मम्मा मुरली मधुबन


कर्मों की गति

रिकॉर्ड:-
छोड़ भी दे आकाश सिंहासन इस धरती पर आजा रे......

यह गीतों में किस को याद करते हैं, किस को पुकारते हैं कि आकर के ज्योत जगा । परमात्मा को ही तो पुकारते हैं ना । तो इससे सिद्ध होता है कि हमारा अंधकार मिटाने वाला एक ही है इसीलिए उनको याद करते हैं कि अंधकार मिटा आकर के और सर्व शास्त्र शिरोमणि गीता में भी भगवान के वर्शन हैं यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत की जब जब अधर्म होता है, तब तब मैं आकर के अधर्म नाश और धर्म की स्थापना और अंधकार नाश और और रोशनी आ करके देता हूँ, जिससे मनुष्य सदा सुखी बने । तो यह भगवान ने भी दावा रखा है कि मैं आकर के करता हूँ और मनुष्य भी तो उसको ही पुकारते हैं कि तू आ अभी तेरा काम है, अभी मनुष्य सब कुछ कर के थक गए हैं । मनुष्य के प्रयत्न करते-करते उसकी जो रिजल्ट है वह तो आज हमारी दुनिया में हम देख रहे हैं । मनुष्यों के प्रयत्न ने जो संसार बनाया है, कोशिश करते आए हैं, कोशिश की जो रिजल्ट है, वह तो अपने अनुभव में है, सामने है, कोई छुपी हुई थोड़ी है, सामने ही है कि मनुष्य ने संसार को बदलने की कोशिश तो रखी है । देखो संसार में कितने प्रयत्न है , चाहे संसारी पदार्थों के भी अनेक प्रयत्न है, आज देखो साइंस, यह संसारी पदार्थों की इन्वेंशन है ना, तो देखो उनमें भी दुनिया कितनी ऊंची जा रही है और कितना सूर्य, चाँद तक पहुचने की कोशिश करते हैं कि मनुष्य की लाइफ को कहाँ कुछ सुख की कुछ मिल जाए, पीछे उधर जाकर के प्लाट ले कर के बैठे, चाहे इधर उनका कुछ मिले । बिचारे कोशिश करते हैं कि क्या है, परंतु इन सभी सांसारिक पदार्थों में इतनी आगे बुद्धि जाते भी, और ईश्वरीय मार्ग के भी अनेक मार्ग हैं और कई सब कोशिशें वेद, शास्त्र, ग्रंथ, पुराण, गुरु, महात्मा, पंडित, आचार्य आदि आदि महामंडलेश्वर, आदि आदि देखो कितने-कितने सब हैं, यह सब उपस्थित हैं, लेकिन इतने सब होते भी और संसार की इतनी स्पीड, पदार्थों की बातें आगे जाते भी, लेकिन हमारी लाइफ तो देखो, लाइफ को अगर ऐसे कहेंग कि हम नीचे ही गिरते जा रहे हैं, तो यह मालूम करता है कि हमारे लाइफ की जो चीज है संपूर्ण सुख शांति की वह कोई और देने वाला है । वह कौन देने वाला है इसीलिए देखो उसको पुकारते हैं कि अभी तू आ और तू उस चीज की रोशनी दे कि हमारे लाइफ को, हमारे सुख के जो साधन हैं, वह हमें कैसे प्राप्त हो । आज क्या नहीं मनुष्य कर बैठे हैं, कितनी इंवेंशंस है देखो सब कुछ करते हैं, लेकिन आज फिर भी देखो, अपना ही भारत आज अन्न के लिए, सब चीजों के लिए मोहताज है ना । यहाँ दिनों दिन देखो जितना बिचारे कोशिश करते हैं, इधर संख्या बढ़ती जाती है, इधर उसके लिए खाना, कपड़ा, लत्ता सब पूरा करना, सब कितनी मुसीबतें खड़ी हो गई है आज दुनिया के सामने और यह सब बातें होती चली आई है और चलती जा रही हैं और भी आगे । तो देखो मनुष्य की कोशिश से हमारी लाइफ की अगर देखें तो लाइफ और ही अशांत और दुःख के नीचे चली जा रही है तो और चीजें भले ऊंची होती जा रही है लेकिन लाइफ तो नीचे चली जा रही है ना । है सब लाइफ के लिए लेकिन लाइफ को वह अभी लगता नहीं है तो यह सभी समझना है की आखिर हमारे लाइफ के लिए