07-03-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मण अर्थात् धर्म सत्ता और स्वराज्य सत्ता की अधिकारी आत्मा

ज बापदादा चारों ओर के बच्चों में दो विशेष सत्ता को देख रहे हैं। वो आ दो सत्तायें हैं एक धर्म सत्ता और दूसरी स्वराज्य सत्ता। ब्राह्मण जीवन की विशेषता-ये दोनों सत्तायें हर एक को प्राप्त होती हैं। धर्म सत्ता अर्थात् सत्यता, पवित्रता के धारणा स्वरूप और स्वराज्य सत्ता अर्थात् अधिकारी बन सर्व कर्मेन्द्रियों को अपने अधिकार से ऑर्डर में चलाना। स्वराज्य अधिकारी वा स्वराज्य के सत्ताधारी किसी भी परिस्थिति, प्रकृति और माया के सर्व स्वरूपों में अधीन नहीं बनेंगे, अधिकारी रहेंगे। हर ब्राह्मण आत्मा को बापदादा ने ये दोनों ही सत्तायें प्राप्त कराई है ना? सभी में ये दोनों सत्तायें हैं कि अभी पूरी नहीं आई हैं? अभी की दोनों सत्तायें प्राप्त करने वाले ही भविष्य में धर्म और राज्य सत्ता के अधिकारी बनते हैं। दोनों ही सत्तायें धारण की हैं? अपना चित्र देखा है? डबल विदेशियों का चित्र है या औरों का चित्र है? तो उस चित्र में दोनों सत्ताओं की निशानी देखी है? धर्म सत्ता की निशानी है-लाइट का ताज और राज्य सत्ता की निशानी है रत्न जड़ित ताज। तो ऐसा अपना चित्र देखा है? तो दोनों सत्ता धारण इस समय करते हो। जो आधाकल्प दोनों ही सत्तायें आप सबके, एक के हाथ में हैं। द्वापर से देखो तो धर्म सत्ता अलग हो गई और राज्य सत्ता अलग हो गई। इसीलिये धर्म पिताओं को आना पड़ा। तो धर्म पिता और राजा दोनों अलगअलग रहे। लेकिन आपके राज्य में अलग होंगे क्या? हर एक के पास दोनों सत्तायें इकट्ठी होती हैं इसलिये अखण्ड निर्विघ्न राज्य चलता है। तो हर एक में ये दोनों ही सत्तायें देख रहे थे कि हर एक ने कितनी अपने में धारण की है? कहाँ तक अधिकारी बने हैं? क्या सदा अधिकारी रहते हैं या कभी अधीन, कभी अधिकारी? अभीअभी अधिकारी हैं और अभीअभी अधीन हो जाये तो अच्छा लगेगा? कि सदा अधिकारी अच्छा है? सदा अधिकार चाहिये या थोड़े टाइम के लिये चलेगा? जब स्वयं बाप अधिकार दे रहा है, देने वाला दे रहा है और लेने वाले जो हैं उनको क्या करना चाहिये? लेना सहज है या देना सहज है? लेने में तो कोई मुश्किल नहीं है ना? देने मे सोचा जाता है-दें, नहीं दें, थोड़ा दें, ज्यादा दें.... लेकिन लेने में तो सब कहेंगे-जितना मिले उतना ले लें। तो लेने में नम्बरवन हो या नम्बर टू हो? इसमें तो नम्बर दो कोई नहीं बनता और जब देना पड़ता है तो.... देने में भी नम्बरवन हो कि सोचना पड़ता है, हिम्मत रखनी पड़ती है! वास्तव में देखो कि देते क्या हो? ब्राह्मण जीवन में देना है या लेना है? अगर देने वाली चीज़ से लेने वाली चीज़ श्रेष्ठ है तो लेना हुआ या देना हुआ? देना पड़ेगा, देना है-ये सोचते हो तो भारी होते हो। लेना है, तो सदा खुश रहेंगे, हिम्मत में रहेंगे। देने में सोचते हो देना मुश्किल है लेकिन पहले लेते हो फिर देते तो कुछ भी नहीं हो। आपके पास कुछ है जो बाप को देंगे? दी तो अच्छी चीज़ जाती है या खराब चीज़? तो क्या अच्छा है आपके पास-तन अच्छा है? मन अच्छा है? धन अच्छा है? बेकार है। दवाइयों के धक्के से शरीर चला रहे हो। तो धक्के वाली गाड़ी अच्छी होती है क्या! तो ब्राह्मण जीवन में लेना ही लेना है। और बाप तो मुस्कराते हैं कि बच्चे बाप से भी चतुर हैं। पहले लेते हैं फिर देने का सोचते हैं। होशियार हो ना! अच्छा है, बच्चे होशियार होते हैं तो बाप को अच्छा लगता है लेकिन चलतेचलते यदि डल हो जाते हैं तो अच्छा नहीं लगता है। कभीकभी बच्चों की शक्ल (फेस) ऐसे लगती है कि पता नहीं क्या हो गया! जैसे शरीर में चलतेचलते खून कम हो जाता है तो कमज़ोर हो जाते हैं ना, फेस से भी कमज़ोरी नजर आती है। तो यहाँ भी खुशी की, शक्तियों की कमी हो जाती है ना तो चेहरा ऐसा हो जाता है जैसे...., सब जानते हैं, सभी अनुभवी हैं। एक तरफ कहते हो कि खुशियों की खान मिली है और वो भी अविनाशी फिर कम कैसे हो जाती है? तो बाप के पास आपके सारे दिन के मन के मूड और मूड प्रमाण जो फेस बदलता है वो सारे दिन के चित्र वहाँ होते हैं। आप तो चित्रों का म्युजयम बनाते हो ना, बाप के पास आपके चित्रों का म्युजयम होता है। तो सदा यह याद रखो कि मैं ब्राह्मण आत्मा राज्य सत्ता और धर्म सत्ता की अधिकारी आत्मा हूँ। यह स्मृति का निश्चय है तो नशा है, निश्चय कम तो नशा भी कम। तो चेक करो-ये सत्तायें सदा साथ रहती हैं वा कभी खो जाती हैं, कभी आ जाती हैं?

