02-12-93   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


नम्बरवन बनने के लिए-गुण मूर्त बन गुणों का दान करने वाले
महादानी बनो

अटल-अखण्ड भव का वरदान देने वाले बापदादा अपने दानी-महादानी बच्चों प्रति बोले -

आज बेहद के मात-पिता चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे थे। क्या विशेषता देखी? कौन से बच्चे अखुट ज्ञानी, अटल स्वराज्य अधिकारी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी, अखण्ड महादानी हैं-ऐसे विशेष आत्मायें कोटों में कोई बने हुए हैं। ज्ञानी, योगी, महादानी सभी बने हैं लेकिन अखण्ड कोई-कोई बने हैं। जो अखुट, अटल और अखण्ड हैं वही विजय माला के विजयी मणके हैं। बापदादा ने संगमयुग पर सभी बच्चों को अटल-अखण्ड भव का वरदान दिया है लेकिन वरदान को जीवन में सदा धारण करने में नम्बरवार बन गये हैं। नम्बरवन बनने के लिये सबसे सहज विधि है अखण्ड महादानी बनो। अखण्ड महादानी अर्थात् निरन्तर सहज सेवाधारी। क्योंकि सहज ही निरन्तर हो सकता है। तो अखण्ड सेवाधारी अर्थात् अखण्ड महादानी। दाता के बच्चे हो, सर्व खज़ानों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्मायें हो। सम्पन्न की निशानी है अखण्ड महादानी। एक सेकण्ड भी दान देने के बिना रह नहीं सकते। द्वापर से दानी आत्मायें अनेक भक्त भी बने हैं लेकिन कितने भी बड़े दानी हों, अखुट खज़ाने के दानी नहीं बने हैं। विनाशी खज़ाने वा वस्तु के दानी बनते हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें अब संगम पर अखुट और अखण्ड महादानी बनते हो। अपने आपसे पूछो कि अखण्ड महादानी हो? वा समय प्रमाण दानी हो? वा चांस प्रमाण दानी हो?

अखण्ड महादानी सदा तीन प्रकार से दान करने में बिजी रहते हैं-पहला मन्सा द्वारा शक्तियां देने का दान, दूसरा वाणी द्वारा ज्ञान का दान, तीसरा कर्म द्वारा गुणों का दान। इन तीनों प्रकार के दान देने वाले सहज महादानी बन सकते हैं। रिजल्ट में देखा वाणी द्वारा ज्ञान दान मैजारिटी करते रहते हो। मन्सा द्वारा शक्तियों का दान यथा शक्ति करते हो और कर्म द्वारा गुण दान ये बहुत कम करने वाले हैं और वर्तमान समय चाहे अज्ञानी आत्मायें हैं, चाहे ब्राह्मण आत्मायें हैं दोनों को आवश्यकता गुणदान की है। वर्तमान समय विशेष स्वयं में वा ब्राह्मण परिवार में इस विधि को तीव्र बनाओ।

ये दिव्य गुण सबसे श्रेष्ठ प्रभु प्रसाद है। इस प्रसाद को खूब बांटो। जैसे-जब कोई से भी मिलते हो तो एक-दो में भी स्नेह की निशानी स्थूल टोली खिलाते हो ना, ऐसे एक-दो में ये गुणों की टोली खिलाओ। इस विधि से जो संगमयुग का लक्ष्य है-फरिश्ता सो देवता यह सहज सर्व में प्रत्यक्ष दिखाई देगा। यह प्रैक्टिस निरन्तर स्मृति में रखो कि मैं दाता का बच्चा अखण्ड महादानी आत्मा हूँ। कोई भी आत्मा चाहे अज्ञानी हो, चाहे ब्राह्मण हो लेकिन देना है। ब्राह्मण आत्माओं को ज्ञान तो पहले ही है लेकिन दो प्रकार से दाता बन सकते हो।

1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता है उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो।

2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सेम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो। इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना। आजकल ब्राह्मण आत्मायें भी सुनने के बजाय प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहती हैं। किसी को भी शक्ति धारण करने की वा गुण धारण करने की शिक्षा देना चाहते हो तो कोई दिल में सोचते, कोई कहते कि ऐसे धारणा मूर्त कौन बने हैं? तो देखना चाहते हैं लेकिन सुनना नहीं चाहते। ऐसे एक-दो में कहते हो ना-कौन बना है, सबको देख लिया... ...। जब कोई बात आती है तो कहते हैं कोई नहीं बना है, सब चलता है। लेकिन यह अलबेलेपन के बोल हैं, यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ क्या है? फॉलो ब्रह्मा बाप। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्वयं, सदा अपने को निमित्त एग्जाम्पल बनाया, सदा यह लक्ष्य लक्षण में लाया-जो ओटे सो अर्जुन अर्थात् जो स्वयं को निमित्त प्रत्यक्ष प्रमाण बनाता है वही अर्जुन अर्थात् अव्वल नम्बर का बनता है। अगर फॉलो फादर करना है तो दूसरे को देख बनने में नम्बरवन नहीं बन सकेंगे। नम्बरवार बन जायेंगे।

