10-01-90   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


होलीहँस की विशेषताऐ

अव्यक्त बापदादा अपने बच्चों प्रति बोले -

आज सर्व बच्चों को विशेष आत्मा बनाने वाले बापदादा हर एक होलीहँस की विशेषता देख रहे हैं । जैसे हँस की निर्णय-शक्ति और परखने की शक्ति विशेष होती है। इसलिए ग्रहण करने की शक्ति भी विशेष है जो मोती और कंकड़ दोनों को परखता है और फिर निर्णय करता है, उसके बाद मोती ग्रहण करता है, कंकड़-पत्थर छोड़ देता है। तो परखना, निर्णय करना और ग्रहण करना अर्थात् धारण करना- तीनों शक्तियो की विशेषता के कारण संगमयुगी सरस्वती माँ की सवारी हँस दिखाया है। तो एक सरस्वती मां का यादगार नहीं लेकिन माँ समान बनने वाली ज्ञान-वीणा वादिनी आप सभी हो। इस ज्ञान को धारण करने के लिए भी वह तीनों विशेषताएं अति आवश्यक है। आप सभी ने ब्राह्मण-जीवन धारण करते ही ज्ञान द्वारा, विवेक द्वारा पहले परखने की शक्ति के आधार को पहचाना, अपने-आपको पहचाना, समय को पहचाना, अपने ब्राह्मण परिवार को पहचाना, अपने श्रेष्ठ कर्त्तव्य को पहचाना। इसके बाद निर्णय किया, तब ही ब्राह्मण-जीवन धारण की । यह वही कल्प पहले वाला बेहद का बाप है, परम-आत्मा है, मैं भी वही कल्प वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ, अधिकारी आत्मा हूँ - इस परखने के बाद निर्णय किया। बिना बाप को परखने के निर्णय नहीं कर सकते। कई आत्माएं अभी तक भी सम्बन्ध-संपर्क में है, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहती रहती है लेकिन परमात्म पहचान वा परखने की शक्ति न होने कारण निर्णय नहीं कर सकते कि क्या बनना है वा क्या करना है । इसलिए ब्राह्मण-जीवन धारण नहीं कर सकते। सहजयोगी बनते है लेकिन सहज योगी जीवन नहीं बना सकते। क्योंकि दोनों शक्तियाँ नहीं है, इसलिए होलीहँस नहीं बन सकते। पवित्रता रूपी मोती और अपवित्रता रूपी कंकड़ - दोनों को अलग नहीं समझते तो पवित्रता को ग्रहण करने की शक्ति नहीं आ सकती । तो होलीहँस की विशेषता है - पहली शक्ति 'परखना' अर्थात् पहचानना। आप होली हँसो में यह दोनों शक्तियाँ है ना? क्योंकि बाप को पहचाना, अपने-आपको भी पहचाना, निर्णय भी ठीक किया तब तो ब्राह्मण बने और चल रहे हो। इस बात में तो सब पक्के पास हो। लेकिन जो सेवा करते हो और कर्म में आते हो, सारे दिन की दिनचर्या में जो कर्म करते हो, सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो, उसमें सफलतापूर्वक हर कर्म रहे वा हर सम्पर्क वाली आत्मा के सम्बन्ध में आने में सदा सफलता रहे । हर प्रकार की सेवा मन्सा-वाचा-कर्मणा - तीनों में सदा सफलता अनुभव हो, उसका भी आधार 'परखने की शक्ति' और निर्णय करने की शक्ति' है । इसमें फुल पास हो?

