03-04-2020 ओम् शान्ति “अव्यक्त महावाक्य'' वीडियो 15-12-09 मधुबन


"परिवार के साथ प्रीत निभाने के लिए नॉलेजफुल बन बाप समान साक्षीपन की स्थिति में रहना है, बाप, स्व, ड्रामा और परिवार चारों में निश्चयबुद्धि बन विजयी बनना है''

आज समर्थ बाप अपने समर्थ बच्चों को देख रहे हैं क्योकि हर एक बच्चा स्नेह से बाप समान बनने का पुरुषार्थ बहुत लगन से कर रहे हैं। बापदादा बच्चों को देख खुश होते हैं और दिल में बच्चों के गीत गाते हैं वाह बच्चे वाह! क्योंकि बच्चे बाप के भी सिर के ताज हैं। देखो बच्चों की पूजा डबल रूप में होती है, बाप की पूजा एक रूप में होती है। तो बच्चे बाप से भी बाप द्वारा आगे जाते हैं इसलिए बाप बच्चों के पुरुषार्थ को देख खुश है। नम्बरवार तो हैं लेकिन पुरुषार्थ का लक्ष्य आगे बढ़ा रहे हैं।

आज अमृतवेले चारों ओर के बच्चों में एक बात जो ज्ञान का फाउण्डेशन है वह देखा। फाउण्डेशन है निश्चय। कहा हुआ भी है निश्चयबुद्धि विजयी। तो आप सबका निश्चय देखा, सभी का नम्बरवार बाप में तो निश्चय है ही, उसकी निशानी सभी बाप को पहचान बाप के बने हैं और यहाँ भी बाप से मिलने के लिए आये हैं। बाप में हर एक बच्चे का अटूट निश्चय है लेकिन बाप के साथ और भी निश्चय पक्का होना चाहिए - वह है स्व में निश्चय। साथ में ड्रामा में निश्चय और परिवार में निश्चय। इन चार प्रकार के निश्चय में पक्के होना अर्थात् निश्चयबुद्धि विजयन्ती बनना। तो चेक करो कि इन चार निश्चय में पक्के हैं? बाप में तो सभी कहते हैं मेरा बाबा और मैं बाप की। बाप को मेरा कहकर बाप का पूरा अधिकार प्राप्त कर लिया। सदा बाप के द्वारा अधिकारी बन सर्व खजानों के अधिकारी बन गये। साथ में स्व में भी निश्चय जरूरी है क्यों? अगर स्व में निश्चय नहीं है तो दिलशिकस्त बन जाते हैं। स्व में निश्चय यही है कि मैं बाप द्वारा स्वमानधारी हूँ, स्वराज्य अधिकारी हूँ। स्वयं बाप ने मुझे कितने स्वमान दिये हैं। एक एक स्वमान को स्मृति में लाओ तो कितना नशा चढ़ता है! आजकल किसी को भी कोई टाइटल मिलता है तो वह भी अपना भाग्य समझते हैं। लेकिन आप बच्चों को एक-एक स्वमान किसने दिया! स्वयं बापदादा ने हर बच्चे को स्वमानधारी बनाया है। एक-एक स्वमान को याद करते खुशी में उड़ते हो। तो स्व में भी सदा निश्चय का इतना नशा रहे कि मैं बाप द्वारा स्वराज्य अधिकारी, स्वमान अधिकारी कोटो में कोई आत्मा हूँ। जैसे बाप में निश्चय है तो साथ में स्व में भी निश्चय आवश्यक है क्योंकि अगर स्व में निश्चय है तो जहाँ निश्चय है वहाँ हर कर्म में निश्चयबुद्धि अर्थात् स्वमानधारी विजयी है। निश्चय का अर्थ ही है सफलता। ऐसे नहीं कि हमारा तो बाप में निश्चय है, बाप में है वह तो बहुत अच्छा लेकिन बाप के साथ स्व का नशा भी आवश्यक है, मैं कौन! एक-एक स्वमान को याद करो तो निश्चय और नशा आपके चलन और चेहरे से दिखाई देगा। दे रहा है और दिखाई देता रहेगा। साथ में तीसरी बात - ड्रामा में भी निश्चय बहुत जरूरी है क्योंकि ड्रामा में समस्यायें भी आती हैं और सफलता भी होती है। अगर ड्रामा में पक्का निश्चय है तो ड्रामा के निश्चय से जो निश्चयबुद्धि है वह समस्या