01-11-81 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"सेवा की सफलता की कुंजी"

सदा कृपालु, दयालु, अव्यक्त बापदादा अपने ईश्वरीय सेवाधारियों प्रति बोले:

आज बापदादा सर्व बच्चों को किस रूप में देख रहे हैं अर्थात् अपने खुदाई खिदमतगार बच्चों को देख रहे हैं। जो हैं ही खुदाई खिदमतगार उन्हों को सदा स्वत: ही खुदा और खिदमत अर्थात् बाप और सेवा दोनों साथ-साथ याद रहती ही हैं। वैसे भी आजकल की दुनिया में कोई किसका कार्य नहीं करता वा सहयोगी नहीं बनता तो एक दो को कहते हैं - भगवान के नाम से यह काम करो। वा खुदा के नाम से यह काम करो। क्योंकि समझते हैं - भगवान के नाम से सहयोग मिल जायेगा और सफलता भी मिल जायेगी। कोई असम्भव कार्य वा होपलेस बात होती है तो भी यही कहते हैं - भगवान का नाम लो तो काम हो जायेगा।'' इससे क्या सिद्ध होता है?असम्भव से सम्भव, ना उम्मीद से उम्मीदवार कार्य बाप ने आकर किये हैं तब तो अब तक भी यह कहावत चलती आती है। परन्तु आप सब तो हैं ही खुदाई खिदमतगार'। सिर्फ भगवान का नाम लेने वाले नहीं लेकिन भगवान के साथी बन श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं। तो खुदाई खिदमतगार बच्चों के हर कार्य सफल हुए ही पड़े हैं। खुदाई खिदमतगार के कार्य में कोई असम्भव बात नहीं। सब सम्भव और सहज है।। खुदाई खिदमतगार बच्चों को विश्व-परिवर्तन का कार्य क्या मुश्किल लगता है? हुआ ही पड़ा है। ऐसे अनुभव होता है ना? सदा यही अनुभव करते हो-कि यह तो अनेक बार किया हुआ है। कोई नई बात ही नहीं लगती। होगा, नहीं होगा, कैसे होगा, यह क्वेश्चन ही नहीं उठता। क्योंकि बाप के साथी हो। जबकि अब तक सिर्फ भगवान के नाम से ही काम हो जाते तो साथ में कार्य करने वाले बच्चों का हर कार्य तो सफल हुआ ही पड़ा है। इसलिए बापदादा बच्चों को सदा सफलतामूर्त्त कहते हैं। सफलता के सितारे अपने सफलता द्वारा विश्व को रोशन करने वाले। तो सदा अपने को ऐसे सफलतामूर्त्त अनुभव करते हो? अगर चलते-चलते कभी असफलता या मुश्किल का अनुभव होता है तो उसका कारण सिर्फ खिदमतगार बन जाते हो। खुदाई खिदमतगार नहीं होते। खुदा को खिदमत से जुदा कर देते हो। इसलिए अकेले होने के कारण सहज भी मुश्किल हो जाता और सफलता दूर दिखाई देती है। लेकिन नाम ही है - खुदाई खिदमतगार। तो कम्बाइन्ड को अलग नहीं करो। लेकिन अलग कर देते हो ना! सदा यह नाम याद रहे तो सेवा में स्वत: ही खुदाई जादू भरा हुआ होगा। सेवा के क्षेत्र में जो भिन्न-भिन्न प्रकार के स्व प्रति वा सेवा प्रति विघ्न आते हैं, उसका भी कारण सिर्फ यही होता, जो स्वयं को सिर्फ सेवाधारी समझते हो। लेकिन ईश्वरीय सेवाधारी, सिर्फ सर्विस नहीं लेकिन गाडली-सर्विस - इसी स्मृति से याद और सेवा स्वत: ही कम्बाइन्ड हो जाती है। याद और सेवा का सदा बैलेन्स रहता है। जहाँ बैलेन्स है वहाँ स्वयं सदा ब्लिसफुल अर्थात् आनन्द स्वरूप और अन्य के प्रति सदा ब्लैसिंग अर्थात् कृपा-दृष्टि सहज ही रहती है। इसके ऊपर कृपा करूँ, यह सोचने की भी आवश्यकता नहीं। हो ही कृपालु। सदा का काम ही कृपा करना है। ऐसे अनादि संस्कार स्वरूप हुए हैं! जो विशेष संस्कार होता है वह स्वत: ही कार्य करते रहते हैं। सोच के नहीं करते लेकिन हो ही जाता है। बार-बार यही कहते हो - मेरे संस्कार ऐसे हैं, इसलिए हो ही गया। मेरा भाव नहीं था, मेरा लक्ष्य नहीं था लेकिन हो गया। क्यों ? संस्कार हैं। कहते हो ना-ऐसे? कई कहते हैं - हमने क्रोध नहीं किया लेकिन मेरे बोलने के संस्कार ही ऐसे हैं। इससे क्या सिद्ध हुआ? अल्पकाल के संस्कार भी स्वत: ही बोल और कर्म कराते रहते हैं। तो सोचो-अनादि,आरिजनल संस्कार आप श्रेष्ठ आत्माओं के कौन से हैं? सदा सम्पन्न और सफलतामूर्त्त। सदा वरदानी और महादानी- तो यह संस्कार स्मृति में रहने से स्वत: ही सर्व के प्रति कृपा-दृष्टि रहती ही है। अल्पकाल के संस्कारों को अनादि संस्कारों से परिवर्तन करो। तो भिन्न-भिन्न प्रकार के विघ्न, अनादि संस्कार इमर्ज होने से सहज समाप्त हो जायेंगे। बापदादा को अब तक भी बच्चों की स्व-परिवर्तन वा विश्व-परिवर्तन की सेवा में मेहनत देख सहन नहीं होता। खुदाई खिदमतगार और मेहनत! जब नाम से काम निकाल रहे हैं, तो आप तो अधिकारी हो। आप लोगों की मेहनत कैसे हो सकती है? फिर छोटी सी गलती करते हो-कौन सी? गलती करते हो-कौन सी? गलती करते हो, जानते हो? जानते भी अच्छी तरह से हो फिर क्यों करते हो? मजबूर बन जाते हो। सिर्फ छोटी सी गलती -मेरा संस्कार,मेरा स्वभाव'', अनादि काल के बजाए मध्यकाल के समझ लेते हो। मध्यकाल के संस्कार, स्वभाव को मेरा संस्कार, मेरा स्वभाव सम- झना यही गलती है। यह रावण का स्वभाव है, आप का नहीं है। पराई चीज़ को अपना मानना, यही गलती करते हो। मेरा कहने और समझने से मेरे में स्वत: ही झुकाव हो जाता है। इसलिए छोड़ने चाहते भी छोड़ नहीं सकते । समझा - गलती क्या है?

