मम्मा  मुरली   मधुबन   19-04-65
 


कर्म - अकर्म और विकर्म का ज्ञान

रिकॉर्ड:-

भोलेनाथ से निराला गौरी नाथ से निराला...........

ओम शांति।

अपने परम पूज्य बाप के द्वारा, अभी कर्म की गति, अर्थात कर्म, अकर्म और विक्रम, इसकी यथार्थ नॉलेज मिल रही है यह भी एक समझने की बात है, कि कर्म की नॉलेज सिवाय परमात्मा के और कोई समझा भी नहीं सकता है। क्योंकि मनुष्य जो है, सभी मनुष्य आत्माएं कर्म के चक्कर में है। क्योंकि वो कर्मों की स्टेज्स में  आने वाली हैं। हर आत्मा को अपने कर्म की स्टेज्स में आना ही है। गोल्डन सिल्वर कॉपर एंड आयरन। सतो रजो तमो यह हर एक को पास करना है सब आत्माओं को कोई भी हो। देवताएं भी देखो अभी तमो में है ना सब, सबकी आत्माएं अपने स्टेज्स में पास होने की है इसलिए सभी आत्माएं जो कर्म के गति में सद्गति फिर दुर्गति इस सभी चक्कर में, इसलिए जो खुद गति में सद्गति से दुर्गति में चल रहे हैं सिर्फ दुर्गति से सद्गति में चलते हैं फिर जो उसी चक्कर में चलते हैं वह उस नॉलेज को दे नहीं सकते। हां इनकी यथार्थ नॉलेज की सद्गति और दुर्गति ये मनुष्य के कर्म का जो स्टेज्स हैं वह कैसे चलता है यह सब शिवाय उसी परमपिता परमात्मा के जो कर्म के इसी सभी कर्म अकर्म विकर्म के खाते से अलग है, वह समझाए सकता है कि कर्म का क्या स्टेज्स है। इसीलिए इसकी नॉलेज इसका यथार्थ ज्ञान शिवाय परमात्मा के और कोई दे नहीं सकता है पहली पहली बात तो जो रोज के सुनने वाले हो उनकी बुद्धि में यह बहुत अच्छी तरह से हो जानी चाहिए, कि यह नॉलेज इन बातों की सिवाय परमात्मा के और कोई दे भी नहीं सकता है। तो यह तो समझने की बात है, इसलिए देखो गीतो मैं भी तो आते हैं ना, उनको ही याद करते हैं गीतों में भी, क्या? कि तुमने जो तो जोग जगाया, देखो गीत में भी कहा ना, वह दूसरा ना कोई अर्थात और कोई जगा नहीं सकता है। तो यह सभी चीजें हमारे पास इसकी नॉलेज और उसके साथ जो योग है अथवा उसकी याद, यह सभी जो बातें हैं वह सिवाय उसके ही और कोई करा नहीं सकता है। यह मनुष्य की बात है ही नहीं। मनुष्य को तो करना है ना तो जिनको करना है वही सिखाएं यह कैसे हो सकता है नहीं। अभी हमको डॉक्टर बनना है तो हमको डॉक्टर जो कि मैं नहीं हूं, तब तो बनेगा ना जो कि बना हुआ है वह हमको बनाएगा। बाकी ऐसे थोड़ी डॉक्टर ही डॉक्टर बनेगा, फिर तो बनने का क्वेश्चन नहीं है ना। तो हमको कर्म की गति अथवा नॉलेज सिखाएगा वह, जो आप सिखाने वाला है ना, हम तो सीखने वाले हो गए ना, सब मनुष्य। तो वह मनुष्य जो सीखने वाले हैं, जो कर्म की गति की स्टेज को पहुंचने वाले हैं वह कैसे सिखाएं सकेंगे। वह जानते भी नहीं है और पहुंचे हुए ही नहीं है जो पहुंचे हुए देवताएं भी हों न वह भी नहीं सिखा सकते हैं। हमको देवताएं भी यह ज्ञान नहीं सिखा सकते। तो जब फिर देवता है तब तो फिर ज्ञान को देने की या लेने की जरूरत नहीं है, उसी टाइम तो दुनिया ही स्वर्ग है तो जब मनुष्य देवताएँ है, पूर्ण जिसकी कंप्लीट स्टेज है तब भी उन्हों को हां, ज्ञान देने की एक तो बात ही नहीं है और उनको भी देने का है ही नहीं। उनके पास भी ये की तुम्हारे कर्म कैसे, क्योंकि उसी समय उन्हीं बातों जानकारी रहने की जरूरत भी नहीं है और ना रहती है, ना उन को देना पड़ता है। वो भी देवताओं के पास भी, जिन्होंने ज्ञान सुनकर करके जो देवता बने, अभी यह हम ज्ञान सुनते हैं ना, सुनकर के इससे क्या बनेंगे? देवता। तो जो हम देवता बनते हैं, उन्हों के पास फिर भी यह ज्ञान जो है ना अभी, जिससे हम बन रहे हैं, वह ज्ञान की जरूरत नहीं रहती है तो उन्हों को भी ज्ञान देने की जरूरत नहीं रहती है यानी उन्हों के पास भी यह ज्ञान नहीं रहता है। तो फिर बाकी जो मनुष्य पीछे हैं, उन्हों के पास ज्ञान कहां से आया। जिन्होंने ज्ञान से सिद्धि जो पाई, उन्हों के पास ही ज्ञान नहीं रहा तो बाकियों के पास ज्ञान कहां से आया। तो ज्ञान जो चीज है, जो समझ है जिस चीज की हमको जरूरत है, वह सिवाए परमात्मा के और कोई दे नहीं सकता तो पहले तो बुद्धि में यह चीज आई है कि ये जो कई समझते हैं, फलाना भी यही समझाते हैं फलाना भी यही समझाता है, वह भी यही ज्ञान देता