को समाधान स्वरूप में बदल देता है क्योंकि निश्चय अर्थात् विजय। तो किसके ऊपर विजयी बनता? परिवर्तन करने में, एक सेकण्ड में समस्या परिवर्तन हो समाधान रूप बन जाती है। हलचल में नहीं आयेंगे, अचल रहेंगे क्योंकि ड्रामा के ज्ञान से अडोल अचल बन जाते हैं। यह निश्चय रहता है कि मैं ही कल्प पहले भी समाधान स्वरूप अर्थात् सफल आत्मा बना था, बनी हूँ और कल्प के बाद भी मैं ही बनूंगी। तो यह ड्रामा का निश्चय नशा पक्का कराता है, फखुर रहता है, नशा रहता है मैं थी, मैं ही हूँ और मैं ही बनूंगी इसलिए इस पुरुषार्थी जीवन में ड्रामा का निश्चय भी आवश्यक है और साथ में चौथा है परिवार का निश्चय क्योंकि बाप ने आते ही परिवार को पैदा किया। तो जैसे बाप में निश्चय है वैसे परिवार में भी निश्चय आवश्यक है क्योंकि परिवार किसका है? और इतना बड़ा परिवार और किसका हो सकता है! तो परिवार में भी निश्चय अति आवश्यक है क्योंकि इतना बड़ा परिवार विश्व में किसका है? तो चेक करो कि आप जितना परिवार विश्व में किसी का है? परिवार की रीति से किसी भी डिवाइन फादर का भी नहीं है वहाँ फॉलोअर हैं, यहाँ परिवार है। परिवार के साथ ही सेवा में, सम्बन्ध में रहते हो। ऐसे नहीं कि हमारा तो बाप से ही कनेक्शन है, परिवार से नहीं हुआ तो क्या हुआ। परिवार का निश्चय तो आपका 21 जन्म चलना है। जानते हो ना! परिवार के साथ ही सम्बन्ध में आने से मालूम होता है कि मैं इतने बड़े परिवार में सभी से निश्चयबुद्धि हो चल रहा हूँ, परिवार में चलने के लिए यह अटेन्शन देना पड़ता है कि परिवार में हर एक के संस्कार भिन्न-भिन्न हैं और होंगे। आपका यादगार माला है, माला में देखो कहाँ एक नम्बर और कहाँ 108 वां नम्बर क्योंकि परिवार में भिन्न-भिन्न संस्कार हैं। तो इतने बड़े परिवार में चलते संस्कारों को समझ एक दो में एक परिवार, एक बाप, एक राज्य, तो एक होके चलना है। परिवार में जैसे बड़ा परिवार है, ऐसे ही एक दो में बड़ी दिल, हर एक के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना की स्थिति में स्थित हो चलना है क्योंकि परिवार के बीच ही संस्कार स्वभाव आता है। लेकिन कोई समझे परिवार से क्या है, बाबा से तो है। लेकिन यहाँ धर्म और राज्य दोनों की स्थापना है, सिर्फ धर्म नहीं है, दूसरे जो भी धर्म पिता आये हैं उनका सिर्फ धर्म है, राज्य नहीं है, यहाँ तो आप सबको राज्य भी करना है। तो राज्य में परिवार की आवश्यकता होती है और 21 जन्म भिन्न-भिन्न रूप से परिवार के साथ ही रहना है, परिवार को छोड़ कहाँ जा नहीं सकते। तो चेक करो ऐसे नहीं समझना कि बाप जाने मैं जानूं। बाप से ही कार्य है लेकिन अगर इन चार निश्चय में से एक भी निश्चय कम है तो हलचल में आ जायेंगे। सेवा के साथी, बाप तो सकाश देने वाले हैं लेकिन साथी कौन? साकार में साथ तो परिवार का है तो बाप ने देखा है कि तीन निश्चय में मैजारिटी ठीक चल रहे हैं लेकिन परिवार के साथ में निभाना, संस्कार मिलाना, एक-एक को कल्याण की भावना से देखना और चलना, इसमें कई बच्चे यथाशक्ति बन जाते हैं। लेकिन बाप ने देखा कि जो परिवार के निश्चय में नॉलेजफुल होके सदा बाप समान साक्षीपन की स्थिति