Murli Revision - Bk Dr. Sachin - 6-2-2022


ओम शांति

पन्द्रहवीं शताब्दी में लिखी गई एक किताब में एक महान योगी का वर्णन है - लाइफ ऑफ मिलरेबा। तिब्बत की भूमि में जन्मा ये महान योगी, उस संस्कृति में इस योगी के विषय में ढेर सारी कहानियां सुनाई जाती है, बार-बार सुनाई जाती हैं। कहां तक वह सच है पता नहीं। शायद किंवदन्तीया होंगी, शायद कुछ सच कुछ झूठ होगा। उसमें से एक वृतांत ऐसा है कि मिलरेबा प्रथम पहली बार अपने गुरु, अपने मास्टर के पास पहुंचता है, वो कहता है मैं सीखने आया हूं….. गुरु कहता है, तुम्हें समर्पित होना होगा, यू हैव टू सरेंडर। वह कहता है मैं तैयार हूं। उस आश्रम पर रहने वाले जो बाकी शिष्य होते हैं देखते हैं यह नवयुवक बहुत ही कांतियुक्त है, तेज है चेहरे पर। उन्हें एक डर सा घेर लेता है कि कहीं कुछ ही दिनों में यह प्रधान शिष्य ना बन जाए और आगे जाकर हमारा गुरु ही ना बन जाए। वह गुरु के पास जाते हैं और कहते हैं, इस तरह से नहीं, इसकी परीक्षा लेनी होगी, इसके समर्पण की परीक्षा। गुरु कहते हैं मैं क्या करूं? वो शिष्य कहते हैं उसको कहो कि सामने जो पहाड़ी है उससे नीचे कूद जाए। गुरु मिलरेबा से कहते हैं कि सामने जो पहाड़ी है, उस पर जाओ और कूद जाओ। मिलरेबा हाँ जी भी नहीं कहता है सीधा जाता है और कूद जाता है। बाकी शिष्य मन ही मन थोड़े प्रसन्न होते हैं, संकट टल गया। कुछ घंटों के बाद वह देखना चाहते है, परंतु गुरु को पता है मेरे वजह से नहीं है, क्योंकि मैं भी कूदा होता तो…….परंतु बाकी शिष्य कहते हैं, यह केवल संयोग मात्र है सन्निपात! कोइंसिडेंस! दूसरी परीक्षा लेनी चाहिए। क्या…? एक घर जल रहा है गुरु कहते हैं जाओ उस घर में जाकर बैठ जाओ और तब तक बाहर न आना जब तक कि वह घर जलकर राख ना हो जाए। मिलरेबा जाता है उस जलते हुए घर में बैठ जाता है, घंटो घंटो बैठा रहता है, सारा घर जलकर राख हो जाता है, बाकी शिष्य उसे ढूंढने जाते हैं, राख के ढेर पर बैठा हुआ वह आनंद मग्न अवस्था में है। शिष्य उसे ले आते हैं। गुरु कहते हैं यह कैसे किया? वह कहते हैं आपके ही चरणों का प्रताप है, मैं आपके प्रति समर्पित हूं, यह आपकी कृपा है। आपका ही चमत्कार है। बाकी शिष्य कहते हैं तीन परीक्षाएं हमेशा होनी चाहिए, दो से काम नहीं होता, यह भी संयोग मात्र है कि वह बच गया। गुरु कहते हैं,,,,, एक नदी तट पर आते हैं कहते हैं कोई नाविक नहीं है, मिलरेबा तुम जाओ इस नदी पर चलकर और देखो उस तरफ कोई नाविक हो तो उसे इस और लेकर आओ। मिलरेबा नदी पर चलता हुआ जाता है, वापस आता है। अब तो हद हो गई। गुरु कहते हैं यह तुमने कैसे कर लिया? मिलरेबा कहता है बस आप ही की शक्ति है, आपका ही नाम लेकर मैं चला। गुरु कहता है मेरा नाम सब वहां से जाने के बाद गुरु कहता है मैं खुद चल कर देखता हूं और गुरु चलने की तैयारी करते हैं और डूब जाते हैं। आगे क्या हुआ पता नहीं।

समर्पण किसके प्रति है वह भी इतना महत्वपूर्ण नहीं है। समर्पण में ही इतनी शक्ति है। समर्पण किसी पत्थर के प्रति भी होगा तो भी चमत्कार हो सकता है, क्योंकि समर्पण अर्थात जो संपूर्ण कायनात है, जो प्रकृति है, यह संपूर्ण सृष्टि है हम उसकी तरफ हो जाते हैं और समर्पण के भाव में द रिटर्न ऑफ यूनिवर्स इस सृष्टि का जो रिद्म ऑफ यूनिवर्स है, इस सृष्टि का जो रिदम है, उस रिदम के साथ हम सिंक हो जाते हैं तो प्रकृति हमारी और हो जाती है तो पहाड़, झरने, नदी, समंदर सब कुछ समर्पण वह छलांग है, समर्पण में ही इतनी शक्ति है, और यदि वह समर्पण उस सर्वशक्तिमान के प्रति हो तो उसमें कितनी शक्ति होगी। साधारण गुरु, अवतार, धर्म स्थापक, महान आत्माएं, तीर्थंकर, बुद्ध ईश्वर पुत्र प्रभु के पैगंबर, पयंबरों के प्रति जिन आत्माओं ने समर्पण किया उनके जीवन में अमोल परिवर्तन आया, चमत्कार होने लगे और यदि यह समर्पण उस परमात्मा के प्रति हो तो कैसा चमत्कार होगा। समर्पण की छलांग। समर्पण अर्थात मुझे कुछ भी पता नहीं। समर्पण अर्थात यह नहीं दो और दो चार, दो और दो 4 का हिसाब पता है तो वह समर्पण नहीं। समर्पण अर्थात अज्ञात में छलांग, समर्पण अर्थात असुरक्षा की ओर कदम, समर्पण अर्थात अनिश्चितता, अनसर्टेंटी, इनसिक्योरिटी कुछ भी पता नहीं। वह सारी दादिया कैसे कूद गई? क्या उन्हें पता था आगे क्या होने वाला है कुछ भी पता नहीं था, खटाटोंक जैसे अंधकार। अगली दिवाली भी नहीं आएगी, ऐसा ही उन्हें बताया गया था। कूद गई। कुछ भी पता नहीं, फिर भी एक निश्चय, एक विश्वास, एक फेथ, कि वो मेरी तरफ है, वो मेरे साथ है, इस विश्वास की मशाल लेकर अंधकार में निकल पड़े अर्थात समर्पण। टीचर्स अर्थात क्या कहा बाबा ने आज, टीचर्स के लिए बोझ नहीं, चिंता नहीं, फिक्र नहीं फिक्र। अभी अभी शांतिवन में मुरली चली है फिक्र नहीं है। छह मास का काम भी दिया है।

