31-03-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


परमात्म मिलन मेले की सौगात - ताज, तख्त और तिलक

आज बेहद का बाप बेहद में सभी बच्चों को देख रहे हैं। बेहद का बाप है और आप सभी भी बेहद के मालिक सो बालक हो। बापदादा सभी स्नेही सहयोगी बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं और बच्चे बाप को देखकर हर्षित हो रहे हैं। बाप को ज्यादा खुशी है वा बच्चों को ज्यादा खुशी है-क्या कहेंगे? दोनों को! इसको कहा जाता है परमात्म मिलन मेला। मेले तो बहुत होते ही हैं लेकिन परमात्म मिलन मेला एक ही संगमयुग पर होता है। सारे कल्प में नहीं हो सकता है। अब हो रहा है और होगा। आप सबको भी मेला अच्छा लग रहा है ना! बापदादा तो बच्चों के भाग्य को देख हर्षित होते हैं और दिल में गीत गाते हैं-वाह बच्चे वाह! जो भाग्य स्वप्न में भी न था, संकल्प में भी नहीं था लेकिन अब साकार में श्रेष्ठ भाग्य अनुभव कर रहे हैं। हर एक के मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर चमक रही है। सभी चमकते हुए सितारे हो ना? अपना ये श्रेष्ठ भाग्य स्मृति में रहता है ना! क्यों श्रेष्ठ भाग्य है? क्योंकि भाग्य विधाता द्वारा आप भाग्यवान आत्माओं का दिव्य ब्राह्मण जन्म हुआ है। बाप को भी भाग्य विधाता कहते हैं और ब्रह्मा को भी भाग्य विधाता कहते हैं। और आप सबका जन्म बापदादा द्वारा हुआ है। तो जिसका बाप स्वयं भाग्य विधाता है उसका भाग्य कितना श्रेष्ठ होगा! परमात्म मिलन मना रहे हो ना! (डबल फॉरेनर्स से) ये भी मना रहे हैं! बेहद के मेले में अगर डबल विदेशी नहीं होते तो बेहद का नहीं कहा जाता। तो आप लोगों का भी विशेष पार्ट है, जो बाप और सर्व बच्चे देखदेख हर्षित होते हैं। भाग्य विधाता द्वारा जन्म होना-ये सबसे नम्बरवन भाग्य है। साथसाथ सारे कल्प में किसी भी जन्म में एक ही परमात्मा बाप भी बने, शिक्षक भी बने, सतगुरू भी बने और सर्व सम्बन्ध भी निभाये-ऐसा सतयुग से कलियुग तक किसको भाग्य मिला है? और अभी आपको मिला है! अभी आप निश्चय और नशे से कहते हो कि हमारा पालनहार परम आत्मा है। दुनिया वाले कहने मात्र कहते हैं कि परमात्मा ही पाल रहा है लेकिन आप प्रैक्टिकल अनुभव से कहते हो कि परमात्मा बाप है और बाप ही पालनहार है, पालना कर रहे हैं! नशा है ना या थोड़ाथोड़ा भूल जाते हो? चलतेचलते अपने श्रेष्ठ भाग्य को साधारण समझ लेते हो, है श्रेष्ठ लेकिन समझ साधारण लेते हो। इसलिए जो नशा और खुशी की झलक सदा होनी चाहिये, वह नहीं रहती। वैसे एक सेकण्ड भी भूल नहीं सकते लेकिन कॉमन समझ लेते हो कि बाप मिल गया, हमारा हो गया, हम भी बाप के हो गये....... जब हमारा है तो नशा (फखुर) होना चाहिये ना? लेकिन कभी ऊंचा तो कभी मध्यम, कभी साधारण हो जाता है। सोचो, हमारा बाप परम आत्मा है! और फिर शिक्षक डायरेक्ट परम आत्मा है! क्या शिक्षा दी? आपको क्या बना दिया? त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ। ऐसी कोई पढ़ाई पढ़ता है! अभी तक ये डिग्री सुनी है? जज बैरिस्टर, डॉक्टर, इंजीनियर ये तो सब डिग्रीज देखी हैं लेकिन त्रिलोकीनाथ, त्रिकालदर्शी, त्रिनेत्री, नॉलेजफुल....ऐसी डिग्री देखी है? द्वापर से कलियुग तक किसको मिली है? आपको मिली थी? आपने भी तो 63 जन्म लिये हैं। तो न किसको मिली है, न मिलनी है। ऐसा शिक्षक हमारा है। साइंस वाले साइंस की कितनी भी योजना करें तो भी त्रिलोक तक नहीं पहुँच सकते। तीनों लोकों का नॉलेज प्राप्त हो नहीं सकता। और आपमें तो 5 वर्ष का बच्चा भी तीन लोकों की नॉलेज देता है! वो भी फलक से कहेगा-हाँ, सूक्ष्म वतन है, मूल वतन है। तो परम आत्मा शिक्षक भी है। श्रेष्ठ शिक्षा से ये डिग्री तो प्राप्त कराई लेकिन दुनिया में सबसे बड़े ते बड़ा पद राज्य पद होता है। तो पढ़ाई से पद भी मिलता है ना! तो आपको राजा बनाया है? अभी राजा हो या बनना है? हो राजा और बैठे पट में हो! पक्का मकान भी नहीं, टेन्ट में बैठे हो! तो देखो श्रेष्ठ में श्रेष्ठ पद राजपद है। अभी भी स्वराज्य अधिकारी हो और भविष्य में भी विश्व राज्य अधिकारी बनना ही है। ये पक्का है ना? किसको राज्य करना है? आप राज्य करेंगे कि आपके ऊपर कोई राजा राज्य करेगा? नहीं। ये सब इतने राजा बन जायेंगे! इतने सब राज्य करेंगे! प्रजा भी तैयार की है या अपने ऊपर ही राज्य करेंगे? तो अपना भाग्य देखो-परम आत्मा मेरा शिक्षक है, राज्य पद देने वाला। और फिर सतगुरू बन..... गुरू क्या करते हैं? मन्त्र देते हैं ना। तो सतगुरू ने क्या मन्त्र दिया? मनमनाभव। सतगुरू द्वारा महामन्त्र भी मिला और सर्व वरदान भी मिले। कितने वरदान मिले हैं? वरदानों की लिस्ट देखो कितनी लम्बी है! रोज वरदान मिलता है ना! कितने समय से मिल रहे हैं! इतने वरदान कोई भी फॉलोअर को कोई गुरू दे ही नहीं सकते। ऐसा सतगुरू जो रोज वरदान दे, ऐसा देखा? अभी नशा है ना! (हाँ जी) बहुत अच्छा। सदा रखना। ऐसे नहीं, यहाँ से बस में जाओ तो नशा उतरना शुरू हो जाये। सदा बढ़ता रहे।

