19-12-85   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


फॉलो फादर

विदेही और अव्यक्त बापदादा बोले

आज सर्व स्नेही बच्चों के स्नेह का रेसपाण्ड करने के लिए बापदादा मिलन मनाने के लिए आये हैं। विदेही बापदादा को देह का आधार लेना पड़ता है। किसलिए? बच्चों को भी विदेही बनाने के लिए। जैसे बाप विदेही, देह में आते हुए भी विदेही स्वरूप में, विदेहीपन का अनुभव कराते हैं। ऐसे आप सभी जीवन में रहते, देह में रहते विदेही आत्म-स्थिति में स्थित हो इस देह द्वारा करावनहार बन करके कर्म कराओ। यह देह करनहार है। आप देही करावनहार हो। इसी स्थिति को ‘‘विदेही स्थिति’’ कहते हैं। इसी को ही फॉलो फादर कहा जाता है। सदा फॉलो फादर करने के लिए अपनी बुद्धि को दो स्थितियों में स्थित रखो। बाप को फॉलो करने की स्थिति है - सदा अशरीरी भव। विदेही भव निराकारी भव। दाता अर्थात् ब्रह्मा बाप को फॉलो करने के लिए सदा अव्यक्त स्थिति भव, फरिश्ता स्वरूप भव, आकारी स्थिति भव। इन दोनों स्थिति में स्थित रहना फॉलो फादर करना है। इससे नीचे व्यक्त भाव, देह-भान, व्यक्ति भाव, इसमें नीचे नहीं आओ। व्यक्ति भाव वा व्यक्त भाव - नीचे ले आने का आधार है। इसलिए सबसे परे इन दो स्थितियों में सदा रहो। तीसरी के लिए ब्राह्मण जन्म होते ही बापदादा की शिक्षा मिली हुई है कि इस गिरावट की स्थिति में संकल्प से वा स्वप्न में भी नही जाना। यह पराई स्थिति है। जैसे अगर कोई बिना आज्ञा के परदेश चला जाए तो क्या होगा? बापदादा ने भी यह आज्ञा की लकीर खींच दी है। इससे बाहर नहीं जाना है। अगर अवज्ञा करते हैं तो परेशान भी होते हैं। पश्चाताप भी करते हैं। इसलिए सदा शान में रहने का, सदा प्राप्ति स्वरूप स्थिति में स्थित होने का सहज साधन है ‘‘फॉलो फादर’’। फॉलो करना तो सहज होता है ना! जीवन में बचपन से फॉलो करने के अनुभवी हो। बचपन में भी बाप बच्चे को अंगुली पकड़ चलने में, उठने-बैठने में फॉलो कराते हैं। फिर जब गृहस्थी बनते हैं तो भी पति-पत्नी को एक-दो के पीछे फॉलो कर चलना सिखलाते हैं। फिर आगे बढ़ गुरू करते हैं तो गुरू के फॉलोअर्स भी बनते हैं अर्थात् फॉलो करने वाले। लौकिक जीवन में भी आदि और अन्त में फॉलो करना होता है। अलौकिक पारलौकिक बाप भी एक ही सहज बात का साधन बताते हैं, क्या करूँ, कैसे करूँ, ऐसे करूँ या वैसे करूँ इस विस्तार से छुड़ा देते हैं। सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही बात है - ‘‘फॉलो फादर’’

