26-10-91   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


तपस्या का प्रत्यक्ष-फल - खुशी

अव्यक्त बापदादा अपने तपस्वी राज बच्चों प्रति बोले: -

आज बापदादा अपने सर्व तपस्वीराज बच्चों को देख रहे हैं। तपस्वी भी हो और राज-अधिकारी भी हो इसलिए तपस्वीराज हो। तपस्या अर्थात् राज्य अधिकारी बनना। तपस्या राजा बनाती है। तो सभी राजा बने हो ना। तपस्या का बल क्या फल देता है? अधीन से अधिकारी अर्थात् राजा बना देता है इसलिए गायन भी है कि तपस्या से राज्य भाग्य प्राप्त होता है। तो भाग्य कितना श्रेष्ठ है! ऐसा भाग्य सारे कल्प में किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकता। इतना बड़ा भाग्य है जो भाग्य विधाता को अपना बना दिया है। एक एक भाग्य अलग मांगने की आवश्यकता नहीं है। भाग्य विधाता से सर्व भाग्य वर्से में ले लिया है। वर्सा कभी मांगा नहीं जाता है। सर्व भाग्य, भाग्य विधाता ने स्वयं ही दिया है। तपस्या अर्थात् आत्मा कहती है मैं तेरी तू मेरा, इसको ही तपस्या कहा जाता है। इसी तपस्या के बल से भाग्य विधाता को अपना बना दिया है। भाग्य विधाता बाप भी कहते हैं मैं तेरा। तो कितना श्रेष्ठ भाग्य हो गया! भाग्य के साथ साथ स्वराज्य अभी मिला है। भविष्य विश्व का राज्य स्वराज्य का ही आधार है। इसीलिए तपस्वीराज हो। बापदादा को भी अपने हर एक राज्य अधिकारी बच्चे को देख हर्ष होता है। भक्ति में अनेक जन्मों में बापदादा के आगे क्या बोला ? याद है या भूल गये हो? बार बार अपने को मैं गुलाम, मैं गुलाम ही बोला है। मैं गुलाम तेरा। बाप कहते हैं मेरे बच्चे और गुलाम ! सर्व शक्तिवान के बच्चे और गुलाम शोभता है ! इसलिए बाप ने मैं गुलाम तेरा के बजाए क्या अनुभव कराया ? मैं तेरा। तो गुलाम से राजा बन गये। अभी भी कभी गुलाम तो नहीं बनते हो ? गुलामपन के पुराने संस्कार कभी इमर्ज तो नहीं होते हैं? माया के गुलाम होते हो? राजा कभी गुलाम नहीं बन सकता है। गुलामपन छूट गया वा कभी कभी अच्छा लगता है? तो तपस्या का बल बहुत श्रेष्ठ है और तपस्या क्या करते हो ? तपस्या में मेहनत करते हो? बापदादा ने सुनाया था कि तपस्या क्या है ? मौज मनाना। तपस्या अर्थात् बहुत सहज नाचना और गाना बस। नाचना गाना सहज होता है वा मुश्किल होता है? मनोरंजन होता है वा मेहनत होती है? तो तपस्या में क्या करते हो? तपस्या का प्रत्यक्षफल है खुशी। तो खुशी में क्या होता है? नाचना। तपस्या अर्थात् खुशी में नाचना और बाप के और अपने आदि अनादि स्वरूप के गुण गाना। तो यह गीत कितना बड़ा और कितना सहज है। इसमें गला ठीक है वा नहीं ठीक है इसकी भी जरूरत नहीं है। निरन्तर यह गीत गा सकते हो। निरन्तर खुशी में नाचते रहो। तो तपस्या का अर्थ क्या हुआ ? नाचना और गाना कितना सहज है। माथा भारी उसका होता है जो छोटी सी गलती करते हैं। ब्राह्मण जीवन में कभी किसका माथा भारी हो नहीं सकता। हॉस्पिटल बनाने वालों का माथा भारी हुआ ? ट्रस्टी सामने बैठे हैं ना! माथा भारी है, जब करनकरावनहार बाप है तो आपको क्या बोझ है ? यह तो निमित्त बनाकर भाग्य बनाने का साधन बना रहे हो। आपकी जिम्मेवारी क्या है? बाप के बजाए अपनी जिम्मेवारी समझ लेते हैं तो माथा भारी होता है। बाप सर्व शक्तिवान मेरा साथी है तो क्या भारीपन होगा। छोटी सी गलती कर देते हो, मेरी जिम्मेवारी समझते हो तो माथा भारी होता है। तो ब्राह्मण जीवन ही नाचो गाओ और मौज करो। सेवा चाहे वाचा है चाहे कर्मणा। यह सेवा भी एक खेल है। सेवा कोई और चीज नहीं है। कोई दिमाग के खेल होते हैं, कोई हल्के खेल होते हैं। लेकिन हैं तो खेल ना। दिमाग के खेल में दिमाग भारी होता है क्या। तो यह सब खेल करते हो। तो चाहे कितना भी बड़ा सोचने का काम हो, अटेन्शन देने का काम हो लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा के लिए सब खेल है, ऐसे है? वा थोड़ा थोड़ा करते करते थक जाते हो? मेजोरिटी अथक बनते हो लेकिन कभी कभी थोड़ा थक जाते हो। यही योग का प्रयोग सर्व खजानों को,चाहे समय, चाहे संकल्प, चाहे ज्ञान का खज़ाना वा स्थूल तन भी अगर योग के प्रयोग की रीति से प्रयोग करो तो हर खज़ाना बढ़ता रहेगा। इस तपस्या वर्ष में योग का प्रयोग किया है ना। क्या प्रयोग किया है? इस एक एक खज़ाने का प्रयोग करो। कैसे प्रयोग करो ? कोई भी खज़ाने को कम खर्चा और प्राप्ति अधिक। मेहनत कम सफलता ज्यादा इस विधि से प्रयोग करो। जैसे समय को वा संकल्प को उठाओ - यह श्रेष्ठ खज़ाने हैं। तो संकल्प का खर्च कम हो लेकिन प्राप्ति ज्यादा हो। जो साधारण व्यक्ति दो चार मिनट संकल्प चलाने के बाद, सोचने के बाद सफलता या प्राप्ति कर सकता है वह आप एक दो सेकेण्ड में कर सकते हो। जिसको साकार में भी ब्रह्मा बाप कहते थे कम खर्चा बाला नशीन। खर्च कम करो लेकिन प्राप्ति 100 गुणा हो। इससे क्या होगा? जो बचत होगी चाहे समय की, चाहे संकल्प की तो बचत को औरों की सेवा में लगा सकेंगे। दान पुण्य कौन कर सकता है? जिसको धन की बचत होती है। अगर अपने प्रति लगाने जितना ही कमाया और खाया तो दान पुण्य कर नहीं सकेंगे। योग का प्रयोग यही है। कम समय में रिजल्ट ज्यादा, कम संकल्प से अनुभूति ज्यादा हो तब ही हर खज़ाना औरों के प्रति यूज कर सकेंगे। ऐसे ही वाणी और कर्म, कम खर्चा और सफलता ज्यादा तब ही कमाल गाई जाती है। बापदादा ने कमाल क्या की? कितने थोड़े समय में क्या से क्या बना दिया? तब तो कहते हो कमाल कर दी। एक का पद्मगुणा प्राप्ति का अनुभव करते हो। तब कहते हो कमाल कर दिया। जैसे बाप-दादा का खज़ाना प्राप्ति और अनुभूति ज्यादा कराता है। ऐसे आप सब भी योग का प्रयोग करो। सिर्फ यह गीत नहीं है कि बाबा आपने कमाल कर दिया है। आप भी तो कमाल करने वाले हो। करते भी हो। लेकिन तपस्या के चलते हुए समय में मेजोरिटी की रिजल्ट क्या देखी?