अच्छा-आज डबल विदेशी मैजारिटी हैं। बापदादा विशेष डबल विदेय्शियों से पूछते हैं कि सारे दिन में अपने अधिकार के सीट पर सेट रहते हो या अपसेट बहुत जल्दी होते हो? कि अपसेट होना-ये पास्ट की बात है, अभी नहीं होते। पास्ट हो गया ना! अभी तो नहीं होते हो ना! अभी नॉलेजफुल, पॉवरफुल बन गये। ऐसे तो नहीं कि छोटीसी बात में अपसेट हो जाओ, चेहरा बदल जाये, मूड बदल जाये! ऐसा कभीकभी होता है? कभीकभी अपसेट होते हो? अच्छा! जो समझते हैं कि अपसेट होना क्या होता है वह भी भूल गया है, ऐसे शक्तिशाली आत्मायें जो कभी अपसेट नहीं होते हैं वो हाथ उठाओ। सच तो बोल रहे हो उसकी मुबारक। अभी इस सीजन में कुछ तो मधुबन में छोड़कर जायेंगे या कुछ लेकर जायेंगे? मैजारिटी ने मधुबन में शिवरात्रि मनाई है ना! तो जिसका बर्थ डे होता है उसको गिफ्ट देते हो ना। तो बाप को क्या गिफ्ट दी? ये अपसेट होना यही गिफ्ट दे दो-नहीं होंगे। हिम्मत है? अच्छा, हाथ उठाओ और टी.वी. में सबके हाथ निकालो। सोचसमझकर पक्के हाथ उठाना। देखो सभी के हाथ का फोटो निकाला। देखना अभी फोटो निकल गया है। बापदादा को वो चेहरा अच्छा नहीं लगता। बापदादा हर एक बच्चे को सदा खिला हुआ रूहानी गुलाब देखना चाहते हैं। मुरझाया हुआ नहीं, खिला हुआ। जिससे प्यार होता है ना तो उसको जो अच्छा लगता है वही किया जाता है! डबल फारेनर्स तो बाप से बहुत प्यार करते हैं। तो जो बाप को अच्छा लगता है वही आपको अच्छा लगता है ना! अभी किसी का भी ऐसा समाचार नहीं आये कि क्या करें, बात ही ऐसी थी, इसीलिये अपसेट हो गये! अगर बात अपसेट की आती भी है तो आप अपसेट स्थिति में नहीं आओ। जैसे झूला झूलते हो ना, तो वो बहुत नीचेऊपर होता है, बहुत नीचे हो, बहुत ऊपर हो और बहुत फास्ट हो तो शरीर को अपसेट करेगा ना। लेकिन आप अपसेट होते हो क्या? क्यों नहीं होते हो? खेल समझते हो तो अपसेट होने के बजाय मनोरंजन समझते हो। कारण क्या हुआ? खेल है। ऐसे अगर कोई अपसेट करने की बातें आये भी, आयेंगी जरूर, जिन्होंने हाथ उठाया उन्हों के पास और बड़ी अपसेट करने वाली बातें आयेंगी। क्योंकि माया भी मुरली सुन रही है। लेकिन उसको एक खेल समझो। घबराओ नहीं। अच्छा, झुलाती है, झूलने दो। लेकिन मन घबराये नहीं। नॉलेजफुल, पॉवरफुल बन जाओ। उस सीट को छोड़ो नहीं। अगर एकदो बार भी माया ने देखा कि ये अपसेट होने वाले नहीं हैं तो खुद अपसेट हो जायेगी, आपको नहीं करेगी। बात की लेन देन भले करो, कोई भी बात आती है तो नॉलेजफुल होने के कारण समझते तो हो ना-ये ठीक है, ये नहीं ठीक है, ये होनी चाहिये, ये नहीं होनी चाहिये.... लेकिन बात की लेन देन बात के रीति से करो, अपसेट रूप से नहीं करो। एक तरफ बोलते जायेंगे, दूसरे तरफ गंगाजमुना बहाते रहेंगे। चाहे मन में बहाओ, चाहे आंख से बहाओ, दोनों ही ठीक नहीं है। तो गिफ्ट देने के लिये तैयार हो? सोच लिया कि ऐसे ही हाँ कर लिया?

बापदादा बहुत सहज शब्दों में युक्ति बता रहे हैं कि जब भी कोई परिस्थिति या प्रकृति हलचल के रूप में आये तो दो शब्द याद रखो, विधि है-या नॉट (Not) करो या डॉट (Dot) लगाओ। नॉट या डॉट। अगर कोई बात रांग है तो यही सोचो नॉट माना नहीं करना है। न सोचना है, न करना है, न बोलना है। और डॉट लगा दो तो नॉट हो ही जायेगा। सोचो नॉट, लगाओ डॉट। फिनिश। डॉट (बिन्दी) लगाने में कितना टाइम लगता है? सेकण्ड से भी कम। लेकिन होता क्या है? समझते हो कि यह नहीं करना है, ठीक नहीं है लेकिन डॉट लगाना नहीं आता है। नॉलेजफुल तो बन गये लेकिन सिर्फ नॉलेजफुल नहीं चाहिये, नॉलेज के साथ पॉवरफुल भी चहिये। तो पॉवरफुल स्थिति की कमज़ोरी है इसीलिये डॉट नहीं लगा सकते हो। और जिसे डॉट लगाना आयेगा वो बाप को भी नहीं भूलेगा, बाप भी डॉट (बिन्दी) है। आप भी तो डॉट हो। तो सभी याद आ जायेगा। फुल स्टॉप। क्वेचन मार्क (? ), आश्चर्य की मात्रा ( ! ) या कॉमा ( , ) ये नहीं दो, फुल स्टॉप ( . )। फुल स्टॉप की मात्रा इजी है ना। और सब तो मुश्किल है। और सबसे मुश्किल है क्वेश्चन मार्क। वो लगाने बहुत जल्दी आता है। सुनाया है ना कि व्हाई (WHY) शब्द आये तो क्या करो? फ्लाय। ऊपर उड़ जाओ। व्हाई नहीं फ्लाय। फ्लाय करना आता है?

