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24-01-70          ओम शान्ति          अव्यक्त बापदादा          मधुबन 


"ब्राह्मणों का मुख्य धंधा समर्पण करना और कराना"

अपने जीवन की नैय्या किसके हवाले की है ? (शिवबाबा के) श्रीमत पर पूर्ण रीति से चल रहे हो ? श्रीमत पर चलना अर्थात् हर कर्म में अलौकिकता लाना  शिवबाबा के वरसे का पूरा अधिकारी अपने को समझते हो ? जो वर्से के अधिकारी बनते हैं, उन्हों का सर्व के ऊपर अधिकार होता है, वह कोई भी बात के अधीन नहीं होते  अगर अधीन होते हैं देह के, देह के सम्बन्धियों वा देह के कोई भी वस्तुओं से तो ऐसे अधीन होनेवाले अधिकारी नहीं हो सकते  अधिकारी अधीन नहीं होते हैं  सदैव अपने को अधिकारी समझने से कोई भी माया के रूप के अधीन बन्ने से बाख जायेंगे  हमेशा यह चेक करना कि अलौकिक कर्म कितने किये हैं और लौकिक कर्म कितने किये हैं ? अलौकिक कर्म औरों को अलौकिक बनाने की प्रेरणा देंगे  सभी ने यह लक्ष्य रखा है कि हम सभी ऊँचे ते ऊँचे बाप के बच्चे ऊँचे ते ऊँचा राज्य पद प्राप्त करेंगे वा जो मिलेगा वाही ठीक है ? जब ऊँचे से ऊँचे बाप के बच्चे हैं तो लक्ष्य भी ऊँचा रखना है  जब अविनाशी आत्मिक स्थिति में रहेंगे तब ही अविनाशी सुख की प्राप्ति होगी  आत्मा अविनाशी है ना

मधुबन में आकर मधुबन के वरदान को प्राप्त किया ? वरदान, विबर म्हणत के सहज ही मिलता है  अव्यक्ति स्थिति में अव्यक्ति आनंद, अव्यक्ति स्नेह, अव्यक्ति शक्ति इन सभी की प्राप्ति सहज रीति होती है  तो ऐसा वरदान सदैव कायम रहे, इसकी कोशिश की जाती है  सदैव वरदानों की याद में रहने से यह वरदान अविनाशी रहेगा  अगर वरदाता को भूले तो वरदान भी ख़त्म  इसलिए वरदाता को कभी अलग नहीं करना  वरदाता साथ है तो वरदान भी साथ है  सारी सृष्टि में सभी से प्रिय वास्तु (शिवबाबा) वाही है तो उनकी याद भी स्वतः ही रहनी चाहिए  जबकि है ही प्रिय में प्रिय एक तो फिर उनकी याद भूलते क्यों ? ज़रूर और कुछ याद आता होगा  कोई भी बात बिना कारन के नहीं होती  विस्मृति का भी कारण है  विस्मृति के कारन प्रिय वास्तु दूर हो जाती है  विस्मृति का कारन है अपनी कमज़ोरी  जो श्रीमत मिलती है उन पर पूरी रीति से न चलने कारन कमज़ोरी आती है  और कमज़ोरी के कारन विस्मृति होती है  विस्मृति में प्रिय वास्तु भूल जाती है  इसलिए सदैव कर्म करने के पहले श्रीमत की स्मृति रख फिर हर कर्म करो  तो फिर वह कर्म श्रेष्ठ होगा  श्रेष्ठ कर्म से श्रेष्ठ जीवन स्वतः ही बनती है  इसलिए हर कार्य के पहले अपनी चेकिंग करनी है  कर्म करने के बाद चेकिंग करने से जो उल्टा कर्म हो गया उसका तो विकर्म बन गया  इसलिए पहले चेकिंग करो फिर कर्म करो

