23-11-81 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"त्याग का भी त्याग"

सदा सहयोगी, आज्ञाकारी सपूत बच्चों प्रति अव्यक्त बापदादा बोले:-

''आज बापदादा किससे मिलने आये हैं? जानते हो? आज अनेक भुजाधारी बाप अपनी भुजाओं से अर्थात् सदा सहयोगी बच्चों से मिलने आये हैं। कितनी विशेष सहयोगी आत्मायें बाप की राइट हैण्ड बन हर कार्य में सदा एवररेडी हैं। बापदादा ने डायरेक्शन का इशारा दिया, और राइट हैण्ड अर्थात् विशेष भुजायें अर्थात् आज्ञाकारी बच्चे सदा कहते-हाँ बाबा, हम सदा तैयार हैं।'' बाप कहते- हे बच्चे।'' बच्चे कहते- हाँ बाबा।'' ऐसी विशेष भुजाओं को बाप देख रहे हैं। चारों ओर की विशेष भुजाओं द्वारा यही आवाज बच्चों का सुन रहे हैं। हाँ जी बाबा, अभी बाबा, हाजर बाबा।'' ऐसे बच्चों के मधुर आलाप बापदादा के पास पहुँच रहे हैं। बाप भी ऐसे बच्चों को सदा, मुरबी बच्चे, सपूत बच्चे, विश्व के श्रृंगार बच्चे, मास्टर भाग्य विधाता, मास्टर वरदाता बच्चे'' कहकर बुलाते हैं।

आज बापदादा ऐसे बच्चों के नाम गिन रहे थे। बताओ कितनी माला बनाई होगी? छोटी माला वा बड़ी माला? और उस माला में आप सबका नम्बर कहाँ होगा? लास्ट के रिजल्ट माला की नहीं कह रहे हैं। वर्तमान समय ऐसे राइट हैण्डस कितने हैं? वह माला बना रहे हैं। वर्तमान का नम्बर तो सहज लगा सकते हो ना? माला के नम्बर गिनती करते-करते ब्रह्मा बाप ने एक विशेष बात बोली, क्या बोला होगा? आज विशेष विषय, राइटहैण्ड अर्थात् सहयोग का था। इसी सहयोग की विषय पर आज प्रवृत्ति में रहते, प्रवृत्ति की वृत्ति से परे रहने वाले, व्यवहार में रहते अलौकिक व्यवहार का सदा ध्यान रखने वाले ऐसे न्यारे और बाप के प्यारे विशेष बच्चों की विशेषता देख रहे थे। वायुमण्डल की अग्नि के सेक से भी परे। ऐसे अग्नि प्रूफ बच्चे बापदादा ने देखे। आज ऐसे डबल पार्टधारी, लौकिक में अलौकिकता का पार्ट बजाने वाले बच्चों की महिमा कर रहे थे।

डबल पार्टधारियों की एक यह विशेषता वर्णन हुई-कि कई ऐसे अनासक्त बच्चे भी हैं, जो कमाते हैं, सुख के साधन जितने जुटाने चाहें इतना जुटा सकते हैं लेकिन साधारण खाते,साधारण चलते, साधारण रहते हैं। पहले अलौकिक सेवा का विशेष हिस्सा निकालते हैं। लौकिक कार्य, लौकिक प्रवृत्ति, लौकिक सम्बन्ध, सम्पर्क निभाते भी हैं लेकिन अपनी विशाल बुद्धि के कारण नाराज भी नहीं करते और ईश्वरीय कमाई के जमा का राज जानते हुए विशेष हिस्सा राजयुक्त हो निकाल भी लेते। इस विशेषता में गोपिकायें भी कम नहीं। ऐसी-ऐसी गुप्त गोपिकायें भी हैं, जो लौकिक में हाफ पार्टनर कहलाती हैं लेकिन बाप के साथ सौदा करने में फुल पार्टनर हैं। ऐसी सच्ची दिल वाली फराखदिल गोपिकायें भी हैं तो पाण्डव भी हैं। सुनाया ना-आज ऐसे बच्चों के नाम गिन रहे थे। ऐसे भी एकनामी कर अलौकिक कार्य में फराखदिल से लगाते हैं। अपने आराम का समय भी, अपने आराम के लिए नहीं, धन का हिस्सा होते हुए भी 75 अलौकिक कार्य में लगाते हैं और निमित्त मात्र लौकिक कार्य को निभाते हैं। ऐसे त्यागवान बच्चे सदा अविनाशी भाग्यवान हैं। लेकिन ऐसे युक्तियुक्त पार्ट बजाने वाले ज्यादा संख्या में नहीं थे। अगुंलियों पर गिनने वाले थे। फिर भी डबल पार्टधारी ऐसी विशेष आत्माओं की महिमा जरूर वर्णन हुई।