वैसे डबल फारेनर्स में अच्छेअच्छे रत्न निकले हैं। बापदादा ऐसे रत्नों को देख हर्षित होते हैं। साथसाथ ऐसे रत्न जो बहुत अमूल्य हैं, ऐसे अमूल्य रत्नों में अगर बहुत जरासा भी कहाँ दाग दिखाई देता है तो अमूल्य रत्न के आगे वो दाग अच्छा नहीं लगता। होता छोटासा दाग है लेकिन कहेंगे तो दाग ना! तो जब अमूल्य रत्न बन गये हो तो बाकी छोटासा दाग क्यों रखा है? अच्छा लगता है क्या? ये तो नहीं सोचते हो कि चन्द्रमा में भी काला दिखाई देता है इसीलिये अच्छा है! डबल विदेशी सेम्पल बनकर दिखाओ। जरा भी कोई कमी नहीं। वैसे दाग का कारण क्या होता है? चाहते नहीं हो कि दाग लगे लेकिन लग जाता है। क्यों लग जाता है? मूल कारण जानते हो? जानने में तो होशियार हो। जानते भी हो और जब आपस में वर्कशॉप करते हो तो बापदादा वर्कशॉप के भी फोटो देखते हैं, कारण बहुत निकालते हो-ये कारण है, ये कारण है.... और अच्छीअच्छी बातें वर्कशॉप में निकालते हो लेकिन वर्क में नहीं लाते हो। बॉडी कॉन्सेसनेस के बहुत सूक्ष्म रूप बनते जाते हैं। अभी मोटेमोटे रूप में बॉडी कान्सेस नहीं आता लेकिन सूक्ष्म और रॉयल रूप में आता है। बुद्धि बहुत अच्छी चलाते हो, जब अच्छीअच्छी बातें सोचते हो तो बापदादा खुश होते हैं लेकिन अच्छी बातें सोचतेकरते फिर थोड़ा भी अगर कोई एडीशनकरेक्शन करते हैं तो मैंपन आ जाता है। जैसे खुशी से अपने विचार देते हो ऐसे दूसरे के विचार भी खुशी से लो। घबराओ नहीं-ये कैसे होगा, ये क्या किया, ये तो हो नहीं सकता, ये तो चल नहीं सकता....। दूसरे की राय, दूसरे की बात को भी इतना ही रिगार्ड दो जितना अपनी बात को रिगार्ड देते हो। विचार देना अलग चीज़ है, आपको उनके विचार अगर ठीक नहीं भी लगते हैं तो उसके इफेक्ट में आना, अवस्था नीचेऊपर हो जाये तो ये सेवा, सेवा नहीं होती। एडजस्ट करना, दूसरों के विचार को भी अपने विचारों के माफिक सोचनासमझना-यह है दूसरे के विचारों को रिगार्ड देना। जैसे समझते हो ना कि मैंने यह सोचा या विचार निकाला, विचार किया, काम किया, तो मेरे विचारों का महत्व होना चाहिये, दूसरों को रिगॉर्ड देना चाहिये, ऐसे दूसरे का विचार भी अपने विचारों से मिलाना, वो मिलाना नहीं आता है, दूसरे के विचार को दूसरों के विचार समझते हो। क्योंकि अभी आप डबल विदेशी भी सेवा के क्षेत्र में प्लैन बनाने में अच्छी प्रोग्रेस कर रहे हो और आगे भी होनी है। लेकिन एडजस्टमेन्ट की विशेषता को यूज करो। अगर कोई भी बच्चा आगे बढ़ता है तो बापदादा को खुशी होती है। ऐसे नहीं समझते कि ये क्यों आगे बढ़े! जो बढ़ता है वो बहुत अच्छा। तो डबल विदेशियों के लिये बापदादा को स्नेह तो है ही लेकिन सेवा के प्लैन वा प्रैक्टिकल सेवा के लिये जो करते हो, कर रहे हो, उसके लिये बहुतबहुत रिगार्ड है।

बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि अगर आप डबल विदेशी नहीं होते तो बाप का एक टाइटल प्रैक्टिकल में सिद्ध नहीं होता। कौनसा? विश्व कल्याणकारी। तो अभी देखो विश्व के चारों ओर बाप का मैसेज दे रहे हो ना! इस सीजन में चारों ओर के आये हैं ना! टोटल कितने देशों के आये हैं? (58) बाकी कितने मुख्य देश रहे हैं? (125) छोटेछोटे देश तो बहुत होंगे, लेकिन मुख्य देश 125 रहे हुए हैं! तो अभी डबल विदेशियों को तो बहुत काम करना पड़ेगा! भारत में भी करना है तो विदेश में भी करना है, दोनों जगह करना है। बापदादा ने पहले भी कहा है कि सेवा की सम्पूर्ण सफलता की निशानी ये है कि कोई भी तरफ की आत्मा उलहना नहीं दे कि हमारे तरफ तो मैसेज पहुँचा ही नहीं। मैसेज पहुँचाया और सुनते हुए कोई ने अपना भाग्य नहीं बनाया तो आपके प्रति उलहना नहीं हुआ, वह उन आत्मा के प्रति हुआ। लेकिन आपके प्रति कोई उलहना नहीं रह जाये। जब कहते ही हैं कि मास्टर विश्व कल्याणकारी हैं तो विश्व के चारों ओर मैसेज तो पहुँचना चाहिये। भारत में भी पहुँचना चाहिये तो विदेश में भी पहुँचना चाहिए। जिस समय आपका विजय का झण्डा लहराता हो उस समय यदि कोई आत्मा आकर यह उलहना दे तो अच्छा लगेगा? एक तरफ आप झण्डा लहरा रहे हैं और दूसरे तरफ लोग उलहना दे रहे हैं तो अच्छा लगेगा? नहीं लगेगा ना! डबल विदेशियों की हिम्मत अच्छी है, बाप से प्यार तो है ही लेकिन सेवा से भी प्यार अच्छा है। दोनों से प्यार का सर्टीफिकेट अच्छा है। अभी कौनसा सर्टीफिकेट लेना है? जितने सेवाधारी, उतने ही शक्तिधारी। तो शक्तिस्वरूप बन गये-यह सर्टीफिकेट लेना है। बापदादा देखते हैं-मैजारिटी बाप से और सेवा से प्यार में पास हैं।

अभी जो इस सीजन में पहली बार आये हैं वो हाथ उठाओ। टोटल कितने हैं? 600 पहली बार आये हैं। आप बहुत लक्की हो। क्योंकि आपको सेवा के लिये मार्जिन बहुत अच्छी मिली है। अभी सवा सौ स्थान रहे हुए हैं और आप 600 हो तो 2-2, 3-3 मिलकर भी करो तो पूरा हो जायेगा। आपके लिये सेवा का निमन्त्रण पहले से ही तैयार है। बहुत अच्छी प्रोग्रेस की है। 600 इस सीजन में नये आ गये तो सेवा की है तब तो आये हैं ना! तो कितनी मुबारक है! पदमापदम मुबारक। (बापदादा ने ड्रिल कराई)

