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AVYAKT MURLI

25 / 06 / 77

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25-06-77   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

 

पवित्रता की सम्पूर्ण स्टेज

 

सदा सच्च्ची दिल वाले, सत्यता के आधार पर सर्व के आधार मूर्त्त बनने वाले, हर अनुभव और प्राप्ति के आधार पर अपने जीवन को श्रेष्ठ मत पर चलाने वाले पुरूषार्थियों के प्रति बाप-दादा बोले:-

बापदादा सभी बच्चों की विशेष दो बातें देख रहे हैं। हरेक आत्मा यथा योग्य तथा यथा शक्ति ऑनेस्ट (Honest;ईमानदार) और होलिएस्ट (Holiest; परमपूज्य) कहाँ तक बने हैं। हरेक पुरुषार्थी आत्मा बाप के सम्बन्ध में ऑनेस्ट अर्थात् बाप से ईमानदार, सच्ची दिल वाले बनने का लक्ष्य रख चल रहे हैं, लेकिन ऑनेस्ट बनने में भी नम्बरवार हैं।

(1) जितना ऑनेस्ट होगा उतना ही होलीएस्ट होगा। होलीएस्ट बनने की मुख्य बात है - बाप से सच्चा बनना। सिर्फ ब्रह्मचर्य धारण करना यह प्यूरिटी की हाइएस्ट स्टेज (Highest Stage;सर्वोच्च स्थिति) नहीं है; लेकिन प्यूरिटी अर्थात् रीयल्टी अर्थात् सच्चाई। ऐसे सच्ची दिल वाले दिलवाला बाप के दिलतख्त नशीन हैं और दिलतख्त नशीन बच्चे ही राज्य राज्यतख्त नशीन होते हैं।

(2) ऑनेस्ट अर्थात् ईमानदार उसको कहा जाता है जो बाप के प्राप्त खजानों को बाप के डायरेक्शन बिना किसी भी कार्य में नहीं लगावे। अगर मनमत और परमत प्रमाण समय को, वाणी को, कर्म को, श्वांस को वा संकल्प को परमत वा संगदोष में व्यर्थ तरफ गंवाते, स्व-चिन्तन की बजाए परचिन्तन करते हैं, स्वमान की बजाए किसी भी प्रकार के अभिमान में आ जाते हैं, इसी प्रकार से श्रीमत के विरूद्ध अर्थात् श्रीमत के बदले मनमत के आधार पर चलते हैं, उसको ऑनेस्ट वा ईमानदार नहीं कहेंगे। यह सब खज़ाने बाप-दादा ने विश्व-कल्याण के सेवा अर्थ दिए हैं, तो जिस कार्य के अर्थ दिए है उस कार्य के बजाए अगर अन्य कार्य में लगाते हैं, तो यह अमानत में ख्यानत करना है। इसलिए सबसे बड़ी ते बड़ी प्यूरिटी की स्टेज है - ऑनेस्ट बनना। हरेक अपने आपसे पूछो कि हम कहाँ तक आनेस्ट बने हैं।

(3) ऑनेस्ट का तीसरा लक्षण है - सदा सर्व प्रति शुभ भावना व सदा श्रेष्ठ कामना होगी?

(4) ऑनेस्ट अर्थात् सदा संकल्प और बोल वा कर्म द्वारा सदा निमित्त और निर्माण होंगे।

(5) ऑनेस्ट अर्थात् हर कदम में समर्थ स्थिति का अनुभव हो। सदा हर संकल्प में बाप का साथ और सहयोग के हाथ का अनुभव हो।

