मम्मा मुरली मधुबन

श्रेष्ठाचारी बनने का ज्ञान और परमात्मा से सर्व संबंध
 


ओम शांति । परमपूज्य और परमपिता परमात्मा को जान गए हो ना? अर्थात अपने बेहद बाप को समझ गए हो ना? आत्मा ही तो समझेगी ना ? आत्मा भी ऐसे इन आंखों से तो नहीं देखी जा सकती है। देखी जा सकती है ? नहीं, तो परमात्मा को भी तो भले इस आंखों से नहीं देखते हैं परंतु जानते हैं कि मैं आत्मा आंखों से देखी जाने वाली नहीं हूं परंतु मैं जानती हूं ना मैं आत्मा हूं । आत्मा को भी तो जाना जाता है ना तो परमात्मा को भी जाना जाता है । भले दिव्य दृष्टि से देखें भी परंतु भल देखा ना, फिर भी तो उसके लिए जानना पड़े कि वह देखी हुई चीज क्या है। उनका ऑक्यूपेशन, उनका पहचान तो फिर बुद्धि से जानी पड़ेगी ना। बुद्धि से जान करके फिर उसे याद रखना है। ऐसे भी नहीं है कि जो दिव्य दृष्टि से देखते हैं तो उस ज्योति रूप का बैठ करके ध्यान करने का है। ऐसा भी नहीं है कि उनका कोई ध्यान रखने का है। नहीं, यह तो बुद्धि से कि बाप है, जैसे बच्चे को बाप सारा दिन याद रहता है कोई वह सामने फोटो रखकर के थोड़े ही याद करता है या कई मानसिक भी करते हैं मूर्ति को ला करके सारी पूजा मानसिक करते हैं, कई यह सब करते हैं भक्ति मार्ग में तो बहुत हैं ऐसा भी नहीं है। यह तो हम बाप के हैं प्रैक्टिकल और बाप को याद रख कर के बाप का जो फरमान है, बाप की जो आज्ञा है उसी को पालन करते रहना है। यह है उनका फरमान बाकी ऐसे नहीं कहता है कि सारा दिन मेरा चित्र बुद्धि में रखकर खाली तू उसको देखते रहो। नहीं, कहते हैं याद रखो बुद्धि से, मुझे भूलना नहीं । ऐसे नहीं कि मुझे देखते रहो। कहा भी है, गीता में भी कहा है मनमनाभव, मन को निरंतर मेरे में स्थित कर अर्थात मन को स्थित कर माना बुद्धि से तो याद में चीज आएगी ना । बाकी ऐसे भी नहीं है कि उसका बैठ करके ध्यान कर या उसके चित्र का, उसके लिए तो फिर बैठना पड़ेगा न। अगर उसके चित्र का बैठकर के ख्याल करें तो उसको ख्याल करने के लिए फिर बैठना पड़े, मानसिक भी बैठना पड़े । नहीं, वह कहते हैं नहीं तू मेरा ध्यान रख, याद रख और मैं कौन हूं किसकी संतान हूं जैसे लौकिक रीति में भी बाप का, खानदान का, बाप के पोजीशन का ध्यान रखा जाता है ना बाकी सारा दिन बाप का फोटो, मानसिक भी फोटो घड़ी घड़ी फोटो उनको थोड़ी ही बैठ कर के देखेंगे। तो कौन सा बाप है, बाप का ऑक्यूपेशन क्या है, बाप की पोजीशन क्या है, मैं ऐसे बाप का बच्चा हूं और ऐसे बाप के बच्चे का क्या फर्ज है और मुझे भी बाप को फॉलो करना है, बाप के खानदान को, बाप के कुल को अथवा पोजीशन को कोई लग ना जाए कुछ चिट्ठा इसीलिए वह ख्याल रखेंगे कि हमारे कर्तव्य में कोई ऐसी बात ना हो । मेरा कर्तव्य अच्छा रहे और अच्छा कर्तव्य भी कैसे अच्छा होता है उसका भी बाप ने बैठकर के समझाया है। तो यह सभी चीजें बुद्धि में रख कर के अपने एकशंस को ठीक रख करके चलना