08-04-82       ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा       मधुबन


लौकिक, अलौकिक सम्बन्ध का त्याग

अव्यक्त बापदादा बोले:-

आज बापदादा अपने महादानी वरदानी विशेष आत्माओं को देख रहे हैं। महादानी वरदानी बनने का आधार है - महात्यागी' बनने के बिगर महादानी वरदानी नहीं बन सकते। महादानी अर्थात् मिले हुए खजाने बिना स्वार्थ के सर्व आत्माओं प्रति देने वाले - नि:स्वार्था'। स्व के स्वार्थ से परे आत्मा ही महादानी बन सकती है। वरदानी, सदा स्वयं में गुणों, शक्तियों और ज्ञान के खजाने से सम्पन्न आत्मा सदा सर्व आत्माओं प्रति श्रेष्ठ और शुभ भावना तथा सर्व का कल्याण हो, ऐसी श्रेष्ठ कामना रखने वाली सदा रूहानी रहमदिल, फराखदिल, ऐसी आत्मा वरदानी' बन सकती है। इसके लिए महात्यागी' बनना आवश्यक है। त्याग की परिभाषा भी सुनाई है कि पहला त्याग है - अपने देह की स्मृति का त्याग। दूसरा देह के सम्बन्ध का त्याग। देह के सम्बन्ध में पहली बात कर्मेंन्द्रियों के सम्बन्ध की सुनाई - क्योंकि 24 घण्टे का सम्बन्ध इन कर्मेन्द्रियों के साथ है। इन्द्रियजीत बनना, अधिकारी आत्मा बनना यह दूसरा कदम। इसका स्पष्टीकरण भी सुना। अब तीसरी बात यह है - देह के साथ व्यक्तियों के सम्बन्ध की। इसमें लौकिक तथा अलौकिक सम्बन्ध आ जाता है। इन दोनों सम्बन्ध में महात्यागी अर्थात् नष्टोमोहा'। नष्टोमोहा की निशानी - दोनों सम्बन्धों में न किसी में घृणा होगी, न किसी में लगाव वा झुकाव होगा। अगर किसी से घृणा है तो उस आत्मा के अवगुण वा आपके दिलपसन्द न करने वाले कर्म बारबार आपकी बुद्धि को विचलित करेंगे, न चाहते भी संकल्प में, बोल में, स्वप्न में भी उसी का उल्टा चिन्तन स्वत: ही चलेगा। याद बाप को करेंगे और सामने आयेगी वह आत्मा। जैसे दिल के झुकाव में लगाव वाली आत्मा न चाहते भी अपने तरफ आकर्षित कर ही लेती है। वह गुण और स्नेह के रूप में बुद्धि को आकर्षित करती है और घृणा वाली आत्मा स्वार्थ की पूर्ति न होने के कारण, स्वार्थ बुद्धि को विचलित करता है। जब तक स्वार्थ पूरा नहीं होता तब तक उस आत्मा के साथ विरोधी संकल्प वा कर्म का हिसाब समाप्त नहीं होता।