बापदादा सभी बच्चों को सदा ही हर सब्जेक्ट में नम्बरवन देखना चाहते हैं। तो नम्बरवन हो कि अभी बनना है? नशे से कहो कि हम नहीं होंगे तो कौन होगा! विदेशियों को डबल नशा है ना! अच्छा है। बाप भी खुश होते हैं कि एकएक मेरा बच्चा राजा बच्चा है। प्रजा नहीं है। प्रजा तो पीछे आने वाली है। आप तो फिर भी लक्की हो जो इतना भी मिलने का चांस मिला है। टेन्ट में रहना पड़ा तो क्या हु। मिट्टी पर तो नहीं सो रहे हो ना, गदेले पर सो रहे हो। ब्रह्मा भोजन तो अच्छा मिलता है ना? मिट्टी वाला तो नहीं मिलता? प्यार से खाते हो ना? थोड़ा बहुत तो होता ही है, होना ही है। क्यों? माया और प्रभु का खेल साथसाथ चल रहा है। अगर परमात्मा द्वारा मेला हुआ तो माया भी झमेला जरूर करती है। आपका काम है मेला करना, उसका काम है झमेला करना। तो झमेला भी हुआ और मेला भी हुआ। (किसी ने कहा आंधी चली) कोई बात नहीं। आपके पुरूषार्थ की आंधी है और ये हवा की आंधी है। घबराते तो नहीं हो ना कि क्या हो गया? नहीं, आंधी आये या बरसात आये, कितनी भी हलचल हो लेकिन आपका मन अचल है ना? मातायें घबरा तो नहीं गई, टेन्ट उड़ गया, क्या करें? थोड़ाथोड़ा घबराये, क्या होगा, तबियत अच्छी रहेगी, नहीं रहेगी? कुछ भी हो भक्ति से तो धक्के और मेहनत कम ही है ना। भक्ति के धक्के तो नहीं खाते हो ना, मजे में रहते हो ना! तो ये मेला अच्छा लगा या झमेला देखकर घबरा गये? नहीं, कोई नहीं घबराये? एकदो तो घबराये होंगे? मजा आ रहा है? और भी दो दिन रखें? अच्छा। बापदादा भी माया का झमेला देख चक्कर लगाते रहते हैं। खेल देखते हैं-बच्चे क्या करते हैं और माया क्या करती है?

