25-03-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


ब्राह्मण जीवन का सबसे श्रेष्ठ खज़ाना संकल्प का खज़ाना

आज बापदादा चारों ओर के बच्चों के खज़ानों के खाते देख रहे थे। हर एक बच्चे को खज़ाने बहुत मिले हैं और अविनाशी अनगिनत खज़ाने मिले हैं। सिर्फ इस जन्म के लिये नहीं लेकिन अनेक जन्मों की गैरेन्टी है। अब भी साथ हैं और आगे भी साथ रहेंगे। तो आज विशेष जो सबसे श्रेष्ठ खज़ाना है और सर्व खज़ानों का विशेष आधार है वो ही विशेष देख रहे थे कि सबके खाते में जमा कितना है? मिला अनगिनत है लेकिन जमा कितना है? तो सबसे श्रेष्ठ खज़ाना संकल्प का खज़ाना है और आप सबका श्रेष्ठ संकल्प ही ब्राह्मण जीवन का आधार है। संकल्प का खज़ाना बहुत शक्तिशाली है। संकल्प द्वारा सेकण्ड से भी कम समय में परमधाम तक पहुँच सकते हो। संकल्प शक्ति एक ऑटोमेटिक रॉकेट से भी तीव्र गति वाला रॉकेट है। जहाँ चाहो वहाँ पहुँच सकते हो। चाहे बैठे हो, चाहे कोई कर्म कर रहे हो लेकिन संकल्प के खज़ाने से वा शक्ति से जिस आत्मा के पास पहुँचना चाहो उसके समीप अपने को अनुभव कर सकते हो। जिस स्थान पर पहुँचना चाहो वहाँ पहुँच सकते हो। जिस स्थिति को अपनाना चाहो, चाहे श्रेष्ठ हो, खुशी की हो, चाहे व्यर्थ हो, कमज़ोरी की हो, सेकण्ड के संकल्प से अपना सकते हो। संकल्प किया-मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ तो श्रेष्ठ स्थिति और श्रेष्ठ अनुभूति होगी और संकल्प किया मैं तो कमज़ोर आत्मा हूँ, मेरे में कोई शक्ति नहीं है, तो सेकण्ड के संकल्प से खुशी गायब हो जायेगी। परेशानी के चिन्ह स्थिति में अनुभव होंगे। लेकिन दोनों स्थिति का आधार संकल्प है। याद में भी बैठते हो तो संकल्प के आधार से ही स्थिति बनाते हो। मैं बिन्दु हूँ, मैं फरिश्ता हूँ... यह स्थिति संकल्प से ही बनी। तो संकल्प कितना शक्तिशाली है!

ज्ञान का आधार भी संकल्प ही है। मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ-ये संकल्प करते हो। सारा दिन मनबुद्धि को शुद्ध संकल्प देते हो वा मनन में शुद्ध संकल्प करते हो तो मनन शक्ति का आधार भी संकल्प शक्ति है। धारणा करते हो, मनबुद्धि को संकल्प देते हो कि आज मुझे सहनशक्ति धारण करनी है तो धारणा का भी आधार संकल्प है। सेवा करते हो, प्लैन बनाते हो तो भी शुद्ध संकल्प ही चलते हैं ना! शुद्ध संकल्प द्वारा ही प्लैन बनता है। अनुभव है ना! तो ब्राह्मण जीवन का विशेष श्रेष्ठ खज़ाना है संकल्प का खज़ाना। अगर आप संकल्प के खज़ाने को सफल करते हो तो आपकी स्थिति, कर्म सारा दिन बहुत अच्छा रहता है और संकल्प के खज़ाने को व्यर्थ गँवाते हो तो रिजल्ट क्या होती? जो स्थिति चाहते हो वो नहीं होती। और आप सब जानते हो कि व्यर्थ संकल्प बुद्धि को भी कमज़ोर करते हैं और स्थिति को भी कमज़ोर करते हैं। जिनका व्यर्थ चलता है उनकी बुद्धि कमज़ोर होती है, कन्फ्युजड होती है। निर्णय ठीक नहीं होगा। सदा मूंझा हुआ होगा। क्या करूँ, क्या न करूँ, स्पष्ट निर्णय नहीं होगा। और व्यर्थ संकल्प की गति बहुत फास्ट होती है। व्यर्थ संकल्प का तो सबको अनुभव होगा। विकल्प नहीं, व्यर्थ का अनुभव सभी को है। तो फास्ट गति होने के कारण उसको कन्ट्रोल नहीं कर पाते हैं। कन्ट्रोल खत्म हो जाता है। परेशानी या खुशी गायब होना या मन उदास रहना, अपने जीवन से मजा नहीं आना-ये व्यर्थ संकल्प की निशानियाँ हैं। कइयों को मालूम ही नहीं पड़ता कि मेरी स्थिति ऐसी हुई ही क्यों? वो मोटीमोटी बातें देखते हैं कि कोई विकर्म तो किया ही नहीं, कोई गलती तो की नहीं फिर भी खुशी कम क्यों, उदासी क्यों, क्यों नहीं आज जीवन में मजा आ रहा है! मन नहीं लग रहा है। कारण? विकर्म को देखते, विकल्प को देखते, बड़ी गलतियों को चेक करते लेकिन ये सूक्ष्म गलती व्यर्थ खज़ाने गँवाने की होती है। जरूर वेस्ट का, व्यर्थ गँवाने का खाता बढ़ा हुआ है। जैसे शारीरिक रोग पहले बड़ा रूप नहीं होता, छोटा रूप होता है लेकिन छोटे से बढ़तेबढ़ते बड़ा रूप हो जाता है और बड़ा रूप दिखाई देता है, छोटा रूप दिखाई नहीं देता है, वैसे ये व्यर्थ का खाता, गँवाने का खाता बढ़ता जाता, बढ़ता जाता। पाप का खाता अलग है, ये खज़ाने गँवाने का खाता है। पाप तो स्पष्ट दिखाई देता है तो महसूस कर लेते हो कि आज ये किया ना इसीलिये खुशी गुम हो गई। लेकिन व्यर्थ गँवाने का खाता, उसकी चेकिंग कम होती है। और आप समझते हो कि चलो, आज का दिन भी बीत गया, अच्छा हुआ, कोई ऐसी गलती नहीं की, लेकिन ये चेक किया कि अपने संकल्प के श्रेष्ठ खज़ाने को जमा किया या व्यर्थ गँवाया? यदि जमा नहीं होगा तो गँवाने का खाता होगा ना! अन्दर समझ में आता है कि बहुत कुछ कर रहे हैं, लेकिन खाता चेक करो-कि आज क्याक्या खज़ाना जमा किया? चेक करना आता है? अपना चेकर बने हो या दूसरे का चेकर बने हो? क्योंकि अपने को अन्दर से देखना होता है, दूसरे को बाहर से देखना होता है, वो सहज हो जाता है। तो बापदादा देख रहे थे कि जो विशेष श्रेष्ठ संकल्पों का खज़ाना है वह व्यर्थ बहुत जाता है। पता ही नहीं पड़ता है कि व्यर्थ गया या समर्थ है?

