हिम्मत रखी है ना! अच्छा किया है। इन्दौर ज़ोन है। अच्छा है इन्दौर ज़ोन साकार बाबा का लास्ट स्मृति का स्थान है। अच्छा है। सभी बहुत खुश हो रहे हो ना! गोल्डन लाटरी मिली है। ज़ोन की सेवा मिलने से सभी सेवाधारियों को छुट्टी मिल जाती है और वैसे संख्या में मिलती है इतने लाओ और अभी देखो इतने हैं। यह भी जोन ज़ोन को अच्छा चांस है ना, जितने लाने हो लाओ। तो आप सभी का थोड़े समय में पुण्य का खाता कितना बड़ा इकठ्ठा हो गया। यज्ञ सेवा दिल से करना अर्थात् अपने पुण्य का खाता तीव्रगति से बढ़ाना क्योंकि संकल्प, समय और शरीर तीनों सफल किया। संकल्प भी चलेगा तो यज्ञ सेवा का, समय भी यज्ञ सेवा में व्यतीत हुआ और शरीर भी यज्ञ सेवा में अर्पण किया। तो सेवा है या मेवा है? प्रत्यक्ष फल किसी के पास यज्ञ सेवा करते कोई व्यर्थ संकल्प आया? आया किसके पास? खुश रहे और खुशी बांटी। तो यह जो यहाँ गोल्डन अनुभव किया, इस अनुभव को वहाँ भी इमर्ज कर बढ़ाते रहना। कभी भी कोई माया का संकल्प भी आवे तो मन के विमान से शान्तिवन में पहुंच जाना। मन का विमान तो है ना! सभी के पास मन का विमान है। बापदादा ने हर ब्रह्मण को जन्म की सौगात श्रेष्ठ मन का विमान दे दिया है। इस विमान में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। स्टार्ट करना है तो मेरा बाबा, बस। चलाना आता है ना विमान! तो जब भी कुछ हो मधुबन में पहुंच जाओ। भक्ति मार्ग में चार धाम करने वाले अपने को बहुत भाग्यवान समझते हैं और मधुबन में भी चार धाम हैं, तो चार धाम किये? पाण्डव भवन में देखो, चार धाम हैं। जो भी आते हो पाण्डव भवन तो जाते हो ना, एक शान्ति स्तम्भ महाधाम। दूसरा बापदादा का कमरा, यह स्नेह का धाम। और तीसरा झोपड़ी, यह स्नेहमिलन का धाम और चौथा - हिस्ट्री हाल, तो आप सभी ने चार धाम किये? तो महान भाग्यवान तो हो ही गये। अभी किसी भी धाम को याद करलेना, कब उदास होजाओ तो झोपड़ी में रूहरिहान करने आजाना। शक्तिशाली बनने की आवश्यकता हो तो शान्ति स्तम्भ में पहुंच जाना और वेस्ट थोट्स बहुत तेज हो, बहुत फास्ट हों तो हिस्ट्री हाल में पहुंच जाना। समान बनने का दृढ़ संकल्प उत्पन्न हो तो बापदादा के कमरे में आ जाना। अच्छा है, सभी ने गोल्डन चांस लिया है लेकिन सदा वहाँ रहते भी गोल्डन चांस लेते रहना। अच्छा। हिम्मतवान अच्छे हैं।कैड ग्रुप (दिल वाले बैठे हैं, बहुत अच्छी कान्फ्रेन्स सबने मिलकर की):-अच्छा किया है, आपस में मीटिंग भी की है और प्रेजीडेंट जो है उसकी भी इच्छा है यह कार्य होना चाहिए। तो जैसे उसकी भी इच्छा है, उसको भी साथ मिलाते हुए आगे बढ़ते रहो और साथ-साथ जो ब्रह्मणों की मीटिंग है, उसमें भी अपने प्रोग्राम का समाचार सुना करके राय ले लेना तो सर्व ब्रह्मणों की राय से और शक्ति भर जाती है। बाकी कार्य अच्छा है, करते चलो, फैलाते चलो और भारत की विशेषता प्रगट करते चलो। मेहनत अच्छी कर रहे हो। प्रोग्राम भी अच्छा किया है, और दिल वालों ने अपनी बड़ी दिल दिखाई, उसकी मुबारक हो। अच्छा।
डबल विदेशी भाई बहिनें:- अच्छा है हर टर्न में डबल विदेशियों का आना इस संगठन को चार चांद लगा देता है। डबल विदेशियों को देखकर सभी को उमंग भी आता है, सब डबल विदेशी डबल उमंग उत्साह से आगे उड़ रहे हैं, चल नहीं रहे हैं, उड़ रहे हैं, ऐसे है। उड़ने वाले हो या चलने वाले हो? जो सदा उड़ता रहता है, चलता नहीं वह हाथ उठाओ। अच्छा। वैसे भी देखो विमान में उड़ते ही आना पड़ता है। तो उड़ने का तो आपको अभ्यास है ही। वह शरीर से उड़ने का, यह मन से उड़ने का, हिम्मत भी अच्छी रखी है। बापदादा नेदेखो कहाँ कोने-कोने से अपने बच्चों को ढूंढ लिया ना! बहुत अच्छा है, डबल विदेशी है कहलाने में, वैसे तो ओरीज्नल भारत के हैं। और राज्य भी कहाँ करना है? भारत में करना है ना! लेकिन सेवा अर्थ पांच ही खण्डों में पहुंच गये हो। और पांच ही खण्डों में भिन्न-भिन्न स्थान में सेवा भी अच्छी उमंग-उत्साह से कर रहे हैं। विघ्न विनाशक हो ना! कोई भी विघ्न आवे घबराने वाले तो नहीं हो ना, यह क्यों हो रहा है, यह क्या हो रहा है, नहीं। जो होता है उसमें हमारी और हिम्मत बढ़ाने का साधन है। घबराने का नहीं, उमंग उत्साह बढ़ाने का साधन है। ऐसे पक्के हो ना! पक्के हो? या थोड़ा-थोड़ा कच्चे? नहीं, कच्चा शब्द अच्छा नहीं लगता। पक्के हैं, पक्के रहेंगे, पक्के होके साथ चलेंगे। अच्छा।
दादी जानकी आस्ट्रेलिया का चक्कर लगाकर आई हैं, उन्होंने बहुत याद दी है:- बापदादा के पास ईमेल में भी सन्देश आये हैं, और बापदादा देखते हैं कि आजकल बड़े प्रोग्राम भी ऐसे हो गये हैं जैसे हुए ही पड़े हैं। सभी सीख गये हैं। सेवा के साधनों को कार्य में लगाने का अच्छा अभ्यास हो गया है। बापदादा को आस्ट्रेलिया नम्बरवन दिखाई देता है लेकिन अभी, पहले-पहले नम्बरवन लिया अभी यू.के. थोड़ा नम्बर आगे जा रहा है लेकिन आस्ट्रेलिया को नम्बरवन होना ही है। यू.के. नम्बर दो नहीं होगा, वह भी नम्बर वन ही होगा। पुराने-पुराने आस्ट्रेलिया के बच्चे बापदादा को याद हैं। और बापदादा की लाडली निर्मल आश्रम, आप लोग तो कहते हैं निर्मला दीदी, दीदी कहते हो ना, लेकिन बापदादा ने शुरू से उसको टाइटल दिया है निर्मल आश्रम, जिस आश्रम में अनेक आत्माओं ने सहारा लिया और बाप के बने हैं और बन रहे हैं, बनते जायेंगे। तो एक-एक आस्ट्रेलिया निवासी बच्चों को विशेष याद है, यह सामने बैठे हैं, आस्ट्रेलिया के हैं ना! आस्ट्रेलिया वाले उठो। बहुत अच्छे। कितना अच्छा उमंग आ रहा है इन्हों को, विश्व की सेवा के लिए खूब तैयारियां कर रहे हैं। बापदादा की मदद है और सफलता भी है ही।
अच्छा - अभी क्या दृढ़ संकल्प कर रहे हो? अभी इसी संकल्प में बैठो कि सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। विजय हमारे गले की माला है। इस निश्चय और रूहानी नशे में अनुभवी स्वरूप होके बैठो।
अच्छा। चारों ओर के फिकर से फारिग बेफिक्र बादशाहों को, सदा बेगमपुर के बादशाह स्वरूप में स्थित रहने वाले बच्चों को, सर्व खजानों से सम्पन्न रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड सर्व बच्चों को, सदा उमंगउत्साह के पंखों से उड़ती कला वाले बच्चों को, सदा समाप्ति को समीप लाने वाले बापदादा समान बच्चों को बापदादा का यादप्यार, दिल की दुवायें, वरदाता के वरदान और नमस्ते।
दादियों से:- कितना प्यार से सभी देख रहे हैं। ठीक हो जायेगी। ठीक है, ठीक ही होगी। अच्छा - सभी खुश हो रहे हैं। खुश रहना यह सबसे बड़े ते बड़े भाग्य के प्राप्ति की निशानी है। खुश रहने वाला अपने चेहरे से अनेको को खुशी का अनुभव कराते हैं।
(दादी जानकी ने विदेश का समाचार सुनाया) अभी तो सारा भारत आपके हाथ में आना है। खुद ही आफर करेंगे आओ, अभी आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है, पर्चे आदि छपाने पड़ते हैं, मेहनत करनी पड़ती है। अभी आपेही सब आफर करेंगे। बस अभी यह सीन रही हुई है कि सबके मुख से एक ही आवाज निकले हमारा बाबा आ गया। यह भी समीप आ रहा है, सिर्फ आप उड़ते रहो, फरिश्ते बन करके उड़ते रहो तो उन्हों को फरिश्तों का साक्षात्कार होगा।
डा. अशोक मेहता:- अच्छा कार्य के निमित्त बन गये हो। अनेक आत्माओंका सहज ही परिचय होता रहता है और हॉस्पिटल का जो लाभ उठाया, पेशेन्ट को मधुबन तक पहुंचाया, यह सेवा बहुत अच्छी की। पेशेन्ट को पेशेन्स सिखला दिया। अच्छा हुआ ना, सभी का फायदा हुआ। अच्छा है। इस हॉस्पिटल से भी कई वी.आई.पी सन्देश लेने आयेंगे। (हेल्थ फेयर और डाक्टर्स की कान्फ्रेन्स करने जा रहे हैं) अच्छा है, हेल्थ का नाम सुन करके अट्रैक्शन होती है, जैसे यहाँ भी ग्लोबल हॉस्पिटल खुलने के बाद वायुमण्डल चेंज हो गया ना। ऐसे हेल्थ का नाम सुनके, सब आजकल हेल्थ कान्सेस बहुत हैं ना तो उन्हों को लगता है डबल फायदा हो जायेगा। यह अच्छी सेवा है।
बम्बई के प्रसिद्ध गीतकार समीर भाई: अब डबल गीत गाना। मुख से तो गाते हो बहुत अच्छा, बनाते भी हो ना, अच्छे बनाते हो, शब्द खराब नहीं बनाते हो, ठीक बनाते हो। अभी मन से बाप के गुणों के भी गीत गाते रहना। डबल गीत। तो आपका चेहरा खुशमिजाज हो जायेगा। आपके चेहरे से लगेगा कुछ पा लिया है। अच्छा है, टाइम पर पहुंच गये हो।
नारायण दादा:- (परदादी से मिलने आये थे, परदादी अहमदाबाद हास्पिटल में है) वह भी ठीक हो रही है। बड़ी आयु है ना। बड़ी आयु के कारण थोड़ा टाइम लग जाता है। आप ठीक हैं, सेट हो? सब सेट है ना। सभी को याद देना। अच्छा।

 

ओम शान्ति 10-11-17 मधुबन


प्यारे बापदादा के अवतरण दिवस का यह दूसरा टर्न है।

प्यारे बापदादा का रथ गुल्लार दादी जी कल (9-11-17) को मुम्बई से शान्तिवन पहुंची। आज 10 तारीख को सायं 6:30 बजे से प्यारे बापदादा के महावाक्य वीडियो द्वारा सुनाये गये। वह महावाक्य आपके पास भेज रहे हैं। यह टर्न कर्नाटक जोन और इन्दौर (आरती बहन) जोन की सेवा का है। अव्यक्त महावाक्य सुनने के पश्चात दादी गुल्लार जी ने प्यारे बापदादा को भोग लगाया फिर सबसे नयन मुलाकात करते हुए, हाथ हिलाते मिलन मनाया और सबके प्रति मधुर महावाक्य उच्चारण किये, वह आपके पास भेज रहे हैं।

आज का दिन कितना प्यारा है जो मीठे बाबा की स्मृति दिला रहा है। भिन-भिन्न समय के दिन, मिलन के दिन, महावाक्य सुनने के दिन, यह सब आपको स्मृति दिलाने के लिए है क्योंकि इतने समय के बाद तो भूल भी जाता है लेकिन बुद्धि में, स्मृति में तो है हमको यह वरदान मिले हुए हैं। तो यह जो वरदान हैं, यह समय पर बहुत काम में आते हैं। कोई समय ऐसा आता है जब अपने को अकेला समझते हैं, कोई साथी साकार में नजर नहीं आता है लेकिन यह जो हमारा समय बीता है, यह समय बीता है संगठन की शक्ति से। संगठन हमको बहुत प्यार से, स्नेह से लेके चल रहा है। अकेला भी चलते हैं लेकिन संगठन की मदद अभी जरूरी है। जब संगठन की बात आती है तो सबके चेहरे बदल जाते हैं। वैसे तो हमारे अन्दर सबकी याद है और सबके अन्दर हमारी याद है। हम अकेले नहीं चलते हैं। संगठन में चलते हैं। संगठन हमको अपना बनाके, मिलाके चला रहा है और संगठन की जो शक्ति है, वह भी दिखाती है कि संगठन कितना प्यारा होता है। चलते-फिरते कितना संगठन का फायदा होता है। तो संगठन का लाभ लेते हुए हम संगठित रूप में भिन-भिन्न तरीके से संगठन को यूज कर रहे हैं। कहाँ भी कुछ होता है तो चाहे अकेले, चाहे संगठन में किसी भी रीति से जब साथ में संगठन में होते हैं तो कितना प्यारा समय बीतता है और कितना आपस का लव स्मृति में आता है इसलिए बहुत अच्छा है जो आज के दिन हम आपस में तो मिलते हैं लेकिन आपस में मिलने का आधार है हमारा बाबा। बाबा भी बच्चों से दिल से मिलते हैं फिर बाहर स्कूल में तो हमारा स्कूल शरीर भी है तो वह भी मिलता है, तो ऐसे लगता है जैसे हम एक परिवार हैं। तो आपस में मिलने का, बाहर और साथियों से मिलने का और मूल बात है, अपने बड़ों से मिलना। यह भी बहुत अच्छा मिलन मेले का रूप हो जाता है। अच्छा।

सबको बाबा और हमारी मीठी मम्मा की याद है, यही तो हमारे मुख्य आधार है, साथी है। वह साथ बहुत अच्छा है। हम सबके दिल में प्यार है तो बाहर भी मिलन मेले का रूप दिखाई देता है। अच्छा। ओम शान्ति।

31-10-07 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

आज बापदादा अपने चारों ओर के श्रेष्ठ स्वमानधारी विशेष बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे का स्वमान इतना विशेष है जो विश्व में कोई भी आत्मा का नहीं है। आप सभी विश्व की आत्माओं के पूर्वज भी हो और पूज्य भी हो। सारे सृष्टि के वृक्ष की जड़ में आप आधारमूर्त हो। सारे विश्व के पूर्वज पहली रचना हो। बापदादा हर एक बच्चे की विशेषता को देख खुश होते हैं। चाहे छोटा बच्चा है, चाहे बुजुर्ग मातायें हैं, चाहे प्रवृत्ति वाले हैं। हर एक की अलग-अलग विशेषतायें हैं। आजकल कितने भी बड़े ते बड़े साइंसदान हैं, दुनिया के हिसाब से विशेष हैं लेकिन प्रकृतिजीत तो बनें, चन्द्रमां तक भी पहुंच गये लेकिन इतनी छोटी सी ज्योति स्वरूप आत्मा को नहीं पहचान सकते। और यहाँ छोटा सा बच्चा भी मैं आत्मा हूँ, ज्योति बिन्दु को जानता है। फलक से कहता है मैं आत्मा हूँ। कितने भी बड़े महात्मायें हैं और ब्राह्मण मातायें हैं, मातायें फलक से कहती हमने परमात्मा को पा लिया। पा लिया है ना! और महात्मायें क्या कहते? परमात्मा को पाना बहुत मुश्किल है। प्रवृत्ति वाले चैलेन्ज करते हैं कि हम सब प्रवृत्ति में रहते, साथ रहते पवित्र रहते हैं क्योंकि हमारे बीच में बाप है। इसलिए दोनों साथ रहते भी सहज पवित्र रह सकते हैं क्योंकि पवित्रता हमारा स्वधर्म है। पर धर्म मुश्किल होता है, स्व धर्म सहज होता है। और लोग क्या कहते? आग और कपूस साथ में रह नहीं सकते। बड़ा मुश्किल है और आप सब क्या कहते? बहुत सहज है। आप सबका शुरू शुरू का एक गीत था - कितने भी सेठ, स्वामी हैं लेकिन एक अल्फ को नहीं जाना है। छोटी सी बिन्दी आत्मा को नहीं जाना लेकिन आप सभी बच्चों ने जान लिया, पा लिया। इतने निश्चय और फखुर से बोलते हो, असम्भव सम्भव है। बापदादा भी हर एक बच्चे को विजयी रत्न देख हर्षित होते हैं क्योंकि हिम्मते बच्चे मददे बाप है। इसलिए दुनिया लिए जो असम्भव बातें हैं वह आपके लिए सहज और सम्भव हो गई हैं। फखुर रहता है कि हम परमात्मा के डायरेक्ट बच्चे हैं। इस नशे के कारण, निश्चय के कारण परमात्म बच्चे होने के कारण माया से भी बचे हुए हो। बच्चा बनना अर्थात् सहज बच जाना। तो बच्चे हो और सब विघ्नों से, समस्याओं से बचे हुए हो।

तो अपने इतने श्रेष्ठ स्वमान को जानते हो ना! क्यों सहज है? क्योंकि आप साइलेन्स की शक्ति द्वारा, परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाते हो। निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन कर लेते हो। माया कितने भी समस्या के रूप में आती है लेकिन आप परिवर्तन की शक्ति से, साइलेन्स की शक्ति से समस्या को समाधान स्वरूप बना देते हो। कारण को निवारण रूप में बदल देते हो। है ना इतनी ताकत, कोर्स भी कराते हो ना! निगेटिव को पॉजिटिव करने की विधि सिखाते हो। यह परिवर्तन शक्ति बाप द्वारा वर्से में मिली है। एक ही शक्ति नहीं, सर्वशक्तियां परमात्म वर्सा मिला है, इसीलिए बापदादा हर रोज कहते हैं, हर रोज मुरली सुनते हो ना! तो हर रोज बापदादा यही कहते- बाप को याद करो और वर्से को याद करो। बाप की याद भी सहज क्यों आती है? जब वर्से की प्राप्ति को याद करते तो बाप की याद प्राप्ति के कारण सहज आ जाती है। हर एक बच्चे को यह रूहानी फखुर रहता है, दिल में गीत गाते हैं - पाना था वो पा लिया। सभी के दिल में यह स्वत: ही गीत बजता है ना! फखुर है ना! जितना इस फखुर में रहेंगे तो फखुर की निशानी है, बेफिक्र होंगे। अगर किसी भी प्रकार का संकल्प में, बोल में या सम्बन्ध-सम्पर्क में फिकर रहता है तो फखुर नहीं है। बापदादा ने बेफिक्र बादशाह बनाया है। बोलो, बेफिक्र बादशाह हो? है, हाथ उठाओ जो बेफिकर बादशाह हैं? बेफिकर कि कभी कभी फिकर आ जाता है? अच्छा है। जब बाप बेफिक्र है, तो बच्चों को क्या फिकर है।

बापदादा ने तो कह दिया है सब फिक्र वा किसी भी प्रकार का बोझ है तो बापदादा को दे दो। बाप सागर है ना। तो बोझ सारा समा जायेगा। कभी बापदादा बच्चों का एक गीत सुनके मुस्कराता है। पता है कौन सा गीत? क्या करें, कैसे करें.... कभी कभी तो गाते हो। बापदादा तो सुनता रहता है। लेकिन बापदादा सभी बच्चों को यही कहते हैं हे मीठे बच्चे, लाडले बच्चे साक्षी-दृष्टा के स्थिति की सीट पर सेट हो जाओ और सीट पर सेट होके खेल देखो, बहुत मजा आयेगा, वाह! त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित हो जाओ। सीट से नीचे आते इसलिए अपसेट होते हो। सेट रहो तो अपसेट नहीं होंगे।

यह तीन चीज़ें बच्चों को परेशान करती हैं। कौन सी तीन चीज़ें? - चंचल मन, भटकती बुद्धि और क्या कहते हैं? पुराने संस्कार। बापदादा को बच्चों की एक बात सुनके हंसी आती है, पता है कौन सी बात है? कहते हैं बाबा क्या करें, मेरे पुराने संस्कार हैं ना! बापदादा मुस्कराता है। जब कह ही रहे हो, मेरे संस्कार, तो मेरा बनाया है? तो मेरे पर तो अधिकार होता ही है। जब पुराने संस्कार को मेरा बना दिया, तो मेरा तो जगह लेगा ना। क्या यह ब्राह्मण आत्मा कह सकती है मेरे संस्कार? मेरा-मेरा कहा है तो मेरे ने अपनी जगह बना दी है। आप ब्राह्मण मेरा नहीं कह सकते। यह पास्ट जीवन के संस्कार हैं। शूद्र जीवन के संस्कार हैं। ब्राह्मण जीवन के नहीं है। तो मेरा-मेरा कहा है तो वह भी मेरे अधिकार से बैठ गये हैं। ब्राह्मण जीवन के श्रेष्ठ संस्कार जानते हो ना! और यह संस्कार जिनको आप पुराने कहते हो, वह भी पुराने नहीं हैं, आप श्रेष्ठ आत्माओं का पुराने ते पुराना संस्कार अनादि और आदि संस्कार है। यह तो द्वापर मध्य के संस्कार हैं। तो मध्य के संस्कार को समाप्त कर देना, बाप की मदद से कोई मुश्किल नहीं है। होता क्या है? कि समय पर बाप कम्बाइन्ड है, उसे कम्बाइन्ड जान, कम्बाइन्ड का अर्थ ही है समय पर सहयोगी। लेकिन समय पर सहयोग न लेने के कारण मध्य के संस्कार महान बन जाते हैं।

