01-03-86   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


होली हंस - बुद्धि, वृत्ति, दृष्टि और मुख

पतित पावन बाप अपने होली हँस बच्चों प्रति बोले

आज बापदादा सर्व होली हँसों की सभा देख रहे हैं। यह साधारण सभा नहीं है। लेकिन रूहानी होली हँसों की सभा है। बापदादा हर एक होली हँस को देख रहे हैं कि सभी कहाँ तक होली हँस बने हैं। हँस की विशेषता अच्छी तरह से जानते हो। सबसे पहले हँस बुद्धि अर्थात् सदा हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ और शुभ सोचने वाले। होली हँस अर्थात् कंकड़ और रत्न को अच्छी तरह परखने वाले और फिर रत्न धारण करने वाले। पहले हर आत्मा के भाव को परखने वाले और फिर धारण करने वाले। कभी भी बुद्धि में किसी भी आत्मा के प्रति अशुभ वा साधारण भाव धारण करने वाले न हो। सदा शुभ भाव और शुभ भावना धारण करना। भाव जानने से कभी भी किसी के साधारण स्वभाव या व्यर्थ स्वभाव का प्रभाव नहीं पड़ेगा। शुभ भाव शुभ भावना, जिसको भाव स्वभाव कहते हो। जो व्यर्थ है उनको बदलने का है। बापदादा देख रहे हैं - ऐसे हँस बुद्धि कहाँ तक बने हैं। ऐसे ही हँस वृत्ति अर्थात् सदा हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ कल्याण की वृत्ति। हर आत्मा के अकल्याण की बातें सुनते-देखते भी अकल्याण को कल्याण की वृत्ति से बदल लेना। इसको कहते हैं - होली हँस वृत्ति। अपने कल्याण की वृत्ति से औरों को भी बदल सकते हो। उनके अकल्याण की वृत्ति को अपने कल्याण की वृत्ति से बदल लेना यही होली हँस का कर्त्तव्य है। इसी प्रमाण दृष्टि में सदा हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ शुद्ध स्नेह की दृष्टि हो। कैसा भी हो लेकिन अपनी तरफ से सबके प्रति रूहानी आत्मिक स्नेह की दृष्टि धारण करना। इसको कहते - होली हंस दृष्टि। इसी प्रकार बोल में भी पहले सुनाया है, बुरा बोल अलग चीज़ है। वह तो ब्राह्मणों का बदल गया है लेकिन व्यर्थ बोल को भी होली हँस मुख नहीं कहेंगे। मुख भी होली हँस मुख हो! जिसके मुख से कभी व्यर्थ न निकले। इसको कहेंगे हँस मुख स्थिति। तो होली हंस बुद्धि, वृत्ति, दृष्टि और मुख। जब यह पवित्र अर्थात् श्रेष्ठ बन जाते हैं तो स्वत: ही होली हँस की स्थिति का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देता है। तो सभी अपने आपको देखो कि कहाँ तक सदा होली हँस बन चलते-फिरते हैं। क्योंकि स्व-उन्नति का समय ज्यादा नही रहा है। इसलिए अपने आपको चेक करो और चेन्ज करो।

