10-03-96   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


करनहारऔर करावनहारकी स्मृति से कर्मातीत स्थिति का अनुभव

आज कल्याणकारी बाप अपने साथी कल्याणकारी बच्चों को देख रहे हैं। सभी बच्चे बहुत ही लगन से, प्यार से विश्व कल्याण का कार्य करने में लगे हुए हैं। ऐसे साथियों को देख बापदादा सदा वाह साथी बच्चे वाह! यह गीत गाते रहते हैं। आप सभी भी वाह-वाह के गीत गाते रहते हो ना? आज बापदादा ने चारों ओर के सेवा की गति देखी। साथ में स्व-पुरूषार्थ की भी गति को देखा। तो सेवा और स्व-पुरूषार्थ दोनों के गति में क्या देखा होगा? आप जानते हो? सेवा की गति तीव्र है वा स्व-पुरूषार्थ की गति तीव्र है? क्या है? दोनों का बैलेन्स है? नहीं है? तो विश्व परिवर्तन की आत्माओं को वा प्रकृति को ब्लैसिंग कब मिलेगी? क्योंकि बैलेन्स से जो आप सभी को ब्लैसिंग मिली हैं वह औरों को मिलेंगी। तो अन्तर क्यों? कहलाते क्या हो - कर्मयोगी वा सिर्फ योगी? कर्मयोगी हो ना! पक्का है ना? तो सेवा भी कर्म है ना! कर्म में आते हो, बोलते हो वा दृष्टि देते हो, कोर्स कराते हो, म्यूजियम समझाते हो-यह सब श्रेष्ठ कर्म अर्थात् सेवा है। तो कर्मयोगी अर्थात् कर्म के समय भी योग का बैलेन्स। लेकिन आप खुद ही कह रहे हो कि बैलेन्स कम हो जाता है। इसका कारण क्या? अच्छी तरह से जानते भी हो, नई बात नहीं है। बहुत पुरानी बात है। बापदादा ने देखा कि सेवा वा कर्म और स्व-पुरूषार्थ अर्थात् योगयुक्त। तो दोनों का बैलेन्स रखने के लिए विशेष एक ही शब्द याद रखो-वह कौनसा? बाप करावनहारहै और मैं आत्मा, ( मैं फलानी नहीं) आत्मा करनहारहूँ। तो करन-करावनहार’, यह एक शब्द आपका बैलेन्स बहुत सहज बनायेगा। स्व-पुरूषार्थ का बैलेन्स या गति कभी भी कम होती है, उसका कारण क्या? ‘करनहारके बजाए मैं ही करने वाली या वाला हूँ, ‘करनहारके बजाए अपने को करावनहारसमझ लेते हो। मैं कर रहा हूँ, जो भी जिस प्रकार की भी माया आती है, उसका गेट कौन सा है? माया का सबसे अच्छा सहज गेट जानते तो हो ही - मैं। तो यह गेट अभी पूरा बन्द नहीं किया है। ऐसा बन्द करते हो जो माया सहज ही खोल लेती है और आ जाती है। अगर करनहारहूँ तो कराने वाला अवश्य याद आयेगा। कर रही हूँ, कर रहा हूँ, लेकिन कराने वाला बाप है। बिना करावनहारके करनहारबन नहीं सकते हैं। डबल रूप से करावनहारकी स्मृति चाहिए। एक तो बाप करावनहारहै और दूसरा मैं आत्मा भी इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराने वाली हूँ। इससे क्या होगा कि कर्म करते भी कर्म के अच्छे या बुरे प्रभाव में नहीं आयेंगे। इसको कहते हैं-कर्मातीत अवस्था।

