04-12-95   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


‘‘यथार्थ निश्चय के फाउण्डेशन द्वारा सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करो’’

आज बापदादा देश-विदेश चारों ओर के नये-नये बच्चों को देख रहे थे। चाहे मधुबन में साकार रूप में आये हैं, चाहे आकार रूप में अपने- अपने सेवा-स्थान में आये हुए हैं, तो नयों-नयों को देख बापदादा सभी के निश्चय को देख रहे थे। क्योंकि निश्चय इस ब्राह्मण जीवन के सम्पन्नता का फाउण्डेशन है और फाउण्डेशन मज़बूत है तो सहज और तीव्र गति से सम्पूर्णता तक पहुँचना निश्चित है। तो बापदादा देख रहे थे कि निश्चय भी भिन्नभिन्न प्रकार का है। जो यथार्थ निश्चय है कि मैं परमात्मा बाप का बन गया, स्वयं को भी आत्म-स्वरूप में जानना, मानना, चलना और बाप को भी जो है वैसे जानना - ये है यथार्थ निश्चय।

दूसरा निश्चय है -योग द्वारा थोड़े समय के लिए अशान्ति से शान्ति का अनुभव करते हैं और स्थान का शक्तिशाली शान्त वायुमण्डल आकर्षित करता है वा ब्राह्मण परिवार, ब्राह्मण आत्माओं का आत्मिक प्यार और पवित्रता की जीवन का प्रभाव पड़ता है, कम्पनी अच्छी लगती है, दुनिया के वायुमण्डल के कान्ट्रास्ट में ये संग अच्छा लगता है, ज्ञान भी अच्छा, परिवार भी अच्छा, वायुमण्डल भी अच्छा ..... तो वो अच्छा लगना, उस फाउण्डेशन के आधार पर चलते रहते हैं। ये है दूसरा नम्बर। पहला नम्बर सुनाया यथार्थ निश्चयऔर दूसरा नम्बर अच्छा लगता हैऔर तीसरा नम्बर - दुनिया के सम्बन्धियों के दु:खमय वातावरण से बचकर जितना समय भी सेवाकेन्द्र पर आते हैं उतना समय दु:ख से किनारा होकर शान्ति का अनुभव करते हैं। ज्ञान की गुह्यता में नहीं जायेंगे लेकिन शान्ति की प्राप्ति के कारण कभी आते हैं और कभी नहीं भी आते हैं। लेकिन यथार्थ निश्चय बुद्धि विजयी होते हैं। और देखा जाता है कि जब शुरू- शुरू में आते हैं तो अशान्ति से तंग होते हैं, शान्ति के इच्छुक होते हैं। तो जैसे प्यासे को एक बूंद भी अगर पानी की मिल जाये तो वो बहुत बड़ी बात अनुभव करता है। तो अप्राप्ति से प्राप्ति होती है, परिवार में, ज्ञान में, योग में, वायुमण्डल में अन्तर दिखाई देता है। तो पहला समय बहुत अच्छे उमंग- उत्साह से चलते हैं, बहुत नशा रहता है, खुशी भी होती है। लेकिन अगर पहले नम्बर के यथार्थ निश्चय का फाउण्डेशन पक्का नहीं है, दूसरे या तीसरे नम्बर का निश्चय है तो धीरे-धीरे जो शुरू की खुशी, शुरू का जोश है, उसमें फर्क आ जाता है।

