11-01-77   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


स्वयं का परिवर्तन ही विश्व-परिवर्तन का आधार

स्वयं के परिवर्तन से विश्व परिवर्तन करने की युक्ति बताते हुए अव्यक्त बाप-दादा बोले :-

बापदादा अपनी फुलवाड़ी को देख भी रहे हैं और सदा देखते भी रहते हैं। अमृतवेले से लेकर फुलवाड़ी को देखते हैं। आज भी बाप-दादा फुलवाड़ी को देख रहे थे कि हर एक किस प्रकार का, कितना खुशबूदार और कैसा रूप-रंग वाला फूल है। कली है या कली से फूल बने हैं? हर एक की विशेषता क्या है और आवश्यकता क्या है? खुशबूदार तो बने, लेकिन वह खुशबू अविनाशी और दूर तक फैलने वाली है? एक फूल होते हैं जिनकी खुशबू सामने से आती है, दूर से नहीं आती। तो यहाँ भी खुशबूदार तो बने हैं, लेकिन जब बाप के सम्मुख वा सेवा के निमित्त आत्माओं के सामने जाते हैं तो खुशबू होती है, लेकिन सेवा के बिना साधारण कर्म करते हुए वा शरीर निर्वाह करते हुए वह खुशबू नहीं रहती। कोई-कोई फूल दूर से भी आकर्षण करता है। रंग-रूप के आधार पर आकर्षण करता है न कि खुशबू के आधार पर। रंग, रूप, खुशबू आदि सभी में सम्पन्न हों - ऐसे बहुत थोड़े से चुने हुए फूल देखे। रंग, रूप अर्थात् सेन्सीबुल (Sensible;समझदार) हैं और खुशबू वाले इसेन्सफुल (Essenceful) हैं। मैजारिटी (Majority) सेन्सीबुल हैं। इसेन्सफुल थोड़े हैं। सेन्स (Sense) के आधार पर सेवाधारी तो बन गए हैं, लेकिन रूहानी सेवाधारी बनें - ऐसे कम हैं। कारण? जैसे बाप निराकार सो साकार बन सेवा का पार्ट बजाते हैं, वैसे बच्चों को इस मंत्र का यंत्र भूल जाता है कि हम भी निराकार सो साकार रूप में पार्ट बजा रहे हैं। निराकार सो साकार - यह दोनों स्मृति साथ-साथ नहीं रहती हैं। या तो निराकार बन जाते और या साकारी हो जाते हैं। सदा यह मंत्र याद रहे कि निराकार सो साकार - यह पार्ट बजा रहे हैं। यह साकार सृष्टि, साकार शरीर स्टेज है। स्टेज और पाटर्धारी दोनों अलग-अलग होते हैं। पार्टधारी स्वयं को कब स्टेज नहीं समझेंगे। स्टेज आधार है, पार्टधारी आधार मूर्त्त है, मालिक है। इस शरीर को स्टेज समझने से स्वयं को पार्टधारी स्वत: ही अनुभव करेंगे। तो कारण क्या हुआ? स्वयं को न्यारा करना नहीं आता है।

सदैव यह समझ कर चलो कि मैं विदेशी हूँ। पराये देश और पुराने शरीर में विश्वकल्याण का पार्ट बजाने के लिए आया हूँ। तो पहला पाठ कमज़ोर होने के कारण सेन्सीबल बने हैं, लेकिन इसैन्स कम है। रूप, रंग है लेकिन खुशबू अविनाशी और फैलने वाली नहीं। इसलिए अभी फिर से बाप-दादा को पहला पाठ रिपीट करना पड़ता है। सेकेण्ड में स्वयं का परिवर्तन सहज करेंगे। पहले अपने-आप से पूछो कि स्वयं के परिवर्तन में कितना समय लगता है। कोई भी संस्कार , स्वभाव, बोल व सम्पर्क यथार्थ नहीं लेकिन व्यर्थ है तो व्यर्थ को परिवर्तन कर श्रेष्ठ बनाने में कितना समय लगता है। सूक्ष्म संकल्पों को, संस्कारों को जो सोचा और किया। चेक किया और चेंज किया - ऐसी तेज़ स्पीड की मशीनरी है?