जिज्ञासु कैसे बढ़ेंगे, टिकते क्यों नहीं, चले क्यों जाते हैं, यह मास कैसे चलेगा, मेला कैसे होगा……? क्या कहा बाबा ने उत्तर में? जो योग युक्त है, जो योग्य टीचर है उसका भंडारा और भंडारी भरपूर, संपन्न रहेगा। योग युक्त होकर रूहानियत से आवाहन करो तो,,,,,क्या होगा? जिज्ञासु अपने आप आएंगे। उस दिन कोई बहन बता रही थी ना कि जानकी दादी को पूछा, बताया कि कोई जिज्ञासु नहीं आते तो नहीं आते क्या करें? दादी ने क्या कहा था कि तुम विदेश में उस जगह,(मुस्लिम देश है) किस लिए हो? जिज्ञासु तैयार करने के लिए नहीं, ब्राह्मण बनाने के लिए नहीं हो मैसेज देने के लिए हो बस। मैसेज दे दो। इसकी चिंता नहीं करो कि ब्राह्मण बन क्यों नहीं रहे, जिज्ञासु आ क्यों नहीं रहे। रूहानी आकर्षण सेवा और सेवा केंद्र को बढ़ाएगा। क्या कहा? रूहानी आकर्षण।

टीचर्स को भाग्य है समर्पण का। धुलाई कर रहे हैं, बर्तन धो रहे हैं, खाना बना रहे  हैं, कुछ भी कर रहे हैं बुद्धि में एक बात है याद और सेवा। एक तरफा बस और कुछ नहीं। ऐसा समर्पण है उस परम के प्रति, उस सर्वश्रेष्ठ के प्रति, बहते रहो जैसे बहे यह हवा। आकाश से भी परे एक आकाश है समर्पण का आकाश। जो हम सोचते हैं उसके भी परे कुछ और हैं। हमें नहीं पता वो उसे पता है, हम अपने आप को जितना नहीं जानते उतना वो हमें जानता है, हमें अपनी योग्यताओं के विषय में कुछ पता नहीं है। अभी अभी मुरली थी स्मृति। बाबा ने आकर केवल स्मृति दिलाई तुम ये नहीं तुम वो हो और उस एक स्मृति ने क्या से क्या कर दिया। कितना बड़ा चमत्कार कर दिया। सारे ज्ञान का सार है स्मृति, सारे ज्ञान का सार है आना और जाना।

तो आज कौन किसको देख रहा है? स्मृति एक ही शब्द है स्मृति। स्वयं को याद दिलाना मुझे कौन मिला है? मेरे सम्मुख कौन आकर बैठा है?मैं कौन हूँ?अमृतवेला अपने आपको याद दिलाते रहना। अमृतवेला उठते ही दो बार उठना है एक नींद से और दूसरा विस्मृति से। उठते ही स्वयं को याद दिलाना की मैं कौन हूं जो उठा है? एक बड़ा मॉल है, बहुत बड़ा मॉल। एक मां अपने छोटे से बेटे के साथ उस मॉल में जाती हैं वो बेटा इतना शरारती है कि भटकते भटकते हमेशा की तरह कहीं भटक गया और थोड़ी देर में अनाउंसमेंट होती है बहुत बड़ा मॉल है मेट्रो सिटी, कि फला फला स्त्री का लड़का, उसका यह नाम है हरी वह फिर खो गया है। ही इज़ लॉस्ट। वो कहीं पर दूर है खिलौने के पास। वह सुनता है अच्छा मैं फिर खो गया, आई एम लॉस्ट अगेन, जो खोया है उसे भी नहीं पता कि वह खो गया है। हम ही वह हैरी हैं। खो तो गए हैं पर उसी ने यह याद दिलाया है कि तुम खो गए ह।  यह भी नहीं पता कि हम खो गए हैं, अगर यह ज्ञान होता कि हम खो गए तो शायद ढूंढते पर हमें तो यह भी नहीं पता कि हम खो गए हैं।

तो कौन किस से मिलने आया है आज? ज्ञान का सागर है वो। मुरलीयों में रोज आता है मैं तुम्हें वेद और शास्त्रों का सार सुनाता हूं, जब तुम मुझे जान जाओगे तब सब कुछ जान जाओगे, जब तुम अपने आप को जान जाओगे तब सब कुछ जान जाओगे, उस एक को जानने में सब कुछ जानना समाहित है, पर हमारी चेष्टा क्या होती है संसार की चीजों को जाने, यह भी जान लूँ, वह भी जान लूँ इसको भी पढ़ लूं उसको भी पढ़ लूं, सब कुछ जान लूँ, पर बाबा क्या कहता है……मैं सब चीजों का सार हूं, केवल मुझे जानने का प्रयत्न करो बस। तो ज्ञान सागर किस से मिलने आया है? किससे मिलने आया है? होली हंस को मिलने आया है या होली हंसों के…….? के संगठन को मिलने आया है…? एक होली हंस नहीं है, कितने हैं? हर एक होली हंस है। अगर एक होली हंस दूसरे होली हंस से घृणा करें,नफरत करें, डिसलाइक करें तो क्या कहेंगे?

