24-10-75   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


शक्तियों का विशेष गुण - निर्भयता

शिव-शक्ति सेना के सर्वोच्च अधिपति सर्वशक्तिवान् शिव बाबा ने पंजाब व गुजरात ज़ोन की
शिव-शक्तियों को सम्बोधित करते हुए ये मधुर महावाक्य उच्चारे :-

शक्तियों का विशेष गुण निर्भयता का गाया हुआ है। वह अपने में अनुभव करती हो? निर्भय सिर्फ कोई मनुष्यात्मा से नहीं लेकिन माया के वार से भी निर्भय। जो माया से घबराने वाली नहीं, उसको शक्ति कहा जाता है। माया से डरती तो नहीं हो? जो डरता है वह हार खाता है। जो निर्भय होता है उससे माया खुद भयभीत होती है, क्योंकि भय के कारण शक्ति खो जाती है और समझ भी खो जाती है। वैसे भी जब किसी से भय होता है तो होश-हवास गुम हो जाते हैं, जो समझ होती है वह भी गुम हो जाती है। तो यहाँ भी जो माया से घबराते हैं उनकी माया से समझ खो जाती, इसलिए वे माया को जीत नहीं सकते। तो जैसा नाम है - शक्ति सेना। तो जब शक्तिपन की विशेषता - निर्भयता प्रैक्टिकल में दिखाई दे, तब कहेंगे शक्तियाँ। किसी भी प्रकार का भय है तो उसे शक्ति नहीं कहेंगे। अबला जो होती है वह सदैव अधीन होती है, वह अधिकारी नहीं होती। आप तो अधिकारी हो ना? भय के कारण अधीन तो नहीं हो जायेंगी? तो पंजाब की शक्ति-सेना ऐसी निर्भय है?

जब से ब्राह्मण बने हो तो माया को चैलेन्ज दी है कि - आओ माया! जितना वार करना हो, उतना करो, मैं शिव-शक्ति हूँ। माया के परवश होना अपनी किसी कमज़ोरी के कारण होता है। जहाँ कमजोरी है वहाँ माया है। जैसे जहाँ गन्दगी है वहाँ मच्छर ज़रूर पैदा होते हैं। वैसे ही माया भी, जहाँ कमज़ोरी होती है वह वहीं प्रवेश होती है। तो कमज़ोर होना अर्थात् माया का आह्वान करना। खुद ही आह्वान करते और खुद ही डरते, तो फिर आह्वान करते ही क्यों हो? यह नशा रखो कि - हम हैं ही शिव-शक्ति सेना। कल्प पहले भी माया पर विजयी बनी थीं। अब भी वही पार्ट फिर रिपीट कर रही हूँ। कितनी ही बार के विजयी हो? जो अनेक बार का विजयी है वह कितना निर्भय होगा? क्या वह डरेंगे? शक्तियों ने बाप को प्रत्यक्ष करने का नगाड़ा कौन-सा बजाया है? कुम्भकरण को जगाने के लिये बड़ा नगाड़ा बजाओ। छोटा नगाड़ा बजाती हो तो कुम्भकरण करवट तो बदलते हैं अर्थात् अच्छा-अच्छा तो करते हैं परन्तु फिर सो जाते हैं। तो उन्हों के लिए अब छोटे-मोटे नगाड़े से काम न होगा, इसलिए बार-बार सम्पर्क बढ़ाना पड़े। उन्हों का दोष नहीं, वह तो गहरी नींद में हैं। तुम्हारा काम है कोई विशेष प्रोग्राम बनाय उन्हों को जगाना।

प्रवृत्ति में रहते अपने को सेवाधारी समझने से ही बाप को सदा साथी बना सकेंगे

पंजाब से आये हुए गोपों से मुलाकात करते समय अव्यक्त बापदादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे: -