इस सीज़न में नये-नये बहुत आये हैं और चांस भी मिला है, यह तो बहुत अच्छा है। बापदादा को भी नये-नये बच्चों को देख खुशी होती है कि ये फिर से अपने परिवार में पहुँच गये। लेकिन ये चेक करो कि निश्चय का फाउण्डेशन पक्का है? हमारा निश्चय नम्बरवन है वा नम्बर टू है? अगर नम्बरवन निश्चय है तो चलते-चलते मुख्य पवित्रता धारण करने में मुश्किल नहीं लगेगा। अगर पवित्रता स्वप्न मात्र भी हिलाती है, हलचल में आती है, तो समझो नम्बरवन फाउण्डेशन कच्चा है। क्योंकि आत्मा का स्वधर्म पवित्रता है। अपवित्रता परधर्म है और पवित्रता स्वधर्म है। तो जब स्वधर्म का निश्चय हो गया तो परधर्म हिला नहीं सकता। कई बच्चे कहते हैं कि पहले तो बहुत अच्छे आते थे, अभी पता नहीं क्या हो गया? तो क्या हो जाता है कि बाप जो है, जैसा है, वैसे अनुभव में नहीं लाते। अगर पूछेंगे कि बाप साथ है? तो हाथ सब उठायेंगे। हाथ उठाना तो बहुत सहज है। लेकिन बाप साथ है तो बाप की पहली-पहली जो महिमा करते हो कि वो सर्वशक्तिमान है - ये मानते हो या सिर्फ जानते हो? तो जब सर्वशक्तिमान बाप साथ है तो सर्वशक्तिमान के आगे अपवित्रता आ सकती है? नहीं आ सकती। लेकिन आती तो है, तो आती फिर कहाँ से है? कोई और जगह है? चोर लोग जो होते हैं वो अपना स्पेशल गेट बना लेते हैं। चोर गेट होता है। तो आपके पास भी छिपा हुआ चोर गेट तो नहीं है? चेक करो। नहीं तो माया आई कहाँ से? ऊपर से आ गई? अगर ऊपर से भी आ गई तो ऊपर ही खत्म हो जानी चाहिये। कोई छिपे हुए गेट से आती है जो आपको पता नहीं पड़ता है तो चेक करो कि माया ने कोई चोर गेट तो नहीं बनाकर रखा है? और गेट बनाती भी कैसे है, मालूम है? आपके जो विशेष स्वभाव या संस्कार कमज़ोर होंगे तो वहीं माया अपना गेट बना देती है। क्योंकि जब कोई भी स्वभाव या संस्कार कमज़ोर है तो आप कितना भी गेट बन्द करो, लेकिन कमज़ोर गेट है, तो माया तो जानीजाननहार है, उसको पता पड़ जाता है कि ये गेट कमज़ोर है, इससे रास्ता मिल सकता है और मिलता भी है। चलते- चलते अपवित्रता के संकल्प भी आते हैं, बोल भी होता, कर्म भी हो जाता है। तो गेट खुला हुआ है ना, तभी तो माया आई। फिर साथ कैसे हुआ? कहने में तो कहते हो कि सर्वशक्तिमान साथ है तो ये कमज़ोरी फिर कहाँ से आई? कमज़ोरी रह सकती है? नहीं ना? तो क्यों रह जाती है? चाहे पवित्रता में कोई भी विकार हो, मानो लोभ है, लोभ सिर्फ खाने-पीने का नहीं होता। कई समझते हैं हमारे में पहनने, खाने या रहने का ऐसा तो कोई आकर्षण नहीं है, जो मिलता है, जो बनता है, उसमें चलते हैं। लेकिन जैसे आगे बढ़ते हैं तो माया लोभ भी रॉयल और सूक्ष्म रूप में लाती है। वो रॉयल लोभ क्या है? चाहे स्टूडेण्ट हो, चाहे टीचर हो, माया दोनों में रॉयल लोभ लाने का फुल पुरूषार्थ करती है। मानो स्टूडेण्ट है, बहुत अच्छा निश्चयबुद्धि, सेवाधारी है, सबमें अच्छा है लेकिन जब आगे बढ़ते हैं तो ये रॉयल लोभ आता है कि मैं इतना कुछ करता हूँ, सब रूप (तरह) से मददगार हूँ, तन से, मन से, धन से और जिस समय चाहिये उस समय सेवा में हाज़र हो जाता हूँ फिर भी मेरा नाम कभी भी टीचर वर्णन नहीं करती कि ये जिज्ञासु बहुत अच्छा है। अगर मानों ये भी नहीं आवे तो फिर दूसरा रूप क्या होता है? अच्छा, नाम ले भी लिया तो नाम सुनते-सुनते-मैं ही हूँ, मैं ही करता हूँ, मैं ही कर सकता हूँ, वो आभिमान के रूप में आ जायेगा। या बहुत काम करके आये और किसी ने आपको पूछा भी नहीं, एक गिलास पानी भी नहीं पिलाया, देखा ही नहीं, अपने आराम में या अपने काम में बिज़ी रहे, तो ये भी आता है कि करो भी और पूछे भी कोई नहीं। तो करना ही क्या है, करना या ना करना एक ही बात है। पूछने वाला तो कोई है नहीं, इससे आराम से घर में बैठो, जब होगा तब सेवा करेंगे। तो ये भिन्न-भिन्न प्रकार का विकारों का रॉयल रूप आता है। और एक भी विकार आ गया ना, मानो लोभ नहीं आया लेकिन अभिमान आ गया या अपने मानने तक का, हमारी मान्यता हो - उसका भान आ गया तो जहाँ एक विकार होता है वहाँ उनके चार साथी छिपे हुए रूप में होते हैं। और एक को आपने चांस दे दिया तो वो छिपे हुए जो हैं वो भी समय प्रमाण अपना चांस लेते रहते हैं। फिर कहते हैं कि पहले जैसा नशा अभी नहीं है, पहले बहुत अच्छा था, पहले अवस्था बड़ी अच्छी थी, अभी पता नहीं क्या हो गया है। माया चोर गेट से आ गई - ये है पता, ये नहीं कहो पता नहीं।