आप सबका लक्ष्य क्या है? कर्मातीत बनना है ना! या थोड़ा-थोड़ा कर्मबन्धन रहा तो कोई हर्जा नहीं? रहना चाहिए या नहीं रहना चाहिए? कर्मातीत बनना है? बाप से प्यार की निशानी है-कर्मातीत बनना। तो करावनहारहोकर कर्म करो, कराओ, कर्मेन्द्रियां आपसे नहीं करावें लेकिन आप कर्मेन्द्रियों से कराओ। बिल्कुल अपने को न्यारा समझ कर्म कराना-यह कानसेसनेस इमर्ज रूप में हो। मर्ज रूप में नहीं। मर्ज रूप में कभी करावनहारके बजाए कर्मेन्द्रियों के अर्थात् मन के, बुद्धि के, संस्कार के वश हो जाते हैं। कारण? ‘करावनहारआत्मा हूँ, मालिक हूँ, विशेष आत्मा, मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ, यह स्मृति मालिकपन की स्मृति दिलाती है। नहीं तो कभी मन आपको चलाता और कभी आप मन को चलाते। इसीलिए सदा नेचरल मनमनाभव की स्थिति नहीं रहती। मैं अलग हूँ बिल्कुल, और सिर्फ अलग नहीं लेकिन मालिक हूँ, बाप को याद करने से मैं बालक हूँ और मैं आत्मा कराने वाली हूँ तो मालिक हूँ। अभी यह अभ्यास अटेन्शन में कम है। सेवा में बहुत अच्छा लगे हुए हो लेकिन लक्ष्य क्या है? सेवाधारी बनने का वा कर्मातीत बनने का? कि दोनों साथ-साथ बनेंगे? ये अभ्यास पक्का है? अभी-अभी थोड़े समय के लिए यह अभ्यास कर सकते हो? अलग हो सकते हो? या ऐसे अटैच हो गये हो जो डिटैच होने में टाइम चाहिए? कितने टाइम में अलग हो सकते हो? 5मिनट चाहिए, एक मिनट चाहिए वा एक सेकण्ड चाहिए? एक सेकण्ड में हो सकते हो?

पाण्डव एक सेकण्ड में एकदम अलग हो सकते हो? आत्मा अलग मालिक और कर्मेन्द्रियां कर्मचारी अलग, यह अभ्यास जब चाहो तब होना चाहिए। अच्छा, अभी-अभी एक सेकण्ड में न्यारे और बाप के प्यारे बन जाओ। पावरफुल अभ्यास करो बस मैं हूँ ही न्यारी। यह कर्मेन्द्रियां हमारी साथी हैं, कर्म की साथी हैं लेकिन मैं न्यारा और प्यारा हूँ। अभी एक सेकण्ड में अभ्यास दोहराओ। (ड्रिल) सहज लगता है कि मुश्किल है? सहज है तो सारे दिन में कर्म के समय यह स्मृति इमर्ज करो, तो कर्मातीत स्थिति का अनुभव सहज करेंगे। क्योंकि सेवा वा कर्म को छोड़ सकते हो? छोड़ेंगे क्या? करना ही है। तपस्या में बैठना यह भी तो कर्म है। तो बिना कर्म के वा बिना सेवा के तो रह नहीं सकते हो और रहना भी नहीं है। क्योंकि समय कम है और सेवा अभी भी बहुत है। सेवा की रूपरेखा बदली है। लेकिन अभी भी कई आत्माओं का उल्हना रहा हुआ है। इसलिए सेवा और स्व-पुरूषार्थ दोनों का बैलेन्स रखो। ऐसे नहीं कि सेवा में बहुत बिजी थे ना इसलिए स्व-पुरूषार्थ कम हो गया। नहीं। और ही सेवा में स्व-पुरूषार्थ का अटेन्शन ज्यादा चाहिए। क्योंकि माया को आने की मार्जिन सेवा में बहुत प्रकार से होती है। नाम सेवा लेकिन होता है स्वार्थ। अपने को आगे बढ़ाना है लेकिन बढ़ाते हुए बैलेन्स को नहीं भूलना है क्योंकि सेवा में ही स्वभाव, संबंध का विस्तार होता है और माया चांस भी लेती है। थोड़ा सा बैलेन्स कम हुआ और माया नया-नया रूप धारण कर लेती है, पुराने रूप में नहीं आयेगी। नये-नये रूप में, नई-नई परिस्थिति के रूप में, सम्पर्क के रूप में आती है। तो अलग में सेवा को छोड़कर अगर बापदादा बिठा दे, एक मास बिठाये, 15 दिन बिठाये तो कर्मातीत हो जायेंगे? एक मास दें बस कुछ नहीं करो, बैठे रहो, तपस्या करो, खाना भी एक बार बनाओ बस। फिर कर्मातीत बन जायेंगे? नहीं बनेंगे?

