06-04-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


प्योरिटी की रूहानी पर्सनालिटी की स्मृति स्वरूप द्वारा मायाजीत बनो

ज स्नेह के सागर बापदादा चारों ओर के सर्व स्नेही बच्चों को देख रहे आ हैं। हर एक स्नेही बच्चों के मूरत में रूहानी पर्सनालिटी की झलक देख रहे हैं। बाहर के रूप में तो साधारण पर्सनालिटी वाले हैं लेकिन रूहानी पर्सनालिटी में सबसे नम्बरवन हैं। दुनिया में अनेक प्रकार की पर्सनालिटीज गाई जाती हैं। शरीर की भी पर्सनालिटी, कोई विशेषता की भी पर्सनालिटी और कोई विशेष पोजीशन की भी पर्सनालिटी, लेकिन आप सबके चेहरे पर, चलन में कौनसी पर्सनालिटी है? प्योरिटी की पर्सनालिटी। प्योरिटी ही पर्सनालिटी है। जितना जितना जो प्योर हैं उतनी उनकी पर्सनालिटी न सिर्फ दिखाई देती है लेकिन अनुभव होती है। सभी अपने रूहानी पर्सनालिटी को अनुभव करते हो? आप जैसी पर्सनालिटी सतयुग से अब तक कोई की है? सारे कल्प में चक्कर लगाओ तो आप जैसी पर्सनालिटी है? नहीं है ना! तो आपको अपने रूहानी पर्सनालिटी का नशा है! अनादि काल में तो परमधाम में भी आप विशेष आत्माओं की पर्सनालिटी सबसे ऊंची है। चाहे आत्मायें सब चमकती हुई ज्योति हैं लेकिन आप रूहानी पर्सनालिटी वाली आत्माओं की चमक अन्य सब आत्माओं से न्यारी और प्यारी है। अपने अनादि काल की पर्सनालिटी को स्मृति में लाओ। आई स्मृति में? देख रहे हो? बापदादा के साथसाथ कैसे रूहानी पर्सनालिटी में दिखाई दे रहे हैं। अपने आपको देख सकते हो? तो चले जाओ अनादि काल में। कितने टाइम में जा सकते हो? जाने में कितना टाइम लगेगा? सेकण्ड से कम ना! कि एक दिन, एक घण्टा चाहिये? सेकण्ड से भी कम जहाँ चाहो वहाँ पहुँच सकते हो। तो अनादि काल की अपनी पर्सनालिटी देख ली? अभी अनादि काल से आदि काल में आ जाओ। आ गये या अभी चल रहे हो? पहुँच गये? तो अनादि काल से आदि काल में अपनी रूहानी पर्सनालिटी देखो-कितनी श्रेष्ठ पर्सनालिटी है! तन की भी तो मन की भी तो धन की भी और सम्बन्ध की भी। सब प्रकार की पर्सनालिटी कितनी श्रेष्ठ है! तो आदि काल की पर्सनालिटी देख रहे हो? कितने सुन्दर लगते हो, कितने सजे हुए हो, कितने सुख, शान्ति, प्रेम, आनन्द स्वरूप हो तो आदि काल में भी अपनी पर्सनालिटी को देखो। स्पष्ट दिखाई देती है वा 5 हजार वर्ष हो गये तो थोड़ा स्पष्ट नहीं है? सभी को स्पष्ट है? होशियार हो सभी। तो आदि काल भी अपना देख लिया। अभी आओ मध्य काल में तो मध्य काल में भी आपकी पर्सनालिटी क्या रही? आपके जड़ चित्र कितने विधिपूर्वक पूजे और गाये जाते हैं। चाहे कितने भी धर्मात्मा, महात्मा, नेतायें पर्सनालिटी वाले गाये जाते हैं लेकिन आपके जड़ चित्रों की पर्सनालिटी के आगे उनकी पर्सनालिटी कुछ भी नहीं है। जैसे आप सबकी पूजा होती है वैसे कोई महात्मा या नेता की, धर्म आत्मा की विधिपूर्वक पूजा होती है? कभी देखी है? आपके जड़ चित्रों जैसे श्रृंगार किसका होता है? तो मध्य काल में भी आप आत्माओं के प्योरिटी की पर्सनालिटी की विशेषता कितनी श्रेष्ठ है! अपना चित्र देखा? आपकी पूजा होती है कि नहीं? सिर्फ बड़ेबड़ों की होती है, हमारी नहीं! डबल विदेशियों के मन्दिर हैं? देखा है, उसमें आपका चित्र है? कि सुना है तो कहते हो कि हाँ होंगे! स्मृति में है? तो मध्य काल भी आपका अति श्रेष्ठ है और अब लास्ट जन्म में जो मरजीवा ब्राह्मण जन्म है उसकी पर्सनालिटी देखो कितनी बड़ी है! गायन कितना है-कोई भी श्रेष्ठ कार्य अब तक भी आपके नामधारी ब्राह्मण ही करते हैं। चाहे ब्राह्मण अभी ब्राह्मण रहे नहीं हैं लेकिन नाम के तो ब्राह्मण है ना! आपके नाम से आपकी पर्सनालिटी के कारण वो भी श्रेष्ठ गाये जाते हैं। तो ब्राह्मण जन्म की पर्सनालिटी कितनी श्रेष्ठ है! आदि काल, अनादि काल, मध्य काल और अब अन्त काल-सारे कल्प में आपकी पर्सनालिटी सदा ही महान रही है।