क्या चीज है । इसीलिए वह लाइफ की चीज कहते हैं ना लाइफ दाता, जीवनदाता परमात्मा है, तो जो जीवन दाता है वही तो हमको अपने जीवन का पूरा-पूरा भेद भी समझाएगा और जीवन के साधन तुमको कैसे प्राप्त होवें उसका क्या तरकीब है, वह समझा सकता है इसलिए बाप कहते हैं इन चीज की देने वाला भी मैं हूँ, समझाने वाला भी मैं हूँ, क्योंकि समझ से देता हूँ, ऐसे नहीं की ऐसे-ऐसे दे दूँगा, नहीं ऐसा नहीं है कि मैं सब कुछ ऐसे ही माल- मकान सब बनाकर ऐसे ही दूंगा, नहीं! समझ दूंगा, उसी समझ से चलना है तुमको, फिर चल करके अपने कर्मों से बना करके, फिर कर्मों के बल से तुम सब अपना यह चीजें प्राप्त करेंगे । कर्म के आधार पर है ना । लाइफ का आधार कर्मों के ऊपर हैं । तो तुम्हारी बनेंगी यह सब चीजें कर्म के आधार पर । आज कर्म भ्रष्ट है दुनिया तो दुनिया के रिजल्ट देखो, कारण यही है कि दुनिया आज कर्म भ्रष्ट है । कर्म की श्रेष्ठता का पता नहीं है दुनिया को कि कर्म हमारे श्रेष्ठ कैसे हो तो आज हमारा आचरण आज हमारा कर्म आज हमारी जीवन के भ्रष्ट होने के कारण उनका नतीजा हमारे सामने है इसीलिए हमारे में अशांत और दुःख बढ़ता जा रहा है क्योंकि हमारे कर्म श्रेष्ठ नहीं है । भले यह कर्म कर्म करते हैं ऊंचे-ऊंचे चांद में सूर्य में पहुंचना, परंतु इसको थोड़ी श्रेष्ठ कर्म कहेंगे यह तो खोज है, यह सब चीजें तो खूब आगे-आगे चलती जाती है, इसीलिए मनुष्य समझते हैं कि आज मनुष्य की बुद्धि बहुत बड़ी है । तो यह सभी चीजें हैं जिसको समझना है कि हमारी वो ऊँचाई जो है ना, जीवन की वह तो रही नहीं है । तो इसमें तो बहुत कुछ पा रहे हैं, लेकिन लाइफ में आज हमारे कर्मों की गिरावट है तो हमारे जीवन की अशांति और दुःख का कारण है हमारे कर्म । तो कर्म कि हमें नॉलेज चाहिए, तो इसकी नॉलेज और इसकी समझ, इसकी रोशनी इसीलिए परमात्मा को याद करते हैं की इस की रोशनी, यह अंधकार, की हमारे कर्मों में क्या अंधकार है, क्या हम गलत कर्म करते हैं, जिसका नतीजा हम चाहते तो कुछ और है, लेकिन मिलता कुछ और रहा है, यानि दुःख और अशांति, इसीलिए हमारे कर्मों में कौन सी गलती है, जिस गलती से हम दुःख भोग रहे हैं, वो हमको पता होना चाहिए । इसका पता हमारे को आज वेद, शास्त्र, ग्रंथ, पुराण है सब रौशनी के लिए बहुत माल रखे हुए हैं, परंतु उससे अभी तक भी इतने यज्ञ, वेद, शास्त्र आज के थोड़े ही हैं यह तो परंपरा से चले आए हैं, बहुत काल से ये चीजें हैं, कोई आज नहीं बनी है, यह तो बहुत काल से हैं चीजें हैं, तो यह बहुत काल की चीजें हैं, परंतु हमारी बहुत काल से जीवन और ही गिरती चली जा रही है, तो इनका पूरा पता होना चाहिए ना, तो आखिर भी हमारी जीत बनाने की कौन सी चीज है इसीलिए उनको याद करते हैं की तू ही बनाने वाला वह चीज, तुम्हारे पास ही है उसकी लाइट, उसकी रोशनी, उसकी नॉलेज तुम्हारे पास है, इसीलिए उसको कहते हैं नॉलेजफुल । क्योंकि काहे का नॉलेज फुल है वह, हमारे कर्म गति का कैसे बनाओ, उसके लिए तुम को मेरा नॉलेज चाहिए और मेरा बल चाहिए । मेरे बल के बिना तुम्हारे कर्म जो है ना वह श्रेष्ठ नहीं हो सकते हैं, इसीलिए अभी तुम कैसे मेरे से बल लो, वह बैठ कर के खुद सिखा रहा है । यह कॉलेज उसकी है, जिसमें आए हो, परंतु