और टीचर को भी आता है। टीचर को क्या चाहिये? सेन्टर अच्छा हो, कपड़े भले कैसे भी हो लेकिन सेन्टर थोड़ा रहने लायक तो अच्छा हो। और जो साथी हो वो अच्छे हो, स्टूडेण्ट अच्छे हो, बाबा की भण्डारी अच्छी हो। अगर अच्छा स्टूडेन्ट चेंज हो जाये तो दिल थोड़ा धड़कता है। फिर समझते हैं कि क्या करें, ये मददगार था ना, अभी वो चला गया। मददगार जिज्ञासु था वा बाप है? तो उस समय कौन दिखाई देता है? जिज्ञासु या बाप? तो ये रॉयल माया फाउण्डेशन को हिलाने की कोशिश करती है। अगर आपको निश्चय है-सर्वशक्तिमान साथ है तो बाप किसी न किसी को निमित्त बना ही देता है। कई फिर सोचते हैं हमें कम से कम एक बार आबू की कांफ्रेंस में या किसी बड़ी कांफ्रेंस में चांस मिलना चाहिए, चलो और नहीं, योग शिविर तो करा लें, ये भी तो चांस होना चाहिये ना, चलो भाषण नहीं करे, स्टेज पर तो आवें, आखिर विनाश हो जायेगा, क्या विनाश तक भी हमारा नम्बर नहीं आयेगा, नम्बर तो आना चाहिये ना! लेकिन पहले भी बापदादा ने सुनाया कि अगर योग्य हैं, चांस मिलता है तो खुशी से करो लेकिन ये संकल्प करना कि हमें चांस मिलना चाहिए...... यह भी मांगना है। चाहिये-चाहिये ये है रॉयल मांगना। ये होना चाहिये..... ये हमें पहचानते नहीं हैं, दादी-दीदियाँ भी सभी को पहचानती नहीं हैं, जो आगे आते हैं उसको आगे कर लेते हैं-तो ये संकल्प आना यह भी एक सूक्ष्म मांगना है। लेकिन बापदादा ने सुना दिया है कि मानों आप स्टेज पर आ गई या आपकी कोई भी विशेषता के कारण, योग नहीं भी है, अवस्था इतनी अच्छी नहीं है लेकिन बोल में, कैचिंग पॉवर में विशेषता है तो चांस मिल जाता है, क्योंकि किसी की वाणी में मिठास होता है, स्पष्टता होती है और कैचिंग पावर होती है तो यहाँ के वहाँ के मिसाल वगैरह कैच करके सुनाते हैं इसीलिए उन्हों का नाम भी हो जाता है। कौन चाहिये? फलानी चाहिये। कौन आवे? फलानी आवे, चाहे योग में कच्ची भी हो.... तो इस पर नम्बर फाइनल नहीं होने हैं। जो फाइनल नम्बर मिलेंगे वो ये नहीं होगा कि इसने कितने भाषण किये या इसने कितने स्टूडेण्ट वा सेन्टर बनाये हैं, लेकिन योग्य कितनों को बनाया है? सेन्टर बनाना बड़ी बात नहीं है लेकिन योग्य कितनी आत्माओं को बनाया? नाम हो गया-30 सेन्टर की इंचार्ज है और 30 में से 15 हिल रहे हैं, 15 ठीक हैं तो फायदा हुआ या सिर्फ नाम हुआ? सिर्फ नाम होता है कि फलानी के 30 सेवाकेन्द्र हैं। लेकिन नम्बर इससे नहीं मिलेगा। फाइनल नम्बर जितनों को सुख दिया, जितना स्वयं शक्तिशाली रहे, उसी प्रमाण मिलेंगे। इसीलिये ये भी चाहिये-चाहिये खत्म कर दो। नहीं तो योग नहीं लगेगा। रोज़ यही देखते रहेंगे कि फलानी जगह प्रोग्राम हुआ मेरे को फिर भी नहीं बुलाया, अभी परसों यहाँ हुआ, कल वहाँ हुआ, आज यहाँ हुआ! तो योग लगेगा या गिनती होती रहेगी?

तो मुख्य बात - जो यथार्थ निश्चय है उसको पक्का करो। कहने में तो कह देते हो मैं आत्मा हूँ और बाप सर्वशक्तिमान है लेकिन प्रैक्टिकल में, कर्म में आना चाहिये। बाप सर्वशक्तिमान है लेकिन मेरे को माया हिला रही है तो कौन मानेगा आपका बाप सर्वशक्तिमान है! क्योंकि उससे ऊपर तो कोई है नहीं। तो बापदादा आज निश्चय के फाउण्डेशन को देख रहे हैं। चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं लेकिन इस निश्चय के फाउण्डेशन को प्रैक्टिकल में लाओ और समय पर यूज़ करो। समय बीत जाता है फिर बाप के आगे पश्चाताप के रूप में आते हो-क्या करें, बाबा हो गया, आप तो रहमदिल हो, रहम कर दो......तो ये क्या हुआ? ये भी रॉयल पश्चाताप है। साथ है तो किसी की हिम्मत नहीं है, निश्चयबुद्धि का अर्थ ही है विजयी। अगर कोई हिसाब-किताब आता भी है तो मन को नहीं हिलाओ। स्थिति को नीचे-ऊपर नहीं करो। चलो आया और फट से उसको दूर से ही खत्म कर दो। अभी योद्धे नहीं बनो। कई अभी निरन्तर योगी नहीं हैं। कुछ समय योगी हैं और कुछ समय युद्ध करने वाले योद्धे हैं। लेकिन अपने को कहलाते क्या हो? योद्धे कि योगी? कहलाते तो सहजयोगी हो। तो नये जो भी आये हैं उनको बापदादा फिर से भाग्य प्राप्त करने की मुबारक देते हैं। लेकिन मुबारक के साथ ये चेक भी करना कि फाउण्डेशन नम्बरवन है या नम्बर दो का है?