(6) ऑनेस्ट अर्थात् हर कदम में चढ़ती कला का अनुभव हो।

(7) ऑनेस्ट अर्थात् जैसे बाप - जो है, जैसा है बाप बच्चों के आगे प्रत्यक्ष हैं; वैसे बच्चे जो हैं, जैसे हैं वैसे ही बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करें। ऐसे नहीं कि बाप तो सब कुछ जानता है, लेकिन बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करना सबसे बड़े ते बड़ा सहज चढ़ती कला का साधन है। अनेक प्रकार के बुद्धि के ऊपर बोझ समाप्त करने की सरल युक्ति है। वा स्वयं को स्पष्ट करना अर्थात् पुरूषार्थ का मार्ग स्पष्ट होना है। स्वयं को स्पष्टता से श्रेष्ठ बनाना है। लेकिन करते क्या हो? कुछ बताते कुछ छिपाते हैं। और बताते भी हैं तो कोई सैलवेशन (Salvation;सहूलियत) के प्राप्ति के स्वार्थ के आधार पर। चतुराई से अपना केस सज-धज कर मनमत और परमत के प्लान अच्छी तरह से बनाकर, बाप के आगे वा निमित्त बनी हुई आत्माओं के आगे पेश करते हैं। भोलानाथ बाप समझ और निमित्त बनी हुई आत्माओं को भी भोला समझ चतुराई से अपने आपको सच्चा सिद्ध करने से रिजल्ट क्या होती है? बाप-दादा वा निमित्त बनी हुई आत्माएं जानते हुए भी खुश करने के अर्थ अल्पकाल के लिए, हाँ जी का पाठ तो पढ़ लेंगे। क्योंकि जानते हें कि हर आत्मा की सहन शक्ति, सामना करने की शक्ति कहां तक हैं। इस राज को जानते हुए नाराज़ नहीं होंगे। उनको और ही आगे बढ़ाने की युक्ति देंगे। राजी भी करेंगे, लेकिन राज से राजी करना और दिल से राजी करना - फर्क होता है। बनने चतुर चाहते हैं, लेकिन भोले बन जाते हैं। कैसे जो थोड़े में राजी हो जाते हैं। हार को जीत समझ लेते हैं। है जन्म-जन्म की हार, लेकिन अल्पकाल की प्राप्ति में राजी हो अपने आपको सयाना, होशियार समझ विजयी मान बैठते हैं। बाप को ऐसे बच्चों के ऊपर रहम भी पड़ता है कि समझदारी के पर्दे के अन्दर अपने ऊपर सदा काल के अकल्याण के निमित्त बन रहे हैं। फिर भी बाप-दादा क्या कहेंगे? श्रेष्ठ पुरूषार्थ की भावी नहीं है।

(8) ऑनेस्ट अर्थात् किसी भी बातों के आधार पर फाउन्डेशन न हो। हरेक बात के अनुभव के आधार पर, प्राप्ति के आधार पर फाउन्डेशन हो। बात बदली और फाउन्डेशन बदला, निश्चय से संशय में आ गया। और क्यों, कैसे के क्वेश्चन में आ गया, उसको प्राप्ति के आधार पर अनुभव नहीं कहेंगे। ऐसा कमज़ोर फाउन्डेशन छोटी सी बात में हलचल पैदा कर लेता है। जैसे आजकल की एक रमणीक बात बाप के आगे क्या रखते हैं कि 1977 तक पवित्र रहना था, अब तो ज्यादा समय पवित्र रहना मुश्किल है। इसलिए बाप के ऊपर बात रखते हुए खुद को निर्दोष बनाकर खुदा को दोषी बना देते हैं। लेकिन पवित्रता ब्राह्मणों का निजी संस्कार है। हद के संस्कार नहीं है। हद की पवित्रता अर्थात् एक जन्म तक की पवित्रता हद का सन्यास है। बेहद के संन्यासियों को जन्मजन्मान्तर के लिए अपवित्रता का संन्यास है। बाप-दादा ने पवित्रता के लिए कब समय की सीमा दी थी क्या? सलोगन (Slogan) में भी यह लिखते हो कि बाप से सदा काल के लिए पवित्रता सुख-शान्ति का वर्सा लो। समय के आधार पर पवित्र रहना, इसको कौन-सी पवित्रता की स्टेज कहेंगे? इससे सिद्ध है कि स्वयं का अनुभव और प्राप्ति के आधार पर फाउन्डेशन नहीं हैं। तो ऑनेस्ट बच्चों के यह लक्षण नहीं हैं। ऑनेस्ट अर्थात् सदा होलीएस्ट। समझा, ऑनेस्ट किसको कहा जाता है? अच्छा।