एक सेकण्ड में डॉट लगा सकते हो? अभीअभी कर्म में और अभीअभी कर्म से न्यारे, कर्म के सम्बन्ध से न्यारे हो सकते हो? यह एक्सरसाइज आती है? किसी भी कर्म में बहुत बिजी हो, मनबुद्धि कर्म के सम्बन्ध में लगी हुई है, बन्धन में नहीं, सम्बन्ध में, लेकिन डायरेक्शन मिले-फुल स्टॉप। तो फुल स्टॉप लगा सकते हो कि कर्म के संकल्प चलते रहेंगे? यह करना है, यह नहीं करना है, यह ऐसे है, यह वैसे है....। तो यह प्रैक्टिस एक सेकण्ड के लिये भी करो लेकिन अभ्यास करते जाओ, क्योंकि अन्तिम सर्टीफिकेट एक सेकण्ड के फुल स्टॉप लगाने पर ही मिलना है। सेकण्ड में विस्तार को समा ले, सार स्वरूप बन जाये। तो यह प्रैक्टिस जब भी चांस मिले, कर सकते हो तो करते रहो। ऐसे नहीं, योग में बैठेंगे तो फुल स्टॉप लगेगा। हलचल में फुल स्टॉप। इतनी पॉवरफुल ब्रेक है? कि ब्रेक लगायेंगे यहाँ और ठहरेगी वहाँ! और समय पर फुल स्टॉप लगे, समय बीत जाने के बाद फुल स्टॉप लगाया तो उससे फायदा नहीं है। सोचा और हुआ। सोचते ही नहीं रहो कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, आत्मा हूँ, मेरे को फुल स्टॉप लगाना है और कुछ नहीं सोचना है, यह सोचते भी टाइम लग जायेगा। ये सेकण्ड का फुल स्टॉप नहीं हुआ। ये अभ्यास स्वयं ही करो। कोई को कराने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि नये चाहे पुराने, सभी यह विधि तो जानते हैं ना! तो अभ्यास बहुत काल का चाहिये। उस समय समझो-नहीं, मैं फुल स्टॉप लगा दूँगी! नहीं लगेगा, यह पहले से ही समझना। उस समय, समय अनुसार कर लेंगे! नहीं, होगा ही नहीं। बहुत काल का अभ्यास काम में आयेगा। क्योंकि कनेक्शन है। यहाँ बहुतकाल का अभ्यास बहुतकाल का राज्यभाग्य प्राप्त करायेगा। अगर अल्पकाल का अभ्यास है तो प्राप्ति भी अल्पकाल की होगी। तो ये अभ्यास सारे दिन में जब भी चांस मिले करते रहो। एक सेकण्ड में कुछ बिगड़ता नहीं है। पि्ार काम करना शुरू कर दो। लेकिन हलचल में फुल स्टॉप लगता है या नहीं-ये चेक करो। कर्म के सम्बन्ध में आना और कर्म के बन्धन में आना इसमें भी फर्क है। अगर कर्म के बन्धन में आते हैं तो कर्म आपको खींचेगा, फुल स्टॉप नहीं लगाने देगा। और न्यारेप्यारे होकर किसी भी कर्म के सम्बन्ध में हो तो सेकण्ड में फुल स्टॉप लगेगा। क्योंकि बन्धन नहीं है। बन्धन भी खींचता है और सम्बन्ध भी खींचता है लेकिन न्यारे होकर सम्बन्ध में आना-यह अण्डरलाइन करना। इसी अभ्यास वाले ही पास विद् ऑनर होंगे। ये लास्ट कर्मातीत अवस्था है। बिल्कुल न्यारे होकर, अधिकारी होकर कर्म में आयें, बन्धन के वश नहीं।

तो चेक करो कर्म करतेकरते कर्म के बन्धन में तो नहीं आ जाते? बहुत न्यारा और प्यारा चाहिये। समझा क्या अभ्यास चाहिये? मुश्किल तो नहीं लगता है ना? कि थोड़ाथोड़ा मुश्किल लगता है? कर्मेन्द्रियों के मालिक हो ना? राजयोगी अपने को कहलाते हो, किसके राजा हो? अमेरिका के, अफ्रीका के! कर्मेन्द्रियों के राजा हो ना! और राजा बन्धन में आ गया तो राजा रहा? सभी का टाइटल तो बहुत अच्छा है। सब राजयोगी हैं। तो राजयोगी हो या प्रजायोगी हो? कभी प्रजायोगी, कभी राजयोगी? तो डबल विदेशी सभी पास विद् ऑनर होंगे? बापदादा को तो बहुत खुशी होगी-यदि सब विदेशी पास विद् ऑनर हो जायें। थोड़ासा मुश्किल है कि सहज है? अच्छा। मुश्किल शब्द आपके डिक्शनरी से निकल गया है। ये ब्राह्मण जीवन भी एक डिक्शनरी है। तो ब्राह्मण जीवन के डिक्शनरी में मुश्किल शब्द है ही नहीं कि कभी कभी उड़कर आ जाता है?

कितने वरदान मिलते हैं! अभी तक लिस्ट भी निकालो तो कितने वरदान मिले हैं! बहुत मिले हैं ना! रोज वरदान मिलता है। भक्ति मार्ग में भक्त को यदि एक वरदान भी मिल जाता है तो वो क्या से क्या बन जाता है! और आप कितने लक्की हो जो भगवान रोज वरदान देते हैं। पालना ही वरदानों से हो रही है। तो वरदान याद रहता है? या सुनने के टाइम याद रहता है? एक है याद रहना और दूसरा है वरदान को काम में लगाना। वरदान ऐसी चीज़ है जो कैसी भी परिस्थिति हो लेकिन वरदान की शक्ति परिस्थिति को आग से पानी बना देती है। इतना शीतल बना देती है। सिर्फ यूज करने की विधि आनी चाहिये। और दूसरी बात, समय पर काम में लगाओ। आधा समय बीत जाये, पीछे होश में आये! नहीं। तो वरदान को यूज करना आता है? करते हो या सुनसुनकर खुश होते हो? डायरी में तो बहुत वरदान भर गये हैं, बुक भी बन गया है। अलमारी में बुक तो रखा ही है लेकिन समय पर कार्य में लगाओ। और जितना कार्य में लगाते जायेंगे उतना वरदान और बढ़ता जायेगा। वरदान का विशाल रूप और अनुभव में आता जायेगा। अच्छा!