है, फलानो ने भी ऐसा ही ज्ञान दिया था, विवेकानंद ने भी यह समझाया, उसने भी यह समझाया, यह बात जो है वह किसी ने नहीं समझाई, पहले तो यह बात  बुद्धि में आनी है कि यह बात जो है जो यथार्थ हमारे कर्म की अथवा हमारे गति, सद्गति, दुर्गति यह नॉलेज जो है यथार्थ, वो सिवाए परमात्मा के और कोई दे नहीं सकता इसी की ही महिमा आप औरों ने की है, जैसे गुरु नानक देव ने भी उस परमात्मा की महिमा की, की उसके ज्ञान, उसके कर्तव्य निराले। तुम्हरी गत मत तुम ही जानो, तो देखो गाया न, कि तुम्हारी गति करने की जो मत है नॉलेज ज्ञान, मत का मतलब क्या, ज्ञान तो उसका ज्ञान भी तुम ही जानो ऐसा नहीं कहा कि तुम्हारी गति सद्गति करने कीमत जो है मैं जानू ना कहा तुम ही जानो तो तुम्हारी गत तुम्हारी मत, यानी गति सद्गति करने की भी जो ज्ञान है, मत है वह तुम ही जानो। तो तुम ही जानो तो बताएगा भी वही ना। तो यह तो चीज बुद्धि में हो जानी चाहिए कि यह नॉलेज, इस चीजों का शिवाय परमात्मा के और कोई दे नहीं सकता। अभी वह क्या समझाता है उसी बातों को समझना है कि ऐसे नहीं है जैसे कई समझते हैं कि भाई आत्मा निर्लेप है। कई समझते हैं कि नहीं, आत्मा को कोई लेप छेप नहीं लगता। नहीं, आत्मा न्यारी का मतलब यह नहीं है की आत्मा लेप छेप से न्यारी है नहीं, शरीर से अलग है, चीज अलग है परंतु उसका मतलब यह तो नहीं है ना अपने लेप छेप से वह न्यारी है या शरीर भोगता है। भोगता शरीर नहीं है, शरीर के सहयोग से, संबंध से भोगती आत्मा है। महसूस करना.. अगर आत्मा ना होती, शरीर खाली पड़ा है, डेड बॉडी पड़ी है, तो कुछ भी करो तो फील होंगा? तो भोगने वाली चीज चली गई ना, तो ऐसे नहीं कहेंगे कि कोई आत्मा नहीं भोगती। आत्मा है इसमें तभी हम को दुख महसूस होता है, अगर शरीर में आत्मा ना होती फिर उसको कुछ भी करोफिर इसको कुछ नही करो, फिर इसको फील होगा? नहीं, नहीं होगा ना। तो उसका मतलब है भोगने वाली जो है, महसूस करने वाली जो है, वह आत्मा है। और बनाती भी अपने कर्मों का हिसाब जो है ना, वह आत्मा बनाती है, इसीलिए आत्माये अपने कर्मों का हिसाब लेकर करके, दूसरे शरीर में भी जाती है। देखो कोई दुख भोगना है किसी को, छोटेपन में ही बच्चा जन्मता है, कोई लूला बेचारा कोई लंगड़ा, कोई समझो कोई दुख है शरीर का या ऐसे कोई कनेक्शंस में आता है जिसको छोटेपन से ही दुख देखना है भला यह कहां से हुआ? जरूर है कोई कर्म का हिसाब, उनका आया है जन्म से ही जो उसको मिला तो कहां से मिला? आत्मा अपने कर्म का हिसाब ले आई ना, जिसके आधार से उसका जन्म वहां बना, उसका शरीर ऐसा बना या उनके जो भी सरकमस्टेंसस है वह ऐसे बने। आत्मा को ही कहेंगे ना वह हिसाब किताब आत्मा के साथ रहा, तो आत्मा ही अपने कर्म के हिसाब को भोगने के लिए वहां गई या जहां भोगना पड़ा वहां आई। तो आत्मा को ही कहेंगे ना लेप छेप लगा इसलिए यह तो चीज बुद्धि में रखनी है कि हम जो कुछ करते हैं वह हम आत्मा ही भोंगते हैं, लेकिन भोगने की फीलिंग सिवाए शरीर के न होने कारण शरीर में जभी आते हैं तभी फील होता है, भोगना पड़ता है। तो शरीर के संबंध से आत्मा भोगती है बाकी ऐसे नहीं कहेंगे कि आत्मा नहीं भोगती है शरीर भोगता है, भोगती आत्मा है। अगर शरीर भोगता है तो फिर जभी डेड बॉडी पड़ी है, उसको भोगाओ हाँ, कुछ दुःख करो या कोई तकलीफ उसको मिलें वो उसको कुछ फील थोड़ी होगा, तो यह सभी चीज समझने की है कि भोगने वाली आत्मा है जो शरीर के साथ में, फिर जहां शरीर में आती है तो वहाँ वह फील अथवा दुख जो भी है होता है एक बात यह भी बुद्धि में रखने की है की आत्मा निर्लेप नहीं है, इसीलिए हम को कर्म के ऊपर पूरा अटेंशन देना पड़ता है। दूसरे जो समझते हैं कि भाई आत्मा निर्लेप है खाओ पियो मौज करो जो कुछ करना है कुछ नहीं, क्योंकि तुम्हारा मन जाता है ना, वह समझते हैं मन जाता है विषयों के ऊपर तो फिर खाली मन को बैठकर के ऐसे ही करें, इसीलिए कर क्यों नहीं लेवें। मन तो जाता है ना परंतु नहीं हम करते हैं वो तो विकर्म बनेगा न। हमारे हाथ है या जो भी हमारा कर्म हो चुका वह हमारे विक्रम के खाते में आ चुका, इसीलिए हम को उसके ऊपर कंट्रोल रखना है ना। जब तक हम