04-05-83       ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा       मधुबन


सदा एक मत, एक ही रास्ते से एकरस स्थिति

सदा श्रीमत दाता, सदा विश्व-कल्याणकारी अपने बच्चों के प्रति बोले:-

आज बापदादा वतन में सर्व बच्चों के प्रति रूह-रूहान करते मुस्करा रहे थे। किस बात पर? सभी बच्चे विश्व में चैलेन्ज करते हैं - मुक्ति जीवनमुक्ति का वर्सा सेकण्ड में प्राप्त कर सकते हैं! यह चैलेन्ज करते हो ना! वैसे अनुभव से देखो दिव्य बुद्धि जो हर ब्राह्मण को बर्थडे की गिफ्ट मिली है ब्राह्मण - नामसंस्कार हुआ और दिव्य बुद्धि की गाडली गिफ्ट बापदादा द्वारा मिली। उस दिव्य बुद्धि के आधार पर सोचो ज्ञान भी सेकेण्ड का है। रचयिता और रचना। अल्फ और बे। और योग भी सेकण्ड का है - मैं बाप का, बाप मेरा। दिव्यगुणधारी बनना यह भी सेकेण्ड की बात है। क्योंकि जैसा जन्म जैसा कुल वैसी धारणा स्वत: और सहज होती है! ईश्वरीय कुल है तो गुण अर्थात् धारणायें भी ईश्वरीय होंगी ना! ब्राह्मण जन्म ऊँचे ते ऊँचा जन्म। तो धारणा भी ऊँची होंगी ना। तो धारणा भी सेकण्ड की है। जैसा बाप वैसे बच्चे। और सेवा भी सेकण्ड की बात है। अनुभवी बन खज़ानों के अधिकारी बन, बाप का परिचय देना है! जो अपने पास है वह दूसरों को देना सेकण्ड की और सहज बात है। तो बापदादा देख रहे थे कि सेकण्ड की बात में इतना समय चलते हुए, चाहे दो मास के ब्राह्मण हैं वा बहुत समय के ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण अर्थात् सेकण्ड में वर्से के अधिकारी। तो सेकण्ड के अधिकारी फिर अधीन क्यों बन जाते? क्या अपने अधिकार के स्थिति रूपी सीट पर सेट होना नहीं आता? आराम की सीट को छोड़ हलचल की बेआरामी में क्यों आते! सीट छोड़ते क्यों जो बार-बार सेट होने की मेहनत करते। सीट से उतरे और सर्वशक्तियों की प्राप्ति गई। श्रेष्ठ अर्थात् स्थिति पर सेट होने से अधिकारी-पन की अथार्टी है। जब सीट छोड़ दी तो अथार्टी कहाँ से आई? सीट से उतर अपनी शक्तियों को आर्डर करते इसलिए वह आर्डर मानती नहीं। फिर सोचते हैं, हूँ तो मास्टर सर्वशक्तिवान लेकिन शक्तियाँ काम नहीं करती। क्या दास का आर्डर दास मानेगा वा मालिक का आर्डर दास मानेगा? और फिर चेहरा क्या बन जाता? जैसे कमज़ोर शरीर वाले का चेहरा पीला हो जाता है क्योंकि वह खून की शक्ति नहीं ऐसे कमज़ोर आत्मा उदास बन जाती। ज्ञान भी सुनेगा, सेवा भी करेगा लेकिन उदास रूप में। खुशी की शक्ति, सर्व प्राप्तियों की शक्ति खत्म हो जाती है। दास सदा उदास ही रहेगा। दास आत्मा की और क्या विशेष हंसाने वाली बातें होती हैं? छोटी सी बातों में बोलते कनफ्यूज हो गये हैं, मूँझ गये हैं। जैसे आँखों की नजर कम हो जाती है ना तो एक चीज़ के बजाए दो दो तीन तीन चीजें दिखाई देती हैं और उसी में कनफ्यूज हो जाते हैं कि यह सही है या वह सही है। ऐसे कमज़ोर आत्मायें एक रास्ते के बजाए दूसरे रास्ते भी देखते हैं। एक श्रीमत के साथ-साथ और मतें भी दिखाई देती हैं। फिर सोचते कि यह करें वा वह करें। यह यथार्थ है वा वह यथार्थ है! जब है ही एक रास्ता, एक श्रेष्ठ मत तो यह करें, क्या करें यह क्वेश्चन ही नहीं। कनफ्यूज क्यों नहीं होंगे, स्वयं ही दो बनाए दुविधा में आते हैं। तो यह विचित्र चाल देख बापदादा मुस्करा रहे थे। बापदादा कहते सीट पर स्थित रहो तो एकरस रहेंगे लेकिन चंचल बच्चे के समान बार-बार चक्कर लगाने के अभ्यासी फिर कहते माया का चक्र आ गया। कनफ्यूज होने का कोई आधार ही नहीं है। लेकिन व्यर्थ, कमज़ोर संकल्पों के आधार ले लेते हैं। जब है ही व्यर्थ और कमज़ोर आधार तो फिर रिजल्ट क्या होगी! या अटकेंगे या लटकेंगे या नीचे गिरेंगे। फिर चिल्लायेंगे - बाबा मैं आपका हूँ, आप शक्ति दे दो। सीट पर सेट रहो तो ज्ञान सूर्य के शक्तियों की किरणें, आपके सीट की छत्रछाया स्वत: ही, सदा ही प्राप्त है। सीट से नीचे उतर व्यर्थ वा कमज़ोरी के संकल्पों की दीवार खड़ी कर देते। व्यर्थ संकल्प एक नहीं आता। एक सेकेण्ड में एक से अनेक संकल्प पैदा हो जाते। और उसी से अनेक ईटों की दीवार बन जाती है। इसलिए ज्ञान सूर्य के शक्तियों की किरणें पहुँच नहीं सकतीं। और फिर कहते मदद नहीं मिलती, शक्ति नहीं आती। खुशी नहीं आती वा याद रहती नहीं। आ ही कैसे सकती! तो बापदादा, पुराने-नये जो ऐसा खेल करते हैं उन्हों का खेल देख मुस्करा रहे थे। सेकेण्ड की बात को इतना मुश्किल क्यों बना दिया है। एक रास्ता, एक मत उसको छोड़ - मनमत, परमत उसको मिक्स क्यों करते हो! अपने कमज़ोरी के बनाये हुए रास्ते, ऐसे तो होता ही है, ऐसा तो चलता ही है - इन रास्तों को स्वयं ही बनाए फिर स्वयं ही भूल भुलैया के खेल में आ जाते हैं। मंज़िल से दूर हो जाते हैं। ऐसे करते क्यों हैं? यह सोच रहे हो, हो जाता है, करते नहीं लेकिन हो जाता है। होता भी क्यों है? बीमारी क्यों आती हैं? बदपरहेज वा कमज़ोरी से। वा यह कहेंगे कि बीमारी आ जाती है? न कमज़ोर बनो, न मर्यादाओं की परहेज से वा मर्यादाओं की लकीर से बाहर आओ। अभी तक यही खेल करने है? विश्व-कल्याण के ठेकेदार इतने बड़े आक्यूपेशन वाले और यह बच्चों के खेल खेलते, यह कब तक? विश्व आपका इन्तजार कर रहा है कि शान्ति के दूत आये की आये। हमारे देव हमारे ऊपर शान्ति की आशीर्वाद वा कृपा करने के लिए आये कि आये। जोर-जोर से चिल्ला के घण्टियाँ बजाते। कभी तो चिमटे भी बजाते हैं, नगाड़े बजाते हैं। आओ, आओ करके पुकारते हैं। ऐसी देव आत्मायें अगर अपने बचपन के खेल में रहेंगी तो उन्हों की पुकार सुनेंगी कैसे! इसलिए पुकार सुनो और उपकार करो। समझा, क्या करना है। अच्छा बाप भी समय का ख्याल रखता, आप लोग नहीं रखते।