वर्तमान समय ऐसे स्वयं की परिवर्तन की मशीनरी फास्ट स्पीड की चाहिए। तब ही विश्व-परिवर्तन की मशीन तेज़ होगी। अभी स्थापना के निमित्त बनी हुई आत्माओं के सोचने और करने में अन्तर है। क्योंकि पुराने भक्ति के संस्कार समय प्रति समय इमर्ज (Emerge) हो जाते हैं। भक्ति में भी सोचना और कहना बहुत होता है। यह करेंगे, यह करेंगे - यह कहना बहुत होता है, लेकिन करना कम होता है। कहते हैं, बलिहार जायेंगे, लेकिन करते कुछ भी नहीं। कहते हैं तेरा, मानते हैं मेरा (अर्थात् अपना), वेसे यहाँ भी सोचते बहुत हैं, रूह-रूहान के समय वायदे बहुत करते हैं - आज से बदल कर दिखायेंगे। आज यह छोड़कर जा रहे हैं। आज यह संकल्प करते हैं। लेकिन कहने और करने में अन्तर है। सोचने और करने में अन्तर है। ऐसे विनाश के निमित्त बनी हुई आत्माएं सोचती हैं लेकिन कर नहीं पाती हैं। तो अब बाप समान बनने के पहले इस एक बात में समान बनो अर्थात् स्वयं के परिवर्तन करने की मशीनरी तेज़ करो। इस अन्तर को मिटाने का मंत्र वा यंत्र सुनाया कि साकार सो निराकार में पार्ट बजाने वाले हैं। इस मंत्र से सोचने और करने में अन्तर को मिटाओ। यही आवश्यकता है। समझा, अब क्या करना है?

स्वयं के परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन होगा। विश्व परिवर्तन की डेट नहीं सोचो। स्वयं के परिवर्तन की घड़ी निश्चित करो। स्वयं को सम्पन्न करो तो विश्व का कार्य सम्पन्न हो ही जाएगा। विश्व-परिवर्तन की घड़ी आप हो। अपने-आप में ही देखो कि बेहद की रात समाप्त होने में कितना समय है? सम्पूर्णता का सूर्य उदय होना अर्थात् रात-अन्धकार समाप्त होना। बाप से पूछते हो अथवा बाप आप से पूछे? आधार मूर्त्त आप हो। अच्छा।

ऐसे सेकेण्ड में परिवर्तन करने वाले, सोचने और कर्म में समान बनने वाले, निरन्तर निराकार सो साकार मन्त्र स्मृति स्वरूप में लाने वाले, सम्पन्न बन विश्व पर मास्टर ज्ञान सूर्य समान अन्धकार को समाप्त करने वाले, सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे - ऐसे विशेष आत्माओं को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दीदी के साथ