बापदादा जानते हैं कि सभी बच्चे बाप के प्यार के पात्र हैं, अधिकारी हैं। बाबा जानते हैं कि प्यार के कारण ही सभी पहुंच गये हैं। चाहे विदेश से आये हैं, चाहे देश से आये हैं, लेकिन सभी परमात्म प्यार की आकर्षण से अपने घर में पहुंचे हैं। बापदादा भी जानते हैं प्यार में मैजॉरिटी पास हैं। विदेश से प्यार के प्लेन में पहुंच गये हो। बोलो, सभी प्यार की डोर में बंधे हुए यहाँ पहुंच गये हो ना! यह परमात्म प्यार दिल को आराम देने वाला है। अच्छा - जो पहली बार यहाँ पहुचे हैं वह हाथ उठाओ। हाथ हिलाओ। भले पधारे।

अभी समय की समीपता प्रमाण वरदानों को हर समय अनुभव में लाओ। अनुभव की अथॉरिटी बनो। जब चाहो तब अपने अशरीरी बनने की, फरिश्ता स्वरूप बनने की एक्सरसाइज करते रहो। अभी-अभी ब्राह्मण, अभी-अभी फरिश्ता, अभी-अभी अशरीरी, चलते फिरते, कामकाज करते हुए भी एक मिनट, दो मिनट निकाल अभ्यास करो। चेक करो जो संकल्प किया, वही स्वरूप अनुभव किया? अच्छा।

चारों ओर के सदा श्रेष्ठ स्वमानधारी, सदा स्वयं को परमपूज्य और पूर्वज अनुभव करने वाले, सदा अपने को हर सबजेक्ट में अनुभवी स्वरूप बनाने वाले, सदा बाप के दिलतख्त नशीन, भृकुटी के तख्तनशीन, सदा श्रेष्ठ स्थिति के अनुभवों में स्थित रहने वाले, चारों ओर के सभी बच्चों को यादप्यार और नमस्ते।

सेवा का टर्न कर्नाटक जोन का है:- बापदादा ने कर्नाटक वालों को काम दिया था, याद है। क्या दिया था! वारिस क्वालिटी निकाले के लिए, याद है? सेवा में तो नम्बर लिया अच्छा, अभी इतने वारिस निकालो जो नम्बरवन आ जाओ। जो निमित्त हैं वह तो हैं, नये नये निकालो। तो बापदादा सभी बच्चों को देख खुश है। आप भी खुश है, बाप भी खुश है। जितना आप बाप को देखकर खुश होते हैं, उससे ज्यादा बच्चों को देख बाप खुश होते हैं।

सेवा का टर्न इन्दौर ज़ोन का है:- यज्ञ सेवा का गोल्डन चांस मिलना यह बहुत बड़ा पुण्य जमा करने का है हर कदम यज्ञ सेवा करना अर्थात् अपना पुण्य जमा करना। तो इन 10-15 दिन में हर कदम सेवा किया तो कितने पदम बने? यज्ञ सेवा महान सेवा है। और बापदादा ने देखा है कि जो भी ज़ोन यह गोल्डन चांस लेता है वह बहुत सिक व प्यार से सेवा करते हैं। रिजल्ट वेरी गुड होती है। तो आप सबकी भी रिजल्ट अच्छी है और अच्छे ते अच्छी रहेगी।

डबल विदेशी: अभी बापदादा ने देखा है कि विदेश में भी सेवा का उमंग अच्छा बढ़ रहा है। पहले कहते थे विदेश में स्टूडेन्ट बनना बड़ा मुश्किल है और अभी क्या है? अभी मुश्किल है या सहज है? सहज है? और बापदादा को बहुत अच्छा लगा कि आपस में मिलकर निर्विघ्न बनाने का प्लैन बनाया है और निर्विघ्न बनाने का प्लैन बहुत विधि पूर्वक निर्विघ्न बनाया है। इसकी बहुत-बहुत मुबारक हो, पदमगुणा मुबारक हो।

 

05-12-17    ओम् शान्ति    ‘‘अव्यक्त बापदादा’’    मधुबन


ओम शान्ति। सभी महारथी बच्चे बाबा की लगन में मगन हैं और सभी बच्चे प्रेम में कितना लीन है। यह बाप और बच्चों का मिलन बहुत बहुत अमूल्य है। बाबा को सभी इतना याद करते हैं, जैसे मोती माला में समा जाता हैं। ऐसे सब बच्चे स्नेह के धागे में पिरोये हुए हैं। हर एक बच्चा अपने मन में क्या-क्या बोल रहे हैं वह तो वह जानें। लेकिन हम यही जानते हैं कि हर एक बच्चा इस समय ऐसे स्नेह में समाये हुए हैं जैसे मोती हार में समाया हुआ होता है। हर एक के मन और मुख से यही निकल रहा है वाह मेरे दिल में समाने वाले विशेष मोती वाह! इस समय हर एक अपने को वह मोती समझते हैं जो बाबा के ह्दय में समाया हुआ है। कैसे चमक रहा है, उनकी चमक ही सभी को चमका रही है। तो बापदादा यही बच्चों का बाप से मिलन का न॰जारा देख-देख खुश हो रहे हैं। वाह बच्चे वाह! बच्चों के दिल में बाप है, बाप की दिल में बच्चे हैं। यह दृश्य समाने वाला बहुत मधुर है। एक-एक अपने दिल में क्या-क्या अनुभव कर रहे हैं, वह तो आप सभी अनुभव में लीन हो और सभी एक दो को देख हार्षित हो रहे हो।

निर्वैर भाई ने बाबा से पूछा - बाबा अभी वर्ष 2017 पूरा हो रहा है, नया वर्ष आने वाला है तो नये वर्ष में सभी के दिल में क्या उमंग होना चाहिए?

सभी कितने हार्षित हो रहे हैं। यह वर्ष है ही ‘‘स्नेह का वर्ष’’। सभी स्नेह में समाने का अनुभव करेंगे। सभी के दिलों में स्नेह का हीरा चमक रहा है। वह एक-एक हीरा अपना अनुभव करा रहा है। अगर कोई भी आके देखे तो समझे कि यह आत्मायें कहाँ से आई हैं, इन्हों के चेहरों पर तो पता नहीं कौन सी झलक है, जो खींच रही है। बाप को भगवान मानते हैं लेकिन बाप, भगवान और बच्चे कैसे आपस में मिलते हैं, वह देखा नहीं है। आप तो भगवान और बच्चे कैसे मिलते हैं, उसका अनुभव कर रहे हो, यह मिलन अनोखा है। हर एक मन में यही गीत आ रहा है - हमने देखा, हमने पाया शिव भोला भगवान। वह कितना मीठा है, वर्णन करने जैसा ही नहीं है, समाने जैसा है। बाबा और बच्चे दोनों का मिलन, यही मिलन बहुत मधुर है, हर एक एक दो को देख करके हार्षित हो रहे हैं।

बाबा 22 हजार आये हैं, पंजाब और राजस्थान की सेवा का टर्न है:- यह मिलन जो अभी हो रहा है, यह राजस्थान और पंजाब का है। एक-एक रतन इसमें कितने वैल्युबुल हैं। एक दो को देख करके भी कितनी खुशी, कितना उमंग उत्पन्न हो रहा है। सभी की दिल कह रही है वाह, वाह! यह वाह क्यों निकलता हैं, क्योंकि स्वयं बाबा ने, भगवान ने बच्चे ढूंढे और बच्चों को ऐसा योग्य बनाया जो कोई भी देखता है तो उनके मुख से आटोमेटिक गीत निकलता है वाह प्रभु के बच्चे वाह! वाह बाबा वाह, सबके दिल से क्या निकलता है, वाह बाबा वाह! वाह मिलन वाह! अच्छा।


15-12-06   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘स्मृति स्वरूप, अनुभवी मूर्त बन सेकण्ड की तीव्रगति से परिवर्तन कर पास विद ऑनर बनो’’

आज बापदादा चारों ओर के बच्चों में तीन विशेष भाग्य की रेखायें मस्तक में चमकती हुई देख रहे हैं। सभी के मस्तक भाग्य की रेखाओं से चमक रहे हैं। एक है परमात्म पालना के भाग्य की रेखा। दूसरी है श्रेष्ठ शिक्षक द्वारा शिक्षा के भाग्य की रेखा। तीसरी है सतगुरू द्वारा श्रीमत के भाग्य की रेखा। वैसो भाग्य आपका अथाह है फिर भी आज यह विशेष तीन रेखायें देख रहे हैं। आप भी अपने मस्तक में चमकती हुई रेखायें अनुभव कर रहे हो ना! सबसे श्रेष्ठ है परमात्म प्यार के पालना की रेखा। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा है तो परमात्म पालना भी ऊंचे ते ऊंची है। यह पालना कितने थोड़ों को प्राप्त होती है, लेकिन आप सब इस पालना के पात्र बने हो। यह पालना सारे कल्प में आप बच्चों को एक ही बार प्राप्त होती है। अब नहीं तो कब प्राप्त नहीं हो सकती। यह परमात्म पालना, परमात्म प्यार, परमात्म प्राप्तियां कोटों में कोई आत्माओं को ही अनुभव होती हैं। आप सभी तो अनुभवी हो ना! अनुभव है? पालना का भी अनुभव है, पढ़ाई का भी और श्रीमत का भी। अनुभवी मूर्त हो। तो सदा अपने मस्तक में यह भाग्य का सितारा चमकता हुआ दिखाई देता है, सदा? कि कभी चमकता हुआ सितारा डल भी हो जाता है क्या! ढीला नहीं होना चाहिए। अगर चमकता हुआ सितारा ढीला होता है, उसका कारण क्या है? जानते हो?

बापदादा ने देखा है कि कारण यह होता है, स्मृति स्वरूप नहीं बने हो। सोचते हो मैं आत्मा हूँ, लेकिन सोचता स्वरूप बनते हो, स्मृति स्वरूप कम बनते हो। जब तक स्मृति स्वरूप सदा नहीं बनते तो स्मृति ही समर्थी दिलाती है। स्मृति स्वरूप ही समर्थ स्वरूप है। इसलिए भाग्य का सितारा कम चमकता है। अपने आपसे पूछो कि ज्यादा समय सोच स्वरूप बनते हो वा स्मृति स्वरूप बनते हो? सोच स्वरूप बनने से सोचते बहुत अच्छा हो, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ.... लेकिन स्मृति न होने के कारण सोचते, व्यर्थ संकल्प साधारण संकल्प भी मिक्स हो जाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो आपका अनादि स्वरूप स्मृति सो समर्थ स्वरूप है। सोचने वाला नहीं, स्वरूप है। और आदि में भी इस समय के स्मृति स्वरूप की प्रालब्ध प्राप्त होती है। तो अनादि और आदि स्मृति स्वरूप है और इस समय अन्त में संगम समय पर भी स्मृति स्वरूप बनते हो। तो आदि अनादि और अन्त तीनों कालों में स्मृति स्वरूप हो। सोचना स्वरूप नहीं हो। इसलिए बापदादा ने पहले भी कहा कि वर्तमान समय अनुभवी मूर्त बनना श्रेष्ठ स्टेज है। सोचते हो आत्मा हूँ, परमात्म प्राप्ति है, लेकिन समझना और अनुभव करना इसमें बहुत अन्तर है। अनुभवी मूर्त कभी भी न माया से धोखा खा सकता, न दु:ख की अनुभूति कर सकता। यह जो बीच-बीच में माया के खेल देखते हो, या खेल खेलते भी हो, उसका कारण है अनुभवी मूर्त की कमी है। अनुभव की अथॉरिटी सबसे श्रेष्ठ है। तो बापदादा ने देखा कि कई बच्चे सोचते हैं लेकिन स्वरूप की अनुभूति कम है। आज की दुनिया में मैजॉरिटी आत्मायें देखने और सुनने से थक गये हैं लेकिन अनुभव द्वारा प्राप्ति करने चाहते हैं। तो अनुभव कराना, अनुभवी ही करा सकता है। और अनुभवी आत्मा सदा आगे बढ़ती रहेगी, उड़ती रहेगी क्योंकि अनुभवी आत्मा में उमंग-उत्साह सदा इमर्ज रूप में रहता है। तो चेक करो हर प्वाइंट के अनुभवी मूर्त बने हैं? अनुभव की अथॉरिटी आपके हर कर्म में दिखाई देती है? हर बोल, हर संकल्प अनुभव की अथॉरिटी से है या सिर्फ समझने के आधार पर है? एक है समझना, दूसरा है अनुभव करना। हर सबजेक्ट में, ज्ञान की प्वाइंट्स वर्णन करना, वह तो बाहर के स्पीकर भी बहुत स्पीच कर लेते हैं। लेकिन हर प्वाइंट का अनुभवी स्वरूप बनना, यह है ज्ञानी तू आत्मा। योग लगाने वाले बहुत हैं, योग में बैठने वाले बहुत हैं, लेकिन योग का अनुभव अर्थात् शक्ति स्वरूप बनना और शक्ति स्वरूप की परख यह है कि जिस समय जिस शक्ति की आवश्यकता है, उस समय उस शक्ति को आह्वान कर निर्विघ्न स्वरूप बन जाए। अगर एक भी शक्ति की कमी है, वर्णन है लेकिन स्वरूप नहीं है तो भी समय पर धोखा खा सकते हैं। चाहिए सहनशक्ति और आप यूज करो सामना करने की शक्ति, तो योगयुक्त अनुभवी स्वरूप नहीं कहेंगे। चार ही सबजेक्ट में स्मृति स्वरूप वा अनुभवी स्वरूप की निशानी क्या होगी? स्थिति में निमित्त भाव, वृत्ति में सदा शुभ भाव, आत्मिक भाव, नि:स्वार्थ भाव। वायुमण्डल में वा सम्बन्ध-सम्पर्क में सदा निर्माण भाव, वाणी में सदा निर्मल वाणी। यह विशेषतायें अनुभवी मूर्त की हर समय नेचुरल नेचर होगी। नेचुरल नेचर। अभी कई बच्चे कभी-कभी कहते हैं कि हम चाहते नहीं हैं यह करें लेकिन मेरी पुरानी नेचर है। नेचर नेचुरल काम वही करती है, सोचना नहीं पड़ता, लेकिन नेचर नेचुरल काम करती है। तो अपने को चेक करो- मेरी नेचुरल नेचर क्या है? अगर कोई भी पुरानी नेचर अंश मात्र भी है, तो हर समय वह कार्य में आते-आते पक्का संस्कार बन जाता है। उसको समाप्त करने के लिए पुरानी नेचर, पुराना स्वभाव, पुराना संस्कार को समाप्त करने के लिए चाहते हो लेकिन कर नहीं पाते हो, उसका कारण क्या है? नॉलेजफुल तो सबमें बन गये हो, लेकिन जो चाहते हो होना नहीं चाहिए लेकिन हो जाता है, कारण क्या है? परिवर्तन करने की शक्ति कम है। मैजॉरिटी में दिखाई देता है कि परिवर्तन की शक्ति, समझते हैं, वर्णन भी करते हैं, अगर सभी को परिवर्तन शक्ति की टॉपिक पर लिखने के लिए कहें या भाषण करने के लिए कहें तो बापदादा समझते हैं सभी बहुत होशियार हैं, बहुत अच्छा भाषण भी कर सकते हैं, लिख भी सकते हैं और दूसरा कोई आता है उसको समझाते भी बहुत अच्छा है - कोई हर्जा नहीं, परिवर्तन कर लो। लेकिन स्वयं में परिवर्तन करने की शक्ति और वर्तमान समय के महत्व को जानते हुए परिवर्तन करने में समय नहीं लगाना चाहिए। सेकण्ड में परिवर्तन की शक्ति, क्योंकि जब समझते हो - होना नहीं चाहिए, समझते हुए भी अगर परिवर्तन नहीं कर पाते हो, उसका कारण है - सोचते हो लेकिन स्वरूप नहीं बने हो।

सोचना स्वरूप ज्यादा सारे दिन में बनते हो, स्मृति सो समर्थ स्वरूप वह मैजॉरिटी कम है। अभी तीव्रगति का समय है, तीव्र पुरूषार्थ का समय है, साधारण पुरूषार्थ का समय नहीं है, सेकण्ड में परिवर्तन का अर्थ है - स्मृति स्वरूप द्वारा एक सेकण्ड में निर्विकल्प, व्यर्थ संकल्प निवृत्त हो जाए, क्यों? समय को समाप्ति को समीप लाने वाले निमित्त हो। तो अभी के समय के महत्व प्रमाण जब जानते भी हो कि हर कदम में पदम समाया हुआ है, तो बढ़ाने का तो बुद्धि में रखते हो लेकिन गवॉने का भी तो बुद्धि में रखो। अगर कदम में पदम बनता भी है तो कदम में पदम गंवाते भी तो हो, या नहीं? तो अभी मिनट की बात भी गई, दूसरों के लिए कहते हो वन मिनट साइलेन्स में रहो लेकिन आप लोगों के लिए सेकण्ड की बात होनी चाहिए। जैसे हाँ और ना सोचने में कितना टाइम लगता है? सेकण्ड। तो परिवर्तन शक्ति इतनी फास्ट चाहिए। समझा ठीक है, नहीं ठीक है, ना ठीक को बिन्दी और ठीक को प्रैक्टिकल में लाना है। अभी बिन्दी के महत्व को कार्य में लगाओ। तीन बिन्दियों को तो जानते हो ना! लेकिन बिन्दी को समय पर कार्य में लगाओ। जैसे साइंस वाले सब बात में तीव्रगति कर रहे हैं, और परिवर्तन की शक्ति भी ज्यादा कार्य में लगा रहे हैं। तो साइलेन्स की शक्ति वाले अभी लक्ष्य रखो अगर परिवर्तन करना है, नॉलेजफुल हो तो अभी पावरफुल बनो, सेकण्ड की गति से। कर रहे हैं, हो जायेंगे... कर लेंगे...., नहीं। हो सकता है या मुश्किल है? क्योंकि लास्ट समय सेकण्ड का पेपर आना है, मिनट का नहीं, तो सेकण्ड का अभ्यास बहुतकाल का होगा तब तो सेकण्ड में पास विद आनर बनेंगे ना! परमात्म स्टूडेन्ट हैं, परमात्म पढ़ाई पढ़ रहे हैं, तो पास विद ऑनर बनना ही है ना! पास मार्क्स लिया तो क्या हुआ। पास विद ऑनर। क्या लक्ष्य रखा है? जो समझते हैं पास विद ऑनर बनना है वह हाथ उठाओ, पास विद ऑनर, ऑनर शब्द अण्डरलाइन करना। अच्छा।

तो अभी क्या करना पड़ेगा? मिनट मोटर तो कामन है, सेकण्ड का काम है अभी। हाँ पंजाब वाले, सेकण्ड का मामला है अभी। इसमें नम्बरवन कौन होगा? पंजाब। क्या बड़ी बात है। जितना फलक से कहते हो, बहुत अच्छा कहते हो, फलक से कहते हो, बापदादा जब सुनते हैं बहुत खुश होते हैं, कहते हो - क्या बड़ी बात है, बापदादा साथ है। तो साथ तो अथॉरिटी है, तो क्या करना है अभी? तीव्र बनना पड़ेगा अभी। सेवा तो कर रहे हो, और सेवा के बिना और करेंगे भी क्या? खाली बैठेंगे क्या? सेवा तो ब्राह्मण आत्माओं का धर्म है, कर्म है। लेकिन अभी सेवा के साथ-साथ समर्थ स्वरूप, जितना सेवा का उमंग-उत्साह दिखाया है, बापदादा खुश है, मुबारक भी देते हैं। लेकिन जैसे सेवा का ताज मिला है ना, ताज पहना हुआ है देखो कितना अच्छा लग रहा है। अभी स्मृति स्वरूप बनने का ताज पहनके दिखाना। यूथ ग्रुप है ना! तो कमाल क्या करेंगे? सेवा में भी नम्बरवन और समर्थ स्वरूप में भी नम्बरवन। सन्देश देना भी ब्राह्मण जीवन का धर्म और कर्म है लेकिन अभी बापदादा इशारा दे रहा है कि परिवर्तन की मशीनरी तीव्र करो। नहीं तो पास विद आनर होने में मुश्किल हो जायेगा। बहुतकाल का अभ्यास चाहिए। सोचा और किया। सिर्फ सोचना स्वरूप नहीं बनो, समर्थ स्मृति सो समर्थ स्वरूप बनो। व्यर्थ को तीव्र गति से समाप्त करो। व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ समय और सम्बन्ध-सम्पर्क में भी व्यर्थ विधि, रीति सब समाप्त करो। जब ब्राह्मण आत्मायें तीव्रगति से यह स्व के व्यर्थ की समाप्ति करेंगे तब आत्माओं की दुआयें और अपने पुण्य का खाता तीव्रगति से जमा करेंगे।

सेवा का टर्न पंजाब का है:- आधा क्लास तो पंजाब है। बहुत अच्छा किया है। सेवा में एवररेडी बन पहुंच गये हो, इसकी मुबारक है। अच्छा, पंजाब वाले क्या कोई नया प्लैन बना रहे हैं? जो किसने नहीं किया हो, कोई ऐसा प्लैन टच होता है? होता है। सुबह को हो जायेगा। ऐसा करके दिखाओ, जो सब ब्राह्मण थैंक्स भी दें, मुबारक भी दें, वाह! वाह! के गीत भी गायें। अभी तक जो किया है, वह तो कर ही रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं। बापदादा सेवा के समाचार सुनते रहते हैं और सुनकर दिल में दिल का प्यार भी देते हैं। अभी कुछ और नवीनता करके दिखाओ। पंजाब को शेर कहा जाता है ना। तो ऐसी कोई गजघोर करके दिखाओ जो सबकी नज़र बापदादा की तरफ सहज ही आ जाए। हो जायेगा। बापदादा को संकल्प है, पंजाब कोई नवीनता करेगा ही। अभी भी गोल्डन चांस मिला है, सेवा का गोल्डन चांस लिया और हर साल लेते भी रहते हैं और अच्छे हिम्मत उमंग से सभी मिल करके कर भी रहे हैं। संख्या तो बहुत अच्छी आई है। अच्छे-अच्छे महावीर हैं। देखो ब्रह्मा बाप का भी पंजाब से प्यार रहा तो पंजाब में पहुंच गये थे। तो ब्रह्मा बाप का भी विशेष प्यार देखा। सभी महारथियों का भी पंजाब में पांव पड़ा है। कोई ऐसी नवीनता करके दिखाओ। कर सकते हैं। पंजाब की पांच नदियां मशहूर हैं। बापदादा तो देख रहे हैं कि अच्छे ब्रह्मा बाप की पालना वाले भी हैं। तो पालना का रिटर्न तो देना पड़ेगा ना। अच्छा है बापदादा की बहुत बढ़िया उम्मींद है पंजाब में। करेंगे ना! कोई ऐसा कार्य करके दिखाओ जो सबकी नज़र बाप की तरफ पड़ जाए। है पाण्डवों में हिम्मत है? पाण्डव हिम्मत वाले हैं? अच्छा है, माताओं की संख्या भी काफी है, टीचर्स भी बहुत हैं। अच्छा - प्लैन बनाना आपस में। पाण्डव प्लैन बनाना। कमाल का प्लैन बनाना। अच्छा।


31-12-07   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


             ``नये वर्ष को समाप्ति वर्ष, श्रेष्ठ वर्ष और दुनिया को जगाने का वर्ष, इस रूप में मनाओ''

ओम् शान्ति। सभी जो भी बैठे हैं, एक ही परिवार है। ऐसा परिवार कभी सुना था, देखा था! नहीं। ऐसा अलौकिक परिवार अभी ही देखा और अभी सब भविष्य के लिए तैयार हो रहे हैं। तो सभी नया वर्ष, नया साल मनायेंगे, अभी अपनी वह नई दुनिया आ रही है, कितना बढ़िया है, आप सब भी भविष्य परिवार के पात्र तैयार दिखाई दे रहे हैं। तो सभी को नये वर्ष की मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।

नये वर्ष में नया तो कुछ दिखाना ही है लेकिन ऐसा दिखायें जो जन्म-जन्म उसकी प्रालब्ध हमारे साथ हो।
(निर्वैर भाई और बृजमोहन भाई ने बापदादा से नये वर्ष के लिए विशेष प्रेरणायें पूछी, जैसे - नये वर्ष को क्या नाम दें, क्या विशेष अटेन्शन रखें, इसमें क्या पुरूषार्थ करें?)

