31-01-98   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन


पास विथ आनर बनने के लिए हर खज़ाने का एकाउण्ट चेक करके जमा करो

आज बापदादा हर एक छोटे-बड़े चारों ओर के देश-विदेश के बच्चों का भाग्य देख हर्षित हो रहे हैं। ऐसा भाग्य सारे कल्प में सिवाए ब्राह्मण आत्माओं के किसी का भी नहीं हो सकता। देवतायें भी ब्राह्मण जीवन को श्रेष्ठ मानते हैं। हर एक अपने जीवन के आदि से देखो कि हमारा भाग्य जन्मते ही कितना श्रेष्ठ है। जीवन में जन्मते ही माँ बाप की पालना का भाग्य मिलता है। उसके बाद पढ़ाई का भाग्य मिलता है। उसके आगे गुरू द्वारा मत वा वरदान मिलता है। आप बच्चों को पालना, पढ़ाई और श्रीमत, वरदान देने वाला कौन? परम आत्मा द्वारा यह तीनों ही प्राप्त हैं। पालना देखो - परमात्म पालना कितने थोड़े कोटों में से कोई को मिलती है। परमात्म शिक्षक की पढ़ाई आपके सिवाए किसको भी नहीं मिलती है। सतगुरू द्वारा श्रीमत, वरदान आपको ही प्राप्त है। तो अपने भाग्य को अच्छी तरह से जानते हो? भाग्य को स्मृति में रखते हुए झूलते रहते हो, गीत गाते रहते हो - वाह मेरा भाग्य!

अमृतवेले से लेकर जब उठते हो तो परमात्म प्यार में लवलीन होके उठते हो। परमात्म प्यार उठाता है। दिनचर्या की आदि परमात्म प्यार होता है। प्यार नहीं होता तो उठ नहीं सकते। प्यार ही आपके समय की घण्टी है। प्यार की घण्टी आपको उठाती है। सारे दिन में परमात्म साथ हर कार्य कराता है। कितना बड़ा भाग्य है जो स्वयं बाप अपना परमधाम छोड़कर आपको शिक्षा देने के लिए आते हैं। ऐसे कभी सुना कि भगवान रोज़ अपने धाम को छोड़ पढ़ाने के लिए आते हैं! आत्मायें चाहे कितना भी दूर-दूर से आयें, परमधाम से दूर और कोई देश नहीं है। है कोई देश? अमेरिका, अफ्रीका दूर है? परमधाम ऊंचे ते ऊंचा धाम है। ऊंचे ते ऊंचे धाम से ऊंचे ते ऊंचे भगवन, ऊंचे ते ऊंचे बच्चों को पढ़ाने आते हैं। ऐसा भाग्य अपना अनुभव करते हो? सतगुरू के रूप में हर कार्य के लिए श्रीमत भी देते और साथ भी देते हैं। सिर्फ मत नहीं देते हैं, साथ भी देते हैं। आप क्या गीत गाते हो? मेरे साथ-साथ हो कि दूर हो? साथ है ना? अगर स्नते हो तो परमात्म टीचर से, अगर खाते भी हो तो बापदादा के साथ खाते हो। अकेले खाते हो तो आपकी गलती है। बाप तो कहते हैं मेरे साथ खाओ। आप बच्चों का भी वायदा है - साथ रहेंगे, साथ खायेंगे, साथ पियेंगे, साथ सोयेंगे और साथ चलेंगे..... सोना भी अकेले नहीं है। अकेले सोते हैं तो बुरे स्वप्न वा बुरे ख्यालात स्वप्न में भी आते हैं। लेकिन बाप का इतना प्यार है जो सदा कहते हैं मेरे साथ सोओ, अकेले नहीं सोओ। तो उठते हो तो भी साथ, सोते हो तो भी साथ, खाते हो तो भी साथ, चलते हो तो भी साथ। अगर दफ्तर में जाते हो, बिजनेस करते हो तो भी बिजनेस के आप ट्रस्टी हो लेकिन मालिक बाप है। दफ्तर में जाते हो तो आप जानते हो कि हमारा डायरेक्टर, बॉस बापदादा है, यह निमित्त मात्र है, उनके डायरेक्शन से काम करते हैं। कभी उदास हो जाते हो तो बाप फ्रेंड बनकर बहलाते हैं। फ्रेंड भी बन जाता है। कभी प्रेम में रोते हो, आंसू आते हैं तो बाप पोछने के लिए भी आते हैं और आपके आंसू दिल के डिब्बी में मोती समान समा देते हैं। अगर कभी-कभी नटखट होके रूठ भी जाते हो, रूसते भी हो बहुत मीठा-मीठा। लेकिन बाप रूठे हुए को भी मनाने आते हैं। बच्चे कोई बात नहीं, आगे बढ़ो। जो कुछ हुआ बीत गया, भूल जाओ, बीती सो बीती करो, ऐसे मनाते भी हैं। तो हर दिनचर्या किसके साथ है? बापदादा के साथ। बापदादा को कभी-कभी बच्चों की बातों पर हंसी भी आती है। जब कहते हैं बाबा आप भूल जाते हो, एक तरफ तो कहते हैं कम्बाइन्ड है, कम्बाइन्ड कभी भूलता है क्या? जब साथ-साथ है तो साथ वाला भूल सकता है क्या? तो बाबा कहते हैं शाबास - बच्चों में इतनी ताकत है जो कम्बाइन्ड को भी अलग कर देते हैं! है कम्बाइन्ड और थोड़ा सा माया कम्बाइन्ड को भी अलग कर देती है।