पहले सभी को अलगअलग डायरेक्शन दिये हैं। इस सीजन के बाद विशेष सभी को भिन्नभिन्न शक्तियाँ अपने में 100% भरनी हैं। जो भी शक्ति अपना सकते हो उस एक शक्ति को लक्ष्य बनाओ कि इस वर्ष हमें विशेष इस शक्ति को स्वरूप में लाना ही है।

अमेरिका कौनसी शक्ति अपनायेगा? शक्तियों का तो पता है ना? कौनसी शक्ति पसन्द है? (थ्दन) स्नेह की शक्ति सामने रखेंगे, लक्ष्य रखेंगे! अच्छा, स्नेह की शक्ति से अमेरिका वाले क्या करेंगे? स्नेह ऐसी शक्ति है जो अज्ञान में गाया हुआ है कि स्नेह पत्थर को भी पानी कर देता है। तो आप क्या करेंगे? माया कितने भी 100 हिमालय जितना पहाड़ बनकर आये लेकिन उस पहाड़ को भी पानी बना दे। बना सकते हो कि माया बड़ी पॉवरफुल है? अमेरिका वाले बोलो-आप पॉवरफुल हो या माया? तो एक माया के पहाड़ को पानी बना देना और दूसरा कोई कुछ भी दे लेकिन आप रूहानी स्नेह देना। बॉडी का स्नेह नहीं देना, रूहानी स्नेह देना। कोई आपकी ग्लानि करे लेकिन आप स्नेह देना। और स्नेह की शक्ति एक चुम्बक है, जैसे चुम्बक दूर को नजदीक करता है ना! तो स्नेह की शक्ति से, जो बाप से दूर हैं उन्हों को समीप लाना और आपस में स्नेह की लेनदेन करना। ऐसा कोई बोल नहीं निकले जो स्नेह का नहीं है। कोई कैसा भी हो लेकिन आपके बोल में स्नेह की शक्ति हो। अच्छा!

अफ्रीका वाले कौनसी शक्ति अपनायेंगे? (र्झीम) इन्हों को शान्ति की शक्ति पसन्द है क्योंकि अफ्रीका में घमसान बहुत होता है ना तो शान्ति की शक्ति पसन्द है। तो शान्ति की शक्ति की निशानी है-जहाँ शान्ति होगी, वहाँ सदा सन्तुष्ट होंगे। क्योंकि अशान्त करती है असन्तुष्टता। जहाँ सन्तुष्टता होगी वहाँ शान्ति होगी और जहाँ शान्ति होगी वहाँ सन्तुष्टता होगी। और शान्ति की शक्ति वाला सदा ही खुश मिजाज होगा। जितनी शान्ति उतनी खुशी उसके चेहरे से, चलन से अनुभव होगी। तो शान्ति की शक्ति की निशानी दिखाना। सदैव सबका चेहरा हर्षित हो। कैसी भी परिस्थिति हो लेकिन खुशी को नहीं छोड़े। अपनी प्रापर्टी है ना। तो प्रापर्टी को कोई छोड़ता है क्या? तो शान्ति की शक्ति की निशानी है-सदा खुश रहना और खुशी बांटना। शान्ति की शक्ति से सहज मंसा सेवा कर सकते हैं। जितना शान्त रहते हैं उतनी मंसा सेवा बड़ी शक्तिशाली होगी। तो अफ्रीका वाले ऐसे शान्ति के शक्ति का स्वरूप बन इस वर्ष का इनाम लेना। सभी इनाम लेंगे ना! अच्छा! रिजल्ट आतो रहेगी। हरेक सेन्टर के हर स्टूडेन्ट की रिजल्ट आती रहेगी। फिर जो नम्बर आगे लेगा, तीन नम्बर को इनाम देंगे। बाकी सेकण्ड नम्बर देंगे। तो शान्त रहना है, हलचल में नहीं आना। कुछ भी हो जाये, शान्त। तो आपकी शान्ति हलचल वालों को भी शान्त कर सकती है। ऐसे पॉवरफुल वायब्रेशन फैलाना। यह सेवा वाणी से नहीं हो सकती लेकिन मंसा से हो सकती है। अच्छा!

ऑस्ट्रेलिया वाले कौनसी शक्ति अपनायेंगे? (सहयोग) ये तो बहुत अच्छी बात सुनाई। ऑस्ट्रेलिया को सेवा में सहयोगी बनना ही चाहिये। क्योंकि सहयोग से असम्भव बात भी सम्भव हो जाती है। कठिन बात सहज हो जाती है। और सहयोग की शक्ति से एकदो में हिम्मत, उमंग, उल्लास बहुत बढ़ा सकते हो। सहयोग की शक्ति ऑस्ट्रेलिया के कोई भी सेन्टर की ब्राह्मण आत्मा को कमज़ोर करने नहीं देगी। सहयोग की शक्ति एक सेफ्टी का किला है। किला कैसे बनता है? ईटों के सहयोग से किला बनता है, सेफ्टी का साधन बनता है। तो सहयोग की शक्ति से मजबूत किला भी बनायेंगे और असम्भव बात सम्भव करके दिखायेंगे। जो सहयोगी होते हैं, सहयोग देते हैं उसको सहयोग मिलता भी बहुत है। इच्छा न होते हुए भी चारों ओर से सहयोग देने वाले को सहयोग मिलता है। करके देखना। अच्छा।

एशिया वाले क्या करेंगे? कौनसी शक्ति अपनायेंगे? (एडजस्टमेन्ट) बहुत बढ़िया बात बताई। एडजस्टमेन्ट की शक्ति को अपनाया तो बहुत सहज सम्पूर्ण बन जायेंगे। क्योंकि माया का दरवाजा ही है-चाहे अपने में एडजस्ट नहीं होते, चाहे सेवा में, चाहे सम्बन्धसम्पर्क में। एडजस्ट होने की कला को लक्ष्य बना दिया तो सबसे पहला नम्बर सम्पूर्ण एशिया वाले बनेंगे। यह शक्ति इतनी पावरफुल है। क्योंकि जिसमें एडजस्ट होने की शक्ति होगी उसमें सहनशक्ति, अन्तर्मुखता सब उसके बाल बच्चे बन जायेंगे। तो एशिया वालों ने मदर को चुन लिया है। सब आ जायेंगे। लेकिन इस लक्ष्य को प्रैक्टिकल में लाने के लिये एक बात सदा याद रखना कि पहले अपनी एडजस्टमेन्ट देखना, दूसरे की नहीं। मुझे पहले एडजस्ट होना है। सेवा में पहले आप होना चाहिये, दूसरों को साथी बनाओ, सहयोगी बनाओ, आगे बढ़ाओ, हिम्मत बढ़ाओ। लेकिन एडजस्ट पहले मेरे को होना है, दूसरे आप ही हो जायेंगे। अगर दूसरे को देखा तो स्वयं भी नहीं होंगे, दूसरा भी नहीं होगा। जो ओटे सो अर्जुन, मैं अर्जुन हूँ। दूसरा अर्जुन बने तो मैं भी अर्जुन बनूँ! नहीं, जो ओटे सो अर्जुन। वैसे भी एशिया में भिन्नभिन्न वैरायटी होने के कारण सेवा में भी प्लैन एडजस्ट करने पड़ते हैं। वेरायटी धर्म वाले भी एशिया में आते हैं। चाइना, जापान सब आता है ना। तो बौद्ध धर्म वाले, चाइनीज सबको एडजस्ट करना पड़ता है ना। उन्हों की मत न्यारी। क्रिश्चियन्स फिर भी उन्हों से नजदीक हैं, गॉड फादर को तो मानते हैं। तो बहुत अच्छा लक्ष्य रखा है इससे स्वयं में भी एडजस्ट हो जायेंगे, सेवा में भी एडजस्ट हो जायेंगे और दूसरों से भी हो जायेंगे। तो इनएडवांस मुबारक हो। अच्छा।