नये वर्ष को समाप्ति वर्ष, श्रेष्ठ वर्ष और दुनिया को जगाने का वर्ष मानें और देखें कि कैसे यह वर्ष भी कमाल दिखाता है।
जो भी सभी ब्राह्मण हैं वह सब उमंग में हैं कि आगे क्या होगा, जानते भी हैं कि क्या होगा! अभी तो नई दुनिया का सभी स्वप्न देख रहे हैं कि अभी नया वर्ष, नई रीति, नई प्रीत सब नया नया बदल रहा है। जैसे युग बदल रहा है, वैसे युग के साथ सब रीति-रिवाज, कायदे सब उसी प्रमाण चलने हैं। तो आज अपने नये संसार में जाने के लिए यही संकल्प करना है कि हमें पास तो होना ही है। दो पास, एक पास, पास (समीप) जाने की और दूसरी पास इम्तहान पास करने की, वह भी पास मिलनी ही है। पास तो आपको मिलेगी ही लेकिन पास के साथ यही बाबा चाहते हैं कि हर एक बच्चा अपने को किसी भी रीति से पास जरूर करे। यह समय ही पास करने का है, इसके लिए अभी अपने आपको चेक करो और भविष्य के ऊपर अटेन्शन दो, पास करना अर्थात् सब कुछ होते हुए भी जो भविष्य है उसको पास करने के लिए इतना पुरूषार्थ करे जो यही भविष्य हमारे साथ रहे और सबके मुख से यही निकले - पास पास पास। सभी की शक्लें बता रही हैं कि सभी ने अभी तक जो पुरूषार्थ किया है, पीछे किया है वा नहीं किया है वह बात और है लेकिन अभी इस समय फुल पास की एम रखी है और ब्राह्मण ही पास होंगे। ब्राह्मण हैं, तो ब्राह्मणों को पहली पहली सौगात यही है। और सारी सभा के अन्दर यही उमंग है तो अब जल्दी-जल्दी हम पास हो जायें तो कितनी सबको खुशी होगी। सभी खुश हैं अभी हम परिवर्तन होने वाले हैं।

(नये वर्ष के लिए देश विदेश के भाई बहिनों के लिए बाबा आपकी क्या प्रेरणा है, सब सुनना चाहते हैं)
सभी अपने को क्या समझते हैं! समझते हैं कि हमारा अधिकार तो है ही है कि समझते हैं पता नहीं क्या होगा, कैसा होगा! इसके विचार भले चलें लेकिन ठहर नहीं जायें। यह ठहरना अच्छा नहीं है। अभी तो हमको राज्यभाग्य लेना है। पहले अपने ऊपर राज्य, दूसरों पर तो रहता ही है, यह तो प्रसिद्ध हो रहे हैं कि स्व का राज्य बहुत बड़ा है और सब प्रश>> इसी विषय पर हैं या दूसरी कोई विषय सामने है? जैसे अभी का राज्य है, वैसे अभी इससे भी मजबूत राज्य आपका आ रहा है। हर एक उस भविष्य को देख खुश हो रहा है और आगे की प्रेरणा ले रहा है। बापदादा भी बच्चों को देख खुश है और समझते हैं कि बहुत कुछ मिल गया है और मिलना ही है।

सेवा का टर्न महाराष्ट्र, मुम्बई, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना का है, 15 हजार सेवाधारी आये हैं, टोटल 25 हजार हैं, 600 डबल विदेशी भाई बहिनें हैं:-
सब उमंग-उत्साह में हैं। बापदादा भी बच्चों को देख खुश है तो हर एक बच्चा पुरूषार्थ कर अपना या बाप का नाम प्रसिद्ध कर रहे हैं।
आज बाप देख रहा था कि कौन, कौन कहाँ तक पहुंचें हैं! पहुंचें हैं, पुरूषार्थ अच्छा किया है। आगे विजय भी है। बाबा ने देखा कि सबने जो लक्ष्य रखा है वह प्रैक्टिकल में करके दिखायेंगे। यही सबमें उमंग है। इसी उमंग से यह ग्रुप
आगे बढ़ता जाता है। हर एक बच्चे की विजय निश्चित है। विजय तो है लेकिन यह विजय अपने में आत्म विश्वास और परिवार में निश्चय को बढ़ा देती है। यही दोनों बातें अपने राज्य में काम में आयेंगी।

(संस्कार मिलन के लिए बहुत पुरूषार्थ करते हैं, फिर भी अभी सफल नहीं हैं, वह सफलता कैसे होगी, बुद्धि को बेहद में कैसे ले जायें, जो इन सब बातों से ऊपर चले जायें)
सभी के पास लक्ष्य है, प्लैन है, अभी उस प्लैन के ऊपर अटेन्शन थोड़ा ज्यादा रहे, और सबको उसकी भासना आवे। भासना आने के लिए थोड़ा सा अटेन्शन इसमें देवें कि हमारे अन्दर जो परिवार का प्यार है, परिवार का प्यार संगम पर ही ज्यादा अनुभव कर सकते हैं। फिर तो नेचरल हो जायेगा।

लक्ष्य यही रखें कि होना ही है। सभी यही सोच रहे हैं कि यह इस बात पर क्यों सोच रहे हैं। हमारी पढ़ाई ठीक है और पढ़ने वाले भी ठीक हैं तो फिर यह क्वेश्चन तो है ही नहीं। अभी यही लक्ष्य रखो कि हम बनने ही हैं। उसमें आपका पार्ट सिर्फ सहयोगी बनने का नहीं है लेकिन खुद अपने को लायक बनाना है। अटेन्शन अपने ऊपर देना, यह जरूरी है। और बाबा ने देखा कि सबको इसका बहुत ख्याल है कि बनना ही है। बन रहे हैं, पुरूषार्थ अनुसार नम्बर लेंगे लेकिन पहले यह ध्यान रखो। जैसे बाबा पूछते हैं वैसे आप भी आपस में रूहरिहान करके जो राजधानी की सीट है वह अवश्य लेंगे। तो अभी यह संकल्प रखो कि अब राजधानी में क्या सीट लेनी है!

(बृजमोहन भाई को देखकर बाबा बोले)
अभी दिल्ली की राजधानी में बैठे तो हैं लेकिन अभी दिल्ली राजधानी के साथ भविष्य की राजधानी भी ध्यान पर रखनी है। (बाबा इसमें बहिनें नम्बर आगे ले लेती हैं) हमेशा ही देखा गया है जब रेस होती है ना तब मातायें, कन्यायें यह नम्बर ले लेती हैं। जब फाइनल होता है तो यही रिजल्ट निकलती है लेकिन आपके पास भी लक्ष्य है कि हमको नम्बर लेना है और पास होना है। तो बापदादा आौर ड्रामा दोनों तरफ ध्यान रखता है।

(फालो फादर कैसे करें) फालो फादर का अगर अटेन्शन है तो फिर प्रैक्टिकल लाइफ में सब प्रैक्टिकल दिखाई देना
चाहिए। तो जैसे बाप अभी चाहता है वैसा ही हो रहा है, टाइम पर सब ठीक हो जाता है लेकिन सदा ही यह बात हो। वह भी हो रही है और होगी ही इसलिए यह भी फिक्र नहीं है। सभी पुरूषार्थ कर रहे हैं और अभी सभी की बुद्धि में यही है कि हम नम्बर जरूर लेंगे। हो जायेंगे। तैयारी हो गई है। यह तो हुआ ही पड़ा है बाकी सिर्फ बीच-बीच में थोड़ा सा रूप बदलता है, तो उस बदलते हुए रूप से किसी न किसी रीति से कोई बात होती है, फिर ठीक हो जाती है इसलिए बापदादा भी इतना नहीं कह सकता है क्योंकि पुरूषार्थ का स्वरूप दिखाई दे रहा है। ऐसा नहीं है कि नहीं दिखाई देता है। देता है लेकिन सदा नहीं दिखाई देता। कभी कैसे, कभी कैसे। अभी इसको स्थिर करो और सब जोश दिखाओ कि हम सब तैयार हैं पेपर देने के लिए। सभी पेपर देने के लिए तैयार हैं, सभी से पूछो? पेपर देने के लिए तैयार हैं और उम्मींद है तो प्राप्ति भी इतनी है। वह नशा सदा नहीं रहता है, बीच-बीच में थोड़ा टाइम रहता है क्योंकि पुरूषार्थ करते हैं लेकिन यह नशा सदा रहे, इसका अभी अभ्यास चाहिए। अटेन्शन थोड़ा देना पड़ेगा। पढ़ाई है ना। पढ़ाई में अटेन्शन दिया जाता है। तो सभी को नये साल की मुबारक भी हो और इस नये साल में कदम आगे बढ़ाने का वरदान है।

अपने को बाप समान भरपूर और सदा तैयार रखना। जो भी समय है उस समय में अपने को ऐसे ही तैयार करें जैसे बाप चाहते हैं, जैसे बाप सर्वगुण सम्पन्न है, ताज, तख्तधारी है, ऐसे यह विशेषतायें हर एक बच्चा अपने में अनुभव करे। अभी भी समय है, जो कुछ रहा हुआ है वह सब अपने में धारण करके, धारणा रूप का साक्षात्कार कराओ। अभी क्या करें, कैसे होगा... नहीं। इसका क्वेश्चन पूछने की बात ही नहीं है। अभी बाप ने सबको हिम्मत दी है, उमंग दिया है तो उसी हिम्मत और उमंग इन दोनों को साथ लेकर सभी जल्दी-जल्दी आगे बढ़ो। अच्छा।


ओम् शान्ति 18-1-18 मधुबन


प्राणेश्वर अव्यक्तमूर्त मात-पिता बापदादा के अति स्नेही, सदा अव्यक्त वतन की सैर करने वाले, अपनी अव्यक्त स्थिति द्वारा अव्यक्त वतन को साकार वतन में उतारने वाले, सर्व फरिश्ता स्वरूप निमित्त टीचर्स बहिनें तथा ब्रह्मण कुल भूषण भाई बहिनें,

ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - इस जनवरी मास में आप सभी ने अन्तर्मुखी बन विशेष योग तपस्या की है। चारों ओर अखण्ड योग के कार्यक्रम चले हैं। बहुत से भाई बहिनों ने मौन में रहकर अव्यक्त वतन के बहुत सुन्दर अनुभव भी किये हैं। आप सबकी तपस्या के सूक्ष्म शक्तिशाली वायब्रेशन पहुंचते रहते हैं। मधुबन में भी योग के बहुत सुन्दर कार्यक्रम चल रहे हैं। हर वर्ष की भांति प्यारे साकार ब्रह्मा बाप का यह 49 वां स्मृति दिवस सभी भाई बहिनों ने बहुत स्नेह और श्रद्धा के साथ मनाया। जैसे मधुबन के चारों धामों का बहुत सुन्दर श्रृंगार कलकत्ता के भाई बहिनें फूल मालाओंसे करते हैं, ऐसे ही पूरी रात जागकरके चारों धामों का श्रंृगार किया। इन सुगन्धित वैरायटी फूलों से पूरा ही मधुबन महक उठता है। बाबा के स्नेही बच्चे अमृतवेले से ही चारों धामों की सैर करते अव्यक्त मिलन मनाते, मीठे बाबा से बहुत मीठी मीठी रूहरिहान करने पहुंच जाते हैं। इस बार गुजरात और भोपाल के भाई बहिनों की सेवा का टर्न है, इसके अलावा देश विदेश से नये पुराने अनेकानेक बच्चे भी मधुबन वरदान भूमि में अव्यक्त दिवस पर वरदानों से अपनी झोली भरने के लिए पहुंचे हुए हैं। शान्तिवन में तो करीब 25 हजार सफेद पोशाकधारी भाई बहिनों की सभा है। उसमें से कुछ भाई बहिनें सवेरे-सवेरे पाण्डव भवन पहुंच कर चारों धामों की परिक्रमा करते रहे।
शान्तिवन में दादी जानकी जी ने तथा मधुबन में दादी रतनमोहिनी जी ने प्यारे बापदादा के गहरे शिक्षाप्रद साकार वा अव्यक्त मधुर महावाक्य सुनाये, वे महावाक्य तो आप सबने भी सुने होंगे। फिर प्यारे बापदादा को भोग स्वीकार कराया गया। बापदादा भी बच्चों को स्नेह के रेसपान्ड में सदा सम्पन्न और समान भव का वरदान देते हैं। भोग के पश्चात सभी वरिष्ठ भाई बहिनें ओम् शान्ति भवन में बाबा के कमरे में गये। फिर विशाल जनसमूह स्नेह के सागर में समाया हुआ शान्तिस्तम्भ पर पहुंचा और मधुर यादों के गीत के साथ सभी ने अपने स्नेह सुमन अर्पित किये। तत्पश्चात बाबा के कमरे में तथा कुटिया में भी सभी नम्बरवार जाते अव्यक्त मिलन मनाते रहे। दादी जानकी जी भी शान्तिवन से पाण्डव भवन पहुंच गई। सभी को नज़र से निहाल करते आपने भी चारों धामों की सैर की। फिर सभी दादियां व मुख्य भाई ज्ञान सरोवर में बाबा के कमरे में होते हुए शान्तिवन में पहुंचे और दोपहर में बापदादा को भोग लगाया गया। फिर सभी ने संगठित रूप में ब्रह्माभोजन स्वीकार किया। शाम के समय सभी अन्त:वाहक शरीर द्वारा सूक्ष्मलोक की सैर करने निमित्त डायमण्ड हाल में उपस्थित हुए। क्लास एवं योग के पश्चात सभी ने वीडियो द्वारा बापदादा से सम्मुख मिलन की अनुभूति की।
आप सबको ज्ञात ही है कि हम सबकी अति स्नेही, बापदादा को अपने नयनों में सदा बसाने वाली, साकार में प्रभु मिलन कराने निमित्त बनी हुई हम सबकी आदरणीय दादी गुल्जार जी इस समय मुम्बई में स्वास्थ्य लाभ ले रही हैं। उन्होंने भी सबको बहुत-बहुत स्नेह भरी याद भेजी है। अव्यक्त महावाक्य सुनने के पश्चात प्यारे बापदादा का भोग विशेष टोली सभी को मिली तथा बड़ी दादियों, वरिष्ठ भाई बहिनों ने स्मृति दिवस निमित्त अपने अनुभव सुनाये।
भ्राता निर्वैर जी ने विशेष स्मृति दिवस निमित्त अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि आज के विशेष दिन पर सभी भाई बहनें बाबा के स्नेह में, जैसेकि सागर में समाये हुए रहे। देखो, आज सभा में 20-25 हजार भाई बहिनें बैठे हैं लेकिन कितनी साइलेन्स से सभी ने बाबा के महावाक्य सुने। यह बाबा के प्यार की शक्ति है, जो इतने भाई बहिनें होते भी जरा भी आवाज नहीं है। तो आज के दिन खास बाबा ने जो लक्ष्य दिया है कि एकरस अवस्था बनानी है। इसके लिए हम निरन्तर दिल से बाबा के स्नेह में डूबे रहें तो बाप समान बनते जायेंगे। जैसे ब्रह्मा बाबा और शिवबाबा में अन्तर खत्म हो गया, इसी तरह हम भी अपने पुरुषार्थ से ऐसी स्थिति तक पहुंचे। जिसको बाबा वरदान रूप में कहते ''बाप समान भव''।
बृजमोहन भाई ने कहा कि आज बाबा ने मेहनत का रास्ता छोड़कर मुहब्बत का रास्ता लेने को याद कराया है। हम देखते हैं जब हमारा मन मुहब्बत में होता है तो समय का पता नहीं लगता है। तो सबसे सहज साधन यही है कि प्यारे बाबा के साथ किसी न किसी समय जो स्नेह की अनुभूति हुई है उसी स्नेह की अनुभूति को याद करें। साकार बाबा की श्रेष्ठ स्मृतियां हमारे साथ हैं। यह स्नेह ऐसी शक्ति है जिसमें मन अगर एक बार लग जाए तो हटाना ही मुश्किल हो जाता है। यह स्नेह की शक्ति संगमयुग पर भी होती तो सतयुग में भी होती। सतयुग में और सब शक्तियां गुणों में बदल जाती है लेकिन प्यार का गुण इमर्ज रहता है। तो जैसे हमारा प्रसिद्ध गीत है बचपन के दिन भुला न देना। ऐसे वह स्नेह के अनुभव की प्यारी सी घड़ी हम याद कर लेते हैं तो हमारा योग आटोमेटिक लगा रहता है।
फिर दादी जानकी जी ने तीन बारी औम शान्ति का महामन्त्र उच्चारण करते हुए कहा कि वन्डरफुल बाबा, वन्डरफुल बाबा के बच्चे। मेरी यही भावना है कि हर बाबा का बच्चा अनुभव करे कि मैं कौन! मेरा कौन! मैं और मेरा, मैने तो जिस दिन साकार बाबा को देखा, पक्का हो गया यही मेरा बाबा है। वाह बाबा वाह! व्हाई शब्द है ही नहीं। वाह मीठा बाबा वाह! बाबा ने हमको मीठा बनाने के लिए कितना प्यार दिया है। कोई घड़ी हमने न दु:ख दिया है, न लिया है। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी है, हिम्मते बच्चे मददे बाप। नियत साफ है तो मुराद साकार हो जाती है। तन मन धन तो सफल हो ही गये। मन वचन कर्म से सेवा करने का भाग्य मिला है। बाबा ने अपना बनाकर मुस्कराना सिखा दिया है इसलिए कोई भी बात मुश्किल नहीं है। बाबा ने सच्चाई, स्नेह ऐसा दिया, पहले अपनी गोद बिठाया, फिर गले लगाया, अभी पलकों में बिठाकर साथ लेकर जा रहा है। तो श्वांसों श्वांस परमात्मा बाप की याद दिल में, मन में, बुद्धि में है, इसलिए संकल्प समय श्वांस सफल हो रहा है। बाबा कहते हैं बच्चे जीते रहो, जागते रहो, जगाते रहो।
फिर दादी रतनमोहिनी जी ने भी स्मृति दिवस निमित्त वरदानी महावाक्य उच्चारण करते हुए कहा कि बाबा ने हमें नया संसार बनाने के निमित्त बनाया है, उसके लिए हम अपने में नये संस्कार जागृत कर लें। आज हम सबने जो महावाक्य सुने हैं, उन महावाक्यों को बार-बार स्मृति में रखते हुए स्वयं का स्वरूप ऐसा ही अनुभव करते रहें। जैसे अभी सभी बड़ी शान्ति और प्रेम से बैठे हैं ऐसे सदा ही ऐसा अनुभव करते और कराते रहना।
फिर मधुरवाणी ग्रुप ने बाबा की स्मृतियों का बहुत प्यारा गीत गाया। इस प्रकार यह स्मृति सो समर्थी दिवस अनेक वरदानों से भरपूर करते सम्पन्न हुआ। अच्छा। सभी को याद.. ओम् शान्ति।
18-1-18 - बापदादा के अवतरण दिवस पर वीडियो द्वारा सुनाये गये अव्यक्त महावाक्य (रिवाइज- 18-01-08)
आज बापदादा अपने चारों ओर के बेफिक्र बादशाहों के संगठन को देख रहे हैं। इतनी बड़ी बादशाहों की सभा सारे कल्प में इस संगम के समय होती है। स्वर्ग में भी इतनी बड़ी सभा बादशाहों की नहीं होगी। लेकिन अब बापदादा सर्व बादशाहों की सभा को देख हर्षित हो रहे हैं। दूर वाले भी दिल के नजदीक दिखाई दे रहे हैं। आप सब नयनों में समाये हुए हो, वह दिल में समाये हुए हैं। कितनी सुन्दर सभा है, आज के विशेष दिवस पर सभी के चेहरों पर अव्यक्त स्थिति के स्मृति की झलक दिखाई दे रही है। सबके दिल में ब्रह्मा बाप की स्मृति समाई हुई है। आदि देव ब्रह्मा बाप और शिव बाप दोनों ही सर्व बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं।
आज तो सवेरे दो बजे से लेकर बापदादा के गले में भिन्न-भिन्न प्रकार की मालायें पड़ी हुई थी। यह फूलों की मालायें तो कामन हैं। हीरों की मालायें भी कोई बड़ी बात नहीं हैं लेकिन स्नेह के अमूल्य मोतियों की माला अति श्रेष्ठ है। हर एक बच्चे के दिल में आज के दिन स्नेह विशेष इमर्ज रहा। बापदादा के पास चार प्रकार की भिन्न-भिन्न मालायें इमर्ज थी। पहला नम्बर श्रेष्ठ बच्चों की जो बाप समान बनने के श्रेष्ठ पुरुषार्थी बच्चे हैं, ऐसे बच्चे माला के रूप में बाप के गले में पिरोये हुए थे। पहली माला सबसे छोटी थी। दूसरी माला - दिल के स्नेह समीप समान बनने के पुरुषार्थी बच्चों की माला, वह श्रेष्ठ पुरुषार्थी यह पुरुषार्थी। तीसरी माला थी - जो बड़ी थी वह थी - स्नेही भी, बाप की सेवा में साथी भी लेकिन कभी तीव्र पुरुषार्थी और कभी, कभी-कभी तूफानों का सामना ज्यादा करने वाले। लेकिन चाहने वाले, सम्पन्न बनने की चाहना भी अच्छी रहती है। चौथी माला थी उल्हनें वालों की। भिन्न-भिन्न प्रकार के बच्चों की अव्यक्त फरिश्ते फेस के रूप में मालायें थी। बापदादा भी भिन्न-भिन्न मालाओंको देख खुश भी हो रहे थे और स्नेह और सकाश साथ-साथ दे रहे थे। अभी आप सब अपने आपको सोचो मैं कौन? लेकिन चारों ओर के बच्चों में विशेष संकल्प वर्तमान समय दिल में इमर्ज है कि अब कुछ करना ही है। यह उमंग-उत्साह मैजारिटी में संकल्प रूप में है। स्वरूप में नम्बरवार है लेकिन संकल्प में है।
बापदादा सभी बच्चों को आज के स्नेह के दिन, स्मृति के दिन, समर्थी के दिन की विशेष दिल की दुआयें और दिल की बधाईयां दे रहे हैं। आज का विशेष दिन स्नेह का होने कारण मैजारिटी स्नेह में खोये हुए हैं। ऐसे ही पुरुषार्थ में सदा स्नेह में खोये हुए रहो। लवलीन रहो तो सहज साधन है स्नेह, दिल का स्नेह। बाप के परिचय की स्मृति सहित स्नेह। बाप की प्राप्तियों के स्नेह सम्पन्न स्नेह। स्नेह बहुत सहज साधन है क्योंकि स्नेही आत्मा मेहनत से बच जाती है। स्नेह में लीन होने के कारण, स्नेह में खोये हुए होने के कारण किसी भी प्रकार की मेहनत मनोरंजन के रूप में अनुभव होगी। स्नेही स्वत: ही देह के भान, देह के सम्बन्ध का ध्यान, देह की दुनिया के ध्यान से ऊपर स्नेह में स्वत: ही लीन रहते। दिल का स्नेह बाप के समीप का, साथ का, समानता का अनुभव कराता है। स्नेही सदा अपने को बाप की दुआओंके पात्र समझते हैं। स्नेह असम्भव को भी सहज सम्भव कर देता है। सदा अपने मस्तक पर, माथे पर बाप के सहयोग का, स्नेह का हाथ अनुभव करते हैं। निश्चयबुद्धि, निश्चिंत रहते हैं। आप सभी आदि स्थापना के बच्चों को आदि के समय का अनुभव है, अभी भी सेवा के आदि निमित्त बच्चों को Dानुभव है कि आदि में सभी बच्चों को बाप मिला, उस स्मृति से स्नेह का नशा कितना था! नौलेज तो पीछे मिली लेकिन पहला-पहला नशा स्नेह में खोये हुए हैं। बाप स्नेह का सागर है तो मैजारिटी बच्चे आदि से स्नेह के सागर में खोये हुए हैं, पुरुषार्थ की रफ्लातार में बहुत अच्छे स्पीड से चले हैं। लेकिन कोई बच्चे स्नेह के सागर में खो जाते हैं, कोई सिर्फ डुबकी लगाके बाहर आ जाते हैं। इसीलिए जितना खोये हुए बच्चों को मेहनत कम लगती उतनी उन्हों को नहीं। कभी मेहनत, कभी मुहब्बत, दोनों में रहते हैं। लेकिन जो स्नेह में लवलीन रहते हैं वह सदा अपने को छत्रछाया के अन्दर रहने का अनुभव करतेहैं। दिल के स्नेही बच्चे मेहनत को भी मुहब्बत में बदल लेते हैं। उन्हों के आगे पहाड़ जैसी समस्या भी पहाड़ नहीं लेकिन रूई समान अनुभव होती है। पत्थर भी पानी समान अनुभव होता है। तो जैसे आज विशेष स्नेह के वायुमण्डल में रहे तो अनुभव किया मेहनत है या मनोरंजन हुआ!
आज तो स्नेह का सबको अनुभव हुआ ना! स्नेह में खोये हुए थे? खोये हुए थे सभी! आज मेहनत का अनुभव हुआ? किसी भी बात की मेहनत का अनुभव हुआ? क्या, क्यों, कैसे का संकल्प आया? स्नेह सब भुला देता है। तो बापदादा कहते हैं कि बाप के इस स्नेह को भूलो नहीं। स्नेह का सागर मिला है, खूब लहराओ। जब भी कोई मेहनत का अनुभव हो ना, क्योंकि माया बीच-बीच में पेपर तो लेती है, लेकिन उस समय स्नेह के अनुभव को याद करो। तो मेहनत मुहब्बत में बदल जायेगी। अनुभव करके देखो। क्या है, गलती क्या हो जाती है! उस समय क्या, क्यों.. इसमें बहुत चले जाते हो। जो आया है वह जाता भी है लेकिन जायेगा कैसे? स्नेह को याद करने से मेहनत चली जायेगी क्योंकि सभी को भिन्न-भिन्न समय पर बापदादा दोनों के स्नेह का अनुभव तो है। है ना अनुभव! कभी तो किया है ना, चलो सदा नहीं है कभी तो है। उस समय को याद करो - बाप का स्नेह क्या है! बाप के स्नेह से क्याक्या अनुभव किया! तो स्नेह की स्मृति से मेहनत बदल जायेगी क्योंकि बापदादा को किसी भी बच्चे की मेहनत की स्थिति अच्छी नहीं लगती। मेरे बच्चे और मेहनत! तो मेहनत मुक्त कब बनेंगे? यह संगमयुग ही है जिसमें मेहनत मुक्त, मौज़ ही मौज़ में रह सकते हैं। मौज नहीं है तो कोई न कोई बोझ बुद्धि में है, बाप ने कहा है बोझ मुझे दे दो। मैंपन को भूल ट्रस्टी बन जाओ। जिम्मेवारी बाप को दे दो और स्वयं दिल के सच्चे बच्चे बन खाओ, खेलो और मौज करो क्योंकि यह संगमयुग सभी युग में से मौज़ों का युग है। इस मौजों के युग में भी मौज नहीं मनायेंगे तो कब मनायेंगे? बापदादा जब देखते हैं ना कि बच्चे बोझ उठाके बहुत मेहनत कर रहे हैं। दे नहीं देते, खुद ही उठा लेते। तो बाप को तो तरस पड़ेगा ना, रहम आयेगा ना। मौजों के समय मेहनत! स्नेह में खो जाओ, स्नेह के समय को याद करो। हर एक को कोई न कोई समय विशेष स्नेह की अनुभूति होती ही है, हुई है। बाप जानता है हुई है लेकिन याद नहीं करते हो। मेहनत को ही देखते रहते, उलझते रहते। अगर आज भी अमृतवेले से अब तक बापदादा दोनों अथॉरिटी के स्नेह का दिल से अनुभव किया होगा तो आज के दिन को भी याद करने से स्नेह के आगे मेहनत समाप्त हो जायेगी।
अभी बापदादा इस वर्ष में हर बच्चे को स्नेह युक्त, मेहनत मुक्त देखने चाहते हैं। मेहनत का नामनिशान दिल में नहीं रहे, जीवन में नहीं रहे। हो सकता है? हो सकता है? जो समझते हैं करके ही छोड़ना है, हिम्मत वाले हैं वो हाथ उठाओ। आज विशेष ऐसे हर बच्चे को बाप का विशेष वरदान है - मेहनत मुक्त होने का। स्वीकार है? फिर कुछ हो जाए तो क्या करेंगे? क्या, क्यों तो नहीं करेंगे ना? मुहब्बत के समय को याद करना। अनुभव को याद करना और अनुभव में खो जाना।
अभी समय की समीपता को देख रहे हो। जैसे समय की समीपता हो रही है ऐसे आप सबका भी बाप के साथ समीपता का अनुभव बढ़ना चाहिए ना। बाप से आपकी समीपता समय की समीपता को समाप्त करेगी। क्या आप सभी बच्चों को आत्माओं के दु:ख अशान्ति का आवाज कानों में नहीं सुनाई देता! आप ही पूर्वज भी हो, पूज्य भी हो। तो हे पूर्वज आत्मायें, हे पूज्य आत्मायें, कब विश्व कल्याण का कार्य सम्पन्न करेंगे?
बापदादा के पास समाचार बहुत अच्छे अच्छे आते हैं। संकल्प तक बहुत अच्छे हैं। स्वरूप में आने में यथाशक्ति हो जाते हैं। अभी दो मिनट के लिए सभी परमात्म स्नेह, संगमयुग के आत्मिक मौज की स्थिति में स्थित हो जाओ। (ड्रिल) अच्छा - यही अनुभव हर दिन बार-बार समय प्रति समय अनुभव करते रहना। स्नेह को नहीं छोड़ना। स्नेह में खो जाना सीखो। अच्छा।

