Sunday AV Murli Revision - Hindi - BK Dr Sachin - 14-10-18 - Part-1


ऊँ शांति

एक संन्यासी सारे विश्व की यात्रा कर पुनः भारत लौटा और भारत के किसी एक राज्य में रूका महेमान होकर । वहाँ का राजा उससे मिलने आया । राजाने कहा मेरा एक प्रश्न है । क्या तुम उत्तर दे पाओगे ? संन्यासी ने कहा पूछो । राजा ने कहा मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं । सन्यासीने  पूछा अभी मिलना चाहते हौ ? या थोडी देर के बाद, राजाने कहा शायद तुम गलत समज रहे हो । मैं इश्वर नाम के किसी व्यक्ति से नहीं स्वयं परमपिता परमात्मा से मिलना चाहता हूं । सन्यासी कहा मैं भी उन्हीं की बात रहा हूं, अभी मिलना चाहते हो या फिर थोडी देर के बाद । राजाने कहा मै बीस वर्ष से खोज कर रहा हूं और मुझे मिलना है । मुझे ईश्वर कौन है ? और क्या है, ये समझाने प्रयत्न कृपया न करें । मुजे सीधा मिलना है क्यों कि ये समझानेवाले बहोत है । तो सन्यासी ने कहा मैं तुम्हे मिला सकता हूं । राजाने कहा अभी मिलना है, सन्यासी ने कहा की तुम अपना नाम अपना पता अपनी उपाधियाँ एक कागज पर लिख दो क्यों कि मुझे भी तो उधर बताना पडेगा ना ? क्यों कि मेरा तो काम ही यह - लोगो को भगवान से मिलाना ! पर जिसको मिलाने जा रहा हूँ उसका नाम पता भी तो चाहिए । तो राजा अपना नाम, अपने राज्य का नाम अपनी उपाधियाँ सब कुछ लिखकर देता है । सन्यासी कहता है यह सब तुमने जूठ लिखा है । वो कहता है नहीं यह सत्य है । सबसे पहले तो तुम्हरा नाम, सन्यासी पूछता है यदी तुम्हारा नाम बदल जाए तो क्या तुम बदल जाओगे  ? वो कहता है नहीँ । और नाम बदलने से भाग्य तो नहीं बदलता  ? इसका मतलब तुम ये नाम नही, इसका बतलब तुम ये शरीर नही, वो कहता है हाँ बात तो सही है । दुसरा वो लिखता है, मैं राजा हूँ, आज तुम राजा हो, कल राजा नही रहोगे तो क्या तुम बदल जाओगे ? वो कहता है नही । इसका मतबल तुम राजा भी नही । ये तुम्हारे राज्य का नाम, आज राजा हो कल कुछ भी नही होंगे ये राज्य नही होगा तो क्या तुम बदल जाओगे ? इसका मतलब ये राजा भी तुम नही, ये राज्य भी तुम्हारा नही । संन्यासी पुछता है आप की उम्र कितनी है ? वो कहता है 40 वर्ष, तो क्या 10 वर्ष पहले जो तुम थे और 10 वर्ष बाद जो तुम होंगे तब तुम बदल जाओगे ? राजा कहेता है मैं तब भी वही रहुंगा इसका मतलब तुम नाम नही, तुम राजा नही, ये राज्य तुम्हारा नही, ये शरीर तुम्हारा नही, ये उम्र भी तुम्हारी नही । पहले तो ये लिखो की तुम क्या हो, तब में जाकर भगवान से तुम्हारा मिलन कराउँगा । नही तो में जुठा पड़ जाउंगा, अगर तुम ऐसी जुठ बातें, लिखोगे और वही मैं भगवान को बताउंगा । तो राजा कहता है सोचता है यही तो पता नही मैं हूँ कौन । सन्यासी कहता है जाओ पहले ढूँढो तुम कौन हो । जिस दिन तुम ये जान जाओगे कि तुम कौन हो, भगवान कौन है, यह सतह पता चल जाएगा जिस दिन ये जान जाओगे कि तुम कौन हो, भगवान से मिलन सतह हो जाएगा ।


पता नही वो राजा स्वयं को जान पाया या नही, पता नही उसे अपनी पहचान मील पाई या नही, पर जिस दिन मनुष्य स्वयं को जान जाएगा, स्वयं के वास्तविक परिचय को, स्वयं के वास्तविक स्वभाव को, स्वयं के मैं को और उसी के स्वयं में स्थिर हो जाएगा तब भगवान से मिलन सतह हो जाएगा । जिसे हम जान रहे वो शायद मेरा वास्तविक स्वरूप नही । तो आज की सुबह की मुरली मैं कौन, तुम कौन और वो कौन - ये जब तुम जानोगे - अभी नहीं बाद में  जानोगे, जब दर्द बहोत बढेगा । दुनियावाले लोग आकर तुमको बताएंगे तुम कौन और वो कौन तब तुम अपने महत्व को जानोगे अपनी श्रेष्ठता को जानोगे । अभी तो साधारणता मे हो और अभी अलबेलेपन मे हो । इस लीए अपनी वैल्यू और अपने दिये खजाने में मिले हुए खजाने की वैल्यू को तुम जानते हो ।
 


तो आज हम दो मुरलीयां रिवाईज करेंगे । एक तो नीचे जो अभी 12 तारीख 31-october-2006 की अव्यक्त वाणी और एक आज की अव्यक्त वाणी 18 फरवरी 1984 । अंतर बहोत है, दो मुरलीओमें ।

