06-02-1980       ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा       मधुबन


"अशरीरी बनने की सहज विधि"

आज कल्प पहले वाले सिकीलधे अति लाडले, स्नेही और सहयोगी, शक्ति स्वरूप बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। बाप-दादा अपने सहयोगी बच्चों के साथ ही रहते हैं। सहयोग और स्नेह का अटूट धागा सदा अविनाशी है। आज वतन में बाप-दादा अति प्यारे-प्यारे बच्चों के स्नेह की माला बना रहे थे। स्नेही तो सब हो फिर भी नम्बरवार तो कहेंगे। आज हरेक बच्चे की विशेषताओं के आधार पर नम्बर बना रहे थे। कई बच्चों में विशेषतायें इतनी ज्यादा देखीं जो बिल्कुल बाप-समान समीप रतन देखे। कई बच्चे विशेषताओं को धारण करने में मेहनत करने वाले भी देखे जो मेहनत देखकर बाप को भी रहम आता है। मेरे बच्चे और मेहनत! क्योंकि सबसे ज्यादा मेहनत अशरीरी बनने में देखी।

बाप-दादा आपस में बोले कि अशरीरी आत्मा को अशरीरी बनने में मेहनत क्यों? ब्रह्मा बाप बोले - ``84 जन्म चोला धारण कर पार्ट बजाने के कारण पार्ट बजाते-बजाते शरीरधारी बन जाते हैं।'' शिव बाप बोले - ``पार्ट बजाया लेकिन अब समय कौन-सा है? समय की स्मृति प्रमाण कर्म भी स्वत: ही वैसे होता है। यह तो अभ्यास है ना?'' बाप बोले - ``अब पार्ट समाप्त कर घर जाना है। पार्ट की ड्रेस तो छोड़नी पड़ेगी ना? घर जाना है तो भी यह पुराना शरीर छोड़ना पड़ेगा, राज्य में अर्थात् स्वर्ग में जाना है तो भी यह पुरानी ड्रेस छोड़नी पड़ेगी। तो जब जाना ही है तो भूलना मुश्किल क्यों? जाना है, क्या यह भूल जाते हो? आप सभी तो जाने के लिए एवररेडी हो ना कि अब भी कुछ रस्सियाँ बँधी हुई हैं? एवररेडी हो ना?''

ये तो बाप-दादा ने सेवा के लिए समय दिया हुआ है। सेवाधारी का पार्ट बजा रहे हो। तो अपने को देखो यह शरीर का बन्धन तो नहीं है अथवा यह पुराना चोला टाइट तो नहीं है? टाइट ड्रेस तो पसन्द नहीं करते हो ना? ड्रैस टाइट होगी तो एवररेडी नहीं होंगे। बन्धन मुक्त अर्थात् लूज़ ड्रेस, टाइट नहीं। आर्डर मिला और सेकण्ड में गया। ऐसे बन्धन-मुक्त, योगयुक्त बने हो? जब वायदा ही है `एक बाप दूसरा न कोई' तो बन्धनमुक्त हो गये ना। अशरीरी बनने के लिए विशेष 4 बातों का अटेन्शन रखो

1. कभी भी अपने आपको भुलाना होता है तो दुनिया में भी एक सच्ची प्रीत में खो जाते हैं। तो सच्ची प्रीत ही भूलने का सहज साधन है। प्रीत दुनिया को भुलाने का साधन है, देह को भुलाने का साधन है।

2. दूसरी बात सच्चा मीत भी दुनिया को भुलाने का साधन है। अगर दो मीत आपस में मिल जाएँ तो उन्हें न स्वयं की, न समय की स्मृति रहती है।

3. तीसरी बात दिल के गीत - अगर दिल से कोई गीत गाते हैं तो उस समय के लिए वह स्वयं और समय को भूला हुआ होता है।

4. चौथी बात - यथार्थ रीत। अगर यथार्थ रीत है तो अशरीरी बनना बहुत सहज है। रीत नहीं आती तब मुश्किल होता है। तो एक हुआ प्रीत 2- मीत 3- गीत 4- रीत।

एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली

इन चारों ही बातें के आप सब तो अनुभवी हो ना? प्रीत के भी अनुभवी हो। बाप और आप तीसरा न कोई। बाप मिला माना सब कुछ मिला बाकी काम ही क्या रहा। प्रभु प्रीत के तो आज भी भक्त कीर्तन करते रहते हैं। सिर्फ प्रीत के गीत में ही खो जाते हैं तो सोचो प्रीत निभाने वाले कितने खोये हुए होंगे! प्रीत के तो अनुभवी हो ना? विपरीत बुद्धि से प्रीत बुद्धि हो गये हो ना? तो जहाँ प्रभु प्रीत है वहाँ अशरीरी बनना क्या लगता है? प्रीत के आगे अशरीरी बनना एक सेकण्ड के खेल के समान है। बाबा बोला और शरीर भूला। बाबा शब्द ही पुरानी दुनिया को भूलने का आत्मिक बाम्ब है। (बिजली बन्द हो गई) जैसे यह स्विच बदली होने का खेल देखा ऐसे वह स्मृति का स्विच है। बाप का स्विच ऑन और देह और देह की दुनिया की स्मृति का स्विच ऑफ। यह है एक सेकण्ड का खेल। मुख से बाबा बोलने में भी टाइम लगता है लेकिन स्मृति में लाने में कितना समय लगता है। तो प्रीत में रहना अर्थात् अशरीरी सहज बनना।

मोहब्बत में मेहनत नहीं

ऐसे सबसे सच्चा मीत जो श्मशान के आगे भी साथ जाए। शरीरधारी मीत तो श्मशान तक ही जायेंगे तो वे दु:ख हर्ता सुख कर्ता नहीं बन सकेंगे। थोड़ाबहुत दु:ख के समय सहयोगी बन सकते हैं। सहयोग दे सकते हैं लेकिन दु:ख हर नहीं सकते। तो सच्चा मीत मिल गया है ना? सदा इसी अविनाशी मीत के साथ रहो तो मोहब्बत में मेहनत खत्म हो जायेगी। जब मोहब्बत करना आता है तो मेहनत क्यों करते हो? बाप-दादा को कभी-कभी हँसी आती है। जैसे किसी को बोझ उठाने का अभ्यास होता है उसको आराम से बिठाओ तो वह बैठ नहीं सकता। बार-बार बोझ की तरफ भागता है और फिर साँस भी फूलता है, तो पुकारते हैं - `छुड़ाओ'! तो सदा प्रीत और मीत में रहो तो मेहनत समाप्त हो जायेगी। मीत से किनारा नहीं करो। सदा के साथी बन करके चलो।

ऐसे ही बाप-दादा द्वारा प्राप्त हुई सर्व प्राप्तियों के, गुणों के सदा गीत गाते रहो। बाप की महिमा व आपकी महिमा के कितने गीत हैं इस गीत में साज़ भी ऑटोमेटिकली चलते हैं। जितना-जितना गुणों की महिमा के गीत गायेंगे तो खुशी के साज़ साथ-साथ स्वत: बजते रहेंगे। यह भी गीत गाने वाले आये हैं (भरत व्यास आदि आये हैं) आपके साज़ तो दूसरे हैं। यह खुशी के साज़ हैं। ये कभी खराब नहीं होते जो रिपेयर (Repair) करना पड़े। तो सदा ऐसे गीत गाते रहो। यह गीत गाना तो सबको आता है ना। तो सदा गीत गाते रहो तो सहज ही अशरीरी बन जायेंगे। बाकी रही रीत - यथार्थ रीत सेकण्ड की रीत है। मैं अशरीरी आत्मा हूँ यह सबसे सहज यथार्थ रीत है। सहज है ना। जैसे बाप की महिमा है कि वह मुश्किल को सहज करने वाला है। ऐसे ही बाप समान बच्चे भी मुश्किल को सहज करने वाले हैं। जो विश्व की मुश्किल को सहज करने वाले हैं वह स्वयं मुश्किल अनुभव करें यह कैसे हो सकता है! इसलिए सदा सर्व सहजयोगी।