अगर बैलेन्स का अभ्यास नहीं है तो कितना भी एक मास क्या, दो मास भी बैठ जाओ लेकिन मन नहीं बैठेगा, तन बैठ जायेगा। और बिठाना है मन को न कि सिर्फ तन को। तन के साथ मन को भी बिठाना है, बैठ जाए बस बाप और मैं, दूसरा न कोई। तो एक मास ऐसी तपस्या कर सकते हो या सेवा याद आयेगी? बापदादा वा ड्रामा दिखाता रहता है कि दिन-प्रतिदिन सेवा बढ़नी ही है, तो बैठ कैसे जायेंगे? जो एक साल पहले आपकी सेवा थी और इस साल जो सेवा की वह बढ़ी है या कम हुई है? बढ़ गई है ना! न चाहते भी सेवा के बन्धन में बंधे हुए हो लेकिन बैलेन्स से सेवा का बन्धन, बन्धन नहीं संबंध होगा। जैसे लौकिक संबंध में समझते हो कि एक है कर्म बन्धन और एक है सेवा का संबंध। तो बन्धन का अनुभव नहीं होगा, सेवा का स्वीट संबंध है। तो क्या अटेन्शन देंगे? सेवा और स्व-पुरूषार्थ का बैलेन्स। सेवा के अति में नहीं जाओ। बस मेरे को ही करनी है, मैं ही कर सकती हूँ, नहीं। कराने वाला करा रहा है, मैं निमित्त करनहारहूँ। तो जिम्मेवारी होते भी थकावट कम होगी। कई बच्चे कहते हैं - बहुत सेवा की है ना तो थक गये हैं, माथा भारी हो गया है। तो माथा भारी नहीं होगा। और ही करावनहारबाप बहुत अच्छा मसाज़ करेगा। और माथा और ही फ़्रेश हो जायेगा। थकावट नहीं होगी, एनर्जी एकस्ट्रा आयेगी। जब साइन्स की दवाइयों से शरीर में एनर्जी आ सकती है, तो क्या बाप की याद से आत्मा में एनर्जी नहीं आ सकती? और आत्मा में एनर्जी आई तो शरीर में प्रभाव आटोमेटिकली पड़ता है। अनुभवी भी हो, कभी-कभी तो अनुभव होता है। फिर चलते-चलते लाइन बदली हो जाती है और पता नहीं पड़ता है। जब कोई उदासी, थकावट या माथा भारी होता है ना फिर होश आता है, क्या हुआ? क्यों हुआ? लेकिन सिर्फ एक शब्द करनहारऔर करावनहारयाद करो, मुश्किल है या सहज है? बोलो हाँ जी। अच्छा।