विनाश की डेट का पता है? कब विनाश होना है? जल्दी विनाश चाहते हो वा हाँ और ना की चाहना से परे हो? विनाश के बजाय स्थापना के कार्य को सम्पन्न बनाने में सभी ब्राह्मण एक ही दृढ़ संकल्प में स्थित हो जाएं तो परिवर्तन हुआ ही पड़ा है। जैसे विनाश की डेट में सभी एकमत हो गए ना। वैसे कोई भी सम्पन्न बनने की विशेष बात लक्ष्य में रखते हुए और डेट फिक्स करें - होना ही है। तब सम्पन्न हो जायेंगे। अभी संगठित रूप में एक ही दृढ़ संकल्प परिवर्तन का नहीं करते हो। कोई करता है कोई नहीं करता है। इसलिए वायुमण्डल पावरफुल (Powerful) नहीं बनता है। मैनारिटी (Minority;अल्प संख्यक) होने कारण जो करता है उसका वायुमण्डल में प्रसिद्ध रूप से दिखाई नहीं देता है। इसलिए अब ऐसे प्रोग्राम बनाओ, जो ऐसे विशेष ग्रुप का कर्त्तव्य विशेष हो - दृढ़ संकल्प से करके दिखाना। जैसे शुरू में पुरूषार्थ के उत्साह को बढ़ाने के लिए ग्रुप्स (Groups) बनाते थे और पुरूषार्थ की रेस (RACE) करते थे, एक दूसरे को सहयोग देते हुए उत्साह बढ़ाते थे, वैसे अब ऐसा तीव्र पुरूषार्थियों का ग्रुप बने, जो यह पान का बीड़ा उठाये कि जो कहेंगे वही करेंगे, करके दिखायेंगे। जैसे शुरू में बाप से पवित्रता की प्रतिज्ञा की कि मरेंगे, मिटेंगे, सहन करेंगे, मार खायेंगे, घर छोड़ देंगे, लेकिन पवित्रता की प्रतिज्ञा सदा कायम रखेंगे - ऐसी शेरनियों के संगठन ने स्थापना के कार्य में निमित्त बन करके दिखाया, कुछ सोचा नहीं, कुछ देखा नहीं - करके दिखाया, वैसे ही अब ऐसा ग्रुप चाहिए। जो लक्ष्य रखा उस लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए सहन करेंगे, त्याग करेंगे, बुरा-भला सुनेंगे, परीक्षाओं को पास करेंगे लेकिन लक्ष्य को प्राप्त करके ही छोड़ेंगे। ऐसे ग्रुप सैम्पल (Sample) बनें तब उनको और भी फॉलो (Follow) करें। जो आदि में सो अन्त में। ऐसे मैदान में आने वाले, जो निन्दा, स्तुति, मान-अपमान सभी को पार करने वाले हों - ऐसा ग्रुप चाहिए। कोई भी बात में सुनना वा सहन करना, किसी भी प्रकार से, यह तो करना ही होगा, कितना भी अच्छा करेंगे, लेकिन अच्छे को ज्यादा सुनना, सहन करना पड़ता है - ऐसी सहन शक्ति वाला ग्रुप हो। जैसे शुरू में पवित्रता के व्रत वाला ग्रुप मैदान में आया तो स्थापना हुई, वैसे अब यह ग्रुप मैदान में आए तब समाप्ति हो। ऐसा ग्रुप नज़र आता है? जैसे वह पार्लियामेन्ट बनाते हैं ना - यह फिर सम्पन्न बनने की पार्लियामेन्ट हो, नई दुनियाँ, नया जीवन बनाने का विधान बनाने वाली विधान सभा हो। अब देखेंगे कौन-सा ग्रुप बनाती हो। विदेशी भी ऐसा ही ग्रुप बनाना। सच्चे ब्राह्मण बनकर दिखाना। मधुबन से क्या बनकर जा रहे हो? जहाँ से आए हैं वहाँ पहऊँचते ही सभी समझें कि यह तो अवतार अवतरित हुए हैं। जब एक अवतार दुनिया में क्रान्ति ला सकता है तो इतने सभी अवतार जब उतरेंगे तो कितनी बड़ी क्रान्ति हो जायेगी! विश्व में क्रान्ति लाने वाले अवतार हो - ऐसे समझते हुए कार्य करना है। अच्छा।

इस ग्रुप को कौन-सा ग्रुप कहेंगे? बाप-दादा इस ग्रुप को मैसेन्जर (Messenger;सन्देश देने वाले) ग्रुप देख रहे हैं। एक-एक अनेक आत्माओं को बाप का सन्देश देने वाले हैं। ऐसे अपने को समझते हो? अब देखेंगे कि कौन-सा माली, कौन-से फूल लाते हैं और कितना बड़ा गुलदस्ता तैयार करते हो! सदैव माली अपने मालिक को बहुत प्यार से गुलदस्ता बनाकर पेश करता है, तो बाप भी देखेंगे। सुनाया इसेन्स (Essence;खुशबू) वाला होना चाहिए। रूहानियत की इसेन्स हो। अपने को माली समझते हो? इतने सारे तैयार हो जायेंगे तो विश्व का कल्याण हो जाएगा। बापदादा की यही उम्मीद है।

