23-12-93   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


पवित्रता के दृढ़ व्रत द्वारा वृत्ति का परिवर्तन

पवित्रता के फाउन्डेशन को मजबूत करने की प्रेरणा देने वाले परम पवित्र बापदादा बोले-

आज ऊंचे से ऊंचा बाप अपने सर्व महान बच्चों को देख रहे हैं। महान आ आत्मा तो सभी बच्चे बने हैं क्योंकि सबसे महान बनने का मुख्य आधार पवित्रता को धारण किया है। पवित्रता का व्रत सभी ने प्रतिज्ञा के रूप में धारण किया है। किसी भी प्रकार का दृढ़ संकल्प रूपी व्रत लेना अर्थात् अपनी वृत्ति को परिवर्तन करना। दृढ़ व्रत वृत्ति को बदल देता है। इसलिये ही भक्ति में व्रत लेते भी हैं और व्रत रखते भी हैं। व्रत लेना अर्थात् मन में संकल्प करना और व्रत रखना अर्थात् स्थूल रीति से परहेज करना। चाहे खान-पान की, चाहे चाल-चलन की, लेकिन दोनों का लक्ष्य व्रत द्वारा वृत्ति को बदलने का है। आप सभी ने भी पवित्रता का व्रत लिया और वृत्ति श्रेष्ठ बनाई। सर्व आत्माओं के प्रति क्या वृत्ति बनाई? आत्मा भाई-भाई हैं, ब्रदरहुड-इस वृत्ति से ही ब्राह्मण महान आत्मा बने। यह व्रत तो सभी का पक्का है ना?

ब्राह्मण जीवन का अर्थ ही है पवित्र आत्मा, और ये पवित्रता ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है। फाउण्डेशन पक्का है ना कि हिलता है? ये फाउण्डेशन सदा अचल-अडोल रहना ही ब्राह्मण जीवन का सुख प्राप्त करना है। कभी-कभी बच्चे जब बाप से रूहरिहान करते अपना सच्चा चार्ट देते हैं तो क्या कहते हैं? कि जितना अतीन्द्रिय सुख, जितनी शक्तियाँ अनुभव होनी चाहियें, उतनी नहीं हैं या दूसरे शब्दों में कहते हैं कि हैं, लेकिन सदा नहीं हैं। इसका कारण क्या? कहने में तो मास्टर सर्वशक्तिमान कहते हैं, अगर पूछेंगे कि मास्टर सर्वशक्तिमान हो, तो क्या कहेंगे? ना तो नहीं कहेंगे ना। कहते तो हाँ हैं। मास्टर सर्वशक्तिमान हैं तो फिर शक्तियां कहाँ चली जाती हैं? और हैं ही ब्राह्मण जीवनधारी। नामधारी नहीं हैं, जीवनधारी हैं। ब्राह्मणों के जीवन में सम्पूर्ण सुख-शान्ति की अनुभूति न हो वा ब्राह्मण सर्व प्राप्तियों से सदा सम्पन्न न हों तो सिवाए ब्राह्मणों के और कौन होगा? और कोई हो सकता है? ब्राह्मण ही हो सकते हैं ना। आप सभी अपना साइन क्या करते हो? बी.के. फलानी, बी.के. फलाना कहते हो ना। पक्का है ना? बी.के. का अर्थ क्या है? ब्राह्मण। तो ब्राह्मण की परिभाषा यह है।

जितना और उतना शब्द क्यों निकलता है? कहते हो सुख-शान्ति की जननी पवित्रता है। जब भी अतीन्द्रिय सुख वा स्वीट साइलेन्स का अनुभव कम होता है, इसका कारण पवित्रता का फाउण्डेशन कमज़ोर है। पहले भी सुनाया है कि पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं, ये व्रत भी महान है क्योंकि इस ब्रह्मचर्य के व्रत को आज की महान आत्मा कहलाने वाले भी मुश्किल तो क्या लेकिन असम्भव समझते हैं। तो असम्भव को अपने दृढ़ संकल्प द्वारा सम्भव किया है और सहज पालन किया है इसलिये ये व्रत भी धारण करना कम बात नहीं है। बापदादा इस व्रत को पालन करने वाली आत्माओं को दिल से दुआओं सहित मुबारक देते हैं। लेकिन बापदादा हर एक ब्राह्मण बच्चे को सम्पूर्ण और सम्पन्न देखना चाहते हैं। तो जैसे इस मुख्य बात को जीवन में अपनाया है, असम्भव को सम्भव सहज किया है तो और सर्व प्रकार की पवित्रता को धारण करना क्या बड़ी बात है! पवित्रता की परिभाषा सभी बहुत अच्छी तरह से जानते हो। अगर आप सबको कहें पवित्रता क्या है इस टॉपिक पर भाषण करो तो अच्छी तरह से कर सकते हो ना? जब जानते भी हो और मानते भी हो फिर उतना, जितना ये शब्द क्यों? कौन-सी पवित्रता कमज़ोर होती है, जो सुख, शान्ति और शक्ति की अनुभूति कम हो जाती है? पवित्रता किसी न किसी स्टेज में अचल नहीं रहती, तो किस रूप की पवित्रता की हलचल है उसको चेक करो। बापदादा पवित्रता के सर्व रूपों को स्पष्ट नहीं करते क्योंकि आप जानते हो, कई बार सुन चुके हो, सुनाते भी रहते हो, अपने आपसे भी बात करते रहते हो कि हाँ, ये है, ये है.। मैजारिटी की रिजल्ट देखते हुए क्या दिखाई देता है? कि ज्ञान बहुत है, योग की विधि के भी विधाता बन गये, धारणा के विषय पर वर्णन करने में भी बहुत होशियार हैं और सेवा में एक-दो से आगे हैं, बाकी क्या है? ज्ञाता तो नम्बरवन हो गये हैं, सिर्फ एक बात में अलबेले बन जाते हो, वो है -स्व को सेकण्ड में व्यर्थ सोचने, देखने, बोलने और करने में फुलस्टॉप लगाकर परिवर्तन करना। समझते भी हो कि यही कमज़ोरी सुख की अनुभूति में अन्तर लाती है, शक्ति स्वरूप बनने में वा बाप समान बनने में विघ्न स्वरूप बनती है फिर भी क्या होता है? स्वयं को परिवर्तन नहीं कर सकते, फुलस्टॉप नहीं दे सकते। ठीक है, समझते हैं-का कॉमा (,) लगा देते हैं, वा दूसरों को देख आश्चर्य की निशानी (!) लगा देते हो कि ऐसा होता है क्या! ऐसे होना चाहिये! वा क्वेश्चन मार्क की क्यू (लाइन) लगा देते हो, क्यों की क्यू लगा देते हो। फुलस्टॉप अर्थात् बिन्दु (.)। तो फुल स्टॉप तब लग सकता है जब बिन्दु स्वरूप बाप और बिन्दु स्वरूप आत्मा-दोनों की स्मृति हो। यह स्मृति फुल स्टॉप अर्थात् बिन्दु लगाने में समर्थ बना देती है। उस समय कोई-कोई अन्दर सोचते भी हैं कि मुझे आत्मिक स्थिति में स्थित होना है लेकिन माया अपनी स्क्रीन द्वारा आत्मा के बजाय व्यक्ति वा बातें बार-बार सामने लाती है, जिससे आत्मा छिप जाती है और बार-बार व्यक्ति और बातें सामने स्पष्ट आती हैं। तो मूल कारण स्व के ऊपर कन्ट्रोल करने की कन्ट्रोलिंग पॉवर कम है। दूसरों को कन्ट्रोल करना बहुत आता है लेकिन स्व पर कन्ट्रोल अर्थात् परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाना कम आता है।

