07-10-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


महारथी वत्सों का अलौकिक मिलन

कर्म-बन्धनों से मुक्ति दिलाने वाले, विश्व की सेवा में तत्पर, निराकार, जन्म-मरण रहित,
अमरनाथ शिव बाबा महारथी बच्चों के सम्मुख बोले -

महारथी और सब बच्चे अमृतवेले जब रूह-रूहान करते हैं तो महारथियों की रूह-रूहान और मिलन-मुलाकात और अनेक आत्माओं के मिलन और रूह- रूहान में क्या अन्तर होता है?

यह जो गायन है कि आत्मा, परमात्मा में लीन हो जाती है, यह कहावत किस रूप में राँग है। क्योंकि एक शब्द बीच से निकाल दिया है। सिर्फ लीन शब्द नहीं हैलेकिन लवलीन। एक शब्द है लीन। एक लव में लीन। जो कोई अति स्नेह से मिलते हैं, तो उस समय स्नेह के मिलन के शब्द क्या निकलते हैं? यह तो जैसे कि एक-दूसरे में समा गए हैं या दोनों मिलकर एक हो गए हैं। ऐसे-ऐसे स्नेह के शब्दों को उन्होंने इस रूप से ले लिया है। यह जो गायन है कि वे एक-दूसरे में समाकर एक हो गये यह है जैसे कि महारथियों का मिलन। बाप में समा गये अर्थात् बाप का स्वरूप हो गये। ऐसा पॉवरफुल अनुभव महारथियों को ज्यादा होगा। बाकी और जो हैं वह खींचते हैं। स्नेह, शक्ति खींचने की कोशिश करते हैं - युद्ध करते-करते समय समाप्त कर देंगे-लेकिन महारथी बैठे और समाये। उनका लव इतना पॉवरफुल है जो बाप को स्वयं में समा देते हैं। बाप और बच्चा समान स्वरूप की स्टेज पर होंगे। जैसे बाप निराकार वैसे बच्चा। जैसे बाप के गुण, वैसे महारथी बच्चों के भी समान गुण होंगे। मास्टर हो गये ना? तो महारथी बच्चों का मिलन अर्थात् लवलीन होना। बाप में समा जाना। समा जाना अर्थात् समान स्वरूप का अनुभव करना। उस समय बाप और महारथी बच्चों के स्वरूप और गुणों में अन्तर नहीं अनुभव करेंगे। साकार होते हुए भी निराकार स्वरूप के लव में खोये हुए होते हैं, तो स्वरूप भी बाप समान हो गया। अर्थात् अपना निराकारी स्वरूप प्रैक्टिकल स्मृति में रहता है। जब स्वरूप-बाप-समान है तो गुण भी बाप समान। इसलिए महारथियों का मिलना अर्थात् बाप में समा जाना। जैसे नदी सागर में समा, सागर स्वरूप हो जाती है अर्थात् सर्व बाप के गुण स्वयं में अनुभव होते हैं, जो ब्रह्मा का अनुभव साकार में था, वह महारथियों का भी होगा। ऐसा अनुभव होता है? यह है सागर में समा जाना अर्थात् स्वयं के सम्पूर्ण स्टेज का अनुभव करना। यह अनुभव अब ज्यादा होना चाहिए।

हर संकल्प से वरदानी, नजर से वरदानी, नजर से निहाल करने वाले - बापदादा हर बच्चे की समीपता को देखते हैं। समीप अर्थात् समा जाना। अमृत वेले का टाईम है विशेष, ऐसा पॉवरफुल अनुभव करने का है। ऐसे अनुभव का प्रभाव सारा दिन चलेगा। जो अति प्यारी वस्तु होती है वह सदा समाई हुई रहती है। यह है महारथियों का मिलन अमृत वेले का। बाप दादा भी चेक करते हैं कौन-कौन कितना समीप है। जैसे मंदिर का पर्दा खुलता है दर्शन करने के लिए। वैसे अमृत वेले की सीन भी होती है। पहले मिलन मनाने की। हर बच्चा अमृत वेले का मिलन मनाने लिए, फर्स्ट नम्बर मिलन मनाने की दौड लगाने में तत्पर होता हैं। बाप चकमक है ना। तो ऑटोमेटिकली जो स्वयं स्वच्छ होते हैं, वह समीप आते हैं। बाहर की रीति से चाहे कोई कितना भी प्रयत्न करे लेकिन चकमक की तरफ समाने वाली स्वच्छ आत्मायें ही होती हैं। वह दृश्य बड़ा मजे का होता है। साक्षी होकर दृश्य देखने में बड़ा मजा आता है।

बच्चों को संकल्प उठता है कि बाप वतन में क्या करते रहते हैं-ब्रह्मा बाप साकार रूप से भी अव्यक्त रूप में अभी दिन-रात सेवा में ज्यादा सहयोगी बनने का पार्ट बजा रहे हैं। क्योंकि अब बाप-समान जन्म-मरण से न्यारा कर्म-बन्धन से मुक्त, कर्मातीत हैं। सिद्धि स्वरूप है। इस स्टेज में हर संकल्प से सिद्धि प्राप्त होती है। जो संकल्प किया वह सत्। इसलिए चारों ओर संकल्प की सिद्धि रूप से सहयोगी हैं। वाणी से संकल्प की गति तीव्र होती है। साकार से आकार की गति तीव्र है। तो संकल्प से सेवा का पार्ट है - वह भी सत-संकल्प। शुद्ध संकल्प। आपकी है ज्यादा वाणी द्वारा सेवा, मन्सा से भी है लेकिन ज्यादा वाणी से है, लेकिन ब्रह्मा बाप की अब सत्-संकल्प की सेवा है। तो तीव्र गति होगी ना? तो अभी सेवा का पार्ट ही चल रहा है। सेवा के बन्धन से मुक्त नहीं हैं, कर्म-बन्धन से मुक्त हैं। अच्छा।

इस मुरली का सार

1. महारथी बच्चों का लव इतना पॉवरफुल होता है कि बाप को स्वयं में समा देते हैं। उस समय बाप और महारथी बच्चों के स्वरूप और गुणों में कोई अन्तर अनुभव नहीं होता