तो आज क्या कहा बाबाने ? क्या कहा है ?  कोन किससे मिलने आया है, स्नेह का सागर, स्नेह स्वरूप बच्चों से मिलने आया है, प्यार का सागर, प्यार के प्रभु प्यार के पात्र बच्चों से मिलने आया है । कभी इधर तो कभी उधर, कौन सी बाते किस मुरली की है, वो मन में खुद ही ढूंढना । तो प्रेम सागर परमात्मा प्रेम के पात्र बच्चों से मिलने आया है । स्नेह का सागर किससे मिलने आया हे आज ? स्नेह स्वरूप बच्चों से मिलने आया हे । तुम यहां कैसे आकर पहुंचे हो ? स्नेह के विमान में, स्नेह चुंबक है, स्नेह विमान है, स्नेह की खींच है । दुनिया  के लोग भगवान को ढूंढ रहे है और भगवानने तुम को ढूंढ लीया । वो गायन कर रहे है और तुम, गोद में बैठे हो । वो आओ.. आओ...  कह रहे है और तुम, तुम्ही से बेठू खाऊ, खेलूँ । वो दर्शन की प्यासी आत्माए है, और तुम दर्शनीय मुरत बन गए हो । अब थोडा दर्द और बढने दो, तो क्या हो जाएगा ? वो भाग भाग के आएँगे । किस के लिए ? एक सेकंड की दृष्टि और एक सेकंड के दर्शन के लिए । साक्षात का स्वरूप बन जाओगे, तब जानोगे अपने महत्व को । खजाने के महत्व को, एक एक महावाक्य के महत्व को, एक एक श्वास ब्रह्मण जीवन का, एक एक सेकंड के महत्व को ।

तो आंख खुलते ही बीस्तर के बाजु में क्या देखना है ? स्नेह का विमान खडा है, क्या देखना है अमृतवेला ? आंख खुली और स्नेह का विमान एक तरफ और दुसरी तरफ सीडी कौन सी सीडी ? दुआओं की सीडी । बटन दबाओ स्मृति का और तीनों लोक की सैर । दुआएँ सीडी का काम करती है । स्नेह की निशानी ही है कि तुम दौड़ दौड़ कर आए हो । स्नेह कितना है ? कौन सा गीत ?  न आसमान में तारे और नाही सागर में जल इतना, जितना बेहद का प्यार, इतना बेहद का स्नेह । तो स्नेह क्या है ? रूहानी चुंबक । तो सुबह सुबह देखना । दो रूहानी चुंबक परम चुंबक है और मुजे क्या कर रहा है ? खींच रहा है । बीस्तर नीचे और में उपर, खींचकर । तो स्नेह के विमान में बैठना, स्मृतिका स्विच ओन करना । तीनो लोको की सैर करना । किसमे आए हो ? साधारण विमान में नहीं । स्नेह के विमान में आए हो । इस स्नेह ने तुम्हे परमात्मा स्नेही बना दीया है । ईस स्नेह से याद सहज है, ईस स्नेह से योग सहज है । यह स्नेह के 4 घटक है, कौन से ? ऐसा निस्वार्थ स्नेह ओर कहीं नहीं ।

आज कहा, सच्ची आत्मिक शांति । कैसी शांति ? अविनाशी । यह स्नेह कैसा है अविनाशी, अविनाशी दिल का स्नेह है, सच्चा स्नेह है । उपर उपर का नही है । यह परमात्मा के स्नेह की विशिष्टता है । इस स्नेह से खींच खींच कर आ गए हो । पर उसमें एक एडिसन करनी है और उसमे अन्डरलाईन करनी है । कौन सी  ? अखंड महादानी बनो और अखंड सहयोगी बनो । इस परिवार में सहयोगी और संसार की प्यासी आत्माए, तडपती आत्माए, जो पुकार रही है, हे कृपा के देव ! हे कृपा की देवी ! चिल्ला रहे है, पुकार रहे है । क्या दे दो ? सच्ची शांति । आज तो कहा, शांति और खुशी और उस दिन कहा था, प्यार और शक्ति ? उन्हें दो, क्यों कि प्यासी है, क्यों कि अतृप्त है, क्यों कि अतृप्ती की प्यासी है और तुम प्राप्ति स्वरूप आत्माए हो । तुमने पा लीया है यही सबसे बड़ा पुन्य है । ऐसे पुन्यतामा बने हो ? अशांत मन को शांत कर देना, स्थिर कर देना चित को । यह हमारा कार्य है । जब ये करोगे तब डबल फायदे होंगे, कौनसे ? उनका भी कल्याण होगा और तुम्हारे अपने विघ्न समस्या से तुम मुक्त हो जाओगे । महेनत से मुक्त हो जाओगे । किसी अव्यक्त वाणी में बाबा ने कहा था, जो ब्राह्मण अपने जीवन को संपूर्ण समर्पण कर देते है, वौ अपने अधिकार को ज्यादा याद रखते है, दाइत्व को कम । अधिकार बहोत याद रहते है, कि ये ये मेरे राइट्स है, ये मुजे मिलने चाहिए । परंतु दाइत्व को कम याद रखते है ।

तीन स्वमान दिये बाबा ने और ड्रील कराई थी । कौन से वो स्वमान थे ?  ऊँचे स्वमान । मैं.. कैसा सन्नाटा छा गया था, जब बाबा ने ड्रील कराई ।  भगवान स्वयं आकर स्वमान दे रहा है । भगवान स्वयं आकर कह रहा है कि, तुम फरमानबरदार, वफादार, तुम आज्ञाकारी और तुम अमुल्य रतन हो । कौन से अमुल्य रतन ? बाप के गले में जो माला है उस माला के अमुल्य रतन । ऐसे विजयी रतन तुम हो । अभी ऐसे स्वमान में रहते हो ? ऐसे स्वमान याद है कि तुम हो कोन ? भगवान कह रहा है - तुम ओबिडीयंट, आज्ञाकारी, तुम फैथफुल, वफादार जो वफा करते है, जो फरमानबरदार, ट्रस्ट वर्धी और तुम वो अमुल्य इनवैल्यूऐबल ज्वेल । तो तीन स्वमान दिये थे और ड्रील कराई थी । कौन से स्वमान थे तीन ? मैं संगमयुगी पुरुषोत्तम श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हुं । केवल इतना भी याद रहे तो स्थिती ऊंची रहेगी । स्थिती का आधार संकल्प है । जब संकल्प मलीन होते है तब स्थिती गिरती है । जब संक्लपो में देहभान आता है, तब स्थिति गिरती है । जब संकल्पो में आत्मस्मृति नहीं रहती, तब आत्मा गिरती है ।