बापदादा को बच्चों का स्नेह देख खुशी है। स्नेह ने मेला रचाया है। बाप का भी स्नेह है तो बच्चों का भी स्नेह है, दोनों मिल गये तो क्या हो गया? मेला। दृश्य भी कितना अच्छा लग रहा है। ऐसा कभी सोचा था-इतना बड़ा परिवार मिलेगा और इतना परिवार किसको होगा? आपके घर कितने हैं? (एक है) और आपके सेवा के स्थान कितने हैं? (अनेक हैं) तो उसको भी तो बाबा का घर कहते हो ना! तो बाबा का घर आपका घर है। दुनिया कहती है घरबार छोड़ते हैं और आपने कितने घर बनाये हैं! गिनती नहीं कर सकते हो, याद रखना पड़ता है। तो ये छोड़ना नहीं है, बनाना है। और परिवार को छोड़ा है या परिवार इतना बड़ा बनाया है जो मिलना ही मुश्किल होता है। सारे ब्राह्मण जितने भी जहाँ भी हैं, एक स्थान पर मिल सकते हैं? मुश्किल होगा ना। क्योकि दूसरे का राज्य है ना, अपना राज्य तो नहीं है। लेकिन बाप मिला, बेहद का परिवार मिला। तो बेहद को याद करने से बेहद की खुशी, बेहद का नशा होगा। अगर हद में समझते हैं-मैं तो फलाने देश में हूँ, फलाने देश का हूँ, फलाने जोन का हूँ तो हद होती है लेकिन ये तो निमित्त मात्र निशानी के लिये कहते हैं-ये फलाना जोन, ये फलाना स्थान। बाकी अपने को बेहद का समझते हो ना। नियम भी रखने पड़ते हैं। कई ऐसे भी सोचते हैं कि ये क्या बैज लगाओ तभी खाना मिलेगा। आपको खाने पर तंग करते हैं ना? लेकिन ये करना ही पड़ता है। क्योंकि कायदे में फायदे हैं। ये बंधन नहीं है लेकिन विघ्नों से निर्बन्धन बनाने का साधन है। ये क्या नई बात निकाली-ये नहीं सोचना। संकल्प तो बाप के पास पहुँचते हैं ना। लेकिन मर्यादा पुरूषोत्तम आप ही हो ना। या सिर्फ बड़ी दादियां मर्यादा पुरूषोत्तम हैं, आप फ्री हो? मर्यादा पुरूषोत्तम अर्थात् मर्यादा के अन्दर रहने वाले, चलने वाले। हाँ जी का पाठ पक्का है ना? अच्छा! और जब कोई बात हो जाती है तो हाँ जी होता है या ना जी भी होता है? जब कोई ऐसी बात करते हैं तो हाँ जी के बदले फिर ना जी में इतने पक्के हो जाते हैं जो बाप भी कहे तो भी नहीं सुनेंगे। जैसे स्थापना में जब छोटेछोटे बच्चे आये तो बापदादा उन्हों को पाठ पक्का कराने के लिये हमेशा कहते रहे कि ना करना माना नास्तिक, हाँ करना माना आस्तिक। तो आप सब कौन हो? आस्तिक हो। नास्तिक तो नहीं हो ना! कभीकभी बन जाते हो। खेल करते हैं! माया के भी नॉलेजफुल हो गये! क्योंकि माया भी नॉलेजफुल है। गिराने में माया नॉलेजफुल है और उड़ने में आप नॉलेजफुल हो। तो माया भी देखती है कि इसकी उड़ान थोड़ी नीचेऊपर हो गई है तो देख करके वार करती है। और आप नॉलेजफुल होने के कारण जान जाते हो, तो हार नहीं खाते हो लेकिन विजय का हार गले में पड़ा। सबके गले में विजय की माला है या कभीकभी उतार देते हो? अच्छा।