तपस्या का उमंग उत्साह अच्छा है। अटेन्शन भी है सफलता भी है लेकिन स्वयं प्रति सर्व खज़ाने यूज ज्यादा करते हो। अपनी अनुभूतियाँ करना यह भी अच्छी बात है। लेकिन तपस्या वर्ष स्वयं प्रति और विश्व सेवा प्रति ही दिया हुआ है। तपस्या के वायब्रेशन्स विश्व में और तीव्रगति से फैलाओ। जो सुनाया कि योग के प्रयोग को और अनुभव की प्रयोगशाला में प्रयोग की गति को बढ़ाओ । वर्तमान समय सर्व आत्माओं को आवश्यकता है आपके शक्तिशाली वायब्रेशन्स द्वारा वायुमण्डल द्वारा परिवर्तन होने की। इसीलिए प्रयोग को और बढ़ाओ। सहयोगी बच्चे भी बहुत हैं। यह सहयोग ही योग में बदल जायेगा। एक हैं स्नेही सहयोगी और दूसरे हैं सहयोगी योगी। और तीसरे हैं निरन्तर योगी प्रयोगी। अभी अपने से पूछो मैं कौन। लेकिन बापदादा को तीनों ही प्रकार के बच्चे प्रिय हैं। कई बच्चों के वायब्रेशन्स बापदादा के पास पहुंचे हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के वायब्रेशन्स हैं। जानते हो कौन सी बात बाप के पास पहुंची है? इशारे से समझने वाले हो ना? इस तपस्या वर्ष में जो कुछ हो रहा है इसका कारण क्या ? बड़े बड़े प्रोजेक्ट कर रहे हो इसका कारण क्या? कोई समझते हैं कि यही तपस्या का फल है। कोई समझते हैं तपस्या वर्ष में यह क्यों? दोनों वायब्रेशन्स आते हैं। लेकिन यह समय की तीव्रगति और तपस्या के वायब्रेशन्स से आवश्यकता का पूर्ण होना यह तपस्या के बल का फल है। फल तो खाना पड़ेगा ना। यह ड्रामा दिखाता है कि तपस्या सर्व आवश्यकताओं को समय पर सहज पूर्ण कर सकती है। समझा। क्वेश्चन नहीं उठ सकता कि यह क्यों हो रहे हैं। तपस्या अर्थात् सफलता सहज अनुभूति हो। आगे चलकर असम्भव कैसे सहज सम्भव होता है यह अनुभव ज्यादा से ज्यादा करते रहेंगे। विघ्नों का आना यह भी ड्रामा में आदि से अन्त तक नूंध है। यह विघ्न भी असम्भव से सम्भव की अनुभूति कराते हैं। और आप सभी तो अनुभवी हो ही गये हैं। इसलिए विघ्न भी खेल लगता है। जैसे फुटबाल का खेल करते हो । तो क्या करते हो? बाल आता है तभी तो ठोकर लगाते हो। अगर बाल ही न आये तो ठोकर कैसे लगायेंगे? खेल कैसे होगा? यह भी फुटबाल का खेल है। खेल खेलने में मजा आता है ना या मूंझते हो? कोशिश करते हो ना कि बाल मेरे पांव में आये मैं लगाऊं। यह खेल तो होता रहेगा। नाथिंगन्यु। ड्रामा खेल भी दिखाता है और सम्पन्न सफलता भी दिखाता है। यही ब्राह्मण कुल की रीति रसम है। अच्छा।