में रह सम्बन्ध में आते हैं, रहते हैं वही नम्बरवन या नम्बरवन डिवीजन में आते हैं। तो चेक करो भाव स्वभाव परिवार में होता है, तो छोटी-छोटी गलतियां भी होती हैं, विघ्न आते हैं वह परिवार के सम्बन्ध में ही आते हैं। तो सबसे आवश्यक इस परिवार के सम्बन्ध में पास होना है। अगर परिवार के साथ चलने में, तोड़ निभाने में कोई भी कमी होती है तो वह विघ्न छोटा हो या बड़ा हो लेकिन तंग करता है। यह क्यों, यह कैसे, परिवार के कनेक्शन में आता है। तो क्यों के बजाए, क्यों नहीं करना है, लेकिन हमें मिलकर चलना है, परिवार की प्रीत निभानी है क्योंकि यह बाप का परिवार है, भगवान का परिवार है। रिवाजी परिवार नहीं है। नशा रहना चाहिए कि वाह बाबा, वाह ड्रामा, वाह मैं और वाह परिवार! ठीक है? चेक करते हो? चार ही में पास हो? चार ही में? एक में भी कम नहीं। चेक करो। अभी-अभी चेक करो क्योंकि विजयी बनने का साधन ही यह है। परिवार के बीच संस्कार निकलते हैं और वह संस्कार मिलाना खुद को भी परिवर्तन करना और परिवार को भी इतनी ऊंची दृष्टि से देखना। बापदादा ने पहले भी कहा है कि बापदादा लास्ट बच्चे को भी अति भाग्यवान समझते हैं क्यों? भगवान को पहचानना, साधारण रूप में बाप को पहचानना, जो इतने बड़े-बड़े महात्मायें भी पहचान नहीं सके, लेकिन बापदादा का लास्ट बच्चा भी मेरा बाबा कहता है। दिल से मेरा बाबा कहते हैं। तो बापदादा जैसे लास्ट बच्चे की भी विशेषता देख, जैसे और बच्चों को लाड प्यार, यादप्यार देते हैं वैसे लास्ट वालों को भी देते हैं। तो चेक करो कि तीन में ठीक हो या चारों में ठीक हो या दो में ठीक हो या एक में ठीक हो? चेक किया? किया चेक? जो समझते हैं कि मैं चार ही निश्चय में बाप, आप, ड्रामा और परिवार, चार ही निश्चय में ठीक हूँ वह हाथ उठाओ। ठीक हैं? अच्छा ठीक हैं, पेपर लें? हाँ हाथ उठाओ। अच्छा परिवार में पास हो? परिवार के सम्बन्ध में आना, क्योंकि परिवार को छोड़ तो कहाँ जायेंगे नहीं, रहना ही है, निभाना ही है। तो इसमें पास हो? कभी ऐसे आता है कि यह नहीं होता तो अच्छा होता, यह क्यों करते हैं, यह क्यों होता है, यह संकल्प आता है... एकदम परिवार का नशा, चार ही निश्चय वाला कभी भी ऐसे वैसे संकल्प में भी नहीं करेगा। संकल्प में आये भी कि ऐसे क्यों होता है, लेकिन मुझे वह क्यों वा क्या हिलावे नहीं, मूड नहीं बदली करे, इसको कहते हैं चार ही में पास। हाथ तो उठाया, बापदादा को खुश किया है परन्तु बापदादा को यह जो परिवार की बात है उसमें कभी-कभी बातें सुननी पड़ती हैं, देखनी पड़ती हैं। एकदम बड़ी दिल हो, सबको शुभ भावना, शुभ कामना से ठीक करना है, क्योंकि परिवार ही एक है। एकमत होके चलना और चलाना है। सिर्फ चलना नहीं है, चलाना भी है इसलिए बापदादा इस बात पर अटेन्शन दिला रहे हैं कि परिवार में जो किसी भी हलचल में पास हो जाते हैं, व्यर्थ नहीं चलता है, उन्हें दूसरों को ऐसा बनाना है। अभी तो आप अपने-अपने सेन्टर पर कितने रहते हो, चलो ज्यादा में ज्यादा 25-50, इतने होते नहीं हैं लेकिन मानों बड़े स्थान हैं, उसमें भी 50-60 अच्छा ज्यादा में ज्यादा 100 भी समझो, इतने हैं नहीं लेकिन समझ लो, तो बापदादा ने सभी सेन्टर्स के बच्चों को लास्ट को भी अपना प्यारा कहके चलाया और प्यार की निशानी है रोज़ बापदादा यादप्यार क्या देता? मीठे मीठे, जानता है खट्टे भी हैं लेकिन मीठे खट्टे कभी यादप्यार में कहा है? उन्हों को भी लाडले कहता है, न सिर्फ कहता है लेकिन मेरा बच्चा है, मेरे भाव से चलाता है क्योंकि ड्रामा में, माला में सब एक नम्बर नहीं हैं, यह रिजल्ट है। संस्कार भिन्न-भिन्न होते हैं, होना है, नहीं तो सब राजा बन जायें, प्रजा कौन बनेगा! राज्य किस पर करेंगे? अच्छी प्रजा भी तो चाहिए, रॉयल प्रजा, राजधानी है ना। ऐसे हर एक अपने को चेक करे, परिवार में किसी भी बात में संस्कार खराब हैं, लेकिन मेरा संस्कार क्या? अगर खराब को देख मेरा संस्कार भी खराब हो गया, तो मैं भी तो खराब हो गया। खराब अच्छे को भी बदल लेता है।

बाप ने स्थापना के समय 350-400 को इकट्ठा सम्भाला है, इतना तो अभी किसी का इकट्ठा रहने वाला परिवार नहीं है। चलो, ड्युटी अलग अलग है लेकिन वह ड्युटी है और परिवार में ड्युटी है। रिवाजी परिवार, रिवाजी ड्युटी, रिवाजी रीति से दिनचर्या बिताना, यह नहीं है, न्यारा और प्यारा परिवार है। इसमें डिस्टर्ब होना, फिर बहाना तो यह देते कि इसने किया तब यह हुआ। यह किया तो यह हुआ, लेकिन बाप के आगे भी क्या आपोजीशन नहीं हुई! भागन्ती भी हुए ना! यह आपोजीशन नहीं है! लेकिन बाप ने फिर भी कहा, कोई भागन्ती भी हो गये तो भी टोली भेजो, उनको बुलाने की कोशिश करो, सर्विस करो, याद दिलाओ। ऐसे चार ही निश्चय में पास होना है वा तीन में, दो में? नम्बरवन होना है। इसके लिए विनाश की तैयारियां होते भी अभी विनाश रूका हुआ है। प्रकृति भी बाप के पास आती है, प्रकृति भी कहती अब बहुत बोझ हो गया है। प्रकृति भी बोझ से छूटने चाहती है। माया भी कहती है कि मैं जानती हूँ कि मेरा पार्ट अभी जाने वाला है लेकिन ब्राह्मण परिवार में ऐसे भी बच्चे हैं जो छोटी बात में मेरे साथी बन जाते हैं। बिठा देते हैं मेरे को। तो अपना राज्य लाने में यह चार निश्चय परसेन्ट में हैं इसलिए समय भी रुक रहा है। बाकी माया और प्रकृति दोनों रेडी हैं। अब बताओ आर्डर करें? बच्चे अगर एवररेडी नहीं हैं तो माया और प्रकृति को आर्डर करें? करें? हाथ उठाओ, तैयार हो? ऐसे नहीं हाथ उठाओ। पेपर आयेगा, आयेगा पेपर। एवररेडी?

अभी बापदादा की हर बच्चे में यही आशा है कि कैसे को मिटाके ऐसे करो। कैसे करूं, कैसे हो, नहीं। ऐसे हो। क्या करें नहीं, ऐसे करें। यह आश कब तक पूरी करेंगे? कितना टाइम चाहिए? क्योंकि सभी को तैयार होना है। अगर आप तैयार हो, हाथ उठाया, तो उन्हों का काम क्या है? एक दो को आप समान बनाना। जिन्होंने हाथ उठाया, वह आप समान बना सकते हो? परिवार को तैयार कर सकते हो? इसमें हाथ उठाओ। कर सकते हैं? अच्छा कितना टाइम चाहिए? एक वर्ष। टीचर्स बतावें कितना टाइम चाहिए? पाण्डव बतावें... हाथ तो उठाया, कितना टाइम चाहिए? परिवार है, तो परिवार में सहयोग तो देना पड़ेगा ना। परिवार से कट तो होंगे नहीं, छोड़के जाना तो है नहीं, रहना तो यहाँ ही है तो परिवार को भी तैयार करना पड़ेगा ना। लौकिक में भी जब अच्छी बुद्धि थी, (आजकल नहीं) तो एक दो के सहयोगी बन आगे बढ़ाते थे, गांव को भी अपना परिवार समझते थे और यह तो अलौकिक परिवार है क्योंकि खिटखिट जो होती है, माया जो आती है वह परिवार की बात में आती है, सम्बन्ध में आती है, वेस्ट थॉट्स सम्बन्ध के कनेक्शन में चलते हैं।