बेचारे बहुत नए है ना, वह जानते नहीं है कि हम कहाँ आए हैं, वह तो समझते हैं कि जैसे की कई और आश्रम हैं, कई संस्थाएं हैं, वह संस्थाएं आश्रम तो बहुत काल से चली आई है । यह संस्था अभी परमात्मा ने खोली है , इसको संस्था नाम ना कहे तो अच्छा है, क्योंकि संस्था रहने से समझते हैं कि जैसे दूसरी भी संस्था है, यह भी ऐसे ही कोई दूसरी ब्रह्माकुमारी नाम की संस्था खुली है, परंतु नहीं! ये उन्हीं परमपिता परमात्मा ने, यह कॉलेज खोला है, इनके बहुत स्थान पर शिक्षा के केंद्र हैं, जहाँ बैठ कर के यह नॉलेज परमात्मा की दी जा रही है । वह बैठ करके अभी रोशनी दे रहा है, वो कहा है न यदा-यदा जब-जब अधर्म होता है, तब मैं आता हूँ, तो अभी वो आए हैं तो आ कर के यह अभी रोशनी हम सब बच्चों को हम उनकी संतान हैं ना, तो संतान को दे रहे हैं और दुखी हो गए हैं तो बाप को तरस पड़ेगा ना तो भी कहते हैं कि जब दुखी ऐसे होते हैं तब मैं आता हूँ तो अभी आए हैं और आकर के यह उसने कॉलेज खोला है । कॉलेज कहो, विद्यालय कहो, यूनिवर्सिटी कहो, स्कूल कहो, जो कुछ कहो, हॉस्पिटल कहो इसको जो भी कहो यह हॉस्पिटल है ना, निरोगी बनाने की सदा के लिए एवर हेल्दी । वह हॉस्पिटल नहीं रोगी का इलाज कर देंगे लेकिन रोग तो रह ही जाते हैं ना, एक रोग जाएगा, दूसरा आएगा, दूसरा जाएगा तीसरा आएगा, ऐसे थोड़े है की ऐसा ईलाज हो, जिससे हमारी दुनिया से रोग ही निकल जाए । नहीं! जितनी इन्वेंशन, जितनी दवाइयां बढती जा रही हैं, उतने रोग भी नए-नए निकलते जा रहे हैं, बिचारे डॉक्टर्स का सारा दिन ढूँढ़ते निकल जाता है यह रोग का क्या इलाज है, वह रोग का क्या इलाज है । एक रोग का इलाज निकालते हैं तो दूसरा कोई रोग खड़ा हो जाता है, दूसरा करते तो फिर तीसरा कोई खड़ा हो जाता है । अभी देखो उनमें ही बिचारों का माथा थक जाता हैं, तो अभी वह तो कहते हैं रोगों को निकाले लेकिन रोगों की जड़ निकल जाए न, जो हमारी दुनिया में रोग ही ना हो । ना रोग हों, न डॉक्टर्स हों, न हॉस्पिटल हों, न चोरी हों, न चकारी हों, तो फिर हमारे लिए न कोर्ट होगा, न जज होगा, न वकील होगा । काहे के लिए होनी चाहिए, चोरी ही ना होनी चाहिए, तो यह चीजें कोई जरूरी तो नहीं है ना, इसीलिए बाप कहते हैं कि मैं तुम्हारे लिए ऐसी दुनिया रचता हूँ, जिसमें तुमको काल भी ना खा सके । अभी देखो काल भी आ जाता है न, अकाले मृत्यु होती है, तुम्हारे पास काल भी ना आवे, वह भी तुम्हारे दुनिया में नहीं आ सकता है क्योंकि तुम्हारा शरीर तुम्हारे कंट्रोल में होगा यानि जब टाइम हो बाल, युवा, वृद्ध तुम्हारे पास बल हो , लेकिन आज कहाँ है वह बल, मरो तो मरो, रोगी बनो तो रोगी बनो, मनुष्य कुछ कर सकता है? बेबस है ना । तो बाप कहते हैं कि देखो, लाइफ तुम्हारी, परंतु तुम्हारी लाइफ तुम्हारे कंट्रोल में नहीं है । लाइफ तुम्हारी लेकिन लाइफ में तुम बेबस हो । जो कुछ होए, तुम कुछ नहीं कर सकते हो, भले कोई धनवान होगा, बीमार पड़ेगा करके थोड़ा इलाज करेगा न, फिर भी कुछ ऐसा कर्म का है, उससे कुछ बनता नहीं है तो क्या करेगा कहेगा हाय! तकदीर, हाय! किस्मत, हाय! कर्म, बस, ऐसा कह करके बैठेगा और क्या कहेगा । परंतु नहीं, हमारी लाइफ के कर्म की जो पावर थी, जिसको स्प्रिचुअल