इस ग्रुप को बहुत चांस मिले हैं। किसी भी कार्य के निमित्त बनना,किसी भी प्रकार की विधि से निमित्त बनना अर्थात् चांस लेने वाले चांसलर बनना। आज के विश्व में सम्पत्ति वाले तो बहुत हैं लेकिन आपके पास सबसे बड़े ते बड़ी सम्पत्ति कौन सी है जो दुनिया वालों के पास नहीं है? और उसी की आवश्यकता सम्पत्ति वालों को भी है तो गरीब को भी है। वह कौन सी सम्पत्ति है? सबसे बड़े ते बड़ी आवश्यक सम्पत्ति है सिम्पथी। चाहे गरीब हैं चाहे धनवान हैं लेकिन आज सिम्पथी नहीं है। सिम्पथी की सम्पत्ति सबसे बड़े ते बड़ी है। और कुछ भी नहीं दो लेकिन सिम्पथी से सबको सन्तुष्ट कर सकते हो। और आपकी सिम्पथी ईश्वरीय परिवार के नाते से सिम्पथी है। अल्पकाल की सिम्पथी नहीं। पारिवारिक सिम्पथी सबसे बड़े ते बड़ी सिम्पथी है और यह सबको आवश्यक है और आप सबको दे सकते हो। रूहानी सिम्पथी तन मन और धन की भी पूर्ति कर सकती है। अच्छा इस पर फिर सुनायेंगे।