कई कहते हैं ज्ञान-योग बहुत अच्छा लगता है, अच्छा है वो तो ठीक है लेकिन कर्म में लाते हो? ज्ञान माना आत्मा, परमात्मा, ड्रामा....यह कहना नहीं। ज्ञान का अर्थ है समझ। समझदार जैसा समय होता है वैसे समझदारी से सदा सफल होता है। कभी भी देखो जीवन में दु:ख आते हैं तो क्या सोचते हो? पता नहीं, मुझे यह क्यों नहीं समझ में आया - यहीं कहेंगे। तो समझदार हो? ज्ञानी हो? बोलो हाँ या ना? (हाँ जी) हाँ तो बहुत अच्छी बोलते हैं। समझदार की निशानी है कभी धोखा नहीं खाना - ये है ज्ञानी की निशानी, और योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लियर बुद्धि। क्लीन भी हो और क्लियर भी हो। योगी कभी नहीं कहेगा-पता नहीं, पता नहीं। उनकी बुद्धि सदा ही क्लियर है। और धारणा स्वरूप की निशानी है सदा स्वयं भी डबल लाइट। कितनी भी ज़िम्मेवारी हो लेकिन धारणामूर्त, सदा डबल लाइट। चाहे मेला हो, चाहे झमेला हो-दोनों में डबल लाइट। और सेवाधारी की निशानी है-सदा निमित्त और निर्माण भाव। तो ये सभी अपने में चेक करो। कहने में तो सभी कहते हो ना कि चारों ही सब्जेक्ट के गॉडली स्टूडेण्ट हैं। तो निशानी दिखाई देनी चाहिये।

तो नये-नये क्या करेंगे? अपने निश्चय को और पक्का करना। नहीं तो फिर क्या होता है दो साल चलेंगे, तीन साल चलेंगे फिर वापस पुरानी दुनिया में चले जायेंगे। और फिर जो वापस जाते हैं वो उस दुनिया में भी सेट नहीं हो सकते हैं। न इस दुनिया के रहते, न उस दुनिया के। इसलिए अपना फाउण्डेशन बहुत पक्का करो। अनुभव करो-सर्वशक्तिमान बाप साथ है। बस एक बात भी अनुभव किया तो सबमें पास हो जायेंगे। रिवाज़ी प्राइम मिनिस्टर है, मिनिस्टर है उसके साथ का भी नशा रहता है। ये तो सर्वशक्तिमान है! अच्छा!

जो इस कल्प में पहले बारी आये हैं वो हाथ उठाओ। जो पहली बार आये हैं वो सदा खुश रहना और सदा आबाद रहना। अच्छा-टीचर्स भी बहुत आती हैं। एक साल में कितने चांस मिलते हैं? एक ही मिलता है। 12 मास को 13 मास तो कर नहीं सकते। बापदादा को तो दिल होती है टीचर्स ऐसे रिफ़्रेश हो जायें, शक्तिशाली बन जायें जो किसी भी सेन्टर पर कोई भी जाये तो एक आत्मा भी कमज़ोर नहीं दिखाई दे। निर्विघ्न सेवाकेन्द्र, उसको ही मार्क्स मिलती हैं। बापदादा इसमें खुश नहीं होते कि इस ज़ोन में हज़ार सेन्टर हैं, हज़ार गीता पाठशालायें हैं। बापदादा खुश होते हैं जिस ज़ोन में कोई खिटखिट नहीं हो, कोई कंप्लेंट नहीं हो। क्योंकि वास्तव में मानो टीचर मेहनत कर रही है और कमज़ोर संस्कार ही माया के आने का चोर गेट है। 52 खिटखिट भी हो रही है, वातावरण वैसे का वैसा है तो क्या वो सेवा है? कि झमेला है? तो आये किसलिए? ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारियां किसलिए बनें? झमेले के लिए? अगर झमेले ही चाहियें तो दुनिया में बहुत जगह हैं। बापदादा वहाँ का एड्रेस भी दे सकते हैं। लेकिन ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ बनना माना मिलन मेला मनाना, न कि झमेला। देखो अभी आये हो तो किस लक्ष्य से आये हो? झमेले के लिए आये हो? मिलन मनाने आये हो तो अच्छा लगता है ना! तो कभी भी, कोई भी स्टूडेन्ट हो वा टीचर हो, हैं तो सभी स्टूडेन्ट-कभी भी झमेला नहीं करो। झमेला करना अर्थात् क्या कहें! बापदादा को कहना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए चाहे टीचर, चाहे मधुबन, चाहे मधुबन के उप सेवाकेन्द्र, गीता पाठशालायें या आपके ज़ोन के उपसेवाकेन्द्र या केन्द्र, जो भी अपने को ब्राह्मण आत्मा कहलाते हैं, नहीं तो अपने को ब्राह्मण नहीं कहलाओ, क्षत्रिय कहलाओ, ब्राह्मण नाम को खराब नहीं करो। ब्राह्मण माना विजयी। अगर झमेला करते हैं तो क्षत्रिय हैं, न कि ब्राह्मण।