पावर कहा जाता था और जिसके नाम से यह भारत में प्राचीन नाम है ना, प्राचीन योग का और प्राचीन ज्ञान का भारत का यह नाम मशहूर है, भारत का ज्ञान, भारत का योग यह बातें इसी पर मशहूर है, क्योंकि परमात्मा ने आकर के जो ज्ञान और योग दिया था, उससे भारत स्वर्ग बना था । उससे मनुष्य की लाइफ ऊंची बनी थी, इसीलिए ज्ञान और योग का नाम है जिस नाम को लेकर के बहुतों ने बैठ कर के ज्ञान के कई पुस्तक बनाए हैं, शास्त्र बनाए हैं, ग्रंथ बनाए हैं लेकिन वह तो शास्त्र और ग्रंथ ज्ञान के नाम के ऊपर बनाए हैं, भाई ज्ञान बड़ा ऊंचा, तो बड़े-बड़े शास्त्र बनाए हैं, बड़ी-बड़ी चीजें, परंतु वह प्रैक्टिकल चीज तो एक ही के पास है ना । नाम तो मशहूर हो गया है कि भाई ज्ञान और योग, परंतु वह दिया किसने, वह दिया परमात्मा ने । ओरिजिनल ज्ञान, ओरिजिनल नॉलेज जो है वह परमात्मा के पास है क्योंकि नॉलेजफुल वो हैं इसीलिए परमात्मा ने सुनाया वह नॉलेज जो ओरिजिनल है मनुष्य के लिए, पूरी रोशनी और उस रोशनी से उनकी पूरी लाइफ बने, तो वो रौशनी तो मैंने आकर के सिखाई है ना, इसीलिए मेरी शिक्षा का देखो शास्त्र यादगार है । परंतु वह यादगार है, लेकिन जो मैंने ओरली समझाया और जो ओरिजिनल आकर के नॉलेज दी वह तो नॉलेज मेरे पास है ना, इसीलिए मैंने कहा है कि यदा यदा जब-जब अधर्म होता है, तब-तब ही मैं आता हूँ, मैं आकर के सुनाता हूँ, ऐसे नहीं कहा कि मैं किसी के द्वारा सुनावाता हूँ, नहीं! मैं खुद आता हूँ, मैं आ करके यह नॉलेज देता हूँ, क्योंकि वह नॉलेज में ही दे सकता हूँ । मेरी नॉलेज और कोई दे नहीं सकता है । मनुष्य के द्वारा वह नॉलेज समझाई नहीं जा सकती है, इसीलिए उसने अपनी दरकार दिखलाई, इसीलिए भारत में ज्ञान का और योग का यह सब नाम मशहूर है, जिसको फॉरेन देश वाले भी सुनते हैं तो उनको योग की अट्रैक्शन होता है कि वह योग भारत का प्राचीन योग कौन सा है, क्योंकि उसी से भारत अथवा दुनिया स्वर्ग बनी थी । जब भारत स्वर्ग था, तो दुनिया स्वर्ग थी, आज भारत नीचे है तो सारी दुनिया नीचे है इसीलिए प्राचीन भारत का जो नाम है उसी कारण नाम है, क्योंकि परमात्मा ने आकर के इस दुनिया को स्वर्ग बनाया था । तो अभी फिर से वह चीज बनने का यह अभी कॉलेज समझो, स्कूल समझो, यह है उनका । वह सिखा रहे हैं । अभी उसमें तो आ करके सीखना पड़े ना । समझना पड़े इन बातों को । यह तो खाली लेक्चर से या भाषणों से समझने की चीज नहीं है । यहाँ तो आ कर के नॉलेज लेना पड़े, जैसे कोई भी स्कूल में जाएगा तो ऐसे थोड़ी खाली लेक्चर से पढ़ेगा । उसको अच्छी तरह से पढ़ना है, समझना है अच्छी तरह से स्टडी करना है तो हर एक के ऊपर ध्यान दिया जाता है, तो यह भी इसी तरीके से स्कूल है । यह ऐसा नहीं है कि भाई हमारे बहुत आए, बस सुन कर चले गए, किसी ने सुना, क्या धारण किया, पता ही नहीं, नहीं! यहाँ एक-एक का पता निकालना पड़ता है की हर एक ने समझा, प्रैक्टिकल चलते हैं उस पर, अपने घर गृहस्थ में रहकर के वो धारणा करते हैं, अपने कर्मों को श्रेष्ठ रखते हैं तो इस चीज के लिए स्कूल की तरह से चाहिए ना । बाकी तो ऐसे नहीं है ना कि खाली बस आया सत्संग सुना, गया, कौन आया कौन गए, बस उसी से तो कोई मतलब नहीं होता । तो यह कोई कॉमन