चारों ओर के तपस्वी राज श्रेष्ठ आत्मायें, सदा योग के प्रयोग द्वारा कम खर्च सफलता श्रेष्ठ अनुभव करने वाले, सदा मैं तेरा तू मेरा इस तपस्या में मगन रहने वाले, सदा हर समय तपस्या के द्वारा खुशी में नाचने और बाप और अपने गुण गाने वाले, ऐसे देश विदेश के सर्व स्मृति स्वरूप बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1- हॉस्पिटल की सेवा के निमित्त भाई बहिनों से:- बहुत अथक सेवा की है ना। अथक सेवाधारी को बापदादा के दिल का स्नेह और हर समय का सहयोग स्वत: ही प्राप्त होता है। तो आप सबने कार्य किया या कोई ने कराया? (बाबा ने कराया) निमित्त आपने किया ना। अगर करेंगे नहीं तो पायेंगे नहीं। इसलिए करने के निमित्त बनना अर्थात् पाना। हर एक ने अपना अपना बहुत अच्छा कार्य किया। बिना सर्व के अंगुली डाले कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। इसलिए जो भी सभी बैठे हो सभी को अपने अपने कार्य की मुबा-रक हो। अभी समझते हो ना कि यह कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे तो और भी बना सकते हैं या यही बहुत मुश्किल है? सहज हो गया ना। कोई भी मुश्किल अगर आती भी है तो खेल के लिए आती है। समझो खेल कर रहे हैं। कभी भी मुश्किल को मुश्किल नहीं समझो। मनोरंजन समझो तो मुश्किल सहज हो जायेगी। यह निमित्त बनना भी भाग्य की निशानी है। भाग्य आपको खींचकर ले आया। अनेक आत्माओं की दुआयें प्राप्त करने का भाग्य। यह कम बात नहीं है। यह विरले को प्राप्त होता है। जिन्होंने भी हार्ड वर्क किया और समय पर कार्य पूरा किया, सबको पद्मगुणा मुबारक हो। बापदादा वतन में बैठे भी देखता है कि क्या क्या कौन कर रहा है। चाहे दूसरा कोई देखे या न देखे। लेकिन बापदादा सबको देखते हैं। सबके मन का रिकार्ड और तन का रिकार्ड दोनों ही देखते हैं। (ज्ञान सरोवर,सालगांव के लिए) वहॉ भी सभी ने बहुत अच्छी सेवा की। दिन रात लगकर जंगल को मंगल बनाना यह बहुत बड़ी सेवा है। उन्हों को भी विशेष मुबारक।

(हॉस्पिटल के दूसरे फेज़ के लिए वरदान) यह भी अनेक आत्माओं के अनेक जन्मों के जीवन को श्रेष्ठ बनाने का फाउन्डेशन हो जायेगा। निमित्त यह पत्थर का फाउन्डेशन लगाते हैं लेकिन अनेक आत्मायें दुआओं के भण्डार से भरपूर हो आपको दुआयें देती रहेंगी। तो यह फाउन्डेशन लगाना अर्थात् दुआओं के पात्र बनना। इसलिए और दिल से उमंग से, तन-मन-धन, मन-वचन-कर्म सबसे बढ़ाते चलो और अपने साथ औरों की जीवन को श्रेष्ठ बनाते चलो। जैसे पहले उमंग उत्साह से किया है उससे भी ज्यादा उमंग उत्साह से यह कार्य सम्पन्न हुआ पड़ा है। सब निमित्त हैं। अच्छा।