तो आज का पाठ क्या पक्का करेंगे? कौन सा संकल्प करेंगे? हर एक को मन, वाणी, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क में झमेला मुक्त बनना है। झमेला नहीं होना चाहिये। रोज़ चेक करो। ये व्यर्थ संकल्प का भी झमेला है। दूसरे के साथ नहीं है लेकिन अपने मन में तो झमेला है। तो सभी क्या संकल्प करेंगे? क्या बनेंगे? बोलो, झमेला मुक्त। क्योंकि डायमण्ड जुबली आ रही है तो डायमण्ड जुबली में झमेला वाला डायमण्ड चाहिये क्या? आप लोग पसन्द करेंगे? या बहुत सुन्दर डायमण्ड के बीच में दो-चार झमेले वाले डायमण्ड हों तो पसन्द करेंगे? नहीं करेंगे। लेकिन इसकी बहुत सहज विधि है, मेहनत करने की भी ज़रुरत नहीं। झमेला मुक्त होने की विधि सबसे सहज है कि पहले स्वयं को झमेले मुक्त करो। दूसरे के पीछे नहीं पड़ो। ये स्टूडेन्ट ऐसा है, ये साथी ऐसा है, ये सरकमस्टांस ऐसे हैं-उसको नहीं देखो लेकिन अपने को झमेला मुक्त करो। जहाँ झमेला हो वहाँ अपने मन को, बुद्धि को किनारे कर लो। आप सोचते हो-ये झमेला पूरा होगा तो बहुत अच्छा हो जायेगा, हमारी सेवा भी अच्छी, हमारी अवस्था भी अच्छी हो जायेगी। लेकिन झमेले पहाड़ के समान हैं। क्या पहाड़ से माथा टकराना है? पहाड़ हटेगा क्या? स्वयं किनारा कर लो या उड़ती कला से झमेले के पहाड़ के भी ऊपर चले जाओ। तो पहाड़ भी आपको एकदम सहज अनुभव होगा। मुझे बनना है। अमृतवेले से ये स्वयं से संकल्प करो कि मुझे झमेला मुक्त बनना है। बाकी तो है ही झमेलों की दुनिया, झमेले तो आयेंगे ही। आपकी दुनिया आपका सेवाकेन्द्र है तो आपकी दुनिया ही वो है, तो वहाँ ही आयेंगे ना। आप पेपर देने के लिए अमेरिका, लण्डन जायेंगी क्या? सेन्टर पर ही देंगी ना! तो झमेला नहीं आवे-यह नहीं सोचो। झमेला मुक्त बनना है-ये सोचो। हो सकता है? कि वहाँ सेन्टर पर या घर में जायेंगे तो कहेंगे कि ये झमेला तो मेरे से नहीं होगा। ऐसे तो नहीं? जब बाप ने कहा है कि पुरानी दुनिया से, पुरानी दुनिया के प्राप्तियों से अभी अपने मन और बुद्धि को ऊंचा करो। पुरानी दुनिया से लंगर उठा लिया कि अभी लगा हुआ है? बंधा हुआ तो नहीं है? वो कहानी सुनाते हैं ना तो अन्जान रहना ये भी अन्धकार है। वो अन्धकार नहीं लेकिन अन्जान रहना भी अन्धकार है। तो अन्धकार में नहीं रह जाना। अच्छी तरह से चेक करो। देखेंगे, ये झमेला मुक्त नम्बरवन कौन सा सेवाकेन्द्र या मधुबन बनता है?

मधुबन वालों को भी बनना है। ऐसे नहीं जो ग्रुप आया है उनको ही बनना है। मधुबन वाले नीचे बैठे हैं ना। (ओम् शान्ति भवन का हाल फुल होने के कारण सभी पाण्डव भवन में मुरली सुन रहे हैं) चाहे यहाँ बैठे हैं, चाहे नीचे बैठे हैं, लेकिन बापदादा के तो सामने हैं। आप टी.वी. के सामने हो, बापदादा आपके सामने है। तो मधुबन वाले या जो भी देश-विदेश सभी इसमें नम्बरवन बनो फिर डायमण्ड जुबली बहुत धूमधाम से मनायेंगे। अभी बापदादा को थोड़ा- थोड़ा होता है कि क्या सभी मुक्त हो जायेंगे! लेकिन ये बापदादा का संकल्प ठीक नहीं है, ऐसे ना? बाप को तो बच्चों पर निश्चय है ना! लेकिन थोड़ा-थोड़ा आता है - क्या करेंगे! बाकी है ही क्या? एक मास। डायमण्ड जुबली तो जनवरी से शुरू है। डायमण्ड जुबली के बीच में करेंगे, आरम्भ में करेंगे, क्या करेंगे? बताओ, राय बताओ कि डायमण्ड जुबली के आरम्भ में मुक्त हो जायेंगे या समाप्ति में मुक्त होंगे? जो समझते हैं थोड़ा समय तो चाहिये, इतने में कैसे हो जायेंगे, 63 जन्म के संस्कार हैं, एक मास में खत्म हो जायेंगे-मुश्किल लगता है....! टाइम चाहिये? 2 मास, 6 मास, क्या समझते हो? जो समझते हैं कुछ टाइम चाहिये वो हाथ उठाओ। अच्छा, जिन्होंने हाथ उठाया वो खड़े हो जाओ। सच्चे तो हैं ना। इन्हों का फोटो निकालो, इन्हों को टाइम देंगे। घबराओ नहीं। जिन्होंने भी हाथ उठाया है वो अपनी चिटकी में सेन्टर और अपना नाम ये परिचय लिख करके शान्तामणि को देना। कोई हर्जा नहीं है, आप लोगों ने सच बोला - तो जल्दी हो जायेंगे। बाकी इतने सभी अगर मुक्त हो गये तो ये थोड़े तो आपकी पूँछ पकड़कर भी मुक्त हो जायेंगे। अच्छा, पोस्ट वाली इशू कहाँ है? इसके पास पोस्ट आती है। तो एक मास के बाद कोई ऐसी झमेले की पोस्ट नहीं आनी चाहिये। अगर आवे तो आप बापदादा को बताना। ठीक है ना। पक्का काम करना चाहिये। इनको पहचानते हो ना। इससे सबका काम पड़ता है। भविष्य बनाने के निमित्त तो रखा हुआ है ना! सभी जमा यहीं आ करके करते हैं।