प्योरिटी की कैसी परिभाषाएं दी है आज की मुरली में? नई परिभाषाएं हैं चार। किसी से भी घृणा नहीं, नफरत नहीं क्योंकि….. क्योंकि हमारा ही परिवार है। मुझे मेरे कुटुंब का हर व्यक्ति प्रिय है। अपनी डायरी में नोट करके रखना मुझे इस कुटुंब का, इस परिवार का हर व्यक्ति प्रिय हैं, क्यों…? क्यों…? क्यों प्रिय है..? जबरदस्ती? क्योंकि भगवान को वो प्रिय है, क्योंकि वह परमात्मा द्वारा सिलेक्टेड, इलेक्टेड और चूज़न, गॉड सिलेक्टेड, गॉड इलेक्टेड, गॉड चूज़न। भगवान ने चयन किया है उसका, भगवान ने चुना है उसको, भगवान ने सिलेक्ट किया है, कितने लोग आए थे इंटरव्यू में? वो सिलेक्टेड है। कितने लोग आए थे इंटरव्यू में? वो इलेक्टेड है। सिलेक्टेड, इलेक्टेड एंड चूज़न, इसलिए वह भगवान को प्रिय है। कोई पड़ोसी महिला किसी दूसरी महिला के घर आती है और कहती है तुम बहुत अच्छी हो, तुम्हारा घर कितना अच्छा है, तुम्हारा सब कुछ बहुत अच्छा है कितनी खुश होगी, पर लास्ट में कहती है तुम्हारा जो बेटा है ना वो बहुत शैतान है, मुझे बिल्कुल पसंद नहीं वो, तो वह महिला क्या करेगीमेरा सब कुछ तुमको प्रिय पर मेरा बेटा प्रिय नहीं है तो, मुझे तुम प्रिय नहीं हो। बाबा तुम्हारा ज्ञान भी अच्छा है, तुम्हारा योग भी अच्छा है, तुम्हारी सेवा तो ………, क्या करूं क्या ना करू, पर यह जो परिवार है और यह जो परिवार के लोग हैं, डेंजरस हैं। इनका कुछ करो। आपके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं पर मुझे इनसे छुड़ाओ बस। इनके लिए नहीं पर। बाबा क्या कहेगा बहुत अच्छा तुम मुझसे इतना प्यार करते हो। तो यह होली हंस का संगठन है।

हंस अर्थात जिस में सात विशेषताएं हैं कौन-कौन सी?

(1) हंस वाहन है। सात या आठ ले लो हंस वाहन है किसका ब्रह्मा का सरस्वती का गायत्री का विश्वकरमा का।

(2) हंस कहां से आते हैं? मानसरोवर से। मानसरोवर स्थान किसका है शिव का।

(3) तीसरा हंस के जो पंख होते हैं उसे पानी कभी भी स्पर्श नहीं कर सकता, हंस अर्थात डिटैचमेंट।

(4) अगला हंस अर्थात नीर क्षीर अलग करने वाला। पानी और दूध को अलग करने वाला। हंस अर्थात उसका भोजन क्या है मोती।

(5) अगला हंस अर्थात वो श्वेत अच्छा आज यह भी कहा बाबा ने।

(6) हंस अर्थात वेदों में क्या लिखा है हंस के विषय में हंस प्योरिटी का प्रतीक है और

(7) शास्त्रों में क्या लिखा है इसके विषय में हंस अर्थात अध्यात्म में जो बहुत ऊंची अवस्था में पहुंच जाता है उसे क्या कहा जाता है   परमहंस। सर्वोच्च अवस्था जो है सन्यासियों की कुटीचर बुद्रुक परमहंस अवधूत अलग-अलग नाम दिए गए हैं, योगियों को           परम हंस बड़ी ऊंची अवस्था है।

(8) हंस की विशेषता अपने घोसले को ऐसे प्रोडक्ट करता है, कहा जाता है एक व्यक्ति छेड़छाड़ करने गया उसकी मृत्यु हो गई। हंस   बिल्कुल ही पजेसिव होता है अपने घोसले के प्रति दूसरे को अटैक करने नहीं देता है, हाथ भी लगाने नहीं देता अपने घोसले को। घोंसला भी बनाता है।

(9) हंस में एक और गुण होता है कौन सा? वफा फिडेलिटी। मोनोगेमस मैरिज  एक के साथ वफा। एक ही साथी होता है उसका जीवन भर। तो हंस की कितनी विशेषताएं हैं

बाबा राजहंस भी नहीं कहते परमहंस भी नहीं कहते नया शब्द ही बनाया है एक हिंदी के लिए और एक इंग्लिश और मिलाकर नया शब्द बना दिया। नवीनता तो वह करेगा ना, वही पुराना पुराना कैसे कहेगा, तुम परमहंस हो तुम राजहंस हो। नहीं तुम कौन होहोली हंस, पवित्र हंस, श्वेत वस्त्र धारी साफ।मुरली में 5 शब्दों का प्रयोग हुआ साफ,स्वच्छ, पवित्र, निर्विकार, बेदाग। दादी जानकी होती तो शायद एक क्लास इसी पर होता कि इन पांचों में क्या अंतर है।  स्वच्छ, साफ, बेदाग, पवित्र, निर्विकार। आगे एक जगह सच्चाई भी जोड़ दिया, वह दूसरा। बेदाग जिसमे कोई दाग नहीं, साफ है स्वच्छ है पवित्र है निर्विकार वह भी संपूर्ण निर्विकार। बाबा को ऐसी आत्माएं बहुत पसंद है जो बहुत निर्विकारी है, बहुत शुद्ध है, बहुत पवित्र है, ब्रह्मचारी है पवित्र है। जिन्हें प्योरिटी बहुत बहुत बहुत पसंद है। जिनकी प्योरिटी कभी भी किसी भी बात से भंग नहीं होती, स्वप्न में भी नहीं, चाहे उसे उसमें फिर बाकी विशेषता ना भी हो, परंतु प्योर है। उसकी दृष्टि वृद्धि बहुत प्यार है जैसे सभी दादिया। जैसे सब मेरे है परंतु स्त्री का चोला है इसलिए गले नहीं मिलते परंतु भावना क्या है? जगत माता। जगन माता हूँ। सब मेरे हैं सब मेरे हैं। ऐसी सर्वोच्च भावनाएं सब के प्रति। स्वच्छ, पवित्र, बेदाग, निर्विकार, पवित्र। पांच शब्द। ज्ञान सागर आपको देख रहे हैं। सागर के कंठे पर आए हो, मुरली में हैं एक जगह। होली हंस हो।

