18-01-79   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


18 जनवरी स्मृति दिवसको सदाकाल का समर्थी दिवस मनाने के लिए शिक्षाएं

सर्वसमर्थ शिव बाबा सदा अमर भव का वरदान देते हुए बोले :-

आज सभी बच्चे विशेष साकारी याद - प्रेम स्वरूप की स्मृति में ज्यादा रहे। साकारी सो आकारी बाप सभी के नयनों में समाये हुए हैं। अमृतवेले से लेकर देशविदेश के बच्चों की याद के सन्देश सारे वतन में वायुमण्डल की रीती से फैले हुए थे - प्रेम के आसुँओं की मालायें वतन को सजा रही थीं। हरेक बच्चा ब्रह्मा बाप के लव में लवलीन थे। चारों ओर दिल के दिलरूबा की आवाज़ बापदादा के पास पहुँच रही थी - हरेक के मन से बाप की महिमा के सुन्दर आलाप साजों के समान वतन में गूँज रहे थे। हरेक के आशाओं के दीपक जगे हुए, वतन को जगमगा रहे थे। बापदादा बच्चों के स्नेह को देख मुस्करा रहे थे। विदेशी वा देशवासी बच्चे अपने बुद्धियोग द्वारा वतन में भी पहुँचे हुए थे। ब्रह्मा बाप भी बच्चों के स्नेह के सागर में बच्चों के लव में लवलीन थे - याद का रिटर्न दे रहे थे।

बच्चे बाप से पूछते हैं हम सबसे पहले अकेले वतनवासी क्यों? मेजोरिटी बच्चों का यही स्नेह का सवाल था। बाप बोले - जैसे आदि में स्थापना के कार्य प्रति साकार रूप में निमित्त एक ही बने - अल्फ की तार पहले एक को आई। सेवा अर्थ - सर्वस्व त्यागमूर्त एक अकेले बने। जिसको देख बच्चों ने फालो फादर किया। त्याग और भाग्य दोनों में नम्बरवन बाप निमित्त बने। अब अन्त में भी बच्चों को ऊंचा उठाने के लिए वा अव्यक्त बनाने के लिए बाप को ही अव्यक्त वतनवासी बनना पड़ा। इस साकारी दुनिया से ऊंचा स्थान अव्यक्त वतन अपनाना पड़ा - अभी बाप कहते हैं बाप समान स्वयं को और सेवा को सम्पन्न करो। बाप समान अव्यक्त वतनवासी बन जाओ। बापदादा अभी भी आह्वान करते हैं। देर किसकी है? ड्रामा की देर हैं! ड्रामा में भी निमित्त कारण कौन। सिर्फ एक छोटी-सी बात दृढ़ संकल्प रूप से धारण करो तो सदाकाल का मिलन हो जावेगा। जैसे आज के दिन सहजयोगी, निरन्तरयोगी, एक बाप दूसरा न कोई - इसी स्थिति में स्थित रहे, ऐसे ही सदा अमर भव के वरदानी बनो। तो क्या होगा। सदाकाल के लिए जुदाई को विदाई मिल जावेगी और सदा मिलन की बधाई होगी। स्नेह स्वरूप को समान स्वरूप में परिवर्तन करो। जैसे जिस भी आत्मा से स्नेह होता है तो स्नेह का स्वरूप यही है कि जो स्नेही को पसन्द हो वही स्नेह करने वाले को पसन्द हो - चलना- खाना-पीना-रहना स्नेही के दिल पसन्द हो। ऐसे ही बाप से स्नेह - जानते हो बाप का स्नेह किससे हैं? बाप को सदा क्या पसन्द है? अपने दिल पसन्द नहीं लेकिन स्नेही बाप के दिलपसन्द। तो सदा जो भी संकल्प करो वा कर्म करो पहले यह सोचो कि स्नेही बाप के दिलपसन्द है। अगर बाप को पसन्द नहीं तो लोकपसन्द भी नहीं। तो सिर्फ इतनी सी बात है स्नेही के पसन्दी से चलना है। इतना रिटर्न सदा कर सकते हो ना! सर्व सम्बन्ध के स्नेह से इतना सा रिटर्न क्या मुश्किल लगता है? आज के स्मृति दिवस को सदाकाल के लिए समर्थी दिवस मनाओ। यह संकल्प करो - जो बाप को पसन्दी वही मेरी पसन्दी। सदा बाप पसन्द लोक पसन्द रहना है।

