28-05-77   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


बाप-दादा के सदा दिल तख्तनशीन समान बच्चों के लक्षण

बाप के सदा स्नेही, सदा सहयोगी, दिल तख्त नशीन व राज्य तख्त नशीन बच्चों प्रति उच्चारे हुए महावाक्य:-

बापदादा समीप और समान सितारों को देख रहे हैं। बाप को सदा स्मृति रहती। जैसे बच्चे स्मृति स्वरूप हैं, वैसे ही बाप भी अपने समीप बच्चों के स्मृति स्वरूप हैं। जैसे बच्चे स्मृति स्वरूप होने से समर्थी स्वरूप का अनुभव करते हैं। बापदादा भी स्वयं समर्थी स्वरूप होते भी, समान बच्चों के सहयोग वा स्मृति से, स्वयं स्वरूप में और एडीशन (Addition;वृद्धि) हो जाती है। इसलिए साकार बाप ब्रह्मा को सहयोगी स्वरूप की निशानी हजार भुजाएं दिखाई हैं। भुजाएं है सहयोग की निशानी। तो बाप के साथ-साथ जो सदा सहयोगी हैं उन्हों की निशानी भुजाओं के रूप में हैं। ऐसे समान बच्चों का स्थान कौन सा होता है? किस स्थान पर वह निवास करते हैं? वह सदा दिल तख्त पर या विश्व के राज्य तख्त नशीन स्वयं को समझते है अर्थात् स्थिति में स्थित होते हैं। जैसे बड़ी से बड़ी महान् आत्माएं कभी भी धरनी पर पाँव नहीं रखती। जैसे यहाँ भी देखा, जब बड़े आदमी आते हैं तो पूरे रास्ते पर सीढ़ियों पर गलीचा बिछा देते हैं। ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं का पाँव धरती पर नहीं लेकिन गलीचे पर होते हैं। यह निशानी किसकी है? शुरू कहाँ से हुई? यहाँ तो उन्हों के पाँव सिर्फ गलीचे तक हैं। लेकिन जो बाप समान बच्चे हैं, उनका बुद्धि रूपी पाँव सिवाए तख्त के नीचे नहीं आते हैं। उन्होंको तख्त नशीन कहा जाता है अर्थात् सदा तख्त पर ही रहते हैं। नीचे नहीं आते हैं। ऐसे जो सदा दिल तख्त नशीन वा राज्य नशीन ही रहते हैं, उन्हों को सर्व आत्माओं से रिटर्न में (Return;बदले में) क्या मिलता है? स्नेह तो मिलता ही है, लेकिन दिल तख्त नशीन वाले जो भी कर्म करते, जो भी बोल बोलते, सभी के दिल पर ऐसे लगता है, जैसे बाप द्वारा जो भी निकलता वह सदा का यादगार बन जाता, सबके दिलों में समा जाता है। यादगार रह जाता है। फिर आधा कल्प के बाद यादगार गीता के रूप में होता। तो बाप के महावाक्य यादगार रूप में ऊपर हो जाते हैं। इसी प्रकार जो दिल तख्त नशीन बच्चे हैं वह जिस आत्मा के प्रति संकल्प करते तो उनके दिल को लगता है। मानो, आप किस आत्मा प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखते हैं - उनके दिल को लगेगा कि सचमुच यह मेरे प्रति शुभ-भावना, शुभ कामना रखते हैं। एक होता है ऊपर-ऊपर से, दूसरा होता है निमित्त बने हुए स्थान के कारण रेसपेक्ट (RESPECT;आदर) देना। तीसरा होता है दिल से स्वीकार करना।