2- सदा अपने को होलीहंस समझते हो? होलीहंस का कर्तव्य क्या होता है? होलीहंस अर्थात् जो सदा सत्य और असत्य का निर्णय कर सके। हंस में निर्णय शक्ति तीव्र होती है। जिस निर्णय शक्ति के आधार पर कंकड़ और रतन को अलग कर सकते हैं। रतन को ग्रहण करेगा और कंकड़ को छोड़ देगा। तो होलीहंस अर्थात् जो सदा निर्णय शक्ति में नम्बरवन हो। निगेटिव को छोड़ दे और पाजिटिव को धारण करे। देखते हुए सुनते हुए न देखे न सुने। यह है होलीहंस की विशेषता। तो ऐसे हो या कभी नगेटिव भी देख लेते हो? निगेटिव अर्थात् व्यर्थ बातें, व्यर्थ कर्म न सुने न करें और न बोलें । तो ऐसी शक्ति है जो व्यर्थ को समर्थ में चेंज कर दो। या व्यर्थ चलता है? चाहते नहीं हैं लेकिन चल पड़ता है ,ऐसे तो नहीं है? यदि व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने की शक्ति नहीं होगी तो अन्त में व्यर्थ का संस्कार धोखा दे देगा। इसलिए होलीहंस अर्थात् परिवर्तन करना। व्यर्थ को समर्थ में चेंज करने के लिए विशेष क्या अभ्यास चाहिए? कैसे चेंज करेंगे? संकल्प पावरफुल कैसे बनेगा? हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना अगर ऐसी विधि होगी तो परिवर्तन कर लेंगे। अगर किसी के प्रति शुभ भावना होती है तो उसकी उल्टी बात भी सुल्टी लगती है और शुभ भावना नहीं होगी तो सुल्टी बात भी उल्टी लगेगी। इसलिए हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना सदा आव-श्यक है। तो यह रहती है या कभी कभी व्यर्थ भावना भी हो जाती है? अपनी शुभ भावना व्यर्थ वाले को भी चेंज कर देती है। वैसे भी गाया हुआ है कि भावना का फल मिलता है। जब भक्तों को भावाना का फल मिलता है तो आपको शुभ भावना का फल नहीं मिलेगा? तो व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने का आधार है शुभ भावना, शुभ कामना। कैसा भी हो लेकिन आप शुभ भावना दो। कितना भी गंदा पानी इकट्ठा हो लेकिन अच्छा डालते जायेंगे तो गंदा निकलता जायेगा। अगर कोई आत्मा में व्यर्थ को निकालने की समर्थी नहीं है तो आप अपनी शुभ भावना की समर्थी से उसके व्यर्थ को समर्थ कर दो। परिवर्तन कर दो। इतनी शक्ति है या कभी असर हो जाता है? जैसे बापदादा ने आपके व्यर्थ कर्म को देखकर परिवर्तन कर लिया ना। कैसे किया? शुभ भावना से मेरे बच्चे हैं। तो आपकी शुभ भावना कि मेरा परिवार है, ईश्वरीय परिवार है। कैसा भी है चाहे वह पत्थर है लेकिन आप पत्थर को भी पानी कर दो। ऐसी शुभ भावना और शुभ कामना वाले होलीहंस हो? हंस को सदा स्वच्छ दिखाते हैं। तो स्वच्छ बुद्धि हंस के समान परि-वर्तन करेंगे। अपने में धारण नहीं करेंगे। तो संगमयुगी होलीहंस हैं यह स्मृति सदा रखनी है। हंस सदा कहाँ रहते हैं? (सरोवर में) तो आप सभी कहाँ रहते हो? ज्ञान सरोवर में। और कहॉ तो नहीं चले जाते? स्थान भी कितना बढ़िया है सरोवर और स्थिति भी कितनी बढ़िया है। जो सदा ज्ञान सरोवर में रहते हैं उनकी स्थिति समर्थ होगी या व्यर्थ होगी? तो सदा अपनी बुद्धि के स्थान और स्थिति को चेक करो। स्थान से स्थिति बनती है। सदा यह स्मृति रहे कि मैं हूँ ही होलीहंस। जैसे प्रदर्शनी में चित्र रखते हो न बुरा देखो, न बुरा बोलो, न बुरा सुनो? यह चित्र किसके लिए रखते हो? औरों के लिए? तो सारे दिन में चेक करो कि जैसा चित्र है वैसी ही चलन रही? क्योंकि अगर कोई व्यर्थ करता है और आपने सुन लिया तो समय किसका गया? देख लेते हो तो सोच किसका चलेगा। आपका चलेगा ना। नुकसान किसका हुआ? उसका या आपका? दोनों का नुकसान हुआ लेकिन आप अपना नुकसान नहीं करो। स्व परिवर्तन से दूसरे का परिवर्तन कर सकते हो। दूसरे का परिवर्तन हो तो मैं परिवर्तन होऊं। तो न वह बद-लेगा न आप बदलेंगे। दोनों रह जायेंगे। तो होलीहंस अर्थात् स्व परिवर्तन द्वारा औरों को परिवर्तन करें। आपकी शुभ भावना और श्ाभ कामना वाणी से भी ज्यादा काम कर सकती है। किसी के भी सामने जाओ आपकी रूहानी भावना और कामना हो तो वह परिवर्तन अवश्य होगा। अच्छा।