नम्बरवन आत्मा की निशानी है-हर श्रेष्ठ कार्य में मुझे निमित्त बन औरों को सिम्पल करने के लिये सेम्पल बनना है। दूसरे को देखना, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, चाहे समान वालों को लेकिन दूसरों को देख बनना कि पहले यह-यह बनें तो मैं बनूँ, तो नम्बरवन तो वह हो गया ना-जो बनेगा। तो स्वयं स्वत: ही नम्बरवार में आ जाते हैं। तो अखण्ड महादानी आत्मा सदा अपने को हर सेकण्ड तीनों ही महादान में से कोई न कोई दान करने में बिजी रखता है। जैसा समय वैसी सेवा में सदा लगा हुआ रहता है। उनको व्यर्थ देखने, सुनने वा करने की फुर्सत ही नहीं। तो महादानी बने हो? अभी अण्डरलाइन करो-अखण्ड बने हैं। अगर बीच-बीच में दातापन में खण्डन पड़ता है तो खण्डित को सम्पूर्ण नहीं कहा जाता। वर्तमान समय आपस में विशेष कर्म द्वारा गुणदाता बनने की आवश्यकता है। हर एक संकल्प करो कि मुझे सदा गुण मूर्त बन सबको गुण मूर्त बनाने का विशेष कर्तव्य करना ही है। तो स्वयं की और सर्व की कमज़ोरियां समाप्त करने की इस विधि में हर एक अपने को निमित्त अव्वल नम्बर समझ आगे बढ़ते चलो।ज्ञान तो बहुत है, अभी गुणों को इमर्ज करो, सर्वगुण सम्पन्न बनने और बनाने का एग्जाम्पल बनो। अच्छा!

सर्व अखण्ड योगी तू आत्मायें, सर्व सदा गुण मूर्त आत्माओं को, सर्व हर संकल्प हर सेकण्ड महादानी वा महासहयोगी विशेष आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठता में सेम्पल बन सर्व आत्माओं को सिम्पल सहज प्रेरणा देने वाले, सदा स्वयं को निमित्त नम्बरवन समझ प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाले बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दादी जानकी से मुलाकात

(आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि के चक्कर का समाचार सुनाया और सबकी याद दी)

सबकी याद पहुँच गई। चारों ओर के बच्चे सदा बाप के सामने हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है जब भी याद करते तो समीप और साथ का अनुभव करते हैं। बाबा कहा दिल से और दिलाराम हाजर। इसीलिये ही कहते हैं हजूर हाजर है, हाजरा हजूर है। जहाँ भी हैं, जो भी हैं लेकिन हर स्थान पर हर के पास हाजर हो जाते हैं इसीलिये हाजरा हजूर हो गया। इस स्नेह की विधि को लोग नहीं जान सकते। यह ब्राह्मण आत्मायें ही जानती हैं। अनुभवी इस अनुभव को जानते हैं। आप विशेष आत्मायें तो हैं ही कम्बाइन्ड ना। अलग हो ही नहीं सकते। लोग कहते हैं जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है और आप कहते हो जो करते हैं, जहाँ जाते हैं बाप साथ ही है अर्थात् तू ही तू है। जैसे कर्तव्य साथ है तो हर कर्तव्य कराने वाला भी सदा साथ है। इसलिये गाया हुआ है करनकरावनहार। तो कम्बाइन्ड हो गया ना-करनहार और करावनहार। तो आप सबकी स्थिति क्या है? कम्बाइन्ड है ना। करनकरावनहार करनहार के साथ है ही, करावनहार अलग नहीं है। इसको ही कम्बाइन्ड स्थिति कहा जाता है। सभी अपना-अपना अच्छा पार्ट बजा रहे हो। अनेक आत्माओं के आगे सेम्पल हो, सिम्पल करने के। ऐसे लगता है ना। मुश्किल को सहज बनाना-यही फॉलो फादर है। ऐसे है ना। अच्छा पार्ट बजाया ना। जहाँ भी हैं, विशेष पार्टधारी विशेष पार्ट बजाने के सिवाए रह नहीं सकते। यह ड्रामा की नूँध है। अच्छा। चक्कर लगाना बहुत अच्छा है। चक्कर लगाया फिर स्वीट होम में आ गये। सेवा का चक्कर अनेक आत्माओं के प्रति विशेष उमंग-उत्साह का चक्कर है। सब ठीक है ना? अच्छा ही अच्छा है। ड्रामा की भावी खींचती जरूर है। आप रहना चाहो लेकिन ड्रामा में नहीं है तो क्या करेंगे। सोचते भी जाना पड़ेगा। क्योंकि सेवा की भावी है तो सेवा की भावी अपना कार्य कराती है। आना और जाना यही तो विधि है। अच्छा। संगठन अच्छा है।

