22-01-76   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


परिवर्तन का मूल आधार- हर सेकेण्ड सेवा में बिज़ी रहना

विश्व-सेवाधारी, महादानी बनाने वाले, वरदाता शिव बाबा बोले

महारथियों के रूह-रूहान में विशेष कौनसी रूह-रूहान चलती है? बहुत करके महारथियों के रूह-रूहान में यही बात निकलती है कि समय-प्रमाण परिवर्तन कैसे होना है? समय और स्वयं को देखते हुए यह प्रश्न उठता है कि क्या होगा? लेकिन परिवर्तन का मूल आधार है - हर सेकेण्ड सेवा में बिज़ी (Busy) रहना। हर महारथी के अन्दर सदा यह संकल्प रहे कि जो भी समय है, वह सेवा-अर्थ ही देना है। चाहे अपने देह व शरीर के आवश्यक कार्य में भी समय लगाते हो, तो भी स्वयं के प्रति लगाते हुए मन्सा विश्व-कल्याण की सेवा साथ-साथ कर सकते हैं। अगर वाचा और कर्मणा नहीं कर सकते तो मन्सा कल्याणकारी भावना का संकल्प रहे तो वह भी सेवा के सब्जेक्ट में जमा हो जाता है।

भक्ति-मार्ग में महादानी किसको कहा जाता है? जो स्वयं के प्रति नहीं बल्कि हर वस्तु, हर समय अन्य को दान-पुण्य करने में लगावे, उसको महादानी कहा जाता है। वर्ना तो दानी कहा जाता। जो अविनाशी दान करता ही रहे, सदा दान चलता रहे उसको कहा जाता है महादानी। ऐसे ही स्वयं के प्रति समय देते हुए भी सदा समझे कि मैं विश्व की सेवा पर हूँ। जब जैसे स्टेज पर बैठते हैं तो सारा समय विशेष अटेन्शन रहता है कि मैं इस समय सेवा की स्टेज पर हूँ; तो हल्कापन नहीं रहता है, सेवा का फुल अटेन्शन रहता है। ऐसे ही सदा अपने को सेवा की स्टेज पर समझो। इसी द्वारा ही परिवर्तन होगा। जो भी कुछ स्वयं में कमज़ोरी महसूस होती है वह सब इस सेवा के कार्य में निरन्तर रहने से सेवा के फलस्वरूप अन्य आत्माओं के दिल से आशीर्वाद की प्राप्ति या गुणगान होता है; उस प्राप्ति के आधार से खुशी और उसके आधार से और बिज़ी (Busy) रहने से वह कमी समाप्त हो जायेगी। तो परिवर्तन होने का साधन यही है जिसको ही एक-दूसरे में अटेन्शन (Attention) खिंचवाते प्रैक्टिकल में लाना है। तो याद की यात्रा में स्थित रहना - यह भी वर्तमान समय विश्व-कल्याणकारी की स्टेज प्रमाण सेवा में जमा हो जाता है। क्योंकि अब महारथियों की याद की यात्रा का समय सिर्फ स्वयं प्रति नहीं, याद की यात्रा का समय भी स्वयं के साथ-साथ सर्व के कल्याण व सर्व की सेवा के प्रति है। स्वयं का अनुभव करने का तो समय काफी मिला लेकिन अब महादानी और वरदानी की स्टेज है।

(अव्यक्त बाप-दादा ने पुन: पूछा) महारथी की परिभाषा क्या हुई? महारथी अर्थात् डबल ताजधारी अर्थात् डबल सेवाधारी। स्वयं की और सर्व की सेवा का बैलेन्स हो, उसको कहेंगे महारथी। बच्चों के बचपन का समय स्वयं के प्रति होता है और ज़िम्मेवार आत्माओं का समय सेवा प्रति होता है। तो घोड़ेसवार और प्यादों का समय स्वयं प्रति ज्यादा जायेगा। स्वयं ही कभी बिगड़ेंगे, कभी धारणा करेंगे, कभी धारणा में फेल होते रहेंगे। कभी तीव्र पुरूषार्थ में, कभी साधारण पुरूषार्थ में होंगे। कभी किसी संस्कार से युद्ध तो कभी किसी संस्कार से युद्ध। वे स्वयं के प्रति ज्यादा समय गँवायेंगे। लेकिन महारथी ऐसे नहीं करेंगे। जैसे बच्चे होते हैं - खिलौने से खेलेंगे भी, बनायेंगे भी और बिगाड़ेंगे भी। यह भी अपने संस्कार रूपी खिलौने से कभी खेलते, कभी बिगाड़ते, कभी बनाते हैं, कभी वशीभूत हो जाते हैं और कभी उसको वशीभूत कर लेते हैं। लेकिन यह बचपन की निशानी है, महारथी की नहीं। अच्छा!