लौकिक पर्सनालिटी वालों का अगर नाम भी आता है तो कोई विशेष बुक में उन्हों का नाम आता है-फलानेफलाने हैं। लेकिन आपका नाम किसमें आता है? साधारण बुक में नहीं आता है, शास्त्र में आता है। जो भी आदि काल से शास्त्र बने उसमें किसके चरित्र हैं? किसका गायन है? किसकी कहानियाँ हैं? तो लौकिक पर्सनालिटी वालों का गायन विशेष बुक में होता है और आपका गायन शास्त्र में होता है और शास्त्र को कितना रिगार्ड देते हैं। बड़े विधिपूर्वक शास्त्र को सम्भालते हैं, उसको भी बड़े पूज्य के रूप में देखते हैं। जो सच्चे भक्त हैं वो शास्त्र को विधिपूर्वक रखते भी हैं और पढ़ते भी हैं। ऐसे रिवाजी किताबों के माफिक नहीं रखते। तो अपनी पवित्रता की पर्सनालिटी को सदा ही इमर्ज रूप में स्मृति में रखो। जानते हैं.... या हैं तो हम ही.... ऐसे मर्ज नहीं।

स्मृति स्वरूप में रखो। जिसके बुद्धि में ये इमर्ज रूप में स्मृति रहती है तो स्मृति ही समर्थी का आधार है। और जहाँ समर्थी है वहाँ माया आ सकती है? समर्थ आत्मा के पास माया का आना असम्भव है। मेहनत करने की आवश्यकता ही नहीं है। माया का काम है आना लेकिन आपका काम अभी समय प्रमाण भगाना नहीं है। माया आई और भगाया। नहीं, आपका काम है सदा मायाजीत रहना। तो मायाजीत हो वा माया को बारबार भगाने वाले हो? अभी भगाना पड़ता है, थोड़ाथोड़ा वो दर्शन देने के लिये आ जाती है! नहीं ना! डबल फारेनर्स ने माया को सदा के लिए भगा दिया? या भगाते ही रहते हैं? क्या हाल है? माया सदा के लिए भाग गई? अभी नहीं आयेगी ना? कि थोड़ाथोड़ा आये, कोई हर्जा नहीं? फिर भी आधा कल्प की दोस्ती है, फ्रेंड है ना! उसको ऐसे ही छोड़ देंगे, आवे ही नहीं! सुनाया ना कि समय समाप्त होने के पहले बहुत काल का मायाजीत बनने का अभ्यास चाहिये। अन्त में नहीं हो सकेगा। अगर अन्त में मायाजीत बनने का पुरूषार्थ भी करेंगे तो क्या हाल होगा? बापदादा तोते की कहानी सुनाते हैं ना कि तोते को कहा नलके पर नहीं बैठना, पर नलके पर बैठकर ही बोल रहा था। ऐसे ही अन्त काल में अगर बहुत काल का अभ्यास नहीं होगा तो मन में सोचते रहेंगे कि मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ, लेकिन माया का प्रभाव भी होता रहेगा, और कोशिश भी करेंगे मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ लेकिन होगा ही नहीं। इसीलिये क्या करना है? अभी से मायाजीत बनने का अभ्यास करो। और उसका सहज साधन है अपने रूहानी पर्सनालिटी को स्मृति स्वरूप में रखो। पर्सनालिटी वाले की निशानी क्या होती है? जो ऊंची पर्सनालिटी वाले होते हैं उसकी कहाँ भी, किसी में भी आंख नहीं जायेगी। ये ऐसा है, ये ऐसा है, ये ऐसा करता, ये ऐसे करती, मैं क्यों नहीं करूँ, मैं क्यों नहीं कर सकती हूँ/कर सकता हूँ..... दूसरे के प्राप्ति में आंख नहीं जायेगी। क्यों? रूहानी पर्सनालिटी वाला सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न है। स्वभाव में भी सम्पन्न, संस्कार में भी सम्पन्न और सम्बन्धसम्पर्क में भी सम्पन्न, भरपूर। वो कभी अपने प्राप्तियों के भण्डार में कोई अप्राप्ति अनुभव ही नहीं करेगा। क्यों? रूहानी पर्सनालिटी के कारण वो सदा ही मन से भरपूर होने के कारण सन्तुष्ट रहता है। आंख दूसरे की प्राप्ति में तब जाती है जब अपने में अप्राप्ति अनुभव करते हो। तो कोई अप्राप्ति है क्या? गीत क्या गाते हो-अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खज़ाने में। ये गीत मुख से नहीं, मन से गाते हो ना? जो गाते हैं वो हाथ उठाओ। अच्छा, डबल विदेशी भी गीत गाते हो? अच्छा!

