23-01-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


स्वमान की सीट पर सैट होकर कर्म करने वाला ही महान्

सर्व आत्माओं के परमपिता परमात्मा शिव बोले

जैसे बापदादा के महत्व को अच्छी तरह से जानते हो वैसे ही इस संगमयुगी ब्राह्मण जन्म को व श्रेष्ठ आत्मा के अपने श्रेष्ठ पार्ट को इतना ही अच्छी रीति से जानते हो? जैसे बाप महान् है, वैसे ही बाप के साथ जिन आत्माओं का हर कदम व हर चरित्र के साथ सम्बन्ध व पार्ट है, वह भी महान् हैं। इस महानता को अच्छी रीति से जानते हुए हर कदम उठाने से हर कदम में पद्मों की प्राप्ति स्वत: ही हो जाती है क्योंकि सारा आधार स्मृति पर है। स्मृति सदा पॉवरफुल और महान् रहती है या कभी महान् और कभी साधारण रहती है? जो जैसा होता है, वैसा ही वह सदा स्वयं को स्वत: ही समझ कर चलता है। वह कभी स्मृति तथा कभी विस्मृति में नहीं आता। ऐसे ही जब आप उच्च ब्राह्मण हो, विश्व में सर्व श्रेष्ठ आत्माएँ हो और विशेष पार्टधारी हो, फिर अपने इस अन्तिम जन्म के इस रूप की, अपनी पोजीशन की व अपने ऑक्युपेशन की स्मृति कभी विशेष और कभी साधारण क्यों रहती है? बार-बार उतरना और चढ़ना क्यों होता है? क्या इसके कारण को समझते हो? जबकि निजी स्वरूप है और जन्म ही महान् है, तो अपने जीवन की और जन्म की महानता को भूलते क्यों हो? भूलना तब होता है जब कि पार्ट बजाने के लिये टेम्पोरेरी रूप बनाया जाता है। निजी रूप न होने के कारण बार-बार स्मृति-विस्मृति होती रहती है। यहाँ क्यों भूलना होता है? देह-अभिमान के कारण। देह अभिमान क्यों आता है? इन सब कारणों को तो बहुत समय से जानते हो न? जानते हुए भी निवारण नहीं कर पाते हो। इसका कारण शक्ति की कमी है या दृढ़ता नहीं है। यह भी बहुत समय से जानते हो, फिर भी निवारण क्यों नहीं कर पाते? वही बात बार-बार अनुभव में आने के कारण परिवर्तन करना तो सहज और सदाकाल के लिए होना चाहिए न।

जैसे लौकिक रीति में मालूम पड़ जाता है कि इस बात के कारण नुकसान होता है, रिजल्ट अच्छा नहीं निकलता है तो एक बार धोखा खाने के बाद स्वत: ही सम्भल जाते हैं न कि बार-बार धोखा खाते हैं? देह-अभिमान के कारण अथवा किसी भी कमजोरी के वशीभूत होने से परिणाम क्या होता है? - इस बात के अनेक बार अनुभवी हो चुके हो। अनुभवी होने के बाद फिर भी धोखा खाते हो, तो ऐसे को क्या कहा जायेगा? इससे सिद्ध होता है कि अपनी महानता को स्वयं ही सदा जानकर नहीं चलते हो। अपनी महानता को भूलते क्यों हो? कारण? - क्योंकि विघ्न-विनाशक, सर्व-परिस्थितियों को मिटाने वाले, स्व-स्थिति व पोजीशन के श्रेष्ठ स्थान और स्वमान की सीट जो बापदादा ने संगमयुग पर दी हुई है उस सीट पर सैट नहीं होते हो। अपनी सीट को छोड़कर बारबार नीचे आ जाते हो। सीट पर रहने से स्वमान भी स्वत: स्मृति में रहता है। लौकिक रीति भी कोई साधारण आत्मा को सीट मिल जाती है तो स्वमान ही बढ़ जाता है, उस नशे में स्वत: ही स्थित हो जाते हैं। ऐसे ही सदा अपनी सीट पर रहो तो स्वमान निरन्तर स्मृति में रहे, समझा?

सीट के नीचे आना अर्थात् स्मृति से नीचे विस्मृति में आना। ऊंची सीट पर सैट रहने की चेकिंग करो। सीट पर सेट होने से स्वत: ही वह संस्कार और कर्म परिवर्तन में आ ही जाते हैं। समझा? कमजोरी के बोल ब्राह्मणों की भाषा ही नहीं। शूद्रपन की भाषा को क्यों यूज़ (प्रयोग) करते हो? अपने देश और अपनी भाषा का नशा रहता है ना। अपनी भाषा को भूल दूसरे की भाषा क्यों बोलते हो? तो अब यह परिवर्तन करो। पहले चेक करो, फिर बोलो। सीट पर सैट होकर के फिर संकल्प व कर्म करो। इस सीट पर रहने से स्वत: ही महानता का वरदान प्राप्त हो जाता है। तो वरदानी सीट को छोड़कर के मेहनत क्यों करते हो? मेहनत करते-करते फिर थक भी जाते हो और दिलशिकस्त हो जाते हो। इसलिये अब सहज साधन अपनाओ। अच्छा।

इस मुरली के विशेष ज्ञान-बिन्दु

1. अपने जन्म और जीवन की महानता को भूलने के कारण ही अवस्था में बारबार उतरना-चढ़ना होता रहता है।

2. जैसे बाप महान् है, वैसे बाप के साथ जिन आत्माओं का हर कदम व हर चरित्र के साथ सम्बन्ध है व पार्ट है वह भी महान् है। ऐसा समझ कर कदम उठाने से हर कदम में पद्मों की कमाई स्वत: हो जाती है।

3.अपने जीवन की, जन्म की महानता को भूलने का कारण यह है कि स्वमान की सीट, जो बापदादा ने संगम पर दी है, उस पर सदा सैट नहीं रहते हो।