बाप कहते हैं “एक बल एक भरोसा''। अगर दोनों ही बातें हैं तो क्या नहीं हो सकता है! बाप ने कितने थोड़े समय में स्थापना का पार्ट बजाया! अभी तो सब नॉलेजफुल बन गये हैं। डबल लाइट भी बन गये हैं। बापदादा जानते हैं कि यह सबजेक्ट थोड़ा अटेन्शन देने की है।

तो अभी क्या करना है? लगन की अग्नि को जलाओ। करना ही है। इसके लिए एक बात में सभी पास भी हैं, जो हर एक समझता है कि बापदादा से हमारे दिल का प्यार 100 परसेन्ट है। 100 परसेन्ट प्यार है तो लम्बा हाथ उठाओ। (सभी ने उठाया) तो प्यार का रिटर्न क्या होता है? प्यार का रिटर्न होता है समान बनना, सम्पन्न बनना, सम्पूर्ण बनना। तो अभी बापदादा एक ड्रिल बताता है, सभी कहते हैं बापदादा दोनों से प्यार है, हाथ उठाया, होंगे तो नम्बरवार लेकिन हाथ उठाया तो बापदादा मानते हैं। दोनों से प्यार है ना। ब्रह्मा बाप से और शिव बाप से दोनों से प्यार है ना! दोनों से है? अच्छा, दोनों से है। बहुत अच्छा धन्यवाद। अच्छा, दोनों के समान बनने चाहते हो? हाथ नहीं उठाओ, कांध हिलाओ। अच्छा। दोनों से प्यार है तो शिव बाप है निराकारी, ठीक है और ब्रह्मा बाप है फरिश्ता। फरिश्ता है ना! तो कल से नहीं, आज से ही अभी से सारे दिन में दोनों बाप से प्यार है तो कभी अपने को निराकार बाप समान निराकारी स्थिति में अभ्यास करो, फालो फादर और कभी फरिश्ता बनकरके साकार रूप ब्राह्मण नहीं, ब्राह्मण तो हो ही, कर्म भले करो लेकिन कर्म करते भी फरिश्ता स्थिति में रहो तो कर्म का बोझ प्रभाव नहीं डालेगा। ब्रह्मा बाप से प्यार है तो ब्रह्मा बाप ने कर्म सब किया, निमित्त बना लेकिन ब्रह्मा बाप के ऊपर कितना बोझ था। आप कोई के ऊपर इतना बोझ नहीं है, है कोई, ब्रह्मा बाप से ज्यादा किसके ऊपर बोझ है, जिम्मेवारी है? वह हाथ उठाओ। कोई नहीं उठाता। तो ब्रह्मा बाप ने इतनी जिम्मेवारी निभाते हुए कार्य में कैसे रहा, कर्म में भी फरिश्ता रूप रहा ना! तो आपका भी ब्रह्मा बाप से प्यार है, तो कभी फरिश्ता रूप में रहो, कभी निराकार स्थिति में रहो, यह प्रैक्टिस, ब्रह्मा बाबा कहके ब्रह्मा बाप समान फरिश्ता बन जाओ और शिव निराकार बाप को याद कर निराकारी स्थिति में स्थित हो जाओ, यह कर सकते हो? यह कर सकते हो या मुश्किल है? जो कर सकते हैं बीच-बीच में, वह बीच-बीच में ऐसे करें जो लगातार हो जाए, अपने कर्म के हिसाब से जो आपकी दिनचर्या है उसके हिसाब से फिक्स करो। कम से कम सारे दिन में 12 बारी फरिश्ता बनो, 12 बारी निराकार स्थिति में स्थित रहो, यह कर सकते हो? हाथ उठाओ। कर सकते हो, मुश्किल नहीं है ना! सहज है ना! सहज है? सहज में हाथ उठाओ। अच्छा, करना है, यह पक्का करो।