दिलशिकस्त होना, किसी भी संस्कार वा परिस्थितियों के वशीभूत होना, अल्पकाल की प्राप्ति कराने वाले व्यक्ति वा वैभवों के तरफ आकार्षि होना - इन सब कमजोरियों रूपी कलियुगी पर्वत को आज के समर्थी दिवस पर सब बच्चे दृढ़ संकल्प की अंगुली दे सदाकाल के लिए समाप्त करो अर्थात् सदाकाल के विजयी बनो। विजय आपका तिलक है। विजय आपके गले की माला है। विजय जन्मसिद्ध अधिकार है। सदा इस समर्थी स्वरूप में रहो। यह है स्नेह का रिटर्न। बाप बच्चों से पूछते हैं - जैसे ब्रह्मा बाप ने सारे ज्ञान का सार स्वयं धारण कर बच्चों को फालो फादर करने की हिम्मत दी, साकार रूप द्वारा अन्तिम महावाकय अमूल्य सौगात दी - उस सौगात को स्वरूप में लाया? सौगात की रिटर्न में बाप को स्वरूप बन दिखाया? सिर्फ तीन बोल जो थे उनको साकार में लाया। साकार स्नेह के रिटर्न में साकार रूप है। इन ही तीन बोल से बाप ने कर्मातीत अवस्था को पाया - फालो फादर। साकार बाप ने स्थिति का स्तम्भ बनकर दिखाया - जिसके स्नेह में यह स्मृति स्तम्भ भी बनाया है - ऐसे ही तत्वम - सर्वगुणों के स्तम्भ बनो। जो विश्व के हर धर्म वाली आत्मायें धारणा स्वरूप स्तम्भ आपको माने - विश्व के आगे आदि पिता के समान शक्ति और शान्ति स्तम्भ बनो।

स्नेह के सन्देश जो बच्चों ने भेजे रिटर्न में बापदादा भी सभी स्नेही बच्चों को पदमगुणा स्नेह दे रहे हैं। अब पदमापदम भाग्यशाली सदा रहो। अच्छा

ऐसे सदा बाप के स्मृति सो समर्थी स्वरूप, बाप के सदा दिलपसन्द, सदा दृढ़ संकल्प द्वारा स्वयं का ओर विश्व का सेकेण्ड में परिवर्तन करने वाले, सदा विश्व के आगे शक्ति और शन्ति स्तम्भ समान स्थित रहने वाले - ऐसे बापदादा के समीप सिकीलधे बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दीदी जी से बातचीत :- आज का दिन स्नेह और शक्ति का बैलेन्स रहा? आज के दिन विशेष साकार बाप को याद किया वा दानों का बैलेन्स था - बैलेन्स रखने वाले बच्चे बाप द्वारा ब्लिसफुल के वरदान को प्राप्त करते हैं। आज साकार बाप ने भी बच्चों को याद किया - हर बच्चे की विशेषता रूपी रतनों को देखते हर्षाया। लौकिक शरीर के संस्कार भी जवाहरी के थे। अलौकिक जीवन में भी जवाहरी के कार्य में ही रहे। जवाहरी की नज़र कहाँ जाती है? अमूल्य रतनों के तरफ, तो बाप भी अपने रतनों को देख रतनों को ही सजा रहे थे। ब्रह्मा बाप के तीव्र पुरूषार्थ के संस्कार को तो जानती हो - आज भी बाबा बोले अब माला तैयार करो - माला तैयार होना अर्थात् खेल खत्म। फिर क्या हुआ होगा। ब्रह्मा अपने तीव्र पुरूषार्थ के संस्कार प्रमाण माला बनाने लगे और बाप मुस्कराने लगे। माला तैयार भी हुई, लेकिन तैयार होने के बाद जब देखने लगे तो दिलपसन्द नहीं लगी। तो फटाफट बदली करने लगे। संकल्प था कि करके दिखावेंगे - बाप बोले - फुल पावर्स हैं - जो चाहे जैसे चाहे तैयार करके दिखाओ। ब्रह्मा बाप तो रोज आह्वान करते हैं। आप आह्वान करते हो? फिर रिजल्ट क्या हुई। बहुत रमणीक दृश्य हुआ। रूहरिहान भी चली और एक-दो को देख मुस्कराये। 100 की माला फिर भी 90% बन गई 8 की माला में बदली बहुत थी - किसको 4 नम्बर दें किसको 5 नम्बर दें - उसकी रूह-रूहान थी। मतलब तो आज ब्रह्मा को माला तैयार करने का तीव्र संकल्प था।