ऐसे सदा सच्ची दिलवाले, सत्यता के आधार पर सर्व के आधार मूर्त्त बनने वाले, हर कदम और प्राप्ति के आधार पर अपने जीवन के हर कदम को चलाने वाले, सदा श्रेष्ठ मत और श्रेष्ठ गति पर चलने वाले, ऐसे तीव्र पुरूषार्थियों को बाप-दादा का याद- प्यार और नमस्ते।

पार्टियों से

स्वयं को सदा विजयी अनुभव करते हो? मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् सदा विजयी। श्रेष्ठ पार्टधारी आत्माओं का यादगार भी विजयमाला के रूप में है सिर्फ माला नहीं कहते लेकिन विजय माला। इससे क्या सिद्ध होता है? कि श्रेष्ठ आत्मा ही विजयी आत्मा है। इसलिए विजयमाला गाई हुई है। ऐसे विजयी हो? या कभी माला में पिरो जाते, कभी निकल जाते।

किसी भी बात में हार होने का कारण क्या होता है वह जानते हो? हार खाने का मूल कारण - स्वयं को बार-बार चेक नहीं करते हो। जो समय प्रति समय युक्तियां मिलती, उनको समय पर यूज़ नहीं करते। इस कारण समय पर हार खा लेते हैं। युक्तियां हैं, लेकिन समय बीत जाने के बाद, पश्चात्ताप के रूप में स्मृति में आती - ऐसे होता था तो ऐसे करते.। तो चेकिंग की कमज़ोरी होने कारण चेन्ज (Change;परिवर्तन) भी नहीं हो सकते। चेकिंग करने का यंत्र है - दिव्य बुद्धि। वैसे चेकिंग का तरीका चार्ट रखना तो है, लेकिन चार्ट भी दिव्य बुद्धि द्वारा ही ठीक रख सकेंगे। दिव्य बुद्धि नहीं तो रांग को भी राईट समझ लेते। अगर कोई यंत्र ठीक नहीं तो रिजल्ट उल्टी निकलेगी। दिव्य बुद्धि द्वारा चेकिंग करने से यथार्थ चेकिंग होती है। तो दिव्य बुद्धि द्वारा चेकिंग करो, तो चेंज हो जाएंगे; हार के बदले जीत हो जाएगी।

सदा अपने को चलते-फिरते लाईट के कार्ब के अन्दर आकारी फरिश्ते के रूप में अनुभव करते हो? जैसे ब्रह्मा बाप अव्यक्त फरिश्ते के रूप में चारों ओर की सेवा के निमित्त बने हैं, ऐसे बाप समान स्वयं को भी लाईट स्वरूप आत्मा और लाईट के आकारी स्वरूप फरिश्ते स्वरूप में अनुभव करते हो? बाप-दादा दोनों के समान बनना है ना? दोनों से स्नेह है ना? स्नेह का सबूत है - समान बनना। जिससे स्नेह होता है तो जैसे वह बोलेगा वैसे ही बोलेगा, स्नेह अर्थात् संस्कार मिलाना। और संस्कार मिलन के आधार पर स्नेह भी होता। संस्कार नहीं मिलता तो कितना भी स्नेही बनाने की कोशिश करो, नहीं बनेगा।

तो दोनों बाप के स्नेही हो? बाप समान बनना अर्थात् लाईट रूप आत्मा स्वरूप में स्थित होना और दादा समान बनना अर्थात् फरिश्ता। दोनों बाप को स्नेह का रिटर्न (Return) देना पड़े। तो स्नेह का रिटर्न दे रहे हो? फरिश्ता बनकर चलते हो कि पांच तत्वों से अर्थात् मिट्टी से बनी हुई देह अर्थात् धरनी अपने तरफ आकर्षित करती? जब आकारी हो जाएंगे तो यह देह (धरनी) आकर्षित नहीं करेगी। बाप समान बनना अर्थात् डबल लाईट बनना। दोनों ही लाईट हैं? वह आकरी रूप में, वह निराकारी रूप में। तो दोनों समान हो ना? समान बनेंगे तो सदा समर्थ और विजयी रहेंगे। समान नहीं तो कभी हार, कभी जीत, इसी हलचल में होंगे।