 

ओम् शान्ति 12-2-18 मधुबन


82वीं त्रिमूर्ति शिव जयन्ती की हार्दिक शुभ बधाईयां प्राणेश्वर अव्यक्त बापदादा के अति लाडले, सदा अपनी प्राप्ति सम्पन्न श्रेष्ठ जीवन द्वारा परमात्म प्रत्यक्षता के निमित्त बने हुए विश्व कल्याणकारी, बेहद सेवाधारी निमित्त टीचर्स बहिनें, देश विदेश के सभी सर्वोत्तम ब्रह्मण कुल भूषण भाई बहिनें,

ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद के साथ, 82 वीं त्रिमूर्ति शिव जयन्ती की बहुत-बहुत हार्दिक बधाईयां स्वीकार हों।
प्राणों से प्यारे हम सबको जीयदान देने वाले स्वयंभू निराकार परमपिता परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का यह यादगार पर्व सभी ब्रह्मा वत्स बड़े उमंग-उत्साह के साथ खूब धूमधाम से मनाते हैं। यह बाप और बच्चों का अलौकिक दिव्य जन्म अनेक उत्साह भरे उत्सवों को साथ-साथ लेकर आता है। हर वर्ष हम सभी इस पावन पर्व पर अनेक नवीनता सम्पन्न सेवाओंके कार्यक्रम ''महाशिवरात्रि मेला, प्रभात फेरियां, सर्व धर्म सम्मेलन, प्रदर्शनियां'' आदि आयोजित कर परमात्म अवतरण का दिव्य सन्देश देते हैं। इस वर्ष भी देश विदेश के कोने-कोने में बहुत-बहुत हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मना रहे हैं। सभी स्थानों पर शिवबाबा का ध्वज फहराते, प्रतिज्ञायें करते सभी जन्म दिन की खुशियां मनाते हैं।
मधुबन महायज्ञ में भी यह त्योहार पूरा सप्ताह चलता है। इस वर्ष की विशेष नवीनता शान्तिवन के प्रांगण में बहुत सुन्दर भव्य ''महाशिवरात्रि मेला'' एक सप्ताह के लिए लगाया गया है। 11 फरवरी को इस मेले का विधिवत उद्घाटन दादियों वा वरिष्ठ भाई बहिनों के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। इस बार इस मेले में 12 ज्योर्तिलिंग दर्शन के साथ विशाल अमरनाथ गुफा में बर्फीले बाबा के दर्शन, योग कक्ष, तपस्वी रूप में विराजमान शिवशक्तियां एवं पाण्डवों का अद्भुत दृश्य अवलोकन करने के लिए आबू तथा उसके आस-पास के गांवों से हजारों भाई बहिनें पहुंच रहे हैं।
आज 12 फरवरी को प्यारे शिवबाबा के अवतरण का दिन है। सभी अमृतवेले से ही बाबा के प्यार में समाये हुए अपनी अव्यक्त स्थिति द्वारा अव्यक्त मिलन की अनुभूतियां कर रहे हैं। शाम के समय विधिवत योग अभ्यास तथा अव्यक्त मिलन की विधियों पर क्लास के पश्चात वीडियो द्वारा शिव जयन्ती के बहुत शिक्षाप्रद प्रेरणादाई महावाक्य सभी ने सुने। (वह महावाक्य आपके पास भेज रहे हैं) प्यारे बाबा को भोग भी लगाया गया। भोग के साथ दादियों एवं वरिष्ठ भाई बहनों ने डायमण्ड हाल की स्टेज पर शिवबाबा का ध्वज फहराया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम नेपाल के भाई बहिनों की सेवा का टर्न है। इनके साथ देश विदेश से पधारे हुए 21 हजार से भी अधिक भाई बहिनें डायमण्ड हाल में उपस्थित हैं।
हम सबकी अति स्नेही, सदा अपने नयनों में बापदादा को बसाने वाली, साकार मिलन की अनुभूति कराने वाली हमारी मीठी दादी गुल्जार जी तबियत के कारण मुम्बई में अपने हॉस्पिटल में हैं, डाक्टर्स ने उन्हें अभी मधुबन आने की छुट्टी नहीं दी है। आप सबकी स्नेह भरी सकाश उन्हें पहुंचती रहती है। दादी जी जल्द ही स्वस्थ होकर हम सबके बीच पहुंच जायेंगी। इस टर्न में तो सभी ने विशेष अव्यक्त स्थिति द्वारा अव्यक्त मिलन के बहुत अच्छे अनुभव किये है। प्राणप्यारे अव्यक्त बापदादा अपने स्नेही बच्चों को अव्यक्त-वतन से ही विशेष शक्तियों/वरदानों की सकाश देकर सन्तुष्ट कर रहे हैं। झण्डारोहण के पश्चात, केक कटिंग एवं मधुर गीत के साथ हमारी वरिष्ठ दादियों व भाईयों ने सभी को शिवजयन्ती के महान पर्व की खूब-खूब बधाईयां दी।
दादी जानकी जी ने सबको बधाई दी:- ओम् शान्ति। साकार के बाद अव्यक्त बापदादा ने गुल्जार दादी जी के द्वारा कितनी पालना दी है। अभी ड्रामा की नाॅलेज बहुत शान्त बना देती है, इससे शान्ति प्रेम मधुरता सब गुण सहज आ जाते हैं। अभी कलियुग की रात पूरी हो रही है, सतयुगी दिन आ रहा है। उसके पहले शान्तिधाम में जाकर हम बैठ नहीं जायेंगे, जल्दी स्वर्ग में आ जायेंगे। साक्षी होकर ड्रामा को देखो, बाबा हमारे साथ है। सारे क्लास को देख बहुत-बहुत खुशी हो रही है। सबको आज के शुभ दिन की, शिव जयन्ती की बहुत-बहुत बधाई।
12-2-18 - शिवरात्रि के टर्न में वीडियो द्वारा सुनाये गये अव्यक्त महावाक्य रिवाइज - 22-02-09
आज जीरो बाप अपने हीरो बच्चों से मिलने आये हैं। आज का दिन आप सभी भी बाप का और बाप के साथ अपना भी बर्थ डे मनाने आये हैं। तो बापदादा सर्व बच्चों को चाहे सम्मुख बैठे हैं, चाहे दूर बैठे दिल के नजदीक बैठे हैं, चारों ओर के बच्चों को सर्व सम्बन्ध से मुबारक दे रहे हैं। उसमें भी विशेष तीन मुबारक बाप, शिक्षक और सतगुरू के रूप की तीन बधाईयां पालना, पढ़ाई और वरदानों की चारों ओर के बच्चों को विशेष दे रहे हैं। सभी बच्चों को मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। आज इस विशेष जन्म को भक्त भी मनाते हैं लेकिन आप बच्चे जानते हो कि यह बर्थ डे बाप और बच्चों के अविनाशी स्नेह का जन्म दिन है। आदि से लेके बाप और बच्चे साथ हैं, साथ में विश्व परिवर्तन के कार्य में भी बाप बच्चों के साथ है, क्योंकि बाप और बच्चों का बहुत-बहुत स्नेह है। अभी भी साथ हैं और अपने घर जाना है तो भी साथ जाना है। बाप बच्चों के सिवाए नहीं जा सकता और बच्चे बाप के सिवाए नहीं जा सकते क्योंकि दिल के स्नेह का साथ है। घर के बाद ज्ाब राज्य में आयेंगे तो भी ब्रह्मा बाप के साथ-साथ राज्य करेंगे। तो सर्व जन्मों से यह जन्म सबसे प्यारा और न्यारा है। इस जन्म की जो वैल्यु है वह सारे कल्प में 84 जन्म में नहीं है, ऐसा स्नेही और साथ वाला विशेष यह हीरे तुल्य जन्म है। तो आप सभी अपना जन्म दिन मनाने आये हो या बाप का मनाने आये हो! कि बाप बच्चों का मनाने आये हैं और बच्चे बाप का मनाने आये हैं? चारों ओर भक्त भी शिव जयन्ती वा शिवरात्रि कहके मनाते हैं, बड़े प्यार से मनाते हैं, बापदादा भक्तों को देख करके भक्तों को भी भक्ति का फल देते हैं। लेकिन आपका मनाना और भक्तों का मनाना फर्क है। वह रात्रि मनाते हैं और आप अमृतवेला मनाते हैं, अमृतवेला श्रेष्ठ वेला है। अमृतवेले ही बापदादा हर एक बच्चे की झोली वरदानों से भर देते हैं। सभी की झोली वरदानों से भरी हुई है ना! रोज़ वरदाता बाप से वरदान मिलता ही है। कितने वरदान आप एक एक बच्चे को बापदादा द्वारा मिले हैं, वह वरदानों से झोली भरी हुई है ना। तो सभी बड़े उमंग-उत्साह से पहुंच गये हैं। बापदादा भी बच्चों को देख बहुत-बहुत खुश हो रहे हैं और गीत गाते रहते वाह बच्चे वाह! बच्चे कहते वाह बाबा वाह! और बाप कहते वाह बच्चे वाह! क्योंकि जो भी बाप के बच्चे बने हैं वह सभी कोटों में कोई आत्मायें हैं। विश्व में कितनी कोट आत्मायें हैं लेकिन उनमें से आप बच्चों ने जिसको बाप कहते हैं लक्की और लवली बच्चे हैं, उन कोटों में से कोई आप बच्चे हो। नशा है कि हम ही कल्प-कल्प के कोटों में कोई बच्चे हैं। कितने भी बड़े-बड़े मर्तबे वाली आत्मायें वर्तमान समय भी हैं लेकिन बाप को पहचान, बाप का बर्थ डे मनाने वाले चारों ओर के पहचानने वाले बच्चे कोटों में कोई हैं। तो यह खुशी है कि हम कोटों में भी कोई हैं! नशा है! हाथ उठाओ। अविनाशी नशा है ना! कभी कभी वाला तो नहीं? सदा है और सदा ही रहेगा। माया पेपर तो लेती है, अनुभव है ना! माया का भी परमात्म बच्चों से ज्यादा प्यार है। बच्चे जानते हैं कि माया का परमात्म बच्चों से आदि से अब तक सम्बन्ध है। माया और परमात्म बच्चे दोनों का आपस में कनेक्शन है, लेकिन माया का काम है आना और आप बच्चों का काम क्या है? माया को दूर से भगाना। आने नहीं देना कि आने भी देते हो? नहीं। दूर से ही भगाओ। आने देते तो फिर उसकी आदत पड़ जाती है आने की। वह भी समझती है आने तो देते हैं ना, चलो। लेकिन बाप देखते हैं कि कई कई बच्चे माया को आने तो देते लेकिन खातिरी भी कर लेते, चाय पानी भी पिला लेते, पता है, कौन सी खातिरी करते हैं? माया के प्रभाव में आके यही सोचते कि अभी तो टूलेट का बोर्ड नहीं लगा है, अभी तो समय पड़ा है। पुरुषार्थ कर रहे हैं, पहुंच जायेंगे। तो माया भी समझती है एक तो आने दिया, दूसरा यह तो हमारे को साथ दे रहे हैं, खातिरी कर रहे हैं। कोई-कोई बच्चे माया को पहचान लेते हैं, लेकिन कोई कोई बच्चे पहचानने में भी गलती कर लेते हैं, माया की मत है वा बाप की मत है, न पहचानने के कारण माया के प्रभाव में आ जाते हैं। लेकिन बापदादा अपने लक्की महावीर विजयी बच्चों को कहते हैं आने नहीं दो, अब आवे और फिर भगाओ, इसमें समय नहीं लगाओ क्योंकि समय कम है और आपका जो वायदा है, विश्व परिवर्तक बन, विश्व सेवक बन विश्व की आत्माओंको बाप का परिचय दे मुक्ति का वर्सा दिलायेंगे, वह कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है। उस कार्य को समाप्त करने में समय लगाना है, अगर माया को भगाने में समय लगायेंगे तो विश्व परिवर्तक का जो वायदा है वह पूरा कैसे करेंगे! बाप के साथी हैं ना, जन्म से ही वायदा किया है, अब भी साथ रहेंगे, साथ चलेंगे.. इसलिए अभी जो बाप से शक्तियां मिली हैं उस शक्तियों के आधार से माया को दूर से भगाओ। इसमें टाइम नहीं लगाओ। तो अभी शिवरात्रि, शिवजयन्ती मनाते हैं तो इसमें विशेष तीन बातें मनाते हैं। कमाल तो है जो यह विधियां, यह उत्सव मनाने वालों ने कापी की है, बापदादा उनको भी बधाईयां दे रहे हैं। विशेष 3 बातें मनाते हैं एक तो व्रत पालन करते हैं। आप लोगों को कापी किया है लेकिन अल्पकाल का। आप लोग भी जब से बाप के बने तो दो व्रत धारण किये। एक पवित्रता का, सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं ब्रह्माचारी। कई बच्चे क्या करते? मुख्य बड़े बड़े विकारों का व्रत तो रख देते लेकिन छोटे छोटे जो हैं ना उसको छोड़ देते हैं लेकिन छोटे महान बलि हो जायेंगे। छोटे कम नहीं होते। समय पर धोखा देने वाले छोटे होते हैं। जैसे चूहा होता है ना, है तो छोटा, लेकिन काटने में नम्बरवन है। फूंक भी देता है तो काटता भी है, जो पता ही नहीं पड़े। तो छोटे छोटे विकार, कई बच्चे क्रोध को समझते हैं यह तो होता ही है, करना ही पड़ता है। तो क्या उसको सम्पूर्ण आत्मा कहेंगे? बाल बच्चों सहित छोटे मोटे सहित व्रत धारण किया कि हम सदा के लिए पवित्र रहेंगे। किया है ना वायदा? या सिर्फ एक ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है? आपका टाइटिल क्या है? सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम, यही टाइटिल है ना? या थोड़ी-थोड़ी मर्यादा कम। तो जो समझते हैं कि हमने मेरा बाबा कहा, मेरा बाबा में सबने हाथ उठाया, जब मेरा बाबा कहा तो बाप समान तो बनना पड़ेगा ना। बस एक मात्रा का फर्क करो, जहाँ मेरा आवे ना वहाँ तेरा याद रखो। एक शब्द का फर्क याद रखने से तीन तख्त के निवासी बनेंगे। तो एक व्रत सदा के लिए पवित्रता, मर्यादा पुरुषोत्तम का आपने सदा के लिए धारण किया, वह एक दिन के लिए करते हैं, कापी तो की है लेकिन आटे में नमक समान की है। फिर भी की तो है। बुद्धिवान तो हैं ना! और दूसरा व्रत रखते हैं खान-पान का। तो आप सबने भी शुद्ध भोजन का व्रत रखा है ना। कापी तो की है ना। आपने भी पूरा व्रत किया है, या कभी थक जाते तो कहते अच्छा कुछ खा लो। ऐसे तो नहीं? थक जाओ या तंग हो, यूथ क्या करते हैं? जो कुमार हैं, वह हाथ उठाओ। कुमार। अच्छा। बहुत अच्छा। कुमारियां हाथ उठाओ। कुमारों ने पूरा व्रत निभाया है कि कभी थक जाते हैं? कुमार जो आते ही अभी भी विधि पूर्वक खानपान का व्रत निभाते हैं, वह हाथ उठाओ। पास हैं, अच्छा मुबारक है। आपको पदमगुणा मुबारक है। मेहनत तो थोड़ी लगती है लेकिन बाप के प्यार में यह मेहनत नहीं मुहब्बत है। तो देखो कापी तो की है ना। वह व्रत रखते हैं एक दिन के लिए और आप व्रत रखते हो जीवन के लिए। एक जीवन का व्रत सदा आपेही चलता है, फिर मेहनत नहीं करनी पड़ती। एक जन्म छोटा सा इसमें मेहनत जरूर है, त्याग है। त्याग का भाग्य बनता है और साथ में क्या करते हैं? जागरण। आपने कौन सा जागरण किया है? वह नींद का त्याग करते हैं, आपने भी अज्ञान की नींद का त्याग किया है कि अज्ञान की नींद को, बिना समय की नींद को आने नहीं देंगे, झुटके नहीं खायेंगे। ऐसे ऐसे नहीं (झुटका खाने वालों की एक्शन), ऐसे। तो यह भी व्रत लिया है ना! कईयों की आदत होती है - ऐसे ऐसे करने की। बापदादा कहते हैं त्याग किया, दृढ़ संकल्प किया तो फिर दृढ़ संकल्प ढीला क्यों करते हो? स्क्रू टाइट करना नहीं आता है? इसको टाइट करने का स्क्रू ड्राइवर है प्रतिज्ञा। अभी जो कार्य रहा हुआ है, कौन सा रहा हुआ है? बोलो। प्रत्यक्षता का। इसका ही पुरुषार्थ कर रहे हो ना! मेरा बाबा आ गया, यह झण्डा क्यों लहराते हो? कोई भी कार्य करते हो, झण्डा लहराते हो। आज भी झण्डा लहरायेंगे ना। किसका झण्डा लहरायेंगे? बापदादा का, सेवा का, बर्थ डे का झण्डा लहरायेंगे। जैसे झण्डा लहराते हो तो जब तक पूरा खुले नहीं, तब तक खोलते रहते हो। समाप्ति झण्डे की तब तक होती है जब तक फूल नहीं बरसा है। तो आप भी प्रत्यक्षता क्या चाहते हो? बाप की प्रत्यक्षता हो। तो जितनी जागरण की, व्रत लेने की, प्रतिज्ञा पक्की करेंगे तो प्रत्यक्षता जल्दी से जल्दी होगी। तो प्रत्यक्षता चाहते हो ना! तो समय को समीप लाने वाले कौन? आप सब हो ना! समय को समीप लाने वाले आप सच्चे सेवाधारी बच्चे हो। विश्व परिवर्तक बच्चे हो। तो बर्थ डे की सौगात मंजूर है! देना भी लेना भी, दोनों बताई। सिर्फ देनी नहीं है, लेनी भी है। हाथ उठाओ जो दोनों करेंगे। जो दोनों करेंगे? अच्छा। बहुत अच्छा। अच्छा। आपका यह चित्र (हाथ उठाया हुआ) इसमें (टी.वी. में) आ रहा है। तो जो कुछ थोड़ा फेल होगा ना उसको यह चित्र भेज देंगे। फिर से हाथ उठाओ। यहाँ निकल रहा है। अच्छा। अच्छा है, तो मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। (डबल विदेशी भाई बहनें आये हैं) डबल फारेनर नहीं कहो, डबल तीव्र पुरुषार्थी। पसन्द है ना टाइटिल! डबल फारेनर्स तो कामन है। वह तो बहुत डबल फारेनर हैं। बापदादा को फारेनर्स के लिए खुशी होती है कि फारेनर्स मधुबन का श्रृंगार बन गये हैं। देखो, इण्डिया के भिन्न-भिन्न देशों से आते हैं तो फारेनर्स कम क्यों हो, इसमें भी अच्छी रेस की है। तो बापदादा एक बात में मैजारिटी को देख करके खुश है, कि जो भी आते हैं वह अभी एक कल्चर वाले हो गये हैं। सभी एक ब्रह्मण कल्चर वाले हैं। हैं ना! हाथ उठाओ। अभी विदेश की कल्चर वाले नहीं, सब ब्रह्मण कल्चर वाले। आये थे तो भिन्न-भिन्न कल्चर वाले आये थे लेकिन कल्चर को भी पार कर लिया, यह बड़ी दीवार थी लेकिन इस बड़ी दीवार को क्रास कर लिया है, अभी लगता ही नहीं है कि यह कोई अलग हैं। अभी उठके देखो टी.वी. में सब ब्रह्मण कल्चर वाले हैं। अच्छा लगता है ना - एक ही कल्चर। अच्छा। चारों ओर के बापदादा के दिलतख्तनशीन बच्चों को, चारों ओर के तीव्र पुरुषार्थी बच्चों को, चारों ओर के बापदादा ने जो गिफ्ट दी, उस गिफ्लाट को स्वीकार करने वाले और जो बच्चों ने संकल्प से बापदादा को गिपÌट दी, उस संकल्प को सदा दृढ़ करने वाले ऐसे दृढ़ पुरुषार्थी, प्रतिज्ञा कर प्रत्यक्षता करने वाले सर्व बच्चों को बापदादा का बहुत-बहुत दिल का दुलार और दिल का यादप्यार स्वीकार हो और सभी बच्चों को बार बार बधाई, बधाई, बधाई।
सेवा का टर्न यू.पी. बनारस और पश्चिम नेपाल का है:- अच्छा है यू.पी. ने विशेष ब्रह्मा बाप की पालना लेने का अधिकार प्राप्त किया है। यू.पी. में ब्रह्मा के नाम से यादगार भी है। तो यू.पी. का भाग्य है, जो जगत अम्बा, ब्रह्मा बाबा की पालना ली है। तो पालना की धरनी है। भाग्य का सितारा ब्रह्मा बाप और जगत अम्बा ने यू.पी. को वरदान में दिया। अच्छा है। अभी दिन प्रतिदिन बाप ने देखा कि सेवा स्थान और जो भी उपसेवाकेन्द्र वा गीता पाठशालायें हैं वह पहले से अभी वृद्धि अच्छी है इसीलिए बापदादा खास मुबारक दे रहे हैं कि बढ़ते चलो और नम्बर वृद्धि करने में, सन्देश देने में नम्बरवन बनो। अच्छा है, बापदादा खुश है और बढ़ाते चलना। टीचर्स को मुबारक है। वृद्धि कर रही हो और इससे भी ज्यादा में ज्यादा वृद्धि करते रहना। अच्छा।