ईश्वरीय पढ़ाई बहुत सहज और सरल रीति किसको देने का तरीका आता है ? एक सेकंड में किसको बाप का परिचय दे सकते हो ? जितना औरों को प्परिचय देंगे उतना ही अपना भविष्य प्रालब्ध बनायेंगे  यहाँ देना और वहाँ लेना  तो गोया लेना ही है  जितना देते रहो उतना समझो हम लेते हैं  इस ज्ञान का भी प्रत्यक्ष फल और भविष्य के प्रालब्ध प्राप्ति का अनुभव करना है  वर्तमान के प्राप्ति के आधार पर ही भविष्य को समझ सकते हो  वर्तमान अनुभव भविष्य को स्पष्ट करता है  अपने को किस रूप में समझकर चलते हो ? मैं शक्ति हूँ, जगत की माता हूँ यह भावना रहती है ? जो जगत माता का रूप है उसमे जगत के कल्याण का रहता है  शिवशक्ति रुप्प में कोई भी कमज़ोरी नहीं रहेगी  तो मैं जगतमाता हूँ और शिवशक्ति हूँ, यह दोनों रूप स्मृति में रखना तब मायाजीत बनेंगे  और विश्व के कल्याण की भावना से कई आत्माओं के कल्याण के निमित्त बनेंगे  नष्टोमोहा सम्बन्ध से वा अपने शरीर से बने हो ? नष्टोमोहा की लास्ट स्टेज कहाँ तक है ? जितना नष्टोमोहा बनेंगे उतना स्मृति रूप बनेंगे  तो स्मृति को सदा कायम रखने के लिए साधन है नष्टोमोहा बनना  नष्टोमोहा बनना सहज है वा मुश्किल है ? जब अपने आप को समर्पण कर देंगे तो फिर सभी सहज होगा  अगर समर्पण न कर के अपने ऊपर रखते हो तो मुश्किल भासता है  सहज बनाने का मुख्य साधन है समर्पण करना  बाप को जो चाहिए वो करावे  जैसे मशीन होती हैं, उन द्वारा सारा कारखाना चलता है  मशीन का काम है कारखाने को चलाना  वैसे हम निमित्त हैं  चलाने वाला जैसे चलावें  हमको चलना है  ऐसा समझने से मुश्किलात फील नहीं होगी  या स्थिति दिन प्रति दिन परिपक्व करनी है  इस मुख्य बात पर अटेंशन रखना है  जितना स्वयं को समर्पण करते हैं बाप के आगे, उतना ही बाप भी उन बच्चों के आगे समर्पण होते हैं  अर्थात् जो बाप का खज़ाना है वह स्वतः ही उनका बन जाता है  जो गुण अपने में होता है वह किसको देना मुश्किल क्यों ? समर्पण करना और कराना यही ब्राह्मणों का धंधा है  जो है ही ब्राह्मणों का धंधा तो ब्राह्मणों के सिवाए और कौन जानेंगे  जैसे बाप थोड़े में राज़ी नहीं होता बच्चों को भी थोड़े में राज़ी नहीं होना है

निश्चय की निशानी क्या है ? विजय  जितना निश्चयबुद्धि होंगे उतना ही सभी बैटन में विजयी होंगे  निश्चयबुद्धि की कभी हार नहीं होती  हार होती है तो समझना चाहिए कि निश्चय की कमी है  निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों में से हम एक रत्न हैं ऐसे अपने को समझना है  विघ्न तो आएंगे, उन्हों को ख़त्म करने की युक्ति है सदैव समझो कि यह पेपर है  अपनी स्थिति की परख यह पेपर कराता है  कोई भी विघ्न आये तो उनको पेपर समझ पास करना है  बात को नहीं देखना है लेकिन पेपर समझना है  पेपर में भी भिन्न-भिन्न क्वेश्चन होते हैं कभी मनसा का, कभी लोक-लाज का, कभी देशवासियों का क्वेश्चन आएगा  परन्तु इसमें घबराना नहीं है  गहराई में जाना है  वातावरण ऐसा बनाना चाहिए जो न चाहते भी कोई खींच आये  जितना खुद अव्यक्त वायुमंडल बनाने में बिजी रहेंगे  उतना स्वतः सभी होता रहेगा  जैसे रस्ते जाते कोई खुशबू भी न चाहते हुए खिचेंगी