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात

ग्रुप. नं. 1

परमात्म प्यार का अनुभव करने के लिए दु:ख की लहर से न्यारे बनो

बापदादा ने संगम पर अनेक खज़ाने दिये हैं उन सभी खज़ानों में से श्रेष्ठ से बा श्रेष्ठ खज़ाना है - सदा खुशी का खज़ाना। तो यह खुशी का खज़ाना सदा साथ रहता है? कैसी भी परिस्थिति आ जाये लेकिन खुशी नहीं जा सकती।

जब परिस्थिति कोई दु:ख की लहर वाली आती है तो भी खुश रहते हो कि थोड़ी-थोड़ी लहर आ जाती है? क्योंकि संगम पर हो ना। तो एक तरफ है दु:खधाम, दूसरे तरफ है सुखधाम। तो दु:ख के लहर की कई बातें सामने आयेंगी लेकिन अपने अन्दर वो दु:ख की लहर दु:खी नहीं करे। जैसे गर्मी के मौसम में गर्मी तो होगी ना लेकिन स्वयं को बचाना वो अपने ऊपर है। तो दु:ख की बातें सुनने में आयेंगी लेकिन दिल में प्रभाव नहीं पड़े। इसलिये कहा जाता है न्यारा और प्रभु का प्यारा। तो दु:ख की लहर से न्यारा तब प्रभु का प्यारा बनेंगे। जितना न्यारा उतना प्यारा। अपने आपको देखो कि कितने न्यारे बने हैं? जितना न्यारा बनते जाते हो उतना ही सहज परमात्म प्यार का अनुभव करते हो। तो हर रोज चेक करो कि कितने न्यारे रहे, कितने प्यारे रहे। क्योंकि ये प्यार परमात्म प्यार है जो और कोई भी युग में प्राप्त हो नहीं सकता। जितना प्राप्त करना है उतना अभी करना है। अभी नहीं तो कभी भी नहीं हो सकता। और कितना थोड़ा सा समय यह परमात्म प्यार की प्राप्ति का है। तो थोड़े समय में बहुत अनुभव करना है। तो कर रहे हो? दुनिया वाले खुशी के लिये कितना समय, सम्पत्ति खर्च करते हैं और आपको सहज अविनाशी खुशी का खज़ाना मिल गया। कुछ खर्चा किया क्या? खुशी के आगे खर्च करने की वस्तु है ही क्या जो देंगे। तो यही खुशी के गीत गाते रहो कि जो पाना था वो पा लिया। पा लिया ना? तो जब कोई चीज़ मिल जाती है तो खुशी में नाचते रहते हैं। दूसरों को भी यह खुशी बांटते जाओ। जितनी बांटते जाते हो उतनी बढ़ती जाती है। क्योंकि बांटना माना बढ़ना। तो जो भी सम्बन्ध में आये वह अनुभव करे कि इनको कोई श्रेष्ठ प्राप्ति हुई है, जिसकी खुशी है। क्योंकि दुनिया में तो हर समय का दु:ख है और आपके पास हर समय की खुशी है। तो दु:खी को खुशी देना-यह सबसे बड़े से बड़ा पुण्य है। तो सभी निर्विघ्न बन आगे उड़ रहे हो या छोटे-छोटे विघ्न रोकते हैं? विघ्नों का काम है आना और आपका काम है विजय प्राप्त करना। जब विघ्न अपना कार्य अच्छी तरह से कर रहे हैं तो आप मास्टर सर्वशक्तिमान अपने विजय के कार्य में सदा सफल रहो। सदा यह याद रखो कि हम विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं। विघ्न-विनाशक का जो यादगार है उसका प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो ना। अच्छा।