दूसरे नम्बर के बच्चे भी थे- जो करते भी हैं लेकिन सेकण्ड नम्बर बन जात हैं। इसी गुप्त दान-महादान, गुप्त महादानी की विशेषता है- त्याग के भी त्यागी। जो श्रेष्ठ कर्म का फल प्राप्त होता है वह प्रत्यक्षफल है- सर्व द्वारा महिमा होना। सेवाधारी को श्रेष्ठ गायन की सीट मिलती है- मान, मर्तबे की सीट मिलती है, यह सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। क्योंकि यह सिद्धियाँ रास्ते की चट्टियाँ हैं, यह फाइनल मंजिल नहीं है, इसलिए इसके त्यागवान, भाग्यवान बनो। इसको कहा जाता है- महात्यागी।

अभी-अभी किया, अभी-अभी खाया, जमा नहीं होता। यह अल्पकाल की सिद्धियाँ कर्म के प्रत्यक्षफल के रूप में प्राप्त जरूर होंगी क्योंकि संगमयुग प्रत्यक्षफल देने वाला युग है। भविष्य तो अनादि नियम प्रमाण मिलना ही है लेकिन संगमयुग वरदान युग है। अभी- अभी किया, अभी-अभी मिला। लेकिन अभी-अभी खाया, यह नहीं करना। यह प्रसाद समझकर बाँट लो या बाप के आगे भोग लगा दो। तो एक का पदमगुणा जमा हो जायेगा। तो सौगा करने में होशियार बनो, भोले नहीं बनो। सुना-यह हैं सेकेण्ड नम्बर। अच्छा तीसरा नम्बर भी सुनेंगे? तीसरा नम्बर- सेवा में सहयोगी कम बनते हैं लेकिन सीट पहले जैसी लेनी चाहते हैं। सर्व खज़ाने स्वयं के आराम प्रति ज्यादा लगाते हैं।

पहला नम्बर एकनामी और एकानामी वाले, दूसरा नम्बर कमाया और खाया। और तीसरा नम्बर कमाई कम और खाना ज्यादा। औरों की भी कमाई को खाने वाले। वह हैं- लाओ और खाओ। श्रेष्ठ आत्माओं के भाग्य का हिस्सा, त्यागवान बच्चों कें प्रत्यक्ष- फल, सर्व प्राप्तियों को त्यागवान त्याग करते लेकिन तीसरे नम्बर वाले उन्हों के हिस्से का भी स्वयं स्वीकार कर लेते हैं। कमाने वाले नहीं सिर्फ खाने वाले। इस कारण नम्बरवन बच्चे बोझ उतारने वाले और वह बोझ चढ़ाने वाले क्योंकि अपनी मेहनत की कमाई नहीं खाते। ऐसी खाती-पीती आत्मायें भी देखीं।

अभी सुना तीन नम्बर? अभी सोचा मैं कौन? अच्छा, फिर भी आज की रूह-रूहान में प्रवृत्ति में रहकर एकनामी और एकनामी वाले बच्चों की बार-बार महिमा गाई। अच्छा!

ऐसे सदा हाँ बाबा, हाजर बाबा कहने वाले, सदा स्वयं त्याग का भी त्याग कर औरों को भाग्यवान बनाने वाले, सदा बापदादा से श्रेष्ठ सौदा करने वाले, सदा सेवा में सर्व खज़ानें लगाने वाले, ऐसे गुप्त दानी महाभागी आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।''