बापदादा आज चारों ओर के बच्चों की प्योरिटी की पर्सनालिटी चेक कर रहे थे। प्योरिटी की परिभाषा को भी अच्छी तरह से जानते हो। प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत नहीं, ब्रह्मचर्य व्रत में तो आजकल के सरकमस्टांस अनुसार कई अज्ञानी भी रहते हैं। ज्ञान से नहीं लेकिन हालातों को देखकर। कई भक्त भी रहते हैं। वो कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन प्योरिटी को सारे दिन में चेक करो-पवित्रता की निशानी है स्वच्छता, सत्यता। अगर सारे दिन में चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की लेकिन अगर विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर जरासा अन्तर रह गया तो वो भी स्वच्छता अर्थात् पवित्रता नहीं। व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता है। क्यों? आप सोचेंगे कि हमने पाप तो किया ही नहीं, किसको दु:ख तो दिया ही नहीं लेकिन अगर व्यर्थ चला, समय गया, संकल्प गया, सन्तुष्टता गई तो आपके पवित्रता की फाइनल स्टेज के डिग्री में फर्क पड़ जायेगा। 16 कला नहीं बन सकेंगे। 15 कला, 14 कला, साढ़े पन्द्रह कला...... नम्बरवार हो जायेगा। तो अपवित्रता सिर्फ किसको दु:ख देना या पाप कर्म करना नहीं है लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो। निकल गया, बोलना नहीं था लेकिन बोल लिया, तो इसको क्या कहेंगे? मालिक हैं? इसीलिये अमृतवेले से लेकर रात तक अपने संकल्प, बोल, कर्म, सेवा-सबको चेक करो। मोटे रूप से नहीं चेक करो। अगर मोटे रूप से चेक करेंगे तो देखो चन्द्रवंशी को मोटी निशानी तीरकमान दिया है और सूर्यवंशी को कितनी छोटीसी मुरली दे दी है। मुरली कितनी हल्की है! और तीर कमान कितना मेहनत का है। पहले तो निशाना लगाते रहो, दूसरा बोझ उठाते रहो! और मुरली देखो-नाचो, गाओ, हंसो, खेलो। तो इसीलिये मोटेमोटे रूप न पुरूषार्थ का रखो, न चेकिंग का रखो। अभी महीन बुद्धि बनो। क्योंकि समय समाप्त अचानक होना है, बताकर नहीं होना है। बापदादा ने तो पहले ही कह दिया है कि कोई उलहना नहीं देना-बाबा, आपने बताया क्यों नहीं? बाप कभी भी टाइम कॉन्सेस नहीं बनायेगा। अभी पूरा डायमण्ड बनना है ना! ये वायदा किया है ना? डायमण्ड जुबली मनानी है या डायमण्ड बनना है? क्या करना है? बनना भी है और मनाना भी है। दोनों साथसाथ करना है। तो बापदादा अगले वर्ष में चेक करेंगे-वायदा निभाया या सिर्फ मुख मीठा किया? तो कौन हो? सिर्फ बोलने वाले हो या निभाने वाले हो? अच्छा! देखो, टी.वी. में आप सबका फोटो आ रहा है, फिर बदल नहीं जाना-मैं था ही नहीं, मैंने नहीं कहा था! बनना तो अच्छा है ना, तो जो अच्छी बात है उसको जल्दी करना चाहिये या देरी से? जल्दी करना चाहिये ना!

