03-04-82       ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा       मधुबन


सर्वप्रथम त्याग है - देह-भान का त्याग

सदा सहयोगी, त्यागी बच्चों प्रति बापदादा बोले-

बापदादा अपने त्यागमूर्त बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा त्याग स्वरूप है, लेकिन जैसे भाग्य का सुनाया ना कि एक बाप के बच्चे होते, एक जैसा भाग्य का वर्सा मिलते, सम्भालने और बढ़ाने के आधार पर नम्बर बन जाते हैं। ऐसे त्यागमूर्त तो सभी बने हैं इसमें भी नम्बरवार हैं। त्याग किया और ब्राह्मण बने। लेकिन त्याग की परिभाषा बड़ी गुह्य है। कहने में तो सभी एक बात कहते कि तन-मन-धन, सम्बन्ध सब का त्याग कर लिया। लेकिन तन का त्याग अर्थात् देह के भान का त्याग। तो देह के भान का त्याग हो गया है वा हो रहा है? त्याग का अर्थ है किसी भी चीज को वा बात को छोड़ दिया, अपनेपन से किनारा कर लिया, अपना अधिकार समाप्त हुआ। जिसके प्रति त्याग किया वह वस्तु उसकी हो गई। जिस बात का त्याग किया उसका फिर संकल्प भी नहीं कर सकते - क्योंकि त्याग की हुई बात, संकल्प द्वारा प्रतिज्ञा की हुई बात फिर से वापिस नहीं ले सकते हो। जैसे हद के संन्यासी अपने घर का, सम्बन्ध का त्याग करके जाते हैं और अगर फिर वापिस आ जाएँ तो उसको क्या कहा जायेगा! नियम प्रमाण वापिस नहीं आ सकते। ऐसे आप ब्राह्मण बेहद के संन्यासी वा त्यागी हो। आप त्याग मूर्तियों ने अपने इस पुराने घर अर्थात् पुराने शरीर, पुराने देह का भान त्याग किया, संकल्प किया कि बुद्धि द्वारा फिर से कब इस पुराने घर में आकर्षित नहीं होंगे। संकल्प द्वारा भी फिर से वापिस नहीं आयेंगे। पहला-पहला यह त्याग किया। इसलिए तो कहते हो - देह सहित देह के सम्बन्ध का त्याग। देह के भान का त्याग। तो त्याग किए हुए पुराने घर में फिर से वापिस तो नहीं आते जाते हो! वायदा क्या किया है? तन भी तेरा कहा वा सिर्फ मन तेरा कहा? पहला शब्द तन'' आता है। जैसे तन-मन-धन कहते हो, देह और देह के सम्बन्ध कहते हो। तो पहला त्याग क्या हुआ? इस पुराने देह के भान से विस्मृति अर्थात् किनारा। यह पहला कदम है त्याग का। जैसे घर में घर की सामग्री (सामान) होती है, ऐसे इस देह रूपी घर में भिन्न-भिन्न कर्मेन्द्रियाँ ही सामग्री हैं। तो घर का त्याग अर्थात् सर्व का त्याग। घर को छोड़ा लेकिन कोई एक चीज में ममता रह गई तो उसको त्याग कहेंगे? ऐसे कोई भी कर्मेन्द्रिय अगर अपने तरफ आकर्षित करती है तो क्या उसको सम्पूर्ण त्याग कहेंगे? इसी प्रकार अपनी चेकिंग करो। ऐसे अलबेले नहीं बनना कि और तो सब छोड़ दिया बाकी कोई एक कर्मेन्द्रिय विचलित होती है वह भी समय पर ठीक हो जायेगी। लेकिन कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी। एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी। नम्बरवन में जाने नहीं देगी। अगर कोई हीरेजवाहर, महल-माड़िया छोड़ दे और सिर्फ कोई मिट्टी के फूटे हुए बर्तन में भी मोह रह जाए तो क्या होगा? जैसे हीरा अपनी तरफ आकर्षित करता वैसे हीरे से भी ज्यादा वह फूटा हुआ बर्तन उसको अपनी तरफ बार-बार आकर्षित करेगा। न चाहते भी बुद्धि बार-बार वहाँ भटकती रहेगी। ऐसे अगर कोई भी कर्मेन्द्रिय की आकर्षण रही हुई है तो श्रेष्ठ पद पाने से बार-बार नीचे ले आयेगी। तो पुराने घर और पुरानी सामग्री सबका त्याग चाहिए। ऐसे नहीं समझो यह तो बहुत थोड़ा है, लेकिन यह थोड़ा भी बहुत कुछ गंवाने वाला है, सम्पूर्ण त्याग चाहिए। इस पुरानी देह को बापदादा द्वारा मिली हुई अमानत' समझो। सेवा अर्थ कार्य में लगाना है। यह मेरी देह नहीं लेकिन सेवा अर्थ अमानत है। जैसे मेहमान बन देह में रह रहे हैं। थोड़े समय के लिए बापदादा ने कार्य के लिए आपको यह तन दिया है। तो आप क्या बन गये? मेहमान! मेरे-पन का त्याग और मेहमान समझ महान कार्य में लगाओ। मेहमान को क्या याद रहता है? असली घर याद रहता है या उसी में ही फँस जाते हो! तो आप सबका यह शरीर रूपी घर भी, यह फारिश्ता स्वरूप है, फिर देवता स्वरूप है। उसको याद करो। इस पुराने शरीर में ऐसे ही निवास करो जैसे बापदादा पुराने शरीर का आधार लेते हैं लेकिन शरीर में फँस नहीं जाते हैं। कर्म के लिए आधार लिया और फिर अपने फरिश्ते स्वरूप में स्थित हो जाओ। अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो जाओ। न्यारेपन की ऊपर की ऊँची स्थिति से नीचे साकार कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करने लिए आओ, इसको कहा जाता है - मेहमान अर्थात् महान'। ऐसे रहते हो? त्याग का पहला कदम पूरा किया है?