सेवा की सफलता वा सम्पर्क में सफलता सदा न होने का कारण चेक करो - तो कार्य को, व्यक्ति को, आत्मा को परखने की शक्ति में अन्तर पड़ जाता है। जिस आत्मा को जिस समय जिस विधिपूर्वक सहयोग चाहिए वा शिक्षा चाहिए, स्नेह चाहिए, उस समय अगर परखने की शक्ति तीव्र है तो अवश्य सम्बन्ध में सफलता प्राप्त होगी। लेकिन होता क्या है जिस आत्मा को जो सहयोग वा विधि उस समय चाहिए वो न देकर वा न परखने कारण अपने ढंग से उसको सहयोग देते हो वा विधि अपनाते हो, इसलिए संतुष्टता की सफलता नहीं होती। जैसे शारीरिक बीमारी को परखने की डॉक्टर को विधि न आये तो क्या होता है? ठीक होने के बजाए एक से अनेक रोग और पैदा हो जाते है। पेशेंट को संतुष्टता की सफलता नहीं मिलती। जिसको साधारण शब्दो में बापदादा कहते है कि हर एक की नब्ज को पहचानो। चलना और चलाना भी जरूरी है। तो क्या करना पड़ेगा? पहचानने अर्थात् परखने की शक्ति को तीव्र करना पड़े। इसमें अन्तर जाता है जिसको आप साधारण भाषा में कहते हो - हैण्डलिंग का फर्क। कहते हो ना - इनकी हैण्डलिंग पुरानी है, इनकी नई है.. । यह अन्तर क्यों पड़ा? क्योंकि हर समय हर आत्मा और हर कार्य को परखने की शक्ति चाहिए। टोटल परखने की शक्ति आ गई है लेकिन विस्तार से और बेहद की परखने की शक्ति की आवश्यकता है - उस समय आत्मा की ग्रहण शक्ति कितनी है, वायुमण्डल क्या है और उस आत्मा की सुनने वा शिक्षा लेने की मूड कैसी है.. । जैसे कोई कमज़ोर शरीर वाला हो और उसको ज्यादा-से-ज्यादा ताकत का इंजेक्शन दे देते तो क्या हालत होती? पेशेंट के बजाये पेशेंस हो जाता है, हार्टफेल हो जायेगा, शान्ति में चला जाता। ऐसे अगर सम्बन्ध में आने वाली आत्मा कमज़ोर है,आत्मा में हिम्मत नहीं है लेकिन आप उसको शिक्षा का डोज़ देते जाओ, उसका मूड, समय, वायुमण्डल परख न सके तो रिजल्ट क्या होती? एक तो दिलशिकस्त हो जाता और शक्ति न होने कारण ग्रहण नहीं कर सकता, और ही जिद्द और सिद्ध करने में उछलता है। आपने तो अच्छी भावना से किया लेकिन सफलता न मिलने का कारण परखने और निर्णय करने की शक्ति कम है, इसलिए सफलतामूर्त बनने में परसेन्टेज हो जाती। तो सारे दिन के कर्म और समय में परखने की शक्ति की आवश्यकता हुई ना। इसलिए शिक्षा भल दो लेकिन सब बातों को परखकर फिर कदम उठाओ। ऐसे ही सेवा के क्षेत्र में भी अगर आत्माओं की आवश्यकता और इच्छा परखने के बिना कितना भी अच्छा ज्ञान दे दो, कितनी भी मेहनत कर लो लेकिन सफलता नहीं होगी। 'अच्छा-अच्छा' कहना तो एक रीति-रसम हो गई है क्योंकि आप कोई बुरी बात तो कहते भी नहीं हो। लेकिन जो सफलता का लक्ष्य रखते हो, उसमें समीप अनुभव करो, उसके लिए परखने की शक्ति अति आवश्यक है। जैसे कोई मुक्ति का इच्छुक है और उसको आप जीवन मुक्ति और मुक्ति - दोनों भी दे दो लेकिन वह रुचि नहीं रखेगा। पानी के प्यासे को ३६ प्रकार का भोजन दे दो लेकिन वह संतुष्ट पानी की बूँद से ही होगा, न कि भोजन से। तो मुक्ति के इच्छुक को अगर उसको मुक्ति के बारे में स्पष्टीकरण देंगे तो उसकी इच्छा भी बढ़ेगी और जीवनमुक्ति में परिवर्तन भी हो जायेंगे। किसको धारणा की बाते सुनना अच्छा लगता है, उसको आप कल्प ५००० वर्ष का वा गीता का भगवान कौन - यह बताना शुरू कर दो तो और ही इंटरेस्ट खत्म हो जायेगा। इसलिए सेवा में भी आत्मा की स्थिति वा उसकी आस्था क्या है - उसको परखना आवश्यक है। तो सेवा में सफलता का आधार किस शक्ति हुआ? परखने की शक्ति चाहिए। चाहे अज्ञानी आत्माओं की सेवा, चाहे सेवा-साथियों की सेवा - दोनों में सफलता का आधार एक ही है। तो होलीहँस की विशेषता - सबसे पहले परखने की शक्ति को बढ़ाओ। परखने की शक्ति यथार्थ है, श्रेष्ठ है तो निर्णय भी यथार्थ होगा और आप जिसको जो देना चाहते है वह उसमें ग्रहण करने की शक्ति स्वत: ही होगी। और क्या बन जायेंगे? नम्बरवन सफलतामूर्त। तो चाहे सेवा में, चाहे सम्बन्ध में लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस लक्षण को धारण करो ।