ग्रुप. नं. 2

अचल स्थिति बनाने के लिए मास्टर सर्वशक्तिमान का टाइटल स्मृति में रखो

स्वयं को सदा सर्व खज़ानों से भरपूर अर्थात् सम्पन्न आत्मा अनुभव करते हो? क्योंकि जो सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता की निशानी है कि वो अचल होगा, हलचल में नहीं आयेगा। जितना खाली होता है उतनी हलचल होती है। तो किसी भी प्रकार की हलचल, चाहे संकल्प द्वारा, चाहे वाणी द्वारा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा, किसी भी प्रकार की हलचल अगर होती है तो सिद्ध है कि खज़ाने से सम्पन्न नहीं हैं। संकल्प में भी, स्वप्न में भी अचल। क्योंकि जितना-जितना मास्टर सर्वशक्तिमान स्वरूप की स्मृति इमर्ज होगी उतना ये हलचल मर्ज होती जायेगी। तो मास्टर सर्वशक्तिमान की स्मृति प्रत्यक्ष रूप में इमर्ज हो। जैसे शरीर का आक्यूपेशन इमर्ज रहता है, मर्ज नहीं होता, ऐसे यह ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन इमर्ज रूप में रहे। तो यह चेक करो-इमर्ज रहता है या मर्ज रहता है? इमर्ज रहता है तो उसकी निशानी है-हर कर्म में वह नशा होगा और दूसरों को भी अनुभव होगा कि यह शक्तिशाली आत्मा है। तो कहा जाता है हलचल से परे अचल। अचलघर आपका यादगार है। तो अपना आक्यूपेशन सदा याद रखो कि हम मास्टर सर्वशक्तिमान हैं - क्योंकि आजकल सर्व आत्मायें अति कमज़ोर हैं तो कमज़ोर आत्माओं को शक्ति चाहिये। शक्ति कौन देगा? जो स्वयं मास्टर सर्वशक्तिमान होगा। किसी भी आत्मा से मिलेंगे तो वो क्या अपनी बातें सुनायेंगे? कमज़ोरी की बातें सुनाते हैं ना? जो करना चाहते हैं वो कर नहीं सकते तो इसका प्रमाण है कि कमज़ोर हैं और आप जो संकल्प करते हो वो कर्म में ला सकते हो। तो मास्टर सर्वशक्तिमान की निशानी है कि संकल्प और कर्म दोनों समान होगा। ऐसे नहीं कि संकल्प बहुत श्रेष्ठ हो और कर्म करने में वो श्रेष्ठ संकल्प नहीं कर सको, इसको मास्टर सर्वशक्तिमान नहीं कहेंगे। तो चेक करो कि जो श्रेष्ठ संकल्प होते हैं वो कर्म तक आते हैं या नहीं आ सकते? मास्टर सर्वशक्तिमान की निशानी है कि जो शक्ति जिस समय आवश्यक हो उस समय वो शक्ति कार्य में आये। तो ऐसे है या आह्वान करते हो, थोड़ा देरी से आती है? जब कोई बात पूरी हो जाती है, पीछे स्मृति में आये कि ऐसा नहीं, ऐसा करते, तो इसको कहा जाता है समय पर काम में नहीं आई। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियां ऑर्डर पर चल सकती हैं ना, हाथ को जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ चला सकते हो, ऐसे यह सूक्ष्म शक्तियां इतने कन्ट्रोल में हों - जिस समय जो शक्ति चाहो काम में लगा सको। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर है? ऐसे तो नहीं सोचते कि चाहते तो नहीं थे लेकिन हो गया। तो सदा अपनी कन्ट्रोलिंग पॉवर को चेक करते हुए शक्तिशाली बनते चलो। सब उड़ती कला वाले हो कि कोई चढ़ती कला वाला, कोई उड़ती कला वाला? वा कभी उड़ती, कभी चढ़ती, कभी चलती कला हो जाती है? बदली होता है वा एकरस आगे बढ़ते रहते हो? कोई विघ्न आता है तो कितने समय में विजयी बनते हो? टाइम लगता है? क्योंकि नॉलेजफुल हो ना। तो विघ्नों की भी नॉलेज है। नॉलेज की शक्ति से विघ्न वार नहीं करेंगे लेकिन हार खा लेंगे। इसी को ही मास्टर सर्वशक्तिमान कहा जाता है। तो अमृतवेले से इस आक्यूपेशन को इमर्ज करो और फिर सारा दिन चेक करो।