बापदादा हँसी की बात यह सुनते हैं कि वर्तमान समय कोई भी अपने को कम नहीं समझते। अगर किसी को भी कहा जाए कि दो में से एक छोटा, एक बड़ा बन जाए तो क्या करते हैं? अपने को कम समझते हैं? क्यों, क्या के शस्त्र लेकर उल्टा शक्ति स्वरूप दिखाते हैं। यह भी अलंकार कोई कम नहीं हैं। जैसे सर्व शक्तियों के अलंकार हैं वैसे माया वा रावण की भुजायें भी कोई कम नहीं हैं। शक्तियों को भुजाएं धारी दिखाया है। अष्ट भुजाधारी, 16 भुजाधारी भी दिखाते हैं लेकिन रावण के सिर ज्यादा दिखाते हैं। यह क्यों? क्योंकि रावण माया की शक्ति पहले दिमाग को ही हलचल में लाती है। जिस समय कोई भी माया आती है तो सेकण्ड में उसके कितने रूप होते हैं? क्यों, क्या, ऐसे, वैसे, जैसे कितने क्वेश्चन के सिर पैदा हो जाते हैं। एक काटते हैं तो दूसरा पैदा हो जाता है। एक ही समय में 10 बातें बुद्धि में फौरन आ जाती हैं। तो एक बात को 10 सिर लग गये ना! इन बातों का तो अनुभव है ना? फिर एक-एक सिर अपना रूप दिखाता है। यही 10 शीश के शस्त्रधारी बन जाते हैं।