पीछे वाले मौज में हो? यह भी मधुबन की ही एरिया हुई ना, तो सिवाए मधुबन के और कहाँ इतना बड़ा मेला हो सकता है? नहीं हो सकता ना। तो मधुबन है बेहद का घर। यहाँ सब बेहद है और और जगह फिर भी सब देखना पड़ता है और यहाँ संकल्प किया और हो गया। तो सभी अपने भाग्य द्वारा परमात्म मेले में पहुँच गये। जो पहले बारी इस कल्प में आये हैं वो हाथ उठाओ। (करीब 13-14 हजार भाई बहिनों की सभा है, उसमें बहुत से नये भाईबहिनें हैं) अच्छा है, टी.वी. में देख रहे हो। ये भी देखो मैजारिटी साइन्स के साधन अभीअभी निकले हैं। कुछ वर्ष पहले ये साइन्स के साधन भी नहीं थे। लेकिन किसके लिये निकले हैं? आपके लिये। बापदादा भी साइन्स वाले बच्चों को मुबारक देते हैं। क्योंकि बाप के बच्चे उससे सुख तो ले रहे हैं ना। तो कितना अच्छा लग रहा है। लेकिन बापदादा अब क्या चाहते हैं? स्थापना हुए कितने वर्ष हो गये? डायमण्ड जुबली मनाने की तैयारी कर रहे हो। तो बापदादा ने अभी सभी बच्चों को राजा बच्चे कहा ना, सब राजा हैं। राजा तख्त नशीन होता है ना? राज्य की निशानी ताज, तख्त और तिलक होता है। तो बापदादा इस वर्ष में चाहे नय्ो हो, चाहे पुराने-अगर नये भी हो तो समाप्ति का समय तो नयों के लिये भी समीप है तो पुरानों के लिये भी समीप है। ऐसे नहीं समझना कि हमारे को भी 60 वर्ष शायद मिलने हैं। नहीं, आपको मेकप करना है। अगर लास्ट आये हो तो फास्ट जाना है। लेकिन सम्पन्न होने का, समाप्ति का समय सबका एक ही है इसलिये चाहे नये हो या पुराने हो लेकिन मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा हूँ-सदा स्मृति का तिलक लगा हुआ ही है। कभी मिट जाये, कभी लगा हुआ हो......। नहीं, राज्य अधिकारी अर्थात् तिलकधारी-इस स्मृति का तिलक अविनाशी रहे, साधारण नहीं। मैं तिलकधारी हूँ, मैं विश्व कल्याण के जिम्मेवारी का ताजधारी हूँ। कितना बड़ा विश्व है और आप सभी विश्व कल्याणकारी हो। अकेला बाप नहीं है। बाप के साथी आप सभी हो। तो विश्व कल्याण की जिम्मेवारी के ताजधारी और सदा बाप के दिलतख्तनशीन। नीचे नहीं आना। सदा तख्तनशीन। वैसे भी देखो जो बहुत प्यारे होते हैं, लाडले बच्चे होते हैं तो माँबाप उनको मिट्टी में जाने नहीं देते, धरनी पर पांव रखने नहीं देते। तो आप कितने लाडले हो! लाडले हो या और आने वाले हैं? आप हो। तो तख्त को छोड़ करके साधारण स्वरूप, साधारण संकल्प.... इस मिट्टी में या धरनी में पांव नहीं रखो। बुद्धि रूपी पांव सदा तख्तनशीन हो। परमात्म बाप के बच्चे हो। महात्मा, धर्मात्मा के नहीं हो, परम आत्मा के हो। अभी तो सब नशे में ठीक हो, वो तो दिखाई दे रहा है लेकिन सदा रहेगा ना? कि थोड़ाथोड़ा रहेगा फिर युद्ध करेंगे, फिर विजय प्राप्त करेंगे-ऐसे तो नहीं? ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो? ब्राह्मण हो। क्षत्रिय नहीं हो, युद्ध नहीं करते हो? कि कभी ब्राह्मण बन जाते हो, कभी क्षत्रिय बन जाते हो? अगर माया से युद्ध करनी पड़ती है तो क्षत्रिय हुए। ब्राह्मण माना विजयी और क्षत्रिय माना युद्ध करने वाले। बापदादा को तो कभीकभी बच्चों पर बहुत रहम आता है, बैठते योग में हैं और करते युद्ध हैं! कहेंगे एक घण्टे योग लगाया लेकिन एक घण्टे में युद्ध कितना समय चली और योग कितना समय रहा? अगर किसी भी कारण से अनुभूति नहीं होती है तो अवश्य ही युद्ध की स्टेज है। बापदादा कहते हैं-योगी बच्चे हैं और बन जाते हैं योद्धे बच्चे! कब तक युद्ध करेंगे? अन्त तक युद्ध करेंगे! छुट्टी दे दें-भले युद्ध करो। छुट्टी चाहिए? नहीं चाहिये? फिर करते क्यों हो? कमज़ोर हो जाते हो तो माया इतना अधीन बना देती है जो चाहते नहीं हो लेकिन कर लेते हो। जैसे कोईकोई सर्वेन्ट बहुत भोले होते हैं तो मालिक उसे अधीन बना लेते हैं, सर्वेन्ट जो नहीं कर सकता उसके लिए भी मालिक कहता है करो, नहीं तो नौकरी क्यों करते हो। माया भी ऐसे करती है, आप चाहते नहीं हो लेकिन कमज़ोर होने के कारण माया के अधीन बनना पड़ता है। तो उस समय योगी हो या योद्धे हो? योगी तो नहीं कहेंगे ना? तो बापदादा यही चाहते हैं कि हर एक बच्चा योगी बच्चा हो, युद्ध वाला नहीं। बापदादा को बच्चों के युद्ध की मेहनत अच्छी नहीं लगती। परमात्म बच्चे तो सदा मौज में रहने वाले हैं, मजे में रहने वाले हैं, युद्ध की मेहनत वाले नहीं। तो क्या बनेंगे? योगी बच्चे या योद्धे बच्चे? योगी बनेंगे या थोड़ाथोड़ा युद्ध करना अच्छा है? कहने में तो हाँहाँ करते हो और जब करते हो तो उस समय फोटो निकलता है। तो इस वर्ष सभी का चार्ट हो-सदा राज्य अधिकारी। अधीनता समाप्त। 63 जन्म तो अधीन रहे ना, अभी एक जन्म अधिकारी बनने का मिला है, उसमें भी अधीन रहेंगे क्या? अधीन बनने का एक जन्म और एक्स्ट्रा दे दें, मजा ले लो। नहीं चाहिये! अधिकार तो मिला है सिर्फ अधिकार को सम्भालो। अलबेले नहीं बनो, कमज़ोर नहीं बनो। कहने में देखो क्या कहते हो कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ। कोई कहता है मैं मास्टर कमज़ोर हूँ? लेकिन बनते क्या हो? मास्टर सर्वशक्तिमान और कमज़ोर! तो अच्छा लगता है? सुनना भी अच्छा नहीं लगता!

