अवतार की यात्रा

सिद्धी स्वरूप सूत्र सेट 3

21 और 22 जनवरी 2016 के लिए

मैं अर्न्तमुखी होकर एकान्त में नीचे दिये गऐ सूत्र का प्रयोग और अनुभव करता हूँ। एकान्त का यह अर्थ नहीं है कि मैं लोगों से और बातों से दूर हो जाऊँ, इसका अर्थ है संसार में रहते और काम करते मैं एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित हो जाऊँ। एकान्त का अर्थ है मैं अपने मन और बुद्धि को एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित करूँ।

सूत्र

(एकरस) + (एकता) + (एकान्तप्रिय) = वरदान

अभ्यास

एकरस: मुझे मालूम है कि मैं कौन हूँ और किसका हूँ। इस स्मृति से अचल और अडोल रहकर मैं प्रतिदिन अपनी आध्यात्मिक बैटरी रिचार्ज करता हूँ।

एकता: मैं स्वयं से और जो मेरे जीवन में तथा मेरे कार्य स्थल पर हैं उन सबसे सामंजस्य स्थापन कर लेता हूँ। मैं हरेक व्यक्ति की और उनके अनूठे योगदान की सराहना करता हूँ।

एकान्तप्रिय: मैं अपने मन और बुद्धि को इस साकारी शरीर में अपने निराकारी और आकारी स्वरूप के अनुभव की स्थिति में स्थित करता हूँ।

प्राप्ति

वरदान: बाप को यह शब्द बहुत पसंद है एक। जो इस एक के पाठ को पक्का करते हैं वे किसी भी बात में मुश्किल अनुभव नहीं करते। ऐसी भाग्यशाली आत्माऐं विशेष वरदान प्राप्त करती हैं और इसलिए वे निराकारी और आकारी को भी साकारी महसूस करती हैं।

अव्यक्त बापदादा


 

23 और 24 जनवरी, 2016 के लिए

मैं अर्न्तमुखी होकर एकान्त में नीचे दिये गऐ सूत्र का प्रयोग और अनुभव करता हूँ। एकान्त का यह अर्थ नहीं है कि मैं लोगों से और बातों से दूर हो जाऊँ, इसका अर्थ है संसार में रहते और काम करते मैं एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित हो जाऊँ। एकान्त का अर्थ है मैं अपने मन और बुद्धि को एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित करूँ।

सूत्र

(र्निविकल्प) + (र्निविघ्न) + (र्निविकर्मी) = श्रेष्ठ जीवन

अभ्यास

र्निविकल्प: मेरे मन और बुद्धि पूरी तरह से स्वच्छ और पावन हैं। विकारी विचार मेरे मन को छूते नहीं हैं और बुराईयां मेरी बुद्धि को आर्कषित नहीं करती।

र्निविघ्न: जो भी कर्म मैं करता हूँ उसके उसके आदि, मध्य और अंत के बारे में मैं जागरूक रहता हूँ। मीठे बाबा की याद में मैं मेरे द्वारा किये गऐ हर कर्म का स्पष्ट परिणाम देखकर विघ्न विनाशक बन जाता हूँ।

र्निविर्कमी: साकार में रहते भी मैं निराकारी स्थिति में स्थित होकर हर श्रेष्ठ कर्म करता हूँ।

प्राप्ति

श्रेष्ठ जीवन: धर्म का अर्थ है श्रेष्ठ जीवन जीने की कला। चैक करके देखो: क्या आप ब्रहामण जीवन जी रहे हो? ब्रहामण जीवन का अर्थ है जो सदा र्निविकल्प रहे, र्निविघ्न रहे और र्निविकर्मी रहे और साकार में रहते जो निराकारी अवस्था में रहे। इसे कहते हैं जीवन जीने की कला। यह एक ऐसा जीवन है जिसमें कोई इच्छा नहीं, जहां कुछ भी अप्राप्त नहीं और जहां आप सदा यह गीत गाते हैं: पाना था सो पा लिया।

अव्यक्त बापदादा


 

25 और 26 जनवरी, 2016 के लिए

मैं अर्न्तमुखी होकर एकान्त में नीचे दिये गऐ सूत्र का प्रयोग और अनुभव करता हूँ। एकान्त का यह अर्थ नहीं है कि मैं लोगों से और बातों से दूर हो जाऊँ, इसका अर्थ है संसार में रहते और काम करते मैं एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित हो जाऊँ। एकान्त का अर्थ है मैं अपने मन और बुद्धि को एक शक्तिशाली स्थिति में स्थित करूँ।

सूत्र

(सत) + (चित) + (आनंद) = परमानंद

अभ्यास

सत: सत्य अविनाशी है। मैं अपनी असली सतोप्रधान अवस्था में स्थिर रहता हूँ, इस बात की सत्यता में कि मैं कौन हूँ और भगवान कौन है।

चित: बिना अस्थिरता के मैं अपने चित में सत्यता को ज़िन्दा रखता हूँ। मैं बाबा को सत्य और अविनाशी के रूप में सदा याद रखता हूँ।

आनंद: जब निरंतर बाबा की स्मृति रहती है तो मैं आत्मा खुशी में नृत्य करती हूँ। मैं सचेतन और अतिन्द्रिय सुख का अनुभव करता हूँ।

प्राप्ति

परमानंद: मैं अतिन्द्रिय सुख का अनुभव करता हूँ। मैं निर्भय और शक्तिशाली महसूस करता हूँ। मैं दूसरे आर्कषणों के प्रकमपन्नों से अप्रभावित हूँ। मैं अपने पावन विचारों से ज्ञान के सागर में गोते खाता हूँ। प्यारे बाबा और ज्ञान का सागर मेरे संसार हैं।

अव्यक्त बापदादा