बापदादा कोई-कोई बच्चों के शब्द पर मुस्कराते रहते हैं। जब स्व के परिवर्तन का समय आता है वा सहन करने का समय आता है वा समाने का समय आता है तो क्या कहते हो? बहुत करके क्या कहते कि मुझे ही मरना है, मुझे ही बदलना है, मुझे ही सहन करना है लेकिन जैसे लोग कहते हैं ना कि मरा और स्वर्ग गया उस मरने में तो स्वर्ग में कोई जाते नहीं हैं लेकिन इस मरने में तो स्वर्ग में श्रेष्ठ सीट मिल जाती है। तो यह मरना नहीं है लेकिन स्वर्ग में स्वराज्य लेना है। तो मरना अच्छा है ना? क्या मुश्किल है? उस समय मुश्किल लगता है। मैं गलत हूँ ही नहीं, वो गलत है, लेकिन गलत को मैं राइट कैसे करूँ, यह नहीं आता। रांग वाले को बदलना चाहिये या राइट वाले को बदलना चाहिये? किसको बदलना है? दोनों को बदलना पड़े। बदलने शब्द को आध्यात्मिक भाषा में आगे बढ़ना मानो, बदलना नहीं मानो, बढ़ना। उल्टे रूप का बदलना नहीं, सुल्टे रूप का बदलना। अपने को बदलने की शक्ति है? कि कभी तो बदलेंगे ही।

पवित्रता का अर्थ ही है - सदा संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क में तीन बिन्दु का महत्व हर समय धारण करना। कोई भी ऐसी परिस्थिति आये तो सेकण्ड में फुलस्टॉप लगाने में स्वयं को सदा पहले ऑफर करो-मुझे करना है। ऐसी ऑफर करने वाले को तीन प्रकार की दुआएं मिलती हैं - (1) स्वयं को स्वयं की भी दुआएं मिलती हैं, खुशी मिलती है, (2) बाप द्वारा, (3) जो भी श्रेष्ठ आत्मायें ब्राह्मण परिवार की हैं उन्हों के द्वारा भी दुआएं मिलती हैं। तो मरना हुआ या पाना हुआ, क्या कहेंगे? पाया ना। तो फुल स्टॉप लगाने के पुरूषार्थ को वा कन्ट्रोलिंग पॉवर द्वारा परिवर्तन शक्ति को तीव्र गति से बढ़ाओ। अलबेलापन नहीं लाओ-ये तो होता ही है, ये तो चलना ही है. . . ये अलबेलेपन के संकल्प हैं। अलबेलापन परिवर्तन कर अलर्ट बन जाओ। अच्छा!

चारों ओर के महान आत्माओं को, सर्वश्रेष्ठ पवित्रता के व्रत को धारण करने वाली आत्माओं को, सदा स्व को सेकण्ड में फुलस्टॉप लगाए श्रेष्ठ परिवर्तक आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठ कार्य में निमित्त बनाने की ऑफर करने वाली आत्माओं को, सदा तीन बिन्दु का महत्व प्रैक्टिकल में धारण कर दिखाने वाली बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दादियों से मुलाकात: -