अच्छा, डबल विदेशियों ने क्या कहा? ज़ोन तो बहुत आये हैं। (सभी ज़ोन वालों से बापदादा ने हाथ उठवाये)

अच्छा, सभी ज़ोन, चाहे दिल्ली, चाहे गुजरात, चाहे तामिलनाडु जो भी हैं बापदादा ने देखा कि सभी के मन में डायमण्ड जुबली का उमंग-उत्साह बहुत अच्छा है। और सभी समझते हैं कि ये डायमण्ड जुबली, यज्ञ की स्थापना निर्विघ्न 60 साल चली है और आगे भी चलती रहेगी। तो 60 साल वृद्धि होती रही है, खत्म नहीं हो जाये संस्था या खिटखिट में बिगड़ नहीं जाये... यह इस विश्वविद्यालय की दुनिया के लिए बहुत बड़ी शान है। तो डायमण्ड जुबली मनाना अर्थात् हर ब्राह्मण का ये शान है कि हम ऐसे विश्वविद्यालय के या ऐसे श्रेष्ठ कार्य के साथी हैं। 60 साल कोई कम नहीं हैं, दुनिया के लिए तो असम्भव बात है। लेकिन आप जानते हो कि परमात्म कार्य सदा अचल, अविनाशी है। तो संस्था की शान अर्थात् हर ब्राह्मण आत्मा की शान है। फ़लक से कह सकते हो कि हमारे कार्य की डायमण्ड जुबली है। दुनिया वाले तो समझते हैं कि कोई भी बड़ा गुरू गया तो संस्था भी गई। इन्हों का ब्रह्मा बाबा गया तो सब कुछ गया.... लेकिन आप जानते हो कि ब्रह्मा बाप द्वारा भी चलाने वाला अविनाशी बाप है। तो ये डायमण्ड जुबली - एक कार्य के सफलता की निशानी है। इसमें चाहे युवा हो चाहे प्रवृत्ति वाले हो, सभी को डायमण्ड बन और अन्य डायमण्ड की माला बनानी है। अगर स्वयं निर्विघ्न श्रेष्ठ डायमण्ड हैं तो औरों को भी ऐसे ही बनायेंगे।

युवकों से

युवा हाथ उठाओ। मैजारिटी देश-विदेश में देखा जाता है कि जो नये-नये आते हैं वो मैजारिटी युवा आते हैं, युवा वर्ग का आना ये संस्था की शान है। क्योंकि गवर्नमेंट तो हार गई, वो तो साफ कहती है हमारी हिम्मत नहीं। तो आप युवा वर्ग ऐसी कमाल करके दिखाओ जो बाप का नाम हर युवा के चलन से, परिवर्तन से दिखाई दे। इसके लिए हर एक युवा को अपने को क्या बनाना है? दिव्य दर्पण। दर्पण में शक्ल दिखाई देती है ना। तो आपके चेहरे से औरों को फरिश्ता या दिव्य गुणधारीमू्र्त्त दिखाई दे।

(एजुकेशन विंग की ओर से गुजरात में चले अभियान का समाचार बापदादा को सुनाया) अच्छा है, कितनी आत्माओं को परिचय मिल गया ना! तो सेवा किया अर्थात् अपने पुण्य का खाता जमा किया। अभी एजुकेशन डिपार्टमेन्ट या वर्ग वालों ने चक्कर तो लगाया, बहुत अच्छा किया लेकिन एजुकेशन डिपार्टमेन्ट या वर्ग गवर्नमेंट को यह सिद्ध करके दिखावे कि सचमुच जो नाम है विश्वविद्यालय वो रीयल विश्वविद्यालय यही है। अभी मान्यता नहीं दिलाई है। तो ये काम अभी रहा हुआ है, अधूरा है अभी। तो ऐसा प्लैन बनाओ जो गवर्नमेंट स्वयं बोले कि हमारे विश्वविद्यालय इस विद्यालय के आगे कुछ नहीं हैं। अगर है तो ये है। यही है, यही है - ये बोले, तब एजुकेशन वालों को इनाम देंगे। अभी तो युद्ध चल रही है - एजुकेशन है या नहीं है? तो जो रीयल है, जो सत्य है वो सिद्ध तो होना है ना। तो थोड़ी और मेहनत करो। होना तो है लेकिन वो बिचारे इतने भटक रहे हैं, जल्दी से बच जावें। अच्छा, युवा अर्थात् दिव्य दर्पण। समझा?