विक्रमों को बंद ना करें तो हमारा पाप जो जमा होता जाता है वह जमा होने से छूटेगा नहीं। तो हमको अपने पाप के जमा किए हुए खाते को बंद करना है तो जब तलक हम विक्रम खाते को बंद ना करें ना,  तब तक हमारा जमा हुआ आप आप जो जमा करते जा रहे हैं वह बंद नहीं होगा। एक तो पहले की किए हुए पापों का भी सर पर बोझ है। इसी के कारण हमारे पास यह दुख और अशांति, जो भी जीवन में रोग आता है, यह कहां का कर्म है? जो किये हैं वो भोंगते हैं एक तो पहले का ही बोझ है, अभी जो हम करते हैं उसका भी हमारा पाप ना बन जाए इसीलिए हम को विकारों के सहयोग से अथवा उसके संबंध में कोई ऐसा कर्म नहीं करना है। ऐसे नहीं है कि हमारा मन जाता है इसीलिए करते रहे, मन जब भी आपे ही ठीक हो जाएगा,.... मन कब तलक ठीक होगा ही नहीं जब तलक हम करम करते रहेंगे, हमारा विकर्म खाता बनता रहता है और हम विकारों को अपने काम में लगाते रहते हैं तो हमारा मन तब तलक सीधा होगा भी नहीं। क्योंकि मन को छूट तो मिल गई ना कर्म करने की। वह चलता रहता है फिर मन हटेंगा कहां से, तो यह जो कइ समझते हैं कि नहीं सुनते सुनते हां, कभी ना कभी मन जो है वह ठीक हो जाएगा, ऐसे तो सुनते सुनते कितने काल से सुनते आए, आज थोड़ी सुनते हैं। यह सत्संग है, यह कथाएं है, यह बातें हैं, यह वेद है, यह शास्त्र हैं, यह ग्रंथ है ये कोई आज के थोड़ी ही है, यह तो कई युगों से सुनते आये हां, 2 युग से द्वापर एक से हम सुनते हैं लेकिन सुनते सुनते हमारा वह विक्रम खाता सिवाय मिटने के और ही बढ़ते चले आए हैं ना कि कॉपर से आयरन एज हो गई है हम और ही नीचे गिरते चले आए हैं लेकिन हमारे वह पाप कर्म का जो कुछ है वह छूटा तो नहीं है ना। तो यह सभी चीजें समझने की है, किसी तरीके से हमारा भाई ये आस्ते आस्ते से सुनते सुनते हो ही जाएगा, सुनते सुनते से नहीं होगा, यह जब तलक जिससे हमारा पाप बनता है उसको जब तलक हमने ब्रेक नहीं दिया है तब तलक हमारी जो कुछ है वह पाप मिटेंगे नहीं ना, इसीलिए तो बाप कहते हैं एक तो तुम पर पहले से ही बोझा है, चढ़ाते आए हो तो वह भी तुम्हारा पाप कटे इसीलिए तो कहता हूं मुझे याद करो तो याद से तुमको पावर मिलेगा उस पापा को नाश करने के लिए। दूसरे तुम पाप ना बनाओ जमा ना करो उसके लिए फिर कहते हैं कि पवित्र रहो ये तुम्हारे विकारी संग का कोई ऐसा विकारों के संग में कर्म ना होवे जिससे तुम्हारा विक्रम बने। विक्रम का मतलब यह है की विकार के संबंध में हम जो भी कार्य करते हैं काम वश क्रोध वश लोभ वश  मोह वश और पहला तो यह देह अभिमान है जिसको हम  विकार कहेंगे, इसके बस में जो भी हम कर्म करते हैं वह हमारा विक्रम बनता है, इसीलिए बाप कहते हैं अभी विकारों के संग का कोई कर्म मत करो जो तुम्हारा विक्रम खाता बने तो एक तो खाते को भी बंद करना है दूसरा जो खाता बंद चूका हुआ है उसको भी मिटाना है इसीलिए तो कहते हैं ना मुझे याद करो तो वह तेरा मिटेगा और पवित्र रहो तो तेरा बनेगा नहीं। दोनों बाजू की बैठकर करके हमको सावधानी देते हैं, तो वह हमको रखने की है इसीलिए हमको अपने कर्मों को पवित्र रखने का जरूर धारणा रखने की है। बाकी ऐसे नहीं है कि मन, मन तब तलक सीधा होगा ही नहीं, मन में तो पहले से ही वह पाप का बोझा चढ़ा हुआ है ना। हमारी मन बुद्धि अभी मैली हुई पड़ी है। अभी वह मेल जब तलक एक तो मेल पहले से ही चढ़ी हुई है और दूसरी मैल को भी अभी हम कर्म करते रहेंगे उसको हम ब्रेक नहीं देंगे तो और मैल चढ़ती जाएगी फिर वह समझेगा भी नहीं कभी, उनमें समझ बैठेंगी ही नहीं, वह जो हमारी सत्यता की पावर है वह उनके ऊपर काम करेंगी नहीं तब तलक जब तलक हमारी वह जो कुछ मैल चढ़ी हुई है वह साफ ना होती जाए तो उसके साथ-साथ साफ होती जाए और जो हम सुनते भी जाते हैं उससे तो हम को साफ बनाते जाए। सुनते हैं साफ करने के लिए न तो वह हमको करना है ना, वह हमको कर्म से करना है। तो हमारा है सारा मदार कर्म के ऊपर। हमारे जीवन का एक क्षण क्षण जो चलता है न वह हमारा कर्म से बनता बिगड़ता सब उससे चलता है ना। हम जो करते हैं यह बोलते हैं इससे हमारा क्या बनता है हम  अच्छा बोलेंगे अच्छा बनेगा। अभी हम कोई बुरा काम करते हैं