सेकण्ड में एवररेडी बन सकते हो? सेकण्ड में अशरीरी बन सकते हो? कि युद्ध करनी पड़ेगी कि नहीं, मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर नहीं हूँ..... ऐसे तो नहीं ना! सोचा और हुआ। सोचना और स्थित होना। (बापदादा ने कुछ मिनटों तक ड्रिल कराई) अच्छा लगता है ना! तो सारे दिन में बीचबीच में ये अभ्यास करो। कितने भी बिजी हो लेकिन बीचबीच में एक सेकण्ड भी अशरीरी होने का अभ्यास अवश्य करो। इसके लिये कोई नहीं कह सकता-मैं बिजी हूँ। एक सेकण्ड निकालना ही है, अभ्यास करना ही है। अगर किसी से बातें भी कर रहे हो, किसके साथ कार्य कर रहे हो, तो उन्हों को भी एक सेकण्ड ये ड्रिल कराओ, क्योंकि समय प्रमाण ये अशरीरीपन का अनुभव, यह अभ्यास जिसको ज्यादा होगा वो नम्बर आगे ले लेगा। क्योंकि सुनाया कि समय समाप्त अचानक होना है। अशरीरी होने का अभ्यास होगा तो फौरन ही समय की समाप्ति का वायब्रेशन आयेगा। इसलिये अभी से अभ्यास बढ़ाओ। ऐसे नहीं, अगले साल में डायमण्ड जुबली है तो अब नहीं करना है, पीछे करना है। जितना बहुत काल एड करेंगे उतना राज्यभाग्य के प्राप्ति में भी नम्बर आगे लेंगे। अगर बीचबीच में यह अभ्यास करेंगे तो स्वत: ही शक्तिशाली स्थिति सहज अनुभव करेंगे। ये छोटीछोटी बातों में जो पुरूषार्थ करना पड़ता है वो सब सहज समाप्त हो जायेगा।

अच्छा सभी खुशराजी हैं ही या पूछना पड़ेगा? मातायें खुश हो? बहुत अच्छा। देखो, कहाँकहाँ से मेले में पहुँच गये हो। अच्छा चांस मिला ना, नहीं तो डेट का इन्तजार करते रहते हैं-हमारा नम्बर कब आयेगा, हमारा नम्बर कब आयेगा? अभी तो खुला निमन्त्रण था ना! सब ठीक अच्छी तरह से रह रहे हो? बेहद अनुभव हो रहा है ना? कि थोड़ीथोड़ी तकलीफ है? बुजुर्ग माताओं को तकलीफ नहीं हुई है? लाइन में लगो तब ही खाना मिलेगा! लाइन में लगने में थकावट नहीं होती? मजा आता है? इतना बड़ा परिवार कब मिलेगा! तो परिवार को देखकर हर्षित होते हैं ना! भक्ति मार्ग के मेले से तो अच्छा मेला है ना? और दो दिन बढ़ा दें कि बस का खर्चा होगा? घर नहीं याद आयेगा? नौकरी नहीं याद आयेगी? ये भी कुछ नवीनता होनी चाहिये ना तो ये मेला भी एक नवीनता हुई। नवीनता का अनुभव कर लिया। अभी फिर पुरानी बातें थोड़ेही होगी, नई बातें होगी ना! नई बात पसन्द आती है या पुरानी? नई बात अच्छी लगती है ना! अच्छा।

कुमारियों से- कुमारियाँ क्या कमाल करेंगी! कुमारियाँ टीचर बनेंगी? कुमारियाँ सभी अपने चेहरे से, चलन से, पवित्रता की परिभाषा का भाषण करेंगी। मुख से भाषण तो सभी करते हैं लेकिन आपके सम्बन्ध में जो भी सामने आये वो चेहरे और चलन से अनुभव करे कि पवित्रता की श्रेष्ठता क्या है? कभी भी कोई कुमारी किसके भी सामने जाये तो साधारण कुमारी नहीं दिखाई दे। पवित्रता की देवी अनुभव हो। देखो शुरूशुरू में जब तपस्या के बाद सेवा पर निकले तो आप सबको किस रूप में देखते थे? देवियाँ समझते थे ना! उन्हों को साधारण स्वरूप नहीं दिखाई देता था, देवी रूप दिखाई देता था। देवियाँ आई हैं, कुमारियाँ नहीं। तो हर कुमारी अपने को देवी स्वरूप अनुभव करे और दूसरों को भी अनुभव कराये। देवी रूप के ऊपर कभी भी कोई की व्यर्थ नजर नहीं जा सकती। औरों को भी बचा लेंगे और स्वयं भी बच जायेंगे। ऐसे नहीं कह सकते कि इसकी बुरी दृष्टि थी ना, मैं तो पवित्र हूँ लेकिन दूसरे की बुरी दृष्टि थी। अगर आपकी पॉवरफुल पवित्र दृष्टि है तो जैसे सूर्य अन्धकार को रहने नहीं देता, समाप्त हो जाता है, अन्धकार रोशनी में बदल जाता है, वैसे ही आपकी पवित्रदृष्टि, देवी स्वरूप आसुरी संस्कार को समाप्त कर देगी। तो कुमारियाँ क्या हैं? पवित्र देवियाँ। तो कुमारियाँ ऐसे समझती हैं? हाँ कहते हो तो हाथ उठाओ, अगर ना तो हाथ नहीं उठाओ। पवित्र कुमारियाँ हैं।