ग्रुप. नं. 3

हर घड़ी अन्तिम घड़ी समझते हुए एवररेडी बनो, अपने भाग्य का गीत सदा गाते रहो

भी अपने भाग्य को देख सदा हर्षित रहते हो? दिल में सदा ये गीत गाते हो कि वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य कि कभी-कभी गीत बजता है, कभी बन्द हो जाता है? सदा एकरस गीत बजता है या कभी स्लो हो जाता है, कभी तेज हो जाता है? सदा भाग्य के गीत गाते रहो। क्योंकि ये भाग्य किसने बनाया? भाग्य विधाता ने भाग्य बनाया। ऊंचे ते ऊंचे भगवान् ने भाग्य बनाया। तो जब स्वयं ऊंचे ते ऊंचा है तो भाग्य भी ऊंचा बनायेगा। तो यह नशा और खुशी रहे कि भगवान् ने श्रेष्ठ भाग्य बना दिया और कितने जन्मों का भाग्य बनाया? जन्म-जन्म के लिये भाग्य बनाया। सिर्फ 21 जन्म नहीं लेकिन सारे कल्प के अन्दर भाग्यवान रहे। 21 जन्म पूज्य बनते हो और फिर द्वापर से पुजारी आपकी पूजा करते हैं। तो वो चैतन्य पूज्य राज्य अधिकारी बनते हो और द्वापर से जड़ चित्र आपके पूजे जाते हैं। तो सारे कल्प का भाग्य है। अब अन्तिम जन्म में भी अपने यादगार देख रहे हो ना। एक तरफ चैतन्य में आप हो और दूसरे तरफ आपके ही जड़ चित्र हैं तो चित्र और चैतन्य दोनों सामने हैं। चित्र को देखकरके भी खुशी होती है ना तो ऐसे पूज्य बाप द्वारा बने हैं। सारे कल्प में कोई अपना चैतन्य रूप में जड़ चित्र देखे, यह नहीं होता। अगर देखते भी होंगे तो भिन्न जन्म होने के कारण जानते नहीं हैं। लेकिन आप जानते हो कि ये हमारे ही जड़ चित्र हैं। मातायें जानती हो? आप सबकी पूजा होती है? तो चित्र और चैतन्य यही विशेषता है। कल क्या थे, आज क्या हैं और कल क्या होंगे-तीनों ही काल सामने हैं।

मातायें सदा खुश रहती हो कि कभी-कभी रहती हो? ब्राह्मण जीवन अर्थात् सदा खुश जीवन। ब्राह्मण बने किसलिये? कभी-कभी खुश रहने के लिये? सदा खुश रहने के लिये। तो कभी-कभी खुश नहीं रहना, सदा खुश रहना। बाप ने अविनाशी खज़ाना दिया है, कभी-कभी का नहीं दिया है। कभी बाप ने कहा है क्या कि कभी-कभी खुश रहना, कभी दु:ख आये तो कोई हर्जा नहीं। सदा खुशी भव, सदा शान्त भव। कभी-कभी का वरदान नहीं होता है। तो क्या करना है - सदा रहना है ना या कभी-कभी भी ठीक है, चलेगा? कभी-कभी शब्द समाप्त कर दो। कभी-कभी नहीं, अभी-अभी। हर घड़ी कहो अभी खुश हैं। आपका स्लोगन भी क्या है? अभी का स्लोगन है या कभी का है? अभी का है ना। तो जिस घड़ी कोई देखे, कोई मिले तो अभी-अभी खुशनसीब हैं ऐसे अनुभव करे। कभी-कभी खुश रहने वाले क्या कहलायेंगे? सूर्यवंशी या चन्द्रवंशी? तो सूर्यवंशी हो या चन्द्रवंशी हो? सूर्यवंशी हो पक्का या यहाँ कहते हो सूर्यवंशी, वहाँ चन्द्रवंशी बन जायेंगे? सदा सूर्यवंशी हो ना। भगवान् के बनकर फिर भी चन्द्रवंशी बने तो क्या किया? गायन है ना कि जब भगवान् ने भाग्य बांटा तो सोये हुए थे क्या? अगर आधा लेते हैं तो आधा समय सोये हुए थे तभी नहीं लिया। तो पूरा भाग्य लेने वाले हो, आधा नहीं। तो डबल विदेशी कौन हो? सूर्यवंशी। एक भी चन्द्रवंशी नहीं। पक्का सोच लिया है, ऐसे ही तो नहीं कह रहे हो? फलक से कहो कि हम नहीं बनेंगे तो कौन बनेंगे? और कोई है क्या? आप ही हो ना। तो यह नशा रखो कि हम ही थे, हम ही हैं और हम ही बनेंगे। तीनों काल के लिये निश्चय है।