सभी आप लोगों को देखकर खुश होते हैं। क्यों खुश होते हैं? (बापदादा सभी से पूछ रहे हैं) दादियों को देख खुश होते हो ना? क्यों खुश होते हो? क्योंकि अपने वायब्रेशन वा कर्म द्वारा खुशी देते हैं इसलिये खुश होते हो। जब भी ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं से मिलते हो तो खुशी अनुभव करते हो ना। (टीचर्स से) फॉलो भी करती हो ना। कई सोचते हैं बाप तो बाप है, कैसे समान बन सकते हैं? लेकिन जो निमित्त आत्मायें हैं वो तो आपके हमजिन्स हैं ना? तो जब वो बन सकती हैं तो आप नहीं बन सकते? तो लक्ष्य सभी का सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने का है। अगर हाथ उठवायेंगे कि 16 कला बनना है या 14 कला तो किसमें उठायेंगे? 16 कला। तो 16 कला का अर्थ क्या है? सम्पूर्ण ना। जब लक्ष्य ही ऐसा है तो बनना ही है। मुश्किल है नहीं, बनना ही है। छोटी-छोटी बातों में घबराओ नहीं। मूर्ति बन रहे हो तो कुछ तो हेमर लगेंगे ना, नहीं तो ऐसे कैसे मूर्ति बनेंगे! जो जितना आगे होता है उसको तूफान भी सबसे ज्यादा क्रॉस करने होते हैं लेकिन वो तूफान उन्हों को तूफान नहीं लगता, तोहफा लगता है। ये तूफान भी गिफ्ट बन जाती है अनुभवी बनने की, तो तोहफा बन गया ना। तो गिफ्ट लेना अच्छा लगता है या मुश्किल लगता है? तो ये भी लेना है, देना नहीं है। देना मुश्किल होता है, लेना तो सहज होता है।

ये नहीं सोचो-मेरा ही पार्ट है क्या, सब विघ्नों के अनुभव मेरे पास ही आने है क्या! वेलकम करो-आओ। ये गिफ्ट है। ज्यादा में ज्यादा गिफ्ट मिलती है, इसमें क्या? ज्यादा एक्यूरेट मूर्ति बनना अर्थात् हेमर लगना। हेमर से ही तो उसे ठोक-ठोक करके ठीक करते हैं। आप लोग तो अनुभवी हो गये हो, नथिंग न्यु। खेल लगता है। देखते रहते हो और मुस्कराते रहते हो, दुआयें देते रहते हो। टीचर्स बहादुर हो या कभी-कभी घबराती हो? ये तो सोचा ही नहीं था, ऐसे होगा, पहले पता होता तो सोच लेते....। डबल फॉरेनर्स समझते हो इतना तो सोचा ही नहीं था कि ब्राह्मण बनने में भी ऐसा होता है? सोच-समझकर आये हो ना या अभी सोचना पड़ रहा है? अच्छा!

कितना भी कोई कैसा भी हो लेकिन बापदादा अच्छाई को ही देखते हैं। इसलिये बापदादा सभी को अच्छा ही कहेंगे, बुरा नहीं कहेंगे। चाहे 9 बुराई हों और एक अच्छाई हो तो भी बाप क्या कहेगा? अच्छे हैं या कहेंगे कि ये तो बहुत खराब है, ये तो बड़ा कमज़ोर है? अच्छा। ये बड़ा ग्रुप हो गया है। (21 देशों के लोग आये हैं) अच्छा है, हाउसफुल हो तब तो दूसरा बनें। अगर फुल नहीं होगा तो बनने की मार्जिन नहीं होगी। आवश्यकता ही साधन को सामने लाती है।

पवित्रता ब्राह्मण जीवन वा फाउण्डेशन है। फाउण्डेशन हमेशा पक्का होना चाहिये। क्योंकि फाउण्डेशन सदा अचल-अडोल रहना ही ब्राह्मण जीवन का सुख प्राप्त करना है। ब्राह्मण का अर्थ ही है पवित्र आत्मा।

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात

ग्रुप नं. 1

प्रकृति और मनुष्यात्माओं को परिवर्तन करने के लिए अपने वायब्रेशन और वृत्ति को शक्तिशाली बनाओ