बापदादा बच्चों का खेल देखते यही कहते हैं बच्चे, अपने भाग्य को सदा स्मृति में रखो। होता क्या है? सोचते हो हाँ मेरा भाग्य बहुत ऊंचा है लेकिन सोचना-स्वरूप बनते हो, स्मृति-स्वरूप नहीं बनते हो। सोचते बहुत अच्छा हो मैं तो यह हूँ, मैं तो यह हूँ, मैं तो यह हूँ.... सुनाते भी बहुत अच्छा हो। लेकिन जो सोचते हो, जो कहते हो उसका स्वरूप बन जाओ। स्वरूप बनने में कमी पड़ जाती है। हर बात का स्वरूप बन जाओ। जो सोचो वह स्वरूप भी अनुभव करो। सबसे बड़े ते बड़ा है अनुभवी मूर्त बनना। अनादि काल में जब परमधाम में हैं तो सोचना स्वरूप नहीं हैं, स्मृति स्वरूप हैं। मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ - यह भी सोचने का नहीं है, स्वरूप ही है। आदिकाल में भी इस समय के पुरूषार्थ का प्रालब्ध स्वरूप है। सोचना नहीं पड़ता - मैं देवता हूँ, मैं देवता हूँ... स्वरूप है। तो जब अनादिकाल, आदिकाल में स्वरूप है तो अब भी अन्त में स्वरूप बनो। स्वरूप बनने से अपने गुण, शक्तियां स्वत: ही इमर्ज होते हैं। जैसे कोई भी आक्यूपेशन वाले जब अपने सीट पर सेट होते हैं तो वह आक्यूपेशन के गुण, कर्तव्य ऑटोमेटिक इमर्ज होते हैं। ऐसे आप सदा स्वरूप के सीट पर सेट रहो तो हर गुण, हर शक्ति, हर प्रकार का नशा स्वत: ही इमर्ज होगा। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इसको कहा जाता है ब्राह्मणपन की नेचुरल नेचर, जिसमें और सब अनेक जन्मों की नेचर्स समाप्त हो जाती हैं। ब्राह्मण जीवन की नेचुरल नेचर है ही गुण स्वरूप, सर्व शक्ति स्वरूप और जो भी पुरानी नेचर्स हैं वह ब्राह्मण जीवन की नेचर्स नहीं हैं। कहते ऐसे हो कि मेरी नेचर ऐसी है लेकिन कौन बोलता है मेरी नेचर? ब्राह्मण वा क्षत्रिय? वा पास्ट जन्म के स्मृति स्वरूप आत्मा बोलती है? ब्राह्मणों की नेचर - जो ब्रह्मा बाप की नेचर वह ब्राह्मणों की नेचर। तो सोचो जिस समय कहते हो मेरी नेचर, मेरा स्वभाव ऐसा है, क्या ब्राह्मण जीवन में ऐसा शब्द - मेरी नेचर, मेरा स्वभाव... हो सकता है? अगर अब तक मिटा रहे हो और पास्ट की नेचर इमर्ज हो जाती है तो समझना चाहिए इस समय मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय हूँ, युद्ध कर रहा हूँ मिटाने की। तो क्या कभी ब्राह्मण, कभी क्षत्रिय बन जाते हो? कहलाते क्या हो? क्षत्रिय कुमार या ब्रह्माकुमार? कौन हो? क्षत्रिय कुमार हो क्या? ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारियां। दूसरा नाम तो है ही नहीं। कोई को ऐसे बुलाते हो क्या कि हे क्षत्रिय कुमार आओ? ऐसा बोलते हो या अपने को कहते हो कि मैं ब्रह्माकुमार नहीं हूँ, मैं क्षत्रिय कुमार हूँ? तो ब्राह्मण अर्थात् जो ब्रह्मा बाप की नेचर वह ब्राह्मणों की नेचर। यह शब्द अभी कभी नहीं बोलना, गलती से भी नहीं बोलना, न सोचना, क्या करूं मेरी नेचर है! यह बहानेबाजी है। यह कहना भी अपने को छुड़ाने का बहाना है। नया जन्म हुआ, नये जन्म में पुरानी नेचर, पुराना स्वभाव कहाँ से इमर्ज होता है? तो पूरे मरे नहीं हैं, थोड़ा जिंदा हैं, थोड़ा मरे हैं क्या? ब्राह्मण जीवन अर्थात् जो ब्रह्मा बाप का हर कदम है वह ब्राह्मणों का कदम हो।

तो बापदादा भाग्य को भी देख रहे हैं और इतना श्रेष्ठ भाग्य, उस भाग्य के आगे यह बोल अच्छा नहीं होता। इस बारी मुक्ति वर्ष मना रहे हो ना - क्या क्लास कराते हो? मुक्ति वर्ष है। तो मुक्ति वर्ष है या 99 में आना है? 98 का वर्ष मुक्ति वर्ष है? जो समझते हैं यही वर्ष मुक्ति वर्ष है, वह हाथ हिलाओ। देखो हाथ हिलाना बहुत सहज है। होता क्या है? वायुमण्डल में बैठे हो ना, खुशी में झूम रहे हो, तो हाथ हिला देते हो, लेकिन दिल से हाथ हिलाओ, प्रतिज्ञा करो - कुछ भी चला जाए लेकिन प्रतिज्ञा मुक्ति वर्ष की न जाए। ऐसी पक्की प्रतिज्ञा है? देखो सम्भालके हाथ उठाओ। इस टी.वी. में आवे या न आवे, बापदादा के पास तो आपका चित्र निकल रहा है। तो ऐसे-ऐसे कमजोर बोल से भी मुक्ति। बोल ऐसे मधुर हो, बाप समान हो, सदा हर आत्मा के प्रति शुभ भावना के बोल हों, इसको कहा जाता है युक्तियुक्त बोल। साधारण बोल भी चलते-फिरते होना नहीं चाहिए। कोई भी अचानक आ जाए तो ऐसा ही अनुभव करे कि यह बोल हैं या मोती हैं। शुभ भावना के बोल हीरे मोती समान हैं क्योंकि बापदादा ने कई बार यह इशारा दे दिया है कि समय प्रमाण अभी थोड़ा सा समय है सर्व खज़ाने जमा करने का। अगर इस समय में - समय का खज़ाना, संकल्प का खज़ाना, बोल का खज़ाना, ज्ञान धन का खज़ाना, योग की शक्तियों का खज़ाना, दिव्य जीवन के सर्व गुणों का खज़ाना जमा नहीं किया तो फिर ऐसा जमा करने का समय मिलना सहज नहीं होगा। सारे दिन में अपने इन एक-एक खज़ाने का एकाउण्ट चेक करो। जैसे स्थूल धन का एकाउण्ट चेक करते हो ना, इतना जमा है.. ऐसे हर खज़ाने का एकाउण्ट जमा करो। चेक करो। सर्व खज़ाने चाहिए। अगर पास विद आनर बनने चाहते हो तो हर खज़ाने का जमा खाता इतना ही भरपूर चाहिए जो 21 जन्म जमा हुए खाते से प्रालब्ध भोग सको। अभी समय के टू लेट की घण्टी नहीं बजी है, लेकिन बजने वाली है। दिन और डेट नहीं बतायेंगे। अचानक ही आउट होगा - टू लेट। फिर क्या करेंगे? उस समय जमा करेंगे? कितना भी चाहो समय नहीं मिलेगा। इसलिए बापदादा कई बार इशारा दे रहा है - जमा करो-जमा करो-जमा करो। क्योंकि आपका अभी भी टाइटिल है - सर्वशक्तिमान, शक्तिवान नहीं है, सर्वशक्तिमान। भविष्य में भी है सर्वगुण सम्पन्न, सिर्फ गुण सम्पन्न नहीं है। यह खज़ाने जमा करना अर्थात् गुण और शक्तियां जमा हो रही हैं। एक एक खज़ाने का गुण और शक्ति से सम्बन्ध है। जैसे साधारण बोल नहीं तो मधुर भाषी, यह गुण है। ऐसे हर एक खज़ाने का कनेक्शन है।