ब्रह्मा बाप को इकॉनॉमी का अवतार कहते हैं। आप सभी कौन हो? आप भी मास्टर हो या नहीं? इकॉनॉमी नहीं आती है? खर्च करना आता है! वैसे डबल फॉरेनर्स को लौकिक जीवन के हिसाब से जमा का खाता बनाना कम आता है। खाया और खर्चा, खत्म। बैंक बैलेन्स कम रखते हैं। लेकिन इसमें तो इकॉनॉमी का अवतार बनना पड़ेगा। तो बापदादा देख रहे थे कि जितना मिला है, जितना संकल्प का श्रेष्ठ खज़ाना जमा होना चाहिये उतना नहीं है, व्यर्थ का हिसाब ज्यादा देखा। अगर संकल्प व्यर्थ हुआ तो और खज़ाने व्यर्थ स्वत: ही हो जाते हैं। संकल्प व्यर्थ तो कर्म और बोल क्या होगा? व्यर्थ ही होगा ना! फाउण्डेशन है संकल्प। तो संकल्प को चेक करो। हल्का नहीं छोड़ो। ठीक है, सिर्फ दो मिनट ही तो हुआ, ज्यादा नहीं हुआ.... लेकिन दो मिनट में आप चेक करो कि कितने संकल्प चलते हैं? व्यर्थ संकल्प तो तेज होते हैं ना! एक सेकण्ड में आबू से अमेरिका पहुँच जायेंगे। वैसे पहुँचने में कितने घण्टे लगते हैं! तो इतनी फास्ट गति है, उस गति के प्रमाण चेक करो, अपने संकल्प शक्ति की बचत करो और फिर रात्रि को चेक करो। अगर अटेन्शन दे करके कोई भी चीज़ की बचत करते हैं तो चाहे बचत थोड़ी हो लेकिन बचत की खुशी एक्स्ट्रा होती है। अगर 10 पाउण्ड या डॉलर खर्च होना है और आपने एक पाउण्ड या डॉलर बचा लिया तो एक पाउण्ड की बड़ी खुशी होगी कि बचाकर आये हैं। तो अपने संकल्पों के ऊपर कन्ट्रोलिंग पॉवर रखो। ये नहीं कहो-चाहते तो नहीं थे, समझते तो हैं लेकिन क्या करें हो जाता है....। कौन कहता है हो जाता है? मालिक या गुलाम? मालिक के तो कन्ट्रोल में होते हैं ना। अगर मालिक को भी कोई धोखा दे दे तो वो मालिक है क्या? तो ये चेक करो-कन्ट्रोलिंग पॉवर है? एक तो बचत करो, वेस्ट के बजाय बेस्ट के खाते में जमा करो और दूसरा अगर बचत नहीं कर सकते हो तो व्यर्थ को समर्थ संकल्पों में परिवर्तन करो। यदि कन्ट्रोल नहीं हो सकता है तो परिवर्तन तो कर सकते हो ना? उसकी रफ्तार को जल्दी से चेंज करना। नहीं तो आदत पड़ जाती है। एक घण्टे को भी चेक करो तो एक घण्टे में भी देखेंगे कि 5-10 मिनट भी जो वेस्ट संकल्प जा रहे थे, वह 5 मिनट भी वेस्ट से बेस्ट में जमा हो गये तो 12 घण्टे में 5-5 मिनट भी कितने हो जायेंगे? और खुशी कितनी होगी? और जितना श्रेष्ठ संकल्पों का खाता जमा होगा तो समय पर जमा का खाता काम में आयेगा। नहीं तो जैसे स्थूल धन में अगर जमा नहीं होता तो समय पर धोखा खा लेते हैं। ऐसे यहाँ भी जब कोई बड़ी परीक्षा आ जाती है तो मन और बुद्धि खालीखाली लगती है, शक्ति नहीं लगती है। तो क्या करना है? जमा करना सीखो। अगले वर्ष अगर देखें तो सबके श्रेष्ठ संकल्पों का खाता भरपूर हो। खालीखाली नहीं हो। यही श्रेष्ठ संकल्पों का खज़ाना श्रेष्ठ प्रालब्ध का आधार बनेगा। तो जमा करना आता है? राजयोगी अर्थात् चेक करना भी आता और जमा करना भी आता। जिसका खाता जमा होगा उसकी चलन और चेहरा सदा ही भरपूर दिखाई देगा। ऐसे नहीं, आज देखो तो चेहरा बड़ा चमक रहा है और कल देखो तो उदासी की लहर-ऐसा नहीं होगा। सारे दिन में चेक करो तो आपके पोज कितने बदलते हैं? कभी चेक किया है? बहुत पोज बदलते हैं। बापदादा तो सबके पोज देखते हैं ना! कभीकभी देखते हैं कि कई बच्चे कर्म करने में इतना टाइम नहीं लगाते लेकिन किये हुए कर्म के पश्चाताप् में टाइम बहुत गँवाते हैं। फिर कहते हैं तीन दिन हो गये, खुशी गुम हो गई है। क्यों खुशी गुम हुई, कहाँ गई, कौन ले गया? खज़ाना तो आपका है लेकिन ले कौन गया? पश्चाताप् करना अच्छी चीज़ है, क्योंकि पश्चाताप् परिवर्तन कराता है लेकिन उसमें ज्यादा टाइम नहीं लगाओ। पश्चाताप् का रोना करेंगे तो सारा सप्ताह रोते रहेंगे। पश्चाताप् किया, बहुत अच्छा-लेकिन पश्चाताप् करना और प्राप्ति की खुशी लाना। आगे के लिये सेकण्ड में निर्णय करो कि ये करना है या ये नहीं करना है। पहले सुनाया है ना-नॉट और डॉट ये दोनों शब्द याद रखो। नॉट सोचा और डॉट लगाया। चार घण्टा रोते रहे, चलो पानी नहीं आया, अन्दर रोते रहे। आधा घण्टा पानी बहाया और चार घण्टा मन से रोया तो इतना पश्चाताप् नहीं करो। यह बहुत है। पश्चाताप् की भी कोई हद रखो।