प्रवृत्ति वालों से

प्रवृत्ति वाले क्या करेंगे? बापदादा प्रवृत्ति वालों की सदा किस पुष्प से तुलना करते हैं? (कमलपुष्प से)

अच्छा तो आप प्रवृत्ति वाले कमल पुष्प हो? कभी-कभी कोई बूंद तो नहीं लग जाती? कोई मिट्टी का प्रभाव तो नहीं पड़ जाता? तो प्रवृत्ति वाले इस सारी पुरानी दुनिया को, कमल पुष्प का तालाब बना दो। तालाब के बीच में कमल पुष्प बहुत अच्छे लगते हैं। तो इस पुरानी दुनिया को कमल पुष्प का बड़े से बड़ा तालाब बनाओ, जो जहाँ भी देखे ना तो कमल ही कमल दिखाई दें। इतनी हिम्मत है? डायमण्ड जुबली तक बनायेंगे? एक मास में नहीं कहते लेकिन एक वर्ष में तो बनाओ। बिचारे आत्माओं की हालतें देखो तो सचमुच रहम आता है। दुनिया की हालत देखो और अपने को देखो-कितना अन्तर है! कितनी बातों से, दु:खों से, दर्दों से छूट गये हो। समझते हो - दुनिया की ऐसी हालत है? किसी से भी पूछो क्या हालचाल है तो कहेंगे कि दुनिया का तो बेहाल है। और आपसे पूछे क्या हाल है? खुशहाल है। तो दुनिया बेहाल और आप सभी खुशहाल। पक्का है या कभी-कभी खुशी कम होती है? कम नहीं होने देना। तो सभी प्रवृत्ति वाले कमल हो ना! पक्का याद रखो कि हम कमल हैं। न्यारे और बाप के प्यारे। अच्छा!

कुमारियों से

कुमारियों की तो महिमा सदा बापदादा करते हैं। क्योंकि कुमारी साधारण कुमारी से विश्व की सेवाधारी कुमारी बन गई। कहाँ घर की चार दीवारों में रहने वाली और कहाँ विश्व के सेवाधारी बन गये या बन रहे हैं। तो कुमारियाँ अपने को ऐसे योग्य समझती हो? ऐसे योग्य हो या टोकरी उठाने वाली हो? टोकरी उठाते-उठाते तो सिरदर्द करता है। अभी कुमारियों को टोकरी वाली बनना है या ताज वाली बनना है? टोकरी छोड़ देंगी? कि टोकरी उठाना ज़रूरी है? कुमारियां क्या समझती हैं? जो समझती हैं कि नौकरी करनी ही पड़ेगी, मजबूरी है, वो हाथ उठाओ। मजबूरी वाली कोई नहीं है। तो घरों में क्यों बैठे हो? जब नौकरी की आवश्यकता नहीं तो क्यों बैठे हो? क्यों नहीं आते हो मैदान में? घर अच्छा लगता है? छोटा सा घर है, कोई खिटखिट नहीं है, माँ-बाप का प्यार मिल रहा है, ठीक है। सेवाकेन्द्र पर पता नहीं क्या-क्या होगा, कैसे चलेंगे, चल सकेंगे या नहीं सकेंगे, इसीलिए चार दीवारी ठीक है... ऐसे समझती हो? कुमारियों पर तो सब युगों में से संगमयुग पर विशेष परमात्म-कृपा है। अगर संगम पर परमात्म कृपा के अधिकारी नहीं बने तो सारे कल्प में नहीं बनेंगे। तो कुमारियों को परमात्म वरदान है या परमात्म-कृपा है, वो कभी भी छोड़नी नहीं चाहिये, लेनी चाहिये। समझा कुमारियों ने? डरो नहीं। आजकल समाचार सुना है, कई कुमारियाँ डरती हैं-पता नहीं, पता नहीं, पता नहीं! लेकिन सभी सेवाकेन्द्र एक जैसे नहीं होते हैं। अगर कोई बात है भी तो बड़ों को दे सकते हैं। उसके लिए कोई को मना नहीं है। अगर टीचर मना भी करती है तो बापदादा की छुट्टी है कि कहाँ से भी पत्र डाल सकते हो। सिर्फ क्या होता है-बापदादा पत्र के लिए तो कहते हैं लेकिन लम्बा बहुत लिख देते हैं। थोड़े में ही समझ में आ जाता है, लेकिन लम्बी कहानी होगी तो जो चार्ज वाली देखेगी ना, वो भी किनारे रख देगी। जब टाइम मिलेगा तब पढ़ेगी। और बड़ों तक भी नहीं जायेगा। उन्हों को भी टाइम मिले ना, तब तो आपका रामायण पढ़ेंगे। इसलिए लम्बा नहीं लिखो। शॉर्टकट में लिखो कि ये तकलीफ है और इसकी ये सैलवेशन चाहिये। फिर स्पष्टीकरण लेना होगा तो बड़े आपको आपेही बुलायेंगे। और ही मधुबन में आने का चांस मिलेगा। तो लम्बा नहीं लिखना। बाकी सबको छुट्टी है, अगर कोई ऐसी अयथार्थ बात है तो सुना सकते हैं। डरो नहीं। डरने के कारण अपनी परमात्म-कृपा का भाग्य नहीं गँवाओ। समझा कुमारियों ने? न अपने को तंग करो, न दूसरे को तंग करो। भाग्य अच्छा है। कुमारियाँ हिम्मत रखती हैं तभी सेन्टर खुल सकते हैं। अगर कुमारियाँ हिम्मत नहीं रखतीं तो सेन्टर भी नहीं खुलते। तो लक्की तो हो ना। सभी दीदी जी, दादी जी तो कहते हैं। यहीं टाइटल मिल जाता है। अच्छा।