 

02-02-08   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘सम्पूर्ण पवित्रता द्वारा रूहानी रॉयल्टी और पर्सनालिटी का अनुभव करते, अपने मास्टर ज्ञान सूर्य स्वरूप को इमर्ज करो’’

आज बापदादा चारों ओर के अपने रॉयल्टी और पर्सनालिटी के परिवार को देख रहे हैं। यह रॉयल्टी वा रूहानी पर्सनालिटी का फाउण्डेशन है सम्पूर्ण प्युरिटी। प्युरिटी की निशानी सभी के मस्तक में, सभी के सिर पर लाइट का ताज चमक रहा है। ऐसे चमकते हुए ताजधारी रूहानी रॉयल्टी, रूहानी पर्सनालिटी वाले सिर्फ आप ब्राह्मण परिवार ही हैं क्योंकि प्युरिटी को अपनाया है। आप ब्राह्मण आत्माओं की प्युरिटी का प्रभाव आदिकाल से प्रसिद्ध है। याद आता है अपना अनादि और आदिकाल! याद करो अनादिकाल में भी आप प्युअर आत्मायें आत्मा रूप में भी विशेष चमकते हुए सितारे, चमकते रहते हैं और भी आत्मायें हैं लेकिन आप सितारों की चमक सबके साथ होते भी विशेष चमकती है। जैसे आकाश में सितारे अनेक होते हैं लेकिन कोई कोई सितारे स्पेशल चमकने वाले होते हैं। देख रहे हो सभी अपने को, फिर आदिकाल में आपके प्युरिटी की रॉयल्टी और पर्सनालिटी कितनी महान रही है! सभी पहुंच गये आदिकाल में? पहुंच जाओ। चेक करो मेरी चमकने की रेखा कितनी परसेन्ट में है? आदिकाल से अन्तिम काल तक आपके प्युरिटी की रॉयल्टी, पर्सनालिटी सदा रहती है। अनादि काल का चमकता हुआ सितारा, चमकते हुए बाप के साथ-साथ निवास करने वाले। अभी-अभी अपनी विशेषता अनुभव करो। पहुंच गये सब अनादिकाल में? फिर सारे कल्प में आप पवित्र आत्माओं की रॉयल्टी भिन्न-भिन्न रूप में रहती है क्योंकि आप आत्माओं जैसा कोई सम्पूर्ण पवित्र बने ही नहीं हैं। पवित्रता का जन्म सिद्ध अधिकार आप विशेष आत्माओं को बाप द्वारा प्राप्त है। अभी आदिकाल में आ जाओ। अनादिकाल भी देखा, अब आदिकाल में आपके पवित्रता की रॉयल्टी का स्वरूप कितना महान है! सभी पहुंच गये सतयुग में। पहुंच गये! आ गये? कितना प्यारा स्वरूप देवता रूप है। देवताओं जैसी रॉयल्टी और पर्सनालिटी सारे कल्प में किसी भी आत्मा की नहीं है। देवता रूप की चमक अनुभव कर रहे हो ना! इतनी रूहानी पर्सनालिटी, यह सब पवित्रता की प्राप्ति है। अभी देवता रूप का अनुभव करते मध्यकाल में आ जाओ। आ गये? आना अनुभव करना सहज है ना। तो मध्यकाल में भी देखो, आपके भक्त आप पूज्य आत्माओं की पूजा करते हैं, चित्र बनाते हैं। कितने रॉयल्टी के चित्र बनाते और कितनी रॉयल्टी से पूजा करते। अपना पूज्य चित्र सामने आ गया है ना! चित्र तो धर्मात्माओं के भी बनते हैं। धर्म पिताओं के भी बनते हैं, अभिनेताओं के भी बनते हैं लेकिन आपके चित्र की रूहानियत और विधि पूर्वक पूजा में फर्क होता है। तो अपना पूज्य स्वरूप सामने आ गया! अच्छा फिर आओ अन्तकाल संगम पर, यह रूहानी ड्रिल कर रहे हो ना! चक्कर लगाओ और अपने प्युरिटी का, अपनी विशेष प्राप्ति का अनुभव करो। अन्तिमकाल संगम पर आप ब्राह्मण आत्माओं का परमात्म पालना का, परमात्म प्यार का, परमात्म पढ़ाई का भाग्य आप कोटों में कोई आत्माओं को ही मिलता है। परमात्मा की डायरेक्ट रचना, पहली रचना आप पवित्र आत्माओं को ही प्राप्त होती है। जिससे आप ब्राह्मण ही विश्व की आत्माओं को भी मुक्ति का वर्सा बाप से दिलाते हो। तो यह सारे चक्कर में अनादिकाल, आदिकाल, मध्यकाल और अन्तिमकाल सारे चक्र में इतनी श्रेष्ठ प्राप्ति का आधार पवित्रता है। सारा चक्कर लगाया अभी अपने को चेक करो, अपने को देखो, देखने का आइना है ना! अपने को देखने का आइना है? जिसको है वह हाथ उठाओ। आइना है, क्लीयर है आइना? तो आइने में देखो मेरी पवित्रता का कितना परसेन्ट है? पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन ब्रह्माचारी। मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क सबमें पवित्रता है? कितनी परसेन्ट में है? परसेन्टेज निकालने आती है ना! टीचर्स को आती है? पाण्डवों को आती है? अच्छा होशियार हो। माताओं को आती है? आती है माताओं को? अच्छा। पवित्रता की परख है - वृत्ति, दृष्टि और कृति तीनों में चेक करो, सम्पूर्ण पवित्रता की जो वृत्ति होगी, वह आ गई ना बुद्धि में। सोचो, सम्पूर्ण पवित्रता की वृत्ति अर्थात् हर आत्मा के प्रति शुभभावना, शुभकामना। अनुभवी हो ना! और दृष्टि क्या होगी? हर आत्मा को आत्मा रूप में देखना। आत्मिक स्मृति से बोलना, चलना। शार्ट में सुना रहे हैं। डिटेल तो आप भाषण कर सकते हैं और कृति अर्थात् कर्म में सुख लेना सुख देना। यह चेक करो - मेरी वृत्ति, दृष्टि, कृति इसी प्रमाण है? सुख लेना, दु:ख नहीं लेना। तो चेक करो कभी दु:ख तो नहीं ले लेते हो! कभी कभी थोड़ा-थोड़ा? दु:ख देने वाले भी तो होते हैं ना। मानों वह दु:ख देता है तो क्या आपको उसको फॉलो करना है! फॉलो करना है कि नहीं? फॉलो किसको करना है? दु:ख देने वाले को वा बाप को? बाप ने, ब्रह्मा बाप ने निराकार की तो बात है ही, लेकिन ब्रह्मा बाप ने किसी बच्चे का दु:ख लिया? सुख दिया और सुख लिया। फॉलो फादर है या कभी-कभी लेना ही पड़ता है? नाम ही है दु:ख, जब दु:ख देते हैं, इनसल्ट करते हैं, तो जानते हो कि यह खराब चीज़ है, कोई आपकी इनसल्ट करता है तो उसको आप अच्छा समझते हो? खराब समझते हो ना! तो वह आपको दु:ख देता है या इनसल्ट करता है, तो खराब चीज़ अगर आपको कोई देता है, तो आप ले लेते हो? ले लेते हो? थोड़े समय के लिए, ज्यादा समय नहीं थोड़ा समय? खराब चीज़ लेनी होती है? तो दु:ख या इनसल्ट लेते क्यों हो? अर्थात् मन में फीलिंग के रूप में रखते क्यों हो? तो अपने से पूछो हम दु:ख लेते हैं? या दु:ख को परिवर्तन के रूप में देखते हैं? क्या समझते हो पहली लाइन। दु:ख लेना राइट है? है राइट? मधुबन वाले राइट है? थोड़ा थोड़ा ले लेना चाहिए? पहली लाइन, दु:ख ले लेना चाहिए ना! नहीं लेना चाहिए लेकिन ले लेते हो। गलती से ले लेते हो। यह दु:ख की फीलिंग, परेशान कौन होता? मन में किचड़ा रखा तो परेशान कौन होगा? जहाँ किचड़ा होगा वहाँ ही परेशान होंगे ना! तो उस समय अपने रॉयल्टी और पर्सनालिटी को सामने लाओ और अपने को किस स्वरूप में देखो? जानते हो आपका क्या टाइटल है? आपका टाइटल है सहनशीलता की देवी, सहनशीलता का देव। तो आप कौन हो? सहनशीलता की देवियां हो, सहनशीलता के देव हो? कि नहीं? कभी-कभी हो जाते हैं। अपना पोजीशन याद करो, स्वमान याद करो। मैं कौन! यह स्मृति में लाओ। सारे कल्प के विशेष स्वरूप की स्मृति को लाओ। स्मृति तो आती है ना!

बापदादा ने देखा कि जैसे मेरा शब्द को सहज याद में परिवर्तन किया है। तो मेरा के विस्तार को समेटने के लिए क्या कहते हो? मेरा बाबा। जब भी मेरा मेरा आता तो मेरा बाबा में समेट लेते हो। और बार-बार मेरा बाबा कहने से याद भी सहज हो जाती है और प्राप्ति भी ज्यादा होती है। ऐसे ही सारे दिन में अगर किसी भी प्रकार की समस्या या कारण आता है, उसके यह दो शब्द विशेष हैं - मैं और मेरा। तो जैसे बाबा शब्द कहते ही मेरा शब्द पक्का याद हो गया है। हो गया है ना? सभी अभी बाबा बाबा नहीं कहते, मेरा बाबा कहते हैं। ऐसे ही यह जो मैं शब्द है, इसको भी परिवर्तन करने के लिए जब भी मैं शब्द बोलो तो अपने स्वमान की लिस्ट सामने लाओ। मैं कौन? क्योंकि मैं शब्द गिराने के निमित्त भी बनता और मैं शब्द स्वमान की स्मृति से ऊंचा भी उठाता है। तो जैसे मेरा बाबा का अभ्यास हो गया है, ऐसे ही मैं शब्द को बॉडीकान्सेसनेस की स्मृति के बजाए अपने श्रेष्ठ स्वमान को सामने लाओ। मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, तख्तनशीन आत्मा हूँ, विश्व कल्याणी आत्मा हूँ, ऐसे कोई न कोई स्वमान मैं से जोड़ लो। तो मैं शब्द उन्नति का साधन हो जाए। जैसे मेरा शब्द अभी मैजारिटी बाबा शब्द याद दिलाता है क्योंकि समय प्रकृति द्वारा अपनी चैलेन्ज कर रहा है।

समय की समीपता को कामन बात नहीं समझो। अचानक और एवररेडी शब्द को अपने कर्मयोगी जीवन में हर समय स्मृति में रखो। अपने शान्ति की शक्ति का स्वयं प्रति भी भिन्न-भिन्न रूप से प्रयोग करो। जैसे साइन्स अपना नया-नया प्रयोग करती रहती है। जितना स्व के प्रति प्रयोग करने की प्रैक्टिस करते रहेंगे उतना ही औरों प्रति भी शान्ति की शक्ति का प्रयोग होता रहेगा। अभी विशेष अपने शक्तियों की सकाश चारों ओर फैलाओ। जब आपकी प्रकृति सूर्य की शक्ति, सूर्य की किरणें अपना कार्य कितने रूप से कर रहा है। पानी बरसाता भी है, पानी सुखाता भी है। दिन से रात, रात से दिन करके दिखाता है। तो क्या आप अपने शक्तियों की सकाश वायुमण्डल में नहीं फैला सकते? आत्माओं को अपनी शक्तियों की सकाश से दु:ख अशान्ति से नहीं छुड़ा सकते! ज्ञान सूर्य स्वरूप को इमर्ज करो। किरणें फैलाओ, सकाश फैलाओ। जैसे स्थापना के आदिकाल में बापदादा के तरफ से अनेक आत्माओं को सुख-शान्ति की सकाश मिलने का घर बैठे अनुभव हुआ। संकल्प मिला जाओ। ऐसे अब आप मास्टर ज्ञान सूर्य बच्चों द्वारा सुख-शान्ति की लहर फैलाने की अनुभूति होनी चाहिए। लेकिन वह तब होगी, इसका साधन है मन की एकाग्रता। याद की एकाग्रता। एकाग्रता की शक्ति को स्वयं में बढ़ाओ। जब चाहो जैसे चाहो जब तक चाहो तब तक मन को एकाग्र कर सको। अभी मास्टर ज्ञान सूर्य के स्वरूप को इमर्ज करो और शक्तियों की किरणें, सकाश फैलाओ।

बापदादा ने सुना और खुश है कि बच्चे सेवा के उमंग-उत्साह में जगह-जगह पर सेवा अच्छी कर रहे हैं, बापदादा के पास सेवा के समाचार सब तरफ के अच्छे अच्छे पहुंचे हैं, चाहे प्रदर्शनी करते हैं, चाहे समाचार पत्रों द्वारा, टी.वी. द्वारा सन्देश देने का कार्य बढ़ाते जाते हैं। सन्देश भी पहुंचता है, सन्देश अच्छा पहुंचा रहे हो। गांव में भी जहाँ रहा हुआ है, हर एक जोन अच्छा अपनी अपनी एरिया को बढ़ा रहा है। अखबारों द्वारा टी.वी. द्वारा भिन्न भिन्न साधनों द्वारा उमंग उत्साह से कर रहे हो। उसकी सब करने वाले बच्चों को बापदादा बहुत स्नेहयुक्त दुआओं भरी मुबारक दे रहे हैं। लेकिन अभी सन्देश देने में तो अच्छा उमंग-उत्साह है और चारों ओर ब्रह्माकुमारीज क्या है, बहुत अच्छा शक्तिशाली कार्य कर रही हैं, यह भी आवाज अच्छा फैल रहा है और बढ़ता जा रहा है। लेकिन, लेकिन सुनायें क्या? सुनायें लेकिन... लेकिन ब्रह्माकुमारियों का बाबा कितना अच्छा है, वह आवाज अभी बढ़ना चाहिए। ब्रह्माकुमारियां अच्छा काम कर रही हैं लेकिन कराने वाला कौन हैं, अभी यह प्रत्यक्षता आनी चाहिए। बाप आया है, यह समाचार मन तक पहुंचना चाहिए। इसका प्लैन बनाओ।