जैसा स्थान होता है, उस स्थान की स्मृति से भी स्थिति में बल मिलता है। जैसे मधुबन-निवासी कहने से फरिश्तापन की स्थिति ऑटोमेटिकली हो जाती है। फरिश्ता अर्थात् जिसका देह से रिश्ता नहीं। तो जो भी देह के रिश्ते हैं वह सब यहाँ भूल जाते हैं। थोड़े समय के लिए भी यह अनुभव तो करते हो ना। यह बीच-बीच में मधुबन में आना; इतना मुश्किल होते हुए भी यह अनुभव करने क्यों आते हो? बार-बार यह अनुभव तो कराया जाता है। यहाँ का अनुभव वहाँ स्मृति में बल देता है। इसलिए मधुबन में आना ज़रूरी है। वहाँ प्रवृत्ति में रहते हो, वह भी सेवा-अर्थ। घर समझेंगे तो गृहस्थी, सेवाधारी समझेंगे तो ट्रस्टी। गृहस्थी में चारों ओर के कर्म-बन्धन खींचेंगे। सेवाधारी समझेंगे तो ट्रस्टीपन में मेरा-पन खत्म होगा। गृहस्थी में मेरा-पन होता है। मेरा-पन बहुत लम्बा है। जहाँ मेरा-पन है वहाँ बाप नहीं हो सकता। जहाँ मेरा-पन नहीं वहाँ बाप है। गृहस्थीपन में हद के अधिकारी बन जाते हो - मेरा माना जाय, मेरा सुना जाय और मेरे प्रमाण चलना चाहिए। जहाँ हद का अधिकार है, वहाँ बेहद का अधिकार खत्म हो जाता है। अब बीती को बीती करके फुलस्टॉप लगाते जाओ। फुलस्टॉप बिन्दी होता है। फुलस्टॉप नहीं लगाते अर्थात् बिन्दी रूप में स्थित नहीं होते तो या आश्चर्य (!) या कॉमा (,) या क्वेश्चन (?) लगा देते हो। आश्चर्य की निशानी क्या कहे? जो कहते हैं - ऐसे यह होता है क्या! ब्राह्मणों में यह-यह बात होती है! यह आश्चर्य की निशानी हो गई। यह भी नहीं होना चाहिये। यह क्यों हुआ? क्यों-क्या कहना यह क्वेश्चन हुआ। यह भी व्यर्थ संकल्प उत्पन्न होने का आधार है। जो होता है उसको साक्षी हो देखो। साक्षी के बजाय आत्मा के साथी बन जाते हो, बाप के साथी के बजाय आत्मा के साथी बन जाते हो। अच्छा ऐसी बात है!, मैं भी ऐसे समझता हूँ। - यह है सुनने का साथ और सुनाने का साथ। तो जहाँ आत्मा के साथी बने तो परमात्मा के साथी कैसे बनेंगे? जितना समय आत्मा का साथी, उतना समय बाप के साथी नहीं बनेंगे। यह खण्डित योग हो जाता है। खण्डित चीज़ फैंकने वाली होती है। वही मूर्ति जो पूजने योग्य होती है - जब वह खण्डित हो जाती है तो उसकी कोई वैल्यू नहीं होती। तो यहाँ भी जब योग खण्डित, तो श्रेष्ठ प्राप्ति नहीं, अर्थात् वैल्यू नहीं। सदा के साथी। अखण्ड योगी। अटूट योगी और निरन्तर बापदादा के साथी - ऐसे हैं पंजाब निवासी?

इस मुरली के विशेष तथ्य

1. जैसा स्थान होता उस स्थान की स्मृति से भी स्थिति में बल मिलता है।

2. प्रवृत्ति में रहते घर समझेंगे तो गृहस्थी, सेवाधारी समझेंगे तो ट्रस्टी।

3. अब बीती को बीती करके फुलस्टॉप (.) लगाते जाओ तो व्यर्थ संकल्पों का चक्कर चलना रूक जायेगा।

4. सिर्फ मनुष्यात्मा से ही नहीं बल्कि माया के वार से भी निर्भय आत्मा शक्ति है।

5. अपनी ही किसी कमज़ोरी के कारण माया के परवश होते हैं।

6. मैं कल्प-कल्प की अनेक बार की विजयी आत्मा हूँ - यह याद रहने से माया से निर्भय रहेगे।