है यह है बाप से याद अथवा बेहद बाप के हम संतान हैं जो बुद्धि में रखने का है। गीता भी थी पहले पहले मनमनाभव कहा, फिर बीच में कहा, फिर एंड में कहा । तीन बार है उसमें मन मना भव का बैठकर के सुनाया है। तो आखरी में भी, पहले में भी और मध्य में, बीच में भी यह वार्निंग दी है कि बच्चे बाप को याद रख । तो मूल बात यही है और इसी से ही हमको बाप से बल मिलना है और अपने पापों को दग्ध करने का क्योंकि अभी तो पाप आत्मा है ना तो उसको अभी स्वच्छ बनाना है इसीलिए उसके याद की मदद लेनी है, तो पापों को नाश करके इसीलिए कहते हैं इसी से ही तुमको बल मिलेगा। इसीसे ही तुम्हारे कर्म भी ऊंचे रहेंगे । यहां पर भी तुमको ऊंचे कर्म का बल तब मिलेगा जब पाप का बोझा नाश होगा ना तब। अगर पाप का बोझा सिर पर होगा तो फिर तुम्हारा यहां भी कर्म, वो मैल चढ़ी हुई है, मैल उतरती जाए तो तुम्हारे को भी कर्म करने का रोशनी आवे इसीलिए बाप कहते हैं याद करो और अपने कर्म को भी संभालते और स्वच्छ बनाते चलो । तो यह तो मुख्य बातें बुद्धि में अच्छी तरह से रख लेने की है बाकी है नॉलेज सारा। बाकी नॉलेज के लिए तो देखो कई किस्म के हैं आज कितनी मत हैं, कितने विचार हैं कितने रास्ते कितने यह सभी बातें हैं। उसी के लिए फिर यह सब बातें फिर समझनी और समझानी पड़ती हैं। वास्तव कर करके कोई हमको बाप को जानने के लिए इतनी सभी बातों के जानने की जरूरत नहीं है परंतु यह जरूरत तभी रही है क्योंकि दूसरे बिचारों ने बहुत-बहुत रास्ते बना रखे हुए हैं ना, अनेकानेक इसीलिए फिर उन्हीं बातों को फिर बैठकर के बाप कहते हैं कि समझो और दूसरों को समझाओ। तो दूसरों को समझाने के लिए फिर यह सभी इतने पॉइंट्स बुद्धि में रखनी पड़ती है और अपने भी कई जो बहुत काल से सुना है तो उन्हीं सभी बातों को भी जो उल्टी पड़ी हुई है ना बुद्धि में बातें तो उन्हों भी फिर किस तरह से अपने बुद्धि में भी लाने के लिए फिर बाप यह सब बातें समझाते हैं। तो यह सभी है समझने की बातें जो उल्टा पड़ा है उसको सुल्टा बनाने के लिए लेकिन बाप को जानने के लिए तो बड़ी सिंपल बात है। बस बाप है समझना है इसीलिए बाबा कहते हैं ना आजकल देखो आप लोग मुरलियों में पढ़ते हो बस एक ही प्वाइंट किसी से भी पूछ लो कि तुम्हारा बाप से, पिता से संबंध क्या है ? कहते हो ना परमपिता तो कहते ही हो तो ऐसे पिता कहते हो तो पिता से क्या संबंध रहा, परमात्मा से क्या संबंध रहा। बस वह पिता है ना, पिता है तो फिर पिता से क्या मिलेगा? वर्सा। तो बस उस पिता का होकर के रहो। पिता का होना क्या होता है ? बस पिता का हो जाए ना, बच्चा बन जाए, पिता का बच्चा तो बस उसका हो करके चलो । उसके लिए तुमको और बैठकर के साधन या क्रिया या कुछ और करना है, कुछ करने की क्या बात है। बाप के लिए, बाप के रास्ते के लिए कोई क्रियाएं या कोई साधन इनकी क्या आवश्यकता है। बस बाप से जन्म लिया और जन्म सिद्ध