दिल्ली ग्रुप से:- दिल्ली को परिस्तान कब बनायेंगे? कितना समय चाहिये? समय चाहिये या एवररेडी हो? (एवररेडी हैं) तो कल दिल्ली में परिस्तान हो जायेगा? (बाबा चाहें तो) लेकिन निमित्त तो आप हो ना। निमित्त बच्चों को बनाया है। बच्चों को आगे रखकरके बाप बैकबोन रहता है। तो कब परिस्तान बनायेंगे? बनाना तो है ना, बनना ही है। तो सभी इन्तजार कर रहे हैं कि दिल्ली परिस्तान बने और जायें। निमित्त तो दिल्ली वाले हैं ना। चाहे सर्व के सहयोग से हो, होना ही है। फिर भी जो दिल्ली में बैठे हो उन्हों का तो विशेष पार्ट है ना। तो इतनी तैयारी कर रहे हो, कि पहले कब्रिस्तान बने, फिर परिस्तान बनायेंगे? क्या करेंगे? (समय करायेगा) समय नहीं करायेगा, समय को लायेंगे। क्योंकि अनेक बार ये निमित्त बनने का पार्ट बजाया है, अभी तो सिर्फ रिपीट करना है। तो अपने श्रेष्ठ वायब्रेशन्स द्वारा, शुभ भावना, शुभ कामनाओं द्वारा परिवर्तन कर रहे हो? जितना-जितना शक्तिशाली सतोप्रधान वायब्रेशन होंगे तो यह प्रकृति और मनुष्यात्माओं की वृत्ति दोनों ही चेंज हो जायेगी। मनुष्यात्माओं को वृत्ति से चेंज करना है और प्रकृति को वायब्रेशन द्वारा परिवर्तन करना है। तो परिवर्तन करने वालों की वृत्ति सदा ही शक्तिशाली चाहिए, साधारण नहीं। साधारण वृत्ति या साधारण वायब्रेशन से परिवर्तन होना मुश्किल है। तो दिल्ली वालों की बड़ी जिम्मेवारी है। अपनी जिम्मेवारी समझते हो या समझते हो कि हो जायेगा? नहीं। निमित्त बनना है। ड्रामा में मालूम है, ब्रह्मा को भी मालूम है और था कि नारायण बनना ही है, फिर भी क्या किया? निमित्त बने ना। जगदम्बा को पता था कि लक्ष्मी बनना ही है फिर भी निमित्त बनकर दिखाया। तो सदा अपनी जिम्मेवारी को स्मृति में रखो तो जिम्मेवारी क्या करती है? कभी भी कोई कार्य की जिम्मेवारी होती है तो अलर्ट हो जाते हैं। तो सदा अलर्ट रहना पड़े। कभी-कभी नहीं, सदा। कितनी बड़ी जिम्मेवारी है। हर आत्मा को बाप द्वारा कोई न कोई वर्सा दिलाना ही है। चाहे मुक्ति का दिलाओ, चाहे जीवनमुक्ति का दिलाओ, लेकिन वर्से के अधिकारी तो बनेंगे ना। तो दिल्ली वालों को कितना काम है? तो अलबेले नहीं बनो। यह सभी की जिम्मेवारी है या समझते हो यह तो बड़ों की जिम्मेवारी है, हम तो छोटे हैं!इसमें छोटे शुभान अल्लाह। बड़े तो बड़े हैं, छोटे शुभान अल्लाह। सभी को सदैव यह शुभ संकल्प इमर्ज हो कि दाता के बच्चे बन सभी आत्माओं को वर्सा दिलाने के निमित्त बनें, कोई वंचित नहीं रहे। फिर भी ब्रदर्स तो हैं ना। तो ब्रदर्स होने के कारण रहम तो आयेगा ना। चाहे कैसा भी है लेकिन बाप का तो है ना। आप भी कहेंगे भाई-भाई तो हैं ना या कहेंगे अज्ञानी भाई नहीं हैं, ज्ञानी भाई हैं। सबको कहेंगे ना भाई-भाई। तो चलो और कुछ नहीं, जो सबकी इच्छा है जन्म-मरण से मुक्त हो जायें, वो तो अनुभव करायेंगे ना। वो आशा तो पूर्ण करायेंगे ना।

आपकी क्या आशा है? मुक्ति में रहना है? मुक्ति में रहेंगे तो बहुत आराम मिलेगा। एक युग रहकर पीछे आओ? सतयुग के बाद त्रेता में आ जाओ, नहीं? मुक्ति में नहीं रहना है? जीवनमुक्ति में आना है? अच्छा, पाण्डवों को मुक्ति चाहिये? जीवनमुक्ति चाहिये? डबल चाहिये, सिंगल नहीं चाहिये। जीवन भी हो और मुक्ति भी हो। लेने में होशियार हैं। तो सदैव यही गीत गाते रहते हो ना कि वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! भगवान भी मिला और भाग्य भी मिला। कोई पूछे या सोचे कि मेरा भाग्य क्या है? अज्ञानी लोग तो सोचते हैं ना कि पता नहीं मेरा भाग्य क्या है? आप सोचते हो कि मेरा भाग्य क्या है? कभी संकल्प आता है या नहीं आता है? अपने भाग्य पर निश्चय है? जब भाग्य विधाता अपना बन गया तो भाग्य कहाँ जायेगा? जहाँ भाग्य विधाता है वहीं भाग्य है। तो सोचने की भी आवश्यकता नहीं है - क्या होगा! तो इतनी खुशी है कि कम-ज्यादा होती है? अभी कम नहीं होना चाहिये। ज्यादा से ज्यादा हो, लेकिन कम नहीं हो।

(दिल्ली को परिस्तान बनाने के लिये विशेष क्या करना चाहिये?)

विशेष तो माइक तैयार करना चाहिये। जिसमें मेहनत कम और सफलता सहज हो। एक द्वारा अनेकों को सन्देश मिल जाये और कार्य में भी सहयोगी बनें। जितना-जितना निमित्त बनते हैं उतना कार्य में भी सहज सहयोगी हो जाते हैं। तो अभी यही लक्ष्य रखो कि भिन्न-भिन्न वर्ग के ऐसे माइक तैयार करें जो वह स्वयं ही अपने-अपने वर्ग के निमित्त बन जायें। तो ऐसे कोई आत्मायें निमित्त बनने वाली तैयार करो।

(माइक तैयार करने के लिये क्या करना है?)