अभी 9 लाख प्रजा बनाई है? विदेश में कितने बने हैं? 9 लाख बने हैं? और भारत में बने हैं? नहीं बने हैं। तो आप ही समाप्ति के कांटे को आगे नहीं बढ़ने देते। बैलेन्स रखो, डायमण्ड जुबली है ना तो खूब सेवा करो लेकिन बैलेन्स रखकर सेवा करो तो प्रजा जल्दी बनेंगी। टाइम नहीं लगेगा। प्रकृति भी बहुत थक गई है, आत्मायें भी निराश हो गई हैं। और जब निराश होते हैं तो किसको याद करते हैं? भगवान, बाप को याद करते हैं, लेकिन उसका पूरा परिचय न होने के कारण आप देवी-देवताओं को ज्यादा याद करते हैं। तो निराश आत्माओं की पुकार आपको सुनने में नहीं आती? आती है कि अपने में ही मस्त हो? मर्सीफुल हो ना! बाप को भी क्या कहते हैं? मर्सीफुल। और सब धर्म वाले मर्सा जरूर मांगते हैं, सुख नहीं मांगेगे लेकिन मर्सी सबको चाहिए। तो कौन देने वाला है? आप देने वाले हो ना? या लेने वाले हो? लेकर देने वाले। दाता के बच्चे हो ना! तो अपने भाई बहिनों के ऊपर रहमदिल बनो, और रहमदिल बन सेवा करेंगे तो उसमें निमित्त भाव स्वत: ही होगा। किसी पर भी चाहे कितना भी बुरा हो लेकिन अगर आपको उस आत्मा के प्रति रहम है, तो आपको उसके प्रति कभी भी घृणा या ईर्ष्या या क्रोध की भावना नहीं आयेगी। रहम की भावना सहज निमित्त भाव इमर्ज कर देती है। मतलब का रहम नहीं, सच्चा रहम। मतलब का रहम भी होता है, किसी आत्मा के प्रति अन्दर लगाव होता है और समझते हैं रहम पड़ रहा है। तो वह हुआ मतलब का रहम। सच्चा रहम नहीं, सच्चे रहम में कोई लगाव नहीं, कोई देह भान नहीं, आत्मा- आत्मा पर रहम कर रही है। देह अभिमान वा देह के किसी भी आकर्षण का नाम-निशान नहीं। कोई का लगाव बॉडी से होता है और कोई का लगाव गुणों से, विशेषता से भी होता है। लेकिन विशेषता वा गुण देने वाला कौन? आत्मा तो फिर भी कितनी भी बड़ी हो लेकिन बाप से लेवता (लेने वाली) है। अपना नहीं है, बाप ने दिया है। तो क्यों नहीं डायरेक्ट दाता से लो। इसीलिए कहा कि स्वार्थ का रहम नहीं। कई बच्चे ऐसे नाज़-नखरे दिखाते हैं, होगा स्वार्थ और कहेंगे मुझे रहम पड़ता है। और कुछ भी नहीं है सिर्फ रहम है। लेकिन चेक करो-नि:स्वार्थ रहम है? लगावमुक्त रहम है? कोई अल्पकाल की प्राप्ति के कारण तो रहम नहीं है? फिर कहेंगे बहुत अच्छी है ना, बहुत अच्छा है ना, इसीलिए थोड़ा.... थोड़े की छुट्टी नहीं है। अगर कर्मातीत बनना है तो यह सभी रूकावटें हैं जो बॉडी कानेसस में ले आती हैं। अच्छा है, लेकिन बनाने वाला कौन? अच्छाई भले धारण करो लेकिन अच्छाई में प्रभावित नहीं हो। न्यारे और बाप के प्यारे। जो बाप के प्यारे हैं वह सदा सेफ हैं। समझा!