घृणा का बीज है स्वार्थ का रॉयल स्वरूप - चाहिए''। इसको यह करना चाहिए, यह न करना चाहिए, यह होना चाहिए। तो चाहिए' की चाह उस आत्मा से व्यर्थ सम्बन्ध जोड़ देती है। घृणा वाली आत्मा के प्रति सदा व्यर्थ चिन्तन होने के कारण परदर्शन चक्रधारी बन जाते। लेकिन यह व्यर्थ सम्बन्ध भी नष्टोमोहा' होने नहीं देंगे। मुहब्बत से मोह नहीं होगा लेकिन मजबूरी से। फिर क्या कहते हैं - मैं तो तंग हो गई हूँ। तो जो तंग करता है उसमें बुद्धि तो जायेगी ना। समय भी जायेगा, बुद्धि भी जायेगी और शक्तियाँ भी जायेंगी। तो एक है यह सम्बन्ध। दूसरा है विनाशी स्नेह और प्राप्ति के आधार पर वा अल्पकाल के लिए सहारा बनने के कारण लगाव वा झुकाव। यह भी लौकिक, अलौकिक दोनों सम्बन्ध में बुद्धि को अपनी तरफ खींचता है। जैसे लौकिक में देह के सम्बन्धियों द्वारा स्नेह मिलता है, सहारा मिलता है, प्राप्ति होती है तो उस तरफ विशेष मोह जाता है ना। उस मोह को काटने के लिए पुरूषार्थ करते हो, लक्ष्य रखते हो कि किसी भी तरफ बुद्धि न जाए। लौकिक को छोड़ने के बाद अलौकिक सम्बन्ध में भी यही सब बातें बुद्धि को आकर्षित करती हैं। अर्थात् बुद्धि का झुकाव अपनी तरफ सहज कर लेती हैं। यह भी देहधारी के ही सम्बन्ध हैं। जब कोई समस्या जीवन में आयेगी, दिल में कोई उलझन की बात होगी तो न चाहते भी अल्पकाल के सहारे देने वाले वा अल्पकाल की प्राप्ति कराने वाले, लगाव वाली आत्मा ही याद आयेगी। बाप याद नहीं आयेगा। फिर से ऐसे लगाव लगाने वाली आत्मायें अपने आपको बचाने के लिए वा अपने को राइट सिद्ध करने के लिए क्या सोचती और बोलती हैं कि बाप तो निराकार और आकार है ना! साकार में कुछ चाहिए जरूर। लेकिन यह भूल जाती हैं अगर एक बाप से सर्व प्राप्ति का सम्बन्ध, सर्व सम्बन्धों का अनुभव और सदा सहारे दाता का अटल विश्वास है, निश्चय है तो बापदादा निराकार या आकार होते भी स्नेह के बन्धन में बाँधे हुए हैं। साकार रूप की भासना देते हैं। अनुभव न होने का कारण? नॉलेज द्वारा यह समझा है कि सर्व सम्बन्ध एक बाप से रखने हैं लेकिन जीवन में सर्व सम्बन्धों को नहीं लाया है। इसलिए साक्षात् सर्व सम्बन्ध की अनुभूति नहीं कर पाते हैं। जब भक्ति मार्ग में भक्त माला की शिरोमणी मीरा को भी साक्षात्कार नहीं लेकिन साक्षात् अनुभव हुआ तो क्या ज्ञान सागर के डायरेक्ट ज्ञान स्वरूप बच्चों को साकार रूप में सर्व प्राप्ति के आधार मूर्त, सदा सहारे दाता बाप का अनुभव नहीं हो सकता! तो फिर सर्वशक्तिवान को छोड़ यथा शक्ति आत्माओं को सहारा क्यों बनाते हो! यह भी एक गुह्य कर्मों का हिसाब बुद्धि में रखो। कर्मों का हिसाब कितना गुह्य है - इसको जानो। किसी भी आत्मा द्वारा अल्पकाल का सहारा लेते हो वा प्राप्ति का आधार बनाते हो, उसी आत्मा के तरफ बुद्धि का झुकाव होने के कारण कर्मातीत बनने के बजाए कर्मों का बन्धन बंध जाता है। एक ने दिया दूसरे ने लिया - तो आत्मा का आत्मा से लेन-देन हुआ। तो लेन-देन का हिसाब बना वा समाप्त हुआ? उस समय अनुभव ऐसे करेंगे जैसे कि हम आगे बढ़ रहे हैं लेकिन वह आगे बढ़ना, बढ़ना नहीं, लेकिन कर्म बन्धन के हिसाब का खाता जमा किया। रिजल्ट क्या होगी! कर्म-बन्धनी आत्मा, बाप से सम्बन्ध का अनुभव कर नहीं सकेगी। कर्मबन्धन के बोझ वाली आत्मा याद की यात्रा में सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव कर नहीं सकेगी, वह याद के सबजेक्ट में सदा कमजोर होगी। नॉलेज सुनने और सुनाने में भल होशियार, सेन्सीबुल होगी लेकिन इसेन्सफुल नहीं होगी। सर्विसएबुल होगी लेकिन विघ्न विनाशक नहीं होगी। सेवा की वृद्धि कर लेंगे लेकिन विधिपूर्वक वृद्धि नहीं होगी। इसलिए ऐसी आत्मायें कर्म बन्धन के बोझ कारण स्पीकर बन सकती हैं लेकिन स्पीड में नहीं चल सकती अर्थात् उड़ती कला की स्पीड का अनुभव नहीं कर सकती। तो यह भी दोनों प्रकार के देह के सम्बन्ध हैं जो महात्यागी' नहीं बनने देंगे। तो सिर्फ पहले इस देह के सम्बन्ध को चेक करो - किसी भी आत्मा से चाहे घृणा के सम्बन्ध में, चाहे प्राप्ति वा सहारे के सम्बन्ध से लगाव तो नहीं है? अर्थात् बुद्धि का झुकाव तो नहीं है? बार-बार बुद्धि का जाना वा झुकाव सिद्ध करता है कि बोझ है। बोझ वाली चीज झुकती है। तो यह भी कर्मों का बोझ बनता है इसलिए बुद्धि का झुकाव न चाहते भी वहाँ ही होता है। समझा - अभी तो एक देह के सम्बन्ध की बात सुनाई।