उसके लिये एक ही समय पर तीन प्रकार की सेवा चाहिये। जैसे कोई भी बहुत होशियार, चाहे योद्धा हो, चाहे आतंकवादी हो, कोई बड़े को पकड़ने के लिये क्या किया जाता है? चारों ओर से उसको पकड़ने की कोशिश की जाती है, तब पकड़ा जाता है। तो यह भी एक ही समय पर मंसा में, वाणी में भी, सम्बन्ध-सम्पर्क से भी, वायुमण्डल में-ये चारों ओर का घेराव हो तभी ये विशेष निमित्त बनने वाली आत्मायें समीप आयेंगी। तो श्रेष्ठ वायब्रेशन्स से उन्हों को समीप लाते रहो। क्योंकि वाणी से समीप जाने का समय तो कम ही मिलता है ना। लेकिन वायब्रेशन, वायुमण्डल बनाने की सेवा सदैव होनी चाहिये। चारों ओर वायब्रेशन द्वारा उन आत्माओं को पकड़ना चाहिये। सिर्फ एक-दो नहीं, लेकिन संगठित रूप में चाहिये। तो देहली वालों को तो बहुत काम करना है। अगर देहली में आवाज बुलन्द हो जाये तो विश्व में तो बहुत जल्दी हो जाये। देहली में एक कोई बड़ा माइक निकल जाये तो चारों ओर आपेही वायब्रेशन फैलेगा। तो दिल्ली वाले अब वायब्रेशन से सेवा करके माइक तैयार करो। और कोई वायब्रेशन में नहीं चले जाना। बहुत बड़ी जिम्मेवारी है। जिम्मेवारी के समय कभी भी कोई व्यर्थ टाइम, व्यर्थ इनर्जा नहीं गंवाता। तो अभी कोई नया जलवा दिखाओ। जैसे देहली में नम्बरवन सेवा का केन्द्र खुला तो देहली से माइक निकलेगा। सेवा की स्थापना तो दिल्ली से हुई ना। और देहली ने कई अच्छी-अच्छी सेवाओं को प्रैक्टिकल में भी लाया है। समय प्रति समय सेवा में सहयोगी बनते रहे हो। अब इसमें नम्बर लो। विदेश वाले भी प्रयत्न कर रहे हैं। लेकिन पहले चैरिटी बिगिन्स एट होम होना चाहिये ना। अच्छा है, लक्ष्य तो सभी का अच्छा है और सेवा से प्यार भी है। अभी सिर्फ जो बीच-बीच में व्यर्थ आ जाता है, उसको समाप्त कर समर्थ वायब्रेशन से समीप लाओ। समझा, क्या करना है? देखेंगे कितने समय में करते हो? जल्दी करना है या समय आयेगा तभी करेंगे। (हुआ ही पड़ा है) लेकिन कितने टाइम में हुआ पड़ा है? (जब गेट खुलेगा) गेट किसको खोलना है? ब्राह्मण फरिश्ते बनेंगे तो गेट खुलेगा। तो कमाल दिखायेंगे या वहाँ जाकर अपने कामों में बिजी हो जायेंगे? चाहे कोई भी निमित्त सेवा मिली हुई है लेकिन बेहद की हो, हद की नहीं। तो बेहद परिवर्तन की सेवा में तीव्र गति लाओ। ऐसे नहीं, कर तो रहे हैं ना, इतने बिजी होते हैं जो टाइम ही नहीं मिलता..। इसके लिये टाइम की भी आवश्यकता नहीं है। निमित्त सेवा करते हुए भी बेहद के सहयोगी बन सकते हो। मातायें बन सकती हैं कि फुर्सत ही नहीं मिलती? फुर्सत है कि बच्चे ही नहीं सुनते, क्या करें? जितना बेहद में बिजी रहेंगे, तो जो ड्युटी मिली है वह और ही सहज हो जायेगी। तो समझा क्या करना है? सदा अपने को बेहद के सेवाधारी और सदा के सेवाधारी, हर संकल्प में, हर सेकण्ड में सेवाधारी बनाओ। इसको कहा जाता है बेहद के सेवाधारी। ऐसे नहीं चार घण्टा तो सेवा कर ली। नहीं, सदा सेवाधारी। छोटे-छोटे बच्चे भी सेवा करेंगे ना? अच्छा!

ग्रुप नं. 2

सब कुछ बाप हवाले करना अर्थात् डबल लाइट बनना

दा अपने को कमल पुष्प समान न्यारे और बाप के प्यारे अनुभव करते हो? क्योंकि जितना न्यारापन होगा उतना ही बाप का प्यारा होगा। चाहे कैसी भी परिस्थितियां हो, समस्यायें हों लेकिन समस्याओं के अधीन नहीं, अधिकारी बन समस्याओं को ऐसे पार करें, जैसे खेल-खेल में पार कर रहे हैं। खेल में सदा खुशी रहती है। चाहे कैसा भी खेल हो, लेकिन खेल है तो कैसा भी पार्ट बजाते हुए अन्दर खुशी में रहते हो? चाहे बाहर से रोने का भी पार्ट हो लेकिन अन्दर हो कि यह सब खेल है। तो ऐसे ही जो भी बातें सामने आती हैं-ये बेहद का खेल है, जिसको कहते हो ड्रामा और ड्रामा के आप सभी हीरो एक्टर हो, साधारण एक्टर तो नहीं हो ना। तो हीरो एक्टर अर्थात् एक्यूरेट पार्ट बजाने वाले। तब तो उसको हीरो कहा जाता है। तो सदा ये बेहद का खेल है-ऐसे अनुभव करते हो? कि कभी-कभी खेल भूल जाता है और समस्या, समस्या लगती है। कैसी भी कड़ी परिस्थिति हो लेकिन खेल समझने से कड़ी समस्या भी हल्की बन जाती है। तो जो न्यारा और प्यारा होगा वो सदा हल्का अनुभव करने के कारण डबल लाइट होगा। कोई बोझ नहीं। क्योंकि बाप का बनना अर्थात् सब बोझ बाप को दे दिया। तो सब बोझ दे दिया है या थोड़ा-थोड़ा अपने पास रख लिया है? थोड़ा बोझ उठाना अच्छा लगता है। सब कुछ बाप के हवाले कर दिया या थोड़ा-थोड़ा जेबखर्च रख लिया है? छोटे बच्चे जेबखर्च नहीं रखते हैं। रोज उनको जेब खर्च देते हैं, खाओ, पीयो, मौज करो। कोई भी चीज़ रखी होती है तो डाकू आता है। जब पता होता है कि ये मालदार है, कुछ मिलेगा तब डाका लगाते हैं। यदि पता हो कि कुछ नहीं मिलेगा तो डाका लगाकर क्या करेंगे। अगर थोड़ा भी रखते हैं तो डाकू माया जरूर आती है और वह अपनी चीज़ तो ले ही जाती है लेकिन जो बाप द्वारा शक्तियां मिली हैं वो भी साथ में ले जाती है। इसीलिये कुछ भी रखना नहीं है। सब दे दिया। डबल लाइट का अर्थ ही है सब-कुछ बाप-हवाले करना। तन भी मेरा नहीं। ये तन तो सेवा अर्थ बाप ने दिया है। आप सबने तो वायदा कर लिया ना कि तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा। ये वायदा किया है कि तन तेरा है बाकी आपका है? जब तन ही नहीं तो बाकी क्या। तो सदा कमल पुष्प का दृष्टान्त स्मृति में रहे कि मैं कमल पुष्प समान न्यारी और प्यारी हूँ। जब आपकी रचना कमल न्यारा रह सकता है तो आप मास्टर रचता उससे भी ज्यादा रह सकते हो। तो सभी कमल पुष्प समान न्यारे और प्यारे हो ना और चाहिये ही क्या, जब परमात्मा के प्यारे हो गये तो और क्या चाहिये! दुनिया में जो भी मेहनत करते हैं, जो भी कुछ प्रयत्न वरते हैं, किसलिये? प्यारा बनने के लिये। प्यार मिले और प्यार दें। और आपको परमात्म प्यार का अधिकार मिला है। तो जहाँ प्यार है वहाँ सब-कुछ है, और जहाँ सब-कुछ है और प्यार नहीं है वहाँ कुछ नहीं है। तो आप कितने लक्की हो परमात्म प्यार के पात्र बन गये! और कितना सहज! कोई मुश्किल हुआ क्या?