जो लक्ष्य रखा जाता है उसको पूर्ण करने के लिए ऐसे लक्षण भी अपने में भरने हैं  ढीले कोशिश वाले कहाँ तक पहुँचेंगे ? कोशिश शब्द ही कहते रहेंगे तो कोशिश में ही रह जायेंगे  एम तो रखना है कि करना ही है  कोशिश अक्षर कहना कमजोरी है  कमजोरी को मिटाने के लिए कोशिश शब्द को मिटाना है  निश्चय से विजय हो जाती है  संशय लाने से शक्ति कम हो जाती है  निश्चयबुद्धि बनेंगे तो सभी का सहयोग भी मिलेगा  कोई भी कार्य करना होता है तो सदैव यही सोचा जाता है कि मेरे बिना कोई कर नहीं सकता तब ही सफ़लता होती है  आज से कोशिश अक्षर ख़त्म करो  मैं शिवशक्ति हूँ  शिवशक्ति सभी कार्य कर सकती है  शक्तियों की शेर पर सवारी दिखाते हैं  किस भी प्रकार माया शेर रूप में आये डरना नहीं है  शिवशक्ति कभी हार नहीं खा सकती  अभी समय ही कहाँ है  समय के पहले अपने को बदलने से एक का लाख गुणा मिलेगा बदलना ही है, तो ऐसे बदलना चाहिए  याद आता है कि अगले कल्प भी वारसा लिया था  अपने को पुराना समझने से वह कल्प पहले की स्मृति आने से पुरुषार्थ सहज हो जाता है  क्योंकि निश्चय रहता है कल्प पहले भी मैंने लिया था  अब भी लेकर छोड़ेंगे  कल्प पहले की स्मृति शक्ति दिलानेवाली होती है  अपने को नए समझेंगे तो कमजोरी के संकल्प आयेंगे  पा सकेंगे वा नहीं  लेकिन मैं हूँ ही कल्प पहले वाला इस स्मृति से शक्ति आएगी  सदैव अपने को हिम्मतवान बनाना चाहिए  हिम्मत हारना नहीं चाहिए  हिम्मत से मदद भी मिलेगी  हम सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे हैं, बाप को याद किया, यही हिम्मत है  बाप को याद करना सहज है व मुश्किल ? सहज करने में सहज हो जाता है  यह तो मेरा कर्त्तव्य ही है  फ़र्ज़ है  क्या करूँ यह संकल्प आने से मुश्किल हो जाता है  कभी भी अपने अन्दर कमज़ोर संकल्प को नहीं रहने देना  अगर मन में कमज़ोर संकल्प उत्पन्न भी हो जायें तो उनको वहां ही ख़त्म कर शक्ति शाली बनाना है  अब तक भी अगर कोशिश करते रहेंगे तो अव्यक्त कशिश का अनुभव कब करेंगे ? जब तक कोशिश है तब तक अव्यक्ति कशिश अपने में नहीं आ सकती है  यह भाषा ही कमजोरी की है  सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे यह नहीं कह सकते  उनके संकल्प, वाणी सभी निश्चय के होंगे  ऐसी स्थिति बनानी है  सदैव चेक करो कि संकल्प रूपी फाउंडेशन मज़बूत है  तीव्र पुरुषार्थी की चलन में यह विशेषता होगी जो उनके संकल्प, वाणी, कर्म तीनों ही एक समान होंगे  संकल्प उंच हों और कर्म कमज़ोर हों तो उनको तीव्र पुरुषार्थी नहीं कहेंगे  तीनों की समानता चाहिए  सदैव यह समझना चाहिए  जो कि माया कभी-कभी अपना रूप दिखाती है यह सदैव के लिए विदाई लेने आती है  विदाई के बदले निमंत्रण दे देते हो  सदैव शिवबाबा के साथ हूँ, उनसे अलग होंगे ही नहीं तो फिर कोई क्या करेंगे  कोई बिजी रहता है तो फिर तीसरा डिस्टर्ब नहीं करता है  समझते हैं तंग करने वाला कोई नहीं आये  तो एक बोर्ड लगा देते हैं  आप भी ऐसा बोर्ड लगाओ  तो माया लौट जाएगी  आने का स्थान ही नहीं मिलेगा  कुर्सी खाली होती है तो कोई बैठ जाता है