अचल बनने का साधन है समान बनना। चलते-फिरते सदैव अपने को निराकारी आत्मा या कर्म करते अव्यक्त फरिश्ता समझो। तो सदा ऊपर रहेंगे, उड़ते रहेंगे खुशी में। फरिश्ते सदैव उड़ते हुए दिखाते हैं। फरिश्ते का चित्र भी पहाड़ी के ऊपर दिखाएंगे। फरिश्ता अर्थात् ऊँची स्टेज पर रहने वाला। कुछ भी इस देह की दुनिया में होता रहे, लेकिन फरिश्ता ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखता रहे और सकाश देता रहे। सकाश भी देना है क्योंकि कल्याण के प्रति निमित्त है। साक्षी हो देखते सकाश अर्थात सहयोग देना है। सीट से उतर कर सकाश नहीं दी जाती। सकाश देना ही निभाना है। निभाना अर्थात् कल्याण की सकाश देना, लेकिन ऊँची स्टेज पर स्थित होकर देना - इसका विशेष अटेंशन हो। निभाना अर्थात् मिक्स नहीं हो जाना, लेकिन निभाना अर्थात् वृत्ति- दृष्टि से सहयोग की सकाश देना। फिर सदा किसी भी प्रकार के वातावरण के सेक में नहीं आएगा। अगर सेक आता तो समझना चाहिए साक्षीपन की स्टेज पर नहीं हैं। कार्य के साथी नहीं बनना है, बाप के साथी बनना है। जहाँ साक्षी बनना चाहिए वहाँ साथी बन जाते तो सेक लगता। ऐसे निभाना सीखेंगे तो दुनिया के आगे लाईट हाउस बन करके प्रख्यात होंगे।

आजकल की लहर कौन-सी है? महारथियों के मन में जैसे शुरू में जोश था कि अपने हमजन्स को अपवित्रता से पवित्रता में लाना ही है। पहला जोश याद है? कैसी लगन थी? सबको छुड़ाने की भी लगन थी; शक्ति भरने की भी लगन थी। आदि में जोश था कि हमजिन्स को छुड़ाना ही है, बचाना है। अभी ऐसी लहर है? चाहे चलते- चलते कमज़ोर होने वाले, चाहे नई आत्मएं जो कि बन्धनयुक्त हैं, ऐसे को बन्धनमुक्त बनाएं - इतना जोश है या ड्रामा कह छोड़ देते हो? वर्तमान समय आप लोगों का पार्ट कौन सा है? वरदानी का, महादानी का, कल्याणकारी का। ड्रामा तो है, लेकिन ड्रामा में आपका पार्ट क्या है? तो यह लहर जरूर फैलनी चाहिए? जैसे फायर ब्रिगेडियर को जोश आता है। आग लग रही है, तो रूक नहीं सकते। तो ऐसी लहर होनी चाहिए। आपकी लहर से उन्हों का बचाव हो। अगर आप लोग ड्रामा कह छोड़ देंगे, या सोचेंगे राजधानी स्थापन हो रही है, तो उन्हों का कल्याण कैसे होगा? नॉलेजफुल होने के कारण यह नॉलेज है कि यह ड्रामा है, लेकिन ड्रामा के अन्दर आपका कर्त्तव्य कौन सा है? तो महारथियों की लहर क्या होनी चाहिए? कुछ भी सुनते हो तो शुभचिन्तन चलना चाहिए, परचिन्तन नहीं। आपका शुभचिन्तन उन्हीं की बुद्धियों को शीतल कर सकता है। आप लोग छोड़ देंगे तो वह तो गए। क्योंकि प्रैक्टिकल में निमित्त शक्तियों का पार्ट है। बाप तो बैक बोन (Backbone;सहारा) है। शक्तियों को कौन सी स्थिति में रहना चाहिए? जैसे देवियों के चित्र में दो विशेषताएं दिखाते हैं। आंखों में मात्र भावना और हाथों से शस्त्रधारी अर्थात् असुर का संहार करने वाली। मात्र भावना अर्थात् रहम की भावना और संघार की भावना भी। संघार करना अर्थात् उन्होंके आसुरी संस्कारों के खत्म करने का प्लान भी हो और रहम भी हो। लॉफुल (Lawful) और लवफुल (Loveful) का बैलेन्स हो। दोनों साथ-साथ हों। यह जो कमज़ोरी की लहर है, यह ऐसे नहीं कि विनाश के कारण प्रत्यक्ष हो गए हैं, कमज़ोरी बहुत समय की होती, लेकिन अभी छिप नहीं सकते। पहले अन्दर-अन्दर गुप्त कमज़ोरी चलती रहती, अभी समय नजदीक आ रहा है। इसलिए कमज़ोरी छिप नहीं सकती। राजा बनने वाला, प्रजा पद वाले, कम पद पाने वाले, सेवाधारी बनने वाले, सब अभी प्रत्यक्ष होंगे। अन्त में जो साक्षात्कार कहा है, वह कैसे होगा? यह साक्षात्कार करा रहे हैं। बाकी ऐसे नहीं है, कमज़ोरी नहीं थीं अब हुई है - लेकिन अब प्रसिद्ध रूप में चान्स मिला है। जैसे समाप्ति के समय सब बीमारी निकलती, वैसे समाप्ति का समय होने के कारण हरेक की वैरायटी कमज़ोरियां प्रत्यक्ष होंगी। अभी तो एक लहर देखी है और भी कई लहरें देखेंगे। अति में जाना जरूर है, अति हो तब तो अन्त हो। जो भी अन्दर कमज़ोरियां हैं, अन्दर छिप नहीं सकती, किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष रूप में आएगी, लेकिन आपकी भावना रहे कि - इन सबका भी कल्याण हो जाए। आप वरदानी हो तो आपका हर संकल्प, हर आत्मा के प्रति कल्याण का हो। लहरें तो और भी आएगी एक खत्म होगी, दूसरी आएगी, यह सब मनोरंजन के बाइप्लाटस हैं। और पद भी स्पष्ट हो रहे हैं। यह होते रहेंगे। आश्चर्यवत् सीन होनी चाहिए। एक तरफ नए-नए रेस में आगे दिखाई देंगे। दूसरे तरफ थकने वाले, रूकने वाले भी प्रसिद्ध होंगे। तीसरे तरफ जो बहुत समय से कमज़ोरियाँ रही हुई हैं, वह भी प्रत्यक्ष होगी। नथिंग न्यू (Nothing New) हैं, लेकिन रहम की दृष्टि और भावना दोनों साथ हों। अच्छा।