यूरोप क्या करेगा? यूरोप में यू.के. भी आ गया। यूरोप कौनसी शक्ति को अपनायेगा? (युनिटी) तो यूरोप सभी खण्डों को मिलाकर एक खण्ड बना देगा, ऐसे करेगा! क्योंकि भविष्य में तो ये अलगअलग खण्ड होने ही नहीं हैं। एक ही होगा। तो यूरोप वाले युनिटी से भिन्नता को खत्म करके विश्व में भी एक धर्म, एक राज्य, एक खण्ड बनाने का इतना बड़ा कार्य करेंगे!

वैसे तो यूरोप में युनिटी का स्तम्भ तो है ही। पहले से ही स्तम्भ है। कौन है स्तम्भ? (दादी) आप नहीं। (दादी तो सबकी है) लेकिन फाउण्डेशन यू.के. में डाला है। जो स्तम्भ होता है वो चारों ओर के लिये होता है, उसी स्थान के लिये नहीं होता। तो चारों तरफ चाहे अमेरिका है, चाहे अफ्रीका है ...... लेकिन एक है-यही विशेषता है। ऐसे नहीं कि अफ्रीका को क्या करना, वो जाने, नहीं। इसको कहा जाता है युनिटी का स्तम्भ। तो एक दादी नहीं, सारा यूरोप युनिटी का स्तम्भ है। ये तो एकएक एक्जैम्पुल हैं। लेकिन एक्जैम्पुल को देखकर सिर्फ खुश होना होता है या बनना होता है? दादी को देखकर बहुत अच्छी, बहुत अच्छी कहकर खुश होते हो या स्वयं भी बनते हो? क्या करते हो? लण्डन की टीचर्स बताओ। सिर्फ देखकर खुश होते हो या बनते भी हो। युनिटी का अर्थ ही है बेहद की वृत्ति, बेहद की दृष्टि, तभी युनिटी होती है। अगर बेहद की दृष्टि और वृत्ति नहीं तो युनिटी नहीं हो सकती। तो यू.के. और यूरोप बेहद की दृष्टि वाले हैं ना! बहुत आये हैं। इतने सब बेहद की वृत्ति, दृष्टि वाले बन जायेंगे तो अपना राज्य आया कि आया। क्योंकि वृत्ति से वायुमण्डल बनेगा और वायुमण्डल बनेगा तो प्रैक्टिकल में भी होगा। यूरोप वालों ने युनिटी को पसन्द किया है, बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। तो यह जिम्मेदारी उठाने के लिये तैयार हो? है? हाँ या ना बोलो। हाँ जी ठीक बोला। बाप इंग्लिश बोले तो भी आप हाँ जी बोलो। हाँ जी अच्छा लगता है। बहुत अच्छी बात उठाई। फिर तो फॉरेन में पहले स्वर्ग आयेगा या भारत में आयेगा? कहाँ आयेगा? अच्छी हिम्मत रखी है। हिम्मत बच्चों की और मदद बाप की है ही है। ये वरदान है। समझा? करते भी हैं, लक्षण हैं भी, लक्ष्य है भी, सिर्फ उसको अण्डरलाइन करना।

अच्छा, रशिया वाले हाथ उठाओ। देखो रशिया वालों को देखकर सब खुश होते हैं क्यों खुश होते हैं? क्योंकि बहुत प्यासे थे। प्यासे को अगर अमृत मिल जाये तो कितने खुश हो जाते हैं। तो उनकी खुशी आपको भी खुश करती है। जब भी रशिया का नाम आता है तो तालियाँ जरूर बजाते हैं। तो रशिया वाले इतने सिकीलधे हो-समझा! सबका प्यार है कि ये पूरा ही एक था अब अनेकता में आ गया लेकिन अब फिर से एक राज्य में, सतयुगी राज्य के अधिकारी बनेंगे।

तो रशिया वाले कौनसा लक्ष्य बनायेंगे, कौन सी शक्ति लायेंगे? (सहनशक्ति) आपकी टीचर कह रही है सहनशक्ति। पसन्द है? वैसे तो सहनशक्ति में ये पास हैं। सहन करना तो इन्हों को बहुत आता है। कोई भी परिस्थिति आती है तो सहनशक्ति में पास हो जाते हैं। फिर भी अण्डरलाइन लगाना। सहनशक्ति के संस्कार हैं। अभी तक बन्धन में रहने में सहनशक्ति का पार्ट अच्छा बजाया है। अभी अपने को श्रेष्ठ बनाने के बीच में जो भी कोई विघ्न आये उसमें सहनशीलता की शक्ति से नम्बर आगे लेना। यह शक्ति अपनाना आपको मुश्किल नहीं होगा, सहज होगा। इसीलिये नम्बर ले लेना। कौनसा नम्बर लेंगे? पहला नम्बर लेंगे या पांचवा? सभी को खुशी होगी पहला नम्बर लेना। आप नम्बरवन लेना तो जैसे अभी तालियाँ बजाई ना ऐसे बहुत बहुत तालियाँ बजेगी, बापदादा भी तालियाँ बजायेंगे। अच्छा है, लास्ट को फास्ट जाना ही है। जो छोटा बच्चा होता है ना वो सबका लाडला होता है, प्यारा होता है। और क्वालिटी भी अच्छी निकली है। एक्जैम्पुल बनने वाले हैं। मैजारिटी खुश रहते हैं, कभीकभी कोई टेन्शन में आते होंगे बाकी मैजारिटी खुश रहते हैं। रशिया में ब्राह्मणों के पास टेन्शन है? कभी टेन्शन में आते हो? कभीकभी आते हो? अभी नहीं आना। अभी टेन्शन फ्री। गीत भी प्यार से गाते हैं। सब चीजों का उमंग है। स्वतन्त्र हो गये हैं ना। तो उमंगउत्साह में नाचते रहते हैं। अच्छा!