माताओं के लिए तो बहुत सहज है सिर्फ़ बाप को याद करना, बस  बाप को याद करने से ज्ञान आपे ही इमर्ज हो जाता है  बाप को जो याद करता है उनको हर कार्य में मदद बाप की मिल जाती है  याद की इतनी शक्ति है जो अनुभव यहाँ पाते हो वह वहाँ भी स्मृति में रखेंगे तो अविनाशी बन जायेंगे  बुद्धि में बार-बार यही स्मृति रखो हम परमधाम निवासी हैं  कर्त्तव्य अर्थ यहाँ आये हैं  फिर वापस जाना है  जितना बुद्धि को इन बातों में बिजी रखेंगे तो फिर भटकेंगे नहीं  ज्ञान भी किसको युक्ति से सुनना है  सीधा ज्ञान सुनाने से घबरा जायेंगे  पहले तो ईश्वरीय स्नेह में खींचना है  शरीरधारी को चाहिए धन, बाप को चाहिए मन  तो मन को जहा लगाना है वहाँ हो लगा रहे और कहाँ प्रयोग न हो  योगयुक्त अव्यक्त स्थिति में रह दो बोल बोलना भी भाषण करना ही है  एक घंटे के भाषण का सार दो शब्द में सुना सकते हो

दिन प्रतिदिन कदम आगे समझते हो ? ऐसे भी नहीं सोचना कि अभी समय पड़ा है, पुरुषार्थ कर लेंगे  लेकिन समय के पहले समाप्ति करके और इस स्थिति का अनुभा प्राप्त करना है  अगर समय आने पर इस स्थिति का अनुभव करेंगे तो समय के साथ स्थिति भी बदल जाएगी  समय समाप्त तो फिर अव्यक्त स्थिति का अनुभव भी समाप्त हो, दूसरा पार्ट आ जायेगा  इसलिए पहले से ही अव्यक्त स्थिति का अनुभव करना है  कुमार्यां दौड़ने में तेज़ होती हैं  तो इस ईश्वरीय दौड़ में भी तेज़ जाना है  फर्स्ट आने वाले ही फर्स्ट के नजदीक आयेंगे  जैसे साकार फर्स्ट गया ना  लक्ष्य तो ऊँचा रखना है  लक्ष्य सम्पूर है तो पुरुषार्थ भी सम्पूर्ण करना है, तब ही सम्पूर्ण पद मिल सकता  सम्पूर्ण पुरुषार्थ अर्थात् सभी बातों में अपने को संपन्न बनाना  बड़ी बात तो है नहीं  जानने के बाद याद करना मुश्किल होता है क्या ? जानने को ही नॉलेज कहा जाता है  अगर नॉलेज, लाइट और मिघ्त नहीं है तो वह नॉलेज ही किस काम की, उनको जानना नहीं कहा जायेगा  यहीं जानना और करना एक है  औरों में जानने और करने में फर्क होता है  नॉलेज वह चीज़ है जो वह रूप बना देती है  ईश्वरीय नॉलेज क्या रूप बनाएगी ? ईश्वरीय स्थिति  तो ईश्वरीय नॉलेज लेनेवाले ईश्वरीय रूप में क्यों नहीं आएंगे  थ्योरी और चीज़ है  जानना अर्थात् बुद्धि में धारणा करना और चीज़ है  धारणा से कर्म ऑटोमेटिकली हो जाता है  धारणा का अर्थ ही है उस बात को बुद्धि में समाना  जब बुद्धि में समां जाते हैं तो फिर बुद्धि के डायरेक्शन अनुसार कर्मेन्द्रियाँ भी वह करती हैं  नॉलेजफुल बाप के हम बच्चे हैं और ईश्वरीय नॉलेज की लाइट मिघ्त हमारे साथ है  ऐसे समझ कर चलना है  नॉलेजक सिर्फ सुनना नहीं लेकिन समाना है  भोजन खाना और चीज़ है हज़म करना और चीज़ है  खाने से शक्ति नहीं आएगी  हज़म करने से शक्ति कहाँ से आ जाती है, खाए हुए भोजन को हज़म करने से ही शक्ति रूप बनता है  शक्तिवान बाप के बच्चे और कुछ कर न सकें, यह हो सकता है ? नहीं तो बाप के नाम को भी शरमाते हैं  सदैव यही एम रखनी चाहिए हम ऐसा कर्म करें जो मिसाल बन दिखाएं  इंतज़ार में नहीं रहना है लेकिन एग्जाम्पल बनना है  बाप एग्जाम्पल बना ना