बापदादा से बच्चों ने प्रश्न पूछा कि वारिस या माइक किसको कहें? माइक निकले भी हैं, लेकिन बापदादा माइक अभी के समय अनुसार ऐसा चाहते हैं या आवश्यक है जिसके आवाज की महानता हो। अगर साधारण बाबा शब्द बोल भी देते हैं, अच्छा करते हैं इतने तक भी लाया है, तो बापदादा मुबारक देते हैं लेकिन अभी ऐसे माइक चाहिए जिनके आवाज की भी लोगों तक वैल्यु हो। ऐसे प्रसिद्ध हो, प्रसिद्ध का मतलब यह नहीं कि श्रेष्ठ मर्तबे वाला हो लेकिन उसका आवाज सुनकर समझें कि यह कहने वाला जो कहता है, इसकी आवाज में वैल्यु है। अगर यह अनुभव से कहता है, तो उसकी वैल्यु हो। जैसे माइक तो बहुत होते हैं लेकिन माइक भी कोई पावर वाला कितना होता है, कोई कितना होता है, ऐसे ही ऐसा माइक ढूंढो, जिसकी आवाज में शक्ति हो। उसकी आवाज को सुनकर समझ में आवे कि यह अनुभव करके आया है तो अवश्य कोई बात है लेकिन फिर भी वर्तमान समय हर जोन, हर वर्ग में माइक निकले जरूर हैं। बापदादा यह नहीं कहते कि सेवा का प्रत्यक्ष रिजल्ट नहीं निकली है, निकली है। लेकिन अभी समय कम है और सेवा के महत्व वाली आत्मायें अभी निमित्त बनानी पड़ेंगी। जिसके आवाज की वैल्यु हो। मर्तबा भले नहीं हो लेकिन उनकी प्रैक्टिकल लाइफ और प्रैक्टिकल अनुभव की अथॉरिटी हो। उनके बोल में अनुभव की अथॉरिटी हो। समझा कैसा माइक चाहिए? वारिस को तो जानते ही हो। जिसके हर श्वांस में, हर कदम में बाप और कर्तव्य और साथ-साथ मन-वचन-कर्म, तन-मन-धन सबमें बाबा और यज्ञ समाया हुआ हो। बेहद की सेवा समाई हुई हो। सकाश ने की समर्थी हो।

अच्छा - अभी किसका टर्न है? तामिलनाडु, ईस्टर्न और नेपाल:- तो पहले कौन? निमित्त बंगाल, बंगाल वाले उठो। अच्छा। बंगाल वालों ने सेवा का चांस लिया है। तो इन थोड़े दिनों में अपने आपको देखा कि कर्मणा सेवा द्वारा यज्ञ सेवा के महत्व को जान, अपने अन्दर यज्ञ सेवा का पुण्य का खाता कितना जमा किया? सेवा तो वहाँ भी करते रहते हो लेकिन यज्ञ सेवा का महत्व अपना है। तो डबल सेवा की, एक कर्मणा सेवा की और दूसरी सेवा से वायुमण्डल शक्तिशाली बनाया, सन्तुष्ट करने का बनाया, उसका भी डबल पुण्य यज्ञ सेवा का प्रत्यक्षफल भी खाया, खुशी हुई ना। खुश रहे ना बहुत सभी। तो खुशी का प्रत्यक्षफल भी मिला और भविष्य भी जमा हुआ, डबल प्राप्ति की। क्योंकि सब देख करके खुश होते हैं कि कितनी निर्विघ्न सेवा हो रही है। कितने स्नेह से सेवा हो रही है। यह वायुमण्डल फैलाना वा निमित्त बनना इसका भी बड़ा पुण्य मिलता है। तो जिसको भी चांस मिलता है वह यही समझे विशेष पुण्य का खाता जमा करने का चांस मिलाहै। तो जमा किया? हाथ हिलाओ। वर्तमान भी जमा भविष्य में भी जमा। यह साधन है डबल फल प्राप्त करने का। अच्छा है। तो बंगाल वालों ने कोई नवीनता दिखाई? कोई नया कार्य किया है? कोई इन्वेन्शन की है? की है? क्योंकि बंगाल में बाप की पधरामणी हुई है, प्रवेशता हुई है। तो नया कार्य करना है ना! कोई नई इन्वेन्शन निकालो, बापदादा ने पहले भी कहा कि अभी यह जो सेवा कर रहे हो, अच्छी कर रहे हो, बापदादा ने मुबारक दी लेकिन अभी कुछ नया निकालो। किसी भी जोन ने नया कोई प्लैन बनाया है? किसी ने भी? कि वही रिपीट कर रहे हैं? फारेन वालों ने कुछ नया निकाला? सेवा का साधन कोई नया निकालो। जो चल रहे हैं वह तो अच्छा है लेकिन और अच्छा, कोई ने भी निकाला हो वह हाथ उठाओ। कोई ने नहीं निकाला है। वर्गीकरण की सेवा भी अभी तो बहुत समय से चल रही है। अभी कुछ तो नवीनता होनी चाहिए। तो कौन, बंगाल निकालेगा? बाकी अच्छा है।

बापदादा को यह अच्छा लगता है कि हर जोन को चांस मिलता है। सेवा तो वृद्धि को पा रही है, यह तो बापदादा को समाचार मिलते हैं। सेन्टर बढ़ रहे हैं, स्टूडेन्टस भी बढ़ रहे हैं, यह तो है। लेकिन कम खर्चा बालानशीन, ऐसा कोई नया साधन निकालो। बाकी बापदादा बंगाल के जोन (इस्टर्न जोन) में वृद्धि को देख करके खुश है। अच्छा। तो पुण्य जमा किया और यह पुण्य की पूंजी साथ में जायेगी। हाथ खाली नहीं जायेंगे। पुण्य की पूंजी साथ में ले जायेंगे। जितना पुण्य जमा करने चाहो उतना कर सकते हो। बाकी हिम्मत अच्छी की है, हर एक एरिया के सेवासाथी अच्छे हैं। यज्ञ सेवा में पहुंच भी गये हैं और सफल भी किया है। ईस्टर्न में बहुत नदियां इकट्ठी है। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आसाम, नेपाल, तामिलनाडु, आधी सभा है। इतने योग्य बनाया है, इसकी बहुत-बहुत बधाई हो। देखो, टी.वी. में देखो कितने हैं। बहुत अच्छे अच्छे हैं। हाथ हिलाओ। बहुत अच्छा। बापदादा को खुशी है कि यज्ञ सेवा से कितना प्यार है और कितने पहुंच गये हैं। अभी 5 ही नदियां मिलके कोई नया प्लैन बनाओ। आवाज फैलाने का तो किया, अभी और कुछ करो। बाकी बापदादा को खुशी है, कि 5 ही तरफ की संख्या बहुत अच्छी आई है। इतने यहाँ हैं, वहाँ कितने होंगे, इतनी वृद्धि की है, इसकी सब परिवार को भी खुशी है, बापदादा को भी खुशी है। तो अभी स्व परिवर्तन और सेवा में नवीनता इसकी प्राइज लेना। नम्बर लेंगे ना। 5 हैं, और बड़े बड़े हैं छोटे नहीं हैं। कमाल करके दिखाना। आपस में मीटिंग करके कोई नवीनता का प्लैन निकालो क्योंकि अभी कई आत्मायें ऐसी हैं जो सुनते हैं ना, मेला है, प्रदर्शनी है, यात्रायें हैं, कानफ्रेन्स है, तो वह समझते हैं यह तो हमने कर लिया है, देख लिया है। इसलिए नवीनता निकालो। बाकी अच्छी हिम्मत रखी है। बाप की विशेष 5 ही को बहुत-बहुतदिल की दुआयें। वरदान भी है, वरदान बतायें कौन सा है? अमरभव का वरदान है। अमर हैं, अमर रहेंगे और बापदादा के साथ अमरलोक में चलेंगे। चलेंगे ना! पहले जन्म में आना। दूसरे तीसरे में नहीं आना। सभी को उमंग है ना। पहले साथ चलेंगे अपने घर में फिर राज्य में जब आयेंगे तो पहले जन्म में आना। दूसरे तीसरे में मजा नहीं आयेगा। पहले जन्म में कौन आयेंगे? सभी आयेंगे। पहले जन्म की विधि का पता है ना! विधि का पता है - जो पहला नम्बर चार ही सबजेक्ट में होंगे, एक सबजेक्ट भी कम नहीं। सब सबजेक्ट में पहला नम्बर। वह पहले जन्म में साथी बनेंगे। हैं हिम्मत? कोई भी देखो स्थूल पढ़ाई में भी अगर एक सबजेक्ट में भी फेल होते हैं, कम मार्क्स लेते हैं तो वह नम्बरवन तो नहीं आता ना। तो वन जन्म में आना अर्थात् वन नम्बर में आना। मंजूर है। अभी हाथ उठाओ। सोचके हाथ उठाना। अच्छा है। अमर रहना और अमर बनाना। अच्छा।

(तामिलनाडु जोन में 12 ज्योर्तिलिंगम् दिखा करके योग की अनुभूति करा रहे हैं, छोटे छोटे स्थानों में यह सेवा बहुत अच्छी तरह से हो रही है, इसमें खर्चा बहुत कम है) सफलता है? अच्छा है, मुबारक है। यह भी देखो नई इन्वेन्शन की ना, ऐसे और भी कोई नई इन्वेन्शन करो और जगह जगह पर ट्रायल करके देखो कम खर्चा है और है भी शिव के प्रतिमा की यादगार। तो सबकी बुद्धि में एक बाप की यादगार रहेगी। अच्छा है। रिजल्ट तो ठीक है। अभी और भी करके देखो। अच्छा है। सभी को सुनाना क्लास में तो कैसे करते हैं, क्या होता है, अनुभव सुनाना। बाकी अच्छा है। बधाई हो।

अच्छा बिहार वालों ने कुछ किया है? (बिहार में आई बहार इसका एक प्रोजेक्ट बनाया है, बिहार में जहाँ जहाँ सन्देश नहीं पहुंचा है, उसे इस वर्ष में पूरा करेंगे, हर महीने नया सेवाकेन्द्र खोलेंगे) अच्छा किया क्योंकि बिहार में देखा गया है कि ज्यादा में ज्यादा सन्देश मिलना चाहिए। प्रोग्राम बनाया है, यह उमंग उत्साह की मुबारक। अभी बहार आयेगी ना। तो बहार को सब देखेंगे, मजा लेंगे ना बहार का। अच्छा। सेवा का तो सब जो भी कर रहे हैं, हर जोन में कोई न कोई सेवा हो रही है, हर वर्ग भी कर रहा है, सेवा का उमंग उत्साह अच्छा है और अच्छा रहना चाहिए। ठीक है ना। अच्छा।

डबल विदेशी:- डबल विदेशी अर्थात् डबल पुरूषार्थी। बापदादा ने अभी नाम रखा है डबल पुरूषार्थी। हैं? डबल पुरूषार्थी हैं? जो समझते हैं वर्तमान समय डबल पुरूषार्थ का लक्ष्य है और कर भी रहे हैं, वह हाथ उठाओ। डबल पुरूषार्थ। डबल? बहुत अच्छा। डबल पर तो ताली बजाओ। अच्छा है। आपको देख करके सब खुशी से आगे बढ़ने का लक्ष्य रखेंगे। और आज देख रहे हैं कि विदेश के जो मेन क्वालिटी है, सर्विसएबुल, नॉलेजफुल, सक्सेसफुल वह पहुंच गई है। और मीटिंग भी अच्छी कर रहे हैं। पहली मीटिंग का समाचार तो बापदादा ने सुना कि सभी इन्टरनेशनल हर देश के विशेष आत्मायें मिलकर जो बनाया है वह बहुत अच्छा और सहज एकमत से सहज पास हो गया। तो आप विशेष आत्मायें जो निमित्त बनी उनको बापदादा पदम पदमगुणा मुबारक दे रहे हैं। पुराने पुराने फाउण्डेशन आये हैं। बापदादा को खुशी होती है। पाण्डव भी कम नहीं हैं। पाण्डव भी एक दो से आगे हैं और शक्तियां भी एक दो से आगे हैं। अच्छा। सभी बापदादा के वरदानों को अमर बनाने के लिए सहज विधि यह अपनाओ कि अमृतवेले और साथ में कर्मयोगी बनने के समय भी बार-बार वरदान को रिवाइज कर स्वरूप में स्थित हैं! या नहीं है तो अपने को वरदान के स्वरूप में स्थित करो। बार-बार रिवाइज करो। बापदादा तो दे देते हैं वरदान, लेकिन वरदान को कायम रखने के लिए बार-बार रिवाइज करके स्वरूप में लाओ। अनुभव करो उस वरदान का। रूहानी नशे का अनुभव करो तो वह वरदान आपका अमर वरदान हो जायेगा क्योंकि वरदान के पात्र आप विशेष आत्मायें हो। भक्तों को भी वरदान मिलता है लेकिन वह अल्पकाल का, एक जन्म के लिए है। आपका संगम का वरदान जन्म जन्मान्तर साथ रहता है। इसलिए वरदान को स्वरूप में लाते रहेंगे तो वरदान की सफलता का अनुभव करते रहेंगे। सिर्फ बुद्धि में नहीं स्वरूप में लाओ। उस नशे में रहो। फलक में रहो। फलक रहे मैं वरदाता की वरदानी हूँ। डायरेक्ट वरदाता ने वरदान दिया है। वरदान को अमर बनाओ, कभी कभी वाला नहीं। और डबल विदेशियों के ऊपर सभी ब्राह्मण आत्माओं का विशेष स्नेह है क्योंकि आपने जो आदि भारत के सेवाधारी हैं उनको बहुत सहयोग दिया है। विश्व कल्याणकारी का जो बाप ने टाइटल दिया उसको साकार रूप में भिन्न भिन्न देशों में भिन्न भिन्न कलचर और भिन्न-भिन्न भाषायें, उसमें आप सभी विश्व कल्याण की सेवा में सफलता देने में सहयोगी बने। इसीलिए भारतवासियों को आपकी सेवा पर बहुत-बहुत स्नेह है। अच्छा।

विशेष जो पहली मीटिंग वाले आये हैं वह हाथ उठाओ। कान्स्टीट्युशन की मीटिंग वाले ऊंचा हाथ उठाओ। अच्छा है। बापदादा को संगठन बहुत अच्छा लगता है। और मेहनत प्यार से की है, थके नहीं हैं। उमंग उत्साह और अथकपन से किया, भारत वालों ने भी और डबल विदेशियों ने भी बहुत अच्छा किया है। बापदादा को भी पसन्द है। भारत के भी उठो। तीनों पाण्डवों को विशेष बधाई है क्यों बधाई है? क्योंकि ढांचा आपने बनाया। और डबल विदेशियों को इस बात की बधाई है कि जो भी बना उसमें सहयोग और समय देकरके फाइनल किया। देखेंगे नहीं कहा, कर लिया, इसकी बापदादा को खुशी है। बधाई हो, बधाई हो, सभी को। भारत वालों को भी और डबल विदेशियों को भी, शक्तियों को भी बधाई। अभी ऐसा माइक, जो बापदादा ने सुनाया, विशेष माइक देखते हैं कहाँ से निकलता है, भारत से निकलता है या विदेश से निकलता है। हर एक सोचता है हम करेंगे, यह तो आपका उमंग, आपका चेहरा दिखा रहा है। अच्छा।

मीडिया विंग और स्पार्क विंग वाले आये हैं:- (गीत गाया - हम होंगे कामयाब एक दिन....) दोनों ही अपना अपना कार्य कर रहे हैं। अभी बापदादा को समाचार मिलते रहते हैं। तो मीडिया भी दिनप्रतिदिन आगे बढ़ रहा है। जो टी.वी. में प्रोग्राम्स आते हैं वह आवाज अच्छा फैला रहे हैं। अभी पांव तो रख लिया है, अखबारों में भी अभी मेहनत के बिना जगह दे देते हैं और टी.वी. में भी अभी सहज जगह मिलती रहती है, चांस मिलता है। तो इतना तो किया है, तो मीडिया को भी मुबारक है। अभी कोशिश करो कि विदेश में अभी शुरू तो हुआ है, विदेश में भी टी.वी. में कोई कोई समय तो जाता है लेकिन विदेश और देश का इतना नजदीक का कनेक्शन हो जाए जो चारों तरफ आवाज फैलता जाए। बाकी मेहनत की सफलता मिली है यह बापदादा को भी अच्छा लगता है। मेहनत की है फल भी मिला है। और स्पार्क वाले भी अपना प्लैन बना रहे हैं, अच्छा है अभी ऐसा कुछ करके दिखाओ जो जैसे साइंस प्रत्यक्ष फल दिखाती है, ऐसे साइलेन्स की शक्ति इतना स्पष्ट और सहज प्रत्यक्ष रूप में अनुभव कराये जो सब कहें ब्रह्माकुमारियों के पास सहज साधन है। इन्वेन्शन कर रहे हैं और होगा भी। सब बुद्धि अच्छी चला रहे हैं तो बुद्धि द्वारा कोई न कोई प्रत्यक्ष फल निकल आयेगा। अच्छा है। मेहनत अच्छी है, फल निकल रहा है, निकलता रहेगा, यह तो होना ही है। अच्छा।

अभी एक सेकण्ड में, एक सेकण्ड हुआ, एक सेकण्ड में सारी सभा जो भी जहाँ है वहाँ मन को एक ही संकल्प में स्थित करो मैं बाप और मैं परमधाम में अनादि ज्योतिबिन्दु स्वरूप हूँ, परमधाम में बाप के साथ बैठ जाओ। अच्छा। अभी साकार में आ जाओ। अभी वर्तमान समय के हिसाब से मन-बुद्धि को एकाग्र करने का अभ्यास, जो कार्य कर रहे हो उसी कार्य में एकाग्र करो, कन्ट्रोलिंग पावर को ज्यादा बढ़ाओ। मन-बुद्धि संस्कार तीनों के ऊपर कन्ट्रोलिंग पावर। यह अभ्यास आने वाले समय में बहुत सहयोग देगा। वायुमण्डल के अनुसार एक सेकण्ड में कन्ट्रोल करना पड़ेगा। जो चाहे वही हो। तो यह अभ्यास बहुत आवश्यक है। इसको हल्का नहीं करना। क्योंकि समय पर यही अन्त सुहानी करेगा।

अच्छा - चारों ओर के डबल तख्तनशीन, बापदादा के दिलतख्तनशीन, साथ में विश्व राज्य तख्त अधिकारी, सदा अपने अनादि स्वरूप, आदि स्वरूप, मध्य स्वरूप, अन्तिम स्वरूप में जब चाहे तब स्थित रहने वाले सदा सर्व खज़ानों को स्वयं कार्य में लगाने वाले और औरों को भी खज़ानों से सम्पन्न बनाने वाले सर्व आत्माओं को बाप से मुक्ति का वर्सा दिलाने वाले ऐसे परमात्म प्यार के पात्र आत्माओं को बापदादा का यादप्यार, दिल की दुआयें और नमस्ते।

दादियों से:- सभी को अच्छा लगता है, पुराने आदि रत्नों को देख करके सभी को खुशी होती है। (मनोहर दादी से) चाहे क्लास कराओ नहीं कराओ, लेकिन देख करके भी खुशी होती है। मिलते रहो, हंसाते रहो। हर एक को कोई न कोई वरदान देते रहो। कुछ भी हो लेकिन फिर भी आदि रत्नों से जो भासना आती हैं ना वह और ही आती है। इसलिए अपना कार्य करते रहो। सबको बहलाते रहो। खुश हो जाते हैं ना। (परदादी से) मधुबन में पहुंच जाते हैं ना तो देखकर सब खुश हो जाते हैं। आप भी खुश होती हो। अच्छा है, हिसाब अपना काम कर रहा है, आप अपना काम कर रही हो। अच्छा लगता है, संगठन होता है ना तो सबको खुशी होती है। अच्छा किया है, अपने हिसाब किताब को शार्टकट कर रही हो। अच्छा, सब अच्छा है। सब ठीक चल रहा है। (मोहिनी बहन, मुन्नी बहन से) दादी भी देख करके खुश हो रही है। बापदादा तो खुश है ही, बापदादा तो सदा बच्चों को देख कर खुश होते हैं, कार्य को देख करके भी खुश होते हैं। अच्छा है मिलकर एक दो के सहयोगी बनके जी हाँ, जी हाँ करके चल रहे हैं, चलते रहेंगे। सब खुश हैं ना।

(रमेश भाई ने उषा बहन की तबियत का समाचार सुनाया, आपरेशन हुआ है) वह थोड़ा बहुत होता है, ठीक हो जायेगी। कटकुट होता है तो थोड़ा बहुत फर्क पड़ता है, ठीक हो जायेगी आप अपनी तबियत ठीक करो, ना ना नहीं करो, जो चाहिए वह देते जाओ। जिम्मेवारी है ना। साथी भी बनाते जाओ और अपने को भी बहुत अच्छी रीति से चलाते चलो। ज्यादा बिजी नहीं रखो। थोड़ा थोड़ा सहयोगी बनाते जाओ। बाकी अच्छा कर रहे हैं, अभी तो रिजल्ट बहुत अच्छी है, इन्टरनेशनल हो गया। सभी एक मत होके और निश्चयबुद्धि होके बैठे तो हो गया। सभी की मदद है। लेकिन साकार में तो तीनों एकमत होके और हाँ जी हाँ जी करके घाट तो बनाया बाकी थोड़ा थोड़ा हीरे गढ़ दिये तो अच्छा हो गया। तो मुबारक हो, तीनों को मुबारक हो।

(बृजमोहन भाई से) देखो अपने विचार यूज किया ना, लक्ष्य रखा करना ही है, हो गया ना। इतने वर्ष नहीं हुआ, अभी सभी की बुद्धियों में एक ही संकल्प रहा, करना ही है, सभी का। समय लगा लेकिन सफलता मिली।