हम समझते हैं कि नहीं यह खान पानी या ये जो कुछ भी, अगर हम समझेंगे की नहीं इसमें कुछ है नहीं, ऐसे ही मन जाता है तो खा लेवे हाँ, तो ऐसे तो खा लें, नहीं हम समझते हैं कि खाने से हमारी वो मन की मैल एक तो पहले से ही चढ़ी हुई है बाकी भी इसी खानपान से हमारे को वह नहीं आएगा ये भी परहेजें तो सब है ना, जैसे डॉक्टर होता है दवाई भी देंगे परहेज भी देंगे वो ऐसे थोड़ी है कि परहेज उस टाइम न रखेंगे तो कभी रखेंगे हाँ? दवाई जैसी बीमारी भी वैसी, जभी रोग है उसके लिए ही तो है ना, उसी टाइम तो हमको परहेज रखनी है ना बाकी ऐसे थोड़ी कहेंगे की आपे ही हो जाएंगे, तो परहेज नहीं तो क्यों है दवाई भी करेंगे परहेज भी रखेंगे भाई खट्टा ना खाओ मीठा ना खाओ फलाना ना खाओ परहेज रखें, तो बही ये भी तो परहेज है ना उन को शुद्ध करने के लिए हमको यह सभी परहेज रखनी पड़ेगी, उसके लिए हमको विकारों का साथ नहीं लेना पड़ेगा। बाकी ऐसे नहीं है कि वह हम लेते रहे आपे ही आप होगा आपे ही कैसे होगा? हम कोई परहेज ना रखें अपने आप ही होगा ऐसे ठीक हो जाएगा नहीं। डॉक्टर जिस समय रोग है, जिस समय दवाई देता है उसी समय परहेज भी देता है ना यह परहेज रखनी है तब तो हम उसी रोग से मिट कर करके अपना जो निरोगता है उसको पा सकेंगे। तो यह भी चीज है कि हमारे ऊपर जो मैंल चढ़ी है उनको साफ करने के लिए हमको इन बातों को ब्रेक देनी पड़ेगी बाकी हां इतना है की कर्म में नहीं आने का है । मनसा कहां उल्टे तरफ चलती है तो उनका कोई दोष नहीं बनता है, कर्म हम कर लेंगे ना उल्टा, तो उसका दोष बन गया, लेकिन मन में जो उल्टे विचार चले तो पाप बन नहीं गया परंतु हाँ फालतू मन जो है ना वह वेस्ट जाता है न फिर उसी वेस्ट को फिर सेट करने के लिए उसकी याद में लगाना है कि उसके याद से हम को बल मिलेगा तो वह भी काम हो जाएगा न। इसीलिए बाप कहा है कि मन को भी वेस्ट ना करो उसको भी मेरी याद में लगाओ तो उस याद से भी तुमको ताकत मिलेगी बाकी तुम्हारा विक्रम तो नहीं बनेगा ना लेकिन तुम कर्म करते चलेंगे कामवश क्रोध वश लोभ वश वो तो तुम्हारा खाता तो बनता चलेगा ना। तो खाता जो जमा होता जाएगा वो तुमको आगे बढ़ने नहीं देंगा इसीलिए हम को यह कर्म की जो फिलोसोफी है अथवा कर्म की जो नॉलेज है कि कल कर्म अकर्म विकर्म यह कैसा बनता है कर्म तो है ही। मनुष्य जो कुछ करते हैं जनरल वह कर्म तो चलने का ही है लेकिन अभी कर्म को चाहे भी विकर्म बनाएँ चाहे कर्म का खाता हम श्रेष्ठ बनाएं अभी। अभी हमको सतकर्म करना है उससे हमारा श्रेष्ठ बनेगा जिस सत्कर्म से अथवा श्रेष्ठ कर्म से फिर हमारे कर्म अकर्म रहेंगे। अकर्म का मतलब है कोई भी हमारे विकारी खाते का कर्म ही नहीं है इसीलिए हम कोई भी दुख को नहीं पाते हैं। तो वह सतयुग की बात जभी हम देवी देवताएँ हैं तो उनका क्या कहेंगे कर्म अकर्म है अभी जो हम करते हैं वह हम सत्कर्म अथवा श्रेष्ठ कर्म करते हैं और पहले जो करते थे वह हमारे विक्रम है। तो हम पहले कर्म को विक्रम मिलाते थे अभी हम कर्म को सत्कर्म अथवा श्रेष्ठ कर्म मे लाते हैं जिसके आधार से फीर हमारे कर्म जो है ना वह अकरम रहेंगे फिर हमको सत्कर्म करने की भी दरकार नहीं रहेंगे क्योंकि अब हमारा कर्म सुकर्म है यानी कोई कर्म का खाता नहीं है हम जो बनाया है अभी वह भोंगते हैं सदा सुख का इसीलिए फिर हमारा कर्म जो है ना वह अकरम रहता है यानी कोई खाता नहीं। तो यह सभी चीजें समझने की है तो अभी हमको अपना सत्कर्म यानी स्वच्छ कर्म करने का है तो स्वच्छ कैसे करेंगे। वही हमको जो कर्म करते हैं वह स्वच्छता के साथ करना है यानी विकारों के संबंध में नहीं करना है तभी तो हमारे कर्म स्वच्छ होंगे ना तो उस कर्म की जो ताकत है वह हमारी मेल को धोती जाएगी, साफ करती जाएंगे अगर हम कर्मों को ताकत में ना लाएंगे तो हमारे की मैल कैसे उतरेगी। वह उतरेंगी नहीं तो हम आगे बढ़ेंगे नहीं। तो यह सभी चीजें समझने की है कि हमारे पर जो कीचड़ चढ़ी है अथवा जिसको माया कहा जाता है उसकी जो किचड चढ़ी है उनको साफ करना है ना। तो वह मैल उतारने के लिए हमको जरूर है जिससे मेल चढ़ी है वही काम हम फिर करते रहेगे तो मैंल उतरेगी कैसे? उनको उतारने