ऐसे सदा श्रेष्ठ समझदार, सदा एक मत एक रास्ता पर चलने वाले, एकरस स्थिति में स्थित होने वाले, सदा सेकण्ड के अधिकार को स्मृति में रख समर्थ आत्मा रहने वाले, व्यर्थ संकल्पों के खेल को समाप्त कर विश्व-कल्याण के श्रेष्ठ सेवाधारी - ऐसी महान आत्माओं सो देव आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।’’

कुमारियों के साथ :- सभी कुमारियाँ अपने को शिव शक्तियाँ समझती हो? शक्तियाँ सदा कहाँ रहती हैं? शिव के साथ रहती हो ना! जो जिसके साथ रहते उसके संग का रंग तो उन पर जरूर लगेगा ना! तो जो बाप का गुण, जो बाप का कर्त्तव्य वही आपका है ना! बाप का कर्त्तव्य है सेवा, तो आप सभी सेवाधारी हो ना! सेवा करती हो या करनी है? सदा यह लक्ष्य रखो कि बाप समान बनना है। हर बात में चेक करो कि यह बाप का कर्म वा बाप का संकल्प, बोल है? अगर है - तो करो। नहीं तो परिवर्तन कर दो। क्योंकि साधारण कर्म आधाकल्प किया अभी तो बाप समान बनना है। सभी बाप समान विश्व सेवाधारी हो ना? हद के नहीं। हिम्मत अच्छी है। हिम्मत और उमंग में आगे बढ़ रही हो। उमंग उल्लास ही सदा आगे बढ़ाता रहेगा।

सदा उमंग और उल्लास में रहने वाले हर बात में नम्बरवन होंगे। याद में भी नम्बरवन, ज्ञान, धारणा सेवा सबमें नम्बरवन। ऐसे हो? नम्बरवन उमंग उल्लास वाले घरों में कैसे रहेंगे! निर्बन्धन होंगे ना! सभी कौन हो? पिंजरे के पंछी हो या स्वतन्त्र पंछी? पढ़ाई का पिंजरा है? माँ बाप का पिंजरा है? ऐसे पिंजरों में बंधने वाली को नम्बरवन कैसे कहेंगे! अभी निर्बन्धन हो जाओ। जो शक्तिशाली आत्मायें होंगी उनके आगे कोई भी कुछ कर नहीं सकता। जैसे तेज आग जल रही हो तो उसके आगे कोई भी आयेगा नहीं, दूर भागेगा। आप भी योग अग्नि को ऐसा जगाओ जो कोई बन्धन डालने वाला सामने आ ही न सके। जैसे कोई जानवर को भगाना होता है तो आग जला देते हैं, आग के सामने कोई जानवर नहीं आ सकता। ऐसे लगन की अग्नि को तेज करो। अगर अभी तक बन्धन हैं तो लगन है लेकिन अग्नि नहीं बनी है। लगन है तब यहाँ पहुँची लेकिन लगन अग्नि बन जाए तो निर्बन्धन हो जाओ। लगन फुल फोर्स में हो। शक्तियाँ मैदान पर आओ। इतना बड़ा ग्रुप जो आया है तो जरूर कमाल करेगा ना! इतने हैण्ड्स निकल आवे तो वाह-वाह हो जाए। अच्छा!