06 - 01 - 88   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


दिल के ज्ञानी तथा स्नेही बनो और लीकेज को बन्द करो

सदा योगी बन साधना की स्थिति से साधनों को कार्य में लाने वाले परमात्म स्नेही बच्चों प्रति स्नेह के सागर बापदादा बोले

आज स्नेह के सागर बापदादा अपने स्नेही बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। यह रूहानी स्नेह, परमात्म - स्नेह नि:स्वार्थ सच्चा स्नेह है। सच्चे दिल का स्नेह आप सर्व आत्माओं को सारा कल्प स्नेही बना देता है। क्योंकि परमात्म - स्नेह, आत्मिक स्नेह, अविनाशी स्नेह - यह रूहानी स्नेह ब्राह्मण जीवन की फाउन्डे - शन है। रूहानी स्नेह का अनुभव नहीं तो ब्राह्मण जीवन का सच्चा आनन्द नहीं। परमात्म - स्नेह कैसी भी पतित आत्मा को परिवर्तन करने का चुम्बक है, परितर्वन होने का सहज साधन है। स्नेह - अधिकारी बनाने का, रूहानी नशे का अनुभव कराने का आधार है। स्नेह है तो रमणीक ब्राह्मण जीवन है। स्नेह नहीं तो ब्राह्मण जीवन सूखी (नीरस) है, मेहनत वाली है। परमात्म - स्नेह दिल का स्नेह है। लौकिक स्नेह दिल का टुकड़ा - टुकड़ा कर देता है क्योंकि बंट जाता है। अनेकों से स्नेह निभाना पड़ता है। अलौकिक स्नेह दिल के अनेक टुकड़ों को जोड़ने वाला है। एक बाप से स्नेह किया तो सर्व के सहयोगी स्वत: बन जाते। क्योंकि बाप बीज है। तो बीज को पानी देने से हर पत्ते को पानी स्वत: मिल जाता है, पत्ते - पत्ते को पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे रूहानी बाप से स्नेह जोड़ना अर्थात् सर्व के स्नेही बनना। इसलिए दिल के टुकड़े - टुकड़े नहीं होते हैं। स्नेह हर कार्य को सहज बना देता है अर्थात् मेहनत से छुड़ा देता है। जहाँ स्नेह होता है वहाँ याद स्वत:, सहज आती ही है। स्नेही को भुलाना मुश्किल होता है, याद करना मुश्किल नहीं होता। चाहे ज्ञान अर्थात् समझ कितनी भी बुद्धि में हो लेकिन यथार्थ ज्ञान अर्थात् स्नेह सम्पन्न ज्ञान हो। अगर ज्ञान है और स्नेह नहीं है तो वह रूखा ज्ञान है। स्नेह सर्व सम्बन्धों का दिल से अनुभव कराता है। सिर्फ ज्ञानी जो हैं वह दिमाग से याद करते हैं और स्नेही दिल से याद करते हैं। दिमाग से याद करने वालों को याद में, सेवा में, धारणा में मेहनत करनी पड़ती है। वह मेहनत का फल खाते हैं और वह मुहब्बत का फल खाते हैं। जहाँ स्नेह नहीं, दिमागी ज्ञान है, तो ज्ञान की बातों में भी क्यों, क्या, कैसे...दिमाग लड़ता रहेगा और लड़ाई लगती रहेगी अपने आप से। व्यर्थ संकल्प ज्यादा चलेंगे। जहाँ क्यों - क्यों होगी, वहाँ क्यों की क्यू होगी। और जहाँ स्नेह है वहाँ युद्ध नहीं लेकिन लवलीन है, समाया हुआ है। जिससे दिल का स्नेह होता है तो स्नेह की बात में क्यों, क्या... नहीं उठता है। जैसे परवाना शमा के स्नेह में क्यों, क्या नहीं करता, न्योछावर हो जाता है। परमात्म - स्नेही आत्मायें स्नेह में समाई हुई रहती हैं।