शक्ति अर्थात् सहयोगी। अभिमान के सिर वाली शक्ति नहीं लेकिन सदा सर्व भुजाधारी अर्थात् सर्व परिस्थिति में सहयोगी'। रावण के 10 सिर वाली आत्मायें हर छोटी-सी परिस्थिति में भी कभी सहयोगी नहीं बनेगी। क्यों, क्या, कैसे के सिर द्वारा अपना उल्टा अभिमान प्रत्यक्ष करती रहेंगी। क्यों का क्वेश्चन हल करेंगी तो फिर कैसे का सिर ऊँचा हो जायेगा अर्थात् एक बात को सुलझायेंगी तो फिर दुसरी बात शुरू कर देंगी। दूसरी बात को ठीक करेंगी तो तीसरा सिर पैदा हो जायेगा। बार-बार कहेंगे यह बात ठीक है लेकिन यह क्यों? वह क्यों? इसको कहा जाता है कि एक बात के 10 शीश लगाने वाली शक्ति। सहयोगी कभी नहीं बनेंगे, सदा हर बात में अपोजीशन करेंगे। तो अपोजीशन करने वाले रावण सम्प्रदाय हो गये ना। चाहे ब्राह्मण बन गये लेकिन उस समय के लिए आसुरी शक्ति का प्रभाव होता है, वशीभूत होते हैं। और शक्ति स्वरूप हर परिस्थिति में, हर कार्य में सदा सहयोगी बन औरों को भी सहयोगी बनायेंगे। चाहे स्वयं को सहन भी करना पड़े, त्याग भी करना पड़े लेकिन सदा सहयोगी होंगे। सहयोग की निशानी भुजायें हैं, इसलिए कभी भी कोई संगठित कार्य होता है तो क्या शब्द बोलते हो? अपनी-अपनी अँगुली दो, तो यह सहयोग देना हुआ ना। अँगुली भी भुजा में है ना। तो भुजायें सहयोग की ही निशानी दिखाई हैं। तो समझा शक्ति की भुजायें और रावण के सिर। तो अपने को देखो कि सदा के सहयोगी मूर्त बने हैं? त्याग मूर्त बनने का पहला कदम फालो फादर के समान किया है? ब्रह्मा बाप को देखा, सुना - संकल्प में, मुख में सदैव क्या रहा? यह बाप का रथ है। तो आपका रथ किसका है? क्या सिर्फ ब्रह्मा ने रथ दिया वा आप लोगों ने भी रथ दिया? ब्रह्मा का प्रवेशता का पार्ट अलग है लेकिन आप सबने भी तन तेरा कहा - न कि तन मेरा। आप सबका भी वायदा है जैसे चलाओ, जहाँ बिठाओ... यह वायदा है ना? वा आँख को मैं चलाऊँगा बाकी को बाप चलायें? कुछ मनमत पर चलेंगे, कुछ श्रीमत पर चलेंगे। ऐसा वायदा तो नहीं है ना? तो कोई भी कर्मेन्द्रिय के वशीभूत होना यह श्रीमत है वा मनमत है? तो समझा, त्याग की परिभाषा कितनी गुह्य है! इसलिए नम्बर बन गये हैं। अभी तो सिर्फ देह के त्याग की बात सुनाई है। आगे और बहुत हैं। अभी तो त्याग की सीढ़ियाँ भी बहुत हैं, यह पहली सीढ़ी की बात कर रहे हैं। त्याग मुश्किल तो नहीं लगता? सबको छोड़ना पड़ेगा। अगर पुराने के बदले नया मिल जाए तो मुश्किल है क्या! अभी-अभी मिलता है। भविष्य मिलना तो कोई बड़ी बात नहीं लेकिन अभी-अभी पुराना भान छोड़ो, फरिश्ता स्वरूप लो। जब पुरानी दुनिया के देह का भान छोड़ देते हो तो क्या बन जाते हो? डबल लाइट। अभी ही बनते हो। परन्तु अगर न यहाँ के न वहाँ के रहते हो तो मुश्किल लगता है। न पूरा छोड़ते हो, न पूरा लेते हो तो अधमरे हो जाते हो, इसलिए बार-बार लम्बा श्वांस उठाते हो। कोई भी बात मुश्किल होती तो लम्बा श्वांस उठता है। मरने में जो मजा है - लेकिन पूरा मरो तो। लेने में कहते हो पूरा लेंगे और छोड़ने में मिट्टी के बर्तन भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए मुश्किल हो जाता है। वैसे तो अगर कोई मिट्टी का बर्तन रखता है तो बापदादा रखने भी दें, बाप को क्या परवाह है! भल रखो। लेकिन स्वयं ही परेशान होते हो। इसलिए बापदादा कहते हैं छोड़ो। अगर कोई भी पुरानी चीज रखते हो तो रिजल्ट क्या होती है? बार-बार बुद्धि भी उन्हों की ही भटकती है। फरिश्ता बन नहीं सकते। इसलिए बापदादा तो और भी हजारों मिट्टी के बर्तन दे सकते हैं - कितना इकट्ठे कर लो। लेकिन जहाँ किचड़ा होगा वहाँ क्या पैदा होंगे? मच्छर! और मच्छर किसको काटेंगे? तो बापदादा बच्चों के कल्याण के लिए ही कहते हैं - पुराना छोड़ दो। अधमरे नहीं बनो। मरना है तो पूरा मरो, नहीं तो भले ही जिंदा रहो। मुश्किल है नहीं लेकिन मुश्किल बना देते हो। कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। जब रावण कि सिर लग जाते हैं तो मुश्किल होता है। जब भुजाधारी शक्ति बन जाते हो तो सहज हो जाता है। सिर्फ एक कदम सहयोग देना और पदम-कदमों का सहयोग मिलना हो जाता। लेकिन पहले जो एक कदम देना पड़ता है उसमें घबरा जाते हो। मिलना भूल जाता है, देना याद आ जाता है। इसलिए मुश्किल अनुभव होता है। अच्छा