एक छोटा सा बच्चा अपने घूटनों पर रेंगता हुआ देखता है सूरज की किरनों में उसकी पड़छाई को । अदभूत आश्चर्य होता है उसे, ये कौन है ? और सोचता है इसको पकडुं और इसके मस्तक को पकडुं । और भागता है, पकड नही पाता, रोने लगता है, क्यों कि जितना पकडने का प्रयत्न करता है फाँसला और बढ़ता है, जितना और आगे जाता है, वो पड़छाई और आगे जाती है । रोने लगता है क्या करूं ? एक भिक्षु द्वार पर आता है और वो देखता है, छोट़ा सा बच्चा रो रहा है और अपनी पड़छाई को पकडने का प्रयत्न कर रहा है । अपनी मस्तक को - संन्यासी आता है, उसका हाथ उठाता है और उसी के मस्तक पर रख देता है । और पड़छाई पकड़ में आती है । स्वयं की ही आत्मा पर हाथ रख दो । पड़छाई शरीर है, जिसके पीछे चेतना भाग रही है । और पड़छाई के पीछे भागना अर्थात आत्मनाश । पड़छाई के पीछे भागना अर्थात आत्मविनाश । पड़छाई को सत्य समझ लेना अर्थात आत्मा का हनन । हाथ मस्तक पर रख देना, आत्मा पर रख देना । नहीं तो अंतरआत्मा एक तरफ आध्यात्म की उंचाई चड़ती है, तो दूसरी तरफ देहभान की घाटीयों में भी गिरती है, नीचे । इसलिए देहभान की घाटी में उसे गिरने नहीं देना ।


तो बाबाने याद दिलाये तीन स्वमान ।
पहेला स्वमान तुम ब्राह्मण हो ।
दुसरा स्वमान - कोन सी ड्रील कराई बाबाने - मैं फरीश्ता हुं, डबल लाइट ।
तीसरा स्वमान -  विश्व कल्याणकारी आत्मा हुं ।


क्या करना है मन्शा से ? शक्तियो की किरणें फैलानी है । ये तीन स्वमान, ये तीन अभ्यास, ये तीन ड्रील l जिससे तुम क्या बन जाओगे ? क्या आ जाएगी ? कंट्रोलिंग और रूलिंग पावर आएगी । स्वयं पर शासन, स्वयं पर अधिपत्य, स्वयं के राजा तुम स्वयं बन जाओगे । तो क्या कहा आज की मुरली मे बाबा ने ? स्नेह का सागर, स्नेह स्वरूप बच्चों से मिलने आया है । तुम उस बाप को याद करते हो और बाप रिटर्न में क्या करते है ? पदम गुना रिटर्न देते है तुमको, नीचे आके तुम से मिलने । और एक कमाल कर दी तुमने जबरदस्त । वो कौन सी ? बाप तुमको, अशरीरी और निराकार बनाते - आप समान । पर तुम क्या करते हो ? उसकी पूरी चाल को तुम क्या कर देते हो ? परास्त कर देते हो । वो आया है निराकार बनाने और अशरीरी बनाने और उसके खेल का पासा ही पलट देते हो तुम। तुम उलटा ही काम कर देते हो । वो कौन सा ? तुम उसी को, वो जो निराकार है, उसको क्या कर देते हो ? आकारी और निराकार को साकार आप समान बना देते हो । ये है बच्चों की कमाल । बाप ऐसी कमाल देख कर हर्षित होते है । कैसे बच्चे बाप की रंग में रंग कर बाप समान फोलो फाधर कर रहे है । तो उसकी चाल उलटी पड गई । संसार की यात्रा तुम्हे नशा और ख़ुशी रहनी चाहिए । ये दुनियावाले उसको ढूँढ रहे है, और उसने तुमको ढूंढ लिया । ऐसे सारे अपने स्वमान याद रहते है ? बाबा ने पूछा है प्रश्न ।

स्वमान संपूर्ण योग है । स्वमान आत्मा का नशा है । स्वमान दो चीजों को नष्ट कर देता है । कौन सी दो चीजें ? अभिमान और अपमान । जो स्वमान में हैं उनका कोई अपमान नहीं कर सकता । जो स्वमान में है उन्हे अभिमान भी नहीं आ सकता क्यों कि स्वमान शुद्ध नशा है । मौलिक नशा, ओरिजिनल स्टेज है  -आत्मा की । तो उस स्वमान में स्थित रहना और जो साधारणता है उसे समाप्त करना । और जो अलबेलापन आ गया है उसे समाप्त करना । क्यों कि ये साधारणता है ये अलबेलापन है, इसलिए अपने महत्व को नही जान पा रहे । स्वयं, स्वयं के महत्व को जानना । स्वयं, स्वयं को मान देना अर्थात स्वमान । किसी और के मान की आवश्यकता नही । स्वयं, स्वयं को मान देना है, स्वयं स्वयं को जानना । अपनी महानता को जानना, अपनी श्रेष्ठता, अपनी विशिष्टता को जानना ।

एक एक महावाक्यो के महत्व को जानना । क्या कहा बाबा ने ? एक एक महावाक्य का महत्व है । एक एक श्वास का महत्व है । एक एक संकल्प का महत्व है । जन जन की प्रारब्ध बनाने का आधार है । तो ये याद रहता है याद स्वरूप हो ? जो याद स्वरूप है वो कभी कुछ बोलते नहीं । इमबोड़ीमेंट ऑफ़ अवेरनेस । निरंतर अवेर है, निरंतर स्मृति स्वरूप है । निरंतर आपको याद दिलाते रहना - मैं कौन हुं ? मेरा स्वधर्म, स्वरूप, स्वलक्ष्य क्या है ? वो जो भक्ति मार्ग के सत्संग है, बाबा हंमेशा कहते है उनका कोई ऐईम ऑब्जेक्ट  नही । निरलक्ष्य है । वो तुम्हारा लक्ष्य है । तो लक्ष्य को नही भूलना ।