चार प्रकार की प्योरिटी कौन-कौन सी?चार या छह? चार या छह? मन,वचन, कर्म। वचन और कर्म ये दो एक्स्ट्रा। मन, तन मन दिल। दिल और मन में क्या अंतर है, अलग अलग है। कई बार आता है दिमाग और दिल माइंड दिल दिमाग वृत्ति, कितने अलग-अलग शब्द हैं परंतु जैसे संदर्भ होगा वैसे उस अनुसार उसका अर्थ होगा। कई बार बाबा कहते हैं दिल अर्थात हार्ट, इमोशंस, फीलिंग, ब्रेन अर्थात लॉजिक, रिजनिंग, तर्क, वितर्क। आज के इस में है एक है मन। मन अर्थात माइंड, विचार, संकल्प और दिल अर्थात भाव भावनाएं उसके पीछे की।

पहली स्वच्छता - तो प्योरिटी की सबसे पहली परिभाषा प्योरिटी अर्थात स्वच्छता।

दूसरा भटकना नहीं - प्योरिटी अर्थात भटकना नहीं। प्योरिटी की दूसरी परिभाषा भटकना अर्थात इंप्योरिटी, बाकी सब अच्छा है पर मन भटक रहे अर्थात इंप्योरिटी यह एकदम नई परिभाषा है एंप्यूटी की। इंप्योरिटी अर्थात भटकता हुआ मन इधर जाए उधर जाए यह करो वह करो मन भटक रहा है, यह भी अपवित्रता है।

तीसरा सच्चाई -  प्योरिटी अर्थात सच्चाई और

चौथा संतुष्टता - प्योरिटी अर्थात संतुष्टता। चार परिभाषाएं हैं प्योरिटी की।

पहली स्वच्छत - पहला प्योरिटी अर्थात स्वच्छता, क्या सोचना है? शरीर क्या है मंदिर, और मैं कौन हूं, कौन सी मूर्ति? हीरे की मूर्ति और मैं कौन हूं यह मंदिर है मैं मूर्ति हूं दूसरा और एक चीज है ट्रस्टी, मंदिर के ट्रस्टी होते हैं ना बोर्ड ऑफ ट्रस्टी, वैसे उस ट्रस्टी। मैं ट्रस्टी हूं मैं मूर्ति हूं। मूर्ति भी कैसी हीरे की, मूर्ति भी कैसी श्रेष्ठ और यह शरीर क्या है मेरा मंदिर और मेरा नहीं है मैं ट्रस्टी हूं वह भी किसका है उसका। उसको दे दिया है। उसको जैसे चलाना है। चलाने और संभालने के लिए चाबी तुम्हारे हाथ में दे दी है। तो इसमें क्या करना है तीन बातें एक अगर यह शरीर मंदिर है अगर यह शरीर मंदिर है मैं मूर्ति हूं अगर यह शरीर मंदिर है मैं ट्रस्टी हूं तो सबसे

पहला मैं इसमें क्या डाल रहा हूं भोजन दूसरा इस तरह का कर्म कर रहा हूं?

(1) सम्यक आहार,राइट फूड

(2) सम्यक व्यायाम,राइट एक्सरसाइज

(3) सम्यक कर्म,राइट एक्शन

(1) सम्यक आहार,राइट फूड- राइट फूड, राइट एक्सरसाइज, राइट एक्शन। यह तीन चीज शरीर से जुड़े हुए हैं। अगर यह शरीर मंदिर है तो हमने सबसे पहले क्या परिवर्तन किया था अज्ञानियों के हाथ का खाना बंद कर दिया था, क्योंकि प्रकंपन किस तरह के होंगे, उसमें दर्द, चीख-पुकार। एक बहन ने अपना अनुभव सुनाया था कि वह किसी कॉन्फ्रेंस में यहां आई थी ज्ञान सरोवर में। तीन दिन से किसी कॉन्फ्रेंस में थी। भोजन के विषय में किसी ने कुछ नहीं कहा था कॉन्फ्रेंस में। वह मांसाहारी थी रोज का चलता था घर पर। कॉन्फ्रेंस में आई, कॉन्फ्रेंस अटेंड की, घर पर गई, घर जाते ही जैसे ही फ्रिज खोला उसमें नॉनवेज सब भरा पड़ा था, उसको देखकर इतनी घृणा आई उसको, यहां किसी ने भोजन के बारे में उसको एक शब्द नहीं बोला था ऐसा भोजन करो या वैसा भोजन करो कुछ नहीं। यहां के वायुमंडल में ही ऐसी शक्ति है ऐसे प्रकंपन है। अभी अभी शांतिवन में मुरली चली ना मधुबन निवासियों को बाबा ने बड़ा उठाया तारीफ की, क्या है तुम्हारे दिल में प्रेम की शक्ति है। वह आत्माएं देखेंगी जो आने वाली है। तुम क्या करते हो सेवा धारी तो हो ज्ञानी तो है परंतु तुम्हारी सेवा कौन सी है जो यहां आते हैं उनकी सेवा करते हो, उनको खुश करते हो, कितनी बड़ी सेवा है। यह उस प्रकंपन का प्रभाव है। उस प्रकंपन का प्रभाव उस पर इतना पड़ा कि वह कहती है, वह लिखती है कि उसी दिन से, मुस्लिम परिवार से हैं, उसी दिन से नॉनवेज बंद कर दिया, उठाकर फेंक दिया सीधा। जैसे-जैसे आत्मा प्योर होती जाती है भोजन सुक्ष्म सुक्ष्म सुक्ष्म और पवित्र पवित्र होते जाता है फिर उस स्थूल राजसिक खाने की इच्छा अपने आप ही कम हो जाती हैं। धीरे-धीरे बहुत कम हो जाती है फिर वह तीखा, मसाला वो तेल मिर्च isssshaaaa ,,,  ,,,,किसी किसी को मजा ही नहीं आता जब तक ऐसे हो। खाने की इच्छा स्वत ही कम कम हो जाती है। योग की वह अवस्था जहां शरीर ही नहीं है, योग की वह गहरी अवस्था जहां पर शरीर भान ही खत्म हो गया, वहां से सीधा निकलने के बाद कोई इतना सारा खा ले यह हो नहीं सकता। शरीर मंदिर है अर्थात कुछ भी अपवित्र अर्थात कुछ भी एक्सेस ज्यादा अर्थात कुछ भी ऐसा जो शरीर को बहुत मेहनत लगे उसको पचाने में नहीं डाल सकते हैं। योगियों का भोजन धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे सालिड से लिक्विडि की तरफ कन्वर्ट हो जाएगा। मास्टिकेशन चीविंग, भूख को बढ़ाता है आसक्ति पैदा करता है। योगी धीरे-धीरे हरसाहार की ओर जाता है। केवल पीना है बस। शरीर को मेहनत नहीं ज्यादा। वेस्ट नहीं निकलेगा ज्यादा और जो निकलेगा वह भी दुर्गंध रहित होगा। जब शरीर में ऐसी पवित्रता जाए तो मन अपने आप ही हल्का हो जाता है। शरीर भी हल्का और मन भी हल्का। जर्नी फ्रॉम सॉलि़ड फूड टू लिक्विड फूड यह लक्ष्य हो। धीरे धीरे धीरे धीरे बहुत धीरे धीरे धीरे क्योंकि शरीर जो है उसकी आदतें होती हैं उसे बुद्धि से तो समझ में गया परंतु काफी नहीं है। बहुत टाइम लगता है कई साल मन को समझाने में।