ऐसे सदा सहयोग मूर्त, सदा त्याग द्वारा श्रेष्ठ भाग्य अनुभव करने वाले, कदम-कदम में फालो फादर करने वाले, सदा अपने को मेहमान अर्थात् महान आत्मा समझने वाले, ऐसे बेहद के संन्यास करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते''

पार्टियों के साथ-अव्यक्त बापदादा की मुलाकात-

1. परिस्थिति रूपी पहाड़ को स्वस्थिति से जम्प देकर पार करोः- अपने को सदा समर्थ आत्मायें समझते हो! समर्थ आत्मा अर्थात् सदा माया को चेलेन्ज कर विजय प्राप्त करने वाले। सदा समर्थ बाप के संग में रहने वाले। जैसे बाप सर्वशक्तिवान है वैसे हम भी मास्टर सर्वशक्तिवान हैं। सर्व शक्तियाँ शस्त्र हैं, अलंकार हैं, ऐसे अलंकारधारी आत्मा समझते हो? जो सदा समर्थ हैं वे कभी परिस्थितियों में डगमग नहीं होंगे। परिस्थिति से स्वस्थिति श्रेष्ठ है। स्वस्थिति द्वारा कैसी भी परिस्थिति को पार कर सकते हो। जैसे विमान द्वारा उड़ते हुए कितने पहाड़, कितने समुद्र पार कर लेते हैं, क्योंकि ऊँचाई पर उड़ते हैं। तो ऊँची स्थिति से सेकण्ड में पार कर लेंगे। ऐसे लगेगा जैसे पहाड़ को वा समुद्र को भी जम्प दे दिया। मेहनत का अनुभव नहीं होगा।