तो सारे दिन में यह चेक करो - सारे दिन की दिनचर्या में परखने की शक्ति कहाँ तक यथार्थ हुई और कहाँ करेक्शन-एडीशन करने की आवश्यकता रही? करने के बाद करेक्शन अपने-आप होती जरूर है क्योंकि दिव्य बुद्धि का वरदान सबको मिला हुआ है । चाहे समस्या के वश वा समय से, परिस्थिति के वश वा कोई आत्माओं के संग के वश वा माया द्वारा मनमत के वश, उस समय हो जाते हैं लेकिन समय, परिस्थिति, संग का प्रभाव, मनमत का प्रभाव जब हल्का हो जाता है, फिर दिव्य-बुद्धि अपना काम करती है, जिसको आप लोग कहते हो 'जोश से होश' में आ गये। फिर महसूस होता है कि यह करेक्शन वा एडीशन होनी चाहिए थी वा करनी है । लेकिन रजिस्टर में वा कर्मों के हिसाब के किताब में दाग नहीं, लेकिन बिन्दी तो पड़ गई, बिल्कुल साफ तो नहीं रहा ना। इसलिए कहा जता है - 'कर्मों की लीला अति गुह्य है।

टीचर्स तो कर्मों की लीला को अच्छी रीति जान गई है ना। टीचर्स सारा दिन क्या गीत गाती है कि वाह मेरे श्रेष्ठ कर्मों की लीला' कर्मों की गहन गति की लीला नहीं, श्रेष्ठ कर्मों की लीला। दुनिया वाले तो हर कर्म में, हर कदम में कर्मों को ही कूटते रहते हैं कि 'हाय मेरे कर्म!' आप कहेंगे - 'वाह श्रेष्ठ कर्म'! अब यह आगे बढ़ो कि सदा वाह श्रेष्ठ कर्म' हो, साधारण कर्म नहीं। कर्मों को कूटना तो खत्म हो गया लेकिन श्रेष्ठ कर्म हो इसमें अण्डरलाइन करना। अगर मिक्स कर्म है- साधारण भी है, श्रेष्ठ भी है तो सफलता भी मिक्स हो जाती है । अभी विशेष अटेंशन यह देना है कि साधारणता को विशेषता में परिवर्तन करो। इस पर भी कभी सुनायेंगे कि बापदादा हर एक की रोज़ की दिनचर्या में क्या-क्या देखते है । साधारणता कितनी है और विशेषता कितनी - यह रिजल्ट देखते रहते है ।