सभी निश्चय करो हमको इसमें नम्बरवन होना है। नम्बरवार नहीं होना, नम्बरवन क्योंकि बापदादा के पास समय बहुत आता है। प्रकृति तो चिल्लाती है, बोझ सहन नहीं होता। माया भी विदाई लेने चाहती है लेकिन कहती है मैं क्या करूं, ब्राह्मण कोई न कोई ऐसा काम संस्कारों वश होकर करते हैं जो मुझे आह्वान करते हैं तो मुझे जाना ही पड़ता है। तो बापदादा क्या जवाब दे! इसलिए जैसे समय आगे बढ़ रहा है, अभी आप लोग सेवा में भी अन्तर देख रहे हो ना! सेवा का रिटर्न अभी सभी चाहते हैं, कुछ हो, कुछ हो। ब्रह्माकुमारियां जो कहती थी वह अभी ठीक हो रहा है। पहले कहते थे विनाश, विनाश नहीं कहो, अब तो कहते हैं कब होगा, आप ही तारीख बताओ। अभी सुनने चाहते हैं, पहले बहाना देते थे, तो यह भी फर्क हो रहा है ना! प्रैक्टिकल देख रहे हो ना इसलिए अभी जो बापदादा से वायदा किया है उसको निभाते रहना। ठीक है! इसलिए अभी लक्ष्य रखो होना ही है, करना ही है, समाप्ति को समीप लाओ। आप थोड़े हिलते हो ना तो समाप्ति भी दूर हो जाती है। आपको ही समाप्ति को समीप लाना है क्योंकि राज्य करने वाले तैयार नहीं होंगे तो समय क्या करेगा! इसलिए सब बहाना कारण, कारण शब्द को समाप्त करो। निवारण सामने लाओ। हाथ भले थोड़ों ने उठाया लेकिन आप सबका भी यही लक्ष्य है ना कि दु:खियों को सन्देश दे मुक्त करें। उन्हों को मुक्त करने के बिना आप मुक्ति में जा नहीं सकते। तो इन्हों को मुक्त करो क्योंकि बाप आया है ना तो सारे विश्व के बच्चों को वर्सा तो देंगे ना। आपको जीवनमुक्ति का वर्सा देंगे लेकिन सभी बच्चे तो है ना। उनको भी वर्सा तो देना है ना। तो उन्हों का वर्सा है मुक्ति, आपका वर्सा है जीवनमुक्ति। जब तक मुक्ति नहीं देंगे तो आप भी जा नहीं सकते। इसके लिए यह ड्रिल करो। 24 बारी। रात और दिन के 24 घण्टे हैं और 24 बार करना है, नींद के टाइम, नींद भले करो। बापदादा यह नहीं कहते कि नींद नहीं करो। नींद करो लेकिन दिन में बढ़ाओ। जब कोई फंक्शन करते हो तो सारा सारा दिन काम करते हो ना। जागते हो ना! अभी इस ड्रिल से सभी को सदा के लिए अपने पुरुषार्थ की गति तीव्र करनी है क्योंकि ब्रहुतकाल चाहिए। मानो पीछे कर भी लेंगे लेकिन बहुतकाल का भी सम्बन्ध है इसलिए सभी अटेन्शन दें मुझे करना है, कोई करे नहीं करे लेकिन मुझे एवररेडी बनना ही है।

अभी जल्दी-जल्दी करो। अचानक कुछ भी हो सकता है जो आपको सेवा करने का भी टाइम नहीं मिलेगा। सरकमस्टांश ऐसे भी बीच-बीच में आ सकते हैं इसीलिए जैसे तीव्र पुरुषार्थी ग्रुप बनाया है ना, ऐसे यह तीव्र सर्विस का ग्रुप बनाके तैयार करो। अच्छा!

चारों ओर के बाप के स्नेही, जो स्नेही होते हैं वह सहयोगी जरूर होते हैं, स्नेह का रिटर्न प्रत्यक्ष रूप वह हर कार्य में तन-मन-धन-जन में एक दो के सहयोगी जरूर होंगे। तो ऐसे स्नेही और सहयोगी बच्चे, जो सदा बाप के प्यार में लवलीन रहने वाले हैं, लव में नहीं, लेकिन लवलीन रहने वाले और सदा बाप के सर्व कार्य में समय संकल्प लगाने वाले, क्योंकि संगमयुग में समय और संकल्प की बहुत वैल्यु है, एक जन्म में अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाने वाले, ऐसे तीव्र पुरुषार्थी हर गुण, हर शक्ति को, हर समय अनुसार कार्य में लगाने वाले ऐसे गुण सम्पन्न, शक्ति सम्पन्न बच्चों को बहुत-बहुत पदम पदम गुणा यादप्यार और नमस्ते।