बापदादा का बच्चों से प्यार है इसलिए फिर भी बार-बार इशारा दे रहे हैं क्योंकि आज की सभा में सब वैरायटी हैं। छोटे बच्चे भी हैं, टीचर्स भी हैं क्योंकि टीचर्स ही तो समर्पण हुई हैं। कुमारियां भी हैं, प्रवृत्ति वाले भी हैं। सब वैरायटी हैं। अच्छा है। सभी को चांस दिया है, यह बहुत अच्छा है। बच्चों की तो काफी समय से अर्जी थी। थी ना बच्चे? हमको मिलने का चांस कब मिलेगा? तो अच्छा हुआ - सर्व वैरायटी का गुलदस्ता बाप के सामने है। तो बच्चे हाथ उठाओ।

बच्चों से तो बड़ों का प्यार होता ही है। तो बाप से भी बच्चों का प्यार है और सभी बच्चे आज के ब्राह्मण हैं कल के क्या बनेंगे? बोलो बच्चे, कल क्या बनेंगे? (देवता बनेंगे) अच्छा, कौन सा देवता बनेंगे, पता है? बच्चों में से कोई देवी नहीं बनेगा, सब देवता बनेंगे? अच्छा है, बच्चों से रौनक होती है। तो आपकी रौनक को देख यह सभी खुश हो रहे हैं, वाह बच्चे वाह! लेकिन एक बात याद रखना - बच्चे, ब्राह्मण आत्मायें बच्चे, तो जो बड़ों का भाग्य है ना वह बच्चों का भी भाग्य है इसलिए बाप के साथ को कभी नहीं भूलना। चाहे कितना भी माया की अट्रैक्शन हो लेकिन बाप को नहीं भूलना। अच्छा सभी बच्चे रोज़ क्लास में जाते हैं या सण्डे-सण्डे जाते हैं? (रोज़ क्लास में जाने वालों ने हाथ उठाया) यह रोज़ जाने वाले हैं। बहुत हैं। अच्छा - टी.वी. देखते हो? सभी हँसते हैं। देखो, अगर अच्छी बातें देखते हो तो ठीक है लेकिन बुरी बातें भी देखते हो तो ठीक नहीं है। आज बुरी बातें न देखने का संकल्प कर लो कि हम कभी अगर टी.वी. देख भी रहे हैं और कोई बुरी बात आ जाती है तो बन्द कर देंगे। कर सकते हो? जो बुरी बातें टी.वी. में नहीं देखते हैं वह हाथ उठाओ। बहुत कम हैं। बच्चों का टीचर कौन है? तो सभी टीचर्स बच्चों का चार्ट देखना। सभी बच्चे मुक्ति वर्ष मनायेंगे? सच्ची दिल से हाथ उठाओ। अच्छा। देखो दादियों ने आपको चांस दिया है तो दादियों को शुक्रिया किया? किया या नहीं? चलो किया तो बहुत अच्छा लेकिन कल दादियों को प्यार से शुक्रिया करना और दादियों ने चांस दिया है ना तो यह प्रतिज्ञा करना कि हम भी मुक्ति वर्ष मनायेंगे। लड़ना नहीं, जोश नहीं करना, क्रोध नहीं करना। बापदादा जानते हैं - कई छोटे-छोटे बच्चे बड़ों से भी प्रतिज्ञा में आगे जाते हैं। तो सभी आगे जाकर दिखाना। अच्छा है बच्चों की महफिल भी अच्छी है। अच्छा।