तो सदा याद रखो - खुदाई खिदमतगार हैं। मैंने किया'' - नहीं, खुदा ने मेरे से कराया। इस एक स्मृति से सहज ही सर्व विघ्नों के बीज को सदा के लिए समाप्त कर दो। सर्व प्रकार के विघ्नों का बीज दो शब्दों में है। वह कौन से दो शब्द हैं जिन शब्दों से ही विघ्न का रूप आता है? विघ्न आने के दरवाजे को जानते हो? तो वह नामीग्रामी दो शब्द कौन-से हैं? विस्तार तो बहुत है लेकिन दो शब्दों में सार आ जाता है- 1. अभिमान और 2. अपमान। सेवा के क्षेत्र में विशेष विघ्न इन दो रास्तों से आता है। या तो मैंने किया'', यह अभिमान और अपमान की भावना भिन्न-भिन्न विघ्नों के रूप में आ जाती है। जब है ही खुदाई खिदमतगार, करनकरावनहार बाप है तो छोटी-सी गलती है ना! इसलिए कहा जाता कि खुदा को जुदा नहीं करो। सेवा में भी कम्बाइन्ड रूप याद रखो। खुदा और खिदमत। तो यह करना नहीं आता? बहुत सहज है। मेहनत से छूट जायेंगें। समझा क्या करना है? अच्छा।

ऐसे सदा अनादि संस्कार स्मृति स्वरूप, सदा स्वयं को निमित्त मात्र और बाप को करन-करावनहार अनुभव करने वाले, सदा स्वयं अनादि स्वरूप अर्थात् ब्लिसफुल, किसी भी प्रकार के विघ्नों के बीज को समाप्त करने में समर्थ आत्मायें, ऐसे सदा बाप के साथी, ईश्वरीय सेवाधारियों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।''