बापदादा को डबल फॉरेनर्स की एक विशेषता बहुत अच्छी लगती है, रोना नहीं अच्छा लगता लेकिन एक विशेषता अच्छी लगती है। कौन सी? सच्ची दिल पर साहेब राजी। सच बताने में डरेंगे नहीं, छिपायेंगे नहीं। तो सच्ची दिल है इसके कारण बाप के डबल प्यार के भी पात्र हो। तो सच्ची दिल रखी, साहेब को तो राजी कर लिया लेकिन परिवर्तन भी फिर इतना जल्दी करना चाहिये। उसको बारबार अपने अन्दर में वर्णन नहीं करो-ये हो गया, ये हो गया....। हो गया, फिनिश। आगे के लिये अटेन्शन। लेकिन कभीकभी अटेन्शन के बजाय टेन्शन कर लेते हो, वो नहीं करना है। बड़े ते बड़ा जस्टिस बनो। यहाँ भी चीफ जस्टिस होते हैं ना, आप तो चीफ जस्टिस के भी चीफ हो। अपने प्रति जल्दी से जल्दी जस्टिस करो-राँग, राईट। राँग है तो नॉट और डॉट। ऐसा नहीं होता तो ऐसे होता, ऐसे नहीं करते तो ऐसा होता.... ये गँवाने का खाता जमा करते हैं। कमाई खत्म हो जाती, जमा का खाता खत्म होता। सोचो लेकिन व्यर्थ नहीं। और बचाकर दिखाओ-एक घण्टे से इतना बचाया, ये रिजल्ट दिखाओ कि व्यर्थ चालू हुआ लेकिन हमने चेंज किया और जमा किया। वेस्ट को बचाओ। ये बचत वा खाता बहुत खुशी दिलायेगा।

इस वर्ष बापदादा सभी के बचत का खाता भरपूर देखना चाहते हैं। कर सकते हो ना? तो अभी फास्ट गति से करना। क्योंकि टाइम भी तो फास्ट जा रहा है ना! फिर देखेंगे-इसमें नम्बरवन कौन जाता है? बचत का खाता किसका सबसे ज्यादा होता है? बचत के खाते में नम्बरवार कौनकौन होते हैं, वो लिस्ट निकालेंगे। और अगर आपने संकल्प को कन्ट्रोल किया तो औरों को कन्ट्रोल करने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। कई कहते हैं बोलना नहीं चाहते हैं लेकिन पता नहीं मुख से निकल गया। लेकिन जब बोल निकलता है या कर्म भी होता है तो पहले तो संकल्प आता है। अगर किससे क्रोध भी करना है तो पहले संकल्प में प्लैन बनता है-ऐसे करूँगा, ऐसे बोलूँगा, ये क्या समझता है.... प्लैन चलता है। फिर समय को भी उसमें यूज करते हैं। समय देखते रहेंगे कब आता है, कौन आता है....। तो संकल्प के खज़ाने के पीछे समय का खज़ाना भी वेस्ट जाता है। सम्बन्ध है। तो संकल्प को बचाने से समय को, बोल को बचाना स्वत: ही हो जायेगा।

अभी डायमण्ड जुबली मनाने के प्लैन बना रहे हो ना। तो डायमण्ड जुबली में बापदादा एक बच्चों का दृश्य देखना चाहते हैं। जैसे दीपावली होती है ना या कोई भी ऐसा बड़ा उत्सव होता है तो जगहजगह पर लाइट जगी हुई दिखाई देती है। देखा है ना? आप सबके देशों में बड़ा दिन तो होता होगा, तो कितने बल्ब या कुछ भी चीज़ जगमगाती है, यहाँ देखो तो जगमगा रहे हैं, वहाँ देखो तो जगमगा रहे हैं। ऐसे डायमण्ड जुबली में ये रीयल रूहानी डायमण्ड जगहजगह पर ऐसे चमकते हुए दिखाई दें जो सब अनुभव करें कि ये कौनसी चमक है। डायमण्ड तो चमकता है ना। चाहे मिट्टी में भी छिपाओ तो अपनी चमक नहीं गँवायेगा। तो जहाँ भी, जिस भी देश में, जिस भी स्थान पर रहते हो तो सभी को अनुभव हो कि ये जगमगाता हुआ डायमण्ड है। उन्हों को वायब्रेशन आये। जैसे लाइट कहाँ भी जगी हुई होती है, अच्छी सजावट होती है तो आप चाहो, नहीं चाहो लेकिन आपकी दृष्टि को आकर्षित जरूर करेगी। कितने डायमण्ड हैं और सारे वर्ल्ड में फैले हुए हैं। तो सारे वर्ल्ड के अन्दर जगमगाते हुए डायमण्ड अपनी चमक दिखायें-तो क्या दृश्य होगा! अच्छा लगेगा ना! इसका फोटो बापदादा निकालेंगे। क्योंकि आप तो सब जगहजगह जा नहीं सकते, बापदादा तो जा सकते हैं। ये कैमरा लेकर कहाँ जायेंगे! तो ऐसे चमकते हुए डायमण्ड्स का दृश्य विश्व में दिखाई दे। आरम्भ तो हो जाये कि कुछ चमत्कार है। पहले कुछ है तक पहुँचेंगे, फिर लास्ट में कहेंगे सब कुछ ये हैं। तो उसका आधार है-ये संकल्प का खाता जमा करना। छोटीछोटी बात में पुरूषार्थ करके थको नहीं। ईर्ष्या खत्म नहीं होती है, थोड़ासा क्रोध अभी भी आ जाता है, बोल निकल जाता है-एकएक बात में मेहनत नहीं करो। बीज को ठीक कर दो तो झाड़ आपेही ठीक हो जायेगा। इन सबका बीज तो संकल्प ही है ना। संकल्प श्रेष्ठ तो सब श्रेष्ठ हुआ ही पड़ा है। मेहनत करने की जरूरत ही नहीं है। नहीं तो मुश्किल लगता है ना-इतना अभी करना है! 10 साल हो गये, 20 साल हो गये, 40 साल, 50 साल हो गये, तो भी यह कमज़ोरी नहीं गई.... अगर फाउण्डेशन को चेक किया तो 4 सेकण्ड भी नहीं लगने चाहिये। फिर देखो आपकी मंसा सेवा कितनी फास्ट होती है! अभी मन्सा शक्ति वेस्ट जाती है, काम में नहीं लगती और जब बचत होगी तो काम में लगेगी ना। फिर मेहनत करने की भी जरूरत नहीं है। चलते फिरते लाइट हाउस, माइट हाउस अनुभव होंगे। लाइट हाउस एकएक के पास जाकर नहीं कहता, दूर से ही इशारा करता है-रास्ता ये है। तो आप सभी चमकते हुए डायमण्ड लाइट हाउस, माइट हाउस हो जायेंगे तो विश्व में अंधकार रहेगा क्या? ये पसन्द है या सिर्फ डायमण्ड जुबली के प्रोग्राम करेंगे और डायमण्ड जुबली पूरी हो गई। ऐसे तो नहीं! पहले स्व, फिर विश्व। देखो अभी भी आप लोगों का कहना और दूसरे बड़ेबड़े मण्डलेश्वर भी कहते हैं लेकिन आप लोगों के कहने का प्रभाव पड़ता है, दिल से लगता है क्योंकि आप करके फिर कहते हो। वो सिर्फ कहते हैं, करते नहीं हैं। तो सभी को फर्क लगता है ना। तो जो स्वयं करके और फिर कहता है उसका प्रभाव अलग होता है। यहाँ भी कहते हो ना कि जो फलानी बहन या भाई कहता है उसका दिल में लगता है और कोईकोई का सिर्फ भाषण सुन लिया, ठीक है। तो फर्क क्या है? सिर्फ कहना और करके कहना, उसका वाणी पर स्वत: ही प्रभाव हो जाता है। तो डायमण्ड तो सभी हो ना कि कोई सिल्वर है, कोई गोल्ड है, कोई डायमण्ड है? डायमण्ड तो हो ही सिर्फ थोड़ी चमक दिखाई दे। बापदादा को भी खुशी होती है कि बाप के खज़ाने में कितने डायमण्ड हैं और एकएक डायमण्ड कितना वैल्युएबल है। इतने रूहानी डायमण्ड कहाँ मिलेंगे, मिलेंगे किसी के पास? सारे अमेरिका, अफ्रीका में ढूँढकर आओ, मिलेंगे? और यहाँ देखो-कितने रीयल डायमण्ड बाप को मिले हैं। लेकिन ऐसे बनना जो वायब्रेशन की चमक फैले। ऐसे नहीं, अपने आपमें खुश रहो कि मैं तो डायमण्ड हूँ। जो सच्चा डायमण्ड होता है उसकी चमक कब छिप सकती है! कितना भी ऐसेऐसे करके दिखाओ तो भी चमक दिखाई देगी। आजकल तो बाहर के जो रीयल डायमण्ड कहते हैं ना वो रीयल नहीं हैं। आपके स्वर्ग के डायमण्ड रीयल हैं, उसके आगे तो ये कुछ भी नहीं हैं। तो रीयल डायमण्ड की निशानी है कि उसकी चमक फैलेगी। जैसे ये लाइट जलती है तो फैलती है ना! जितनी पॉवरफुल उतना फैलती है। तो वायब्रेशन द्वारा आप रीयल डायमण्ड की चमक फैले। जैसे देखो मधुबन में जब बाप के कमरे में जाते हो तो विशेष अनुभव होता है ना। चाहे जाने, न जाने, निश्चय हो या नहीं हो लेकिन साइलेन्स के वायब्रेशन तो लगते हैं ना! तो आपके साथियों को वायब्रेशन आये कि हाँ ये तो चमक रहे हैं। ऐसे नहीं कहे कि ये तो वैसे के वैसे ही हैं। पहले साथियों को वायब्रेशन आयेंगे तो दूर तक भी जायेंगे।