अधिकार हो गया । बाप के पास जन्म लिया और जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त होना ही है बस यह भी चीज ऐसे ही है। फिर वह कितनी सिंपल और सहज बात है अगर कोई समझे तो सेकंड की बात है। नहीं समझे तो फिर देखो उसके लिए फिर देखो कितना बैठ करके यह सब माथा खुटी हैं । तो यह सभी बाप बैठकर के अभी समझाते हैं कि बच्चे मुझे जानने के लिए, पर्सनली मेरे जानने के लिए कोई डिफिकल्टी नहीं है । डिफिकल्टी भी तुमको तभी जब ये सब समझना, पुरुषार्थ रखना, जो उल्टा बनाया है अपना तो उसको सुल्टा करने के लिए मेहनत है क्योंकि बहुत पुराने संस्कार तेरी बुद्धि में है ना तो उसको मिटाना, करना वह तो भाई उल्टा जो भरा है उसको सुल्टा करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। नहीं तो ऐसे तो कोई मेहनत कि मेरे जानने के लिए तो कोई मेहनत नहीं करते हो। मेरा जानना तो बड़ा सिंपल है बाप हूं बस और क्या है, उसको सिर्फ भूल गए हो अभी पता लगा है और बाप को बस बाप समझ करके चलना है कि मैं उसका पुत्र हूं ऐसा समझ करके बस उसको पकड़ लो, उस संबंध को पकड़ लो। जैसे संबंध पकड़े जाते हैं ना, देखो लड़का लड़की है, फिर जानते तो नहीं है ना आपस में। बस उसको खाली संबंध का पता लगा कि यह मेरा अभी पति बना तो बस संबंध पकड़ लिया ना। क्या पकड़ लिया, संबंध पकड़ लिया ना। पकड़ लिया तो बस वह जीवन का साथी, वह जीवन की साथिन। तो बन गए फिर देखो फिर वह सारा कैसा। है तो वैसे तो बस लड़के लड़कियां ही हैं परंतु खाली संबंध का जोड़ मालूम होने से बस वह जुट जाती हैं और जुट जाती है तो जीवन देखो एक दो के प्रति हो जाती है ना। इसी तरह से यह भी हमको अभी पता चला है उनके प्रति हमारी जीवन हो चुकी तो वो लगाना पड़े ना संबंध का । तो इसीलिए बाप कहते हैं कि बस मेरे लिए तो सिंपल बात है बाकी इतनी सब जो भी तुमको जानना अथवा यह सब करना है वह तो तुम्हारे अंदर जो उल्टा भरा है ना उसको बैठ करके साफ करने के लिए हेल्प और फिर दूसरों को समझाने के लिए यह जो तुम्हारा उल्टा भरा हुआ है उसकी माथा खोटी तुमको ही करनी पड़ती है। बाकी मुझे जानना तो बड़ा सिंपल है मुझे जानने में कोई बड़ी बात थोड़ी ही है कि ऐसा हूं, बड़ा हूं, यह हूं वह हूं । नहीं, मैं तो देखो क्या हूं बिंदी, इतना छोटा। तू भी कितनी है, उसको क्या जानना है। नहीं, बस पता पड़ा कि हम आत्मा बिंदी हैं, ज्योति रूप हैं। वह भी परमात्मा है, क्या उसका क्या बैठकर के वर्णन करें। मनुष्य का भी वर्णन है दो आंखें हैं, दो कान है इतना वर्णन करना पड़े, उनके लिए तो इतना भी वर्णन नहीं वह तो बिंदी की बिंदी, उसमें क्या वर्णन करें । तो कहते हैं मेरा तो कोई रूप का भी वर्णन बड़ा नहीं है और मेरे लिए तो कोई इतना बैठकर के कोई वर्णन करने की बात तो है ही नहीं। तो यह सारी चीजों को समझने का है इसीलिए बाप कहते हैं बड़ा सिंपल, बहुत सिंपल है बाकी यह सभी