अधरकुमारों से :- सभी अपने को बाप के स्नेही और सहयोगी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो ना? सदा यह नशा रहता है कि हम श्रेष्ठते- श्रेष्ठ आत्मायें हैं क्योंकि बाप के साथ पार्ट बजाने वाली हैं। सारे चक्र के अन्दर इस समय बाप के साथ पार्ट बजाने के निमित्त बने हो। ऊंच-ते ऊंच पार्ट बजाने के निमित्त बने हो। ऊंचे-ते-ऊंचे भगवान के साथ पार्ट बजाने वाले कितनी ऊंची आत्मायें हो गई। लौकिक में भी कोई पद वाले के साथ काम करते हैं, उनको भी कितना नशा रहता है! प्राइम मिनिस्टर के प्राइवेट सेक्रेटरी को भी कितना नशा रहता! तो आप किसके साथ हो? ऊंचे-ते-ऊंचे बाप के साथ और फिर उसमें भी विशेषता यह है कि एक कल्प के लिए नहीं, अनेक कल्प यह पार्ट बजाया है और सदा बजाते ही रहेंगे। बदली नहीं हो सकता। ऐसे नशे में रहो तो सदा निर्विघ्न रहेंगे। कोई विघ्न तो नहीं आता है ना? वायुमण्डल का, वायब्रेशन का, संग का कोई विघ्न तो नहीं है? कमलपुष्प के समान हो? कमलपुष्प समान न्यारा और प्यारा। बाप का कितना प्यारा बना हूँ, उसका हिसाब न्यारेपन से लगा सकते हो। अगर थोड़ा-सा न्यारा है, बाकी फंस जाते हैं तो प्यारे भी इतने होंगे। जो सदा बाप के प्यारे हैं उनकी निशानी है - स्वत: याद। प्यारी चीज़ स्वत: सदा याद आती है ना! तो यह कल्प-कल्प की प्रिय चीज़ है। एक बार बाप के नहीं बने हो, कल्प-कल्प बने हो। तो ऐसी प्रिय वस्तु को कैसे भूल सकते! भूलते तब हो जब बाप से भी अधिक कोई व्यक्ति या वस्तु को प्रिय समझने लगते हो। अगर सदा बाप को प्रिय सम- झते तो भूल नहीं सकते। यह नहीं सोचना पड़ेगा कि याद कैसे करें, लेकिन भूले कैसे - -यह आश्चर्य लगेगा! तो नाम अधर-कुमार है लेकिन हो तो ब्र.कु.। ब्रह्माकुमार सदा नशे और खुशी में रहेंगे। तो निश्चयबुद्धि विजयी हो ना? अधरकुमार तो अनुभवी कुमार हैं। सब अनुभव कर चुके। अनुभवी कभी भी धोखा नहीं खाते। पास्ट के भी अनुभवी और वर्तमान के भी अनुभवी। एक-एक अधरकुमार अपने अनुभवों द्वारा अनेंकों का कल्याण कर सकते हैं। यह है विश्व-कल्याणकारी ग्रुप। अच्छा।

माताओं को :- प्रवृत्ति में रहते एक बाप दूसरा न कोई इसी स्मृति में रहती हो, यह चेकिंग करती हो? क्योंकि प्रवृत्ति के वायुमण्डल में रहते, उस वायुमण्डल का असर न हो, सदा बाप के प्यारे रहें इसके लिए इसी बात की चेकिंग चाहिए। निमित्त मात्र प्रवृत्ति है लेकिन बाप की याद में रहना। परिवार की सेवा का कितना भी पार्ट बजाना पड़े लेकिन ट्रस्टी होकर बजाना है। ट्रस्टी होंगे तो नष्टोमोहा हो जायेंगे। गृहस्थीपन होगा तो मोह आ जायेगा। बाप याद नहीं आता माना मोह है। बाप की याद से हर प्रवृत्ति का कार्य भी सहज हो जायेगा क्योंकि याद से शक्ति मिलती है। तो बाप के याद की छत्रछाया के नीचे रहती हो ना? छत्रछाया के नीचे रहने वाले हर विघ्न से न्यारे होंगे। मातायें तो बापदादा को अति प्रिय हैं क्योंकि माताओं ने बहुत सहन किया है। तो बाप ऐसे बच्चों को सहन करने का फल - सहयोग और स्नेह दे रहे हैं। सदा सुहागवती रहना। इस जीवन में कितना श्रेष्ठ सुहाग मिल गया है। जहाँ सुहाग है वहाँ भाग्य तो है ही। इसलिए सदा सुहागवती भव!