तो अपने आप से पूछो - कि देह के सम्बन्ध का त्याग किया? वा लौकिक से त्याग कर अलौकिक में जोड़ लिया? कर्मातीत बनने वाली आत्मायें, इस कर्म के बन्धन का भी त्याग करो। तो ब्राह्मणों के लिए इस सम्बन्ध का त्याग ही त्याग है। तो समझा त्याग की परिभाषा क्या है? अभी और आगे सुनायेंगे। यह त्याग का सप्ताह कोर्स चल रहा है। आज का पाठ पक्का हुआ? ब्राह्मणों की विशेषता है ही महात्यागी'। त्याग के बिना भाग्य पा नहीं सकते। ऐसे तो नहीं समझते ब्रह्माकुमार-कुमारी हो गये तो त्याग हो गया? ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी के लिए त्याग की परिभाषा गुह्य हो जाती है। समझा? अच्छा-

ऐसे सदा निस्वार्था, सर्व कल्याणकारी, सर्व प्राप्तियों को सेवा में लगाए जमा करने वाले, सदा दाता के बच्चे देने वाले, लेने के अल्पकाल के प्राप्ति से निष्कामी, सदा सर्व प्रति शुभ भावना, कल्याण की कामना रखने वाले महादानी, वरदानी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।''

टीचर्स के साथ- सेवाधारी आत्माओं का सदा एक ही लक्ष्य रहता है कि बाप समान बनना है? क्योंकि बाप समान सीट पर सेट हो। जैसे बाप शिक्षक बन, शिक्षा देने के निमित्त बनते हैं वैसे सेवाधारी आत्मायें बाप समान कर्त्तव्य पर स्थित हो। तो जैसे बाप के गुण वैसे निमित्त बने हुए सेवाधारी के गुण। तो सदा पहले यह चेक करो - कि जो भी बोल बोलते हैं यह बाप समान हैं? जो भी संकल्प करते हैं यह बाप समान है! अगर नहीं तो चेक करके चेन्ज कर लो। कर्म में नहीं जाओ। ऐसे चेक करने के बाद प्रैक्टिकल में लाने से क्या होगा? जैसे बाप सदा सेवाधारी होते हुए सर्व का प्यारा और सर्व से न्यारा है, ऐसे सेवा करते सर्व के रूहानी प्यारे भी रहेंगे और साथ-साथ सर्व से न्यारे भी रहेंगे! बाप की मुख्य विशेषता ही है - जितना प्यारा उतना न्यारा'। ऐसे बाप समान सेवा में प्यारे और बुद्धियोग से सदा एक बाप के प्यारे सर्व से न्यारे। इसको कहा जाता है - बाप समान सेवाधारी'। तो शिक्षक बनना अर्थात् बाप की विशेष इस विशेषता को फालो करना। सेवा में तो सभी बहुत अच्छी मेहनत करते हो लेकिन कहाँ न्यारा बनना है और कहाँ प्यारा बनना है - इसके ऊपर विशेष अटेन्शन। अगर प्यार से सेवा न करो तो भी ठीक नहीं और प्यार में फँसकर सेवा करो तो भी ठीक नहीं। तो प्यार से सेवा करनी है लेकिन न्यारी स्थिति में स्थित होकर करनी है तब सेवा में सफलता होगी। अगर मेहनत के हिसाब से सफलता कम मिलती है तो जरूर प्यारे और न्यारे बनने के बैलेन्स में कमी है। इसलिए सेवाधारी अर्थात् बाप का प्यारा और दुनिया से न्यारा। यही सबसे अच्छी स्थिति है। इसी को ही कमल पुष्प समान' जीवन कहा जाता है। इसलिए शक्तियों को कमल आसन भी देते हैं! कमल पुष्प पर विराजमान दिखाते हैं। क्योंकि कमल समान न्यारे और प्यारे हैं। तो सभी सेवाधारी कमल आसन पर विराजमान हो ना? आसन अर्थात् स्थिति। स्थिति को ही आसन का रूप दिया है। बाकी कमल पर कोई बैठा हुआ तो नहीं है ना? तो सदा कमल आसन पर बैठो। कभी कमल कीचड़ में न चला जाए इसका सदा ध्यान रहे! अच्छा-