परिवर्तन शक्ति अच्छी है ना या कम है? जिसको परिवर्तन करना है तो टाइम नहीं लगता है, कि सोचते हो-करेंगे, देखेंगे! करना ही है, चाहे कोई करे या न करे, मुझे करना है। बहानेबाजी सबको बहुत अच्छी आती है। ऐसा कोई नहीं होगा जिसको बहानेबाजी नहीं आती हो। होशियार हैं। बहाने क्या बना येंगे-ऐसे हुआ तब ऐसा हुआ, इसने किया तब हुआ, वैसे मैं ठीक हूँ, इसने चलते हुए चोट मार दी तो गिर गई, चोट नहीं लगती तो नहीं गिरते लेकिन उसने चोट मार दी। आप अपने को क्यों नहीं बचा सकते! चोट लगाने वाले का काम है चोट लगाना, आपका काम है अपने को बचाना या ये बहाना बनाना कि इसने चोट लगाई तो गिर गये। बचाव करना अपना काम है या दूसरा करेगा? तो ये भी बहाने हैं। ये ठीक हो जायेगा ना तो देखना....। बहुत अच्छी मीठी मीठी बातें सुनाते हो-कल से ये हो जायेगा ना तो तीव्र पुरूषार्थी बन जायेंगे। कल फिर दूसरी बात आ जाती है तो कहते हैं परसों हो जायेगा। तो बहाने नहीं लगाओ। उड़ती कला की बाजी में नम्बर लो। बहानेबाजी में नम्बर नहीं लो। आपके साथी, सहयोगी बहुत अन्धकार में हो, चारों ओर अंधकार हो तो आप ये नहीं कह सकते कि अंधकार है ना इसलिये मैं रोशनी नहीं दे सकता। अंधकार के लिये ही तो आप रोशनी हो ना! अंधकार था इसीलिये ठोकर खा ली! कहाँ गये लाइट हाउस! अपने को भी लाइट नहीं दे सकते! तो वर्ष बीतता जा रहा है। अभी संकल्प में साधारण संकल्प नहीं करो, प्रतिज्ञा करो। शरीर जाये लेकिन प्रतिज्ञा नहीं जाये। कितना भी सहन करना पड़े, परिवर्तन करना पड़े लेकिन प्रतिज्ञा नहीं तोड़ो। इसको कहा जाता है दृढ़ संकल्प। सोचते बहुत अच्छा हो, बापदादा भी खुश हो जाते हैं। ये करेंगे, ये करेंगे, ये नहीं करेंगे-खुश तो कर देते हो लेकिन इसमें दृढ़ता द्वारा सदा शब्द एड करो। थोड़ा समय तो प्रभाव दिखाते हो। उसके लिये जैसे पहले सुनाया ना कि अपने को सदा इकॉनॉमी का अवतार समझो। साथसाथ इकॉनॉमी, एकनामी और एकान्तवासी। ज्यादा बोल में नहीं आओ। एकान्तवासी बनो। देखा जाता है जो बोल में सारा दिन आते हैं उनके संकल्प, समय सब खज़ाने ज्यादा वेस्ट होते हैं। एकान्तवासी का डबल अर्थ है। सिर्फ बाहर की एकान्त नहीं लेकिन एक के अन्त में खो जाना, एकान्त। नहीं तो सिर्फ बाहर की एकान्त होगी तो बोर हो जायेंगे, कहेंगे-पता नहीं दिन कैसे बीतेगा! लेकिन एक बाप के अन्त में खो जाओ। जैसे सागर के तले में चले जाते हैं तो कितना खज़ाना मिलता है। अन्त में चले जाओ अर्थात् बाप से जो प्राप्तियाँ हैं उसमें खो जाओ। सिर्फ ऊपरऊपर की लहरों में नहीं लहराओ, अन्त में चले जाओ, खो जाओ। फिर देखो कितना मजा आता है। तो सर्व खज़ानों में इकॉनॉमी करो, और एक बाप दूसरा न कोई, इसको कहते हैं एकनामी। ऐसे स्थिति में रहने वाले अपने सर्व खज़ानों को जमा कर सकेंगे, नहीं तो जमा नहीं होता है। तो इकॉनॉमी करना जानते हो ना? अच्छा!