इस समय का परिवर्तन बहुत काल के परिवर्तन वाली गोल्डन दुनिया के अधिकारी बनायेगा। यह ईशारा बापदादा ने पहले भी दिया है। स्व की तरफ डबल अन्डर लाइन से अटेन्शन सभी का है! थोड़े समय का अटेन्शन है और बहुत काल के अटेन्शन के फलस्वरूप श्रेष्ठ प्राप्ति की प्रालब्ध है। इसलिए यह थोड़ा समय बहुत श्रेष्ठ सुहावना है। मेहनत भी नहीं है सिर्फ जो बाप ने कहा और धारण किया। और धारण करने से प्रैक्टिकल स्वत: ही होगा। होली हंस का काम ही है - धारण करना। तो ऐसे होली हंसो की यह सभा है ना। नॉलेजफुल बन गये। व्यर्थ वा साधारण को अच्छी तरह से समझ गये हो। तो समझने के बाद कर्म में स्वत: ही आता है। वैसे भी साधारण भाषा में यही कहते हो ना कि - अभी मेरे को समझ में आया। फिर करने के बिना रह नहीं सकते हो। तो पहले यह चेक करो कि साधारण अथवा व्यर्थ क्या है? कभी व्यर्थ या साधारण को ही श्रेष्ठ तो नहीं समझ लेते! इसलिए पहले-पहले मुख्य है - होली हंस बुद्धि। उसमें स्वत: ही परखने की शक्ति आ ही जाती है। क्योंकि व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ समय तब जाता जब उसकी परख नहीं रहती कि यह राइट है या रांग है। अपने व्यर्थ को, रांग को राइट समझ लेते हैं तब ही ज्यादा व्यर्थ समय जाता है। है व्यर्थ लेकिन समझते हैं कि मैं समर्थ, राइट सोच रही हूँ। जो मैंने कहा वही राइट है। इसी में परखने की शक्ति न होने के कारण मन की शक्ति, समय की शक्ति, वाणी की शक्ति सब चली जाती है। और दूसरे से मेहनत लेने का बोझ भी चढ़ता है। कारण? क्योंकि होली हंस बुद्धि नहीं बने हैं। तो बापदादा सभी होली हंसों को फिर से यही ईशारा दे रहे हैं कि उल्टे को उल्टा नहीं करो। यह है ही उल्टा यह नहीं सोचो लेकिन उल्टे को सुल्टा कैसे करूँ, यह सोचो। इसको कहा जाता है - कल्याण की भावना। श्रेष्ठ भाव, शुभ भावना से अपने व्यर्थ भाव-स्वभाव और दूसरे के भाव स्वभाव को परिवर्तन करने की विजय प्राप्त करेंगे! समझा। पहले स्व पर विजयी फिर सर्व पर विजयी, फिर प्रकृति पर विजयी बनेंगे। यह तीनों विजय आपको विजयी माला का मणका बनायेगी। प्रकृति में वायुमण्डल, वायब्रशेन या स्थूल प्रकृति की समस्यायें सब आ जाती हैं। तो तीनों पर विजय हो? इसी आधार से विजय माला का नम्बर अपना देख सकते हो! इसलिए नाम ही वैजयन्ती माला रखा है। तो सभी विजयी हो? अच्छा!

आज आस्ट्रलेया वालों का टर्न है। आस्ट्रेलिया वालों को मधुबन से भी गोल्डन चान्सलर बनने का चांस मिलता है। क्योंकि सभी को आगे रखने का चांस देते हो, यह विशेषता है। औरों को आगे रखना यह चांस देना अर्थात् चान्सलर बनना है। चांस लेने वाले को, चांस देने वाले को दोनों को चांसलर कहते हैं। बापदादा सदा हर बच्चे की विशेषता देखते हैं और वर्णन करते हैं। आस्ट्रेलिया में पाण्डवों को सेवा का चांस विशेष मिला हुआ है। ज्यादा सेन्टर्स भी पाण्डव सम्भालते हैं। शक्तियों ने पाण्डवों को चांस दिया है। आगे रखने वाले सदैव आगे रहते ही हैं। यह भी शक्तियों की विशालता है। लेकिन पाण्डव अपने को सदा निमित्त समझ सेवा में आगे बढ़ रहे हो ना! सेवा में निमित्त भाव ही सेवा की सफलता का आधार है। बापदादा तीन शब्द कहते हैं ना, जो साकार द्वारा भी लास्ट में उच्चारण किये। निराकारी, निर्विकारी और निरअहंकारी। यह तीनों विशेषतायें निमित्त भाव से स्वत: ही आती हैं। निमित्त भाव नहीं तो इन तीनों विशेषताओं का अनुभव नहीं होता। निमित्त भाव अनेक प्रकार का मैं-पन मेरा-पन सहज ही खत्म कर देता है। न मैं, न मेरा। स्थिति में जो हलचल होती है वह इसी एक कमी के कारण। सेवा में भी मेहनत करनी पड़ती और अपनी उड़ती कला की स्थिति में भी मेहनत करनी पड़ती। निमित्त हैं अर्थात् निमित्त बनाने वाला सदा याद रहे। तो इसी विशेषता से सदा सेवा की वृद्धि करते हुए आगे बढ़ रहे हो ना। सेवा का विस्तार होना यह भी सेवा की सफलता की निशानी है। अभी अचल-अडोल स्थिति के अच्छे अनुभवी हो गये हो। समझा - आस्ट्रेलिया अर्थात् कुछ एकस्ट्रा है, जो औरों में नहीं है। आस्ट्रेलिया में और वैरायटी - गुजराती आदि नहीं हैं। चैरिटी बिगन्स एट होम का काम ज्यादा किया है। हमजिन्स को जगाया है। कुमार-कुमारियों का अच्छा कल्याण हो रहा है। इस जीवन में अपने जीवन का श्रेष्ठ फैसला करना होता है। अपनी जीवन बना ली तो सदा के लिए श्रेष्ठ बन गये। उल्टी सीढ़ी चढ़ने से बच गये। बापदादा खुश होते हैं कि एक दो से अनेक दीपक जग दीपमाला बना रहे हैं। उमंग-उत्साह अच्छा है। सेवा में बिजी रहने से उन्नति अच्छी कर रहे हैं।