जो समान बच्चे हैं उन्हों का संकल्प भी दिल से लगेगा, जैसे कि तीर लगता है। जैसे पहले जमाने में तीर लगाते थे। तो जिसको तीर लगता था वा तीर सहित ही नीचे आ गिरते थे। इस प्रकार से जो दिल तख्त नशीन हैं - (1) वह दिल के संकल्प जिस आत्मा प्रति करेंगे वह व्यक्ति अर्थात् आत्मा स्वयं अपने दिल का भाव प्रकट करने के लिए सामने आ जायेगी। (2) दूसरी बात जो उस स्थिति में स्थित हो बोल बोलेंगे उनके दो शब्द दिल को राहत देने वाले होंगे। महसूस करेंगे कि भल दो शब्द बोले लेकिन दिल को राहत मिल गई, खुराक मिल गई (3) तीसरी बात - सदैव ऐसी आत्माओं को दूर होते हुए भी दिल से याद करेंगे। दिल से याद करने की निशानी क्या होगी? ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि साथ समीप हैं, दूर नहीं हैं। ऐसे नहीं अनुभव करेंगे कि यह आबू में हैं हम दूसरे देश में हैं। ऐसे समझेंगे कि सदा सम्मुख और साथ हैं। जैसे बाप को दिल से याद करते हैं तो क्या अनुभव होता है? दूर लगता है क्या? साथ का अनुभव होता है ना? इस प्रकार जो दिलतख्त नशीन बच्चे होंगे उन्हों का भी प्रेक्टीकल में रिटर्न दिखाई देगा। इसको कहा जाता है - प्रत्यक्ष फल। (4) चौथी बात - वह दिल तख्त नशीन होंगे। दिल तख्त नशीन कौन होते हैं? राजा होगा ना? जैसे कोई बड़ा होता है तो उसको सब अपना समझते हैं। छोटे जो होंगे, वह बडों को अपना समझेंगे - मेरा है। तो दिल तख्त नशीन बच्चे की यही निशानी होती जो हरेक उनको अपना बड़ा समझेंगे। अपनापन महसूस करेंगे। हमारे पूर्वज बड़े हैं, पूज्य हैं। यह शब्द कहने में भक्ति मार्ग के हैं, लेकिन जैसे पूर्वज का नशा होता है ना - यह हमारे पूर्वज पूज्य हैं, इसी रीति से हर आत्मा जो भी सम्पर्क में हैं वह ऐसे महसूस करेंगे कि यह ही हमारे पूर्वज हैं, पूज्य हैं। अपनापन महसूस करेंगे। ऐसे दिल तख्त नशीन कितने बनेंगे? थोड़े ही होते। यही अष्ट रत्नों की विशेषता है, जो फिर 100 में नहीं होती। उनमें भी माँबाप हैं फिर भी उनमें नम्बर तो हैं ना। तो जब पहले युग में भी नम्बर हैं, तो जो और पीछे हैं उनमें भी नम्बर होंगे।

दादी जाती है इसकी सबको खुशी है। क्यों? वैसे तो जाने में दूसरी लहर होनी चाहिए, लेकिन खुशी क्यों है? और विशेष खुशी की लहर है, क्यों? विशेष सबको खुशी इसी बात की है जो सभी बहुत समय से इन्तजार कर रहे हैं कि कुछ होना है, कुछ परिवर्तन आना है। तो इस पार्ट को देखते हुए सबके बुद्धि में कुछ नवीनता, परिवर्तन की भावना आ रही है। सभी को ऐसा लगता है, जैसे कि यह जा नहीं रहे हैं, लेकिन कुछ समीप जा रहे हैं। कुछ परिवर्तन, नवीनता का नक्शा सामने आने से जाने का संकल्प उसमें समा गया है। सबकी बुद्धि में यही है कि अब कुछ परिवर्तन की भूमिका बन रही है। बहुत समय से सबको यही संकल्प में रहता है कि कोई नई बात अब होनी चाहिए। बहुत समय वही सीन चलती रही है, कुछ नवीनता होनी चाहिए। यह निमित्त फारेन में जाने का जो पार्ट बना है उसमें सबके दिलों मे जैसे ऑटोमेटीकली सबमें लहर है। किसको कहा नहीं गया है, लेकिन एक नया उमंग उत्साह है। वहाँ तो उमंग में हैं। लेकिन भारत में भी समझते हैं नवीनता होगी। इसलिए सबको जैसे नई लहर खुशी की है। समझते हैं - समीपता को पहुँचने का दिखाई दे रहा है, समीप नजारा आ रहा है - यह भासना आती है। इसलिए जो विशेष आत्माएं हैं उन्हों का ही समय के साथ बहुत सम्बन्ध है जैसे ब्रह्मा की आत्मा का समय के साथ गहरा कनेक्शन है, ब्रह्मा का जन्म और संगम का होना। अगर ब्रह्मा का पार्ट नहीं होता तो संगम भी नहीं होता। ब्रह्मा के साकार पार्ट की समाप्ति और अन्य पार्ट का आरम्भ होना, यह भी समय को समीप लाने का एक आधार है। ब्रह्मा का समाप्त अर्थात् संगम युग समाप्त। तो जैसे ब्रह्मा की आत्मा का समय के साथ गहरा सम्बन्ध है, वैसे ही जो फॉलो करने वाली समीप आत्माएं हैं, उन्हों के हर कार्य का भी समय के साथ उतना ही समीप सम्बन्ध है। वह जैसे समय की घड़ी बन जाते हैं। जैसे देखो, आप लोग जो निमित्त बने हुए हो, उन्हों के संकल्पों को रीड़ (Read) करते हैं। सब समय की तुलना करते हैं कि इन लोगों की स्टेज यहाँ तक पहुँच गई है। तो समय क्या दिखाता है, चैक तो करते हो ना? जैसे आप लोगो के सामने समय की घड़ी साकार बाप था। उनकी स्टेज को देखते आप लोग भी समझते थे जैसे कि कुछ होने वाला है। समीपता लग रही थी। जैसा फरिश्ता रूप! साकार नहीं है - ऐसा फील (Feel;अनुभव) होता था। तो समय की घड़ी हो गए ना। ऐसे आप लोग भी जो निमित्त हैं वह भी समय की घड़ी हो। उस नज़र से ही आप लोगों को देखते हैं कि घड़ी क्या दिखा रही है? यह जो विदेश जाने का पार्ट है, यह भी जैसे विशेष घंटी बजी है - ऐसा अनुभव होगा।