जैसे बाप विचित्र है, विचित्र बाप की लीला भी विचित्र है - दुनिया वाले समझते हैं बाप चले गये और बाप बच्चों से विचित्र रूप में जब चाहें तब मिलन मना सकते। दुनिया वालों की आँखों के आगे पर्दा आ गया - वैसे भी स्नेही मिलन पर्दे के अन्दर अच्छा होता है - तो दुनिया की आँखों में पर्दा आ गया - लेकिन बाप बच्चों से अलग हो नहीं सकता। वायदा है साथ चलेंगे, वही वायदा याद है ना। जो आदि से अन्त।

पार्टियों से मुलाकात

1. सभी ने बापदादा की आज के वतन की रूह-रूहान सुनी। उससे अपने को एवररेडी बनाने की प्रेरणा भी ली। सदैव यह अटैन्शन रहे कि हम सभी बाप समान विजयी बने हैं - क्योंकि बहुत समय के विजयी, विजयी माला के मणके बन सकते हैं। अगर अभी-अभी हार होगी तो कभी भी विजय माला के मणके नहीं बन सकते। विजयी बनने के लिए सदैव क्या याद रहे? विजयी बनने के लिए सदा बाप को सामने रखो - जो बाप ने किया वह हमें करना है। हर कदम-कदम के ऊपर जो बाप का संकल्प वही बच्चों का संकल्प, जो बाप के बोल वही बच्चों के बोल तब विजयी बन सकते हो। ऐसा अटेन्शन सदैव रहता है? जब सदा काल का राज्य-भाग्य पाना है तो अटेन्शन भी सदाकाल का चाहिए, अगर अल्पकाल का राज्य लेना है तो थोड़ समय के लिए याद रखो। जैसा पुरूषार्थ वैसी प्रालब्ध। तो सदा का राज्य और सदा का पुरूषार्थ - ऐसे पुरुषार्थी हो? माया के भी नॉलेजफुल हो, तो नॉलेजफुल कभी धोखा नहीं खाते। अनजान होते हैं तो धोखा खा लेते हैं। नॉलेज को लाइट और माइट कहा जाता है। जो नॉलेजफुल हैं अर्थात् लाइट और माइट दोनों हैं वह कभी माया से हार नहीं खा सकते। सिर्फ संकल्प में दृढ़ता की कमी होती है। संकल्प करते हो कि यह करेंगे लेकिन दृढ़ता न होने के कारण सोचने-करने में फर्क पड़ जाता है। संकल्प में दृढ़ता हो तो सोचना और करना दोनों समान हो जाएं। तो सुना बहुत है लेकिन अब जो सुना वह साकार स्वरूप में लाओ।