इतनी बातें ये विस्तार, ये सब बातें समझाना क्योंकि पहले से पड़ा हुआ है न इसीलिए ये सब समझाने में आता है। तो ऐसे ये सब बाप बैठ कर अभी समझाते हैं। सिंपल तो लगता है ना। कोई भारी नहीं है बहुत सिंपल है, इसीलिए ऐसी सिंपल नॉलेज बाप ही समझा सकते हैं बाकी बिचारे दूसरे मनुष्य तो देखो कितने बड़े-बड़े वेद, बड़े-बड़े शास्त्र, बड़े-बड़े ग्रंथ, अठारह पुराण, चार वेद और फिर और अनेक शास्त्र होंगे तो देखो कितने-कितने यह सब बैठकर के बनाए हैं। वेद जब चार वेद पढ़ो, अठारह पुराण पढ़ो, यह करो, वह करो तब कोई ज्ञान थोड़ा बहुत कुछ बुद्धि में आए इसीलिए बैठकर के इतना पढ़े तो पहले से ही है भाई चार वेद पढ़े, अठारह पुराण पढ़ें तभी जाकर ज्ञान कुछ लगे परंतु बाप कहते हैं अभी इसके लिए तुमको कोई वेद शास्त्र या बैठ करके कोई हठयोग साधनाएं क्रियाएं करनी है या इतना ये सब, या तो कहेंगे कई जन्म भक्ति करो पीछे ज्ञान, ऐसी ऐसी बातें बता रखी थी ना इसीलिए बाप कहते हैं बच्चे ऐसी कोई बात नहीं है । बाप को ऐसी कठिनाई से पाना ऐसी कोई बात नहीं है। बाप तो बस बाप है, तू बच्चा हो जा वह बाप है। बाप को पाने के लिए इतना बैठ करके मेहनत करने की तो कोई बात ही नहीं है, परंतु वह जब स्वयं बाप आता है ना तब आकर के सहज करके बतलाते है । बाप ही तो सहज करके बच्चे को देगा ना । बाप क्या बच्चों को कहेगा कि मेरे पाने के लिए तू ऐसा कर, ऐसा ऐसा कर? देखो मेरे पाने के लिए तुमको क्या करना है बड़ा सहज और मैं खुद ही आता हूं तुमको अपना गोद का बच्चा बनाने के लिए अथवा अडॉप्टेड बच्चे बनाने के लिए तो मैं खुद ही आता हूं न। तो देखो बाप तो कहते हैं मैं खुद आता हूं और आकर कहता हूं अभी मेरे बनो तो फिर बनना चाहिए ना। बाप की सुननी चाहिए और सुनकर माननी चाहिए । अभी बाप तो अच्छी बात बताते हैं हमारे ही कल्याण की बतलाते हैं। इसमें नुकसान ही क्या बताया कोई, क्या नुकसान पड़ा है ? हमारे अपने जीवन में हम देखें तो क्या नुकसान पड़ा है , कोई नुकसान की तो बात है ही नहीं । यह भी जीवन अच्छी रही और जरूर है जो यह जीवन अच्छी है तो उसकी भविष्य भी, भले कोई कहे, चलो कोई कैसे समझें भविष्य स्वर्ग रहेगा। नारी से लक्ष्मी बनेंगे, नारायण बनेंगे चलो, परंतु भविष्य अच्छा तो रहेगा ना। अच्छा और क्या रहेगा। इस दुनिया में तो अच्छा और कुछ है नहीं। हम अगर इतना श्रेष्ठ पुरुषार्थ कर रहे हैं और यही है कि नहीं हमको कोई इस दुनिया के धन की इस दुनिया के मर्तबे की तो इस दुनिया से निराली कोई चीज मिलेगी तो निराली और क्या होगी? दूसरी दुनिया का तो फिर यही भविष्य प्रारब्ध है ना और क्या है। तो भले यह समझते तो है ना कि नहीं यह जो पुरुषार्थ कर रहे हैं वह हम कोई धनवान बनने का पुरुषार्थ नहीं है। यह कोई हम इस दुनिया में मर्तबे पाए उसके लिए पुरुषार्थ नहीं है। इस दुनिया के मर्तबे वाले भी देख लिए, इस दुनिया का सब देख लिया उसके लिए