के लिए जरूर है कि उन कर्मों से संभलना है और जो चढ चुकी है उसको भी उतारना है। उसके लिए फिर कहते हैं मुझे याद करो। अभी याद करोगे यह जो कहा जाता है मन को मेरे में टिकाओ अथवा मन मना भव् निरंतर मुझे याद करो इसकी सहज रीती बैठ कर कर के बाप समझाते हैं कि किस तरह से मेरे में मन लगाओ। अभी देखो काम तो करना है ना ऐसे तो नहीं है सब छोड़-छाड़ कर बैठ जाना है मन लगाने के लिए एक कोठरी में हां, जहां कुछ छोड़ छाड़ के सब बैठ जाना है। ऐसी बात नहीं है हमको कर्म तो करना ही है लेकिन कर्म करते भी हम योगी रहे अर्थात मन उसमें टीका रहे, उसकी याद में रहे, उसकी बैठ कर के यह सहज रीती से प्रैक्टिस बताते हैं कि चलो तुम देखो भले देखो देखना तो है ही तो देखते तो क्या भी देखो? तुम्हारी बुद्धि में क्या होना चाहिए, देखो अभी हम हैं ना, हम आपके सब के तरफ देख रहे हैं, लेकिन हमारी बुद्धि में रहना क्या है कि हम क्या देखते हैं, यह सब आत्मा है अभी हमारी दृष्टि जो है हमारी नजर में जो है कि यह सब आत्माएं हैं तो हम देखते हैं तो किस को देखते हैं, आपके तरफ देख रहे हैं तो हम आपको देखते हैं कि यह आपकी बॉडी है यह तिल्ली है हां भाई पता है हमको चलो हम देखते हैं परंतु हम देखते हुए भी हम आपको क्या देखते हैं यानी आत्मा। यह तिल्ली क्या है यह कौन सी चीज है? आत्मा है ना, यह आत्मा ने यह शरीर धारण किया है फिर शरीर और आत्मा के ऊपर यह नाम रखा हुआ है परंतु हमने देखा किसको? आत्मा को। तो हमने आँख से क्या काम लिया? हम आपसे बात करते भी हमारा ध्यान है आत्मा से, यह आत्मा सुन रही है, ऐसा ऐसा कर रही हैं, कानॉ से सुनती है, इस ऑर्गन से कौन सुन रही है आत्मा सुन रही है, तो हमारे ध्यान में आत्मा है। तो आत्मा ध्यान होने से हमारे को ख्याल में आएगा तो यह भी तो उसी बाप का बच्चा है है ना, यह भी उसका बच्चा है मैं भी उसका बच्चा हूं हम एक ही बाप के बच्चे हैं परंतु हां इन बेचारे को आत्मा को अभी वह भूल गया है कि हम कोई उस बाप के बच्चे हैं। अभी इसको यह रोशनी देने की है, पहचान देने की है कि तू उस बाप का बच्चा है अभी तू उस बाप को याद रख। तो हमारी बुद्धि में वह चीज आएंगे ना, आत्मा निश्चय होने से हमारी बुद्धि परमपिता परमात्मा के संबंध में आएंगे इसीलिए देखने समय भी सुनने समय भी बात करने के समय भी अभी हम बोल रहे हैं तो हम अपने लिए भी क्या समझेंगे कि हम आत्मा बोलती हैं, इस मुख के द्वारा। इन मुख से हम समझाते हैं लेकिन बोलती कौन हैं मैं आत्मा और यह सुनती कौन है यह आत्मा सुनती है। तो हमारा बोलना सुनना, सुनाना, हाथों से भी करना, अभी हम हाथ से लिखते हैं, ये हाँथ से रसोई पकाते हैं या कोई भी काम करते हैं तो हमारी बुद्धि में क्या होगा कि इस ऑर्गन से हम आत्मा यह लिखाते हैं, ऑफिस में बैठे हैं, दफ्तर में बैठे हैं कोई काम करते हैं तो हमारी बुद्धि में यह है कि इस ऑर्गन से हम आत्मा यह लिखा रहे हैं। तो हमारी बुद्धि में आत्मा निश्चय है और फिर हम बोलते हैं या या कुछ भी करते हैं तो हमारी बुद्धि में है कि हम आत्मा बोलती हैं। तो आगे जो अपने को बॉडी समझते थे, मैं फलाना हूं फलाना हूं या वह दिल का अभिमान आता था वह बदलकर करके अभी आत्मा का अभिमान आएगा यानि शुद्ध अभिमान उसको कहेंगे इसको कहा जाता है देही अभिमानी। देहि माना आत्मा और देह माना शरीर। तो अभी हम होते हैं देही अभिमानी यानी आत्मा अभीमानी, आत्मा अभिमानी माना शुद्ध अभिमान, हमको शुद्ध है कि हमें उस बाप का बच्चा हूं हम सब आत्माएं उसकी संतान है परंतु हां इन बिचारी आत्माओं को अभी वह पता नहीं है हमारा फर्ज है उनको बता देना। तो हमको यह आएंगे कि वह घृणा नहीं आएंगे की नहीं यह आत्मा यहां ऐसी है ऐसी है नहीं हम समझेंगे है तो उसका बच्चा ना परंतु बेचारे को हाँ पता नहीं है उनको वह खबर देनी है इसीलिए हमारी वह दृष्टि रहने से हमको वह प्रेम रहेगा उस दृष्टि रहने से हमारा कोई ऐसा उल्टा काम नहीं होगा क्योंकि हम एक ही बाप के बच्चे हैं और वह बाप हमारा एवर प्योर है, हम आत्माएं भी फर्स्ट प्योर हैं पीछे इम्प्योर हुआ है तो हम हमारी ओरिजिनल जो स्टेज है ना वह पवित्र है इसीलिए हम को अपनी