मधुबन निवासियों से

मधुबन निवासी चैतन्य दर्शनीय मूर्तियाँ हो। मधुबन में सब क्या देखने आते हैं? क्या मकान देखने आते हैं? मधुबन निवासियों को देखने आते हैं। तो मधुबन निवासी चलते फिरते चैतन्य दर्शनीय मूर्त हो। चलते फिरते आपका दर्शन होता रहता है। ऐसे हर कर्म करते अपने आपको दर्शनीय मूर्त समझकर चलते हो? या कभी साधारण भी हो जाते हो? मन्दिर में देखा है हर कर्म का दर्शन होता है? अभी भगवान सो रहा है अभी नहा रहा है, अभी खा रहा है, अभी श्रृंगार कर रहा है। सबका दर्शन होता है। इससे क्या सिद्ध होता है? कि हर कर्म करते दर्शनीय मूर्त। इसलिए हर कर्म का दर्शन होता है। तो ऐसे दर्शनीय मूर्तियों का कितना महत्व है। मधुबन वालों ने कितनी दुआओं का स्टॉक जमा किया है? हिसाब है? अच्छा दुआयें सिर्फ लेते हो या देते भी हो? जो भी कर्म करो दुआयें लो और दुआयें दो। जब भी कोई श्रेष्ठ कर्म करता है तो सबके मुख से दुआयें निकलती हैं। हर कर्म में दुआयें दो और दुआयें लो तो सभी के मुख से निकलेगा कि कमाल है, बहुत अच्छे हैं। वाह! ऐसे उमंग उत्साह के बोल निकलेंगे। ऐसे कर्म यादगार बन जाते हैं। तो दुआयें लेने वा देने में बिजी हो या सिर्फ कर्मणा में बिजी हो? कोई भी काम करो लेकिन खुशी लो और खुशी दो। दुआयें लो दुआयें दो। जब अभी संगम पर दुआयें लेंगे और देंगे तब आपके जड़ चित्र द्वारा भी दुआ मिलती रहेगी। अभी जमा करते हो तभी मिलती है। अच्छा सभी खुश रहते हो? जो स्वयं खुश रहता है उससे अन्य स्वत: ही खुश होते हैं। तो सबसे बढ़िया काम है खुश रहना और खुश करना। सेवा का भाग्य तो है ही है, मौज भी है और सेवा भी है। मधुबन का अर्थ ही है मौज। मधुबन में रोज फंक्शन होते हैं । (ज्ञान सरोवर के लिए)

जैसा लक्ष्य रखेंगे वैसा होना कोई बड़ी बात नहीं है। इतने सब ब्राह्मण आत्माओं के सहयोग की अंगुली जहाँ है वहाँ पहाड़ क्या रहेगा। इसलिए जैसा लक्ष्य वैसा होता है और होता ही रहेगा। अच्छा- ओम शान्ति