तो स्वमान का अभ्यास । तीन स्वमान बाबाने दिए । उन तीन स्वमान का अगले पंदरह दिन तक अभ्यास करना । मैं संगमयुगी श्रेष्ठ पुरुषोत्तम ब्राह्मण आत्मा हुं । पुरुषोत्तम हुं, अर्थात् पुरुषो में उत्तम । संगमयुगी अर्थात संसार के कलयुगी - में वो नहीं, में अलग, में श्रेष्ठ, में छोटा नही, नीच नहीं । मै फरिश्ता - जिसका देह से कोई संबंध नही, जो देहभान में नही । तीसरा मुजे क्या करना है ? विश्वास कल्याण । एक  ही संकल्प हो । हर संकल्प और हर श्वास - हर सेकंड - किसके लिए ? विश्व कल्याण प्रति, क्यों कि महान कार्य करने है ।

पांच काम करने है, कौन कौन से ? मन्शा से शक्तियाँ फैलानी है । आत्माए बहोत कमजोर है, बल नही है । निर्बल को शक्तिशाली बनाओ । दुःखी को सुखी बनाओ अशांत को शांत । तुम शांति का समागम करो । शांति का शिबीर करो, शांति की एडवरटाइजमेंट करो और क्या करो शांति का ? शांति का सप्ताह । क्यों कि तुम शांति कुण्ड में आये हो । तुम स्वयं शांत स्वरूप । स्वयं को पावरफुल बनाओ अपनी व्रति से वायु मंडल को शक्तिशाली बनाओ । पावरफुल स्वयं बनो । अटेन्शन और बैलेंस । तो बडे बडे काम करने है । तो सबसे पहेली चीज, तीन स्वमान का अभ्यास ।

दुसरी चीज - स्नेह के विमान में बैठने का अभ्यास । स्नेह विमान है तो आँख खुलते ही देखना विमान खड़ा हुआ है । पाइलट बैठा हुआ है, होर्न बजा रहा है, अलार्म बजा रहा है, बिगुल बजा रहा है । रणभेरी बज रही है । कॉल ऑफ़ टाइम - जल्दी उठो क्यों कि टाइम हो रहा है । फटाफट बोर्ड करो और उडो । तो उठते ही सबसे पहले देखना है कि विशाल शुभ बडा सजा सजाया सा विमान खड़ा है । और बापदादा पाईलट बन कर हमारी वेट कर रहे है - बस । लास्ट पेसेंजर आप ही हो । बाकी सब बैठ चुके है । और उडो । तीनो लोको की सैर ।

दुसरा अभ्यास करना है । वो महा चुंबक है, खींच रहा है, खींच रहा है । और उसके प्यार में मगन हो जाना । प्रेम फाउंडेशन है, बाबाने कहा है इस जीवन का । ब्राह्मण जीवन का क्या है ? फाउंडेशन है । इस प्रेम ने ही तुम्हे परमात्मा स्नेही बना दीया । तो उस प्रेम का चिंतन करना । कैसा संसार का प्रेम स्वार्थी है, झूठा है, दिमागी है, धोखेवाला है, स्वार्थी है । और ये परमात्म प्रेम ? वो विमान आया है, बैठो और उडो - प्रेम के विमान में । तो ये कुछ अभ्यास करने है ।

पांच प्रकार के अनुभव करने को - बाबाने - अनुभव कराने को कहा । कौन कौन से अनुभव कराना है ?  नवीनता क्या लाओगे सेवाओ में ? आत्माओ को अनुभव कराना है । क्यों कि अनुभव आगे बढता है, अनुभव भूलता नही, वो अनूभव खींचता है । स्वयं भी अनुभव करना है और दुसरों को भी अनुभव कराना है । पर अनुभव करा वो सकते है जो स्वयं अनुभवीमुर्त है । शांति वो दे सकते है दुसरों को - जो स्वयं शांत स्वरूप है । तुम शांति कुण्ड में आए हो । तो कितना शांत होने चाहिए ? यह शांति कुण्ड है, सच्ची शांति का अनुभव ।