कुमार: कुमार भी पवित्र देव हैं। ऐसे नहीं, ये तो पवित्र देवियाँ हो गई! कुमार भी पवित्र देव हैं। किसी भी तरफ, अपवित्र दृष्टि की बात तो छोड़ो लेकिन स्वप्न मात्र भी अपवित्र वृत्ति नहीं जा सकती। कुमार हाथ उठाओ। कुमार भी बहुत हैं। तो कुमार कौन हो? पवित्र देव। देव आत्मा हूँ। मैं फलाना हूँ, नहीं। देव आत्मा हूँ, पवित्र आत्मा हूँ।

माताओं से - मातायें बहुत हैं। मातायें क्या कमाल करेंगी? कमाल करना है ना? तो मातायें सदा ईश्वरीय स्नेह से सभी को अज्ञान की नींद से जगाओ। जैसे छोटे बच्चों को उठाती हो ना-उठो, तैयार हो, स्कूल में जाओ, तो ऐसे जगत मातायें बन अज्ञान के नींद में सोये हुए बच्चों को उठाओ। आत्माओं को जगाओ, क्योंकि जगत माता हो। जैसे अपने को हद की माता समझने से जिम्मेवारी समझती हो ना। जो भी बच्चें होंगे, 8 हो कि 6, लेकिन जिम्मेवारी समझती हो ना ऐसे बेहद की जगत मातायें बन बच्चों (आत्माओं) पर रहम करो। बच्चा माना बाप का बच्चा। कई ऐसे भी कहानियाँ सुनते हैं, कहते हैं बुरीदृष्टि नहीं है लेकिन इसको माँ समझते हैं। लेकिन माँ सिवाए ब्रह्मा बाप के और कोई आत्मा हो नहीं सकती। तो अपना बच्चा नहीं बनाना, बाप का बच्चा बनाना। तो मातायें तैयार हैं? करनी है सेवा? अच्छा, हाथ हिला रही हैं। कई बच्चे खेल बहुत करते हैं, सारे दिन में कहाँ न कहाँ, कोई न कोई नया खेल जरूर होता है। और बातें भी बड़ी अच्छी बनाते हैं। ऐसी नईनई अच्छी बातें बनाते हैं जो न शास्त्र में हैं न मुरली में हैं, तो अभी ये बचपन के खेल कब तक करेंगे? ये बचपन के खेल हैं। जैसे गुड़िया बनाते भी हैं, उनको बड़ा भी करते हैं, परिवार वाले भी बना देते हैं, फिर खत्म कर देते हैं। तो बातें बनाने वाले भी ऐसे करते हैं-बात को पहले जन्म देते हैं, फिर उसको विस्तार करते हैं, फिर उसमें नमक-मिर्ची डालकर, मसाला डालकर बहुत टेस्टी करते हैं, फिर एकदो को खिलाते हैं। अभी आप सबका बचपन है या वानप्रस्थ है? वानप्रस्थ तक पहुँच गये हो ना? अभी तो वाणी से परे जाने का समय है। तो वानप्रस्थ स्थिति वाले बचपन के खेल नहीं करते लेकिन कमाल करते हैं। जब खेल में लग जाते हैं ना तो ये खेल क्या कर रहा हूँ-ये महसूस भी कम करते हैं। खेल में इतने मस्त हो जाते हैं। तो अभी वानप्रस्थ स्थिति का अनुभव करो और कराओ। बचपन के खेल खेल लिये, बहुत खेले।