एक तो निमित्त भाव की बात सुनाई दूसरा जो सेवा के निमित्त बनते उन्हों के लिए स्व-उन्नति वा सेवा की उन्नति प्रति एक विशेष स्लोगन सेफ्टी का साधन है। हम निमित्त बने हुए जो करेंगे हमें देख सब करेंगे। क्योंकि सेवा के निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर आना। जैसे कोई पार्टधारी जब स्टेज पर आता है तो कितना अटेन्शन रखता है। तो सेवा के निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर पार्ट बजाना। स्टेज तरफ सभी की नजर होती है। और जो जितना हीरो एक्टर होता उस पर ज्यादा नजर होती है। तो यह स्लोगन सेफ्टी का साधन है। इससे स्वत: ही उड़ती कला का अनुभव करेंगे। वैसे तो चाहे सेन्टर पर रहते वा कहाँ भी रह कर सेवा करते। सेवाधारी तो सब हैं। कई अपने निमित्त स्थानों पर रहकर सेवा का चांस लेते वह भी सेवा की स्टेज पर हैं। सेवा के सिवाए अपने समय को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। सेवा का भी खाता बहुत जमा होता है। सच्ची दिल से सेवा करने वाले अपना खाता बहुत अच्छी तरह से जमा कर रहे हैं। बापदादा के पास हर एक बच्चे का आदि से अन्त तक सेवा का खाता है। और आटोमेटिकली उसमें जमा होता रहता है। एक-एक का एकाउन्ट नहीं रखना पड़ता हैं। एकाउन्ट रखने वालों के पास बहुत फाइल होती हैं। बाप के पास स्थूल फाइल कोई नहीं है। एक सेकण्ड में हर एक का आदि से अभी तक का रजिस्टर सेकण्ड में इमर्ज होता है। आटोमेटिक जमा होता रहता है। ऐसे कभी नहीं समझना हमको तो कोई देखता नहीं, समझता नहीं। बापदादा के पास तो जो जैसा है, जितना करता है, जिस स्टेज से करता है सब जमा होता है। फाइल नहीं है लेकिन फाइनल है। आस्ट्रेलिया में शक्तियों ने बाप का बनने की, बाप को पहचान बाप से स्नेह निभाने में हिम्मत बहुत अच्छी दिखाई है। हलचल की भूल होती है वह तो कई स्थान के, धरनी के या टोटल पिछले जीवन के संस्कार के कारण हलचल आती है। उनको भी पार कर स्नेह के बन्धन में आगे बढ़ते रहते हैं। इसलिए बापदादा शक्तियों की हिम्मत पर मुबारक देते हैं। एक बल एक भरोसा आगे बढ़ा रहा है। तो शक्तियों की हिम्मत और पाण्डवों का सेवा का उमंग दोनों पंख पक्के हो गये हैं। सेवा के क्षेत्र में पाण्डव भी महावीर बन आगे बढ़ रहे हैं। हलचल को पार करने में होशियार हैं। सभी का चित्र वही है। पाण्डव मोटे ताजे लम्बे-चौड़े दिखाते हैं। क्योंकि स्थिति ऐसी ऊँची और मजबूत है। इसलिए पाण्डव ऊँचे और बहादुर दिखाये हैं। आस्ट्रेलिया वाले रहमदिल भी ज्यादा हैं। भटकती हुई आत्माओं के ऊपर रहमदिल बन सेवा में आगे बढ़ रहे हैं। वे कभी सेवा के बिना रह नहीं सकते। बापदादा को बच्चों के आगे बढ़ने की विशेषता पर सदा खुशी है। विशेष खुशनसीब हो। हर बच्चे के उमंग उत्साह पर बापदादा को हर्ष होता है। कैसे हर एक श्रेष्ठ लक्ष्य से आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते रहेंगे। बापदादा सदैव विशेषता को ही देखते हैं। हर एक, एक दो से प्यारा लगता है। आप भी एक दो को इस विधि से देखते हो ना! जिसको भी देखो एक दो से प्रिय लगे। क्योंकि 5 हजार वर्ष के बाद बिछुड़े हुए आपस में मिले हैं तो कितने प्यारे लगते हैं। बाप से प्यार की निशानी यह है कि सभी ब्राह्मण आत्मायें प्यारी लगेंगी। हर ब्राह्मण प्यारा लगना माना बाप से प्यार है। माला में एक दो के सम्बन्ध में तो ब्राह्मण ही आयेंगे। बाप तो रिटायर हो देखेंगे। इसलिए बाप से प्यार की निशानी को सदा अनुभव करो। सभी बाप के प्यारे हैं तो हमारे भी प्यारे हैं। अच्छा-