अगर सेवा को बढ़ाते हो और बढ़ाना ही है तो स्थापना को भी नज़दीक लाना है या नहीं? कौन लायेगा? बाप लायेगा? सभी लायेंगे। साथी हैं ना! अकेला बाप भी कुछ नहीं कर सकता, सिवाए आप साथी बच्चों के। देखो, बाप को अगर समझाना भी है तो भी शरीर का साथ लेना पड़ता है। बिना शरीर के साथ के बोल सकता है? चाहे पुरानी गाड़ी हो चाहे अच्छी हो, लेकिन आधार तो लेना पड़ता है। बिना आधार के कर नहीं सकता। ब्रह्मा बाप का साथ लिया ना, तभी तो आप ब्राह्मण बनें। ब्रह्माकुमार कहते हो, शिवकुमार नहीं कहते हो। क्योंकि निराकार बाप को भी साकार का आधार लेना ही है। जैसे साकार ब्रह्मा का आधार लिया, अभी भी ब्रह्मा के अव्यक्त फरिश्ते के रूप में आधार लेने के बिना आपकी पालना नहीं कर सकते हैं। चाहे साकार में लिया, चाहे आकार रूप में लिया लेकिन आत्मा का आधार, साथ लेना ही पड़ता है। वैसे तो आलमाइटी अथॉरिटी है, जब जादूगर विनाशी खेल सेकण्ड में दिखा सकते हैं तो क्या आलमाइटी अथॉरिटी जो चाहे वह नहीं कर सकता है? कर सकता है? अभी-अभी विनाश को ला सकता है? अकेला ला सकता है? अकेला नहीं कर सकता। चाहे आलमाइटी अथॉरिटी भी है लेकिन आप साथियों के संबंध में बंधा हुआ है। तो बाप का आपसे कितना प्यार है। चाहे कर सकता है, लेकिन नहीं कर सकता। जादू की लकड़ी नहीं घुमा सकता है क्या? लेकिन बाप कहते हैं कि राज्य अधिकारी कौन बनेगा? बाप बनेगा क्या? आप बनेंगे। स्थापना तो कर ले, विनाश भी कर ले लेकिन राज्य कौन करेगा? बिना आपके काम चलेगा? इसलिए बाप को आप सभी को कर्मातीत बनाना ही है। बनना ही है ना कि बाप जबरदस्ती बनाये? बाप को बनाना है और आप सबको बनना ही है। यह है स्वीट ड्रामा। ड्रामा अच्छा लगता है ना? कि कभी कभी तंग हो जाते हो, ये क्या बना? यह बदलना चाहिए-सोचते हो? बाप भी कहते हैं - बना बनाया ड्रामा है, यह बदल नहीं सकता। रिपीट होना है लेकिन बदल नहीं सकता। ड्रामा में इस आपके अन्तिम जन्म को पावर्स हैं। है ड्रामा, लेकिन ड्रामा में इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म में बहुत ही पावर्स मिली हुई हैं। बाप ने विल किया है इसीलिए विल पावर है। तो कौन सा शब्द याद रखेंगे? ‘करन-करावनहार। पक्का या प्लेन में जाते-जाते भूल जायेंगे? भूलना नहीं।

अभी फिर से अपने को शरीर के बन्धन से न्यारा कर्मातीत स्टेज, कर्म करा रहे हैं लेकिन न्यारा, देख रहे हैं, बात कर रहे हैं लेकिन न्यारा, मालिक और बाप द्वारा निमित्त आत्मा हूँ, इस स्मृति में फिर से मन और बुद्धि को स्थित करो। (ड्रिल) अच्छा।

चारों ओर के सदा सेवा के उंमग उत्साह में रहने वाले सेवाधारी आत्मायें, सदा स्व-पुरूषार्थ और सेवा दोनों का बैलेन्स रखने वाली ब्लिसफुल आत्मायें, सदा नि:स्वार्थ रहमदिल बन सर्व आत्माओं प्रति सच्चा रहम करने वाली विशेष आत्मायें, सदा सेकण्ड में अपने को कर्म बन्धन वा अनेक रॉयल बन्धनों से मुक्त करने वाले तीव्र पुरूषार्था आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

आज विशेष मुख्य मधुबन निवासी और मधुबन की भुजायें, कितनी भुजायें हैं? 5 चाहे ज्ञान सरोवर है, चाहे हॉस्पिटल वाले हैं, चाहे म्यूजियम वाले हैं, तलहटी वाले हैं, संगम वासी हैं, पीस-पार्क वाले हैं और प्रवृत्ति में रह निवृत्ति का पार्ट बजाने वाले हैं, जो भी सभी हैं, तो लगातार सभी ने बहुत समय से बहुत अच्छी सेवा की है, सबको खुशी दी है और दुआयें ली हैं, तो बापदादा ऐसे सर्व सेवाधारियों को मुबारक भी देते हैं। आप डबल विदेशियों की सेवा वा आने वाले मेहमानों की सेवा अच्छी की है ना?