बापदादा के पास देखने के साधन इतने है जो एक ही समय देश-विदेश के सभी बच्चों को देख सकते है । अलग-अलग देखने की आवश्यकता नहीं, ५ मिनट में सबका पता लग जाता। बच्चों के वाह-वाह' के गीत भी गाते है, साथ-साथ समान बनने की एम से चेक भी करते हैं । सुनाया था ना कि बाप के स्नेह वा बाप की पहचान- इसमें तो सब पास हो और कभी-कभी तो कमाल के काम भी करते हो। अच्छी कमाल है, न कि धमाल वाली कमाल। कोई-कोई बच्चे धमाल की भी कमाल करते हैं ना! होती धमाल है लेकिन कहते हैं - यह तो हमारी कमाल है। इसलिए बापदादा कहते - परखने की शक्ति को बढाओ। अपने कर्मों को भी परख सकेगें और दूसरों के कर्मों को भी यथार्थ परख सकेंगे। उल्टे को सुल्टा नहीं कहेंगे। वह परखने की शक्ति की कमी है। और सदा एक बात याद रखो, सबके लिए कह रहे हैं - कभी भी कोई ऐसा व्यर्थ वा साधारण कर्म करते हो और अपने-आपको पहचान नहीं सकते हो कि यह राइट है वा रांग है, तो जब ऐसी परिस्थिति आती है, वशीभूत हो जाते है उस समय ऐसी परिस्थिति में सिद्धि को प्राप्त करने की श्रेष्ठ विधि क्या है? क्योंकि उस समय अपनी बुद्धि तो वशीभूत है । राइट को भी रांग समझते हो, रांग को रांग नहीं समझते हो, राइट समझते हो । फिर जिद्द करेंगे या सिद्ध करेंगे। यह निशानी है वशीभूत बुद्धि की। ऐसे समय पर सदैव एक बापदादा की श्रेष्ठ मत याद रखो कि जिन्हों को बाप ने निमित्त बनाया है वह निमित्त आत्माएं जो डायरेक्शन देती है, उसको महत्व देना चाहिए । उस समय यह नहीं सोचो की निमित्त बने हुए शायद कोई के कहने से कह रहे है। इसमें धोखा खा लेते हो। निमित्त बने हुए श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा जो शिक्षा वा डायरेक्शन मिलते है। उसको उस समय महत्व देने से अगर कोई बुरी बात भी होगी तो आप जिम्मेवार नहीं। जैसे ब्रह्मा बाप के लिए सदा कहते हैं कि अगर ब्रह्मा द्वारा कोई गलती भी होगी तो वह गलती भी बदल के आपके प्रति सही हो जायेंगी। तो ऐसे निमित्त बनी हुई आत्माओं प्रति कभी भी यह व्यर्थ संकल्प नहीं उठना चाहिए। मानो कोई ऐसा फैसला भी दे देते हैं जो आपको ठीक नहीं लगता है। लेकिन आप उसमें जिम्मेवार नहीं है। आपका पाप नहीं बनेगा। आपका काम ठीक हो जायेगा। क्योंकि बाप बैठा है। बाप, पाप को बदल लेगा। यह गुह्य रहस्य है । गुप्त मशीनरी है। इसलिए निमित्त बनी हुई श्रेष्ठ आत्माओं के श्रेष्ठ डायरेक्शन को महत्व से कार्य में लगाओ। इसमें आपका फायदा है, नुकसान भी बदलकर फायदे में हो जायेंगा। यह बाप की गारण्टी है। समझा? इसलिए सुनाया कि कर्मों की लीला बड़ी विचित्र है। बाप जिम्मेवार है। जिनको निमित्त बनाया है उसका भी जिम्मेवार बाप है। आपके पाप को बदलने का भी जिम्मेवार है। ऐसे ही निमित्त नहीं बनाया है, सोच-समझ के ड्रामा के लॉ-मुजीब निमित्त बनाया गया है । समझा?

टीचर्स को अच्छा लगता है ना। इनमें फायदा है, बोझा हल्का हो गया। कोई भी बात आयेगी तो कहेंगे निमित्त बने हुए बड़े जाने। हल्के हो गये ना। लेकिन सिर्फ कहने मात्र नहीं, समझने-मात्र, स्नेह-मात्र, स्वमान-मात्र हो। इन गुह्य बातों को बाप जाने और जो समझदार बच्चे है वह जानें। निमित्त बनी हुई आत्माओं के लिए कुछ भी कहना अर्थात् बाप के लिए कहना। निमित्त बाप ने बनाया है ना। बाप से ज्यादा आपको परखने की शक्ति है?