तो सबसे तीव्र पुरुषार्थी कौन है? तीव्र पुरुषार्थी हो या कभी ढीला कभी तीव्र? सदा तीव्र। क्योंकि हर घड़ी अन्तिम घड़ी है अगर साधारण पुरुषार्थी हैं और अंतिम घड़ी आ जाये तो धोखा हो जायेगा ना। इसलिये हर घड़ी अन्तिम घड़ी समझते हुए एवररेडी रहो। एवररेडी अर्थात् तीव्र पुरुषार्थी। ऐसे नहीं सोचो कि अभी तो विनाश होने में कुछ तो टाइम लगेगा ही फिर तैयार हो जायेंगे। अन्तिम घड़ी को नहीं देखो। लेकिन अपनी अन्तिम घड़ी का कोई भरोसा नहीं है इसलिये एवररेडी। तो डबल विदेशी एवररेडी हैं? करना ही क्या है? कोई काम रह गया है क्या? (म्युज़ियम बनाना है) म्युज़ियम बनाना होगा तो कोई भी बना देगा। आप तो एवररेडी हो ना कि म्युज़ियम के बाद एवररेडी होंगे। अपनी स्थिति सदा उपराम। अब भी जो होगा वो अच्छा। ऐसे रेडी हो या सोचना पड़ेगा कि यह कर लें, यह कर लें। नहीं। सदा निर्मोही और निर्विकल्प, निर-व्यर्थ। व्यर्थ भी नहीं। इसको कहा जाता है एवररेडी। मातायें एवररेडी हैं या थोड़ा-थोड़ा मोह है? पोत्रे धौत्रे में मोह है? यह करना है, यह सम्भालना है? पाण्डवों का मोह है? जेब खर्च में मोह है? कमाना है, खाना है, खिलाना है- यह नहीं सोचते हो? न्यारे हो गये हो या थोड़ा-थोड़ा मोह है? नष्टोमोहा अर्थात् सर्व से न्यारे और बाप के प्यारे। तो सदा क्या याद रखेंगे? हम ऊंचे ते ऊंचे भाग्यवान हैं। सदा अपने भाग्य का सितारा चमकता हुआ दिखाई दे। अच्छा!

ग्रुप. नं. 4

राजऋषि अर्थात् स्वराज्य के साथ-साथ बेहद के वैरागी बनो

अपने को राजऋषि समझते हो? राज भी और ऋषि भी। स्वराज्य मिला तो राजा भी हो और साथ-साथ पुरानी दुनिया का ज्ञान मिला तो पुरानी दुनिया से बेहद के वैरागी भी हो इसलिये ऋषि भी हो। एक तरफ राज्य, दूसरे तरफ ऋषि अर्थात् बेहद के वैरागी। तो दोनों ही हो? बेहद का वैराग्य है या थोड़ा-थोड़ा लगाव है। अगर कहाँ भी, चाहे अपने में, चाहे व्यक्ति में, चाहे वस्तु में कहाँ भी लगाव है तो राजऋषि नहीं। न राजा है, न ऋषि है। क्योंकि स्वराज्य है तो मन-बुद्धि-संस्कार सब अपने वश में है। लगाव हो नहीं सकता। अगर कहाँ भी संकल्प मात्र थोड़ा भी लगाव है, तो राजऋषि नहीं कहेंगे। अगर लगाव है तो दो नाव में पांव हुआ ना। थोड़ा पुरानी दुनिया में, थोड़ा नई दुनिया में। इसलिए एक बाप, दूसरा न कोई। क्योंकि दो नाव में पांव रखने वाले क्या होते हैं? न यहाँ के, न वहाँ के। इसलिये राजऋषि राजा बनो और बेहद के वैरागी भी बनो। 63 जन्म अनुभव करके देख लिया ना? तो अनुभवी हो गये फिर लगाव कैसा? अनुभवी कभी धोखा नहीं खाते हैं। सुनने वाला, सुनाने वाला धोखा खा सकता है। लेकिन अनुभवी कभी धोखा नहीं खाता। तो दु:ख का अनुभव अच्छी तरह से कर लिया है ना फिर अब धोखा नहीं खाओ। यह पुरानी दुनिया का लगाव सोनी हिरण के समान है। यह शोक वाटिका में ले जाता है। तो क्या करना है? थोड़ा-थोड़ा लगाव रखना है? अच्छा नहीं लगता लेकिन छोड़ना मुश्किल है! खराब चीज़ को छोड़ना और अच्छी चीज़ को लेना मुश्किल होता है क्या? अगर कोई सोचता है कि छोड़ना है, तो मुश्किल लगता है। लेना है तो सहज लगता है। तो पहले लेते हो, पहले छोड़ते नहीं हो। लेने के आगे यह देना तो कुछ भी नहीं है। तो क्या-क्या मिला है वह लम्बी लिस्ट सामने रखो। सुनाया है ना कि गीत गाते रहो-पाना था वो पा लिया, काम क्या बाकी रहा? तो यह गीत गाना आता है? मुख का नहीं, मन का। मुख का गीत तो थोड़ा टाइम चलेगा। मन का गीत तो सदा चलेगा। अविनाशी गीत चलता ही रहता है। आटोमेटिक है।