यू.पी.और गुजरात जोन बापदादा के सामने बैठा है, बापदादा उनकी विशेषता सुना रहे हैं सर्व स्थानों की अपनी-अपनी विशेषता है। यू.पी. भी कम नहीं तो गुजरात भी कम नहीं। दिल्ली के बाद यू.पी. निकला। जो आदि में स्थापना के निमित्त बने हैं उन्हों का भी ड्रामा में विशेष पार्ट है। फिर भी आदि वालों ने डबल लाटरी तो ली है ना! साकार और निराकार। डबल लाटरी मिली है। यह भी कोई कम पार्ट है क्या! कल्प-कल्प के चरित्र में सदा साथ रहने का भी यादगार है। यह भी विशेष भाग्य है। अभी भी बापदादा अव्यक्त रूप में सब पार्ट बजाते हैं लेकिन साकार तो साकार है। साकार वालों की अपनी विशेषता इन्हों की फिर अपनी विशेषता है। यह अव्यक्त से साकार का स्नेह खींचने वाले हैं। कई हैं जो साकार के साथ रहने वालों से भी अधिक अनुभव अभी करते हैं। तो सब एक-दो से आगे हैं। अच्छा! आज यू.पी. वालों का चांस है। नदियों के किनारे पर यू.पी. ज्यादा है। जमुना नदी के किनारे पर राजधानी और रास दिखाते हैं लेकिन यू.पी. की पतित पावनी मशहूर है,यानी यू.पी. को सेवा का स्थान दिखाया है। तो ऐसा कोई यू.पी.से निकला जरूर जो अनेकों की सेवा के निमित्त बने। ऐसा कोई तैयार हो जायेगा। जैसे अमेरिका से एक से अनेकों की सेवा हो रही है,ऐसे यू.पी. से भी कोई निकल आयेगा जो एक से अनेकों की सेवा हो जायेगी। आवाज तो फैलेगा ना! जब विदेश से आवाज आयेगा तब सब जाग जायेंगे। अभी एकदम बड़ा वी.आई.पी. नहीं निकला है। अभी तक जो वी.आई.पी. निकले हैं उनसे ज्यादा नामीग्रामी तो वही विदेश का कहेंगे ना! जो प्रैक्टिकल अनेकों को सन्देश दिलाने के निमित्त बन रहे हैं। भारत भी आगे जा सकता है, लेकिन अभी की बात है। आखिर जय-जयकार तो भारत में ही होनी है ना! विदेश से भी जय-जयकार के नारे लगाते-लगाते पहुँचेंगे तो भारत में ही ना! उन्हों के मुख से भी यही निकलेगा - हमारा भारत। भारत में बाप आये हैं, ऐसे नहीं कहेंगे कि यू.एन. में बाप आये हैं। विदेश इस समय रेस में आगे जा रहा है। अभी की बात है, कल दूसरा भी बदल सकता है। एक-दो को देख करके और ही आगे बढ़ेंगे। अभी यू.पी. का कोई वी.आई.पी. लाओ। पतित-पावनी! कोई को पावन करके छू मंत्र करो।

गुजरात वृद्धि में नम्बरवन हो गया है। वी.आई.पीज भी स्टेज पर आ जायेगे। ऐसे वी.आई.पीज हो जो बेहद की सेवा करें। गुजरात का गुजरात में किया वह तो छोटा माइक हो गया। चारों ओर करें उसको कहेंगे बड़ा माइक। अच्छा!

प्रश्न: जो संगम पर मास्टर नालेजफुल बन जाते हैं, उनकी निशानी क्या होगी?

उत्तर: मा.नालेजफुल सदा मायाजीत होंगे। क्योंकि वह जानते हैं कि माया किस रूप से और क्यों आती है? माया के आने का मुख्य कारण अपनी कमजोरी है। कमजोरी ही माया को जन्म देती है। संकल्प या संस्कार में जब कमजोरी होती है तो माया को जन्म मिल जाता है। इसलिए नालेजफुल बच्चे, कारण को जानकर पहले ही सदाकाल का निवारण कर देते हैं। संगम पर हर बात में नालेजफुल बनना है, तन के भी नालेजफुल, मन के भी नालेजफुल और धन के भी नालेजफुल। ऐसे नालेजफुल ही पावरफुल बन मायाजीत, जगतजीत बन जाते हैं। अच्छा!