मातायें प्यार का अनुभव करती हो कि बाल बच्चों के प्यार का अनुभव करती हो? परमात्म प्यार में सब प्यार समाया हुआ है। पोत्रे का प्यार, धोत्रे का प्यार सब समाया हुआ है क्योंकि रचता है ना। तो रचता में रचना आ ही जाती है। जो भी स्नेह चाहिये उस रूप से स्नेह का अनुभव कर सकते हो। लेकिन आत्माओं का प्यार नहीं, परमात्म प्यार। तो ऐसे अधिकारी हो ना? पूरा अधिकार लिया है? थोड़े में खुश होने वाले तो नहीं हो ना। जब दाता फुल दे रहा है तो थोड़ा क्यों लें? अच्छा!

मोदी नगर होस्टेल की कुमारियों से -

हॉस्टल की कुमारियां क्या कमाल कर रही हो? स्कूल या कॉलेज में जहाँ पढ़ती हो, वो समझते हैं कि ये न्यारी कुमारियां हैं? कि जैसे वो वैसे आप? क्योंकि ब्रह्माकुमारियां अर्थात् न्यारी कुमारी। कुमारियां तो सभी हैं लेकिन आप ब्रह्माकुमारियां हो। ब्रह्माकुमारियां कमाल करने वाली हो। जहाँ भी जाये, वहाँ विशेष आत्मा अनुभव हो। तो बाप से पूरा ही प्यार है ना? पक्का, कोई व्यक्ति के तरफ नहीं, वैभव के तरफ नहीं? जब एक बाप से प्यार होगा तो सेफ रहेंगे। बाप से कम होगा तो फिर कहीं न कहीं फंस जायेंगे। तो कहाँ फंसने वाली तो नहीं हो? देखना, सर्टीफिकेट मिलेगा! अच्छा, हिम्मत रखी है तो हिम्मत और मदद से आगे बढ़ते रहो।

ग्रुप नं. 3

सर्वशक्तिमान बाप के साथ सदा कम्बाइन्ड रहो तो सफलता आगे पीछे घूमती रहेगी

दा अपने को चमकता हुआ सितारा अनुभव करते हो? जैसे आकाश के सितारे सभी को रोशनी देते हैं ऐसे आप दिव्य सितारे विश्व को रोशनी देने वाले हो ना! सितारे कितने प्यारे लगते हैं! तो आप दिव्य सितारे भी कितने प्यारे हो! सितारों में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के सितारे गाये जाते हैं। एक हैं साधारण सितारे और दूसरे हैं लक्की सितारे और तीसरे हैं सफलता के सितारे। तो आप कौन-से सितारे हो? सभी सफलता के सितारे हो! सफलता मिलती है कि मेहनत करनी पड़ती है? कम्बाइन्ड कम रहते हो इसलिए सफलता भी कम मिलती है। क्योंकि जब सर्वशक्तिमान कम्बाइण्ड है तो शक्तियां कहाँ जायेंगी? साथ ही होगी ना। और जहाँ सर्व शक्तियां हैं वहाँ सफलता न हो, यह असम्भव है। तो सदा बाप से कम्बाइन्ड रहने में कमी है इस कारण सफलता कम होती है या मेहनत करने के बाद सफलता होती है। क्योंकि जब बाप मिला तो बाप मिलना अर्थात् सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है। नाम ही अधिकार है तो अधिकार कम मिले, यह हो नहीं सकता। तो सफलता के सितारे, विश्व को ज्ञान की रोशनी देने वाले हैं। मास्टर सर्वशक्तिमान के आगे सफलता तो आगे-पीछे घूमती है। तो कम्बाइन्ड रहते हो या कभी कम्बाइन्ड रहते हो, कभी माया अलग कर देती है। जब बाप कम्बाइन्ड बन गये तो ऐसे कम्बाइन्ड रूप को छोड़ना हो सकता है क्या? कोई अच्छा साथी लौकिक में भी मिल जाता है तो उसको छोड़ सकते हैं? ये तो अविनाशी साथी है। कभी धोखा देने वाला साथी नहीं है। सदा ही साथ निभाने वाला साथी है। तो ये नशा, खुशी है ना, जितना नशा होगा कि स्वयं बाप मेरा साथी है उतनी खुशी रहेगी। तो खुशी रहती है? (बहुत रहती है) बढ़ती रहती है या कम और ज्यादा होती रहती है? कोई बात आती है तो कम होती है? थोड़ा तो कम होती है! फिर सोचते हैं क्या करें, वैसे तो ठीक है, लेकिन बात ही ऐसी हो गई ना। कितनी भी बड़ी बात हो लेकिन आप तो मास्टर रचता हो, बात तो रचना हैं। तो रचता बड़ा होता है या रचना बड़ी होती है?