तो पांच प्रकार के अनुभव आत्माओ को कराने है और स्वयं भी करने है ।


तो सबसे पहला। एक एक ज्ञान के पॉइंट का अनुभव ।

जो मुरलीयां सुनते हो, महावाक्य है, एक एक साधारण शब्द नहीं है, भगवान के कहे हुए शब्द है । 5000 साल में पहली बार भगवान के शब्द कानो में पडते है । परमात्म वेद सुनाई देता है । परमात्मा गोसपील परमात्मा बाइबल । वो गुंजन वो ध्वनी ईश्वरीय, अव्यक्त है, अनहद, अनाद है । तो साधारण से नही ले लेना । साधारणता है, खजानों को समझने में । साधारणता है स्वयं को महत्व का समजने में । तो भगवान के एक क वाक्य का क्या करना है ? अनुभव करना है । जैसे ही मुरली पढो - प्रेम का सागर आया है, रुक जाओ आगे नहि बढो । धीरे धीरे । कौन आया है किससे मिलने आया है ? प्रेम स्वरूप बच्चों से प्रेम के पात्र बच्चों से । क्या में प्रेम के पात्र बना हुं ? क्या एसा परमात्म प्रेम अंदर भरा है ? रुक रुक के धीरे धीरे चिंतन करते हुए, मनन करते हुए, ऐकांत में अंतरमुक्ता की गुफा में बैढ कर, इश्वरीय महावाक्यो का अध्ययन - समाना है । जल्दी जल्दी में नही पढ लेना । जल्दी जल्दी में सुन नही लेना, धीरे धीरे । तो सब से पहला कौन सा अनुभव करना है ? ज्ञान के एक एक पोइंट का, ज्ञान के एक एक लाईन का, एक एक वाक्य का, केवल परमात्मा के ही वाक्य है जिन्हे महावाक्य कहा जाता है । किसी देहधारी के वाक्य को महावाक्य नही कहा जाता । ऐसा ये दिव्यज्ञान है । तो ज्ञान की पोइंट का अनुभव, एक लाईन पढना और रुक जाना । जगह जगह पर स्लोगन लिखे हुए है । एक स्लोगन पढना और उसके उपर चिंतन करते हुए आगे बढना । तो स्थिति शक्तिशाली रहेगी । नहीं तो सारे दिनभर हजारो बातें आती है, जो स्थिति को गिरा देती है । व्यक्ति आते है, परिस्थितीयाँ आती है जो नीचे गिरा देती है । तो सुरक्षा का कवच - ज्ञान तलवार है, योग कवच है, ड्रामा ढाल है । इन तीन से तुम माया से युद्ध करो - किसी मुरली में बाबा ने कहा है । ज्ञान तलवार, योग कवच और ड्रामा ढाल । इमर्जन्सी में क्या काम आती है, ढाल ? सोए हुए है और अचानक शत्रु आक्रमण कर दे तो क्या करना पड़ेगा । तलवार तो कहाँ ? और कवच ? वो भी ठीक, परंतु इमर्जन्सी में क्या काम आता है, ढाल ? तो ढाल चाहिए । अचानक कोई अपमान कर दे, अचानक कोई धोखा दे दे, अचानक कोई आरोप लगा दे, अचानक लांछन लगा दे, तो क्या करोगे ? ढाल चाहिए । माया सबको आती है । गृहस्थ में रहने वाले कहते है, हमें माया ज्यादा है, पर कुमार कुमारी भी माया से छुटे हुए नही है । उन से भी ज्यादा है । कब लांछन लग जाए । सहन करना पडे पता नही । इसके लिए क्या चाहिए ? ढाल । पहला अनुभव - ज्ञान के पॉइंट का । जो रोज की मुरली में जो वाक्य आते है -  एक वाक्य ऐसा ले लेना और उस पर ऐसा गहरा चिंतन करना । और चिंतन करने के लिए जरूरी नहीं कि बहोत समय मिल जाए । चलते, फिरते, उठते, बैठते सारे सेवाए करते हुए चिंतन । दीनभर चिंतन करो - बाबाने कहा है । किसी एक मुरली में बाबाने कहा था - बाप के कमरे में बैठकर ज्ञान का चिंतन करो । बाप से रुहरुहान भी करो और बाबा से उसके ज्ञान का चिंतन भी करो । तो ज्ञान के पॉइंट्स की अनुभव पहले खुद को करना और फिर औरों को कराना ।

दुसरा - गुण ।

एक एक गुण का अनुभवीमुर्त - वो बोर्ड लिस्ट लगी हुई है । चलते फिरते एक दिव्य गुण देख लेना और उसके विषय में सोचना ।

तीसरा शक्ति

किसी एक शक्ति को ले लेना, जैसे पवित्रता की शक्ति । क्या मेरे अंदर ब्रह्मचर्य पवित्रता की शक्ति बनी है ? क्या मेरे अंदर पवित्रता शक्ति के रुप में अनुभव होती है ? पावर ।

चौथा आत्मिक स्थिति का अनुभव

क्या करना है ? आत्मिक स्थिती का अनुभव । स्लोगन क्या था आज ? साक्षी होकर आत्माओं के पार्ट को देखना । कैसा विचित्र ड्रामा है - वंडरफुल । कैसा पार्ट है  आत्माओं का - भिन्न भिन्न । कैसा खेल चल रहा है सृष्टि मंच पर ? किसी मुरली में बाबा ने कहा था जब अच्छी सिन आती है तब वाह वाह करते हो, जब बुरी सिन आती है तो वाह वाह क्यों नही करते ? क्यों कि साक्षी स्थिति खो जाती है । साक्षी सिट से उतर जाते हो । सारे ड्रामा को साक्षी होकर देखना आत्मिक स्थिति में स्थित होना सब को आत्माए देखना ये सब आत्माए है सब अपना अपना पार्ट प्ले कर रही है ।  किस का कैसा पार्ट किस का कैसा - किसका पार्ट कब खुलेगा ? वो भी पता नही । तो साक्षी स्थिति का अनुभव - स्वयं करना और दूसरों को भी कराना ।  जब कोर्स करते है तो सूचनाएँ देने का लक्ष्य कम रखना है । अनुभव कराने का लक्ष्य ज्यादा रखना है । जो कहानी शुरूआत में बताई थी वो कोर्स कराने वाले सुना सकते है । काम आयेगी । क्यों कि, वो आत्माके परिचय की कहानी है । तो आत्माओं को क्या कराना है ? अनुभव कराना है । आत्मा का पार्ट चालु है, थोडा सा आत्मा के विषय में बताओ और अनुभव ज्यादा कराओ । शरीर से आत्मा डिटेच हो जाए, अलग हो जाए, अनुभूति हो जाए, सन्नाटा छा जाए । शरीर से अलग होने का अभ्यास । यही वास्तविक अभ्यास है, बाकी सब विस्तार है । उस मुरली में भी बाबा ने कहा - एक सेकंड में हलचल में अचल । एक  सेकंड में अभ्यास करो । स्वमान मे स्थित होने का । शरीर से अलग हो जाने का । जैसे कौई डेड बोडी है, आत्मा चली गई, सन्नाटा छा गया । ऐसा अनुभव - विशेष रुप से अमृतवेला  - जैसे शरीर है ही नही । ईतना देह से डिटेच, शरीर की सारी हलचल समाप्त हो जाए - द्रष्टि भी स्थिर हो जाए ।  तो ये चौथा अनुभव ।

