17-04-83       ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा       मधुबन


कर्मातीत स्थिति के लिए समेटने और सामने की शक्तियों की आवश्यकता

सर्व प्राप्तियों और शक्तियों से सम्पन्न बनाने वाले सर्वशक्तिवान शिवबाबा बोले:-

आवाज़ से परे अपनी श्रेष्ठ स्थिति को अनुभव करते हो? वह श्रेष्ठ स्थिति सर्व व्यक्त आकर्षण से परे शक्तिशाली न्यारी और प्यारी स्थिति है। एक सेकण्ड भी इस श्रेष्ठ स्थिति में स्थित हो जाओ तो उसका प्रभाव सारा दिन कर्म करते हुए भी स्वयं में विशेष शान्ति की शक्ति अनुभव करेंगे। इसी स्थिति को - कर्मातीत स्थिति, बाप समान सम्पूर्ण स्थिति कहा जाता है। इसी स्थिति द्वारा हर कार्य में सफलता का अनुभव कर सकते हो। ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव किया है? ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है - कर्मातीत स्थिति को पाना। तो लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले अभी से इसी अभ्यास में रहेंगे तब ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। इसी लक्ष्य को पाने के लिए विशेष स्वयं में समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति आवश्यक है। क्योंकि विकारी जीवन वा भक्ति की जीवन दोनों में जन्मजन्मान्तर से बुद्धि का विस्तार में भटकने का संस्कार बहुत पक्का हो गया है। इसलिए ऐसे विस्तार में भटकने वाली बुद्धि को सार रूप में स्थित करने के लिए इन दोनों शक्तियों की आवश्यकता है। शुरू से देखो - अपने देह के भान के कितने वैरायटी प्रकार के विस्तार हैं। उसको तो जानते हो ना! मैं बच्चा हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बुजुर्ग हूँ। मैं फलाने-फलाने आक्यूपेशन वाला हूँ। इसी प्रकार के देह की स्मृति के विस्तार कितने हैं! फिर सम्बन्ध में आओ कितना विस्तार है। किसका बच्चा है तो किसका बाप है, कितने विस्तार के सम्बन्ध हैं। उसको वर्णन करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जानते हो। इसी प्रकार देह के पदार्थो का भी कितना विस्तार है! भक्ति में अनेक देवताओं को सन्तुष्ट करने का कितना विस्तार है। लक्ष्य एक को पाने का है लेकिन भटकने के साधन अनेक हैं। इतने सभी प्रकार के विस्तार को सार रूप में लाने के लिए समाने की वा समेटने की शक्ति चाहिए। सर्व विस्तार को एक शब्द से समा देते। वह क्या? - ‘‘बिन्दू’’। मैं भी बिन्दू बाप भी बिन्दू। एक बाप बिन्दू में सारा संसार समाया हुआ है। यह तो अच्छी तरह से अनुभवी हो ना। संसार में एक है सम्बन्ध, दूसरी है सम्पत्ति। दोनों विशेषतायें बिन्दू बाप में समाई हुई हैं। सर्व सम्बन्ध एक द्वारा अनुभव किया है? सर्व सम्पत्ति की प्राप्ति सुख-शान्ति, खुशी यह भी अनुभव किया है या अभी करना है? तो क्या हुआ? विस्तार सार में समा गया ना! अपने आप से पूछो अनेक तरफ विस्तार में भटकने वाली बुद्धि समेटने के शक्ति के आधार पर एक में एकाग्र हो गई है? वा अभी भी कहाँ विस्तार में भटकती है! समेटने की शक्ति और समाने की शक्ति का प्रयोग किया है? या सिर्फ नालेज है! अगर इन दोनों शक्तियों को प्रयोग करना आता है तो उसकी निशानी सेकण्ड में जहाँ चाहो जब चाहे बुद्धि उसी स्थिति में स्थित हो जायेगी। जैसे स्थूल सवारी में पॉवरफुल ब्रेक होती है तो उसी सेकण्ड में जहाँ चाहें वहाँ रोक सकते हैं। जहाँ चाहें वहाँ गाड़ी को या सवारी को उसी दिशा में ले जा सकते हैं। ऐसे स्वयं यह शक्ति अनुभव करते हो वा एकाग्र होने में समय लगता है? वा व्यर्थ से समर्थ की ओर बुद्धि को स्थित करने में मेहनत लगती है? अगर समय और मेहनत लगती है तो समझो इन दोनों शक्तियों की कमी है। संगमयुग के ब्राह्मण जीवन की विशेषता है ही - सार रूप में स्थित हो सदा सुख-शान्ति के, खुशी के, ज्ञान के, आनन्द के झूले में झूलना। सर्व प्राप्तियों के सम्पन्न स्वरूप के अविनाशी नशे में स्थित रहो। सदा चेहरे पर प्राप्ति ही प्राप्ति है - उस सम्पन्न स्थिति की झलक और फलक दिखाई दे। जब सिर्फ स्थूल धन से सम्पन्न विनाशी राजाई प्राप्त करने वाले राजाओं के चेहरे पर भी द्वापर के आदि में वह चमक थी। यहाँ तो अविनाशी प्राप्ति है। तो कितनी रूहानी झलक और फलक चेहरे से दिखाई देगी! ऐसे अनुभव करते हो? वा सिर्फ अनुभव सुन करके खुश होते हो! पाण्डव सेना विशेष है ना! पाण्डव सेना को देख हर्षित जरूर होते हैं। लेकिन पाण्डवों की विशेषता है उन्हें सदा बहादुर दिखाते हैं, कमज़ोर नहीं। अपने यादगार चित्र देखे हैं ना। चित्रों में भी महावीर दिखाते हैं ना। तो बापदादा भी सभी पाण्डवों को विशेष रूप से, सदा विजयी, सदा बाप के साथी अर्थात् पाण्डवपति के साथी, बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान स्थिति में सदा रहें, यही विशेष स्मृति का वरदान दे रहे हैं। भले नये भी आये हो लेकिन हो तो कल्प पहले के अधिकारी आत्मायें। इसलिए सदा अपने सम्पूर्ण अधिकार को पाना ही है - इस नशे और निश्चय में सदा रहना। समझा। अच्छा!