2. रोब को त्याग, रूहाब को धारण करने वाले सच्चे सेवाधारी बनोः- सभी कुमार सदा रूहानियत में रहते हो? रोब में तो नहीं आते? यूथ को रोब जल्दी आ जाता है। यह समझते हैं हम सब कुछ जानते हैं, सब कर सकते हैं। जवानी का जोश रहता है। लेकिन रूहानी यूथ अर्थात् सदा रूहाब में रहने वाले। सदा नम्रचित्त। क्योंकि जितना नम्रचित्त होंगे उतना निर्माण करेंगे। जहाँ निर्मान होंगे वहाँ रोब नहीं होगा, रूहानियत होगी। जैसे बाप कितना नम्रचित्त बनकर आते हैं, ऐसे फालो फादर। अगर जरा भी सेवा में रोब आता तो वह सेवा समाप्त हो जाती है।

3. भरपूर आत्माओं के चेहरे द्वारा सेवा:- सभी सागर के समीप रहने वाले सदा सागर के खजानों को अपने में भरते जाते हो। सागर के तले में कितने खजाने होते हैं। तो सागर के कण्ठे पर रहने वाले, समीप रहने वाले - सर्व खजानों के मालिक हो गये। वैसे भी जब किसी को कोई खजाना प्राप्त होता है तो खुशी में आ जाते हैं। अचानक कोई को थोड़ा धन मिल जाता है तो नशा चढ़ जाता है। आप बच्चों को ऐसा धन मिला है जो कभी भी कोई छीन नहीं सकता, लूट नहीं सकता। 21 पीढ़ी सदा धनवान रहेंगे। सर्व खजानों की चाबी है बाबा''। बाबा बोला और खजाना खुला। तो चाबी भी मिल गई, खजाना भी मिल गया। सदा मालामाल हो गये। ऐसे भरपूर मालामाल आत्माओं के चेहरे पर खुशी की झलक होती है। उनकी खुशी को देख सब कहेंगे - पता नहीं इनको क्या मिल गया है, जानने की इच्छा रखेंगे। तो उनकी सेवा स्वत: हो जायेगी।

4. मायाजीत बनने के लिए स्वमान की सीट पर रहो:- सदा स्वयं को स्वमान की सीट पर बैठा हुआ अनुभव करते हो? पुण्य आत्मा हैं, ऊँचे ते ऊँची ब्राह्मण आत्मा हैं, श्रेष्ठ आत्मा हैं, महान आत्मा हैं, ऐसे अपने को श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर अनुभव करते हो? कहाँ भी बैठना होता है तो सीट चाहिए ना! तो संगम पर बाप ने श्रेष्ठ स्वमान की सीट दी है, उसी पर स्थित रहो।

स्मृति में रहना ही सीट वा आसन है। तो सदा स्मृति रहे कि मैं हर कदम में पुण्य करने वाली पुण्य आत्मा हूँ। महान संकल्प, महान बोल, महान कर्म करने वाली महान आत्मा हूँ। कभी भी अपने को साधारण नहीं समझो। किसके बन गये और क्या बन गये? इसी स्मृति के आसन पर सदा स्थित रहो। इस आसन पर विराजमान होंगे तो कभी भी माया नहीं आ सकती। हिम्मत नहीं रख सकती। आत्मा का आसन स्वमान का आसन है, उस पर बैठने वाले सहज ही मायाजीत हो जाते हैं।

5. सर्व सम्बन्ध एक के साथ जोड़कर बन्धनमुक्त अर्थात् योगयुक्त बनो:- सदा स्वयं को बन्धनमुक्त आत्मा अनुभव करते हो? स्वतन्त्र बन गये या अभी कोई बन्धन रह गया है? बन्धनमुक्त की निशानी है - सदा योगयुक्त''। योगयुक्त नहीं तो जरूर बन्धन है। जब बाप के बन गये तो बाप के सिवाए और क्या याद आयेगा? सदा प्रिय वस्तु या बढ़िया वस्तु याद आती है ना। तो बाप से श्रेष्ठ वस्तु या व्यक्ति कोई है? जब बुद्धि में यह स्पष्ट हो जाता है कि बाप के सिवाए और कोई भी श्रेष्ठ नहीं तो सहजयोगी' बन जाते हैं। बन्धनमुक्त भी सहज बन जाते हैं, मेहनत नहीं करनी पड़ती। सब सम्बन्ध बाप के साथ जुड़ गये। मेरा-मेरा सब समाप्त, इसको कहा जाता है - सर्व सम्बन्ध एक के साथ।