संत्संग नहीं है । यह है सत का, सत जो है ना, गॉड, उसी का अभी संग मिल रहा है क्योंकि ट्रुथ को जानने वाला एक ही है इसीलिए गॉड को कहते हैं गॉड इज ट्रुथ । इसका मतलब बाकी जो कुछ है न, वह सब अनट्रुथ, यानी झूठ सुनाने वाले इसीलिए कहते हैं, ट्रुथ को वही जानता है, यथार्थ क्या है, व्हाट ऍम आई यानी हम क्या हैं, गॉड क्या है, यह हमारी सारी दुनिया का चक्कर कैसे चलता है, इन सब बातों की यथार्थ नॉलेज जो है, वह गॉड के पास है । इसीलिए ही कहा जाता है, गॉड इज ट्रुथ, यानी ट्रुथ को गॉड जानता है और कोई नहीं जान सकता है । तो जो जानता है वही तो सुनाएंगा ना कि जानेगा वह, सुनाएंगे मनुष्य । नहीं! जो जानेगा वही सुनाएगा, इसीलिए उनको कहते हैं कि मैं आता हूँ, तो अभी वह सुना रहे हैं तो उसको सुनना है और उसी यथार्थ चीजों को अपने पास प्रैक्टिकल में ला करके और अपने को प्रैक्टिकल में ऐसा लायक बनाना है । तो ऐसा बनाने के लिए क्या करना है, कैसे करना है, तो ये सभी बातों को फिर डिटेल से समझना है । उसके लिए चाहिए टाइम, तो वह तो फिर आएंगे क्योंकि आज कुछ नए भी आए होंगे, सन्डे है तो नए भी आते हैं, तो यह सभी ख्याल में बातें दी जाती हैं कि यह समझने का है, बाकी ऐसे नहीं है कि खाली गया, दो वचन सुना या दर्शन किया, उससे काम हो जाता है , यह तो बहुत काल की टेव पड़ी हुई है ना । गया , ब्लेस लेना, आशीर्वाद लेना, दया करो, कृपा करो, आशीर्वाद करो, तो आशीर्वाद दया कृपा कोई ऐसे नहीं होती है, खाली ऐसे-ऐसे किया हो गया बस उससे काम हो जाए । अगर ऐसा ईजी है की ऐसे होने से काम हो जाए तो फिर क्या है । भले अल्पकाल के लिए किसी ने कुछ कह दिया, चलो तुमको पुत्र होगा, फिर क्या, चलो पुत्र भी हो गया, फिर क्या हुआ । पुत्र वाले हैं तो क्या सुख हो गया? सुखी हो गया क्या ? पुत्र वाले तो बहुत हैं । धनवान हुआ, हमारे को धन मिला, कहते हैं न धनवान भव, पुत्रवान भव, भले अल्पकाल के लिए कुछ मिल भी जाए, वो तो है देखो धनवानों का हाल, अच्छी तरह से गवर्नमेंट भी उनके पीछे लगी है, यह तो है तो सभी बातें हैं, धन वालों का हाल देखो, उनका हाल देखो, सबका हाल देखो, तो इससे क्या है, बिचारों का धन है तो धन संभालना ही मुश्किल हो गया है, तो ये तो सभी देख रहे हैं ना, तो इसमें तो अशांति ही अशांति है । यह सब अशांति के कारण हो गए हैं ना । वह हमारी जो एवर हेल्दी, एवर वेल्दी एवर हेप्पी की जो लाइफ थी वह कहाँ है तो यह सभी चीजें समझने की है कि इनका हमें अभी, यह अल्पकाल की पुत्रवान भव, आयुष्मान भव, नहीं! हमको एवर सब बातें एवर की चाहिए जिसमें हम सदा सुखी भी रहे । वह जो सुख की चीज है उन सभी बातों को समझना है वह कैसे । जो हमारे पूज्य देवताएं थे, देखो उस जमाने में ऐसे थोड़ी था । धन था तो धन से पूरा सुख था । अविनाशी धन था और जो हमको लाइफ भी थी तो पूरी सुखी थी । जो चीज थी, उसके साधन सुख के पूरे थे ना । आज है तो भी दुःख है, ना है तो भी दुःख है, दुःख ही दुःख है । नाम ही दुःख है, दूसरी कोई बात ही नहीं है । है तो भी दुःख, ना है तो भी दुःख, मतलब दुःख ही है । क्यों है? तो यह कारण समझना है कि आज लाइफ को क्या चाहिए । क्या खो गई है चीज, कौन सी चीज की हमारे पास कमी है जिसके आधार से हमारे को आज दुःख ही दुःख खड़ा है, तो वह है हमारा कर्म भ्रष्ट । इसीलिए इन सब का हम सुख भी तभी पा सकते हैं, जब हमारे पास कर्म की श्रेष्ठता हो, तभी भोग सकेंगे ना । श्रेष्ठता है नहीं तो किस बल से भोगेंगे । भोगेंगे नहीं ना और उल्टा दुःख मिलेगा तो यह सभी चीजें सब बातों को समझना है और उसी श्रेष्ठ कर्म करने के लिए अभी क्या करना है, उसी का नॉलेज, उसी का ज्ञान लेना है इसीलिए ज्ञान का नाम मशहूर है, कहते हैं भाई भारत का प्राचीन योग, भारत का ज्ञान । कई तो समझते हैं कि क्या भारत में ही यह बातें हैं कर्म अच्छा, दूसरे देश में तो सब खाते-पीते, ईट एंड ड्रिंक, फलाने फलाने, उसमें लगा करके बस अपना जीवन चलाएं । वह समझते हैं, परंतु नहीं, हमारा प्राचीन भारत ही जो है न, इसका नाम क्यों बाला है इसीलिए कि इसमें वह प्राचीन शक्ति थी, बल था, लेकिन आज नहीं है । इसीलिए क्योंकि यह भारत स्वर्ग था, तो दुनिया सारी स्वर्ग थी, इसमें पावर था लेकिन आज वह चीज नहीं है परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि खाली भारतवासी ही ज्ञान का नाम लेते हैं । खाली भारतवासी ही योग का नाम लेते हैं । भारतवासी खाली भगवान का नाम लेते हैं, दूसरे देश तो ना भगवान को नाम लेते हैं और ही सुखी हैं, क्योंकि उनके पास धन और माल है और ही सुखी हैं । भाई अमेरिका है फलाने हैं, वो कई ऐसे हिसाब लगाते हैं, परंतु नहीं, भले तो भी उनके पास वह पीस ऑफ माइंड नहीं है । भले धन हैं पर उनसे पूँछों रोग है, बीमारी है, ये है वो है, क्या यह सब अशांति के कारण नहीं है । तो ऐसा नहीं है परंतु यह सब में प्राचीन जो बल था एवर हेल्दी, एवर वेल्दी, एवर हैप्पी, वह जो प्राचीन बल था, वह तो वहाँ नहीं है ना दूसरे देश में । यह भारत की थी, लेकिन भारत में भी आज नहीं । था जरूर, बाकि ऐसे नहीं है लाइफ कोई हमारी ऐसे ही है इसीलिए बेचारे कई समझते हैं बस, शरीर में आना ही दुःख है, तो शरीर में आवे ही क्यों, बैठ जाए वहाँ, उनके पास इसीलिए बेचारे बहुत पूंछते है की यहाँ क्यों आवें । उन्होंने बहुत जेनेरेशन्स से देखा है, आज थोड़ी ही देखते हैं, एक जन्म थोड़ी देखा है बहुत जेनरेशंस देखा है, हमारे दादा, परदादा, फलाने फलाने सब दुखी होते आए हैं । इसीलिए कई समझते हैं कि हम लाइफ में ही क्यों आवे । वहीं बैठे रहे उनके पास इसीलिए कहते हैं कि कोई और ठिकाना है जो ज्योति ज्योत में समाय बैठे रहें या कोई ऐसा कोई कोना हो जहाँ बैठे रहे, इधर उतरे ही नहीं शरीर में क्योंकि उतरे इसमें और शरीर में दुःख पाएं तो अच्छा है शरीर में ना आए, क्योंकि उन्होंने शरीर देखा ही दुःख का है ना । इनको यह पता नहीं है कि हमारा आत्मा भी पवित्र शरीर भी पवित्र के साथ हमारा जनरेशंस यहाँ चली हुई है, और उसमें हम सदा सुखी थे । तो यह पता ना होने के कारण कि हमारे लाइफ की स्टेज कौन सी है, हमारे लाइफ की स्टेटस कौन सी है, इन सब बातों की एम एंड ऑब्जेक्ट का पूरा पता ना होने के कारण बिचारे ने सुना है, वह भी सुना है, किन्होने में सुना दिया है, ऐसा कोई विद्वान पंडित आचार्य ने ऐसी बात सुना रखी है कि भाई एक ऐसा भी कोना है, जहाँ जाके वहाँ समा जाएंगे, जहाँ ज्योति ज्योत में समा जाएँगे, फिर निकलेंगे