राजस्थान (जयपुर) ग्रुप को सेवा की वृद्धि का विशेष इशारा तथा प्लैन

राजस्थान वाले भी राजगद्दी के स्थान वाले हो। तो राजगद्दी के स्थान पर क्या-क्या कर रहे हो? इस सारे साल के अन्दर क्या-क्या नवीनता की है? महातीर्थ कराने के लिए यात्रियों की पार्टियाँ लाई? लौकिक यात्रा पर भी संगठन बनाकर ले जाते हैं, पूरी ट्रेन की ट्रेन ले जाते हैं, तो राजगद्दी वालों ने इस महातीर्थ की यात्रा कितनों को कराई? राजस्थान की राजगद्दी वालों ने मुख्य स्थान (हैड-क्वार्टर) पर कितनों को लेकर आये? बस भरकर लाये? या राजस्थान में यात्री हैं ही नहीं, क्या समझते हो? यात्री नहीं है या पण्डे तैयार नहीं हैं? अगर इतने सब पण्डे हों तो यात्री कितने होने चाहिए? तो यात्रियों को लायेंगे या खुद को ही लायेंगे। इस साल प्रोग्राम बनायेंगे या दूसरे साल? अच्छा, कोई नया प्लैन बनाया है? जैसे जयपुर का इन्टरनेशनल स्थान है तो कम से कम यह विशेषता जरूर करो जो अब तक कोई ने नहीं की हो! मेन स्थान पर बहुत अच्छा सुन्दर बड़ा बोर्ड लगाओ। यह तो कर सकते हो ना? बोर्ड ऐसा आकर्षण वाला हो जो चलते फिरते सबकी नजर जाए। उसकी सजावट और मैटर ऐसा हो जो न चाहते भी सब उसे देखें जरूर। और मैटर भी ऐसा बनाओ जो सब पढ़ कर समझें यह करना चाहिए, यहाँ जाना चाहिए। ऐसे चलते फिरते सन्देश मिलता रहे, एड्रेस हो और वहाँ का विशेष निमन्त्रण भी हो। ऐसा कम शब्दों में आकर्षण वाला मैटर भी बनाओ और बोर्ड की सजा- वट का प्लैन निकालो जिससे अनेकों को सन्देश मिलता रहेगा। ऐसे मुख्य स्थान पर खर्चा हो तो भी कोई हर्जा नहीं। तो अभी यह करके दिखाओ। कोई नई इन्वेंशन हो जो न चाहते हुए भी सबको चमकता हुआ नजर आता रहे। ऐसा कोई प्लैन बनाओ, एड्रेस, फोन नम्बर सब लिखा हुआ हो, निमन्त्रण भी हो। तो कोई न कोई विशेष आत्मा जाग जायेगी। जहाँ मेन सबका आना जाना है, नजर जाने वाली है, ऐसे स्थान पर कुछ करो लेकिन ऐसा आकर्षण वाला हो जो देखने के बिना कोई भी रह न सके। अच्छा, दूसरा क्या करेंगे? किसी न किसी विशेष आत्मा को हर मास यात्रा जरूर करानी है। ऐसा लक्ष्य रखो। बस भराकर न आओ लेकिन एक दो को तो ले आ सकते हो ना! एक विशेष ऐसी आत्मा लाओ जो अनेकों को सन्देश सुनाने के निमित्त बन जाए। साधन तो सब हैं सिर्फ करने वाले करें तो सहज हो। एक बार सम्पर्क करके छोड़ नहीं देना है, बार-बार सम्पर्क रखते रहो। ऐसे सम्पर्क वाले फिर कहना न मानें यह होता नहीं है। तो क्या करेंगे? सदैव सोचो-कि मुझे करना है। दूसरे को नहीं देखो। इनमें जो ओटे सो अर्जुन। मुझे देख और करेंगे...तो फिर क्या हो जायेगा? हरेक यह पाठ पढ़ ले कि मुझे करना है तो सब करने लग जायेंगे। इसमें दूसरों को न देख स्वयं को मैदान में लाओ। अच्छा, स्व में तो ठीक हो लेकिन सेवा में भी नम्बरवन। सेवा में भी फुल मार्क्स लेनी हैं। अच्छा!