तीनों वरिष्ठ भाईयों तथा विदेश की 6 बड़ी बहिनों से:- बापदादा को यह खुशी हुई कि चाहे भाईयों ने चाहे शक्तियों ने लक्ष्य रखा करना ही है तो सहज हो गया ना। टाइम तो देना पड़ता है लेकिन हुआ तो सहज ना। ज्यादा डिसकस तो नहीं हुई ना। तो यह भी एक एक्जैम्पुल बना कार्य करने का।

विदेश के पाण्डवों से: (यह बैकबोन थे) बैकबोन आप थे, निमित्त यह थे। सभी ने जैसे एक कार्य निश्चयबुद्धि होके सफल किया तो इससे सिद्ध है कि सफलता आपके हाथ में है। जो चाहे वह कर सकते हो। यह अनुभव हुआ। खुश हुए। अभी समझा कि संगठन में एक संकल्प दृढ़ता का करने से सब पहाड़ भी राई बन सकता है, रूई बन सकता है। हो सकता है ना। हो सकता है? हुआ ही पड़ा है। शक्तियों का भी शुभ संकल्प है, बापदादा कहेंगे विशेष निमित्त थोड़े बनें लेकिन सबका जो शुभ संकल्प था ना कि करना ही है, उसने काम किया। तो जैसे अभी इन्टरनेशनल फैंसला मिलके किया और प्रैक्टिकल प्रत्यक्ष देखा कि हो गया, ऐसे सदा करते रहना। कोई मुश्किल नहीं है। कितनी भुजायें हैं। हैं तो एक ब्रह्मा बाप की भुजायें। तो भुजाओं ने कमाल तो दिखाई ना। ऐसे ही संगठन को बढ़ाते रहना। एक दो के सहयोगी रहना। ठीक है ना। बापदादा तो समझते हैं कि इस ग्रुप को कोई विशेष यादगार देना चाहिए। यादगार में एक वरदान याद रखना - कोई भी कार्य करो अमरभव का वरदान पहले याद करो। तो अमर ही होगा। ठीक है ना। अच्छा, बहुत अच्छा। न्युयार्क की मोहिनी बहन ने डिनीस बहन की याद दी: उसको कहना कि आप भी एक डबल विदेशियों में एक्जैम्पुल हो। इशारे में समझने वाली हो। मुबारक हो। अभी इसी ढंग से चलाते चलो। सफलता का वरदान है। किसी द्वारा सफल हो जाता है।

अन्नपूर्णा बहन (चेन्नई):- अभी आपकी शक्ल में बीमारी नहीं है, ऐसे ही रहना। बस मुस्कराती रहना, आपकी दवाई यही है मुस्कराती रहना। दवाई भले करो लेकिन मुस्कराती रहो।



18-03-08   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘कारण शब्द को निवारण में परिवर्तन कर मास्टर मुक्तिदाता बनो, सबको बाप के संग का रंग लगाकर समान बनने की होली मनाओ’’

आज सर्व खज़ानों के मालिक बापदादा अपने चारों ओर के खज़ाने सम्पन्न बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे के खज़ाने में कितने खज़ाने जमा हुए हैं, यह देख हर्षित हो रहे हैं। खज़ाने तो सभी को एक ही समय एक ही जैसे मिले हैं फिर भी जमा का खाता सभी बच्चों का अलग-अलग है। क्योंकि समय प्रमाण अभी बापदादा सभी बच्चों को सर्व खज़ानों से सम्पन्न देखने चाहते हैं क्योंकि यह खज़ाने सिर्फ अभी एक जन्म के लिए नहीं हैं, यह अविनाशी खज़ाने अनेक जन्म साथ चलने वाले हैं। इस समय के खज़ानों को तो सभी बच्चे जानते ही हो। बापदादा ने क्या क्या खज़ाने दिये हैं वह कहने से ही सबके सामने आ गये हैं। सबके सामने खज़ानों की लिस्ट इमर्ज हो गई है ना! क्योंकि बापदादा ने पहले भी बताया है कि खज़ाने तो मिले लेकिन जमा करने की विधि क्या है? जो जितना निमित्त और निर्मान बनता है उतना ही खज़ाने जमा होते हैं।

तो चेक करो - निमित्त और निर्मान बनने की विधि से हमारे खाते में कितने खज़ाने जमा हुए हैं। जितने खज़ाने जमा होंगे, भरपूर होगा उनके चलन और चेहरे से भरपूर आत्मा का रूहानी नशा स्वत: ही दिखाई देता है। उसके चेहरे पर सदा रूहानी नशा वा फखुर चमकता है और जितना ही रूहानी फखुर होगा उतना ही बेफिक्र बादशाह होगा। रूहानी फखुर अर्थात् रूहानी नशा बेफिक्र बादशाह की निशानी है। तो अपने को चेक करो कि मेरे चलन और चेहरे पर बेफिक्र बादशाह का निश्चय और नशा है? दर्पण तो सबको मिली हुई है ना! तो दिल के दर्पण में अपना चेहरा चेक करो। किसी भी प्रकार का फिक्र तो नहीं है। क्या होगा! कैसे होगा! यह तो नहीं होगा! कोई भी संकल्प रह तो नहीं गया है? बेफिक्र बादशाह का संकल्प यही होगा जो हो रहा है वह बहुत अच्छा और जो होने वाला है वह और ही अच्छे ते अच्छा होगा। इसको कहा जाता है फखुर, रूहानी फखुर अर्थात् स्वमानधारी आत्मा। विनाशी धन वाले जितना कमाते उतना समय प्रमाण फिकर में रहते। आपको अपने ईश्वरीय खज़ानों के लिए फिकर है? बेफिक्र हो ना! क्योंकि जो खज़ानों के मालिक और परमात्म बालक हैं वह सदा ही स्वप्न में भी बेफिक्र बादशाह हैं क्योंकि उसको निश्चय है कि यह ईश्वरीय खज़ाने इस जन्म में तो क्या लेकिन अनेक जन्म साथ हैं, साथ रहेंगे। इसीलिए वह निश्चयबुद्धि निश्चिंत हैं।

तो आज बापदादा चारों ओर के बच्चों का जमा का खाता देख रहे थे। पहले भी सुनाया है कि विशेष तीन प्रकार के खाते जमा किये हैं और कर सकते हैं। एक है - अपने पुरूषार्थ प्रमाण खज़ाने जमा करना। यह एक खाता है। दूसरा खाता है - दुआओं का खाता। दुआओं का खाता जमा होने का साधन है सदा सम्बन्ध-सम्पर्क और सेवा में रहते हुए संकल्प, बोल और कर्म में, तीनों में स्वयं भी स्वयं से सन्तुष्ट और दूसरे भी सर्व और सदा सन्तुष्ट हों। सन्तुष्टता दुआओं का खाता बढ़ाती है। और तीसरा खाता है - पुण्य का खाता। पुण्य के खाते का साधन है - जो भी सेवा करते हैं, चाहे मन से, चाहे वाणी से, चाहे कर्म से, चाहे सम्बन्ध में, सम्पर्क में आते सदा नि:स्वार्थ और बेहद की वृत्ति, स्वभाव, भाव और भावना से सेवा करना। इससे पुण्य का खाता स्वत: ही जमा हो जाता है। तो चेक करो - चेक करना आता है ना! आता है? जिसको नहीं आता हो वह हाथ उठाओ। जिसको नहीं आता है, कोई नहीं है माना सभी को आता है। तो चेक किया है? कि स्व पुरूषार्थ का खाता, दुआओं का खाता, पुण्य का खाता तीनों कितनी परसेन्ट में जमा हुआ है? चेक किया है? जो चेक करता है वह हाथ उठाओ। चेक करते हो? पहली लाइन नहीं करती है? चेक नहीं करते? क्या कहते हैं? करते हैं ना! क्योंकि बापदादा ने सुना दिया है, इशारा दे दिया है कि अभी समय की समीपता तीव्रगति से आगे बढ़ रही है इसलिए अपनी चेकिंग बारबार करनी है। क्योंकि बापदादा हर बच्चे को राजा बच्चा, राजयोगी सो राजा बच्चा देखने चाहते हैं। यही परमात्म बाप को रूहानी नशा है कि एक-एक बच्चा राजा बच्चा है। स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी परमात्म बच्चा है।

तो खज़ाने तो बापदादा द्वारा मिलते ही रहते हैं। इस खज़ानों के जमा करने की बहुत सहज विधि है - विधि कहो या चाबी कहो, वह जानते हो ना! जमा करने की चाबी क्या है? जानते हो? तीन बिन्दियां। है ना सभी के पास चाबी? तीन बिन्दियां लगाओ और खज़ाने जमा होते जायेंगे। माताओं को चाबी लगाने आती हैं ना, चाबी सम्भालने में होशियार होती हैं ना! तो सभी माताओं ने यह तीन बिन्दियों की चाबी सम्भालकर रखी है, लगाई है? बोलो, मातायें चाबी है? जिसके पास है वह हाथ उठाओ। मातायें उठाओ। चाबी चोरी तो नहीं हो जाती है? वैसे घर के हर चीज़ की चाबी माताओं को सम्भालने बहुत अच्छी आती है। तो यह चाबी भी सदा साथ में रहती है ना?

तो वर्तमान समय बापदादा यही चाहते हैं - अभी समय समीप होने के नाते से बापदादा एक शब्द सभी बच्चों के अन्दर से, संकल्प से, बोल से और प्रैक्टिकल कर्म से चेन्ज करना देखने चाहते हैं। हिम्मत है? एक शब्द यही बापदादा हर बच्चे का परिवर्तन कराना चाहते हैं, जो एक ही शब्द बार-बार तीव्र पुरूषार्थ से अलबेला पुरूषार्थी बना देता है और अभी समय अनुसार कौन सा पुरूषार्थ चाहिए? तीव्र पुरूषार्थ और सब चाहते भी हैं कि तीव्र पुरूषार्थियों के लाइन में आयें लेकिन एक शब्द अलबेला कर देता है। पता है वह? परिवर्तन करने के लिए तैयार हैं? है तैयार? हाथ उठाओ, तैयार हैं? देखो, आपका फोटो टी.वी. में आ रहा है। तैयार हैं, अच्छा मुबारक हो। अच्छा - तीव्र पुरूषार्थ से परिवर्तन करना है या कर लेंगे, देख लेंगे... ऐसे तो नहीं? एक शब्द जान तो गये होंगे, क्योंकि सब होशियार हैं, एक शब्द वह है कि कारणशब्द को परिवर्तन कर निवारणशब्द को सामने लाओ। कारण सामने आने से वा कारण सोचने से निवारण नहीं होता है। तो बापदादा संकल्प तक, सिर्फ बोलने तक नहीं लेकिन संकल्प तक यह कारण शब्द को निवारण में परिवर्तन करने चाहते हैं क्योंकि कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं और वह कारण शब्द सोचने में, बोलने में, कर्म में आने में तीव्र पुरूषार्थ के आगे बन्धन बन जाता है क्योंकि आप सभी का बापदादा से वायदा है, स्नेह से वायदा है कि हम सभी भी बाप के, विश्व परिवर्तन के कार्य में साथी हैं। बाप के साथी हैं, बाप अकेला नहीं करता है, बच्चों को साथ लाते हैं। तो विश्व परिवर्तन के कार्य में आपका क्या कार्य है? सर्व आत्माओं के कारणों को भी निवारण करना क्योंकि आजकल मैजारिटी दु:खी और अशान्त होने के कारण अभी मुक्ति चाहते हैं। दु:ख अशान्ति से, सर्व बन्धनों से मुक्ति चाहते हैं और मुक्तिदाता कौन? बाप के साथ आप बच्चे भी मुक्तिदाता हैं। आपके जड़ चित्रों से आज तक क्या मांगते हैं? अभी दु:ख अशान्ति बढ़ते देख सभी मैजारिटी आत्मायें आप मुक्तिदाता आत्माओं को याद करती हैं। मन में दु:खी होके चिल्लाते हैं - हे मुक्तिदाता मुक्ति दो। क्या आपको आत्माओं के दु:ख अशान्ति की पुकार सुनने नहीं आती? लेकिन मुक्तिदाता बन पहले इस कारणशब्द को मुक्त करो। तो स्वत: ही मुक्ति का आवाज आपके कानों में गूंजेगा। पहले अपने अन्दर से इस शब्द से मुक्त होंगे तो दूसरों को भी मुक्त कर सकेंगे। अभी तो दिन-प्रतिदिन आपके आगे मुक्तिदाता मुक्ति दो की क्यू लगने वाली है। लेकिन अभी तक अपने पुरूषार्थ में भिन्नभिन्न कारण शब्द के कारण मुक्ति का दरवाजा बन्द है। इसीलिए आज बापदादा इस शब्द के, इसके साथ और भी कमज़ोर शब्द आते हैं। विशेष है कारण फिर उसमें और भी कमज़ोरियाँ होती हैं, ऐसे वैसे, कैसे, यह भी इनके साथी शब्द हैं, जो दरवाजे बन्द के कारण हैं।

तो आज सब होली मनाने आये हो ना । सब भाग-भाग करके आये हैं। स्नेह के विमान में चढ़के आये हैं। बाप से स्नेह है, तो बाप के साथ होली मनाने पहुंच गये हैं। मुबारक हो, भले पधारे। बापदादा मुबारक देते हैं। बापदादा देख रहे हैं, कुर्सी पर चलने वाले भी, तबियत थोड़ी नीचे ऊपर होते भी हिम्मत से पहुंच गये हैं। बापदादा यह दृश्य देखते हैं, यहाँ क्लास में आते हैं ना। प्रोग्राम में आते हैं तो चेयर पर भी चलके पण्डे को पकड़कर आ जाते हैं। तो इसको क्या कहा जायेगा? परमात्म प्यार। बापदादा भी ऐसे हिम्मतवान स्नेही, दिल के स्नेही बच्चों को बहुत-बहुत दिल की दुआयें, दिल का प्यार विशेष दे रहे हैं। हिम्मत रखके आये हैं, बाप के और परिवार की मदद है ही। सभी को स्थान ठीक मिला है? मिला है? जिसको स्थान ठीक मिला है वह हाथ उठाओ। फॉरेनर्स को ठीक मिला है? मेला है मेला। वहाँ मेले में तो रेत भी चलती रहती है, खाना भी चलता रहता है। आपको ब्रह्मा भोजन अच्छा मिला, मिलता है? अच्छा हाथ हिला रहे हैं। सोने की तीन पैर पृथ्वी मिली।ऐसा मिलन फिर 5 हजार वर्ष के बाद संगम पर ही होगा। फिर नहीं होगा।

तो आज बापदादा को संकल्प है कि सब बच्चों के जमा खाते को देखें। देखा भी है, आगे भी देखेंगे क्योंकि बापदादाने यह पहले ही बच्चों को सूचना दे दी है कि जमा के खाते जमा करने का समय अब संगमयुग है। इस संगमयुग पर अबजितना जमा करने चाहो, सारे कल्प का खाता अब जमा कर सकते हो। फिर जमा के खाते की बैंक ही बन्द हो जायेगी।फिर क्या करेंगे? इसलिए बापदादा को बच्चों से प्यार है ना। तो बापदादा जानते हैं कि बच्चे अलबेलेपन में कभी भूल जातेहैं, हो जायेगा, देख लेंगे, कर तो रहे हैं, चल तो रहे हैं ना। बड़े मजे से कहते, आप देख नहीं रहे हो, हम कर रहे हैं, हाँचल तो रहे हैं और क्या करें? लेकिन चलना और उड़ना कितना फर्क है? चल रहे हो मुबारक है। लेकिन अभी चलने कासमय समाप्त हो रहा है। अभी उड़ने का समय है। तभी मंज़िल पर पहुंच सकेंगे। साधारण प्रजा में आना, भगवान का बच्चाऔर साधारण प्रजा! शोभता है? इसीलिए बापदादा यही चाहता है कि आज से होली का अर्थ है ना - बीती सो बीती। तोहोली मनाने आये हो, तो बीती सो बीती, कोई भी कारण से अगर कोई भी कमज़ोरी रही हुई है तो अब घड़ी बीती सो बीती कर अपना चित्र स्मृति में लाओ, अपना ही चित्रकार बन अपना चित्र निकालो।

पता है - बापदादा अभी भी एक-एक बच्चे का कौन सा चित्र सामने देख रहा है? पता है कौन सा चित्र देख रहे हैं? अभी आप सभी भी अपना चित्र खींचो। आता है चित्र खींचने आता है ना! श्रेष्ठ संकल्प की कलम से अपना चित्र अभी-अभी सामने लाओ। पहले सभी ड्रिल करो, माइन्ड ड्रिल। कर्मेन्द्रियों की ड्रिल नहीं, मन की ड्रिल करो। रेडी, ड्रिल करने के लिए रेडी हैं। कांध हिलाओ। देखो सबसे श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ चित्र होता है, ताज, तख्त, तिलकधारी का। तो अपना चित्र सामने लाओ। और सब संकल्प किनारे कर देखो, आप सभी बापदादा के दिलतख्त नशीन हैं। तख्त है ना! ऐसा तख्त तो कहाँ भी नहीं मिलेगा। तो पहले यह चित्र निकालो कि मैं विशेष आत्मा, स्वमानधारी आत्मा, बापदादा की पहली रचना श्रेष्ठ आत्मा, बापदादा के दिलतख्तनशीन हूँ। तख्तनशीन हो गये! साथ में परमात्म रचना इस वृक्ष के जड़ में बैठी हुई पूर्वज और पूज्य आत्मा हूँ, इस स्मृति का तिलकधारी हूँ। स्मृति का तिलक लगाया! साथ में बेफिकर बादशाह, सारा फिकर का बोझ बापदादा को अर्पण कर डबल लाइट की ताजधारी हूँ। तो ताज, तिलक और तख्तधारी, ऐसी बाप अर्थात् परमात्म प्यारी आत्मा हूँ।

तो यह चित्र अपना खींच लिया। सदा यह डबल लाइट का ताज चलते फिरते धारण कर सकते हो। कभी भी अपना स्वमान याद करो तो यह ताज, तिलक, तख्तनशीन आत्मा हूँ, यह अपना चित्र दृढ़ संकल्प द्वारा सामने लाओ। याद है - शुरू-शुरू में आप लोगों का अभ्यास बार-बार एक शब्द की स्मृति में रहता था, वह एक शब्द था - मैं कौन? यह मैं कौन? यह शब्द बार-बार स्मृति में लाओ और अपने भिन्न-भिन्न स्वमान, टाइटल, भगवान के मिले हुए टाइटल। आजकल लोगों को, मनुष्य को मनुष्य से टाइटल मिलता तो भी कितना महत्व समझते हैं और आप बच्चों को बाप द्वारा कितने टाइटल मिले हैं? स्वमान मिले हैं? सदा स्वमान की लिस्ट अपने बुद्धि में मनन करते रहो। मैं कौन? लिस्ट लाओ। इसी नशे में रहो तो कारण जो हैं ना, वह शब्द मज र् हो जायेगा और निवारण, हर कर्म में दिखाई देगा। जब निवारण का स्वरूप बन जायेंगे तो सव र् आत्माओं को निर्वाणधाम, मुक्तिधाम में सहज जाने का रास्ता बताए मुक्त कर लेंगे।

दृढ़ संकल्प करो - आता है दृढ़ संकल्प करना? जब दृढ़ता होती है तो दृढ़ता सफलता की चाबी है। जरा भी दृढ़ संकल्प में कमी नहीं लाओ क्योंकि माया का काम है हार खिलाना और आपका काम क्या है? आपका काम है - बाप के गले का हार बनना, न माया से हार खाना। तो सभी यह संकल्प करो मैं सदा बाप के गले की विजय माला हूँ। गले का हार हूँ। गले का हार विजयी हार है। तो बापदादा हाथ उठवाते हैं तो आप क्या बनेंगे? सब क्या उत्तर देते हैं? एक ही उत्तर देते हैं लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। रामसीता नहीं। तो लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हम बापदादा के विजयी माला के मणके हैं, पूज्य आत्मायें हैं, आपके माला का मणका जपते जपते अपनी समस्याओं को समाप्त करते हैं। ऐसे श्रेष्ठ मणके हो। तो आज बापदादा को क्या देंगे? होली की कोई तो गिफ्ट देंगे ना! यह कारण शब्द, यह तो तो, और कारण, तो तो करेंगे तो तोता बन जायेंगे ना। तो तो भी नहीं, ऐसे वैसे भी नहीं, कोई भी प्रकार का कारण नहीं, निवारण।

तो आज, होली बापदादा के सदा संग में रहने की, कम्बाइण्ड रहने की होली मनाई? सबसे पक्के में पक्का संग में रहना है कम्बाइण्ड रूप। साथ वाला फिर भी आगे पीछे हो सकता लेकिन कम्बाइण्ड सदा साथ रहता है। तो होली अर्थात् बाप के संग के रंग में रहना। बाप का रंग लगाना है अर्थात् समान बनना है। तो कम्बाइण्ड हैं ना कि कभी-कभी हैं! कई बच्चे देखा है पुरूषार्थ करके थोड़े कमज़ोर हो जाते हैं ना तो अकेलापन पसन्द करते हैं, कोई को साथ नहीं पसन्द करते, अकेला रहना, अकेला सोचना, यह अकेलापन भी नहीं ठीक, प्रभू परिवार है। इतने प्रभु परिवार के साथी अकेले कैसे होंगे! यह माया की चालाकी हैं। पहले अकेला कर देती फिर वार करती। माला में देखो अकेला मोती है? माला में विशेषता क्या है? एक मोती का दूसरे मोती से समीप का सम्बन्ध है, जरा भी बीच में धागा नहीं दिखता है। स्नेही, सहयोगी, साथी यही आपका यादगार है। तो होली मनाई? बाप समान बनना अर्थात् संग के रंग में आ जाना। तो सबका संकल्प क्या है? समान बनना है ना! बाप को खुशी है, बापदादा एक-एक बच्चे को समान बनने की, श्रेष्ठ संकल्प करने की पदम पदमगुणा मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। नशा है ना - हमारे जितना पदम-पदम भाग्यवान कौन? इसी नशे में रहो।