अभी जब थोड़ीसी प्रत्यक्षता होगी ना कि एक ही बाप है, वही अल्लाह है, वही ईश्वर है। थोड़ासा प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेगा तो कैसे भी देश हो, कैसे भी धर्म हो, चाहे मुस्लिम देश हो फिर भी अल्लाह को तो मानते हैं ना। तो वो दिन भी आयेगा जो सब कहेंगे कि एक हैं, एक हैं, यही हैं, यही हैं, इस झण्डे के नीचे सभी आयेंगे। अभी थोड़ीसी प्रत्यक्षता होने दो। अभी कहते हैं ये भी हैं। यही हैं, नहीं कहते हैं। ये भी हैं। अभी भी निकल जाये, ये ही हैं। इसको कहा जाता है प्रत्यक्षता का झण्डा लहराना। जब ये झण्डा लहरायेंगे तो सब एक झण्डे के नीचे आयेंगे। सब एक झण्डे के नीचे एक ही शब्द बोलेंगे-ओम् शान्ति। (बाबा बोलेंगे) बाबा तो बोलेंगे ही। अच्छा इनको मेरा बाबा शब्द अच्छा लगता है।

(हॉस्टल की कुमारियों से) अच्छा है, हॉस्टल की रिजल्ट तब कहेंगे जब जितने हॉस्टल में हैं इतने टीचर्स बनकर निकले। तब कहेंगे हॉस्टल नम्बरवन है। ऐसे नहीं, दो तो निकली हैं, चार चली गई। जितने हॉस्टल में आये, कुमारी बनकर आये और टीचर बनकर निकले तब कहेंगे हॉस्टल की रिजल्ट सबसे आगे। तो इतनी हिम्मत है कि माया आयेगी तो कहेंगे क्या करें! बापदादा तो खुश होते हैं क्योंकि देखो स्थापना का फाउण्डेशन ही ओम् निवास में छोटीछोटी कुमारियों से शुरू हुआ। तो बापदादा को भी पहले स्थापना में क्या पसन्द आया? छोटे बच्चे ही पसन्द आये ना। आज वो छोटे ही विश्व कल्याणकारी बन गये। तो आप भी ऐसे ही बनना। ये अच्छा है, सेफ तो रहे हुए हैं ना। माया के प्रभाव से बचे हुए हैं।

अच्छा, पोलेण्ड वाले क्या करेंगे? पोलेण्ड वालों ने भी हिम्मत अच्छी रखी है। सरकमस्टांश देश के कैसे भी हैं लेकिन हिम्मत रख ब्राह्मण परिवार को आगे बढ़ाने में सफल है और होते रहेंगे। पोलेण्ड की टीचर कहाँ है? (ट्रांसलेशन कर रही है) अच्छी है। जितनी भी टीचर हैं लेकिन यह फाउण्डेशन है। चाहे जितनी भी हलचल हुई खुद अचल रही तो सेवा भी हुई। सेवा की मुबारक है। हिम्मत जो भी रखते हैं उनको मदद जरूर मिलती है। हिम्मत में हिलना नहीं चहिये। पता नहीं क्या होगा! पता नहीं-आया, और गया, खत्म! अच्छा होना है, और अच्छे ते अच्छा होना है। अच्छाअच्छा सोचने से अच्छा हो ही जाता है। क्योंकि आपकी अच्छी वृत्ति वायुमण्डल को परिवर्तन कर देगी। अगर क्योंक्या में जायेंगे-ऐसा है, ऐसा है तो कभी परिवर्तन नहीं होगा। अच्छाअच्छा कहते जाओ तो अच्छे बन जायेंगे। अपनी मंसा वृत्ति सदा अच्छे की, पॉवरफुल बनाओ तो खराब भी अच्छा हो जायेगा। बाप ने आप सब बच्चों में खराब है, खराब है-ये वृत्ति रखी? जैसे भी हो, जो भी हो बाप ने अच्छा समझा ना! तो सभी अच्छे बन गये ना! कोई खराब हैं? सब अच्छे हैं। तो अच्छा, अच्छा, अच्छा.... कोई बात भी करता है तो कहो अच्छा जी, बहुत अच्छा, तो अच्छा हो जायेगा। नहीं, तुम क्यों बोलते हो, क्या बोलते हो.... लड़ाई नहीं करो। यह बोलने में भी अच्छा नहीं लगा और अच्छा जी, यह कहना अच्छा लगा ना। तो अच्छा जी बोलते रहो, अच्छा बनाते चलो। आपको ही तो अच्छा बनना है ना और कोई आने हैं क्या? इसमें सभी पहले मैं, अभिमान वाली मैं नहीं, शुद्ध मैं। अच्छा!