अच्छा, अभी इस वर्ष के सीजन का समय समाप्त हो रहा है। तो बापदादा को एक संकल्प है। ब्रह्मचर्य व्रत तो सभी ने बहुत सहज धारण किया लेकिन अगले वर्ष सीजन में वही आयें जो क्रोध नहीं करे। ये हो सकता है कि फेल हो जायेंगे? बोलेंगे तो सच ना। तो ऑटोमेटिकली सीजन कम हो जायेगी। ऐसा करें? फॉर्म में सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत का नहीं लिखना, कि 6 मास से या 6 वर्ष से ब्रह्मचर्य में रहे, लेकिन क्रोध कितने समय से नहीं किया? क्रोध पर कड़ी नजर रखना। क्या समझते हैं? पसन्द है? पाण्डवों को पसन्द है? देखो नाम तो आउट हो जायेगा-क्यों नहीं सीजन में आये! तो मातायें बोलो, टीचर्स बोलो-करें? हाँ जी बोलो। टीचर्स को भी आने को नहीं मिलेगा! कोई भी होगा, चाहे महारथी हो, चाहे प्यादा हो, चाहे घोड़े सवार हो-मधुबन वाले कहेंगे हम तो मधुबन में होंगे, लेकिन उन्हों को सामने नहीं बिठायेंगे। टी.वी. में जाकर देखें, सुने। ये इन्सल्ट तो है ना। किसलिये सामने नहीं आये! तो मधुबन वालों को पक्का कंगन बांधना पड़ेगा। पहले मधुबन वाले हाँ करते हैं? पहले मधुबन करेगा। ऐसे नहीं, दूसरे कहें कि पहले मधुबन को तो देखो, ये अच्छा नहीं। अच्छा, सभी तैयार हो? जो सोचे कि नहीं, बहुत मुश्किल है तो वो खड़े हो जाओ। क्योंकि पीछे वालों का हाथ दिखाई नहीं देता। कहेंगे कि हमने तो हाथ उठाया ही नहीं था। तो दादियाँ बताओ-करें? अच्छा! देखो, सभी हाँहाँ कर रहे हो फिर कल से सोचना शुरू नहीं करना कि ये क्या हो गया! अन्तर्मुखता से मुख को बन्द कर देना। मुख खुलेगा तब तो क्रोध होगा ना। तो इस सीजन में क्रोधमुक्त आत्माओं का मेला होगा। पसन्द है ना? अच्छा फिर भी बापदादा समझते हैं कि कइयों के संस्कार बहुत पक्के हैं, रिवाजी बोल भी बोलेंगे तो लगता ऐसे है जैसे क्रोध करते हैं। बोल ऐसा है, आदत पड़ गई है। इसीलिये अभी जब तक सीजन शुरू हो तब तक के लिये अगर कभी गलती से क्रोध हो भी गया ना तो तीन बारी माफ करेंगे। तीन बार छुट्टी है। (सभी ने तालियां बजाई) अच्छा तीन बार छुट्टियाँ चाहिये तभी तालियाँ बजाई। बापदादा ने तो ट्रायल की, फेल हो गये। कहो, हम करके दिखायेंगे, विजय प्राप्त करके दिखायेंगे, ये बोलो। कुछ तो नवीनता होनी चाहिये ना! वही फॉर्म आते हैं-खाना खाया, नहीं खाया? ब्रह्मचर्य में रहे, नहीं रहे? अभी फॉर्म चेंज करेंगे। नवीनता पसन्द है ना? टीचर्स को भी नियम में रहना पड़ेगा। टीचर्स को रियायत नहीं करेंगे। स्टूडेन्ट्स को तीन बार तो टीचर्स को दो बार।

पाण्डवों से - पाण्डव क्या कमाल करके दिखायेंगे? पाण्डव गाये जाते हैं - विजयी पाण्डव। कोई भी पाण्डव नाम लेंगे तो पाण्डवों की दो बातें सामने आती हैं एक बाप के साथी और दूसरा पाण्डव अर्थात् विजयी, तो जो भी पाण्डव हैं वो सभी ये संकल्प करो कि किसी भी बात में हार नहीं खानी है। सदा विजयी। और निश्चय रखो विजयी माला में मुझ पाण्डव का ही पार्ट है। विजयी रत्न हूँ। सदा अमृतवेले अपने मस्तक पर विजय का तिलक रोज रिफ्रेश करो और अमृतवेले से लेकर अपने मस्तक पर विजय का तिलक इमर्ज रूप में देखो। ऐसे नहीं, मैं तो हूँ ही। नहीं...। अगर हूँ तो सारे दिन में विजय प्राप्त की या नहीं की-ये चेक करो। तो पाण्डव अर्थात् विजयी।

टीचर्स से - टीचर्स क्या करेंगी? टीचर्स ने मेहनत तो की, बसें भरभर कर लाई। तो टीचर्स क्या कमाल करेंगी? टीचर्स को विशेष ये लक्ष्य रखना है कि सदा हर परिस्थिति में, परिस्थिति बदले लेकिन स्थिति नहीं बदले। स्थिति सदा खज़ानों से सम्पन्न हो और सन्तुष्ट रहे। परिस्थिति आयेगी और चली जायेगी। लेकिन परिस्थिति की क्या शक्ति है जो आपकी सन्तुष्टता को ले जाये। तो परिस्थिति का खेल भले देखो लेकिन साक्षीपन, सन्तुष्टता की सीट पर बैठकर देखो। तो टीचर्स अर्थात् सदा सम्पन्न और सन्तुष्ट। टीचर्स का टाइटल है सन्तुष्टमणियाँ। ऐसे हैं ना? सदा सन्तुष्टमणि।