6. समीप आत्माओं कि निशानी है - समानः- सदा अपने को समीप आत्मा अनुभव करते हो? समीप आत्माओं की निशानी है - समान। जो जिसके समीप होता है, उस पर उसके संग का रंग स्वत: ही चढ़ता है। तो बाप के समीप अर्थात् बाप के समान। जो बाप के गुण, वह बच्चों के गुण, जो बाप का कर्त्तव्य वह बच्चों का। जैसे बाप सदा विश्व-कल्याणकारी है ऐसे बच्चे भी विश्व-कल्याणकारी। तो हर समय यह चेक करो कि जो भी कर्म करते हैं, जो भी बोल बोलते हैं वह बाप समान हैं। बाप से मिलाते चलो और कदम उठाते चलो तो समान बन जायेंगे। जैसे बाप सदा सम्पन्न हैं, सर्वशक्तिवान हैं वैसे ही बच्चे भी मास्टर बन जायेंगे। किसी भी गुण और शक्ति की कमी नहीं रहेगी। सम्पन्न हैं तो अचल रहेंगे। डगमग नहीं होगे।

7. सेवा की भाग-दौड़ भी मनोरंजन का साधन है:- सभी अपने को हर कदम में याद और सेवा द्वारा पद्मों की कमाई जमा करने वाले पद्मापद्म भाग्यवान समझते हो? कमाई का कितना सहज तरीका मिला है! आराम से बैठे बैठे बाप को याद करो और कमाई जमा करते जाओ। मंसा द्वारा बहुत कमाई कर सकते हो, लेकिन बीच-बीच में जो सेवा के साधनों में भाग-दौड़ करनी पड़ती है - यह तो एक मनोरंजन है। वैसे भी जीवन में चेन्ज चाहते हैं तो यह चेन्ज हो जाती है। वैसे कमाई का साधन बहुत सहज है, सेकण्ड में पद्म जमा हो जाते हैं, याद किया और बिन्दी बढ़ गई। तो सहज अविनाशी कमाई में बिजी रहो।

पंजाब निवासी बच्चों को याद प्यार देते हुए बापदादा बोले:- पंजाब निवासी सेवाधारी बच्चों को सेवा के उमंग उत्साह के प्रति सदा मुबारक हो। जितनी सेवा उतना बहुत-बहुत मेवा खाने वाले बनेंगे। पंजाब में वैसे ही मेवा खाने के आदती हैं। तो यहाँ भी जितनी सेवा करेंगे उतना मेवा अर्थात् प्रत्यक्षफल खाने वाले बनेंगे। यह तो विशेष बेहद की सेवा है। मेला अर्थात् बाप से मिलन मनवाना। मेला कर रहे हैं अर्थात् आत्माओं को मिलन कराने के निमित्त बन रहे हैं। बेहद की सेवा, बेहद का उमंग-उत्साह है। इससे सफलता भी बेहद की होती है। बहुत अच्छा उमंग रख सेवा की है और सदा ऐसे उमंग उत्साह में रहते आगे बढ़ते रहना। बापदादा जानते हैं, बहुत अच्छे पुराने पालना लिए हुए बच्चे निमित्त बने हैं। पुराने बच्चों का भाग्य तो अब तक शास्त्र भी गा रहे हैं और चैतन्य में जो नये-नये बच्चे आते हैं वह भी उनका वर्णन करते हैं। तो ऐसे पद्मपति बनने का चान्स लेने वाले सेवाधारी बच्चों को पद्मगुणा यादप्यार। अच्छा-