तो इस वर्ष की रिजल्ट में क्या करेंगे? अभी तो डायमण्ड जुबली मनाने की तैयारी कर रहे हो ना! आप भी मनायेंगे या जिनको 60 वर्ष हुआ है वो मनायेंगे? क्योंकि ये स्थापना की डायमण्ड जुबली है। तो स्थापना में आप सभी हो या नहीं? क्योकि अभी तो मिक्स आये हैं, कोई तो दोचार वर्ष के हैं, कोई दोचार मास के भी हैं, लेकिन डायमण्ड जुबली सभी की है क्योंकि स्थापना की डायमण्ड जुबली है। तो धूमधाम से मनायेंगे ना! मनाने का अर्थ क्या है? कांफ्रेंस करना, प्रोग्राम करना कि बनना? मनाना अर्थात् बनना और बनाना। सिर्फ मनाना नहीं, बनना। देखो आप सभी इस सीजन के समाप्ति में भोग डालने वाली आत्मायें हो। तो कितना अच्छा चांस मिला है। तो मेला अच्छा लगा? अभी आप सबके उलहने तो पूरे हो गये ना! चांस नहीं मिलता, चांस नहीं मिलता-ये उलहना तो पूरा हुआ ना। देखो, बच्चों के प्यार में जहाँ बच्चे वहाँ आना पड़ा। क्योंकि बाप जानते हैं कि आधा कल्प बच्चों ने याद किया-आओआओ। बाप तो अपने समय पर आये, आपके चिल्लाने पर नहीं आये लेकिन सुनते तो हैं ना। तो आपने आधाकल्प कहा आओआओ और बाप ने अभी कहा मेले में आओआओ। सभी खुश हो? सब तन्दुरूस्त भी हो या बीमार भी कोई टेन्ट में सोया हुआ है। आप तो यहाँ बैठे हुए हैं और आपके साथी? कोई नहीं। इससे सिद्ध है सब इतने तन्दुरूस्त हैं माना ब्रह्मा भोजन बहुत अच्छा मिला है। अभी तो फिर भी देखो नीचे सोने का प्रबन्ध मिला है आगे चलकर विनाश के समय हो सकता है बांहों को ही तकिया बनाना पड़े। मिट्टी पर आराम से सो जायेंगे, अगर पत्थरकंकड़ लगेंगे तो साफ कर लेंगे, किनारे कर लेंगे। अभी तो बापदादा ने देखा, बापदादा ने चक्कर लगाया है, बहुत अच्छा प्रबन्ध किया है और उसमें भी गुजरात वालों को पदम गुणा मुबारक। बहुत अच्छा किया है। दिल से मेहनत की है। तो जिन्होंने दिल से मेहनत की है उनको बापदादा मेहनत की पदम गुणा मोहब्बत दे रहे हैं। हाथ उठाओ जिन्होंने सेवा में निमित्त बनकर सेवा की है? गुजरात वालों ने की है ना! गुजरात वाले हाथ उठाओ। बहुत अच्छी की है। देखो पतलीपतली रोटी तो मिलती हैं। जली हुई तो नहीं मिलती? बापदादा ने रिजल्ट सुनी है कि ब्रह्मा भोजन बहुत अच्छा बनता है। अभ्यास तो हो गया ना पट में सोने का! अच्छा है, गर्मी की सीजन में अगर टेन्ट भी उड़ गया तो हवा के लिए छत खाली हो गई ना। नेचरल खिड़कियाँ बन गई। लेकिन दूसरे ग्रुप को ऐसा नहीं मिलेगा, उनके लिये प्रबन्ध अच्छा करेंगे। और मधुबन वालों ने, जिन्होंने बहुत अच्छा सहयोग दिया वो हाथ उठाओ। मेहनत अच्छी की। (दादी ने की) दादी तो निमित्त है ना। दादी को सारे दिन में कितनी मालायें पड़ती हैं! दुआओं की मालायें एक के पीछे एक पड़ती हैं जो उतारनी भी नहीं पड़ती। फूलों की 10 माला अगर गले में पड़ गई तो गला ही थक जायेगा और ये दुआओं की माला कितनी हल्की और कितनी प्यारी है! जो सेवा करते हैं, वैसे तो सभी ने सहयोग दिया है, बिना सहयोग के कोई कार्य नहीं होता। सबको हाँ जी करना ही है, करो, ये सहयोग का हाथ बढ़ाया तभी ये कार्य हुआ। अगर दोचार भी सहयोगी ना ना करते तो मेला नहीं हो सकता। लेकिन मधुबन वालों ने, चाहे तलहटी वालों ने, चाहे हॉस्पिटल वालों ने वा चारों ओर के देश वालों ने, ज्ञान सरोवर वालों ने भी मदद की है। बलिहारी ज्ञान सरोवर की, जो आपको भोजन अच्छा मिला। (ज्ञान सरोवर का स्टीम सिस्टम तथा बड़े बर्तन आदि मेले में यूज हो रहे हैं) क्योंकि आप सबनेज्ञान सरोवर बनाया है ना, तो जो बीज डाला उसका फल खा रहे हैं। प्रत्यक्षफल है ना, तो प्रत्यक्षफल मिला है और बना भी प्यार से रहे हैं। जरा भी थकावट के चिन्ह चेहरे पर नहीं हैं। कमाल तो ये है ना! काम करे और प्यार से करें। घुटके खाकर काम करे तो वो काम, काम नहीं है। तो मेले में जब जाते हैं ना तो कोई न कोई चीज़ निशानी जरूर ले जाते हैं। इस परमात्म मेले से क्या निशानी ले जायेंगे? ताज, तख्त और अविनाशी तिलक की निशानी सभी साथ में ले जाना। ऐसे नहीं करना कि तीन चीजों में से एक चीज़ रह गई दो साथ चली। यहीं तो नहीं छोड़कर जायेंगे? ले जाना आता है? एनाउन्स करते हैं ना सीजन में, लॉस्ट प्रापर्टी रोज इकट्ठी होती है, तो ऐसे नहीं छोड़कर जाना। मैं ब्राह्मण आत्मा हूँ, मै सर्वश्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा हूँ-इस निश्चय और नशे में सदा ही रहना। यह सिर्फ बुद्धि में नहीं हो लेकिन चलन और चेहरे में दिखाई दे, जो भी आपके सम्पर्क में आये वो अनुभव करे कि ये साधारण नहीं हैं लेकिन न्यारे हैं। और अलौकिक न्यारापन ही तो प्यारा लगता है ना! तो न्यारा बनना आता है?