2. संगमयुग के महत्व को जानते हुए हर संकल्प और सेकेण्ड जमा करते हो? व्यर्थ तो नहीं जाता है? सेकेण्ड भी व्यर्थ गया तो सेकेण्ड की वैल्यू बहुत बड़ी है। जैसे एक का लाख गुना बनता है वैसे एक सेकेण्ड भी व्यर्थ जाता तो लाख गुना व्यर्थ गया। इतना अटेन्शन रहता है। अलबेलापन तो नहीं आता। अभी वह समय नहीं है। अभी तो चल जाता है, कोई हिसाब लेने वाला ही नहीं है लेकिन थोड़े समय के बाद अपने आपको ही पश्चाताप होगा। समय की वैल्यू है समय के वरदान से ही अमूल्य रतन बनते हो। अमूल्य रतन समय भी अमूल्य रीति से व्यतीत करते हैं। अमूल्य रतन समझने से सेकेण्ड और संकल्प भी अमूल्य हो जायेंगे।

3. सभी अपने को सदा सर्व आत्माओं से श्रेष्ठ आत्मा समझ श्रेष्ठ कर्म करते हो? जैसा आक्यूपेशन होता है वैसे कर्म होता है। अगर कोई बड़ा पोजीशन वाला होगा तो उसकी एक्टिविटी भी उसी प्रमाण होगी। आपका आक्यूपेशन क्या है? सर्व आत्माओं से श्रेष्ठ आत्मा। तो श्रेष्ठ आत्मा का हर संकल्प हर सेकेण्ड भी ऐसा ही होगा! आप जैसा विशेष पार्ट बाप को पा लेना, ऐसा पार्ट और किसका हो नहीं सकता। जब ब्रह्माकुमार कहलाते हो, परमात्मा के बच्चे कहलाते हो तो चलन भी तो ऐसी चाहिए। सदा आक्यूपेशन और एक्टिविटी को मिलाओ। बड़ा आदमी कर्म बेसमझी के वा बच्चे जैसे करे तो लोग हसेंगे ना। ऐसे ही जब ब्रह्माकुमार कहलाते हो और साधारण ऐक्ट चलो तो क्या कहेंगे! आधाकल्प बेसमझ रहे अब समझदार बने - तो समझदार का हर संकल्प शक्तिशाली होगा।

4. सदा कल्प पहले माफिक अपने को अंगद के समान अचल समझते हो? अंगद के समान अचल अर्थात् सदा निश्चय बुद्धि विजयन्ती। जरा भी हलचल में आये तो विजयी बन नहीं सकेंगे। माया के विघ्न यह तो ड्रामा में महावीर बनाने के लिए पेपर के रूप में आते हैं। बिना पेपर के कभी क्लास चेन्ज नहीं होता। पेपर आना अर्थात् क्लास आगे बढ़ना। तो पेपर आने से खुश होना चाहिए न कि हलचल में आना है। माया से भी लेसन सीखो, वह कभी भी हलचल में नहीं आती - अटल रहती, यही लेसन माया से सीख मायाजीत बन जाओ।

5. स्नेह का रेसपान्ड है फालोफादर। जिससे स्नेह होता है उसको आटोमेटिकली फालो करना होता है। सदा याद रहे कि यह कर्म जो कर रहे हैं यह फालो फादर है। अगर नहीं तो स्टाप। फालो फादर है तो करते चलो, कापी ही करनी हैं ना। बाप को कापी करते बाप बन जाओ। कापी करने के लिए जैसे कार्बन पेपर डालते हैं वैसे अटेन्शन का पेपर डालो तो कापी हो जायेगा।

अभी अपने को तीव्र पुरुषार्थी नहीं बनायेंगे तो आगे चलकर यह समय भी खत्म हो जायेगा फिर टू लेट हो जायेंगे, वंचित रह जायेंगे। अभी हर शक्ति से स्वयं को सम्पन्न बनाने का समय है। अगर स्वयं-स्वयं को सम्पन्न नहीं कर सकते हो तो सहयोग लो, छोड़ नहीं दो। सम्पन्नता की निशानी है सन्तुष्टता। इसलिए सदा सन्तुष्ट आत्मा बनो। अच्छा - ओम् शान्ति।