ओरिजिनल स्टेज पकड़ने की है कि हम जो असल में चीज हैं वही हमको हो करके रहना है तो हमारी बुद्धि उसी बातों में चली जाएगी आत्मा का निश्चय से, इसीलिए हमारा जो बर्ताव चलेगा ना वह उसी तरीके से चलेगा उसमें किसी को हम दुख देवें या किसी हमको अभिमान आवे यह ऐसा वो ऐसा नहीं हम हैं तो एक ही बाप के बच्चे हैं न तो यह भी तो आत्मा ही है परंतु इन बेचारे खाली पता नहीं तो उनको उनको पता देना है ना। अच्छा इसने मुझे दो गाली भी दे दी किसी ने दे दी तो हमको क्या आएगा उसी समय ये किसने दी गाली? है तो यह भी आत्मा परंतु इस बिचारी आत्मा के संस्कार जो है ना वह अभी थोड़े मेले हैं तो हमारा काम है उसकी मेल को उतारकर करके उनको भी इस बात की रोशनी देना कि तुम्हारे कोई पाप ना बने ऐसा तुम काम मत करो। तो हमारी बुद्धि में वो चीज आएंगी कि इसको उसी चीज की रोशनी देवे बाकी ऐसे नहीं की इसने दो गाली दी तो उसको हम चार गाली देंवे। या दों के हम चार बोले 4 के हम आठ बोले, नहीं। वह बोलेंगे तो हमारा खाता बन जाएगा, हमारा विकर्म बन जाएगा इससे क्या होगा? हमारे पर और ही मैल चढ़ती जाएगी और हम और ही पाप के भागी होते जाएंगे तो हमारा जो भी एक्शंस है इसी धारणा से जिसको सौल कॉन्शियस कहा जाता है अभी इसको कहा जाता है सौल कॉन्शियस की हम आत्मा है दूसरे को भी देखते हैं आत्मा है कोई दूसरे से रोंग एक्शंस का बर्ताव भी होता है तो भी हम समझते हैं हैं वह भी आत्मा परंतु इनको पता नहीं है कि मैं कोई आत्मा हूं पता होता तो यह रॉन्ग एक्शंस में एक्ट नहीं करता, ऐसा नहीं बोलता, ऐसा कुछ नहीं करता तो हमारा काम क्या है उसको पता देना। चलो पता नहीं दे सकता वह नहीं मानता है या कोई नहीं भी सुनता है तो चलो मैं तो अपनी खबर में रहू ना मैं तो अपने पते में रहूं मैं तो अपने को सौल कॉन्शियस मे रखु कि मैं तो आत्मा हूं ना यह भी है, परंतु विचारे के संस्कार इसके ऊपर वो मैल चढ़ गई हुई है ना इसीलिए बेचारा उसके बस में वह कुछ कर देता है या कह देता है लेकिन उसके साथ हम क्यों करें हम अगर कहेंगे तो हमारा खाता बन जाएगा ना। तो इसी इसी तरीके से अपने को बुद्धि में रखने से इसको कहा जाता है हम देखो टीके पड़े हैं ना इसको कहेंगे मन को उसमें ठिकाना यानि किस में टीकाना आई एम आत्मा, आई एम सोल, सन ऑफ सुप्रीम सौल। तो जितना हम बुद्धि को इसी में स्थिर रखेंगे तो हमारा एक्शन हमारा बर्ताव हम जो आपस में भी चलेगा वह चलेगा जिसमें हमारा कोई ऐसा विक्रम अथवा कोई पाप का कर्म ना हो इसीलिए बाप का फरमान है कि बच्चे अशरीरी रहो, यानी अपने को शरीर मत समझो। अशरीरी का मतलब है आत्मा, अशरीरी है ना आत्मा का असर ही तो नहीं है ना, वह अशरीरी है वो तो आत्मा जो चीज हो अपने को वह समझो। तो वह समझ कर करके सारा दिन जो बर्ताव चलता है उस में रहकर करके अगर बर्ताव करेंगे तो तुम्हारा बर्ताव भी जो है ना वह प्योर होंगा इमप्योर नहीं नहीं होगा, इसी से तुम्हारे कर्म अभी श्रेष्ठ बनते रहेंगे और तुमको बाप की भी याद रहेंगे गॉड कॉन्शियसली रहेंगे। सौल कॉन्शियस भी यानी मैं आत्मा और फिर परमपिता परमात्मा की संतान हूं तो गॉड कॉन्शियस भी रहेंगे। तो आत्मा सौल कॉन्शियस होने से गॉड कॉन्शियस रहेंगी और यह रहने से फिर तुम्हारे से कोई ऐसा उल्टा काम नहीं होगा तो सेफ्टी हो गई ना। तो यह है कि जैसे पहले अपने को समझती थी मैं फलानी हूं हर वक्त समझ में आता है ना, बच्चों से बात करेंगी या जो भी संबंध में जो भी काम काज तो मैं फलानी हूं फलाने की बच्ची हूं, फलाने की स्त्री हूं, फलाने की मां हूं तो बुद्धि में तो सभी चीजें आती है ना। अभी है कि मैं आत्मा हूं, अभी अपने बुद्धि को उसमें ठिकाना है तो कहते हैं ना मन को टिकाऊ तो मन को कैसे ठिकाना है यानी मन को अभी इसी में रखना है कि मैं सोल हूं हर वक्त अपने को सोल समझ कर कर के बर्ताव में चलना है ऐसे नहीं है सोल समझने से हमारा बर्ताव नहीं चलेगा। जैसे हम अपने को बॉडी कौनसेस में चलते थे न, अभी बॉडी ना समझ कर करके अपने को आत्मा समझना है यानि वह चीज समझने की है आत्मा। बस वह समझ कर कर के बर्ताव में चलो तो वह समझने से हमारी बुद्धि जो है ना वह ऊपर रहेंगे, ऊपर