बापदादा का अति स्नेह सभी बच्चों से है । ऐसे नहीं कि निमित्त बने हुए से ही प्यार है। दूसरों से नहीं है। यह भी प्यार के कारण ही डायरेक्शन देते है। प्यार नहीं होता तो कहते - जैसे चल रहे हैं, चलते रहें। जब इतनी हिम्मत रखी है और ब्राह्मण-जीवन में चल रहे हो, उड़ रहे हो तो छोटी-सी कमज़ोरी भी क्यों रह जाए? यह है प्यार। प्यार वाले की कमी कभी नहीं देखी जाती है। यह है प्यार की निशानी। जिससे दिल का सच्चा प्यार होता है उसकी कमी को हमेशा अपनी कमी समझता है । अच्छा

कोई भी कार्य करो तो कभी भी कोई हलचल के वातावरण के प्रभाव में नहीं आओ । अपना प्रभाव डालो तो वह आपके प्रभाव में आ जायेंगे और दिल से यही निकलेगा 'सफलता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है । ' हिम्मत का बहुत महत्त्व है । कभी किसी बात में घबराओ नहीं। हजार भुजाओं वाले आप भी हो। बाप की हजार भुजाएं आपकी भी तो हुई ना। अच्छा

बाम्बे सायन सेन्टर की टीचर्स तथा भाइयों को देख बापदादा बोले - यह सब कार्य समाप्त कर पहुँचे है । पास होके आये हो कि पास-विद्-ऑनर होके आये हो? अच्छा पार्ट बजाया। यह भी स्नेह का रिटर्न आत्मा को प्राप्त होता ही है । जिसको स्नेह मिला है वह समय पर स्नेह का रिटर्न जरूर करता है । कई आत्माओं की इस समय के पार्ट में भी आवश्यकता है और नई दुनिया के आदि में भी आवश्यकता है। तो क्या करेंगे? ड्रामा तो चलना ही है ना! इसलिए जो भी गये हैं वा जा रहे हैं - विशेष आत्माओं की आदि में भी आवश्यकता है । यह नया चैप्टर (पाठ) शुरू करेंगे ना। योगबल की पैदाइश का नया चैप्टर शुरू करने के लिए कौन-सी आत्मायें चाहिए? योगी आत्माएं चाहिए ना! निमित्त बहाना कोई भी बन जाता है, लेकिन चुक्तू भी होना है और सेवा भी होनी है । अभी यह नहीं सोचना कि कृष्ण को जन्म कौन देगा, राधे को कौन जन्म देगा। इस विस्तार में नहीं जाना । यह कोई टापिक नहीं है। इसलिए कहा कि कर्मों की लीला 'वाह-वाह' है, बाकी जन्म कोई भी दे - इनमें नहीं जाना। आपको जाना है या सोचना है ' अच्छा!

चारों ओर के सदा परखने की शक्ति की विशेष आत्माओं को सदा हर कर्म और सम्बन्ध में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त करने वाली सफलतामूर्त आत्माओं को, सदा हिम्मत और शुभभावना और शुभकामना द्वारा परिवर्तन करने वाली शक्तिशाली आत्माओं को सदा, 'वाह मेरे श्रेष्ठ कर्म ' के खुशी के गीत गाने वाले बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