तो नहीं है ना। यह पुरुषार्थ नया है और नई कोई चीज पाने के लिए है। तो नई क्या और पाएंगे? जरूर नई दुनिया की पाएंगे ना और जानते हैं कि नई दुनिया भी अभी आने की है। अभी टाइम भी देख रहे हैं और आसार भी सामने हैं । अभी यह तो कोई कल्पना कहे या कोई कहे की नहीं यह तो सब बनावट है, अपनी बातें बना रखी हैं। इसमें अपने बनाने की क्या बात है? यह तो प्रैक्टिकल है ना। सामने समय भी दिखाई दे रहा है, आसार भी नजर आते जाते हैं। वह भी तो विवेक और बुद्धि है, बड़े-बड़े लिखे पढ़े साइंस वाले भी खुद कहते हैं कि यह सब दुनिया की हालात दिखाई दे रही है कि हां दुनिया का डिस्ट्रक्शन है। वह तो कॉमन बुद्धि भी जो अभी पढ़े लिखे हैं वह भी समझते हैं। तो हां वह तो बुद्धि कह रही है, इसमें तो कोई ऐसा नहीं है कि हम अपनी कल्पना लगाते हैं। नहीं, सो भी आसार देखते जाएं और इधर यह भी देखते हैं कि इतना जो ऊंच पुरुषार्थ है। जो पुरुषार्थ अब तक करते आए हैं वह तो दूसरा पुरुषार्थ है ना, धन के लिए, पुत्र के लिए या दुनिया में मर्तबे के लिए या जो भी कुछ किया है उनका फल है। अभी यह तो पुरुषार्थ ही निराला है। हम तो देह सहित देह के सर्व संबंध से बुद्धि हटा करके अपने बाप से लगाते हैं वो नई चीज पाने के लिए हमको इस दुनिया का नहीं चाहिए। तो हमारा इस दुनिया से तो कोई रहा ही नहीं ना। हमारा है नई तो जरूर है कि नई दुनिया का तो नई दुनिया में ही मिलेगा और जानते हैं कि जरूर दुनिया का परिवर्तन, यह दुनिया ही दिखा रही है कि दुनिया का परिवर्तन होने का है। तो अभी जरूर है कि उसी में ही तो पाएंगे ना। तो इसमें तो कोई ऐसी भी मूंझने की आवश्यकता नहीं है कौन कहता है कैसा स्वर्ग, कौन कहता है ये सब। भला ऐसी ऐसी दुनिया चल करके भी कितना समय रहेगी। बस इसी तरह से चलते रहे चलते रहे यह भी कोई दुनिया होती है। तू जरूर है कि दुनिया की कंडीशन चेंज होती आई है, जैसे कि हमारी लाइफ में हम इतनी छोटी लाइफ में भी देखें तो दुनिया चेंज होती आई है। हमारी इतनी लाइफ में भी चेंज है हम देखते थे अनाज कितने के हैं भाई, गेहूं भाई इतने के हैं, बाबा की लाइफ में देखें बाबा तो कहते हैं हम भी सौदा करते थे, सीधे का पहले काम था , जवाहरी काम तो पीछे उठाया था सीधा समझते हो ? अनाज बेचने वाला, तो उनके बाप का कुछ ऐसा काम था कि उसी दुकान पर हम काम करते थे । तो बाबा भी कहते हैं कि पता नहीं गेंहू कितने बतलाते हैं की इतना दाम सस्ता आता था , आज तो देखो गेहूं नहीं मिलता, चावल नहीं मिलता यह नहीं होता वह नहीं होता देखो कितना । तो देखो थोड़े ही बरसों की बातों में भी , एक ही आयु में भी कितना डिफरेंस है और यह हमारी हिस्ट्री में भी कितनी चीजों जो सस्ती मिलती थीं अब देखो । तो दुनिया का अब का टाइम यह टाइम कहां तक जा करके अपना यह होगा । और यह हमारी हिस्ट्रीज भी हमको बतलाती है, चाहे शास्त्र के कुछ चिह्न भी हमको दिखलाते हैं