का मतलब है ऊँची स्टेज पर, ये आत्मा तो फर्स्ट प्योर है ना उसे आत्मा की स्टेज्स ख्याल में आएंगे तो आत्मा फर्स्ट प्योर थी, अभी ये इम प्योर हुई है, अभी फिर हमको जो है वो प्योर स्टेज जो है वह पकड़ने की है हम प्योरतो एवर प्योर गॉड की हम संतान हैं, तो बुद्धि मैं यह सब बातें रहने से फिर हमा जो एक्शंस है ना वह सब ठीक रहेंगे, कोई हमसे कोई उल्टा काम नहीं होगा तो यह है चलते-फिरते खाते भी इसके लिए हमको चुप करके बैठने की तो कोई बात ही नहीं है ना। इसके लिए कोई हमको एक कोठरी में बैठ कर के कोई ध्यान करना या कोई मूर्ति सामने रख कर के उनका बैठकर कंसंट्रेट करना है, नहीं। हमको अपने को उसी आत्मा निश्चय में अपने को रखना है ध्यान अपना अटेंशन जो है ना तो उसमें रखने का है कि अपने को आत्मा समझ कर करके फिर बर्ताव में चलना है तो बर्ताव चलते हम सौल कॉन्शियस रह सकते हैं ऐसे नहीं है सौल कॉन्शियस रहने के लिए हमारा बर्ताव बंद हो जाएगा नहीं, या हम कुछ ना करें बैठ जाएं नहीं करते भी हम आत्मा है यह अपने को निश्चय रखने का है, तो यह है चीज जिसका प्रैक्टिस हर वक्त घर में कामकाज करते जहां भी हो उधर रखने का है, अभी हम भी हैं हम भीहैं हम भी किसी अवस्था का अपना अभ्यास रख रहे हैं। यही तो अभ्यास है ना कि हम आत्मा है, बोलने के समय हमारा भी ध्यान, हम अपना ध्यान किस में रखेंगे कि हम आत्मा है तो उसी बाप की संतान लेकिन बाप ने जो नॉलेज सुनाया है वह अभी सुन कर कर के हम इन्हों को सुनाते हैं तो हमारे बुद्धि में यह सब बात है परंतु घड़ी घड़ी थोड़ी इनका बैठकर सुनाएंगे लेकिन हमारी बुद्धि में जैसे वह हमारी धारणा अथवा स्टेज उसी में रहने की या उसको हमको रखना है तो यह तो अंदर की है ना तो अंदर को हम को किस स्टेज में रखना है हमारे बुद्धि की स्थिति कहां रखने की है तो जैसे पहले आगे मैं फलानी हूं फलाने की लड़की हूं अथवा फलाने की हां मैं औरत हूं वह देख कर अभिमान आते थे कोई बोलता था तो हां हां मेरे को क्यों बोला उसने हां तो वह देह का अभिमान। अभी है कि हम उसके बच्चे हैं, चलो यह भी तो है उसका बच्चा है माफ कर दो बेचारे को पता नहीं है चलो दो गाली दे दिया तो हमारा क्या बिगड़ा, बिगड़ा तो उसका बिगड़ा जो करेगा सो पाएंगे इसीलिए हम उसका क्यों अपने पर लगाएं नहीं तो देह अभीमान आ जाएगा ना। तो इसने कहा तो फिर हम को भी आएंगे इसने ऐसा करा तो हम क्यों ऐसा,  फिर इसने कहा तो फिर हम क्यों ऐसा, फिर ऐसा हम और हम और तुम हम और तुम तो उसी में तो बात ही और हो जाती हैं और इसमें क्या आएगा कि नहीं है बिचारी यह भी आत्मा और ही तरस पड़ेगा परन्तु इन बिचारी को पता नहीं है इसीलिए इसनें अपना बाप बना लिया हमारा काम है इसको भी इससे छुड़ाना अगर छुड़ा सकते हैं हमारे में समर्थ ही है तो। परंतु समझो नहीं सुना सकते तो मैं ही फस जाऊं इसलिए मैं क्यों फसूं मैं तो अपने को सेफ रखूं न चलो उनको नहीं बचा सकता हूँ तो अपने को तो बचाऊँ ना वास्तव में बचाना चाहिए परंतु समझो हमारे में इतनी हिम्मत नहीं है वह हमारी ना मानेगा या जो कुछ भी है तो चलो उनको हमको कुछ नहीं है तो हम अपना तो कुछ करें ना, तो हम क्यों अपना बिगाड़े हम क्यों उस में आकर करके उसके प्रति घृणा या उसके प्रति कुछ रखें जिससे फिर हमारा ही विक्रम बने या उस में आकर के हम कुछ बोले या कुछ करें तो वह हमारा विक्रम हो जाएगा ना तो यह सभी चीजें हैं जो अपने पास रखने की है अभी इसको कहा जाता है सौल कॉन्शियस बाकी सौल कॉन्शियस कोई और चीज तो नहीं है ना उसके लिए कोई हमको बस कोई बैठ कर के कोई मूर्ति का ध्यान लगाने का है, बैठना है, वह कोई ध्यान कोई आंखों में कोई चीज का रूप रखकर करके थोड़ी बैठ कर के ध्यान करने का नहीं। हर वक्त अपना अटेंशन यह हम उनके बच्चे हैं और हम आत्माएं हैं और यह आत्माएं हम अभी लास्ट स्टेज पर आई अभी हम को ऊंचा जाना है ना तो यह भी हमारी बुद्धि में है हमको अपनी वो स्टेज पकड़ने की है जो फर्स्ट हम थे फर्स्ट हम प्योर थे पीछे इन्फ्यूर हुए हैं तो फिर ओरिजिन हमको फिर ओरिजनल अपनी जो फर्स्ट स्टेज है उसको पकड़ना है तो पकड़ने का है तो हमको प्योर रहना है ना हमको कोई