मधुबन वाले यहाँ कितने बैठे हैं, वह उठो, हॉस्पिटल वाले उठो, बहुत अच्छा। म्यूजियम वाले? तलहटी, शान्तिवन वाले? संगम वाले? ज्ञान सरोवर के सेवाधारी? पीस-पार्क के सेवाधारी?

देखो, आप लोगों के वहाँ तो कभी-कभी बड़े प्रोग्राम होते हैं लेकिन मधुबन में सदा ही बड़े प्रोग्राम हैं। छोटे प्रोग्राम नहीं चलते, बड़े ही चलते हैं तो मधुबन अर्थात् 5 ही इकट्ठे हैं, बिना हॉस्पिटल के भी काम नहीं चलता। और बिना ज्ञान सरोवर के सेवाधारियों से भी काम नहीं चलता और पीस-पार्क तो जैसा नाम है वैसे अनेक आत्माओं को शान्ति का अनुभव कराने वाला है, तो पीस-पार्क के सेवाधारी, पाण्डव भवन के सेवाधारी सब बहुत आवश्यक हैं। और अभी तो सभी के मन में क्या है? अभी क्या बनाना है? शान्तिवन में मेला होना है, नाम शान्तिवन है लेकिन होना मेला है, झमेला नहीं, मेला। दुनिया के मेले झमेले होते हैं, यहाँ मेला मिलन का होता है। तो सभी को शान्तिवन तैयार करने के लिए बहुत उमंग है? कि मुश्किल है? अभी डायमण्ड जुबली मनानी है? फिर शुरू करें? (हाँ जी) डबल काम करना पड़ेगा। एक डायमण्ड जुबली और दूसरा शान्तिवन की तैयारी। तो बूंद-बूंद से तालाब बन जायेगा। देखो खेल क्या है? एक बिन्दू और दूसरा बूंद। बाप के यादगार जो मन्दिर हैं उसमें भी क्या दिखाते हैं? बूंद भी दिखाते हैं और बिन्दू भी दिखाते हैं। तो आप सबकी शुभ भावना और सहयोग की बूंद यह मेला भवन तैयार कर देगी। तो सभी सहयोगी हैं ना? कि डायमण्ड जुबली के बाद करें? 6 मास रूक जायें? शुरू कर दें? (हाँ जी) भारत वाले भी सुन रहे हैं, ऐसे नहीं सिर्फ आप डबल विदेशी लेकिन सभी के बूंद से महल तैयार हो जायेंगे और आप मेला मनायेंगे।

डबल फारेनर्स ने भी इस वर्ष सेवा में अच्छा हाइजम्प दिया है। कितने प्रोग्राम किये हैं? एक के पीछे एक प्रोग्राम करते रहे हैं। और सभी सफल हैं और सदा रहेंगे। तो जिन्होंने पहला प्रोग्राम रिट्रीट का किया वह उठो, जो सहयोगी हैं, रेसपान्सिबुल वह उठो। सिर्फ 3 शक्तियां रही हुई हैं बाकी चली गई हैं, तो जो चले गये हैं उन्हों को पद्मगुणा मुबारक देना। अच्छा-दूसरा प्रोग्राम महिलाओं का, उसमें सहयोगी बनने वाले उठो। इसमें पाण्डव बैकबोन रहे हैं और शक्तियां आगे रही हैं। बाकी एक प्रोग्राम होना है। (फैमिली रिट्रीट का कार्यक्रम होने वाला है) अच्छा। बच्चों के प्रोग्राम का जिम्मेवार कौन रहा? (चले गये) उन्हों को डबल पदम मुबारक। अभी जो होने वाला है उसके निमित्त कौन है? इसमें पाण्डव हैं, तो इनएडवांस मुबारक। यह हुए सेवा के निमित्त। लेकिन अगर देखने वाले, बैठने वाले नहीं होते तो हाल खाली होता, इसलिए आप देखने वाले, बैठने वाले उन्हों को भी मुबारक। तो डबल विदेशियों ने इस बारी डबल संख्या भी बना ली है। बहुत बढ़ गये हैं ना। (ज्ञान सरोवर छोटा हो गया है) कितना भी बड़ा बनायेंगे, छोटा तो होना ही है।