पांचवा - परमात्मा प्रेम का अनुभव

हम दुसरी आत्माओं को इश्वरीय प्रेम का अनुभव उतना ही करा सकते है जितना उस परमात्म प्रेम को हमने अपने अंदर भरा है ।, यदी हमने अपने अंदर परमात्म प्रेम को पूरा नहीं भरा है, उस प्रेम के साथ साथ संसार का प्रेम भी समाया हुआ है, उस प्रेम के साथ संसार की व्यक्ति भी समाये हुऐ है, तो ईश्वरीय प्रेम का अनुभव आत्माओं को कैसे करा सकेंगे । व्यक्तियों का प्रेम, वस्तुओ का प्रेम, वैभवो का प्रेम, संसार के साधनों का प्रेम । जब हृदय इन सब से रिक्त हो जाए और वहां ये ईश्वरीय प्रेम समा जाए - निस्वार्थ सच्चा दिलका। तब दुसरों को अनुभव करवाया जा सकेगा । बाबा के महावाक्य बार बार याद आते है, बाप को इतना प्यार से याद करो इतना प्यार से याद करो की आँखो से मोती, आँसु झर झर गिरने लगे । कितनी बार रोना चाहीये दिन में बाबा के लिए ? कम से कम एक बार । कम से कम एक बार लगन में मगन । प्यार में मगन । प्यार में खो जाना - इतना खो जोना इतना खो जाना कि आँसु बहने लगे । एसे जो आँसु है वो मोती बनेंगे । वो कहां रखयेगा इन मोतीयों को ? उसके दिल में छोटी सी डिब्बी है उस डिब्बी में - संजोके रखीयेगा । और तुम को बाद में बतायेगा - ये तुम्हारे है पहेचान लो । अब जो साँसु बहा रहे हो संसार के लोगों के लिए वे झुठ है । ये है वास्तविक तुम्हारे सच्चे आँसु । तो परमात्म प्रेम का अनुभव करना है, रूह रूहान अर्थात् रूह की रुह से रुहान - शब्द नहीं अर्थात् बोल नही अर्थात आवाज नही अर्थात चुप्पी, मौन - मौन वार्तालाप I आई शेल स्पीक टू इन साइलेंस । मौन में बात करना, मौन में समाना, उसके साथ एकरूप ।


तो ये पांच अनुभव करने है, और रोज करने है - ये पांच काम । मुरली का पॉइंट लेना, अनुभव करना । गुण लेना, अनुभव करना । शक्ति लेना अनुभव करना । आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाना । मधुबन के आंगन में - वहा बैठना । और ये सोचना ये आत्माए है - कितनी महान आत्माए । कितना महान तीर्थ । पोलैंड और वो जो ग्रुप आया उसे बाबाने कहा कितने भाग्यशाली हो कि इस भूमी पर आकर पहोंचे हो । ये महान आत्माओं का समागम है । ईश्वरीय परिवार है । एसी श्रेष्ठ आत्माओं की मंजूषा - ये परिवार है । आत्मिक स्वरूप का अभ्यास और पांचवा परमात्म प्रेम का अनुभव । उसने क्या क्या दिया है उसका चिंतन । अपने भाग्य का चिंतन, प्राप्तियों का चिंतन - ये तीन काम ।

तो पांच चीजो का अनुभव करना है और पांच चीजे आत्माओ को देनी है, कौन कौन सी ? मन से क्या कहा ? शक्तियां । वाचा से ज्ञान । कर्म से गुन । संबंध संपर्क से खुशी और पांचवी चीज जो सबसे नई है ?  बुध्धि से समय

बुध्धि से समय - ये क्या चीज है ? दादीयां कितने सालो से मुरली सुना रही है, कितनी सारी बार मुरलीया रिपीट हुई है । फिर भी हम दादीयों के मुख से एक बात सुनते है कि बाबा ने कैसे या नई बात आज कह दी ? कौन कह रहा है ये ? दादीयाँ - मुरलीयो की बीच में कई बार आती है उनके लिए भी नई लगती है - ये बाते । तो बुध्धि से क्या करना है ? समय का दान अर्थात् दिव्य बुध्धि से समय देना । दिव्य बुध्धि से किसी की मुश्किल, किसी की हलचल को समाप्त करना । किसी मन को शांत कर देना, अशांत जो मन है, बेचेन जो मन है, दुःखी जो मन  है, समस्या युक्त जो मन है, उसको समाधान स्वरूप कर देना - अपनी दिव्य बुध्धि से उसे समय देकर । तो इन पांचो मे से सबसे बड़ा दान कौन सा है ? बुध्धि वाला, और ज्ञान जो है वो क्या कम दान है ? वो इसमें समाया हुआ है, और मन से शक्तिया देना वो भी समय देने में समाया हुआ है और कर्म से गुणो का दान भी उसी में समाया हुआ है, तो दिव्य बुध्धि बनानी है । अपनी बुध्धि को क्या करना है ? दिव्य बुध्धि बना देनी है । एक अभ्यास और है जो सुबह भी बताया था, उठते ही एसा अनुभव करे जैसे एक अदृश्य हाथ आसमान से आ रहा है । और कहां रख दीया है ? दिव्य बुध्धि पर । क्या कहा उस हाथ ने ? दिव्य बुध्धि भव ।

तो रोज की मुरली से योग के अभ्यास निकालने है । एक ही तरह का योग नही करते जाना है । बाबा कहते है नवीनता करो - नवीनता करो । योग में नवीनता - योग के प्रयोग में नवीनता - रचनात्मक योग में, सेवामें नवीनता, ज्ञान में, नवीनता, चिंतन में नवीनता, मनन में नवीनता । और एक जो चीज हर एक को करनी है सारे दिन में ज्ञान के विषय में - ज्ञान की चर्चा अपने साथीयों के साथ । जब समय मिले तो संगठन में दो लोग, तीन लोग, चार लोग, पांच लोग, बैठे और चर्चा चालु कि आज बाबाने क्या कहा । ये चर्चा बहोत जरूरी है, और हर दिन की मुरली पर चर्चा होनी चाहिए । हर दिन की केवल सूचना और लिखना पर्याप्त नही है । क्यों कि बहोत सारी बातें बिना चर्चा के बिना, डिस्कशन के बिना उसकी गहराई में जाए क्लीन ही नही होती है । क्योकिं इश्वर महावाक्य इतने सूक्ष्म है पकड़ में नही आते ।