सदा सेकण्ड में बुद्धि को एकाग्र कर, सर्व प्राप्ति को अनुभव कर, सदा सर्व शक्तियों को समय प्रमाण प्रयोग में लाते, सदा एक बाप में सारा संसार अनुभव करने वाले, ऐसे सम्पन्न और समान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

पार्टियों के साथ

(1) अधरकुमारों के साथ:- ऐसा श्रेष्ठ भाग्य कभी अपने लिए सोचा था? कभी उम्मीद भी नहीं थी कि इतना श्रेष्ठ भाग्य हमें प्राप्त हो सकता है लेकिन नाउम्मीद आत्माओं को बाप ने उम्मीदवार बना दिया। नाउम्मीदी का समय अब समाप्त हो गया। अभी हर कदम में उम्मीद रहती है कि हमारी सफलता है ही। यह संकल्प तो नहीं आता कि पता नहीं होगी या नहीं होगी? किसी भी कार्य में चाहे स्वयं के पुरूषार्थ में, चाहे सेवा में, दोनों में नाउम्मीदी का संस्कार समाप्त हो जाए। कोई भी संस्कार चाहे काम का, चाहे लोभ का, चाहे अहंकार का, बदलने में नाउम्मीदी न आए। ऐसे नहीं मैं तो बदल ही नहीं सकता, यह तो बदलना बड़ा मुश्किल है। ऐसा संकल्प भी न आये। क्योंकि अगर अभी नहीं खत्म करेंगे तो कब करेंगे? अभी दशहरा है ना। सतयुग में तो दीपमाला हो जायेगी। रावण को खत्म करने का दशहरा अभी है। इसमें सदा विजय का उमंग उत्साह रहे। नाउम्मीदी के संस्कार नहीं। कोई भी मुश्किल कार्य इतना सहज अनुभव हो जैसे कोई बड़ी बात ही नहीं है क्योंकि अनेक बार कार्य कर चुके हैं। कोई नई बात नहीं कर रहे हैं। कई बार की हुई को रिपीट कर रहे हैं। तो सदा उम्मीदवार। नाउम्मीद का नाम निशान भी न रहे। कभी कोई स्वभाव संस्कार में संकल्प न आये कि पता नहीं यह परिवर्तन होगा या नहीं होगा। सदा के विजयी, कभी-कभी के नहीं। अगर कोई स्वप्न में भी कमी हो तो उसको सदा के लिए समाप्त कर देना। नाउम्मीद को सदा के लिए उम्मीद में बदल देना। निश्चय अटूट है तो विजय भी सदा है। निश्चय में जब क्यों, क्या आता तो विजय अर्थात् प्राप्ति में भी कुछ न कुछ कमी पड़ जाती है तो सदा उम्मीदवार, सदा विजयी। नाउम्मीदों को सदाकाल के लिए उम्मीदों में बदलने वाले।