(2) सम्यक व्यायाम,राइट एक्सरसाइज- दूसरा व्यायाम, शरीर को किस चीज की आवश्यकता है व्यायाम। यह प्योरिटी है। बॉडी लव्स टू मूव, एनर्जी लव टू मूव। कहते हैं शरीर में जितने जॉइंट्स हैं हर जॉइंट्स केवल सात चक्र नहीं हर जॉइंट एक चक्र है एवरी जॉइंट नीड्स एक्टिवेशन, एवरी चकरा नीड्स एक्टिवेशन। चक्र का एक्टिवेशन, हर चक्र सक्रिय हो जाए, इसके लिए क्या चाहिए? एक एक ज्वाइंट की मूवमेंट, एक्सरसाइज ताकि उर्जा बहती रहे। अगर शरीर के किसी अंग को काम ही ना दिया जाए क्या हो जाता है? निष्क्रिय हो जाता है, उसमें पावर कम हो जाती है अपने आप। एक हाथ ऐसे रख दो एक मास, फिर उसके बाद में उंगली भी नहीं रहेगी। पेशेंट होते हैं बीमारी कुछ और कमजोरी बहुत है बेड पर पड़े रहते हैं। पैर ठीक है, कोई फ्रैक्चर  नहीं है उनको कहो चलो, कैसे चले कमजोरी कितनी है, कमजोरी पैरों में नहीं मन में है। चला पैरों से नहीं मन से जाता है। कोविड हुए दो साल हो गए अभी भी एक ही कंप्लेंट है कुछ तकलीफ? बहुत कमजोरी है चलना नहीं होता है कोई अच्छा सा तगड़ा सा इंजेक्शन लगा दो एक एकदम पावर जाए। पावर इंजेक्शन से नहीं मन से आती है। मन में कमजोरी है। कई सारे ऐसे भी देखे गए कि जिस पेशेंट ने यह मान लिया कि मेरा यह पैर पैरालिसिस हो गया है, ठीक है पैर पैरालिसिस चल नही सकते हैं, उंगली भी नहीं हिल रही है घर चौथे मंजिल पर है और अचानक एक दिन भूकंप गया, ऐसे उठ के भागे 2 माह से चले नहीं थे, भूकंप ऐसा हुआ, ऐसा भय, ऐसा भागे, सीधा बिल्डिंग के बाहर गए और फिर बैठ गए, अरे तुम चले कैसे? मैं कैसे चला, मुझे क्या पता अब तो मैं चल भी नहीं पा रहा हूं। अब नहीं चल पा रहे। जागरण हो गया , एक सुषुप्त था जो, सोया था उसका जागरण उस भय ने जागृत कर दिया, समर्पण भी ऐसा ही जागरण है जहां असुरक्षा है, पता ही नहीं कब जागृति जाती है, कब बाबा का अनुभव होता है कि वह जो है वही मेरा है और उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मेरा किसी की मदद नहीं मिल रही है कहीं से कोई मदद नहीं रही है, हम अकेले हैं। ऐसी स्थिति में परमात्मा मदद का अनुभव होता है। जहां सब कुछ ठीक है सारी व्यवस्था कर रखी है वहां कौन सा अनुभव होगा, तो शरीर की प्योरिटी अर्थात व्यायाम।

(3) सम्यक कर्म,राइट एक्शन- तीसरा सेवा। शरीर का, हमारा यह शरीर भोग विलास  के लिए दिया नहीं गया है, इस को भोग विलास की आदत पड़ी हुई है। भोक्ता भाव नहीं साक्षी भाव। हर चीज में साक्षी को लाने है भोक्ता को धीरे-धीरे खत्म करना है। कुछ खा भी रहे हैं आसक्ति से नहीं, अनासक्त वृत्ति से। शरीर की प्योरिटी मंदिर है, अपवित्र उसमे कुछ ना डालना एक्सिस इसमें कुछ ना डालना, उत्तेजित करने वाला, इन्द्रियों को उत्तेजित कर्ता हैं, मिर्च मसाला नमक तेल। धीरे धीरे योगी शुद्धता की ओर बढ़ता है।