जिससे ज्यादा प्यार होता है तो प्यार की निशानी होती है अपने से भी आगे बढ़ाना। तो बापदादा भी यही चाहते हैं कि हर बच्चा मेरे से भी आगे हो। यही प्यार की निशानी है। कोई में कोई कमी नहीं रहे। सब सम्पूर्ण और सम्पन्न हों। अगर सम्पन्न हैं तो सम्पूर्ण होंगे। तो डबल विदेशियों से तो डबल प्यार है ना! क्योंकि स्थापना के पार्ट में आप डबल विदेशियों की विशेष एक शोभा है। स्थापना के पार्ट का विशेष श्रृंगार हो। अभी देखेंगे कि जमा के खाते में अभी विदेश नम्बरवन लेता है या भारत वाले नम्बरवन लेते हैं? क्योंकि डबल विदेशियों में नेचरल संस्कार हैं जिस लाइन में भी जायेंगे तो तीव्र गति से जायेंगे, गिरेंगे तो भी तीव्र, चढ़ेंगे तो भी तीव्र। तो इस संस्कार को अभी जमा के खाते में तीव्र गति से लगाओ। छोटेछोटे जो स्थान हैं ना वो नम्बर और आगे लेना। अच्छा।

अफ्रीका: अफ्रीका वाले क्या करेंगे? बापदादा को अमेरिका, अफ्रीका बोलना बहुत अच्छा लगता है। तो अफ्रीका वाले क्या कमाल करेंगे? कौनसा नम्बर लेंगे? सारे अफ्रीका में जगमग हो जायेंगे। डायमण्ड्स चमकेंगे! तो संकल्प करो कि इस वर्ष विशेष दृढ़ता की विशेषता को हर संकल्प में प्रैक्टिकल में लायेंगे। तो अफ्रीका अर्थात् दृढ़ता की विशेषता। पसन्द है? करना पड़ेगा। ऐसे नहीं, पसन्द तो है....। लेकिन बाप को भी पसन्द आ जायेगा ना! तो अफ्रीका वाले इस विशेषता को सदा सामने रखना। चाहे साउथ है, चाहे कोई भी है, लेकिन दृढ़ता को नहीं छोड़ना।

अमेरीका: अमेरिका वाले कौनसी विशेषता को अपनायेंगे? (परिर्वतन करेंगे) बहुत अच्छा, इसमें एडीशन करना-फास्ट गति का परिवर्तन। कोई भी संकल्प में एकाग्रता की विशेषता श्रेष्ठ परिवर्तन में फास्ट गति लायेगी। अमेरिका में बाहर का टेन्शन बहुत है ना तो जितना बाहर का टेन्शन है उतना आप लोग एकाग्र, टेन्शन फ्री। एकाग्रता की विशेषता से फास्ट गति का परिवर्तन, ठीक है ना! अमेरिका वालों को पसन्द है! बापदादा के पास तो सबके फोटो हैं। देखेंगे अभी एकाग्र रहते हैं या सारे दिन में पोज बदलते हैं। बापदादा को भी निश्चय है कि होना तो इन्हों को ही है। होना ही है। ये एकाग्रता की विशेषता सदा साथ रखना। अच्छा!

यू.के., यूरोप: यू.के., यूरोप वाले क्या करेंगे? वायब्रेशन से सेवा करेंगे। वैसे लण्डन तो लाइट हाउस है ही। तो यूरोप से लाइट कहाँ तक जायेगी? विश्व तक या सिर्फ यूरोप तक? विश्व तक जायेगी, अच्छा! तो इस विशेषता को और प्रैक्टिकल में लाने के लिये सदा यह स्मृति में रखना कि सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है। सफल करना अर्थात् सफलता पाना। तो सफलता की शक्ति है? है ही सफलता, होगी या नहीं होगी, नहीं। तो सफलता के निश्चय की विशेषता सदा साथ रखो। सब जगह होना तो है ही लेकिन हिम्मत रखकरके मदद के पात्र बन, सफलता के जन्म सिद्ध अधिकार को अनुभव करते रहेंगे। होना ही है। ठीक है ना! अफ्रीका, अमेरिका, सब ठीक है। अच्छा!

ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया क्या करेगा? (इकॉनॉमी का अवतार बनेंगे) अच्छा, आस्ट्रेलिया अवतार बन जायेगा। बहुत अच्छा है। ऑस्ट्रेलिया में जो भी आयेंगे तो ऑस्ट्रेलिया की भूमि अवतारों की भूमि लगेगी। जब एक अवतार इतना कमाल करके दिखाता है तो ऑस्ट्रेलिया में इतने अवतार हैं तो क्या कमाल दिखायेंगे! अच्छी बात है, इसके लिये जो विशेषता धारण करनी है वो है दिव्यता। जितना जितना दिव्यता की शक्ति या विशेषता हर संकल्प में लायेंगे तो सहज ही अवतार भूमि बन जायेगी। ऑस्ट्रेलिया का नाम ही बदली हो जायेगा-अवतार भूमि। इतने अवतार आ गये! इतनी सारी क्रिश्चियन डिना यस्टी के लिये एक क्राइस्ट अवतार आया। यहाँ तो कितने अवतार होंगे तो अवतार भूमि बन जायेगी। ऑस्टेलिया का भविष्य बहुत ऊंचा है। ऑस्ट्रेलिया के सभी रत्न सदा बापदादा के सामने आते हैं। बीचबीच में थोड़ी आंख मिचौनी का खेल खेलते हैं। खेल अच्छा लगता है, लेकिन खेल खत्म, तो क्या होगा? सफलता। तो सदा दिव्यता ही अवतार की विशेषता है। दिव्यता की विशेषता से इस संकल्प को स्वरूप में लायेंगे। लाना ही है। अच्छा!