दूसरा ग्रुप है कुमारियों का - कुमारियां बहुत हैं। (करीब 2000 कुमारियां आई हैं) अच्छा है कुमारियों ने हिम्मत रखी है। कुमारियों के लिए तो बापदादा सदा ही लक्की कुमारी जीवन कहते हैं। देखो कुमार कहते हैं कि कुमारी अगर टीचर बनती हैं, सेन्टर पर जाती हैं तो कुमारी जाते ही दीदी-दीदी कहलाती हैं और कुमार कितने भी पुराने हैं तो दादा-दादा कोई नहीं कहता। कुमारियों के लिए तो ट्रेनिंग होती है निकालें, और कुमार सेन्टर सम्भालने के लिए आफर करते हैं तो दादियाँ सोचती हैं। तो कुमारियों का भाग्य बहुत सहज बना हुआ है। कुमारी ने ट्रेनिंग की, योग्य बनी तो दहेज में सेन्टर मिल जाता है। तो कुमारी जीवन कितनी श्रेष्ठ है, कितने गोल्डन चांस हैं, वह सोचो। अगर अभी से सेवाधारी नहीं बनेंगे तो भविष्य में भी क्या बनेंगे? सेवाधारी किसे मिलेंगे? जो सेवा करेंगे उन्हें मिलेंगे। इसलिए कुमारियों को अपना फैसला जल्दी से जल्दी करना चाहिए। लेकिन बापदादा कुमारियों के लिए एक बात सदा कहते हैं - सच्ची सेवाधारी कुमारी वह है जो शक्ति रूप कुमारी है। अगर निमित्त सेवाधारी शक्तिशाली नहीं है तो औरों को शक्तिशाली नहीं बना सकती। अगर कुमारी शक्तिशाली नहीं है, कोमल है, एक होती है कोमल और दूसरी होती है किसी के प्रभाव में आने वाली। ज्ञान का प्रभाव डालने वाली नहीं लेकिन कोई के प्रभाव में प्रभावित होने वाली। कुमारियों में दादियों को सदा इसी एक बात का डर लगता है। निमित्त बनी बाप के ऊपर प्रभावित करने के लिए लेकिन स्वयं प्रभावित हो जाए तो क्या रिजल्ट निकलेगी? तो बापदादा कहते हैं कुमारियां हाँ तो करती हैं, हाँ जायेंगे, निकलेंगे लेकिन अभी समय के हिसाब से ऐसी कुमारियां चाहिए जो जिस सेन्टर पर जाएं उस सेवाकेन्द्र को निर्विघ्न बनाकर रखें। निर्विघ्न का सर्टिफिकेट स्वयं को भी देवें और साथियों से भी लेवें। तो ऐसी कुमारियां हो या थोड़ी सी वस्तु पर, कोई व्यक्ति पर प्रभावित होने वाली हो? क्या हो? क्या सोचती हो? बापदादा को ऐसी कुमारियां चाहिए जो निर्विघ्न कुमारी, विघ्न-विनाशक कुमारी, कमजोर को शक्तिशाली बनाने वाली कुमारी हो, ऐसे नहीं बापदादा वा दादियां हैण्डस करके भेजें और हैण्डस के बजाए मैं और हेडक (सरदर्द) बन जाएं। तो ऐसी कुमारियां नहीं चाहिए। तो क्या समझती हो? ऐसी कुमारियां तैयार हैं, हिम्मत है कि हम विघ्न-विनाशक बनकर रहेंगे? जो ऐसा बनेंगी वह हाथ उठाओ। दिल से उठा रही हो? संगठन में शर्म के मारे तो नहीं उठा रही हो? जो सेन्टर्स पर जाने के लिए तैयार हैं और ऐसा विघ्न-विनाशक बनेंगी, वही उठो बाकी बैठ जाओ। जो 18 वर्ष की आयु से ऊपर हैं और विघ्न-विनाशक होके सेन्टर पर जाने के लिए तैयार हैं, वह खड़े हो जाओ। यह सब विघ्न-विनाशक निमित्त सेवाधारी हैं? (हाँ जी) फोटो निकालो। अभी दादियों को यह कैसेट देना, फिर आप नोट करना - कौन-कौन हैं? मुबारक हो, मुबारक हो। कुमारियों को बापदादा भी मुबारक देते हैं लेकिन राइट हैण्ड बनना, लेफ्ट हैण्ड नहीं बनना। अच्छा।

तीसरा ग्रुप है - गीता पाठशाला वालों का- वह हाथ उठाओ। खड़े होकर हाथ हिलाओ। (करीब 4000 भाई-बहिन हैं) बहुत हैं। अच्छा - गीता पाठ- शाला के निमित्त बच्चों को भी बापदादा निमित्त सेवाधारी कहते हैं। अपनी प्रवृत्ति भी सम्भाल रहे हैं और अलौकिक सेवा के निमित्त भी बने हैं तो डबल काम कर रहे हैं। लेकिन गीता पाठशाला के निमित्त आत्माओं की विशेषता है सदा अपने को हर कार्य में ट्रस्टी समझकर चलना। क्योंकि बापदादा ने देखा कि गीता पाठशाला खोलने वाले भिन्न-भिन्न संकल्प से गीता पाठशाला खोलते हैं, कोई तो सच्चे दिल से सेवा प्रति गीता पाठशाला खोलते हैं वा चलाते हैं लेकिन कोई-कोई जब वृद्धि होती है तो कहाँ-कहाँ भावनाओं में भी मिक्स हो जाता है। तो बापदादा देखते हैं कि कोई-कोई गीता पाठशाला अपने परिवार की पालना अर्थ भी खोलते हैं, परिवार की पालना भी हो और निमित्त सेवा भी हो। तो गीता पाठशाला का अर्थ है ट्रस्टी बनके सेवा करना क्योंकि जो भी आत्मायें आती हैं वह बाप के स्नेह में आती हैं, इसलिए ट्रस्टी बनकर कारोबार चलाना बहुत आवश्यक है। एकदम नि:स्वार्थ सेवा की भावना वालों को कहेंगे सच्ची गीता पाठशाला। बाकी बापदादा मैजॉरिटी शुभ भावना से सेवा निमित्त चलाने वाली आत्माओं पर बहुत खुश हैं कि अपना समय सफल कर रहे हैं। डबल कार्य उसी शुद्ध भावना से सम्भाल रहे हैं। और कोई भावना मिक्स नहीं है, न नाम की, न लौकिक परिवार के पालना की। तो ऐसी शुद्ध भावना, सेवा की भावना वाली ट्रस्टी आत्माओं को बापदादा बहुत-बहुत-बहुत मुबारक देते हैं। अच्छे हैं और अच्छे ही रहेंगे। लेकिन चेक करना कोई भी और भावना मिक्स नहीं हो। सेवा की भावना के सिवाए और कोई भावना आने नहीं देना। बाकी सेवा करते हो अर्थात् अनेक आत्माओं का कल्याण करते हो। और देखा गया है, गीता पाठशाला वालों की विशेषता है कि प्रवृत्ति वालों को देख प्रवृत्ति वाले हिम्मत रखते हैं। सेन्टर पर फिर भी सोचते हैं कि पता नहीं हमको भी छोड़ना पड़ेगा लेकिन प्रवृत्ति में रहते सेवा के निमित्त बनने वाले बच्चों को देख और भी प्रवृत्ति वालों को हिम्मत, उमंग-उत्साह आता है। इसलिए बापदादा गीता पाठशाला वालों को भी बहुत-बहुत सेवा की मुबारक, यादप्यार दे रहे हैं। एक हाथ की ताली बजाओ। अच्छा।