(परदादी को) ड्रामा आपको भी समीप पार्ट बजाने के निमित्त बनाता है। जैसे कल्प पहले बजाया था, वैसे अभी भी बजाते हैं। प्लॉन सोचने से नहीं होता है, लेकिन न चाहते भी ड्रामा का पार्ट निमित्त बना देता हैं। इसमें भी बड़ा रहस्य है। वरदान है आपको। लौकिक अलौकिक बाप के कुल का नाम बाला करने वाली निमित्त आत्मा हो। यह भी विशेष वरदान है। इसलिए आपको देखकर के दोनों याद आ जाते हैं। लौकिक भी फीचर्स (Features;शक्ल) याद आयेंगे और फीचर्स द्वारा जो फ्यूचर (Future;भविष्य) बनता है, वह भी याद आयेगा। आपके हर कदम में जो वरदान है - दोनों कुल का नाम बाला करना, वह समाया हुआ है। इसलिए ड्रामा स्वयं ही सीट की तरफ खींचता जा रहा हैं। समय प्रति समय जो भी महावाक्य आत्माओं के प्रति बापदादा के उच्चारण किए हुए हैं, वह प्रेक्टीकल में आ रहे हैं। विशेष वरदान है; और सर्विस का चांस भी आपको विशेष है। डबल सर्विस करने का चान्स है आपको। सूरत द्वारा भी, और सीरत द्वारा भी। इन लोगों की सूरत से अव्यक्त स्थिति होने से अनुभव करेंगे लेकिन आपकी सूरत चलते-फिरते ब्रह्मा बाप की सूरत और सीरत को प्रत्यक्ष करेंगे। यह एक्सट्रा सर्विस की फील्ड हुई ना? जहाँ भी जायेंगे तो क्या कहेंगे? सबको बाप की भासना आती है ना? तो यह सूरत भी सर्विस के निमित्त बनी है। डबल सर्विस हुई ना? (दादी को) वर्तमान समय आप आत्मा की डबल रूप से आह्वान की लीला चल रही है। एक तरफ भक्त आत्माएं अनजान रूप में आह्वान कर रही हैं - अष्ट देव के रूप में। दूसरी तरफ ज्ञान-स्वरूप होकर के ज्ञानी तू आत्मा बच्चे आह्वान कर रही हैं। ऐसे ही आह्वान कर रहे हैं जैसे आपकी जड़ चित्र अष्ट देव के रूप में करते हैं। लेकिन वह अन्जान हैं, इसलिए उन्होंको वह रस नहीं आता। लेकिन उन्हों को आह्वान से भी वरदान की अनुभूति की प्राप्ति का अनुभव होगा, डबल आह्वान हो गया ना?

दो मूर्तियाँ जा रही हैं, तीन मूर्तियाँ जा रही हैं वा अष्ट भी जा रही हैं? यह भी एक विशेष लहर है ना। जो सब समझते हैं - हम लोग भी जैसे साथ जा रहे हैं। इसका भी कारण? यह स्नेह की समीपता की निशानी है। जो इतना समय ड्रामानुसार निमित्त बन पार्ट बजाया है उसका प्रत्यक्ष रूप रिटर्न स्वरूप देख रहे हैं। निमित्त बन पार्ट बजाने की रिजल्ट सामने आ रही है।

इस समय आप तीनों के पार्ट में - जैसे ब्रह्मा का पार्ट रचना का, विष्णु का पार्ट पालना का, शंकर का पार्ट विनाश का दिखाते हैं। है तो ड्रामानुसार, लेकिन हर एक के साथ विशेषता दिखाई है। तो अभी-अभी बाप देख रहे हैं तीनों का विशेष गुण, कौनसा वर्तमान पार्ट चल रहा है? आप कौन सी मूर्त्त हो? वर्तमान पार्ट के प्रमाण तीनों का विशेष पार्ट प्रेक्टीकल में है। यह (दादी) तो निमित्त सर्व के उमंग, उत्साह और सेवा की फील्ड में नया मोड़ लाने के निमित्त आधारमूर्त्त बन जा रही है। तो यह आधारमूर्त्त हो जा रही है, और आपका (दीदी) सभी विशेष यह देख रहे हैं कि कितनी उद्धारमूर्त्त हैं, जो एक में दो का जाना महसूस करती हैं। किसको निमित्त बनाना यह उद्धारमूर्त्त हैं। और यह (पर दादी) है उदाहरण दिखाया कि प्रेक्टीकल हम सब एक हैं। तो आधारमूर्त्त, उद्धारमूर्त्त और उदाहरणमूर्त्त। तीनों की विशेषता हुई ना।