एशिया: जापान वालों ने तो परीक्षा पास कर लिया ना। जापान वाले भी आये हैं। हाथ उठाओ। तो एशिया वाले क्या करेंगे? (एकान्तवासी बनेंगे, बाबा को प्रत्यक्ष करेंगे) प्रत्यक्षता का सूर्य एशिया से प्रकट होगा, बहुत अच्छा संकल्प है। तो एशिया वाले प्रत्यक्षता का झण्डा वहाँ से पहले लहरायेंगे। अच्छी बात, छोटे सुभान अल्लाह होते हैं ना। देखो कितनी अच्छी हिम्मत रखी-एशिया से प्रत्यक्षता होगी। आपके मुंह में गुलाब जामुन। बहुत अच्छा संकल्प लिया है। तो इस संकल्प को सहज पूर्ण करने के लिये पहले पवित्रता की शमा चारों ओर जलानी पड़े। जैसे वो शमा ले करके चक्कर लगाते हैं ना तो आपको पवित्रता की शमा चारों ओर एशिया में जगमगानी पड़ेगी तभी सब बाप को देख सकेंगे, पहचान सकेंगे। तो पवित्रता की शमा सदा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जलती रहे। जरा भी हलचल में नहीं आये, अचल। जितनी अचल पवित्रता की शमा होगी उतना सहज सभी बाप को पहचान सकेंगे और पवित्रता की जयजयकार होगी। समझा! अच्छा!

मॉरिशिस: मॉरिशियस भी छोटा है लेकिन कमाल करता है। तो मॉरिशि यस वाले क्या करेंगे? मॉरिशियस की चमक इतनी होगी जो जल्दी भारत में पहुँचेंगी। नजदीक है ना। तो मॉरिशियस की चमक भारत के कुम्भकरण को जगा देगी ना। कोई नहीं जागता है तो लाइट जलाकर उसको जगा देते हैं ना। तो मारिशियस वाले पहले सदा एकरस चमक के लिए सत्यता की शक्ति का झण्डा लहराओ। बाप सत्य है, ज्ञान सत्य है, आत्मा भी सत्य है और ब्राह्मण जीवन भी सत्य है। तो सत्यता का झण्डा पहले लहराना पड़ेगा तब इस सत्यता की विशेषता से चमक बढ़ेगी और भारत क्या, सारे विश्व तक फैलेगी। ठीक है ना!

रशिया: रशिया वाले भी रेस तो कर रहे हैं। रशिया वाले हाथ उठाओ। वो इकट्ठे ही बैठते हैं। इन्हों का आपस में बहुत प्यार है। एक जायेगा ना, तो सारी लाइन जायेगी। संगठन की शक्ति की प्रैक्टिस इन्हों की अच्छी है। तो रशिया वाले क्या कमाल दिखायेंगे? (अडोलता की शक्ति धारण करेंगे) फिर तो सारी रशिया को किनारा मिल जायेगा। बहुत अच्छा है। तो सारे विश्व में सच्चा सहारा कौन-यह झण्डा लहरायेंगे। क्योंकि सहारे तो समय प्रति समय बहुत आये हैं लेकिन सहारे ने किनारे में नहीं पहुँचाया है। तो सच्चा सहारा कौन है जिससे किनारा मिलना ही है, निश्चित है। तो जो सहारा स्वयं लिया है उस सहारेदाता बाप को प्रत्यक्ष करके सबको किनारे लगायेंगे। अच्छी बात है। तो सहारे दाता कौन-यह झण्डा लहराना।

मिडिल ईस्ट: मिडिल ईस्ट वाले क्या करेंगे? (असम्भव को सम्भव करेंगे, राष्ट्रपति को लायेंगे) तो विदेश का पहला राष्ट्रपति यही आयेगा। हिम्मत तो अच्छी रखी। अभी पहले असम्भव से सम्भव ये करो कि खुले रूप से सेन्टर खुल जाये। है तो सम्भव ना! लेकिन असम्भव को सम्भव करने वाले युक्ति युक्त, युक्ति के बिना भी मुक्ति नहीं होनी है। इसीलिये युक्तियुक्त ऐसा प्रयत्न करो जो सभी आवाज निकालें कि अल्लाह आ गया। हिम्मत अच्छी रखी है। और हिम्मत वालों को मदद तो बाप की है। इसलिये युक्ति से आगे बढ़ते चलो। युक्ति को नहीं छोड़ना। जाकर प्रभातफेरी निकाल लो-ऐसे नहीं करना। अभी तो गुप्त है ना। पाण्डवों के लिए प्रसिद्ध है कि पराये राज्य में गुप्त में रह कार्य किया। तो अभी गुप्त का पार्ट धीरेधीरे खुलता जा रहा है।

तो सब खुश हो? ज्ञान सरोवर पसन्द है। पसन्द है, ये तो नहीं सोचते हो कि मधुबन में सीट खाली हो तो आ जायें। अगले वर्ष डबल विदेशियों को ज्ञान सरोवर ही देंगे। ठीक है? पसन्द है? (दादियाँ भी रहेंगी) आपके साथ दादियाँ भी रहेंगी। बापदादा तो आ सकते हैं लेकिन हाल ही छोटा बनाया है। हाँ कोई युक्ति से हाल को बड़ा करो, कम से कम 3 हजार तो बैठ सकें। कोई इन्वेन्शन करो। बापदादा तो तलहटी में भी आ रहे हैं। हाल सुन्दर बहुत बनाया है लेकिन सिर्फ छोटा बना दिया। देखो दादियाँ अगर वहाँ रहें तो डबल विदेशी मधुबन वाले, मधुबन की टोटल सात भुजायें हैं, सभी वहाँ बैठ तो सकें, मुरली तो सुन सकें। अभी कितने बैठ सकते हैं? (16-17 सौ) 16-17 सौ तो डबल विदेशी हो जाते हैं। कोई इन्वेन्शन करो, बापदादा आयेंगे। (लण्डन में भी बापदादा आयेंगे? ) अभी लण्डन का टर्न पीछे है। पहले लण्डन में बापदादा आयें तो इतनी टिकट कटवायेंगे? कितने चार्टर करेंगे? जम्बो प्लेन करेंगे, वो भी कितने? इतने सारे इकट्ठे करके दिखाओ, मधुबन बनाकर दिखाओ। यहाँ इण्डिया में आते हैं तो दोनों (देशय्विदेश) होते हैं। इसीलिये कहा ना कि उसमें थोड़ा टाइम पड़ा है। एयर इण्डिया के जो सारे डिपार्टमेन्ट हैं ना उनको आप समान बनाओ तो सब टिकट फ्री देवें। आखिर तो आप लोगों के ही सब काम में आना है। थोड़ा झण्डा लहराओ तो सब खुद ही ऑफर करेंगे। अच्छा!