चौथा ग्रुप - समर्पण वाली टीचर्स का है। अच्छा किया, हिम्मत रख अपने सेवा के निमित्त बनने को प्रत्यक्ष स्टेज पर लाया। और बाप के बनने की, हाथ में हाथ देने की सेरीमनी 5-6 साल पहले हो गई थी लेकिन अभी और हाथ में हाथ पक्का किया, जो छूट नहीं सके। इसलिए बापदादा समर्पण वाली टीचर्स को बधाई देते हैं कि सदा हाथ में हाथ, साथ में साथ पक्का करके विजय माला अपने गले में डालेंगी। अब जिस स्थान पर रहती हो उस स्थान को और स्वयं को निर्विघ्न बनाना। कोई विघ्न की रिपोर्ट नहीं आवे। स्व के पुरूषार्थ में भी विघ्न रूप नहीं बनना। कई बार बाहर से भले विघ्न नहीं भी हो लेकिन मन में तो आता है ना। तो न मन का विघ्न हो, न साथियों का विघ्न हो, न स्टूडेन्टस द्वारा कोई विघ्न हो। स्व निर्विघ्न, सेन्टर निर्विघ्न, साथी निर्विघ्न - यह तीन सर्टिफिकेट इस मुक्ति वर्ष में लेना है। मंजूर है? और विघ्न डालें तो क्या करेंगी? आप तो निर्विघ्न होंगी और कोई विघ्न डालने वाला हो, तो क्या करेंगी? विघ्न विनाशक बनेंगी? तो समर्पण समारोह माना सम्पूर्णता का समारोह। सिर्फ समर्पणता का समारोह याद नहीं करना, वह भी याद करना लेकिन समय प्रमाण अभी सम्पूर्णता का दिवस मनाना ही है, इतना दृढ़ निश्चय का कंगन बांधकर जाना। बापदादा सभी टीचर्स को कह रहे हैं, जो भी सभी टीचर्स हैं चाहे देश की, चाहे विदेश की वह हाथ उठाओ। अच्छा। आज विदेश भी बहुत है, वेलकम हो आने की विदेश के सेन्टर्स को। अच्छा

बापदादा की टीचर्स के प्रति एक शुभ भावना है, सुनायें? सिर्फ सुनेंगी या करेंगी भी? सिर्फ सोचेंगी या स्वरूप बनेंगी? सुनेंगी, करेंगी.. अच्छा-बहुत छोटी सी शुभ भावना है। बड़ी बात भी नहीं है, बहुत छोटी है। दादी ने सन्देश भेजा कि अभी सभी सेन्टर्स निर्विघ्न हो जाएं उसकी रेसपान्सिबुल टीचर्स हैं। अभी तक टीचर्स की कम्पलेन्स आती हैं। दादियों के पास वह फाइल है ना। आफिस वाली ईशू कहती है सेन्टर्स से इतने फालतू लेटर्स आते हैं जो किचड़े का डिब्बा भर जाता है। ऐसे है ना? यह पढ़ने में भी टाइम लगता, फिर फाड़ने में भी टाइम लगता, फिर बाक्स में डालने में भी टाइम लगता, तो यह मेहनत फालतू हो गई ना। इसलिए बापदादा की शुभ भावना है कि सभी टीचर्स बाप के राइट हैण्डस हैं, लेफ्ट हैण्ड नहीं हैं, राइट हैण्ड हैं। राइट हैण्डस के स्थान से, सेन्टर्स से ऐसे समाचार आवें जो वेस्ट बाक्स ही भर जावे - तो ऐसा अच्छा है? बोलो हाँ या ना? जो समझते हैं इस वर्ष हम हर एक तीन सर्टिफिकेट लेंगे - स्व विघ्न-विनाशक, सेन्टर विघ्न-विनाशक और साथी विघ्न विनाशक। यह तीन सर्टिफिकेट लेने के लिए जो तैयार हैं वह टीचर्स हाथ उठाओ। जो सेन्टर पर पाण्डव रहते हैं, वह भी हाथ उठाओ। (सभी ने हाथ उठाया) थैंक्यू।

अभी वेस्ट पेपर बाक्स खाली रहेंगे। पढ़ना नहीं पड़ेगा। यह (ईशू) कहती है लेटर्स खोल-खोलकर हाथ थक जाता है। तो इसीलिए चाहे यहाँ बैठे हैं, चाहे विदेश में सुन रहे हैं, चाहे देश में सुन रहे हैं, चाहे मुरली सुनेंगे। लेकिन बापदादा की सारे विश्व की निमित्त टीचर्स के प्रति यह शुभ भावना है कि यह वर्ष कोई कम्पलेन्ट नहीं आनी चाहिए। कम्पलेन्ट के फाइल खत्म हो जाएं। बापदादा के पास भी बहुत फाइल हैं। तो इस वर्ष कम्पलेन्ट के फाइल खत्म। सब फाइन बन जाएं। फाइन से भी रिफाइन। पसन्द है ना? कोई कैसा भी हो उनके साथ चलने की विधि सीखो। कोई क्या भी करता हो, बार-बार विघ्न रूप बन सामने आता हो लेकिन यह विघ्नों में समय लगाना, आखिर यह भी कब तक? इसका भी समाप्ति समारोह तो होना है ना? तो दूसरे को नहीं देखना। यह ऐसे करता है, मुझे क्या करना है? अगर वह पहाड़ है तो मुझे किनारा करना है, पहाड़ नहीं हटना है। यह बदले तो हम बदलें - यह है पहाड़ हटे तो मैं आगे बढूं। न पहाड़ हटेगा न आप मंजिल पर पहुंच सकेंगे। इसलिए अगर उस आत्मा के प्रति शुभ भावना है, तो इशारा दिया और मन-बुद्धि से खाली। खुद अपने को उस विघ्न स्वरूप बनने वाले के सोच-विचार में नहीं डालो। जब नम्बरवार हैं तो नम्बरवार में स्टेज भी नम्बरवार होनी ही है लेकिन हमको नम्बरवन बनना है। ऐसे विघ्न वा व्यर्थ संकल्प चलाने वाली आत्माओं के प्रति स्वयं परिवर्तन होकर उनके प्रति शुभ भावना रखते चलो। टाइम थोड़ा लगता है, मेहनत थोड़ी लगती है लेकिन आखिर जो स्व-परिवर्तन करता है, विजय की माला उसी के गले में पड़ती है। शुभ भावना से अगर उसको परिवर्तन कर सकते हो तो करो, नहीं तो इशारा दो, अपनी रेसपान्सिबिल्टी खत्म कर दो और स्व परिवर्तन कर आगे उड़ते चलो। यह विघ्न रूप भी सोने का लगाव का धागा है। यह भी उड़ने नहीं देगा। यह बहुत महीन और बहुत सत्यता के पर्दे का धागा है। यही सोचते हैं यह तो सच्ची बात है ना। यह तो होता है ना। यह तो होना नहीं चाहिए ना। लेकिन कब तक देखते, कब तक रूकते रहेंगे? अब तो स्वयं को महीन धागों से भी मुक्त करो। मुक्ति वर्ष मनाओ। इसलिए बच्चों की जो आशायें हैं, उमंग है, उत्साह है, इसके सभी फंक्शन मनाकर बापदादा पूरे कर रहे हैं। लेकिन इस वर्ष का अन्तिम फंक्शन मुक्ति वर्ष का फंक्शन हो। फंक्शन में दादियों को सौगात भी देते हो। तो बापदादा को इस मुक्त वर्ष के फंक्शन में स्वयं के सम्पूर्णता की गिफ्ट देना। अच्छा।