कभी कोई बात में घबराने वाले तो नहीं हो? वहाँ जाकर कोई बात आ जाये तो घबरायेंगे नहीं? देखना, वहाँ जायेंगे तो माया आयेगी। फिर ऐसे तो नहीं कहेंगे कि मैंने तो समझा नहीं था, ऐसे भी हो सकता है! नये-नये रूप में आयेगी, पुराने रूप में नहीं आयेगी। फिर भी बहादुर हो। निश्चय है कि अनेक बार बने हैं, अब भी हैं और आगे भी बनते रहेंगे। निश्चय की विजय है ही। मास्टर सर्वशक्तिमान की स्मृति में रहने वाले कभी घबरा नहीं सकते।

सभी एवररेडी हो गये हो या थोड़ा-थोड़ा अभी तैयार होना है? कल विनाश आ जाये तो तैयार हो? कि सोचेंगे कि अभी ये करना था एवररेडी हो, सम्पूर्ण हो गये हो? (सम्पूर्ण बनना है) तो एवररेडी कैसे हुए? बनना है तो देरी है ना। ऐसे नहीं सोचना कि उस समय हो जायेंगे। इसके लिए बहुत समय का अभ्यास चाहिये। अगर उस समय कोशिश करेंगे तो मुश्किल है, हो नहीं सकेंगे, टिक नहीं सकेंगे। इसीलिये अभी से एवररेडी के संस्कार इमर्ज करो।

माताओं को विशेष खुशी है ना कि क्या से क्या बन गये! दुनिया वालों ने जितना गिराया, बाप ने उतना ही चढ़ा दिया। माताओं को कभी दु:ख की लहर आती है? अच्छा-पाण्डवों को कभी दु:ख की लहर आती है? बिजनेस में, नौकरी में नुकसान हो जाये तो! देवाला निकल जाए तो? इतने पक्के हो? क्योंकि निश्चय है अगर बाप के सच्चे बच्चे बने, तो बाप दाल रोटी खिलाते रहेंगे। ज्यादा नहीं देगा लेकिन दाल रोटी देगा। चाहिये भी क्या? दाल-रोटी ही चाहिये ना। रोटी नहीं तो चावल ही मिल जायेगा। इतना पक्का निश्चय है ना। बस ऐसे ही निश्चय में अटल, अखण्ड, अटल उड़ते रहो।

ग्रुप नं. 4

श्रेष्ठ कर्म का आधार - श्रेष्ठ स्मृति

अपने को सदा संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा अनुभव करते हो? श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्थात् जिन्हों का हर संकल्प, हर सेकण्ड श्रेष्ठ हो। ऐसे श्रेष्ठ बने हो कि कभी साधारण, कभी श्रेष्ठ? अभी साधारण और श्रेष्ठ दोनों चलते हैं या सिर्फ श्रेष्ठ चलते हैं? क्या होता है? थोड़ा-थोड़ा चलता है? तो सदैव मैं ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ - यह स्मृति इमर्ज रखो। देखो, जो आजकल के नामधारी ब्राह्मण हैं, उन ब्राह्मणों से भी कौन-सा कार्य कराते हैं? जहाँ कोई श्रेष्ठ कार्य होगा तो ब्राह्मणों को बुलाते हैं। तो यह आप लोगों के यादगार हैं ना। क्योंकि आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने सदा श्रेष्ठ कार्य किया है, तभी अब तक भी यादगार में ब्राह्मण श्रेष्ठ कार्य के निमित्त हैं। अगर कोई ब्राह्मण ऐसा कोई काम कर लेता है तो उसको कहते हैं यह ब्राह्मण नहीं है। तो ब्राह्मण अर्थात् श्रेष्ठ कार्य करने वाले, श्रेष्ठ सोचने वाले, श्रेष्ठ बोलने वाले। तो जैसा कुल होता है वैसे कुल के प्रमाण कर्तव्य होता है। अगर कोई श्रेष्ठ कुल वाला ऐसा-वैसा काम करे तो उसको शर्मवाते हैं कि ये क्या करते हो! तो अपने आपसे पूछो कि मैं ब्राह्मण ऊंचे से ऊंची आत्मा हूँ, श्रेष्ठ आत्मा हूँ तो कोई भी ऐसा कार्य कर कैसे सकते। क्योंकि श्रेष्ठ कर्म का आधार है श्रेष्ठ स्मृति। स्मृति श्रेष्ठ है तो कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ होंगे। तो सदा यह श्रेष्ठ स्मृति रखो कि हम श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। यह तो सदा याद रहता है या याद करना पड़ता है? कभी शरीर को याद करते हो कि मैं फलाना हूँ, मैं फलानी हूँ? क्योंकि याद तब किया जाता है जब भूलते हैं। अगर कोई बात भूली नहीं तो याद करनी पड़ेगी। तो मैं ब्राह्मण आत्मा हूँ यह भी स्वत: याद रहे, न कि करना पड़े। तो स्वत: और सदा याद रहे कि मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ। जब तक ब्राह्मण जीवन है तब तक ये स्वत: याद रहे।