दूसरा भटकना नहीं - दूसरी प्योरिटी है मन। मन का भटकना इंप्योरिटी है, कितनी बड़ी परिभाषा है। वांडरिंग माइंड इज इंप्योरिटी। मन के लिए क्या डायरेक्शन है बापदादा का, मुझ में लगाओ मन मनभावन या फिर विश्व सेवा में लगाओ सकाश। छह मास का होमवर्क दिया है बाबा ने दुखी आत्माओं को क्या करो अपनी वृत्ति से सुख शांति की किरणें फैला। यह काम करो फर्स्ट फरवरी से इकत्तीस जुलाई छह मास। अपना प्लान बनाना है। मन को बिजी करने का प्लान बनाओ। किसमें बिजी करेंगे?परमात्मा मोहब्बत में।  किसमें करेंगे ड्रिल में। किसमें बिजी करेंगे सेवा में किसने बिजी करेंगे? अभी अभी मुरली चलि शांतिवन में, वायुमंडल को शुद्ध बनाने में। ड्रिल करो, ड्रिल में बिजी कर दो, जैसे मसल्स होती है उसको क्या चाहिए एक्सरसाइज चाहिए, उसी तरह सोल इज मसल, आत्मा भी एक मसल है, उसको भी क्या चाहिए? एक्सरसाइज नहीं तो क्या होगी, एक्सरसाइज के बिना डल हो जाती है। स्प्रिचुअल बॉडीबिल्डिंग। ड्रिल करो आना जाना आना जाना। टाइम मिला, शरीर को ही साक्षी होकर देखते जाओ। शरीर की इतनी गहरी अटैचमेंट आत्मा की शरीर से। इस शरीर को ही बीच-बीच में बैठकर साक्षी हॉकर देखो।  शरीर को और उसपर उत्पन्न होने वाली सारी संवेदना सेंसेशन। वास्तव में आकर्षण, आसक्ति शरीर की नहीं है शरीर पर जो संवेदनाएं उत्पन्न होती हैं उसकी आकर्षण है उसकी आसक्ति है। यहां बहुत सुखद दुखद दर्द हो रहा है हम नहीं चाहते यह दर्द हो तुरंत दवाई लेकर उसको ठीक करना है, परंतु उसी दर्द को साक्षी होकर देखना। मन की आसक्तिकी आदत को तोड़ना है इसके लिए ऊपर से नीचे नीचे से ऊपर इस शरीर को साक्षी होकर देखते रहना, बीच-बीच में क्या चल रहा है क्या उत्पन्न हो रहा है अभी अभी आंखें खोल कर आंखें बंद करके दोनों ही अभ्यास चाहिए। ऊपर से सिर के सिरे से पांव तक शरीर को देखना की आत्मा कहां-कहां और देखते देखते ही डीटेच होते जाती है सबसे ब्यूटी यह है कि शरीर को जैसे ही हम देखने लगते हैं अपने आप शरीर अलग मैं अलग बस तरंगे ही तरंगे दिखाई देती है और फिर वहां से राजयोग का अभ्यास कि मैं आत्मा आगे बढ़ रही हूं। हम देखभान के साथ बैठते हैं और योग की शुरुआत करते हैं। पहले स्टेप है आत्मा समझो। शरीर से स्वयं को डिटेच करने की की एक विधि है शरीर को ही साक्षी होकर देखना कि यह मिथ्या है अनित्य है खत्म हो जाएगा, समाप्त हो जाएगा थोड़ी देर के लिए है बस। भूख लगी इतनी तेज भूख लगी कि अब इस दुख को ही साक्षी होकर देखो कहां लगी भूख कंधे को? कहां लगी हाथ को,पेट को, छाती को, सर को की पैर को और धीरे-धीरे हो भूख विलीन हो जाएगी क्योंकि भूख शरीर को कम लगती है मन को ज्यादा लगती है। भूख स्वभाव मन का है शरीर की वास्तविक भूख तो बहुत कम है और धीरे-धीरे यह भी पता चलेगा कि शरीर को कितने कम चीजों की आवश्यकता है। बहुत कम के साथ वह बहुत स्वस्थ रह सकता है। तो भटकता मन, मन को क्या कर दो बिजी।  मन का टाइम टेबल बनाओ। अपने आपको देखो कल की मुरली भी थी, खुद को चेक करते जाओ।  खुद को चेक करते रहो परसेंटेज निकालो कितना बड़ा काम है कैसे निकाले मेरी पिक परसेंटेज कितना मुश्किल काम है कोई टीचर होता है उसको एग्जाम पेपर चेक करता है तो परसेंटेज देता है उसके लिए शायद थोड़ा ठीक होगा पर बाकी लोग हम तो टीचर नहीं है परसेंटेज कैसे निकाले बड़ा काम है यह और वह भी प्योरिटी का और कौन अपने आप को कम मार्क्स देगा इसलिए

तीसरा सच्चाई - तीसरा प्योरिटी की परिभाषा क्या है सच्चाई और सफाई अपने पुरुषार्थ की सच्चाई यह मेरा पुरुषार्थ है इस एक मास में अमृत वेले में यह हलचल हुई है कभी चार कभी तीन कभी 3:30 कभी तो, तो कभी 5:00, तो कभी 5:30, तो कभी सीधा 8 बाबा गुड मॉर्निंग मुरली उधर पूरी हो चुकी है पर, पूरा संगम युग भी तो अमृतवेला कितने अच्छे अच्छे शब्द हमारे पास है और अपने आप को कन्वेंस करने के और नीचे नीचे गिराने के लिए भी, बाबा के बताए हुए हैं। सेल्फ डिसेप्शन। इसमें और क्या बताया तीसरे प्रकार की प्योरिटी में सेवा। सेवा कैसे करो,