बाकी मधुबन वाले या जो भी सम्पर्क में गीता पाठशालायें कहो, उपसेवाकेन्द्र कहो, जो भी हैं सभी को बापदादा अभी अपने समान सम्पन्न और मास्टर सर्वशक्तिमान देखना चाहते हैं। सबसे बड़े ते बड़ा मॉडल मधुबन है। मधुबन कौन सा मॉडल बनाता है, वह देखेंगे। जो सच्ची दिल से सेवा करते हैं उसको बापदादा भी पद्मगुणा मुबारक देते हैं। मधुबन वाले खातिरी तो करते हैं ना। चाहे ज्ञान सरोवर में, चाहे यहाँ पाण्डव भवन में, खातिरी तो करते हैं। तो खातिरी करने वालों को आप सभी भी मुबारक दे रहे हो ना। तो सारी सभा की तरफ से मुबारक।

अच्छा, चारों ओर के सदा श्रेष्ठ भाग्यवान भाग्य विधाता को अपना बनाने वाले ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा बापदादा के श्रीमत को सुना और किया ऐसे सर्व सपूत बच्चों को, सदा सेवा में अचल रहने वाले झमेला मुक्त और परमात्म-मिलन मेला मनाने वाले सभी बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

अच्छा-डबल विदेशियों को डबल नशा है ना? डबल विदेशी अर्थात् डबल लाइट, डबल नशा और डबल बापदादा और परिवार के प्यारे। समझा?

अच्छा! हेल्थ मेला करने वालों को भी मुबारक। वैसे रिज़ल्ट अच्छी है और रहेगी।

(दादियां बापदादा के सामने बैठी हैं) टीचर्स को अच्छा चांस मिल जाता है। मेहनत भी करती हैं, यहाँ थकावट उतर जाती है। यहाँ रिफ़्रेश होते हो या यहाँ भी पार्टी की चिन्ता रहती है? वैसे तो मधुबन की दिनचर्या ऐसी सेट है जो टाइम भी नहीं है। बिज़ी रहने चाहे, क्लासेस का लाभ उठाना चाहे तो स्टूडेण्ट को फुर्सत मिलती है? मधुबन में फ्री होते हो? पाण्डवों से पूछते हैं कि क्लासेस में बिज़ी रहते हो, क्या होता है? मधुबन में यहाँ वहाँ की बातें करने का फ्री टाइम मिलता है? क्लासेस में बिज़ी रहते हो? सभी क्लासेस अटेण्ड करते हो? क्लासेस ज़रुर अटेण्ड करना चाहिये क्योंकि हर एक रत्न में बापदादा वा ड्रामानुसार कोई न कोई विशेषता भरी हुई है। तो क्लास कोई भी करावे। ऐसे नहीं फलाने का क्लास है तो सभी भागो और कोई दूसरे का है तो आधा घूमना...। कोई भी क्लास कराता है उसमें विशेषता होती है। और आप लोगों के पास सभी तो पहुँच भी नहीं सकते। यहीं मिलते हैं। तो जिन्हों ने सभी क्लास अटेण्ड किये हैं, एक भी मिस नहीं किया है, वह हाथ उठाओ। अच्छा, टीचर्स अपने काम उतारती हैं। आप एक तो ऑफिशियल राउण्ड लगाने जाते हो वो तो अच्छी बात है, लेकिन क्लास के टाइम जो क्लास छोड़ करके और कहाँ घूमने गये हैं वो हाथ उठाओ। तो अभी ऐसे नहीं करना। क्लास की कई बातें समय पर बरोबर काम में आयेंगी। अभी सुनते हो, तो समझते हो बहुत सुन लिया। लेकिन कोई-कोई पॉइन्ट ऐसे टाइम में काम पर आती हैं जो आप अन्दर ही अन्दर शुक्रिया मानेंगे, इसलिए बिजी रहो। मधुबन माना पढ़ाई में बिज़ी। बाकी खाओ पियो मौज करो, वो भले करो लेकिन टाइम पर। अच्छा है, नयों-नयों को तो नई बातें मिलती हैं। पढ़ाई में अटेन्शन बहुत ज़रूरी है। पढ़ाई माना सिर्फ सुनना नहीं। पढ़ाई का अर्थ है सुनना और करना। अच्छा, सब खुशहाल तो हैं ही। बेहाल नहीं, खुशहाल हो। अच्छा। (एजुकेशन अभियान के भाई-बहनें बापदादा के सामने खड़े हुए) अच्छा है, सेवा का फल, मधुबन में आने की छुट्टी मिल गई। लेकिन इनाम तभी देंगे जब गवर्नमेंट से कहलवायेंगे। कहने से भी कुछ नहीं होता। ये तो ऑफिशियल लिखा-पढ़ी हो। कहने में तो प्राइम मिनिस्टर भी कहकर गया-बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है। तो चाहे डॉक्टर्स, एजुकेशन वाले वा इन्जीनियर्स आदि, जो भी सेवा अर्थ रैली निकालते हैं वो अच्छा है। तो मुबारक हो।

अच्छा! ओम् शान्ति।