 

 

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QUIZ QUESTIONS

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प्रश्न 1 :- श्रेष्ठ पुरूषार्थी की निशानी, होलिएस्ट और ऑनेस्ट आत्मा प्रति बापदादा की समझानी क्या है ?

 प्रश्न 2 :- 'जैसे हैं वैसे ही बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करना है।' क्यों ?इसके पीछे के कारण प्रति बापदादा ने क्या समझाया है ?

 प्रश्न 3 :- बापदादा को किन बच्चो प्रति रहम आता है ?

 प्रश्न 4 :- किसी भी बात में हार होने का मूल कारण और उसके निवारण प्रति बापदादा की समझानी क्या है ?

 प्रश्न 5 :- रहम की दृष्टि और भावना साथ साथ होने का डायरेक्शन देते हुए बापदादा ने क्या समझाया है?

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

( साक्षी, समान, दुनिया, कल्याण, वातावरण, अचल, फरिश्ता, सकाश, निभाना, कार्य, प्रख्यात, साक्षीपन, स्टेज, निमित्त, खुशी )

 

 1   _____ बनने का साधन है _____ बनना। चलते-फिरते सदैव अपने को निराकारी आत्मा या कर्म करते अव्यक्त फरिश्ता समझो। तो सदा ऊपर रहेंगे, उड़ते रहेंगे _____ में।

 2  _____ अर्थात् ऊँची स्टेज पर रहने वाला। कुछ भी इस देह की _____ में होता रहे, लेकिन फरिश्ता ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखता रहे और सकाश देता रहे। सकाश भी देना है क्योंकि कल्याण के प्रति _____ है।

 3  साक्षी हो देखते _____ अर्थात सहयोग देना है। सीट से उतर कर सकाश नहीं दी जाती। सकाश देना ही निभाना है। निभाना अर्थात् _____ की सकाश देना, लेकिन ऊँची _____ पर स्थित होकर देना - इसका विशेष अटेंशन हो।