कुमारों के साथ

कुमार जीवन में बाप का बनना- कितने भाग्य की निशानी है! ऐसे अनुभव करते हो कि हम कितने बन्धनों में जाने से बच गये? कुमार जीवन अर्थात् अनेक बन्धनों से मुक्त जीवन। किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं। देह के भान का भी बन्धन न हो। इस देह के भान से सब बन्धन आ जाते हैं। तो सदा अपने को आत्मा भाई-भाई हैं - ऐसे ही समझकर चलते रहो। इसी स्मृति से कुमार जीवन सदा निर्विघ्न आगे बढ़ सकती है। संकल्प वा स्वप्न में भी कोई कमज़ोरी न हो इसको कहा जाता है - विघ्न विनाशक। बस चलते फिरते यह नैचरल स्मृति रहे कि हम आत्मा हैं। देखो तो भी आत्मा को, सुनो तो भी आत्मा होकर। यह पाठ कभी भी न भूले। कुमार सेवा में तो बहुत आगे चले जाते हैं लेकिन सेवा करते अगर स्व की सेवा भूले तो फिर विघ्न आ जाता है। कुमार अर्थात् हार्ड वर्कर तो हो ही लेकिन निर्विघ्न बनना है। स्व की सेवा और विश्व की सेवा दोनों का बैलेन्स हो। सेवा में इतने बिजी न हो जाओ जो स्व की सेवा में अलबेले हो जाओ। क्योंकि कुमार जितना अपने को आगे बढ़ाने चाहें बढ़ा सकते हैं। कुमारों में शारीरिक शक्ति भी है और साथ-साथ दृढ़ संकल्प की भी शक्ति है इसलिए जो चाहे कर सकते हैं, इन दोनों शक्तियों द्वारा आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन बैलेंस की कला चढ़ती कला में ले जाएगी। स्व सेवा और विश्व की सेवा, दोनों का बैलेंस हो तो निर्विघ्न वृद्धि होती रहेगी।

2. कुमार सदा अपने को बाप के साथ समझते हो? बाप और मैं सदा साथ-साथ हैं, ऐसे सदा के साथी बने हो? वैसे भी जीवन में सदा कोई न कोई साथी बनाते हैं। तो आपके जीवन का साथी कौन? (बाप) ऐसा सच्चा साथी कभी भी मिल नहीं सकता। कितना भी प्यारा साथी हो लेकिन देहधारी साथी सदा का साथ नहीं निभा सकते और यह रूहानी सच्चा साथी सदा साथ निभाने वाला है। तो कुमार अकेले हो या कम्बाइन्ड हो? (कम्बाइन्ड) फिर और किसको साथी बनाने का संकल्प तो नहीं आता है? कभी कोई मुश्किलात आये, बीमारी आये, खाना बनाने की मुश्किल हो तो साथी बनाने का संकल्प आयेगा या नहीं? कभी भी ऐसा संकल्प आये तो इसे व्यर्थ संकल्प' समझ सदा के लिए सेकण्ड में समाप्त कर लेना। क्योंकि जिसे आज साथी समझकर साथी बनायेंगे कल उसका क्या भरोसा! इसलिए विनाशी साथी बनाने से फायदा ही क्या! तो सदा कम्बाइन्ड समझने से और संकल्प समाप्त हो जायेंगे क्योंकि सर्वशक्तिवान साथी है। जैसे सूर्य के आगे अंधकार ठहर नहीं सकता वैसे सर्वशक्तिवान के आगे माया ठहर नहीं सकती। तो सब मायाजीत हो जायेंगे।

अच्छा - ओमशान्ति।