कई बच्चे बाप से रूहरिहान करते यह कम्पलेन्ट (शिकायत) करते हैं कि ज्ञान तो बुद्धि में है, ब्राह्मण भी बन गये, आत्मा को भी जान गये, बाप को भी पूरे परिचय से जान गये, सम्बन्धों का भी पता है, चक्र का भी ज्ञान है, रचयिता और रचना का भी सारा ज्ञान है - फिर भी याद सहज क्यों नहीं होती? आनन्द का वा शक्ति का, शान्ति का सदा अनुभव क्यों नहीं होता है? मेहनत से क्यों याद आती, निरन्तर क्यों नहीं याद रहती? बार - बार याद भूलती क्यों?'' इसका कारण - क्योंकि ज्ञान दिमाग तक है, ज्ञान के साथ - साथ दिल का स्नेह कम है। दिमागी स्नेह है। मैं बच्चा हूँ, वह बाप है, दाता है, विधाता है - दिमागी ज्ञान है। लेकिन यही ज्ञान जब दिल में समा जाता है, तो स्नेह की निशानी क्या दिखाते हैं? दिल। तो ज्ञान और स्नेह कम्बाइन्ड हो जाता है। ज्ञान बीज है लेकिन पानी स्नेह है। अगर बीज को पानी नहीं मिलेगा तो फल नहीं देगा। ऐसे, ज्ञान है लेकिन दिल का स्नेह नहीं तो प्राप्ति का फल नहीं मिलता। इसलिए मेहनत लगती है। स्नेह अर्थात् सर्व प्राप्ति के, सर्व अनुभव का सागर में समाया हुआ। जैसे लौकिक दुनिया में भी देखो - स्नेह की छोटी - सी गिफ्ट (सौगात) कितनी प्राप्ति का अनुभव कराती है! और वैसे स्वार्थ के सम्बन्ध से लेन - देन करो तो करोड़ भी दे दो लेकिन करोड़ मिलते भी फिर भी सन्तुष्टता नहीं होगी, कोई न कोई कमी फिर भी निकालते रहेंगे - यह होना चाहिए, यह करना चाहिए। आजकल कितना खर्चा करते हैं, कितना शो करते हैं! लेकिन फिर भी स्नेह समीप आता है या दूर करता है? करोड़ की लेन - देन इतना सुख का अनुभव नहीं कराती लेकिन दिल के स्नेह की एक छोटी - सी चीज़ भी कितने सुख की अनुभूति कराती है! क्योंकि दिल के स्नेह में हिसाब - किताब को भी चुक्तू कर लेता है। स्नेह ऐसी विशेष अनुभूति है। तो अपने आपसे पूछो कि ज्ञान के साथ - साथ दिल का स्नेह है? दिल में लीकेज (रिसाव) तो नहीं है? जहाँ लीकेज होता है तो क्या होता है? अगर एक बाप के सिवाए और किसी से संकल्प मात्र भी स्नेह है, चाहे व्यक्ति से, चाहे वैभव से, व्यक्ति की भी चाहे शरीर से स्नेह हो, चाहे उनकी विशेषता से हो, हद की प्राप्ति के आधार से हो लेकिन विशेषता देने वाला कौन , प्राप्ति कराने वाला कौन?

किसी भी प्रकार से स्नेह अर्थात् लगाव चाहे संकल्प - मात्र हो, चाहे वाणी मात्र हो वा कर्म में हो, इसको लीकेज कहा जायेगा। कई बच्चे बहुत भोलेपन में कहते हैं - लगाव नहीं है लेकिन अच्छा लगता है, चाहते नहीं हैं लेकिन याद आ जाती है। तो लगाव की निशानी है - संकल्प, बोल और कर्म से झुकाव। इसलिए लीकेज होने के कारण शक्ति नहीं बढ़ती है। और शक्तिशाली न होने के कारण बाप को याद करने में मेहनत लगती है। और मेहनत होने के कारण सन्तुष्टता नहीं रहती है। जहाँ सन्तुष्टता नहीं, वहाँ अभी - अभी याद की अनुभूति से मस्ती में मस्त होंगे और अभी - अभी फिर दिलशिकस्त होंगे। क्योंकि लीकेज होने के कारण शक्ति थोड़ा टाइम भरती है, सदा नहीं रहती। इसलिए सहज निरन्तर योगी बन नहीं सकते। तो चेक करो - कोई व्यक्ति वा वैभव में लगाव तो नहीं है अर्थात् लीकेज तो नहीं है? यह लीकेज लवलीन स्थिति का अनुभव नहीं करायेगी। वैभव का प्रयोग भले करो लेकिन योगी बन प्रयोग करो। ऐसा न हो कि जिसको आप आराम के साधन समझते हो वह मन की स्थिति को बेआराम करें। क्योंकि कई बच्चे वैभवों के वश होते भी मन के लगाव को जान नहीं सकते। रायल भाषा यही कहते कि हठयोगी नहीं हैं, सहजयोगी हैं। सहजयोगी बनना तो अच्छा लेकिन योगी हो? जो बाप की याद को हलचल में लावे अर्थात् अपनी तरफ आकर्षित करे, झुकाव करे तो योगी बनके प्रयोग करने वाले नहीं कहेंगे। क्योंकि बाप के बनने कारण समय प्रति समय प्रकृति दासी अर्थात् वैभवों के साधनों की प्राप्ति बढ़ती जा रही है। अभी - अभी 18 - 19 वर्ष के अन्दर कितनी प्राप्ति हो रही है! सब आराम के साधन बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन यह प्राप्तियाँ बाप के बनने का फल मिल रहा है। तो फल को खाते बीज को नहीं भूल जाना। यह साधन बढ़ते जायेंगे थोड़ा समय। लेकिन आराम में आते राम' को नहीं भूल जाना। सच्ची सीता रहना। मर्यादा की लकीर से संकल्प रूपी अंगूठा भी नहीं निकालना। क्योंकि यह साधन बिना साधना के यूज करेंगे तो स्वर्ण - हिरण का काम कर लेगा। इसलिए व्यक्ति और वैभव के लगाव और झुकाव से सदा अपने को सेफ रखना, नहीं तो बाप के स्नेही बनने के बजाए, सहजयोगी बनने के बजाए कभी सहयोगी, कभी सहजयोगी, कभी वियोगी - दोनों अनुभव करते रहेंगे। कभी याद, कभी फरियाद - ऐसी अनुभूति में रहेंगे और कम्पलेन भी कभी पूरी नहीं होगी।