सभी पाण्डव कल्प पहले की तरह अपनी ऊँची स्टेज को प्राप्त होते हुए देह- अभिमान से पूर्ण रीति से गल गए हैं? जैसे पाण्डवों को दिखाते हैं कि पहाड़ों पर गल गए अर्थात् समाप्त हुए। ऐसे देह-अभिमान की स्थिति से समाप्त हो गए हो? अभी पूरे पाण्डव समान मरजीवा नहीं बने हो? मरजीवा अर्थात् देहभान से मरना। तो मरजीवा बने हो? मरना तो मरना, या अभी मर रहे हो? ऐसे होता है क्या? एक स्थान से मरना दूसरे स्थान में जीना होता है। यह सब में होता है ना? यहाँ भी देह-अभिमान से मरना और देही-अभिमान से जीना। इसमें कितना टाइम चाहिए? कम से कम 6 मास तो हो गए हैं ना। पाण्डव प्रसिद्ध हैं - ऊँची स्टेज को प्राप्त करने में। इसलिए पाण्डव के शरीर भी लम्बे-लम्बे दिखाते हैं। शरीर नहीं लेकिन आत्मा की स्टेज इतनी ऊँची हो। तो वही पाण्डव हो ना। तीव्र पुरूषार्थ का सहज साधन है - दृढ़ संकल्प। देही-अभीमानी बनने के लिए भी दृढ़ संकल्प करना है कि मैं शरीर नहीं हूँ, आत्मा हूँ। संकल्प में दृढ़ता नहीं तो कोई भी बात में सफलता नहीं। कोई भी बात में जब दृढ़ संकल्प रखते हैं तब ही सफलता होती है। दृढ़ संकल्प वाले ही मायाजीत होते हैं। माया से हार खाने वाले तो नहीं हो ना? जब माया को परखते नहीं तब ही धोखा खाते हैं। परखने वाला कभी धोखा नहीं खा सकता। लक्की (Lucky; खुशनसीब) हो जो प्राप्ति से पहले वर्सा लेने का अधिकार प्राप्त हुआ। जब खुशियों के सागर बाप के बने, तो कितनी खुशी होनी चाहिए! अप्राप्ति क्या है, जो खुशी गायब होती है? जहाँ प्राप्ति होती है, वहाँ खुशी होती है। अल्पकाल की प्राप्ति वाले भी खुश होते हैं। तो सदाकाल की प्राप्ति वालों को सदा खुश रहना चाहिए। कभी-कभी खुशी में रहेंगे तो अन्तर क्या हुआ? ज्ञानी अर्थात् सदा खुश। अज्ञानी अर्थात् कभी-कभी खुश। तो सदा खुश रहने का दृढ़ संकल्प करके जाना।