अपने घर में आये हो यह समझते हो ? जब कोई भटका हुआ अपने घर पहुँच जाता है तो जैसे विश्राम मिल जाता है  तो यहाँ विश्राम की भासना आती है  स्थान मिलने से विश्राम की स्थिति हो जाती है  सदैव विश्राम स्थिति में समझो  भाल कार्य अर्थ जाओ तो भी यह स्थिति का अनुभव साथ ले जाना  इसको साथ रखेंगे तो फिर कितना भी कार्य करते हुए स्थिति विश्राम की रहेगी  विश्राम अवस्था में शांति सुख का अनुभव होता है  अपने में जब शक्ति आ जाती है तो फिर वातावरण का भी असर अपने पर नहीं होता, लेकिन हमारा असर वातावरण पर रहे  सर्वशक्तिवान वातावरण है या बाप ? जबकि सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे हो तो फिर वातावरण आप से शक्तिशाली क्यों ? अपनी शक्ति भूलने से ही वातावरण का असर होता है  जैसे डॉक्टर कोई भी बीमारी वाले पेशेंट के आगे जायेगा तो भी उनको असर नहीं होगा  वैसे ही अपनी स्मृति रखकर सर्विस करनी है  यह अपने में शक्ति रखो कि हमें वातावरण को बनाना है ना कि वातावरण हमको बनावे  युगल होते हुए भी अकेली आत्मा की स्मृति में रहते हो ? आत्मा अकेली है ना  अगर आत्मा को सम्बन्ध में आना भी है तो किसके ? सर्व सम्बन्ध किससे हैं ? एक से  तो एक से दो भी बनना है बाप और बच्चे  तीसरा कोई सम्बन्ध नहीं  सर्व सम्बन्ध को एक से जोड़ना है  एक से दूसरा शिवबाबा  इस स्थिति को ही उंच स्थिति कहा जाता है  तीसरी कोई भी चीज़ देखते हुए देखने में न आये  अगर देखना है तो भी एक को, बोलना भी उनसे  ऐसी स्थिति रहने से ही माया जीत बनेंगे  जो माया जीत बनते हैं वह जगतजीत बन जाते हैं  यह शुद्ध स्नेह सारे कल्प में एक ही बार मिलता है  ऐसे स्नेह को हम पाते हैं यह सदैव याद रखना है  जो कोई को प्राप्त नहीं हो सकता वह हमें प्राप्त हुआ है  इसी नशे और निश्चय में रहना है  दिल्ली में नाम बाला होना, भारत में नाम बाला होना है

इतनी ज़िम्मेवारी दिल्ली वालों को उठानी है  समय कम है सर्विस बहुत है  इसी रफ़्तार से जब सर्विस करेंगे तब ही सभी को सन्देश पहुंचेगा  कोई को धनवान बनाने के लिए मौका देना भी महादान है, महादान का फल भी इतना मिलता है  बाप को सदैव साथ रखेंगे तो माया देखेगी इसके साथ सर्वशक्तिवान बाप है तो वह दूर से ही भाग जाएगी  अकेला देखती है तब हिम्मत रखती है  शिकार करने जब जाते हैं तो कोई भी जानवर वार न करें इसके लिए आ जलाते हैं  वैसे ही याद की अग्नि जली हुई होगी तो माया आ नहीं सकेगी  यह लगन की अग्नि बुझनी नहीं चाहिए  साथ रखने से शक्ति आपे ही आ जाएगी  फिर विजय ही विजय है