इस समय प्रेक्टीकल पार्ट में जनक का पार्ट सेवा की सचेली कौड़ी का चल रहा है। लंडन में दोनों ही सुदेश और जयन्ती सर्विस के निमित्त बनी हुई हैं। यह दोनों भी वर्तमान समय बहुत अच्छी स्टेज पर हैं। समझती हैं एक साथ अंगुली देकर सेवा को बढ़ाना ही है। इस समय अच्छी रफ्तार से सर्विस में मस्त आत्माएं दिखाई देती हैं। यह भी एक चारों ओर के वातावरण का प्रत्यक्ष रूप है। सबकी नज़र वहाँ है। अभी सबका शुभ संकल्प उस तरफ है। कुछ होने वाला है - वायुमण्डल का प्रभाव है। सुमन जर्मनी में है, उनको भी विशेष वरदान मिल गया है। क्योंकि उसने अपने को रियलाइज किया, तो रियलाइज का उनको वरदान मिल गया है। जो महसूस करता है तो उसका आधा तो खत्म हो जाता है। तो हल्कापन भी आ गया और दूसरा फिर सर्विस का लक्ष्य रखा है इसलिए विशेष वरदान मिल गया है जम्प लगाने का। क्योंकि सच्ची दिल से रियलाइज किया। रियलाइज करने वाला बहुत आगे बढ़ सकता है। सरकमटेंस (परिस्थितियाँ) ऐसी थीं, यह ऐसा था तब मेरा भी ऐसा था - उनको कोई रियलाइजेशन नहीं कहेंगे। उसने अपने आपको रियलाइज किया। दिल से स्वीकार किया, इसलिए उनको विशेष वरदान की लिफ्ट मिल गई। वरदान के कारण खुद भी नहीं समझती कि मैं कैसे सर्विस कर रही हूँ। समझती है, मेरे से जितना हो रहा है, रेसपांड मेरी स्टेज से ज्यादा मिल रहा है। इसलिए खुशी भी है। इस गुण के कारण उनको यह लिफ्ट मिला है। वह भी आगे बढ़ करके कमाल कर सकती है। लाईन क्लीयर होने से रफ्तार तेज हो सकती।

संकल्प की सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे होता है? संकल्प किया और सिद्ध हुआ। वृत्ति और स्मृति द्वारा सेवा कैसे हो उसके ऊपर कुछ रूह-रूहान की? समय प्रमाण वाणी के साथ-साथ संकल्प अर्थात् स्मृति और वृत्ति अर्थात् शुभभावना हो - इससे सर्विस बहुत अच्छी हो सकती है। क्योंकि सुना हुआ तो रिपीटेशन समझते हैं। जो ज्यादा सम्पर्क में आत्माएं हैं वह प्वाईन्ट को कामन समझती हैं। लेकिन नए रूप की सेवा का उन्हों को भी तरीका सिखाओ। जब तक स्वयं अनुभवी नहीं तो औरों को कोई नई ररूपरेखा चाहिए। नया अनुभव कराओ। संगठन में भी ऐसा सेवा का प्रोग्राम बनाकर कर सकते हो। विशेष लक्ष्य देकर बिठाओ। फिर उन्हों से अनुभव पूछो। बहुत अच्छा सुनायेंगे। जैसे वाणी द्वारा सेवा का बहुत अनुभव किया है - जो आप लोग की रचना है। अभी सर्विस में जो एडीशन चाहिए - वह है संकल्प और वृत्ति द्वारा। इसके लिए प्लान्स बनाओ। जब मजा आयेगा तब महसूस करेंगे कि हमारी नवीनता की चढ़ती कला है। जैसे साइंस वाले कोई न कोई इन्वेन्शन करने में बीजी रहते हैं, इसी प्रकार से जो पाइंट चल चुकी है उनकी गुह्यता में नए रूप की इन्वेन्शन करने के लिए अमृतवेले लक्ष्य ले बठेंगे तो टच होगा। नई-नई इन्वेन्शन निकलेंगी जिससे औरों को भी नवीनता का अनुभव होगा। अच्छा।