टीचर्स के साथ:-

टीचर्स अर्थात् फरिश्ता। टीचर का काम है - पण्डा बन करके यात्रियों को ऊँची मंज़िल पर ले जाना। ऊँची मंज़िल पर कौन ले जा सकेगा? जो स्वयं फरिश्ता अर्थात् डबल लाईट होगा। हल्का ही ऊँचा जा सकता है। भारी नीचे जाएगा। टीचर का काम है ऊँची मंज़िल पर ले जाना। तो खुद क्या करेंगे? फरिश्ता होंगे ना। अगर फरिश्ते नहीं तो खुद भी नीचे रहेंगे और दूसरों को भी नीचे लायेंगे। अपने को फरिश्ता अनुभव करती हो? बिल्कुल हल्का। देह का भी बोझ नहीं। मिट्टी बोझ वाली होती है ना। देहभान भी मिट्टी है। जब इसका भान है तो भारी रहेंगे। इससे परे हल्का अर्थात् फरिश्ता होंगे। तो देह के भान से भी हल्कापन। देह के भान से परे तो और सभी बातों से स्वत: ही परे हो जायेंगे। फरिश्ता अर्थात् बाप के साथ सभी रिश्ते हों। अपनी देह के साथ भी रिश्ता नहीं। बाप का दिया हुआ तन भी बाप को दे दिया था। अपनी वस्तु दूसरे को दे दी तो अपना रिश्ता खत्म हुआ। सब हिसाब-किताब बाप से, और किसी से नहीं। तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से बोलूं......... तो लेन-देन सब खाता बाप से हुआ ना? जब एक बाप से सब खाता हुआ तो और सभी खाते खत्म हो गए ना? टीचर अर्थात् जिसके सब खाते बाप से अर्थात् सब रिश्ते बाप से। कोई पिछला खाता नहीं, सब खत्म हो गया। इसको ही तुम्हीं से बोलूं...... तो लेन-देन सब खाता बाप से हुआ ना! जब एक बाप से सब खाता हुआ तो और सभी खाते खत्म हो गए ना? टीचर अर्थात् जिसके सब खाते बाप से अर्थात् सब रिश्ते बाप से। कोई पिछला खाता रह नहीं जाता। जब बाप के बने तो पिछला खाता सब खत्म हो गया। इसको ही कहा जाता है सम्पूर्ण बेगर (Beggar)। बेगर का कोई बैंक बैलेन्स (Bank Balance) नहीं होता। खाता नहीं, कोई रिश्ता नहीं। न किसी व्यक्ति से, न किसी वैभव से - खाते समाप्त। पिछले कर्मों के खाते में कोई भी बैंक बैलेन्स नहीं होना चाहिए। ऐसी चेकिंग करनी है। ऐसे कई होते हैं कि मरने के बाद कोई सड़ा हुआ खाता रह जाता है तो पीछे वालों को तंग करता है। तो चेक करते हो कि सब खाते समाप्त हैं? स्वभाव, संस्कार, सम्पर्क, सब बातें, सब रिश्ते खत्म। फिर खाली हो जायेंगे ना। जब इतना हल्का बने तभी पण्डा बन औरों को ऊँचा उठा सकंगे। तो समझा, टीचर को क्या करना होता है? टीचर बनना सहज है या मुश्किल? टीचर बनना भी बाप समान बनना हुआ तो जो टीचर की सीट लेता है वह बाप समान बनता है। टीचर बनते हैं अर्थात् जिम्मेवारी का संकल्प लेते हैं। तो बाप भी इतना सहयोग देते हैं। जो जितनी जिम्मेवारी लेता, उतना ही बाप सहयोग देने का जिम्मेवार हैं। जब बाप जिम्मेवारी ले लेते तो मुश्किल हुआ या सहज? जब बाप को जिम्मेवारी दे दी, तो स्वयं नहीं उठानी चाहिए। जिसके निमित्त बनते, उनकी जिम्मेवारी अपनी समझते हो। तो मुश्किल हो जाती है। जिम्मेवार बाप है न कि आप। अपने-आप के ऊपर बोझ तो नहीं रख लेते? कइयों को बोझ उठाने की आदत होती है। कितना भी कहो फिर भी उठा लेते हैं। यह न हो जाय, ऐसा न हो जाय यह व्यर्थ का बोझ है, बोझ बाप के ऊपर छोड़ दो। बाप का बन बाप के ऊपर छोड़ने से सफलता भी ज्यादा, उन्नति भी ज्यादा और सहज हो जाएगा। टीचर्स तो बाप-दादा को प्रिय हैं, क्यों? फिर भी हिम्मत तो रखी है ना। बाप-दादा हिम्मत देख हर्षित होते, लेकिन हिम्मतहीन देख आश्चर्य भी खाते हैं। टीचर्स को क्यों और क्या के क्वेश्चन में नहीं जाना चाहिए। नहीं तो आपकी क्यू (Queue;कतार) भी ऐसी हो जाएगी। टीचर अर्थात् फुल स्टॉप (Full Stop) की स्थिति में स्थित। क्वेश्चन वाले प्रजा में आ जाते हैं। फुल स्टॉप अर्थात् राजा। क्वेश्चन वाले को कब अति-इन्द्रिय सुख नहीं हो सकता। इसलिए टीचर्स की विशेष धारणा ही फुल स्टॉप की स्टेज है। टीचर्स अर्थात् इन्वेन्टर बुद्धि (Inventor;आविष्कार), प्रोग्राम प्रमाण ही सिर्फ चलने वाले नहीं। इन्वेन्शन करने वाले। क्या ऐसी नई बात निकाले, जो सहज और ज्यादा से ज्यादा को सन्देश पहुँच जाए। यह इन्वेन्शन हरेक को निकालनी है। अच्छा।