तो पांच चीजों का दान, पांच चीजो का अनुभव, तीन चीजें स्वमान, और आज आगे क्या कहा फिर बाबा ने ? पोलैंड वालो से मुलाकात और बाकी जो नए बच्चे हैं उनसे मुलाकात की । क्या क्या कहा, सबसे पहले तो इस स्थान का महत्व बताया, तो स्वयं को निरंतर याद दिलाते रहेना - में यहां कहाँ आया हुं । ये जो स्थान है, तपस्या कुण्ड है । ब्रह्मा की चरित्र भूमि - कर्म भूमि - कर्मातीत भूमि है । यहाँ पर वो वाइब्रेशन है - वो आवाज भी सुनाई दे सकती है । यदी कर्म इतने सूक्ष्म हो जाए तो क्यों कि सृष्टि मे प्रकृति मे वो प्रिंट अभी भी है - वोईस प्रिंट । कोई आपने आप को इतना स्थिर कर दे, सूक्ष्म कर दे तो वो आवाजे सुनाई भी देगी, भगवान क्या कहता है ? तो इस भूमि की महत्व को जानना, तीर्थ के महत्व को जानना । पुन्यभूमि, वनपंथ - जहाँ जहाँ राज, जहां जहां तूम धारा -भक्ती में कहावत है कण कण में भगवान । वो यहां का गायन है, तो एक बात । तो ये दुसरा - याद अभ्यास को क्या करो ? बढाओ - कैसे बढाएगे ? थोडा थोडा कर के और कैसे बढाएँगे याद के अभ्यास को । योग के चार्ट को बढाना । ज्ञान कितना भी हो और चिंतन कितना भी हो, परंतु जब तक बीज रुप स्थिति नहीं और जब तक शक्तिशाली योग नही वो विकर्म विनाश नही होंगे । इसके लिए योग के चार्ट  - किसी एक मम्मा की मुरली में मम्माने कहा है - तुम इतना पुरुषार्थ करते हो, इतना अमृतवेला उठते हो, इतनी मुरली सुनते हो लीखते हो, पढते हो, सारे दीनभर कर्मयोग करते हो, बीच बीच में अटेन्शन रखते हो, फिर भी एसा क्यों हो जाता है कि कोई एक छोटी सी बात से डिस्टर्ब हो जाते हो । और इतना सारा जो तुमने पुरुषार्थ किया, एक छोटी सी बात तुमको डिस्टर्ब कर देती है ।  ड्रामा के पार्ट को पक्का करो । कुट कुट के भरना है, जो हो रहा है कल्याणकारी है । कोई भी चीज डिस्टर्ब न करें । याद के चार्ट को बढाना है । ये भूल नहीं जाना है की सेवा धी फोर्थ सब्जेक्ट है । धी फोर्थ को धी फर्स्ट नही बना देना । क्यों कि लोग ज्ञान, योग और धारणा छोडकर सेवा में उतरते है और सेवा में खो जाते है ।

और जो दो बाते बाबा ने कही - साधारणता और अलबेलापन । कोन सा अलबेलापन आ जाता है ? अलबेलापन के उदाहरण ? तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं के जीवन में अलबेलापन के उदाहरण ? मान, शान और अलबेलापन - अभी समय बहोत पड़ा है, हमने तो बहोत पुरुषार्थ कर लिया, हम तो बहोत पुराने है, तुम अभी अभी आये हो, करेंगे, देखेंगे । हमारी तो बहोत साधना पहले से हुई है । ये तो हममे सूक्ष्म धारणा है । तुम नहीं समझोगे । ये स्थूल धारणाए - हमारी धारणाए बहोत सूक्ष्म है । तुम अभी छोटे हो, ये सब अलबेलापन है । हमारी पहचान बहोत है, हमारे हाथ बहोत लम्बे है, हमारी जड़े बहोत गहरी है, ये सब अलबेलापन है । क्या वही वही तो मुरली होती है, वही वही तो चीजे, उसमें वही वही तो बाबा बाबा बाबा रिपीट  करते रहता है - ये अलबेलापन हे, ये साधारणता है, और क्या ?  तो ये साधारणता अलबेलापन में खो गई है ।

इसके लिए बाबाने कहा - याद के चार्ट को बढाओ । क्या करेंगे याद के चार्ट को बढाने के लीये ? थोडा थोडा अभ्यास करना है । और क्या करना है । योग का चार्ट एकदम पावरफुल हो जाए । क्या करें उसके लिए ? स्वमान का ज्यादा से ज्यादा अभ्यास । अंतरमुखता का ज्यादा से ज्यादा अभ्यास । बीच बीच में मौन का अभ्यास । चिंतन को बढाना है । और डिटेच होने का अभ्यास । रूहानी ड्रील का ज्यादा से ज्यादा अभ्यास । अशरीरीपन का ज्यादा से ज्यादा अभ्यास । सन्नाटा छा जाये जैसे - ऐसा अशरीरीपन - शरीर है ही नही । जब भी कोई दादी या महारथी उस दिन भी कह रहे थे - शरीर छोडते हो और हिस्टरी हॉल में वो मृतदेह रखा जाता है, वहां कैसा सन्नाटा छा जाता है ? पिन ड्रॉप साईंलेंस । उस अशरीरीपन का अभ्यास । जेसे देह एकलीन हो गई और केवल चमकती हुई मणी, आत्मा उड रही है - उपर । ये अभ्यास । और योग का चार्ट बढाने के लिए प्यार को बढाना है । खत लिखने है बाबा को - लेटर लिखना । अपना समाचार सुनाना और बाप का पेट - उस दिन क्या था ? खुश खैरत और सेवा समाचार से खाली पेट नही भरता । किस से पेट भरता है फिर ? सर्विस से पेट भरता है । कभी कुछ तो कभी कुछ - लहेरे उसकी इतनी चलती है कभी मुरली सेवा पर है तो कभी ज्ञान पर तो कभी योग पर । लेहरी बाबा, लहराते रहता है ।