(आज बापदादा को ज्ञान सरोवर में आने की एप्लीकेशन दी गई थी लेकिन बापदादा मधुबन में ही आये)

मधुबन निवासियों प्रति: विशेष मधुबन के कारण ही बापदादा यहाँ आये हैं। क्योंकि मधुबन वालों ने अपने तनमन से, सम्बन्धसम्पर्क से अथक सेवा की है। सेवा में मधुबनवासियों को बहुत अच्छे नम्बर मिलते हैं। लेकिन जैसे सेवा की सब्जेक्ट में अच्छे मार्क हैं ऐसे डायमण्ड जुबली में मधुबनवासीज्ञानयोगधारणा इन तीन सब्जेक्ट में भी विशेष नम्बर लेवें। जैसे सेवा के गीत सब गाते हैं, सारा विश्व मधुबन निवासियों की सेवा के गीत गाता है, ऐसे धारणा में और सब्जेक्ट में नम्बर हैं, लेकिन और ज्यादा लेवें। मंजूर है? मधुबन वाले हाथ उठाओ। मधुबन वालों का खज़ानों के बचत का खाता नम्बरवन हो। होना है। बाकी अच्छे भाग्यवान आत्मायें हैं। मधुबन निवासी बनना भी एक्स्ट्रा भाग्य का मेडल है। क्यों? रहने की सिर्फ बात नहीं है। लेकिन अनेक प्रकार के चांस मधुबन में मिलते हैं। तो मधुबनवासी बनना अर्थात् अनेक गोल्डन चांस लेना। इसीलिये बापदादा मधुबन निवासियों का भाग्य देख हर्षित होते हैं-वाह भाग्यवान, वाह!

हॉस्पिटल: हॉस्पिटल भी वृद्धि कर रही है और जितना जितना दिल से सेवा करते हैं, तन से सेवा सभी करते हैं लेकिन यहाँ दिल से सेवा करना अर्थात् दिल की दुआयें देना। तो जो दिल से सेवा करते हैं वो बापदादा के दिल पर नम्बर आगे रहते हैं। रहते तो सभी हैं लेकिन नम्बर आगे और पीछे तो होगा ना! तो दिल से सेवा करने वाले हॉस्पिटल निवासियों को सदा ही नम्बर आगे लेना है। बढ़ रहे हैं, बढ़ते रहेंगे। क्योंकि आवश्यकता भी बढ़नी है। तो मधुबन की, माउण्ट आबू की हॉस्पिटल सबके लिए और आसपास वालों के लिए भी एक सहारा अनुभव होगी कि अगर सहारा मिलना है तो यहीं मिलना है। तन और मन दोनों का। तो मधुबन की हॉस्पिटल भी अनेक आत्माओं के तन और मन का सहारा है और बनती रहेगी। इसलिये सेवा की मुबारक है। लेकिन और भी मुबारक लेने के लिये प्लैन बनाते चलो। समझा? अच्छा, जो भी हैं तलहटी वाले हैं, म्युजियम वाले हैं, आबू निवासी हैं, पीसपार्क वाले, संगम भवन वाले, ऐसे और भी हैं, देखो मधुबन की भुजायें कितनी है? अभी सात भुजायें हैं, ये जो ज्ञान सरोवर है आठवीं भुजा है। तो मधुबन अष्ट भुजा हो गया। तो अष्ट भुजाओं को विशेष यादप्यार।

भारत तो है ही, अभी भारत का मेला लगना है। बापदादा को भारत ही पसन्द आया, लण्डन का रिट्रीट हाउस नहीं। जब रेस्ट करेंगे ना तो परमधाम के रिट्रीट हाउस में जायेंगे। तो भारतवासियों से विशेष बाप का प्यार है और भारतवासियों को भी विशेष नाज़ है, नशा है कि स्वर्ग भी विशेष तो भारत ही बनेगा और बनाने वाला बाप भी भारत में ही आते हैं। और स्टोरी भी विशेष तो आदि से अन्त तक भारत की है। तो भारत अविनाशी खण्ड है। इसीलिये भारतवासी सबसे नम्बरवन अखण्ड, अचल, अडोल स्थिति वाले बनने ही हैं। अच्छा।

(टीचर्स ट्रेनिंग का प्रोग्राम चल रहा है) प्रोग्राम अच्छा चला? प्रोग्राम तो अच्छा रहा और प्रोग्रेस क्या रही? क्योंकि टीचर्स निमित्त हैं। अगर निमित्त टीचर्स सदा शक्तिशाली हैं तो आने वाले भी सहज शक्तिशाली बनते हैं। अगर टीचर्स हलचल में आती हैं, तो चाहे कोई देखे, नहीं देखे, सुने, नहीं सुने, लेकिन टीचर्स वायब्रेशन ऑटोमेटिक जाता है। आप देखेंगे जैसी टीचर होगी वैसी विशेषता स्टूडेन्ट में भी होगी। अगर कोई रमणीक टीचर है तो स्टूडेन्ट भी रमणीक होंगे, अगर टीचर ऑफिशल है तो स्टूडेन्ट भी आफिशल होंगे, योग की इन्ट्रेस्ट ज्यादा है तो स्टूडेन्ट भी ऐसे होंगे, अगर कल्चरल प्रोग्राम करने वाली है तो स्टूडेन्ट भी ऐसे होंगे। तो टीचर्स विशेष आधार है। तो टीचर्स के फीचर्स काम करते हैं। बोले, नहीं बोले, लेकिन उसके फीचर्स बोलते हैं, छिप नहीं सकते। तो टीचर्स को समझना है कि हम फाउन्डेशन हैं, निमित्त हैं। फाउण्डेशन वैसे तो बापदादा है लेकिन सेवा प्रति निमित्त हैं। तो निमित्त भाव, करनकरावनहार की स्मृति-ये टीचर्स को सदा ही सहज आगे बढ़ाती है। तो टीचर्स माना सिर्फ मुख से सेवा करने वाले नहीं, टीचर्स अर्थात् अपने फीचर्स से भी सेवा करें। ऐसे दिव्य फीचर्स, मुस्कराते हुए फीचर्स, अचलअडोल के फीचर्स वो सेवा करते हैं। तो सिर्फ ये नहीं देखो-कोर्स तो अच्छा करा लिया, सप्ताह कोर्स भी करा लिया, पॉजिटिव का भी करा लिया और भी सारे पाठ पढ़ा लिये लेकिन फीचर्स से सेवा की? फीचर्स से सेवा अर्थात् प्रैक्टिकल लाइफ में बल देना। तो प्रैक्टिकल लाइफ का बल दिया या सिर्फ पाठ पढ़ाया? तो डबल सेवाधारी बनना अर्थात् नम्बरवन टीचर बनना।