भारत के चारों तरफ से पहुँचे हैं। सब तरफ से आये हैं या कोई रह गया है? सभी जोन आ गये हैं। तो जैसे आने में एवररेडी होकर पहुँच गये, ऐसे ही अगर बापदादा ऑर्डर करे कि अभी एक सेकण्ड में वापस घर जाने की तैयारी करो तो कर सकते हो? कि याद आयेगा टेलीफोन कर दें कि हम जा रहे हैं, प्रवृत्ति वाले याद करेंगे? ऐसी प्रैक्टिस करो-एक सेकण्ड में आत्मा शरीर से परे होने के लिये एवररेडी बन जाये। क्योंकि सबका वायदा है-साथ चलेंगे। वायदा है, कि नहीं? बाप चला जाये और हम देखते रहें! नहीं, साथ रहेंगे, साथ चलेंगे। तो चलने के लिये तैयारी भी चाहिये ना! कोई गोल्डन, सिल्वर, कॉपर की सूक्ष्म रस्सियाँ तो नहीं हैं, जो आप उड़ने की कोशिश करो और रस्सी आपको नीचे ले आये? तो चेक करो और अभ्यास करो कि सेकण्ड में अशरीरी बन सकते हैं? अशरीरी का अर्थ है कि शरीर की कोई भी आकर्षण आत्मा को अपने तरफ आकर्षित नहीं करे। चाहे जिन्दा भी हैं, लेकिन जैसे जीते जी मरजीवा। वैसे आप सबका अपना शरीर तो है ही नहीं। मेरा शरीर कहेंगे या बाप की अमानत है? जब है ही बाप की अमानत तो अशरीरी बनना क्या मुश्किल है? मुश्किल है या सहज है? (सहज है) कहने में तो सहज है। युद्ध नहीं करनी पड़े कि नहीं, मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ......। युद्ध में ही एक सेकण्ड पूरा हो जायेगा तो कहाँ पहुँचेंगे! बाप ने कहा और किया। अगर जरा भी सोचा-ऐसा नहीं वैसा, अभी तो थोड़ा टाइम चाहिये, इतना अभ्यास तो हुआ नहीं है, हो जायेगा...... सोचा और गया। कहाँ गया? त्रेता में गया। हाँ जी किया तो ब्रह्मा बाप के साथी बनेंगे। अच्छा।

टीचर्स से: टीचर्स सब आगे बैठी हैं, होशियार हैं। बहुत अच्छा। बापदादा निमित्त बन सेवा करने की मुबारक देते हैं। फिर भी देखो पुरूषार्थ करके सभी को यात्रा तो कराई है।