अच्छा, ये वैराइटी ग्रुप है। वैराइटी फूलों का बगीचा अच्छा लगता है ना। कोई कहाँ के, कोई कहाँ के लेकिन हैं एक माली के। एक के हैं और एक हैं। ये तो सेवा के अर्थ भिन्न-भिन्न स्थानों पर गये हुए हैं। नहीं तो विश्व की सेवा कैसे होगी। अच्छा!

ग्रुप. नं. 5

सदा एकरस स्थिति के आसन पर स्थित रहने वाले ही तपस्वी हैं

भी अपने को तपस्वी आत्मायें अनुभव करते हो? तपस्वी अर्थात् सदा अपनी तपस्या में रहने वाले। तो तपस्या क्या है? एक बाप दूसरा न कोई। ऐसे तपस्वी हो या दूसरा-तीसरा भी कोई है? तपस्वी सदा आसनधारी होते हैं, कोई न कोई आसन पर तपस्या करते हैं। तो आपका आसन कौनसा है? स्थिति आपका आसन है। जैसे एकरस स्थिति यह आसन हो गया। फरिश्ता स्थिति यह आसन हो गया। तो आसन पर स्थित होते हैं ना, बैठते हैं अर्थात् स्थित हो जाते हैं। तो इन श्रेष्ठ स्थितियों में स्थित हो जाते हो, टिक जाते हो इसी को आसन कहा जाता है। स्थूल आसन पर स्थूल शरीर बैठता है लेकिन यह श्रेष्ठ स्थितियों के आसन पर मन-बुद्धि को बिठाना है। मन-बुद्धि द्वारा इन स्थितियों में स्थित हो जाते हो अर्थात् बैठ जाते हो - ऐसे तपस्वी हो? तो अच्छा आसन मिला है ना। यहाँ है आसन फिर भविष्य में मिलेगा सिंहासन। तो जितना जो आसन पर स्थित रहता वो उतना ही सिंहासन पर भी स्थित रह सकता है। जितना समय चाहो, जब चाहो, तब आसन रूपी स्थिति में स्थित होते हो ना। होते हो या हलचल होती है? क्या होता है? जैसे देखो शरीर आसन पर नहीं टिक सकता तो हलचल करेगा ना। ऐसे मन हलचल तो नहीं करता? अचल है या हलचल भी है कि दोनों है? सदा अचल अडोल। जरा भी हलचल नहीं हो। अगर कभी हलचल और कभी अचल है तो सिंहासन भी कभी मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा। तो सदा का राज्य भाग्य लेना है या कभी-कभी का और स्थित सदा होना है या कभी-कभी? कितना भी कोई हिलावे लेकिन आप अचल रहो। परिस्थिति श्रेष्ठ है या स्वस्थिति श्रेष्ट है? कभी परिस्थिति वार कर लेती है? तो सोचो कि ये परिस्थिति पावरफुल या स्वस्थिति पावरफुल? तो इस स्थिति से कमज़ोर से शक्तिशाली बन जायेंगे। आप तपस्वी आत्माओं की स्थिति का यादगार आजकल के तपस्वियों ने कॉपी की है लेकिन उल्टी की है। आप तपस्वी एकरस स्थिति में एकाग्र होते हो और आजकल के क्या करते हैं? एक टांग पर खड़े हो जाते हैं। तो कहाँ एकरस स्थिति और कहाँ एक टांग पर स्थित रहना, फर्क हो गया ना। आपका कितना सहज है! और उन्हों का कितना मुश्किल है! तो सहजयोगी हो ना। एक को याद करना सहज है वा अनेकों को याद करना सहज है? तो द्वापर से क्या किया? अनेकों को याद किया और अभी क्या करते हो? एक को याद करते हो ना। एक को याद करना सहज है या मुश्किल है ? माया आती है? आयेगी तो अन्त तक लेकिन माया का काम है आना और आपका काम है विजय प्राप्त करना। माया आये तभी तो मायाजीत बनेंगे ना। तो माया का आना बुरी बात नहीं है लेकिन हार खाना कमज़ोरी है। तो मायाजीत हो ना?