(1) स्वार्थ से नहीं पहला

(2) मजबूरी से नहीं दूसरा,                    

(3) तीसरा अलबेले पन से नहीं और

(4) चौथा ड्यूटी समझकर नही

केवल मेरी ड्यूटी पूरी हो गई, 9:00 से 5:00, आई एम गोइंग, बाय, टाटा, अब मुझे बुलाना मत, कॉल मत करना। मां ऐसे करती है क्या उसका बच्चा बीमार है, वह कहती है 5:00 बज गए मेरी ड्यूटी पूरी हुई। आजकल की तो शायद कहती भी होगी अब तुम्हारी टर्न है , मैं तो चली। जे कृष्णमूर्ति ने एक बड़ा ही क्रांतिकारी वाक्य कहा है थॉट इज टाइम विचार समय है। बड़ी क्लास हो सकती है थॉट इस टाइम अर्थात जब हम इतने विचार मगन हो जाते हैं समय रुक जाता है समय का भान ही नहीं रहता है और जब समय का भान है सवा चारसाढ़े चार, पौने चार अमृतवेला पूरा अभी भागो, सात बज गए, सवा सात हो गए, सात बीस हो गए, अभी म्यूजिक बंद हो गया, गीत बजना बंद हो गया, अभी नो म्यूजिक, दस मिनट खाली दस मिनट है, दस मिनट शिव की याद रहेगी, तब थाली लेकर समय। थॉट इज टाइम जब थॉट खो जाए तो समय भी खो जाता है लग्न में मगन समयातीत स्थिति। देह सब कुछ भूल जाए वह अवस्था। तो क्या करो सेवा मजबूरी से नहीं, सेवा स्वार्थ से नहीं, सेवा, सेवा ड्यूटी समझकर नहीं, सेवा अलबेले पन से नहीं, सेवा क्या है तुम्हारा निजी संस्कार। सेवा क्या है तुम्हारा स्वकर्म, सेवा क्या है तुम्हारा स्वधर्म, सेवा के संस्कार रग रग में समाए हो। सेवा सेवा सेवा कोई भी समय बिना सेवा ना जाए चाहे वह कोई भी सेवा हो।मनसा कुछ भी नहीं है स्थूल तो कम से कम इन दीवारो को पवित्र करने की सेवा करो। इस कमरे को पवित्र करने की सेवा करो।

चौथा संतुष्टता - चौथी पवित्रता संबंध किससे संबंध आता है ब्राह्मणों का ब्राह्मण, जिज्ञासु, लौकिक और किससे होता है व्यक्ति, सीनियर, जूनियर, सब केटेगरी, सीनियर, जूनियर, अलौकिक, बाहर वाले, स्टूडेंट, परिवार कोई स्टूडेंट्स या परिवार मधुबन, मधुबन निवासी, सबकैटिगरीज क्या करना है इनके साथ? हल्का। क्या करना इनके साथ संतुष्ट। हम भी खुश और वह भी खुश। ऐसा नहीं करना चाहिए था ऐसा नहीं बोलना चाहिए था ऐसा संकल्प आने चाहिए बार-बार अगर यह भी नहीं रहे तो मतलब अलबेले पुरुषार्थी है, परंतु बोझ नहीं, हल्के। हम भी खुश और वह भी खुश। खुशहाल अर्थात, ये चार प्रकार की प्योरिटी फिर खुशहाल के बारे में क्या कहा खुशहाल अर्थात उड़ती कला, फरिश्तों की चाल और हाल खुशहाल खुशहाली अर्थात संपन्न। खुशहाली अर्थात खुशहाली अर्थात एवर हेल्दी एवर हैप्पी और दवाई कौन सी मिली है खुशी की, इस दवाई से क्या करो क्या करो इस दवाई से बीमारी भूल भी जाएगी और भाग भी जाएगी क्या होगा भूल भी जाएगी भाग भी जाएगी। जो पेशेंट ज्यादा डिप्रेस्ड रहते हैं उनको रिकवरी में ज्यादा टाइम लगता है और जो पहले से ही तैयार रहते हैं बीमारी गई अभी चली जाएगी चली जाएगी थोड़ी देर रहने वाली है वह फास्ट रिकवरी होती है और जिन्होंने मन में ही समझ लिया मुझे तो ऐसा ही होता रहता है हर बार ऐसा होता है जब भी मधुबन आता हू तो ऐसा ही होता है सर्दी आती है ना तो इतनी गालियां देते हैं सर्दी को की बात मत पूछो धूल मिट्टी इतने नेगेटिविटी रहती हैं वो बीमारी वही ठहर जाती है रोग दवाई अच्छी हो तो रोग क्या होगा भाग जाएगा भूल जाएगा और अच्छा ना हो तो पीला पड़ जाएगा शरीर भी कहा ना आज। तो स्वस्थ शरीर हम ही चैलेंज कर सकते हैं क्या कि अगर हैप्पी बनना हो तो किसके पास आओ हमारे पास आओ हमारे पास क्या है खजाना मिला है खुशी का हम जैसे कोई खुश संसार में हो नहीं सकता। अगर तुमसे कोई पूछे कैसे हो तो क्या कहूं उनसे मुरलिया में आता है साकार मुरली हिम्मत कैसे की तुमने पूछने की? किससे पूछ रहे हो हमसे। हमसे ज्यादा खुश हो ही नहीं सकता स्वयं भगवान मिला है। संसार कितना दुखी है इसलिए भगवान ने कहा सब के प्रति शुभ भावना परवश है माया के वस हैं परिवार है हमारे ही हैं हैं घृणा ना हो एक पेशेंट होता है उसको कुत्ता काटता है डॉक्टर के पास पहुंचता है डॉक्टर इंक्वायरी करता है पता चला जिस कुत्ते ने काटा उसे रवीश था और रेविश की बीमारी कुत्तों से आती है और जिस कुत्ते को रेबीज होता है अर्थात जो कुत्ता पागल होता है लार टपकती है ऐसा कुछ सबको काटते फिरता है वह कुत्ता खुद भी दस दिन से ज्यादा जिंदा नहीं रहता है और जिसको उसने काटा, रेबीज की मोर्टालिटी 99.9% है उस व्यक्ति को अगर इलाज ना मिले तो उसे मरना निश्चित ही है, तो ऐसा एक व्यक्ति जिसको कुत्ता काटा है डॉक्टर के पास आता है देखता है इसको जिस कुत्ते ने काटा वह तो रैबिट है उसको तो रविस की बीमारी है अब यह भी यह भी नहीं बचेगा डॉक्टर को बड़ा दुख होता है तुम जल्दी क्यों नहीं है चार दिन के बाद रहे हो कुत्ता काटा चार दिन पहले जल्दी आना चाहिए था तुमने वह व्यक्ति दुखी हो जाता है और एक कागज पर लिखने लगता है डॉक्टर कहता है इतनी भी देरी नहीं है तुम अपनी वसीयत लिख रहे हो ना वह कहता है नहीं मेरे दुश्मन जो है ना उनके नाम लिख रहा हूं जिनको मुझे जाकर अब काटना है। इतनी गहरी नफरत, जाऊंगा परंतु दूसरों को लेकर जाऊंगा,