अच्छा, जो भी जहाँ से आये हो, सबको बहुतबहुत आने की मुबारक हो और यादप्यार। क्योंकि सभी को मालूम है कि डबल विदेशियों की इस वर्ष की सीजन का ये लास्ट चांस है। तो सभी ने अपने पत्र और कार्ड भी भेजे हैं। बापदादा के पास तो वहाँ लाइन लगी हुई है, आकर देखना। तो जो भी कार्ड या यादप्यार भेजते हैं, अपने अवस्था के बारे में समाचार देते हैं, सुनाया ना कि डबल विदेशी छिपाते नहीं हैं, छोटीसी बात भी होगी ना तो सच सुना देंगे, छिपाते नहीं हैं। तो सच्ची दिल की विशेषता है। इसीलिये पत्रों में भी समाचार बहुत देते हैं। सेवा का भी देते हैं, अवस्था का भी देते हैं, खुशी का भी देते हैं और फिर ग्रीटिंग्स के कार्ड भी बहुत भेजते हैं। बापदादा के पास सबकी ग्रीटिंग्स बड़े दिल में समा जाती है। जिन्होंने भी अपने विशेष नाम से कार्ड भेजे हैं या पत्र भेजे हैं या सन्देश भेजे हैं, जो आते हैं वो भी सन्देश लेकर आते हैं-हमारे क्लास वालों ने बहुतबहुत याद दी है, तो जिन्होंने सन्देश भेजा है उन सभी को बापदादा आने वाले डायमण्ड जुबली की विशेष डायमण्ड बनने की एडवांस मुबारक दे रहे हैं।

चारों ओर के रूहानी सच्चे डायमण्ड आत्माओं को, सदा इकॉनॉमी के अवतार विशेष आत्माओं को, सदा एकनामी, एकान्तप्रिय विशेष आत्माओं को अपने वायब्रेशन वृत्ति की चमक से विश्व में प्रकाश फैलाने वाले चमकती हुई आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से - सब कार्य सफल हुए ही पड़े हैं। सफलता स्वरूप आत्मायें निमित्त हो। आप सभी निमित्त आत्मायें कौनसे सितारे हो? सफलता के सितारे हो ना! ये सारा संगठन सफलता के सितारे हैं। यह सारा संगठन ब्राह्मण परिवार के तारा मण्डल में सफलता के सितारे चमकते हुए हैं।

(बापदादा ने दादी जी को अपने पास बिठाया) सब आपको देखकर खुश होते हैं। मीठीमीठी ईर्ष्या तो नहीं होती, हम भी बैठें! प्यार है, ईर्ष्या नहीं है। तो प्यार अच्छा लगता है ना! क्योंकि आप सबके आगे साकार में सेम्पल तो यही हैं ना तो सेम्पल को देख करके सौदा करना सहज होता है। बापदादा ये नहीं समझते हैं कि ये 10-12 बैठे हैं, बापदादा सभी के साथ हैं। निमित्त ये हैं लेकिन आप सभी साथ हो। साथ का वायदा अन्त तक है और साथ ही चलेंगे। नीचे बैठे हो या ऊपर बैठे हो, और ही सामने बैठे हो। अच्छा है डबल विदेशियों ने भी डबल विदेशियों की सेवा अच्छी की। जो निमित्त बने हैं उन्होंने अच्छी सेवा की। तो ऐसा बनाया है जो कभी कोई रोयेगा नहीं? मन में भी नहीं! कि छिपकर बाथरूम में रोकर आयेंगे? रोना बन्द हो गया ना! जब परीक्षा आती है ना फिर देखो थोड़ासा चेहरा बदलता है। फिर भी बहुत अच्छे हो। थोड़ाथोड़ा रोते हो, खेल दिखाते हो फिर भी अच्छे हो। बाप को पहचान लिया-ये कमाल कम नहीं की! डायमण्ड तो हैं और भी जो कुछ कमी हो वह सम्पन्न करनी है। डायमण्ड जुबली मनाने का अर्थ सिर्फ ये नहीं है कि सिर्फ प्रोग्राम कर लिये। डायमण्ड बन डायमण्ड बनने का मैसेज देना है। अपने प्रत्यक्ष प्रमाण से सेवा करना-ये है डायमण्ड जुबली। नहीं तो दूसरे को डायमण्ड बनाया और स्वयं डायमण्ड नम्बरवन नहीं तो देखने वाले क्या कहेंगे? अच्छा।

विदेश मुख्य टीचर्स बापदादा के सामने आई तो बापदादा ने सभी से पूछा:

ये तो नहीं सोचते हो कि इण्डियन को ही बुलाया जाता है। कभी ये सोचते हो कि इण्डियन बहनों को ही क्यों आगे किया गया है? संकल्प आता है? नहीं आता? थोड़ाथोड़ा! देखो, आपके पालना के लिये भारत से ही भेजना पड़ा ना। और भारत से आये तब आप आगे आये। वैसे विदेश से भी जो विशेष टीचर्स निकली हैं वो भी बहुत अच्छी निकली हैं, और अच्छी सेवा कर रही हैं। ऐसे नहीं है जो स्टेज पर हैं वो बापदादा के सामने हैं। चाहे नीचे बैठे हैं चाहे अपने स्थान पर बैठे हैं लेकिन बापदादा के साथ हैं। इन्हों के साथी आप सभी हो। अगर आप अपनी भाषा से सेवा नहीं करते तो वृद्धि भी नहीं होती। इतने सेन्टर्स नहीं खुल सवते थे। यह तो गिनती वाले हैं। इतने सेवाकेन्द्र जो खोले हैं वो किसने खोले हैं? आप लोगों ने ही तो निमित्त बनकर खोले हैं, इसीलिये निमित्त और थोड़े ही बैठ सकते हैं तो सेम्पुल थोड़ों को बिठाया जाता है, लेकिन हो आप सभी। समझा! बापदादा ने देखा है कि जिस भी तरफ इण्डियन सिस्टर नहीं हैं तो मांगनी करते हैं इण्डियन दो। अच्छा, तो सभी ने अच्छी सेवा की है इसकी मुबारक। अच्छा सम्भालते हैं। इसीलिये अभी केसेस कम होते हैं। पहले होते थे। अभी सम्भल गये हैं और सम्भाल लेते हैं। दोनों ही बाते हैं। विदेश के सेवाधारियों की भी बहुत अच्छी माला है। जैसे दादियों में प्यार है तो निमित्त बनने वाली आत्माओं में भी प्यार है। अच्छा, सब खुश है ना? तो बापदादा भी सभी बच्चों के लिये गीत गाते हैं-वाह बच्चे वाह! अच्छा।