चारों ओर के धर्म सत्ता के अधिकारी आत्मायें, सदा स्वराज्य सत्ता के अधिकारी आत्मायें, सदा डबल सत्ताधारी डबल ताजधारी श्रेष्ठ आत्मायें, सदा सर्व शक्तियों द्वारा शक्ति स्वरूप का प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाने वाले शक्तिशाली आत्मायें, सदा लक्ष्य को लक्षण के रूप में दिखाने वाले, अभव कराने वाले शक्तिशाली महावीर, अचलअडोल आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से - (दादी जी एवं दादी जानकी ने बाबा को भाकी पहनी) सभी को मिल गया ना! सन्तुष्ट हो गये ना! बहुत सयाने हो, समझदार हो। सभी अपने को स्टेज पर देख रहे हो कि नीचे देख रहे हो? कहाँ हो? स्टेज पर हो ना। यह सारा हाल ही स्टेज है। सब समीप हो, साथ हो। स्टेज पर आना माना साथ में आना, पास में आना। आप तो सदा ही पास हो। अलग हो ही नहीं सकते। कोई अलग करे तो अलग होंगे? कि उसको अलग कर देंगे? उसको भगा देंगे? लेकिन स्वयं सदा साथ रहेंगे। साथ हैं, साथ रहेंगे और साथ चलेंगे। (साथ में चक्कर लगायेंगे) चक्कर तो लगाते ही हैं साथ में। चक्कर लगाने का सोच रही है। 84 का चक्कर तो पूरा हो गया। अभी तो घर चलना है। घर जायेंगे या सीधे ही राज्य में जायेंगे? घर जाना है कि राज्य करना है? घर जाना है ना! तो साथ हैं ही। बापदादा को अकेलापन अच्छा नहीं लगता। आप लोगों को कभीकभी अकेलापन अच्छा लगता है! अकेले नहीं बैठते, सेवा करते रहते हैं। (दादी जी गुजरात तथा गुल्जार दादी बाम्बे चक्कर पर जा रही हैं) चक्कर लगाना है तो चक्कर पर तो जायेंगे। बिना चक्कर के चक्रवर्ता राजा नहीं बनेंगे। आप लोगों को भी चक्कर लगाना अच्छा लगता है ना। जब कोई निमन्त्रण मिलता है तो कितनी खुशी होती है। अच्छा है, चक्कर लगाना अर्थात् अपने अनुभवी मूर्त में और मार्क्स बढ़ाना। जमा होता जाता है। लेकिन ऐसे नहीं सोचना कि हमको चक्कर का निमन्त्रण नहीं मिला तो शायद मैं अच्छी नहीं हूँ। ये नहीं सोचना। कोई मुख से भाषण करते, कोई मन से करते। सिर्फ भाषण करना सेवा नहीं है। ये भी एक विधि है। लेकिन चाहे मन्सा करो, चाहे वाचा करो, चाहे कर्मणा करो, सम्बन्धसम्पर्क से करो, चारों ही के मार्क्स 100 हैं। 100 सभी की मार्क्स है। कर्मणा वाले को 50 मिलेगा, भाषण वाले को 100 मिलेगा, ऐसा नहीं है। कोई भी सेवा करो लेकिन सेवाधारी बन सेवा करो, निःस्वार्थ सेवा करो तो सेवा का मेवा मिला हुआ ही है। ऐसे समझते हो ना? या बड़ीबड़ी कांफ्रेंस में भाषण करना ही सेवा है? वो तो एकदो ही जायेंगे ना, इतने लाखों के लाख चले जायें तो भाषण कैसे होगा। सुनाने वाले 3 लाख और सुनने वाले 100 वो कैसे होगा! तो ऐसे कभी भी नहीं समझना कि मेरे को सेवा का चांस नहीं मिला तो मैं सेवा के योग्य नहीं हूँ। कभी भी दिलशिकस्त नहीं होना। बापदादा के पास सब रिकॉर्ड होते हैं। चांस मिला, नहीं मिला, लेकिन मंसा का चांस ले लिया तो वो चक्कर लगाकर भाषण करके आई, आपने मंसा सेवा किया तो मार्क्स आपको वैसे ही मिलेंगे। इसीलिये कभी यह फिक्र नहीं करना कि मेरा तो भाग्य ही ऐसा है। नहीं, बहुत बड़ा भाग्य है। सन्तुष्ट रहना, चाहे कर्मणा हो, चाहे वाचा हो, चाहे मंसा हो, सन्तुष्ट रहना इसमें मार्क्स मिलनी है। भाषण में गये असन्तुष्ट हो गये, खिटखिट हो गई, खत्म, मार्क्स एक भी नहीं। आप घर बैठे बहुत अच्छी स्थिति में रहे तो आपको 100 मार्क्स मिलेगी। तो हिसाब पूरा है। हिसाब में ऊपरनीचे नहीं होगा, आपको फुल मार्क्स मिलेंगी। कोई भी सेवा करो लेकिन सच्चे दिल से। मैं और मेरापन नहीं। सेवा भाव। मैपन का भाव नहीं। अगर सेवाभाव है तो आपको फल पहले मिलेगा। चाहे सदा रोटी पकाते हो, कोई हर्जा नहीं। तो भी 100 मार्क्स मिलेगी। सच्ची दिल से करते हैं ना, तो रोटी बनाते हुए आप जो बल भरते हैं वही भाषण वालों को काम में आता है। समझा! इसीलिये दिलशिकस्त नहीं होना, मेरा नाम कभी भी कोई कांफ्रेंस में नहीं आया, मेरा नाम ही कोई नहीं लेता, शायद मैं पीछे हूँ....। नहीं, सन्तुष्ट रहो, सन्तुष्टता ही सफलता का साधन है। कहाँ भी रहो, सन्तुष्ट रहो। ठीक है ना कि कभीकभी सोचते हो कि महारथी तो यही बनेंगे। हम तो महारथी के लिस्ट में आ नहीं सकते। नहीं, पहले महारथी नम्बरवन आप हो। बाप की लिस्ट में महारथी आप हो। समझा! तो कभी ऐसाऐसा फेस नहीं करना। बापदादा बहुत फेस देखते हैं, कभी ऐसा, कभी ऐसा! नहीं, सदा मुस्कराते रहो। अच्छा, सभी ठीक है?

(मुन्नी बहन ने बापदादा के सामने फल की थाली सजाकर रखी) आपकी मूर्ति की भी विधिपूर्वक पूजा होगी। अच्छा है विधि पूर्वक बनाना, रखना-यह भी एक विशेषता है। यह भी आना चाहिये। ऐसे नहीं, जैसा आया वैसे भोग लगा दिया। आधा कच्चा, आधा पक्का लगा दिया कभी बनाने की सुस्ती हुई तो एक फल ही रख दिया। (डबल विदेशियों को देखते हुए) यह थक जाते हैं ना, डबल काम करते हैं, लौकिक काम भी करते हैं, सेन्टर भी सम्भालते हैं, अपना पुरूषार्थ भी करते हैं इसलिये थक जाते हैं। ऐसे चलाना नहीं। एक चीज़ ही प्यार से बनाओ। तीन नहीं बनाओ लेकिन एक भी प्यार से बनाओ। ऐसे नहीं कि ब्रेड तो बना हुआ है ब्रेड का ही भोग लगा दो-चलाना नहीं। जितनी विधि उतनी सिद्धि। अगर विधिपूर्वक करते हैं तो सिद्धि भी मिलती है। ब्राह्मण का अर्थ ही है-हर कार्य में एक्युरेट, शुद्धिपूर्वक। शुद्धि भी हो, विधि भी हो-दोनों चाहिये। अच्छा। ओम् शान्ति।