अच्छा, महाराष्ट्र अथवा आंध्रा वाले अब कोई नई बात करके दिखाओ तभी तो कहेंगे कमाल किया है। कोई नई इन्वेन्शन करके, कोई नवीनता करके दिखाओ, जो सब कहें कि यह तो हम भी करेंगे। कमाल उसको कहा जाता है जो किसी ने किया नहीं हो और आप करके दिखाओ। जो सब कर रहे हैं वो करेंगे तो कमाल नहीं कहेंगे। ऐसा कोई प्लैन बनाओ जिसमें कम खर्चा, कम समय और रिजल्ट सौ गुना से भी ज्यादा। कम समय में रिजल्ट सौ गुना निकलना - इसको कहा जाता है कमाल। तो अगले वर्ष जब आयेंगे तो नया कार्य करके ही आयेंगे ना कि फिर कहेंगे करेंगे! करेंगे, करेंगे तो नहीं कहेंगे ना।

ग्रुप नं. 5

हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने का युग-संगमयुग

(डबल विदेशी भाई बहिनों से)

पने को पदमापदम भाग्यवान समझते हो? हर कदम में पदमों की कमाई जमा हो रही है? तो कितने पदम जमा किये हैं? अनगिनत हैं? क्योंकि जानते हैं कि जमा करने का समय अब है। सतयुग में जमा नहीं होगा। कर्म वहाँ भी होंगे लेकिन अकर्म होंगे। क्योंकि वहाँ के कर्म का सम्बन्ध भी यहाँ के कर्मों के फल के हिसाब में है। तो यहाँ है करने का समय और वहाँ है खाने का समय। तो इतना अटेन्शन रहता है? कितने जन्मों के लिये जमा करना है? (84) जमा करने में खुशी होती है ना? मेहनत तो नहीं लगती? क्यों नहीं मेहनत महसूस होती है? क्योंकि प्रत्यक्षफल भी मिलता है। प्रत्यक्षफल मिलता है कि भविष्य के आधार पर चल रहे हो? भविष्य से भी प्रत्यक्षफल अति श्रेष्ठ है। सदा ही श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ प्रत्यक्षफल मिलने का साधन है कि सदा ये याद रखो कि अब नहीं तो कब नहीं। जैसे नाम है डबल फॉरेनर्स, तो डबल का टाइटिल बहुत अच्छा है। तो सबमें डबल-खुशी में, नशे में, पुरूषार्थ में, सबमें डबल। सेवा में भी डबल। और रहते भी सदा डबल हो, कम्बाइन्ड, सिंगल नहीं। कभी डबल होने का संकल्प तो नहीं आता? कम्पनी चाहिये या कम्पैनियन चाहिये? चाहिये तो बता दो। ऐसे नहीं करना कि वहाँ जाकर कहो कम्पैनियन चाहिये। कितने भी कम्पैनियन करो लेकिन ऐसा कम्पैनियन नहीं मिल सकता। कितने भी अच्छे कम्पैनियन हो लेकिन सब लेने वाले होंगे, देने वाले नहीं। इस वर्ल्ड में ऐसा कम्पैनियन कोई है? अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि में थोड़ा ढूंढ कर आओ, मिलता है! क्योंकि मनुष्यात्मायें कितने भी देने वाले बनें फिर भी देते-देते लेंगे जरूर। तो जब दाता कम्पैनियन मिले तो क्या करना चाहिये? कहाँ भी जाओ, फिर आना ही पड़ेगा। ये सब जाने वाले नहीं हैं। कोई कमज़ोर तो नहीं हैं? फोटो निकल रहा है। फिर आपको फोटो भेजेंगे कि आपने कहा था। कहो यह होना ही नहीं है। बापदादा भी आप सबके बिना अकेला नहीं रह सकता।

क्रिसमस वा बड़े दिन की मुबारक: -

क्रिसमस मना लिया कि अभी मनायेंगे? क्रिसमस का अर्थ ही है फादर द्वारा गिफ्ट लेना। वो क्रिसमस फादर है और यह गॉड फादर है। तो क्रिसमस फादर क्या देता है? छोटी-छोटी गिफ्ट देंगे। और गॉड फादर क्या गिफ्ट देता है? जन्म-जन्म के लिये सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों के अधिकारी बना देते हैं। स्वर्ग हाथ में दे देते हैं। स्वर्ग आपके हाथ में है? यह आपका चित्र है या सिर्फ ब्रह्मा बाप का है ? क्योंकि चित्र में तो एक ही दिखाया जाता है? लेकिन अधिकारी सभी बनते हैं। ये नशा है?

ये बड़ा दिन कहकर मनाते हैं लेकिन आपका हर घड़ी बड़ी घड़ी हो गई। क्योंकि एक सेकण्ड में कितनी कमाई करते हो तो बड़ी हो गई ना! और क्रिसमस की निशानी क्या दिखाते हैं? (क्रिसमस ट्री) तो संगम पर आपको भी ट्री का नॉलेज मिला है ना। आपकी ट्री कितनी बड़ी है! तो आप कहाँ बैठे हो? कल्प ट्री के अन्दर बैठे हो। यह संगमयुग की यादगार एक दिन करके मनाते हैं। तो क्रिसमस की मुबारक मिली? ये मिलना ही मुबारक है। अच्छा!