(2) सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें, पुरूषोत्तम आत्मायें वा ब्राह्मण चोटी महान आत्मायें समझते हो? अभी से पुरूषोत्तम बन गये ना। दुनिया में और भी पुरूष हैं लेकिन उन्हों से न्यारे और बाप के प्यारे बन गये इसलिए पुरूषोत्तम बन गये। औरों के बीच में अपने को अलौकिक समझते हो ना! चाहे सम्पर्क में लौकिक आत्माओं के आते लेकिन उनके बीच में रहते हुए भी मैं अलौकिक न्यारी हूँ यह तो कभी नहीं भूलना है ना! क्योंकि आप बन गये हो हंस, ज्ञान के मोती चुगने वाले होली हंसहो। वह हैं गन्द खाने वाले बगुले। वे गन्द ही खाते, गन्द ही बोलते...तो बगुलों के बीच में रहते हुए अपना होलीहंस जीवन कभी भूल तो नहीं जाते! कभी उसका प्रभाव तो नहीं पड़ जाता? वैसे तो उसका प्रभाव है मायावी और आप हो मायाजीत तो आपका प्रभाव उन पर पड़ना चाहिए, उनका आप पर नहीं। तो सदा अपने को होलीहंस समझते हो? होलीहंस कभी भी बुद्धि द्वारा सिवाए ज्ञान के मोती के और कुछ स्वीकार नहीं कर सकते। ब्राह्मण आत्मायें जो ऊँच हैं, चोटी हैं वह कभी भी नीचे की बातें स्वीकार नहीं कर सकते। बगुले से होलीहंस बन गये। तो होलीहंस सदा स्वच्छ, सदा पवित्र। पवित्रता ही स्वच्छता है। हंस सदा स्वच्छ है, सदा सफेद-सफेद। सफेद भी स्वच्छता वा पवित्रता की निशानी है। आपकी ड्रेस भी सफेद है। यह प्यूरिटी की निशानी है। किसी भी प्रकार की अपवित्रता है तो होलीहंस नहीं। होलीहंस संकल्प भी अशुद्ध नहीं कर सकते। संकल्प भी बुद्धि का भोजन है। अगर अशुद्ध वा व्यर्थ भोजन खाया तो सदा तन्दुरूस्त नहीं रह सकते। व्यर्थ चीज़ को फेंका जाता, इकट्ठा नहीं किया जाता इसलिए व्यर्थ संकल्प को भी समाप्त करो, इसी को ही होलीहंस कहा जाता है।’’ अच्छा –

पाण्डवों से - पाण्डव अर्थात् संकल्प और स्वप्न में भी हार न खाने वाले। विशेष यह स्लोगन याद रखना कि पाण्डव अर्थात् सदा विजयी। स्वप्न भी विजय का आये। इतना परिवर्तन करना। सभी जो बैठे हो - विजयी पाण्डव हो। वहाँ जाकर हार खा ली, यह पत्र तो नहीं लिखेंगे? माया आ नहीं जाती लेकिन आप उसे खुद बुलाते हो। कमज़ोर बनना अर्थात् माया को बुलाना। तो किसी भी प्रकार की कमज़ोरी माया को बुलाती है। तो पाण्डवों ने क्या प्रतिज्ञा की? सदा विजयी रहेंगे! हार खा करके छिपना नहीं, लेकिन सदा विजयी रहना। ऐसे प्रतिज्ञा करने वालों को सदा बापदादा की बधाई मिलती रहती है। सदा वाह-वाह के गीत बाप ऐसे बच्चों के लिए गाते रहते हैं। तो वाह-वाह के गीत सुनेंगे ना सभी। हार होगी तो हाय-हाय करेंगे, विजयी होंगे तो वाह-वाह करेंगे। सब विजयी, सारे ग्रुप में एक भी हार खाने वाला नहीं!

अच्छा - ओम शान्ति।