बापदादा को बुज़ुर्ग माताएं सबसे प्यारी लगती हैं  क्योंकि बहुत दुखों से थकी हुई हैं  तो थके हुए बच्चों पर बाप का स्नेह रहता है  इतना स्नेह बच्चों को भी रखना है  घर बैठे भी याद की यात्रा में पास हो गए तो भी आगे बढ़ सकते हो  जितना याद की यात्रा में सफल होंगे तो मन की भावनाएं भी शुद्ध हो जायेंगी  सभी सर्विस में सहयोगी हो रहते हो ? जितना दुश्रों को सन्देश देते हैं उतना अपने को भी सम्पूर्णता का सन्देश मिलता है  क्योंकि दूसरों को समझाने से अपने को सम्पूर्ण बनाने का न चाहते हुए भी ध्यान जाता हैं  यह सर्विस करना भी अपने को सम्पूर्ण बनाने का मीठा बंधन है  इस बंधन में जितना अपने को बाँध लेंगे उतना ही सर्व संबंधों से मुक्त होते जायेंगे  सर्व बंधनों से मुक्त होने का साधन क्या हुआ ? एक बंधन में अपने को बांधना  यह मीठा बंधन भी अब का ही है  फिर कभी नहीं होता  सभी इस ईश्वरीय बंधन में बंधी हुई आत्माएं हैं  श्रेष्ठ कर्म करने से ही श्रेष्ठ पद मिल सकता है और श्रेष्ठाचारी भी बन जाते हैं  एक ही श्रेष्ठ कर्म से वर्मान भी बन जाता है और भविष्य भी बनता  जिससे दोनों ही श्रेष्ठ बन जायें वह कर्म करना चाहिए  अहमदाबाद को सभी से ज्यादा सर्विस करनी है क्योंकि अहमदाबाद सभी सेंटर्स का बीज रूप है  बीज में ज्यादा शक्ति होती है  खूब ललकार करो  जो गहरी नींद में सोये हुए भी जाग उठें  कुमारियाँ तो बहुत कमाल कर सकती हैं  एक कुमारी में जितनी शक्ति है तो इतनी सर्विस में सफलता दिखानी चाहिए  कुमारियाँ पुरुषार्थ में, सर्विस में, सभी से तेज़ जा सकती हैं  शक्तियां सर्विस में आगे हैं वा पाण्डव ? अपना यादगार है हम कल्प पहले वाले पाण्डव हैं  कितने बार पाण्डव बने हो जो अनगिनत बार होती है वह पक्की याद रहती है ना  यह स्मृति रहेगी तो फिर कभी भी विस्मृति नहीं होगी  कल्प पहले भी हम ही थे अब भी हम ही हैं यह नशा और निश्चय रखना है  हम ही हक़दार हैं, किसके ? उंच ते उंच बाप के  यह याद रहने से फिर सदैव एकरस अवस्था रहेगी  एक की याद में रहने से ही एकरस अवस्था होगी