जो पहले बारी मिलने आये हैं वह हाथ उठाओ। तो पहले बारी जो बच्चे हिम्मत रखके आये हैं उन्हों को विशेष बापदादा इस संगठन के मौज मनाने की मुबारक दे रहे हैं और साथ में विशेष वरदान दे रहे हैं - वह वरदान है अमर भव। यह वरदान सदा अमृतवेले मिलन मनाने के बाद सारे दिन के लिए बार-बार याद रखना। अमर हूँ, अमर बाप का बच्चा हूँ, अमरपद प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ। जन्म भले लेंगे लेकिन सुख शान्ति अमर रहेगी। अच्छा।

सेवा का टर्न दिल्ली-आगरा का है:- बापदादा ने देखा है जिस भी जोन को टर्न मिलता है ना वह बड़ी दिल से, खुली दिल से सभी को चांस दिला देते हैं। अच्छा है यह, डबल फायदा हो जाता है। एक है यज्ञ सेवा का और दूसरा यज्ञ सेवा का पुण्य तो बहुत बड़ा है। एक का लाख गुणा फल मिलता है। यज्ञ की महिमा कम नहीं है। तो जो भी आते हैं उनको बहुत फायदे हैं। एक यज्ञ सेवा का पुण्य जमा होता है और दूसरा इतनी श्रेष्ठ आत्मायें मधुबन में ही इकट्ठी मिलती हैं। चाहे पाण्डव हैं, चाहे दादियां हैं, चाहे महारथी बहन-भाई हैं और साथ में इतना बेहद का परिवार कहाँ मिलेगा आपको। सतयुग में भी छोटा परिवार होगा। अभी कितनी संख्या आई है? (17,500 भाई-बहनें आये हैं, उसमें 500 बच्चे हैं) 500 बच्चे आये हैं तो कितने तकदीरवान हैं। इतने हजारों का परिवार न सतयुग में मिलेगा, न त्रेता में मिलेगा, न द्वापर, कलियुग में मिलेगा। ऐसा एक परिवार 17 हजार का परिवार, कभी सुना है! सम्भालना ही मुश्किल हो जाए। लेकिन यहाँ देखो सभी मजे मजे से रह रहे हैं। तो कितना फायदा है। परिवार से मिलना कब नहीं होता है। और यह तो विशेष भगवान का परिवार है।

अच्छा दिल्ली वालों ने भविष्य राजधानी दिल्ली को बनाना है ना। पक्का है ना! तैयार हो ना! तो सभी के लिए बहुत बड़ा परिवार है, सभी आपकी दिल्ली में आयेंगे। साथी बनेंगे आपके? तो तैयारी भी तो करनी है ना। तो तैयारी की है दिल्ली में? आह्वाहन किया है सभी को? अभी तो दिल्ली खिटपिट में हो। रोज खबरें सुनो तो क्या खबरें आती हैं? गड़बड़ सड़बड़। और अब क्या बनेंगी? कौन सी दिल्ली बनेंगी? सोने की दिल्ली बनेंगी। सभी को स्थान देंगे ना। सभी को राजधानी में मंगायेंगे ना। तो दिल्ली वालों को पहले दिल्ली को तैयार करना पड़ेगा। तब तो आयेंगे ना सभी। दिल्ली वालों में विशेषतायें हैं। बापदादा ने देखा है कि दिल्ली वालों ने कई सेवाओं की विशेषतायें इमर्ज की हैं। निमित्त बनें हैं। अभी दिल्ली को सोने की दिल्ली बनाने के लिए ऐसा कोई प्लैन बनाओ जो सबके दिल से निकले वाह! निमित्त दिल्ली वाले आपने हमको स्वर्ग का राज्य भाग्य दिला दिया! क्योंकि दिल्ली में ही स्वर्ग बनना है। स्थापना तो वहाँ होनी है। अच्छा है, संगठन भी अच्छा है और सेवा के प्लैन बनाने में भी विशेष आत्मायें हैं। और दिल्ली से साकार ब्रह्मा और जगदम्बा और निमित्त बनी हुई सर्व दादियों का प्यार रहा है। कोई दादी है जो दिल्ली में नहीं गई हो! कोई नहीं है। तो दिल्ली वाले अभी सेवा में भी कोई नया प्लैन बनाओ। अभी सभी जोन नवीनता चाहते हैं, क्योंकि बहुत कर चुके हैं ना। अभी अमृतवेले खास बैठना और कोई नये प्लैन को सोचना, निकल आयेगा। अभी भी जो सेवा कर रहे हो वह अच्छी कर रहे हो। सभी जोन कुछ न कुछ करते तो रहते हैं। बापदादा ने सुना - कि जहाँ बापदादा ने बच्चों को सेवा करने के लिए गिफ्ट में स्थान बनाके दिया है, चाहे दिल्ली ओ.आर.सी. में, चाहे हैदराबाद में, हैदराबाद वाली कहाँ है (कुलदीप बहन को) अभी वहाँ भी अच्छी सेवा की लहर आरम्भ हो गई है। अच्छी हिम्मत रखी है, हिम्मत की बापदादा विशेष मुबारक दे रहे हैं। दिल्ली में भी भिन्न-भिन्न प्रकार से स्थान बिजी रखने में अच्छी मेहनत कर रहे हैं। वैसे बापदादा के पास सभी जोन भिन्न-भिन्न रूप में, जैसे गुजरात है वह यूथ की कर रहे हैं, चाहे गांव में कर रहे हैं, चाहे यूथ की कर रहे हैं। तो हर एक जोन अपने-अपने हिसाब से सेवा में अच्छी रूचि रख रहे हैं क्योंकि हर एक जोन में भिन्न-भिन्न वर्ग होने के कारण वर्गीकरण की सेवा सहज है। समाचार तो बापदादा के पास आता है, बापदादा खुश होते हैं लेकिन अभी चाहिए, जैसे पहले छोटा-छोटा बेल बजाके एडवरटाइज करते हैं और कहाँ-कहाँ बड़े ते बड़ा ढोल बजाते हो, वार्निग देते हैं यह होना है, यह होना है। अभी ऐसा कोई बुलन्द आवाज का बड़ा ढोल बजाओ। छोटे-छोटे ढोल बज रहे हैं। शिवरात्रि पर बापदादा ने देखा कि कईयों ने बोर्ड भी लगाये, आ गया, आ गया... लेकिन सबके दिलों तक नहीं पहुंचा है। अभी सबके दिल में यह आवाज आवे, हमारा बाबा आ गया।

तो कौन सा जोन पहले करेगा? जो भी जोन करे बापदादा सभी को चांस देते हैं। कम से कम जो वर्ग का प्रोग्राम करते हो उसमें आई हुई सारी सभा दिल से कहे, नारा नहीं लगाये आ गया, आ गया, दिल से कहे हमारा बाबा आ गया। थोड़े बोलते हैं, थोड़े समझते हैं लेकिन सारी सभा अपने उमंग उत्साह से कहे आ गया। यह तो कर सकते हो। सारी सभा को तैयार करो। आते तो हैं, लेकिन मानें भी। समय तो समीप आ ही रहा है तो मुबारक है दिल्ली वालों को। क्योंकि दिल्ली वालों की जिम्मेवारी बहुत बड़ी है। और पहले-पहले सेवा की स्थापना कायदे प्रमाण, आजकल के कायदे प्रमाण सेन्टर नहीं, लेकिन सेवा का आरम्भ दिल्ली से हुआ है। तो अभी और कमाल करना। कोई की भी बुद्धि में प्लैन आ सकता है। अच्छा - मुबारक हो।

आगरा वाले उठो - थोड़े हैं। फिर भी आगरा वाले विशेष सेवा कर सकते हैं। जो आजकल की गवर्मेन्ट है उस गवर्मेन्ट द्वारा आगरा में सेवा होती है, उससे भी ज्यादा आगरा में आलमाइटी गवर्मेन्ट द्वारा सेवा होनी है। तो अभी ऐसा प्लैन आगरा वाले बनाओ जो आलमाइटी गवर्मेन्ट की सेवा का नाम बुलन्द हो। जब दूसरे बारी आओ तो सारी सेवा का आपस में प्लैन बनाके कोई साथी बनाना हो, कोई की मदद लेनी हो तो मदद भी लेके बापदादा को प्रैक्टिकल रिजल्ट बताना कि इस वर्ष यह यह सेवा विशेष हुई। टीचर्स कहाँ हैं? तो करेंगे? सारा प्लैन बनाके आना। कहाँ-कहाँ की, जैसे कई जोन बनाके लाते हैं, कहाँ-कहाँ की, क्या नवीनता की, कहॉ तक आवाज फैला यह सारा रिकार्ड ले आना। ठीक है। हैं थोड़े लेकिन 5 पाण्डवों ने क्या नहीं किया। तो आप यह कमाल दिखाओ, संख्या कम और सेवा सबसे ज्यादा। ठीक है। अच्छा है। ब्रह्मा बाप का तो आगरा के ऊपर बहुत ध्यान रहा। तो ब्रह्मा बाप को सबूत देना। अच्छा। अच्छा है सेवा का चांस लिया, बहुत अच्छा।

डबल विदेशी - 50 देशों के 700 भाई बहिने आये हैं:- अंकल जी भी आये हैं वाह!। बापदादा को खुशी होती है इस युगल को देख करके, परिवार को देख करके। क्योंकि ब्राह्मण परिवार में कायदे प्रमाण जो पहला पहला वी.आई.पी निमित्त बना वह आप बने हो। ताली तो बजाओ। और कमाल यह है कि ड्युटी पर गवर्मेन्ट की ड्युटी पर होते सेन्टर स्थापन किया और अनेक वी.आई.पीज को परिचय दिया। चाहे ग्याना में खोला, लेकिन ग्याना ही अमेरिका की सेवा के निमित्त बना। तो सिर्फ ग्याना के नहीं हो, अमेरिका सेवा के भी निमित्त हो। इसीलिए बापदादा को बहुत दुआयें भी हैं, दिल का यादप्यार भी पदम पदम गुणा है। आण्टी कहाँ है? बच्चियां भी आई है ना। लाडली हैं, परिवार की भी लाडली, बापदादा की भी लाडली। हैं ना। अच्छा है।

डबल फारेनर्स को बापदादा ने टाइटल क्या दिया? डबल तीव्र पुरूषार्थी। वह तो सदा बापदादा कहते हैं कि डबल फारेनर्स ने बापदादा का विश्व परिवर्तक का टाइटल सिद्ध किया। नहीं तो सब कहते थे भारत कल्याणी हैं, विदेश के कारण विश्व कल्याणकारी बनें प्रैक्टिकल में। और बापदादा ने देखा है कि हर सीजन में डबल फॉरेनर्स की संख्या बढ़ती जाती है और विशेष परिवर्तन यह है कि पहले जो यह आवाज निकलता है हमारा कल्चर, भारत का कल्चर, यह आवाज नहीं है। परिवर्तन हो गया। अभी सभी का एक ही कल्चर हो गया, ब्राह्मण कल्चर। पसन्द है ना। ब्राह्मण कल्चर पसन्द है? पसन्द है, इसलिएबापदादा को भी आप डबल फॉरेनर्स बहुत- बहुत बहुत पसन्द हो। क्योंकि विशेषता यह है कि अगर करेंगे कोई भी कार्य तो पूरा करेंगे। हिम्मत रख करके हाँ तो हाँ, ना तो ना। इसमें होशियार हैं। लेकिन मैजारिटी हाँ जी, हाँ जी हैं। मीठा बाबा, मीठी दादियां, मीठा परिवार, हाँ जी, हाँ जी करने में अच्छे आगे जा रहे हैं। पहले फॉरेन में कहते थे स्टूडेन्ट का बढ़ना बहुत मुश्किल है। अभी मुश्किल है? अभी आ रहे हैं ना। अभी वी.आई.पी भी सम्बन्ध सम्पर्क में आ रहे हैं। तो आप सबकी दिल का उमंग उत्साह आपको भी आगे बढ़ा रहा है और सेवा को भी आगे बढ़ा रहा है। आगे बढ़ रहे हैं ना! बढ़ रहे हैं ना? सन्तुष्ट हो ना! अच्छा है, यह आबू में जो संगठन करते हो ना, यह सबमें बल भर जाता है। इसीलिए अवश्य हर सीजन में आते रहो, आते रहो, यज्ञ की शोभा बढ़ाते रहो। बापदादा को इन्हों की जो मीटिंग रखते हैं और प्रोग्रामस रखते हैं, डायलॉग का, समय की पुकार का, अच्छा लगता है। अच्छा मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। अच्छा।

मातायें सभी हाथ उठाओ:- (10 हजार मातायें आई हैं) अच्छे हाथ दिखाई दे रहे हैं, बापदादा भी हाथ हिला रहे हैं। माताओं को वरदान है विशेष जिस सेन्टर में मातायें बहुत अच्छी पुरूषार्थी हैं, स्नेही हैं बापदादा का वरदान है, जहाँ मातायें हैं वहाँ यज्ञ का भण्डारा और यज्ञ की भण्डारी सदा भरपूर है। अच्छा है। माताओं के स्नेह की जो यज्ञ सेवा है उसमें बरक्कत है। तो बरक्कत होने के कारण भण्डारी और भण्डारे में भी बरक्कत हो जाती है इसीलिए माताओं को बापदादा विशेष मुबारक दे रहे हैं। मुबारक दे रहे हैं, मुबारक दे रहे हैं। अच्छा।

पाण्डव हाथ उठाओ:- पाण्डव भी बहुत हैं। देखो, पाण्डवों के बिना सेन्टर की सेवा में उन्नति नहीं हो सकती है। पाण्डव एक तो सेवा के प्लैन बहुत अच्छे-अच्छे बनाते हैं, पाण्डवों को यह वरदान मिला हुआ है। सेवा के नये-नये प्लैन अच्छे बनाते हैं और शक्तियों के रखवाले हैं। सदा पाण्डव यही समझें, कहाँ भी रहते हो चाहे सेन्टर पर रहते हो, चाहे घर में रहते हो लेकिन शक्तियों के रखवाले हो। कोई की भी कोई उल्टी सुल्टी नज़र न जाये। ऐसे सेवाधारी हो। और पाण्डव अगर नहीं आते तो जो इस श्रेष्ठ ज्ञान की विशेष नवीनता है कि यहाँ प्रवृत्ति में रहते न्यारे और प्यारे, परिवार में रहते न्यारे और प्यारे, मोहजीत नष्टोमोहा, वह पाण्डव नहीं होते, सिर्फ शक्तियां होती तो कैसे चलता! इसीलिए कहाँ शक्तियों की महिमा है, कहाँ पाण्डवों की है और इसका चित्र चतुर्भुज का चित्र है। पाण्डवों के बिना भी बाप का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता और शक्तियों के बिना भी बाप का कार्य पूरा नहीं। इसीलिए परिवार के परिवार की आवश्यकता क्या, महत्व है। छोटे बच्चे भी कम नहीं है, छोटे बच्चों को देखकर सब खुश होते हैं। जो छोटे बच्चे आये हैं वह उठो। हाथ हिलाओ। तो आपको क्या कहेंगे? वाह! बच्चे वाह! बच्चों की भी महिमा है, अगर बच्चे नहीं चलते तो प्रवृत्ति थोड़ेही कहेंगे। प्रवृत्ति में बच्चे भी चाहिए, पाण्डव भी चाहिए, शक्ति भी चाहिए। तो सुना बच्चों ने भी रिट्रीट की है। कुमारों की रिट्रीट हुई है, कुमारियों की भी रिट्रीट हुई है। जिनकी रिट्रीट हुई है वह उठो। अधरकुमार भी उठो, यूथ भी उठो।

बापदादा के पास सारा समाचार आता है। आप लोगों ने जो पुरूषार्थ किया, चाहे कुमारों ने चाहे अधरकुमारों ने, बापदादा खुश है कि मधुबन के वायुमण्डल में आकर अपनी स्थिति को, अपने पुरूषार्थ को आगे बढ़ाया, यह बहुत अच्छा है। क्योंकि यहाँ जैसा वायुमण्डल और कहाँ नहीं मिलता। अभी सिर्फ चाहे यूथकुमार, चाहे अधरकुमार, जो यहाँ तीव्र पुरुषार्थ की अनुभूति की, अनुभूति की तीव्र पुरूषार्थ की? वह अमर रखना। अमर भव का वरदान सदा याद रखना। ऐसे नहीं वहाँ जाओ तो कहो तीव्र पुरूषार्थ नहीं, पुरूषार्थ है नहीं। और ही कहना हम तो और ही उड़ती कला में उड़ रहे हैं। ठीक है। ऐसी रिजल्ट निकालना। बहुत अच्छा किया। बापदादा खुश है। अच्छा।

अभी एक सेकण्ड में सभी ब्राह्मण अपने राजयोग का अभ्यास करते हुए मन को एकाग्र करने का मालिक बन मन को जहाँ चाहो, जितना समय चाहो, जैसे चाहो वैसे अभी-अभी मन को एकाग्र करो। कहाँ भी मन यहाँ-वहाँ चंचल नहीं हो। मेरा बाबा, मीठा बाबा, प्यारा बाबा इस स्नेह के संग के रंग की, आध्यात्मिक होली मनाओ। (ड्रिल) अच्छा।

चारों ओर के श्रेष्ठ विशेष होली और हाइएस्ट बच्चों को, सदा स्वयं को बाप समान सर्व शक्तियों से सम्पन्न मास्टर सर्वशक्तिवान अनुभव करने वाले, सदा हर कमज़ोरियों से मुक्त बन अन्य आत्माओं को भी मुक्ति दिलाने वाले मुक्तिदाता बच्चों को, सदा स्वमान की सीट पर सेट रहने वाले, सदा अमर भव के वरदान के अनुभव स्वरूप रहने वाले, ऐसे चारों ओर के, चाहे सामने बैठने वाले, चाहे दूर बैठे स्नेह में समाये हुए बच्चों को यादप्यार वा अपने उमंग-उत्साह, पुरूषार्थ के समाचार देने वालों को बापदादा का बहुत-बहुत दिल का यादप्यार और दिल की पदम पदमगुणा यादप्यार स्वीकार हो और सभी राजयोगी सो राज्य अधिकारी बच्चों को नमस्ते।

मोहिनी बहन से:- (तबियत का समाचार सुनाया) अच्छा किया समय पर पूरा करके आ गई। यह बुद्धि की होशियारी है। बहुत अच्छा।

(दादी जानकी से) मजा आ रहा है ना। (क्या बताऊं, कैसे बताऊं) आंखों से। यह अच्छा है, चलाने वाला चला रहा है। (एज में सबसे बड़ी हूँ) मुबारक हो। (सब बापदादा को देख लें) यह आंखें देखें ना, दुनिया देखे बाबा क्या करता है, कैसे करता है। अच्छा, (दादियों से) सभी ठीक हैं! सब आदि रत्न हैं। बहुत अछा। उड़ रहे हैं। अच्छा। ठीक, बैठ जाओ। पुरानी चीज़ें जो होती हैं ना अमूल्य होती हैं, उन्हों का मूल्य बहुत होता है।

रमेश भाई, ऊषा बहन, डा.अनिला बहन से:- बहुत अच्छा किया। यह तो आदि रत्न है। सेवा का आदि रत्न। पहला परिवार है जहाँ जगदम्बा रही है। तो लकी परिवार है। (ऊषा बहन से) अच्छा पार्ट बजाया। लेकिन जैसे इनकी नेचर है उसी प्रमाण बहुत-बहुत-बहुत अच्छा पार्ट बजाया। इसीलिए सबका प्यार है और सब खुश हैं कि बहुत अच्छा पार्ट बजाया। अच्छा किया। डायरेक्ट पालना लेने वाली है। यह आदि फैमिली है। जिसने साकार बाप की भी पालना नजदीक से ली और सेवा में भी पार्ट बजाया। (डा.अनीला बहन से) इसको भी वरदान है।

शान्ति बहन (सिरीफोर्ट) से:- देखा जाता है कि अभी शरीर के हिसाब को मैजारिटी पास करने में पास हो जाते हैं। आपने भी पास का सर्टीफिकेट ले लिया। बहुत अच्छा पार्ट बजाया है। आजकल तो डाक्टर्स की सेवा बहुत हो जाती है। वह फर्क देखते हैं ना, प्रैक्टिकल लाइफ, उसका असर होता है। (सेवा करने वाली बहनों से) यह बहुत लाडली है। यह छोटी बहुत लाडली है, दिल से सेवा की है। दिल की सेवा का बहुत महत्व है। सेवा सब करते हैं लेकिन जो दिल से करता है उसका महत्व है। यह पुरूषार्थ में आगे जा रही है बहुत अच्छा। (डा.अनीला बहन से) बाप से दिल का स्नेह, परिवार से दिल का स्नेह तो परिवार की भी दुआयें, बाप की भी दुआयें हैं।

विदेश की मुख्य बड़ी बहनों से:- अच्छा है, मधुबन रहने का भी चांस और सेवा का भी विशेष चांस है। फिर भी देखो आप सेवा का जो दूसरा ग्रुप निमित्त बना उसके मुख्य एक्टर्स हो। आदि के समय का तो यह ग्रुप बैठा है लेकिन सेवा के आदि रत्न, सेवा के साथी बनके साथी बनाने वाले वह आप लोगों का ग्रुप है। तो बापदादा जितना इन्हों की महिमा करता है, आदि स्थापना के रत्नों की, इतना आदि सेवा के साथी उन्हों की भी महिमा करता है। चाहे फॉरेन है लेकिन निमित्त आप लोग हो। मैजारिटी सब सेवा की स्थापना के रत्न हो। तो आप लोगों को भी चांस तो अच्छा मिला है। मेहनत जरूर करनी पड़ती है क्योंकि उन्हों का रहना सहना, कल्चर न्यारा होता है उसको एक कल्चर में जोड़ना इसकी आप लोगों को मुबारक हो। अच्छी मेहनत की है। मेहनत तो करनी पड़ी है लेकिन सफलता हुई है। मेहनत व्यर्थ नहीं गई है, अभी रेसपाण्ड तो अच्छा मिलता है। विदेशी भी सेवा में साथी तो अच्छे बनते हैं। हर सेन्टर पर आपको साथ देने वाले तो बने हैं। बने हैं ना! बापदादा खुश है। तो एक-एक को पदम पदमगुणा मुबारक हो, मुबारक हो।

चन्द्रहास बाबू जी से:- ठीक है। मन मजबूत है ना। मन मजबूत है तो तन ठीक हो जायेगा। मन सदा खुशी में नाचता रहे। चाहे स्ट्रेचर पर जाये लेकिन माइण्ड डांस होती रहे। फिकर तो नहीं है ना। बेफिकर बादशाह।