कुमारों से: कुमार क्या करेंगे? कुमार सदा ही विश्व में कोई न कोई परिवर्तन के लिये एवररेडी रहते हैं। कोई भी क्रान्ति के निमित्त कुमार बनते हैं। तो ये है शान्ति की क्रान्ति। तो सभी कुमार सदा यह याद रखो कि हमारा हर कर्म परिवर्तन करने के निमित्त है। तो कुमार अर्थात् विश्व परिवर्तक। ऐसे है ना? सिर्फ तालियाँ तो नहीं बजा रहे हो। अच्छेअच्छे कुमार हैं। देखो, बापदादा सदा कहते हैं कि सेवाकेन्द्र सेवा में आगे नम्बर पर जायें, उसके लिए कुमार भी जरूर चाहिये। जहाँ कुमार नहीं होंगे वहाँ सेवा के प्लैन कम बनेंगे। तो ऐसे निर्विघ्न सेवाधारी कुमार। खिटखिट करने वाले नहीं बनना। निर्विघ्न सेवाधारी कुमार। कुमार ही सेवा की शोभा हैं इसीलिये बापदादा को कुमार प्यारे लगते हैं। अच्छा है। इस वर्ष तो सभी को निर्विघ्न होना ही है, आपके पास कोई विघ्नों के पत्र नहीं आयेंगे-ये हो गया, ये हो गया......। कुमारों को माया भी बहुत प्यार करती है। माया भी समझती है मेरा बनें, इसीलिये डबल अटेन्शन। माया के नहीं बनना।

कुमारियों से: कुमारियाँ क्या करेंगी? कुमारियों का तो बहुतबहुत बड़ा भाग्य है। कुमार 25 वर्ष का होगा लेकिन उनको कोई दादा नहीं कहेगा, लेकिन कुमारियों को दादी कहेंगे, दीदी कहेंगे। कुमारियाँ अगर टीचर बन जाती हैं तो दादी, दीदी का टाइटल मिल जाता है। दीदी कहने वाले तो बहुत अच्छे हैं और बनने वाले भी अच्छे हैं। लेकिन दीदी माना बड़ी। तो दीदी बनना अर्थात् बड़े दिल से स्व का पुरूषार्थ और औरों को पुरूषार्थ कराना। सिर्फ दीदी नाम से नहीं खुश हो जाना। काम भी करना है। कुमार और कुमारियों से देखा जाता है कि माया का कुछ एक्स्ट्रा प्यार है। लेकिन ये प्यार नहीं है, धोखा है। पहले माया बहुत प्यार करती है लेकिन समाया हुआ धोखा होता है। अभी कोई कुमार और कुमारी की माया के प्रति रिपोर्ट नहीं आनी चाहिये। अभी रिपोर्ट आती है। कई खेल करते हैं कुमार भी, कुमारियाँ भी। अभी खेल नहीं करना। अभी विश्व परिवर्तक बन, सभी एकदो के सहयोगी बन आगे उड़ना। ठीक है ना।

प्रवृत्ति वालों से: प्रवृत्ति वाले क्या करेंगे? प्रवृत्ति वाले सदा ये वरदान याद रखना कि हम विश्व के शो केस में बहुत बढ़िया नम्बरवन शो पीस हैं। जितना आप शो पीस अर्थात् सेम्पल बढ़िया होंगे तो बाप से सौदा करने वाले बहुत आयेंगे। सेम्पल को देखकरके स्वयं भी खरीददार बन जायेंगे। प्रवृत्ति वाले अपना बहुत अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। अगर प्रवृत्ति वाले नहीं होते तो अभी तक भी बापदादा को गालियाँ खानी पड़ती। देखो पहले कितनी गाली खाई। लेकिन आप प्रवृत्ति वालों का सेम्पल देखकर हिम्मत आती है। तो प्रवृत्ति वालों की भी अपनी विशेषता है लेकिन प्रवृत्ति का अर्थ क्या है? पर वृत्ति में रहने वाले। प्रवृत्ति का अर्थ ये नहीं है-मेरा पोत्रा, मेरा धौत्रा। नहीं, पर वृत्ति में रहने वाले। लेकिन होता क्या है? बापदादा कहते हैं न्यारे और प्यारे रहो, तो प्यारे बनेंगे लेकिन न्यारे बनकर प्यारे नहीं बनते। ये गलती करते हैं। प्यारे तो बन जाते हैं लेकिन न्यारापन भूल जाता है। तो प्यारे भी और न्यारे भी-ये प्रवृत्ति वालों को आता है ना! प्यारे और न्यारे रहने में होशियार हैं ना? अभी ये नहीं लिखना कि माया आ गई क्या करें? माया को हमेशा के लिए भगा दिया-ऐसा पत्र लिखना। पत्र लिखने की भी जरूरत नहीं, बाबा के पास पहुँचता है। लिखते हैं तो 4-4 पेज पत्र लिखते हैं, इकॉनॉमी खत्म। खर्चा तो होता है ना, खर्चा किसका हुआ? आपका हुआ या बाप का हुआ? तो फालतू खर्चा किया ना और फिर पढ़ने वाले का कितना फालतू टाइम जाता है। अक्षर भी क्या लिखते हैं कोई ईस्ट में जाता है, कोई वेस्ट में जाता है। दो शब्दों में लिखो, डिटेल में नहीं लिखो। खुशखबरी के पत्र कभी भी लम्बे नहीं होते। उल्टे सुल्टे समाचार का पत्र चार पेज का होगा। तो अभी खुशखबरी के पत्र आने हैं ना कि लम्बेचौड़े आने हैं? कोई कितना भी आपके पास ऐसेऐसे पत्र या समाचार सुनाये तो आपको क्या करना है? अचलअडोल। वेस्ट पेपर बॉक्स में डाल दो। इन्टरेस्ट नहीं लो-ये क्या होता है, ये क्या हुआ......। नहीं, कहने वाले कह रहे हैं। आप तो बाप का कहा हुआ सुन रहे हो, कि औरों का भी सुनना है? क्या वायदा है? आप से ही सुनेंगे कि औरों से भी थोड़ाथोड़ा सुनेंगे? कोई कुछ भी कहे, कोई कहे-हम बाप हैं, कोई कहे हम ये हैं...... कहने दो, मौज मनाने दो। आप बाप के हैं और बाप के रहना है। मंजूर है ना कि थोड़ाथोड़ा मजा लेना है? बाप के प्रभाव में रहने वाले किसी भी आत्मा के प्रभाव में नहीं आ सकते। ये भी अच्छा बोलते हैं-सुन लिया तो क्या हुआ! लेकिन बाप ने क्या कहा है? एक से सुनो, एक का ही सुनो। तो ये पसन्द है ना कि थोड़ाथोड़ा रामायण की कथा, महाभारत की कथा सुनना अच्छा है? बीचबीच में थोड़ा मनोरंजन तो होना चाहिये! नहीं, आप अपनी मौज में रहो। अगर और कुछ भी करते हैं तो उनको भी मौज करने दो, शुभ भावना दो। आप सेफ रहो। सेफ रहना आता है कि थोड़ा सेक आ जाता है? सेक भी नहीं आये। सदा सेफ रहना।