सदा ये याद रखो कि अनेक बार के विजयी हैं और सदा विजयी रहेंगे। अच्छा!

ग्रुप. नं. 6

सदा इसी स्वमान में रहो कि मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ, कल्याण करना मेरा कर्तव्य है

इस समय अर्थात् संगमयुग को कल्याणकारी युग कहा जाता है। यह कल्याणकारी युग है और कल्याणकारी आप आत्मायें हो। तो सदा ये अपना स्वमान याद रहता है कि मैं कल्याणकारी आत्मा हूँ? संगमयुग पर विशेष कर्तव्य ही है कल्याण करना। पहले स्व का कल्याण और साथ-साथ सर्व का कल्याण। तो ऐसे कल्याण करने की शक्ति अपने में अनुभव करते हो? किसी के वायुमण्डल का प्रभाव तो नहीं पड़ता है? दुनिया का वायुमण्डल है अकल्याण का और आपका वायुमण्डल है कल्याण करने का। तो अकल्याण का वायुमण्डल शक्तिशाली या कल्याण का वायुमण्डल शक्तिशाली? तो आपके ऊपर औरों का वायुमण्डल प्रभाव नहीं कर सकता। वो कमज़ोर है और आप शक्तिशाली हो। तो शक्तिशाली कमज़ोर के ऊपर जीत प्राप्त करता है, कमज़ोर शक्तिशाली के ऊपर जीत नहीं प्राप्त करता। कैसा भी तमोगुणी वायुमण्डल हो लेकिन आप सर्वशक्तिमान बाप के साथी हो। जहाँ भगवान् है वहाँ विजय है। तो वायुमण्डल को बदलने वाले हो। चैलेन्ज की है ना कि हम विश्व परिवर्तक हैं। तो कल्याणकारी युग है, कल्याणकारी आप आत्मायें हो और कल्याणकारी बाप है। तो कितनी शक्ति हो गई। समय की भी शक्ति, स्वयं की भी शक्ति और बाप की भी शक्ति। तो यह याद रखो-दुनिया के लिये अकल्याण का समय है, आपके लिये कल्याण का समय है। दुनिया वालों को सिर्फ विनाश दिखाई देता है और आपको विनाश के साथ स्थापना सामने है। तो सदा दिल में यह श्रेष्ठ संकल्प इमर्ज करो कि स्थापना हुई कि हुई। अपना भविष्य स्पष्ट है ना। जैसे वर्तमान स्पष्ट है ऐसे ही भविष्य भी स्पष्ट है। शक्तियों को तो नशा होना चाहिये कि संगमयुग विशेष शक्तियों का युग है। संगम पर ही बाप शक्तियों को आगे करते हैं। पाण्डवों को भी खुशी होती है ना कि शक्तियां आगे हैं तो हम आगे हैं ही। सदा मन में यही शुभ भावना रहती है कि सर्व का कल्याण हो। मनुष्यात्मायें तो क्या प्रकृति का भी कल्याण करने वाले। इसलिये प्रकृतिजीत, मायाजीत कहलाते हो। क्योंकि पुरूष हो ना, आत्मा पुरूष है तो आत्मा पुरूष प्रकृतिजीत बनती है। प्रकृति भी सुखदायी बन जाती है। इस समय देखो प्रकृति कितना दु:ख देती है। थोड़ा सा भी तूफान आया, थोड़ा सा धरनी हलचल में आई कितनों को दु:ख मिलता है। तो आपके लिये सुखदायी प्रकृति है और लोगों के लिये दु:खदायी। कोई भी दु:ख की घटना देखते हो, सुनते हो तो दु:ख की लहर आती है? कभी पोत्रा, धोत्रा दु:खी होता हो तो दु:ख की लहर आती है? दु:खधाम से न्यारे हो गये। संगम पर हो या कलियुग में हो? तो दु:खधाम से किनारा कर लिया या कि थोड़ा-थोड़ा दु:खधाम से लगाव है? बिल्कुल न्यारे हो गये? या हो रहे हो? तो सदा समय और स्वयं को याद रखो। स्वयं भी कल्याणकारी और समय भी कल्याणकारी। तो इस स्मृति से सदा ही मायाजीत और प्रकृतिजीत रहेंगे। जरा भी हलचल नहीं हो। तो अचल भी हो, अडोल भी हो, अटल भी हो। कोई इस निश्चय से टाल नहीं सकता। अच्छा। सभी उड़ती कला वाले हो ना? उड़ते चलो और उड़ाते चलो।