महाराष्ट्र के सेवाधारियों से - यह रसम अच्छी बनाई है। अच्छा है, सेवा से सभी को ब्राह्मण परिवार के समीप आने का चांस मिलता है। निर्विघ्न सेवा हुई तो हाथ उठाओ। महाराष्ट्र के सेवाधारियों ने बेहद की सेवा की तो बेहद की दुआयें ली। आपके खाते में बेहद की दुआयें जमा हो गई। सबने सेवा का लाभ उठाया ना। सभी को अच्छा लगा ना। बहुत अच्छा। महाराष्ट्र के मुख्य सेवाधारी उठो। बापदादा सभी महाराष्ट्र के निमित्त सेवाधारियों को निर्विघ्न सेवाधारी की मुबारक देते हैं। अच्छा। सिक्युरिटी वालों को रोज़ दादियों से गुडमोर्निंग या गुडनाइट करनी चाहिए। उन्हों की सेवा ज्यादा है। अच्छा। सिक्युरिटी वालों ने निर्विघ्न अपना टर्न पूरा किया है, यह बहुत हिम्मत का काम है।

(डबल विदेशी कहते हैं एक मेला हम भी सम्भाल सकते हैं) कम से कम सभी विदेश का खाना तो खायेंगे। अच्छा है जो सेवा की आफर करते हैं उसको पहले ही इन-एडवांस आफरीन है।

डबल विदेशी विशेष आत्मायें पहुंच गई हैं और पहुंचते जायेंगे। बापदादा विदेश की चारों ओर की सेवा देख, उमंग-उत्साह देख हर्षित होते हैं क्योंकि जब विदेश सेवा आरम्भ हुई तो जो भी मुश्किल बातें लगती थी वह अभी इतनी सहज हो गई हैं जो सभी सेवा में उड़ते रहते हैं। पहले सोचते थे विदेश में बड़ा प्रोग्राम करें तो सुनने वालों से हाल भरना बहुत मुश्किल है। वी.आई.पी. की सेवा बहुत मुश्किल है। लेकिन अभी क्या कहते हैं? अभी तो यू.एन. तक भी पहुंच गये हैं। तो बहुत सहज हो गया है ना। बापदादा सदा कहते हैं कितने भी बड़े हों, उन्हों के पास पावर है, आपके पास परमात्म विल पावर है। परमात्मा ने पावर्स की विल की है, तो विल पावर है। तो परमात्म विल पावर के आगे पावर्स परिवार्तित होना कोई बड़ी बात नहीं है सिर्फ स्वयं में एक संकल्प हो - होना ही है। यह तो नहीं होगा, वह तो नहीं होगा, पता नहीं क्या होगा... यह परमात्म टचिंग उन्हों की बुद्धि में जाने से रूकावट बन जाती है। चाहे देश में, चाहे विदेश में - क्यों, कैसा, ऐसा तो नहीं, इस संकल्प से कभी भी कोई कार्य अर्थ सामने नहीं जाओ। क्यों, क्या, ऐसा, वैसा - यह पहले आपस में सोच के फाइनल करो, वह बात अलग है लेकिन जब सामने जाते हो तो सदा दृढ़ संकल्प से जाओ - होना ही है। आखिर तो सभी को झुकना ही है। तो विदेश भी सेवा में उड़ रहा है, भारत की सेवा और विदेश की सेवा दोनों उड़ती कला में हैं। अभी सेवा में सकाश दे, बुद्धियों को परिवर्तन करने की सेवा एड करो। फिर देखो सफलता आपके सामने स्वयं झुकेगी। ठीक है ना? विदेश में अनुभव है ना? अच्छा है। सेवाओं का समाचार बापदादा के पास पहुंचता है। विघ्न भी आते हैं, लेकिन आगे का पर्दा विघ्न का होता है, पर्दे के अन्दर कल्याण समाया हुआ दृश्य छिपा हुआ होता है। मन्सा-वाचा की शक्ति से विघ्न का पर्दा हटा दो तो अन्दर कल्याण का दृश्य दिखाई दे।