मधुबन निवासियों से - मधुबन वाले क्या करेंगे? मधुबन वालों को बापदादा सेवा की मुबारक सदा दिल से पदमगुणा देते हैं, अब भी दे रहे हैं। अब मधुबन वालों को आगे क्या करना है? विशेष ये पाठ पक्का करना है कि मधुबन निवासी हर कर्म में, हर संकल्प में विशेष हीरो पार्टधारी हैं। मधुबन की स्टेज पर नहीं, लेकिन विश्व की स्टेज पर संकल्प, बोल और कर्म में हीरो पार्टधारी। तो हीरो एक्टर के ऊपर न चाहते भी सबकी नजर होती है और हीरो एक्टर थोड़ा भी नीचे ऊपर करता है तो हाहाकार हो जाता है। और अच्छा करता है तो वाहवाह हो जाती है। तो मधुबन वाले जीरो के साथ रहने वाले सदा हीरो पार्ट बजाने वाले। मधुबन में सब आ गये, हॉस्पिटल भी आ गई तो ज्ञान सरोर भी आ गया, तलहटी भी आ गई, सब आ गये, जो भी आठ भुजायें हैं सब आ गये। समझा? मधुबन निवासी नाम सुनकर सब कितना आपको प्यार करते हैं, कहाँ भी चले जाओ, कहाँ से आये हैं? मधुबन वाले हैं। जैसे मधुबन वाला बाबा मशहूर है ऐसे मधुबन वाले भी मशहूर हैं। ऐसे समझते हो ना! अच्छा है, नशा तो है मधुबन वालों को।

अच्छा, मेला निर्विघ्न हो गया? कल तो चलाचली का मेला शुरू होगा। मिलन का मेला समाप्त हो गया, अभी चलाचली का मेला होगा। देखो, क्या नहीं आप कर सकते हो! जो चाहे वो कर सकते हो! देख लिया ना! जो सुन करके समझते थे पता नहीं क्या होगा, कैसे होगा....? और अभी क्या कहते हैं? ये तो कुछ भी नहीं है। अभी ये कॉमन हो गया ना! कि गुजरात वालों को बहुत मेहनत लगी? मेहनत करनी पड़ी? नहीं, अच्छा लगा। प्राइज मिलने योग्य कार्य किया है। बापदादा दिल के यादप्यार की प्राइज गुजरात को दे रहे हैं। अच्छा, इसमें जो मातायें सवेरे से लेकर रोटी बनाती हैं, हाथ थक जाते होंगे, तो बापदादा दोनों ऐसे सेवाधारी माताओं के बाहों की मसाज कर रहे हैं। रोटी बनाने वाले खड़े हो जाओ। हाँ, बहुत ताली बजाओ। सब्जी काटने वाले भी हैं। सब्जी काटने वाले उठो। सबसे मुश्किल काम जो है वो है गर्मी में इतना समय गैस के आगे ठहरकर रोटी पकाना। तो मुबारक हो, मुबारक। खाने वाले नहीं होते तो ये क्या करते! देखो खाने वालों से ही तो रौनक है। जैसे मन्दिरों में घण्टे बजते हैं ना, जो जाता है घण्टे बजाता है तो इस मेले में बर्तनों के घण्टे बजते रहते हैं। अच्छी सीन होती है, जब बर्तन धुलाई करते हैं ना तो बहुत घण्टे बजते हैं बर्तनों के। तो कमाल तो खाने वालों की है ना!

मधुबन वालों ने भी बहुत मेहनत की। गुजरात को भी सहयोग देने वाले तो मधुबन वाले हैं। बहुत सहयोग दिया है ना। मेला निर्विघ्न समाप्त हो जाये - इस दृढ़ संकल्प से बहुत किया है। मधुबन वालों ने सहयोग दिया है ना या तंग किया है? मधुबन वाले तंग नहीं करते, सबको खुश करते हैं।

बापदादा तो टी. वी. में देखते हैं ना, तो ये देखा कि कोई की शक्ल के पोज इस बारी ज्यादा बदली नहीं हुए हैं। मैजारिटी ठीक रहे हैं, खुशी खुशी से सेवा की है। अगर थोड़ा बहुत हुआ भी है तो सहन शक्ति, समाने की शक्ति अच्छी यूज की है इसलिये मुबारक है। अच्छा, गर्मी लगी? कि पता ही नहीं पड़ा, आप बापदादा के याद की लहरों में लहरा रहे थे। टेन्ट में सोते हो या बापदादा की गोदी में सोते हो? टेन्ट में तो नहीं ना! टेन्ट उड़ जाये तो भी कोई हर्जा नहीं, गोदी तो है ना! लेकिन पहले थोड़ा डराया अभी प्रकृति भी समझ गई ये हटने वाले नहीं हैं। अगर छत उड़ जायेगी तो दूसरी छत आ जायेगी।