पार्टियों से

1. सभी अपने को विशेष आत्मायें समझते हो? विशेष आत्मा विशेष कार्य के निमित्त हैं और विशेषतायें दिखानी हैं - ऐसे सदा स्मृति में रहे। विशेष स्मृति साधारण स्मृति को भी शक्तिशाली बना देती है। व्यर्थ को भी समाप्त कर देती है। तो सदा यह विशेष शब्द याद रखना। बोलना भी विशेष, देखना भी विशेष, करना भी विशेष, सोचना भी विशेष। हर बात में यह विशेष शब्द लाने से स्वत: ही बदल जायेंगे और इसी स्मृति से स्व-परिवर्तन तथा विश्व-परिवर्तन सहज हो जायेगा। हर बात में विशेष शब्द ऐड करते जाना। इसी से जो सम्पूर्णता को प्राप्त करने का लक्ष्य है, मंज़िल है उसको प्राप्त कर लेंगे।

2. सदा बाप और वर्से की स्मृति में रहते हो! श्रेष्ठ स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति का अनुभव होता है। स्थिति का आधार है - स्मृति। स्मृति कमज़ोर है तो स्थिति भी कमज़ोर हो जाती है। स्मृति सदा शक्तिशाली रहे। वह शक्तिशाली स्मृति है - मैं बाप का और बाप मेरा। इसी स्मृति से स्थिति शक्तिशाली रहेगी और दूसरों को भी शक्तिशाली बनायेंगे। तो सदा स्मृति के ऊपर विशेष अटेन्शन रहे। समर्थ स्मृति, समर्थ स्थिति, समर्थ सेवा स्वत: होती रहे। स्मृति, स्थिति और सेवा तीनों ही समर्थ हों। जैसे स्विच आन करो तो रोशनी हो जाती, आफ करो तो अंधियारा हो जाता, ऐसे ही यह स्मृति भी एक स्विच है। स्मृति का स्विच अगर कमज़ोर है तो स्थिति भी कमज़ोर है। सदा स्मृति रूपी स्विच का अटेन्शन। इसी से ही स्वयं का और सर्व का कल्याण है। नया जन्म हुआ तो नई स्मृति हो। पुरानी स्मृतियाँ सब समाप्त। तो इसी विधि से सदा सिद्धि को प्राप्त करते चलो।

3. सभी अपने को भाग्यवान समझते हो? वरदान भूमि पर आना यह महान भाग्य है। एक भाग्य वरदान भूमि पर पहुँचने का मिल गया, इसी भाग्य को जितना चाहो श्रेष्ठ बना सकते हो। श्रेष्ठ मत ही भाग्य की रेखा खींचने की कलम है। इसमें जितना भी अपनी श्रेष्ठ रेखा बनाते जायेंगे उतना श्रेष्ठ बन जायेंगे। सारे कल्प के अन्दर यही श्रेष्ठ समय भाग्य की रेखा बनाने का है। ऐसे समय पर और ऐसे स्थान पर पहुँच गये। तो थोड़े में खुश होने वाले नहीं। जब देने वाला दाता दे रहा है तो लेने वाला थके क्यों! बाप की याद ही श्रेष्ठ बनाती है। बाप को याद करना अर्थात् पावन बनना। जन्म-जन्म का सम्बन्ध है तो याद क्या मुश्किल है! सिर्फ स्नेह से और सम्बन्ध से याद करो। जहाँ स्नेह होता है वहाँ याद न आवे, यह हो नहीं सकता। भूलने की कोशिश करो तो भी याद आता। अच्छा