28-06-73   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


योगयुक्त होने से स्वत: युक्ति- युक्त संकल्प, बोल और कर्म होंगे  

सदा विजयी बनाने वाले, मरणासन्न आत्माओं को जी-दान देने वाले, सदा श्रेष्ठ कर्म करने और करवाने वाले योगेश्वर शिवबाबा बोले:-

जैसे जिसमानी मिलिट्री को मार्शल ऑर्डर करते हैं - एक सेकेण्ड में जहाँ हो, जैसे हो, वहाँ ही खड़े हो जाओ। अगर वह इस ऑर्डर को सोचने में व समझने में ही टाइम लगा दे तो उसका रिजल्ट क्या होगा? विजय का प्लान प्रैक्टिकल में नहीं आ सकता। इसी प्रकार सदा विजयी बनने वाले की विशेषता यही होगी एक सेकेण्ड में अपने संकल्प को स्टॉप कर लेना। कोई भी स्थूल कार्य व ज्ञान के मनन करने में बहुत बिज़ी हैं लेकिन ऐसे समय में भी अपने आप को एक सेकेण्ड में स्टॉप कर लेना।

जैसे वे लोग यदि बहुत तेजी से दौड़ रहे हैं वा कश्म-कश के युद्ध में उपस्थित हैं, वे ऐसे समय में भी स्टॉप कहने से स्टॉप हो जायेंगे। इसी प्रकार यदि किसी समय यह संकल्प नहीं चलता है अथवा इस घड़ी मनन करने के बजाय बीज रूप अवस्था में स्थित हो जाना है। तो सेकेण्ड में स्टॉप हो सकते हैं? जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियों को एक सेकेण्ड में जैसे और जहाँ करना चाहें वह कर सकते हैं, अधिकार है न उन पर? ऐसे बुद्धि के ऊपर और संकल्पों के ऊपर भी अधिकारी बने हो? फुलस्टॉप वर्ना चाहो तो कर सको क्या ऐसा अभ्यास है? विस्तार में जाने के बजाय एक सेकेण्ड में फुलस्टॉप हो जाय ऐसी स्थिति समझते हो? जैसे ड्राइविंग का लाइसेन्स लेने जाते हैं तो जानबूझ कर भी उनसे तेज स्पीड करा के फिर फुलस्टॉप कराते हैं व बैक कराते हैं। यह भी प्रैक्टिस है ना? तो अपनी बुद्धि को चलाने और ठहराने की भी प्रैक्टिस करनी है। कमाल तब कहेंगे जब ऐसे समय पर एक सेकेण्ड में स्टॉप हो जायें। निरन्तर विजयी वह जिसके युक्ति-युक्त संकल्प व युक्ति-युक्त बोल व युक्ति-युक्त कर्म हों या जिसका एक संकल्प भी व्यर्थ न हो। वह तब होगा जब यह प्रैक्टिस होगी मानो कोई ऐसी सर्विस है जिसमें फुल विजयी होना होता है तो ऐसे समय भी स्टॉप करने का अभ्यास करो।

अभी समय ऐसा आ रहा है जो सारे भंभोर को आग लगेगी। उस आग से बचाने के लिए मुख्य दो बातें आवश्यक हैं। जब विनाश की आग चारों ओर लगेगी उस समय आप श्रेष्ठ आत्माओं का पहला कर्त्तव्य है-शान्ति का दान अर्थात् सफलता का बल देना। उसके बाद क्या चाहिए? फिर जिसको जो आवश्यकता होती है वह पूर्ण की जाती है। आप लोगों को ऐसे समय उनकी कौन-सी आवश्यकता पूर्ण करनी पड़ेगी? उस समय हरेक को अलग- अलग शक्ति की आवश्यकता होगी। कोई को सहन करने की शक्ति की आवश्यकता होगी, किसी को समेटने की शक्ति की आवश्यकता होगी, किसी को निर्णय करने की शक्ति की आवश्यकता होगी और कोई को मुक्ति की आवश्यकता होगी। जिसकी जो आशा होगी वह पूर्ण करने के लिये बाप के परिचय द्वारा एक सेकेण्ड में अशान्त आत्मा को शान्त कराने की शक्ति भी उस समय आवश्यक होगी। तो यह सभी शक्तियाँ अभी से ही इकट्ठी करनी हैं, नहीं तो उस समय जी-दान कैसे दे सकेंगे? सारे विश्व की सर्व- आत्माओं को शक्तियों का दान देना पड़ेगा। इतना स्टॉक जमा करना है जो स्वयं भी अपने को शक्ति के आधार पर चला सकें और दूसरों को भी दे सकें। कोई भी वंचिज न रहे। एक आत्मा भी यदि वंचित रही तो बोझ किस पर होगा? जो निमित्त बने हुए हैं - जी-दान देने के लिये। तो अपनी हर शक्ति के स्टॉक को चेक करो। जिनके पास शक्तियों का स्टॉक जमा है वही लक्की स्टार्स के रूप में विश्व की आत्माओं के बीच चमकते हुये नजर आयेंगे। तो अब ऐसी चेकिंग करनी है।

अमृत वेले से उठकर अपने को अटेन्शन के पट्टे पर चलाना है। पटरी पर गाड़ी ठीक चलेगी ना? तुम्हारे ऊपर सारे विश्व की जिम्मेवारी है, सिर्फ भारत की नहीं। श्रेष्ठ आत्माओं का हर कर्म महान् है ना? तो यह चेकिंग करनी है। सारे दिन में कोई ऐसा बोल तो नहीं बोला? व मन्सा में कोई व्यर्थ संकल्प तो नहीं चला या कोई कर्म राँग तो नहीं हुआ? हर संकल्प पर पहले से ही अटेन्शन रहे। योग-युक्त होने से ऑटोमेटिकली युक्ति-युक्त संकल्प, बोल और कर्म होगा। अच्छा।

महावाक्यों का सार

1. सदा विजयी बनने वाले की विशेषता यही होगी कि वह एक सेकेण्ड में अपने संकल्प को स्टॉप कर लेगा।

2. निरन्तर विजयी के युक्ति-युक्त संकल्प, युक्ति-युक्त बोल व युक्ति- युक्त कर्म हों, एक संकल्प भी व्यर्थ न हो। यह तब होगा जब अपनी बुद्धि को चलाने और ठहराने की प्रैक्टिस की होगी।

3. महाविनाश के समय आप श्रेष्ठ आत्माओं का पहला कर्त्तव्य है शान्ति का दान देना और फिर हरेक आत्मा की आवश्यकतानुसार शक्तियों का दान देना।

4. श्रेष्ठ आत्माओं का हर कर्म महान् होता है।