 4  _____ अर्थात् मिक्स नहीं हो जाना, लेकिन निभाना अर्थात् वृत्ति- दृष्टि से सहयोग की सकाश देना। फिर सदा किसी भी प्रकार के _____ के सेक में नहीं आएगा। अगर सेक आता तो समझना चाहिए _____ की स्टेज पर नहीं हैं।

 5  _____ के साथी नहीं बनना है, बाप के साथी बनना है। जहाँ _____ बनना चाहिए वहाँ साथी बन जाते तो सेक लगता। ऐसे निभाना सीखेंगे तो दुनिया के आगे लाईट हाउस बन करके _____ होंगे।

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:-

 

 1  :- सबसे बड़ी ते बड़ी प्यूरिटी की स्टेज है - अगेंस्ट बनना।

 2  :- पवित्रता ब्राह्मणों का निजी संस्कार है। हद के संस्कार नहीं है।

 3  :- कुछ भी सुनते हो तो चिन्तन चलना चाहिए, स्वचिन्तन नहीं।

 4  :- लहरें तो और भी आएगी एक खत्म होगी, दूसरी आएगी, यह सब मनोरंजन के बाइप्लाटस हैं।

 5   :- आप वरदानी हो तो आपका हर संकल्प, हर आत्मा के प्रति अकल्याण का हो।

 

 

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QUIZ ANSWERS

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 प्रश्न 1 :- श्रेष्ठ पुरूषार्थी की निशानी, होलिएस्ट और ऑनेस्ट आत्मा प्रति बापदादा की समझानी क्या है ?

 उत्तर 1 :- श्रेष्ठ पुरूषार्थी की निशानी प्रति बापदादा की समझानी है कि -

          सदा सच्च्ची दिल वाले होंगे।

          सत्यता के आधार पर सर्व के आधार मूर्त्त बनने वाले होंगे।

           हर अनुभव और प्राप्ति के आधार पर अपने जीवन को श्रेष्ठ मत पर चलाने वाले होंगे।

           सदा श्रेष्ठ मत और श्रेष्ठ गति पर चलने वाले होंगे।

 होलिएस्ट और ऑनेस्ट आत्मा प्रति बापदादा की समझानी है कि -

          होलीएस्ट बनने की मुख्य बात है - बाप से सच्चा बनना। सिर्फ ब्रह्मचर्य धारण करना यह प्यूरिटी की हाइएस्ट स्टेज (Highest Stage;सर्वोच्च स्थिति) नहीं है; लेकिन प्यूरिटी अर्थात् रीयल्टी अर्थात् सच्चाई।

          ऑनेस्ट अर्थात् ईमानदार उसको कहा जाता है जो बाप के प्राप्त खजानों को बाप के डायरेक्शन बिना किसी भी कार्य में नहीं लगावे।

          ऑनेस्ट आत्मा की वृत्ति सदा सर्व प्रति शुभ भावना व सदा श्रेष्ठ कामना होगी।

          ऑनेस्ट अर्थात् सदा संकल्प और बोल वा कर्म द्वारा सदा निमित्त और निर्माण होंगे।

          ऑनेस्ट अर्थात् हर कदम में समर्थ स्थिति का अनुभव हो। सदा हर संकल्प में बाप का साथ और सहयोग के हाथ का अनुभव हो।

          ऑनेस्ट अर्थात् हर कदम में चढ़ती कला का अनुभव हो।

          ऑनेस्ट अर्थात् किसी भी बातों के आधार पर फाउन्डेशन न हो। हरेक बात के अनुभव के आधार पर, प्राप्ति के आधार पर फाउन्डेशन हो।

 

 प्रश्न 2 :- 'जैसे हैं वैसे ही बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करना है।' क्यों ?इसके पीछे के कारण प्रति बापदादा ने क्या समझाया है ?