अच्छा, डबल विदेशी क्या करेंगे? अभी थोड़े हो, सिकीलधे हो। तो डबल विदेशी सदा अपने चेहरे को, सूरत को चलता फिरता म्युजयम बनायेंगे। आपके नयनों को कोई देखे तो नयनों द्वारा हर्षित रूहानी आकर्षित मूर्त का चित्र देखे। साधारण नयन नहीं देखे। दिव्य नयन। जिन दिव्य नयनों में सदा बाप बिन्दु दिखाई दे। तो आपके नयन चलताफिरता म्युजियम बन जायें। आपका मस्तक आत्म साक्षात्कार कराये। आपके ओंठ सर्व को मुस्कराना सिखा दें। ऐसे चारों ओर चैतन्य म्युजियम अपनी सेवा करते रहें। करने वाले हो ना? अच्छा है। उमंगउत्साह तो अच्छा है ही और सदा उमंगउत्साह में आगे बढ़ते रहेंगे।

डबल विदेशियों को मेले में मिलने में मजा आया? सिर्फ विदेश की सीजन तो देखते ही रहते हो लेकिन इतना परिवार तो देखते नहीं हो तो डबल फायदा हो गया। बापदादा से मिलना हो गया और परिवार से भी मिलना हो गया। तो लक्की हो। अच्छा, फॉरेन के कोई भी सेन्टर्स पर रहने वाले टीचर्स हाथ उठाओ। जो भी चारों ओर सेवा में निमित्त रहते हैं उन सबको बापदादा श्रेष्ठ सेवा के भाग्यवान समझते हैं। सेवा का भाग्य प्राप्त होना ये बहुत बड़ा भाग्य है। सेवा में प्रत्यक्षफल प्राप्त होने का अनुभव बहुत सहज होता है। अभीअभी सेवा की और अभीअभी स्थिति में आगे बढ़ते रहे। अगर नि:स्वार्थ सेवा की तो सेवा का फल मिलता है। स्वार्थ का फल नहीं मिलता है। लेकिन आप सभी सेवाधारी हो। इसलिये सेवा का फल अवश्य मिलता है। भविष्य तो कुछ नहीं है, अभी का प्रत्यक्षफल आत्मा को उड़ती कला का बल देता है। इसलिये बापदादा निमित्त सेवाधारियों को देख खुश होते हैं। तो श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मायें हैं और सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य द्वारा अनेकों के भाग्य को जगाते रहेंगे। अच्छे हैं, अथक सेवा करते हैं। बापदादा के पास सबका रिकॉर्ड है। ऐसे नहीं, बापदादा के पास तो हम जाते ही नहीं, आते ही नहीं, पता ही नहीं.... ये तो नहीं सोचते। जो गुप्त हैं वो सदा नयनों में हैं। गुप्त नहीं रह सकते हो, बाप के आगे प्रत्यक्ष हो। चाहे नाम हो, नहीं हो, सामने आओ, नहीं आओ, लेकिन सामने के बजाय नयनो में समाये हो। समझा?

चारों ओर के सर्व रूहानी प्योरिटी की पर्सनालिटी वाले विशेष आत्माओं को, सदा आदि से अन्त तक पर्सनालिटी की झलक दिखाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें, सदा पवित्रता, स्वच्छता, सत्यता के शक्ति से स्व को और विश्व को परिवर्तन करने वाले विश्व परिवर्तक आत्मायें, सदा निमित्त भाव से सेवाधारी बन प्रत्यक्षफल अनुभव करने वाले अनुभवी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से - अच्छा रहा मेला? कोई तकलीफ तो नहीं हुई ना? सबके शुभ संकल्प और उमंगउत्साह के संकल्प से सफलता है ही है। यह संगठन का संकल्प ऐसे होता है जो असफलता को मिटा देता है। जैसे किला होता है ना तो किला कमज़ोर तब होता है जब एक भी ईट हिलती है। और सब ईटे मजबूत हैं तो किला कभी हिल नहीं सकता। विजय है। तो ये भी संगठन से उमंगउत्साह और श्रेष्ठ संकल्प से, सहयोग से सफलता हुई पड़ी है। अच्छा लगा और समय प्रति समय और अनुभव करते जाते हैं। पहले क्वेश्चन उठता था होगा? लेकिन जो सोचो उसमें सफलता है ही। तो सफलता मूर्त का वरदान संगठन की शक्ति को मिलता है। बापदादा सदा गुडमॉर्निंग, गुडनाइट करते हैं। अच्छा डबल विदेश उड़ रहा है ना। अच्छा है।