सदा अपने को रूप-बसन्त अनुभव करते हो ? रूप अर्थात् ज्ञानी तू आत्मा भी है और योगी तू आत्मा भी है। जिस समय चाहे रूप बन जायें और जिस समय चाहे बसंत बन जाएँ । इसलिए आप सबका स्लोगन है - ' योगी बनो और पवित्र बनो माना ज्ञानी बनो' ' । औरों को यह स्लोगन याद दिलाने है ना। तो दोनों स्थिति सेकण्ड में बन सकते हैं । ऐसे न हो कि बनने चाहें रूप और याद आती रहे ज्ञान की बातें। सेकण्ड से भी कम टाइम में फुलस्टाप लग जायें । ऐसे नहीं - फुलस्टाप लगाओ अभी और लगे पाँच मिनट के बाद । इसे पावरफुल ब्रेक नहीं कहेंगे । पावरफुल ब्रेक का काम है, जहॉ लगाओ वहीँ लगे। सेकण्ड भी देर से लगी तो एक्सीडेंट हो जायेगा। फुलस्टाप अर्थात् ब्रेक पावरफुल हो। जहॉ मन-बुद्धि को लगाना चाहे वहां लगा लें। यह मन-बुद्धि-संस्कार आप आत्माओं की शक्तियाँ है। इसलिए सदा वह प्रैक्टिस करते रहो कि जिस समय, जिस विधि से मन-बुद्धि को लगाना चाहते हैं वैसा लगता है या टाइम लग जाता है? चेक करते हो या सारा दिन बीत जाता है फिर रात को चेक करते हो? बीच-बीच में चेक करो । जिस समय बहुत बुद्धि बिजी हो, उस समय ट्रायल करके देखो कि अभी-अभी अगर बुद्धि को इस तरफ से हटाकर बाप की तरफ लगाना चाहें तो सेकण्ड में लगती है? ऐसे तो सेकण्ड भी बहुत है । इसको कहते हैं कंट्रोलिंग पावर। जिसमे कंट्रोलिंग पावर नहीं वह रूलिंग पावर के अधिकारी बन नहीं सकते। स्वराज्य के हिसाब से अभी भी रूलर (शासक) हो। स्वराज्य मिला है ना! ऐसे नहीं आँख को कहो यह देखो और वह देखे कुछ और, कान को कहो कि यह नहीं सुनो और सुनते ही रहे । इसको कंट्रोलिंग पावर नहीं कहते। कभी कोई कमेंन्द्रिय धोखा न दें - इसको कहते हैं - 'स्वराज्य । ' तो राज चलाने आना है ना? अगर राजा को प्रजा माने नहीं तो उसे नाम का राजा कहेंगे या काम का? आत्मा का अनादि स्वरूप ही राजा का है, मालिक का है । यह तो पीछे परतंत्र बन गई है लेकिन आदि और अनादि स्वरूप स्वतंत्र है । तो आदि और अनादि स्वरूप सहज याद आना चाहिए ना। स्वतंत्र हो या थोड़ा-थोड़ा परतंत्र हो? मन का भी बंधन नहीं। अगर मन का बंधन होगा तो यह बंधन और बंधन को ले आयेगा। कितने जन्म बंधन में रहकर देख लिया! अभी भी बंधन अच्छा लगता है क्या? बंधनमुक्त अर्थात् राजा, स्वराज्य-अधिकारी । क्योंकि बंधन प्राप्तियों का अनुभव करने नहीं देता। इसलिए सदा ब्रेक पावरफुल रखो, तब अन्त में पास-विद्-ऑनर होंगे अर्थात् फर्स्ट डिवीजन में आयेंगे। फर्स्ट माना फास्ट, ढीले-ढीले नहीं। ब्रेक फास्ट लगे। कभी भी ऊँचाई के रास्ते पर जाते हैं तो पहले ब्रेक चेक करते हैं । आप कितना ऊँचे जाते हो! तो ब्रेक चाहिए ना! बार-बार चेक करो । ऐसा ना हो कि आप समझो ब्रेक बहुत अच्छी है लेकिन टाइम पर लगे नहीं, तो धोखा हो जायेगा। इसलिए अभ्यास करो- स्टाप कहा और स्टाप हो जायें । रिद्धि- सिद्धि वाले क्या करते हैं? सिद्धि दिखाते है - चलती हुई ट्रेन को स्टाप कर दिया... । लेकिन उससे क्या फायदा? आप संकल्पो की ट्रेफिक को स्टाप करते हो। इससे बहुत फायदे हैं। आपकी हैं 'विधि से सिद्धि ' और उनकी है 'रिद्धि-सिद्धि । ' वह अल्पकाल की है, यह सदाकाल की है। तो सभी नालेजफुल बन गये। रचना और रचता की सारी नालेज आ गई । दुनिया वाले समझते हैं - मातायें क्या करेगी । और मातायें असंभव को भी सम्भव बना देती हैं । ऐसी शक्तियाँ हो ना? अच्छा!