कि दुनिया का चेंज कैसे होता आया है तो उसी तरीके का अभी टाइम आ करके पहुंचा है। तो यह सभी बातें कोई अगर विचारवान विचार शक्ति पूरी लगा करके और उसी ढंग से सोचे समझे न बाकी अभी तो दृष्टि मिली है न। त्रिकालदर्शी बाप ने तीनों कालों का बैठकर के नॉलेज क्लियर दिया है और इन्हीं बातों को लेकर के कोई अच्छी तरह से सोचे और समझे बैठ करके तो आएगा उनको कि हां, क्योंकि अभी तीन काल की दृष्टि मिली है ना, तीनों कालों का। काल समझते हो ना ? टाइम, काल कहा जाता है टाइम को । तो अभी तीन काल यानी आदि, मध्य, अंत कि हम आदि कहां से आए, फिर कैसे मध्य में फिर चेंज आया, ये माया का राज्य आया फिर कहते हैं अभी उसकी भी एंड होगी ना। आई है जो चीज फिर जाएगी भी न, जिसको आना है उसको जाना भी है यह तो अनादि चक्र का खेल ही है। तो माया का राज्य आया ना, ऐसे तो नहीं है ना शुरू से ही सदा से ही था। आया, आया तो फिर जाएगा भी ना। फिर जैसा था वैसा होगा। यह तो गीता में भी वर्णन है कि यह राजे भी और हम और तुम आगे भी मिले थे, अभी भी मिले हैं फिर मिलेंगे, ऐसा कहा है ना। तो यह रिपीट होता है और यह कैसा चक्र चलता है इन सभी राजों को भी समझना है न। तो ये अभी यह जो कलयुग आया है यह कलयुग कई बार आया है यही फिर सतयुग बना है। फिर सतयुग का भी तो जरूर टाइम जैसे कलयुग का भी टाइम चला है ना, इतना टाइम चला है, हम इस तमोप्रधान अवस्था में होते, दुख अशांति कोई आज की थोड़ी ही है आई है, ये तो चलती आई है । बढ़ती बढ़ती, बढ़ती , बढ़ती चलती जाती है इसी तरह से हमारा सुख शांति का जैनरेशंस में चलने का होगा न समा। तो यह सभी चीजों को बाप बैठकर के समझाते हैं कि इन सब बातों को, नियमों को हर चीज का अपना अपना नियम है। आकाश किस तरह का है उसका अपना नियम है, पानी का अपना है नियम, पृथ्वी का अपना है, हर एक चीज की जो बनावट है उसका अपना अपना है, यह कैसे होता है इसका भी परिवर्तन, यह सभी बातें। तो बाप कहते हैं हर चीज को जैसी है उसी को वैसा जानना उसको कहा जाता है ज्ञान। ऐसे नहीं है कि है ऐसी और उसको फिर कैसे भी जाने, कुछ भी समझे, यह कोई समझ थोड़ी ही होती है। यह है क्या है कौन है, इसको हम क्या भी कहें, क्या भी समझे तो बस ये समझ है ? नहीं, जो है, जैसी है जो है उसको उसी तरीके से समझना कि भाई हम को पहचान है इसकी कौन है, यह फलाना है , तो जो है जैसा है उसकी ओरिजिनल पहचान को ही पहचान कहेंगे न । बाकी कैसे भी जाने कि ऐसा नहीं है ऐसा है कैसे भी जानो, बस कुछ भी समझो तो ऐसे ही बस ऐसे ही जानना, उसको जानना तो नहीं कहेंगे न। इसलिए परमात्मा ने भी कहा है कि मैं जो हूं, जैसा हूं मुझे उसी तरीके से ही जानना उसका नाम ही तो ज्ञान है इसीलिए वह यथार्थ नॉलेज और यथार्थ समझ जो जैसा है उसकी नॉलेज तो मैं ही दूंगा न। मैं अपनी भी दूंगा और दूसरों की भी मैं दूंगा क्योंकि मेरी क्रिएशन है ना, मैं जानता हूं ना सबको । मैं तो सबको जानता हूं। मुझे ही तो भूले हो ना। अपने को भी भूल हो तो मुझे भी भूले हो । अपने को ही नहीं जानते तो मुझे क्या जानेंगे । self-realization ही नहीं है तो गॉड रियलीजेशन क्या होगा। जिसको सेल्फ रियलीजेशन नहीं, सेल्फ को नहीं जानते हैं तो गॉड को क्या जानेंगे। तो अपने को नहीं जानते हैं वो तो तुम्हारी लाइफ से सिद्ध है। अगर जानते होते तो लाइफ तुम्हारी खड़ी होती है अच्छी, बाप तो ऐसा कहेगा ना। अगर सेल्फ रियलाइजेशन है कि हम मनुष्य क्या है तो मनुष्य की लाइफ कितनी ऊंची होती है । नहीं, जानते हो तभी तो दुख अशांति में पड़े हो । तुम्हारा ना जानना तुम्हारी लाइफ से सिद्ध है। तुम्हारी लाइफ दुख अशांति में पड़ी है वहीं तो दिखलाता है कि तुम अपनी लाइफ को नहीं जानते हो। तो जिसको सेल्फ रियलाइजेशन नहीं है वह गॉड रियलाइजेशन क्या करेगा । तो इसीलिए बाप कहते हैं बच्चे अपने को समझो अच्छी तरह से और तुमको तुम्हारी समझ और मैं अपनी समझ मैं ही दे सकता हूं। तो इन सब बातों को अच्छी तरह से समझते और अच्छी तरह से बाप से अपना जन्मसिद्ध अधिकार पाने का अभी लगाओ और लगाकर के बाप से अच्छी तरह से बेहद का वर्सा प्राप्त करो, तो लेना चाहिए ना, तो लग जाओ। बाकी ऐसी ऐसी बातों में मूंझने की तो कोई बात ही नहीं है । बाप है बाप से अपना लेना है, लेना भी जरूर कर्म अच्छे करेंगे तब लेंगे, मुफ्त का थोड़ी ही मिलेगा । बाप है तो क्या ऐसे ही देगा? नहीं, वह बाप भले कहे जैसा है वैसा चलो यह बाप तो फिर इसका है ही अर्थ की बनेंगे इसीलिए तो बाप ने बैठकर के कहा है न कि बच्चे विकारों को और इन सब बातों को छोड़ो इन सब से निकलो तो यह सब समझने का है ना । आ करके बुद्धि योग हटाते हैं। छोड़कर कहां जाएंगे, दुनिया में तो होंगे ही ना, छोड़कर कहां जाएंगे। जिधर भी जाएंगे दुनिया में तो होंगे ना परंतु बाप कहते हैं बुद्धि से इसकी आसक्ति ममत्व छोड़ो। तो बुद्धि से छोड़ेंगे तो फिर तुम्हारे बुद्धि बल से फिर प्रैक्टिकल में नई दुनिया बसाऊंगा इधर अर्थात तेरे लिए नई दुनिया बनाऊंगा। तो अभी देखो नई दुनिया बना रहे हैं। अभी चलना है ना नहीं दुनिया में ? उसके लिए देखो बाप भी, बनाने वाला भी नया, कोई मनुष्य तो नहीं है ना । इतना समय हमको मनुष्य सुनाते हैं, अभी उनकी सुनते हैं परमात्मा की । तो अभी बाप सुनाता है तो उनका सुनाने वाला भी नया और बातें भी नई है । देखो नई बातें हैं ना जो सुनते आए परमात्मा सर्वव्यापी है, फलाना है यह बातें, जो भी कुछ सुनते आए। अभी बाप आ करके सब बातें नई कि नहीं, मेरा धाम है, मैं अपने घर का निवासी हूं, मेरा घर है, ठिकाना है ऐसे थोड़े ही है मेरा कोई ठिकाना नहीं है सब मैं वासी हूं । नहीं, हां सब में मेरी याद है वह बात एक अलग है बाकी मैं तो जो हूं वह तो मैं अपना निराकारी दुनिया का निवासी हूं। मेरा ऑक्यूपेशन यह है, मैं ऐसे हूं, सब बात बैठकर के बाप समझाते हैं।