तो एवरहेल्दी एवरहैप्पी और एवरवेलदी के बारे में कुछ नहीं कहा परंतु खुशी जैसी कोई खुराक नहीं, खजाना नहीं। तो टीचर से मुलाकात, महाराष्ट्र ग्रुप से मुलाकात और किस से मुलाकात की और क्या है मुरली में सच तो बिठो नच। नाचते रहेगा। तो बड़ा डीप एनालिसिस है मुरली का। प्योरिटी क्लीनलीनेस, प्योरिटी अर्थात ऑनेस्टी, प्योरिटी अर्थात नॉन वंडरिंग माइंड, प्योरिटी अर्थात लास्ट कंटेंटमेंट, संतुष्टता, हम भी कुछ दूसरे भी खुश,प्योरिटी अर्थात हल्का, बोझ नहीं, भारी नहीं, अपना भी नहीं, सेवा का भी नहीं, सेवा साथियों का भी नहीं। टीचर से मुलाकात। यह है प्योरिटी हल्कापन किसी से ईर्ष्या नहीं।

आज सुबह देख रहे थे, भारत की स्वर गायिका स्वर कोकिला लता जी का निधन उनसे कभी इंटरव्यू में कभी पूछा गया था जब दूसरा गाता है तो आपको कभी ये लगता है यह गीत मुझे गाना चाहिए था या कभी आपको ऐसा लगा यह गीत इस तरह से नहीं इस तरह से गाना चाहिए था और इससे यह गीत मैं अच्छा गाती उनसे यह प्रश्न पूछा गया था एक इंटरव्यू में क्या उत्तर था उन्होंने कहा ऐसा मुझे बहुत कम लगता है परंतु परंतु मुझे तो बहुत उल्टा लगता है जब कोई दूसरा गाता है मैं तब मैं यह सोचती हूं कि अगर यह गीत मैंने गाया होता तो सारी खिचड़ी हो गई होती यह भी विनम्रता का प्रतीक है।

ऐसे विश्व परिवर्तक आत्माओं को, ऐसे अपनी वृत्ति से वायुमंडल को परिवर्तन करने वाली आत्माओं को, ऐसे ज्ञानी तू आत्माओं को, ऐसे दुख अशांति के सारे कारणों को समाप्त करने वाली आत्माओं को, ऐसे विक्रम…. ऐसे विक्रम… दूसरा शब्द विकल्प, तीसरा शब्द विक्रम से मुक्त रखने वाली जीवनमुक्त आत्माओं को, जीवन मुक्ति का अनुभव यही करने वाली आत्माओं को, ऐसे बंधन मुक्त आत्माओं को, ऐसे होली हंसों को, ऐसे अधिकारी आत्माओं को, अधिकार है बाबा  ने कहा टीचर्स से…. प्राप्तियां स्वत ही आएंगी, तुम्हें जाने की जरूरत नहीं, ऐसे निस्वार्थ सेवा में, सेवा में स्वार्थ नहीं, सेवा में अलबेला नहीं, ऐसे सेवा को ड्यूटी समझकर नहीं, ऐसे सेवा में को निज धर्म, निज बनाने वालीं आत्माओं को, ऐसे समय से पहले संपन्न संपूर्ण बनने वाली आत्माओं को, ऐसे, साफ, स्वच्छ, पवित्र, बेदाग, निर्विकार, 16 कला संपूर्ण, संपूर्ण निर्णकारी आत्माओं को, ऐसे.. ऐसे… ऐसे… हीरे की मूर्तियों को, ऐसे शरीर को स्वच्छ रखने वाली आत्माओं को, ऐसे संतुष्ट मणियों को, ऐसे सच्चाई और सफाई से रहने वाली आत्माओं को, ऐसे साफ दिल और साफ मन वाली आत्माओं को, ऐसे पुरानी सच्ची दिल तो मुराद हासिल ऐसी मन मनाभव के मंत्र का स्वरूप आत्माओं को, ऐसे सच्चे दिल पर साहिब राजी हो गया,ऐसे 16 कला संपूर्ण टीचर को,  महान आत्मा को, महाराष्ट्र की आत्माओं को, ऐसे एवर हैप्पी एवर हेल्दी आत्माओं को, ऐसे विश्व को चैलेंज करने वाली आत्माओं को, ऐसे घृणा मुक्त आत्माओं को, नस्टो घृणा आत्माओं को, ऐसे ही नष्टोमोहा आत्माओं को मोह से भी से सेवा नहीं होगी ऐसे रहम दिल आत्माओं को, कल्याण की भावना वाली, परिवर्तन की भावना वाली आत्माओं को, ऐसे बाप समान आत्माओं कोमेरा परिवार है मेरा मेरा भाई है ऐसे भावना वाली आत्माओं को, सभी आत्माओं को प्यार और गुड नाईट और नमस्ते। हम रूहानी बच्चों की रूहानी बाप दादा को याद प्यार गुड नाइट और नमस्ते ओम शांति।