अच्छा, सभी को वरदान मिल गये। कितना परमात्म प्यार है। गीत गाते हो ना-इतना प्यार करेगा कौन? परमात्म प्यार कोई और दे ही नहीं सकता। असम्भव है। तो आशायें सब पूरी हुई? जब तक जीना है तब तक मिलते रहना है। कभी भी माया के झमेले से घबराना नहीं। आओ, हम भी विजयी हैं। और ही चैलेन्ज करो-आओ, ई हर्जा नहीं। आपका झमेला है तो हमारा मेला है।

अच्छा, ज्ञान सरोवर में इतना मेला हो सकता है? (हो सकता है) बापदादा को दिखाना, कहाँ करेंगे? अच्छा है, ज्ञान सरोवर एक विश्व के लिये सेम्पुल बना है। आखिर तो एसलम बनना ही है। अभी देख लिया ना, जब भी कोई बात नीचेऊपर हो तो आ जाना। स्थान तो देख लिया ना? ज्ञान सरोवर में सब तरफ के माइक्स का मेला होगा। सब तरफ के माइक आने हैं ना? ये ब्राह्मणों का मेला और वो है चारों ओर के माइक्स का मेला। क्योंकि ज्ञान सरोवर सभी के बूंदबूंद से सरोवर बना है और सभी ने दिल वा जान से सिक व प्रेम से बूंदबूंद डाली है। इसीलिये आप सबके सहयोग का सेम्पल ज्ञान सरोवर है। यहाँ तलहटी वालों ने भी तपस्या बहुत समय से की, उन्हों की भी तपस्या पूरी हुई।

सर्व तरफ के देशविदेश के सर्व सूक्ष्म स्वरूप से दृश्य देखने वाली आत्मायें, चारों ओर के सदा श्रेष्ठ पालना में पलने वाली, श्रेष्ठ पढ़ाई से राज्य पद पाने वाली आत्मायें, सद्गुरू द्वारा सर्व वरदान प्राप्त करने वाली आत्मायें, सदा मायाजीत विजयी रत्न, सदा युद्ध को छोड़ राजयोगी स्थिति में स्थित रहने वाली सर्वश्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

अच्छा, डबल विदेशियों को भी मेला अच्छा लगा? आप लोग ऐसे सोयेंगे, टेन्ट में सोयेंगे कि नींद नहीं आयेगी? सोने के लिये तैयार हैं? ये तो तैयार हैं आप नहीं सुलाते हो। बहुत बहादुर हैं, एवररेडी हैं। अगर डनलप मिलेगा तो भी ठीक, जमीन मिलेगी तो भी ठीक। अच्छा, डबल विदेशी भी इस सीजन में अच्छे उमंगउत्साह वाले देखे। वृद्धि भी देखी, संख्या में भी वृद्धि है तो स्थिति में भी वृद्धि है। अभी बचपन का खेल समाप्त हो गया, अभी बड़े हो गये। अच्छा, सब ठीक है? मेला पसन्द आया? ऐसे तो नहीं सोचते-ये झमेला क्या है? नहीं, बहुत अच्छा। जो ड्रामा में होता है वो अच्छा है और अच्छे ते अच्छा रहेगा।