सबसे बड़ा ग्रुप विदेश से किसका है? रशिया। छोटा सुभानअल्ला। बहुत अच्छा, सरकमस्टांश को पार करने के विधि को जान गये हैं। चाहे कितनी भी परिस्थितियां हैं लेकिन पार करना सहज हो गया है। इसीलिए रशिया वालों को होशियार बनने की मुबारक हो। अच्छा। पहले उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले, वह आप सभी हो। आप नहीं होते तो कोई प्रोग्राम सफल नहीं होते। किसके आगे भाषण करते, दीवारों में करते। तो सबसे पहले आपको मुबारक। अभी तरीका आ गया है। अच्छा – साउथ अफ्रीका और मॉरीशियस ने दोनों ने मेहनत अच्छी की है। साउथ अफ्रीका ने भी थोड़े समय में मेहनत अच्छी की है। हिम्मत वाले हैं। और मॉरीशियस है छोटा लेकिन काम मोटा किया है। अच्छा किया है। ऐसे ही और आगे बढ़ते जाना और बड़े ते बड़े माइक लाते रहना।

जो पहली बार आये हैं वह हाथ उठाओ। (टोली के टाइम लाइन में आना) और पुराने कहेंगे हमको तो मिला ही नहीं। लेकिन बड़ों का काम क्या होता है? छोटों को आगे रखना, इसमें ही बड़ा-पन है इसलिए छोटों को देख खूब खुश हो, अपना नहीं सोचो, छोटों को आगे बढ़ाना, छोटों को एक्स्ट्रा मिलना, यह आपको मिल गया। अच्छा।

दादी, दादी जानकी जी से

सभी का सहयोग यह सहज ही आपको और सेवा को बढ़ा रहा है। और आप देख-देख हर्षा रही हो। आपका काम है देख-देख हर्षित होना। अभी यही काम रह गया है। उमंग-उत्साह बढ़ाना और हर्षित होना, मनोरंजन लगता है ना! मेहनत लगती है या मनोरंजन लगता है? सेवा भी एक खेल है। तो खेल में चाहे कोई गिरता है, कोई जीतता है लेकिन खेल में सदा खुशी होती है। तो यह सेवा भी क्या है? संगमयुग का खेल है। ऐसे है? और खेल देख-देख कर खुश होते रहते हैं। और औरों की भी खुशी बढ़ाते रहते हो। बस अभी आप लोगों का काम यही है। खुशी बढ़ाना, उमंग-उत्साह बढ़ाना और स्व-पुरूषार्थ बढ़ाना। आपको अभी यही खेल करना है। और औरों को खेल में अच्छे खिलाड़ी बनाना है। अच्छा

दादी निर्मलशान्ता से

यह भी आ गई, ठीक है। मज़ा आता है ना? सेवा में भी मज़ा, घर में भी मज़ा, मज़ा ही मज़ा। अगर विश्व में देखो तो सबसे मजे की जीवन किसकी है? चाहे कितना भी दुनिया वाले सोचें कि हम मजे में हैं लेकिन सदा का मज़ा, सच्चा मज़ा सिवाए आपके और किसके पास भी नहीं है इसलिए सदा बढ़ रहे हो और बढ़ाते रहते हो। रोज़ खुराक खुशी की खाते रहना।