व्यक्ति और वैभव के झुकाव की निशानी एक तो सुनाई - कभी सहजयोगी, कभी योगी, कभी फरियादी। दूसरी बात, ऐसी आत्मा को प्राप्त सब होगा - चाहे साधन, चाहे सहयोग, चाहे स्नेह लेकिन लीकेज वाली आत्मा प्राप्ति होते भी कभी सन्तुष्ट नहीं होगी। उनके मुख से सदैव किसी न किसी प्रकार की असन्तुष्टता के बोल, न चाहते भी निकलते रहेंगे। दूसरे ऐसे अनुभव करेंगे कि इनको बहुत मिलता, इन जैसा किसको नहीं मिलता। लेकिन वह आत्मा सदा अपने अप्राप्ति का, दु:ख का वर्णन करती रहेंगी। लोग कहेंगे - इन जैसा सुखी कोई नहीं और वह कहेंगे - मेरे जैसा दु:खी कोई नहीं। क्योंकि गैस का गुब्बारा है। जब बढ़ता है तो बहुत ऊंचा जाता है। जब खत्म होता है तो कहाँ गिरता है! देखने में कितना सुन्दर लगता है उड़ता हुआ लेकिन अल्पकाल का होता है। कभी अपने भाग्य से सन्तुष्ट नहीं होगा। सदैव कोई न कोई को अपने भाग्य के अप्राप्ति का निमित्त बनाते रहेंगे - यह ऐसा करता, यह ऐसा होता, इसलिए मेरा भाग्य नहीं। भाग्यविधाता भाग्य बनाने वाला है। जहाँ भाग्यविधाता भाग्य बना रहा है, उस परमात्म - शक्ति के आगे आत्मा की शक्ति भाग्य को हिला नहीं सकती। यह सब बहानेबाजी है। उड़ती कला की बाजी नहीं आती तो बहाने - बाजी बहुत करते हैं। इसमें सब होशियार हैं। इसलिए यह चेक करो - चाहे स्नेह से झुकाव हो, चाहे हिसाब - किताब चुक्तू होने के कारण झुकाव हो।

जिससे ईर्ष्या वा घृणा होती है वहाँ भी झुकाव होता है। बार - बार वही याद आता रहेगा। बैठेंगे योग में बाप को याद करने और याद आयेगा घृणा वा ईर्ष्या - वाला। सोचेंगे मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ और चलेगा परदर्शन चक्र। तो झुकाव दोनों तरफ का नीचे ले आता है। इसलिए दोनों चेक करना। फिर बाप के आगे अर्जा डालते हैं कि वैसे मैं बहुत अच्छा हूँ, सिर्फ यह एक ही बात ऐसी है, इसको आप मिटा दो।' बाप मुस्कराते हैं कि हिसाब बनाया आपने और चुक्तू बाप करे! चुक्तू करावे - यह बात ठीक है लेकिन चुक्तू करे - यह बात ठीक नहीं। बनाने के समय बाप को भूल गये और चुक्तू करने के टाइम बाबा - बाबा कहते! करनकरावनहार कराने के लिए बंधा हुआ है लेकिन करना तो आपको पड़ेगा। तो सुना, बच्चों का क्या - क्या समाचार बापदादा देखते हैं? सार क्या हुआ? सिर्फ रूखे ज्ञानी नहीं बनो, दिमाग के ज्ञानी नहीं बनो। दिल के ज्ञानी और स्नेही बनो और लीकेज को चेक करो। समझा!

18 जनवरी आ रही है ना। इसलिए पहले से स्मृति दिला रहे हैं जो 18 जनवरी के दिन सदा का समर्थ दिवस मना सको। समझा? सिर्फ जीवन कहानी सुनाके नहीं मनाना लेकिन समान - जीवन बनने का मनाना। अच्छा!