तो योग के चार्ट को बढाने के लिए सबसे पहेले अमृतवेला पावरफुल करना है । अमृतवेला का टाइम बढाना है, अमृतवेले की क्वालिटी बढानी है अमृतवेला नींद क्यों आती है, उस पर रिसर्च करना है । पावरफुल बीजरूप स्थिति क्यों नही होती,  उसके लीऐ क्या अभ्यास करे उस पर चिंतन मनन करना है । नुमाशाम का - जैसे शक्तिशाली अमृतवेला है वैसे नुमाशाम का योग भी शक्तिशाली और जैसे नुमाशाम का योग शक्तिशाली - रात को सोने की विधी भी वैसी ही शक्तिशाली और सारे दिनभर स्वमान का अभ्यास और सारे दिनभर अशरीरीपन का अभ्यास । और सारे दिन भर आत्मिक दृष्टि का अभ्यास । क्यों कि जब तुम किसी को आत्मा देखते हो तो करंट देते हो - उसको। यदी हमारी वजह से कोई देहभान में आता है तो ये भी सूक्ष्म विकर्म है । इसके लीऐ हमे आत्मिक दृष्टि । सेवा से भी ज्यादा हिसाब किताब चुक्ते करने का महत्व है । तो सेवा तो करनी है परंतु उस सेवामें एक दुसरा काम हो रहा है । कौन सा ? हिसाब किताब चुकतु हो रहे है क्यों कि सेवाओं में बहोत सारी आत्माओं के संबंध संपर्क में आ रहे है । बडे, साथी, छोटे, बहारवाले, अंदरवाले ईन सबके साथ हमारी जबरदस्त -  हिसाब किताब है । एक एक से एसे हिसाब किताब है -  पता नहि क्या क्या पाप करके रखे है ? किस किस को कैसे कैसे दुःख देकर रखे है । जो कोर्स करने आ रहे है उनसे भी हिसाब किताब है । हम तो हंमेशा अपने लीऐ ऐसा सोचते है कि एक डॉक्टर के पेशंट के साथ कितने हिसाब किताब है ? एक एक दिन 70-70, 80-80 नई आत्माओ के साथ हिसाब किताब चालु ही रहते है । तौ हर ब्राह्मण के आत्मा की भी सबसे पहले तो घने, घडे, इस परिवार मे -  फिर बहारवालों के साथ । एक एक के साथ हिसाब किताब  है । और वो इतनी परते है उनकी 100-100 परते है, तो सेवा तो निमित्त है । मेईन काम तो करना है, क्या - ये वाला - सबके साथ हिसाब किताब चुक्तु करने का । इसलीऐ कर्मक्षेत्र में आत्मिक दृष्टि । उसके मन में जो घृणा है और नफरत वो हमने जो दुःख दीया है थोडी तो कम होगी - दृष्टि से । क्यों कि हमने तड़पा तड़पा कर उसको मारा है, पीछले जन्मो में । तो ये काम - योग को बढ़ाना, चार्ट को बढाना, इस अभ्यास को बढाना । राजयोग से सुख शांति मिलती है, ये सीखाओ, ये समझाओ - बाबा ने कहा ।

और फिर सेवाधारीओ से बात की, दो बाते - सेवामें - सभी No. 1 है । सभी को फर्स्ट प्राईज । परंतु क्या करना संतुष्ट रहेना, डिस्टर्ब ना होना और डिस्टर्ब ना करना । ऐसी सेवा जो डिस्टर्ब कर दे,  स्थिति गिर जाये - बाबाने कहा छोड दो । स्थिति का महत्व सेवा से ज्यादा है । और फिर कहा रूह-ए-गुलाब अर्थात् जो न्यारे और प्यारे रहे, जो प्रभावीत न हो, डबल लोक लगा दो - माया आ ही ना सके अंदर । तो उसका भी अभ्यास करना है । तो सेवाधारीयों ने कहा मे रूहे गुलाब हुं । सेवाधारीयों को कहा - में फर्स्ट प्राईज लेनेवाली आत्मा हुं । और फिर शांति की बातें कही । स्वयं शांत स्वरूप, पांच अनुभव, पांच दान, स्नेह का महत्व, स्नेह का विमान, स्नेह का चुंबक, स्नेह की लहरे, स्नेह की रेखाएँ । तुम्हारे चेहरे पर स्नेह के पात्र । स्नेह का क्या महत्व है, ये सारे चिंतन के विषय । ब्राह्मण कल्चर वन-वन की काठी - एक चंदन का वृक्ष । सब पर चिंतन करना है । सब पर मनन करना है । योग के चार्ट  को बढाना है ।

ऐसे बाप से मिलन मनानेवाली आत्माओं को, एसे बाप के रंग में बाप समान बननेवाली आत्माओं को, एसे सपूत सिकिलिधे बच्चों को, एसे अपने समय के प्रमाण प्राप्ति के महत्व को जानने वाली आत्माओं को, एसे निरंतर बाप को फोलो करनेवाली आत्माओं को, एसे रुहे गुलाब आत्माओं को, एसे सेवाधारी आत्माओं को, एसे फर्स्ट प्राईज लेनेवाली आत्माओं को, एसे परमात्म प्रेम के पात्र याद आत्माओं को, और बहोत सारी..... आत्माओ को - बापदादा का याद प्यार, गुड नाईट और नमस्ते । हम रूहानी बच्चों की रूहानी बापदादा को याद प्यार गुड नाईट और नमस्ते, ऊँ शांति ।