बाकी सभी विदेश के सेन्टर्स के बच्चे बहुत अच्छे-अच्छे कार्ड भी भेजते हैं, पत्र भी भेजते हैं, कोई आता है तो बहुत-बहुत यादप्यार भी भेजते हैं। बापदादा भी कार्ड को रिगार्ड देते हैं। दिल से भेजते हैं, दिखावे से नहीं भेजें। दिखावे से भेजना वह एकानामी होनी चाहिए और दिल से भेजते हैं तो उसका कोई मूल्य नहीं है। तो हर एक के साइन किये हुए बहुत कार्ड बापदादा के पास हर उत्सव के पहुंचते हैं। भारतवासियों के भी पहुंचते हैं। बापदादा सभी कार्डस और पत्रों का एक ही जवाब देते हैं - मुबारक हो, बधाईयां हो, सदा सफल रहो और औरों को भी सफलता स्वरूप बनाते उड़ो। चलो नहीं, उड़ो। अच्छा जो दूर बैठे सुन रहे हैं उन्हों को भी बापदादा एक-एक देश को नाम सहित, हर एक सेवाकेन्द्र की विशेषता सहित सम्मुख वालों से भी पहले यादप्यार दे रहे हैं। साधन अच्छा निकाला है और भी निकलते रहेंगे। आगे चलकर देखेंगे भी। यह तो सेन्टर्स सुन रहे हैं, वह भी दिन आयेगा जो चारों ओर बाप का सन्देश सभी तरफ पहुंचेगा। साइन्स भी सब आपके लिए ही इन्वेन्शन कर रही है। इसीलिए बापदादा साइन्स के साधन निकालने वाले बच्चों को भी स्नेह से मुबारक देते हैं। दिमाग तो चलाते हैं। साइन्स वाले भी आयेंगे, आपकी अंचली लेंगे। फिर आपकी सेवा में भविष्य में आयेंगे। अच्छा।

बापदादा सभी सेवाकेन्द्रों में सेवा के लिए डायरेक्शन दे रहे हैं कि सितम्बर और अक्टूबर यह दो मास बड़े-बड़े प्रोग्राम करो। जितना भी आवाज़ फैला सकते हो, सभी कोनों में आवाज़ फैलाओ। कोई भी कोना रह नहीं जाये। बड़े-बड़े प्रोग्राम्स में भी लक्ष्य रखो, ऐसी कोई विधि बनाओ जो सिर्फ सुनके नहीं जायें लेकिन बनने की शुभ इच्छा लेकर जायें। कुछ अनुभव करके जायें। वर्तमान समय वायुमण्डल भी चारों ओर सहयोगी है इसलिए सफलता सहज प्राप्त होने का समय है। खूब आवाज़ फैलाओ और साथ-साथ जो छोटे-छोटे स्थान हैं, जिसमें बड़े फंक्शन करने की हिम्मत नहीं है, वहाँ छोटे-छोटे ग्रुप्स का चाहे 10-12 हो लेकिन योग शिविर के प्रोग्राम रखो। अगर स्थान नहीं है तो कोई साथ में स्थान ले सकते हो तो लो, अगर वह भी नहीं है तो एक दिन का भी शिविर रखो। अगर छुट्टी का एक दिन भी रखते हो और उन्हों को अनुभव अच्छा होता है तो वह आपेही दूसरे सण्डे को भी आफर करेंगे। देखा जाता है योग शिविर स्टूडेन्ट बनाता है। कांफ्रेंस और स्नेह मिलन, छोटे-छोटे स्नेह मिलन भी समीप लाते हैं लेकिन बड़े प्रोग्राम प्रभावित करते हैं। नाम बाला होता है। एडवरटाइज अच्छी हो जाती है। तो दोनों ही जरूरी हैं लेकिन छोटे स्थान और छोटे सेन्टर्स या तो छोटे-छोटे स्नेह मिलन करो वा योग शिविर का छोटा सा प्रोग्राम रखो।

उसके साथ बापदादा हर ब्राह्मण की स्व-उन्नति के प्रति जहाँ-जहाँ जब सहज मास निकल सकता है, मौसम के अनुसार, प्रबन्ध के अनुसार एक मास स्व-उन्नति, सर्व खज़ानों को जमा करने के अभ्यास की भट्ठी हो। एक मास स्व- उन्नति के लिए भी निकालना जरूरी है। उसमें कुछ नवीनता निकालो। जैसे अभी भट्ठियाँ होती रही हैं, वह भी अच्छी हैं लेकिन कुछ उसमें नवीनता एड करो। कुछ समय अन्तर्मुखता का मौन, मन का मौन भी हो। मुख का मौन तो दुनिया भी रखती है लेकिन यहाँ व्यर्थ संकल्प से मन का मौन होना चाहिए। जैसे ट्रैफिक कन्ट्रोल करते हो तो व्यर्थ की ट्रैफिक को कन्ट्रोल करते हो वैसे बीचबी च में एक दिन मन के व्यर्थ का ट्रैफिक कन्ट्रोल करो। ज्ञान के मनन के साथ शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प, सकाश देने का अभ्यास, यह मन के मौन का या ट्रैफिक कन्ट्रोल का बीच-बीच में दिन मुकरर करो। अगर किसको छुट्टी नहीं भी मिलती हो, एक दिन सप्ताह में तो छुट्टी मिलती है, उसी प्रमाण अपने- अपने स्थान के प्रोग्राम फिक्स करो। लेकिन एक मास विशेष एकान्तवासी और खज़ानों के एकानामी का प्रोग्राम अवश्य रखो। एकनामी और एकानामी। बाकी बापदादा अपने नियम प्रमाण नवम्बर से आरम्भ करेंगे। देखा गया कि रथ के दृढ़ संकल्प, हिम्मत और सम्भाल से यह वर्ष निर्विघ्न समाप्त हुआ है और हो जायेगा। तो अभी भी बच्ची का उमंग है, जब रथ तैयार है तो रथवान को आने में क्या है। हाँ बीच-बीच में रेस्ट का देखना। रथ को रेस्ट भी देना, ऐसा नहीं कि काम में ज्यादा लगा दो। अच्छा है रेस्ट के टाइम रेस्ट, सेवा के समय सेवा।