उत्तर 2 :- बापदादा ने बताया कि जैसे आजकल की एक रमणीक बात बाप के आगे बच्चे क्या रखते हैं कि 1977 तक पवित्र रहना था, अब तो ज्यादा समय पवित्र रहना मुश्किल है। इसलिए बाप के ऊपर बात रखते हुए खुद को निर्दोष बनाकर खुदा को दोषी बना देते हैं। इसलिए जैसे हैं वैसे ही बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करने के कारण प्रति बापदादा ने समझाया है कि  -

          बाप के आगे स्वयं को प्रत्यक्ष करना सबसे बड़े ते बड़ा सहज चढ़ती कला का साधन है।

          अनेक प्रकार के बुद्धि के ऊपर बोझ समाप्त करने की सरल युक्ति है।

          स्वयं को स्पष्ट करना अर्थात् पुरूषार्थ का मार्ग स्पष्ट होना है।

           स्वयं को स्पष्टता से श्रेष्ठ बनाना है।

 

 प्रश्न 3 :- बापदादा को किन बच्चो प्रति रहम आता है ?

उत्तर 3 :- इस संबंध में बापदादा समझाते है कि कई बच्चे सैलवेशन (Salvation;सहूलियत) के प्राप्ति के स्वार्थ के आधार पर चतुराई से अपना केस सज-धज कर मनमत और परमत के प्लान अच्छी तरह से बनाकर, बाप के आगे वा निमित्त बनी हुई आत्माओं के आगे पेश करते हैं। बनने चतुर चाहते हैं, लेकिन भोले बन जाते हैं। हार को जीत समझ लेते हैं। है जन्म-जन्म की हार, लेकिन अल्पकाल की प्राप्ति में राजी हो अपने आपको सयाना, होशियार समझ विजयी मान बैठते हैं।

 .  बाप को ऐसे बच्चों के ऊपर रहम पड़ता है जो समझदारी के पर्दे के अन्दर अपने ऊपर सदा काल के अकल्याण के निमित्त बन रहे हैं।

 

 प्रश्न 4 :- किसी भी बात में हार होने का मूल कारण और उसके निवारण प्रति बापदादा की समझानी क्या है ?

उत्तर 4 :- किसी भी बात में हार होने का मूल कारण प्रति बापदादा की समझानी है कि -

         हार खाने का मूल कारण - स्वयं को बार-बार चेक नहीं करते हो।

         जो समय प्रति समय युक्तियां मिलती, उनको समय पर यूज़ नहीं करते। इस कारण समय पर हार खा लेते हैं।

        ❸ युक्तियां हैं, लेकिन समय बीत जाने के बाद, पश्चात्ताप के रूप में स्मृति में आती - ऐसे होता था तो ऐसे करते.।

 किसी भी बात में हार होने का मूल कारण के निवारण प्रति बापदादा की समझानी है कि -

          चेकिंग की कमज़ोरी होने कारण चेन्ज (Change;परिवर्तन) भी नहीं हो सकते। चेकिंग करने का यंत्र है - दिव्य बुद्धि।

          वैसे चेकिंग का तरीका चार्ट रखना तो है, लेकिन चार्ट भी दिव्य बुद्धि द्वारा ही ठीक रख सकेंगे। दिव्य बुद्धि नहीं तो रांग को भी राईट समझ लेते।

          अगर कोई यंत्र ठीक नहीं तो रिजल्ट उल्टी निकलेगी। दिव्य बुद्धि द्वारा चेकिंग करने से यथार्थ चेकिंग होती है। तो दिव्य बुद्धि द्वारा चेकिंग करो, तो चेंज हो जाएंगे; हार के बदले जीत हो जाएगी।

 

 प्रश्न 5 :- रहम की दृष्टि और भावना साथ साथ होने का डायरेक्शन देते हुए बापदादा ने क्या समझाया है?