अव्यक्त में सर्विस कैसे होती है ? यह अनुभव होता जाता है ? अव्यक्त में सर्विस का साथ कैसे सदैव रहता है  यह भी अनुभव होता है ? जो वायदा किया है कि स्नेही आत्माओं के हर सेकंड साथ ही है  ऐसे सदैव साथ का अनुभव होता है ? सिर्फ रूप बदला है लेकिन कर्त्तव्य वाही चल रहा है  जो भी स्नेही बच्चे हैं उन्हों के ऊपर छत्र रूप में जज़र आता है  छत्रछाया के निचे सभी कार्य चल रहा है  ऐसी भासना आती है  व्यक्त से अव्यक्त, अव्यक्त से व्यक्त में आना यह सीढ़ी उतरना और चढ़ना जैसे आदत पद गयी है  अभी-अभी वहां, अभी अभी यहाँ  जिसकी ऐसी स्थिति हो जाती है, अभ्यास हो जाता है उसको यह व्यक्त देश भी जैसे अव्यक्त भासता है  स्मृति और दृष्टि बदल जाती है  सभी एवररेडी बनकर बठे हुए हो ? कोई भी देह के हिसाब किताब से भी हल्का  वतन में शुरू-शुरू में पक्षियों का खेल दिखलाते थे, पक्षियों को उड़ाते थे  वैसे यह आत्मा भी पक्षी है जब चाहे तब उड़ सकती है  वह तब हो सकता है जब अभ्यास हो  जब खुद उड़ता पक्षी बनें तब औरों को भी एक सेकंड में उड़ा सकते हैं  अभी तो समय लगता है  अपरोक्ष रीति से वतन का अनुभव बताया  अपरोक्ष रूप से कितना समय वतन में साथ रहते हो ? जैसे इस वक्त जिसके साथ स्नेह होता है, वह कहाँ विदेश में भी है तो उनका मन ज्यादा उस तरफ़ रहता है  जिस देश में वह होता है उस देश का वासी अपने को समझते हैं  वैसे ही तुमको अब सूक्ष्मवतनवासी बनना है  सूक्ष्मवतन को स्थूलवतन में इमर्ज करते हो वा खुद को सूक्ष्मवतन में साथ समझते हो ? क्या अनुभव है ? सूक्ष्मवतनवासी बाप को यहाँ इमर्ज करते हो वा अपने को भी सूक्ष्मवतनवासी बनाकर साथ रहते हो ? बापदादा तो यही समझते हैं कि स्थूल वतन में रहते भी सूक्ष्मवतनवासी बन जाते, यहाँ जो भी बुलाते हो यह भी सूक्ष्मवतन के वातावरण में ही सूक्ष्म से सर्विस ले सकते हो  अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर मदद ले सकते हो  व्यक्त रूप में अव्यक्त मदद मिल सकती है  अभी ज्यादा समय अपने को फ़रिश्ते ही समझो  फरिस्थों की दुनिया में रहने से बहुत ही हल्कापन अनुभव होगा जैसे कि सूक्ष्मवतन को ही स्थूलवतन में बसा दिया है  स्थूल और सूक्ष्म में अंतर नहीं रहेगा  तब सम्पूर्ण स्थिति में भी अंतर नहीं रहेगा  यह व्यक्त देश जैसे अव्यक्त देश बन जायेगा  सम्पूर्णता के समीप आ जायेंगे  जैसे बापदादा व्यक्त में आते भी हैं तो भी अव्यक्त रूप के अव्यक्त देश के अव्यक्ति प्रवाह में रहते हैं  वाही बच्चों को अनुभव कराने लिए आते हैं  ऐसे आप सबहीं भी अपने अव्यक्त स्थिति का अनुभव औरों को कराओ  जब अव्यक्त स्थिति की स्टेज सम्पूर्ण होगी तब ही अपने राज्य में साथ चलना होगा  एक आँख में अव्यक्त सम्पूर्ण स्थिति दूसरी आँख में राज्य पद  ऐसे ही स्पष्ट देखने में आएंगे जैसे साकार रूप में दिखाई पड़ता है  बचपन रूप भी और सम्पूर्ण रूप भी  बस यह बनकर फिर यह बनेंगे  यह स्मृति रहती है  भविष्य की रुपरेखा भी जैसे सम्पूर्ण देखने में आती है  जितना-जितना फ़रिश्ते लाइफ के नज़दीक होंगे उतना-उतना राजपद को भी सामने देखेंगे  दोनों ही सामने  आजकल कई ऐसे होते हैं जिनको अपने पस्त की पूरी स्मृति रहती है  तो यह भविष्य भी ऐसे ही स्मृति में रहे यह बनना है  वह भविष के संस्कार इमर्ज होते रहेंगे  मर्ज नहीं इमर्ज होंगे  अच्छा-

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