अमृतवेले जो मुख्य प्लैनिंग बुद्धि हैं उन्हों को बापदादा कार्य के निमित्त बनाता है, उन्हों को नई विधियां सेवा की टच होंगी, सिर्फ अपनी बुद्धि को बाप के हवाले करके बैठो। बुद्धिवानों की बुद्धि आपकी बुद्धि को टच करेंगे। यह प्लैनिंग बुद्धि वालों को वरदान मिलना ही है। निमित्त बनो। ठीक है ना पाण्डव। देखो सब प्लैनिंग बुद्धि वाले बैठे हैं, टीचर्स भी, विदेशी भी, भारत वाले भी तो क्या हो जायेगा? बहुत-बहुत अच्छा होगा। बाकी गर्मी और बरसात में छोटे-छोटे स्नेह मिलन कर सकते हो। शान्तिवन में भी, बापदादा ने पहले भी कहा था कि कईयों के मित्र सम्बन्धी, समीप वाले योग शिविर करने चाहते हैं तो उन्हों को थोड़ा सा हालों में कम संख्या करके और जो हर हाल में कमरे छोटे-छोटे बनाये हैं, जहाँ अभी टीचर्स रहती हैं वहाँ अगर कोई ऐसे वी.आई.पी. हैं तो उन कमरों में भी अलग में रख सकते हैं और बहुत बड़ा हाल है तो डबल कनात की पार्टीशन भी कर सकते हैं क्योंकि अभी सीजन तक तो बना नहीं सकते हैं लेकिन पीछे कुछ प्रबन्ध कर भी सकते हैं। और जो यहाँ अलग में एक बहनों का, एक भाईयों का भवन बनाया है, वहाँ भी अगर ब्राह्मण आत्मायें अपने को सेट कर सकें, तो विशेष वी.आई.पी. को इस वर्ष में सेट कर सकते हो। ऐसा कोई वी.आई.पी. स्पेशल है तो। बाकी ब्राह्मण तो अपने को एडजेस्ट भी कर सकते हैं और योग शिविर के ग्रुप तो साथी टीचर्स ही ले आती हैं। बाकी दूसरी सीजन में तो वी.आई.पी. के तैयार हो ही जायेंगे। जो ज़ोन अपने ज़ोन का रिफ्रेशर कोर्स शान्तिवन में करना चाहते हैं, उसको शान्तिवन का चांस मिल सकता है। यहाँ-वहाँ स्थान ढूंढने के बजाए चाहे संख्या कम भी हो फिर भी जो सुख-साधन यहाँ है वह बाहर नहीं मिल सकता। तो ज़ोन वालों को आफर है। अपना ग्रुप ले आवे और रिफ्रेश कर जाये क्योंकि यहाँ फिर भी दादियां तो मिलेंगी। वहाँ तो दादियाँ जावें नहीं जावें, यहाँ यह चांस मिल सकता है। और जो ग्रुप आफर करे, जैसे यूथ हैं या प्रवृत्ति वाले हैं, अगर 4-6 ज़ोन मिलके ग्रुप बना सकें तो बना सकते हैं क्योंकि ऊपर तो वर्ग की सेवा होगी लेकिन नीचे छोटे-छोटे ग्रुप के भी ऐसे प्रोग्राम कर सकते हो। शान्तिवन को बिजी रखो। जो चांस लेना चाहे वह ले सकते हैं। मित्र-सम्बन्धियों की सेवा दिल से कर सकते हैं। अच्छा।

चारों ओर के परमात्म पालना, पढ़ाई और श्रीमत के भाग्य के अधिकारी विशेष आत्माओं को, सदा सोचना और स्वरूप बनना दोनों समान करने वाले बाप समान आत्माओं को, सदा परमात्म विल पावर द्वारा स्वयं में और सेवा में सहज सफलता प्राप्त करने वाले निमित्त सेवाधारी बच्चों को, सदा बाप को कम्बाइन्ड रूप में अनुभव करने वाले, सदा साथ निभाने वाले साथी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते। अच्छा

सभी ठीक रहे हुए हैं, कोई तकलीफ हुई है? तकलीफ नहीं हुई ना? खुश हैं? बच्चे खुश हैं? बहुत खुश हैं, नाच रहे हैं बच्चे। कुमारियां खुश हैं? कुमारियां भी मौज में हैं। टीचर्स सबसे खुश हैं और पाण्डव खुशी में उड़ रहे हैं, बहुत अच्छा।

दादियों से:- बच्चे कहते हैं जी बाबा, तो बाप भी कहते हैं जी बच्चे। बाप और बच्चों का यही तो स्नेह का धागा है।

जगदीश भाई से - तबियत अच्छी है। अभी बहुत काम करना है। अभी पाण्डवों को मिलकर कोई नये प्लैन बनाने हैं। नवीनता के निमित्त बनना है। आदि से कोई न कोई कार्य के लिए निमित्त बनते आये हैं, सभी की विशेषता है इसलिए अभी भी और टचिंग होती रहेगी। अच्छा है दिल्ली में भी धूम मचानी है। दिल्ली का सेवाधारी पाण्डव पहला निमित्त बने हुए हो। दिल्ली से नाम बाला होगा ना। सभी के सकाश से दिल्ली से नाम बाला तो करना ही है। कोई ऐसे प्लैन बनाओ, बाम्बे, दिल्ली नई इन्वेन्शन्स निकालो। मधुबन में तो सेवायें ड्रामानुसार बढ़ती ही जाती हैं और बढ़ती जानी हैं। यह विंग्स का सेवा का प्लैन भी अच्छा चल रहा है और चलता रहेगा। जो निमित्त बनता है उसको सेवा की सफलता का शेयर मिल जाता है। इसलिए निमित्त बनते जाओ और शेयर्स जमा करते जाओ। अच्छा है जो भी चारों ओर निमित्त बनते हैं उन्हों को एक्स्ट्रा लिफ्ट मिल जाती है। स्व का पुरूषार्थ तो है लेकिन यह गिफ्ट में लिफ्ट मिलती है। विदेश वालों को भी सेवा की गिफ्ट मिलती रहती है। भारत वाले विदेश को भी सकाश दे रहे हैं। तो अच्छा है, अच्छे-अच्छे पाण्डव भी हैं, अच्छी-अच्छी शक्तियां भी हैं। सेना बहुत अच्छी सुन्दर है। बापदादा तो हर एक की विशेषता की दिल में महिमा करते रहते हैं। ऐसे है ना?