साकार रूप में भी निमित्त बन कर्म सिखलाने के लिए पूरे 84 जन्म लेने वाली ब्रह्मा की आत्मा निमित्त बनी। कर्म में कर्म बन्धनों से मुक्त होने में, कर्म सम्बन्ध को निभाने में, देह में रहते विदेही स्थिति में स्थित रहने में, तन के बन्धनों को मुक्त करने में, मन की लगन में मगन रहने की स्थिति में, धन का एक-एक नया पैसा सफल करने में, साकार ब्रह्मा, साकार जीवन में निमित्त बने। कर्मबन्धनी आत्मा, कर्मातीत बनने का एक्जाम्पल बने। तो साकार जीवन को फॉलो करना सहज है ना! यही पाठ हुआ फॉलो फादर। प्रश्न भी चाहे तन के पूछते, सम्बन्ध के पूछते वा धन के पूछते हैं। सब प्रश्नों का जवाब - ब्रह्मा बाप की जीवन है। जैसे आजकल के साइंस वाले हर एक प्रश्न का उत्तर कम्प्यूटर से पूछते हैं। क्योंकि समझते हैं मनुष्य की बुद्धि से यह कम्प्यूटर एक्यूरेट है। बनाने वाले से भी बनी हुई चीज़ को एक्यूरेट समझ रहे हैं। लेकिन आप साइलेन्स वालों के लिए ब्रह्मा की जीवन ही एक्यूरेट कम्प्यूटर है। इसलिए क्या, कैसे के बजाए जीवन के कम्प्यूटर से देखो। कैसा और क्या का क्वेश्चन ऐसे ही बदल जायेगा। प्रश्नचित्त के बजाए प्रसन्नचित्त हो जायेंगे। प्रश्नचित्त हलचल बुद्धि है। इसलिए प्रश्न का चिन्ह भी टेढ़ा है। क्वेश्चन लिखो तो टेढ़ा बांका हैं ना? और प्रसन्नचित्त है बिन्दी। तो बिन्दी में कोई टेढ़ापन है? चारों तरफ से एक ही है। बिन्दी को किसी भी तरफ से देखो तो सीधा ही देखेंगे। और एक जैसा ही देखेंगे। चाहे उल्टा चाहे सुल्टा देखो। प्रसन्नचित्त अर्थात् एक रस स्थिति में एक बाप को फॉलो करने वाले। फिर भी सार क्या निकला? फॉलो ब्रह्मा, साकार रूप फादर वा फॉलो आकार रूप ब्रह्मा फादर। चाहे ब्रह्मा बाप को फॉलो करो चाहे शिव बाप को फॉलो करो। लेकिन शब्द वही है - फॉलो फादर। इसलिए ब्रह्मा की महिमा ‘‘ब्रह्मा वन्दे जगतगुरू’’ कहते हैं। क्योंकि फॉलो करने के लिए साकार रूप में ब्रह्मा ही साकार जगत के लिए निमित्त बने। आप सभी भी अपने को शिवकुमार शिवकुमारी नहीं कहलाते हो। ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी कहलाते हो। साकार रचना के निमित्त साकार श्रेष्ठ जीवन का सेम्पल ब्रह्माही बनता है। इसलिए सतगुरू शिव बाप को कहते, गुरू सिखलाने वाले को भी कहते हैं। जगत के आगे सिखलाने वाले ब्रह्माही निमित्त बनते हैं। तो हर कर्म में फॉलो करना है। ब्रह्मा को इस हिसाब से जगतगुरू कहते हैं। इसलिए जगत ब्रह्मा की वन्दना करता हैं। जगतपिता का टाइटिल भी ब्रह्मा का है। विष्णु को वा शंकर को प्रजापति नहीं कहते। वह मालिक के हिसाब से पति कह देते हैं। लेकिन है पिता। जितना ही जगत का प्यारा उतना ही जगत से न्यारा बन अभी अव्यक्त रूप में फॉलो अव्यक्त स्थिति भव का पाठ पढ़ा रहे हैं। समझा, किसी भी आत्मा का ऐसा इतना न्यारापन नहीं होता। यह न्यारेपन की ब्रह्मा की कहानी फिर सुनायेंगे।

आज तो शरीर को भी संभालना है। जब लोन लेते हैं तो अच्छा मालिक वो ही होता है जो शरीर को, स्थान को शक्ति प्रमाण कार्य में लगावे। फिर भी बापदादा दोनों के शक्तिशाली पार्ट को रथ चलाने के निमित्त बना है। यह भी ड्रामा में विशेष वरदान का आधार है। कई बच्चों को क्वेश्चन भी उठता है कि यही रथ निमित्त क्यों बना? दूसरे तो क्या इनको (गुल्जार बहिन को) भी उठता है। लेकिन जैसे ब्रह्मा भी अपने जन्मों को नहीं जानते थे ना, यह भी अपने वरदान को भूल गई है। यह विशेष साकार ब्रह्मा का आदि साक्षात्कार के पार्ट समय का बच्ची को वरदान मिला हुआ है। ब्रह्मा बाप के साथ आदि समय एकान्त के तपस्वी स्थान पर इस आत्मा के विशेष साक्षात्कार के पार्ट को देख ब्रह्मा बाप ने बच्ची के सरल स्वभाव, इनोसेन्ट जीवन की विशेषता को देख यह वरदान दिया था कि जैसे अभी इस पार्ट में आदि में ब्रह्मा बाप की साथी भी बनी और साथ भी रही ऐसे आगे चल बाप के साथी बनने की, समान बनने की ड्यूटी भी सम्भालेगी। ब्रह्मा बाप के समान सेवा में पार्ट बजायेगी। तो वो ही वरदान तकदीर की लकीर बन गये और ब्रह्मा बाप समान रथ बनने का पार्ट बजाना यह नूँध नूँधी गई। फिर भी बापदादा इस पार्ट बजाने के लिए बच्ची को भी मुबारक देते हैं। इतना समय इतनी शक्ति को एडजस्ट करना, यह एडजस्ट करने की विशेषता की लिफ्ट के कारण एक्स्ट्रा गिफ्ट है। फिर भी बापदादा को शरीर का सब देखना पड़ता है। बाजा पुराना है और चलाने वाले शक्तिशाली हैं। फिर भी हाँ जी, हाँ जी के पाठ के कारण अच्छा चल रहा है। लेकिन बापदादा भी विधि और युक्ति पूर्वक ही काम चला रहे हैं। मिलने का वायदा तो है लेकिन विधि, समय प्रमाण परिवर्तन होती रहेगी। अभी तो अठारहवें वर्ष में सब सुनायेंगे। 17 तो पूरा करना ही है। अच्छा- सब फॉलो फादर करने वाले सहज पुरुषार्थी बच्चों को सदा प्रसन्नचित्त विशेष आत्माओं को, सदा करावनहार बन देह से कर्म कराने वाले मास्टर रचयिता बच्चों को, ऐसे बापदादा के स्नेह का, जीवन द्वारा रेसपाण्ड देने वाले बच्चों को स्नेह सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।’’