ज्ञान सरोवर के म्यूजियम प्रति सन्देश

यह ज्ञान सरोवर का म्यूजियम  बहुत सेवा के निमित्त बनेगा। देश विदेश की आत्मायें इससे बाप का परिचय प्राप्त करेंगी और अनेक आत्मायें अपना खोया हुआ जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त कर खुशी में नाचेंगी। अनेक आत्माओं को स्व का और बाप का परिचय मिलने से वह अनुभव करेंगी कि हम क्या थे और क्या बन गये। विचित्र परिवर्तन का अनुभव करेंगे। और शक्तिशाली बन औरों को भी यह ईश्वरीय सन्देश देने के निमित्त बनेंगे।

साउथ अफ्रीका के मिनिस्टर भ्राता नायडू से

आप अपने को विश्व सेवा के निमित्त आत्मा हूँ, ऐसे समझते हो? तो बहुत बड़ा काम करना है। यह जो सीट मिली हुई है वह विशेष बड़ी सेवा के निमित्त बनाने के लिए मिली है। मिनिस्ट्री की हलचल नहीं देखो, सेवा देखो। अभी आपको जो सेवा करनी है वह रही हुई है। इसलिए कुछ समय के लिए मिनिस्टर या लौकिक पोजीशन जो भी है उसको लौकिक रीति से नहीं देखो, अभी अलौकिक सेवा प्रति आपकी सीट है। तो सीट पर मिनिस्टर रूप में नहीं लेकिन विश्व सेवाधारी के रूप में रहो। अभी स्मृति में अन्तर हो गया। फर्क हो गया। अभी मिनिस्टर हूँ नहीं, विश्व सेवाधारी हूँ। यह सीट विश्व सेवा के लिए है। समझा। चाहे सीट मिनिस्टर हो या आपोजीशन की हो लेकिन सीट विश्व सेवाधारी की है, उस लक्ष्य से सीट पर बैठो। और जो लौकिक कार्य है उसमें भी इस वृत्ति से, इस स्मृति से बहुत मदद मिलेगी। क्योंकि बुद्धि, मन अभी एक बाप में एकाग्र हो गया। तो अभी आपकी बुद्धि जो निर्णय करेगी वह बहुत यथार्थ करेगी। जिस समय जिसको जो करना चाहिए वह टच होगा। मन, बुद्धि को एक बाप में एकाग्र करने का मेडीटेशन तो सीख गये हो ना। और भी मेडीटेशन का थोड़ा अभ्यास करेंगे तो बहुत मदद मिलेगी। जिस काम से, वायुमण्डल से, देख करके कभी थकते थे, अभी थकेंगे नहीं। अभी यह बुद्धि में आयेगा कि इन सबका कल्याण कैसे हो! क्योंकि मैं विश्व सेवाधारी, विश्व कल्याण की सीट पर हूँ। मिनिस्टर की सीट पर नहीं विश्व कल्याण की सीट पर। इस वृत्ति से, इस दृष्टि से कुछ समय सेवा करके देखो। बहुत अच्छे अनुभव करेंगे और आपका शक्तिशाली वातावरण औरों को भी साथी बनायेगा। समझा। यह बहुत आपका भाग्य है जो इस समय भाग्य प्राप्त करने के स्थान पर पहुंच गये हो। यह भाग्य बनने का स्थान है। समझा। तो लक्की हैं और इस लक्क को बढ़ाते रहेंगे तो सफलता पाते रहेंगे।

टीचर्स से

आप लोग डबल साथी हो बड़े जो निमित्त हैं उन्हों के भी साथी और बाप के भी। तो डबल साथी बन रहने का पार्ट बजाया तो साथी होकर रहना ये बड़े मजे की जीवन है। खाओ-पियो, सेवा करो और नाचो। जिम्मेवारी होते भी जिम्मेवारी से फ्री। वैसे मेहनत तो सेकेण्ड ग्रुप ही करता है। तो बापदादा खुश होते हैं - हिम्मत से आगे बढ़ रहे हो और बढ़ा रहे हो। तो एक-एक की विशेषता बहुत अच्छी है, नाम बड़ों का काम आपका। अगर आपको आगे नहीं रखें तो काम ही नहीं चले। अच्छा।