भी इंप्योरिटी का काम नहीं करने का है। हमको कोई भी अपना ऐसा विक्रम नहीं बनाने का है। तो यह सभी बातें बुद्धि में आएंगी। तो उससे हमारे एक्संस जो है वह चेंज में चलेंगे पवित्र चलेंगे और उससे हमारी पवित्रता के आधार हमारी जीवन आगे बढ़ती चलेंगे तो इसको कहा जाएगा सोल कांसेस चलते फिरते खाते। तो यह हम चलते भी रह सकते हैं ऐसे नहीं कि हम चलने से बैठ जाएं तभी हो सकेगा नहीं चलते फिरते बोलते भी सौल कॉन्शियस कि अभी हम बोलते हैं  यह सोल कांसेस यानी हम आत्मा बोल रही हैं यह हमारी बुद्धि में रहने का है। तो यह हर वक्त बुद्धि में इसी अवस्था को रख कर कर के इनको कहेंगे आत्मा निश्चय बुद्धि या देही अभिमानी या सोल कोंइसिअस गॉड कॉन्शियस तो यह दो चीजें बुद्धि में होने की है की आत्मा तब तो फिर परम आत्मा भी याद रहेगा ना, ऐसे नहीं की मैं फलाना हूं देहधारी तो फिर नहीं उसका संतान हूँ न तो फिर उसका संतान मैं कौन? उसका संतान मैं कोई बॉडी कांसेस वाला थोड़ी हूँ उसका संतान मैं सोल, तो वो बुद्धि में सोल आएंगी न। तो बाप और उसकी संतान में आत्मा ये अपनी बुध्ही में हर समय समझ कर करके हमें हर वर्ताव में चलना है तो हर बर्ताव में ऐसी अवस्था में चलने से फिर हमारा एक्शंस जो होंगा न वह रॉयल होगा, रॉयल का मतलब है  प्योर और प्योरिटी तो रॉयल्टी है ना। हम देवताओं को इतना मानते हैं यह क्या है? उसमें क्या रॉयल्टी है? यह प्योरिटी की ही तो रॉयल्टी है ना। तो यह प्योरिटी के एक्शंस हमारे रहेंगे। इसी से फिर हमारे कोई कर्म ऐसा विक्रम नहीं बनेगा तो खाता भी सेफ रहेगा हमारी जो ख़ुशी है हम बढ़ते जाएंगे हमारे एक्शंस राइट होने से हमारे में ताकत आती जाएंगे एक्संस में वह भी हमको परहेज भी साथ साथ रखने से वह बल भी मिलता जाएगा ना अगर परहेज ना रखेंगे तो बल कहां से मिलेगा फिर हमारा रोग निवारण कैसे होगा तो रोग निवारण के लिए हमको यह परहेज और यह दवाई हां यह सब लेनी पड़े ना तो यह ज्ञान भी लेना है जो हमारे को दवाई का काम करती है उसके साथ फिर जो धारणाएं हैं वह परहेज के रूप में धारण भी करनी पड़ेगी न तब तो हमारी जो कुछ है हमारा रोग बाकी हम ऐसे ही चलते रहें खाली सुनते रहने से क्या होगा तो सुनते सुनते तो बहुत काल हो गया हां आपे ही होगा आपे ही नहीं होगा ना। हमको कर्म बदल करना है बदली करना है कर्म ।कर्मों को जब तलक चेंज नहीं किया है तब तलक हमारे एक्शंस वही चलेंगे तो हमारा विक्रम का खाता पाप तो बनता चलेगा ना। फिर पाप बनता चलेगा तो फिर आपका बोझा भी चढ़ता चलेगा तो हमारे एक्शंस चेंज होने चाहिए फ़ौरन इसीलिए देखो बाप यहाँ प्रैक्टिस कराते हैं ना की जल्दी से जितना... इसलिए बतलाते हैं कि नहीं अभी दुनिया ही ऐसी आने की है जिसमें अभी ना करेंगे तो कभी करेंगे, अभी सांस निकल जाए शरीर छूट जाए तो फिर क्या ले जाएंगे, तो करना है ना अभी इसलिए हमको फौरन अपने एक्शन को बदली करनी है। इसीलिए ऐसी पवित्रता के ऊपर यहाँ पांचों विकारों के ऊपर यहां फोर्स दिया जाता है और कोई सत्संग में इसी तरीके से भले कहें निर्विकार ही रहो परंतु हाँ आशते अश्ते, थोड़ा-थोड़ा कर कर कर के वह थोड़ा-थोड़ा करके आशते आस्ते कर कर करके इसी तरीके से देखो आज कई काल हो गया है फिर क्या होता है तो बाप तो आकर करके इन बातों से बिल्कुल छुड़ाने के लिए ही आते हैं ना क्योंकि वो ले जाते हैं प्रैक्टिकल वो सतयुगी सतोप्रधान दुनिया में  ले जाते हैं तो उनको तो फॉरेन ही यहां पाँचों विकारों से छुड़ाकर करके हमारे कर्मों को श्रेष्ठ बनाना जिसमें फिर श्रेष्ठ पद पाएंगे यह सभी चीजों को भी समझना है अच्छी तरीके से बाकी सौल कॉन्शियस तो यह ऐसा नहीं है कोई आंखें बंद कर कर कर के या कोई किसका ध्यान करना है या कुछ नहीं, चलते फिरते अपने को आत्मा समझना है अभी यह नहीं समझना है नहीं। मैं आत्मा ने यह शरीर लिया है मैं आत्मा तो यह अपनी बुद्धि को बदली करना है आत्मा में लगाना है वैसे हम बॉडी अपने को समझते थे मैं फलानी हूं वह देह का अभिमान, अभी मैं आत्मा। दादा अभी बाप दादा तो समझते जाते हो ना तो बाप दादा और मां के मीठे मीठे बहुत अच्छे सपूत बच्चों के याद प्यार और गुड मॉर्निंग अच्छा