अहम नहीं, वहम नहीं लेकिन रहम करो

संगमयुगी ब्राह्मणों के मुख से `मेहनत' है वा `मुश्किल है' - यह शब्द मुख से क्या लेकिन संकल्प में भी नहीं आ सकता। तो इस वर्ष का विशेष अटेन्शन `सदा सहज योगी'। जैसे बाप को बच्चों पर रहम आता है वैसे स्वयं पर भी रहम करो और सर्व प्रति भी रहमदिल बनो। टाइटल `रहमदिल' का तो आप सबका भी है ना? अपना टाइटल याद है ना? लेकिन रहमदिल बनने के बदले एक छोटी-सी गलती करते हो। रहम भाव के बजाए अहम भाव में आ जाते हो। तो रहम भूल जाते हो। कोई अहम भाव में आ जाते हैं। कोई वहम भाव में आ जाते हैं। पता नहीं, पहुँच सकेंगे कि नहीं पहुँच सकेंगे? यथार्थ मार्ग है या नहीं है - ऐसे अनेक प्रकार के स्वयं के प्रति वहम भाव और कभी-कभी नॉलेज के प्रति वहम भाव। इसलिए रहम का भाव बदल जाता है। समझा? दिलशिकस्त नहीं बनो लेकिन सदा दिलतख्तनशीन बनो। तो समझा इस वर्ष में क्या करना है? इस वर्ष का होमवर्क दे रहे हैं। `सहजयोगी बनो। रहमदिल बनो और दिलतख्तनशीन बनो' तो सदा भाग्य-विधाता बाप ऐसे आज्ञाकारी बच्चों को अमृतवेले रोज सफलता का तिलक लगाते रहेंगे। यह भी तिलक का गायन है ना कि भक्तों को भगवान तिलक लगाने आया तो इस वर्ष आज्ञाकारी बच्चों को स्वयं बाप आपके सेवास्थान अर्थात् तीर्थ स्थान पर सफलता का तिलक देने आयेंगे। बाप तो रोज चक्र लगाने आते ही हैं। अगर बच्चे सोये हुए हों, वह उनकी गफलत है।

जैसे दीपावली में जगह-जगह ज्योति जगाकर रखते हैं, सफाई भी करते हैं, आह्वान भी करते हैं। `स्वच्छता, प्रकाश और आह्वान' वह लक्ष्मी का आह्वान करते और यह लक्ष्मी के रचयिता का आह्वान है। तो ज्योति जगाकर बैठो तब तो बाप आयेंगे। कईयों को जगाते भी हैं फिर सो जाते हैं। आवाज भी अनुभव करते हैं फिर भी अलबेलेपन की नींद में सो जाते हैं। सतयुग में सोना ही सोना है। डबल सोना है। इसलिए अभी जागती ज्योति बनो। ऐसे नहीं कि सोने के संस्कार से वहाँ सोना मिलेगा। जो जागेगा वह सोना पायेगा। अलबेलेपन की नींद भी तब आती है जब विनाशकाल भूल जाते हो। भक्तों की पुकार सुनो। दु:खी आत्माओं के दु:ख की पुकार सुनो। प्यासी आत्माओं के प्रार्थना की आवाज सुनो। तो कभी भी नींद नहीं आयेगी। तो इस वर्ष अलबेलेपन की नींद को तलाक देना। तब भक्त लोग आप साक्षात्कार मूर्तियों का साक्षात्कार करेंगे। तो इस वर्ष साक्षात्कार मूर्त्त बन भक्तों को साक्षात्कार कराओ। ऐसे चक्रवर्ती बनो।

ऐसे सदा प्रीत निभाने वाले, सदा सच्चे मीत के साथ रहने वाले, सदा प्राप्तियों और गुणों की महिमा के गीत गाने वाले, सदा सेकण्ड की यथार्थ रीत द्वारा सहजयोगी बनने वाले, ऐसे सदा रहमदिल, मुश्किल को सहज बनाने वाले निद्राजीत, चक्रवर्ती बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।