उत्तर 5 :-  जैसे देवियों के चित्र में दो विशेषताएं दिखाते हैं। आंखों में मात्र भावना और हाथों से शस्त्रधारी अर्थात् असुर का संहार करने वाली। मात्र भावना अर्थात् रहम की भावना और संघार की भावना भी। संघार करना अर्थात् उन्होंके आसुरी संस्कारों के खत्म करने का प्लान भी हो और रहम भी हो। लॉफुल (Lawful) और लवफुल (Loveful) का बैलेन्स हो।

   इस संबंध में आगे बताते हुए बाबा ने समझाया कि -

          यह जो कमज़ोरी की लहर आत्माओ में है, यह ऐसे नहीं कि विनाश के कारण प्रत्यक्ष हो गए हैं। अभी समय नजदीक आ रहा है। इसलिए कमज़ोरी छिप नहीं सकती। जैसे समाप्ति के समय सब बीमारी निकलती, वैसे समाप्ति का समय होने के कारण हरेक की वैरायटी कमज़ोरियां प्रत्यक्ष होंगी।

          आश्चर्यवत् सीन होगी। एक तरफ नए-नए रेस में आगे दिखाई देंगे। दूसरे तरफ थकने वाले, रूकने वाले भी प्रसिद्ध होंगे। तीसरे तरफ जो बहुत समय से कमज़ोरियाँ रही हुई हैं, वह भी प्रत्यक्ष होगी। नथिंग न्यू (Nothing New) हैं, लेकिन रहम की दृष्टि और भावना दोनों साथ हों।

 

       FILL IN THE BLANKS:-    

( साक्षी, समान, दुनिया, कल्याण, वातावरण, अचल, फरिश्ता, सकाश, निभाना, कार्य, प्रख्यात, साक्षीपन, स्टेज, निमित्त, खुशी )

 

 1   _____ बनने का साधन है _____ बनना। चलते-फिरते सदैव अपने को निराकारी आत्मा या कर्म करते अव्यक्त फरिश्ता समझो। तो सदा ऊपर रहेंगे, उड़ते रहेंगे _____ में।  

    अचल /  समान /  खुशी

 

 2  _____ अर्थात् ऊँची स्टेज पर रहने वाला। कुछ भी इस देह की _____ में होता रहे, लेकिन फरिश्ता ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखता रहे और सकाश देता रहे। सकाश भी देना है क्योंकि कल्याण के प्रति _____ है। 

    फरिश्ता /  दुनिया /  निमित्त

 

 3  साक्षी हो देखते _____ अर्थात सहयोग देना है। सीट से उतर कर सकाश नहीं दी जाती। सकाश देना ही निभाना है। निभाना अर्थात् _____ की सकाश देना, लेकिन ऊँची _____ पर स्थित होकर देना - इसका विशेष अटेंशन हो।  

    सकाश /  कल्याण /  स्टेज

 

 4  _____ अर्थात् मिक्स नहीं हो जाना, लेकिन निभाना अर्थात् वृत्ति- दृष्टि से सहयोग की सकाश देना। फिर सदा किसी भी प्रकार के _____ के सेक में नहीं आएगा। अगर सेक आता तो समझना चाहिए _____ की स्टेज पर नहीं हैं। 

    निभाना /  वातावरण /  साक्षीपन

 

 5  _____ के साथी नहीं बनना है, बाप के साथी बनना है। जहाँ _____ बनना चाहिए वहाँ साथी बन जाते तो सेक लगता। ऐसे निभाना सीखेंगे तो दुनिया के आगे लाईट हाउस बन करके _____ होंगे। 

    कार्य /  साक्षी /  प्रख्यात

 

सही गलत वाक्यो को चिन्हित करे:- 】【

 

 1  :- सबसे बड़ी ते बड़ी प्यूरिटी की स्टेज है - अगेंस्ट बनना।

सबसे बड़ी ते बड़ी प्यूरिटी की स्टेज है - ऑनेस्ट बनना।

 

 2  :- पवित्रता ब्राह्मणों का निजी संस्कार है। हद के संस्कार नहीं है।

 

 3  :- कुछ भी सुनते हो तो चिन्तन चलना चाहिए, स्वचिन्तन नहीं।

  कुछ भी सुनते हो तो शुभचिन्तन चलना चाहिए, परचिन्तन नहीं।

 

4  :- लहरें तो और भी आएगी एक खत्म होगी, दूसरी आएगी, यह सब मनोरंजन के बाइप्लाटस हैं।

 

5   :- आप वरदानी हो तो आपका हर संकल्प, हर आत्मा के प्रति अकल्याण का हो।

आप वरदानी हो तो आपका हर संकल्प, हर आत्मा के प्रति कल्याण का हो।