टीचर्स के साथ- टीचर्स को डबल चांस मिला है। डबल इसीलिए मिल रहा है कि अनेंकों को बाटेंगी। क्योंकि शिक्षक अर्थात् सदा औरों की सेवा के लिए जीने वाली। शिक्षक की जीवन सदा औरों को सिखाने के लिए होती है। स्व के प्रति नहीं लेकिन सेवा के प्रति। जब मास्टर शिक्षक वा सच्चेधारी यह लक्ष्य रखते हैं कि हमारा हर सैकण्ड और हर संकल्प दूसरों को पढ़ाने के लिए है तो ऐसा मास्टर शिक्षक वा सेवाधारी सदा सफलता मूर्त्त होते हैं। जीना ही सेवा है, चलना ही सेवा है, बोलना, सोचना अब सेवा के लिए। हर नस-नस में सेवा का उमंग और उत्साह भरा हुआ हो। जैसे नसों में खून चलता है तो जीवन है। ऐसे सेवाधारी अर्थात् हर नस यानी हर संकल्प, हर सैकण्ड में सेवा के उमंग-उत्साह का खून भरा हुआ हो। ऐसे ही सेवाधारी हो ना? गुडनाइट करें तो भी सेवा, गुड मा\नग करें तो भी सेवा। उसमें स्व की सेवा स्वत: समाई हुई है। तो इसको कहा जाता है- सच्चे सेवाधारी। सेवाधारी के स्वप्न भी कौन से होंगे? सेवा के। स्वप्न में भी सेवा करते रहेंगे। ऐसे ही हो ना?

सेवाधारियों को लिफ्ट भी बहुत बड़ी है। अनेक दुनिया के बन्धनों से मुक्त हो। यहाँ ही जीवनमुक्त स्थिति की प्राप्ति है। सेवाधारी का अर्थ ही है - बन्धनमुक्त, जीवनमुक्त। कितने हद की जिम्मेवारियों से छूटे हुए हो। और अलौकिक जिम्मेवारी भी बाप की है, इससे भी छूटे हुए हो। सिर्फ सेवा किया-आगे चलो। जिम्मेवारी का बोझ नहीं है। क्या किसी के ऊपर कोई बोझ है? सेन्टर का बोझ है क्या? सेन्टर को चलाने का बोझ नहीं है, यह फिकर नहीं रहता है कि जिज्ञासू कैसे आवें (रहता है) तो बोझ हुआ ना!

सफलता भी तब होगी जब यह समझो कि मैं बढ़ाने वाली नहीं हूँ लेकिन बाप की याद से स्वत: बढ़ेगी। मैं बढ़ाने वाली हूँ, तो बढ़ नहीं सकती। बाप को बोझ दे देंगे तो बढ़ती रहेगी। इसलिए इससे भी निश्फुरने रहना। जितना स्वयं हल्के होगे उतना सेवा और स्वयं सदा ऊपर चढ़ती रहेंगी अर्थात् उन्नति को पाती रहेंगी। जब मै-पन आता है तो बोझ हो जाता है और नीचे आ जाते हो। इसलिए इस बोझ से भी निश्चिन्त। सिर्फ याद के नशे में सदा रहो। बाप के साथ कम्बाइन्ड सदा रहो तो जहाँ बाप कम्बाइन्ड हो गया वहाँ सेवा क्या है? स्वत: हुई पड़ी है। अनुभवी हो ना?

तो शिक्षक अर्थात् सेवाधारी को यह भी लिफ्ट हो गई ना! याद में रहो और उड़ते रहो। सेवा तो निमित्त हैं। करावनहार करा रहा है तो हल्के भी रहेंगे और सफलतामूर्त्त भी रहेंगे। क्योंकि जहाँ बाप है वहाँ सफलता है ही। अच्छा!

बापदादा अपनी हमजिन्स को देखकर खुश होते हैं। मास्टर भाग्यविधाता हो। भाग्यविधाता को याद कर अनेंको के भाग्य के तकदीर की लकीर खींचने वाले हो। सन्तुष्ट तो सदा हो ही। पूछने की जरूरत है क्या? मास्टर शिक्षक से पूछना यह भी इनसल्ट हो जायेगी ना! सदा सन्तुष्ट हो और सदा रहेंगी।

अच्छा, महाराष्ट्र और राजस्थान का मेला पूरा हुआ? यह दिन भी ड्रामा में लिपटता जा रहा है। फिर कब आयेगा? हर घड़ी का, हर सैकण्ड का अपना-अपना महत्व है। संगमयुग है ही महत्व का युग। महान बनने का युग और महान बनाने का युग। इसलिए संगम के हर सैकण्ड का महत्व है। संगम पर शिक्ष्क अर्थात् सेवाधारी बनने का भी महत्व है, प्रवृत्ति में रहकर न्यारे रहने का भी महत्व है। गोपिकायें बनने का भी महत्व है, पाण्डव बनने का भी महत्व है। सबका अपना-अपना महत्व है। लेकिन निमित्त शिक्षक को चांस बहुत अच्छा है। तो सभी चांस लेने वाली हो ना!

अच्छा-ओम् शान्ति।