सदा व्यक्ति और वैभव के झुकाव से न्यारे, बाप के स्नेह में समाये हुए, सदा यथार्थ ज्ञान और दिल के स्नेह - दोनों में कम्बाइन्ड स्थिति का अनुभव करने वाले, सदा योगी बन साधना की स्थिति से साधनों को कार्य में लाने वाले, सदा स्नेही, दिल में समाये हुए बच्चों को दिलाराम बाप की यादप्यार और नमस्ते।''

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात: - डबल हीरो समझते हो? हीरे तुल्य जीवन बन गई। तो हीरे समान बन गये और सृष्टि ड्रामा के अन्दर आदि से अन्त तक हीरो पार्ट बजाने वाले हो। तो डबल हीरो हो गये ना। कोई भी हद के ड्रामा में पार्ट बजाने वाले हीरो एक्टर गाये जाते हैं लेकिन डबल हीरो कोई नहीं होता। और आप डबल हीरो हो। बाप के साथ पार्ट बजाना - यह कितना बड़ा भाग्य है! तो सदा इस श्रेष्ठ भाग्य को स्मृति में रख आगे बढ़ रहे हो ना। रूकने वाले तो नहीं हो ना? जो थकता नहीं है वह रूकता भी नहीं है, बढ़ता रहता है। तो आप रूकने वाले हो या थकने वाले? अकेले होते हैं तो थकते हैं। बोर (ऊबना) हो जाते हैं तो थक जाते हैं। लेकिन जहाँ साथ हो वहाँ सदा ही उमंग - उत्साह होता है। कोई भी यात्रा पर जाते हैं तो क्या करते हैं? संगठन बनाते हैं ना। क्यों बनाते हैं? संगठन से, साथ से उमंग - उत्साह से आगे बढ़ते जाते। तो आप सभी भी रूहानी यात्रा पर सदा आगे बढ़ते रहना क्योंकि बाप का साथ, ब्राह्मण परिवार का साथ कितना बढ़िया साथ है! अगर कोई अच्छा साथी होता है तो कभी भी बोर नहीं होते, थकते नहीं। तो सदा आगे बढ़ने वाले सदा ही हर्षित रहते हैं, सदा खुशी में नाचते रहते हैं। तो वृद्धि को पाते रहते हो ना! वृद्धि को प्राप्त होना ही है क्योंकि जहाँ भी, जिस कोने में बिछुड़े हुए बच्चे हैं, वहाँ वह आत्मायें समीप आनी ही है। इसलिए सेवा में भी वृद्धि होती रहती है। कितना भी चाहो - शांत करके बैठ जाएं, बैठ नहीं सकते। सेवा बैठने नहीं देगी, आगे बढ़ायेगी क्योंकि जो आत्मायें बाप की थी, वह बाप की फिर से बननी ही हैं। अच्छा!

मुख्य भाइयों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात: - पाण्डव सोचते हैं कि शक्तियों को चांस अच्छा मिलता है, दादियां बनना अच्छा है! लेकिन पाण्डव अगर प्लैनिंग बुद्धि नहीं हों तो शक्तियां क्या करेंगी! अन्तिम जन्म में भी पाण्डव बनना कम भाग्य नहीं है! क्योंकि पाण्डवों की विशेषता तो ब्रह्मा बाप के साथ ही है। तो पाण्डव कम नहीं। पाण्डवों के बिना शक्तियाँ नहीं, शक्तियों कि बिना पाण्डव नहीं। चतुर्भुज की दो भुजा वह हैं, दो भुजा वह हैं। इसलिए पाण्डवों की विशेषता अपनी। निमित्त सेवा इन्हों को (दादियों को) मिली हुई है, इसलिए यह करती हैं। बाकी सदा पाण्डवों के लिए शक्तियों को और शक्तियों के लिए पाण्डवों को स्नेह है, रिगार्ड है और सदा रहेगा। शक्तियाँ पाण्डवों को आगे रखती हैं - इसमें ही सफलता है और पाण्डव शक्तियों को आगे रखते - इसमें ही सफलता है। पहले आप' का पाठ दोनों को पक्का है। पहले आप', पहले आप' कहते खुद भी पहले आप' हो जायेंगे। बाप बीच में है तो झगड़ा है ही नहीं। पाण्डवों को बुद्धि का वरदान अच्छा मिला हुआ है। जिस कार्य के निमित्त बने हुए हैं उनको वही विशेषता मिली हुई है। और हरेक की विशेषता एक दो से आगे हैं। इसलिए आप निमित्त आत्मायें हो। अच्छा!