ही नहीं, किसी ने सुना रखा है इसीलिए वह समझते हैं, वो अच्छा है, क्योंकि यहाँ तो दुःख है ना इसीलिए वहाँ ही बैठे रहें इसलिए उसका क्या कोशिश है, उसका क्या प्रयत्न है, क्या पुरुषार्थ है तो उसमें जाकर बस बैठ जाए, परंतु नहीं हमारा है की हमको लाइफ में आना है और आना है परन्तु लाइफ में हमारी स्टेज है, ऐसे नहीं है कि ऐसी लाइफ है, नहीं, हमारी जनरेशंस बहुत सुख की चली हुई है, लेकिन वह कैसे चली हुई है, वो किसने बनाई, उसके लिए तो उसको याद करते हैं इसीलिए कि अभी तू आ, वो रोशनी दे, अभी हम बहुत अंधकार में आ गए हैं । जितनी हम रोशनी में जा रहे हैं देखो हमारी आज बुद्धि खुल गई है परंतु वह रोशनी और ही अन्धकार में ले जाती है जितना जाते हैं और ही डिस्ट्रक्शन की चीजें बनती जाती हैं । हां आज यह एटॉमिक पावर आदि यह सब इतना मनुष्य के द्वारा खोज की गई, लेकिन वह मनुष्य का ही नाश करने के लिए खड़ी हो गई है । यह चीजें, मनुष्य सुख के लिए बनाते जाते हैं परंतु, मिलता उलटा उनसे दुःख ही है, इसको कहा जाता है विनाश काले विपरीत बुद्धि, यह कहावत है बड़ी मशहूर तो जभी विनाश का काल आता है ना तो बुद्धि से काम उल्टा ही होता है तो है सुख की चीजें परन्तु उसका उपयोग जो है न उल्टा किया है, आज यह एटॉमिक पावर यह सब चीजें जो है, नहीं तो इनको सीधे तरीके से कहाँ लगाएं तो यह सुख के साधन बन सकते हैं परंतु उसकी बुद्धि उस तरीके का काम नहीं करेगी अभी । उनकी बुद्धि काम यह करेगी कि इससे नाश कैसे करें क्योंकि यह है ही विनाश काले विपरीत बुद्धि न । विपरीत बुद्धि का मतलब है अभी परमात्मा के साथ प्रीत नहीं रही है उससे विपरीत है उससे कट ऑफ़ हैं रिलेशन । उसके विपरीत बुद्धि है विनाश का काल है तो उससे विपरीत बुद्धि होगी ना, उससे प्रीत नहीं है । अब जब प्रीत बुद्धि है तो फिर देखो उससे प्रीत बुद्धि, इसीलिए कहते हैं अभी मेरे से प्रीत रखो, अर्थात मेरे से योग रखो । प्रीत कहो या योग कहो बात एक ही है तो मेरे से प्रीत रखो, मेरे से योग रखो तो फिर प्रीत बुद्धि से कन्स्ट्रशन, अभी देखो उससे कंस्ट्रक्शन का काम प्रीत बुद्धि से करा रहे हैं और विपरीत बुद्धि से डिस्ट्रक्शन काम करा रहे हैं तो दोनों चाहिए ना काम भी दोनों है न विनाश स्थापना तो कंस्ट्रक्शन और डिस्ट्रक्शन तो अभी दोनों कहते हैं प्रीत रखो तो नई दुनिया का कंस्ट्रक्शन होगा, विपरीत बुद्धि से फिर डिस्ट्रक्शन तब तो दुनिया का यह प्रॉब्लम सोल्व होगा न । अगर डिस्ट्रक्शन ना हो तो सोल्व कैसे हो सकेगा, यह सब जो जनसंख्या बढ़ती जा रही है, खाने के लिए नहीं है आज सब मुसीबतें खड़ी हो जाती हैं यह बढ़ता रहेगा कैसा होगा अभी इसको कौन हल करे । मनुष्य बिचारे थक गए, बिचारा गांधी कोशिश करते करते गाँधी चला गया, नेहरू कोशिश करते नेहरु चला गया और भी आएंगे चलते रहेंगे लेकिन आकर के भी क्या करेंगे । हमारा खाना पीना और सब जरूरतें बढ़ती जाती है, आखिर क्या होगा तो इसीलिए बाप कहते हैं कि बच्चे अभी इस दुनिया का हाल अभी मैं आकर के संभालता हूँ । इसकी वाघें अभी मैंने हाँथ में ली हैं कंट्रोल, अभी मनुष्य के कंट्रोल में आने की चीजें नहीं है यह तो लड़ झगड़ कर आपस में सब खत्म इसीलिए अभी मैंने पकड़ा है तो मैं आकर के अभी ये सेप्लिंग कंस्ट्रक्शन की गुप्त रीती से लगा रहा हूँ । वो कहते हैं अभी हम को कंट्रोल पकड़ना चाहिए, जब देखते है ना कि बच्चे आपस में लड़ते झगड़ते ऐसे हो जाते है तो फिर बड़े खड़े हो जाते हैं, अभी सबसे बड़ा वह है ना, तो अभी वो आ करके, यदा यदा ही धर्मस्य, जब जब ऐसी अधर्म का टाइम आता है, वह कहते मैं कोई परमधाम रूप में या कोई सजे सजाए में या कोई मैं ऐसा चमत्कार दिखाता हूँ, ऐसा नहीं है मैं आता हूँ गुप्त, मेरा काम चलता ही गुप्त है, यह शास्त्रों में भी है गुप्त का इसीलिए महत्व है दान भी गुप्त, क्यों महत्व रखा है इसीलिए क्योंकि परमात्मा गुप्त आया है ना, उसने जो काम किया है पतितों को पावन बनाना, बड़े गुप्त तरीके से तो यह अभी उसका गुप्त काम चल रहा है तो आपको बतलाते हैं अभी उसका पूरा फायदा लेना और लाभ लेना, यह तो फिर आप लोगों का काम है । अच्छा अभी टाइम हुआ है, आज आए भी कुछ सवेल हैं इसीलिए छुट्टी भी थोड़ा सवेल ही लेनी चाहिए । अच्छा, दो मिनट साइलेंस । साइलेंस का मतलब है हम असल में साइलेंस है फिर टोकी में आए हैं, अब फिर अपने साइलेंस देश को याद करो क्योंकि अभी वहाँ चलना है, पीछे फिर टॉकी वर्ल्ड में आएंगे परंतु यह प्योर वर्ल्ड होगी, अभी इम्प्योर है, समझा । आना है, परंतु प्योर बन करके, फिर शरीर भी प्योर, पीछे हम सदा सुखी होंगे । अच्छा । (रिकॉर्ड बजा छोड़ भी दे आकाश सिंहासन) यह जीवन की नैया बीच भंवर में आ गई है ना, नॉलेज इज माइट वो देखो डॉक्टरी नॉलेज, नॉलेज तो बहुत है ना, एक नॉलेज थोड़ी ही है, वैसे तो हद के नॉलेज बहुत है ,परंतु यह ज्ञान जिसका नाम है ज्ञान, वैसे कॉमन अर्थ है उसका समझ, ज्ञान का माना ही समझ, परंतु समझ बहुत प्रकार की है, डॉक्टरी इंजीनियरी बेरीस्टरी हर तरह की समझे हैं, लेकिन ज्ञान जिसके ऊपर है कि भाई ज्ञान बिना गति नहीं है, वह कौन सी समझ है, वह यह कि हमारे अपने जीवन का यह पूरा समझ होना चाहिए अर्थात हमको अपने कर्मों का पूरा नॉलेज होना चाहिए तो कर्मों की नॉलेज का, उसको कहा हुआ है ज्ञान, कर्म की गति परमात्मा ही समझा सकते हैं और कोई मनुष्य नहीं क्योंकि मनुष्य तो कर्म की गति के चक्कर में है ना, वह नहीं समझा सकते हैं । कर्म की गति को जानने वाला वही है जो हमारी दुर्गति और सद्गति गति की गति को जानता है । यह दुर्गति में कैसे आए, हम तो सब दुर्गति में आ गए हैं ना लेकिन हम दुर्गति वाले कैसे जान सकेंगे अपने को या हमारे करम गति को । नहीं, हमारी कर्म गति को जो हम दुर्गति में आए हुए हैं उसको जानने वाला वो ही होगा जो गति दुर्गति से ऊपर है, वही जान सकता है इसलिए उनको आ करके समझाना पड़ता है । उसी का नाम ज्ञान है इस चीज का कि जिससे हमको अपने कर्मों का नॉलेज जिससे हम अपने कर्मों को वो नॉलेज पाकर के ऊंचे कर्म बनाएं, जिस नॉलेज की फिर माइट प्राप्त रहेगी कर्म श्रेष्ट की, उससे फिर हम अपना प्रालब्ध यूज़ करें, जिससे फिर हमको सब सुख मिलेगा अच्छा । अभी उसी नॉलेज की ये कॉलेज है समझा, मनुष्य को ऊँच स्टेटस अथवा सदा सुख प्राप्त करने की स्टेटस कैसे प्राप्त हो, उसका यह कॉलेज । अभी उसमें जो पढ़ेगा, वह स्टेटस पाएगा । जो पढ़ेगा नहीं, वह कैसे पाएगा, तो पढ़ना है ना आ करके यह समझो ।